22. आखिरकार मैंने अपना कर्तव्य निभाना सीख लिया

जिंचांग, इटली

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "अपना कर्तव्य पूरा करने की प्रक्रिया के माध्यम से मनुष्य धीरे-धीरे बदलता है, और इसी प्रक्रिया के माध्यम से वह अपनी वफ़ादारी प्रदर्शित करता है। इस प्रकार, जितना अधिक तुम अपना कार्य करने में सक्षम होगे, उतना ही अधिक तुम सत्य को प्राप्त करोगे, और उतनी ही अधिक तुम्हारी अभिव्यक्ति वास्तविक हो जाएगी। जो लोग अपना कर्तव्य बेमन से करते हैं और सत्य की खोज नहीं करते, वे अंत में हटा दिए जाएँगे, क्योंकि ऐसे लोग सत्य के अभ्यास में अपना कर्तव्य पूरा नहीं करते, और अपना कर्तव्य पूरा करने में सत्य का अभ्यास नहीं करते। ये वे लोग हैं, जो अपरिवर्तित रहते हैं और शापित किए जाएँगे। उनकी न केवल अभिव्यक्तियाँ अशुद्ध हैं, बल्कि वे जो कुछ भी व्यक्त करते हैं, वह दुष्टतापूर्ण होता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर')। "अपना कर्तव्य दिल लगाकर करने और इसकी ज़िम्मेदारी लेने के लिए तुम्हें पीड़ा सहने और एक कीमत चुकाने की ज़रूरत है। केवल इसके बारे में बात करना ही काफ़ी नहीं है। यदि तुम अपना कर्तव्य दिल लगाकर नहीं करते, बल्कि हमेशा शारीरिक प्रयास करना चाहते हो, तो तुम्हारा कर्तव्य निश्चित ही अच्छी तरह पूरा नहीं होगा। तुम बस एक ढर्रे पर काम करते रहोगे और कुछ नहीं, और तुम्हें पता नहीं होगा कि तुमने अपना कर्तव्य कितनी अच्छी तरह से निभाया। यदि तुम दिल लगाकर काम करोगे, तो तुम धीरे-धीरे सत्य को समझोगे; लेकिन अगर तुम ऐसा नहीं करोगे, तो तुम नहीं समझोगे। जब तुम दिल लगाकर अपना कर्तव्य निभाते हो और सत्य का पालन करते हो, तो तुम धीरे-धीरे परमेश्वर की इच्छा को समझने, स्वयं के भ्रष्टाचार और कमियों का पता लगाने और अपनी सभी विभिन्न अवस्थाओं में महारत हासिल करने में सक्षम हो जाते हो। यदि तुम खुद की जांच करने के लिए अपना दिल नहीं लगाते, लेकिन केवल बाहरी प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करते हो, तो तुम अपने दिल में उत्पन्न होने वाली विभिन्न आवस्थाओं और विभिन्न बाहरी वातावरणों में अपनी सभी प्रतिक्रियाओं को जानने में असमर्थ होगे। अगर तुम खुद की जांच करने के लिए अपना दिल नहीं लगाते हो, तो तुम्हारे लिए अपने दिल की समस्याओं का हल करना मुश्किल हो जाएगा" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'ईमानदार होकर ही कोई सच्ची मानव सदृशता जी सकता है')। परमेश्वर के वचन हमें दिखाते हैं कि अपना कर्तव्य निभाने में हमें सतर्क रहना होगा, जिम्मेदार बनना होगा और सत्य का अनुसरण करना होगा। मैं एक लापरवाह व्यक्ति हुआ करती थी। मैंने किसी भी काम में ज्यादा मेहनत नहीं की। परमेश्वर के घर में भी मैं ऐसा ही करती थी। मैं अपने काम में सर्वोत्तम परिणाम पाने का प्रयास नहीं करती थी। मेरे सामने जब भी कोई ऐसी जटिल समस्या आती, जिसमें कड़ी मेहनत की आवश्यकता होती, तो मैं लापरवाह और गैर-जिम्मेदार रहती, इसलिए मैं अपने काम में हमेशा गलतियाँ करती रहती। बाद में मुझे परमेश्वर के वचनों से अपने भ्रष्ट स्वभाव और इस बात की थोड़ी समझ आई कि परमेश्वर की इच्छा कैसे पूरी की जाए, तभी मैं जिम्मेदारी और दृढ़ता से अपना कर्तव्य निभा पाई।

उस समय मेरा काम इतालवी में अनुवाद की जाँच करना था। मैं पहले मेहनती थी और आने वाली मुश्किलें हल करने के लिए तैयार रहती थी। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, मेरे पास दस्तावेजों का ढेर लगने लगा और मैं थोड़ी असहज होने लगी, खासकर जब मैं रंग-बिरंगी टिप्पणियों वाले, पूर्णविराम, अल्पविराम और अन्य विराम-चिह्नों से भरे दस्तावेज देखती। फॉर्मेटिंग और प्लेसमेंट के हिसाब से हर दस्तावेज की जाँच होनी थी। मैं बेचैन हो उठी। मैंने सोचा, "इस पर मुझे कितना ध्यान देना पड़ेगा? यह तो बड़ा भारी काम है।" तब मेरी इच्छा उनकी इतनी मेहनत से जाँच करने की नहीं रही, और मैं बस उन्हें सरसरी निगाह से देखकर ठीक-ठाक कर देती। कभी-कभी मुझे अपने दिमाग को शांत करने की आवश्यकता होती और मैं वाकई सोचती कि क्या अनुवाद सही है, लेकिन जब मैं कोई जटिल वाक्य-विन्यास देखती, तो मैं स्वार्थपूर्ण गणनाएँ करने लगती : "हर शब्द पर चिंतन और अनुसंधान करने में बहुत मेहनत है, और इसके बावजूद यदि मैं असफल रही, तो क्या यह ऊर्जा की बरबादी नहीं होगी? छोड़ो, कोई और इन्हें देख लेगा।" और इसी तरह मैं बेमन से अपना काम करती रही।

समय के साथ लगातार समस्याएँ खड़ी होने लगीं। मेरे द्वारा जाँचे गए दस्तावेजों में अन्य लोगों को कैपिटल लैटर और विराम-चिह्नों की गलतियाँ मिलने लगीं और कुछ में तो अनुवाद से कई शब्द भी गायब मिले। जब मैंने यह देखा, तो मुझे वाकई बुरा लगा। किसी और ने उन छोटी-छोटी समस्याओं को तुरंत देख लिया, लेकिन जब वे मेरे सामने थीं, तो मुझे नहीं दिखीं। ऐसी स्पष्ट चूकें कैसे हो सकती हैं? मैं इसके बारे में जितना सोचती, उतना ही मुझे बुरा लगता। एक दिन लंच के बाद मुझे एक संदेश मिला, जिसमें कहा गया था कि मेरे द्वारा जाँचे गए एक दस्तावेज में एकवचन और बहुवचन की एक वाकई बुनियादी गलती है। मुझे लगा, मानो मेरे दिल पर छुरी चल गई हो। मैं इतनी लापरवाह कैसे हो सकती हूँ? मैंने इतनी बुनियादी गलती ढूँढ़ने में चूक कर दी? पता नहीं, मेरे द्वारा जाँचे गए अन्य दस्तावेजों में भी ऐसी गलतियाँ होंगी या नहीं। मेरे काम में गलतियों की भरमार थी। क्या करूँ? दुखी होकर मैं जल्दी से परमेश्वर के सामने आकर प्रार्थना करने लगी। मैंने अपनी हालत और हाल ही में काम के प्रति अपने दृष्टिकोण पर चिंतन किया।

मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : "अगर तुम अपना कर्तव्य पूरा करने में अपना दिल नहीं लगाते हो और लापरवाह बने रहते हो, कोई भी काम जितना हो सके उतने आसान तरीके से करते हो, तो यह किस तरह की मानसिकता है? यह मानसिकता सिर्फ़ बिना मन लगाए काम करने की है, जिसमें अपने कर्तव्य के प्रति कोई वफ़ादारी नहीं है, जिम्मेदारी की कोई समझ नहीं है, और उद्देश्य की कोई समझ नहीं है। हर बार जब तुम अपना कर्तव्य करते हो, तुम सिर्फ़ अपनी आधी शक्ति का उपयोग करते हो; तुम इसे आधे मन से करते हो, तुम इसमें अपना दिल नहीं लगाते हो, और थोड़ा-भी कर्तव्यनिष्ठ हुए बिना तुम बस जैसे-तैसे कार्य पूरा करने की कोशिश करते हो। तुम इसे इतने बेपरवाह तरीके से पूरा करते हो मानो तुम इससे खिलवाड़ कर रहे हो। क्या यह समस्याओं को पैदा नहीं करेगा? अंत में, लोग कहेंगे कि तुम अपना कर्तव्य खराब ढंग से करते हो, और तुम बस यंत्रवत ढंग से काम कर रहे हो। परमेश्वर इसके बारे में क्या कहेगा? वह कहेगा कि तुम विश्वास के लायक नहीं हो। अगर तुम्हें कोई काम सौंपा गया है, चाहे वह काफी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का काम हो या सामान्य जिम्मेदारी वाला काम हो, अगर तुम उसमें अपना दिल नहीं लगाते हो या अपनी जिम्मेदारी के अनुसार काम नहीं करते हो, और अगर तुम इस काम को परमेश्वर द्वारा दिये गये एक मिशन की तरह नहीं देखते हो या इसे परमेश्वर द्वारा सौंपे गये कार्य के तौर पर नहीं देखते हो, न ही इसे अपना कर्तव्य एवं दायित्व समझते हो, तो यह एक परेशानी बन जाएगी। 'विश्वास के अयोग्य'—ये शब्द यह परिभाषित करेंगे कि तुम अपने कर्तव्य किस तरह पूरे करते हो, और परमेश्वर यह कहेगा कि तुम्हारा चरित्र अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। अगर तुम्हें कोई काम सौंपा गया है और तुम इसके प्रति इस तरह का रवैया अपनाते हो और इसे इसी तरह से पूरा करते हो, तो क्या आने वाले समय में तुम्हें कोई और कर्तव्य करने को दिया जाएगा? क्या तुम्हें कोई महत्वपूर्ण काम सौंपा जा सकता है? शायद तुम्हें ऐसा काम सौंपा जा सकता है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि तुम्हारा व्यवहार कैसा था। हालांकि, परमेश्वर अपने हृदय की गहराई में तुम्हारे प्रति हमेशा कुछ अविश्वास पाले रहेगा, साथ ही कुछ असंतोष के भाव भी होंगे। यह एक समस्या होगी, है ना?" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्‍य के बारम्‍बार चिन्‍तन से ही आपको आगे का मार्ग मिल सकता है')। परमेश्वर लोगों के दिलों को देखता है। उसके एक-एक वचन ने मेरी घातक गलती पर प्रहार किया। तब मुझे एहसास हुआ कि अपना काम हलके तरीके से निपटाना लापरवाही है। इसमें कोई चौकसी नहीं है; यह सिर्फ बेमन से काम करना और जिम्मेदारी बिलकुल भी स्वीकार न करना है। अपने निष्पादन पर पीछे मुड़कर सोचने पर मैंने पाया कि जब भी किसी कार्य में समय और प्रयास की दरकार होती थी, मैं उसे करने का सबसे तेज, आसान और जुगाड़ वाला तरीका अपनाती थी। मैं वही करती थी, जिसमें सबसे ज्यादा आसानी, सबसे कम परेशानी या सबसे कम थकान होती थी। जब बहुत सारे नए शब्द या जटिल व्याकरणिक समस्याएँ या वाक्य-विन्यास आते, तो मैं उन्हें सुधारने का गंभीर प्रयास नहीं करती थी। मैं उन्हें चिह्नित करके किसी और से पूछने का आसान मार्ग अपनाती। जहाँ मैं जटिल टिप्पणियाँ देखती या जहाँ विराम-चिह्न की सावधानी से जाँच करने की जरूरत होती, वहाँ मैं उन्हें बस एक सरसरी नजर से देख लेती और कुछ समस्याओं को नजरअंदाज कर देती। मैं लापरवाह थी और अपने कर्तव्य और परमेश्वर के कार्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी से जी चुराती थी। मैं केवल शारीरिक कष्ट से बचने की बात सोचती थी। मेरे दिल में परमेश्वर के लिए थोड़ी-सी भी जगह कहाँ थी?

बाद में मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े, जिनमें कहा गया है : "मानवता वाले लोगों को अपने कर्तव्यों का अच्छी तरह से पालन करने में तब भी कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए जब कोई देख न रहा हो; यह उनकी ज़िम्मेदारियों के हिस्से में शामिल होना चाहिए। जिन लोगों में मानवता नहीं है और जो भरोसेमंद नहीं हैं, उनके लिए अपने कर्तव्यों का पालन करना एक बहुत कठिनाई भरी प्रक्रिया है। दूसरों को हमेशा उनके बारे में चिंता करनी पड़ती है, उनकी निगरानी करनी पड़ती है और उनकी प्रगति के बारे में पूछना पड़ता है; अन्यथा, जब भी तुम उन्हें कोई काम सौंपोगे तब वे इसमें कोई गड़बड़ी कर देंगे। संक्षेप में, लोगों को अपने कर्तव्यों का पालन करते समय हमेशा अपने आप पर विचार करना चाहिए : 'क्या मैंने इस कर्तव्य को पर्याप्त रूप से पूरा किया है? क्या मैंने दिल लगाकर काम किया? या मैंने इसे जैसे-तैसे ही पूरा किया?' अगर ऐसा कुछ भी हुआ, तो यह ठीक नहीं है; यह खतरनाक है। बारीकी से सोचा जाए तो इसका मतलब है कि ऐसे व्यक्ति की कोई विश्वसनीयता नहीं है, और लोग उस पर भरोसा नहीं कर सकते। विस्तार से सोचा जाए तो, अगर ऐसा व्यक्ति अपना कर्तव्य निभाते समय हमेशा दिखावे के लिए काम करता है, और अगर परमेश्वर के प्रति उसका रवैया लगातार लापरवाही भरा है, तो वह बड़े खतरे में है! जान बूझकर धोखेबाज बनने के दुष्परिणाम क्या हैं? अल्पावधि में, तुम्हारा स्वभाव भ्रष्ट होगा, तुम पश्चाताप किए बिना लगातार अपराध करोगे, न तुम सत्य का अभ्यास करने का तरीका सीखोगे, और न ही इसे अमल में लाओगे। लंबी अवधि में, जैसे जैसे तुम वो चीज़ें करते रहोगे, तुम्हें परिणाम मिलने बंद हो जाएँगे, और इसके कारण तुम संकट में पड़ जाओगे। इसे कहते हैं कोई बड़ी गलती न करना लेकिन लगातार छोटी-मोटी गलतियाँ करते जाना। अंत में, यह तुम्हें ऐसे परिणामों की ओर ले जाएगा जिन्हें सुधारा नहीं जा सकता। वह स्थिति बहुत ही गंभीर होगी!" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन में प्रवेश अपने कर्तव्य को निभाने का अनुभव करने से प्रारंभ होना चाहिए')। परमेश्वर को मेरे सामने मेरी लापरवाही की प्रकृति और उसके परिणाम उजागर करते देख मैं डरे बिना नहीं रह सकी। अपना काम अधूरे मन से करना दूसरे लोगों और परमेश्वर, दोनों को धोखा देना है। परमेश्वर द्वारा इस रवैये की निंदा की जाती है। अगर मैंने पश्चात्ताप नहीं किया, तो देर-सवेर मैं कोई गंभीर अपराध कर बैठूँगी और परमेश्वर द्वारा हटा दी जाऊँगी। जब कलीसिया ने मेरे काम की व्यवस्था की थी, तो मैंने अपना काम सही तरीके से करने की गंभीर प्रतिज्ञा की थी, लेकिन जब मुझे वास्तव में प्रयास करने की आवश्यकता हुई, तो मैंने परेशानी और कष्ट से डरकर केवल देह-सुख की चिंता की। दस्तावेजों की जाँच करते समय मैं असावधान और लापरवाह रही, इसलिए सबसे स्पष्ट गलतियाँ भी मुझसे छूट गईं। क्या वह धोखा नहीं था? इन विचारों ने मुझे खेद और आत्म-निंदा से भर दिया, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की : "सर्वशक्तिमान परमेश्वर! मैं अपने कर्तव्य के प्रति जिम्मेदार नहीं रही, बल्कि तुम्हें बेवकूफ बनाने की कोशिश करती रही हूँ। ऐसा करना तुम्हारे लिए घृणास्पद है। मुझमें विवेक की बहुत कमी रही है। परमेश्वर, मैं पश्चात्ताप करना चाहती हूँ। कृपया मेरा मार्गदर्शन करो, मुझे कठिनाई सहने की इच्छाशक्ति और देह-सुख त्यागने और अपना कर्तव्य निभाने की क्षमता प्रदान करो।"

उसके बाद प्रत्येक दस्तावेज में जो शब्द मुझे ठीक न लगते, उन्हें मैं कई शब्दकोशों में देखती। जब पक्का यकीन न होता, तो अपनी पूरी तसल्ली होने तक भाई-बहनों या किसी पेशेवर अनुवादक से पूछती। जो दस्तावेज कठिन और लंबे होते, उन्हें भी मैंने अधूरे मन से और जैसे-तैसे निपटाने की हिम्मत नहीं की, बल्कि प्रत्येक वाक्य पर बार-बार और बारीकी से ध्यान देकर अनुवाद की सटीकता बढ़ाने की भरसक कोशिश करती। दस्तावेज को अंतिम रूप देते समय, जाँच के लिए आवश्यक विवरणों की सूची बनाती और स्वयं को लगातार याद दिलाती कि हर कदम पर अच्छी तरह से विचार करना जरूरी है। अंतिम रूप देते समय मैं हर विवरण की जाँच करती और अंतिम चरण में गलतियाँ कम करने की भरपूर कोशिश करती। कुछ समय बाद अपने काम में मुझे बेहतर नतीजे मिलने लगे और मेरी गलती की दर भी कम हो गई।

बाद में एक और बहन टीम में शामिल हुई, जिसने फाइनल किए गए अनुवादों की फॉर्मेटिंग मानकीकृत करने में मदद की। वह समय-समय पर मुझसे पूछती रहती, "क्या यह विराम-चिह्न सही है? यह विराम-चिह्न यहाँ क्यों है?" जब उसने बहुत सारे सवाल पूछे, तो मुझे बहुत गुस्सा आ गया और मैंने सोचा, "हर बात बताने में कितनी समस्या है। बस फाइनल किए गए दस्तावेज के अनुसार चलो।" इसलिए मैंने उसे चुप कराने के इरादे से कहा : "यह फाइनल दस्तावेज है। इसमें विराम-चिह्नों की कोई समस्या नहीं है। इतालवी और अंग्रेजी में विराम-चिह्न मूलत: एक-जैसे होते हैं। अधिकांश तो अंग्रेजी की तरह इस्तेमाल किए जा सकते हैं, लेकिन कुछ अपवाद भी हैं। आपको अर्थ समझना होता है।" तब उसने मुझसे कहा, "हमारी वर्तमान संदर्भ-पुस्तकें उस तरह की हैं, जिनका इस्तेमाल पेशेवर लोग करते हैं। मैं इनके कुछ हिस्से समझ नहीं पाती। क्या हमारे पास इतालवी विराम-चिह्नों पर सामान्य मार्गदर्शन देने वाला कोई दस्तावेज है?" मैंने कहा, अभी हमारे पास नहीं हैं। उसके बाद मुझे लगा कि मुझे एक ऐसा दस्तावेज बनाना चाहिए, जिसे नए सदस्य संदर्भित कर सकें, लेकिन विराम-चिह्न बहुत हैं। इसका मतलब है, संदर्भ-पुस्तकें देखना, जिसमें बहुत अधिक परेशानी होगी। मैंने फिलहाल इसे टाल दिया। मैंने सोचा था कि मामला यहीं समाप्त हो जाएगा, लेकिन जब उसने इतालवी विराम-चिह्नों का अंग्रेजी विराम-चिह्नों की तरह इस्तेमाल किया, जैसा कि मैंने उसे फॉर्मेटिंग के सिलसिले में बताया था, तो आगे बढ़ते हुए उसने 1,50,000 से अधिक शब्दों वाले एक दस्तावेज में डैश से पहले और बाद के सभी स्पेस हटा दिए। यह देखकर मैं भौचक्की रह गई। इतालवी में डैश से पहले और बाद में स्पेस देना होता है, ताकि हाइफन और डैश समान न समझ लिए जाएँ, जो कि अंग्रेजी से अलग है। लेकिन मैंने इसके बारे में उसे नहीं बताया था। अब इसमें कुछ नहीं किया जा सकता था। मेरी लापरवाही की वजह से उसे उस दस्तावेज को दोबारा देखना पड़ा और हर जगह ठीक करना पड़ा। मुझे बहुत बुरा लगा और अफसोस हुआ। मुझे खुद से नफरत हुई और सोचा, "एक संदर्भ-दस्तावेज बनाने के लिए मैंने थोड़ा-सा प्रयास क्यों नहीं कर लिया? मैं हमेशा देह-सुख के बारे में क्यों सोचती रहती हूँ और परेशानी से इतनी क्यों डरती हूँ? मेरी लापरवाही के कारण उसे दोबारा मेहनत करनी पड़ी। उस दस्तावेज का फिर से सत्यापन भी करना पड़ा। इसमें मेहनत लगी, और मुख्य बात यह रही कि हमारे काम की प्रगति में देरी भी हुई। क्या यह परमेश्वर के घर के काम में रूकावट डालना नहीं था?" कृतज्ञता, आत्म-निंदा और पछतावे की भावनाएँ फिर से उमड़ पडीं। मुझे बस खुद को अपने मुँह पर थप्पड़ मारने की इच्छा हुई। मैंने सोचा, "मैं फिर से वही गलती क्यों कर रही हूँ? मुझे क्या हो गया है?"

एक बार अपनी आराधना में अचानक मुझे परमेश्वर के वचनों का यह अंश मिला : "क्या एक भ्रष्ट स्वभाव के भीतर ही कोई ऐसी चीज नहीं है जो इतनी लापरवाही से और गैर-जिम्मेदाराना रूप से काम संभालने के लिए उकसाती है? वह क्या चीज है? वह है मलिनता; सभी मामलों में, वे कहते हैं कि 'यह लगभग ठीक है' और 'काफ़ी ठीक है'; यह 'शायद,' 'संभवतः' और 'पाँच में से चार' का रवैया है; वे चीजों को सरसरी तौर पर करते हैं, कम से कम और जैसे-तैसे काम करके संतुष्ट हो जाते हैं; वे चीज़ों को गंभीरता से लेने या परिशुद्धता के लिए प्रयास करने को कोई महत्व नहीं देते, और सिद्धांतों की तलाश करने का तो उनके लिए कोई मतलब ही नहीं। क्या यह चीज एक भ्रष्ट स्वभाव के भीतर नहीं है? क्या यह सामान्य मानवता की अभिव्यक्ति है? इसे अहंकार कहना सही है, और इसे ज़िद्दी कहना भी पूरी तरह से उपयुक्त है—लेकिन इसके अर्थ को पूरी तरह से एक शब्द में ढालना हो, तो वह शब्द होगा 'मलिन'। अधिकांश लोगों की मानवता में इस तरह की मलिनता मौजूद है; सभी मामलों में, वे कम से कम प्रयास करने की इच्छा रखते हैं, यह देखने के लिए कि उन्हें कितनी छूट मिल सकती है, और वे जो कुछ भी करते हैं उसमें छल की झलक होती है। जब मौका मिले, वे दूसरों को धोखा देते हैं, जब भी मुमकिन हो, लापरवाही से काम करते हैं, और किसी मामले पर गौर करने के लिए वे बहुत समय या विचार देना पसंद नहीं करते। जब तक कि उनका पर्दाफाश नहीं होता, और वे कोई समस्या नहीं पैदा करते, और उनसे हिसाब नहीं लिया जाता, तब तक उन्हें लगता है कि सब ठीक है, और इस तरह वे जैसे-तैसे आगे की ओर बढ़ते रहते हैं। उनकी नजर में, किसी काम को अच्छी तरह से करना एक बड़ी परेशानी मोल लेने के बराबर है। ऐसे लोग कुछ सीख कर किसी चीज में माहिर नहीं बनते, और वे अपनी पढ़ाई में पूरा ध्यान नहीं लगाते। वे केवल ऊपर-ऊपर से किसी विषय की रूपरेखा समझना चाहते हैं और खुद को उस में प्रवीण कहते हैं, और फिर जैसे-तैसे बढ़ते रहने के लिए वे इस पर भरोसा करते हैं। क्या चीज़ों के बारे में लोगों का रवैया ऐसा ही नहीं होता? क्या यह ठीक रवैया है? लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति जिस तरह का रवैया ऐसे लोग अपनाते हैं, उसे चंद शब्दों में, 'जैसे-तैसे काम चलाना' कहते हैं, और इस तरह की मलिनता सारी भ्रष्ट मानव जाति में मौजूद है" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (9)')। परमेश्वर के वचनों ने बेधक तरीके से मेरे काम में प्रयास के अभाव के मूल कारण की ओर इंगित किया। मेरी नीचता बहुत गंभीर थी, और मैंने हर चीज बेमन और कपटपूर्ण रवैये के साथ की थी। जब बहन ने मुझसे विराम-चिह्नों के उचित प्रयोग के बारे में पूछा, तो मैंने परेशानी में नहीं पड़ना चाहा। बहुत सारे सवालों से बचने के लिए मैंने इसे गंभीरता से नहीं लिया, इसलिए मैंने उसे एक साधारण नियम का पालन करने के लिए कहकर चुप करा दिया। और जब उसने मुझसे संदर्भ-दस्तावेज के बारे में पूछा, तो मैं उसके लिए वह बना सकती थी, लेकिन जब मैंने अपनी परेशानी की दृष्टि से उसकी लागत के बारे में सोचा, तो परेशान न होने का फैसला किया। मुझे गलतियाँ होने का डर था, फिर भी मैंने धोखे से काम लिया। अच्छा तो यह होता कि मैंने मेहनत भी बचाई होती और काम भी ठीक से होता। हर बार जब मैंने बिना मेहनत के काम किया, तब-तब मैं सफल होने के लिए भाग्य के भरोसे रही। मैंने हमेशा कम से कम मेहनत से काम चलाने की कोशिश की। यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई गलती न रहे, मैं हर बात पर विचार न करके और अपनी ओर से भरसक प्रयास न करके अपना कर्तव्य पूरा करने का वास्तविक, ईमानदार प्रयास नहीं कर रही थी। मैं काम करते हुए और सवालों के जवाब देते हुए दिखती तो थी, लेकिन वास्तव में मैं उस बहन को बेवकूफ बना रही थी और धूर्तता कर रही थी। नतीजतन, उसने मेरे जवाबों पर भरोसा किया और कुछ गंभीर गलतियाँ कर दीं और खुद को निरर्थक कार्य में थका लिया। यहाँ तक कि बहुत सारा काम फिर से करना पड़ा, जिससे काम की समग्र प्रगति धीमी हुई और कलीसिया के काम में नुकसान हुआ। सबसे आसान, सबसे कष्टहीन काम करने के मेरे प्रयासों के पीछे का सिद्धांत लोगों को नुकसान पहुँचाने वाला सिद्धांत था। मैं फौरी तौर पर मेहनत से बचने के लिए घटिया चालें चल रही थी। मुझे शारीरिक पीड़ा नहीं हुई, लेकिन अपने काम में मेरे अपराधों का कोई अंत नहीं था, जिससे परमेश्वर के घर के काम में रुकावट आई। मैं दूसरों को भी नुकसान पहुँचा रही थी और खुद को भी! मुझे इतना महत्वपूर्ण काम सौंपा गया था, लेकिन मैंने उसे हलके में लिया, और मैं बेपरवाह, गैर-जिम्मेदार, धोखेबाज और लापरवाह थी, और मैंने इसके परिणामों पर विचार नहीं किया। मुझमें जरा भी विवेक नहीं था। केवल तभी मैंने देखा कि मेरी नीचता कितनी गंभीर है, मेरी निष्ठा कितनी निम्न है, और मैं कितनी बेकार हूँ।

बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों के पाठ का एक वीडियो देखा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "यदि लोग वह व्यक्त नहीं कर सकते, जो उन्हें सेवा के दौरान व्यक्त करना चाहिए या वह हासिल नहीं कर सकते, जो उनके लिए सहज रूप से संभव है, और इसके बजाय वे सुस्ती में समय गँवाते हैं और बेमन से काम करते हैं, तो उन्होंने अपना वह प्रयोजन खो दिया है, जो एक सृजित प्राणी में होना चाहिए। ऐसे लोग 'औसत दर्जे के' माने जाते हैं; वे बेकार का कचरा हैं। इस तरह के लोग उपयुक्त रूप से सृजित प्राणी कैसे कहे जा सकते हैं? क्या वे भ्रष्ट प्राणी नहीं हैं, जो बाहर से तो चमकते हैं, परंतु भीतर से सड़े हुए हैं? ... तुम्हारे शब्द और कार्य किसके योग्य हो सकते हैं? क्या तुम लोगों का इतना छोटा-सा बलिदान उस सबके बराबर है, जो मैने तुम लोगों को दिया है? मेरे पास और कोई विकल्प नहीं है और मैं पूरे हृदय से तुम लोगों के प्रति समर्पित रहा हूँ, फिर भी तुम लोग मेरे बारे में दुष्ट इरादे रखते हो और मेरे प्रति अनमने रहते हो। यही तुम लोगों के कर्तव्य की सीमा, तुम लोगों का एकमात्र कार्य है। क्या ऐसा ही नहीं है? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने में बिलकुल असफल हो गए हो? तुम लोगों को सृजित प्राणी कैसे माना जा सकता है? क्या तुम लोगों को यह स्पष्ट नहीं है कि तुम क्या व्यक्त कर रहे हो और क्या जी रहे हो? तुम लोग अपना कर्तव्य पूरा करने में असफल रहे हो, पर तुम परमेश्वर की सहनशीलता और भरपूर अनुग्रह प्राप्त करना चाहते हो। इस प्रकार का अनुग्रह तुम जैसे बेकार और अधम लोगों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए तैयार किया गया है, जो कुछ नहीं माँगते और खुशी से बलिदान करते हैं। तुम जैसे मामूली लोग स्वर्ग के अनुग्रह का आनंद लेने के बिलकुल भी योग्य नहीं हैं। केवल कठिनाई और अनंत सज़ा ही तुम लोगों को अपने जीवन में मिलेगी! यदि तुम लोग मेरे प्रति विश्वसनीय नहीं हो सकते, तो तुम लोगों के भाग्य में दु:ख ही होगा। यदि तुम लोग मेरे वचनों और कार्यों के प्रति जवाबदेह नहीं हो सकते, तो तुम्हारा परिणाम दंड होगा। राज्य के समस्त अनुग्रह, आशीषों और अद्भुत जीवन का तुम लोगों के साथ कोई लेना-देना नहीं होगा। यही वह अंत है, जिसके तुम काबिल हो और जो तुम लोगों की अपनी करतूतों का परिणाम है!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर')। परमेश्‍वर के वचन कहते हैं : "मेरे पास और कोई विकल्प नहीं है और मैं पूरे हृदय से तुम लोगों के प्रति समर्पित रहा हूँ, फिर भी तुम लोग मेरे बारे में दुष्ट इरादे रखते हो और मेरे प्रति अनमने रहते हो। यही तुम लोगों के कर्तव्य की सीमा।" इन वचनों ने मेरे दिल को बेध दिया। परमेश्वर ने मुझे अपना कर्तव्य निभाने का मौका दिया, ताकि मैं अपने कर्तव्य के माध्यम से सत्य की खोज कर सकूँ और उसे प्राप्त कर सकूँ, अपना भ्रष्ट स्वभाव त्याग सकूँ और परमेश्वर द्वारा बचाई जा सकूँ। लेकिन मैंने सत्य की खोज करने के बजाय सिर्फ देह-सुख का ध्यान रखा, परमेश्वर के साथ चालाकी बरती और उसे धोखा दिया। मैंने विचार किया कि कैसे परमेश्वर ने मानवजाति को बचाने के लिए देहधारण किया, भारी अपमान और पीड़ा सही, सरकार द्वारा दौड़ाया और प्रताड़ित किया गया, लोगों की निंदा और तिरस्कार झेला, लेकिन वह हमेशा सत्य को अभिव्यक्त करता है और लोगों को बचाने के लिए कार्य करता है। हमारी क्षमता कमजोर है, इसलिए हम सत्य को धीरे-धीरे समझते हैं। न केवल परमेश्वर ने हमारा परित्याग नहीं किया, बल्कि वह हर कोण से हमारे साथ गंभीरतापूर्वक सहभागिता करता है। वह सारे सत्य विस्तार से समझाता है। हमें समझाने के लिए वह कहानियाँ सुनाता है, उदाहरण देता है, और रूपकों का इस्तेमाल करता है। कुछ सत्य जटिल होते हैं और कई चीजों को स्पर्श करते हैं, इसलिए परमेश्वर उन्हें खोलकर समझाता है। वह सहभागिता के माध्यम से धैर्यपूर्वक और व्यवस्थित रूप से सत्य को थोड़ा-थोड़ा करके समझने में हमारा मार्गदर्शन करता है। हम देख सकते हैं कि परमेश्वर हमारे जीवन की बड़ी जिम्मेदारी लेता है। लेकिन मैंने अपना कर्तव्य कैसे निभाया? मैंने सोचा कि उस पर ज्यादा सोच-विचार या मेहनत करने की जरूरत नहीं है। दस्तावेजों की समीक्षा करते समय मैं गंभीर या जिम्मेदार नहीं होती थी। मैं परिणामों की परवाह किए बिना कम से कम परिश्रम वाला रास्ता अपनाती थी। मैं परमेश्वर के कार्य को हलके में लेती रही, उसे बस जैसे-तैसे निपटाती रही। मेरी अंतरात्मा कहाँ थी? मैं परमेश्वर के दंड की हकदार थी। लेकिन परमेश्वर ने मुझे बचाने का विचार कभी नहीं त्यागा। उसने मुझे प्रबुद्ध करने और मेरी अगुआई करने के लिए अपने वचनों का उपयोग किया, और उनके द्वारा अपने को जानने और परमेश्वर की इच्छा समझने में मदद की। अगर मैं अपने काम में लापरवाह बनी रहूँगी और उसे अधूरे मन से करती रहूँगी, तो जीवित रहने या इंसान कहलाने के लायक नहीं रहूँगी। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की : "सर्वशक्तिमान परमेश्वर! मेरी नीचता बहुत गंभीर है। मैं इस तरह शर्मिंदगी भरे और गरिमाहीन तरीके से जीते रहना नहीं चाहती। कृपया मुझे सत्य का अभ्यास करने की शक्ति दो, ताकि मैं एक सच्चे इंसान की तरह जीवन जी सकूँ और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभा सकूँ।"

बाद में मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "एक मनुष्य के तौर पर परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करने के लिए व्यक्ति को समर्पित होना चाहिए। उसे पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित होना चाहिए और वह अनमना नहीं हो सकता, ज़िम्मेदारी लेने में चूक नहीं कर सकता या अपनी रुचि या मनोदशा के आधार पर काम नहीं कर सकता; यह समर्पित होना नहीं है। समर्पित होने से क्या आशय है? इसका आशय यह है कि अपने कर्तव्य पूरे करते समय, तुम मनोदशा, वातावरण, लोगों, मुद्दों और चीज़ों से प्रभावित और विवश नहीं होते हो। 'मुझे यह आदेश परमेश्वर से प्राप्त हुआ है; उसने यह मुझे दिया है। मुझसे यही अपेक्षित है। अतः मैं इसे अपना मामला मानकर जिस भी तरीके से अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं उस तरह इस काम को करूंगा, परमेश्वर को संतु्ष्ट करने पर ज़ोर दूँगा।' जब तुम इस स्थिति में होते हो, तो तुम न केवल अपने अंत:करण से नियंत्रित होते हो, बल्कि इसमें श्रद्धा भी शामिल होती है। यदि तुम काम में दक्षता या परिणाम पाने की आशा किए बिना इसे बस यों ही कर देने में संतुष्ट हो और ऐसा महसूस करते हो कि कुछ प्रयास कर लेना ही पर्याप्त है, तो यह केवल अंत:करण का ही मानक है और इसे समर्पण नहीं माना जा सकता है। जब तुम परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हो तो यह मानक स्तर अंत:करण के मानक स्तर से थोड़ा ज़्यादा ऊँचा होता है। तब यह केवल कुछ प्रयास करने का विषय ही नहीं होता; तुम्हें इसमें अपना सम्पूर्ण हृदय भी लगाना चाहिए। तुम्हें अपने कर्तव्य को हमेशा अपना ही काम मानना चाहिए, इस काम के लिए भार उठाना चाहिए, कोई छोटी-सी ग़लती करने पर या थोड़ा-सा भी असावधान होने पर फटकार सहनी चाहिए, ऐसा महसूस करना चाहिए कि तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो सकते, क्योंकि यह तुम्हें परमेश्वर का ऋणी बनाता है। वे लोग जिनके पास सच्चे अर्थों में अपने कर्तव्यों को इस तरह पूरा करने का बोध होता है मानो वे उनके अपने ही काम हों, और बिना इस बात की परवाह किए कि कोई निगरानी कर रहा है या नहीं, चाहे परमेश्वर उनसे प्रसन्न हो या नहीं या चाहे वो उनके साथ जैसा भी व्यवहार करे, वे स्वयं से कर्तव्यों का पालन करने की और परमेश्वर द्वारा सौंपे गए आदेश को पूरा करने की कठोर अपेक्षा करते हैं। इसे समर्पण कहते हैं" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल ईमानदार व्यक्ति बनकर ही कोई वास्तव में ख़ुश हो सकता है')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे अभ्यास का मार्ग दिखाया। हम अपना काम मनमाने तरीके से और अपनी मनोदशा और प्राथमिकताओं के अनुसार नहीं कर सकते। जहाँ कठिन परिश्रम की जरूरत हो, वहाँ जैसे-तैसे काम नहीं चला सकते, बल्कि हमें अपने काम को परमेश्वर का आदेश और अपनी जिम्मेदारी समझना चाहिए। हमें सर्वोत्तम परिणामों के लिए विचार और प्रयास करना चाहिए। चाहे कितना भी मुश्किल हो, चाहे हमारी निगरानी की जा रही हो या नहीं, हमें अपना काम हमेशा अपने दिल, दिमाग और क्षमता से करना चाहिए। जब मुझे यह एहसास हुआ, तो मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और परमेश्वर के वचनों के अनुसार पश्चात्ताप और अभ्यास करने के लिए तैयार हो गई। बाद में, मैंने नए सदस्यों द्वारा संदर्भित किए जाने के लिए इतालवी में विराम-चिह्नों के प्रयोग पर एक दस्तावेज बनाने में समय लगाया। उसके बाद मैंने अनुवाद में आने वाली आम समस्याओं का सारांश तैयार किया और ध्यान देने वाली सभी बातों की सूची बनाई। मैं दस्तावेज की समीक्षा के दौरान भी इसका ध्यान रखती, ताकि कुछ छूट न जाए। और जब कोई भाई या बहन मुझसे अपने काम के बारे में सवाल पूछता, तो मैं उस पर सरसरी निगाह डालते हुए अपनी कल्पना के आधार पर जवाब न देती, बल्कि ध्यान से उनके सवाल पर विचार करती, सिद्धांत लागू करती और पेशेवर ज्ञान के आधार पर उसका जवाब देती। जब कोई चीज मुझे समझ में न आती, तो मैं उसे वास्तविक प्रयासों और परमेश्वर के प्रबोधन व मार्गदर्शन के जरिये धीरे-धीरे समझ जाती। मैंने काम में अपनी गलत मंशाओं पर भी भरपूर चिंतन किया। जब भी मेरे सामने मुश्किलें आतीं और मैं उन्हें हलके में लेना चाहती, तो मैं देह-सुख का त्याग करने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करती, ताकि मैं जरूरी वास्तविक प्रयासों से वे मुद्दे हल कर पाऊँ। धीरे-धीरे काम के प्रति मेरे दृष्टिकोण में काफी सुधार आ गया और मैं जैसे-तैसे काम निपटाने का कम प्रयास करने लगी। मैं दृढ़ता से अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम हो गई। मुझमें आया यह बदलाव पूरी तरह से परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का परिणाम था। परमेश्वर का धन्यवाद!

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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