23. आखिरकार मुझे अपना कर्तव्य पूरा करने का मतलब समझ आ गया

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "मनुष्य द्वारा अपना कर्तव्य निभाना वास्तव में उस सबकी सिद्धि है, जो मनुष्य के भीतर अंतर्निहित है, अर्थात् जो मनुष्य के लिए संभव है। इसके बाद उसका कर्तव्य पूरा हो जाता है। मनुष्य की सेवा के दौरान उसके दोष उसके क्रमिक अनुभव और न्याय से गुज़रने की प्रक्रिया के माध्यम से धीरे-धीरे कम होते जाते हैं; वे मनुष्य के कर्तव्य में बाधा या विपरीत प्रभाव नहीं डालते। वे लोग, जो इस डर से सेवा करना बंद कर देते हैं या हार मानकर पीछे हट जाते हैं कि उनकी सेवा में कमियाँ हो सकती हैं, वे सबसे ज्यादा कायर होते हैं। यदि लोग वह व्यक्त नहीं कर सकते, जो उन्हें सेवा के दौरान व्यक्त करना चाहिए या वह हासिल नहीं कर सकते, जो उनके लिए सहज रूप से संभव है, और इसके बजाय वे सुस्ती में समय गँवाते हैं और बेमन से काम करते हैं, तो उन्होंने अपना वह प्रयोजन खो दिया है, जो एक सृजित प्राणी में होना चाहिए। ऐसे लोग "औसत दर्जे के" माने जाते हैं; वे बेकार का कचरा हैं। इस तरह के लोग उपयुक्त रूप से सृजित प्राणी कैसे कहे जा सकते हैं? क्या वे भ्रष्ट प्राणी नहीं हैं, जो बाहर से तो चमकते हैं, परंतु भीतर से सड़े हुए हैं?" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचनों से मुझे यह समझने में मदद मिली कि अपना कर्तव्य पूरा करने का वास्तविक अर्थ क्या है। इसका अर्थ है कि चाहे हम कितने ही प्रतिभावान या गुणी क्यों न हों, हम जो समझते हैं हमें उसे पूरी तरह अमल में लाना होगा। हम छोटा रास्ता नहीं अपना सकते या बिना रुचि के काम नहीं कर सकते। जो परमेश्वर चाहता है उसके आधार पर हमें प्रयास करते रहना है। इस तरह से, हम अपने कर्तव्यों के पालन में किसी भी कमजोरी या कमी की भरपाई कर सकते हैं और इससे हमें बेहतर नतीजे मिलेंगे।

हाल ही में, कलीसिया परमेश्वर के वचनों के एकल भजनों के कुछ वीडियो बनाना चाहती थी। हमारा टीम के अगुआ चाहते थे कि मैं गायन का नेतृत्व करूँ और एक गीत के लिए गिटार बजाऊं। जब उन्होंने मुझे इसके बारे में बताया, तो मैं थोड़ी घबरा गयी। गाना और गिटार बजाना केवल गीत गाने से ज़्यादा मुश्किल है। मैंने पहले भी ऐसे एकल गायन की कोशिश की थी, मगर गाते हुए मैंने अपने प्रदर्शन पर ध्यान दिया और अपने सुर भूल गयी, मगर जब मैंने सुरों पर ध्यान दिया, तो मेरे हाव-भाव ख़राब थे। अंत में, वे उस फिल्म के हिस्से को इस्तेमाल ही नहीं कर सके। वैसे ही काम का सामना करने पर, मैं 'ना' कहना चाहती था, मगर मुझे नहीं लगा कि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होता। मेरे सभी भाई-बहन सोचते थे कि मैं उस गीत के लिए उपयुक्त थी, तो मैंने अंदाज़ा लगाया कि मुझे उसके साथ चलना चाहिए और अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। इसलिए, मैंने वह भूमिका मंज़ूर कर ली। दो दिन के अभ्यास के बाद, मैंने गाने और अभिनय के हिस्सों को काफी अच्छी तरह समझ लिया। मगर गिटार के सुर काफी जटिल थे और उन्हें याद करना मुश्किल था। फ़िल्म शूट करने के सिर्फ एक दिन पहले, मैं बहुत बेचैन हो रही थी। मुझे डर था कि अभ्यास का समय निकल चुका है, और अगर मैं अभ्यास करती रही, तो क्या मेरे हाथ सूज नहीं जाएंगे? बेचैनी के बावजूद, मुझे शायद वह याद भी न रहे। इस ख़याल से, मैं उसके लिये कीमत नहीं चुकाना चाहती थी। तो मैं इस मुश्किल समस्या के लिए सही उपाय ढूंढने का प्रयास करती रही। तभी मुझे एक ख़याल आया: मैं कैमरामैन से कह सकती थी कि मेरे हाथों की ज़्यादा फ़िल्में न ले, फिर मुझे इन खिझाऊ सुरों पर इतनी मेहनत करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, है न? और हम अभी भी वीडियो शूट कर सकते थे। लगा कि यह एक अच्छा ख़याल है। दरअसल जब मुझे यह ख़याल आया तो मैं थोड़ी बेचैन हुई। ऐसा लगा जैसे मैं गैर-ज़िम्मेदार हो रही हूँ। अगर सुरों में कुछ समस्या आ गयी तो, और हमें वीडियो दोबारा शूट करना पड़ा तो? मगर फिर मैंने सोचा: "समय इतना कम है और यह इतना मुश्किल गीत है। इस गीत को ठीक से बजाना कितना मुश्किल और तनाव डालने वाला होगा। मैं अपने स्तर से ऊपर काम नहीं कर सकती। और फिर, यह इसलिए है ताकि हम जल्द से जल्द वीडियो निकाल सकें। सभी को समझना चाहिए।" उसके बाद, मैंने सुरों के बारे में ज़्यादा फिक्र न करते हुए, अपने प्रदर्शन और गायन पर ध्यान दिया। मैंने अंदाज़ा लगाया कि यही बेहतर होगा।

जब फिल्म शूट करने का समय आया, तो मैंने फिल्म बनाने वाले भाई से कहा कि मेरे हाथों के ज़्यादा क्लोज़-अप न ले। मुझे नहीं लगा कि कुछ समस्या होगी। मगर अगले दिन, डायरेक्टर ने कहा कि मैं कुछ सुर गलत बजा रही थी और पूछा कि क्या चल रहा है। मुझे इतनी ग्लानि हुई कि मेरा मुँह लाल पड़ गया। मैंने सोचा, "ओह नहीं, क्या हमें दोबारा शूट करना पड़ेगा?" मैं जल्दी से एडिटर से पूछने भागी कि क्या और कोई उपाय है। उसने बस सिर हिलाया और कहा, "मैंने कोशिश की थी, मगर बेकार है।" इससे, मुझे पता चल गया कि हमें दोबारा फिल्माना पड़ेगा। मुझे बुरा लगा यह जानकर कि यह समस्या मैंने खड़ी की थी। बाद में, जब हम जो कुछ हुआ उस पर विचार-विमर्श करने इकट्ठा हुए, तो मैंने सबको अपनी करनी का कारण बताया। एक बहन ने मुझे यह कहते हुए धिक्कारा, "तुमने हमें पहले क्यों नहीं बताया कि तुमने सुर नहीं सीखे थे? अब हमें एक बार फिर से फिल्म शूट करनी पड़ेगी और पूरे प्रोजेक्ट में देरी हो जाएगी। यह तुम्हारा बहुत लापरवाह और गैर-ज़िम्मेदार रवैया था।" जो कुछ उसने कहा, मैं मान ही नहीं सकी। मैंने सोचा, "क्या मैंने अपनी तरफ से सबसे अच्छा नहीं किया? हकीकत यह है कि मैं सुर नहीं बजा सकती, और मैंने ऐसा यह पक्का करने के लिए किया कि वीडियो जल्दी पूरा हो जाए। बस उन्हें मेरे हाथ नहीं फिल्माने चाहिए थे, है न?" मैंने बस बहाने बनाये, बिना आत्म-चिंतन किये। मगर फिर एक और बहन ने मुझे बताया, "अगर तुम्हें मुश्किल हो रही थी तो तुम ज़्यादा अभ्यास कर सकती थी, भले ही फिल्माना कुछ दिनों के लिए टाल दिया जाता। मगर तुम ऐसे हड़बड़ी में काम नहीं कर सकती। तुम मुख्य गायिका हो—कैसा लगेगा अगर हम तुम्हें गिटार बजाते न दिखाएं? यह तुम्हारी ओर से बहुत लापरवाह और गैर-ज़िम्मेदार रवैया था।" उसे यह कहते सुन कर मुझे सच में 'ऐसा' लगा। मैं खुद को यह सोचने से रोक न सकी "अगर मेरे सभी भाई-बहन यह सोचते हैं कि मैं अपने कर्तव्यों में लापरवाह हूँ तो शायद मैं वाकई गलत हूँ? मैं भी चाहती थी कि फ़िल्म ठीक से शूट हो। मगर तुम इसे कैसे भी देखो, प्रोजेक्ट में देरी हो गयी है और हमें दोबारा फिल्माना पड़ेगा क्योंकि मेरे सुर गलत थे। मैं निश्चित रूप से दोषी हूँ।" मुझे यह सोच कर बुरा लगा। मैंने विरोध करना बंद कर दिया और मनन करना शुरू कर दिया।

बाद में मुझे परमेश्वर के शब्द का एक परिच्छेद मिला जिसका मुझ पर गहरा असर हुआ। उसमें यह लिखा था : "अपने कर्तव्य को सरसरी तौर पर और जल्दबाज़ी में करने, और इसे महत्व न देने का परिणाम क्या होता है? इसका परिणाम है कि तुम अपना कर्तव्य ठीक ढंग से नहीं निभाओगे, भले ही तुम इसे अच्छी तरह से करने के योग्य हो। तुम्हारा कार्य-निष्पादन कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा, और परमेश्वर तुम्हारे कर्तव्य के प्रति तुम्हारे रवैये से संतुष्ट नहीं होगा। यदि, आरंभ से ही, तुमने सामान्य रूप से खोज की होती और सहयोग दिया होता; यदि तुमने अपने सभी विचारों को इसके लिए समर्पित कर दिया होता; यदि तुमने अपना दिल और अपनी आत्मा इसे करने में लगा दी होती, और अपना सारा प्रयास इसी में जुटा दिया होता, और एक अवधि का श्रम, अपनी मेहनत, और अपने विचारों को इसके लिए समर्पित कर दिया होता, या संदर्भ की सामग्री के लिए कुछ समय दिया होता, और अपने पूरे तन-मन को इसके लिए प्रतिबद्ध कर दिया होता; यदि तुम इस तरह का सहयोग देने में सक्षम होते, तो परमेश्वर तुम्हारी अगुवाई करता, तुम्हारा मार्गदर्शन करता। तुम्हें ज़्यादा प्रयत्न करने की ज़रूरत नहीं है; जब तुम सहयोग देने में कोई कसर नहीं छोड़ते, तो परमेश्वर पहले से ही तुम्हारे लिए सब कुछ व्यवस्थित कर देगा। यदि तुम मक्कार और विश्वासघाती हो, और काम के दौरान ही तुम्हारा हृदय परिवर्तन हो जाता है और तुम भटक जाते हो, तो परमेश्वर तुम में कोई रुचि नहीं लेगा; तुम इस अवसर को खो चुके होगे, और परमेश्वर कहेगा, 'तुम योग्य नहीं हो; तुम बेकार हो। दूर खड़े हो जाओ। तुम्हें आलसी बने रहना पसंद है, है न? तुम धोखेबाज़ी और मक्कारी पसंद करते हो, है न? तुम आराम करना पसंद करते हो? ठीक है, फिर आराम करो।' परमेश्वर यह अनुग्रह और अवसर अगले व्यक्ति को दे देगा। तुम लोग क्या कहते हो : यह नुकसान है या फ़ायदा? यह बहुत बड़ा नुकसान है!" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। परमेश्वर के वचनों ने मेरी स्थिति उजागर कर दी। मैं मुख्य भूमिका लेने के लिए अभ्यास करने पर राज़ी हुई थी, मगर मैंने असल में वह नहीं किया जो मैंने वादा किया था। मैंने अपनी कमज़ोरियों पर काम नहीं किया, न ही अपने सुर सुधारने के लिए जानकारी ढूंढी। मैं अभ्यास में ढीली पड़ गयी क्योंकि मैंने सोचा कि यह बहुत मुश्किल होगा। मैंने बहाने बनाये कि मेरे पास वक़्त नहीं था और कैमरामैन से कहा कि मेरे हाथों के क्लोज-अप लेने से बचे। मैंने सोचा कि मैं यह कर बच के निकल सकती हूँ, मगर इससे प्रोजेक्ट में देरी हो गई। यह वाकई मेरा गैर-ज़िम्मेदार और लापरवाह रवैया था! जब मेरा कर्तव्य निभाने का समय आया, तब मैं गाना ठीक से बजाने और परमेश्वर की गवाह बनने के लिये मेहनत नहीं करना चाहती थी। उसकी जगह, मैंने सबसे आसान रास्ता चुना, और अब हमें सब कुछ दोबारा से करना पड़ रहा था। मैं इतनी गैर-ज़िम्मेदार कैसे हो सकती थी? सिर्फ थोड़ा और अभ्यास, थोड़ी और मेहनत कर ली होती, तो मैंने परमेश्वर के घर के काम का नुकसान न किया होता। उस पल, मुझे खुद से थोड़ी नफरत हुई। मैंने सोचा, "अगर मुझे दोबारा मौका मिले, तो मैं फिर से इतनी बेपरवाह नहीं होउंगी। चाहे मैं उन सुरों का अभ्यास करते हुए खुद को थका ही क्यों न लूँ, मैं वह करूँगी जो करने की ज़रूरत है।"

औरों ने मुझे अभ्यास करने के लिए दो दिन का समय देने का निश्चय किया। यह मेरे लिए सच में दिल को छू जाने वाली बात थी। मैंने परमेश्वर का धन्यवाद किया, मुझे अपना अपराध सुधारने का मौका देने के लिए। उसके बाद अपने अभ्यास में मैंने सभी सुर याद करने के लिए बहुत मेहनत की, मगर मैंने वास्तव में बहुत तनाव महसूस किया। मुझे डर था कि मेरी तकनीक अब भी बिलकुल ठीक नहीं थी, सुधार करने के लिए दो दिन काफ़ी नहीं थे। मैं फिर से बेचैन होने लगी। मगर जितना ज़्यादा मैं बेचैन होती, उतना ही ज़्यादा मैं भूलती जाती, और जितना मैं भूलती, उतनी ही बेचैन हो जाती। सुबह का वक्त एक पल में गुज़र गया। मैं अभी भी गीत को अच्छे से नहीं बजा पा रही थी, और मेरे हाथ दुःख रहे थे। अक्सर मैं लंच के बाद अभ्यास करने से विराम लेती थी, मगर इस बार, मुझे पता था मुझे अभ्यास में लगे रहना है। मैं जानती थी कि मैं विराम लेने का जोखिम नहीं उठा सकती, बल्कि मुझे अपना हर पल सुरों को ठीक करने में इस्तेमाल करना था। जब मैंने अपना दिल मजबूत कर लिया, तो परमेश्वर ने मेरा मार्गदर्शन किया। उस दोपहर, बिना जाने, मैंने पता लगा लिया कि सुरों को टुकड़ों में कैसे याद किया जाये! फिर वह बेहतर होता गया। मगर मैं इतनी देर से अभ्यास कर रही थी कि मेरे हाथ सूजने लगे और मुझे दोबारा ढील देने का लालच हुआ। जब मैंने खुद को दोबारा ऐसे सोचते पाया, मैंने कुछ ऐसा सोचा जो परमेश्वर ने कहा था, और उसे पढ़ने के लिए भागी : "जब तुम्हारे सामने एक ऐसा कर्तव्य आता है, जिसके लिए तुम्हारे प्रयास और तुम्हारे खुद को खपाने की आवश्यकता होती है, और जिसके लिए तुम्हें अपने तन, मन और समय को समर्पित करने की आवश्यकता होती है, तो तुम्हें कोई संकोच नहीं करना चाहिए, किसी तरह की तुच्छ चालाकी नहीं करनी चाहिए, और कोई कसर नहीं छोडनी चाहिए। यदि तुमने कोई कसर छोड़ी, या तुम मतलबी, मक्कार या विश्वासघाती बनते हो, तो तुम निश्चित ही एक ख़राब काम करोगे। तुम कह सकते हो, 'किसी ने मुझे चालाकी से काम करते हुए नहीं देखा। क्या बात है!' यह किस तरह की सोच है? तुम्हें लगता है कि तुमने लोगों की आँखों में धूल झोंकी, और परमेश्वर की आँखों में भी। हालांकि, वास्तविकता में, तुमने जो किया वो परमेश्वर जानता है या नहीं? (वह जानता है।) आम तौर पर, जो लोग लंबे समय से तुम्हारे साथ बातचीत करते रहे हैं, उन्हें भी पता चल जाएगा, और वे कहेंगे कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो हमेशा मक्कारी दिखाता है, कभी दिल लगाकर मेहनत नहीं करता, और उसका प्रयास केवल पचास या साठ प्रतिशत होता है, या ज़्यादा से ज़्यादा अस्सी प्रतिशत। वे कहेंगे कि तुम सब कुछ बहुत ही उलझे हुए तरीके से करते हो, और जो कुछ भी कर रहे हो उसपर एक नज़र भी नहीं डालते; तुम अपने काम में बिलकुल ईमानदार नहीं हो। जब तुम्हें कुछ करने के लिए ज़ोर दिया जाता है, तभी तुम थोड़ा-सा प्रयास करते हो; अगर तुम्हारे आसपास कोई निगरानी कर रहा है कि काम ठीक से हो रहा है या नहीं, तो तुम थोड़ा बेहतर काम करते हो— लेकिन अगर कोई निगरानी करने के लिए नहीं है, तो तुम थोड़ा सुस्त पड़ जाते हो। अगर कोई तुमसे निपटा जाता है, तो तुम काम में अपना दिल लगाते हो; वरना तुम काम करते हुए लगातार ऊंघते रहते हो और जितना कम हो सके उतना ही काम करने की कोशिश करते हो, यह मानकर कि कोई नहीं देखेगा। समय के साथ, लोग ध्यान देने लगते हैं। वे कहते हैं, 'यह व्यक्ति अविश्वसनीय है और भरोसे के लायक नहीं है; यदि तुम उसे कोई महत्वपूर्ण काम सौंपते हो, तो उसपर निगरानी रखने की आवश्यकता होगी। वह साधारण कार्य कर सकता है और ऐसे काम जिनका सिद्धांतों से कोई सरोकार नहीं है, लेकिन यदि तुम उसे कोई महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए दोगे, तो यह बहुत ही संभव है कि वह इसे चौपट कर देगा, और फिर तुम उसके धोखे का शिकार हो जाओगे।' लोग उसकी सही फितरत पहचान लेंगे, और वह पूरी गरिमा और ईमानदारी को त्याग चुका होगा। अगर कोई उस पर भरोसा नहीं कर सकता, तो परमेश्वर कैसे कर सकता है? क्या परमेश्वर उसे कोई बड़े काम सौंपेगा? ऐसा व्यक्ति भरोसे के लायक नहीं है" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)।

परमेश्वर के वचनों ने मुझे अहसास करवाया कि मैं अपने कर्तव्य में कितनी लापरवाह हो रही थी। मैं सुरों का अभ्यास करने में आत्म-संतुष्ट थी, मैं सबसे ऊँचा स्तर पाने की कोशिश नहीं कर रही थी। मैं अपना पूरा ज़ोर नहीं लगा रही थी। मैं अपने कर्तव्य में हड़बड़ी करते हुए जैसे-तैसे आगे बढ़ रही थी। मुझ में कोई ईमानदारी नहीं थी। मैं विश्वास करने योग्य नहीं थी। मैंने खुद को हमेशा अपने कर्तव्यों में जोशीली और मेहनती समझा था, मानो कि मुझमें अनंत वफादारी थी। मगर अब, मैंने देखा कि मैं नतीजों पर ध्यान नहीं दे रही थी, बल्कि सिर्फ हड़बड़ी में काम करती गयी थी। यह अपना कर्तव्य निभाना कैसे था? अगर मैं उसी तरह काम करती रहती, तो कौन दोबारा मुझ पर विश्वास करने का खतरा मोल लेता? क्या मैं अपनी ईमानदारी और इज़्ज़त दांव पर नहीं लगा रही थी? मैंने पिछली बार एक अपराध किया था। मैं उसे दोहराना नहीं चाहती थी। इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि मेरे हाथ सूजे हुए थे या मैं थकी हुई थी, मेरी गरिमा और मेरे सिद्धांत ज़्यादा मायने रखते थे। तो मैंने संकल्प कर लिया कि मैं सुरों का अभ्यास करती रहूंगी, चाहे यह कितना ही थकाने वाला या मुश्किल ही क्यों न हो। एक बार मैंने सच में प्रायश्चित करने का संकल्प कर लिया, तो मैंने परमेश्वर के आशीषों और मार्गदर्शन को देखा। उस दिन, मैंने आधी रात तक अभ्यास किया, और लगभग सभी सुर याद कर लिए। अगला पूरा दिन मैंने अभ्यास किया, जब तक मैं पूरे गाने को समझ नहीं गयी। फिल्माने के दौरान, मैंने हर एक स्टेप पर पूरी तरह से ध्यान दिया और परमेश्वर पर भरोसा करते हुए मन ही मन प्रार्थना की। मुझे हैरानी हुई कि हमने हर चीज़ एक बार में शूट कर ली! ऐसा होता देखकर मुझे काफ़ी सुकून मिला। मैंने सत्य का अभ्यास करने की मिठास को चखा।

बाद में मुझे संगीत रचने का काम सौंपा गया। मैंने बहुत लम्बे समय से किसी संगीत की रचना नहीं की थी, मैं थोड़ी अभ्यास में नहीं थी। खासकर, हाल में हम रॉक संगीत करते रहे थे, जो मैंने पहले कभी नहीं किये थे, तो मैं थोड़ी चिंतित थी। मगर मैं जानती थी कि यह एक कर्तव्य है जो मुझे पूरा करना है और अपना सबसे अच्छा योगदान देना है। इसलिए, मैंने महीने के अंत तक दो गीत पूरे करने की योजना बनाई। मैंने संगीत रचना में ज़्यादा देर तक काम किया, जब मैं थक गयी, तो परमेश्वर से देह-सुख को त्यागने में मदद माँगी। संयोग से मुझे एक धुन मिल गयी और मैंने जल्दी से उसे एक पूरे गीत में बदल दिया। जब वह गीत पूरा हो गया, तो मैंने अपने भाई-बहनों को सुनाया। उन्होंने कहा कि यह ठीक है और इसमें रॉक संगीत का सही अंदाज़ है। मगर मैंने सोचा: "अगर मैं और काम करती और कोरस धुन को और तराशती, तो गीत और भी बेहतर होता।" मगर मेरे पास दूसरे विचार भी थे। मेरे पास उस समय एक स्पष्ट दिशा नहीं थी, और मैं खुद से ज़्यादा नहीं माँगना चाहती थी। इसके अलावा, मेरे भाई-बहनों को इससे कोई समस्या नहीं थी। यह काफ़ी हद तक ठीक था। इसके अलावा, मैंने इस तरह की गीत रचना अभी-अभी सीखी थी, तो इसका थोड़ा दोषपूर्ण होना सामान्य बात थी। मैंने उसे टीम के अगुआ को भेज दिया।

कुछ दिन बाद, उसने मुझे बताया कि मैं सही मार्ग पर थी, मगर धुन ज़रा कर्कश थी। उसने मुझे गीत के बोल के बारे में थोड़ा और सोचने की सलाह दी। मुझे थोड़ी हिचकिचाहट महसूस हुई और मैंने सोचा, "मैंने अभी-अभी तो इस तरह की गीत रचना सीखी है। आप मुझसे ज़्यादा ही उम्मीद कर रहे हैं!" मैंने पहले ही इस पर बहुत अधिक समय लगा लिया है, और कई दिनों तक इसके फीडबैक का इंतज़ार किया है। आधा महीना पहले ही गुज़र चुका है। यह देख कर कि कोई प्रगति नहीं हुई, मैं थोड़ी बेचैन थी। रचना में सुधार करने में तो सच में बहुत मेहनत लगती और मुझे यह भी पता नहीं था कि वह कैसा निकलेगा। तो मैंने मुख्य धुन दोबारा लिखी। टीम के अगुआ ने कहा कि इसमें मधुरता की कमी है और यह बच्चों के गीत जैसा लग रहा है। मैंने वास्तव में हताश महसूस किया। मैंने सोचा, "मैं अपना सब कुछ दे रही हूँ, मगर मैं अपना एक भी गीत मंज़ूर नहीं करवा सकी। मुझे क्या करना चाहिए?" बाद में, मैंने कुछ और धुनें लिखीं, मगर उनमें से कोई भी मंज़ूर नहीं हुई। मैं बहुत हताश हो गयी थी। मैंने सोचा, कैसे मैंने महीने के अंत तक दो संगीत रचने का संकल्प लिया था, मगर एक भी पूरा नहीं कर पायी। मैं अपने कर्तव्यों में विफल हो गयी थी। क्या मैं बिलकुल बेकार थी?

बाद की एक सभा में, टीम के अगुआ ने मुझे याद दिलाया, "तुम्हारी रचनाएँ काफ़ी मौलिक हैं और अंदाज़ भी अच्छे हैं, तो अभी तक कुछ मंज़ूर क्यों नहीं किया गया है? तुम गीत के बोल पर ध्यान नहीं दे रही, इसलिए बोल और धुन फिट नहीं बैठ रहे। जब भी तुम उसे बदलती हो, वह बदतर हो जाता है। यह परमेश्वर के घर के काम को रोके हुए है।" फिर, एक और भाई ने सुर में सुर मिलाया: "तुम रिकॉर्डिंग पर अच्छा नहीं गा रही हो। उनमें से कुछ तो शीट संगीत से भी नहीं मेल खाते। तुम लापरवाह हो रही हो!" भाइयों द्वारा यह बर्ताव और डांटा जाना बहुत अपमानजनक था। मैं किसी बिल में छिप जाना चाहती थी। घर पहुंचकर, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की: "परमेश्वर, मैं अपने कर्तव्य में बेपरवाह रही। समर्पित होकर काम नहीं किया, मगर मुझे नहीं पता, इस समस्या को कैसे हल करें। मेरी मदद करो और राह दिखाओ।"

फिर, मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा: "क्या एक भ्रष्ट स्वभाव के भीतर ही कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो इतनी लापरवाही से और गैर-जिम्मेदाराना रूप से काम संभालने के लिए उकसाती है? वह क्या चीज़ है? वह है मलिनता; सभी मामलों में, वे कहते हैं कि 'यह लगभग ठीक है' और 'काफ़ी ठीक है'; यह 'शायद,' 'संभवतः' और 'पाँच में से चार' का रवैया है; वे चीजों को सरसरी तौर पर करते हैं, कम से कम और जैसे-तैसे काम करके संतुष्ट हो जाते हैं; वे चीज़ों को गंभीरता से लेने या परिशुद्धता के लिए प्रयास करने को कोई महत्व नहीं देते, और सिद्धांतों की तलाश करने का तो उनके लिए कोई मतलब ही नहीं। क्या यह चीज़ एक भ्रष्ट स्वभाव के भीतर नहीं है? क्या यह सामान्य मानवता की अभिव्यक्ति है? इसे अहंकार कहना सही है, और इसे ज़िद्दी कहना भी पूरी तरह से उपयुक्त है— लेकिन इसके अर्थ को पूरी तरह से एक शब्द में ढालना हो, तो वह शब्द होगा 'मलिन'। अधिकांश लोगों की मानवता में इस तरह की मलिनता मौजूद है; सभी मामलों में, वे कम से कम प्रयास करने की इच्छा रखते हैं, यह देखने के लिए कि उन्हें कितनी छूट मिल सकती है, और वे जो कुछ भी करते हैं उसमें छल की झलक होती है। जब मौका मिले, वे दूसरों को धोखा देते हैं, जब भी मुमकिन हो, लापरवाही से काम करते हैं, और किसी मामले पर गौर करने के लिए वे बहुत समय या विचार देना पसंद नहीं करते। जब तक कि उनका पर्दाफाश नहीं होता, और वे कोई समस्या नहीं पैदा करते, और उनसे हिसाब नहीं लिया जाता, तब तक उन्हें लगता है कि सब ठीक है, और इस तरह वे जैसे-तैसे आगे की ओर बढ़ते रहते हैं। उनकी नज़र में, किसी काम को अच्छी तरह से करना एक बड़ी परेशानी मोल लेने के बराबर है। ऐसे लोग कुछ सीख कर किसी चीज़ में माहिर नहीं बनते, और वे अपनी पढ़ाई में पूरा ध्यान नहीं लगाते। वे केवल ऊपर-ऊपर से किसी विषय की रूपरेखा समझना चाहते हैं और खुद को उस में प्रवीण कहते हैं, और फिर जैसे-तैसे बढ़ते रहने के लिए वे इस पर भरोसा करते हैं। क्या चीज़ों के बारे में लोगों का रवैया ऐसा ही नहीं होता? क्या यह ठीक रवैया है? लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति जिस तरह का रवैया ऐसे लोग अपनाते हैं, उसे चंद शब्दों में, 'जैसे-तैसे काम चलाना' कहते हैं, और इस तरह की मलिनता सारी भ्रष्ट मानव जाति में मौजूद है।" "महान और नीच लोगों के बीच का अंतर कोई कैसे जान सकता है? बस लोगों, घटनाओं, और चीजों के साथ उनके व्यवहार के तरीके और उनके रवैये को देखो— यह देखो कि वे कैसे कार्य करते हैं, वे चीजों को कैसे संभालते हैं, और कोई समस्या उठे तो वे क्या करते हैं। अच्छे चरित्र और गरिमा वाले लोग अपने कार्यों में अतिसावधान, गंभीर और मेहनती होते हैं, और बलिदान देने के लिए तैयार रहते हैं। बिना चरित्र और गरिमा वाले लोग अपने कार्यों में अनियमित और फिसड्डी होते हैं, हमेशा कोई न कोई चाल चलते रहते हैं, हमेशा बस जैसे-तैसे काम चलाते रहना चाहते हैं। वे कोई कौशल सीख कर उसमें माहिर नहीं बनते, और चाहे वे कितने समय तक अध्ययन करें, वे कौशल या पेशे के मामलों में अज्ञानता से भ्रमित रहते हैं। यदि तुम उन्हें उत्तर देने पर ज़ोर नहीं देते, तो सब ठीक लगता है, लेकिन जैसे ही तुम ऐसा करते हो, तो वे घबरा जाते हैं—उनके माथे से पसीना छूटने लगता है, और उनकी बोलती बंद हो जाती है। वे घटिया चरित्र के लोग हैं" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। इसे पढ़कर ही मुझे एहसास हुआ कि मैं अपने कर्तव्य में लापरवाह रही हूँ, क्योंकि मेरे अंदर कुछ अशुद्धियां थीं। मैं हर काम में कम से कम योगदान देना चाहती थी, मुझे अपने काम की गुणवत्ता की कोई फ़िक्र नहीं थी। मैं सत्य के सिद्धांतों को खोजना और परमेश्वर की अपेक्षाओं के मुताबिक अपना कर्तव्य करना नहीं चाहती थी। जब मैं इस वक्त के बारे में सोचती, चाहे वह वीडियो फ़िल्माने की बात हो या गीत रचना की, जब भी कोई ऐसी समस्या सामने आती जिसमें मुझे कोशिश करनी होती, जब भी मुझे कीमत चुकानी होती, मैं कम से कम कोशिश करके खुश थी। मैंने अपने काम में सुधार करने या कड़ी मेहनत करने की कोशिश नहीं की। दरअसल, मैं जानती थी कि अगर मैंने कड़ी मेहनत की और काम में ज़्यादा ध्यान दिया, तो अपना काम बेहतर कर पाऊँगी। मगर मैंने सिर्फ़ खानापूर्ती की, हमेशा अपनी इच्छाओं को पूरा करने में लगी रही। मैं अपने काम में आगे नहीं बढ़ सकी, अपने कर्तव्य से परमेश्वर की गवाह नहीं बनी, नतीजा ये हुआ कि मैं कलीसिया के काम में रुकावट डालती रही। कैसे कहूँ कि मैंने अपना कर्तव्य निभाया? साफ़ तौर पर, मैं परमेश्वर के घर के काम में बाधा डाल रही थी। तब जाकर मैंने जाना कि मेरी अशुद्धियां कितनी गंभीर थीं। मैं लापरवाही बनी रही, काम में कोई ध्यान नहीं दिया, मैंने परमेश्वर को बेवकूफ़ बनाने की कोशिश की। मुझमें चरित्र और आत्मसम्मान की कमी थी। परमेश्वर ऐसे लोगों को पसंद करता है जो अपना कर्तव्य कड़ी मेहनत और ईमानदारी से करते हैं, जो मुश्किलों का सामना होने पर सत्य के सिद्धांत को खोजते हैं, परमेश्वर की अपेक्षा के मुताबिक कर्तव्य निभाते हैं। उनमें ईमानदारी और आत्मसम्मान होता है, परमेश्वर की नज़रों में उनकी जगह ऊँची होती है। उनके मुकाबले, मैं इंसान कहलाने लायक भी नहीं थी। मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई। उस वक्त, मैंने समझा: भाइयों द्वारा कांट-छांट और निपटान के ज़रिए परमेश्वर मुझे बचा रहा था। वरना, मैं हमेशा इसी तरह लापरवाह बनी रहती। मैं कभी अपना काम ठीक से नहीं कर पाती। मैंने परमेश्वर के घर के काम में रुकावट डाली है और परमेश्वर द्वारा निकाली गई हूँ।

फिर मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े: "परमेश्वर का कार्य मनुष्यजाति के वास्ते है, तथा मनुष्य का सहयोग परमेश्वर के प्रबंधन के वास्ते है। जब परमेश्वर ने वह सब कुछ कर लिया जिसे करने की उससे अपेक्षा की जाती है, उसके पश्चात्, मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने अभ्यास में उदार हो, और परमेश्वर के साथ सहयोग करे। परमेश्वर के कार्य में, मनुष्य को कोई कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए, उसे अपनी वफादारी अर्पित करनी चाहिए, और अनगिनत अवधारणाओं में सलंग्न नहीं होना चाहिए, या निष्क्रिय बैठ कर मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। परमेश्वर मनुष्य के लिए स्वयं को बलिदान कर सकता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी अर्पित नहीं कर सकता है? परमेश्वर मनुष्य के प्रति एक हृदय और मन वाला है, तो क्यों मनुष्य थोड़ा सा भी सहयोग अर्पित नहीं कर सकता है? परमेश्वर मनुष्यजाति के लिए कार्य करता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के वास्ते अपने कुछ कर्तव्य पूरा नहीं कर सकता है? परमेश्वर का कार्य इतनी दूर तक आ गया है, फिर भी तुम लोग तब भी देखते हो किन्तु कार्य नहीं करते हो, तुम लोग सुनते तो हो किन्तु हिलते नहीं हो। क्या ऐसे लोग तबाही के लक्ष्य नहीं हैं? परमेश्वर ने पहले ही अपना सर्वस्व मनुष्य को अर्पित कर दिया है, तो क्यों आज मनुष्य ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ है? परमेश्वर के लिए, उसका कार्य उसकी प्राथमिकता है, और उसके प्रबंधन का कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। मनुष्य के लिए, परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाना और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करना उसकी पहली प्राथमिकता है। इसे तुम सभी लोगों को समझ लेना चाहिए" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करके मुझे प्रेरणा मिली। परमेश्वर इंसान के लिये एक दिल-एक मन से सोचता है। शैतान द्वारा भ्रष्ट किये गए इंसान को बचाने के लिये उसने दो बार देहधारण किया। उसने अपमान सहे, पीढ़ियों द्वारा नकारे गये और बहुत अधिक कष्ट उठाये। हमारी गहरी भ्रष्टता और बेपरवाही का सामना करते हुए भी, परमेश्वर ने हमें कभी नहीं छोड़ा। वो अब भी हमें बचाने के लिये सत्य व्यक्त करता है। हमारी काबिलियत कम हो रही है, हम सत्य को जल्दी स्वीकार नहीं कर पाते, मगर परमेश्वर पूरी तरह से दिल खोलकर हमारे साथ सहभागिता करता है। कभी-कभी वो उपमाओं और मिसालों के ज़रिए हमें कहानियां सुनाता है, हर नज़रिये और हर तरीके से हमें राह दिखाता है। इसी तरह हम सत्य को समझकर उसमें प्रवेश कर सकते हैं। परमेश्वर हमारे जीवन की जिम्मेदारी लेता है, वो हमें पूर्ण बनाये बिना नहीं रुकेगा। परमेश्वर के स्वभाव और उसके सच्चे इरादों को जानना वाकई प्रेरणादायक था। मगर जब मैंने परमेश्वर के साथ अपने व्यवहार और कर्तव्य निभाने के दौरान अपने बर्ताव के बारे में सोचा, मैंने पछतावे से भर गया। अब मैं अपने कर्तव्य में लापरवाह नहीं बनना चाहती थी। मैंने परमेश्वर के सामने जाकर प्रार्थना की, परमेश्वर, मैं अपने कर्तव्य में लापरवाह होने को कैसे रोकूँ, अपना कर्तव्य अच्छे से कैसे निभाऊं।

फिर मैंने परमेश्वर के वचनों के इस अंश को पढ़ा: "कर्तव्य क्या है? यह परमेश्वर द्वारा लोगों को सौंपा गया एक आदेश है। तो तुम्हें अपना कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए? व्यक्तिपरक मानवीय इच्छाओं के आधार पर नहीं बल्कि परमेश्वर की अपेक्षाओं और मानकों के अनुसार काम कर तथा सत्य के सिद्धांतों पर अपना व्यवहार आधारित कर। इस तरह तुम्हारा अपने कर्तव्य को करना मानकों के स्तर का होगा" "गंभीरता से लेने का क्या अर्थ है? गंभीरता से लेने का अर्थ यह नहीं है कि थोड़ी-सी मेहनत कर लो, या कोई शारीरिक यातना झेल लो। मुख्य बात यह है कि तुम्हारे दिल में परमेश्वर, और एक दायित्व-भार हो। तुम्हारे दिल में तुम्हें अपने कर्तव्य के महत्त्व को तोलना चाहिए, और फिर इस भार को, इस दायित्व को अपने हर काम में उठाए रखना चाहिए और अपना दिल इसमें लगाना चाहिए। तुम्हें स्वयं को उस लक्ष्य के योग्य बनाना चाहिए जो परमेश्वर ने तुम्हें प्रदान किया है, साथ ही तुम्हें खुद को परमेश्वर ने तुम्हारे लिए जो कुछ भी किया है उसके योग्य, और तुमसे उसकी उम्मीदों के योग्य भी बनाना चाहिए। केवल ऐसा करना ही गंभीर होना है। सिर्फ लापरवाही से काम करने से कुछ न होगा; तुम लोगों को छल सकते हो, पर तुम परमेश्वर को बेवकूफ़ नहीं बना सकते। यदि कर्तव्य को करते समय, कोई सच्चा मूल्य न हो, तुम्हारी कोई निष्ठा न हो, तो यह मानक के अनुसार नहीं है" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। इससे मेरे दिल में यह बात साफ़ हो गई कि हमारा कर्तव्य परमेश्वर ने हमें सौंपा है। हमें उसकी अपेक्षाओं और सत्य के अनुसार काम करना चाहिए। हम अपनी पसंद-नापसंद नहीं चुन सकते या अंधाधुंध अपनी इच्छाओं के मुताबिक नहीं चल सकते। अपने कर्तव्य में हमें कुछ मानकों पर खरा उतरना होगा। सिर्फ़ कड़ी मेहनत करते हुए दिखने से काम नहीं चलेगा। सबसे बड़ी बात कि हमें जिम्मेदारी की समझ होनी चाहिए, मेहनती और ईमानदार बनना चाहिए, अपने अंदर सुधार लाने के तरीके खोजने चाहिए। तभी हम अपना कर्तव्य निभाते हुए परमेश्वर को खुश कर पाएंगे। फिर, जब मैं एक गीत बना रही थी, तो मैंने उसके बोलों को अच्छी तरह से देखा, मुझे कुछ ऐसे गीत मिले जो उनके मिजाज़ से मेल खाते थे। मैंने ध्यान दिया कि दूसरे लोग इसी भाव को दिखाने के लिए कैसी धुन इस्तेमाल करते हैं, मैंने गीत के बोलों के अर्थ, मिजाज़ और धुन के निर्देशन पर ध्यान दिया। इन बातों को समझने के बाद, मैंने गीत रचना शुरू की। बाद में, मैंने भाई-बहनों से सलाह भी माँगी. रचना में दो बार सुधार किया और फिर वह गीत तैयार हो गया। इसे पूरा करने में बस कुछ ही हफ़्ते लगे। एक और गीत में मैंने सुधार किया था जिसे मंज़ूर कर लिया गया। जब मैंने देखा इन रचनाओं को पूरा करने में कितना कम समय लगा, तो मुझे और भी अफ़सोस और पछतावा हुआ कि पहले मैंने अपने काम में कितनी लापरवाही की थी। मैंने जाना कि शैतान ने मुझे कितना अधिक भ्रष्ट कर दिया था, मेरी अशुद्धियां कितनी गंभीर थीं और मैं अपने काम में कितनी लापरवाह थी। परमेश्वर की व्यवस्थाओं और भाई-बहनों द्वारा निपटान के कारण ही, आखिर मैं अपने भ्रष्ट स्वभाव को ठीक करने के लिए सत्य की खोज कर पायी और समर्पण के साथ अपना कर्तव्य पूरा किया। परमेश्वर का धन्यवाद!

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