85. क्रूर यातना का समय

चेन हुई, चीन

मैं चीन के एक साधारण परिवार में पली-बढ़ी हूँ। मेरे पिता सेना में थे और चूंकि मैं कम उम्र से ही उनके द्वारा ढाली गई थी और उनसे प्रभावित थी, इसलिए मैं यह मानने लगी थी कि एक सैनिक का पेशा और कर्तव्य मातृभूमि की सेवा करना, आदेशों का पालन करना और कम्युनिस्ट पार्टी तथा जनता की निस्वार्थ भाव से सेवा करना है। मैंने भी सैनिक बनने और अपने पिता के नक्शेकदम पर चलने का संकल्प ले लिया। लेकिन, जैसे-जैसे समय बीता, कुछ ऐसी घटनाएं घटीं, जिससे मेरे जीवन का मार्ग और मेरे लक्ष्य की दिशा धीरे-धीरे बदल गई। 1983 में, मैंने प्रभु यीशु का सुसमाचार सुना। यह पवित्र आत्मा का विशेष मार्गदर्शन था जिसके कारण मेरे जैसा व्यक्ति, जिसे कच्ची उम्र से ही नास्तिकता और चीनी कम्युनिस्ट विचारधारा का ज़हर दिया गया था, प्रभु यीशु के प्रेम से बहुत प्रभावित हो गया। सुसमाचार सुनने के बाद, मैंने परमेश्वर में विश्वास के जीवन को अपना लिया—मैंने कलीसिया जाना, प्रार्थना करना और प्रभु की स्तुति में भजन गाना शुरू कर दिया। इस नए जीवन ने मुझे बहुत स्थिरता और शांति दी। 1999 में, मैंने वापस आए प्रभु यीशु—सर्वशक्तिमान परमेश्वर—के अंत के दिनों के सुसमाचार को स्वीकार कर लिया। परमेश्वर के वचन लगातार पढ़ने और अपने भाई-बहनों से मिलने तथा संगति करने से, मैंने कई सत्यों को समझा और मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के अत्यावश्यक उद्देश्य के बारे में जाना। मैंने महसूस किया कि परमेश्वर ने हम में से प्रत्येक को एक महान उद्यम और जिम्मेदारी दी है, और इसलिए मैं उत्‍साहपूर्वक सुसमाचार फैलाने के काम में जुट गया।

मगर सीसीपी सरकार के क्रूर उत्पीड़न ने मेरे शांत और खुशहाल जीवन को छिन्‍न-भिन्‍न कर दिया। अगस्त 2002 में, प्रभु में विश्वास रखने वाले अपने कुछ सहकर्मियों के बीच सुसमाचार का प्रचार करने के लिए, मैंने अपने पति के साथ उत्तर-पश्चिम की यात्रा की। एक रात, जब मैं दो भाई-बहनों के साथ बैठक कर रही थी, जिन्होंने हाल ही में अंत के दिनों के परमेश्वर के काम को स्वीकार किया था, तो मैंने अचानक कुछ भड़भड़ाने की आवा़ज़ सुनी और देखा कि डंडे लिये हुए छह-सात पिशाच-से दिखने वाले पुलिसवाले लातों से दरवाजा तोड़कर भीतर घुस आये हैं। एक पुलिसवाले ने मेरी ओर इशारा किया और क्रूर गुर्राहट के साथ कहा, "इसे हथकड़ी पहनाओ!" दो पुलिसवालों ने हमें दीवार के सहारे बिना हिले-डुले खड़े होने का आदेश दिया और हमलावर डाकुओं की तरह घर में रखे बक्सों और संदूकों को खोलकर तलाशी लेनी शुरू कर दी। वे लोग बारीकी से ऐसी हर चीज़ और जगह की तलाशी लेने लगे जहाँ उन्हें संदेह था कि चीज़ें छिपाई जा सकती हैं। कुछ ही समय में उन्होंने पूरी जगह को उलट-पुलट कर रख दिया। अंत में, एक पुलिसवाले को मेरी बहन के बैग में एक सुसमाचार पुस्तिका और परमेश्वर के वचन की एक पुस्तक मिल गई। उसने मुझे खूँखार नज़रों‍ से घूरते हुए चिल्लाकर कहा, "क्या तू मरना चाहती है? यहाँ आकर अपना सुसमाचार फैला रही है। यह कहां से आया?" मैंने कोई जवाब नहीं दिया तो वह गुस्‍से से बोला, "तो तू नहीं बोलेगी, हूं? हम तेरा मुंह खुलवाएंगे। चल! जहां हम जा रहे हैं वहां तू खुद ही बोलेगी!" वह मुझे घसीटकर घर से बाहर लाया और पुलिस की गाड़ी में धकेल दिया। उस समय, मुझे एहसास हुआ कि उन्‍होंने सिर्फ छह या सात पुलिसवाले ही नहीं भेजे थे—बल्कि बाहर की सड़क के दोनों ओर विशेष पुलिस के बहुत से सशस्त्र लोग खड़े हुए थे। जब मैंने देखा कि उन्होंने हमें पकड़ने के लिए कितना बड़ा पुलिसबल तैनात किया हुआ है, तो मैं बहुत डर गई और अनायास ही परमेश्वर के मार्गदर्शन और सुरक्षा की याचना करते हुए उससे प्रार्थना करने लगी। कुछ ही समय बाद, मेरे मन में परमेश्वर के वचन का एक अंश आया, "तुम जानते हो कि तुम्हारे आसपास के परिवेश में सभी चीजें मेरी अनुमति से हैं, सब मेरे द्वारा आयोजित हैं। स्पष्ट रूप से देखो और अपने को मेरे द्वारा दिए गए परिवेश में मेरे दिल को संतुष्ट करो। डरो मत, समुदायों का सर्वशक्तिमान परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारे साथ होगा; वह तुम लोगों के पीछे खड़ा है और तुम्हारी ढाल है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 26')। "यह सही है!" मैंने सोचा। "परमेश्वर मेरा सहारा है; मुझे चाहे जैसी स्थिति का सामना करना पड़े, सभी चीज़ों का शासक और रचयिता, परमेश्वर, हमेशा मेरे साथ है। मुझे चाहे जिस स्थिति का सामना करना पड़े, उससे पार पाने की राह परमेश्वर मुझे दिखाएगा। क्योंकि, वह भरोसेमंद है और वही सभी चीज़ों पर शासन करता है और उनका आयोजन करता है।" इन बातों को सोचते हुए, मेरा मन फिर से शांत हो गया।

उस रात लगभग दस बजे मुझे आपराधिक पुलिस ब्रिगेड में लाया गया। मेरी तस्वीर ली गई, और फिर मुझे एक पूछताछ कक्ष में ले जाया गया। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वहाँ पहले से ही चार-पाँच क्रूर दिखने वाले गुंडे थे। जब मैं अंदर आ रही थी तो वे मुझे घूर रहे थे। जैसे ही मैं कमरे में दाखिल हुई, उन्होंने शिकार पर टूट पड़ने के लिए तैयार भूखे भेड़ियों के झुंड की तरह मुझे चारों ओर से घेर लिया। मैं बुरी तरह से घबरा गई और बदहवास होकर परमेश्वर से प्रार्थना करने लगी। पहले तो, इन पुलिस के गुंडों ने मुझ पर उंगली भी नहीं उठाई, बस मुझे तीन-चार घंटे तक खड़े रहने का आदेश दिया। मैं इतनी देर तक खड़ी रही कि मेरी टांगें और पैर के पंजे दर्द से अकड़ने और सुन्न होने लगे और मेरा पूरा शरीर थकान से निढाल हो गया। रात के लगभग एक या दो बजे, आपराधिक पुलिस ब्रिगेड का प्रमुख मुझसे पूछताछ करने के लिए आया। मैं घबराहट से कांपने लगी। उसने मुझे घूरकर देखा और मुझसे पूछताछ शुरू करते हुए बोला, "बताओ! तुम कहां की रहने वाली हो? यहाँ तुम किसे जानती हो? तुम्हारा वरिष्‍ठ कौन है? तुम लोगों की सभाएं कहां होती रही हैं? तुम्‍हारे अधीन कितने लोग काम कर रहे हैं?" जब मैंने कुछ नहीं कहा, तो वह गुस्‍से से बौरा गया, मुझे बालों से पकड़ लिया और घूंसे और लातें बरसाने लगा। मुझे बहुत पीटने के बाद भी उसने लात-घूँसे मारना जारी रखा। एकदम से मेरे कान बजने लगे जिससे मुझे कुछ भी सुनाई देना बंद हो गया, और ऐसा लगा जैसे मेरा सिर तेज दर्द से फटने वाला है। मैं दर्द से चीखे बिना नहीं रह सकी। कुछ देर और संघर्ष करने के बाद, मेरे लिए हिलना-डुलना भी मुश्किल हो गया, मैं फर्श पर ही लेट गई। प्रमुख ने मुझे फिर से बालों से पकड़ लिया और मुझे घसीटते हुए खड़ा कर दिया। उसके बाद उन क्रूर गुंडों में से चार-पांच मेरे चारों ओर इकट्ठा हो गए और उन्होंने मुझे लातों-घूंसों से मारना शुरू कर दिया; मैं ज़मीन पर गिर गई, मैं हाथों से अपने सिर को ढँक रही थी, और दर्द से इधर-उधर लोट‌पोट होकर तड़प रही थी। पुलिस के ये गुंडे कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे—हर लात और घूंसे में घातक बल था। मुझे मारते हुए वे चिल्ला रहे थे, "तू बोलेगी या नहीं? मुँह बंद रखने की हिम्मत करके तो दिखा! बता दे वरना तू मरेगी!" जब प्रमुख ने देखा कि मैं अभी भी बात नहीं कर रही हूं, तो उसने मेरे टखने में कसकर लात मारी। उसकी हर लात पर मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी हड्डियों में कील ठोंक दी हो, यह बेहद तकलीफदेह था। उसके बाद, वे मुझे तब तक लातों से मारते रहे जब तक कि मुझे ऐसा नहीं लगने लगा कि उन्होंने मेरे शरीर की हर हड्डी को तोड़ डाला है। मेरे भीतर हो रही भीषण ऐंठन के कारण मुझे इतना दर्द हुआ कि मैं मुश्किल से सांस ले पा रही थी। मैं साँस लेने के लिए छटपटाती हुई और दर्दभरेआंसू बहाती हुई जमीन पर पड़ी थी। दिल ही दिल में, मैंने परमेश्वर को पुकारते हुए कहा, "प्रिय परमेश्वर! मैं और नहीं झेल सकती। मेरी रक्षा करें, वरना शायद मैं ये रात न निकाल पाऊँ। हे परमेश्वर, मुझे शक्ति प्रदान करो। ..." मुझे नहीं पता कि यातनाएं कब तक चलती रहीं। मुझे बहुत चक्कर आ रहा था और इतना भयानक दर्द हो रहा था कि मुझे लगा जैसे मेरा अंग-अंग टूट गया हो। दर्द इतना तीखा था कि वास्तव में मेरा पूरा शरीर सुन्न हो गया। पुलिस के एक गुंडे ने कहा, "लगता है अभी भी तेरा जी नहीं भरा। तू ज़रूर बोलेगी!" यह बोलते हुए उसने एक बिजली के हथौड़े जैसी दिखने वाली एक चीज़ उठाई और मेरे माथे पर दे मारी। उसकी हर चोट मुझे अपनी हड्डी के भीतर तक महसूस हुई, और उसके हर वार पर मेरा शरीर सुन्‍न हो जाता था। फिर मैं ढीली पड़ गयी और लगातार कांपती रही। जब उन्होंने देखा कि मैं कितनी तकलीफ़ में हूं, तो वह अपने काम से खुश लगा और ठहाके मारकर हंसने लगा। पीड़ा के बीच, परमेश्वर के वचन ने मुझे मार्गदर्शन व प्रबोधन दिया : "तुम्हें सत्य के लिए कष्ट उठाने होंगे, तुम्हें सत्य के लिए समर्पित होना होगा, तुम्हें सत्य के लिए अपमान सहना होगा, और अधिक सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें अधिक कष्ट उठाने होंगे। यही तुम्हें करना चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान')। परमेश्वर के वचन ने मुझे अविश्वसनीय शक्ति दी, और मैंने मन ही मन उस अंश को बार-बार दोहराया। मैंने सोचा : "मैं शैतान के आगे समर्पण करके परमेश्वर को निराश नहीं कर सकती। सत्य को प्राप्त करने के लिए, मैं किसी भी कष्ट को सहन करने का प्रण लेती हूं, और अगर इसका अर्थ मेरी मृत्यु है, तब भी यह सार्थक होगी और मेरा जीवन व्यर्थ नहीं जाएगा!" राक्षसों के इस गिरोह ने अगली सुबह तक मुझसे पूछताछ की, लेकिन मुझे प्रोत्साहित करने के लिए परमेश्वर का वचन मेरे पास था, इसलिए मैं उनकी यातना को झेल सकी। अंत में, उनकी कोई रणनीति काम नहीं आई और वे बेबस होकर कहने लगे, "तू एक साधारण गृहिणी की तरह लगती है जिसमें कोई विशेष प्रतिभा नहीं है, तो तेरे परमेश्वर ने तुझे इतनी जबरदस्त ताकत कैसे दे दी?" मुझे पता था कि ये पुलिस के गुंडे मुझसे हार नहीं मान रहे, बल्कि वे परमेश्वर के अधिकार और शक्ति के सामने आत्मसमर्पण कर रहे थे। मैंने स्वयं देखा कि परमेश्वर का वचन सत्य है, यह लोगों को अपार शक्ति से भर सकता है, और परमेश्वर के वचन के अनुसार आचरण करने से व्यक्ति मृत्यु के भय को दूर कर सकता है और शैतान को परास्‍त कर सकता है। इस सबके परिणामस्वरूप, परमेश्वर में मेरा विश्वास और भी मजबूत हो गया।

दूसरे दिन सुबह करीब सात बजे प्रमुख मुझसे दोबारा पूछताछ करने आया। जब उसने देखा कि मैं अभी भी बोलने के लिए तैयार नहीं हूँ, तो उसने मुझे एक और धूर्तता भरी चाल से लुभाने की कोशिश की। सादी वर्दी में एक गंजा पुलिसकर्मी अंदर आया, उसने मुझे उठने में मदद की, और मुझे एक सोफे पर बैठाया। उसने मेरे कपड़े ठीक किए, मुझे कंधे पर थपथपाया और चिंता का दिखावा करते झूठी मुस्‍कान के साथ कहा, "खुद को देखिए, इस तरह से तकलीफ झेलने का कोई मतलब नहीं है। बस हमें जानकारी दे दीजिए और फिर आप घर जा सकती हैं। यहाँ रहकर यह सब कष्ट क्यों सहना? आपके बच्चे घर पर आपका इंतजार कर रहे हैं। क्या आप जानती हैं कि आपको इस तरह से पीड़ित होते हुए देख मुझे कितना दुख हो रहा है?" उसके सारे झूठ सुनकर और उस घृणित, बेशर्म चेहरे को देखकर, मैंने गुस्से से दाँत पीसे और मन में सोचा, "तुम सिर्फ एक राक्षस हो जो मुझे धोखा देने के लिए तमाम तरह के झूठ बोलता है। एक मिनट के लिए भी ये मत सोचना कि मैं परमेश्वर को धोखा देने वाली हूं! सपने में भी मत सोचना कि मैं कलीसिया के बारे में एक शब्द भी बोलने वाली हूं!" जब पुलिसवाले ने देखा कि मुझ पर कोई असर नहीं हुआ है, तो वह मुझे कामुक ढंग से घूरने लगा और अपने हाथ से मेरा शरीर सहलाने लगा। मैं एकदम से उससे दूर जाने लगी, लेकिन उस बदमाश ने मुझे एक हाथ से पकड़ रखा था ताकि मैं हिल न सकूं और फिर उसने अपने दूसरे हाथ से मेरी छाती पकड़ ली। मैं दर्द से चीख उठी और इस आदमी के लिए मैंने असीम घृणा महसूस की; मुझे इतना गुस्सा आ रहा था कि मेरा पूरा शरीर काँपने लगा और मेरे गालों पर आँसू बहने लगे। मैंने गुस्से से दहकती आँखों से उसे देखा और और मेरी नज़रों को देखकर उसने मुझे छोड़ दिया। इस व्यक्तिगत अनुभव से, मैंने सीसीपी सरकार की दुष्ट, प्रतिक्रियावादी और क्रूर प्रकृति को देखा। मैंने देखा कि कैसे सीसीपी की संस्था के लिए काम करने वाली "जनता की पुलिस" में वास्तव में बिल्कुल नीच, बेशर्म गुंडे और नीच लोग हैं जिनमें ज़रा भी ज़मीर नहीं है! चूंकि मुझे 24 घंटे से पानी की एक बूंद नहीं मिली थी, इसलिए मेरा शरीर खतरनाक रूप से कमज़ोर और जर्जर हो गया था और मुझे यकीन नहीं था कि अब मैं और जी सकूंगी। मैं अचानक दुख और निराशा की भावना से घिर गई। उस समय, मुझे कलीसिया का एक भजन याद आ गया। "भले ही बड़े लाल अजगर ने मुझे उत्पीड़ित और गिरफ्तार किया, लेकिन मैं परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए और भी अधिक संकल्पित हूँ। मैं देखता हूँ कि बड़ा लाल अजगर कितना दुष्ट है; वह परमेश्वर को कैसे सहन कर सकता है? परमेश्वर देह में आ गया है—मैं उसका अनुसरण कैसे न करूँ? मैं शैतान को त्यागता हूँ, और दृढ़ इच्छा से परमेश्वर के पीछे चलता हूँ। जहाँ भी शैतान सत्ता में है, वहाँ परमेश्वर पर विश्वास करना मुश्किल है। शैतान मेरे पीछे पड़ा है; रहने के लिए कोई सुरक्षित स्थान नहीं है। परमेश्वर पर विश्वास और उसकी आराधना करना बिलकुल सही है। परमेश्वर से प्रेम करने के लिए चुने जाकर, मैं अंत तक वफादार रहूँगा। शैतान की चालें क्रूर, शातिर और सच में घिनौनी हैं। शैतान का चेहरा स्पष्ट रूप से देखने के बाद मैं मसीह को और भी अधिक प्यार करता हूँ। मैं नहीं झुकूँगा शैतान के सामने, निरर्थक अस्तित्व नहीं जिऊँगा। मैं सहूँगा सारी यातना, कठिनाई और दर्द, और सबसे अँधेरी रातें गुजार लूँगा। परमेश्वर को सुकून देने के लिए मैं विजयी गवाही दूँगा और शैतान को शर्मिंदा करूँगा" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'अँधेरे और दमन के बीच उठ खड़े होना')। यह मधुर और शक्तिशाली भजन मेरे लिए बहुत प्रेरणादायी था : ये राक्षस परमेश्वर के विश्वासियों को इसीलिए इस तरह सता रहे थे क्योंकि वे परमेश्वर से नफरत करते हैं। उनका कायरतापूर्ण और दुष्टतापूर्ण लक्ष्य हमें परमेश्वर में विश्वास करने और उसका अनुसरण करने से रोकना, और इस प्रकार परमेश्वर के कार्य को बाधित और नष्ट करना और मानवजाति के उद्धार के अवसर को बर्बाद करना है। इस आध्यात्मिक लड़ाई के इस महत्वपूर्ण क्षण में, मैं बस पड़े रहकर खुद को शैतान के मजाक का पात्र नहीं बनने दे सकती थी। जितना अधिक शैतान मुझे सताता था, उतने ही स्पष्ट रूप से मैं उसके राक्षसी चेहरे को देख सकती थी और उतना ही अधिक मैं उसे तिलांजलि देकर परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना चाहती थी। मुझे विश्वास है कि परमेश्वर विजयी होगा, और शैतान की हार होनी तय है। मैं हार नहीं मान सकती थी और परमेश्वर पर भरोसा करना चाहती थी, उसके लिए एक मजबूत और शानदार गवाही देना चाहती थी।

जब पुलिस को समझ आया कि उन्हें मुझसे काम की कोई जानकारी नहीं मिलने वाली है, तो उन्होंने पूछताछ करना छोड़ दिया और उसी शाम, उन्होंने मुझे एक सुधार गृह में पहुंचा दिया। उस समय तक, मुझे इतना पीटा गया था कि मुझे पहचानना कठिन था—मेरा चेहरा सूज गया था, मैं अपनी आँखें नहीं खोल पा रही थी और मेरे होंठ घावों से भर गए थे। सुधार गृह के सुरक्षाकर्मियों ने एक नज़र मुझ पर डाली और यह देखकर कि मुझे पीट-पीट कर लगभग मार डाला गया है, उन्‍होंने मुझे स्वीकार करने से इनकार कर दिया क्योंकि जो कुछ हुआ था उसकी ज़ि‍म्‍मेदारी वे नहीं लेना चाहते थे। हालांकि, कुछ बातचीत के बाद, आखिरकार मुझे उस शाम लगभग सात बजे अंदर ले लिया गया और एक कोठरी में पहुंचा दिया गया।

उस रात, मैंने गिरफ्तार होने के बाद से पहला भोजन खाया : एक कड़ी, काली, और चीमड़ उबली हुई पावरोटी, जिसे चबाना और निगलना भी मुश्किल था, और सूखी हुई सब्जियों के सूप का एक कटोरा जिसमें मरे हुए कीड़े तैर रहे थे और गंदगी की एक परत कटोरे की तली में जमी हुई थी। लेकिन इन सबके बावजूद मैंने उस भोजन को तेज़ी से खत्‍म कर दिया। चूंकि मैं एक विश्वासी थी, इसलिए अगले कुछ दिनों में, सुधार अधिकारी दूसरे कैदियों को मेरा जीना दूभर बना देने के लिए उकसाने लगा। एक बार, हमारी कोठरी की प्रमुख कैदी के आदेश पर उसके मातहतों ने मुझे बालों से पकड़कर मेरा सिर दीवार से दे मारा। उन्होंने मेरे सिर को दीवार से इतनी ज़ोर से टकराया कि मुझे चक्कर आ गया और मैं सीधे देख नहीं पा रही थी। इसके अलावा, रात में वे मुझे बिस्तर पर सोने की अनुमति नहीं देते थे और इसलिए मुझे शौचालय के बगल में ठंडे कंक्रीट के फर्श पर सोना पड़ता था। इतना ही नहीं, जेल के सुरक्षाकर्मी मुझे सुधार गृह के नियम सुनाने के लिए कहते, और अगर मैं गलत सुनाती या भूल जाती, तो वे मुझे चमड़े की बेल्ट से मारते थे। लगभग लगातार होने वाली इस अमानवीय यातना और अपमान का सामना करते हुए, मैं कमज़ोर हो गई, और सोचने लगी कि दिन-रात पिंजरे में बंद पशु की तरह तकलीफ झेलने से तो बेहतर है कि मैं मर जाऊं। कई मौकों पर, जब मैं अपने सिर को दीवार पर मारकर सबकुछ खत्म कर देने के कगार पर होती, तो परमेश्वर के वचन मेरा मार्गदर्शन करते हुए कहते, "इन अंतिम दिनों में, तुम्हें अवश्य ही परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें अवश्य ही परमेश्वर के प्रति निष्ठावान और उसकी कृपा पर बने रहना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही सशक्त और जोरदार गवाही है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे प्रोत्साहन दिया और मेरे दिल को राहत दी। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए मेरी आँखों से आँसू बह निकलते। मैं सोचती कि जब मुझे पुलिस के गुंडों द्वारा बुरी तरह से पीटा जाता था, तो परमेश्वर का प्रेम ही हर समय मेरा ख़्याल रखता था, उसी ने अपने वचनों से मेरा मार्गदर्शन किया था, और मुझे विश्वास और शक्ति दी थी, और मुझे दृढ़ता से उस भयानक यातना के बीच ज़िंदा रखा था। जब हमारी कोठरी की प्रमुख कैदी के दुर्व्यवहार, गुंडागर्दी और अन्य कैदियों द्वारा उस हद तक यातनाएं दिए जाने के बाद मैं अवसाद की ऐसी हालत में पहुंच गई थी जहां मैं अपने जीवन को समाप्त करने पर विचार कर रही थी, तो परमेश्वर के वचनों ने ही मुझे एक बार फिर विश्वास और नए सिरे से उठ खड़े होने का साहस दिया था। यदि परमेश्वर मेरी निगरानी करते हुए मेरे साथ नहीं रहा होता, तो वे दुष्‍ट पिशाच बहुत पहले ही यातनाएं देकर मुझे मार चुके होते। परमेश्वर के महान प्यार और दया के सामने, मैं अब निष्क्रिय रूप से विरोध करके परमेश्वर के हृदय को दुःखी नहीं कर सकती थी। मुझे परमेश्वर के साथ दृढ़ रहना था और निष्ठा के साथ परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान देना था। अनायास, जब मैंने अपने मन की स्थिति को दुरुस्‍त कर लिया, तो परमेश्वर के कारण एक दूसरी कैदी मेरी ओर से विरोध करने के लिए उठी और उसके और प्रमुख कैदी के बीच खूब लड़ाई हुई। अंतत: प्रमुख कैदी झुक गयी और उसने मुझे बिस्तर पर सोने दिया। परमेश्वर का धन्यवाद। अगर परमेश्वर की दया न होती, तो गीले, ठंडे कंक्रीट के फर्श पर लंबे समय तक सोते रहने से मेरी मौत हो जाती या मेरे कमज़ोर शरीर के कारण मुझे लकवा मार जाता। इस तरह, मैं सुधार गृह में तोड़कर रख देने वाले महीनों के दौरान जीवित रहने में कामयाब रही। उस दौरान, पुलिस के गुंडों ने वही अच्छी पुलिस, बुरी पुलिस का खेल खेलकर मुझसे दो बार पूछताछ की। लेकिन परमेश्वर की सुरक्षा के चलते, मैं शैतान की धूर्त चाल को देखने और उनकी दुष्ट योजना को विफल करने में सफल रही। अंत में, उनकी सारी चालें खत्म हो गईं और उनकी सारी पूछताछ असफल होने के बाद, उन्होंने आखिरकार मुझे तीन साल के कारावास की सज़ा सुनाई। सज़ा काटने के लिए उन्होंने मुझे किसी दूसरी महिला जेल में भेज दिया।

जेल में पहुँचने के पहले दिन से ही मुझे बेहद थकाऊ शारीरिक श्रम करने के लिए मजबूर किया गया। मुझे दिन में दस घंटे काम करना पड़ता था, और मुझे एक स्वेटर बुनना पड़ता था या कपड़े की तीस-चालीस चीज़ें बनानी पड़ती थीं या हर दिन दस-हजार जोड़ी चॉपस्टिक्स पैक करने पड़ते थे। अगर मैं इन कार्यों को पूरा करने में असमर्थ होती, तो मेरी जेल की अवधि बढ़ा दी जाती। मानो ये शारीरिक श्रम पर्याप्त थकाऊ नहीं था, रात में हमारा मनोबल तोड़ने के इरादे से हमें एक तरह के राजनीतिक मत-परिवर्तन में भाग लेने के लिए मजबूर किया जाता, जिसमें हमें जेल के नियमों, कानून, मार्क्सवाद-लेनिनवाद, और माओ त्‍से-तुंग की विचारधारा का अध्ययन करने के लिए बाध्‍य किया जाता था। जब भी मैं सुधार अधिकारियों को उनकी नास्तिकता से भरी वाहियात बातें करते हुए सुनती, मुझे उल्टी जैसा महसूस होता और उनके घृणित, बेशर्म तरीकों से भयंकर नफ़रत होती। जेल में रहने के दौरान, मैं एक रात भी चैन से सो नहीं पाई—हम अक्सर जेल के पहरेदारों की सीटी से आधी रात में चौंककर जाग जाते थे। वे या तो हमें उठाकर बिना किसी स्पष्ट कारण के गलियारे में खड़ा कर देते या हमें आलू, मक्का और चारा उठाकर लाने जैसे काम सौंप देते। हर बोरी का वजन 50 किलोग्राम से अधिक होता था। सर्दियों की रातों में, हमें सांय-सांय करती, हाड़ कंपा देने वाली हवाओं से जूझना पड़ता। हम झुके हुए और लड़खड़ाते हुए एक-एक कदम बढ़ाते, कभी-कभी हम अपनी पीठ पर लदे बोझ से ढेर भी हो जाते। अक्सर, मैं अपने थके हुए शरीर को ढोते हुए रात के दो-तीन बजे अपनी कोठरी में पहुँचती, मैं थककर चूर हो जाती और आँखों में आँसू भर आते। ऐसी रातों में, थकान, ठंड और गुस्से के मिले-जुले असर से मैं सो नहीं पाती थी। जब भी मैं सोचती कि मुझे अभी भी तीन साल की कैद और झेलनी है, तो मैं और भी निराशा में डूब जाती और मेरा पूरा शरीर थकावट से सुन्न हो जाता। परमेश्वर मेरे दुख से भलीभांति परिचित था, और मेरे सबसे कमज़ोर क्षणों में, उसने मुझे अपने वचनों के इस अंश को याद करने के लिए निर्देशित किया, "निराश न हो, कमज़ोर न बनो, मैं तुम्हारे लिए चीज़ें स्पष्ट कर दूँगा। राज्य की राह इतनी आसान नहीं है; कुछ भी इतना सरल नहीं है! तुम चाहते हो कि आशीष आसानी से मिल जाएँ, है न? आज हर किसी को कठोर परीक्षणों का सामना करना होगा। बिना इन परीक्षणों के मुझे प्यार करने वाला तुम लोगों का दिल मजबूत नहीं होगा और तुम्हें मुझसे सच्चा प्यार नहीं होगा। यदि ये परीक्षण केवल मामूली परिस्थितियों से युक्त भी हों, तो भी सभी को इनसे गुज़रना होगा; अंतर केवल इतना है कि परीक्षणों की कठिनाई हर एक व्यक्ति के लिए अलग-अलग होगी" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 41')। परमेश्वर के वचन मेरे दुखी और पीड़ित हृदय के लिए गहरी राहत थे और उनके कारण मैं उसकी इच्छा को समझ सकी। जिस स्थिति में मैं अब थी, वह वास्तविक परीक्षा थी। परमेश्वर यह देखना चाहता था कि क्या मैं इस तरह के कष्टों के बीच उसके प्रति वफादार रहूंगी या नहीं और क्या मैं वास्तव में उससे प्रेम करती हूँ या नहीं। हालाँकि तीन साल जेल में बहुत लंबा समय था, परंतु मुझे पता था कि मैं अकेली नहीं हूँ क्योंकि परमेश्वर के वचन मेरा मार्गदर्शन करने के लिए और परमेश्वर का प्रेम मुझे सहारा देने के लिए मौजूद थे। मैं सारे दर्द और कष्ट सहन करने और शैतान पर विजय पाने के लिए परमेश्वर पर भरोसा करती थी। मैं डरपोक नहीं बनसकती थी।

सीसीपी सरकार का अंधेरा और बुराई उनकी देखरेख में चलने वाली इस जेल के हर पहलू में उजागर थी। लेकिन परमेश्वर का प्रेम हमेशा मेरे साथ था। एक बार, एक जेल के सुरक्षाकर्मी ने मुझे चॉपस्टिक की एक बोरी को पाँचवीं मंजिल ले जाने का आदेश दिया। चूंकि सीढ़ियाँ बर्फ से ढकी थीं, इसलिए बोरी के वजन के कारण मुझे बहुत धीरे चलना पड़ रहा था। मगर सुरक्षाकर्मी मुझे जल्दी करने के लिए कहती रही और अपना काम पूरा न कर पाने पर बुरी तरह पीटे जाने के डर से, मैं घबरा गई और जल्दबाजी में फिसलकर सीढ़ियों से नीचे गिर गई और मेरी एड़ी की हड्डी टूट गई। मैं फर्श पर पसरी हुई थी, अपने पैर को हिलाने में असमर्थ थी और हड्डी टूटने से हो रहे तीखे दर्द के कारण मुझे ठंडे पसीने आ रहे थे। मगर सुरक्षाकर्मी ने ज़रा भी दिलचस्पी नहीं दिखाई। उसने कहा कि मैं दिखावा कर रही हूँ और मुझे उठकर काम करते रहने का आदेश दिया। लेकिन मैं खड़ी नहीं हो पा रही थी। कलीसिया की एक बहन, जो मेरी तरह ही जेल की सज़ा काट रही थी, उसने देखा कि क्या हुआ है और तुरंत मुझे जेल क्लिनिक में ले गई। क्लिनिक में, मुझे देखने वाले चिकित्सक ने मेरे पैर पर पट्टी बांधी, मुझे सस्ती दवा की कुछ गोलियां दीं और वापस भेज दिया। इस डर से कि मैं अपने काम के कोटे को पूरा नहीं कर पाऊंगी, जेल के सुरक्षाकर्मी ने मुझे कोई इलाज करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया, इसलिए मुझे अपने टूटे हुए पैर के साथ ही काम करना पड़ा। हमें जो भी काम करना होता, उसे करने के लिए वो बहन मुझे अपनी पीठ पर लादकर ले जाती। चूंकि परमेश्वर के प्रेम ने हमारे दिलों को एक साथ बांध दिया था, जब भी उसे अवसर मिलता था, वो बहन मुझे प्रोत्साहित करने के लिए मेरे साथ परमेश्वर के वचन पर संगति करती थी। मेरे सबसे कमज़ोर और सबसे मुश्किल क्षणों में यह मेरे लिए एक बहुत बड़ी राहत थी। उस अवधि के दौरान, मुझे नहीं पता कि मैंने कितनी बार इतनी पीड़ा और कमज़ोरी महसूस की कि मैं मुश्किल से उठ पाती थी, और मुझमें मुश्किल से सांस लेने की ताकत थी, कितनी ही बार मैं आंसुओं के साथ परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए रजाई में छिप जाती, लेकिन ये दो भजन मुझे हमेशा प्रोत्साहन और संबल प्रदान करते थे : "तुम्हारा परमेश्वर केन्याय, ताड़ना, प्रहार और शब्द-शोधन को स्वीकार करने में सक्षम होना और इसके अलावा, परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार कर पाना, युगों से पहले ही परमेश्वर ने पूर्वनिर्धारित कर दिया था और इस प्रकार जब तुम्हें ताड़ना दी जाए तो तुम्हें बहुत व्यथित नहीं होना चाहिए। तुम लोगों में जो कार्य किया गया है और तुम्हें जो आशीर्वाद दिए गए हैं, उन्हें कोई नहीं ले सकता और जो तुम लोगों को दिया गया है, वह कोई भी नहीं ले जा सकता। धार्मिकलोग तुम लोगों के साथ तुलना में नहीं ठहर सकते। तुम लोगों के पास बाइबल में महान विशेषज्ञता नहीं है और तुम धार्मिक सिद्धांतों से सुसज्जित नहीं हो, पर चूँकि परमेश्वर ने तुम्हारे भीतर कार्य किया है, तुमने सारे युगों में अन्य किसी से ज़्यादा प्राप्त किया है—और इसलिए यह तुम्हारा सबसे बड़ा आशीर्वाद है" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'ईश्वर की इच्छा को निराश नहीं कर सकते तुम')। "बहुत से उतार-चढ़ाव हैं राज्य के मार्ग में। जीवन और मृत्यु के बीच, यातना और आँसुओं के बीच मँडराऊँ मैं। बग़ैर परमेश्वर की सुरक्षा के, कौन पहुँच सका यहाँ तक? मैं भाग्यशाली हूँ कि अंत के दिनों में जन्म लेकर, मैं मसीह का अनुसरण कर रहा हूँ, जो कि परमेश्वर का आदेश और व्यवस्था है। परमेश्वर दीनता से मनुष्य का पुत्र बनकर, भयंकर अपमान झेलता है। परमेश्वर ने इतने कष्ट उठाए हैं, यदि मैं उससे प्रेम करूँ तो मैं इंसान कैसे कहला सकता हूँ? ... परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग पर चलकर, मुझे उसका अनुसरण करने और गवाही देने में कभी मलाल न होगा। हालाँकि कमज़ोर हूँ, नकारात्मक हूँ, आँसुओं में अब भी प्यार है मुझे परमेश्वर से। दुख सहता हूँ, उसे अपना प्यार देता हूँ, ताकि शोक न हो फिर कभी उसे। परीक्षण में तपना, है जैसे आग में सोने का तपना। कैसे न अर्पित न करूँ मैं परमेश्वर को दिल अपना? मुश्किल है राह स्वर्ग की हालाँकि, बहुत से आँसू होंगे राह में, प्रेम करूँगा सदा परमेश्वर से, न मलाल करूँगा" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'बिना पश्चाताप के परमेश्वर से प्रेम करने का गीत')। परमेश्वर के वचनों और परमेश्वर के प्रेम ने मुझे निराशा की गहराई से बचाया और, बार-बार, मुझे जीवित रहने की हिम्मत दी। पृथ्वी पर इस ठंडे, अंधेरे नरक में, मैंने परमेश्वर के प्रेम की गर्मजोशी और सुरक्षा का अनुभव किया, और मैंने जीवित रहने का दृढ़ निश्चय किया ताकि मैं परमेश्वर के प्रेम का बदला चुका सकूं। चाहे मैं कितना भी कष्ट सहूं, मुझे आगे बढ़ते रहना था; चाहे मेरी एक ही सांस बची हो, मुझे परमेश्वर के प्रति वफादार रहना था। कैद के अपने तीन साल के जीवन में, मैं सबसे ज़्यादा गहराई से तब प्रभावित हुई जब मेरी बहन ने मुझे परमेश्वर के वचन के कुछ हस्तलिखित पन्ने दिए। शैतानों द्वारा चलाई जा रही जेल में, जहां किसी किले से भी ज़्यादा सख्त पहरा था, वहां मैं परमेश्वर के वचन को पढ़ने में सक्षम थी, यह वास्तव में परमेश्वर द्वारा मुझसे किए जा रहे असीम प्रेम और दया का प्रमाण था। परमेश्वर के इन्हीं वचनों ने मुझे प्रोत्साहित किया और मार्गदर्शन दिया, जिससे मैं उस सबसे कठिन समय को झेल सकी।

सितंबर, 2005 में मेरी सज़ा समाप्त हो गई और मैं आखिरकार जेल के काले दिनों को पीछे छोड़ सकी। जेल से बाहर आकर मैंने एक गहरी साँस ली और परमेश्वर के प्रेम और सुरक्षा के लिए अपने हृदय की गहराई से परमेश्वर को धन्यवाद दिया, जिसके कारण मैं जेल की सज़ा के दौरान जीवित रह सकी थी। सीसीपी सरकार द्वारा गिरफ्तार किए जाने और सताए जाने के अपने व्यक्तिगत अनुभव के कारण, अब मुझे पता है कि क्या धार्मिक है और क्या बुरा है, क्या अच्छा है और क्या दुष्टतापूर्ण है, और क्या सकारात्मक है और क्या नकारात्मक है। मैं जानती हूं कि मुझे किस चीज़ का अनुसरण करने के लिए सबकुछ छोड़ देना चाहिए और किस चीज़ को मुझे घृणा और धिक्कारपूर्वक अस्वीकार करना चाहिए। इस अनुभव के माध्यम से, मुझे वास्तव में पता चला कि परमेश्वर का वचन परमेश्वर का अपना जीवन है और इसमें अलौकिक शक्तियां निहित हैं जो मनुष्य के जीवन की प्रेरणा स्रोत हो सकती हैं। जब तक मनुष्य परमेश्वर के वचन के अनुसार जीता है, तब तक वह शैतान की सभी शक्तियों पर काबू पाने में सक्षम है और अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में भी विजयी हो सकता है। परमेश्वर का धन्यवाद!

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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