सत्य का अनुसरण कैसे करें (33)

आज, आओ हम पहले एक प्रश्न पर विचार करें। परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख करता है—क्या यह एक तथ्य है? (हाँ।) चूँकि परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख करता है, तो वह अभी भी मनुष्य को क्यों परखता है? क्या तुम लोगों ने इस प्रश्न पर विचार किया है? (नहीं।) तुम लोगों ने इस पर विचार नहीं किया है, अब जबकि यह प्रश्न उठाया गया है तो तुम लोग क्या सोचते हो? क्या तुम लोगों को इस मामले की कोई समझ है? (यद्यपि परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख करता है, फिर भी हमें शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही देनी है, ताकि शैतान परमेश्वर के प्रति हमारे सच्चे दिल और उसके प्रति हमारी वफादारी को देख सके। इस प्रकार, यह परख हमें शैतान के सामने गवाही देने का अवसर भी देती है।) पिछली बार हमने जिस पर संगति की थी, यह उसका एक पहलू है। इसके अलावा, तुम लोग और क्या सोच सकते हो? (मैंने भी एक बात सोची : यद्यपि परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख करता है, पर वह मनुष्य को परखने के लिए परिवेशों का इंतजाम भी करता है, जिससे मनुष्य वास्तव में चीजों का अनुभव कर सके और उन परिवेशों में, अपने स्वयं के भ्रष्ट स्वभावों के खिलाफ लगातार लड़ सके और अपनी देह से लगातार विद्रोह कर सके, ताकि वह सत्य का अभ्यास कर सके और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कर सके। यह एक व्यावहारिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक सृजित प्राणी सत्य प्राप्त करता है।) और किसके पास इसकी कोई समझ है? क्या तुम लोग आमतौर पर बोलने में बहुत अच्छे नहीं हो? तो फिर, किसी वास्तविक मुद्दे का सामना होने पर तुम लोगों में कोई समझ क्यों नहीं होती? क्या तुम लोग जानते हो कि मैंने अभी जिस प्रश्न का जिक्र किया है, उसमें क्या शामिल है? इसमें परमेश्वर के कार्य करने का तरीका शामिल है और इसमें परमेश्वर के इरादों को जानना भी शामिल है। तो तुम लोग इससे क्या समझ प्राप्त कर सकते हो? यदि तुम लोगों को इतने बड़े मामले की कोई समझ नहीं है तो यह साबित करता है कि तुम लोग इन वास्तविक मुद्दों पर विचार नहीं करते, सत्य को समझना और वास्तविकता में प्रवेश करना तो दूर की बात है। इसलिए, जब तुम लोग ऐसे मुद्दों का सामना करते हो तो तुम लोगों को उनका कोई प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता और परिणामस्वरूप तुम किसी समझ के बारे में बात नहीं कर सकते। और कौन इस प्रश्न के बारे में अपनी समझ पर बात करना चाहेगा? चूँकि परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख करता है और वह जानता है कि लोग सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हैं, लगन से अपने कर्तव्य निभाने के इच्छुक हैं और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने के इच्छुक हैं तो क्या इतना पर्याप्त नहीं है? परमेश्वर फिर भी मनुष्य को क्यों परखता है? ऐसा करके परमेश्वर अंततः क्या प्रभाव प्राप्त करना चाहता है? (मुझे लगता है कि परमेश्वर मनुष्य को परीक्षणों और शोधन से गुजारने के वास्ते परिवेशों का इंतजाम इसलिए करता है कि वह सत्य को लेकर मनुष्य के भीतर कार्य कर सके और सत्य को उसका जीवन बना सके; यह अपेक्षाकृत एक व्यावहारिक प्रक्रिया है।) क्या यह सही है? (हाँ। मैं एक बात और जोड़ना चाहूँगा : मुझे लगता है कि मनुष्य को परखने का परमेश्वर का कार्य, एक लिहाज से, मनुष्य को परीक्षणों और शोधन के अनुभव से गुजारकर सत्य को उसके भीतर गढ़ने का काम करता है, और दूसरे लिहाज से, यह मनुष्य में परमेश्वर की इच्छा पूरी करने का काम करता है।) तुम लोग कहते हो कि परमेश्वर मनुष्य को इसलिए परखता है ताकि मनुष्य परमेश्वर की इच्छा पूरी कर सके, लेकिन क्या मनुष्य परमेश्वर की इच्छा पूरी कर सकता है? (नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकता।) तुम लोगों ने इतने वर्षों तक उपदेश सुने हैं, फिर भी तुम्हें अधिकांश चीजों की कोई समझ नहीं है, विशेषकर तब जब तुम्हारे दैनिक जीवन के वास्तविक मुद्दों की बात आती है। चाहे कुछ भी घटित हो जाए, अधिकांश लोग केवल ऊँची-ऊँची बातें करना और खोखले धर्म-सिद्धांतों और सिद्धांतों के बारे में बात करना ही जानते हैं। कुछ लोग तो ऐसी बातें भी कहते हैं जो बिल्कुल मुद्दे से अलग होती हैं, जिनका सत्य से, वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता—यहाँ तक कि दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता। यद्यपि कुछ लोगों ने भी इन प्रश्नों पर विचार नहीं किया है, फिर भी उन्हें कुछ वास्तविक मुद्दों की थोड़ी-बहुत समझ तो है, है ना? तुम लोगों के उत्तरों से ऐसा लगता है कि सामान्य समय में अपने वास्तविक जीवन में तुम लोगों ने अभ्यास से संबंधित अधिकांश सत्यों में कोई प्रवेश नहीं किया है और इसलिए तुम्हें उनका कोई अनुभव नहीं है। तुम चाहे किसी भी वास्तविक मुद्दे का सामना करो, तुम्हारे पास बात करने के लिए कोई समझ नहीं होती और तुम केवल धर्म-सिद्धांतों के बारे में बात करना जानते हो; जब भी कुछ घटित होता है, तुम धर्म-सिद्धांतों के साथ प्रतिक्रिया देते हो। इसलिए, किसी भी कार्य में या कर्तव्य के किसी भी क्षेत्र में, तुम जो कर सकते हो वह बहुत सीमित है, यहाँ तक कि तुम जो सीमित चीजें करने में सक्षम हो भी, वे भी सत्य सिद्धांतों के अनुसार नहीं हैं। सत्य सिद्धांत अधिकांश लोगों की समझ से बाहर हैं, अधिकांश लोग उन्हें समझ भी नहीं सकते, इससे भी बढ़कर वे सिद्धांतों के अनुसार अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ हैं। अभी पूछे गए प्रश्न के संबंध में, “परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख करता है तो वह अभी भी मनुष्य को क्यों परखता है?” तुम लोगों में से अधिकांश को कोई समझ नहीं थी, लेकिन एक बार जब कुछ व्यक्तियों ने कुछ समझ व्यक्त की, तो तुम लोगों में से अधिकांश अभी भी अपने दिलों में पुष्टि प्राप्त कर सकते हो और यह निर्धारित कर सकते हो कि किसने अधिक सटीकता से और तुलनात्मक रूप से तथ्यों के अनुसार बात की थी। तो इस प्रश्न को वास्तव में कैसे समझा जाना चाहिए? हमें इस पर संगति करने की आवश्यकता है।

मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख करना एक ऐसी क्षमता है जो स्वयं परमेश्वर के पास है। परमेश्वर को मानवजाति की, सृजित प्राणियों की बहुत ही गहरी समझ है; यह पूरी तरह से सटीक है; इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता। चाहे तुमने इसका अनुभव किया हो या नहीं, चाहे तुमने इसकी कोई समझ प्राप्त की हो या नहीं, और चाहे तुमने कभी इसे महसूस किया हो या नहीं, बात चाहे जो भी हो, यह एक तथ्य है कि परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख करता है। चूँकि परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख करता है, इसलिए स्वाभाविक रूप से उसे मनुष्य की विशेष रूप से गहरी समझ है। मनुष्य की काबिलियत और सहज प्रवृत्तियाँ कैसी हैं, उसका आध्यात्मिक कद कितना बड़ा है, वह क्या कर सकता है और क्या नहीं कर सकता, उसमें कौन-से भ्रष्ट स्वभाव हैं—परमेश्वर इन सभी चीजों को पूरी तरह जानता है; परमेश्वर के लिए ये चीजें सर्वथा स्पष्ट हैं! तो फिर परमेश्वर अभी भी मनुष्य को लगातार क्यों परखता है? इस परख का उद्देश्य क्या है? परमेश्वर चाहता है कि मनुष्य अपने स्वयं के व्यवहार और अभिव्यक्तियों के माध्यम से उसे उत्तर दे। परमेश्वर देखना चाहता है कि मनुष्य का संकल्प, उसकी इच्छाएँ, उसकी प्रार्थनाएँ या परमेश्वर के सामने खाई गई उसकी कसमें पुष्टि प्राप्त करें। परमेश्वर की नजर में, यह एक आवश्यक प्रक्रिया है; इसका संबंध इस बात से है कि परमेश्वर मनुष्य को कैसे बचाता है और वह कैसे अपने वचनों को लेता है और कैसे सत्य को लेता है, और उन्हें मनुष्य में गढ़ता है। पिछली बार, हमने इस बात के एक हिस्से पर भी संगति की थी कि परमेश्वर मनुष्य को क्यों परखता है, यह उल्लेख करते हुए कि वह मनुष्य को इसलिए परखता है क्योंकि उसे आवश्यकता है कि मनुष्य उसकी गवाही दे। लेकिन यह कारण का एक बहुत ही छोटा हिस्सा है। मुख्य कारण यह है कि परमेश्वर का इरादा यह है कि परखने के द्वारा मनुष्य परमेश्वर के वचनों को ले, सत्य को ले और उसका अभ्यास करे और उसे अपनी स्वयं की वास्तविकता में बदल दे। उद्देश्य यह नहीं है कि मनुष्य केवल एक छाप या कुछ विचारों, इरादों या संकल्पों के साथ परमेश्वर के वचनों को पढ़ना समाप्त कर दे। बल्कि, इसका उद्देश्य यह है कि मनुष्य, परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, उन पर विचार और संगति करे और इस प्रकार सत्य को समझे और सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हो सके ताकि यह उसकी जीवन वास्तविकता बन जाए। तो परमेश्वर मनुष्य का अभ्यास क्यों चाहता है? यह अभ्यास मनुष्य के उद्धार प्राप्त करने के लिए अहम है। यह एक आवश्यक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से परमेश्वर सत्य को लेता है और इसे मनुष्य के भीतर गढ़ता है। एक लिहाज से, सत्य का अभ्यास करके मनुष्य अपने भ्रष्ट स्वभावों को उतार फेंकने में सक्षम होता है; दूसरे लिहाज से, वह वास्तव में उस चीज का अनुभव करता है जिसके बारे में परमेश्वर के वचन बात करते हैं, वह वास्तव में अनुभव करता है कि परमेश्वर के अपेक्षित मानक क्या हैं और उसके इरादे क्या हैं और वह अपने भ्रष्ट स्वभावों को उतार फेंकने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने की प्रक्रिया का भी वास्तव में अनुभव करता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से, परमेश्वर के वचन और सत्य मनुष्य के भीतर गढ़ दिए जाते हैं। बेशक, यह कोई ऐसा नतीजा नहीं है जिसे एक या दो बार सत्य का अभ्यास करके प्राप्त किया जा सकता है; बल्कि, मनुष्य को लंबे समय तक सत्य के हर पहलू का अभ्यास करना होगा और उसमें प्रवेश करना होगा। इस दीर्घकालिक प्रक्रिया में, जैसे-जैसे मनुष्य लगातार अनुभव करता है और लगातार परिस्थितियों से गुजरता है, उसके भ्रष्ट स्वभावों का धीरे-धीरे अलग-अलग सीमा तक समाधान हो जाता है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभावों का समाधान होना अभी भी वह अंतिम नतीजा नहीं है जिसे परमेश्वर उसे परखकर हासिल करना चाहता है। अंतिम नतीजा क्या है? परमेश्वर मनुष्य में जो पूरा करना चाहता है, वह यह है कि सत्य उसके भीतर असर करे, इसके माध्यम से उसे उसके भ्रष्ट स्वभावों से छुटकारा दिलाए और फिर सत्य को लेकर उसे उसका जीवन बना दे; यह अंतिम नतीजा है। जब सत्य मनुष्य का जीवन बन जाता है, तो उसके भ्रष्ट स्वभावों का जड़ से समाधान हो जाता है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभावों का जड़ से समाधान होना वह अंतिम नतीजा है जिसे मनुष्य उद्धार के मार्ग पर चलकर हासिल करता है। यह परमेश्वर द्वारा मनुष्य को परखने का मुख्य कारण है। इसलिए, जब कुछ लोग कहते हैं कि “परमेश्वर मनुष्य को परखता है, एक लिहाज से ऐसा इसलिए क्योंकि उसे आवश्यकता है कि मनुष्य उसकी गवाही दे, और दूसरे लिहाज से इसलिए कि मनुष्य परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चले,” तो वे जिन दो बिंदुओं के बारे में बात करते हैं, वे वास्तव में परमेश्वर की प्रबंधन योजना और मनुष्य को पूर्ण करने और मनुष्य को उद्धार प्राप्त करने में सक्षम बनाने के उसके उद्देश्य की तुलना में बहुत महत्वपूर्ण नहीं हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य को परखने की प्रक्रिया के दौरान, परमेश्वर का इरादा अपने वचनों को लेकर और सत्य को लेकर उन्हें मनुष्य के भीतर गढ़ना है। अंतिम नतीजा परमेश्वर के वचनों को और सत्य को मनुष्य का जीवन बनने में सक्षम बनाना है, ताकि वे उसके पुराने जीवन—उसके भ्रष्ट स्वभावों—की जगह ले सकें। क्या तब मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त नहीं कर लिया जाएगा? (हाँ।) मनुष्य का अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाना, यही वह नतीजा है जिसे परमेश्वर उसे परखकर हासिल करना चाहता है। यह परख कई रूपों में होती है। कभी-कभी परमेश्वर तुम्हें परीक्षणों और शोधन से गुजारने के लिए किसी परिवेश का उपयोग करता है; कभी-कभी वह तुम्हें ताड़ना देने और तुम्हारा न्याय करने के लिए किसी परिवेश का उपयोग करता है; और कभी-कभी वह तुम्हें प्रेरित करने और तुम्हें चेतावनी देने के लिए किसी परिवेश का उपयोग करता है। कभी-कभी वह तुम्हें याद दिलाने, तुम्हें चेतावनी देने और तुम्हारी काट-छाँट करने के लिए अन्य लोगों का उपयोग करता है; और कभी-कभी वह स्पष्ट रूप से तुम्हें फटकारने, तुम्हें ताड़ना देने और तुम्हें अनुशासित करने के लिए अपने वचनों का उपयोग करता है या यहाँ तक कि स्पष्ट रूप से तुम्हारा न्याय करने और तुम्हारे विद्रोहीपन को उजागर करने के लिए अपने वचनों का उपयोग करता है। ये सभी वे तरीके हैं जिनसे परमेश्वर मनुष्य को परखता है; मनुष्य को परखने के परमेश्वर के तरीके अनेक और विविधतापूर्ण हैं। तो फिर, वे कौन-सी शर्तें हैं जिनके तहत परमेश्वर मनुष्य को परखता है? परमेश्वर द्वारा तुम्हें परखे जाने के लिए तुम्हें कौन-सी शर्तें पूरी करनी होंगी? तुम्हारे पास जीवन प्रवेश होना चाहिए। परमेश्वर तुम्हारी जाँच-परख करता है; वह जानता है कि तुम अपने दिल में क्या सोच रहे हो और वह जानता है कि तुम्हारा प्रकृति सार कैसा है। हालाँकि, यदि तुम्हारे पास कोई जीवन प्रवेश नहीं है—दूसरे शब्दों में, यदि तुम आमतौर पर सत्य का अनुसरण नहीं करते हो और किसी भी चीज में सत्य सिद्धांतों को नहीं खोजते हो—भले ही परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध करे और तुम्हारा मार्गदर्शन करे ताकि तुम्हें सत्य के किसी पहलू को समझने में मदद मिल सके, तुम उदासीन बने रहते हो, तुम भीतर से प्रेरित नहीं होते हो और न तो तुम्हारे दिल में और न ही तुम्हारी व्यक्तिपरक चेतना में सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने का तुम्हारा कोई इरादा होता है। ऐसा है तो, मनुष्य को परखने के परमेश्वर के विभिन्न तरीके शायद ही कभी तुम पर आएँगे। यह क्या दर्शाता है? यह दर्शाता है कि तुम अभी भी श्रम करने के चरण में हो और तुमने अभी तक उद्धार के मार्ग पर चलना शुरू नहीं किया है। यह किस बात का संकेत है? कि तुम अभी भी श्रम कर रहे हो! श्रम करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि जब तुम अपना वह थोड़ा-सा कर्तव्य निभाते हो और उन कार्यों को करते हो तो यह केवल मशक्कत करना है और इसका सत्य सिद्धांतों से कोई लेना-देना नहीं है। चूँकि तुम केवल मशक्कत कर रहे हो, इसलिए अभ्यास के सिद्धांतों की कोई बात नहीं होती और न ही सत्य सिद्धांतों को खोजने की कोई बात होती है। इतना ही पर्याप्त है कि तुम मशक्कत कर सको, गड़बड़ न करो, बाधा न डालो, जानबूझकर व्यवस्था को भंग न करो, जानबूझकर किसी चीज को नुकसान न पहुँचाओ और जानबूझकर किसी भी प्रकार के उपकरण को क्षतिग्रस्त न करो। तुमसे की गई अपेक्षाएँ बहुत ऊँची नहीं हैं; इतना ही पर्याप्त है कि तुम मशक्कत कर सको, बाधा न डालो और बाहरी तौर पर उचित रूप से अच्छे व्यवहार करने वाले दिखो। तुमसे यही मानक अपेक्षित है। तुमसे ऐसे मानक की अपेक्षा क्यों की जाती है? क्योंकि तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते हो, आमतौर पर तुम्हारे पास कोई जीवन प्रवेश नहीं होता है और तुम किसी भी चीज में सत्य नहीं खोजते हो। कुछ लोग कहते हैं, “यद्यपि जब चीजें होती हैं तो हम सत्य नहीं खोजते, लेकिन हमने किसी सिद्धांत का उल्लंघन नहीं किया है। परमेश्वर का घर हमसे जो भी करने के लिए कहता है, हम वही करते हैं, हम आज्ञाकारी रहे हैं और हमने अपने कार्य पूरे किए हैं। हमने जानबूझकर कोई गड़बड़ या बाधा भी पैदा नहीं की है, तो तुम कैसे कह सकते हो कि हम श्रम कर रहे हैं?” क्या यह कहना कि ये लोग श्रम कर रहे हैं, उनके साथ अन्याय करना है? (नहीं।) लोग धर्म-सैद्धांतिक रूप से जानते हैं कि ऐसा नहीं है, लेकिन कुछ लोग अभी भी अपने दिलों में आश्वस्त नहीं हैं। ऐसा क्यों कहा जाता है कि ये लोग श्रम कर रहे हैं? (अंत के दिनों में परमेश्वर के देह धारण करने और सत्य व्यक्त करने का मुख्य उद्देश्य हमें सत्य को स्वीकार करने, सत्य का अभ्यास करने और सत्य को अपने जीवन के रूप में प्राप्त करने देना है। यदि हम बिना सिद्धांतों के अपने कर्तव्य निभाते हैं तो उन्हें निभाने का सत्य से कोई लेना-देना नहीं है और इसे केवल श्रम करना ही कहा जा सकता है।) ये बातें सुनकर, कुछ लोग इन्हें स्वीकार नहीं कर पाते और कहते हैं, “हमने इतने वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास किया है और अपने कर्तव्य निभाने में इतनी बड़ी कीमत चुकाई है, तो हम अभी भी श्रम कैसे कर सकते हैं? हम इस बात से आश्वस्त नहीं हैं! क्या परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख नहीं करता है? फिर भी परमेश्वर नहीं जानता कि उसके प्रति हमारे दिल कैसे हैं और वह हमें नहीं समझता! यदि परमेश्वर हमें नहीं समझता तो यह कैसे कहा जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख करता है? यदि परमेश्वर मनुष्य को नहीं समझता तो वह आसानी से मनुष्य के साथ अन्याय कर सकता है।” ऐसा व्यक्ति मानता है कि परमेश्वर ने उसके साथ अन्याय किया है; क्या उसके लिए ऐसा सोचना सही है? (नहीं।) वह स्वीकार करता है कि परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख करता है, फिर भी कहता है कि परमेश्वर ने उसके साथ अन्याय किया है। क्या वह सचमुच स्वीकार करता है कि परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख करता है? (नहीं। यदि वह मानता है कि परमेश्वर ने उसके साथ अन्याय किया है तो भले ही वह कहे, “परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख करता है,” यह कोई सच्ची समझ नहीं है।) परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख करता है, तो क्या वह लोगों की विभिन्न अवस्थाओं और सार को समझता है? (वह समझता है।) चूँकि परमेश्वर समझता है तो क्या वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करने वाले कई लोगों को अभी भी श्रम करने वाले लोग ठहराना—ऐसे लोग ठहराना जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं और जिन्होंने उद्धार के मार्ग पर चलना शुरू नहीं किया है—सटीक है? (यह सटीक है।) यह किस पर आधारित है? (हमारी वास्तविक अवस्थाओं पर। परमेश्वर जिन परिवेशों का इंतजाम करता है, उनमें हम अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करने के लिए सत्य नहीं खोजते और हम सत्य सिद्धांतों के बिना अपने कर्तव्य निभाते हैं, इसलिए मुझे लगता है कि परमेश्वर का हमें ऐसे निरूपित करना सही है।) तुम लोग अभी भी इस मामले की असलियत नहीं देख सकते।

इन वर्षों में, मैंने इतने सारे सत्य बोले हैं और इतने सारे सत्य सिद्धांतों पर संगति की है—क्या तुम लोग उनका अभ्यास करने के इच्छुक हो? (हाँ।) तुम लोग सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हो तो क्या तुम लोगों ने कभी इस बारे में प्रार्थना की है और परमेश्वर के सामने संकल्प लिए हैं या कसमें खाई हैं? (कभी-कभी मैं कसमें खाता हूँ और संकल्प लेता हूँ।) अधिकांश लोग अपने दिलों में सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक होते हैं, वे अक्सर प्रार्थना करते हैं और संकल्प लेते हैं और वे परमेश्वर के सामने कसमें भी खाते हैं; कुछ तो परमेश्वर से उन्हें अनुशासित करने के लिए भी कहते हैं। लेकिन क्या इस इच्छा का अर्थ यह हो सकता है कि लोगों के पास सत्य वास्तविकता है? क्या यह उनके सत्य का अभ्यास करने की जगह ले सकती है? (नहीं।) यह उनके सत्य का अभ्यास करने की जगह नहीं ले सकती। देखो, क्या अधिकांश लोग इसी अवस्था में नहीं हैं? जब सत्य का अभ्यास करने या सत्य के किसी पहलू पर संगति करने की बात आती है, जहाँ तक लोगों के व्यक्तिपरक इरादों का सवाल है, कोई भी इसके प्रति प्रतिरोध नहीं रखना चाहता; वे सभी सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक होते हैं। उदाहरण के लिए, एक ईमानदार व्यक्ति बनना, लगन से अपना कर्तव्य निभाना, खानापूरी न करना, सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग करना, काम करते समय गड़बड़ या बाधा पैदा न करना और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने और परमेश्वर की गवाही बनाए रखने में सक्षम होना, आदि—लोग इन सभी सत्यों का अभ्यास करने और इनमें प्रवेश करने के इच्छुक होते हैं। यदि तुम पूछो, “कौन सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक नहीं है?” तो कोई अपना हाथ नहीं उठाएगा; हर कोई इसका अभ्यास करने का इच्छुक है। यदि तुम फिर पूछो, “तुम इसका अभ्यास कब से शुरू करने की योजना बना रहे हो?” तो वे कहेंगे, “मैं अभी से इसका अभ्यास करना शुरू कर दूँगा।” लेकिन बाद में, वे कोई वास्तविक कार्रवाई नहीं करते; वे अभी भी अपने दिलों में सोचते रहते हैं, “परमेश्वर, मैं सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक हूँ।” वे न केवल परमेश्वर के सामने इस तरह प्रार्थना करते हैं, बल्कि वे सभी के सामने अपना संकल्प और अपनी इच्छाएँ भी व्यक्त करते हैं और कभी-कभी तो खुद को इतना भावुक कर लेते हैं कि उनके चेहरों पर आँसू बहने लगते हैं और उनका गला रुँध जाता है। भावुक होना एक बात है, लेकिन क्या वे वास्तव में सत्य का अभ्यास कर सकते हैं, यह कहना कठिन है। कुछ लोग हमेशा सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक होने के चरण में ही रहते हैं; जब भी उनसे पूछा जाता है, वे कहते हैं कि वे अभ्यास करने के इच्छुक हैं, बिल्कुल एक बच्चे की तरह जो किसी वयस्क की बातें बोल रहा हो। उदाहरण के लिए, कुछ माता-पिता अपने बच्चे से पूछते हैं कि क्या वह बड़ा होने पर अपने माता-पिता का भरण-पोषण करने के लिए पैसे कमाने का इच्छुक होगा और बच्चा कहता है, “हाँ!” लेकिन क्या वह बड़ा होने पर वास्तव में अपने माता-पिता का भरण-पोषण करेगा, यह एक अलग बात है। किसी बच्चे को यह कहते हुए सुनने के बाद कि वह अपने माता-पिता का भरण-पोषण करने का इच्छुक है, कुछ माता-पिता इन बातों को गंभीरता से ले लेते हैं और अपनी सारी उम्मीदें बच्चे पर लगा देते हैं, यहाँ तक कि उसके लिए जी-तोड़ मेहनत करने के लिए भी तैयार रहते हैं। वास्तव में, बच्चा केवल बड़ी-बड़ी बातें कर रहा होता है; वह स्वयं भी नहीं समझता कि इस “इच्छा” का क्या अर्थ है। वह बस यही सोचता है कि अगर उसके माता-पिता इसे सुनकर खुश और संतुष्ट हैं, उसकी “इच्छा” पूरी हो गई है। वह नहीं जानता कि बड़े होने पर इस “इच्छा” की खातिर उसे क्या-क्या कष्ट सहने होंगे, क्या कीमत चुकानी होगी या किन जिम्मेदारियों और दायित्वों को पूरा करना होगा। वह नहीं जानता कि इस “इच्छा” को अभ्यास में कैसे लाया जाना चाहिए, इसे कैसे पूरा किया जाना चाहिए या इसे वास्तविकता में कैसे बदला जाना चाहिए। बच्चा केवल बड़ी-बड़ी बातें कर रहा होता है और बात वहीं खत्म हो जाती है; जब वह बड़ा होता है तो वह बचपन में कही गई बातों को पूरी तरह भूल जाता है और उन्हें हवा में उड़ा देता है। वास्तविक जीवन में पैसे कमाना आसान नहीं है; वास्तविकता बहुत कठोर है, चाहे वह कोई भी काम करे, कुछ भी आसानी से नहीं होता। तो, क्या बचपन में कही गई उसकी बातें, “मैं अपने माता-पिता का भरण-पोषण करने का इच्छुक हूँ,” पूरी की जा सकती हैं? (इन्हें पूरा करना आसान नहीं है।) तुम लोगों में से अधिकांश भी इसी अवस्था में हो; तुम परमेश्वर के लिए केवल श्रम करने के अनिच्छुक हो और परमेश्वर के लिए लगन से खुद को खपाने के इच्छुक हो, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने के इच्छुक हो, सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने के इच्छुक हो और सत्य सिद्धांतों के अनुसार सब कुछ करने के इच्छुक हो। हालाँकि, केवल इच्छुक होने तक ही रुक जाना तुम्हारी वास्तविकता को नहीं दर्शाता और यह तुम्हारी वास्तविकता नहीं है; इन क्षेत्रों में तुम्हारे पास कोई वास्तविकता नहीं है। लोग केवल इच्छुक होने तक ही रुक जाते हैं और फिर सोचते हैं, “चूँकि मैं इच्छुक हूँ, इसलिए मुझे वफादार माना जाता है और यह माना जाता है कि मैंने सत्य का अभ्यास किया है। चूँकि मुझमें यह संकल्प है, इसलिए मैं अपने भ्रष्ट स्वभावों को उतार फेंक सकता हूँ और परमेश्वर के इरादों को पूरा कर सकता हूँ।” उनका मानना है कि इच्छुक होने का अर्थ यह है कि सत्य पहले से ही उनके जीवन के रूप में मौजूद है और उनके पास पहले से ही सत्य वास्तविकता है। वे नहीं जानते कि उनकी यह “इच्छा” केवल उनकी इच्छाओं और विचारों तक ही सीमित रहता है; इसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है, इसके और सत्य का अभ्यास करने के बीच, साथ ही इसके और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने के बीच अभी भी कुछ दूरी है। यद्यपि तुम सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हो, फिर भी तुम इसे अभ्यास में नहीं लाए हो और तुम्हारी कोई वास्तविक अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं, इसलिए तुम अभी भी अपने व्यक्तिपरक इरादों की कल्पनाओं में रहते हो और तुम अभी भी उस चरण में जीते हो जहाँ तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव तुम्हारे विचारों और व्यवहार को निर्देशित करते हैं। जब तक तुम इस चरण में रहते हो, क्या तुम्हारी इच्छा तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों पर विजय पा सकती है? (नहीं।) तुम चाहे किसी भी परिस्थिति का सामना करो, तुम अभी भी अपने भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार जीते हो। उदाहरण के लिए, जब तुम अपना कर्तव्य निभाने में किसी के साथ सहयोग करते हो तो तुम सोचते हो कि यदि तुम उसके साथ सहयोग करोगे और चीजों पर चर्चा करोगे तो यह तुम्हें उससे कमतर दिखाएगा और इस तरह, तुम अपना रुतबा और प्रतिष्ठा खो दोगे। इसलिए, तुम उसके साथ सहयोग नहीं करते और तुम सारे निर्णय खुद लेते हो। जब तुम किसी को अपना कर्तव्य निभाने में खानापूरी करते हुए देखते हो तो तुम उसे उजागर नहीं करते या उसकी काट-छाँट नहीं करते, मन ही मन सोचते हो, “आमतौर पर इस व्यक्ति के साथ मेरा संबंध अच्छा है। यदि वह खानापूरी करता है, तो करने दो; वैसे भी, मेरे व्यक्तिगत हितों को कोई नुकसान नहीं पहुँचा है। मैं बस कुछ इशारे करूँगा और उसे थोड़ी सलाह दूँगा—इतना काफी होगा; यदि वह पश्चात्ताप नहीं करता है तो मैं कुछ और समय तक उसका अवलोकन करूँगा और उसके लिए थोड़ी गुंजाइश छोड़ दूँगा।” तुम चाहे किसी भी परिस्थिति का सामना करो, तुम सत्य का अभ्यास नहीं करते। तुम्हारी वह “इच्छा” बस एक अपेक्षाकृत सकारात्मक विचार है; यह बिल्कुल भी तुम्हारी वास्तविकता नहीं है। तुमने बिल्कुल भी सत्य का अभ्यास नहीं किया है और न ही तुमने सत्य वास्तविकता में प्रवेश किया है। जब भी तुम किसी ऐसी परिस्थिति का सामना करते हो जिसके लिए तुम्हें सत्य का अभ्यास करने की आवश्यकता होती है तो तुम हमेशा अपने भ्रष्ट स्वभावों के आधार पर उसके साथ व्यवहार करते हो और उसे सँभालते हो; तुम सत्य सिद्धांतों को नहीं खोजते और न ही तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश करते हो। और अपने दिल में तुम लगातार सोचते हो, “मैं सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक हूँ, मैं परमेश्वर से प्रेम करने का इच्छुक हूँ और मैं परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का इच्छुक हूँ,” और इसलिए तुम यह मान लेते हो कि तुमने खुद पहले ही सत्य का अभ्यास कर लिया है, खुद परमेश्वर से प्रेम कर लिया है और खुद परमेश्वर के प्रति समर्पण कर दिया है। यहाँ तक कि तुम खुद को परिभाषित भी करते हो, खुद को “सत्य का अभ्यास करने वाला और सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति” जैसी शानदार उपाधि देते हो। तुम खुद को धोखा दे रहे हो और तुम परमेश्वर को भी धोखा दे रहे हो। तुम चाहे किसी भी परिस्थिति का सामना करो, तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश नहीं करते और तुम समस्याओं को हल करने के लिए सत्य का उपयोग नहीं करते, फिर भी तुम परमेश्वर के सामने संकल्प लेते हो : “परमेश्वर, मैं तुम्हारे प्रति वफादार होने का इच्छुक हूँ, मैं तुम्हारे प्रति समर्पण करने का इच्छुक हूँ, मैं तुमसे प्रेम करने का इच्छुक हूँ और मैं तुम्हारे लिए अपना सब कुछ त्यागने का इच्छुक हूँ।” प्रार्थना करने के बाद, जब परमेश्वर तुम्हारे लिए किसी परिवेश का इंतजाम करता है, तो तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं करते और सत्य का अभ्यास नहीं करते; तुमने अपनी इच्छा को बहुत पहले ही ताक पर रख दिया है। मामला गुजर जाने के बाद, तुम तुरंत फिर से अपना संकल्प व्यक्त करना शुरू कर देते हो : “मैं सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक हूँ, मैं परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का इच्छुक हूँ, मैं परमेश्वर से प्रेम करने का इच्छुक हूँ।” तुम्हारे दिल में लगातार एक आवाज तुमसे कह रही होती है : “चूँकि मैं ये सभी चीजें करने का इच्छुक हूँ, इसलिए मैं कोई श्रमिक नहीं हूँ; मैं परमेश्वर से प्रेम करने वाला व्यक्ति हूँ, ऐसा व्यक्ति जो सत्य का अभ्यास करता है।” तुम खुद को बहुत अच्छी तरह से दिलासा देते हो, लेकिन क्या परमेश्वर तुम्हें इस तरह उसे धोखा देने देता है? (नहीं।) तुम खुद को धोखा दे सकते हो, लेकिन परमेश्वर तुम्हें इस तरह उसे धोखा देने की अनुमति नहीं देगा। तुम खुद को धोखा देने और अपने आस-पास के लोगों को धोखा देने में सक्षम हो सकते हो, लेकिन तुम परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकते। तुम परमेश्वर के सामने बार-बार संकल्प लेते हो : “परमेश्वर, मैं तुम्हारे प्रति समर्पण करने का इच्छुक हूँ, मैं तुम्हें संतुष्ट करने का इच्छुक हूँ!” “परमेश्वर, मैं तुम्हारे लिए खुद को खपाने का इच्छुक हूँ, मैं अपना सर्वस्व तुम्हें अर्पित करने का इच्छुक हूँ!” परमेश्वर के सामने खाई गई अपनी किन कसमों को तुमने अभ्यास में लाया है? तुमने किस कसम को पूरा किया है? एक भी कसम पूरी नहीं की गई है; अंत में, तुम अभी भी इच्छा के चरण में ही रहते हो। इसलिए, तुमने चाहे कितनी भी मशक्कत क्यों न की हो, जब तक तुम इच्छा के चरण में रहते हो, जब तक तुमने सत्य सिद्धांतों को खोजना शुरू नहीं किया है और सत्य का अभ्यास करना शुरू नहीं किया है, तब तक तुम्हारा कोई जीवन प्रवेश नहीं है। क्या जीवन प्रवेश के बिना किसी व्यक्ति के पास जीवन होता है? (नहीं।) बिना जीवन वाला व्यक्ति किस प्रकार की चीज है? वह एक श्रमिक है या परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से एक? क्या वह उन लोगों में से है जिन्हें परमेश्वर बचाता है? क्या वह ऐसा व्यक्ति है जिसे परमेश्वर बचाना चाहता है? क्या वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करता है? (नहीं।) तुम्हारे पास कोई जीवन प्रवेश नहीं है, फिर भी तुम दावा करते हो कि तुम सत्य का अभ्यास करने वाले व्यक्ति हो और दावा करते हो कि तुम श्रमिक नहीं हो। यदि तुम श्रमिक नहीं हो तो फिर तुम क्या हो? क्या तुम परमेश्वर के लोगों में से एक हो या परमेश्वर द्वारा बचाए गए और पूर्ण बनाए गए व्यक्ति हो? (दोनों में से कोई नहीं।) मेरी नजर में, तुम्हें श्रमिक कहना पहले ही तुम्हें तुम्हारी हैसियत से ज्यादा श्रेय देना है; कुछ लोग तो श्रमिक भी नहीं हैं—वे अपना कर्तव्य निभाने में थोड़ी-सी मशक्कत करने से भी कतराते हैं और इसके लिए अनिच्छुक होते हैं। ऐसा मत सोचो कि सिर्फ इसलिए कि तुम लोग थोड़ी-सी मशक्कत करते हो और सत्य का अभ्यास करने की इच्छा रखते हो, तो तुम आशीष और इनाम प्राप्त करने के योग्य हो और तुम्हारे पास पूँजी है जिसके द्वारा तुम परमेश्वर के साथ सौदेबाजी की कोशिश कर सकते हो। तुम लोग अभी भी उद्धार प्राप्त करने से बहुत दूर हो। तुममें से लगभग किसी के पास भी अभी तक कोई स्पष्ट जीवन प्रवेश नहीं है। तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर में विश्वास करने के बाद, अपने कर्तव्य निभाने के लिए अपने परिवार और करियर को पीछे छोड़ देने और परमेश्वर का घर तुम्हारे लिए जो भी व्यवस्था करता है उसे करने का इच्छुक होने का अर्थ यह है कि तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता है। लेकिन वास्तव में, तुम लोगों की उस इच्छा के पीछे क्या छिपा है? तुम लोगों की इच्छा में भारी मिलावट है और परखे जाने पर यह टिक नहीं सकती, इसलिए तुम लोगों को श्रमिक ठहराना तुम्हारे साथ जरा-सा भी अन्याय करना नहीं है। तुम्हारा कोई जीवन प्रवेश नहीं है तो क्या तुम एक श्रमिक नहीं हो? यह पहले से ही बहुत अच्छा है कि मैंने तुम्हें दानव नहीं कहा है। बिना जीवन प्रवेश वाला व्यक्ति बिना जीवन वाला व्यक्ति होता है। कुछ लोगों ने दस वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास किया है लेकिन उनके पास कोई जीवन नहीं है; कुछ ने बीस वर्षों तक विश्वास किया है लेकिन उनके पास कोई जीवन नहीं है; कुछ ने तो तीस वर्षों से अधिक समय तक विश्वास किया है, फिर भी उनके पास कोई जीवन नहीं है। वे कोई वास्तविक कार्य नहीं कर सकते, यहाँ तक कि सबसे सरल और सबसे सतही सत्यों को भी स्पष्ट रूप से समझा नहीं सकते या उन्हें सरलता से व्यक्त नहीं कर सकते—क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके पास कोई जीवन नहीं है? परमेश्वर में विश्वास करने के अपने वर्षों के दौरान, उन्होंने हमेशा यही सोचा है कि वे अपनी आस्था में काफी अच्छा कर रहे हैं, वे अक्सर कहते हैं, “मैं परमेश्वर के लिए भाग-दौड़ करने और खुद को खपाने का इच्छुक हूँ, मैं परमेश्वर के लिए कीमत चुकाने का इच्छुक हूँ और मैं परमेश्वर के प्रति वफादार होने का इच्छुक हूँ। देखो मैंने कितना कुछ अर्पित किया है और परमेश्वर के लिए खुद को कितना खपाया है। मैंने अपना समय और ऊर्जा समर्पित की है और अपने परिवार, पढ़ाई, काम और पैसे को छोड़ दिया है। मुझसे जो भी करने के लिए कहा जाता है, मैं वह करने का इच्छुक हूँ। मैं परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का इच्छुक हूँ, मैं परमेश्वर को संतुष्ट करने का इच्छुक हूँ, मैं काट-छाँट स्वीकार करने का इच्छुक हूँ और मैं ताड़ना और न्याय स्वीकार करने का इच्छुक हूँ।” क्या उस “इच्छा” का अर्थ यह हो सकता है कि तुमने सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर लिया है? तुम्हारी वह “इच्छा” तुम्हारी जुबान से इतनी आसानी से कैसे निकल सकती है? तुम इतना कुछ करने के “इच्छुक” हो, लेकिन तुमने कितने सत्यों का अभ्यास किया है? तुम्हारी सत्य वास्तविकता कहाँ है? तुम इतना कुछ करने के “इच्छुक” हो, लेकिन क्या तुम्हारे पास अनुभवजन्य गवाही है? ऐसा क्यों है कि अब भी, तुम्हारे परमेश्वर से विश्वासघात करने की संभावना शत-प्रतिशत बनी हुई है? यह थोड़ी-सी भी कम क्यों नहीं हुई है? भले ही यह बीस या तीस प्रतिशत कम हो जाती, धीरे-धीरे कम होती तो भी इसे थोड़ा-बहुत सत्य का अभ्यास करने और उसमें प्रवेश करने के रूप में गिना जाता। लेकिन तुम इतना भी प्राप्त नहीं कर सकते। तुम्हारी वह “इच्छा” धोखा है; यह परमेश्वर के खिलाफ सबसे बड़ा धोखा है। यह परमेश्वर के प्रति वफादारी नहीं है, न ही यह परमेश्वर के प्रति सच्चा दिल है। क्या तुम सोचते हो कि यदि कोई झूठ हजार या दस हजार बार बोला जाए तो वह वास्तव में सच बन जाएगा, एक तथ्य बन जाएगा? परमेश्वर के यहाँ, यह दावा सच नहीं ठहरता; यह विकृत तर्क और विधर्म है। परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख करता है। तुम चाहे कितना भी कहो कि तुम परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के इच्छुक हो और तुम्हारी बातें चाहे कितनी भी अच्छी क्यों न लगें, परमेश्वर पूरी स्पष्टता के साथ अवलोकन करता है कि तुम किस प्रकार की चीज हो। तुम लगातार दावा करते रहते हो कि तुम सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हो और तुम कहते हो कि तुम्हारे पास सत्य का अनुसरण करने की वास्तविकता है और तुम्हारे पास इसका अभ्यास करने का प्रमाण है। फिर जब परमेश्वर तुम्हें परखता है तो तुम वह क्या है जो तुम उसे वापस देते हो? तुम बुरे लोगों को परमेश्वर के घर में विघ्न-बाधाएँ पैदा करते हुए देखते हो, फिर भी तुम इस पर कोई ध्यान नहीं देते और खुद को इसमें शामिल नहीं करते। यहाँ तक कि यदि कोई किसी समस्या की रिपोर्ट करता है, तो भी तुम उसे हल नहीं करते या उससे निपटते नहीं हो, तुम बस बुरे लोगों को बुराई करने और बेलगाम होने देते हो। क्या यह परमेश्वर के प्रति तुम्हारा समर्पण है? क्या यह परमेश्वर के प्रति तुम्हारी वफादारी है? चूँकि तुम सोचते हो कि तुम परमेश्वर के प्रति वफादार हो, तो जब तुम अगुआ या कार्यकर्ता थे, तब तुमने कितनी बार परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा की? किन मामलों में तुमने समस्याओं की पहचान करने और उन्हें हल करने की पहल की, जिससे कलीसिया के कार्य का सामान्य संचालन सुनिश्चित हुआ? जब बुरे लोग कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधाएँ पैदा कर रहे थे, तो तुमने कितनी बार उन्हें उजागर करने और उनके द्वारा पैदा की गई बाधाओं का समाधान करने के लिए कदम उठाया? तुमने कब भेंटों के उपयोग और खर्च में सिद्धांतों को बनाए रखा और परमेश्वर की भेंटों को उचित रूप से नुकसान से बचाया? इन मामलों में, तुमने कभी भी परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता नहीं दिखाई, ताकि बुरे लोगों को बुराई करने से रोकने के लिए कड़ी जाँच की जा सके। इसके बजाय, तुम पूरी तरह से गैर-जिम्मेदार रहे, कलीसिया के कार्य और परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचते हुए देखते रहे, फिर भी उदासीन बने रहे। विशेष रूप से भेंटों के खर्च के संबंध में, तुम बिल्कुल भी जाँच नहीं करते और लापरवाही से स्वीकृति दे देते हो और हस्ताक्षर कर देते हो। तुम्हारे मुँह से निकले एक लापरवाही भरे शब्द और एक बार तुम्हारी कलम के चलने से, दसियों हजार या सैकड़ों हजार की भेंटें बर्बाद कर दी गईं और तुमने पलक तक नहीं झपकाई। बाद में, जब परमेश्वर के घर ने तुम्हें जवाबदेह ठहराया तो तुम्हें नुकसान की भरपाई करने से डर लगा, इसलिए तुम सबूत गढ़ने, सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने और हस्ताक्षरों को बदलने के लिए किसी को ढूँढ़ने में भी सक्षम रहे। यह परमेश्वर के प्रति तुम्हारी “वफादारी” है। जब बुरे लोग बेलगाम होकर बुरे काम कर रहे थे और कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधाएँ पैदा कर रहे थे, और जब तुमने लोगों को अपना कर्तव्य निभाने में खानापूरी करते हुए और परमेश्वर के घर में मुफ्तखोरी करते हुए देखा तो तुमने बहरे और गूँगे होने का नाटक किया, न देखने का नाटक किया और न जानने का नाटक किया, जबकि अपने दिल में यह सोचते रहे, “मैं परमेश्वर के प्रति वफादार होने का इच्छुक हूँ, मैं परमेश्वर के घर के लिए अपनी चौकी पर पहरा देने, इसके द्वार की अच्छी तरह से रखवाली करने और झुंड की अच्छी तरह से देखभाल करने का इच्छुक हूँ।” तुम इच्छुक हो, लेकिन क्या तुमने ऐसा किया है? तुम कहते हो कि तुम अपनी चौकी पर पहरा देने और परमेश्वर के घर के लिए कड़ी जाँच करने और इसके द्वार की अच्छी तरह से रखवाली करने के इच्छुक हो, लेकिन क्या तुम्हारे पास परमेश्वर के प्रति वफादारी है? क्या तुम ये बातें कहने के योग्य हो? क्या तुममें कोई आत्म-जागरूकता है? तुम अपने बारे में बहुत ज्यादा ऊँचा सोच रहे हो! यदि तुम ऐसा नहीं कर सकते तो लापरवाही से मत बोलो। तुम कहते हो कि तुम इच्छुक हो और तुम परमेश्वर के सामने संकल्प लेते हो और कसमें खाते हो। तुम्हारे कसमें खाने के बाद, परमेश्वर प्रतीक्षा करता है; परमेश्वर अवलोकन करेगा और देखेगा, यह देखने के लिए कि तुम आगे क्या करते हो, क्या तुम सत्य का अभ्यास करते हो और क्या तुम्हारी कही गई बातें पूरी हुई हैं। यदि तुम उन्हें पूरा नहीं करते हो तो परमेश्वर की नजर में तुम एक धोखेबाज हो और तुमने परमेश्वर के सामने जो संकल्प लिए और जो कसमें खाईं, वे सब झूठ का पुलिंदा हैं। तुम खुलेआम परमेश्वर को धोखा देते हो और खुलेआम परमेश्वर को मूर्ख बनाने की कोशिश करते हो; तुम किस प्रकार की चीज हो? क्या तुम सोचते हो कि परमेश्वर के सामने केवल अपना संकल्प व्यक्त करना, थोड़ी-सी मशक्कत करना और खानापूरी करना सत्य का अभ्यास करना माना जाता है? तुमने परमेश्वर के घर के हितों के साथ विश्वासघात किया, फिर भी तुम चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हें स्वीकार करे, तुम अभी भी चाहते हो कि परमेश्वर के चुने हुए लोग तुम्हें स्वीकृति दें; यहाँ तक कि तुम परमेश्वर के साथ सौदेबाजी भी करना चाहते हो, और यहाँ तक कि इनाम भी प्राप्त करना चाहते हो—क्या चीजें वास्तव में तुम्हारे लिए इतनी अच्छी हो सकती हैं? तुम परमेश्वर को धोखा देते हो और उसके साथ अनमने ढंग से पेश आते हो, और तुम उसके साथ खिलवाड़ करते हो, फिर भी तुम चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हें इनाम दे; तुम किस प्रकार की चीज हो? यदि तुम ऐसा करने में सक्षम हो तो क्या तुम्हारे पास जीवन है? यदि भ्रष्ट मानवजाति के पास मानवीय अंतरात्मा और विवेक होता, तो वह इतने वर्षों तक उपदेश सुनने के बाद परमेश्वर के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करती। फिर भी तुमने कई वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास किया है और इतने वर्षों तक उपदेश सुने हैं और अभी भी परमेश्वर के साथ ऐसा व्यवहार कर सकते हो, सत्य का अभ्यास करने की जगह अपनी स्वयं की इच्छा का उपयोग करते हुए, परमेश्वर को मूर्ख बनाने और उसके साथ अनमने ढंग से पेश आने, उसे धोखा देने और उसके साथ खिलवाड़ करने की कोशिश कर सकते हो। मुझे बताओ, तुम किस प्रकार की चीज हो? तुम एक शैतान हो, एक दानव हो—मनुष्य नहीं। परमेश्वर की नजर में, तुम एक सृजित प्राणी भी नहीं हो; तुम बस एक दानव हो, बस एक कमीने इंसान हो जो मरने लायक है! मुझे बताओ, क्या ऐसा व्यक्ति मरने लायक नहीं है? (हाँ।)

कुछ लोग सोचते हैं कि उन्होंने परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य निभाने में बहुत मशक्कत की है, वे परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के इच्छुक हैं, परमेश्वर के वचनों पर ध्यान देने के इच्छुक हैं, और सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हैं। जब वे कहते हैं कि वे इच्छुक हैं, तो वे कुछ हद तक भावुक महसूस करते हैं और उनमें थोड़ी सच्चाई होती है, इसलिए वे पतरस जैसे लोगों के रूप में खुद की बड़ाई करते हैं जो सत्य का अनुसरण करते हैं और सत्य का अभ्यास करते हैं और खुद को सिंहासन पर बिठा लेते हैं। क्या यह ऐसा कुछ है जो एक सृजित प्राणी को करना चाहिए? क्या एक सृजित प्राणी में ऐसी अभिव्यक्तियाँ होनी चाहिए? (नहीं।) जीवन प्रवेश वाले व्यक्ति में केवल इच्छा ही नहीं होती; उस इच्छा के आधार पर, उसका अभ्यास होता है और प्रवेश होता है। तो फिर, ऐसे व्यक्ति में क्या अभिव्यक्तियाँ होंगी? जीवन प्रवेश होने का अर्थ है कि व्यक्ति धीरे-धीरे अपना भ्रष्ट स्वभाव छोड़ देता है और धीरे-धीरे परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में अपना लेता है। जिन लोगों का जीवन परमेश्वर के वचन हैं, वे आम तौर पर क्या प्रकट करते हैं और क्या जीते हैं? परमेश्वर के प्रति उनका रवैया क्या होता है? अपना कर्तव्य निभाने में उनकी क्या अभिव्यक्तियाँ होती हैं? (जीवन प्रवेश वाले व्यक्ति में कई मुख्य अभिव्यक्तियाँ होती हैं। एक बात तो यह है कि उसे स्वयं का सच्चा ज्ञान होता है। वह देखता है कि वह अभी भी परमेश्वर की अपेक्षाओं से बहुत पीछे है और उसका आध्यात्मिक कद अभी भी बहुत छोटा है। वह अपने कुछ अपराधों और भ्रष्टता प्रकट करने पर दुखी और व्यथित महसूस करता है; वह परमेश्वर द्वारा इंतजाम की गई और अधिक परिवेशों का अनुभव करने और अधिक बोझ उठाने की भी आशा करता है, इस प्रक्रिया में वह सत्य का अभ्यास करने में स्वयं को प्रशिक्षित करता है, क्योंकि केवल इसी तरह से वह सत्य प्राप्त कर सकता है। दूसरी बात, कम से कम, वह अपना कर्तव्य निभाने में खानापूरी करने से बच सकता है और अक्सर आत्म-चिंतन कर सकता है। यदि वह पाता है कि उसने सिद्धांतों का उल्लंघन किया है या किसी मामले में उसमें कमी रह गई है, तो वह तुरंत अपनी दिशा बदल सकता है। इसके अलावा, जब परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों या परमेश्वर के चढ़ावों से जुड़े मामलों की बात आती है, तो उसमें परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होता है और वह परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुँचाने की हिम्मत नहीं करता है।) (मैं एक बात और जोड़ना चाहूँगा। जीवन प्रवेश वाला व्यक्ति अपना कर्तव्य निभाने में सतर्क और सावधान रहेगा, परमेश्वर के वचनों पर मशक्कत करेगा और सत्य सिद्धांतों को खोजेगा, और अपनी मर्जी के अनुसार बिना सोचे-विचारे काम करने से बचेगा। वह सत्य समझने वाले लोगों के साथ मामलों पर विचार-विमर्श और संगति भी करेगा, और वह सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करेगा।) अपने वास्तविक जीवन में, जीवन प्रवेश वाले लोगों के पास उसी के अनुरूप जीवन यापन और प्रकाशन होता है। वे केवल इरादों के स्तर पर नहीं रहते; वे केवल वफादार होने के इच्छुक और समर्पण करने के इच्छुक नहीं होते। इसके बजाय, उनके पास वास्तविक जीवन यापन और प्रकाशन होता है। सबसे सरल बात यह है कि उनके दैनिक जीवन में चाहे जो भी हो, वे सक्रिय और सचेत रूप से सत्य सिद्धांतों को खोज सकते हैं। कार्य करने से पहले, वे सबसे पहले इसे करने के सिद्धांतों को लेते हैं और उनकी स्पष्ट समझ प्राप्त करते हैं, और वे बिना सोचे-विचारे बुरे कर्म नहीं करते हैं। यदि वे नहीं समझते हैं, तो वे परमेश्वर के वचनों में सिद्धांतों को ढूँढ़ते हैं। यदि उन्हें ढूँढ़ने के बाद भी वे पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं, तो वे किसी ऐसे व्यक्ति को खोजते हैं जो सत्य को समझता हो ताकि वे आगे संगति और विचार-विमर्श कर सकें। एक बार जब वे सिद्धांतों को समझ लेते हैं, तो वे उन्हें अभ्यास में ला सकते हैं। सकारात्मक पक्ष की बात करें तो वे सत्य का अभ्यास करने में विशेष रूप से सक्रिय और विशेष रूप से कर्तव्यनिष्ठ होते हैं। वे चाहे जिस परिस्थिति का भी सामना करें, चाहे मामला महत्वपूर्ण हो या मामूली—और विशेष रूप से जब यह परमेश्वर के घर के कार्य से जुड़ा कोई बड़ा मामला हो—वे विशेष रूप से सतर्क रहते हैं। वे लापरवाही से अकेले निर्णय नहीं लेते बल्कि दूसरों से अधिक सलाह लेते हैं, अधिक पूछताछ करते हैं और अधिक खोजते हैं। नकारात्मक पक्ष की बात करें तो जब वे कुछ गलत करते हैं, तो वे अपने भ्रष्ट स्वभावों पर चिंतन कर सकते हैं और उसे जान सकते हैं, अपनी खामियों और कमियों को जान सकते हैं, उन क्षेत्रों को जान सकते हैं जिनसे वे अनजान हैं, और उन क्षेत्रों को जान सकते हैं जिनमें वे नकारात्मक और कमजोर हो जाते हैं और खरे नहीं उतर पाते हैं। वे अक्सर आत्म-चिंतन करते हैं। एक बात तो यह है कि इस प्रक्रिया के दौरान वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं और सत्य खोजते हैं, परमेश्वर के न्याय और प्रकाशन के वचनों के माध्यम से आत्म-चिंतन करते हैं और स्वयं को जानते हैं; दूसरी बात, वे अपने भाई-बहनों से प्रतिक्रिया देने के लिए कहते हैं। कोई कार्य पूरा करने के बाद, वे बार-बार विचार करते हैं कि क्या उन्होंने किसी भी मामले में सिद्धांतों का उल्लंघन किया है, क्या उन्होंने किसी चीज को अनदेखा किया है, क्या कोई विरूपण हुआ है या क्या ऊपरवाले की कार्य व्यवस्थाओं के साथ कोई विसंगति थी। वे निरंतर आत्म-चिंतन करते हैं। चाहे वह सकारात्मक पक्ष हो या नकारात्मक पक्ष, उनके अभ्यास का लक्ष्य और दिशा सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने और सत्य सिद्धांतों के अनुसार होने का प्रयास करना है, न कि अपनी मर्जी के अनुसार कार्य करना। यदि वे सत्य सिद्धांतों को नहीं समझते हैं या उनके बारे में स्पष्ट नहीं हैं, तो वे मामले को अपने मन में दबाकर नहीं रखते हैं। इसके बजाय, वे सत्य समझने वाले लोगों को खोजते हैं और उनके साथ तब तक संगति करते हैं जब तक कि सिद्धांत स्पष्ट न हो जाएँ, और उसके बाद ही वे सिद्धांतों को अभ्यास में लाते हैं और उन्हें कार्यान्वित करते हैं। संक्षेप में, जब अभ्यास की बात आती है, तो वे अपनी प्राथमिकताओं या मनोदशा के अनुसार कार्य नहीं करते हैं, अपनी मर्जी के अनुसार बिना सोचे-विचारे बुरे कर्म करना तो दूर की बात है; इसके बजाय, वे सत्य खोज सकते हैं और सिद्धांतों के अनुसार अपना कर्तव्य निभा सकते हैं। यह अभ्यास में उनकी अभिव्यक्ति है। इसके अलावा, परमेश्वर के प्रति उनके रवैये के संदर्भ में, वे परमेश्वर की अपेक्षाओं के साथ किस तरह पेश आते हैं और परमेश्वर से जुड़े मामलों के हर पहलू के साथ किस तरह पेश आते हैं, इस बारे में उनमें परमेश्वर का भय मानने वाला दिल, परमेश्वर से डरने वाला दिल, और घबराहट और कंपकंपी से भरा दिल होता है। वे इस बात से बहुत डरते हैं कि कहीं वे गलत मार्ग पर न चले जाएँ या कुछ गलत न कर दें और परमेश्वर के दिल को ठेस न पहुँचा दें; वे इस बात से बहुत डरते हैं कि कहीं वे परमेश्वर को नाराज न कर दें, परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन न कर दें या परमेश्वर के स्वभाव को ठेस न पहुँचा दें। परमेश्वर के प्रति उनकी यह मानसिकता होती है और सत्य के साथ उनके व्यवहार में और सत्य सिद्धांतों के साथ उनके व्यवहार में उनके ये वास्तविक क्रियाकलाप और प्रकाशन होते हैं; केवल यही जीवन प्रवेश होता है, है ना? (हाँ।) क्या तुम लोगों में ये अभिव्यक्तियाँ हैं? जिन लोगों में ये अभिव्यक्तियाँ होती हैं, उनके पास जीवन प्रवेश होता है; जिनमें ये अभिव्यक्तियाँ नहीं होते हैं, वे सभी श्रम कर रहे हैं। यदि तुमसे पूछा जाए कि तुम हर दिन इधर-उधर भाग-दौड़ करते हुए और खुद को खपाते हुए क्या करने में व्यस्त थे, और तुमने कहा कि तुम अपना कर्तव्य निभा रहे थे और तुम परमेश्वर के प्रति लगनशील थे, तो क्या तुम्हारे शब्द और क्रियाकलाप सिद्धांत-सम्मत हैं? क्या वे परमेश्वर के वचनों पर आधारित हैं? यदि तुम्हारा कहा हर शब्द, तुम्हारा किया हर काम और तुम्हारा हर दृष्टिकोण परमेश्वर के वचनों और सत्य पर आधारित नहीं है, यदि तुम चीजें घटित होने पर सत्य नहीं खोजते हो और तुम्हारे पास कोई जीवन प्रवेश नहीं है, तो क्या तुम केवल श्रम नहीं कर रहे हो? अच्छे शब्दों में कहें तो तुम श्रम कर रहे हो; थोड़े कम अच्छे शब्दों में कहें तो तुम केवल मशक्कत कर रहे हो; और अधिक बेबाकी से कहें तो तुम बस अपना श्रम बेच रहे हो! अपना श्रम बेचना श्रम करने के बराबर है। अपना श्रम बेचने से तुम क्या प्राप्त कर सकते हो? तुम बस थोड़ा अनुग्रह प्राप्त करते हो : कुछ अच्छा खाना, कुछ अच्छे कपड़े पहनना, जीवन में कुछ सुख-सुविधाओं का आनंद लेना, किसी काफी खुली जगह पर रहना और सर्दियों में अपेक्षाकृत गर्म और गर्मियों में अपेक्षाकृत ठंडा रहना। यह पहले से ही काफी अच्छा है। यदि तुम केवल मशक्कत करते हो, तो तुम और क्या प्राप्त करने की उम्मीद करते हो? तुम केवल अपना कर्तव्य निभाने के इच्छुक हो लेकिन सत्य का अभ्यास नहीं करते हो। यह परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करना नहीं है। उस स्थिति में, तुम जो कर रहे हो वह केवल श्रम करना है। जो लोग श्रम करते हैं वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं और वे जो कुछ भी करते हैं उसमें उनका कोई सिद्धांत नहीं होता है। इस तरह से श्रम करना उनके लिए जीवन नहीं ला सकता; थोड़े अनुग्रह का आनंद लेने में सक्षम होना पहले से ही काफी अच्छा है। तुम मशक्कत करने के इच्छुक हो, और तुम्हारी मशक्कत को ध्यान में रखते हुए, परमेश्वर का घर तुम्हें कुछ दैनिक आवश्यकताओं की आपूर्ति करता है ताकि तुम थोड़ा बेहतर जीवन जी सको, साल भर ताजी सब्जियाँ पा सको और कुछ जैविक भोजन खा सको। यह पहले से ही परमेश्वर का अनुग्रह है—तुम और क्या आनंद लेने की उम्मीद करते हो? यदि तुम दुनिया में पैसा कमाने के लिए काम करते और मशक्कत करते, तो तुम क्या खाने या पहनने का खर्च उठा पाते? तुम्हें न तो भोजन और न ही कपड़े मुफ्त में दिए जाते; तुम्हें उन्हें खरीदने के लिए खुद पैसे कमाने पड़ते, तुम्हें दुर्व्यवहार भी सहना पड़ता और दूसरों द्वारा सताया जाता। परमेश्वर के घर में मशक्कत करके, तुम परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद ले सकते हो और धौंस जमाए जाने से बच सकते हो; तुम अच्छा खा सकते हो, अच्छे कपड़े पहन सकते हो, अच्छी जगह रह सकते हो और एक सुखद जीवन जी सकते हो। कोई तुम पर धौंस नहीं जमाता, कोई तुम पर हमला नहीं करता और तुमसे बदला नहीं लेता, और जब तुम बीमार पड़ते हो, तो भाई-बहन तुम्हारी देखभाल करते हैं और तुम्हारा ध्यान रखते हैं। क्या यह अनुग्रह नहीं है? क्या ये वे चीजें नहीं हैं जिन्हें तुम लोग खोजते हो? यदि तुम लोग इन्हीं चीजों को खोजते हो, तो तुम उन्हें पहले ही प्राप्त कर चुके हो; तुम लोग जो खोजते थे, वह तुम्हें पहले ही मिल चुका है। क्या ये वे चीजें नहीं हैं जिन्हें जीवन से रहित लोग खोजते हैं? क्या इन चीजों को खोजने में उनकी सभी इच्छाएँ पूरी नहीं हो गई हैं? तुम्हारी “इच्छा” के बदले में तुम्हें केवल परमेश्वर का यह अनुग्रह और ये सुख-सुविधाएँ ही मिल सकती हैं। यह पहले से ही काफी अच्छा है; परमेश्वर ने तुम्हें कम नहीं दिया है। वास्तव में, तुम्हारी वह “इच्छा” निरर्थक है। जीवन प्रवेश के बिना, तुम इसके बदले में जीवन नहीं प्राप्त कर सकते; तुम इसके बदले में केवल थोड़ा-सा अनुग्रह प्राप्त कर सकते हो। क्या तुम्हें जो अनुग्रह मिला है, वह पहले से ही उससे अधिक नहीं है जो तुम लोगों ने माँगा था या जिसकी तुम लोगों ने कल्पना की थी? (हाँ।) तो क्या तुम लोग यही चाहते हो? क्या तुम लोग इसी का अनुसरण करते हो? जब तुम लोगों ने पहली बार परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया था, तो क्या तुम लोगों ने केवल यह अनुग्रह प्राप्त करने की आशा की थी और बात वहीं छोड़ दी थी? (नहीं।) तो क्या तुम लोगों की कोई अन्य आकांक्षा है? (हाँ। हम उद्धार पाने का अनुसरण भी करना चाहते हैं।) यदि तुममें सत्य का अभ्यास करने का केवल इरादा है लेकिन तुम वास्तव में कभी इसका अभ्यास नहीं करते हो, तो क्या तुम्हारी यह आकांक्षा—उद्धार पाने का अनुसरण करना—अभी भी पूरी हो सकती है? (नहीं।) यह पूरी क्यों नहीं हो सकती? क्योंकि तुम केवल इच्छा के स्तर पर ही रहते हो और तुमने सत्य को अभ्यास में नहीं लाया है। तुम शारीरिक सुख-सुविधा और आराम के माहौल में रहते हो, परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हो और अपने दिल में बहुत संतुष्ट महसूस करते हो। क्या इस तरह चलते रहना अच्छा है? (नहीं।) इसमें क्या गलत है? क्या ये वही चीजें नहीं हैं जिनका तुम लोग अनुसरण करते हो? (सत्य का अभ्यास किए बिना और मनुष्य की छवि जिए बिना केवल इरादों के स्तर पर रहना—मुझे लगता है कि इस तरह जीना अर्थहीन और मूल्यहीन है।) क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि अच्छा खाना और अच्छा पहनना ही जीने का मूल्य है? अच्छा खाना, अच्छा पहनना, अच्छी जगह रहना और अच्छे जीवन का आनंद लेना; जीवन भर भोजन या कपड़ों की कोई चिंता न होना और धन, सम्मान और शांति का आनंद लेना—क्या अतीत के सम्राट इन्हीं चीजों का अनुसरण नहीं करते थे? यहाँ तक कि सम्राट भी इन चीजों का अनुसरण करते थे, तो तुम जैसे तुच्छ लोग और क्या अनुसरण करने की आशा करते हैं? तुम लोगों में से हर एक को देखो : तुम लोग जीवन का अनुसरण नहीं करते और तुम लोग उद्धार पाने का अनुसरण नहीं करते; तुम लोग केवल अच्छा खाने, अच्छा पहनने और अच्छे जीवन का आनंद लेने का अनुसरण करते हो। क्या तुम लोगों का अनुसरण बस इतना ही नहीं है? उस अनुसरण को प्राप्त करना बहुत ही आसान है। उसके लिए सत्य पर संगति करने की कोई आवश्यकता नहीं है; संगति का एक अतिरिक्त शब्द भी अनुचित होगा। तुम लोगों को सत्य की आवश्यकता नहीं है। तुम लोगों को किस चीज की आवश्यकता है? तुम सभी भरपेट निवाले खाने की कोशिश करते हो। जब तक तुम लोगों के शरीर को शांति और आनंद मिलता है, तुम लोगों के पास भोजन और कपड़े हैं, और तुम लोग इस पूरे जीवन में खुशी से रहते हो, तुम लोगों के लिए बस इतना ही काफी है। तुम लोग उद्धार पाने का अनुसरण नहीं करते, इसलिए अधिकांश लोगों में सत्य का अनुसरण करने की बहुत कम जागरूकता या संकल्प होता है। भले ही मैं सत्य सिद्धांतों से संबंधित किसी कथन को सौ बार दोहराऊँ, तुममें से कितने लोग इसे ग्रहण कर सकते हैं? तुममें से कितने लोग इसे अपने दिल में उतारेंगे? जैसा कि मैं देखता हूँ, बहुत कम। मैंने इतने वर्षों से तुम लोगों के साथ मेलजोल किया है। चाहे किसी भी मामले से निपटा जा रहा हो—चाहे वह सामान्य मामलों का विषय हो या ऐसा मामला हो जिसमें कलीसिया का कार्य शामिल हो या कर्तव्यों का निर्वहन शामिल हो—यदि मैं अपनी बात पर विशेष जोर दिए बिना और बिना किसी सख्त लहजे का उपयोग किए बस शांति से बोलता हूँ, तो मैं पाता हूँ कि बाद में बहुत कम लोग चीजों को सख्ती से अभ्यास में ला सकते हैं और सत्य सिद्धांतों के अनुसार उन्हें कार्यान्वित कर सकते हैं। मैंने इतने वर्षों तक सत्य सिद्धांतों पर संगति की है, फिर भी तुम लोग उन्हें समझ नहीं सकते और तुम लोगों के दिलों में उनके प्रति कोई जागरूकता नहीं है। इससे पहले कि तुम लोग उन्हें याद रख सको और कायम रख सको, किसी को तुम लोगों की काट-छाँट करनी होगी और तुम लोगों को अनुशासित करना होगा। यदि मैं तुम लोगों से बस शांति से बोलता हूँ, तो तुम लोग बेखबर रहते हो और सत्य का अभ्यास करने को बिल्कुल भी गंभीरता से नहीं लेते हो। थोड़ी काबिलियत वाले लोग केवल थोड़ा-सा धर्म-सिद्धांत समझते हैं और फिर सोचते हैं कि उन्होंने सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर लिया है और यहाँ तक कि खुद से काफी प्रसन्न भी महसूस करते हैं। कुछ तो और भी आगे बढ़ जाते हैं और अपना दिखावा करते हैं। क्या यह बेशर्मी नहीं है?

हाल ही में, मैं एक कलीसिया में समस्याओं का समाधान कर रहा था और मैंने उनके साथ कई सिद्धांतों पर संगति की। मैंने पिछले कुछ वर्षों में इन सिद्धांतों पर कई बार संगति की है, फिर भी आज तक प्रभारी लोग उन्हें नहीं समझ पाए हैं। मैं बस शांति से बोलता हूँ, लेकिन कुछ लोग इंसानी भाषा नहीं समझ सकते। वे नहीं जानते कि क्या करना है और वे नहीं जानते कि चीजों को कैसे कार्यान्वित करना है। मैंने ये बातें कई बार कही हैं लेकिन वे बस उनके एक कान से अंदर जाती हैं और दूसरे से बाहर निकल जाती हैं; उन्हें सुन-सुनकर उनके कानों में लगभग घट्टे पड़ गए हैं, फिर भी वे नहीं समझते। मुझे बताओ, वे किस तरह की चीज हैं? क्या वे मानव हैं? मैं उन्हें वे सिद्धांत बताता हूँ जिनके अनुसार किसी मामले से निपटा जाना चाहिए और इसे कैसे किया जाना चाहिए। मैं नियमित रूप से सत्य पर संगति भी करता हूँ और जब विशेष परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, तो मैं कुछ विशेष सिद्धांतों पर संगति करता हूँ। फिर भी अब तक, वे नहीं जानते कि सिद्धांत क्या हैं। मुझे बताओ, क्या वे सिद्धांतों को कायम रख सकते हैं? क्या वे सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कर सकते हैं? वे सिद्धांतों को कायम नहीं रख सकते, न ही वे सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कर सकते हैं, इसलिए वे जो करते हैं उसे कर्तव्य का निर्वहन नहीं माना जा सकता। तो फिर, वे क्या कर रहे हैं? क्या वे केवल मशक्कत नहीं कर रहे हैं? यदि तुम मेरे द्वारा बताए गए सत्य सिद्धांतों को कायम नहीं रख सकते, तो क्या वह थोड़ी-सी मशक्कत करना सत्य का अभ्यास करना है? क्या इसका मतलब यह है कि तुम्हारे पास जीवन प्रवेश है? वह जीवन प्रवेश नहीं है; वह श्रम करना है। यदि तुम्हारा श्रम तुम्हें तुम्हारे भोजन का खर्च दिला सकता है, तो यह पहले से ही काफी अच्छा है; तुम जीवन प्राप्त नहीं कर सकते। तुम मेरे द्वारा बताए गए सत्य सिद्धांतों को नहीं समझ सकते, तो मैं तुम्हें कैसे निरूपित करूँ? यदि तुम सत्य सिद्धांतों को समझ सकते हो, तो तुम्हारे पास मानवता है, तुम एक मानव हो। यदि तुम सत्य सिद्धांतों को नहीं समझ सकते, तो तुम्हारे पास कोई मानवता नहीं है, तुम एक जानवर हो। यदि तुम्हें सत्य के प्रति अरुचि है और तुम सत्य से घृणा करते हो, और जानबूझकर खुद को परमेश्वर के घर के खिलाफ खड़ा करते हो, तो तुम एक शैतान हो और तुम एक दानव हो। यदि तुम मेरी बात समझते हो और उसके अनुसार कार्य करते हो—यदि तुम मेरे द्वारा दूसरी बार जोर दिए बिना और मेरे द्वारा तुम्हें फिर से प्रेरित किए बिना समझते हो, मेरे वचनों के अनुसार अभ्यास कर सकते हो और उन्हें कायम रखना जारी रख सकते हो—तो मैं देख सकता हूँ कि तुम्हारे पास जमीर और विवेक है। अपने दिल में, मैं तुम्हारा सम्मान करता हूँ और तुम्हारा आदर करता हूँ, और तुम्हारे साथ एक मानव जैसा व्यवहार करता हूँ। यदि मैंने कोई बात एक हजार या दस हजार बार कही है और तुम फिर भी उसे नहीं समझे हो, तो मैं तुम्हारे साथ एक मानव जैसा व्यवहार नहीं करता; मेरे दिल में, तुम मानव नहीं हो, तुम एक जानवर हो। क्यों? यदि तुम उन वचनों को भी नहीं समझ सकते जो मैंने इतनी सरलता और स्पष्टता से, और इतने साफ तौर पर कहे हैं, तो तुम जानवर नहीं तो और क्या हो? तुम जानवर से भी बदतर हो। मेरे पास जो कुत्ता है वह उन बातों को समझ सकता है जो लोग आमतौर पर कहते हैं। हो सकता है कि वह यह न जानता हो कि मैं उससे क्या करवाना चाहता हूँ, लेकिन इतने वर्षों तक मेरे साथ रहने के बाद, वह जानता है कि मैं उससे क्या नहीं करवाना चाहता। आम तौर पर, वह ऐसा कुछ भी करने से बचता है जिसके बारे में वह जानता है कि मुझे नापसंद है। इसे कैसे देखा जा सकता है? उदाहरण के लिए, जब मैं उसके पिल्लों को अनुशासित करता हूँ, तो वह जितना हो सके सहयोग करता है, वह इस बात से बहुत डरता है कि दोनों छोटे कुत्ते समझ नहीं पाएँगे और अपने मालिक को नाराज कर देंगे। वह जानता है कि उसे आँगन में सूखने के लिए टाँगी गई चीजों या कपड़ों को काटने की अनुमति नहीं है और यदि वह ऐसा करेगा तो उसका मालिक नाराज हो जाएगा। हर बार जब वह आँगन में प्रवेश करता है, तो वह सबसे पहले दोनों पिल्लों को नियंत्रण में रखता है और उन्हें सूखने के लिए टाँगी गई चीजों को काटने से रोकता है। यदि वह कुछ ऐसा करता है जिससे मुझे गुस्सा आता है, तो वह मुझे मनाने और मुझे खुश करने की कोशिश करता रहता है। जब मैं उसे फिर से थपथपाने और उससे बात करने के लिए तैयार होता हूँ, तभी वह खुश होता है। कुत्ते की सोच बहुत सरल होती है, लेकिन कुत्ते के पास एक सबसे कीमती चीज होती है जो भ्रष्ट मानवजाति के पास नहीं होती : कुत्ते की सच्चाई एक ऐसी चीज है जिसकी मानवजाति में कमी है। यदि मानवजाति में सच्चाई की कमी है, तो उसे मानवजाति कैसे कहा जा सकता है? यद्यपि मानवजाति के सदस्य इंसानी खाल पहने हुए हैं और बाहरी तौर पर उनका रूप इंसानी है, लेकिन सार रूप में वे मानव नहीं हैं। उनमें सबसे बुनियादी जमीर और विवेक की भी कमी है, तो वे सच्चाई कैसे प्रकट कर सकते हैं? कुछ लोग सिद्धांतों को समझ सकते हैं और उन्हें अभ्यास में ला सकते हैं; ऐसे लोगों को मानव कहा जा सकता है। ऐसा क्यों है? (एक बात तो यह है कि सिद्धांतों को समझने की उनकी क्षमता यह दर्शाती है कि उनके पास आध्यात्मिक समझ है और वे परमेश्वर के वचनों और परमेश्वर के इरादों का अर्थ जानते हैं। दूसरी बात, ऐसे लोगों के पास जमीर और विवेक होता है, उनके स्व-आचरण की सीमाएँ होती हैं और वे सिद्धांतों को कायम रख सकते हैं; इसलिए, केवल ऐसे लोगों को ही मानव कहा जा सकता है।) यह सही है। एक बात तो यह है कि उनमें बोध क्षमता होती है। वे इंसानी भाषा समझ सकते हैं और अन्य लोगों के समान तरीकों से सोच और समझ सकते हैं। दूसरी बात, उनके पास जमीर और विवेक होता है, जमीर की सीमाएँ होती हैं, वे सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक होते हैं, और इसका अभ्यास करने में सक्षम होते हैं। ऐसे व्यक्ति को मानव कहा जा सकता है; जिनके पास ये दो चीजें नहीं हैं वे मानव नहीं हैं। यदि कोई व्यक्ति मानव नहीं है, तो उसमें जमीर और विवेक कैसे हो सकता है? जमीर और विवेक के बिना, वह इंसानी भाषा को कैसे समझ सकता है? जमीर और विवेक से रहित व्यक्ति थोड़ा-सा धर्म-सिद्धांत समझने और ऐसा करने की इच्छा रखने के बावजूद विनियमों का पालन भी नहीं कर सकता। फिर भी वह सोचता है कि सत्य का अभ्यास करने की उसकी इच्छा का अर्थ यह है कि वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर के प्रति वफादार है और ऐसा व्यक्ति है जिसे परमेश्वर स्वीकार करता है और जिससे वह प्रेम करता है। क्या यह किसी बदमाश का तर्क नहीं है? (हाँ।) जिन लोगों के पास बदमाश का तर्क होता है, वे अंततः सत्य प्राप्त नहीं कर सकते। किस तरह के लोगों के पास बदमाश का तर्क होता है? भ्रमित लोगों के पास। भ्रमित लोग हमेशा बदमाश का तर्क पेश करते हैं। तुम लोगों को ये बातें बताने का मेरा क्या मतलब है? क्या मैं तुम लोगों को सत्य का अभ्यास करने के लिए प्रेरित करने की कोशिश कर रहा हूँ या मैं तुम लोगों की समस्याओं के सार को उजागर कर रहा हूँ? (तुम हमें स्पष्ट रूप से यह दिखा रहे हो कि हमने अभी तक सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना शुरू नहीं किया है और तुम हमें उस मार्ग पर आगे बढ़ा रहे हो।) कुछ लोग कहते हैं, “क्या तुम ये बातें केवल हमें सत्य का अभ्यास करने को प्रेरित करने के लिए नहीं कह रहे हो?” मेरा सच में वह मतलब नहीं है। तुम सत्य का अभ्यास कर सकते हो या नहीं, यह तुम्हारा अपना मामला है और इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं है। एक बार जब जिन सत्यों पर मुझे संगति करनी चाहिए, उन पर मेरे द्वारा स्पष्ट रूप से संगति कर ली जाती है, तो मैं अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को पूरा कर चुका होऊँगा। जहाँ तक इस बात का सवाल है कि तुम कौन-सा मार्ग चुनते हो और तुम किस रास्ते पर चलते हो, मैं इसमें हस्तक्षेप नहीं करता। तुम अंततः उद्धार पा सकते हो या नहीं, यह पूरी तरह से तुम्हारे अपने विकल्पों पर निर्भर करता है और पूरी तरह से तुम्हारे द्वारा अपनाए गए मार्ग पर टिका है; तुम लोगों के प्रति मेरी जिम्मेदारी यहीं समाप्त होती है। यानी, मैं वे सभी सत्य लेता हूँ जो तुम लोगों को समझने चाहिए और उन्हें तुम लोगों को बताता हूँ, और यदि तुम लोग उनका अभ्यास करने के इच्छुक हो, तो यह स्वाभाविक रूप से बेहतर है, लेकिन यदि तुम लोग अनिच्छुक हो, तो मैं इसमें हस्तक्षेप नहीं करूँगा। मैं निश्चित रूप से हर दिन तुम लोगों के पीछे-पीछे नहीं घूमूँगा और तुम लोगों का पर्यवेक्षण नहीं करूँगा, तुम लोगों को सत्य का अभ्यास करने के लिए मजबूर करना तो दूर की बात है। मैं ऐसे काम नहीं करता; वह मेरा कार्य नहीं है, न ही वह मेरे कार्य के दायरे में आता है। यदि तुम लोग चाहते हो कि मैं तुम लोगों के साथ दासों जैसा व्यवहार करूँ, हर दिन तुम लोगों की काट-छाँट करूँ और तुम लोगों को अनुशासित करूँ, जिसके बाद ही तुम लोग कुछ नियमों का पालन कर सको, थोड़ी आज्ञाकारिता दिखा सको और थोड़ा सत्य का अभ्यास कर सको, तो मेरी नजर में, ऐसे लोग वे हैं जिन्हें बचाया नहीं जा सकता। यदि मैंने सत्य सिद्धांतों को एक हजार या दस हजार बार बोला है और तुम लोग फिर भी उन्हें नहीं समझे हो और खोजते नहीं हो, तो मैं और क्या कह सकता हूँ? इसके प्रति मेरा रवैया क्या है? तुम लोग जैसा चाहो वैसा करो। यदि तुम लोग सुनने के अनिच्छुक हो, तो मत सुनो। तुम लोग जैसे चाहो वैसे विश्वास कर सकते हो; मैं इसमें हस्तक्षेप नहीं करूँगा, न ही मैं उतनी मशक्कत करना चाहता हूँ। सत्य तुम लोगों को मुफ्त में प्रदान किया गया है, लेकिन तुम लोग इसे संजोना नहीं जानते। तुम लोग अंततः उद्धार पा सकते हो या नहीं, यह तुम लोगों का अपना मामला है और इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं है। यदि तुम्हें हमेशा तुम्हारा पर्यवेक्षण करने, तुम्हारी काट-छाँट करने और तुम्हें अनुशासित करने के लिए अन्य लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिसके बाद ही तुम मुश्किल से थोड़ा-सा सत्य का अभ्यास कर पाते हो या परमेश्वर के घर के कार्य और अपने कर्तव्य के लिए कुछ फायदेमंद कर पाते हो, तो यह वह नहीं है जो मैं चाहता हूँ। यदि तुम सभी ऐसे ही हो, तो मेरे सत्य पर संगति करने का कोई अर्थ नहीं है; सत्य के किसी भी पहलू पर संगति करना निरर्थक होगा और पूरी तरह से अनावश्यक होगा। यदि तुम लोगों के पास वह जमीर और विवेक भी नहीं है जो सामान्य मानवता में होना चाहिए, और इतने सारे सत्यों पर संगति सुनने के बाद भी तुम लोगों के पास सत्य का अभ्यास कैसे करें और सत्य वास्तविकता में प्रवेश कैसे करें, इसके लिए कोई व्यक्तिपरक इरादा या योजना नहीं है, तो तुम लोगों के पास उद्धार पाने की कोई आशा नहीं है। क्या यह सही है? (हाँ।)

कुछ लोग हमेशा मेरे साथ दिमागी खेल खेलने और धोखेबाजी करने की कोशिश करते हैं। जब भी वे कुछ करते हैं, तो वे कार्य करने से पहले मेरे आदेश जारी करने की प्रतीक्षा करते हैं। मैंने चाहे कितनी भी बार सिद्धांतों पर संगति की हो, उन पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता; वे बस सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास नहीं करते हैं। वे सोचते रहते हैं, “मुझे इस मामले के संबंध में तुमसे एक आदेश प्राप्त करना ही होगा। यदि तुम कहते हो कि हम इसे कर सकते हैं, तो हम इसे करेंगे; यदि तुम कहते हो कि हम नहीं कर सकते, तो हम नहीं करेंगे। यदि मैं तुम्हारे द्वारा समझाए गए सिद्धांतों के अनुसार कार्य करूँ और मेरे कार्य पूरा करने के बाद, तुम असंतुष्ट हो जाओ तो क्या होगा? यदि तुम मेरे लिए मुश्किलें खड़ी करो तो क्या होगा? यदि तुम मुझसे नुकसान की भरपाई करवाओ तो क्या होगा?” वे मेरे साथ दिमागी खेल खेलते हैं, वे न तो सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हैं और न ही एक मानव की जिम्मेदारियों को पूरा करते हैं। वे ऐसा कोई भी काम नहीं करते जो उनकी अपनी जिम्मेदारी के दायरे में आता हो—दूसरों के साथ सहयोग करना, दूसरों के साथ मामलों पर विचार-विमर्श और संगति करना या संदर्भ सामग्रियों से परामर्श करना। इसके बजाय, वे लगातार मेरे पीछे पड़े रहते हैं और मुझे परेशान करते हैं, यह और वह बात पूछते हैं और हमेशा कहते हैं, “क्या तुम्हें लगता है कि मेरे लिए इसे इस तरह से करना ठीक है?” वास्तव में, मैंने सिद्धांतों को लेकर उन्हें बहुत स्पष्ट रूप से समझाया है, लेकिन ये लोग बस उन्हें गंभीरता से नहीं लेते हैं। वे सोचते हैं, “तुमने जिन सिद्धांतों पर संगति की, वे केवल एक व्यापक ढाँचा हैं—लोगों को धोखा देने के लिए कहे गए शब्द। तुम्हें मुझे बताना होगा कि इस मामले से कैसे निपटना है और तुम्हें मुझे हर बारीकी के बारे में समझाना होगा।” तुम मेरे द्वारा समझाए गए सिद्धांतों को ग्रहण नहीं कर सकते और उन्हें गंभीरता से नहीं लेते, और तुम मुझसे हर काम करने का तरीका सीधे तौर पर बताने के लिए कहते हो। क्या यह तुम्हें बेकार नहीं बनाता? क्या तुम्हारे पास दिमाग नहीं है? क्या तुम्हारे पास विचार नहीं हैं? तुम्हारा कर्तव्य क्या है? तुम उन कर्तव्यों में से एक का भी बोझ नहीं उठाना चाहते जो एक मानव को उठाना चाहिए या वे जिम्मेदारियाँ नहीं उठाना चाहते जो उन्हें लेनी चाहिए; तुम बस यह चाहते हो कि मैं तुम्हें सीधे तौर पर बताऊँ कि क्या करना है। तो फिर, तुम्हारे दिल और दिमाग का क्या उपयोग है? तुम इसमें अपना दिल नहीं लगाना चाहते, तुम अपने दिमाग का उपयोग नहीं करना चाहते, न ही तुम मशक्कत करना चाहते हो और तुम जिम्मेदारी लेने से भी डरते हो। तुम किस तरह के व्यक्ति हो? क्या तुम एक धूर्त व्यक्ति नहीं हो? तुम्हारी काबिलियत काफी खराब है, फिर भी तुम चालबाजियों से भरे हो! मुझ पर यह चाल आजमाना काम नहीं करेगा। यह काफी घृणित है कि तुम सिद्धांतों को नहीं समझ सकते, फिर भी तुम मुझ पर चालें चलने की कोशिश करते हो और जिम्मेदारी लेने से डरते हो। तुम सत्य को अभ्यास में कैसे ला सकते हो? अपना कर्तव्य निभाते समय जिम्मेदारी लेने से डरने की प्रकृति क्या है? क्या इस तरह से अपना कर्तव्य निभाने में कोई सच्चा दिल होता है? क्या कोई लगन होती है? (नहीं।) यदि तुम्हारे पास न तो सच्चा दिल है और न ही लगन है, तो क्या कोई जीवन प्रवेश है? क्या यह कर्तव्य का निर्वहन है? (नहीं।) तो इस तरह से अपना कर्तव्य निभाने की प्रकृति क्या है? यह श्रम करना है; यही इसकी प्रकृति है। जो कोई भी मेरे साथ दिमागी खेल खेलता है, वह मुझे घृणित लगता है। यदि तुम एक गंभीर, व्यावहारिक तरीके से काम करते हो, कोई बात नहीं समझ आने पर तुरंत खोजते हो, और पूछे जाने और स्पष्टता प्राप्त करने के बाद सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करते हो, तो भले ही तुम कभी-कभी विशेष परिस्थितियों में एक बार और पूछ लो, मैं तुम्हारी खराब काबिलियत से निराश नहीं होऊँगा। लेकिन यदि कोई हमेशा भीतर ही भीतर मुझसे होड़ कर रहा है, मेरे साथ दिमागी खेल खेल रहा है और मुझे मात देने की कोशिश कर रहा है, कोई भी जिम्मेदारी लेने से इनकार कर रहा है, अपने सामने आने वाली हर परिस्थिति के बारे में मुझसे पूछ रहा है, और मेरे द्वारा निर्देश दिए जाने के बाद ही कार्य कर रहा है, तो यह क्या समस्या है? बाहरी तौर पर, वह हर परिस्थिति में परमेश्वर के प्रति समर्पण करता हुआ प्रतीत होता है, लेकिन वास्तव में, वह चालाक बन रहा है। वह सोचता है कि यदि इस तरह से कार्य करते समय कुछ गलत हो जाता है, तो वह कोई जिम्मेदारी नहीं उठाएगा; साथ ही, वह दूसरों को यह देखने दे सकता है कि वह हर चीज में परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है। इसलिए, वह चाहे जो भी करे, वह हमेशा परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से जारी किए गए निर्देश सुनना चाहता है, मानो परमेश्वर के साथ उसका रिश्ता विशेष रूप से घनिष्ठ हो। उसे इस बात का एहसास नहीं है कि यह परमेश्वर के विचारों में विघ्न डालता है, उसके कार्य में विघ्न डालता है, और उसे उसके प्रति अरुचिकर और घृणित बनाता है। वह यहाँ तक सोचता है कि वह अपने कर्तव्य निभा रहा है और परमेश्वर के लिए खुद को खपा रहा है, परमेश्वर को इस तरह से उसका मार्गदर्शन करना चाहिए, परमेश्वर के घर को उसे इस तरह से कार्य करने की अनुमति देनी चाहिए और यह कि परमेश्वर के घर को उसे छोटे बच्चों की तरह लाड़-प्यार करना चाहिए। तभी वह भीतर से प्रसन्न महसूस करता है और यह महसूस करता है कि वह आनंद ले रहा है। यह किस तरह की सोच है? क्या यह कोई ऐसा व्यक्ति है जो सत्य का अनुसरण करता है? क्या ऐसे व्यक्ति के पास विवेक है? (नहीं।) जो लोग सत्य को समझते हैं वे विवेक के साथ कार्य करते हैं। कम से कम, वे उन समस्याओं को खुद हल करते हैं जिन्हें वे हल करने में सक्षम हैं और वे परमेश्वर को एक के बाद एक सवालों से परेशान नहीं करते हैं। भले ही वे किसी समस्या का समाधान खुद न कर सकें, उन्हें उन भाई-बहनों के साथ खोज और संगति करनी चाहिए जिनके साथ वे सहयोग करते हैं या उन लोगों के साथ जो सत्य को समझते हैं। इस तरह, वे समस्या का समाधान कर सकते हैं और अभ्यास का मार्ग ढूँढ़ सकते हैं। विवेकशील व्यक्ति ऐसा कर सकता है; बिना विवेक वाले लोग आसानी से बिना विचारे बुरे कर्म कर बैठते हैं। यदि जीवन प्रवेश वाला कोई व्यक्ति सत्य को समझता है, इसका अभ्यास कर सकता है और सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकता है, और उसने परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में अपनाया है, तो क्या परमेश्वर के प्रति उसका इस तरह का रवैया होगा या वह इस तरह का व्यवहार करेगा? क्या वह परमेश्वर के साथ इस तरह से मेलजोल करेगा? (नहीं।) वह ऐसा नहीं करेगा; यह निश्चित है। तो फिर, इस तरह का व्यवहार करने वाले लोगों के साथ क्या चल रहा है? स्पष्ट रूप से, उनके पास कभी जीवन प्रवेश नहीं रहा है। वे सब कुछ पूरी तरह से अपनी रुचियों और इरादों के अनुसार करते हैं, फिर भी वे लगातार दावा करते हैं, “मैं परमेश्वर के प्रति वफादार होने का इच्छुक हूँ, मैं परमेश्वर के लिए सेवा प्रदान करने का इच्छुक हूँ और मैं परमेश्वर के लिए मरने का इच्छुक हूँ! अगर मैं इच्छुक हूँ, तो मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जो परमेश्वर से प्रेम करता है और मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जो परमेश्वर के प्रति वफादार है और उसके प्रति समर्पण करता है!” इस आड़ में, वे सोचते हैं कि उनके पास जीवन है। उन्हें सच में ब्रह्मांड में अपनी जगह का पता नहीं है! क्या यह विवेक की कमी की अभिव्यक्ति नहीं है? (हाँ।) यदि किसी व्यक्ति के पास विवेक है, तो क्या वह इस “इच्छा” को लेकर इसे जीवन मानेगा? (नहीं।) क्यों नहीं? (क्योंकि वह देखता है कि उसमें अभी भी कई भ्रष्ट स्वभाव हैं जिनका समाधान नहीं हुआ है और ऐसे कई सत्य हैं जिन्हें वह अभ्यास में नहीं ला सकता है, वह महसूस करता है कि वह परमेश्वर की अपेक्षाओं से पीछे है, इसलिए वह नहीं सोचता कि उसके पास जीवन है।) विवेकशील व्यक्ति की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि वह अक्सर आत्म-चिंतन कर सकता है। जब उसे अपनी समस्याओं का पता चलता है, तो वह उनके साथ तर्कसंगत रूप से पेश आता है और उन्हें समझता है, और वह उन्हें हल करने के लिए सत्य खोजता है। केवल ऐसे व्यक्ति के पास ही सच्चा जीवन प्रवेश होता है। सत्य समझने वाले सभी लोगों को स्वयं का कुछ सच्चा ज्ञान होता है; उन सभी के पास स्वयं का सटीक मूल्यांकन और आकलन होता है। वे सटीक तौर पर जानते हैं कि उनकी काबिलियत क्या है, उनकी मानवता कैसी है, उन्होंने परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों को कितना अभ्यास में लाया है और उन्हें अभी कितना अभ्यास में लाना बाकी है। वे इन बातों पर विचार करेंगे और उन पर विचार करने के बाद, वे ये चीजें प्राप्त करेंगे। इन चीजों को प्राप्त करने के बाद, वे सोचते हैं, “मनुष्य के व्यक्तिपरक इरादे के संदर्भ में उसकी इच्छा जीवन नहीं है। केवल इच्छुक होना बेकार है; मैंने अभी तक सत्य को अभ्यास में नहीं लाया है। मेरे भीतर अभी भी भ्रष्टता और विद्रोहीपन है और मेरी मानवता बहुत अच्छी नहीं है। मैं हमेशा दूसरों के साथ अपनी तुलना करना चाहता हूँ, और मैं जो कुछ भी करता हूँ, मैं हमेशा एकतरफा और मनमाने ढंग से कार्य करना चाहता हूँ। मैं कभी भी मामलों पर चर्चा नहीं करना चाहता या किसी के साथ सहयोग नहीं करना चाहता; मैं बस खुद ही अंतिम निर्णय लेना चाहता हूँ। मैं हर किसी को नीची नजर से देखता हूँ और किसी का कोई लिहाज नहीं करता। ये मानवता होने की अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं और ये सत्य का अभ्यास करने की अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं!” परमेश्वर के वचनों और अपने भाई-बहनों की अनुभवजन्य गवाहियों से तुलना करके आत्म-चिंतन करने और स्वयं को जानने से, वे ये नतीजे हासिल कर सकते हैं और ये लाभ प्राप्त कर सकते हैं। ये लाभ प्राप्त करने के बाद, क्या वे अपने अनुसरण और अपनी विभिन्न अभिव्यक्तियों के बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं? (हाँ।) वे किस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं? (यह कि वे अभी तक ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो सत्य का अनुसरण करते हैं।) वे पहचानते हैं कि वे ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो सत्य का अनुसरण करते हैं, वे सत्य को नहीं समझते हैं और यह कि वे अभी भी परमेश्वर की अपेक्षाओं से बहुत पीछे हैं। वे पहचानते हैं कि अपना कर्तव्य निभाने में उन्होंने केवल थोड़ी-सी मशक्कत की है और अभी तक सत्य को अभ्यास में नहीं लाया है। यही वह निष्कर्ष है जिस पर वे पहुँचते हैं। तो क्या सत्य का अभ्यास करने का उनका इरादा और भी मजबूत नहीं हो जाता? (हाँ।) जब जमीर और विवेक वाले लोग चिंतन के माध्यम से इन नतीजों तक पहुँचते हैं, तब सत्य का अभ्यास करने का उनका इरादा और भी मजबूत हो जाता है। जब कुछ घटित होता है, तो वे विचार करते हैं कि उनके पास कौन-से विद्रोही विचार हैं, उनके पास कौन-से भ्रामक विचार और दृष्टिकोण हैं, उनके पास कौन-सी भ्रष्ट अवस्थाएँ और भ्रष्ट स्वभावों के खुलासे हैं, और उन्हें उनके खिलाफ कैसे विद्रोह करना चाहिए और कैसे उनका समाधान करना चाहिए। इन बातों पर विचार करने के बाद, वे फिर खोजेंगे कि परमेश्वर के वचन क्या कहते हैं और परमेश्वर मनुष्य से कैसे अभ्यास करने की अपेक्षा करता है, और फिर वे सत्य सिद्धांतों की तलाश करेंगे। जब वे सत्य सिद्धांत ढूँढ़ लेते हैं, तो सत्य का अभ्यास करने का उनका इरादा और भी मजबूत हो जाता है। वे जानते हैं कि परमेश्वर के अपेक्षित मानक क्या हैं और उन्हें विशेष संदर्भ में कैसे अभ्यास करना चाहिए। उनके लिए मार्ग स्पष्ट होता है और उनका अगला कदम अभ्यास करना होता है।

मुझे बताओ, क्या बिना तर्क-बुद्धि वाले लोग आत्म-चिंतन कर सकते हैं? (नहीं।) वे कभी आत्म-चिंतन नहीं करेंगे; वे हमेशा सोचते हैं कि यद्यपि उनमें भ्रष्ट स्वभाव हैं, फिर भी उन्होंने उन्हें कभी प्रकट नहीं किया है, वे हमेशा सही होते हैं और हर तरह से बाकी सभी से बेहतर हैं, और यह कि वे कभी गलत नहीं रहे हैं और उन्होंने कभी कुछ भी गलत नहीं किया है। वे इस तरह से क्यों सोच पाते हैं? तर्क-बुद्धि से रहित होने का यही मतलब है। बिना तर्क-बुद्धि वाले लोग आत्म-चिंतन नहीं करेंगे और परमेश्वर के वचनों से अपनी तुलना नहीं करेंगे। वे परमेश्वर के वचनों से अपनी तुलना नहीं करेंगे और उनके पास खुद का कोई अपेक्षाकृत सटीक मूल्यांकन, आकलन या ज्ञान नहीं होता, तो क्या उनमें सत्य का अभ्यास करने का इरादा होता है? यह इरादा उनमें पैदा नहीं हो सकता। तो क्या वे सत्य से प्रेम करेंगे? क्या वे सत्य खोजने के लिए परमेश्वर के सामने आएँगे? नहीं। उनका मानना है कि उन्होंने वह सब कुछ किया है जो उन्हें करना चाहिए था, ठीक वैसे ही जैसे पौलुस ने कहा था, “मैंने आस्था बनाए रखी है, मैंने अच्छी लड़ाई लड़ी है।” केवल थोड़ी मशक्कत करने के बाद, वे अपने बारे में यह निष्कर्ष निकालते हैं और इसलिए वे सत्य नहीं खोजते। बिना तर्क-बुद्धि वाले लोग खुद को इस तरह ठहराते हैं और सत्य नहीं खोजते, तो क्या वे सत्य का अभ्यास कर सकते हैं? (नहीं।) भले ही वे कभी-कभार कुछ विनियमों का पालन करते हों और खानापूरी करते हों, और बाहरी तौर पर ऐसा लगता हो मानो वे सत्य का अभ्यास कर रहे हैं, लेकिन असल में वे विनियमों का पालन कर रहे होते हैं, फिर भी उनका मानना होता है कि वे सत्य का अभ्यास कर रहे हैं। क्या यह खुद को धोखा देना नहीं है? लोग विनियमों का पालन करने के लिए इतने प्रवृत्त क्यों होते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सत्य खोजने में अच्छे नहीं हैं। यदि वे सत्य नहीं खोजते हैं, तो वे सत्य सिद्धांतों को बिल्कुल नहीं समझ सकते, और वे यह बिल्कुल नहीं समझ सकते कि सत्य का अभ्यास करने का मार्ग क्या है। इसलिए, वे जो कुछ भी करते हैं, वे केवल कुछ विनियमों का पालन करते हैं और खानापूरी करते हैं। वे स्पष्ट रूप से विनियमों का पालन कर रहे होते हैं, फिर भी कहते हैं कि वे सत्य का अभ्यास कर रहे हैं—यह एक दिखावा है, यह एक धोखा है और यह खिलवाड़ करना है। तुम केवल एक विनियम का पालन कर रहे हो। यह बिल्कुल पौलुस की तरह है : उसने अपने काम में और उपदेश देने में बहुत कष्ट सहे और बड़ी कीमत चुकाई, फिर भी उसने केवल खानापूरी की और कभी परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण नहीं किया। यानी, उसने जो कुछ भी किया, उसमें उसने कभी परमेश्वर के इरादे नहीं खोजे, कभी परमेश्वर के वचनों को दिल से नहीं लगाया, कभी उनके अनुसार अभ्यास नहीं किया और बस अपनी इच्छा के अनुसार कार्य किया। फिर उसने अपने कष्ट और खुद को खपाने को पूँजी के रूप में इस्तेमाल करके परमेश्वर से इनाम की माँग की : “मैंने वह दौड़ पूरी कर ली है जो मुझे दौड़नी चाहिए थी। मुझे मुकुट दो; मुझे इनाम दो!” किसी ने उससे पूछा, “क्या तुम जानते हो कि प्रभु यीशु कौन है?” उसने कहा, “वह मसीह है।” उसने उससे फिर पूछा, “तो तुम कौन हो?” उसने कहा, “मैं भी मसीह हूँ।” क्या उसकी असलियत उजागर नहीं हो गई थी? क्या उसमें सत्य का अभ्यास करने की कोई वास्तविक अभिव्यक्ति थी? (नहीं।) जो लोग कभी आत्म-चिंतन नहीं करते, वे कभी सत्य का अभ्यास करना नहीं जानेंगे। उन्हें सत्य का अभ्यास करने की कोई जागरूकता नहीं होती और वे कभी सत्य नहीं खोजेंगे। वे सत्य का अभ्यास करने का मार्ग नहीं ढूँढ सकते, सत्य का अभ्यास करने की बारीकियों को समझना तो दूर की बात है। इसलिए, जब वे जीवन अनुभव के बारे में गवाही लेख लिखने की कोशिश करते हैं, तो अपनी पूरी ताकत लगाने के बाद भी वे कुछ लिख नहीं पाते। वे बेतहाशा दिखावा करना चाहते हैं और बेतहाशा यह प्रदर्शित करना चाहते हैं कि वे क्या कर सकते हैं, लेकिन वे ऐसा नहीं कर सकते; वे इतने व्याकुल होते हैं कि उनके पसीने छूट जाते हैं, फिर भी वे कुछ नहीं लिख पाते। ऐसा क्यों है? उन्होंने कभी सत्य का अभ्यास नहीं किया है और वे कभी सत्य खोजने और उसका अभ्यास करने की प्रक्रिया से नहीं गुजरे हैं। क्या ये जीवन प्रवेश वाले लोग हैं? (नहीं।) क्या जीवन प्रवेश के बिना लोगों में जीवन होता है? उनमें जीवन नहीं होता। तो वे अपने कर्तव्य करते समय किस पर निर्भर रहते हैं? (वे अपनी इच्छा पर निर्भर रहते हैं और अपनी पसंद पर निर्भर रहते हैं।) यह कहना सही है कि वे अपनी इच्छा पर निर्भर रहते हैं और अपनी पसंद पर निर्भर रहते हैं, लेकिन फिर भी वे खुद के साथ अन्याय हुआ महसूस करते हैं और इसे स्वीकार नहीं करते। तो हम इसे इस तरह कह सकते हैं : वे अपने कर्तव्य करते समय किस पर निर्भर रहते हैं? वे बस इस पर निर्भर रहते हैं : “मैं सत्य का अभ्यास करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने का इच्छुक हूँ; मैं परमेश्वर के प्रति वफादार होने का इच्छुक हूँ; मैं सत्य के प्रति समर्पण करने का इच्छुक हूँ; मैं परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलने का इच्छुक हूँ; मैं पश्चात्ताप करने और अपनी गलतियाँ मानने का इच्छुक हूँ; मैं सत्य का अनुसरण करने और उद्धार के मार्ग पर चलने का इच्छुक हूँ।” वे अपने कर्तव्य करते समय बस “मैं इच्छुक हूँ” जैसी इच्छाओं पर निर्भर रहते हैं; यह उनके लिए अपनी इच्छा के अनुसार अपना कर्तव्य करने का आधार है। उनके लिए, यह “इच्छा” हर चीज की जगह ले सकती है और सब कुछ पूरा कर सकती है, लेकिन परमेश्वर के लिए, उनकी इच्छा एक कौड़ी के लायक भी नहीं है। क्यों? परमेश्वर तुम्हारे हृदय का अवलोकन करता है और वह जानता है कि तुम सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हो और सत्य का अनुसरण करने के इच्छुक हो। परमेश्वर तुम्हारे अभ्यास और तुम्हारे प्रवेश की प्रतीक्षा करता है, फिर भी वह कभी तुम्हारी ओर से कोई वास्तविक कार्रवाई नहीं देखता या तुम्हारी ओर से कोई जीवन प्रवेश नहीं देखता। इसलिए, ऐसे लोगों में कोई जीवन नहीं होता; यह निश्चित है। जिन लोगों में जीवन नहीं होता, उनकी एक बहुत ही स्पष्ट विशेषता होती है : वे परमेश्वर के साथ हमेशा उसी रवैये से पेश आते हैं जिससे वे किसी इंसान के साथ पेश आते हैं। वे हमेशा इस बारे में सोचते रहते हैं कि परमेश्वर से होड़ कैसे करें और उसके खिलाफ साजिश कैसे रचें, वे हमेशा यह अनुमान लगाते रहते हैं कि परमेश्वर उन्हें कैसे देखता है, और वे परमेश्वर के साथ हमेशा ऐसे पेश आते हैं मानो वे किसी अन्य व्यक्ति या किसी वरिष्ठ से मेलजोल कर रहे हों। उनमें परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं होता और उनमें परमेश्वर के प्रति समर्पण का रवैया भी नहीं होता। यह बिना जीवन वाले व्यक्ति की सबसे स्पष्ट विशेषता है। अपने हृदय में, वे हमेशा परमेश्वर के बारे में अनुमान लगाते रहते हैं : “तुम क्या सोच रहे हो? तुम्हारी आँखों के भाव का क्या मतलब है? तुम्हारे लहज़े और तुम्हारी आवाज के पीछे क्या अर्थ है? क्या तुम मुझे इसे इस तरह या उस तरह से करने के लिए कह रहे हो?” वे सत्य सिद्धांत नहीं खोजते; उनमें परमेश्वर का कोई भय नहीं होता, केवल संदेह, सतर्कता और होड़ होता है। बिना जीवन वाले व्यक्ति में कभी परमेश्वर का भय पैदा नहीं हो सकता और इसलिए उसमें देहधारी परमेश्वर के लिए सबसे बुनियादी सम्मान भी नहीं होता। जब तुम प्रार्थना करते हो तो तुम हमेशा “परमेश्वर, परमेश्वर” कह सकते हो और यह सुनने में बहुत अच्छा लग सकता है। बाहरी तौर पर, ऐसा लग सकता है मानो तुम देहधारी परमेश्वर का बहुत सम्मान करते हो, लेकिन असल में, चूँकि तुम्हारा कोई जीवन प्रवेश नहीं है और तुम परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में नहीं रखते, इसलिए जब तुम “परमेश्वर” पुकारते हो, तो तुम केवल एक शब्द बोल रहे होते हो। इसका यह मतलब नहीं है कि तुम परमेश्वर के सार और उसकी पहचान को जानते हो या सचमुच उसके साथ परमेश्वर के रूप में पेश आते हो। यह केवल संबोधन का एक रूप है, ठीक वैसे ही जैसे वे शब्द जिनका उपयोग तुम अपने माता-पिता, दादा-दादी या किसी बड़े को संबोधित करने के लिए करते हो। तुम्हारे लिए, “परमेश्वर” केवल एक सम्मानजनक संबोधन है, क्योंकि जहाँ तक तुम्हारा सवाल है, परमेश्वर तुम्हारी आराधना का लक्ष्य नहीं है और तुममें परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं है। क्या तुम समझे? (हाँ।) परमेश्वर के वचनों के किसी व्यक्ति का जीवन बन जाने के बाद ही उसमें धीरे-धीरे परमेश्वर का भय मानने वाला दिल पैदा होगा। यह कथन तुम लोगों को क्या दर्शाता है? परमेश्वर का भय मानने वाला दिल इसलिए पैदा होता है क्योंकि परमेश्वर के वचन व्यक्ति के भीतर जीवन बन गए हैं; यह व्यक्ति के जमीर और विवेक से पैदा नहीं होता। जमीर होने और विवेक होने से परमेश्वर का भय मानने वाला दिल पैदा नहीं हो सकता। भले ही तुम एक अच्छे व्यक्ति हो, एक नियम मानने वाले व्यक्ति हो और एक ऐसे व्यक्ति हो जो निष्कपट है और अपने उचित स्थान पर रहता है, यदि तुम्हें परमेश्वर का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है या तुम्हारा कभी जीवन प्रवेश नहीं हुआ है, तो अधिक से अधिक तुम्हारे मन में परमेश्वर के प्रति केवल थोड़ा सम्मान, शिष्टाचार और विनम्रता है; इसे भय नहीं कहा जा सकता। किसी व्यक्ति में परमेश्वर का भय इसलिए पैदा होता है क्योंकि परमेश्वर के वचन उसका जीवन बन गए हैं। इसलिए, यह मत सोचो कि केवल एक “इच्छा” सब कुछ समाहित कर सकती है या हर चीज की जगह ले सकती है। परमेश्वर के लिए, तुम्हारी इच्छा निरर्थक है और उसका बहुत कम मूल्य है। कुछ लोग कहते हैं, “क्या तुमने यह संगति नहीं की थी कि मनुष्य में परमेश्वर के प्रति समर्पण का रवैया होना चाहिए?” परमेश्वर के प्रति तुम्हारा रवैया और तुम्हारा व्यक्तिपरक इरादा—तुम क्या करने के इच्छुक हो—दो अलग-अलग चीजें हैं। परमेश्वर के प्रति समर्पण का रवैया होना वह तर्क-बुद्धि है जो तुममें होनी चाहिए, जबकि तुम्हारा व्यक्तिपरक इरादा और तुम्हारी इच्छा केवल तुम्हारी कोई चाहत या संकल्प है। मुख्य बात यह है कि तुम्हें इसे स्पष्ट रूप से पहचानना चाहिए : तुम्हारी इच्छा तुम्हें उद्धार के मार्ग पर ले जाने में सक्षम हो सकती है, और बेशक, यह तुम्हें उद्धार के मार्ग पर चलने देने के लिए एक पूर्वशर्त भी है, लेकिन सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक होने का यह मतलब नहीं है कि तुमने पहले ही इसका अभ्यास कर लिया है, न ही इसका यह मतलब है कि तुमने पहले ही सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर लिया है, इसका यह मतलब होना तो बिल्कुल नहीं है कि तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता है या तुम्हारा जीवन प्रवेश हो गया है। यानी, यदि तुम केवल सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक होने के चरण पर ही बने रहते हो, तो यह नहीं कहा जा सकता कि तुममें पहले से ही जीवन है। तो तुम्हारा सचमुच जीवन प्रवेश कब होता है? जब तुम सत्य का अभ्यास कर सकते हो और तुम खुद को जानते हो, और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अभ्यास कर सकते हो—केवल इसी का मतलब सचमुच जीवन प्रवेश होना है। तुम्हारा जीवन प्रवेश इसलिए होता है क्योंकि, सत्य की तुम्हारी समझ के माध्यम से, तुम्हारे विचारों और दृष्टिकोणों, परमेश्वर के प्रति तुम्हारे रवैये और तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों में अलग-अलग स्तर तक बदलाव आए हैं; परमेश्वर के प्रति तुम्हारा रवैया और अपना कर्तव्य करने के प्रति तुम्हारा रवैया सही हो गया है, और तुम अब अपने भ्रष्ट स्वभावों या भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों के अनुसार नहीं जीते हो; लोगों और चीजों पर अपने दृष्टिकोण में, और अपने स्व-आचरण और क्रियाकलापों में, तुम परमेश्वर के वचनों को अपना आधार बनाने और सत्य को अपनी कसौटी मानने में सक्षम हो—केवल यही जीवन होना है। क्या तुम लोगों में जीवन है? जब तुम्हारे पास ये वास्तविकताएँ होती हैं, केवल तभी तुममें जीवन होता है; इन वास्तविकताओं के बिना, तुममें जीवन नहीं होता। यदि तुममें जीवन नहीं है, तो तुम किस तरह के व्यक्ति हो? तुम एक जानवर हो, तुम एक दानव हो और तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो जो शैतान का है। जो लोग शैतान के हैं, वे अपने कर्तव्य करते समय किस पर निर्भर रहते हैं? वे अपने भ्रष्ट स्वभावों पर निर्भर रहते हैं और आशीष पाने की अपनी इच्छा पर निर्भर रहते हैं। अंतिम नतीजा क्या होता है? वे बेलगाम होकर गलत काम करते हैं; वे सत्य का अभ्यास करने में पूरी तरह से असमर्थ होते हैं, परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने में असमर्थ होते हैं, और उद्धार प्राप्त करने में तो और भी अधिक असमर्थ होते हैं। यही नतीजा है।

हमने अभी उन लोगों की कुछ अभिव्यक्तियों पर संगति की है जिनका कोई जीवन प्रवेश नहीं है। यह सुनने के बाद, कुछ लोग कहते हैं, “तो इसका मतलब है कि इतने समय तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी, हमारा अभी भी कोई जीवन प्रवेश नहीं है और हमने सत्य और जीवन प्राप्त नहीं किया है। तो, क्या तुम अपने हृदय में हमें नापसंद करते हो और हमसे बहुत तंग आ गए हो?” ऐसे लोग हमेशा इस बात की चिंता करते हैं कि मैं उनका मूल्यांकन कैसे करता हूँ। क्या यह सही है? (नहीं।) यह सही क्यों नहीं है? (परमेश्वर आज हमारे साथ इतनी ज्यादा संगति इसलिए करता है ताकि हम अपनी असली अवस्था को स्पष्ट रूप से पहचान सकें और स्पष्ट रूप से देख सकें कि अब तक हमने सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर कदम नहीं रखा है और अपने कर्तव्य करते समय, हम अभी भी श्रम करने के चरण में हैं। इससे हम समय रहते जाग सकते हैं और पश्चात्ताप कर सकते हैं, और इससे हम सत्य का अभ्यास करने का सही मार्ग ढूँढ सकते हैं। यदि हम परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों को समझने का प्रयास किए बिना केवल यह अनुमान लगाते हैं कि परमेश्वर हमारा मूल्यांकन कैसे करता है और हमें कैसे देखता है, तो यह सत्य का अनुसरण न करने की अभिव्यक्ति है, और अंततः हम फिर भी सत्य प्राप्त नहीं करेंगे।) मैं तुम्हारा मूल्यांकन कैसे करता हूँ या तुम्हारे बारे में मेरी क्या राय है, चाहे जो भी हो, यह ऐसा मामला नहीं है जिसकी तुम्हें परवाह करनी चाहिए और यह तुम्हारी चिंता का केंद्र नहीं है। क्या ऐसा नहीं है? (ऐसा ही है।) तुम यहाँ तक चाहते हो कि मैं तुम्हें पसंद करूँ और तुम्हारे बारे में मेरी अच्छी राय हो? तुम लोगों के प्रदर्शन को देखते हुए, यह पहले से ही काफी अच्छा है यदि तुम लोग ऐसा कर सको कि मुझे तुम लोगों से घृणा न हो। जहाँ तक इस बात का सवाल है कि मैं तुम लोगों को पसंद करता हूँ या नहीं, मेरी किसके बारे में अच्छी राय है और मैं किसे बहुत अच्छा मानता हूँ, इसके लिए मेरे अपने सिद्धांत हैं। यह ऐसा मामला नहीं है जिसकी तुम लोगों को परवाह करनी चाहिए, न ही यह ऐसी बात है जो तुम लोगों को जाननी चाहिए। इसके अलावा, बोलते समय तुम लोगों के प्रति मेरा रवैया चाहे जैसा भी हो या किसी भी व्यक्ति के बारे में मेरे विचार चाहे जैसे भी हों, मैं आवेश में आकर या भावनाओं में बहकर कार्य नहीं करूँगा, भावुकता में आकर तो बिल्कुल नहीं करूँगा; मैं तुम लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करूँगा। भले ही तुम लोगों का प्रदर्शन बहुत खराब हो, लेकिन नकारात्मक मत बनो और बाधित मत बनो। बस परमेश्वर के घर द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों के अनुसार वह कर्तव्य पूरा करने पर ध्यान केंद्रित करो जो तुम्हें करना चाहिए। जहाँ तक इस बात का सवाल है कि तुम लोगों में से प्रत्येक किस मार्ग पर चल सकता है, वह तुम लोगों के अनुसरणों और विकल्पों पर निर्भर करता है। बेशक, मेरे दृष्टिकोण से, मुझे उम्मीद है कि तुम लोगों में से हर कोई सत्य का अनुसरण कर सके, सत्य स्वीकार कर सके और उद्धार के मार्ग पर चल सके। विशेष रूप से, मुझे उम्मीद है कि तुम में से जो लोग मशक्कत करते हैं और भारी बोझ उठाते हैं और जो महत्वपूर्ण कर्तव्य करते हैं, आध्यात्मिक समझ वाले वे लोग जिनकी काबिलियत अपेक्षाकृत अच्छी है, और वे लोग जिनकी मानवता अच्छी है, वे सभी सत्य का अनुसरण करने वाले लोग बन जाएँगे, वे जल्द से जल्द उद्धार के मार्ग पर चलने में सक्षम होंगे, और सभी चीजों में सत्य का अभ्यास करने और जीवन प्रवेश प्राप्त करने में सक्षम होंगे। हालाँकि, यदि तुम लोग सत्य का अनुसरण करने और उद्धार के मार्ग पर चलने के अनिच्छुक हो, तो मैं तुम लोगों को मजबूर नहीं करूँगा; मैं तुम्हें बाध्य नहीं करूँगा। यह मेरा रवैया है। जहाँ तक तुम लोगों में से प्रत्येक की बात है, मैं जानता और समझता हूँ कि तुम्हारी काबिलियत कैसी है, तुम्हारा अनुसरण कैसा है और उनके बारे में मेरे अपने विचार हैं। लेकिन मैं अभी तुम लोगों के बारे में निष्कर्ष नहीं निकालूँगा। तुम लोग किस मार्ग पर चलते हो और तुम लोग कितनी दूर जा सकते हो, यह तुम लोगों के अपने विकल्पों पर निर्भर करता है। लोगों के साथ पेश आने के लिए परमेश्वर के घर के अपने सिद्धांत हैं। यदि तुम प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करते हो, तो कलीसिया सिद्धांतों के अनुसार तुम्हारे साथ वैसा ही व्यवहार करेगी जैसा उसे करना चाहिए। मैं तुम्हारा बचाव नहीं करूँगा; भले ही मैं तुम्हें बहुत अच्छा मानता हूँ, मैं तुम्हारा बचाव नहीं करूँगा। भले ही तुमने अतीत में बहुत मशक्कत की हो और तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसने कड़ी मशक्कत की है, भारी बोझ उठाया है और पहले परमेश्वर के घर के कार्य के किसी क्षेत्र में योगदान दिया है, यदि तुम प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करते हो, तो कलीसिया तुम्हारे साथ उसी तरह से निपटेगी जिस तरह से उसे निपटना चाहिए। तुम्हारे पैरों के छाले तुम्हारे अपने चलने से आए हैं; तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो, वह तुमने खुद चुना है। ये गलत मार्ग पर चलने के परिणाम हैं। इन मामलों से निपटना मेरे लिए सरल है। सामान्य मामलों को लेकर कुछ व्यक्तियों के साथ मेरा कुछ वास्ता पड़ता है। उनके काम करने का तरीका काफी अरुचिकर और काफी घृणित है, लेकिन मैं फिर भी उनके साथ सही ढंग से पेश आ सकता हूँ। लगातार मेरे विचारों का अनुमान लगाना बंद करो। मुझे उन लोगों से सख्त अरुचि है जो लगातार छिपे हुए अर्थ निकालते हैं और मेरे हाव-भाव देखते हैं, लगातार इस बारे में पूछताछ करते हैं कि मैं क्या सोच रहा हूँ, और लगातार इस बात का अनुमान लगाते हैं कि क्या मैं उन्हें पसंद करता हूँ या उनके बारे में मेरी क्या राय है। मुझे इन बातों से सबसे अधिक घृणा है। कभी भी मेरे विचारों का अनुमान मत लगाओ, कभी इस बात पर विचार मत करो कि मैं तुम्हें कैसे देखता हूँ और तुम्हारा मूल्यांकन कैसे करता हूँ या तुम्हारे लिए मेरी क्या योजनाएँ हैं और मैं तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार करूँगा। इन बातों के बारे में चिंता मत करो और इन पर विचार करने में ऊर्जा भी मत लगाओ। तुम इन पर जितना अधिक विचार करोगे, मुझे तुमसे उतनी ही अधिक घृणा होगी। सत्य पर संगति करते समय मैं तुम्हारी चाहे जिस भी समस्या के बारे में बताऊँ, यह तुम्हें पूरी तरह से खारिज करने के लिए नहीं है, यह तुम पर हमला करने के लिए नहीं है, न ही यह तुम्हें दोषी ठहराने के लिए है। बल्कि, यह तुम्हारी समस्याओं को हल करने में तुम्हारी मदद करने के लिए है ताकि तुम सत्य समझ सको, तुम्हारे पास अभ्यास का मार्ग हो और अंततः तुम उद्धार के मार्ग पर चलने में सक्षम हो सको। इसलिए, तुम्हें अपना ध्यान मेरे द्वारा उपयोग किए जाने वाले शब्दों या मेरी आवाज के लहज़े पर केंद्रित नहीं करना चाहिए। तुम्हें मेरी बातों की विषय-वस्तु पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, उससे अपनी तुलना करनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि क्या मेरी बातें तुम्हारी समस्या के बारे में हैं, और क्या वे तुम्हारी समस्या को हल कर सकती हैं। यदि मैं तुमसे कुछ अतिरिक्त शब्द कहूँ, यदि मैं तुम्हें बहुत अच्छा मानूँ या मैं तुम्हें किसी महत्वपूर्ण पद पर रखूँ, तो घमंडी मत बनो। कभी-कभी मैं तुमसे जो शब्द कहता हूँ वे बहुत कठोर और बहुत चुभने वाले होते हैं, और भले ही तुम्हें लगे कि मैं बहुत क्रोधित हूँ, तुम्हें बिल्कुल भी नकारात्मक नहीं होना चाहिए। मैं तुम पर हमला करने के लिए ऐसा नहीं कर रहा हूँ; मैं केवल मामले को निष्पक्ष रूप से सँभाल रहा हूँ और मामले को उसके गुण-दोष के आधार पर परख रहा हूँ। मैं ऐसा सत्य को लेकर उस पर स्पष्ट रूप से संगति करने और उस पर पूरी तरह से संगति करने के लिए करता हूँ, न कि व्यक्तिगत रूप से तुम्हें परेशानी में डालने के लिए। मैं तुम्हारी समस्या के बारे में संगति करता हूँ क्योंकि इसमें सत्य का कोई पहलू शामिल है या इसमें मानवजाति की अवस्था का कोई पहलू शामिल है। हमें इसके बारे में संगति करने की आवश्यकता है ताकि हर कोई इस मामले के माध्यम से अंतर्दृष्टि प्राप्त कर सके और सबक सीख सके। मेरे विचारों का अनुमान मत लगाओ; यदि तुम ऐसा करते हो, तो तुम गलत जगह पर मशक्कत कर रहे हो। क्या तुम समझे? (हाँ।) यदि तुम हर दिन इस बात पर विचार करते हो कि मैं क्या सोच रहा हूँ, मैं तुम्हें कैसे देखता हूँ और तुम्हारा मूल्यांकन कैसे करता हूँ, तुम्हारे लिए मेरी क्या योजनाएँ हैं और क्या मैं तुम्हारे साथ निपटने वाला हूँ या तुम्हें कष्ट देने वाला हूँ—यदि तुम हमेशा इन बातों के बारे में सोच रहे हो, तो तुम गलत हो और तुम गलत जगह पर मशक्कत कर रहे हो। यदि मैं तुम्हारे साथ निपटना चाहता, तो मुझे व्यक्तिगत रूप से ऐसा करने की आवश्यकता नहीं होती; अगुआ और कार्यकर्ता सिद्धांतों के अनुसार सीधे तुम्हारे साथ निपटते। परमेश्वर के घर में प्रशासनिक नियम हैं, और कलीसिया सिद्धांतों के अनुसार प्रक्रियाओं का पालन करेगी और मामले से निष्पक्ष रूप से निपटेगी। यदि मैं तुम्हारे साथ निपटना चाहता, तो मैं कलीसिया अगुआओं और कार्यकर्ताओं से सत्य पर संगति करने और तुम्हारी अभिव्यक्तियों के आधार पर समस्या को हल करने के लिए कहता, और फिर उनसे सिद्धांतों के अनुसार तुम्हारे साथ निपटने के लिए कहता; ऐसा करना बहुत आसान होता। इसलिए, तुम्हें छिपे हुए अर्थ निकालने और मेरे हाव-भाव देखने की आवश्यकता नहीं है, और तुम्हें मेरी बातों में इशारे ढूँढने की भी आवश्यकता नहीं है, मेरी आवाज के लहज़े पर ध्यान देने की आवश्यकता बिल्कुल नहीं है। यदि तुम परमेश्वर में सच्चा विश्वास करते हो, यदि तुम मानते हो कि परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख करता है, और यदि तुम मानते हो कि परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन का स्रोत है, तो तुम्हें मेरे बारे में ये अनुमान नहीं लगाने चाहिए या मेरे साथ इस तरह पेश नहीं आना चाहिए। क्या तुम समझे? (हाँ।) मुझे तुम्हारा इस तरह से और इस मानसिकता के साथ मुझसे पेश आना पसंद नहीं है। मेरे लिए तुम्हारे सार को समझना, तुम्हारी मानवता को समझना और तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों को समझना बिल्कुल स्वाभाविक और उचित है। लेकिन यदि तुम यह समझना चाहते हो कि मैं अपने हृदय में क्या सोच रहा हूँ, मैं तुम्हें कैसे देखता हूँ और मैं तुम्हारे साथ क्या करने की योजना बना रहा हूँ, तो तुम गलत हो। क्या तुम जानते हो कि तुम कहाँ गलत हो? (हमने गलत स्थान ले लिया है।) यह गलत स्थान लेना है। यदि तुम मेरे साथ पेश आते समय गलत स्थान लेते हो, तो तुम बड़े खतरे में हो। तुम्हें किसी भी स्थिति में इस मार्ग पर नहीं चलना चाहिए; यदि तुम ऐसा करते हो, तो तुम खतरे में होगे।

परमेश्वर में विश्वास करने में, छिपे हुए अर्थ निकालने और परमेश्वर के हाव-भाव देखने की कोई आवश्यकता नहीं है, न ही तुम्हें उसके प्रति सतर्क या संदेही होना चाहिए। क्या तुम लोग अपने दिलों में स्पष्ट रूप से जानते हो कि तुम लोगों को क्या करना चाहिए और कैसे कार्य करना चाहिए? (अब यह थोड़ा अधिक स्पष्ट है। हमें परमेश्वर के साथ खुला और ईमानदार होना चाहिए और परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचनों और जिन सत्यों पर वह संगति करता है, उनमें मशक्कत करना चाहिए।) ये बातें कहनी आसान हैं, लेकिन क्या इन्हें अभ्यास में लाना आसान है? (नहीं।) जब मैं कुछ लोगों की अवस्थाओं और समस्याओं को उजागर करता हूँ और उनका गहन-विश्लेषण करता हूँ, यदि मैं नरमी से बोलता हूँ, तो कुछ लोग इसे एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देते हैं; यदि मैं अधिक सख्ती से या कठोरता से बोलता हूँ, तो कुछ लोग परेशान महसूस करते हैं और नकारात्मक हो जाते हैं, वे कहते हैं, “मुझसे बात करते समय परमेश्वर बहुत क्रोधित होता है। वह निश्चित रूप से अब मुझे पसंद नहीं करता है और वह मुझसे असंतुष्ट है, तो क्या मैंने उद्धार पाने की सारी उम्मीद नहीं खो दी है? परमेश्वर अब मुझे चाहता भी नहीं है, तो जीने का क्या मतलब है? इससे अच्छा तो मैं मर ही जाऊँ!” क्या इसे समझने का यह सही तरीका है? (नहीं।) क्या तुम लोग इस तरह सोचोगे? (नहीं।) कुछ लोग ढीठ होते हैं। चाहे उन्हें कितना भी उजागर किया जाए या उनकी कितनी भी काट-छाँट की जाए, उन्हें कोई परवाह नहीं होती। तुम उनसे चाहे जो भी कहो, वे अपने दिलों में परेशान महसूस नहीं करते, वे सोचते हैं, “तुम जो चाहो कह सकते हो। यदि मैं इसे अपने दिल में स्वीकार नहीं करता, तो तुम कुछ नहीं कर सकते। तुम मेरी काट-छाँट कर सकते हो, लेकिन जब तक तुम मुझे बाहर नहीं निकालते या निष्कासित नहीं करते, मैं नकारात्मक नहीं होऊँगा, न ही मैं कमजोर पडूँगा। मैं वैसे ही काम करता रहूँगा जैसे मैं पहले करता था। मैं बस सत्य का अभ्यास नहीं करूँगा। जब तक मैं बुराई नहीं करता, तुम मेरा क्या कर सकते हो?” यह परेशानी वाली बात है। यदि वे न तो सत्य स्वीकार करते हैं और न ही सत्य का अभ्यास करते हैं, तो क्या वे फिर भी उद्धार प्राप्त कर सकते हैं? (नहीं।) देखो, लोगों से निपटना बहुत कठिन है। किस बात से उनसे निपटना कठिन हो जाता है? एक लिहाज से, उनमें हर तरह के भ्रामक विचार और दृष्टिकोण होते हैं; दूसरे लिहाज से, उनके पास कुछ घातक होता है—उनके भ्रष्ट स्वभाव। भ्रामक विचार और दृष्टिकोण इस बात का कारण बनते हैं कि जब कुछ चीजों की बात आती है, तो तुम्हारी समझ और बोध भ्रामक होते हैं, और तुम्हारे रवैये भ्रामक होते हैं। इस आधार पर, तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों के माध्यम से अपने भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों को भी व्यक्त करते हो, जिससे एक गलती पर दूसरी गलती होती है। क्या इससे निपटना कठिन नहीं है? (हाँ।) तुम्हारे विचार और रवैये अपने आप में भ्रामक हैं, फिर भी तुम उनसे चिपके रहते हो, फिर भी खुद को समझाने और सही ठहराने की कोशिश करते हो और सत्य स्वीकार करने से इनकार करते हो। यहाँ तक कि तुम खुद को दोषमुक्त करने और जिम्मेदारी से बचने के लिए कुछ हथकंडों का भी इस्तेमाल करते हो और हर तरह के कारण और बहाने देते हो। क्या यह अपने भ्रामक विचारों से चिपके रहते हुए भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करना नहीं है? (हाँ।) भ्रष्ट स्वभाव होना पहले से ही बहुत परेशानी वाली बात है, फिर भी तुम भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों से चिपके रहते हो। क्या यह समस्या को गंभीर नहीं बनाता? यह उजागर करता है कि तुम अपने दिल में अड़ियल हो, सत्य के प्रति अरुचि रखते हो, अहंकारी और धोखेबाज हो, और तुम जो कुछ भी कहते हो उसमें कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते। क्या यह एक जीता-जागता शैतान नहीं है? (हाँ।) यदि तुम इस तरह से आचरण करते हो, तो तुम कभी सत्य और जीवन प्राप्त नहीं करोगे। यदि इसे पहचानने के बाद, तुम अपने भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों को छोड़ सकते हो, चीजों से निपटने के लिए उनका उपयोग करना बंद कर सकते हो, अपने गलत रवैये को बदल सकते हो और परमेश्वर के वचनों के अनुसार और उस तरीके से जो परमेश्वर मनुष्य को सिखाता है, परमेश्वर का भय मानने वाले दिल के साथ ईमानदारी और सच्चाई से उन समस्याओं को हल कर सकते हो जिनका तुम सामना करते हो, तो तुम्हारे पास जीवन प्रवेश है। एक बार जब तुम्हारे पास जीवन प्रवेश होता है, एक बार जब तुम अपने भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों के खिलाफ विद्रोह कर देते हो, उनका समाधान कर लेते हो और उन्हें छोड़ देते हो, और एक बार जब तुम्हारे सत्य का अभ्यास करने और जीवन प्रवेश प्राप्त करने की प्रक्रिया में तुम्हारे द्वारा अपने शैतानी स्वभावों के खिलाफ विद्रोह कर दिया जाता है, उनका समाधान कर लिया जाता है और उन्हें त्याग दिया जाता है, तो वह क्या है जिसे तुम जीते हो और प्रकट करते हो? वे चीजें जो सत्य सिद्धांतों के अनुसार होती हैं और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार होती हैं। इसलिए तुम जो जीते हो वह सत्य का वह जीवन है जिसकी परमेश्वर अपेक्षा करता है। क्या ऐसा नहीं है? (ऐसा ही है।) जीवन प्रवेश प्राप्त करने की कुंजी क्या है? (सत्य का अभ्यास करने की केवल चाहत और व्यक्तिपरक इरादा होना ही पर्याप्त नहीं है; व्यक्ति में सत्य का अभ्यास करने की वास्तविक अभिव्यक्तियाँ होनी चाहिए।) हर कोई इसे धर्म-सिद्धांत के रूप में जानता और समझता है, लेकिन इसे अभ्यास में लाना इतना आसान नहीं है; यह कठिन है। यह कुछ हद तक इस बात से संबंधित है कि किसी व्यक्ति की मानवता अच्छी है या बुरी। जमीर और विवेक वाले लोग सत्य स्वीकार कर सकते हैं, इसलिए उनके लिए इसका अभ्यास करना कम कठिन होता है; यदि वे मशक्कत करते हैं, तो वे इसे अभ्यास में ला सकते हैं। बिना जमीर और विवेक वाले लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, इसलिए उनके लिए इसका अभ्यास करना बहुत कठिन होता है; वे बस ऐसा नहीं कर सकते। केवल उन्हीं के पास जीवन प्रवेश होता है जो सत्य का अभ्यास कर सकते हैं। नियमित रूप से सत्य का अभ्यास करके, वे धीरे-धीरे जीवन प्राप्त करते हैं। जो लोग सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते, वे जीवन प्रवेश से दूर बहुत दूर होते जाते हैं और जीवन प्राप्त नहीं कर सकते, है ना? (हाँ।) यह पहलू एक बहुत ही सरल मुद्दा है; यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर अक्सर लोगों के दैनिक जीवन में चर्चा की जाती है। कुछ लोगों के मन में थोड़ी अवधारणात्मक समझ हो सकती है, लेकिन फिर भी उनमें इस मुद्दे के व्यक्तिगत अनुभव और समझ की कमी होती है। यदि उनसे अपनी समझ के बारे में बोलने के लिए कहा जाए, तो वे इसे स्पष्ट रूप से नहीं समझा सकते और वे इसे साफ-साफ नहीं समझा सकते। इस तरह संगति करने से, क्या तुम लोग अब स्पष्ट हो? (हाँ।) तो इसका सारांश निकालो : परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच-परख करता है, तो फिर वह मनुष्य को क्यों परखता है? (क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर द्वारा इंतजाम किए गए परिवेशों के माध्यम से व्यावहारिक रूप से परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने, अपने भ्रष्ट स्वभावों को जानने और सत्य को अपने जीवन के रूप में प्राप्त करने की आवश्यकता होती है। यह एक ऐसी प्रक्रिया भी है जिसमें परमेश्वर सत्य को लेता है और अपने वचनों को लेता है, और उन्हें मनुष्य में गढ़ता है। इस प्रक्रिया में, मनुष्य बार-बार अपने भ्रष्ट स्वभावों के खिलाफ संघर्ष करता है, बार-बार अपने गलत विचारों और दृष्टिकोणों को नकारता है, और धीरे-धीरे देह के खिलाफ विद्रोह करने और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने में सक्षम हो जाता है; अंततः, वह सत्य का अभ्यास कर सकता है और इसे प्राप्त कर सकता है।) इस प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से समझाया गया है। क्या तुम सभी लोग समझते हो? (हाँ।) इस तरह से देखा जाए, तो यह प्रश्न बहुत सरल लगता है। शब्दों में स्पष्टीकरण सरल लग सकता है, लेकिन इसे अभ्यास में लाने में कई बारीकियाँ शामिल होती हैं। सिद्धांत रूप में, जैसा कि शब्दों में निर्धारित किया गया है, यह ऐसे ही काम करता है। मूल रूप से, अब इस प्रश्न पर स्पष्ट रूप से संगति की जा चुकी है : परमेश्वर द्वारा मनुष्य को परखना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें परमेश्वर अपने वचनों को लेता है और उन्हें मनुष्य में गढ़ता है ताकि वे वचन उसका जीवन बन जाएँ; यह परमेश्वर के कार्य करने का एक तरीका है और यह एक ऐसी प्रक्रिया भी है जिसका मनुष्य को उद्धार प्राप्त करने के लिए अवश्य अनुभव करना चाहिए। इस विषय पर हमारी संगति यहीं समाप्त होती है।

मैं तुम लोगों को बताता हूँ कि किसी ने कैसा व्यवहार किया और तुम लोग सुन और देख सकते हो कि समस्या क्या थी। उस सर्दी के मौसम में बर्फ गिरी थी और मैंने लोगों से कहा कि उन्हें जाकर बर्फ हटानी चाहिए। किसी ने पूछा कि इसे लोगों द्वारा हटाया जाना चाहिए या मशीन द्वारा। मैंने कहा, “अगर बर्फ बहुत गहरी है, तो मशीन का उपयोग करो; अगर लोग इसे हटा सकते हैं, तो मशीन का उपयोग मत करो।” यद्यपि मैंने उसे यह नहीं बताया कि मशीन का उपयोग करने से पहले बर्फ कितनी गहरी होनी चाहिए या लोगों को इसे किन परिस्थितियों में हटाना चाहिए, फिर भी मैंने उसे सिद्धांत बता दिया था। लेकिन वह इसे समझ ही नहीं सका और बिल्कुल नहीं जानता था कि बर्फ कैसे हटानी है। मुझे बताओ, क्या मेरी बातें समझने में आसान नहीं थीं? अगर तुम लोगों को इसे कार्यान्वित करने के लिए कहा जाता, तो तुम लोग इसे कैसे कार्यान्वित करते? (सबसे पहले, मैं यह देखता कि जमा हुई बर्फ कितनी गहरी है और वास्तविक स्थिति के आधार पर निर्णय लेता।) कुछ जगहों पर, जमा हुई बर्फ एक मीटर गहरी थी, जबकि अन्य जगहों पर यह केवल पाँच इंच गहरी थी। ऐसे में तुम क्या करते? (अगर अधिकांश जगहों पर बर्फ पाँच इंच से कम गहरी थी, तो लोगों को इसे हटाना चाहिए और कुछ इक्का-दुक्का जगहों को साफ करने के लिए मशीन का उपयोग किया जा सकता था।) तुम लोग इस सिद्धांत के बारे में क्या सोचते हो? (यह उचित है।) कुछ लोग इतनी सरल चीज को भी कार्यान्वित करना नहीं जानते। इसे कार्यान्वित करना न जानने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है सामान्य परिस्थितियों को सँभालना भी न जानना। जब बर्फ एक इंच गहरी थी, तो उसने पूछा, “क्या हमें बाहर जाकर बर्फ हटानी चाहिए? क्या लोगों को इसे हटाना चाहिए या हमें मशीन का उपयोग करना चाहिए?” मैंने कहा, “तुम बर्फ गिरना बंद होने के बाद ही बर्फ हटा सकते हो। अगर बर्फ इतनी गहरी हो जाए कि लोग उसे न हटा सकें, तो इससे निपटने के लिए मशीन का उपयोग करो। यह सिद्धांत है।” उसने कहा कि वह समझ गया। जब बर्फ दो इंच गहरी हो गई, तो वह फिर से यह पूछने आया कि क्या इसे हटाया जाना चाहिए और मैंने एक बार फिर सिद्धांत दोहराया। जब बर्फ सात इंच गहरी हो गई, तो वह फिर से पूछने आया। मुझे बताओ, क्या इस व्यक्ति में कोई काबिलियत है? (नहीं।) मैंने कई बार सिद्धांत बताया, फिर भी वह इसे समझ नहीं सका और बार-बार पूछता रहा कि क्या किया जाना चाहिए। वह यह नहीं समझ सका कि बर्फ कब हटाई जानी चाहिए, किन परिस्थितियों में लोगों को इसे हटाना चाहिए या किन परिस्थितियों में मशीन का उपयोग किया जाना चाहिए। उसकी काबिलियत कितनी खराब होगी? ऐसे व्यक्ति के लिए कार्य की व्यवस्था करते समय उसे समझाने से पहले और कितना कुछ कहना पड़ेगा? ऐसा व्यक्ति किसी भी चीज को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकता। तो उसके इस व्यवहार के साथ क्या समस्या थी? क्या वह मेरी बात समझ गया? (वह नहीं समझा; वह विनियमों का पालन कर रहा था।) अगर वह विनियमों का पालन कर रहा था, तो उसे जल्दी से बर्फ हटानी चाहिए थी। चाहे उसने इसे हटाने के लिए लोगों की व्यवस्था की हो या मशीन से हटवाया हो, उसे कम से कम किसी एक उपाय पर तो टिके रहना चाहिए था। लेकिन क्या वह किसी एक उपाय पर टिका रहा? वह बर्फ हटाने नहीं गया; वह बस बार-बार पूछता रहा कि क्या इसे हटाया जाना चाहिए और क्या लोगों को इसे हटाना चाहिए या मशीन का उपयोग किया जाना चाहिए। वह कुछ करने के बजाय पूछता क्यों रहा? (वह वास्तव में इसे हटाने के लिए मशीन का उपयोग करना चाहता था, लेकिन उसने खुद निर्णय नहीं लिया; वह बस परमेश्वर के कहने का इंतजार कर रहा था।) वह मेरे कहने का इंतजार कर रहा था। क्या उसके इस रवैये से समर्पण करने का कोई इरादा दिखाई दिया? (नहीं।) सबसे पहले, आओ देखें कि क्या वह मेरे द्वारा बताए गए सिद्धांत को समझ सका। क्या वह मेरी बात समझा? (नहीं।) वह नहीं समझा। वह बस यह चाहता था कि मैं उसे सीधे बताऊँ कि क्या करना है, क्या नहीं करना है और इसे कैसे करना है। वह केवल इसी तरह की बातें समझ सकता था; वह सिद्धांतों को बिल्कुल नहीं समझ सकता था। सिद्धांत सुनने के बाद, वह पूरी तरह से उलझन में पड़ गया, मानो वह बिना शब्दों वाली कोई स्वर्गिक पुस्तक पढ़ रहा हो और उसे लगा कि सब कुछ एक रहस्य है। वह सिद्धांत को नहीं समझ सका और नहीं जानता था कि क्या करना है, इसलिए जब जमा हुई बर्फ से निपटने की बात आई, तो वह बस यही जानता था कि बार-बार पूछता रहे कि क्या लोगों को इसे हटाना चाहिए या मशीन का उपयोग किया जाना चाहिए। मुझे बताओ, क्या इस तरह के व्यक्ति से निपटना तुम लोगों को असहज और परेशान नहीं करता? (हाँ, यह मुझे परेशान करता है और बहुत थका देता है।) ऐसे व्यक्ति से निपटना कैसा होता है? इसका वर्णन करो। (यह कुछ-कुछ दीवार से बात करने जैसा है; तुम चाहे जो भी कहो, वह नहीं समझता।) क्या इस तरह के व्यक्ति से बात करना तीन से पाँच साल के बच्चे से निपटने जैसा नहीं है? क्या यह किसी जानवर से बात करने जैसा नहीं है? (हाँ।) तो मुझे बताओ, क्या इस तरह के व्यक्ति से निपटना थका देने वाला है? क्या इससे तुम लोगों को गुस्सा आता है? (हाँ, इससे मुझे गुस्सा आता है।) इस तरह के व्यक्ति से निपटना गुस्सा दिलाने वाला और थका देने वाला दोनों है। तो इस तरह के व्यक्ति से कैसे निपटा जाना चाहिए? बस उसे तुरंत चलता करो और बात खत्म करो। उसका उपयोग करो जो इस सिद्धांत को समझ सके और इसे सुनने के बाद, इस सिद्धांत के अनुसार अभ्यास कर सके और कार्य को पूरा कर सके और मामले का समाधान कर सके। जो व्यक्ति सिद्धांत नहीं समझ सकता, उससे कुछ भी कहना बेकार है। तुम चाहे जैसे भी समझाओ, वह फिर भी नहीं समझेगा और किसी मूर्ख की तरह अंतहीन सवालों से तुम्हें परेशान करेगा। वह यहाँ तक सोचता है कि इस तरह सवाल पूछना बहुत उचित है, यह सोचते हुए, “देखो, क्या मैं यह काम बहुत विशिष्ट और बहुत सूक्ष्म तरीके से नहीं कर रहा हूँ? जब बर्फ एक इंच गहरी थी, तो मैंने जल्दी से पूछा कि क्या इसे हटाया जाना चाहिए, और जब यह दो इंच हो गई, तो मैंने देरी करने की हिम्मत नहीं की और जल्दी से फिर पूछा। देखो, मैं बिना सोचे-विचारे काम नहीं करता। क्या मुझमें समर्पण और वफादारी नहीं है? क्या मैं जिम्मेदार नहीं हूँ? मैं किसी चीज में ज़रा-सी भी देरी किए बिना तुरंत सवाल पूछता हूँ और समय पर प्रतिक्रिया देता हूँ!” क्या वह खुद से काफी प्रभावित नहीं है? (हाँ।) अगर तुम उसे हटा देते हो, तो वह क्या सोचेगा? वह आहत भी महसूस करेगा, यह सोचते हुए, “मैंने इस मामले के लिए इतनी चिंता की और इतनी भागदौड़ की! क्या यह मेरे लिए आसान रहा है? अंत में मुझे कैसे हटाया जा सकता है?” क्या वह अपने दिल में इसे स्वीकार करेगा? (नहीं।) इस तरह के व्यक्ति की काबिलियत बहुत खराब होती है। सत्य सिद्धांतों का उसकी समझ से बाहर होना तो दूर की बात है; यहाँ तक कि किसी साधारण कार्य को करने के सिद्धांत भी उसकी समझ में नहीं आते और उसकी पहुँच से बाहर होते हैं। उसमें किसी सामान्य व्यक्ति की बुद्धिमत्ता नहीं होती है, तो सत्य उसकी पहुँच में कैसे हो सकता है? उसे हटा देना वास्तव में सिद्धांतों के अनुसार है, लेकिन वह इसे नहीं समझता और यहाँ तक कि खुद के साथ अन्याय हुआ और आहत महसूस करता है। इस तरह का व्यक्ति छोटे मामलों में भी सिद्धांतों को नहीं समझ सकता, तो क्या बड़े मामले, सत्य से जुड़े मामले उसकी पहुँच में हैं? (नहीं।) बिल्कुल भी नहीं। इसलिए, कुछ लोग जो सत्य को नहीं समझ सकते, उनके लिए सत्य सिद्धांत उनकी पहुँच से बाहर हैं। क्या ऐसे लोग सत्य का अभ्यास कर सकते हैं? (नहीं।) कुछ लोग कहते हैं, “तुम्हारे कहने के अनुसार, चूँकि इस तरह का व्यक्ति सत्य का अभ्यास नहीं कर सकता, तो क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि वह उद्धार प्राप्त नहीं कर सकता?” क्या ऐसा ही है? अगर सत्य सिद्धांत तुम्हारी पहुँच से बाहर हैं तो तुम्हें क्या करना चाहिए? एक सरल तरीका है जो तुम्हें अंत तक अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम बनाएगा। अगर सत्य सिद्धांत तुम्हारी पहुँच से बाहर हैं, तो एक विनियम का पालन करो : अपना कर्तव्य निभाने में, तुम्हारे पास एक सच्चा और निष्कपट दिल होना चाहिए, तुम जो कर सकते हो उसे यथासंभव अच्छे से करने के लिए अपने जमीर और विवेक पर निर्भर रहो, और तुम्हें बिल्कुल भी दाँव-पेंच नहीं खेलने चाहिए। यह देखते हुए कि तुम्हारी काबिलियत पहले से ही बहुत खराब है और तुममें सत्य समझने की क्षमता नहीं है, अगर, अपना कर्तव्य निभाने में, तुम्हारे पास अभी भी बिल्कुल भी सच्चा दिल नहीं है और तुम अभी भी दाँव-पेंच खेलते हो, तो क्या यह दानवी प्रकृति नहीं है? ऐसा व्यक्ति खत्म हो जाता है। तो अपना कर्तव्य निभाने में सच्चा दिल होने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है उतना करना जितना करने में तुम सक्षम हो। उदाहरण के लिए, बर्फ हटाने को ही ले लो। दिए गए सिद्धांत के अनुसार, अगर लोग इसे हटा सकते हैं तो उन्हें हटाना चाहिए, और अगर वे नहीं हटा सकते तो मशीन का उपयोग करना चाहिए। अगर तुम देखते हो कि एक इंच बर्फ गिरी है और नहीं जानते कि इसे हाथ से हटाया जाना चाहिए या मशीन से, तो तुम पहले इसे हटाना शुरू कर सकते हो और मशीन का उपयोग केवल तभी कर सकते हो जब तुम वास्तव में इसे हाथ से नहीं हटा सकते। यद्यपि तुम नहीं जानते कि ऐसा करना सही है या नहीं, फिर भी तुम बिना चालाकी किए या कामचोरी किए, अपनी पूरी ताकत से इसे करते हो। भले ही तुम्हारे द्वारा की गई मशक्कत बेकार साबित हो, कम से कम, परमेश्वर के सामने तुम्हारा दिल सच्चा है। जब परमेश्वर देखता है कि तुम्हारा दिल सच्चा है और तुमने चालाकी या कामचोरी नहीं की है और उसके साथ दाँव-पेंच नहीं खेले हैं, तो परमेश्वर तुम्हारे अच्छे व्यवहार को स्वीकार करेगा। लेकिन अगर तुम चालाकी और कामचोरी करते हो और परमेश्वर के साथ दाँव-पेंच खेलते हो, तो परमेश्वर तुमसे घृणा करेगा, और अगर तुम पश्चात्ताप नहीं करते, तो परमेश्वर तुम्हें दोषी ठहराएगा और तुम्हें हटा देगा। परमेश्वर के साथ दाँव-पेंच खेलने की कुछ अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? तुम मन ही मन सोचते हो, “मुझे अभी दिया गया सिद्धांत समझ नहीं आया। एक इंच बर्फ गिरी है, तो क्या इसे हाथ से हटाया जाना चाहिए या मशीन का उपयोग किया जाना चाहिए? अगर इसे हाथ से नहीं हटाया जाना चाहिए और मैं ठीक वैसा ही करता हूँ, तो क्या इसका अर्थ अतिरिक्त मशक्कत करना नहीं होगा? अगर मैं मशीन का उपयोग करता हूँ, तो क्या होगा अगर बर्फ गहरी न हो और इसे हाथ से हटाया जाना चाहिए, लेकिन मैं मशीन का उपयोग करूँ—क्या मुझ पर बोना सोचे-विचारे मशीन का उपयोग करने और ईंधन बर्बाद करने का आरोप नहीं लगेगा? मैं निश्चित रूप से बिना सोचे-विचारे काम नहीं कर सकता। अगर मैं ऐसा करता हूँ, तो न केवल मेरी सारी मशक्कत बर्बाद हो सकती है, बल्कि मुझ पर आरोप भी लगेगा। यहाँ तक कि मेरी काट-छाँट भी की जा सकती है और मुझे नुकसान की भरपाई करने के लिए भी कहा जा सकता है। काम करने से पहले मुझे स्पष्ट उत्तर प्राप्त कर लेना चाहिए।” तुम्हारे दिमाग में इस तरह की योजना होती है। इसे क्या कहा जाता है? (धोखेबाजी।) यह दाँव-पेंच खेलना है। जब उस व्यक्ति ने इस तरह दाँव-पेंच खेले, तो बाहर से वह समर्पित लग सकता था और उसने दिखावा किया कि वह मार्गदर्शन माँग रहा था और बिना सोचे-विचारे काम नहीं कर रहा था, लेकिन वास्तव में उसके छिपे हुए इरादे थे। लोग नहीं समझ सकते थे, लेकिन परमेश्वर ने बहुत पहले ही देख लिया था कि यह व्यक्ति निष्कपट नहीं था। वह काम नहीं करना चाहता था, इसलिए वह हमेशा सवाल पूछने के बहाने ढूँढता रहता था। उसने अपने इरादे को छिपाने के लिए एक प्रकार के अच्छे व्यवहार को छद्म के रूप में इस्तेमाल किया। जब कोई व्यक्ति इस तरह दाँव-पेंच खेलता है और धोखेबाजी करता है, तो यह परमेश्वर की नजर में एक अपराध है। क्या तुम लोग समझते हो? (हाँ, हम समझते हैं।) तो, क्या अब तुम लोग इस बात पर स्पष्ट हो कि तुम्हें कैसे अभ्यास करना चाहिए? यद्यपि तुम सत्य सिद्धांतों को नहीं समझते, फिर भी तुम्हें परमेश्वर के साथ दाँव-पेंच नहीं खेलने चाहिए। तुम्हें कहना चाहिए, “मेरी सोच भ्रमित है, मेरी काबिलियत खराब है और सत्य सिद्धांत मेरी पहुँच से बाहर हैं। इसलिए मैं कुछ व्यावहारिक करूँगा : मैं थोड़ी और मशक्कत करूँगा और खुद थोड़ा और काम करूँगा। जब मैं थक जाऊँगा, तो मैं थोड़ी देर आराम करूँगा और फिर काम करना जारी रखूँगा।” भले ही अंततः कोई यह शिकायत करे कि तुम्हारे द्वारा की गई मशक्कत अनावश्यक और व्यर्थ थी, परमेश्वर देखेगा कि तुम्हारा दिल सच्चा और ईमानदार है। परमेश्वर तुम्हें मान्यता देगा और तुमने कोई अपराध नहीं किया होगा। क्या इसे प्राप्त करना आसान है? (हाँ, यह आसान है।) यह अभ्यास का सबसे सरल सिद्धांत है। यद्यपि यह सरल है, लेकिन चिंता यह है कि तुम इसे करने में विफल हो सकते हो। जो लोग सत्य को समझते हैं, उनके पास उन सभी चीजों को हल करने के तरीके होते हैं जिनका वे सामना करते हैं, और उनके पास हर तरह के व्यक्ति के साथ पेश आने के सिद्धांत होते हैं : मूर्ख लोगों के साथ पेश आने में, उनके पास ऐसे लोगों के साथ पेश आने के सिद्धांत होते हैं, और बुरे लोगों के साथ पेश आने में, उनके पास ऐसे लोगों के साथ पेश आने के सिद्धांत होते हैं। अगर तुम सत्य को समझते हो लेकिन इसका अभ्यास नहीं करते और इसके बजाय दाँव-पेंच खेलते हो, तो यह एक अपराध है। अगर तुम्हारे पास एक सच्चा दिल है और एक बार जब तुम किसी सिद्धांत को समझ लेते हो, तो तुम परमेश्वर के सामने अपराध किए बिना उसके अनुसार इसका अभ्यास कर सकते हो, फिर तुम जो भी करते हो वह परमेश्वर द्वारा स्वीकार किया जाएगा। यहाँ मुख्य बिंदु क्या है? (दाँव-पेंच न खेलना और पहले उसके अनुसार अभ्यास करना जिसे हम समझ सकते हैं।) दाँव-पेंच मत खेलो; परमेश्वर के प्रति एक सच्चा दिल रखो। परमेश्वर द्वारा तुम्हें दिए गए काम, कार्यों और मिशन के प्रति एक सच्चा दिल रखो। तुम जितना समझते हो, उतना ही अभ्यास करो। भले ही तुम न समझो, फिर भी तुम परमेश्वर के वचनों के मूल अर्थ पर टिके रह सकते हो; भले ही तुम विनियमों का पालन कर रहे हो, फिर भी तुम्हें इस पर टिके रहना होगा। है ना? (हाँ।) यहाँ सिद्धांत क्या है? मनुष्य के लिए परमेश्वर का अपेक्षित मानक क्या है? मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाएँ अधिक नहीं हैं; यानी, तुम्हारे पास एक सच्चा दिल होना चाहिए। यद्यपि परमेश्वर उन लोगों से घृणा करता है और उन्हें पसंद नहीं करता जो सिद्धांतों को नहीं समझते और जिनकी काबिलियत खराब है, फिर भी अगर तुम्हारे पास एक सच्चा दिल है, तो परमेश्वर तुम्हें स्वीकार करेगा और वह तुम्हारे साथ निष्पक्ष तरीके से पेश आएगा। अगर तुम्हारे पास एक सच्चा दिल नहीं है और तुम हमेशा परमेश्वर के साथ दाँव-पेंच खेलते रहते हो, तो तुम्हारी काबिलियत चाहे कितनी भी अच्छी क्यों न हो या तुम्हारी समझ कितनी भी उच्च क्यों न हो, परमेश्वर फिर भी तुमसे घृणा करेगा और वह तुम्हारे द्वारा किए गए अपराधों को दर्ज करेगा। क्या तुम लोग समझते हो? (हाँ, हम समझते हैं।) ये सभी ऐसी चीजें हैं जिनका दैनिक जीवन में आमतौर पर सामना करना पड़ता है। अब तुम लोगों के पास ऐसी चीजों को देखने के लिए एक मार्ग होना चाहिए, है ना? (हाँ।) हम इस पहलू पर अपनी संगति यहीं समाप्त करेंगे।

इससे पहले, हमने देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं पर काफी संगति की थी। हमने इस बात पर भी विस्तार से संगति की थी कि देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं को कैसे छोड़ें और उनका समाधान कैसे करें। इस विषय-वस्तु के आधार पर, हम इस बात पर संगति करके अपनी बात समाप्त करेंगे कि परमेश्वर के साथ एक अनकही समझ कैसे प्राप्त की जाए। बेशक, वर्तमान चरण में, इसका अर्थ देहधारी परमेश्वर के साथ एक अनकही समझ होना है। क्या परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त करना आसान है? (नहीं, यह आसान नहीं है।) तुम लोग जितना समझ सकते हो उसके दायरे में, परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त करने के लिए, किसी व्यक्ति के पास कम से कम क्या होना चाहिए? परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त करने के लिए, काबिलियत, मानवता, अनुसरण, उनके द्वारा चुने गए मार्ग आदि के संदर्भ में उनके पास क्या होना आवश्यक है? (काबिलियत के संदर्भ में, व्यक्ति के पास बोध क्षमता होनी चाहिए; मानवता के संदर्भ में, व्यक्ति के पास कम से कम जमीर और विवेक होना चाहिए; और उसे कुछ सत्यों को समझने में भी सक्षम होना चाहिए। केवल तभी कोई व्यक्ति परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त कर सकता है।) (परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त करने के लिए, सबसे पहले, व्यक्ति के पास एक सच्चा दिल होना चाहिए और उसे परमेश्वर के प्रति सच्चा होना चाहिए। दूसरे लिहाज से, व्यक्ति में काबिलियत होनी चाहिए और उसे परमेश्वर के इरादों और मनुष्य से उसकी अपेक्षाओं को अवश्य समझना चाहिए। एक अन्य पहलू यह है कि चीजों पर व्यक्ति के विचार और उसके अनुसरण के पीछे के परिप्रेक्ष्य परमेश्वर के अनुरूप होना आवश्यक है। केवल तभी परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त करना आसान होगा।) क्या कुछ और भी है? (मैं एक पहलू के बारे में सोच सकता हूँ : चूँकि परमेश्वर लोगों से बात करते समय बहुत सच्चा होता है, इसलिए यदि लोग परमेश्वर के साथ अनकही समझ रखना चाहते हैं, तो उनका रवैया भी सच्चा होना चाहिए।) यह भी एक पहलू है; कम से कम, यह एक दृष्टिकोण है। परमेश्वर के साथ अनकही समझ कैसे प्राप्त की जाए, यह एक बहुत व्यापक विषय है। यह एक बहुत गहरा विषय भी है। तुम लोगों के साथ इस विषय-वस्तु पर संगति करना किंडरगार्टन के बच्चों को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम पढ़ाने जैसा है। तुम लोगों ने अभी जो समझ साझा की है, उसे देखते हुए, तुम लोगों में से कई लोग इस पहलू पर पूरी तरह से कोरे हैं। यह इस बात की और पुष्टि करता है कि तुम लोगों में कितनी कमी है : तुम सत्य के इस पहलू को नहीं समझते, तुमने इस विषय के बारे में कभी नहीं सोचा है और यह विषय तुम्हारी समझ से बाहर है। परमेश्वर के साथ अनकही समझ कैसे प्राप्त की जाए, यह देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं को छोड़ने से संबंधित अंतिम विषय है। यह एक बहुत महत्वपूर्ण विषय है। यह एक ऐसा लक्ष्य है जिसे कोई व्यक्ति देहधारी परमेश्वर का अनुसरण करते हुए अंततः प्राप्त कर सकता है और यह उस जीवन सार की एक अभिव्यक्ति भी है जिसे कोई व्यक्ति तब जी सकता है जब वह परमेश्वर में विश्वास करता है और सत्य को अपने जीवन के रूप में प्राप्त करता है। देहधारी परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को छोड़ना केवल परमेश्वर के बारे में कोई धारणा न रखने का मामला नहीं है। सत्य के इस पहलू में देहधारी परमेश्वर के बारे में कई धारणाएँ और कल्पनाएँ शामिल हैं, और इसमें देहधारी परमेश्वर के प्रति लोगों के विभिन्न रवैये, परमेश्वर के बारे में उनकी विभिन्न समझ और उसके साथ पेश आने में उनके अभ्यास के विभिन्न तरीके भी शामिल हैं। देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं को छोड़ने के इस पहलू का अभ्यास करके अंततः जो सबसे अच्छा परिणाम प्राप्त किया जा सकता है, वह यह है कि लोगों की देहधारी परमेश्वर के साथ एक अनकही समझ हो। यह “अनकही समझ होना” मनुष्य के बोलने का तरीका है; उन शब्दों में जिनका हम अक्सर उपयोग करते हैं, इसका अर्थ परमेश्वर के हिसाब से होना और परमेश्वर के अनुरूप होना है। लेकिन मनुष्य के आध्यात्मिक कद को देखते हुए, मनुष्य के गुणों को देखते हुए और मनुष्य के सार को देखते हुए, और उसकी पृष्ठभूमि और स्थितियों के हर पहलू से आकलन करते हुए, वास्तव में मनुष्य के लिए परमेश्वर के हिसाब से होने के बिंदु तक पहुँचना या परमेश्वर के अनुरूप होने के बिंदु तक पहुँचना पूरी तरह से असंभव है। इसलिए “परमेश्वर के अनुरूप होना” अभिव्यक्ति का उपयोग करना कुछ हद तक अवास्तविक, कुछ हद तक खोखला और गैर-वस्तुनिष्ठ होगा। इसलिए मैंने इस पर सावधानीपूर्वक विचार किया और “अनकही समझ” शब्द को अधिक वस्तुनिष्ठ और अधिक उपयुक्त पाया, और इसे अपेक्षाकृत सटीक माना जा सकता है। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।) देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं को छोड़ने के लिए अंततः तुम्हें परमेश्वर के अनुरूप होने की आवश्यकता नहीं है। चूँकि मनुष्य का जीवन और परमेश्वर का जीवन सार में भिन्न हैं, और हर लिहाज से मनुष्य की समस्याओं के कारण, मनुष्य परमेश्वर के अनुरूप बिल्कुल नहीं हो सकता। केवल एक चीज की आवश्यकता है : व्यक्ति को परमेश्वर के साथ एक अनकही समझ प्राप्त करनी चाहिए। इस अनकही समझ का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि जब भी कोई बात उठती है, तो तुम परमेश्वर के पक्ष में खड़े हो सकते हो, तुम्हारा एक समान परिप्रेक्ष्य हो सकता है, तुम एक समान विचार और दृष्टिकोण साझा कर सकते हो, और किसी भी व्यक्ति, घटना और चीज को देखने, समझने और उसने निपटने के लिए उन्हीं मानकों का उपयोग कर सकते हो जो सत्य सिद्धांतों के अनुसार हैं। इसे ही अनकही समझ कहा जाता है। सरल शब्दों में कहें तो, अनकही समझ का अर्थ है तुम दोनों में से किसी के भी बोले बिना यह जानना कि दूसरा क्या सोच रहा है, और शब्दों में संवाद करने की किसी आवश्यकता के बिना, एक ही चीज के बारे में एक समान दृष्टिकोण रखना। अनकही समझ का वर्णन करने का दूसरा तरीका क्या है? (एक ही सोच रखना।) सही है, एक ही सोच रखना। भले ही दोनों एक ही क्षेत्र में या एक ही स्थान पर नहीं रहते हों, चूँकि उनके विचार और दृष्टिकोण समान हैं, और उनका रुख और परिप्रेक्ष्य समान है, और हर चीज के प्रति उनका रवैया भी समान है, इसलिए संवाद करने की आवश्यकता के बिना और किसी भी शब्द का आदान-प्रदान करने की आवश्यकता के बिना, वे किसी भी समस्या से निपटने के लिए समान तरीकों और मार्गों पर पहुँच सकते हैं, और इससे निपटने में उनके लक्ष्य और उद्देश्य भी समान हो सकते हैं। इसे ही अनकही समझ कहा जाता है; यह वैसा ही है जिसे लोग एक ही सोच रखना कहते हैं। यदि कोई परमेश्वर के साथ एक ही सोच रख सकता है, तो इसे अनकही समझ कहा जाता है। परमेश्वर के साथ—या कम से कम, देहधारी परमेश्वर के साथ—अनकही समझ प्राप्त करने के लिए किसी व्यक्ति के पास क्या होना चाहिए? तुम लोगों ने अभी कुछ बातें कही हैं। तुममें से कुछ ने अधिक सटीकता से बात की, जबकि अन्य की बातें बिल्कुल सटीक नहीं थीं। जिन लोगों ने सटीकता से बात की, उन्हें परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त करने की उम्मीद है।

परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त करने के लिए किसी व्यक्ति के पास कौन-सी शर्तें होनी चाहिए? सबसे पहले, व्यक्ति के पास सच्चा विश्वास होना चाहिए। क्या यह महत्वपूर्ण है? (हाँ।) विशेष रूप से, सच्चे विश्वास का अर्थ परमेश्वर में सच्ची आस्था होना है। यानी, तुम स्वीकार करते हो कि वह सृष्टिकर्ता है, तुम विश्वास करते हो कि वह सभी चीजों पर संप्रभुता रख सकता है, तुम समझते हो कि मानवजाति के प्रति उसका रवैया क्या है, और सभी घटनाओं और चीजों के प्रति उसका रवैया क्या है। तुम्हारे दिल में इस बात की कुछ समझ और ज्ञान है कि वह क्या कहता है और क्या करता है, उसका सार, उसकी पहचान, उसकी सर्वशक्तिमत्ता, उसकी शक्ति, उसका अधिकार आदि क्या हैं। यह सच्चा विश्वास है। इस सच्चे विश्वास का अर्थ है आस्था होना। हालाँकि, यह आस्था केवल मौखिक रूप से यह स्वीकार करने का मामला नहीं है कि देहधारी परमेश्वर सृष्टिकर्ता है और वह परमेश्वर है; यह केवल उसकी पहचान, दर्जे और सार को स्वीकार करना और मान्यता देना नहीं है। बल्कि, इसका अर्थ उसकी पहचान, दर्जे और सार की बुनियादी या गहन समझ और ज्ञान होना है। यह सच्चा विश्वास है। सच्ची और बुनियादी समझ, ज्ञान और अनुभव होने के बाद ही तुम सृष्टिकर्ता में सच्ची आस्था रख सकते हो। परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त करने के लिए यह एक शर्त है जो व्यक्ति के पास होनी चाहिए। दूसरे लिहाज से, व्यक्ति के पास एक सच्चा दिल होना चाहिए। सच्चा दिल होने का अर्थ है कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारा दिल सच्चा है। तुम भ्रमित तरीके से परमेश्वर में विश्वास और परमेश्वर का अनुसरण नहीं करते हो और न ही तुम केवल खिलवाड़ कर रहे हो। परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास और तुम्हारा परमेश्वर का अनुसरण करना वैसा नहीं है जैसे तुम किसी साधारण व्यक्ति के साथ पेश आते हो; यह कोई धार्मिक विश्वास भी नहीं है, यह कोई कर्मकांड नहीं है, यह श्रद्धा अर्पित करने का कार्य नहीं है, यह वंदना करने का कार्य तो बिल्कुल भी नहीं है। बल्कि, तुम्हारे पास एक सच्चा दिल है। सच्चा दिल होने का अर्थ है कि कम से कम, तुम अपना सब कुछ परमेश्वर को अर्पित करने में सक्षम हो; तुम्हें कम से कम ऐसा करने के लिए अवश्य तैयार रहना चाहिए। अगर परमेश्वर तुम्हें मरने के लिए कहता है, तो तुम इस पर विचार करते हो : “परमेश्वर ने मुझे मरने के लिए कहा है, इसलिए मैं जाकर मर जाऊँगा। यद्यपि मैं अपने दिल में अनिच्छुक हूँ, फिर भी मुझे खुद को परमेश्वर को अर्पित करना ही चाहिए।” तुम्हारे पास इस तरह का सच्चा दिल होना चाहिए। इसके अलावा, परमेश्वर तुमसे चाहे जो भी माँगे, वह तुमसे जो भी अर्पित करने के लिए कहे या वह तुम्हें जो भी करने के लिए कहे, तुम उसके प्रति समर्पण कर सकते हो और उसके साथ मोलभाव नहीं करते; परमेश्वर के प्रति तुम्हारा रवैया गंभीर और सच्चा है। भले ही तुममें भ्रष्ट स्वभाव हों और भले ही परमेश्वर के बारे में तुम्हारे पास अभी भी कई धारणाएँ और कल्पनाएँ हों, कम से कम, तुम्हारा यह दिल सच्चा है और तुम परमेश्वर के प्रति सच्चे हो। परमेश्वर के प्रति सच्चा दिल होना दूसरी शर्त है जो परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त करने के लिए व्यक्ति के पास अवश्य होनी चाहिए।

यदि कोई व्यक्ति देहधारी परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त करना चाहता है, तो सच्चा विश्वास और सच्चा दिल होने की दो शर्तें पूरी होने के बाद, तीसरी शर्त जो उसके पास होनी चाहिए वह है विचारशीलता। “विचारशीलता” शब्द थोड़ा अमूर्त है; विचारशीलता दिखाने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि परमेश्वर जो कहना चाहता है और परमेश्वर जो करना चाहता है, परमेश्वर जिस बात को लेकर व्याकुल और चिंतित है, और परमेश्वर जिस बात से खुश है, वे सभी तुम्हारे दिल को छू सकते हैं, और वे सभी तुम्हारे मिजाज और तुम्हारी भावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं। तुम उस बारे में सोच सकते हो जिसके बारे में परमेश्वर सोचता है और उस बात के लिए व्याकुल हो सकते हो जिसके लिए परमेश्वर व्याकुल है; इसे विचारशीलता दिखाना कहा जाता है। विचारशीलता दिखाने का अर्थ है कि जब तुम परमेश्वर के कहने का अर्थ देखते हो और परमेश्वर के हर कदम को देखते हो, तो तुम परमेश्वर के दिल को समझ सकते हो, और सकारात्मक और सक्रिय रूप से परमेश्वर के साथ सहयोग कर सकते हो, वह सब कर सकते हो जो तुम कर सकते हो और वह कर्तव्य पूरा कर सकते हो जो तुम्हें करना चाहिए, जिससे परमेश्वर के दिल को संतुष्टि और सांत्वना मिले। यह विचारशीलता दिखाना है। साथ ही, परमेश्वर की अपेक्षाओं के संबंध में, तुम उन्हें स्वीकार कर सकते हो और उनके प्रति समर्पण कर सकते हो, जिससे परमेश्वर संतुष्ट हो; तुममें परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने की चाह है और तुम सक्रिय रूप से सहयोग कर सकते हो। इसे विचारशीलता दिखाना कहा जाता है। उदाहरण के लिए, जब तुम परमेश्वर के वचन पढ़ते हो, “मेरी भेड़ों को कौन चरा सकता है? मेरा पतरस कौन है? मेरी इच्छा के अनुसार चलने वाला कौन है?” परमेश्वर के ये वचन तुम्हें छू जाएँगे। परमेश्वर के इन वचनों को सुनने के बाद, तुम उसकी व्याकुलता और उसके दुख को महसूस कर सकते हो; तुम्हारे दिल में हलचल मच जाएगी और तुम परमेश्वर के वचनों को दिल से लगाओगे और उन पर विचार करोगे। जब भी तुम परमेश्वर के इन वचनों को देखोगे, तो तुम भावुक हो जाओगे; परमेश्वर के ये वचन तुम्हारे दिल में जगह बना लेंगे, और तुममें परमेश्वर को संतुष्ट करने, उसके इरादे पूरे करने और उसे सांत्वना देने की चाह होगी। क्या यह विचारशीलता दिखाना है? (हाँ।) उदाहरण के लिए, परमेश्वर कहता है, “मैं पृथ्वी पर ऐसे लोगों का एक समूह प्राप्त करना चाहता हूँ जो मेरे इरादों के अनुरूप हों।” तुम अपने दिल में विचार करते हो, “परमेश्वर पृथ्वी पर ऐसे लोगों का एक समूह प्राप्त करना चाहता है जो उसके इरादों के अनुरूप हों। परमेश्वर ऐसा कैसे करता है? यह किन साधनों से पूरा होगा? परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए मुझे कैसे सहयोग करना चाहिए?” इसे विचारशीलता दिखाना कहा जाता है। तुम्हें अपने दिल में इस बात को लेकर स्पष्ट होना चाहिए कि परमेश्वर के इरादों के अनुरूप व्यक्ति बनने के लिए तुम्हें परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे करना चाहिए, और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने और उसके इरादों के अनुरूप होने के लिए तुम्हें सत्य का अनुसरण कैसे करना चाहिए और सत्य का अभ्यास कैसे करना चाहिए। अगर तुम्हारे ऐसे विचार हैं, तो तुम परमेश्वर के साथ सक्रिय रूप से सहयोग करने के इच्छुक होगे। इसे विचारशीलता दिखाना कहा जाता है। यह एक रवैया है और यह इस बात का चुनाव भी है कि कोई व्यक्ति कैसे आचरण करता है। यह विचारशीलता है। यह वैसा ही है जैसे लोग अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं—जब उनके माता-पिता को कठिनाइयाँ होती हैं, तो वे मदद करने के इच्छुक होते हैं; जब वे देखते हैं कि उनके माता-पिता का स्वास्थ्य खराब है, तो वे अपने दिलों में व्याकुल हो जाते हैं और अपने माता-पिता के लिए चिकित्सा उपचार और स्वास्थ्य देखभाल प्राप्त करने का हर संभव प्रयास करते हैं, ताकि उनके माता-पिता जल्द से जल्द अपना स्वास्थ्य वापस पा सकें और उनकी बीमारी और पीड़ा कम हो सके। यह अपने माता-पिता का सम्मान करने की एक अभिव्यक्ति है। यानी, अगर तुम अपने माता-पिता की कठिनाइयों, बीमारी और पीड़ा से अनजान हो, तो वह एक अलग बात है; एक बार जब तुम उनके बारे में जान जाते हो, तो तुम विशेष रूप से चिंतित और विशेष रूप से चौकस होगे, और तुम अपने माता-पिता के कष्ट को कम करने की पूरी कोशिश करोगे। इसे विचारशीलता दिखाना कहा जाता है। तो फिर तुम परमेश्वर के साथ कैसे पेश आते हो? मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाएँ ऊँची नहीं हैं। बच्चे अपने माता-पिता के प्रति विचारशीलता दिखा सकते हैं, इसलिए मनुष्य भी परमेश्वर के प्रति विचारशीलता दिखा सकता है। क्या तुम लोग अब परमेश्वर के प्रति विचारशीलता दिखाने के इस पहलू को समझते हो? (हम समझते हैं।)

यदि कोई व्यक्ति देहधारी परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त करना चाहता है, तो चौथी शर्त जो उसके पास होनी चाहिए वह यह है कि उसे परमेश्वर के इरादों को समझना होगा। अगर तुम परमेश्वर के दिल के प्रति विचारशीलता दिखाना चाहते हो, उसे संतुष्ट करना चाहते हो, चाहते हो कि उसकी इच्छाएँ पूरी हों और चाहते हो कि उसे सांत्वना मिले, तो तुम्हें विचार करना चाहिए : “परमेश्वर के इरादे क्या हैं? परमेश्वर क्या करना चाहता है? परमेश्वर क्या चाहता है? परमेश्वर किस बात के लिए व्याकुल है? वह किस बात को लेकर चिंतित है? वह किस बात को लेकर दुखी है? उसे किस बात की तकलीफ है? परमेश्वर किस चीज के लिए कीमत चुकाता है? परमेश्वर का अपेक्षित मानक क्या है? परमेश्वर की अपेक्षाएँ क्या हैं? परमेश्वर ने क्या व्यक्त किया है? परमेश्वर ने मानवजाति से क्या कहा है?” अगर तुम परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाना चाहते हो, तो तुम्हें समझना चाहिए कि उसके इरादे क्या हैं। परमेश्वर के इरादों को समझने के लिए, तुम्हें अक्सर उन विभिन्न चीजों में खोजना और विचार करना चाहिए जिनका तुम सामना करते हो। चाहे तुम एक अगुआ या कार्यकर्ता हो, कार्य की किसी मद के पर्यवेक्षक हो या एक साधारण विश्वासी हो, तुम्हें उन विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों में, जिनका तुम सामना करते हो, यह खोजना होगा कि परमेश्वर के इरादे क्या हैं और उसका अपेक्षित मानक क्या है। तुम्हें बिना थके उन पर मनन करना होगा और किसी भी रूप तक सीमित रहे बिना उन्हें खोजना और उन पर विचार करना होगा। अंततः, एक बार जब तुम परमेश्वर के इरादों और परमेश्वर के अपेक्षित मानक को समझ लेते हो, तो तुम्हारे लिए परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त करना आसान हो जाएगा और तुम्हारे पास बुनियादी शर्तें होंगी। तो मुझे बताओ, परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त करने के लिए किसी व्यक्ति के पास कौन-सी बुनियादी शर्तें होनी चाहिए? (व्यक्ति के पास चार क्षेत्रों में शर्तें होनी चाहिए : पहला, परमेश्वर में सच्चा विश्वास; दूसरा, परमेश्वर के प्रति एक सच्चा दिल; तीसरा, परमेश्वर के प्रति विचारशीलता; और चौथा, परमेश्वर के इरादों की समझ।) क्या तुम लोगों को वे शर्तें याद हैं? क्या ये ही वे चार शर्तें हैं? (हाँ।) इन चार शर्तों में से किसी की भी कमी नहीं हो सकती; एक बार जब तुम इन चार शर्तों को पूरा कर लेते हो, तो तुम्हारी परमेश्वर के साथ एक अनकही समझ हो सकती है। प्रत्येक शर्त बहुत सरल दिखती है, लेकिन वास्तव में इसे प्राप्त करना आसान नहीं है। तो, इन चार शर्तों में से तुम लोगों के पास कौन-सी है? (सख्ती से कहें तो हमने अभी तक उनमें से किसी को भी प्राप्त नहीं किया है।) सख्ती से कहें तो तुम लोगों के पास उनमें से कोई भी शर्त नहीं है। अगर हम इसे इतनी सख्ती से न कहें तो अधिकांश लोगों के पास परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा सच्चा दिल है। क्या यह कहना उचित है? (यह उचित है।) जहाँ तक अन्य तीन शर्तों—सच्ची आस्था, परमेश्वर के प्रति विचारशीलता और परमेश्वर के इरादों की समझ—का सवाल है, लोगों के पास वे ज़रा-सी भी नहीं हैं, है ना? (हाँ।) चाहे तुम्हारे पास वे शर्तें हों या न हों, तुम्हें इन पहलुओं की ओर प्रयास करना चाहिए और जहाँ तक हो सके वहाँ तक पहुँचना चाहिए। अगर तुमने अपना सर्वश्रेष्ठ किया है, तो चाहे तुम अंततः किसी भी स्तर तक पहुँच सको, कम से कम तुम्हारा जमीर साफ होगा और तुमने खुद सही किया होगा। लेकिन अगर तुम ऊपर की ओर प्रयास नहीं करते और अंततः पछतावे के साथ रह जाते हो, तो तुम केवल छाती पीट सकते हो और खुद को दोष दे सकते हो। इस बात की परवाह किए बिना कि क्या तुम इन चार शर्तों पर खरे उतर सकते हो और चाहे तुम किसी भी स्तर तक पहुँच सको, कम से कम तुम्हें ऊपर की ओर प्रयास अवश्य करना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि मानक को अब कम कर दिया गया है और पहले ही एक कदम पीछे हटा लिया गया है। तुम्हें परमेश्वर के अनुरूप होने की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर के अनुरूप होने का मानक बहुत ऊँचा है और तुम उस पर खरे नहीं उतर सकते। अब तुमसे केवल परमेश्वर के साथ एक अनकही समझ प्राप्त करने की अपेक्षा की जाती है। तुम्हें इसके लिए ऊपर की ओर प्रयास करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए—हार मत मानो—और अंततः परमेश्वर में सच्ची आस्था रखो, परमेश्वर के प्रति एक सच्चा दिल रखो, परमेश्वर के प्रति विचारशीलता रखो और परमेश्वर के इरादों को समझने में सक्षम बनो। इन चार शर्तों को प्राप्त करने की प्रक्रिया परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त करने की प्रक्रिया भी है। बेशक, एक बार जब तुम इन चार शर्तों को पूरी तरह से प्राप्त कर लेते हो, तो तुम्हारी परमेश्वर के साथ एक पूर्ण अनकही समझ होगी।

हमने उन चार शर्तों पर संगति समाप्त कर ली है जो परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त करने के लिए किसी व्यक्ति में होनी चाहिए। हमेशा की तरह, क्या हमें कुछ उदाहरण नहीं देने चाहिए? यह वह बात है जिसे तुम लोग सबसे ज्यादा सुनना पसंद करते हो, और यह वह आवश्यक मार्ग और तरीका भी है जिनसे तुम लोग विभिन्न सत्यों को समझते हो। कुछ सकारात्मक और नकारात्मक उदाहरण देने से तुम लोग परमेश्वर के साथ एक अनकही समझ रखने के सत्य और इस संबंध में अभ्यास के सिद्धांतों को समझने में सक्षम हो जाओगे। तुम लोगों की नजर में, तुम लोगों के आस-पास के लोगों या जिन लोगों को तुम लोग जानते हो, उनमें से क्या कोई ऐसा है जिसने पहले ही इन चार शर्तों को पूरा कर लिया है—यानी, जिसने पहले ही परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त कर ली है? कम से कम, तुम लोगों की नजर में, इस व्यक्ति की परमेश्वर के साथ अनकही समझ है, यह भारी बोझ उठा सकता है और परमेश्वर द्वारा दिए गए मिशन को पूरा कर सकता है। कुछ उदाहरण दो। ऐसा व्यक्ति कौन है? (पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाने वाला व्यक्ति।) पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति के अलावा, क्या तुम लोग ऐसे लोगों के कुछ और उदाहरण दे सकते हो जिनकी परमेश्वर के साथ अनकही समझ है? आओ हम देखें कि इस प्रकार के लोगों में क्या समानता है। उनके कुछ उदाहरणों के माध्यम से, सभी को देखने दो कि इस प्रकार के लोगों में क्या विशेषताएँ होती हैं : उनके शब्द, क्रियाकलाप और आचरण, आचरण करने और मामलों को सँभालने के तरीके में उनके विचार और दृष्टिकोण, परमेश्वर के प्रति और सत्य के प्रति उनके रवैये, अपने स्वयं के मिशन और कर्तव्यों के प्रति उनके रवैये—इन संबंधों में उनकी अभिव्यक्तियाँ और उनकी सामान्य विशेषताएँ। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति के अलावा, क्या ऐसे लोग हैं? (नहीं।) तो आओ हम इस बात पर संगति करें कि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने परमेश्वर के साथ अनकही समझ कैसे प्राप्त की या दूसरे शब्दों में, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने ऐसे कौन-से काम किए हैं जो परमेश्वर के साथ अनकही समझ की अभिव्यक्तियाँ हैं। कुछ लोग इन चीजों के बारे में जानते होंगे और कुछ नहीं जानते होंगे। चाहे तुम लोग उनके बारे में जानते हो या नहीं, जो भी हो, तुम लोगों को आज की संगति के विषय के आधार पर समझ प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए और तुलना करने की कोशिश करनी चाहिए।

पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति के परमेश्वर के साथ अनकही समझ होने की अभिव्यक्तियों पर संगति करने के लिए, हमें कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के कथनों और वचनों से शुरुआत करनी चाहिए। कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के पहले कथन ने उस बिंदु को चिह्नित किया जहाँ से परमेश्वर ने औपचारिक रूप से स्वयं परमेश्वर की पहचान में मानवजाति से वचन बोलना और कथन कहना शुरू किया, और अपने कार्य का तीसरा चरण—राज्य के युग का कार्य, अर्थात, ताड़ना देने और न्याय करने के लिए पूरी मानवजाति से बोलने का कार्य—शुरू किया। पवित्र आत्मा के पहले कथन से शुरू करते हुए, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने उन्हें पढ़ा, लेकिन उसने केवल खुद उन्हें पढ़कर कलीसिया में प्रसारित नहीं किया। उसने अपने मन में सोचा, “ये वचन न तो साधारण हैं और न ही सामान्य; ऐसा लगता है कि ये पवित्र आत्मा से आए हैं। चूँकि ये पवित्र आत्मा से आए हैं, इसलिए कलीसिया के सभी भाई-बहनों को इन्हें देखने का अधिकार है। यह परमेश्वर का कथन है और यह बड़ी खबर हर किसी को बताई जानी चाहिए।” तो, कलीसिया में हर किसी को इस खबर के बारे में बताने और पवित्र आत्मा के वचनों और कथनों को दिखाने के लिए, क्या किया जाना चाहिए? आम लोगों पर वास्तव में यह बोझ नहीं था और न ही वे जानते थे कि इसे कैसे करना है। तब पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने यह करना शुरू किया; यानी, उसने पवित्र आत्मा के वचनों को लिया और उन्हें कलीसिया के भीतर फैलाया, ताकि परमेश्वर के अधिक चुने हुए लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़ सकें। उस समय, एक सीमा के कारण—मुख्यभूमि चीन के उस परिवेश में जहाँ विश्वासियों का उत्पीड़न किया जाता था, परमेश्वर में विश्वास के बारे में खुलेआम किताबें न छाप पाने के कारण—पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने कलीसिया के उन युवा लोगों को संगठित किया जो साफ-साफ लिखते थे और काम करने में कर्तव्यनिष्ठ थे, ताकि वे पवित्र आत्मा के वचनों की नकल उतारें और उनकी कार्बन कॉपी बनाएँ। उनकी नकल उतारे जाने के बाद, उन कॉपियों को हर क्षेत्र और जिले में भेजा गया; फिर जिलों ने उन्हें विभिन्न स्थानों की कलीसियाओं में भेजा और फिर कलीसियाओं ने उन्हें व्यक्तियों तक पहुँचाया। कम से कम, हर कलीसिया के पास कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचनों की एक या अधिक हस्तलिखित कॉपियाँ होनी चाहिए थीं। जब भी परमेश्वर का कोई नवीनतम कथन व्यक्त किया जाता था, तो पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाने वाला व्यक्ति उसकी कार्बन कॉपी बनाने के लिए लोगों की व्यवस्था करता था। जब व्यक्त किए गए वचन एक निश्चित मात्रा तक पहुँच गए, तो उसने लोगों को उन्हें किताबों के रूप में छापने के लिए संगठित किया। चीन जैसी जगह में जो इस कदर पागलों की तरह परमेश्वर का प्रतिरोध करती है, परमेश्वर में विश्वास करने में भी जोखिम शामिल था, परमेश्वर में विश्वास के बारे में किताबें छापने की तो बात ही छोड़ दो। एक बार गिरफ्तार होने पर, मौत की सज़ा मिलती थी। इसलिए, उस समय छपाई की मशीनरी और उपकरण खरीदने में भी जोखिम शामिल था। यहाँ तक कि उन परिस्थितियों में भी, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने फिर भी लोगों को इस कार्य को अच्छी तरह से करने के लिए संगठित किया, लोगों से कुछ मशीनरी और उपकरण खरीदवाए, और लोगों को टाइप करने और टाइपसेटिंग सीखने के लिए संगठित किया, उसने भाई-बहनों को छपाई की जिम्मेदारी लेने और परमेश्वर के वचनों को किताबों के रूप में बाइंडिंग करने के लिए व्यवस्थित किया। टाइपिंग, टाइपसेटिंग, प्रूफरीडिंग और छपाई से लेकर बाइंडिंग करने और फिर विभिन्न स्थानों की कलीसियाओं में किताबें बाँटने तक—पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने लोगों को यह सारा कार्य करने के लिए संगठित किया। मुझे बताओ, अगर पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने यह सब संगठित नहीं किया होता, तो इस कार्य को करने में कौन अगुआई करता? (कोई भी इसे नहीं करता।) इस कार्य को करने में, एक बात तो यह थी कि सुरक्षा सुनिश्चित की जानी थी; दूसरी बात, कार्य के हर कदम के लिए चुने गए लोगों का उपयुक्त होना जरूरी था। इस प्रक्रिया के माध्यम से, ये किताबें अंततः एक के बाद एक विभिन्न स्थानों की कलीसियाओं में भेजी गईं। यद्यपि उस समय किताबों की छपाई की गुणवत्ता आज की तुलना में बहुत खराब थी, फिर भी उस समय के परिवेश, कलीसिया की आर्थिक स्थितियों और हर लिहाज से लोगों की स्थितियों को देखते हुए, कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचन और मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ की प्रति व्यक्ति एक कॉपी उपलब्ध कराना पहले से ही बहुत अच्छा और बहुत कठिन था। अगर किसी ने इसे संगठित नहीं किया होता और इस कार्य को करने के लिए कोई सही व्यक्ति नहीं होता, तो कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के चाहे कितने भी वचन क्यों न होते, उन्हें समय पर कलीसियाओं में नहीं भेजा जा सकता था, शायद वे भाई-बहनों तक बिल्कुल भी नहीं पहुँच पाते और प्रति व्यक्ति एक कॉपी उपलब्ध नहीं हो पाती। जब से परमेश्वर ने अपना पहला कथन व्यक्त करना शुरू किया तब से लेकर अब तक, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाने वाला व्यक्ति इस कार्य को लगातार करता आ रहा है। किताबें छापने के कार्य का एक लंबा इतिहास है, और प्रति व्यक्ति एक कॉपी उपलब्ध होने के बाद, यह माना जा सकता था कि छपाई कार्य के नतीजे हासिल हो गए।

कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचन छापने और उन्हें समय पर बाँटने के लिए लोगों की व्यवस्था करने के अलावा, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने जो एक और कार्य किया, वह था विभिन्न स्थानों पर कलीसियाएँ स्थापित करना। उस समय, विभिन्न स्थानों की कलीसियाएँ उन लोगों से बनी थीं जिन्होंने कार्य के इस चरण को अभी-अभी स्वीकार किया था। कई कलीसियाओं में उपयुक्त अगुआ और कार्यकर्ता नहीं थे। कलीसियाएँ आंतरिक रूप से अव्यवस्थित थीं, प्रशासनिक ढाँचे अव्यवस्थित थे और कार्मिक मामले भी अव्यवस्थित थे—अर्थात, हर पहलू अव्यवस्थित था। तब पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने चीजों को सुधारना, प्रशासनिक ढाँचे स्थापित करना और अगुआओं और कार्यकर्ताओं को विकसित करना शुरू किया। फिर, कदम-दर-कदम, उसने उन सभी लोगों को ढूँढ़ा जिनमें कुछ उत्साह था, जो खुद को खपा सकते थे, जिन्हें विकसित किया जा सकता था और जो अपने परिवारों का त्याग भी कर सकते थे, और उनसे कलीसिया का कार्य करवाया। उस समय, कुछ जगहों पर लोग जल्दी शादी कर लेते थे। सोलह या सत्रह साल या फिर अठारह या उन्नीस साल की उम्र में, वे शादी करने, बच्चे पैदा करने और वंश आगे बढ़ाने के बारे में सोचने लगते थे। कलीसिया के भाई-बहन भी कोई अपवाद नहीं थे और वे भी इन स्थानीय रीति-रिवाजों से प्रभावित थे। परमेश्वर में अपने विश्वास में उत्साही कई भाई-बहन भी इस उम्र तक पहुँच गए थे। अगर कलीसिया ने उन्हें पदोन्नत और विकसित न किया होता, बार-बार उनका सिंचन न किया होता, उन पर बोझ न डाला होता और उनसे विभिन्न स्थानों पर कार्य न करवाया होता, तो इन लोगों ने शादी कर ली होती और अब तक वे दादा-दादी या नाना-नानी बन चुके होते। उस समय, इनमें से कुछ युवा लोगों के बारे में माना जा सकता था कि उन्होंने विशेष कृपा प्राप्त कर ली है। कुछ कलीसियाओं को अगुआओं और कार्यकर्ताओं के रूप में सेवा करने के लिए बुजुर्ग लोगों के बीच अच्छी काबिलियत वाले लोग नहीं मिल सके। बेहतर काबिलियत वाले कुछ लोग अभी भी अपने परिवारों का त्याग नहीं कर सकते थे, जबकि कुछ अन्य लोगों की काबिलियत खराब थी और वे वास्तविक कार्य करने में बिल्कुल असमर्थ थे, उनमें केवल कुछ उत्साह था और वे भाग-दौड़ करने और खुद को खपाने के इच्छुक थे। तो फिर, क्या किया जाना था? पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने अच्छी काबिलियत वाले कुछ युवा लोगों को विकसित किया और उन्हें विभिन्न स्थानों की कलीसियाओं में यात्राएँ करने और कार्य करने के लिए पदोन्नत किया, क्योंकि वे अपने परिवारों का त्याग कर सकते थे और अपेक्षाकृत स्वतंत्र थे। इन लोगों को विकसित किए जाने के बाद, कम से कम, विभिन्न स्थानों की कलीसियाओं में कलीसियाई जीवन की गारंटी दी जा सकती थी। कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचनों के साथ, विभिन्न स्थानों की कलीसियाओं में कलीसियाई जीवन और कलीसिया का कार्य कुछ अधिक सामान्य हो गया। इनमें से कुछ युवा लोग अब लगभग पचास वर्ष के हैं। वर्तमान समय तक परमेश्वर का अनुसरण करने के बाद, उनके बारे में कहा जा सकता है कि उन्होंने बहुत कुछ अनुभव किया है। शायद वे जिस बात के लिए सबसे अधिक भाग्यशाली महसूस करते हैं, वह यह है कि उन्होंने उस समय परमेश्वर के घर द्वारा पदोन्नत और विकसित किए जाने का अवसर नहीं गँवाया और न ही उन्होंने, अविश्वासियों की तरह, उस उम्र में पहुँचने पर शादी की चर्चा शुरू की और शादी के बंधन में बँधे। यद्यपि वे आज भी अविवाहित हैं, फिर भी उन्होंने बहुत कुछ प्राप्त किया है और काफी सत्यों को समझा है। विभिन्न स्थानों पर कलीसियाएँ स्थापित करना और अगुआओं और कार्यकर्ताओं को विकसित करना कार्य का एक पहलू था। दूसरा पहलू यह था कि कलीसियाई जीवन केवल परमेश्वर के वचनों को पढ़ पाने और पवित्र आत्मा का कार्य होने का मामला नहीं था। कलीसियाई जीवन के लिए बहुत सारी सामग्री की आवश्यकता थी। परमेश्वर में विश्वास करने में, परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के अलावा, लोगों को सत्य पर संगति करने और अपने अनुभवों के बारे में बात करने की भी आवश्यकता थी। मनोरंजन के विभिन्न रूपों के संदर्भ में भी उनकी कुछ आवश्यकताएँ थीं, जैसे कि भजन गाना और नृत्य करना। इसलिए, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने एक भजन मंडली स्थापित की, कुछ लोगों को अनुभवजन्य भजन लिखने के लिए संगठित किया और खुद भी भजन लिखे। इसका उद्देश्य भाई-बहनों को गाने के लिए गीत देना और कलीसियाई जीवन को समृद्ध करना था। भजन लिखे जाने के बाद, उन्हें कलीसियाओं में समान रूप से कैसे बाँटा जा सकता था ताकि सभी भाई-बहन उन्हें गाना सीख सकें? पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने भजनों को गाने के लिए लोगों को संगठित किया और उन्हें रिकॉर्ड करने के लिए लोगों को ढूँढ़ा। उस समय, सभी गायक-गायिकाएँ और संगीतकार नौसिखिए थे। उन्होंने पेशेवर प्रशिक्षण नहीं लिया था और संगीत के ज्यादा ज्ञान के बिना ही अभ्यास करना शुरू कर दिया था। जब गीतों को रिकॉर्ड किया जाता था, तो अच्छे रिकॉर्डिंग उपकरण उपलब्ध नहीं थे और न ही संगीत की संगत के लिए उच्च-स्तरीय वाद्ययंत्र थे। एरहु को अपेक्षाकृत व्यावहारिक वाद्ययंत्र माना जाता था और इसका होना संगत होने के बराबर माना जा सकता था। कुछ लोग एकॉर्डियन या इलेक्ट्रॉनिक कीबोर्ड भी थोड़ा-बहुत बजा सकते थे। संक्षेप में, वे सभी नौसिखिए थे, लेकिन उस समय उस स्तर तक पहुँचना पहले से ही कोई आसान काम नहीं था। बेशक, अंततः तैयार की गई रचनाएँ अच्छी थीं या नहीं, इस बात की परवाह किए बिना, इस मामले को व्यवस्थित करने के लिए किसी की आवश्यकता थी। कलीसियाओं को जिस किसी चीज की आवश्यकता थी, भाई-बहनों को जिस किसी चीज की आवश्यकता थी और परमेश्वर के कार्य के लिए मनुष्य से जिस भी सहयोग की आवश्यकता थी, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाने वाला व्यक्ति उन सभी के बारे में सोच सकता था और इन मामलों पर अनुवर्ती कार्रवाई करता रहा। अर्थात, वह जो कुछ करने में सक्षम था, उसके दायरे में, उसने उन सभी चीजों को लिया जिनके बारे में मनुष्य सोच सकता था और उन्हें वास्तविकता में बदल दिया, और मनुष्य जो कुछ भी कर सकता था, वह सब करने की उसने पूरी कोशिश की। इस तरह, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने इस कार्य को संगठित किया और इस पर अनुवर्ती कार्रवाई की, परमेश्वर के वचनों की छपी हुई किताबें, भजनों की किताबें, रिकॉर्ड किए गए कैसेट टेप और सीडी सभी कलीसियाओं में भेजीं, ताकि सभी भाई-बहन परमेश्वर के वचन पढ़ सकें, भजन सीख सकें और उनका कलीसियाई जीवन अच्छा हो। यद्यपि उस समय का कलीसियाई जीवन आज की तुलना में अपेक्षाकृत सादा था और परिस्थितियाँ अपेक्षाकृत कठिन थीं, कोई आधुनिक उपकरण या उच्च-स्तरीय मशीनरी नहीं थी, और उपयोग के लिए सही कोई अगुआ और कार्यकर्ता या तकनीकी कर्मी नहीं थे, फिर भी चूँकि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने इस कार्य को संगठित किया और इस पर अनुवर्ती कार्रवाई की और कार्य की हर मद में लगातार सुधार किया, इसलिए लोग उस समय की परिस्थितियों में भी एक अच्छे कलीसियाई जीवन का आनंद लेने में सक्षम थे। इस अच्छे कलीसियाई जीवन का अर्थ यह था कि लोग परमेश्वर के नवीनतम वचन पढ़ सकते थे, आनंद महसूस कर सकते थे और मुक्ति प्राप्त कर सकते थे। हर कोई मानवजाति के लिए परमेश्वर के नवीनतम कथन पढ़ सकता था और ठीक उसी पल परमेश्वर के इरादों, मनुष्य के बारे में परमेश्वर के विचारों और मनुष्य से उसकी अपेक्षाओं को जान सकता था। इससे भी बेहतर बात यह थी कि कुछ लोग परमेश्वर के वचनों में सत्य को समझ सकते थे और कुछ उसमें प्रवेश प्राप्त कर सकते थे। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति द्वारा इस तरह से चीजों को संगठित और व्यवस्थित करने के माध्यम से, एक बात तो यह हुई कि कलीसियाएँ स्थापित हो गईं और दूसरी बात यह हुई कि सभी लोग एक सामान्य और व्यवस्थित कलीसियाई जीवन जीने लगे। परमेश्वर का घर कोई धार्मिक समूह नहीं है। कलीसियाई जीवन में धार्मिक तौर-तरीकों का अभ्यास नहीं किया जाता है, एकतरफा उपदेश देने का अभ्यास तो बिल्कुल भी नहीं किया जाता है। परमेश्वर के घर के कलीसियाई जीवन में परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना शामिल होना आवश्यक है और पवित्र आत्मा का कार्य शामिल होना आवश्यक है; इसमें सत्य पर संगति करना और अनुभवजन्य गवाहियों के बारे में बात करना शामिल होनाआवश्यक है, और परमेश्वर की स्तुति में भजन गाना भी शामिल होना आवश्यक है। इस प्रकार का कलीसियाई जीवन परमेश्वर की अगुआई और निर्देशन, सिंचन और आपूर्ति, मार्गदर्शन और सहायता के अधीन कलीसियाई जीवन है; यह सच्चा कलीसियाई जीवन है। यद्यपि आज के कलीसियाई जीवन की तुलना में यह बहुत उथला, बहुत एकतरफा और बहुत सरल था, फिर भी उस समय मानव को इसी की आवश्यकता थी, और यह इसलिए भी था ताकि मानव पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी का आनंद ले सके—अर्थात, ताकि परमेश्वर के सभी चुने हुए लोग कलीसियाई जीवन में परमेश्वर के वचनों का आनंद ले सकें और अपने कानों से परमेश्वर की वाणी सुन सकें। यह कलीसियाई जीवन के लिए एक अच्छी शुरुआत थी। ऐसे कलीसियाई जीवन के बिना, तुम लोग आज की स्थिति तक नहीं पहुँच पाते। ठीक इसलिए क्योंकि व्यावहारिक नतीजों वाला इस प्रकार का नियमित, स्थिर कलीसियाई जीवन मौजूद था, लोग कदम-दर-कदम वहाँ तक आ सके जहाँ वे आज हैं और उन्हें वहाँ तक लाया जा सका जहाँ वे आज हैं, और उनका वह आध्यात्मिक कद हो सका जो आज उनका है, साथ ही हर लिहाज से उन्हें वे फायदे मिल सके जो आज उनके पास हैं। कलीसिया के प्रशासन, कार्मिकों और कलीसिया के विशिष्ट कार्य के संदर्भ में पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने यही कार्य किया। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने एक अन्य क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किया, जो कि कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचनों को सुनाने के तुरंत बाद उपदेश देना था। वह नियमित या अनियमित रूप से अगुआओं और कार्यकर्ताओं को सभाओं के लिए एक साथ बुलाता था और परमेश्वर के इरादों पर संगति करता था, उन सत्य सिद्धांतों पर संगति करता था जिनका लोगों को अपने दैनिक जीवन में और अपने कर्तव्य निभाने में पालन करना चाहिए, और वह इस बात पर भी संगति करता था कि कलीसियाएँ कैसे स्थापित की जाएँ और कलीसियाओं का सिंचन कैसे किया जाए और इस बात पर संगति करता था कि परमेश्वर की सेवा कैसे की जाए। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने इस कार्य को अच्छी तरह से करने की पूरी कोशिश की, जीवन प्रवेश के विषयों पर संगति की और परमेश्वर की सेवा करने से संबंधित सत्यों पर भी संगति की। इसी बात ने मुझ पर सबसे गहरा प्रभाव छोड़ा।

पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य परमेश्वर के इरादों से और पृथ्वी पर कलीसियाएँ स्थापित करने के परमेश्वर के उद्देश्य से निकटता से संबंधित था, और यह उस कार्य से अटूट रूप से जुड़ा हुआ था जो परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों पर करने वाला था। स्पष्ट रूप से कहें तो पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने जो कुछ कहा, जिस पर उसने ध्यान केंद्रित किया, जिस पर उसने अनुवर्ती कार्रवाई की, जिसका उसने पर्यवेक्षण किया और हर अवधि के दौरान कलीसिया में उसने जो कुछ किया, वह सब पवित्र आत्मा के कार्य के साथ घनिष्ठ सहयोग में था; पवित्र आत्मा ने जो भी अगुआई प्रदान की, परमेश्वर ने जो भी प्रकाशन दिए और परमेश्वर के वचनों में जो भी अर्थ और अपेक्षाएँ थीं, उन्हें क्रियान्वित करने में उसने भरसक सहयोग करने का प्रयास किया, ताकि परमेश्वर के वचन व्यर्थ न जाएँ, ताकि परमेश्वर के इरादे व्यर्थ न जाएँ, और ताकि उस समय के लोग परमेश्वर के इरादों और परमेश्वर के वचनों को जान और समझ सकें। यद्यपि यह हर घर में जाने जाने की स्थिति तक नहीं पहुँचा, फिर भी कम से कम, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति की अगुआई में, उस समय के लोग इस विषय का निकटता से अनुसरण कर सकते थे और महसूस कर सकते थे कि इस विषय में पवित्र आत्मा का कार्य था, परमेश्वर का कार्य था, परमेश्वर के वचन थे और परमेश्वर के इरादे थे। वे निश्चित थे कि यह विषय परमेश्वर से आया है, वे निश्चित थे कि यह विषय सही था, और कम से कम, वे निश्चित थे कि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाने वाला व्यक्ति एक सही व्यक्ति था। उसने तब जो कुछ किया और अब जो किया जा रहा है, उसके बीच चाहे जो भी अंतर हो, संक्षेप में, उसने जो कुछ भी किया वह पवित्र आत्मा द्वारा किए गए कार्य को बनाए रखने और उसमें सहयोग करने के लिए था। उस समय कलीसिया में लोगों द्वारा सत्य को समझने के स्तर के संदर्भ में, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाने वाला व्यक्ति ये चीजें करने में सक्षम था और कलीसिया को उस स्तर तक लाने में सक्षम था जहाँ वह तब पहुँच गई थी—तुम लोग क्या कहोगे कि परमेश्वर के साथ अनकही समझ रखने की चार अभिव्यक्तियों में से उसमें कौन-सी अभिव्यक्ति थी? (मुझे लगता है कि उसमें चारों अभिव्यक्तियाँ थीं।) यह कहना पूरी तरह से निष्पक्ष नहीं होगा कि उसमें चौथी अभिव्यक्ति, “परमेश्वर के इरादों को समझना” भी थी, लेकिन मेरे विचार में, उसमें कम से कम अन्य तीन अभिव्यक्तियाँ थीं : सच्चा विश्वास, सच्चा दिल, और विचारशीलता, जिनमें से “विचारशीलता” सबसे अधिक स्पष्ट थी। वह ऐसा व्यक्ति था जिसने परमेश्वर के दायित्व के प्रति विचारशीलता दिखाई, और इतना सारा कार्य करने में, उसने कभी भी अपने लिए पैसे या व्यक्तिगत लाभ से संबंधित कुछ भी प्राप्त करने की योजना नहीं बनाई। तुम लोग शायद यह न समझो कि इससे मेरा क्या मतलब है, इसलिए मैं तुम लोगों को एक उदाहरण दूँगा। जब से पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने किताबें छापने की व्यवस्था करनी शुरू की तब से लेकर वर्तमान तक, हमारी कलीसिया द्वारा बाँटी गई किसी भी किताब के लिए भाई-बहनों से एक पैसा भी नहीं लिया गया है। ऐसा नहीं था कि जब कलीसिया सक्षम हो गई थी, तो हमने बाद में उनके लिए पैसे लेना बंद कर दिया; बिल्कुल शुरुआत में भी, जब आर्थिक स्थिति विशेष रूप से तंग थी, हमने एक पैसा भी नहीं लिया। ऐसा क्यों था? यद्यपि उस समय कलीसिया आर्थिक रूप से बहुत संपन्न नहीं थी, फिर भी उस समय उपलब्ध सीमित आर्थिक संसाधनों को देखते हुए, यह मूल रूप से किताबें छापने की लागत जैसे खर्चों को पूरा कर सकती थी, इसलिए भाई-बहनों को बाँटी गई किताबों के लिए उनसे पैसे नहीं लिए गए और वे उन्हें मुफ्त में पढ़ सकते थे। जैसे-जैसे किताबें छपती रहीं, कलीसिया की कुल धनराशि लगातार कम होती गई। उस समय, कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करने वाले अधिकांश भाई-बहनों के पास आय का कोई स्रोत नहीं था क्योंकि वे शुरू से ही अपने कर्तव्य निभा रहे थे और उनके पास ज्यादा पैसा नहीं था। परिणामस्वरूप, भेंट किया गया पैसा कभी-कभी कलीसिया की लागतों और विभिन्न खर्चों को पूरा नहीं कर पाता था। मुझे बहुत स्पष्ट रूप से याद है कि एक अवसर पर, किताबों का एक बैच छापा जाना था, लेकिन कलीसिया के पास केवल कुछ हजार युआन बचे थे। किताबों की छपाई की लागत का भुगतान करने के बाद, कलीसिया के कार्य के लिए कोई पैसा नहीं बचता। यदि अगुआओं और कार्यकर्ताओं को कहीं जाते समय यात्रा खर्च की आवश्यकता होती या यदि किसी बड़ी सभा के लिए भाई-बहनों की मेजबानी करते समय रहने के खर्च की आवश्यकता होती, तो शायद पैसा उपलब्ध नहीं होता। ऐसे में क्या किया जाना चाहिए था? इन परिस्थितियों में, क्या फिर भी किताबें छापी जानी चाहिए थीं? (हाँ, छापी जानी चाहिए थीं।) किताबें फिर भी छापी जानी थीं और पैसा फिर भी दिया जाना था। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने एक समाधान सोचा। उसने कहा कि इस बैच की प्रत्येक किताब के लिए पहले से ही कुछ युआन अग्रिम रूप से एकत्र किए जाने चाहिए—बस इतने कि बैच को छापने की लागत पूरी हो जाए। इस संदर्भ में, उस एक अवसर पर अग्रिम रूप से पैसा एकत्र किया गया था। लेकिन कुछ समय बाद, कलीसिया में भाई-बहनों ने फिर से भेंटें चढ़ाईं और किताबों के अगले बैच की छपाई की लागत को पूरा करने के लिए पर्याप्त पैसा उपलब्ध हो गया। उसके बाद से, कलीसिया की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ और हमने फिर कभी किताबें छापने के लिए पैसे नहीं लिए। वह घटना बस एक संक्षिप्त अंतराल जैसी थी। यह बताने का क्या मतलब है? मतलब यह है कि जब आर्थिक स्थिति सबसे अधिक तंग थी, तब भी हमने अपनी किताबें छापना बंद नहीं किया। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने हर संभव प्रयास किया और घर के मुखिया की तरह, इस मामले के बारे में चिंतित हुआ, विचार किया और योजनाएँ बनाईं। अधिकांश लोग इन बातों के बारे में नहीं जानते हैं। जब परमेश्वर के वचनों की ये किताबें कलीसियाओं में बाँटी गईं, तो इसे प्राप्त करने पर अधिकांश लोग बस इतना ही कहते थे, “यह किताब कितनी अच्छी है! हमने इसे खुद छपवाया है—यह कितना कठिन रहा होगा!” कुछ लोगों ने तो इस किताब को सँजोया भी नहीं या इसे ठीक से पढ़ा भी नहीं। हालाँकि, लोग नहीं जानते थे कि यह कार्य करते समय और इस किताब को छापते समय ऊपरवाले ने पर्दे के पीछे कितनी कठिनाइयों का सामना किया। हमारी कलीसिया में काफी लोग स्थानीय कलीसिया या अन्य संप्रदायों से आए थे। पहले, उन संप्रदायों के अगुआओं और मुख्यभूमि के प्रेरितों ने किताबें छापने का कार्य नहीं किया था। वे विभिन्न कलीसियाओं में भाई-बहनों द्वारा भेंट किए गए अधिकांश पैसे ले जाते थे, लेकिन उन्होंने किताबें नहीं छापीं या भजनों को व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं कराया। उच्च स्तरों से उपदेशों की जो भी रिकॉर्डिंग की गई थीं, उन्हें कभी भी नीचे वालों को नहीं बाँटा गया। उन्होंने इनमें से कोई कार्य नहीं किया। परमेश्वर के चुने हुए लोगों के पास बाइबल के अलावा कुछ नहीं था। अगर तुम उपदेशों का संग्रह या अनुभवजन्य गवाहियाँ पढ़ना चाहते, तो तुम उन्हें प्राप्त नहीं कर सकते थे; अगर तुम कुछ अच्छे भजन सुनना चाहते, तो वह और भी कठिन था। किसी ने यह कार्य नहीं किया। अगर तुम आध्यात्मिक किताबें पढ़ना चाहते, तो तुम्हें उनके साथ व्यक्तिगत संबंध बनाना पड़ता था, तभी वे तुम्हें पढ़ने के लिए कोई किताब उधार देते थे। परमेश्वर के चुने हुए लोग बिल्कुल भी जीवन की आपूर्ति प्राप्त नहीं कर सकते थे, और कलीसियाई जीवन की अगुआई और प्रबंधन करने के लिए अच्छे लोग उपलब्ध नहीं थे। उन प्रेरितों और अगुआओं ने बिल्कुल भी कोई वास्तविक कार्य नहीं किया। एक काम जो वे नियमित रूप से करते थे, वह यह था कि वे हर कुछ समय में सहकर्मियों की एक सभा आयोजित करते थे जहाँ वे जमकर खाते-पीते थे। शायद यही वह “कार्य” था जो उन्होंने किया। मैं उस समय युवा था, बस सत्रह या अठारह साल का, और जब मैंने इन बातों के बारे में सुना, तो मुझे लगा, “कितनी अव्यवस्था है! क्या ये परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग हैं? यह परमेश्वर में विश्वास करने वालों का काम कैसे लगता है?” यह सुनकर मुझे बहुत क्रोध आया। हमें इससे कोई मतलब नहीं है कि उन्होंने क्या खाया या उन्होंने किस चीज का आनंद लिया। संक्षेप में, कम से कम, उन्होंने कलीसियाई जीवन को ठीक से व्यवस्थित नहीं किया, उन्होंने लोगों को आवश्यक आध्यात्मिक भोजन—किताबें और भजन—नहीं बाँटा, और उन्होंने अगुआओं और कार्यकर्ताओं को विकसित नहीं किया। उन्होंने इनमें से कोई भी कार्य नहीं किया। कलीसिया को भेंटों के रूप में कोई छोटी-मोटी रकम नहीं मिलती थी, लेकिन जब वे विभिन्न स्थानों की कलीसियाओं में जाते थे, तो उन्हें केवल खाने, पीने और मजे करने की परवाह होती थी। उन्होंने कोई वास्तविक कार्य नहीं किया और कभी भी कलीसिया के कार्य के लिए भेंटों का उपयोग नहीं किया। सभाओं में, वे बस कुछ धर्म-सिद्धांतों के बारे में बात करते थे और कुछ नारे लगाते थे, और बात वहीं खत्म हो जाती थी; उन्होंने कभी भी वास्तविक समस्याओं को हल नहीं किया। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने कार्य शुरू करने के बाद, इन घटनाओं पर रोक लगा दी। उसने हर समस्या को हल करना शुरू किया और थोड़ा-थोड़ा करके ठोस कार्य करना शुरू किया, ताकि कलीसियाई जीवन और कलीसिया का कार्मिक कार्य धीरे-धीरे बदल जाए और सही रास्ते पर आ जाए, और यह वर्तमान समय तक जारी है। परमेश्वर की भेंटें वे हैं जो लोग परमेश्वर को भेंट करते हैं। यदि तुम भेंटों के प्रबंधन और उपयोग को देखो, तो देहधारी परमेश्वर के रहन-सहन का खर्च केवल एक बहुत छोटे हिस्से के बराबर है। शेष अधिकांश भेंटों का उपयोग सुसमाचार का उपदेश देने के कार्य, अगुआओं और कार्यकर्ताओं तथा पूर्णकालिक रूप से अपने कर्तव्य निभाने वाले लोगों के रहन-सहन के खर्च, और कलीसिया के कार्य के लिए आवश्यक मशीनरी और उपकरण खरीदने आदि के लिए किया जाता है। संक्षेप में, ये सभी लागतें उचित हैं और इनका उपयोग परमेश्वर के घर के कार्य के लिए किया जाता है, न कि उन बेकार लोगों का भरण-पोषण करने के लिए जो अपने कर्तव्य नहीं निभा सकते। परमेश्वर के घर के कार्य की बात करें तो इसका दायरा बहुत बड़ा है। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने भेंटों का उचित रूप से उपयोग किया, थोड़ा-थोड़ा करके कलीसियाई जीवन का निर्माण किया और थोड़ा-थोड़ा करके प्रशासनिक कार्य को व्यवस्थित किया। कलीसिया में विभिन्न प्रकार के लोगों को भी वर्गीकृत किया गया : अपने कर्तव्य निभाने वालों को ऐसा न करने वालों से अलग किया गया और सत्य से प्रेम करने वालों को सत्य के प्रति अरुचि रखने वालों से अलग किया गया। जिन्हें कलीसिया से दूर किया जाना था, उन्हें दूर कर दिया गया, और विभिन्न अवधियों में विकसित करने के लिए उपयुक्त लोगों को पदोन्नत भी किया गया। ये वे चीजें हैं जो तुम सभी लोगों ने देखी हैं और अनुभव की हैं। बेशक, इस यात्रा के दौरान, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाला व्यक्ति इन चीजों का अनुभव करने के दौरान धीरे-धीरे सत्य को समझने लगा और कार्य करने के सिद्धांतों को समझने लगा। एक लिहाज से, उसने कार्य करने के माध्यम से पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता प्राप्त की। दूसरे लिहाज से, परमेश्वर के कार्य और वचनों के माध्यम से, वह धीरे-धीरे परमेश्वर के इरादों को अधिक से अधिक समझने लगा। उसकी समझ केवल धर्म-सिद्धांतों के स्तर तक ही सीमित नहीं रही, न ही यह केवल विनियमों और अभ्यासों तक सीमित रही। बल्कि, उसकी समझ अधिकाधिक व्यावहारिक होती गई और वह परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कलीसिया का कार्य अच्छी तरह से करने में अधिकाधिक सक्षम होता गया, जिससे कलीसियाई जीवन अधिक स्थिर और अधिक सामान्य हो गया, और लोगों के जीवन प्रवेश के लिए अधिक लाभदायक हो गया। इसलिए, लगातार खोजने और लगातार अन्वेषण करने की प्रक्रिया में ही पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाला व्यक्ति परमेश्वर के इरादों को समझने लगा, परमेश्वर के साथ निकटता से सहयोग करने लगा, परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाने लगा और कलीसिया के कार्य को अच्छी तरह से करने की पूरी कोशिश करने लगा, और अधिक सटीकता के साथ यह सुनिश्चित करने का प्रयास करने लगा कि परमेश्वर के इरादे व्यर्थ न जाएँ और परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित किया जा सके। वह जो भी काम करता है, चाहे वह कार्मिकों से संबंधित हो या जीवन प्रवेश से, चाहे वह बाहरी मामलों से संबंधित हो या आंतरिक मामलों से, वह बिना बाएँ या दाएँ भटके सिद्धांतों के अनुरूप होने और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होने का प्रयास करता है। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाला व्यक्ति अपना कार्य इन चार शर्तों के साथ करता है : सच्चा विश्वास, सच्चा दिल, विचारशीलता, और परमेश्वर के इरादों की समझ। तुम लोगों के लिए, यह केवल अत्यंत लाभदायक और अत्यंत सहायक ही नहीं है; यह तुम लोगों का आशीष है! यदि यह व्यक्ति एक सही व्यक्ति न होता, बल्कि ऐसा व्यक्ति होता जो प्रसिद्धि और लाभ के पीछे भागता और रुतबे के फायदों का लालच करता, एक धोखेबाज व्यक्ति होता, ऐसा व्यक्ति होता जो केवल मुनाफे के चक्कर में रहता और जिसे पैसा देखते ही लालच आ जाता या फिर वह एक छद्म-विश्वासी होता, तो मुझे बताओ, क्या वह यह कार्य कर सकता था? क्या वह इन सभी तरीकों से सहयोग कर सकता था? क्या वह देहधारी परमेश्वर के साथ ऐसी अनकही समझ प्राप्त कर सकता था? (नहीं।) तो, यह व्यक्ति बेहद अहम है! मुख्य रूप से इसलिए क्योंकि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति में वे चार शर्तें हैं जिनके बारे में हमने अभी बात की है, वह कलीसिया का यह कार्य अच्छी तरह से कर सकता है। जब एक ही मामले की बात आती है, तो लोगों के पास चुनने का अधिकार और चुनने की गुंजाइश दोनों होते हैं। वे इसे बुरी तरह से सँभालना चुन सकते हैं और बेशक वे इसे अच्छी तरह से सँभालना भी चुन सकते हैं। यदि वे इसे अच्छी तरह से सँभालते हैं, तो अनगिनत लोगों को लाभ होगा, और परमेश्वर जो वचन बोलता है और परमेश्वर जो कार्य करता है, वह धीरे-धीरे लोगों में नतीजे हासिल करेगा। लेकिन यदि कोई व्यक्ति अच्छा मार्ग नहीं अपनाता है और इसके बजाय बिना सोचे-विचारे कुकर्म करता है, तो वह किस तरह के काम करेगा? वह परमेश्वर की सभी भेंटों का उपयोग व्यक्तिगत आनंद के लिए करेगा, महँगी कारें और आलीशान घर खरीदेगा, और यहाँ तक कि दुनिया भर के देशों की यात्रा करने के लिए निजी विमान और क्रूज जहाज भी खरीदेगा, और खाने, पीने और मजे करने का आनंद लेगा। अधिक से अधिक, वह कभी-कभार कुछ उपदेश देगा और बात वहीं खत्म हो जाएगी। वह कलीसिया का कोई कार्य बिल्कुल नहीं करेगा और कलीसिया के पूरी तरह से अव्यवस्थित होने पर भी उसे नजरअंदाज कर देगा, और केवल अपने आनंद की परवाह करेगा। यदि ऐसा व्यक्ति कलीसिया की अगुआई करता, तो क्या तुम लोगों के लिए एक अच्छा कलीसियाई जीवन और अपने कर्तव्य निभाने के लिए एक अच्छा परिवेश पाना आसान होता? (नहीं।) इसलिए पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति जैसे किसी अच्छे व्यक्ति का तुम लोगों की अगुआई करना वास्तव में आवश्यक है। कुछ लोग पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य को देखते हैं और फिर भी इसे कुछ नहीं समझते, यह सोचते हुए, “यह आसान है। इसे कौन नहीं कर सकता? अगर कोई व्यक्ति परमेश्वर के इरादों को समझता है और परमेश्वर द्वारा उपयोग किया जाने वाला व्यक्ति है, परमेश्वर द्वारा नामित व्यक्ति है, तो यह कार्य करना आसान है।” मुझे बताओ, क्या यह आसान है? (नहीं।) इस कार्य को अच्छी तरह से करना आसान नहीं है, मुख्यभूमि चीन जैसे धार्मिक उत्पीड़न वाले परिवेश में तो बिल्कुल भी आसान नहीं है। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति की अधिकारियों को तलाश थी; वह सभाओं में भाग लेने के लिए चाहे जहाँ भी जाता या वह कोई भी कार्य करता, वह अपने जीवन को जोखिम में डाल रहा होता था और उसके गिरफ्तार होने का मतलब मौत था। तो क्या उसने अपना कर्तव्य छोड़ दिया? क्या वह पीछे हट गया? क्या उसने धूर्त बनने और कामचोरी करने की कोशिश की? (नहीं।) चाहे वह अपने दिल में कितना भी भयभीत या कितना भी कमजोर क्यों न रहा हो, उसने कभी अपना कर्तव्य नहीं छोड़ा। कुछ लोग महत्वपूर्ण कार्य का बोझ नहीं उठाते हैं और वे चाहे जहाँ भी जाएँ, उन्हें किसी बड़े खतरे का सामना नहीं करना पड़ता है। जब वे कहते हैं, “मैंने अपना कर्तव्य निभाना नहीं छोड़ा है,” तो यह कहना आसान है और ऐसा करना आसान है। लेकिन पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाने वाला व्यक्ति जिन परिस्थितियों में था, उन पर विचार करते हुए, उसके लिए इतने खतरनाक परिवेश में हार न मानना और कलीसिया के कार्य के हर पहलू पर ध्यान देना—उसे कार्य के हर क्षेत्र और हर मामले के बारे में सोचना पड़ता था, किसी और के सोचने से पहले उसे उनके बारे में सोचना पड़ता था—क्या तुम लोग कहोगे कि यह करना आसान था? (नहीं।) मनुष्य की ऊर्जा और मनुष्य की स्वाभाविक क्षमता जो सहन कर सकती है, वे दोनों सीमित हैं। जब तुम उसे यह काम करते हुए देखते हो तो यह सब आसान लगता है, लेकिन अगर तुमसे इसे करने के लिए कहा जाए, तो तुम्हें पता चलेगा कि यह कितना कठिन है और यह आसान होने से कितना दूर है। तुममें से जिन लोगों ने इतने वर्षों तक उपदेश सुने हैं, मैंने उनके बीच ऐसा कोई दूसरा व्यक्ति नहीं पाया है, और न ही मैंने किसी ऐसे व्यक्ति को पाया है जो इस कार्य का बोझ उठा सके। जब पवित्र आत्मा ने कलीसियाओं से बोलना शुरू किया था, तब काफी लोगों ने अनुसरण करना शुरू किया था और वे वर्तमान तक ऐसा करते आ रहे हैं। उन्हें पता होना चाहिए और स्पष्ट होना चाहिए कि कलीसिया अपनी वर्तमान अवस्था तक विकसित होने में किन परिस्थितियों से गुजरी है और यह कदम-दर-कदम यहाँ तक कैसे पहुँची है। यदि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशीलता और समझ न दिखाई होती, तो मानवीय परिप्रेक्ष्य से बोलते हुए, कलीसिया अपनी वर्तमान अवस्था तक विकसित नहीं हो सकती थी। बेशक, कुछ लोग कहेंगे, “क्या यह पवित्र आत्मा का कार्य और अगुआई नहीं थी जिसने उसे अपने कार्य में ऐसे नतीजे हासिल करने में सक्षम बनाया?” पवित्र आत्मा तुम पर भी कार्य करना चाहता है, लेकिन क्या तुममें वह सच्चा दिल और विचारशीलता है? क्या तुम यह कर सकते हो? मुझे नहीं लगता कि तुम वास्तव में यह कर सकते हो। यह तुम्हें नीचा दिखाना नहीं है; बल्कि, तुम मूल रूप से यह नहीं कर सकते। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाने वाला व्यक्ति और तुम दोनों मानव हो, फिर भी वह यह कर सकता है और तुम नहीं कर सकते। यह साबित करता है कि लोगों के बीच अंतर होते हैं। परमेश्वर ने इस कार्य को करने के लिए उसे चुना और परमेश्वर ने जिस व्यक्ति को चुना, उसमें वह गलत नहीं था। कम से कम, इस व्यक्ति में यह शर्त है और यह योग्यता है, जबकि तुममें नहीं है। तुममें वे शर्तें नहीं हैं जिनकी परमेश्वर अपेक्षा करता है, इसलिए परमेश्वर ने उसे चुना और तुम्हें नहीं चुना। तुम्हारे पास आश्वस्त होने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। यह एक तथ्य है और कोई भी इससे इनकार नहीं कर सकता, है ना? (हाँ।)

अब जबकि हमने कलीसियाई जीवन, किताबों की छपाई और कलीसिया के हर पहलू के बारे में बात पूरी कर ली है, तो आओ, इसके बाद हम 1995 में शुरू हुए सुसमाचार का प्रचार करने के कार्य के बारे में बात करें। उस समय, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने मुझसे पूछा, “क्या अब सुसमाचार का प्रचार करना ठीक है? कुछ लोग कहते हैं कि वे बाहर जाकर सुसमाचार का प्रचार करना चाहते हैं,” और मैं सहमत हो गया। इसके बाद, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने इस कार्य के लिए व्यवस्थाएँ करनी शुरू कर दी। उसने सुसमाचार टीमों को साधारण तरीके से व्यवस्थित करके और फिर सुसमाचार का प्रचार करने के लिए खास लोगों को खास जगहों पर भेजकर, बस एक साधारण-सी व्यवस्था करके यह नहीं मान लिया कि सब कुछ ठीक से हो गया है। सुसमाचार टीमों को व्यवस्थित करते समय, उसने इस बात पर विचार किया कि विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के बीच प्रचार कैसे दिया जाए, विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के लोगों को सुसमाचार के किन सत्यों की आवश्यकता है और सुसमाचार की किताबों में शामिल करने के लिए परमेश्वर के वचनों में से कौन-से अंश और सामग्री चुनी जाए। फिर उसने सुसमाचार के सत्यों के विभिन्न पहलुओं से संबंधित परमेश्वर के कुछ मूलभूत वचनों को चुना और संकलित किया और उन्हें विशेष रूप से सुसमाचार का प्रचार करने के लिए किताबों के रूप में छपवाया। किताबें छपने के बाद, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने सुसमाचार कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण की भी व्यवस्था की और व्यक्तिगत रूप से सुसमाचार का प्रचार करने के सिद्धांत तैयार किए। यह वह ठोस कार्य था जो उसने किया। यानी, जब मैं उसे किसी मामले के बारे में बताता हूँ, तो वह बिना कुछ और कहे और बिना किसी समझौते के जाकर उसे कार्यान्वित करता है। वह मुझे परेशान नहीं करता या इसे कैसे करना है, इस बारे में सवाल पूछ-पूछकर तंग नहीं करता; मुझे इसके बारे में चिंता करने की कोई जरूरत नहीं होती। अगर कोई मामला तुम लोगों को सौंपा जाता है, तो मुझे फिर भी उसके बारे में चिंता करनी पड़ती है और उसकी जाँच करनी पड़ती है। लेकिन जब पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति की बात आती है, तो मैं उसे यह बताने के लिए सिर्फ एक वाक्य कहता हूँ कि क्या करना है, और वह जाकर उसे करता है और कार्यान्वित करता है। जिस बात ने मुझ पर सबसे गहरा प्रभाव छोड़ा, वह यह थी कि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने सुसमाचार का प्रचार करने के लिए कई सिद्धांत तैयार किए, जैसे कि सुसमाचार का प्रचार कैसे किया जाए, किसे प्रचार किया जा सकता है और किसे प्रचार नहीं किया जा सकता है, और इसका प्रचार करने के लिए किन तरीकों का उपयोग किया जाए और किन तरीकों का उपयोग न किया जाए। उसने एक-एक करके, बहुत विस्तार से विशिष्ट तरीके और विधियाँ तैयार कीं। फिर उसने सुसमाचार टीमों के लिए अक्सर सभाएँ आयोजित कीं, उनसे सवाल उठवाए और जवाब देने के लिए उनके साथ संगति की। उसने यह भी निर्धारित किया कि अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य के बारे में धार्मिक लोगों की क्या धारणाएँ और सवाल थे, उनका सामना कैसे किया जाना चाहिए, किन सत्यों पर संगति की जानी चाहिए और उनके सवालों को हल करने के लिए किन तरीकों का उपयोग किया जाना चाहिए। उसने छोटे-बड़े हर मामले पर ध्यान दिया और हड्डी कुतरने वाली चींटियों की तरह थोड़ा-थोड़ा करके उनसे निपटा। देखो, मैंने सिर्फ एक वाक्य कहा और उसने जाकर उसे कार्यान्वित कर दिया, और मैं बिना दखल दिए काम सँभालने वाला प्रबंधक बन सका। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति के वहाँ कार्य करने से, मुझे चिंता करने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि वह इस कार्य की जिम्मेदारी उठाने में पूरी तरह से सक्षम था। उसने विचारशीलता दिखाई और खोज भी की; बेशक, वह समर्पित भी था और उसने सचमुच कीमत चुकाई। यानी, वह मेरे द्वारा बोले गए वचनों और मेरी अपेक्षाओं को लेने और उन्हें कार्यान्वित करने में सक्षम था। इस तरह, सुसमाचार थोड़ा-थोड़ा करके फैलाया गया। भले ही कितने भी लोग सुसमाचार का प्रचार कर रहे हों, किसी भी मामले में, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति के साथ ही यह कार्य शुरू किया गया था और इसने प्रगति करनी शुरू की थी। वही वह व्यक्ति था जिसने इसे व्यवस्थित किया, इस पर अनुवर्ती कार्रवाई की, इसे कार्यान्वित किया और इसका पर्यवेक्षण किया, और थोड़ा-थोड़ा करके कार्य को वहाँ तक पहुँचाया जहाँ यह आज है। यह कहा जा सकता है कि कार्य में वर्तमान उपलब्धियाँ उन शुरुआती कार्य-व्यवस्थाओं, कार्य की बारीकियों से जुड़े नियमों और सामान्य मामलों की व्यवस्थाओं के आधार पर प्राप्त की गई थीं। ये सभी चीजें पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य थीं। उसका दिल सच्चा है और उसने एक वास्तविक कीमत चुकाई है। क्या ये तथ्य नहीं हैं? (हाँ।)

जैसे-जैसे राज्य का सुसमाचार अधिक से अधिक फैलता गया और अधिक से अधिक लोगों ने कार्य के इस चरण को स्वीकार किया, तो इसमें कौन-सा मुद्दा शामिल था? इसमें कलीसियाओं की स्थापना का मुद्दा शामिल था। क्या तुम लोग कलीसियाओं की स्थापना का कार्य अच्छी तरह से कर सकते थे? तुम लोग फिर भी इसे अच्छी तरह से करने में असमर्थ होते। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति को फिर भी व्यक्तिगत रूप से कार्य-व्यवस्थाएँ करनी पड़ीं, इस कार्य की रूपरेखा तैयार करनी पड़ी और इस कार्य को कार्यान्वित करना पड़ा, और व्यक्तिगत रूप से इस कार्य का पर्यवेक्षण करने, इस पर अनुवर्ती कार्रवाई करने और इसे आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करना पड़ा। इसलिए, उसने अक्सर अगुआओं और कार्यकर्ताओं के लिए और सुसमाचार कार्य के प्रति जिम्मेदार लोगों के लिए सभाएँ बुलाईं, उन्हें बताया कि कलीसियाएँ कैसे स्थापित की जाएँ, कितने लोगों से एक कलीसिया बननी चाहिए, कितनी कलीसियाओं से एक जिला बनना चाहिए, कितने जिलों से एक क्षेत्र बनना चाहिए, प्रत्येक कलीसिया में कितने कलीसिया अगुआ और कितने उपयाजक नियुक्त किए जाने चाहिए, इत्यादि। उसने कलीसिया के कार्य में शामिल हर बारीकी के संबंध में विशिष्ट नियम बनाए, जिसमें भेंटों के प्रबंधन और उपयोग के लिए विशिष्ट व्यवस्थाएँ शामिल थीं। यह सब पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य था। मुझे बताओ, क्या देहधारी परमेश्वर के साथ उसकी अनकही समझ है? (हाँ।) यदि उसके दिल में परमेश्वर के इरादों के प्रति कोई विचारशीलता नहीं होती या केवल थोड़ी-सी विचारशीलता होती या यदि उसके द्वारा दिखाई गई विचारशीलता में किसी हद तक कमी होती, तो क्या यह कार्य कार्यान्वित किया जा सकता था? (नहीं।) कार्य को कार्यान्वित किए बिना कलीसिया में क्या स्थिति पैदा हो गई होती? (कलीसियाई जीवन अस्त-व्यस्त हो गया होता।) न केवल कलीसियाई जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता, बल्कि कलीसिया के कार्य के सभी पहलू अस्त-व्यस्त हो जाते। बुरे लोग भी विघ्न-बाधा पैदा करने में सक्षम होते, और यहाँ तक कि कलीसिया में सत्ता सँभालते और अंतिम निर्णय उनका ही होता। हर जगह कलीसियाएँ स्थापित करने का कार्य अस्त-व्यस्त हो जाता और कार्मिक व्यवस्थाओं और भेंटों के प्रबंधन जैसे कार्य की विभिन्न मदें अस्त-व्यस्त हो जातीं। यदि अगुआ के रूप में सेवा करने वाले व्यक्ति का दिल सचमुच परमेश्वर के प्रति विचारशीलता दिखाने वाला नहीं होता और यह देखकर कि कलीसिया अच्छी तरह से विकसित हो रही है, पैमाने में बढ़ रही है और उनकी संख्या में वृद्धि हो रही है, वह रुतबे के फायदों का आनंद लेना, पुरानी उपलब्धियों के सहारे जीना और अपने बचे हुए साल आराम से बिताना शुरू कर देता—यदि इस तरह का व्यक्ति अगुआ होता, तो कलीसिया का कार्य अच्छी तरह से नहीं किया जाता। हालाँकि, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने हमेशा कलीसिया के कार्य में अपना सर्वश्रेष्ठ दिया है और आज भी दे रहा है। संकल्प वाले लोगों द्वारा अक्सर इस्तेमाल किया जाने वाला एक वाक्यांश है, “जब तक जीवन है, तब तक संघर्ष जारी रहेगा।” पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति के लिए, जब तक जीवन है, कार्य जारी रहेगा। वह हमेशा से कार्य करता रहा है। यहाँ तक कि जब तुम उसे आराम करने के लिए कहते हो, तो वह आराम नहीं करता; वह हर दिन इस तरह कार्य करता है और चाहे वह कितना भी थका हुआ क्यों न हो, कार्य करने में लगा रहता है। क्या यह कुछ ऐसा है जिसे केवल परमेश्वर के इरादों को समझकर प्राप्त किया जा सकता है? क्या उसने केवल इसलिए कार्य किया क्योंकि कोई उसका पर्यवेक्षण कर रहा था और उसे प्रेरित कर रहा था? नहीं। लोगों के दिल एक जैसे नहीं होते। इस व्यक्ति में परमेश्वर का भय मानने वाला दिल है और वह परमेश्वर के दिल के प्रति विचारशीलता दिखाता है। यह अत्यंत अहम है! चाहे वह कितना भी थक जाए, वह नकारात्मक नहीं होता और चाहे वह किसी भी कठिनाई का सामना करे, वह पीछे नहीं हटता; वह हमेशा कार्य करने में लगा रहता है। इसलिए, कलीसिया के कार्य की सभी मदें अब कदम-दर-कदम सही रास्ते पर आ गई हैं, अधिकाधिक सुचारू रूप से आगे बढ़ रही हैं और अधिकाधिक अच्छे नतीजे हासिल कर रही हैं। हर ठोस कार्य को करने में ऐसे व्यक्ति द्वारा तुम लोगों की अगुआई किया जाना कैसा लगता है? यदि तुम लोगों की अगुआई करने वाला यह व्यक्ति नहीं होता, तो तुम लोगों का क्या होता? क्या तुम लोगों में बहुत-सी चीजों की कमी नहीं होती? (हाँ।) इस व्यक्ति का होना तुम लोगों के लिए अहम है। उसने कलीसिया के कार्य की हर मद को सही रास्ते पर ला दिया है। कार्य के हर कदम पर पैदा होने वाली समस्याएँ लगातार कम होती गई हैं, जिन समस्याओं को हल करने की आवश्यकता है वे लगातार कम होती गई हैं और लोग जिन सत्य सिद्धांतों को समझते हैं वे अधिकाधिक स्पष्ट होते गए हैं। ये नतीजे केवल इसलिए हासिल नहीं हुए हैं क्योंकि यह व्यक्ति मौजूद है, बल्कि, इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उसकी परमेश्वर के साथ अनकही समझ है। यदि वह कोई अलग रास्ता अपनाता तो क्या होता? यदि वह अपने उद्यम में जुट जाता और अपने रुतबे का प्रबंधन करता तो क्या होता? तब ऐसे नतीजे हासिल नहीं होते। यह ठीक इसलिए है क्योंकि उसके द्वारा किए जाने वाले सभी कार्यों की प्रकृति परमेश्वर के कार्य के साथ घनिष्ठता से सहयोग करना है, परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाना है और परमेश्वर के साथ अनकही समझ रखना है, जिससे अंततः तुम लोगों को ही लाभ होता है। तुम लोगों को कितना लाभ मिला है? कहीं और दूर देखने की जरूरत नहीं, कम से कम, तुम लोग विशेषज्ञता के विभिन्न क्षेत्रों के बारे में काफी कुछ समझने लगे हो, तुम लोगों ने अपनी विशेषज्ञता में प्रगति की है और धीरे-धीरे नौसिखिए से पेशेवर बन गए हो। इसके अलावा, वह सत्य सिद्धांतों के बारे में बात करने में जितना अधिक विस्तृत और विशिष्ट होता है और तुम लोगों से उसकी अपेक्षाएँ जितनी अधिक सख्त होती हैं, और विशेष रूप से, जिन वचनों से वह तुम लोगों की काट-छाँट करता है वे जितने अधिक कठोर होते हैं, तुम लोग उन्हें अपने दिलों में उकेरने, उन्हें गहराई से याद रखने, सत्य सिद्धांत क्या हैं यह स्पष्ट रूप से समझने और परमेश्वर के इरादे क्या हैं यह समझने में उतने ही अधिक सक्षम होते हो। तुम लोग सचमुच इतने ही तुच्छ हो। चाहे तुम लोगों के साथ सत्य सिद्धांतों पर कितनी भी बार संगति क्यों न की जाए, तुम लोग उन्हें याद नहीं रख सकते। केवल जब पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाने वाला व्यक्ति अक्सर तुम लोगों को इतनी कठोरता से उजागर करता है और तुम लोगों की काट-छाँट करता है, और यहाँ तक कि तुम लोगों को डाँटता है, तभी तुम लोग कुछ सत्य सिद्धांतों को समझते हो, अपने स्व-आचरण और क्रियाकलापों में बहुत अधिक नियमों का पालन करने वाले और अच्छा व्यवहार करने वाले बन जाते हो, और अपना रवैया सही करते हो। बेशक, काट-छाँट किए जाने की प्रक्रिया में, तुम लोग भी डर से काँपते हो, हमेशा इस बात से डरते हो कि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाने वाला व्यक्ति तुम लोगों की असलियत जान लेगा और तुम लोगों को बाहर निकाल देगा। मैं इसे एक अच्छी बात मानता हूँ, बुरी बात नहीं। कम से कम, कुछ लोगों का अब अपने कर्तव्य निभाने के प्रति रवैया बहुत बेहतर है और वे पहले की तुलना में बहुत अच्छा व्यवहार करते हैं। इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। यद्यपि लोगों को डाँटना गलत लग सकता है, और बाहर से देखा जाए, तो यह देखने के मामले में इतना परिष्कृत नहीं है और शब्द सुनने में इतने सुखद नहीं हैं, फिर भी प्राप्त नतीजे अच्छे होते हैं। यह नतीजा हासिल करने के लिए, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने कितनी कीमत चुकाई है? उसे तुम लोगों पर कितनी बार गुस्सा होना पड़ता है? मुझे बताओ, जब वह तुम लोगों की काट-छाँट करता है, तो क्या वह गुस्सा नहीं होता? क्या उसे क्रोध नहीं आता? क्या इससे उसके स्वास्थ्य को भी नुकसान नहीं पहुँचता? वह तुम लोगों की काट-छाँट नहीं करना चाहता। कभी-कभी वह इतना गुस्सा हो जाता है कि वह तुम लोगों को डाँटता है और हो सकता है कि उसके द्वारा कहे गए शब्द सुनने में बहुत परिष्कृत न लगें। लेकिन तुम लोगों के साथ मेलजोल में तुम लोगों की अभिव्यक्तियों को देखते हुए, वह जो कहता है वह सही है और तुम लोगों की वास्तविक स्थिति के अनुरूप है; यह ज़रा-सा भी अतिवादी नहीं है। तुम लोगों ने ऐसा क्या किया है जिससे यह व्यक्ति इतना गुस्सा हो गया है? ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम लोग जो काम करते हो वे बहुत ही गुस्सा दिलाने वाले हैं। तुम लोगों के साथ इतने वर्षों तक सत्य सिद्धांतों पर संगति की गई है, फिर भी तुम लोग उन्हें नहीं समझते और अभी भी अपनी मर्जी के अनुसार बिना सोचे-विचारे गलत काम करते हो। केवल तभी वह इस तरह बोलने के लिए मजबूर होता है। यह कहने के बाद, उसे खुद भी पछतावा होता है और वह कहता है, “हम सभी भाई-बहन हैं; मैं इतना गुस्सा क्यों होता हूँ?” मैं उसे सांत्वना देता हूँ और प्रोत्साहित करता हूँ : “ठीक इसी तरह उनकी काट-छाँट की जानी चाहिए। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। अगली बार जब तुम इस तरह की स्थिति का सामना करो, तो तुम्हें फिर भी उनकी काट-छाँट अवश्य करनी चाहिए।” मुझे बताओ, क्या उसे इस तरह प्रोत्साहित करना सही है? (हाँ।) यह ठीक इसलिए है क्योंकि लोग बहुत गहराई से भ्रष्ट हैं, बहुत सुन्न हैं और उनका आध्यात्मिक कद दयनीय रूप से छोटा है, इसलिए एक बहुत ही साधारण मामले में भी नतीजे हासिल करने के लिए डाँटने और चिल्लाने की आवश्यकता होती है। अन्यथा, कार्य नहीं किया जा सकता। हर कोई सोचता है कि वह सक्षम है और हर कोई अपनी मर्जी के अनुसार मनमाने ढंग से और बिना सोचे-विचारे काम करना चाहता है। मुझे बताओ, क्या चीजों को नियंत्रण में रखने वाले ऐसे व्यक्ति का न होना स्वीकार्य होगा? (नहीं।) सभी लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन उनमें से किसी में भी परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं है; वे सभी भ्रष्ट स्वभावों से भरे लोग हैं। यदि चीजों को नियंत्रण में रखने वाला कोई नहीं होता, तो इसके बाद की स्थिति यह होती कि हर कोई अपना अंतिम निर्णय थोपना चाहता और हर कोई राजा की तरह सत्ता का इस्तेमाल करना चाहता, जबकि वे सत्य का शासन होने देने से इनकार करते और परमेश्वर का शासन होने देने से इनकार करते। यदि सत्य का शासन होना है और सत्य को सत्ता सँभालनी है, तो तुम लोगों पर नजर रखने वाला कोई अवश्य होना चाहिए और इस व्यक्ति का उपयोग तुम लोगों पर अंकुश लगाने के लिए अवश्य किया जाना चाहिए। क्या यह प्रभाव प्राप्त करना आसान है? (नहीं।) जैसे-जैसे पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाने वाला व्यक्ति कार्य करता है, वह जितना अधिक कार्य करता है, उतना ही अधिक क्रोधित होता जाता है; वह जितना अधिक कार्य करता है, उतना ही अधिक व्याकुल होता जाता है; वह जितना अधिक कार्य करता है, उसके शब्द उतने ही अधिक कठोर होते जाते हैं; वह जितना अधिक कार्य करता है, वह उतनी ही अधिक बार तुम लोगों की काट-छाँट करता है; और वह जितना अधिक कार्य करता है, तुम लोगों के प्रति उसका रवैया उतना ही खराब होता जाता है। केवल यही दर्शाता है कि तुम लोगों की काबिलियत कितनी खराब है, तुम लोग कितने अड़ियल हो, तुम लोग कितने सुन्न हो और तुम लोगों का आध्यात्मिक कद कितना छोटा है। मुझे बताओ, कार्य के इतना कठिन होने के बावजूद, क्या पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति ने हार मान ली है? उसने हार नहीं मानी है। चाहे तुम लोग कितनी भी बार वही बुनियादी गलतियाँ क्यों न करो, क्या उसने तुम लोगों का साथ छोड़ा है? (नहीं।) जब भी कोई टीम किसी समस्या के बारे में मार्गदर्शन माँगती है, तो भाई, बिना कुछ और कहे और बिना किसी कोताही के, तुरंत उस पर संगति करता है और उसे हल करता है। कभी-कभी वह खाना खा रहा होता है या आराम करने वाला होता है, लेकिन वह अपना कटोरा नीचे रख देता है या आराम करना टाल देता है और तुरंत जवाब देता है। वह कहता है : “एक बार जब मैं जवाब दे दूँगा, तो वे जल्दी से काम पर लग सकते हैं। काम में देरी नहीं होनी चाहिए; काम बहुत जरूरी है। एक बार जब मैं जवाब दे दूँगा, तो मुझे तसल्ली मिलेगी और मैं शांति से आराम भी कर सकूँगा।” देखो, क्या समस्याओं को हल करने के प्रति उसकी मानसिकता सही है? (हाँ।) वह हमेशा तुम लोगों का पर्यवेक्षण करता है और तुम लोगों को प्रेरित करता है, और वह अक्सर तुम लोगों की काट-छाँट भी करता है। वह हमेशा तुम लोगों के काम की जाँच भी करता है, तुम लोगों का काम का बोझ पूरा रखता है ताकि तुम लोग खाली न बैठो, और वह हर दिन तुम लोगों पर नजर रखता है। मुझे बताओ, क्या तुम लोगों की अगुआई करने वाला ऐसा व्यक्ति होना अच्छा है? (हाँ, यह अच्छा है।) मुझे लगता है कि इस व्यक्ति का होना काफी अच्छा है। वह तुम लोगों के लिए सत्य का अनुसरण करने और अपने कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने में बहुत मददगार है। उसे नापसंद मत करो, और शिकायत मत करो। मैं सत्य पर संगति करने के लिए जिम्मेदार हूँ और मेरे पास सचमुच यह सामान्य मामलों का काम और प्रशासनिक काम करने के लिए शारीरिक शक्ति या ऊर्जा नहीं है। इसके अलावा, भाई के इसे करने से, मुझे इसे करने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है। यदि मैं तुम लोगों पर कार्य करने वाला होता, तो मैं काफी नरम होता। इससे तुम लोगों को फायदा उठाने का अवसर मिल जाता और तुम लोग उतने अच्छे व्यवहार वाले नहीं हो पाते जितने कि तुम अभी हो। मैं इस स्थिति को जानता हूँ। मेरा तुम लोगों के प्रति इतना उदार होना तुम लोगों के लिए पूरी तरह से उचित नहीं है। जब मैं कुछ लोगों के साथ सख्ती से पेश नहीं आता, तो वे बेलगाम और निरंकुश हो जाते हैं, और यहाँ तक कि अपनी हदें पार कर देते हैं, अपना काम लापरवाही से करते हैं और खानापूरी करते हैं। क्या इस तरह के लोगों की काट-छाँट करने की आवश्यकता नहीं है? (हाँ।) तुम लोगों को जिसकी सबसे अधिक आवश्यकता है, वह है भाई के काम करने का कठोर तरीका—जितना अधिक कठोर, उतना ही बेहतर। जब वह दिन आएगा कि तुम लोग सत्य को समझ जाओगे और तुम लोग परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाना जान जाओगे, सत्य सिद्धांतों के अनुसार सटीक रूप से अभ्यास कर सकोगे, अपने कर्तव्यों को बेहतर से बेहतर तरीके से निभा सकोगे, अपने कर्तव्यों को अधिकाधिक उचित तरीके से निभा सकोगे, अपने कर्तव्यों के निर्वहन में अधिकाधिक प्रभावी बन जाओगे, परमेश्वर के सामने आना जान जाओगे, सत्य का अभ्यास करना जान जाओगे और परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य करना जान जाओगे, मुझे बताओ, क्या यह एक अच्छी बात नहीं होगी? (हाँ।) यह एक अच्छी बात है। ऐसे व्यक्ति का होना तुम लोगों के लिए बहुत फायदेमंद है। यह व्यक्ति ये सभी चीजें ठीक इसलिए करता है क्योंकि उसकी परमेश्वर के साथ एक अनकही समझ है। इस अनकही समझ का अर्थ है परमेश्वर के प्रति विचारशीलता दिखाना और बिना किसी कोताही के परमेश्वर के वचनों को कार्यान्वित करने और उनका अभ्यास करने में सक्षम होना, और फिर तुम लोगों को थोड़ा-थोड़ा करके परमेश्वर में विश्वास करने के सही रास्ते पर लाना, ताकि अपने कर्तव्य निभाते हुए तुम लोग धीरे-धीरे मानक स्तर तक पहुँच सको और सही रास्ते पर आ सको, और ताकि तुम लोग उस मिशन को सफलतापूर्वक पूरा कर सको जो परमेश्वर ने तुम लोगों को दिया है और तुम लोग परमेश्वर को हिसाब दे सको। यह एक अच्छी बात है। तो मुझे बताओ, इस प्रक्रिया में, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाने वाला व्यक्ति क्या भूमिका निभाता है? तुम लोग उसे क्या भूमिका निभाते हुए मानते हो? (एक परिवार का मुखिया।) इस परिवार के मुखिया की तरह, है ना? पूरे रास्ते, वह आगे बढ़ने में तुम लोगों की अगुआई करता है। काम में चाहे जो भी कठिनाइयाँ आएँ, वह कभी भी कठिनाई के बारे में शिकायत नहीं करता, कभी भी कष्ट के बारे में शिकायत नहीं करता; यदि कोई पीछे हटता है, तो वह उन्हें अपने साथ खींचता है और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए उन पर प्रहार करता है।

परमेश्वर के साथ अनकही समझ होने के विषय पर अभी भी बहुत कुछ है और कुछ बारीकियों पर अभी तक चर्चा नहीं की गई है। यदि तुम लोग उनके बारे में सुनना चाहते हो, तो हमारी अगली सभा में हम इन विशिष्ट बारीकियों पर चर्चा करेंगे ताकि तुम लोग इस बात की कुछ समझ प्राप्त कर सको कि परमेश्वर के साथ अनकही समझ होने का क्या अर्थ है और उन लोगों के संबंध में जो परमेश्वर के साथ अनकही समझ प्राप्त कर सकते हैं, परमेश्वर उन्हें कैसे देखता है और परमेश्वर उन्हें कैसे निरूपित और परिभाषित करता है। हम इन सभी चीजों के बारे में संगति करेंगे। आओ, आज के लिए हम अपनी संगति यहीं समाप्त करें। अलविदा!

21 दिसंबर 2024

पिछला: सत्य का अनुसरण कैसे करें (30)

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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