24. मैंने आखिर कर्तव्‍य पालन करना सीख लिया

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "अपना कर्तव्य पूरा करने की प्रक्रिया के माध्यम से मनुष्य धीरे-धीरे बदलता है, और इसी प्रक्रिया के माध्यम से वह अपनी वफ़ादारी प्रदर्शित करता है। इस प्रकार, जितना अधिक तुम अपना कार्य करने में सक्षम होगे, उतना ही अधिक तुम सत्य को प्राप्त करोगे, और उतनी ही अधिक तुम्हारी अभिव्यक्ति वास्तविक हो जाएगी। जो लोग अपना कर्तव्य बेमन से करते हैं और सत्य की खोज नहीं करते, वे अंत में हटा दिए जाएँगे, क्योंकि ऐसे लोग सत्य के अभ्यास में अपना कर्तव्य पूरा नहीं करते, और अपना कर्तव्य पूरा करने में सत्य का अभ्यास नहीं करते। ये वे लोग हैं, जो अपरिवर्तित रहते हैं और शापित किए जाएँगे। उनकी न केवल अभिव्यक्तियाँ अशुद्ध हैं, बल्कि वे जो कुछ भी व्यक्त करते हैं, वह दुष्टतापूर्ण होता है" (वचन देह में प्रकट होता है)। "अपना कर्तव्य दिल लगाकर करने और इसकी ज़िम्मेदारी लेने के लिए तुम्हें पीड़ा सहने और एक कीमत चुकाने की ज़रूरत है। केवल इसके बारे में बात करना ही काफ़ी नहीं है। यदि तुम अपना कर्तव्य दिल लगाकर नहीं करते, बल्कि हमेशा शारीरिक प्रयास करना चाहते हो, तो तुम्हारा कर्तव्य निश्चित ही अच्छी तरह पूरा नहीं होगा। तुम बस एक ढर्रे पर काम करते रहोगे और कुछ नहीं, और तुम्हें पता नहीं होगा कि तुमने अपना कर्तव्य कितनी अच्छी तरह से निभाया। यदि तुम दिल लगाकर काम करोगे, तो तुम धीरे-धीरे सत्य को समझोगे; लेकिन अगर तुम ऐसा नहीं करोगे, तो तुम नहीं समझोगे। जब तुम दिल लगाकर अपना कर्तव्य निभाते हो और सत्य का पालन करते हो, तो तुम धीरे-धीरे परमेश्वर की इच्छा को समझने, स्वयं के भ्रष्टाचार और कमियों का पता लगाने और अपनी सभी विभिन्न अवस्थाओं में महारत हासिल करने में सक्षम हो जाते हो। यदि तुम खुद की जांच करने के लिए अपना दिल नहीं लगाते, लेकिन केवल बाहरी प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करते हो, तो तुम अपने दिल में उत्पन्न होने वाली विभिन्न आवस्थाओं और विभिन्न बाहरी वातावरणों में अपनी सभी प्रतिक्रियाओं को जानने में असमर्थ होगे। अगर तुम खुद की जांच करने के लिए अपना दिल नहीं लगाते हो, तो तुम्हारे लिए अपने दिल की समस्याओं का हल करना मुश्किल हो जाएगा" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। परमेश्‍वर के वचनों से हम समझ सकते हैं कि कर्तव्‍य पालन में हमें सतर्क और जिम्‍मेदार बनकर सत्‍य की खोज करनी होगी। पहले मैं लापरवाह थी। मैंने किसी भी काम में ज्यादा मेहनत नहीं की। परमेश्‍वर के घर में भी ऐसा ही था। अपने काम में मेरा प्रयास बेहतरीन परिणाम पाने के लिए नहीं होता था। जब भी कोई जटिल समस्या आती, जिसमें कड़ी मेहनत की आवश्यकता होती, मैं लापरवाह और गैर-जिम्मेदार रही, इसलिए अपने काम में हमेशा गलतियां करती रही। बाद में मुझे परमेश्‍वर के वचनों से अपने भ्रष्ट स्वभाव और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए अपने काम के बारे में थोड़ी समझ आई, तभी मैं जिम्मेदारी और दृढ़ता से अपना कर्तव्य निभा पाई।

उस समय मेरा काम इतालवी में अनुवाद की जांच करना था। मैं पहले मेहनती थी,आने वाली मुश्किलों के हल के लिए तैयार रहती थी, लेकिन समय के साथ-साथ मेरे पास दस्तावेजों का ढ़ेर लगने लगा, तो थोड़ी असहज होने लगी, खासकर जब मैंने रंग-बिरंगी टिप्‍पणियों वाले, पूर्णविराम, अल्पविराम और अन्य विराम चिह्नों से भरे हुए दस्‍ताव़ेज देखे। फॉर्मेटिंग और प्लेसमेंट के हिसाब से हर दस्तावेज़ की जांच होनी थी। मैं बेचैन हो उठी। मैंने सोचा,“इसमें तो मुझे बहुत ध्यान देना पड़ेगा? बड़ा भारी काम है।” अब मैं उनकी जांच इतनी मेहनत से नहीं करना चाहती थी, बस उन्हें सरसरी तौर से देखकर ठीक-ठाक कर देती थी। कभी-कभी अपने दिमाग को शांत करके सोचती कि क्या वास्‍तव में अनुवाद सही है, मगर जब कोई जटिल वाक्य संरचना देखती, तो मैं स्वार्थी गणनाएं करने लगती: "हर शब्द पर चिंतन और अनुसंधान करने में बहुत मेहनत है, इसके बावजूद यदि मैं असफल रहती हूं, तो क्या यह मेहनत की बर्बादी नहीं है? छोड़ो, कोई और इन्‍हें देख लेगा।” ऐसे ही,मैं लापरवाही से अपने काम में लग रही।

समय के साथ लगातार समस्याएं आने लगीं। जिन दस्‍तावेज़ों की मैंने जांच की थी अन्‍य लोगों को उनमें कैपिटल लेटर और विराम चिह्नों की गलतियां मिलने लगीं और कुछ में तो अनुवाद से कई शब्द भी गायब मिले। जब मैंने देखा तो मुझे बहुत बुरा लगा। किसी और ने उन छोटी-छोटी समस्याओं को तुरंत देख लिया, लेकिन मुझे तब भी नहीं दिखी जब वे मेरे सामने थीं। ऐसी स्‍पष्‍ट चूक कैसे हो सकती है? मैं इसके बारे में जितना सोचती, उतना ही बुरा लगता। अगले दिन लंच के बाद मुझे एक संदेश मिला जिसमें कहा गया था, जिस दस्तावेज की मैंने जांच की थी उसमें एकवचन और बहुवचन की बुनियादी गलती है। मुझे लगा मानों दिल पर छुरी चल गई। मुझे से इतनी लापरवाही कैसे हो गई? इतनी बुनियादी गलती ढूंढने में कैसे चूक हो गई? मैं यकीन से नहीं कह सकती थी कि मेरे द्वारा जांचे गए अन्य दस्तावेज़ों में ऐसी गलतियां नहीं होंगी। मेरे काम में गलतियों की भरमार थी। क्‍या करूं? पीड़ा के मारे, मैं तुरंत परमेश्‍वर के सामने बैठकर प्रार्थना करने लगी। मैंने अपनी मनोदशा और हाल ही में काम के प्रति अपने दृष्टिकोण पर चिंतन किया।

मैंने परमेश्‍वर के वचनों का एक अंश पढ़ा: "अगर तुम अपना कर्तव्य पूरा करने में अपना दिल नहीं लगाते हो और लापरवाह बने रहते हो, कोई भी काम जितना हो सके उतने आसान तरीके से करते हो, तो यह किस तरह की मानसिकता है? यह मानसिकता सिर्फ़ बिना मन लगाए काम करने की है, जिसमें अपने कर्तव्य के प्रति कोई वफ़ादारी नहीं है, जिम्मेदारी की कोई समझ नहीं है, और उद्देश्य की कोई समझ नहीं है। हर बार जब तुम अपना कर्तव्य करते हो, तुम सिर्फ़ अपनी आधी शक्ति का उपयोग करते हो; तुम इसे आधे मन से करते हो, तुम इसमें अपना दिल नहीं लगाते हो, और थोड़ा-भी कर्तव्यनिष्ठ हुए बिना तुम बस जैसे-तैसे कार्य पूरा करने की कोशिश करते हो। तुम इसे इतने बेपरवाह तरीके से पूरा करते हो मानो तुम इससे खिलवाड़ कर रहे हो। क्या यह समस्याओं को पैदा नहीं करेगा? अंत में, लोग कहेंगे कि तुम अपना कर्तव्य खराब ढंग से करते हो, और तुम बस यंत्रवत ढंग से काम कर रहे हो। परमेश्वर इसके बारे में क्या कहेगा? वह कहेगा कि तुम विश्वास के लायक नहीं हो। अगर तुम्हें कोई काम सौंपा गया है, चाहे वह काफी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का काम हो या सामान्य जिम्मेदारी वाला काम हो, अगर तुम उसमें अपना दिल नहीं लगाते हो या अपनी जिम्मेदारी के अनुसार काम नहीं करते हो, और अगर तुम इस काम को परमेश्वर द्वारा दिये गये एक मिशन की तरह नहीं देखते हो या इसे परमेश्वर द्वारा सौंपे गये कार्य के तौर पर नहीं देखते हो, न ही इसे अपना कर्तव्य एवं दायित्व समझते हो, तो यह एक परेशानी बन जाएगी। 'विश्वास के अयोग्य'—ये शब्द यह परिभाषित करेंगे कि तुम अपने कर्तव्य किस तरह पूरे करते हो, और परमेश्वर यह कहेगा कि तुम्हारा चरित्र अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। अगर तुम्हें कोई काम सौंपा गया है और तुम इसके प्रति इस तरह का रवैया अपनाते हो और इसे इसी तरह से पूरा करते हो, तो क्या आने वाले समय में तुम्हें कोई और कर्तव्य करने को दिया जाएगा? क्या तुम्हें कोई महत्वपूर्ण काम सौंपा जा सकता है? शायद तुम्हें ऐसा काम सौंपा जा सकता है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि तुम्हारा व्यवहार कैसा था। हालांकि, परमेश्वर अपने हृदय की गहराई में तुम्हारे प्रति हमेशा कुछ अविश्वास पाले रहेगा, साथ ही कुछ असंतोष के भाव भी होंगे। यह एक समस्या होगी, है ना?" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। परमेश्‍वर लोगों के दिलों में देखते हैं। उनका एक-एक वचन मेरी भयंकर गलती पर भारी पड़ा। तब मुझे एहसास हुआ कि अपने काम को आसान तरीके से निबटाना लापरवाही है। इसमें कोई सतर्कता नहीं है, यह सिर्फ चीजों पर परदा डालना और जिम्मेदारी से भागना है। अपने प्रदर्शन पर पीछे मुड़कर सोचने पर मैंने पाया, जब भी किसी कार्य में समय और प्रयास की दरकार होती, मैं उसके लिए सबसे आसान और शॉर्टकट तरीका अपनाती। मैं वह तरीका अपनाती जिसमें सबसे कम परेशानी या कम से कम थकान हो। जब बहुत सारे नए शब्‍द या व्याकरण संबंधी जटिल समस्‍या या वाक्य संरचनाएं आती, तब उनका समाधान करने का गंभीर प्रयास नहीं करती थी। मैं उन्हें चिह्नित करके किसी और से पूछने का आसान मार्ग अपनाती। जहां जटिल टिप्‍पणियां देखती या सावधानी से विराम चिह्न की जांच करने की ज़रूरत होती, तो मैं उन्हें बस एक सरसरी नज़र से देख लेती और कुछ समस्याओं को नजरअंदाज कर देती। मैं लापरवाह होकर अपने कर्तव्य और परमेश्‍वर के कार्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी से किनारा कर लेती थी। केवल शारीरिक कष्ट से बचने के बारे में सोचती। मेरे दिल में परमेश्‍वर के लिए थोड़ी-सी भी जगह नहीं थी।

फिर,मैंने परमेश्‍वर के और वचन पढ़े जिनमें कहा गया है: "मानवता वाले लोगों को अपने कर्तव्यों का अच्छी तरह से पालन करने में तब भी कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए जब कोई देख न रहा हो; यह उनकी ज़िम्मेदारियों के हिस्से में शामिल होना चाहिए। जिन लोगों में मानवता नहीं है और जो भरोसेमंद नहीं हैं, उनके लिए अपने कर्तव्यों का पालन करना एक बहुत कठिनाई भरी प्रक्रिया है। दूसरों को हमेशा उनके बारे में चिंता करनी पड़ती है, उनकी निगरानी करनी पड़ती है और उनकी प्रगति के बारे में पूछना पड़ता है; अन्यथा, जब भी तुम उन्हें कोई काम सौंपोगे तब वे इसमें कोई गड़बड़ी कर देंगे। संक्षेप में, लोगों को अपने कर्तव्यों का पालन करते समय हमेशा अपने आप पर विचार करना चाहिए : 'क्या मैंने इस कर्तव्य को पर्याप्त रूप से पूरा किया है? क्या मैंने दिल लगाकर काम किया? या मैंने इसे जैसे-तैसे ही पूरा किया?' अगर ऐसा कुछ भी हुआ, तो यह ठीक नहीं है; यह खतरनाक है। बारीकी से सोचा जाए तो इसका मतलब है कि ऐसे व्यक्ति की कोई विश्वसनीयता नहीं है, और लोग उस पर भरोसा नहीं कर सकते। विस्तार से सोचा जाए तो, अगर ऐसा व्यक्ति अपना कर्तव्य निभाते समय हमेशा दिखावे के लिए काम करता है, और अगर परमेश्वर के प्रति उसका रवैया लगातार लापरवाही भरा है, तो वह बड़े खतरे में है! जान बूझकर धोखेबाज़ बनने के दुष्परिणाम क्या हैं? अल्पावधि में, तुम्हारा स्वभाव भ्रष्ट होगा, तुम पश्चाताप किए बिना लगातार अपराध करोगे, न तुम सत्य का अभ्यास करने का तरीका सीखोगे, और न ही इसे अमल में लाओगे। लंबी अवधि में, जैसे जैसे तुम वो चीज़ें करते रहोगे, तुम्हें परिणाम मिलने बंद हो जाएंगे, और इसके कारण तुम संकट में पड़ जाओगे। इसे कहते हैं कोई बड़ी गलती न करना लेकिन लगातार छोटी-मोटी गलतियां करते जाना। अंत में, यह तुम्हें ऐसे परिणामों की ओर ले जाएगा जिन्हें सुधारा नहीं जा सकता। वह स्थिति बहुत ही गंभीर होगी!" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। जब परमेश्‍वर ने मेरी लापरवाह प्रकृति और इसके परिणामों को परत-दर-परत खोलकर मेरे सामने रखा, तो मुझे बहुत डर लगा। अधूरे मन से अपना काम करना परमेश्वर को और दूसरों को धोखा देना है। परमेश्‍वर इस रवैये की निंदा करता है। अगर मैं पश्‍चाताप नहीं करती तो देर-सवेर कोई गंभीर अपराध कर बैठती और परमेश्‍वर द्वारा हटा दी जाती। जब कलीसिया ने मेरे काम की व्यवस्था की, मैंने सही तरीके से अपना काम करने का संकल्प लिया, लेकिन जब मुझे वास्तव में प्रयास करने की आवश्यकता थी, तो परेशानी और पीड़ा से डरकर मुझे केवल शरीर की चिंता रही। दस्तावेजों की जांच करते समय मैंने लापरवाही बरती, इसलिए स्पष्ट गलतियां भी मेरी नज़रों से चूक गईं। क्या वह धोखा नहीं था? इन विचारों ने मुझे खेद और आत्‍मदोष भर दिया, इसलिए मैंने परमेश्‍वर से प्रार्थना की: "सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर! मैं अपने कर्तव्य के प्रति जिम्मेदार नहीं हूं, बल्‍कि आपको बेवकूफ बनाने की कोशिश करती रही हूं। ऐसा करना आपके प्रति घृणित है। मेरे भीतर अंतरात्‍मा नहीं है। परमेश्‍वर, मैं पश्चाताप करना चाहती हूं। मेरा मार्गदर्शन करें, मुझे कठिनाइयों को सहने, देह-सुख को त्‍यागने और अपना कर्तव्य निभाने की शक्‍ति दें।"

उसके बाद प्रत्येक दस्तावेज़ में, जो शब्‍द मुझे ठीक नहीं लगते उन्‍हें मैं कई शब्दकोशों में देखती। जब पक्का यकीन नहीं होता तो अपनी पूरी तसल्‍ली होने तक भाई-बहनों या किसी पेशेवर अनुवादक से पूछती। कठिन और लंबे दस्तावेजों को मैंने अधूरे मन से निबटाने की हिम्मत नहीं की, बल्‍कि अपनी पूरी क्षमता झोंककर प्रत्येक वाक्य पर बार-बार और बारीकी से ध्‍यान देकर, अनुवाद की सटीकता बढ़ाने की पूरी कोशिश करती। दस्तावेज़ को अंतिम रूप देते समय, जांच के लिए आवश्‍यक चीज़ों की सूची बनाती, याद रखती कि हर कदम पर अच्छी तरह से विचार करने की जरूरत है। अंतिम रूप देते समय प्रत्‍येक शब्‍द की जांच करके आख़िरी चरण की गलतियों को कम करने की भरपूर कोशिश करती। कुछ समय बाद, अपने काम में मुझे बेहतर नतीजे मिलने लगे और मेरी गलती की दर भी कम हो गई।

बाद में एक और बहन टीम में शामिल हुई जिसने फाइनल किए गए अनुवादों के फॉर्मेट को मानकीकृत करने में मदद की। वह समय-समय पर मुझसे पूछती रहती, "क्या यह विराम चिह्न सही है? इस विराम चिह्न का क्या करना है?" जब वह बहुत सारे सवाल पूछती, तो मुझे बहुत गुस्सा आता और मैं सोचती, "हर बात को समझाना बहुत कठिन है। बस फाइनल किए गए दस्तावेज को देखो।" मैंने बहाना बनाते हुए कहा: "यह फाइनल दस्तावेज है। इसमें विराम चिह्न की कोई समस्या नहीं है। इतालवी और अंग्रेजी में विराम चिह्न मूलत: एक जैसे होते हैं। अधिकांश तो अंग्रेज़ी की तरह लगते हैं, लेकिन कुछ अपवाद भी हैं। इसके अर्थ को समझना होता है।” फिर उसने मुझसे पूछा, "हमारी वर्तमान संदर्भ पुस्तकें पेशेवर इस्तेमाल की हैं। मैं इनके कुछ हिस्सों को नहीं समझ पाती। क्या इतालवी विराम चिह्न पर हमारे पास कोई सरल दस्तावेज़ है?" मैंने कहा, अभी हमारे पास नहीं है। मुझे लगा कि एक दस्तावेज बनाना चाहिए, जिसे नए सदस्य देख सकें, लेकिन विराम चिह्न बहुत हैं। इसका मतलब है कि संदर्भ पुस्तकों की जांच करना बहुत अधिक परेशानी वाला काम है। मैंने फिलहाल इसे टाल दिया। मैंने सोचा था कि मामला यहीं समाप्‍त हो जाएगा, लेकिन जब उसने मेरी सलाह के अनुसार अपनी फॉर्मेटिंग में अंग्रेज़ी की तरह इतालवी विराम चिह्न लगाते हुए, 1,50,000 से अधिक शब्दों वाले दस्तावेज़ में डैश से पहले और बाद के सभी रिक्त स्थान हटा दिए, तो मैं देखकर दंग रह गई। इतालवी में,डैश से पहले और बाद हाइफ़न लगाना होता है, ताकि हाइफ़न और डैश आपस में मिल न जाएं, जो अंग्रेजी से अलग है। लेकिन मैंने इसके बारे में उसे नहीं बताया। इसमें और कुछ भी नहीं था। उसे हर जगह ठीक करना पड़ा। मुझे बहुत बुरा लगा और अफसोस हुआ। मुझे खुद से नफरत हुई और सोचा, "एक संदर्भ दस्तावेज़ बनाने के लिए मैंने थोड़ा-सा प्रयास क्‍यों नहीं किया? मैं हमेशा देह-सुख के बारे में क्यों सोचती रहती हूं और परेशानी से इतनी क्‍यों डरती हूं? मेरी लापरवाही के कारण उसे दोबारा मेहनत करनी पड़ी। इसका फिर से सत्यापन भी करना पड़ा। इसमें मेहनत तो करनी ही पड़ी, हमारे काम में देरी भी हुई। क्या इससे परमेश्‍वर के घर का काम बाधित नहीं हुआ?" आभार,आत्‍मदोष और पछतावे की भावनाएं फिर से उभर आईं। खुद को थप्पड़ मारने की इच्‍छा हुई। फिर से वही गलती कर रही हूं? मुझे क्या हो गया है?

एक बार प्रार्थना में मुझे परमेश्‍वर के वचनों का यह अंश याद आया: "क्या एक भ्रष्ट स्वभाव के भीतर ही कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो इतनी लापरवाही से और गैर-जिम्मेदाराना रूप से काम संभालने के लिए उकसाती है? वह क्या चीज़ है? वह है मलिनता; सभी मामलों में, वे कहते हैं कि 'यह लगभग ठीक है' और 'काफ़ी ठीक है'; यह 'शायद,' 'संभवतः' और 'पाँच में से चार' का रवैया है; वे चीजों को सरसरी तौर पर करते हैं, कम से कम और जैसे-तैसे काम करके संतुष्ट हो जाते हैं; वे चीज़ों को गंभीरता से लेने या परिशुद्धता के लिए प्रयास करने को कोई महत्व नहीं देते, और सिद्धांतों की तलाश करने का तो उनके लिए कोई मतलब ही नहीं। क्या यह चीज़ एक भ्रष्ट स्वभाव के भीतर नहीं है? क्या यह सामान्य मानवता की अभिव्यक्ति है? इसे अहंकार कहना सही है, और इसे ज़िद्दी कहना भी पूरी तरह से उपयुक्त है—लेकिन इसके अर्थ को पूरी तरह से एक शब्द में ढालना हो, तो वह शब्द होगा 'मलिन'। अधिकांश लोगों की मानवता में इस तरह की मलिनता मौजूद है; सभी मामलों में, वे कम से कम प्रयास करने की इच्छा रखते हैं, यह देखने के लिए कि उन्हें कितनी छूट मिल सकती है, और वे जो कुछ भी करते हैं उसमें छल की झलक होती है। जब मौका मिले, वे दूसरों को धोखा देते हैं, जब भी मुमकिन हो, लापरवाही से काम करते हैं, और किसी मामले पर गौर करने के लिए वे बहुत समय या विचार देना पसंद नहीं करते। जब तक कि उनका पर्दाफाश नहीं होता, और वे कोई समस्या नहीं पैदा करते, और उनसे हिसाब नहीं लिया जाता, तब तक उन्हें लगता है कि सब ठीक है, और इस तरह वे जैसे-तैसे आगे की ओर बढ़ते रहते हैं। उनकी नज़र में, किसी काम को अच्छी तरह से करना एक बड़ी परेशानी मोल लेने के बराबर है। ऐसे लोग कुछ सीख कर किसी चीज़ में माहिर नहीं बनते, और वे अपनी पढ़ाई में पूरा ध्यान नहीं लगाते। वे केवल ऊपर-ऊपर से किसी विषय की रूपरेखा समझना चाहते हैं और खुद को उस में प्रवीण कहते हैं, और फिर जैसे-तैसे बढ़ते रहने के लिए वे इस पर भरोसा करते हैं। क्या चीज़ों के बारे में लोगों का रवैया ऐसा ही नहीं होता? क्या यह ठीक रवैया है? लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति जिस तरह का रवैया ऐसे लोग अपनाते हैं, उसे चंद शब्दों में, 'जैसे-तैसे काम चलाना' कहते हैं, और इस तरह की मलिनता सारी भ्रष्ट मानव जाति में मौजूद है" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। परमेश्वर के वचनों ने एहसास कराया, मेरे काम में प्रयासों का अभाव है। मेरी प्रकृति बहुत नीच है। मैं अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से जी रही हूं, हर चीज़ के प्रति मेरा कपटपूर्ण और लापरवाह रवैया है। जब बहन ने मुझसे विराम चिह्नों के उचित उपयोग के बारे में पूछा, तो मैं परेशानी से बचना चाहती थी। बहुत सारे सवालों से बचने के लिए मैंने इसे गंभीरता से नहीं लिया, इसलिए मैंने उसे एक साधारण नियम का पालन करने के लिए कहकर छोड़ दिया। जब उसने संदर्भ दस्तावेज के बारे में पूछा, तो मुझे यह बनाना चाहिए था, लेकिन जब मैंने अपनी पीड़ा की कीमत के हिसाब से सोचा, तो इस पर ध्‍यान नहीं दिया। मुझे गलतियां बढ़ने की चिंता थी, लेकिन मैंने धोखे से अपना रास्ता निकालने का फैसला किया। प्रयासों में बचत होती और कार्य ठीक चलता तो भी अच्‍छा होता। हर बार मैं बिना प्रयास किये भाग्य के भरोसे चल रही थी। मैं हमेशा कम से कम प्रयास से सफल होने की कोशिश कर रही थी। अपने कर्तव्य पालन में हर बात पर विचार करने और गलतियों से बचने के लिए, मैं ईमानदार प्रयास नहीं कर रही थी। ऐसा लगा मानो मैं काम करते हुए सवालों के जवाब दे रही हूं, मगर वास्तव में, मैं उस बहन को बेवकूफ बना रही थी। उसने मेरे जवाबों पर भरोसा किया और कुछ गंभीर गलतियां कर दीं और खुद को निरर्थक कार्य में झोंक दिया। उसे इतना ज़्यादा काम फिर से करना पड़ा, इससे काम की कुल प्रगति धीमी हुई और कलीसिया के काम में नुकसान हुआ। मेरे कर्मों के पीछे का सिद्धांत, सबसे आसान, सबसे परेशानी मुक्त काम करना, लोगों को नुकसान पहुंचाने वाला सिद्धांत था। मैं फौरी तौर पर प्रयासों से बचने के लिए घटिया चालें चल रही थी। मुझे शारीरिक पीड़ा नहीं हुई, लेकिन अपने काम में मेरे अपराधबोध का कोई अंत न था और परमेश्वर के घर का काम भी बाधित हुआ। मैं दूसरों को और खुद को नुकसान पहुंचा रही थी! मुझे इतना महत्वपूर्ण काम सौंपा गया था, लेकिन मैंने इसे हल्के में लिया, और बेपरवाह, गैर-जिम्मेदार, धोखेबाज,लापरवाह, और परिणामों को बिगाड़ने वाला व्‍यवहार किया। मेरे पास ज़रा भी विवेक नहीं था। तभी मैंने जाना कि मेरी प्रकृति बहुत नीच है, मेरी सत्‍यनिष्‍ठा बहुत निचले दर्जे की है।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों के पाठ का एक वीडियो देखा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "यदि लोग वह व्यक्त नहीं कर सकते, जो उन्हें सेवा के दौरान व्यक्त करना चाहिए या वह हासिल नहीं कर सकते, जो उनके लिए सहज रूप से संभव है, और इसके बजाय वे सुस्ती में समय गँवाते हैं और बेमन से काम करते हैं, तो उन्होंने अपना वह प्रयोजन खो दिया है, जो एक सृजित प्राणी में होना चाहिए। ऐसे लोग 'औसत दर्जे के' माने जाते हैं; वे बेकार का कचरा हैं। इस तरह के लोग उपयुक्त रूप से सृजित प्राणी कैसे कहे जा सकते हैं? क्या वे भ्रष्ट प्राणी नहीं हैं, जो बाहर से तो चमकते हैं, परंतु भीतर से सड़े हुए हैं? ... तुम्हारे शब्द और कार्य किसके योग्य हो सकते हैं? क्या तुम लोगों का इतना छोटा-सा बलिदान उस सबके बराबर है, जो मैने तुम लोगों को दिया है? मेरे पास और कोई विकल्प नहीं है और मैं पूरे हृदय से तुम लोगों के प्रति समर्पित रहा हूँ, फिर भी तुम लोग मेरे बारे में दुष्ट इरादे रखते हो और मेरे प्रति अनमने रहते हो। यही तुम लोगों के कर्तव्य की सीमा, तुम लोगों का एकमात्र कार्य है। क्या ऐसा ही नहीं है? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने में बिलकुल असफल हो गए हो? तुम लोगों को सृजित प्राणी कैसे माना जा सकता है? क्या तुम लोगों को यह स्पष्ट नहीं है कि तुम क्या व्यक्त कर रहे हो और क्या जी रहे हो? तुम लोग अपना कर्तव्य पूरा करने में असफल रहे हो, पर तुम परमेश्वर की सहनशीलता और भरपूर अनुग्रह प्राप्त करना चाहते हो। इस प्रकार का अनुग्रह तुम जैसे बेकार और अधम लोगों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए तैयार किया गया है, जो कुछ नहीं माँगते और खुशी से बलिदान करते हैं। तुम जैसे मामूली लोग स्वर्ग के अनुग्रह का आनंद लेने के बिलकुल भी योग्य नहीं हैं। केवल कठिनाई और अनंत सज़ा ही तुम लोगों को अपने जीवन में मिलेगी! यदि तुम लोग मेरे प्रति विश्वसनीय नहीं हो सकते, तो तुम लोगों के भाग्य में दु:ख ही होगा। यदि तुम लोग मेरे वचनों और कार्यों के प्रति जवाबदेह नहीं हो सकते, तो तुम्हारा परिणाम दंड होगा। राज्य के समस्त अनुग्रह, आशीषों और अद्भुत जीवन का तुम लोगों के साथ कोई लेना-देना नहीं होगा। यही वह अंत है, जिसके तुम काबिल हो और जो तुम लोगों की अपनी करतूतों का परिणाम है!" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्‍वर के वचन कहते हैं: "मेरे पास और कोई विकल्प नहीं है और मैं पूरे हृदय से तुम लोगों के प्रति समर्पित रहा हूँ, फिर भी तुम लोग मेरे बारे में दुष्ट इरादे रखते हो और मेरे प्रति अनमने रहते हो। यही तुम लोगों के कर्तव्य की सीमा।" इन वचनों ने मेरे दिल को तार-तार कर दिया। परमेश्‍वर ने मुझे अपना कर्तव्य निभाने का मौका दिया, ताकि मैं अपने काम के माध्यम से सत्य को प्राप्‍त कर सकूं, अपना भ्रष्ट स्वभाव छोड़कर परमेश्वर की शरण में जाऊं। लेकिन मैंने सत्य की खोज करने के बजाय, सिर्फ देह-सुख का ध्‍यान रखा, झूठा बहाना बनाया, परमेश्‍वर को धोखा दिया। मैंने सोचा कि कैसे परमेश्‍वर ने मानवजाति को बचाने के लिए देहधारण किया, भारी अपमान और पीड़ा सही, सरकार की प्रताड़ना, लोगों की निंदा और तिरस्‍कार झेला, लेकिन उन्‍होंने हमेशा सत्‍य को अभिव्यक्त करने और लोगों को बचाने का कार्य किया। हमारी बौद्धिक क्षमता कमजोर है इसलिए सत्‍य को धीरे-धीरे समझते हैं। इतना ही नहीं कि परमेश्‍वर ने हमारा परित्‍याग नहीं किया, बल्‍कि वे हर दृष्‍टिकोण से हमारे साथ गंभीर सहभागिता करते हैं। वे सत्‍य को विस्तार से समझाते हैं। कहानियों, उदाहरणों और रूपकों की मदद से हमें समझाते हैं। कुछ सत्य जटिल और बहु-अर्थी होते हैं, इसलिए परमेश्वर उन्हें खोलकर समझाते हैं। वे धैर्यपूर्वक और व्यवस्थित रूप से सहभागिता के माध्यम से सत्‍य की बारीकियों को समझाने के लिए हमारा मार्गदर्शन करते हैं। परमेश्वर हमारे जीवन की बड़ी ज़िम्मेदारी लेते हैं। लेकिन फिर मैंने अपना कर्तव्य कैसे निभाया? मैंने सोचा कि अधिक विचार-मंथन और प्रयास करने की दरकार नहीं है। दस्तावेजों की समीक्षा करते समय मैं गंभीर या जिम्मेदार नहीं थी। मैं परिणामों की परवाह किए बिना कम से कम प्रतिरोध वाला रास्ता अपनाती। मैं परमेश्‍वर के कार्य को हल्के में लेती रही। मेरी अंतरात्मा कहां थी? मैं परमेश्‍वर के दंड की हकदार थी। लेकिन परमेश्‍वर ने मुझे बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्‍होंने अपने वचनों से मुझे प्रबुद्ध बनाया, स्वयं को और परमेश्‍वर की इच्छा को जानने का मौका दिया। अगर मैं सुस्त रहती और अपना काम अधूरे मन से करती, तो जीवित रहने या इंसान कहलाने के लायक नहीं रहती। इसलिए मैंने परमेश्‍वर से प्रार्थना की: "सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर! मेरी प्रकृति बहुत नीच है।" मैं इस तरह शर्मिंदा और नालायक होकर जीना नहीं चाहती। कृपया मुझे सत्य का अभ्यास करने की शक्ति दें, ताकि मैं एक सच्‍चे इंसान की तरह जीवन जीते हुए अपना कर्तव्‍य निभा सकूं।”

फिर, मैंने परमेश्‍वर के वचन पढ़े: "एक मनुष्य के तौर पर परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करने के लिए एक व्यक्ति को समर्पित होना चाहिए। उसे पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित होना चाहिए और वह अनमना या ज़िम्मेदारी लेने में चूक नहीं हो सकता या अपनी व्यक्तिगत रुचि या मनोदशा के आधार पर काम नहीं कर सकता, यह समर्पित होना नहीं है। समर्पित होने से क्या आशय है? इसका आशय यह है कि अपने कर्तव्य पूरे करते समय, तुम मनोदशा, वातावरण, लोगों, मुद्दों और चीज़ों से प्रभावित और विवश नहीं होते हो। 'मुझे यह आदेश परमेश्वर से प्राप्त हुआ है; उसने मुझे यह दिया है। मुझसे यह अपेक्षित है। अतः मैं इसे अपना स्वयं का मामला मानकर जिस भी तरीके से अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं उस तरह इस काम को करूंगा, परमेश्वर को संतु्ष्ट करने पर ज़ोर दूँगा।' जब तुम इस स्थिति में होते हो, तो तुम न केवल अपने अंत:करण से नियंत्रित होते हो, बल्कि इसमें श्रद्धा भी शामिल होती है। यदि तुम काम में दक्षता या परिणाम पाने की आशा किए बिना इसे बस यों ही कर देने में संतुष्ट हो और ऐसा महसूस करते हो कि कुछ प्रयास कर लेना ही पर्याप्त है, तो यह केवल अंत:करण का ही मानक है और इसे समर्पण नहीं माना जा सकता है। जब तुम परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हो तो यह मानक स्तर अंत:करण के मानक स्तर से थोड़ा ज़्यादा ऊँचा होता है। इस प्रकार यह केवल कुछ प्रयास करने का विषय ही नहीं है; तुम्हें इसमें अपना सम्पूर्ण हृदय भी लगाना चाहिए। तुम्हें हमेशा अपने कर्तव्य को अपने ख़ुद के काम की तरह ही मानना चाहिए, इस काम के लिए भार उठाना चाहिए, कोई छोटी-सी ग़लती करने पर या थोड़ा-सा भी असावधान होने पर फटकार सहना चाहिए, ऐसा महसूस करना चाहिए कि तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो सकते क्योंकि यह तुम्हें परमेश्वर के लिए कुपात्र बनाता है। वे लोग जिनके पास सच्चे अर्थों में अपने कर्तव्यों को इस तरह पूरा करने का बोध होता है मानो वे उनके अपने ही काम हों, और बिना इस बात की परवाह किए कि कोई निगरानी कर रहा है या नहीं, चाहे परमेश्वर उनसे प्रसन्न हो या नहीं या चाहे वो उनके साथ जैसा भी व्यवहार करे, वे स्वयं से कर्तव्यों का पालन करने की और परमेश्वर द्वारा सौंपे गए आदेश को पूरा करने की कठोर अपेक्षा करते हैं। इसे समर्पण कहते हैं" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। परमेश्‍वर के वचनों ने मुझे अभ्यास का मार्ग दिखाया। हम मनमर्ज़ी करते हुए अपनी मनोदशा और पसंद के हिसाब से कर्तव्य-पथ पर नहीं चल सकते। जहां कठिन परिश्रम की ज़रूरत हो, वहां लापरवाही नहीं बरत सकते। हमें अपने काम को परमेश्वर का आदेश और अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। हमें बेहतरीन परिणामों के लिए विचार और प्रयास करना चाहिए। ऐसा करना कितना भी मुश्किल हो, हमारी निगरानी की जा रही हो या नहीं, हमें हमेशा अपने दिल, दिमाग और क्षमता से अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। जब मुझे यह एहसास हुआ, तो मैंने परमेश्‍वर से प्रार्थना की, परमेश्‍वर के वचनों के अनुसार पश्चाताप और अभ्यास करने को तत्‍पर हुई। बाद में, मैंने नए सदस्यों के लिए इतालवी में विराम चिह्नों के प्रयोग पर एक दस्तावेज़ बनाने में समय लगाया। उसके बाद, मैंने अनुवाद में आने वाली आम समस्याओं का संक्षिप्‍त उल्‍लेख किया और ध्यान देने वाली बातों की सूची बनाई। दस्तावेज़ की समीक्षा के दौरान ध्‍यान रखती कि कुछ छूट न जाए। जब कोई भाई-बहन मुझसे अपने काम पर सवाल पूछते, तो मैं अपनी कल्पना के आधार पर जवाब नहीं देती, बल्‍कि ध्यान से उनके सवाल पर विचार करती, सिद्धांतों और पेशेवर ज्ञान के आधार पर उन्हें जवाब देती। जब मुझे कुछ समझ नहीं आता, तो वास्तविक प्रयासों, परमेश्‍वर के प्रबोधन और मार्गदर्शन से इसे धीरे-धीरे समझने लगती। मैंने काम में अपनी गलत मंशाओं पर बहुत चिंतन किया। जब भी मुझे कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और उससे छुटकारा पाना चाहा, तो मैं देह-सुख का त्‍याग करने के लिए परमेश्‍वर से प्रार्थना करती, ताकि सच्चे प्रयासों से उन मुद्दों को हल कर पाऊं। काम के प्रति मेरे दृष्टिकोण में धीरे-धीरे काफी सुधार आया और मैं अब अधूरे मन से काम नहीं करती। मैं दृढ़ता से अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम हो गई। मुझमें यह बदलाव पूरी तरह से परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का परिणाम था। परमेश्‍वर का धन्यवाद!

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