42. शोहरत और हैसियत की बंदिशों से आज़ाद

परमेश्वर के वचन कहते है, "शैतान मनुष्य के विचारों को नियन्त्रित करने के लिए प्रसिद्धि एवं लाभ का तब तक उपयोग करता है जब तक लोग केवल और केवल प्रसिद्धि एवं लाभ के बारे में सोचने नहीं लगते। वे प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए संघर्ष करते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए कठिनाइयों को सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए अपमान सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए जो कुछ उनके पास है उसका बलिदान करते हैं, और प्रसिद्धि एवं लाभ के वास्ते वे किसी भी प्रकार की धारणा बना लेंगे या निर्णय ले लेंगे। इस तरह से, शैतान लोगों को अदृश्य बेड़ियों से बाँध देता है और उनके पास इन्हें उतार फेंकने की न तो सामर्थ्‍य होती है न ही साहस होता है। वे अनजाने में इन बेड़ियों को ढोते हैं और बड़ी कठिनाई से पाँव घसीटते हुए आगे बढ़ते हैं। इस प्रसिद्धि एवं लाभ के वास्ते, मनुष्यजाति परमेश्वर को दूर कर देती है और उसके साथ विश्वासघात करती है, तथा निरंतर और दुष्ट बनती जाती है। इसलिए, इस प्रकार से एक के बाद दूसरी पीढ़ी शैतान के प्रसिद्धि एवं लाभ के बीच नष्ट हो जाती है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI')।

एक साल पहले मैं कलीसिया की अगुआ चुनी गई। मुझे पता था कि यह काम मेरे लिये परमेश्वर की मेहरबानी और उन्नति है। मैंने मन ही मन ईमानदारी से सत्य का अनुसरण करने और अपने कर्तव्य को अच्छी तरह निभाने का संकल्प लिया। उसके बाद, मैं कलीसिया के काम में व्यस्त हो गई, और जब भी कोई मुश्किल आती, तो मैं परमेश्वर के सामने झुककर उसके मार्गदर्शन के लिये प्रार्थना करती थी। मैं इन मुश्किलों के बारे में सहकर्मियों से भी चर्चा करती और उन्हें हल करने के लिए सत्य की खोज भी करती थी। कुछ समय बाद, कलीसिया के काम का हर पहलू प्रगति कर रहा था, और मैंने तहेदिल से परमेश्वर के मार्गदर्शन के लिए उसका शुक्रिया किया। कुछ समय बाद, एक दूसरी कलीसिया की अगुआ को चुनने के लिये चुनाव हुआ, और मुझे हैरानी हुई जब मेरे साथ कुछ साल पहले काम कर चुकी बहन ज़िया को चुना गया। बहन ज़िया नई अगुआ थीं और उनका जीवन अनुभव थोड़ा सतही था। जब हम पहले साथ में काम कर रहे थे, तो उनके सामने कुछ मुश्किलें और समस्याएं आयी थीं, और मैंने इन्हें हल करने में उनकी मदद की थी। मुझे लगा कि इस बार साथ काम करने पर, मैं ज़रूर उनसे ज़्यादा काबिल साबित होऊंगी।

एक बार, मैं घर लौटी तो मैंने देखा कि बहन ज़िया ने मेरे लिए एक संदेश छोड़ा है, जिसमें उन्होंने कहा कि चेंगज़ी कलीसिया में एक समूह के अगुआ हैं जो व्यावहारिक काम नहीं कर पा रहे हैं और उन्हें बदलने की ज़रूरत है, वहां कुछ व्यावहारिक समस्याएं भी हैं जिन्हें फ़ौरन हल करना होगा। वो चाहती थीं कि मैं जाकर मदद करूँ। इस बारे में जब मैंने सोचा, तो मुझे लगा कि वो सच में मुझे अपने से ज़्यादा काबिल मानती हैं, और क्योंकि वो मुझे इतना काबिल समझती हैं, मुझे अच्छा काम करना होगा और शर्मिंदा होने से बचना होगा! मैंने जितना इस बारे में सोचा, मुझे उतनी ही ज़्यादा ख़ुशी महसूस हुई। जब मैं सभा में पहुँची, तो मैंने देखा कि बहन ज़िया को काम के बारे में विस्तार से जानकारी थी, और सत्य पर उनकी सहभागिता बहुस्तरीय और व्यावहारिक थी। मुझ हैरानी हुई यह देखकर कि पिछले कुछ सालों सें उन्होंने काफ़ी तरक़्क़ी की है। मुझे लगता था कि मैं उनसे ज़्यादा काबिल हूँ और मुझे काम के मामले में उन्हें काफ़ी मदद करनी होगी, लेकिन लग रहा था कि वो मुझसे कम काबिल नहीं थीं! मुझे बहुत बुरा लगा और मुझे ऐसा दिखाई दे रहा था कि वो मुझसे आगे निकल जाएंगी, तो मैंने सोचा कि मैं अपने भाई-बहनों को दिखाऊँगी कि मैं क्या चीज़ हूँ! मैंने थोड़ी सी भी कोताही नहीं बरती, और अपने दिमाग़ पर बहुत ज़ोर देकर सोचा कि मैं अपनी सहभागिता को उनसे बेहतर कैसे बना सकती हूँ। नतीजा ये निकला कि मेरी सहभागिता बहुत ही बोझिल निकली, मुझे भी उसमें कोई आनंद नहीं आया। मुझे लगा कि मैं अपनी इज़्ज़त खो बैठी हूँ और बहुत उदास महसूस करने लगी।

उस वक़्त से, मैं बहन ज़िया से मुकाबला करने से ख़ुद को रोक नहीं पाई। एक सभा में जब उन्हें भाई-बहनों की परिस्थितियों के बारे में पता चला, तो उन्होंने परमेश्वर के प्रासंगिक वचनों को ढूंढा और फिर अपनी सहभागिता में उन वचनों के साथ अपने अनुभव को पिरो दिया, मैंने देखा कि हर इंसान सुनते समय अपना सिर हिलाकर हामी भर रहा था। कुछ तो नोट्स भी लिख रहे थे, और कुछ ने कहा, "अब हमारे पास चलने के लिए एक राह है।" यह देखकर मैंने सराहना और जलन दोनों महसूस की, और मैं क्या सोच रही थी? "अब मुझे जल्द से जल्द अपनी सहभागिता करनी होगी। कुछ भी हो जाए, ऐसा नहीं लगना चाहिए कि मैं इनका मुकाबला नहीं कर सकती।" लेकिन मैं जितना इस तरह सोच रही थी, उतना ही मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या सहभागिता करूँ। मेरे मन में बहन ज़िया के खिलाफ़ पूर्वाग्रह ने जगह बना ली, और मैं सोचने लगी, "क्या तुम्हें इतनी सहभागिता करनी ज़रूरी है? जो तुम्हें कहना था, तुम कह चुकी हो। मैं यहाँ एक बहरे इंसान के कानों की तरह बैठी हूँ—बस एक सजावट के सामान की तरह। मैं ऐसा नहीं होने दूँगी, मुझे अपना सम्मान वापस हासिल करने के लिए कुछ तो सहभागिता करनी होगी।" जैसे ही वह पानी की एक घूंट लेने के लिए रुकीं, तो मैं अपना स्टूल आगे की तरफ़ ले गई और सहभागिता करने लगी। मैं बहुत अच्छी बात कहना चाहती थी, लेकिन बस सही शब्दों में कह नहीं पाई। मेरी सहभागिता खिचड़ी की तरह थी। जब मैंने देखा कि मेरे भाई-बहन मुझे अजीब तरीके से देख रहे हैं, तो मुझे अहसास हुआ कि मैं विषय से पूरी तरह भटक चुकी थी। मुझे बहुत ही असहज महसूस होने लगा और मेरा मन किया कि मैं एक बिल ढूंढकर उसमें घुस जाऊँ। मैंने अपना मज़ाक बनाकर रख दिया था। मैं ख़ुद को अच्छा दिखाना चाह रही थी, लेकिन मैं बेवकूफ़ दिख रही थी। मैंने अपने आपको सबके सामने रखा, और सबने मुझे नाकाम होते हुए देखा। अपने मन में, मेरी बहन को प्रबुद्ध करने और मुझे प्रबुद्ध नहीं करने के लिए मैं परमेश्वर को दोषी ठहराने लगी, मुझे फ़िक्र हो रही थी कि पता नहीं अब से मेरे भाई-बहन मेरे बारे में क्या सोचेंगे। मेरे मन में जितने ये ख़्याल आते, उतना ही मुझे बुरा लगता। मैं हालात से भाग जाना चाहती थी और अब मैं बहन ज़िया के साथ काम नहीं करना चाहती थी। मुझे याद है एक सभा के दौरान, कुछ बहनों के हालात बहुत अच्छे नहीं थे, और बहन ज़िया की सहभागिता के बाद भी हालात बेहतर नहीं हुए। मैंने मदद करने के लिए सहभागिता नहीं की, और यह भी सोचने लगी, "अब हर किसी को नज़र आएगा कि वे समस्याएं हल नहीं कर सकती हैं, इसलिए अब कोई भी उनकी तरफ़ इज़्ज़त से और मेरी तरफ़ नीची नज़र से नहीं देखेगा।" उस दौरान, मैं लगातार बहन ज़िया के साथ मुक़ाबला करने की कोशिश कर रही थी, और मेरी आध्यात्मिक स्थिति बिगड़ती जा रही थी। सभाओं में परमेश्वर के वचनों पर मेरी सहभागिता में कोई रोशनी नहीं थी, और जब भी मैं भाई-बहनों को मुश्किलों या परेशानियों का सामना करते हुए देखती, तो मुझे उन्हें हल करना नहीं आता था। मैं हर रात जल्दी सो जाया करती, और कर्तव्य पालन के लिए मुझे ज़बरदस्ती जाना पड़ता था। मेरी तकलीफ़ बस बढ़ती जा रही थी। परमेश्वर से मुझे बचाने के लिए प्रार्थना करने के सिवाय मैं कुछ भी नहीं कर सकती थी।

अपनी आराधना में एक दिन मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा: "जैसे ही पद, प्रतिष्ठा या रुतबे की बात आती है, हर किसी का दिल प्रत्याशा में उछलने लगता है, तुममें से हर कोई हमेशा दूसरों से अलग दिखना, मशहूर होना, और अपनी पहचान बनाना चाहता है। हर कोई झुकने को अनिच्छुक रहता है, इसके बजाय हमेशा विरोध करना चाहता है—इसके बावजूद कि विरोध करना शर्मनाक है और परमेश्वर के घर में इसकी अनुमति नहीं है। हालांकि, वाद-विवाद के बिना, तुम अब भी संतुष्ट नहीं होते हो। जब तुम किसी को दूसरों से विशिष्ट देखते हो, तो तुम्हें ईर्ष्या और नफ़रत महसूस होती है, तुम्हें लगता है कि यह अनुचित है। 'मैं दूसरों से विशिष्ट क्यों नहीं हो सकता? हमेशा वही व्यक्ति दूसरों से अलग क्यों दिखता है, और मेरी बारी कभी क्यों नहीं आती है?' फिर तुम्हें कुछ नाराज़गी महसूस होती है। तुम इसे दबाने की कोशिश करते हो, लेकिन तुम ऐसा नहीं कर पाते, तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो। और कुछ समय के लिए बेहतर महसूस करते हो, लेकिन जब एक बार फिर तुम्हारा सामना इसी तरह के मामले से होता है, तो तुम इससे जीत नहीं पाते हो। क्या यह एक अपरिपक्व कद नहीं दिखाता है? क्या किसी व्यक्ति का इस तरह की स्थिति में गिर जाना एक फंदा नहीं है? ये शैतान की भ्रष्ट प्रकृति के बंधन हैं जो इंसानों को बाँध देते हैं" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो')। परमेश्वर के वचनों ने मेरी हालत को पूरी तरह से सामने रख दिया और यह सीधे मेरे दिल में उतर गए। मैं इस बात पर विचार करने लगी कि मैं क्यों इस मुश्किल और थकाऊ तरीके से अपनी ज़िंदगी जी रही हूँ। इसकी जड़ यह थी कि शोहरत और इज़्ज़त के लिए मेरी इच्छा बहुत ज़्यादा थी, और मेरा स्वभाव बहुत अहंकारी था। मैं उस वक़्त को याद करने लगी जब मैंने यह काम करना शुरू किया था। जब मुझे अपने काम में थोड़ी सफलता मिली और भाई-बहन मेरी इज़्ज़त करने लगे, तो मैं ख़ुद की तारीफ़ करती थी और अपने आप को काबिल मानती थी। बहन ज़िया के साथ काम करके और यह देखकर कि वो मुझसे बेहतर काम कर रही हैं, मुझे उनसे जलन होने लगी, मेरा बर्ताव अप्रिय हो गया, और मैं लगातार उनके साथ मुकाबला करने लगी। जब मैं उनसे आगे नहीं निकल पाई, तो मैं नकारात्मक हो गई, शिकायत करने लगी, यहाँ तक कि अपने कर्तव्य पालन के दौरान भी अपनी भावनाओं को प्रकट कर दिया। जब मैंने देखा कि वे उन बहनों के हालात का हल नहीं निकाल पाईं, तो मैंने सहभागिता करने से तो इनकार किया ही, साथ ही एक उंगली भी नहीं उठाई और उनकी नाकामी से मुझे ख़ुशी हुई। मैं उन्हें शर्मिंदा होते हुए देखना चाहती थी। इसे अपना कर्तव्य पालन करना कैसे कहेंगे? कलीसिया की एक अगुआ होने के नाते, मैं पूरी तरह से गैर-ज़िम्मेदार थी और न तो मैंने कलीसिया के काम के बारे में सोचा, न ही यह फ़िक्र की कि भाई-बहनों की परेशानियां हल हुईं या नहीं। मैं बस यही सोच रही थी कि मैं उनसे ऊपर कैसे उठ सकती हूँ। मैं स्वार्थी और निंदनीय थी, और बहुत चालाक भी। शोहरत और हैसियत ने मेरा दिमाग़ खराब कर दिया था। मैं यह देखने के लिए तैयार थी कि मेरे भाई-बहनों की समस्याएं हल न हों और कलीसिया के काम का नुकसान हो जाये, बस मेरी इज़्ज़त और हैसियत बनी रहनी चाहिए। क्या इसे जिस थाली में खाना उसी में छेद करना नहीं कहेंगे? मैं इतने ज़रूरी काम के लायक नहीं थी। मेरा बर्ताव परमेश्वर के लिए घिनौना और नफ़रत के लायक था! जब ये विचार मेरे मन में आया, तो मैं फ़ौरन प्रार्थना और पश्चाताप करने के लिए परमेश्वर के सामने पहुँच गई, और कहा कि शोहरत और हैसियत की इन बंदिशों से आज़ाद होने के लिए मेरी मदद करें।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा: "हमेशा अपने स्वयं के वास्ते कार्यों को मत कर, हमेशा अपने हितों की मत सोच, और अपनी स्वयं की हैसियत, चेहरे या प्रतिष्ठा पर विचार मत कर। लोगों के हितों के प्रति मत सोच। तुझे सबसे पहले परमेश्वर के घर के हितों पर विचार अवश्य करना चाहिए और उसे अपनी पहली प्राथमिकता बनाना चाहिए; तुझे परमेश्वर की इच्छा के बारे में मननशील होना चाहिए, इस पर चिंतन करने के द्वारा आरंभ कर कि तू अपने कर्तव्य को पूरा करने में अशुद्ध रहा है या नहीं, तूने वफादार होने में, अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने में, अपना अधिकतम किया और अपना सर्वस्व दिया है या नहीं, तूने अपने कर्तव्य, और परमेश्वर के घर के कार्य के प्रति पूरे दिल से विचार किया है या नहीं। तुझे इन चीज़ों के बारे में विचार करने की आवश्यकता है। इन चीज़ों पर बार-बार विचार कर, और तेरे पास अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाने का एक आसान समय होगा" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो')। परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ने से मेरा दिल फ़ौरन प्रबुद्ध महसूस करने लगा, और फिर मेरे पास एक रास्ता था। अगर मुझे शोहरत और हैसियत की बंदिशों से आज़ाद होना है, तो पहले मुझे अपने दिल को सही करना होगा। मुझे परमेश्वर के काम पर मन लगाना होगा और परमेश्वर की इच्छा का ख़्याल रखना होगा, मुझे विचार करना होगा कि मैं अपने काम को अच्छी तरह कैसे पूरा कर सकती हूँ। अगर मेरे दिल में ज़्यादा सकारात्मक चीज़ें होंगी, तो नाम, हैसियत, मान और इज़्ज़त जैसी नकारात्मक चीज़ों को छोड़ना ज़्यादा आसान हो जाएगा। मुझे अहसास हुआ कि अगर दूसरे लोग यह मानते हैं कि मैं कुछ हूँ, तो ज़रूरी नहीं कि परमेश्वर को भी मैं मंज़ूर हूँ, अगर दूसरे लोग यह मानते हैं कि मैं कुछ नहीं हूँ, तो ज़रूरी नहीं कि परमेश्वर मुझे नहीं बचाएगा। ज़रूरी बात यह है कि परमेश्वर की तरफ़ मेरा रवैया कैसा है, और क्या मैं सत्य का अभ्यास कर सकती हूँ और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सकती हूँ या नहीं। मैंने परमेश्वर को इस प्रबुद्धता के लिए शुक्रिया कहा, जिसने मुझे गलत रास्ते से वापस आने में मदद की। अब मैं बहन ज़िया के साथ मुकाबला नहीं करना चाहती थी, मैं बस एक सृजित प्राणी के कर्तव्य को पूरा करके परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहती थी। तब से, मैं पूरे होशोहवास में परमेश्वर से प्रार्थना करती और तहेदिल से अपना काम पूरा करती, कलीसिया की सभाओं में हिस्सा लेती, भाई-बहनों की सहभागिता को ग़ौर से सुना करती थी। अगर परेशानियाँ मेरे सामने आतीं, तो मैं संजीदगी से उनके बारे में सोचती, परमेश्वर के प्रासंगिक वचनों की तलाश करती, और फिर अपने अनुभवों के साथ उन्हें जोड़कर सहभागिता करती थी। मैंने अपनी कमियों को दूर करने के लिए बहन ज़िया की ख़ूबियों से भी सीख हासिल की। इस तरह के अभ्यास से मैं ज़्यादा सहज और सुकून महसूस करने लगी, और मेरी हालत बहुत बेहतर हो गई। मैं तहेदिल से परमेश्वर की आभारी थी। लेकिन, मेरे अंदर शोहरत और हैसियत की इच्छा की जड़ बहुत गहरी थी, और इसलिए जब भी सही हालात पैदा होते, तो मेरी शैतानी प्रकृति फिर से उभरकर आ जाती।

मुझे याद है एक बार मैं समूह में कुछ समस्याओं को सुलझाने जा रही थी, और जैसे ही मैं बाहर निकलने लगी, तो बहन ज़िया ने कहा कि इस समूह की परशानियाँ थोड़ी पेचीदा हैं, और वो चाहती थीं कि मैं उनके साथ जाऊँ। जो ख़ुशी की लहर मेरे अंदर दौड़ रही थी, यह सुनकर दब गई। मैं सोचने लगी, "तो सिर्फ़ तुम ही हो जो चीज़ों को ठीक कर सकती हो? तुम्हें ये दिखाना ज़रूरी है कि तुम क्या कर सकती हो, क्यों है न? वरिष्ठों के सामने यह कहकर तुम क्या जताना चाहती हो? क्या तुम जानबूझकर मुझे बुरा दिखाने की कोशिश नहीं कर रही हो?" उस वक्त मैं बहुत नाराज़ थी। मुझे अकेले जाना पड़ा, लेकिन मैं अपनी नाराज़गी को भुला नहीं पा रही थी। मैं रास्ते में बहन ज़िया के बारे में इतना बड़बड़ा रही थी कि मुझे सभा की जगह भी नहीं मिली और मुझे वापस लौटना पड़ा। मुझे बहुत बुरा लग रहा था। मैंने सोचा, "क्या मैं वाक़ई बिल्कुल बेकार हूँ? मुझे सभा की जगह भी नहीं मिली। हमारे वरिष्ठ मेरे बारे में क्या सोचेंगे? इस बार मैंने सच में ख़ुद को बहुत शर्मिंदा किया है!" वापस आकर जब मैंने बाकी बहनों को देखा, तो मैं उनसे बात नहीं करना चाहती थी।

अगले दिन, कुछ काम करने के लिए मैं और बहन ज़िया कलीसिया की तरफ़ अलग-अलग गए, और एक बार फिर मेरे मन में भावनात्मक उथल-पुथल मच रही थी। मैं सोच रही थी, "मुझे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम किस चीज़ की बनी हो, देखते हैं कौन बेहतर करता है!" मैं पूरे जोश के साथ कलीसिया पहुँची और सीधे अपने काम पूरे करने, सहभागिता करने और काम को बांटने में लग गई। मैंन सोचा, "इस बार मैंने बहुत मेहनत की है। मुझे ज़रूर फल मिलेगा, और मैं बहन ज़िया को हरा दूँगी।" सहकर्मियों की एक बैठक में, मुझे पता चला कि अपने कर्तव्य में मैंने सबसे कम कामयाबी हासिल की है। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा कुछ हो सकता है। उस वक्त मेरी हर उम्मीद ख़त्म हो गई और मुझे लगने लगा कि मैं चाहे जितनी मेहनत कर लूँ, मैं कभी भी बहन ज़िया से आगे नहीं निकल पाऊँगी। उस दौरान, बहन ज़िया के देर से वापस आने पर, जब वरिष्ठ अगुआ उनके बारे में फ़िक्र करते, तो मुझे लगता कि मेरी किसी को परवाह नहीं है। मुझे उनसे बहुत जलन होती थी। जब मैंने देखा कि वो मुझसे बेहतर काम कर रही हैं और उनके वरिष्ठ अगुआ उनकी बहुत इज़्ज़त करते हैं, तो मुझे लगा कि मुझे कभी भी ऐसा दिन देखने को नहीं मिलेगा जब मेरी भी पूछ हो। मैंने सोचा कि कलीसिया की अगुआ होने से अच्छा होगा कि मैं एक समूह की अगुआ बनूँ। कम से कम भाई-बहन मेरी इज़्ज़त करेंगे और मेरा साथ देंगे। मुझे लगा कि एक बड़े तालाब में छोटी मछली बनकर रहने से अच्छा होगा कि मैं छोटे से तालाब में बड़ी मछली बनकर रहूँ। मेरी शिकायतें बस सामने आती रहीं। मैं इस माहौल में रहने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी और जल्द से जल्द यहाँ से निकलने का इंतज़ार कर रही थी। मेरी हालत बिगड़ती जा रही थी। मैं बहन ज़िया से जलती थी, उनके खिलाफ़ थी, और मुझे लगता था कि उनकी वजह से मैं बेहतर नहीं दिख सकती हूँ। मैंने यह भी सोचा, "अगर वो अपने काम में किसी तरह की गलती कर दें और उन्हें कहीं और भेज दिया जाए, तो बहुत अच्छा रहेगा।"

मैं निरंतर इज़्ज़त और निजी हितों की लड़ाई की हालत में जी रही थी, और अपने बर्ताव पर बिल्कुल भी विचार नहीं कर रही थी, जल्द ही परमेश्वर का अनुशासन मुझ पर उतारा गया। एक बार, मैंने कुछ अगुआओं के साथ सभा का इंतज़ाम किया। एक तो सभा में कोई आया नहीं, और दूसरे वापस जाते वक़्त मेरी गाड़ी का टायर भी पंक्चर हो गया, जल्द ही मेरी पीठ में तेज़ दर्द होने लगा। पीठ की सूजन और दर्द को सहन करना बहुत मुश्किल हो रहा था। मेरी हालत इतनी ख़राब हो गई कि मैं अपना काम भी नहीं कर पा रही थी। फिर मैंने परमेश्वर के इन वचनों के बारे में सोचा: "आज तुम लोगों से—सद्भावना में एक साथ मिलकर काम करने की अपेक्षा करना—उस सेवा के समान है जिसकी अपेक्षा यहोवा इस्राएलियों से करता था : अन्यथा, सेवा करना बंद कर दो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'इस्राएलियों की तरह सेवा करो')। इसने मुझे डरा दिया। क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर कर्तव्य पूरा करने के मौक़े को मुझसे छीनना चाहता है? फिर, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा: "तुम जितना अधिक संघर्ष करोगे, उतना ही अंधेरा तुम्हारे आस-पास छा जाएगा, तुम उतनी ही अधिक ईर्ष्या और नफ़रत महसूस करोगे, और कुछ पाने की तुम्हारी इच्छा अधिक मजबूत ही होगी। कुछ पाने की तुम्हारी इच्छा जितनी अधिक मजबूत होगी, तुम ऐसा कर पाने में उतने ही कम सक्षम होगे, जैसे-जैसे तुम कम चीज़ें प्राप्त करोगे, तुम्हारी नफ़रत बढ़ती जाएगी। जैसे-जैसे तुम्हारी नफ़रत बढ़ती है, तुम्हारे अंदर उतना ही अंधेरा छाने लगता है। तुम्हारे अंदर जितना अधिक अंधेरा छाता है, तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन उतने ही बुरे ढंग से करोगे; तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन जितने बुरे ढंग से करोगे, तुम उतने ही कम उपयोगी होगे। यह एक आपस में जुड़ा हुआ, कभी न ख़त्म होने वाला दुष्चक्र है। ऐसी अवस्था में तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन अच्छी तरह से नहीं कर सकते, इसलिए, धीरे-धीरे तुम्हें हटा दिया जाएगा" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो')। परमेश्वर के कठोर वचनों ने मुझे डरा दिया और मैं भय से कांपने लगी। मैं कोई अपमान न सहने वाले, परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को महूसस कर पा रही थी। ख़ास तौर पर जब परमेश्वर के वचनों में मैंने यह पढ़ा, "ऐसी अवस्था में तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन अच्छी तरह से नहीं कर सकते, इसलिए, धीरे-धीरे तुम्हें हटा दिया जाएगा," मुझे सच में ऐसा लगा कि कोई ख़तरा मेरी ओर बढ़ रहा है। कुछ ही समय बाद, मैंने बहन ज़िया को कहते हुए सुना, "कलीसिया का काम सच में हर तरह से बिगड़ता जा रहा है...।" वो इतनी परेशान थीं कि रोने लगीं। तब मुझे याद आया कि हमारे एक वरिष्ठ अगुआ ने हम दोनों के साथ में अच्छी तरह से काम करने की विफलता के कारण का सार समझाते हुए कहा था कि यह परमेश्वर के घर के काम में रुकावट डाल रहा है और उसे नुकसान पहुँचा रहा है। मैं इस बारे में सोचना जारी रखने की हिम्मत नहीं जुटा पाई, लेकिन मैं दौड़कर परमेश्वर के सामने गई और प्रार्थना करने लगी और समझने की कोशिश करने लगी। मैं अच्छी तरह जानती थी कि शोहरत और हैसियत की तलाश करना, और दूसरों से जलन रखना परमेश्वर की इच्छा के मुताबिक नहीं है, तो आख़िर क्यों मैं अपने आप को इन बुराइयों के पीछे जाने से नहीं रोक पाई?

फिर मैंने परमेश्वर के वचनों से एक और अंश पढ़ा। "शैतान मनुष्य के विचारों को नियन्त्रित करने के लिए प्रसिद्धि एवं लाभ का तब तक उपयोग करता है जब तक लोग केवल और केवल प्रसिद्धि एवं लाभ के बारे में सोचने नहीं लगते। वे प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए संघर्ष करते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए कठिनाइयों को सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए अपमान सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए जो कुछ उनके पास है उसका बलिदान करते हैं, और प्रसिद्धि एवं लाभ के वास्ते वे किसी भी प्रकार की धारणा बना लेंगे या निर्णय ले लेंगे। इस तरह से, शैतान लोगों को अदृश्य बेड़ियों से बाँध देता है और उनके पास इन्हें उतार फेंकने की न तो सामर्थ्‍य होती है न ही साहस होता है। वे अनजाने में इन बेड़ियों को ढोते हैं और बड़ी कठिनाई से पाँव घसीटते हुए आगे बढ़ते हैं। इस प्रसिद्धि एवं लाभ के वास्ते, मनुष्यजाति परमेश्वर को दूर कर देती है और उसके साथ विश्वासघात करती है, तथा निरंतर और दुष्ट बनती जाती है। इसलिए, इस प्रकार से एक के बाद दूसरी पीढ़ी शैतान के प्रसिद्धि एवं लाभ के बीच नष्ट हो जाती है। अब शैतान की करतूतों को देखने पर, क्या उसकी भयानक मंशाएँ बिलकुल ही घिनौनी नहीं हैं? हो सकता है कि आज तुम लोग अब तक शैतान की भयानक मंशाओं की वास्तविक प्रकृति को नहीं देख पा रहे हो क्योंकि तुम लोग सोचते हो कि प्रसिद्धि एवं लाभ के बिना कोई जी नहीं सकता है। तुम सोचते हो कि यदि लोग प्रसिद्धि एवं लाभ को पीछे छोड़ देते हैं, तो वे आगे के मार्ग को देखने में समर्थ नहीं रहेंगे, अपने लक्ष्यों को देखने में समर्थ नहीं रह जायेँगे, उनका भविष्य अंधकारमय, मद्धिम एवं विषादपूर्ण हो जाएगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI')। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन में मुझे समस्या की जड़ मिल गई। शोहरत और हैसियत के पीछे भागने से मैं अपने आप को कभी भी रोक नहीं पाई, क्योंकि मेरी शिक्षा एक स्कूल में हुई थी और बचपन से ही मुझ पर समाज का असर रहा है। शैतानी फ़लसफ़े और भ्रांतियां मेरे दिल की गहराई में जड़ें जमा चुकी थीं, जैसे, "स्वर्ग उन लोगों को नष्ट कर देता है जो स्वयं के लिए नहीं हैं," "भीड़ से ऊपर उठो और अपने पूर्वजों का नाम करो," "केवल एक ही अल्फा पुरुष हो सकता है," "आदमी ऊपर की ओर जाने के लिए संघर्ष करता है; पानी नीचे की ओर बहता है," और "एक व्यक्‍ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज़ करता जाता है।" मैं इन फ़लसफ़ों के मुताबिक अपना जीवन जीया करती थी और मैंने उन्हें अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था। चाहे बाहर की दुनिया में हो या परमेश्वर के घर में, मैं बस दूसरों से सम्मान पाने की तलाश में रहती थी। चाहे कोई भी समूह हो, मैं चाहती थी कि मैं सबसे आगे और केंद्र में रहूँ, और हर कोई मेरे इर्द-गिर्द मंडराता रहे। मुझे लगता था कि सार्थक जीवन जीने का यही एक तरीका है। मेरी योग्यता कभी भी बहुत बढ़िया नहीं रही, और मैं किसी भी चीज़ में बहुत अच्छी नहीं थी, लेकिन मुझे दूसरों से कम होना बर्दाश्त नहीं होता था। अगर कोई मुझसे बेहतर होता, तो मुझे बहुत बुरा लगता, और मैं ख़ुद को उनके साथ बराबरी और मुकाबला करने से रोक नहीं पाती थी। मैं उनसे आगे निकलने की तरक़ीबों के बारे में सोचने लगती। अगर मैं उनसे आगे नहीं निकल पाती थी, तो मुझे जलन होती, उनसे नफ़रत होने लगती, और मैं अपने अलावा हर किसी को दोष देती। जीने का यह बहुत ही बुरा तरीक़ा था। आख़िरकार, मुझे समझ आ गया कि शोहरत और हैसियत की तलाश करना बिल्कुल भी सही रास्ता नहीं है, मैं जितना इनके पीछे जाती, उतनी ही मैं अहंकारी और ओछे सोच वाली बनती जा रही थी। मेरी प्रकृति ज़्यादा स्वार्थी और ज़हरीली हो गई, और मुझ में इंसान जैसी कोई चीज़ नहीं बची। फिर मैंने बहन ज़िया की तरफ़ देखा: वे अपने कर्तव्य का निर्वाहन बहुत ही ईमानदारी और संजीदगी से करती थीं, और उनकी सहभागिता में रोशनी थी। वे भाई-बहनों की व्यावहारिक मुश्किलें भी सुलझा पा रही थीं। ये दूसरों के लिए और कलीसिया के काम के लिए भी अच्छा था। यह एक बहुत अच्छी चीज़ थी, जिससे परमेश्वर को इत्मेनान मिलता है। दूसरी तरफ़, मैं ओछी सोच और जलन वाली इंसान थी, जो हमेशा यही सोचती रहती कि वे मेरी ख्याति मुझसे छीन रही हैं, और इसलिए मैं उनके खिलाफ़ पक्षपाती हो गई। मुझे इंतज़ार था कि वे कब अपना काम खराब करेंगी और उन्हें बदल दिया जाएगा। मैंने देखा कि मैं अंदर से द्वेष से भरी हुई थी! परमेश्वर चाहता है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग सत्य पर चलें और उसकी इच्छा का ख़्याल करें, और उसे संतुष्ट करने के लिए अपने कर्तव्य पूरे कर पाएं। लेकिन ऐसा करने वाले भाई-बहन मुझे बर्दाश्त नहीं थे, क्योंकि मेरी कोशिश थी कि मैं अपनी इज़्ज़त और हैसियत को बचाऊँ। मैं उनसे जलती थी और मैं उन्हें सहन नहीं कर सकती थी। क्या इसे परमेश्वर के खिलाफ़ जाना और उसका विरोध करना नहीं कहेंगे? क्या इसे परमेश्वर के घर के काम में रुकावट डालना नहीं कहेंगे? मैं दानव, शैतान से कैसे अलग थी? साथ ही, कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकारी भी हैं, जो समूह बनाकर इज़्ज़त और हैसियत के पीछे भागने की ओछी हरकतें करते हैं, और अपने विरोधी को मार गिराने के लिए कुछ भी कर सकते हैं, वे अपने दुश्मनों को ख़त्म करना चाहते हैं और लोगों का दमन करते हैं। उनकी बुराइयों की गिनती भी नहीं की जा सकती है, न जाने कितने लोगों को इन्होंने मार डाला है! आख़िर में, वे ख़ुद को बर्बाद कर लेते हैं, और मरने के बाद वे नरक में जाते हैं और उन्हें सज़ा मिलती है। उनका ऐसा अंत क्यों होता है? क्या ऐसा इसलिए नहीं क्योंकि वो इज़्ज़त और हैसियत को सबसे ऊपर रखते हैं? हालांकि, मेरा बर्ताव उनके जितना बुरा नहीं था, लेकिन यह था बिल्कुल वैसा ही। मैं शैतानी फ़लसफ़ों और नियमों के मुताबिक जी रही थी, और जो स्वभाव मैंने दिखाया, वो अहंकारी, दंभी, स्वार्थी, घिनौना, चालाक और बुरा था। मैं एक राक्षसी जीवन जी रही थी, जिसमें ज़रा सी भी इंसानी समानता नहीं थी। कैसे परमेश्वर इसे घिनौना नहीं समझेगा, कैसे इससे नफ़रत नहीं करेगा? इस तरह से अनुशासित किया जाना, मुझ पर परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का आना है, और इससे भी ज़्यादा, ये मेरे लिए उसका उद्धार है। यह सब समझने के बाद, मैं फ़ौरन परमेश्वर के सामने जाकर प्रार्थना करने लगी। मैंने कहा, "हे परमेश्वर, मैं सत्य पर नहीं चल रही हूँ। मैं बस शोहरत और हैसियत के पीछे दौड़ रही हूँ। मैं शैतान का खिलौना हूँ, मुझे उसने भ्रष्ट किया है, और मैं इंसान जैसा महसूस नहीं कर रही हूँ। जब मैंने अपनी इज़्ज़त और हैसियत खो दी, तो मैं अब अपना काम नहीं करना चाहती थी और तुम्हें धोखा देने की कगार पर थी। परमेश्वर, मैं तुम्हारे सामने पश्चाताप करना चाहती हूँ। मैं सत्य की तलाश करने, अपनी बहन के साथ सहयोग करने, और तुम्हें संतुष्ट करने के लिए अपने कर्तव्य में विनम्र होने के लिए तैयार हूं।"

इसके बाद, मैंने बहन ज़िया से खुलकर बात की। मैंने विस्तार से उन्हें बताया कि मैं कैसे शोहरत और फ़ायदे की होड़ में थी और कैसे उनके साथ मुकाबला करने की कोशिश कर रही थी। मैंने उनसे ये भी कहा कि वो मुझ पर नज़र रखें और मेरी मदद करें। उसके बाद, काम में हमारा सहयोग काफ़ी आसानी से चलने लगा। हालांकि अभी भी मुझ में शोहरत और फ़ायदे की इच्छा नज़र आती है, मैं जल्द देख पाती हूँ कि मेरा शैतानी स्वभाव उभर रहा है, मैं इस तरह के स्वभाव की प्रकृति और ऐसे जारी रखने के नतीजों पर विचार करती हूँ, और फिर मैं फ़ौरन परमेश्वर के सामने जाकर प्रार्थना करती हूँ और अपने विचारों पर ग़ौर करती हूँ। मैं दिल से अपनी बहन की सहभागिता को सुनती हूँ और उनकी ख़ूबियों से सीखती हूँ। अगर मुझे दिखता है कि वो अपनी सहभागिता में कुछ भूल गईं हैं, तो मैं फ़ौरन अपनी बात जोड़ देती हूँ। ऐसे मौक़ों पर, मैं इस बात पर ध्यान देती हूँ कि सत्य पर सहभागिता कैसे करनी चाहिए ताकि सबको फ़ायदा हो सके। सबको महसूस होता है कि इस तरह की सभाएं सच में सिखाती हैं, और मैं भी इनसे कुछ न कुछ हासिल करती हूँ। मैं दिल से आज़ाद और सहज महसूस कर रही हूँ। जैसा कि परमेश्वर के वचन बताते हैं: "यदि तुम अपनी ज़िम्मेदारियों को निभा सकते हो, अपने दायित्वों और कर्तव्यों को पूरा कर सकते हो, अपनी स्वार्थी इच्छाओं, व्यक्तिगत अभिलाषाओं और इरादों को त्याग सकते हो, परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रख सकते हो, और परमेश्वर तथा उसके घर के हितों को सर्वोपरि रख सकते हो, तो इस तरह के कुछ अनुभव के बाद, तुम पाओगे कि यह जीने का एक अच्छा तरीक़ा है: एक अधम या निकम्मा व्यक्ति बने बिना, यह सरलता और नेकी से जीना है, और यह न्यायसंगत और सम्मानित ढंग से जीना है, एक संकुचित मन वाले या ओछे व्यक्ति की तरह नहीं। तुम पाओगे कि किसी व्यक्ति को ऐसे ही जीना और काम करना चाहिए। धीरे-धीरे, अपने खुद के हितों को पूरा करने की तुम्हारे हृदय में बसी इच्छा घटती चली जाएगी" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो')।

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