अभ्यास (5)
अनुग्रह के युग के दौरान यीशु ने कुछ वचन कहे और कार्य का एक चरण पूरा किया। उन सभी का एक संदर्भ था और वे सभी उस समय के लोगों की दशाओं के लिए उपयुक्त थे; यीशु ने उस समय के संदर्भ के अनुसार बोला और कार्य किया। उसने कुछ भविष्यवाणियाँ भी कीं। उसने भविष्यवाणी की कि सत्य का आत्मा अंत के दिनों में आएगा और कार्य का एक चरण पूरा करेगा। अर्थात् उस युग के दौरान जो कार्य उसे स्वयं करना था, उसके अलावा वह कुछ नहीं समझता था; दूसरे शब्दों में, देहधारी परमेश्वर द्वारा लाया गया कार्य सीमित है। इसलिए, वह केवल उस युग का कार्य करता है जिसमें वह होता है, और ऐसा कोई अन्य कार्य नहीं करता, जिससे उसका कोई संबंध नहीं होता। उस समय यीशु ने भावनाओं या दर्शनों के अनुसार कार्य नहीं किया, बल्कि समय और संदर्भ के उपयुक्त कार्य किया। किसी ने उसकी अगुआई या मार्गदर्शन नहीं किया। उसके कार्य की संपूर्णता उसका अपना स्वरूप था—यह वह कार्य था, जिसे परमेश्वर के आत्मा के देहधारण द्वारा पूरा किया जाना था, इस संपूर्ण कार्य का सूत्रपात देहधारण द्वारा किया गया था। यीशु ने जो स्वयं देखा और सुना, केवल उसके अनुसार कार्य किया। दूसरे शब्दों में, आत्मा ने सीधे कार्य किया; उसके लिए यह आवश्यक नहीं था कि दूत सामने आएँ या उसे सपने दिखाएँ या कोई महान रोशनी उस पर चमके और उसे देखने में सक्षम बनाए। उसने मुक्त और अबाध रूप से कार्य किया, क्योंकि उसका कार्य भावनाओं पर आधारित नहीं था। दूसरे शब्दों में, जब वह कार्य करता था तो वह टटोलता नहीं था या अंदाजा नहीं लगाता था, बल्कि इसे सुगमता से कार्यान्वित करता था, अपने विचारों और अपनी आँखों देखी के अनुसार कार्य करता और बोलता था, अपना अनुसरण करने वाले प्रत्येक शिष्य को समय पर पोषण प्रदान करता था। परमेश्वर के कार्य और लोगों के कार्य के बीच यही अंतर है : जब लोग कार्य करते हैं तो वे खोजते और टटोलते हैं, हमेशा दूसरों द्वारा रखी गई नींव के आधार पर अनुकरण या मनन करते हैं और इस प्रकार अधिक गहन प्रवेश हासिल करते हैं। परमेश्वर का कार्य उसके स्वरूप का पोषण है और वह उस कार्य को करता है जो उसे स्वयं करना चाहिए। वह किसी व्यक्ति के कार्य से प्राप्त ज्ञान का उपयोग करके कलीसिया को पोषण प्रदान नहीं करता है। इसके बजाय, वह लोगों की दशाओं के आधार पर वर्तमान कार्य करता है। इस प्रकार इस ढंग से कार्य करना लोगों द्वारा किए जाने वाले कार्य से हजारों गुना अधिक मुक्त है। लोगों को यह तक लग सकता है कि परमेश्वर “अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता है” और अपनी मनमर्जी से कार्य करता है—लेकिन वह जो भी कार्य करता है, वह सब नया होता है। फिर भी, तुम्हें पता होना चाहिए कि देहधारी परमेश्वर का कार्य कभी भी भावनाओं पर आधारित नहीं होता है। उस समय जब यीशु ने सूली चढ़ाए जाने का अपना कार्य पूरा कर लिया था, जब यीशु के अनुयायी अपने अनुभव में किसी बिंदु तक पहुँच गए तो उन्हें महसूस हुआ कि परमेश्वर का दिन आ रहा है, और वे जल्दी ही प्रभु से मिलेंगे। उनकी यही भावना थी, और उनके लिए यह भावना अत्यंत महत्वपूर्ण थी। लेकिन वास्तव में, लोगों के भीतर की भावनाएँ भरोसेमंद नहीं होतीं। उन्होंने महसूस किया कि शायद वे मार्ग के अंत पर पहुँचने वाले हैं, या जो भी उन्होंने किया और सहा, वह परमेश्वर द्वारा नियत था। पौलुस ने भी कहा कि वह अपनी दौड़ पूरी कर चुका है, वह एक अच्छी कुश्ती लड़ चुका है, और उसके लिए धार्मिकता का मुकुट रखा हुआ है। उसने ऐसा ही महसूस किया, और उसने इसे पत्रियों में लिखा और उन्हें कलीसियाओं को भेजा। ऐसे क्रियाकलाप उस दायित्व से आए जो उसने कलीसियाओं के लिए उठाया था और इस प्रकार इन्हें पवित्र आत्मा द्वारा अनदेखा कर दिया गया था। जब पौलुस ने ये शब्द कहे, तो उसे बेचैनी का कोई एहसास नहीं हुआ, न ही उसने कोई धिक्कार महसूस किया, इसलिए उसका मानना था कि ऐसी चीजें बहुत सामान्य और बिल्कुल सही हैं और वे पवित्र आत्मा से आई हैं। लेकिन आज जब हम इसे देखते हैं, तो पता चलता है कि वे पवित्र आत्मा से बिल्कुल नहीं आई थीं। वे मानवीय भ्रमों के अलावा कुछ भी नहीं थीं। मनुष्यों में बहुत-से भ्रम होते हैं और परमेश्वर उन पर ध्यान नहीं देता या उनके उत्पन्न होने पर कोई राय व्यक्त नहीं करता है। अधिकतर मामलों में पवित्र आत्मा का कार्य लोगों की भावनाओं के माध्यम से नहीं किया जाता है—उस कठिन, अंधकारमय दौर को छोड़कर जब कार्य करने के लिए परमेश्वर देहधारी नहीं हुआ होता है या उस अवधि को छोड़कर जब कोई प्रेरित या कर्मी नहीं होता है, पवित्र आत्मा लोगों की भावनाओं के भीतर कार्य नहीं करता है। उस चरण के दौरान पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को कुछ विशेष भावनाएँ प्रदान करता है। उदाहरण के लिए : जब लोगों को परमेश्वर के वचनों का मार्गदर्शन नहीं मिलता, तो प्रार्थना करते समय उन्हें खुशी का एक अवर्णनीय एहसास होता है; उनके दिलों में आनंद की भावना होती है, और वे शांत और निश्चिंत हो जाते हैं। जब लोगों को वचनों का मार्गदर्शन मिल जाता है, तो वे अपनी आत्मा में प्रबोधन महसूस करते हैं, अपने क्रियाकलापों में उनके पास अभ्यास का एक मार्ग होता है, और निस्संदेह, उनमें शांति और चैन की भी भावनाएँ होती हैं। जब लोग खतरे का सामना करते हैं या परमेश्वर उन्हें कुछ चीजें करने से रोकता है, तो वे अपने दिल में बेचैन और व्याकुल महसूस करते हैं। ये पूरी तरह से पवित्र आत्मा द्वारा मनुष्य को दी गई भावनाएँ हैं। हालाँकि, अगर कोई प्रतिकूल परिवेश डर का माहौल उत्पन्न करता है, जिससे लोग असाधारण रूप से बेचैन और डरपोक बन जाते हैं, तो यह मानवता की एक सामान्य अभिव्यक्ति है और पवित्र आत्मा के कार्य से संबंधित नहीं है।
लोग हमेशा अपनी भावनाओं के बीच रहते हैं और वर्षों से ऐसा ही करते आए हैं। जब उनके दिल में शांति होती है तो (अपनी इच्छा को शांति की भावना मानते हुए) वे कार्य करते हैं, और जब उनके दिल में शांति नहीं होती है तो (अपनी अनिच्छा या घृणा को बेचैनी की भावना मानते हुए) वे कार्य नहीं करते हैं। यदि चीजें सुचारु रूप से चलती हैं, तो उन्हें लगता है कि यह परमेश्वर का इरादा है। (वास्तव में, ये ऐसी चीजें होती हैं, जिन्हें बहुत सुचारु रूप से ही चलना चाहिए था, क्योंकि यह चीजों का प्राकृतिक नियम है।) जब चीजें सुचारु रूप से नहीं चलतीं, तो उन्हें लगता है कि यह परमेश्वर का इरादा नहीं है। इस प्रकार, जब उनका सामना किसी ऐसी चीज से होता है जो सुचारु रूप से नहीं चलती है, तो वे रुक जाते हैं। ऐसी भावनाएँ सटीक नहीं होती हैं, और उनके अनुसार कार्य करने से बहुत-से मामलों में देरी होगी। उदाहरण के लिए, सत्य को अभ्यास में लाने में निश्चित रूप से मुश्किलें होंगी और परमेश्वर की इच्छा पर चलने में तो और भी अधिक मुश्किलें होंगी। बहुत-सी सकारात्मक चीजों को आगे बढ़ाना मुश्किल होगा। जैसी कि कहावत भी है, “अच्छी चीजों के साकार होने से पहले आम तौर पर बड़ी कठिनाइयाँ आती हैं।” अपने वास्तविक जीवन में लोगों में बहुत अधिक भावनाएँ होती हैं, जिसके कारण वे निरंतर असमंजस में रहते हैं और अनेक चीजों को स्पष्ट रूप से समझ नहीं पाते हैं। जब तक लोग सत्य समझने में सक्षम नहीं हो जाते, उन्हें कुछ भी स्पष्ट नहीं होता है। लेकिन सामान्य रूप से, जब वे अपनी भावनाओं के अनुसार कार्य करते या बोलते हैं, तो जब तक उसमें ऐसा कुछ नहीं होता जो प्रमुख सिद्धांतों का उल्लंघन करता हो, तब तक पवित्र आत्मा बिल्कुल भी प्रतिक्रिया नहीं करता है। यह पौलुस द्वारा महसूस किए गए “धार्मिकता के मुकुट” की तरह है : कई सालों तक किसी ने भी नहीं माना कि उसकी भावनाएँ गलत हैं, न ही पौलुस ने कभी स्वयं महसूस किया कि उसकी भावनाएँ गलत हैं। लोगों की भावनाएँ कहाँ से आती हैं? निश्चित रूप से वे उनके मस्तिष्क से आई प्रतिक्रियाएँ होती हैं। विभिन्न परिवेशों और विभिन्न मामलों के अनुसार विभिन्न भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। अधिकांश समय लोग मानवीय तर्क से निष्कर्ष निकालते हैं जिससे सूत्रों का समुच्चय निकलता है, परिणामस्वरूप बहुत-सी मानवीय भावनाएँ निर्मित होती हैं। इसका एहसास किए बिना ही लोग अपने तार्किक निष्कर्षों में फँस जाते हैं और इस तरह ये भावनाएँ वे चीजें बन जाती हैं, जिन पर लोग अपने जीवन में निर्भर करने लगते हैं; ये उनके जीवन में भावनात्मक बैसाखी बन जाती हैं, जैसे पौलुस का “धार्मिकता का मुकुट” या विटनेस ली की “हवा में प्रभु से भेंट।” परमेश्वर के पास मनुष्यों की इन भावनाओं में हस्तक्षेप करने का लगभग कोई उपाय नहीं है, और उसे इन भावनाओं को उनकी मर्जी से विकसित होने देना पड़ता है। आज मैंने तुमसे सत्य के विभिन्न पहलुओं पर स्पष्ट रूप से बात की है। अगर तुम अपनी भावनाओं को टटोलने का प्रयास करते रहते हो, तो क्या तुम अभी भी अस्पष्टता के बीच नहीं जी रहे हो? तुम उन वचनों को स्वीकार नहीं करते हो जो स्पष्ट रूप से तुम्हारे सामने रखे गए हैं और हमेशा अपनी व्यक्तिगत भावनाओं पर निर्भर रहते हो। ऐसी स्थिति में क्या तुम किसी हाथी को टटोल रहे अंधे व्यक्ति जैसे नहीं हो? और अंततः तुम्हें क्या प्राप्त होगा?
आज देहधारी परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला समस्त कार्य व्यावहारिक है। यह ऐसा कुछ नहीं है जिसे तुम महसूस कर सकते हो, या ऐसा कुछ जिसकी तुम कल्पना कर सकते हो, यह ऐसा कुछ तो बिल्कुल नहीं है जिसका तुम अनुमान लगा सकते हो—यह केवल ऐसी चीज है जिसे तुम तब समझ पाओगे, जब तथ्यों से तुम्हारा सामना होगा। कभी-कभी, तथ्यों से सामना होने पर भी तुम स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हो और लोग तब तक नहीं समझेंगे जब तक परमेश्वर मामले के वास्तविक तथ्यों को पूरी तरह स्पष्ट करने के लिए खुद ही कार्य नहीं करता है। उस समय, यीशु का अनुसरण करने वाले शिष्यों में कई भ्रम थे। उनका मानना था कि परमेश्वर का दिन आने ही वाला है और वे जल्दी ही प्रभु के लिए मर जाएँगे और प्रभु यीशु से मिल पाएँगे। पतरस ने इस भावना के कारण पूरे सात साल तक इंतजार किया—लेकिन वह दिन फिर भी नहीं आया। उन्हें लगा कि उनका जीवन परिपक्व हो गया है; उनके भीतर की भावनाएँ कई गुना बढ़ गईं और ये भावनाएँ अधिक तीव्र हो गईं, लेकिन उन्होंने कई असफलताओं का अनुभव किया और वे सफल नहीं हो पाए। वे स्वयं नहीं जानते थे कि क्या चल रहा है। क्या ऐसा हो सकता है कि जो वास्तव में पवित्र आत्मा से आया हो, वह पूरा न हो? लोगों की भावनाएँ भरोसेमंद नहीं होतीं। चूँकि लोगों के सोचने के अपने ढंग और विचार होते हैं, वे तत्कालीन संदर्भ और दशाओं के आधार पर प्रचुर कपोल कल्पनाएँ बना लेते हैं। विशेष रूप से, जब ऐसे लोगों के साथ कुछ होता है जिनके सोचने का ढंग स्वस्थ होता है, तो वे अति उत्साहित हो जाते हैं और प्रचुर कपोल कल्पनाएँ बनाए बिना रह नहीं पाते हैं। यह विशेष रूप से उच्च ज्ञान और सिद्धांतों वाले “विशेषज्ञों” पर लागू होता है, जिनकी कपोल कल्पनाएँ सालों तक दुनिया से निपटने के बाद और भी विपुल हो जाती हैं; उन्हें एहसास हुए बिना ही, ये कपोल कल्पनाएँ उनके हृदय पर कब्जा कर लेती हैं और उनकी अत्यंत शक्तिशाली भावनाएँ बन जाती हैं, और वे इनसे संतुष्ट होते हैं। जब लोग कुछ चाहते हैं, तो उनके भीतर भावनाएँ और कल्पनाएँ प्रकट होंगी और उन्हें लगेगा कि ये सही हैं। बाद में, जब लोग देखते हैं कि ये पूरी नहीं हुई हैं, तो लोग यह पता नहीं लगा पाते हैं कि चीजें कहाँ गड़बड़ हुईं। शायद वे मानते हैं कि परमेश्वर ने अपनी योजना बदल दी है।
लोगों में भावनाएँ होना अपरिहार्य है। व्यवस्था के युग में भी कई लोगों में कुछ भावनाएँ होती थीं, लेकिन आज के लोगों की तुलना में उनकी भावनाओं में त्रुटियाँ कम होती थीं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि पहले लोग यहोवा का प्रकटन देख पाते थे; वे दूतों को देख सकते थे और उन्हें सपने भी आते थे। आज के लोग दर्शनों या दूतों को देखने में असमर्थ हैं, इसलिए उनकी भावनाओं में त्रुटियाँ बढ़ गई हैं। जब आज के लोगों को लगता है कि कोई बात विशेष रूप से सही है, और वे उस पर अमल करने लगते हैं, तो पवित्र आत्मा उन्हें धिक्कारता नहीं है और वे भीतर से बहुत शांति से रहते हैं। घटनाक्रम के बाद, केवल संगति करने या परमेश्वर के वचन पढ़ने से ही उन्हें पता चलता है कि वे गलत थे। इसका एक पहलू यह है कि लोगों को कोई दूत दिखाई नहीं देते, सपने बहुत कम आते हैं, और लोगों को आकाश में दर्शनों से संबंधित कुछ दिखाई नहीं देता। एक दूसरा पहलू यह है कि पवित्र आत्मा लोगों में अपना धिक्कार और अनुशासन तीव्र रूप से नहीं बढ़ाता है; उनके भीतर पवित्र आत्मा का मुश्किल से ही कोई कार्य होता है। इसलिए, अगर लोग परमेश्वर के वचनों को नहीं खाते-पीते, व्यावहारिक ढंग से सत्य की खोज नहीं करते, और अभ्यास के मार्ग को नहीं समझते, तो उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होगा। पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांत इस प्रकार हैं : वह उस चीज पर ध्यान नहीं देता, जो उसके कार्य में शामिल नहीं है; अगर कोई चीज उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है तो वह कतई कभी हस्तक्षेप या दखलंदाजी नहीं करता है, लोग जो भी मुसीबत चाहें उन्हें खड़ी करने देता है। तुम जैसे चाहो वैसे कार्य कर सकते हो, लेकिन वह दिन आएगा जब तुम खुद को किंकर्तव्यविमूढ़ पाओगे। परमेश्वर अपनी देह में एकचित्त होकर कार्य करता है, कभी भी मनुष्य के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करता। इसके बजाय, वह लोगों की दुनिया से बचकर ही रहता है और वही कार्य करता है, जो उसे करना चाहिए। आज अगर तुम कुछ गलत करते हो, तो धिक्कारे नहीं जाओगे, न ही कल कुछ अच्छा करने पर पुरस्कृत किए जाओगे। ये इंसानी मामले हैं, और पवित्र आत्मा के कार्य से थोड़ा-सा भी संबंध नहीं रखते—यह बिल्कुल भी मेरे कार्य के दायरे में नहीं आता।
जिस समय पतरस कार्य कर रहा था, उस समय उसने बहुत-से वचन बोले और बहुत कार्य किया। क्या यह संभव है कि उनमें से कोई भी इंसानी विचारों से न आया हो? उनका पूरी तरह से पवित्र आत्मा से आना असंभव है। पतरस मात्र एक सृजित प्राणी था, वह एक अनुयायी था, वह पतरस था, यीशु नहीं, और उनके सार एक-जैसे नहीं थे। हालाँकि पतरस को पवित्र आत्मा द्वारा भेजा गया था, लेकिन उसके द्वारा किया गया सब-कुछ पूर्ण रूप से पवित्र आत्मा से नहीं आया था, क्योंकि आखिरकार वह एक मनुष्य था। पौलुस ने बहुत-से वचन भी कहे और बड़ी संख्या में पत्रियाँ भी लिखीं, जिनमें से कुछ बाइबल में संकलित हैं। पवित्र आत्मा ने कोई राय व्यक्त नहीं की, क्योंकि यह वह समय था जब पौलुस का पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जा रहा था। उसने कुछ अनुभवजन्य ज्ञान प्राप्त किया, इसे लिखा और प्रभु में विश्वास के नाते बने अपने भाई-बहनों तक पहुँचा दिया। यीशु ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उस समय पवित्र आत्मा ने उसे क्यों नहीं रोका? ऐसा इसलिए था, क्योंकि कुछ अशुद्धियाँ हैं जो लोगों के सोचने के सामान्य ढंग से उपजती हैं; यह अपरिहार्य है। साथ ही, उसके क्रियाकलाप गड़बड़ी या बाधा के स्तर तक नहीं पहुँचे। जब इस तरह का कोई मानवता का कार्य होता है तो लोगों के लिए इसे स्वीकार करना आसान होता है। अगर इंसान के सोचने के सामान्य ढंग की अशुद्धियाँ किसी चीज में गड़बड़ी नहीं करती हैं, तो वे सामान्य मानी जाती हैं। दूसरे शब्दों में, सामान्य ढंग से सोचने वाले सभी लोग उसी ढंग से सोचने में सक्षम होते हैं। जब लोग देह में रहते हैं तो उनके पास सोचने का अपना ढंग होता है, लेकिन इन्हें बाहर निकालने का कोई तरीका नहीं होता है। लेकिन, कुछ समय तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने और कुछ सत्य समझने के बाद सोचने के ये ढंग कुछ कम हो जाएंगे। जब वे और अधिक चीजों का अनुभव कर लेंगे तो वे स्पष्ट रूप से देख पाएँगे और चीजों में कम गड़बड़ी करेंगे। दूसरे शब्दों में, जब लोगों की कल्पनाओं और तार्किक निष्कर्षों का खंडन किया जाता है, तो उनकी असामान्य भावनाएँ कम हो जाती हैं। जो लोग देह में रहते हैं, उन सभी के सोचने के अपने ढंग होते हैं, लेकिन अंत में, परमेश्वर उन पर इस स्तर तक कार्य करेगा कि उनके सोचने का ढंग उन्हें बाधित नहीं कर पाएगा, वे अब अपने जीवन में भावनाओं पर निर्भर नहीं रहेंगे, उनका वास्तविक आध्यात्मिक कद बढ़ जाएगा, वे वास्तविकता के भीतर परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सकेंगे और अब वे ऐसी चीजें नहीं करेंगे जो अस्पष्ट और खोखली हैं और फिर वे ऐसी चीजें नहीं करेंगे जो गड़बड़ियाँ पैदा करती हैं। इस तरह उनके भ्रम अब नहीं रहेंगे और इस समय के बाद से उनके क्रियाकलाप ही उनका असली आध्यात्मिक कद होंगे।