88. मैंने प्रसिद्धि और लाभ के बंधनों को उतार फेंका है

शाओहे, चीन

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “चूँकि लोग परमेश्वर के आयोजनों और परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं जानते हैं, इसलिए वे हमेशा प्रतिरोधी मनोदशा से और विद्रोही रवैये के साथ नियति का सामना करते हैं और वे हमेशा परमेश्वर के अधिकार, उसकी संप्रभुता और अपनी नियति में होने वाली चीजों से मुक्त होना चाहते हैं, व्यर्थ ही यह आशा रखते हैं कि वे अपनी वर्तमान परिस्थितियों को बदल देंगे और अपनी नियति को पलट देंगे। परंतु वे कभी भी सफल नहीं हो सकते हैं और वे हर मोड़ पर नाकामियों का सामना करते हैं। उनकी आत्मा की गहराइयों में घटित होने वाला यह संघर्ष उन्हें पीड़ा देता है और यह पीड़ा हड्डियों तक उतर जाती है, साथ ही यह उनसे उनका जीवन व्यर्थ करवा देती है। इस पीड़ा का कारण क्या है? क्या यह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण है या दुर्भाग्य के कारण? स्पष्ट है कि दोनों में कोई भी बात सही नहीं है। अंतिम विश्लेषण में, लोग जिस मार्ग पर चलते हैं और अपना जीवन जीने के जो तरीके वे चुनते हैं, उसी कारण से ऐसा होता है। हो सकता है कि कुछ लोगों ने इन चीजों को अनुभव ही न किया हो। किन्तु जब तुम सही मायनों में जान जाते हो और यह स्वीकार कर लेते हो कि मनुष्य की नियति पर परमेश्वर की संप्रभुता है, जब तुम सही मायनों में समझ जाते हो कि हर वह चीज जिस पर परमेश्वर की संप्रभुता है और जिसकी वह व्यवस्था करता है, वह तुम्हारे लिए जबरदस्त लाभ और सुरक्षा है, तब तुम्हें अपनी पीड़ा धीरे-धीरे कम होती महसूस होगी और तुम्हारा सम्पूर्ण अस्तित्व धीरे-धीरे सुकून भरा, स्वतंत्र और मुक्त हो जाएगा(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III)। जब भी मैं परमेश्वर के वचनों का यह अंश देखती हूँ, तो मुझे कड़ी मेहनत करने का अपना पिछला अनुभव याद आ जाता है। चूँकि मैं परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं समझती थी, इसलिए हमेशा अपने प्रयासों से अपनी किस्मत बदलना चाहती थी और प्रसिद्धि और लाभ दोनों के साथ एक सम्मानजनक और प्रतिष्ठित जीवन जीना चाहती थी, ताकि दूसरे मेरी सराहना करें। मेरा मानना था कि प्रसिद्धि और लाभ से मुझे एक सुखी जीवन मिलेगा। बार-बार मुश्किलों और असफलताओं का अनुभव करने के बाद मुझे तब होश आया जब मैं एक बस दुर्घटना में लगभग मर ही चुकी थी और एहसास हुआ कि मौत के सामने इंसान कितना लाचार और छोटा है, कि कितना भी पैसा जीवन नहीं खरीद सकता, कि प्रसिद्धि और लाभ के अनुसरण से मुझे केवल दर्द और खालीपन मिला और यह कि केवल परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने और एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य पूरा करने का चुनाव करके ही मैं सबसे अधिक सार्थक जीवन जी सकती हूँ।

मेरा जन्म एक ग्रामीण इलाके में हुआ था और जब मैं बच्ची थी, तो मैंने अपनी बहन को एक खनिज प्रसंस्करण संयंत्र की प्रयोगशाला में काम करते देखा था। उसके काम का माहौल आरामदायक और सुकून भरा था और वह नियमित रूप से काम के सिलसिले में यात्रा कर पाती थी। हर बार जब वह घर आती, तो न केवल वह बहुत फैशनेबल और सुंदर कपड़े पहने होती थी, बल्कि वह दूसरे क्षेत्रों की कुछ स्थानीय खासियतें भी लाती थी। गाँव के सभी लोग उसकी बहुत सराहना करते थे और मुझे उससे ईर्ष्या होती थी, मैं सोचती थी : “कितना अच्छा होता कि अगर मैं भविष्य में ऐसा सम्मानजनक और प्रतिष्ठित जीवन जी पाती!” जिस साल मैंने जूनियर हाई स्कूल से स्नातक किया, उसी साल संयोग से मेरी बहन वाले खनिज प्रसंस्करण संयंत्र में भर्ती हो रही थी, और इसलिए मैं उस संयंत्र में काम करने चली गई। लेकिन मेरी शिक्षा का स्तर कम था और कोई विशेष कौशल नहीं था, इसलिए मैं केवल कार्यशाला में ही काम कर सकती थी। कार्यशाला में मशीनों के शोर से कान बहरे हो जाते थे और हर जगह धूल उड़ती रहती थी। मैं हर दिन दर्जनों किलो अभिकर्मक लेकर सीढ़ियों से ऊपर-नीचे चढ़ती-उतरती थी ताकि अभिकर्मक भर सकूँ। चूँकि मुझे अभिकर्मकों से एलर्जी थी, मेरे हाथों और चेहरे पर लाल चकत्ते पड़ गए थे। मुझे रात की पालियों में भी काम करना पड़ता था, कुछ महीने बाद मेरा चेहरा पीला पड़ गया और मुरझा गया और मैं पूरी तरह से थक गई थी। मैंने देखा कि तकनीकी काम करने वाले मेरे सहकर्मियों को सबसे अच्छे लाभ और आवास मिलते थे, साथ ही उनका वेतन भी मेरे वेतन से कई गुना ज्यादा था। वे अक्सर दफ्तर में बैठे भी रहते, आराम से अखबार पढ़ते और चाय पीते थे और साफ-सुथरे कपड़े पहने होते थे, उनका रूप-रंग भी सभ्य और सौम्य होता था। फिर जब मैं खुद को देखती, जो हर दिन धूल-मिट्टी में सनी रहती थी, तो मुझे लगता था कि मैं उनसे नीची हूँ; मुझे वास्तव में बहुत हीन महसूस होता था। मैंने मन ही मन सोचा : “मेरे पास न तो शिक्षा है और न ही कोई कौशल, इसलिए मैं केवल कड़ी मेहनत ही कर सकती हूँ। मुझे सच में पछतावा है कि मैंने पहले मन लगाकर पढ़ाई नहीं की। अगर मुझे डिप्लोमा मिल गया होता, तो क्या मैं भी उनकी तरह भीड़ से अलग दिखकर सराहना नहीं पाती? हम सब इंसान हैं, तो मैं इतनी असफल क्यों हूँ? मैं अपनी पूरी जिंदगी कार्यशाला में मेहनत-मजदूरी करते हुए नहीं बिताना चाहती।” बाद में, मैंने संयंत्र के माध्यम से व्यावसायिक माध्यमिक विद्यालय की प्रवेश परीक्षा देने के एक अवसर के बारे में सुना। मैंने अपना आराम का समय छोड़ दिया, किताबें रटने और अभ्यास प्रश्न करने के लिए सुबह जल्दी उठने और देर रात सोने लगी। दो साल की कड़ी मेहनत के बाद मैंने एक व्यावसायिक विद्यालय में दाखिले की योग्यता हासिल कर ली। तीन साल बाद मुझे अपनी इच्छानुसार डिप्लोमा मिल गया और मैं एक कुशल पेशेवर बन गई। मैंने अपने चिकनाई वाले काम के कपड़े उतार दिए और धूल भरी कार्यशाला छोड़कर एक आकर्षक दफ्तर की नौकरी कर ली। कार्यशाला में अभी भी व्यस्त अपने सहकर्मियों को देखक मैं मन ही मन सोचती थी कि पिछले कुछ सालों के मेरे प्रयास बेकार नहीं गए। मैं इस विचार में और भी दृढ़ता से विश्वास करने लगी कि “सबसे महान इंसान बनने के लिए व्यक्ति को सबसे बड़ी कठिनाइयाँ सहनी होंगी” और यह कि जब तक मैं कड़ी मेहनत करने को तैयार हूँ, मैं एक आरामदायक, सुविधाजनक, सभ्य और प्रतिष्ठित जीवन जी सकती हूँ।

लेकिन जब मैं विभागीय कार्यालय में पहुँची, तो मैंने पाया कि मेरे सहकर्मियों के पास न केवल शैक्षणिक योग्यताएँ थीं, बल्कि पेशेवर पदवियाँ भी थीं। हालाँकि हम एक जैसा काम करते थे, लेकिन मेरा वेतन हम सब में सबसे कम था। इसके अलावा पेशेवर पदवी के बिना मैं घर के आवंटन, आधिकारिक रुतबे या पदोन्नति के लिए योग्य नहीं थी और मुझे किसी भी समय वापस कार्यशाला में भेजा जा सकता था। अगर मुझे वेतन वृद्धि और पदोन्नति चाहिए थी, तो मुझे एक उन्नत पेशेवर पदवी हासिल करनी थी। उसके बाद मैंने ढेर सारी परीक्षा सामग्री खरीदी, जिसमें लेखांकन सिद्धांत, उन्नत अंग्रेजी, सांख्यिकीय सिद्धांत और इसी तरह की अन्य चीजें शामिल थीं। ये ऐसी चीजें थीं जिनसे मेरा पहले कभी पाला नहीं पड़ा था और मेरे लिए उन्हें सीखना वास्तव में बहुत मुश्किल था। हालाँकि विभागीय कार्यालय में अपनी जगह पक्की करने के लिए मुझे पूरी जान लगानी पड़ी। बाद में मैंने काम के अलावा अपना सारा समय और ऊर्जा पढ़ाई में लगा दिए। परेशान होने से बचने के लिए मैंने अपने एक साल के बच्चे को अपने माता-पिता को सौंपने का पीड़ादायक निर्णय भी लिया। हालाँकि काम के बहुत अधिक तनाव और मेरी खराब शैक्षणिक पृष्ठभूमि के कारण मैंने लगातार दो साल परीक्षा दी लेकिन दोनों बार असफल रही। मेरे सहकर्मियों ने मेरा मजाक उड़ाया और मेरे पति ने मुझे दोबारा परीक्षा न देने की सलाह दी। लेकिन मैंने हार मानने से इनकार कर दिया और अक्सर देर रात तक पढ़ाई करती थी। शुरू में मुझे थायरॉइड की समस्या थी और लंबे समय तक दवा लेने की जरूरत होती थी। लंबे समय तक देर रात तक पढ़ाई करने से मेरी रोग-प्रतिरोधक क्षमता और भी खराब हो गई। मुझे हर दो-चार दिन में नसों में ड्रिप लगवानी पड़ती थी और जब मैं सच में बहुत बीमार महसूस करती थी तो चलते समय मेरी साँस तक फूल जाती थी। हालाँकि अगर मुझे पेशेवर पदवी न मिलती, तो मेरे पास वेतन वृद्धि या पदोन्नति का कोई मौका नहीं होता। तो क्या इतने सालों की मेरी सारी मेहनत बेकार नहीं चली जाती? भविष्य में मुझे भीड़ से अलग दिखने का मौका कैसे मिलता? यह सोचने के बाद मैंने हिम्मत बनाए रखी और कोशिश करती रही। तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद आखिरकार मुझे एक मध्यवर्ती पेशेवर योग्यता मिल गई। इस “पास होने” के साथ मुझे जल्द ही एक मध्यम स्तर के कैडर के रूप में पदोन्नत कर दिया गया। मेरा वेतन भी बढ़ गया क्योंकि मैं एकदम से मजदूर से एक कैडर बन गई थी। मुझे लगा कि मेरी अहमियत और मेरा रुतबा बढ़ गया है; मैं बता नहीं सकती कि मुझे कितना गर्व था।

हालाँकि यह अच्छा समय ज्यादा दिन नहीं चला। कुछ साल बाद संयंत्र का मुनाफा घट गया और मेरी छँटनी कर दी गई। मैं एक पल में एक कैडर से नौकरी से निकाली गई मजदूर बन गई। मुझे लगा कि एकदम से मेरे सिर के ऊपर का प्रभामंडल और मेरा उज्ज्वल भविष्य गायब हो गए हैं और मैं वास्तव में बहुत खोया हुआ महसूस कर रही थी; मैं अपनी पूरी जिंदगी इस तरह बिताने को भी तैयार नहीं थी। उस समय मैंने अखबारों में पढ़ा कि बहुत से लोगों ने नौकरी से निकाले जाने के बाद अपना खुद का व्यवसाय शुरू किया और अंत में मालिक और उद्यमी बन गए और एक शानदार जीवन जी रहे थे। मेरा मानना था कि जो वे कर सकते हैं, वह मैं भी कर सकती हूँ। इसलिए मैंने खुद अपनी उद्यमी की यात्रा शुरू की, एक ठेला लगाना, नाश्ता बेचना, बीमा का प्रचार करना, वगैरह। हालाँकि मैंने कुछ पैसे कमाए, लेकिन मैं एक कार दुर्घटना का शिकार हो गई और मेरी गर्दन की रीढ़ में चोट लग गई। इसके तुरंत बाद मेरे पति की भी छँटनी कर दी गई, मेरे माता-पिता बीमार पड़े और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा और हमारे परिवार के पास जो थोड़ा-बहुत पैसा था, वह सब खर्च हो गया। इन मुश्किलों के सामने मैं हार मानने को तैयार नहीं थी और अभी भी अवसरों की तलाश में थी। 2004 में मैं प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग के संपर्क में आई। मैंने एक प्रबंधक को सुना जो औसत जीवन से सफल होने तक के अपने उद्यमी अनुभव को साझा कर रही थी और यह भी कि कैसे उसकी बिक्री टीम पूरे देश में फैली हुई थी, वह कैसे हर साल कई लाख युआन कमाती थी... यह सुनकर मुझमें जोश भर गया और मैं बिना किसी हिचकिचाहट के टीम में शामिल हो गई। मैं लगातार सीखती थी कि कैसे उत्पाद बेचें और अपनी टीम विकसित करें, मेरा सपना था कि एक दिन बहुत सारा पैसा कमाकर वित्तीय स्वतंत्रता हासिल करूँगी और दूसरों के साथ अपने उद्यमी अनुभवों को साझा कर पाऊँगी। यह कितना शानदार होगा!

कुछ ही समय बाद एक रिश्तेदार ने मुझे अंत के दिनों के परमेश्वर का सुसमाचार का उपदेश दिया। परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के जरिए मुझे पता चला कि परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है, कि मानवजाति की नियति, परिणाम और मंजिल परमेश्वर के हाथों में है और यह कि लोगों को एक अच्छी नियति तभी मिल सकती है जब वे परमेश्वर के प्रति समर्पण करें और उसकी आराधना करें। इसलिए, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार किया और कलीसियाई जीवन में भाग लेना शुरू कर दिया। हालाँकि उस समय मैं पूरी तरह से अपनी बिक्री टीम को विकसित करने पर केंद्रित थी और मुझे डर था कि बहुत अधिक सभाओं में भाग लेने से मेरी बिक्री पर असर पड़ेगा। अगर मेरी बिक्री कम होती, तो मेरी आय कम होती। तब मैं एक प्रतिष्ठित और सम्मानजनक जीवन जीने के बारे में सोच भी कैसे सकती थी? इसलिए, मैंने अपना अधिकांश समय उत्पाद बेचने और अपने ग्राहक आधार का विस्तार करने में बिताया, अक्सर सभाएँ छोड़ देती थी। यहाँ तक कि जब मैं सभाओं में जाती भी थी, तो मुझे हमेशा नींद आती थी और कुछ भी समझ नहीं आता था। शुरू में मुझे थोड़ी आत्म-ग्लानि महसूस हुई, लेकिन जब मैंने देखा कि मेरी कड़ी मेहनत से किए गए प्रबंधन के तहत मेरी टीम में लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है, हमारी बिक्री बेहतर से बेहतर हो रही है और मैं एक मध्य-स्तर की वितरक बनने के करीब और करीब आ रही हूँ, तो मेरे दिल में जो थोड़ी-बहुत आत्म-ग्लानि थी, वह गायब हो गई। बाद में मैं लगभग हर दिन उत्पाद बेचने के लिए ग्राहकों के पास जाती थी, हर महीने टीम को अध्ययन यात्राओं पर ले जाती थी, इसलिए मैंने सभाओं में जाना बंद कर दिया। जब बहनें मुझे ढूँढ़ने मेरे घर आतीं, तो मैं उनसे छिप जाती थी, मैंने अपना तन-मन अपने करियर के लिए समर्पित कर दिया था। ग्राहकों को बेहतर ढंग से विकसित करने के लिए मैंने बिक्री की विभिन्न बातें सीखीं। उदाहरण के लिए, मैंने बीमारियों के खतरों के बारे में बात करके ग्राहकों को स्वास्थ्य उत्पाद खरीदने के लिए प्रेरित किया और सौंदर्य प्रसाधन बेचने के लिए ग्राहकों की प्रशंसा की। मैंने प्रत्यक्ष बिक्री की संभावनाओं और आकर्षक बोनस प्रणाली के बारे में भी बात की और खुद को खूबसूरती से तैयार किया, अपनी बिक्री टीम में शामिल होने के लिए ग्राहकों को आकर्षित करने हेतु एक सफल व्यक्ति की छवि का उपयोग किया। बाद में मुझे थोड़ी बेचैनी महसूस हुई : दरअसल, मेरी आय बिल्कुल भी स्थिर नहीं थी और प्रत्यक्ष बिक्री के माध्यम से पैसा कमाना इतना आसान नहीं था। क्या मैं लोगों को धोखा देने के लिए सिर्फ सब्ज़बाग नहीं दिखा रही थी? लेकिन फिर मैंने सोचा : “प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग में हर कोई बिक्री की पिच का प्रशिक्षण लेता है। अगर तुम बहुत ईमानदार हो तो चीजें कैसे बेच पाओगी? तुम कोई पैसा कैसे कमाओगी?” इसलिए, मैं पैसा कमाने के लिए धोखेबाजी के तरीके इस्तेमाल करती रही। ज्यादा पैसा कमाने के लिए मैं अक्सर सुबह एक या दो बजे तक काम करती थी, घर पहुँचने पर मैं बुरी तरह थक जाती थी। यहाँ तक कि मेरे पति का जब ऑपरेशन हुआ तो मेरे पास उनकी देखभाल करने का भी समय नहीं होता था। वह गुस्से में कहते थे कि मैं पत्थर-दिल हूँ और यहाँ तक कि तलाक भी माँग लिया। मेरी बेटी, जो हाई स्कूल में जाने वाली थी, ऑनलाइन गेम की आदी हो गई और उसके ग्रेड गिर गए, लेकिन मेरे पास उसकी देखभाल करने का कोई समय नहीं था। टीम का नेतृत्व करना मुश्किल था, मेरे विवाह में समस्या थी और मेरा बच्चा आज्ञाकारी नहीं था। इन सबसे मैं थक कर चकनाचूर हो गई थी। मैं अक्सर सोचती थी : “क्या सच में यही वह जीवन है जो मैं चाहती हूँ?” हालाँकि टीम में सुधार होने लगा था और लगता था कि मैं जो अद्भुत जीवन चाहती हूँ, वह बस आने ही वाला है, इसलिए मैं हिम्मत करके आगे बढ़ती रही। मैंने इस तरह दो साल तक कड़ा संघर्ष किया। मेरी टीम बढ़कर लगभग सौ लोगों की हो गई और हमारी बिक्री लगातार बढ़ती रही। मैं एक मध्य-स्तर की वितरक बन गई, मेरी मासिक आय 6,000 से 7,000 युआन थी। मुझे अपने अगुआओं से प्रशंसा और आसपास के लोगों से सराहना मिली और मुझे उपलब्धि का बड़ा एहसास हुआ। हालाँकि बाद में मेरे दिल में एक अजीब-सा खालीपन होता था, लेकिन जब मैंने सोचा कि अगर मैं एक उच्चस्तरीय की वितरक बन गई तो मैं प्रति वर्ष लाखों युआन कमा सकती हूँ और सबकी प्रशंसा पा सकती हूँ, तो मुझे नई प्रेरणा मिली और मैंने एक उच्चस्तरीय वितरक बनने के लक्ष्य की ओर संघर्ष करने के लिए खुद को तैयार किया। जब मैं टीम को एक अध्ययन यात्रा पर ले जा रही थी तो जिस बस में हम सवार थे, वह अप्रत्याशित रूप से एक ट्रक से टकरा गई और मैं बेहोश हो गई। जब मैं जागी, मैंने देखा कि गाड़ियाँ जमीन पर पलटी पड़ी थीं और चारों ओर चीखें सुनाई पड़ रही थीं। कुछ लोगों के चेहरे पर खून लगा था और कुछ दर्द से कराह रहे थे। मैं खड़ा होना चाहती थी, लेकिन मेरी कमर में इतना दर्द था कि मैं उठ नहीं सकी। मुझे बस बचाव दल के लोगों का इंतजार करना पड़ा कि वे हमें बस से बाहर निकालें। यह दुखद दृश्य देखकर मैं डर गई, “क्या मुझे लकवा मार जाएगा क्योंकि मेरी कमर में बहुत दर्द है? मेरी टीम के इतने सारे लोग घायल हो गए हैं। अगर किसी को कुछ हो गया, तो मैं उनके परिवार को क्या जवाब दूँगी?” मैंने खुद को बेहद असहाय महसूस किया। इस समय मैंने परमेश्वर के बारे में सोचा और अपने दिल में प्रार्थना करती रही, “प्रिय परमेश्वर, हमें बचाओ...” जाँच के बाद पता चला कि मेरी कमर की तीन निचली कशेरुकाओं में कम्प्रेशन फ्रैक्चर हैं। डॉक्टर ने सामान्य उपचार की सलाह दी। भले ही मैं बस में सबसे आगे बैठी थी, लेकिन मुझे गंभीर चोट नहीं आई। यह मुझ पर परमेश्वर की दया और सुरक्षा थी और मैंने तहे दिल से परमेश्वर का धन्यवाद किया। मेरी अच्छी दोस्त रीढ़ की हड्डी की सर्जरी के बाद भी वार्ड में कोमा में थी, एक और बड़ी बहन के पैर का टेंडन टूटने के कारण अभी-अभी सर्जरी हुई थी और बीस-बाइस साल की एक लड़की को पेड़ू में चोट लगी थी और डॉक्टर ने कहा कि वह शायद कभी माँ नहीं बन पाएगी। यह सब देखकर मुझे एहसास हुआ कि इंसानी जीवन कितना नाजुक होता है। दो दिन पहले बस में हम खुशी-खुशी अपनी सीखी हुई बातें साझा कर रहे थे, लेकिन अब हम सब अस्पताल के बिस्तरों पर पड़े थे। फिर मैंने खुद को देखा, मेरे कमर में फ्रैक्चर था। डॉक्टर ने कहा कि मैं दो-तीन महीने तक अपनी देखभाल नहीं कर पाऊँगी। मैंने सोचा : “अगर मैं इस बार मर जाती तो और पैसे कमाने का क्या फायदा? मैं तो बस जिंदा हूँ, यही बहुत बड़ी बात है!”

दो महीने बाद मुझे अस्पताल से छुट्टी मिल गई और मैं स्वास्थ्य लाभ के लिए घर लौट आई। एक बहन को जब पता चला कि मैं बस दुर्घटना का शिकार हुई हूँ, तो वह मुझसे मिलने आई और उसने परमेश्वर के वचन का एक अंश ढूँढ़कर मुझे पढ़कर सुनाया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के हाथों से नियंत्रित होता है। तुम स्वयं को नियंत्रित करने में असमर्थ हो : भले ही मनुष्य अपनी ओर से भाग-दौड़ करता रहे और व्यस्त रहे के बावजूद मनुष्य स्वयं को नियंत्रित करने में अक्षम रहता है। यदि तुम अपने भविष्य की संभावनाओं को जान सकते, यदि तुम अपने भाग्य को नियंत्रित कर सकते, तो क्या तुम्हें तब भी एक सृजित प्राणी कहा जाता? संक्षेप में, परमेश्वर चाहे जैसे भी कार्य करे, उसका समस्त कार्य केवल मनुष्य के वास्ते होता है। यह वैसा ही जैसे स्वर्ग और पृथ्वी और उन सभी चीज़ों को परमेश्वर ने मनुष्य की सेवा करने के लिए सृजित किया : परमेश्वर ने मनुष्य के लिए चंद्रमा, सूर्य और तारे बनाए, उसने मनुष्य के लिए जानवर और पेड़-पौधे, बसंत, ग्रीष्म, शरद और शीत ऋतु इत्यादि बनाए—ये सब मनुष्य के अस्तित्व के वास्ते ही बनाए गए थे। और इसलिए, परमेश्वर मनुष्य को चाहे जैसे भी ताड़ित करता हो या चाहे जैसे भी उसका न्याय करता हो, यह सब मनुष्य के उद्धार के वास्ते ही है। यद्यपि वह मनुष्य को उसकी दैहिक आशाओं से वंचित कर देता है, पर यह मनुष्य को शुद्ध करने के वास्ते है, और मनुष्य का शुद्धिकरण मनुष्य के अस्तित्व के लिए किया जाता है। मनुष्य की मंज़िल सृजनकर्ता के हाथ में है, तो मनुष्य स्वयं को नियंत्रित कैसे कर सकता है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना)। मेरी बहन ने कहा : “इंसान की नियति परमेश्वर के हाथ में है और कोई भी अपनी नियति को नियंत्रित नहीं कर सकता। देखो तुम कैसे दिन भर पैसे के लिए हाथ-पैर मार रही थी। इस बार परमेश्वर ने ही तुम्हें गंभीर चोट से बचाया। लेकिन क्या तुमने कभी सोचा है कि अगर तुमने पैसा कमा भी लिया, तो अगर तुम्हारी जान ही चली जाए तो उस पैसे का क्या फायदा? हम सौभाग्यशाली हैं कि आज अंत के दिनों का परमेश्वर का कार्य स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन तुम ठीक से सभाओं में शामिल नहीं हो रही हो। क्या यह तुम्हारे लिए परमेश्वर के उद्धार से बचने का प्रयास नहीं है?” हालाँकि बहन के शब्द मेरे दिल में चुभ गए, लेकिन वे तथ्य भी थे। पीछे मुड़कर देखती हूँ कि जब मैंने स्व-अध्ययन से अपना डिप्लोमा और पेशेवर पदवी हासिल की, तो मैंने सोचा कि इसके बाद सब कुछ आसान हो जाएगा। लेकिन मुझे उम्मीद नहीं थी कि मेरी छँटनी हो जाएगी और मैं बेरोजगार हो जाऊँगी। मैं इस हार को चुपचाप सहने को तैयार नहीं थी। जब मैंने देखा कि बहुत से लोग अपना खुद का व्यवसाय शुरू करते हैं और भीड़ से अलग दिखते हैं, तो मैं भी अपना व्यवसाय शुरू करने की कोशिश में कड़ी मेहनत करती रही। हालाँकि, यह सब असफलता में समाप्त हुआ। इस दौरान हालाँकि मुझे कार दुर्घटना का भी अनुभव हुआ और गर्दन की रीढ़ में चोट लगी जिससे मैं लगभग लकवाग्रस्त हो गई थी। पूरी तरह से ठीक होने से पहले ही मैं फिर से प्रत्यक्ष बिक्री उद्योग में कूद पड़ी। मैं प्रत्यक्ष बिक्री के माध्यम से एक अच्छा जीवन जीना चाहती थी, लेकिन मैंने यह उम्मीद नहीं की थी कि एक बस दुर्घटना मेरी इतने सालों की कड़ी मेहनत पर पानी फेर देगी और उसे शून्य बना देगी। मुझे एहसास हुआ कि मैं वास्तव में अपनी नियति को नियंत्रित नहीं कर सकती और यह कि इंसान की नियति परमेश्वर के हाथों में है। यह दुर्घटना एक बुरी चीज लग सकती है, लेकिन असल में यह एक अच्छी बात थी। यह मेरे लिए परमेश्वर का उद्धार था। वरना मैंने प्रसिद्धि और लाभ का पीछा करना बंद नहीं किया होता।

बाद में मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े और मैं बहुत द्रवित हुई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “सर्वशक्तिमान गहराई से पीड़ित इन लोगों पर दया करता है; साथ ही, वह उन लोगों से विमुख महसूस करता है जिनमें जरा-सी भी चेतना नहीं है, क्योंकि उसे लोगों से जवाब पाने के लिए बहुत लंबा इंतजार करना पड़ता है। वह खोजना चाहता है, तुम्हारे दिल और तुम्हारी आत्मा को खोजना चाहता है, तुम्हें पानी और भोजन देना चाहता है, ताकि तुम जाग जाओ और अब तुम भूखे या प्यासे न रहो। जब तुम थक जाओ और तुम्हें इस दुनिया की वीरानी का कुछ-कुछ एहसास होने लगे, तो तुम भटकना मत, रोना मत। सर्वशक्तिमान परमेश्वर, प्रहरी, किसी भी समय तुम्हारे आगमन को गले लगा लेगा(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सर्वशक्तिमान की आह)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मेरे दिल को सुकून मिला और मैंने परमेश्वर के प्रेम और दया को महसूस किया। मैंने परमेश्वर की वाणी सुनी थी लेकिन पैसे, प्रसिद्धि और लाभ के प्रलोभन का प्रतिरोध नहीं कर पाई थी और अधिक पैसा कमाने और दूसरों से बेहतर बनने के लिए मैं सभाओं में नहीं जाना चाहती थी। यहाँ तक कि जब मेरे भाई-बहन मुझे ढूँढ़ने मेरे घर आते थे, तो मैं उनसे छिप जाती थी। मैं काफी सुन्न और विद्रोही हो गई थी, लेकिन परमेश्वर ने मेरा परित्याग नहीं किया। जब बस दुर्घटना हुई तो मैं अगली सीट पर बैठी थी और मुझे जोर का झटका लगा था, लेकिन मुझे गंभीर चोट नहीं आई। क्या यह परमेश्वर की सुरक्षा नहीं थी? परमेश्वर ने एक बहन की व्यवस्था भी की कि वह मेरे पास आए और सत्य पर संगति करे, ताकि मैं परमेश्वर के इरादे को समझ सकूँ और परमेश्वर की ओर मुड़ सकूँ। क्या यह सब मुझ पर परमेश्वर की दया नहीं थी? परमेश्वर का प्रेम इतना महान है, लेकिन मैं प्रसिद्धि और लाभ के पीछे पड़ी थी, परमेश्वर से छिप रही थी और उससे बहुत दूर चली गई थी। मेरा दिल बहुत कठोर हो गया था और मैं जमीर और विवेक से पूरी तरह रहित थी। मैं सच में परमेश्वर के उद्धार के अयोग्य थी!

जैसे ही मैं फिर से चलने लायक ठीक हुई, मेरे अगुआ ने मुझे फोन किया और टीम का प्रबंधन करने के लिए वापस जाने को कहा। मैंने मन ही मन सोचा : “अगर मैं उस टीम का प्रबंधन नहीं करती जिसे मैंने इतनी मेहनत से बनाया है, तो वह भंग हो जाएगी। अब बिक्री हर महीने घट रही है और मेरी आय भी घट रही है। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो क्या मेरे पिछले सारे प्रयास व्यर्थ नहीं हो जाएँगे?” मेरा दिल डगमगाने लगा। इस समय मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास और उसका अनुसरण करते हो, तुम्हें अपना सर्वस्व उसे अर्पित कर देना चाहिए, और व्यक्तिगत चुनाव या माँगें नहीं करनी चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर के इरादे संतुष्ट करने चाहिए। चूँकि तुम्हें सृजित किया गया था, इसलिए तुम्हें उस प्रभु के प्रति समर्पण करना चाहिए जिसने तुम्हें सृजित किया, क्योंकि तुम्हारा स्वयं अपने ऊपर कोई स्वाभाविक प्रभुत्व नहीं है, और तुममें स्वयं अपनी नियति को नियंत्रित करने की स्वाभाविक क्षमता नहीं है। चूँकि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर में विश्वास करता है, इसलिए तुम्हें पवित्रीकरण और परिवर्तन का अनुसरण करना चाहिए(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है)। “जिस क्षण तुम रोते हुए इस दुनिया में आते हो उसी पल से तुम अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना शुरू कर देते हो। परमेश्वर की योजना और उसके विधान की खातिर तुम अपनी भूमिका निभाते हो और अपनी जीवन यात्रा शुरू करते हो(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है)। परमेश्वर के वचनों से मुझे समझ आई कि इंसान का सृजन परमेश्वर ने किया है। एक सृजित प्राणी के रूप में मुझे परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए, परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए, अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करना चाहिए और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहिए। मैंने सोचा कि मैंने अपना अधिकांश जीवन प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे का पीछा करते हुए बिताया है। अंत में, अपनी सारी मेहनत और पीड़ा के बाद भी मुझे वह नहीं मिला जो मैं चाहती थी और मैंने लगभग अपनी जान गँवा दी थी। कि मैं अब परमेश्वर के पास लौट पाने में सक्षम थी, यह परमेश्वर की दया और सुरक्षा के कारण था, और मुझे परमेश्वर के प्रेम का बदला चुकाना चाहिए। अभी भी बहुत से सच्चे विश्वासी हैं जो परमेश्वर के सामने नहीं आए हैं, और मुझे इन लोगों को सुसमाचार का प्रचार सुनाना चाहिए। यह मेरी जिम्मेदारी और मेरा कर्तव्य है। इसलिए मैंने टीम को और विकसित न करने का फैसला किया। मैं ठीक से सभाओं में शामिल होकर परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना चाहती थी और परमेश्वर की गवाही देने के लिए सुसमाचार का प्रचार करना चाहती थी। उसके बाद मैंने अपने अगुआ के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया और अपने भाई-बहनों के साथ अपना कर्तव्य निभाने का फैसला किया और अपने आसपास के लोगों को सक्रिय रूप से सुसमाचार का प्रचार करने लगी। हर दिन संतुष्टि भरा होता था।

2012 में मैं एक पूर्व सहकर्मी से मिली। वह पहले से ही एक उच्च स्तर की वितरक थी और खूब पैसा कमा रही थी। उसने एक बड़ा घर भी खरीद लिया था। उसने कहा, “जब तक तुम मेरे साथ काम करने आओगी, मैं तुम्हारी बिक्री कराने में मदद करूँगी। तुम्हारी सालाना तनख्वाह 1,00,000 युआन होगी, कोई समस्या नहीं।” यह देखकर कि वह बहुत पैसा कमा रही थी और इतनी जवान और सुंदर दिख रही थी और उसका नया घर एक विला जैसा था, मेरा मन फिर डगमगाने लगा, “क्या यह ठीक वैसा ही जीवन नहीं है जैसा मैं चाहती हूँ? मेरे पास अनुभव है और मैं उससे कम बुद्धिमान नहीं हूँ, इसलिए मेरे लिए वापसी करना मुश्किल नहीं होगा। 1,00,000 युआन की वार्षिक आय प्राप्त करने में ज्यादा मेहनत नहीं लगेगी।” लाभ के प्रलोभन ने मेरे दिल को शांत नहीं होने दिया, और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “प्रिय परमेश्वर, मैं जानती हूँ कि मुझे अपनी आस्था में ठीक से सभाओं में शामिल होने और अपना कर्तव्य निभाने की जरूरत है, लेकिन मैं अब भी प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण करना चाहती हूँ और मेरे दिल में बहुत अंतर्द्वंद्व है। प्रिय परमेश्वर, तुम मुझे शैतान के प्रलोभनों में पड़ने से बचाओ।”

बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और अपने प्रसिद्धि और लाभ के अनुसरण के मूल कारण के बारे में कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब तुम लोगों द्वारा जीवन में अनुसरण किए जा रहे अपने विभिन्न लक्ष्यों और उनके जीने के विभिन्न तरीकों की बार-बार जाँच करोगे और इनका सावधानीपूर्वक गहन-विश्लेषण करोगे तो तुम यह पाओगे कि उनमें से एक भी सृष्टिकर्ता के उस मूल इरादे के अनुरूप नहीं है जिसके साथ उसने मानवजाति का सृजन किया था। ये सारी चीजें लोगों को सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और उसकी देखभाल से दूर करती हैं; ये सभी ऐसे जाल हैं जो लोगों को भ्रष्ट बनने का कारण बनते हैं और उन्हें नरक में ले जाते हैं। इस बात को मान लेने के बाद तुम्हें जीवन के अपने पुराने दृष्टिकोण को त्याग देना चाहिए, विभिन्न जालों से दूर रहना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर को तुम्हारे जीवन का नियंत्रण करने देना चाहिए और इसके लिए व्यवस्थाएँ करने देना चाहिए, केवल परमेश्वर के आयोजनों और मार्गदर्शन के प्रति समर्पण करने का दृढ़ संकल्प करना चाहिए, खुद से कोई चुनाव नहीं करने चाहिए और एक ऐसा इंसान बनना चाहिए जो परमेश्वर की आराधना करता हो(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III)। “शैतान लोगों के विचारों को नियंत्रित करने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का इस्तेमाल करता है, उनसे और कुछ नहीं, बस इन दो ही चीजों के बारे में सोच-विचार करवाता है और उनसे प्रसिद्धि और लाभ के लिए संघर्ष करवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए कष्ट उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपमान सहन करवाता है और भारी बोझ उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करवाता है और उनसे प्रसिद्धि और लाभ की खातिर हर फैसला या निर्णय करवाता है। इस तरीके से शैतान लोगों पर अदृश्य बेड़ियाँ डाल देता है और इन बेड़ियों के रहते उनमें उन्हें तोड़ देने की न तो क्षमता होती है, न ही साहस होता है। अनजाने में वे बड़ी ही कठिनाई से कदम-दर-कदम आगे घिसटते हुए ये बेड़ियाँ ढोते रहते हैं। इस प्रसिद्धि और लाभ की खातिर मानवजाति भटककर परमेश्वर से दूर हो जाती है, उसके साथ विश्वासघात करती है और अधिकाधिक दुष्ट होती जाती है। इस तरह, एक के बाद एक पीढ़ी शैतान की प्रसिद्धि और लाभ के बीच नष्ट होती जाती है। अब शैतान की करतूतें देखते हुए क्या उसके धूर्त इरादे एकदम घृणास्पद नहीं हैं? शायद आज भी तुम शैतान की धूर्त मंशाओं की असलियत नहीं देख पाते हो क्योंकि तुम्हें लगता है कि प्रसिद्धि और लाभ के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं होगा और लोग अब आगे का मार्ग नहीं देख पाएँगे, अपने लक्ष्य नहीं देख पाएँगे और उनका भविष्य अंधकारमय, धुँधला और प्रकाशरहित हो जाएगा। परंतु धीरे-धीरे तुम सब लोग एक दिन समझ जाओगे कि प्रसिद्धि और लाभ ऐसी भारी-भरकम बेड़ियाँ हैं जिन्हें शैतान मनुष्य पर डाल देता है। जब वह दिन आएगा, तुम पूरी तरह से शैतान के नियंत्रण का प्रतिरोध करोगे और पूरी तरह से उन बेड़ियों का भी प्रतिरोध करोगे जो शैतान ने तुम पर डाल दी हैं। जब तुम उन सभी चीजों से खुद को मुक्त करना चाहोगे जिन्हें शैतान ने तुम्हारे भीतर गहराई से बैठा दिया है, तब तुम शैतान से अपने आपको पूरी तरह से अलग कर लोगे और उस सबसे सच में नफरत करोगे जो शैतान तुम्हारे लिए लाया है। तभी तुम्हारे पास परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम होगा और तड़प होगी(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझी कि शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का उपयोग करता है, उन्हें प्रसिद्धि और लाभ के अनुसरण को एक सकारात्मक चीज, जीवन भर के संघर्ष का लक्ष्य मानने पर मजबूर करता है, लगातार परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं से बचाने की कोशिश करता है और अंततः परमेश्वर से दूर करा देता है और उसे धोखा दिलवाता है। प्रसिद्धि और लाभ लोगों के लिए शैतान द्वारा बिछाए गए जाल हैं और वे फंदे हैं जो लोगों को पतन की ओर ले जाते हैं। मैं प्रसिद्धि और लाभ को इसलिए नहीं छोड़ सकी क्योंकि मैंने “आदमी ऊपर की ओर जाने के लिए संघर्ष करता है; पानी नीचे की ओर बहता है” और “भीड़ से ऊपर उठो” जैसे जीवित रहने के शैतानी नियमों को सकारात्मक चीजें मान लिया था। मेरा मानना था कि जब लोग प्रसिद्धि और लाभ प्राप्त कर लेते हैं तभी वे एक सम्मानजनक और मूल्यवान जीवन जी सकते हैं। मैंने उस समय के बारे में सोचा, जब मैंने स्कूल से स्नातक किया था और नौकरी शुरू की थी। अपनी बहन की तरह प्रतिष्ठित जीवन जीने के लिए मैंने बेताब होकर डिप्लोमा और पेशेवर पदवियों के लिए परीक्षाएँ दीं। नौकरी से निकाले जाने के बाद एक अच्छा जीवन जीने और लोगों की प्रशंसा जीतने के लिए मैंने प्रत्यक्ष बिक्री का प्रशिक्षण लिया और अच्छी बिक्री पाने के लिए झूठ बोलना और धोखा देना सीखा। लोग जो सुनना चाहते थे, मैं वही कहती थी और खुद को एक सफल व्यक्ति होने का दिखावा कर, झूठी छवि से लोगों को गुमराह करती थी। यहाँ तक कि जब मैंने लोगों को बचाने वाली परमेश्वर की आवाज सुनी और महसूस किया कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं और लोगों को सही मार्ग पर ले जा सकते हैं, तब भी मैंने ठीक से सभाओं में भाग नहीं लिया क्योंकि मैं अपनी टीम को विकसित करना और अपनी बिक्री में सुधार करना चाहती थी। यहाँ तक कि मेरे पास परमेश्वर के वचन पढ़ने का समय नहीं था और मैंने अपनी सारी ऊर्जा पैसा, प्रसिद्धि और लाभ कमाने का अनुसरण करने में लगा दी। आखिरकार, बस दुर्घटना में मेरी जान लगभग चली ही गई थी। अब मैं आखिरकार नियमित रूप से सभा करने और अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम थी, लेकिन जब मैंने अपनी पूर्व सहकर्मी को यह कहते सुना कि वह मुझे 1,00,000 युआन का वार्षिक वेतन दिलाने में मदद करेगी, तो मेरी इच्छाएँ जाग उठीं और मैं दुनिया में वापस जाकर कुछ बड़ा हासिल करने के लिए उत्सुक हो गई। मैं पैसे, प्रसिद्धि और लाभ से कितनी कसकर बंधी हुई थी! असल में इस बारे में सोचा, पिछले कुछ सालों में मैं प्रसिद्धि और लाभ के लिए हाथ-पैर मारने में व्यस्त थी। हालाँकि मैंने कुछ पैसे कमाए और दूसरों से प्रशंसा और सराहना भी पाई, लेकिन मेरा पारिवारिक जीवन सामंजस्यपूर्ण नहीं था और मैं अक्सर अपने पति से नाराज होती और झगड़ती थी, और मुझे अक्सर अपने दिल में खालीपन महसूस होता था। इसके अलावा प्रसिद्धि और लाभ के अनुसरण में मैंने अपने ग्राहकों से झूठ बोला और उन्हें धोखा दिया और जमीर के बुनियादी मानक को लांघ दिया। मैं बिना किसी ईमानदारी या गरिमा के जी रही थी। साथ ही, बस दुर्घटना से मुझे कुछ शारीरिक दुष्प्रभाव हुए हैं और मुझे अक्सर कमर दर्द रहता है। मैंने प्रसिद्धि और लाभ के लिए बहुत कुछ चुकाया, लेकिन बदले में मुझे जो मिला वह आध्यात्मिक खालीपन और शारीरिक दर्द था। मैंने महसूस किया कि आपके पास चाहे जितना पैसा हो, आप मन की शांति या साफ जमीर नहीं खरीद सकते और आपका रुतबा चाहे जितना भी ऊँचा हो, आप दुर्भाग्य से नहीं बच सकते। प्रसिद्धि और लाभ लोगों को सच्चा सुखी जीवन नहीं दे सकते। वे केवल लोगों को परमेश्वर से और दूर ले जा सकते हैं, ताकि वे खालीपन और दर्द में जियें और अंततः बचाए जाने का अवसर खो दें। अब मैंने आखिरकार अपने पैर पैसे, प्रसिद्धि और लाभ के दलदल से बाहर निकाल लिए थे, मैं पहले की तरह प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के पीछे नहीं भागना चाहती थी, या वह दुख, थकावट, खालीपन और पीड़ा का जीवन नहीं जीना चाहती थी। मुझे प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण करने की अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को छोड़ना था, परमेश्वर के प्रति समर्पण का अनुसरण करना था और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना था। केवल इसी तरह जीवन सार्थक होता है। मैंने यह भी महसूस किया कि हालाँकि ऐसा लग रहा था कि मेरी सहकर्मी मुझे मनाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन इसके पीछे शैतान का प्रलोभन और परमेश्वर का मुझ पर परीक्षण था। मैं फिर से शैतान की चालों में फँसकर अपने पिछले गलत रास्ते पर नहीं चल सकती थी। इसलिए, मैंने अपनी सहकर्मी को स्पष्ट रूप से मना कर दिया।

उस समय से जब भी कोई मुझे पैसे कमाने के अच्छे तरीके के रूप में किसी प्रकार की प्रत्यक्ष बिक्री की सलाह देता, मेरा दिल अब और नहीं डगमगाता था और मैं केवल सुसमाचार का प्रचार करने और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने के बारे में सोचती। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “तुम सृजित प्राणी हो—तुम्हें निस्संदेह परमेश्वर की आराधना और सार्थक जीवन का अनुसरण करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर की आराधना नहीं करते हो बल्कि अपनी अशुद्ध देह के भीतर रहते हो, तो क्या तुम बस मानव भेष में जानवर नहीं हो? चूँकि तुम मानव प्राणी हो, इसलिए तुम्हें स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाना और सारे कष्ट सहने चाहिए! आज तुम्हें जो थोड़ा-सा कष्ट दिया जाता है, वह तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक और दृढ़तापूर्वक स्वीकार करना चाहिए और अय्यूब तथा पतरस के समान सार्थक जीवन जीना चाहिए। ... तुम वे लोग हो जो सही मार्ग का अनुसरण करते हो, जो सुधार की खोज करते हो। तुम वे लोग हो जो बड़े लाल अजगर के देश में उठ खड़े होते हो, वे हो जिन्हें परमेश्वर धार्मिक कहता है। क्या यह सबसे सार्थक जीवन नहीं है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (2))। परमेश्वर के वचनों से मुझे समझ आया कि पैसा, प्रसिद्धि, लाभ, अभिमान या प्रतिष्ठा का पीछा करने का कोई मतलब नहीं है। केवल परमेश्वर में विश्वास करके, सत्य का अनुसरण करके, भ्रष्ट स्वभावों को उतार फेंककर और एक सृजित प्राणी के कर्तव्य को पूरा करके ही तुम सबसे सार्थक जीवन जी सकती हो। अतीत में मैं पैसे, प्रसिद्धि, लाभ और भौतिक आनंद के पीछे भागती थी और देह के लिए जीती थी। हालाँकि मैं प्रतिष्ठित और सम्मानजनक दिखती थी, लेकिन मुझे अपने दिल में शांति और खुशी महसूस नहीं होती थी। अब मैं अपने भाई-बहनों के साथ अपना कर्तव्य निभा रही हूँ, परमेश्वर के वचन खा और पी रही हूँ, परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार कर रही हूँ, आत्म-चिंतन कर रही हूँ और खुद को समझ रही हूँ। मैं अब उतना झूठ नहीं बोलती और मैंने धीरे-धीरे एक मानव समान जीना शुरू कर दिया है। मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की अगुआई का धन्यवाद करती हूँ कि उसने मुझे पैसे, प्रसिद्धि और लाभ के अनुसरण की पीड़ा से बचने में मदद की और जीवन में एक उज्ज्वल मार्ग पर चलने के लिए मेरा मार्गदर्शन किया!

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