सत्य का अनुसरण कैसे करें (30)

पिछली बार हमने लोगों में देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाएँ और कल्पनाएँ होने के मुद्दे पर संगति की थी, जो “सत्य का अनुसरण कैसे करें” विषय के अंतर्गत “त्याग देना” का अभ्यास करने के तरीकों में से एक, “अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना” में शामिल है, है ना? (हाँ।) हमने इस बात पर संगति की थी कि लोगों को देहधारी परमेश्वर के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। तो, पिछली बार हमने परमेश्वर के देहधारण से जुड़े किन सत्यों पर संगति की थी? (पिछली बार हमने परमेश्वर के अस्पष्ट रूप से न बोलने पर, जो परमेश्वर द्वारा लोगों को प्रलोभन न देने का हिस्सा है, और साथ ही रुतबे के प्रति परमेश्वर के रवैये पर भी संगति की थी।) हमने देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के बराबर न रखने के विषय पर संगति की थी, जिसमें परमेश्वर का लोगों को प्रलोभन न देना शामिल है, और हमने इस पर भी संगति की थी कि देहधारी परमेश्वर रुतबे के साथ कैसे पेश आता है। इस विषय के बारे में हमने क्या संगति की थी? मुझे बताओ, तुम लोगों ने क्या जाना है। (अतीत में, मुझे लगता था कि परमेश्वर की पहचान सृष्टिकर्ता की है और उसका रुतबा बहुत ऊँचा है। परमेश्वर की संगति के माध्यम से मैंने यह देखा है कि परमेश्वर कभी खुद को ऊँचे रुतबे वाले के रूप में पेश नहीं करता, न ही वह कभी इस रुतबे में आनंद लेता है। ऐसा भी नहीं है कि इस रुतबे के कारण परमेश्वर मानवजाति को बचाने के लिए कीमत चुकाता है; बल्कि, ऐसा करके वह मानवजाति के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहा है। इसके अलावा, अतीत में, मैं सोचता था कि अगर किसी के पास ऊँचा रुतबा है, तो उसके पास ताकत है। परमेश्वर की संगति के माध्यम से ही मुझे एहसास हुआ कि रुतबा वास्तव में सिर्फ एक उपाधि दर्शाता है और परमेश्वर के घर में किसी व्यक्ति का अगुआ या कार्यकर्ता होना परमेश्वर द्वारा उस व्यक्ति को आदेश और जिम्मेदारी दिए जाने के बराबर है। परमेश्वर की संगति सुनने के बाद मैंने यही समझ हासिल की है।) मैं चाहे कुछ भी संगति करूँ, एक लिहाज से, यह लोगों को अधिक स्पष्ट और सटीक रूप से यह जानने देने के लिए है कि सभी प्रकार की चीजों के संबंध में परमेश्वर के दृष्टिकोण और सिद्धांत क्या हैं और परमेश्वर के स्वभाव सार की सच्ची अभिव्यक्तियाँ और प्रकाशन क्या हैं—यही लोगों को जानने की जरूरत है। दूसरे लिहाज से, इस विषयवस्तु पर संगति करने से लोगों को सभी प्रकार की चीजों के साथ व्यवहार करने के लिए कुछ सही दृष्टिकोण मिलते हैं, जिससे वे उनके साथ व्यवहार करने और उन्हें सँभालने के सिद्धांत समझ पाते हैं। उदाहरण के लिए, रुतबे के साथ परमेश्वर के पेश आने के तरीके को ही लो। एक लिहाज से, इस पर संगति करने से तुम्हें यह समझने में मदद मिलती है कि जब परमेश्वर देह धारण करता है और मानवजाति का सदस्य बनने के लिए पृथ्वी पर आता है—यानी, जब वह सामान्य मानवता के भीतर रहता है—तो रुतबे पर परमेश्वर के विचार और दृष्टिकोण कैसे होते हैं और रुतबे को सँभालने के लिए उसके सिद्धांत कैसे होते हैं। यह ऐसी चीज है, जिसे लोगों को समझने की जरूरत है। दूसरे लिहाज से, परमेश्वर रुतबे के साथ कैसे पेश आता है, इस पर संगति करना सिर्फ इसलिए नहीं है कि लोग इन सत्यों को समझें जिन्हें उन्हें जानना चाहिए; बल्कि अधिक महत्वपूर्ण रूप से यह इसलिए है कि सत्य समझने के बाद लोगों के पास इस मुद्दे को सुलझाने और सँभालने के लिए सही विचार और दृष्टिकोण और अभ्यास के सिद्धांत हों। संक्षेप में, हम चाहे किसी भी प्रकार के मुद्दे पर संगति करें, एक लिहाज से, यह तुम्हें इस प्रकार के मुद्दे के साथ पेश आने के सही दृष्टिकोण बताने के लिए है, और दूसरे लिहाज से, यह तुम्हें इस प्रकार के मुद्दे को सँभालने के लिए अभ्यास के सिद्धांत और अभ्यास के मार्ग से अवगत कराने के लिए है।

यद्यपि देहधारी परमेश्वर के पास परमेश्वर की पहचान है और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के बीच उसका रुतबा भी है, लेकिन यह रुतबा उस रुतबे से पूरी तरह से अलग है, जिसके बारे में भ्रष्ट मनुष्य बात करते हैं। परमेश्वर के लिए, एक लिहाज से, यह रुतबा केवल एक कथन है जिसमें सत्य शामिल है; दूसरे लिहाज से, जहाँ तक देहधारी परमेश्वर के जीवन और सार का संबंध है, यह रुतबा कोई पद नहीं है, बल्कि यह देहधारी परमेश्वर के जीवन सार के संदर्भ में कहा जाता है। तो सार रूप में, वह रुतबा जिसके बारे में भ्रष्ट मनुष्य बात करते हैं, वास्तव में देहधारी परमेश्वर के इस रुतबे से अलग है। भ्रष्ट मानवजाति के बीच रुतबा क्या है? (ताकत का प्रतीक।) भ्रष्ट मानवजाति के बीच रुतबे का किसी व्यक्ति की पहचान और सार से कोई लेना-देना नहीं होता; यह केवल एक उपाधि है। उदाहरण के लिए, भ्रष्ट मानवजाति में कुछ लोग सीईओ, मैनेजर हैं या उनका एक निश्चित सामाजिक रुतबा है। यह लोगों के बीच केवल एक उपाधि है या वर्ग और श्रेणी का विभाजन है; इसका व्यक्ति की सच्ची पहचान और सार से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए, लोगों के बीच देहधारी परमेश्वर का तथाकथित “रुतबा” मानव समाज के शासकों के रुतबे जैसा नहीं है; वह कोई शासक नहीं है, न ही वह निहित स्वार्थों वाला कोई व्यक्ति है। लोगों के बीच, परमेश्वर के रुतबे की बात केवल उसके सार और पहचान के संदर्भ में की जाती है, और परमेश्वर की पहचान और सार की बात केवल परमेश्वर के जीवन और परमेश्वर के अधिकार, सामर्थ्य और स्वभाव के कारण की जाती है। परमेश्वर का रुतबा लोगों के बीच किसी उपाधि जैसा नहीं है। इसलिए, लोग देहधारी परमेश्वर को विभिन्न सामाजिक वर्गों के रुतबे वाले लोगों के बराबर नहीं रख सकते। विभिन्न सामाजिक वर्गों में रुतबे वाले लोगों को, चाहे वे किसी भी वर्ग के हों, सामूहिक रूप से शासक वर्ग कहा जाता है। शासक वर्ग का सार यह है कि, एक लिहाज से, उनके पास ऐसा काम होता है जो उनके रुतबे के अनुरूप होता है; दूसरे लिहाज से, चाहे कोई भी काल या सामाजिक परिवेश हो, इस शासक वर्ग में मूलभूत रूप से लोगों के बीच के नेता, असाधारण लोग, निहित स्वार्थों वाले लोग, आदि शामिल होते हैं। सौ साल से भी अधिक समय पहले तो विशेष रूप से ऐसा ही था—समाज में रुतबे और प्रतिष्ठा वाले शासक वर्ग के विशाल बहुमत में निहित स्वार्थों वाले लोग ही थे। तो “निहित स्वार्थों वाले लोगों” से क्या तात्पर्य है? इसका तात्पर्य है वे लोग, जो अपनी ताकत और रुतबे का उपयोग अपने लिए लाभ खोजने के लिए करते हैं। वे किस तरह से लाभ खोजते हैं? अपने राजनीतिक प्रभाव और ताकत के माध्यम से वे अपनी प्रजा पर शासन करते हैं; उनके शासन और प्रशासन के तहत यह प्रजा उन्हें नजराना देती है, या अधिक विशिष्ट रूप से कहें तो, कर चुकाती है। लेकिन देहधारी परमेश्वर के रुतबे और शासक वर्ग के रुतबे के बीच सार में अंतर है। समाज में या लोगों के समूहों के बीच वे शासकों या ताकत और रुतबे वाले व्यक्तियों के किसी भी वर्ग के हों, शासक वर्ग का रुतबा केवल एक पद और एक उपाधि है। वे केवल उन लोगों पर शासन करते हैं जिन पर वे राज करते हैं, या एक सरल तरीके से जो उनके शासन और प्रशासन के दायरे में आते हैं—मोटे तौर पर कहें तो, इसे राज करना कहा जाता है, और संकीर्ण अर्थ में, इसे शासन करना और प्रशासन करना कहा जाता है। राज करने, शासन करने और प्रशासन करने के माध्यम से, वे वह ताकत और विभिन्न लाभ प्राप्त करते हैं जो उनका रुतबा उनके लिए लाता है। यद्यपि देहधारी परमेश्वर के पास परमेश्वर की पहचान और सार है और उसके पास परमेश्वर का दर्जा है, फिर भी वह जो कार्य करता है, उसके कार्य का सार और स्वयं उसके रुतबे का सार समाज और मानवजाति के विभिन्न शासक वर्गों से अलग है। देहधारी परमेश्वर लोगों पर जो कार्य करता है, वह उन पर राज करना या प्रशासन करना नहीं है, बल्कि उनकी अगुआई करना, उन्हें पोषण प्रदान करना, उनका मार्गदर्शन करना, उन्हें सहारा देना, उनकी मदद करना, उनकी काट-छाँट करना, उनका न्याय करना और उन्हें ताड़ना देना है। यह सारा कार्य करने में परमेश्वर का उद्देश्य लोगों को अपने भ्रष्ट स्वभाव त्यागने और उनसे मुक्त होने में सक्षम बनाना है। वह लोगों पर जो समस्त कार्य करता है, उसकी सबसे बुनियादी प्रकृति उन्हें सत्य और जीवन प्रदान करने की है, ताकि उन्हें परमेश्वर के सामने लाया जा सके। वह यही कार्य करता है। परमेश्वर पृथ्वी पर जो कार्य करना और जो वचन बोलना चाहता है, वह उन्हें लेता है और लोगों पर वह करता है और वे वचन लोगों से बोलता है, ताकि वे सुन और समझ सकें और उनके पास अभ्यास का मार्ग हो और अंततः वे अपने भ्रष्ट स्वभाव त्याग सकें, परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकें और ऐसे लोग बन सकें जो वास्तव में परमेश्वर की आराधना करते हैं। इस प्रक्रिया में भ्रष्ट मनुष्य देहधारी परमेश्वर से मुख्य रूप से जो प्राप्त करते हैं, वह है सत्य का प्रावधान, जीवन का प्रावधान और मार्ग का प्रावधान। अंततः, वे वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम होते हैं, सच्चे सृजित प्राणी—ऐसे सृजित प्राणी जो मानक स्तर के हैं—बन जाते हैं और परमेश्वर को संतुष्ट करने लगते हैं, परमेश्वर की मान्यता और स्वीकृति प्राप्त करते हैं और परमेश्वर की आराधना करने वाले मानव बन जाते हैं। ये वे चीजें हैं जो मानव देहधारी परमेश्वर से प्राप्त करते हैं। यद्यपि देहधारी परमेश्वर के पास यह रुतबा है और उसने यह कार्य किया है, लेकिन वह मानवजाति के नजरानों का आनंद नहीं लेता। यद्यपि देहधारी परमेश्वर के पास रुतबा है, लेकिन वह रुतबे के उन फायदों का आनंद नहीं लेता जिनका आनंद शासक वर्ग का कोई सदस्य लेता है, न ही वह अपने रुतबे द्वारा उसे प्रदत्त विभिन्न प्रकारों के उदार व्यवहार का आनंद लेता है। इसलिए, यद्यपि देहधारी परमेश्वर के पास देहधारी परमेश्वर का रुतबा है, फिर भी वह कोई निहित स्वार्थ वाला व्यक्ति नहीं है, न ही वह शोषक वर्ग का हिस्सा है। अपना कार्य करने में—ठीक वैसे ही जैसे स्वर्ग स्थित परमेश्वर, परमेश्वर का आत्मा, पूरी मानवजाति की अगुआई करता है—देहधारी परमेश्वर मानवजाति को पोषण प्रदान करता है, उसका मार्गदर्शन करता है, उसे सहारा देता है और उसकी मदद करता है और मानवजाति से कभी किसी भौतिक या गैर-भौतिक चीज की माँग नहीं करता। इसलिए, जब देहधारी परमेश्वर कार्य करने के लिए लोगों के बीच आता है, तब भले ही उसके पास वह रुतबा होता है जो मनुष्य अपनी आँखों से देखते हैं या वह रुतबा होता है जो वह उनके विचारों और धारणाओं के अनुसार रखता है, फिर भी वह लोगों से नजरानों का आनंद नहीं लेता। वह जो कार्य करता है वह और मानवजाति के लिए उसका पोषण निःशुल्क हैं; वह मानवजाति से किसी शुल्क, कर या पारिश्रमिक की माँग नहीं करता। अब तक, क्या तुम लोगों ने उसे एक पैसा भी दिया है? (नहीं।) क्या तुम लोगों ने कभी उपदेश सुनने के लिए भुगतान किया है? (नहीं।) हमारे सभा-स्थलों में प्रवेश-पत्रों की आवश्यकता नहीं होती, सभाओं में शामिल होने के लिए तुम्हें टिकट नहीं खरीदने पड़ते और तुम्हें एक पैसा भी नहीं देना पड़ता। इसके अलावा, तुम लोग जो किताबें पढ़ते हो, जो वीडियो देखते हो और उपदेशों की जो रिकॉर्डिंग सुनते हो, वे सब निःशुल्क हैं। तुम लोगों से कभी एक पैसा भी नहीं लिया गया है। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।) किसी से भी एक पैसा तक नहीं लिया गया है; सब कुछ निःशुल्क है। कुछ लोग पूछते हैं, “क्या व्यक्तिगत भेंटों का व्यक्ति की आय का एक निश्चित प्रतिशत होना आवश्यक है?” ऐसा नहीं है; सभी भेंटें स्वेच्छा से दी जाती हैं। दशमांश केवल वह है जो विश्वासियों को भेंट करना चाहिए, लेकिन कोई अपनी आय का दसवाँ हिस्सा भेंट करता है या पाँचवाँ हिस्सा, यह पूरी तरह से स्वैच्छिक है। इसके अलावा, परमेश्वर में विश्वास करने वाले कई लोगों ने कभी वह भेंट नहीं किया है जो उन्हें करना चाहिए, फिर भी वे सभाओं में शामिल होते हैं और फिर भी वे परमेश्वर के वचन पढ़ सकते हैं और उपदेश सुन सकते हैं। एक भी व्यक्ति उपदेश सुनने के उसके अधिकार, सभाओं में शामिल होने के उसके अधिकार या अपना कर्तव्य निभाने के उसके अधिकार से केवल इसलिए वंचित नहीं किया गया है कि उसने कभी भेंटें नहीं दीं—ऐसा किसी के साथ नहीं हुआ है, है ना? (हाँ।)

व्यवस्था के युग से लेकर वर्तमान राज्य के युग तक, परमेश्वर ने निरंतर मानवजाति को पोषण प्रदान किया है। जब से परमेश्वर के आत्मा ने मानवजाति से बोलना शुरू किया, तब से लेकर परमेश्वर के पहले देहधारण तक, और फिर परमेश्वर के दूसरे देहधारण तक, परमेश्वर ने अनगिनत वचन बोले हैं और मानवजाति पर इतना अधिक कार्य किया है जिसकी गणना नहीं की जा सकती। उसने बहुत सारे वचन बोले हैं और उसने मानवजाति को बहुत अधिक पोषण प्रदान किया है—यह पहले से ही बेहिसाब है। और क्या परमेश्वर ने कभी मनुष्यों से एक पैसा भी माँगा है? उसने कभी नहीं माँगा है। उसने कभी मनुष्यों से अनाज की एक बोरी तक नहीं माँगी है; वह केवल लोगों को इस तरह निरंतर और निःशुल्क पोषण प्रदान करता है। चाहे वह देहधारी परमेश्वर हो या स्वयं परमेश्वर, यद्यपि उसके पास सर्वोच्च रुतबा है, फिर भी वह मानवजाति को निःशुल्क पोषण प्रदान करता है। इसके अलावा, देहधारी परमेश्वर लोगों से समान आधार पर मिलता-जुलता है, मनुष्यों को घनिष्ठतापूर्वक और आमने-सामने पोषण प्रदान करता है, और जिस तरह से वह उनकी अगुआई करता है, वह और भी अधिक व्यावहारिक है। परमेश्वर हर कदम पर अगुआई करता है और कार्य की हर मद की व्यक्तिगत रूप से अगुआई करता है। इसके अलावा, अपना कार्य करते समय परमेश्वर किसी एवजी का उपयोग नहीं करता; परमेश्वर खुद उसे व्यक्तिगत रूप से करता है। इंसानी शब्दों में, इसे योग्य लोगों के साथ विनम्रता से पेश आना या भेष बदलकर लोगों के बीच जाना कहा जाएगा। परमेश्वर बोलने और कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से लोगों के बीच आता है, लोगों के बीच रहता है और उनके आमने-सामने होता है। लोग अपने कानों से परमेश्वर की आवाज सुन सकते हैं, अपनी आँखों से परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य देख सकते हैं और परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य का स्वयं व्यक्तिगत रूप से अनुभव कर सकते हैं। यद्यपि लोगों को लगता है कि परमेश्वर का रुतबा है और उनके और परमेश्वर के बीच एक दूरी है, लेकिन परमेश्वर के मामले में ऐसी कोई दूरी नहीं है जैसी लोग देखते या महसूस करते हैं। परमेश्वर खुद को परमेश्वर की पहचान रखने वाले के रूप में पेश नहीं करता, जो ऊँचाई से मानवजाति को तुच्छ समझता हो, बल्कि वह मनुष्यों के साथ बराबरी की स्थिति में बोलता और कार्य करता है। क्या इन वर्षों के दौरान सभाओं में तुम लोगों के साथ मेरे बोलने और संगति करने का यही तरीका नहीं रहा है? मैं खुद को कृपालु नहीं मानता और मैंने कभी यह महसूस नहीं किया है कि मेरे पास बड़ी ताकत और ऊँचा रुतबा है; मेरे मन में ऐसी कोई भावना नहीं है और मैंने इस तरह से कार्य भी नहीं किया है। यद्यपि भ्रष्ट मनुष्य भ्रष्टता से भरे हैं, परमेश्वर के प्रति शत्रुता से भरे हैं और परमेश्वर के दुश्मन हैं, फिर भी लोगों को बचाने का कार्य करने में परमेश्वर मनुष्यों के प्रति धैर्य, सहनशीलता, दया और प्रेमपूर्ण दयालुता से भरा है। जब वह मनुष्यों पर कार्य करता है और उनसे बोलता है, तो वह प्रेम से भरा होता है—यहाँ तक कि यह भी कहा जा सकता है कि वह ऐसा बड़ी श्रमसाध्य सच्चाई से करता है। मनुष्यों को जिस किसी चीज की आवश्यकता होती है, परमेश्वर उदारतापूर्वक उन्हें वह प्रदान करता है। वह लोगों से पहेलियों में बात नहीं करता, न ही वह उन्हें असमंजस में रखता है, बल्कि वह वही कहता है जो उसके मन में होता है। तुम लोगों को जो सत्य समझने चाहिए, वह एक भी वाक्य छोड़े बिना उन्हें प्रदान करता है। अगर यह कोई ऐसी चीज है जिसे तुम लोग समझ सकते हो, तो वह ज़रा-सा भी नहीं छिपाता। वह तुम लोगों को ये सत्य प्राप्त करने देता है और ऐसा करता है कि वे तुम लोगों को स्पष्ट हो जाएँ और तुम उन्हें समझ जाओ। विशेष रूप से जब उन मामलों की बात आती है जिन्हें तुम लोग नहीं समझते और उलझन भरे पाते हो, तो वह श्रमसाध्य सच्चाई से बार-बार उन पर और भी अधिक चर्चा करता है और बार-बार उन पर जोर देता है, जब तक कि तुम लोग समझ न जाओ। इस प्रकार, देहधारी परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य और परमेश्वर के आत्मा द्वारा किया गया कार्य हमेशा समान रहा है। यद्यपि वह जिस मानवजाति को बचाता है, वह भ्रष्ट है, फिर भी परमेश्वर ने कभी मानवजाति का तिरस्कार नहीं किया है। यद्यपि मनुष्य और परमेश्वर सार और जीवन में अलग और पूरी तरह से भिन्न हैं, फिर भी मनुष्य के प्रति परमेश्वर के रवैये के संदर्भ में, परमेश्वर ने कभी मनुष्य को अपना दुश्मन, वास्तव में भ्रष्ट मानवजाति या ठुकराए जाने का लक्ष्य नहीं समझा है। इसके विपरीत, परमेश्वर मनुष्य को अपने कार्य और उद्धार का प्राप्तकर्ता समझता है। इसके अलावा, एक अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि, मनुष्य से बात करते समय परमेश्वर के रवैये और मनोदशा और साथ ही मनुष्य से अपनी अपेक्षाओं के संदर्भ में परमेश्वर मनुष्य के साथ परिवार जैसा व्यवहार करता है। इसलिए, मनुष्य खुद परमेश्वर के रुतबे को चाहे जैसे भी देखे, परमेश्वर ने कभी मानवजाति को ऊँचे रुतबे के नजरिये से देखने के लिए श्रेष्ठता की स्थिति नहीं अपनाई है, बल्कि इसके बजाय उसने खुद को मनुष्य के बराबर की स्थिति में रखा है, यहाँ तक कि वह मनुष्य के साथ लंबी, घनिष्ठ बातें भी कर सकता है; उसके और मनुष्य के बीच कोई दूरी नहीं है और रुतबे का कोई भेद नहीं है। मानवजाति के प्रति परमेश्वर के रवैये और परमेश्वर द्वारा किए गए समस्त कार्य को देखते हुए, चूँकि देहधारी परमेश्वर के पास परमेश्वर का सार और परमेश्वर का जीवन है, ठीक इसलिए, यद्यपि वह बाहर से एक साधारण व्यक्ति प्रतीत होता है, फिर भी वह मानवजाति के साथ शासक वर्ग के किसी सदस्य से अलग मानसिकता के साथ व्यवहार कर सकता है। केवल देहधारी परमेश्वर ही ऐसा कर सकता है; कोई मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता, शासक वर्ग का कोई व्यक्ति तो बिल्कुल भी नहीं कर सकता। परमेश्वर ने मनुष्य से चाहे जो भी वचन बोले हों या मनुष्य पर चाहे जो भी कार्य किया हो, मनुष्य से किसी भी लाभ की माँग न करने के अलावा, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि परमेश्वर ने मनुष्य को वे सत्य प्रदान किए हैं जिन्हें उसे समझना चाहिए, अभ्यास के वे मार्ग प्रदान किए हैं जिन पर उसे चलना चाहिए और आगे बढ़ने की वह दिशा प्रदान की है जिसे उसे समझना चाहिए। साथ ही, परमेश्वर ने मनुष्य को उसके दैनिक जीवन की बुनियादी जरूरतों के संदर्भ में आवश्यक चीजें भी प्रदान की हैं। परमेश्वर न केवल मनुष्य के जीवन का स्रोत है, बल्कि उसकी आजीविका का स्रोत भी है। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।) कुछ लोग हमेशा सोचते हैं, “मैंने इन सभी वर्षों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण किया है और अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपनी व्यक्तिगत संभावनाओं, अपनी पढ़ाई और अपनी शादी का त्याग कर दिया है, फिर भी अब तक मुझे कुछ नहीं मिला है।” फिर वे पछताते और शिकायत करते हैं। यह उन कुछ लोगों के बारे में विशेष रूप से सच है जिन्हें बाहर निकाल दिया गया है और जिन्हें गिरफ्तार किया गया है और जेल में डाल दिया गया है—उनका मानना है कि इन सभी वर्षों में परमेश्वर में विश्वास करके उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ है। मुझे बताओ, क्या यह दृष्टिकोण सही है? (नहीं।) यह किस तरह से गलत है? वे नहीं जानते कि परमेश्वर में विश्वास करने से उन्हें वास्तव में क्या प्राप्त होना चाहिए। वे सोचते हैं कि उन्हें ऐसी चीजें प्राप्त होनी चाहिए जिन्हें वे देख और पकड़ सकें, जैसे कि पैसा, प्रसिद्धि और लाभ और रुतबा, और अगर उन्हें ये चीजें प्राप्त नहीं हुई हैं, तो उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ है। वास्तव में, परमेश्वर मनुष्य को बहुत सारे सत्य प्रदान करता है; चूँकि उन लोगों ने सत्य का अनुसरण नहीं किया है या सत्य स्वीकार नहीं किया है, इसलिए उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ है। यदि इन सभी वर्षों में अपना कर्तव्य निभाने के दौरान वे सत्य का अनुसरण करने, सत्य स्वीकार करने और परमेश्वर द्वारा उनके लिए बनाए गए परिवेशों के प्रति समर्पण करने में सक्षम होते, तो निश्चित रूप से वे कुछ सत्य समझ गए होते और उन्होंने परमेश्वर का कुछ ज्ञान प्राप्त कर लिया होता। यद्यपि हो सकता है उन्हें भौतिक चीजें प्राप्त न होतीं, फिर भी उन्हें अधिक मूल्यवान चीजें प्राप्त हुई होतीं, मानव संसार की सबसे कीमती चीजें—वे चीजें जिन्हें किसी भी रकम या भौतिक लाभों से नहीं बदला जा सकता।

लोगों के बीच अपना कार्य करते समय यद्यपि देहधारी परमेश्वर लोगों की आँखों में रुतबा रखता है, फिर भी वह रुतबे के फायदों, लोगों के नजरानों या उस ताकत या किसी भी प्रकार के अनुकूल व्यवहार का आनंद नहीं लेता जो उसका रुतबा उसके लिए लाया होता, जैसा कि मानवजाति के बीच रुतबे वाले लोग करते हैं। वह खुद को ऊँचा और ताकतवर भी नहीं दिखाता, आदेश भी जारी नहीं करता या श्रेष्ठता की स्थिति से इस रुतबे का आनंद भी नहीं लेता, जैसा मानवजाति के बीच रुतबे वाले लोग करते हैं। यह इसके ठीक विपरीत है : वह न केवल श्रेष्ठता की स्थिति नहीं अपनाता, बल्कि वह लोगों के साथ समानता के आधार पर व्यवहार भी करता है और उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए उनके बीच रहता है। जीवन प्रवेश के संदर्भ में लोगों की जरूरतें पूरी करने के अलावा वह उनके दैनिक जीवन की कुछ अतिरिक्त जरूरतें भी पूरी करता है। देहधारी परमेश्वर उचित या आवश्यक होने पर लोगों के दैनिक जीवन और कार्य में शामिल भी होता है, सामान्य और नियमित रूप से जीने में तुम लोगों की मदद करता है और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने में तुम लोगों का निर्देशन और मदद करता है। इसलिए, तुम इसे चाहे जिस भी कोण से देखो, यद्यपि देहधारी परमेश्वर एक विशेष रुतबा रखता है, फिर भी वह रुतबे के साथ जिस तरह से पेश आता है, वह रुतबे वाले किसी भी मनुष्य के समान नहीं होता। यद्यपि उसके पास यह रुतबा है, फिर भी जो कार्य वह करता है उसमें, अपने दैनिक जीवन में और लोगों के साथ व्यवहार करने के अपने सिद्धांतों में वह केवल अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहा होता है। स्वयं देहधारी परमेश्वर के लिए वह अपनी सेवकाई कर रहा है और मानवजाति के लिए वह अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहा है। वह देहधारी परमेश्वर का रुतबा रखने के आधार पर मानवजाति के प्रति देहधारी परमेश्वर की जिम्मेदारी पूरी करता है। एक लिहाज से, मानवजाति के प्रति उसकी जिम्मेदारी वह सत्य प्रदान करना है जिसकी मनुष्यों को अपने जीवन के संदर्भ में सबसे अधिक आवश्यकता है; दूसरे लिहाज से, यह सामान्य मानवता के संदर्भ में उनकी कमियों की भरपाई करना है, लोगों का मार्गदर्शन करना है ताकि वे उन सिद्धांतों के अनुसार जी सकें, जो सामान्य मानवता वाले लोगों में होने चाहिए। यह वह जिम्मेदारी है, जो मुझे पूरी करनी चाहिए। लेकिन जब कुछ लोग मुझे ये बातें कहते हुए सुनते हैं, तब वे अपने दिलों में सोचते हैं, “हम सभी वयस्क हैं और हम अपने दैनिक जीवन में आने वाली इन सभी चीजों को समझते हैं। क्या हमें वाकई तुम्हारे मार्गदर्शन की आवश्यकता है?” यद्यपि तुम सभी लोग वयस्क हो, फिर भी तुम लोग अपने दैनिक जीवन में बहुत अधिक कमियाँ प्रदर्शित करते हो और तुम लोग सामान्य मानवता के मानकों से बहुत पीछे हो। किसी और चीज की चर्चा भी न करते हुए, तुम लोगों के लिए अपने दैनिक जीवन में केवल स्वस्थ और उचित तरीके से खाना ही काफी कठिन है। कभी-कभी, जब मैं संयोग से देखता हूँ कि तुम लोगों को इस संबंध में कोई समस्या है, तो मैं थोड़ा मार्गदर्शन प्रदान करता हूँ और तुम लोगों को विचार करने के लिए कुछ सलाह देता हूँ। इसके अलावा, जब तुम लोगों के मानव-जीवन से जुड़े मामले सँभालने के तरीके की बात आती है, तब यदि मैं देखता या सुनता हूँ कि तुम लोगों को इस संबंध में समस्याएँ हैं—या मैं तुम्हारी उन समस्याओं के संपर्क में आता हूँ—तो मैं तुम लोगों को कुछ सलाह भी दूँगा, चीजों की जाँच-परख करने में तुम लोगों की मदद करूँगा, तुम लोगों के गलत दृष्टिकोण और अभ्यास सुधारूँगा, तुम लोगों को कुछ सिद्धांत दूँगा और तुम लोगों को बताऊँगा कि आचरण कैसे करना है और इन मामलों को कैसे सँभालना है। यद्यपि कुछ ऐसे विशेष मामले हैं जिनका मैंने अनुभव नहीं किया है या जिन्हें मैंने नहीं सँभाला है, फिर भी जब मैं ऐसी चीजों का सामना करता हूँ, तब मैं सिद्धांतों को समझ सकता हूँ। मैं जानता हूँ कि क्या करना है; मैं चीजों की जाँच-परख करने में तुम लोगों की मदद करूँगा और तुम लोगों को कुछ सुझाव और सलाह दूँगा, ताकि तुम लोग भी जीवन में आने वाले विभिन्न मामलों में सामान्य मानवता के सिद्धांतों और मानकों के अनुसार कार्य कर सको। अपने जमीर के खिलाफ मत जाओ और नैतिकता की सीमा पार मत करो। तुम जो करते हो उसमें तुम्हें तर्कसंगत होना चाहिए; अविश्वासियों की तरह अनियंत्रित तरीके से व्यवहार मत करो, बल्कि नियमों का पालन करो, और अपने जमीर के खिलाफ न जाने या नैतिकता की सीमा पार न करने के सबसे बुनियादी सिद्धांत के आधार पर मामले सँभालो। जब मैं इन चीजों को देखता हूँ, तब मैं तुम लोगों को सुझाव भी दूँगा और चीजों की जाँच-परख करने में तुम लोगों की मदद करूँगा, जिससे तुम लोगों के दैनिक जीवन की बुनियादी जरूरतें विनियमित हो सकें। यह तुम लोगों के व्यवहार और तुम्हारी सामान्य मानवता के जमीर और विवेक को विनियमित करने में तुम लोगों के लिए फायदेमंद है। कुछ लोग कह सकते हैं, “तुम बहुत अधिक शिक्षित नहीं हो, तुमने बाहरी दुनिया के कई मामलों में भाग नहीं लिया है और तुम समाज के खेल के नियम नहीं समझते। तुम्हें हमें विनियमित करने का अधिकार किसने दिया?” मैं कहता हूँ कि मैं वास्तव में तुम्हें नियंत्रित करने के योग्य हूँ। यद्यपि मैं बाहर की उन चीजों में भाग नहीं लेता, फिर भी जब व्यक्ति के मार्ग, जिस पर वह चलता है, व्यक्ति के अनुसरण और सत्य सिद्धांतों से जुड़े मामलों की बात आती है, तो मैं इन चीजों में तुम लोगों की मदद कर सकता हूँ। मैं सिद्धांतों को जानता हूँ और मैं जानता हूँ कि व्यक्ति के आचरण की सीमा कहाँ होनी चाहिए। मैं अपने हृदय में स्पष्ट रूप से जानता हूँ कि तुमने यह सीमा पार की है या नहीं या सिद्धांतों का उल्लंघन किया है या नहीं। मैं जानता हूँ, लेकिन तुम नहीं जानते। तुम यह क्यों नहीं जानते? क्योंकि तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों में जीते हो और दुनिया की विभिन्न दुष्ट प्रवृत्तियों से गहराई से प्रभावित हो। इसके अलावा, अधिकांश लोगों के पास सही जमीर और विवेक नहीं होता, इसलिए वे हमेशा फायदा उठाने के शौकीन होते हैं, हमेशा धूर्त बनने और अवसरवादी सुगम उपाय अपनाने और खामियों का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। यहाँ तक कि वे फायदा उठाने के लिए कानून से भी बचकर निकल जाते हैं, हमेशा यह सोचते रहते हैं कि कुछ नीच और घिनौनी चीजें कैसे की जाएँ। जब मैं देखता हूँ कि तुम ऐसी चीजें करना चाहते हो, तब मैं तुम्हें कुछ सुझाव दूँगा, तुम्हारे लिए कुछ जाँच-परख करूँगा और तुम्हें उस तरह से कार्य करने से बचने के लिए प्रेरित करूँगा। यदि मैं तुम्हें प्रेरित नहीं करता या तुम्हारे लिए जाँच-परख नहीं करता, तो तुम्हें हमेशा लगेगा कि तुम जो कर रहे हो वह उचित है। तुम्हारे उचित होने का एहसास कहाँ से आता है? तुम्हारे इस विश्वास से कि “सभी अविश्वासी ऐसा करते हैं, तो हम क्यों नहीं कर सकते? हमें नुकसान क्यों उठाना चाहिए?” इसे नुकसान उठाना नहीं कहा जाता; इसे नियमों का पालन करना कहा जाता है। आचरण करते समय जमीर की सीमा का पालन व्यक्ति को करना ही चाहिए; यह नुकसान उठाना नहीं है। यह मेरा सिद्धांत है। तुम हमेशा नुकसान उठाने से डरते हो, और इतना ही नहीं, बल्कि तुम सक्रिय रूप से फायदा उठाने और खामियों का लाभ उठाने की कोशिश भी करते हो। इसके लिए विनियमन की आवश्यकता है और इसके लिए सुधार की आवश्यकता है। इसलिए, जब मैं किसी को इस तरह से चीजें सँभालने के संकेत दिखाते हुए देखता हूँ, तो मैं तुरंत उन्हें ऐसा न करने के लिए प्रेरित करता हूँ; इस तरह से कार्य करना घृणित है। जब तुम वह छोटा-सा फायदा उठाते हो, तब तुम अपने हृदय में गर्व और संतुष्टि महसूस करते हो, लेकिन ऐसा करने में तुम क्या बेच देते हो? अपना जमीर और सत्यनिष्ठा, जो तुम्हें परमेश्वर से एक “खराब समीक्षा” दिलाता है। क्या तुम जानते हो कि यह एक खराब समीक्षा कितने अच्छे कर्म रद्द कर सकती है? तुम नहीं जानते और तुम इसे महसूस नहीं करते। चूँकि तुम नहीं जानते और तुम्हें इसके बारे में कोई जागरूकता नहीं है, इसलिए मुझे तुम्हें प्रेरित करना होगा। महत्वपूर्ण क्षणों और महत्वपूर्ण मामलों में मुझे आगे आना होगा और तुम्हें बताना होगा कि इस तरह से कार्य मत करो, कि तुम्हें नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए और फायदा बिल्कुल नहीं उठाना चाहिए। इन मामलों में मैं तुम्हें विवश करने के लिए अपने रुतबे का उपयोग नहीं कर रहा हूँ, बल्कि तुम्हारे साथ सिद्धांतों पर संगति कर रहा हूँ, अपना व्यवहार व्यवस्थित करने में तुम्हारी मदद कर रहा हूँ, तुम्हारे जमीर को जागरूक कर रहा हूँ, ऐसा कर रहा हूँ कि तुम्हारे पास जमीर और तर्क-बुद्धि का एक मानक हो, और तुम्हें यह देखने दे रहा हूँ कि जीवन में व्यक्ति का सही लक्ष्य और दिशा क्या होनी चाहिए। फिर, जब तुम दोबारा उस तरह से कार्य करने के बारे में सोचोगे, तब तुम्हारा जमीर इसकी इजाजत नहीं देगा; तुम्हारा चेहरा शर्म से लाल हो जाएगा और वैसा कुछ करने के विचार से ही तुम्हें शर्मिंदगी महसूस होगी। इस तरह, तुम्हें यह बताने का मेरा उद्देश्य पूरा हो जाता है और इसका वाँछित प्रभाव पड़ता है। इसे ही विनियमन कहा जाता है।

मैं आम तौर पर उन छोटे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता जिनमें कलीसिया का कार्य शामिल नहीं होता, लेकिन परमेश्वर के चुने हुए लोगों की शारीरिक और मानसिक भलाई से जुड़े कुछ मामलों में मैं कभी-कभी कुछ शब्द कहता हूँ और कुछ सलाह देता हूँ। तो, मैं इन मामलों में किस पहचान और किस तरह के रुतबे के साथ हस्तक्षेप करता हूँ? क्या माता-पिता के तौर पर? कुल के मुखिया के तौर पर? चरवाहे के तौर पर? अगुआ के तौर पर? या तुम्हारे बॉस के तौर पर? मुझे नहीं लगता कि इनमें से किसी के भी तौर पर। तो फिर, ऐसे मामलों में मैं क्या भूमिका निभाता हूँ? सबसे पहले, रुतबे का कोई भेद नहीं है; मैं जिम्मेदारी की भावना से बोलता और कार्य करता हूँ। तुम्हारे साथ चाहे जो भी हो, अगर मेरा ध्यान उस पर जाता है और मुझे उसकी जानकारी होती है, तो मैं तुम्हें सही मार्ग पर ले जाऊँगा, तुम्हें अपने जमीर और इस सबसे बुनियादी, मूलभूत सीमा के आधार पर कार्य करने में सक्षम बनाऊँगा, जो तुम्हारे व्यवहार को विनियमित करेगी और तुम्हारी मंशाओं को सही करेगी, और तुम्हें जीवन के प्रति एक सही दृष्टिकोण स्थापित करने और इस तरह की चीज को सँभालने और इस तरह के मुद्दे को सही नजरिये और परिप्रेक्ष्य से देखने में सक्षम बनाऊँगा। मैं तुम्हारे लिए चीजों की जाँच-परख करने में मदद करूँगा। हालाँकि जब मैं तुम्हारे लिए चीजों की जाँच-परख करूँगा, तब तुम्हारे आत्म-सम्मान और गर्व को ठेस लग सकती है, लेकिन मैं तुम्हें लाड़-प्यार नहीं करता या तुम्हारी खुशामद नहीं करता; मैं तुम्हारे समान स्तर पर खड़े होकर, तुम्हारे प्रति जिम्मेदारी की भावना से तुम्हारी मदद करता हूँ। तुम लोग इस तरीके के बारे में क्या सोचते हो? (यह अच्छा है।) मैं तुम्हारे आगे बड़े-बड़े विचार नहीं झाड़ता और मैं नारे नहीं लगाता—मैं बस तुम्हें बताता हूँ कि किसी निश्चित काम को कैसे करना है और उसे ठीक से कैसे करना है, और तुम्हें इसके फायदे और नुकसान स्पष्ट रूप से समझाता हूँ। तुम्हारे परिप्रेक्ष्य से, मैं जो शब्द बोलता हूँ वे सरल और साधारण हैं। वे बस सीधी-सादी भाषा हैं, जिनमें कोई गहन ज्ञान, फलसफे या सिद्धांत शामिल नहीं हैं। लेकिन उन्हें सुनने के बाद तुम्हें एक मार्ग मिल जाता है और तुम जान जाते हो कि कैसे कार्य करना है। हालाँकि लोगों की आँखों में देहधारी परमेश्वर का एक अद्वितीय रुतबा है, और हालाँकि यह बहुत ऊँचा रुतबा है, लेकिन वह जो करता है उसका दायरा इस ऊँचे रुतबे से सीमित नहीं होता। इसके विपरीत, वह हर चीज पर ध्यान देता है, चाहे वह कितनी भी बड़ी या छोटी हो। तुम्हारी समस्याएँ या कठिनाइयाँ चाहे किसी भी प्रकार की हों, अगर मेरा ध्यान उन पर जाता है, तो मैं उनके बारे में तुमसे बात करूँगा, और मैं खुद को श्रेष्ठ नहीं मानूँगा; यदि तुम सुनने के इच्छुक हो, तो सुनो, और यदि तुम सुनने के इच्छुक नहीं हो, तो मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूँगा। यदि यह कोई महत्वपूर्ण मामला हो, जिसमें कलीसिया का कार्य और सत्य सिद्धांत शामिल हों, तो मैं तुम्हें बताऊँगा कि कैसे अभ्यास करना है और बाद में मैं उसकी निगरानी करूँगा; यदि यह तुम्हारे निजी जीवन का मामला हो, तो मैं तुमसे खुलकर बात करूँगा, और बड़े-बड़े विचार झाड़े बिना अपने दिली विचार साझा करूँगा—यदि तुम सुनने के इच्छुक हो, तो तुम इसे स्वीकार कर सकते हो, और यदि तुम सुनने के इच्छुक नहीं हो, तो मैं तुम्हें डाँटूँगा नहीं या तुम्हें बाध्य नहीं करूँगा। यदि तुम इसे स्वीकार कर पाते हो, तो मैं समझूँगा कि तुम एक अच्छे इंसान हो जो सही और उचित बातें स्वीकार कर सकता है, और फिर मैं तुमसे और अधिक बात करने का इच्छुक होऊँगा; यदि मैं देखता हूँ कि तुम सही बातें स्वीकार नहीं करते और मेरी बात नहीं सुनोगे, तो मैं भविष्य में तुमसे बात नहीं करूँगा, या मैं तुमसे कम बात करूँगा। लोगों के साथ जुड़ने में मेरे अपने चुनाव और मेरे अपने सिद्धांत होते हैं। क्या तुम लोगों को लगता है कि मैं किसी रुतबे वाले व्यक्ति की तरह बोलता और कार्य करता हूँ? (नहीं।) उदाहरण के लिए, पिछली सभाओं में चाहे तीस से पचास लोग रहे हों या अस्सी से सौ, मैंने कभी माइक्रोफोन का उपयोग नहीं किया; मैं बस सीधे बोला और लोग मुझे सुन सकते थे। आजकल, कुछ जगहों पर, किसी सभा में केवल बीस या तीस लोग होने पर भी कुछ वक्ता माइक्रोफोन का उपयोग करते हैं—क्या यह जरूरी है? क्या तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्द किसी भी तरह से दूसरों के लिए आत्मिक उन्नयन करने वाले होते हैं? और फिर भी तुम बोलने के लिए माइक्रोफोन का उपयोग अवश्य करते हो—क्या यह खुद को महत्वपूर्ण समझना नहीं है? यह सांसारिक अधिकारियों की नकल करना है। देखो, मैं भी अक्सर भाई-बहनों के साथ बातचीत और संगति करता हूँ; कभी-कभी हम बस आँगन में बैठकर बात करते हैं, जहाँ लगभग बीस लोग मौजूद होते हैं। पीछे शोर होता रहता है, फिर भी बिना माइक्रोफोन का इस्तेमाल किए हर कोई मुझे स्पष्ट रूप से सुन लेता है। जिस भी बात पर संगति करने की जरूरत होती है, उस पर स्पष्ट रूप से संगति की जाती है और कोई काम नहीं रुकता। क्या फिर भी माइक्रोफोन का उपयोग करना जरूरी है? इस तरह की औपचारिकताओं में पड़ने का क्या मतलब है? यह एक सांसारिक रिवाज है; हर कोई भव्यता का प्रदर्शन करना और खुद को महत्वपूर्ण समझना पसंद करता है, और ठाट-बाट और तड़क-भड़क दिखाने को लेकर सावधान रहता है। यदि साधारण लोग इस तरह से कर सकते हैं, तो यदि किसी के पास थोड़ा-सा रुतबा हो तो वह तो खुद को पता नहीं क्या समझेगा, है ना? तुम लोगों को ये बातें बताने का मेरा उद्देश्य तुम लोगों को एक तथ्य से अवगत कराना है : हालाँकि लोगों की आँखों में देहधारी परमेश्वर रुतबा रखता है, लेकिन इस रुतबे के संबंध में मेरी भावनाएँ तुम लोगों की भावनाओं से अलग हैं। मुझे बस ऐसा लगता है कि मैं एक साधारण व्यक्ति हूँ और मेरा तुम लोगों के साथ बातचीत करना और सत्य पर संगति करना अपनी जिम्मेदारी पूरी करना है। तो मैं तुम लोगों से क्या अपेक्षा करता हूँ? वह यह है कि तुम लोग सकारात्मक चीजें स्वीकार करने, सत्य स्वीकार करने और सत्य सिद्धांतों के अनुसार काम करने में सक्षम हो जाओ; मैं तुम लोगों से कुछ भी अतिरिक्त करने की अपेक्षा नहीं करता। पहला, मैं तुम लोगों से आराधना में दंडवत होने की अपेक्षा नहीं करता; दूसरा, मैं तुम लोगों से यह अपेक्षा नहीं करता कि जब हम मिलें तो तुम लोग खुशामद करते हुए मेरा अभिवादन करो—सामान्य और स्वाभाविक रूप से व्यवहार करना पर्याप्त है। क्या परिवार के सदस्यों के लिए मिलने पर हमेशा एक-दूसरे का अभिवादन करना जरूरी है? यदि वे अक्सर एक-दूसरे से नहीं मिलते, तो अचानक मिलने पर नमस्ते कहना सामान्य है; यह विनम्र होना है और यह ऐसी चीज है जो सामान्य मानवता की तर्क-बुद्धि में होनी चाहिए—यहाँ तक कि जानवर भी एक-दूसरे का अभिवादन करना जानते हैं, तो इंसानों का तो कहना ही क्या! हालाँकि, सिर्फ इसलिए कि मेरे पास रुतबा है, इसकी कोई जरूरत नहीं है कि जब तुम मुझसे मिलो तो तुम झुककर सलाम करो और विनम्रता से मेरा हाल-चाल पूछो। यह एक अनावश्यक औपचारिकता है और यह ऐसी चीज नहीं है जिसकी मैं तुमसे अपेक्षा करता हूँ। तुम लोगों से मेरी अपेक्षाएँ बहुत ही उचित और सही हैं। यदि तुम लोगों में सामान्य मानवता है और तुम लोग सत्य से प्रेम करते हो और सत्य का अनुसरण करते हो, तो तुम लोग ये सभी अपेक्षाएँ पूरी कर पाओगे, क्योंकि ये अपेक्षाएँ बिल्कुल भी खोखली या ऊँची नहीं हैं; ये सभी ऐसी चीजें हैं जिन्हें सामान्य लोग हासिल कर सकते हैं। यदि तुम लोगों ने सत्य के उन विभिन्न पहलुओं को समझ और जान लिया है जिन पर मैंने इन वर्षों में तुम लोगों के साथ संगति की है और तुम लोगों के पास अनुभवजन्य ज्ञान और जीवन प्रवेश है, तो अपने साथ तमाम तरह की चीजें घटित होने पर तुम लोग सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर पाओगे। लोगों के साथ व्यवहार करने में, अपने काम, अपने कर्तव्यों, मसीह-विरोधियों, नकली अगुआओं, सामंजस्यपूर्ण सहयोग, अपनी पसंद के अनुरूप न होने वाली तमाम तरह की चीजों और ऐसी और भी बहुत-सी चीजों में तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कर पाओगे—यही तुम लोगों से अपेक्षित है। मैं तुम लोगों से जो अपेक्षाएँ करता हूँ, वे सभी ऐसी चीजें हैं जो सामान्य मानवता में तुम लोगों द्वारा हासिल की जा सकने वाली चीजों के दायरे के भीतर हैं। बोलना खत्म करने के बाद, मैं अपेक्षा करता हूँ कि तुम लोग वे परिणाम हासिल करने के लिए इन वचनों के अनुसार अभ्यास करो, जो हासिल किए जाने चाहिए।

कुछ लोगों ने इतने वर्षों तक उपदेश सुने हैं लेकिन कभी कोई भेंट नहीं चढ़ाई है। क्या परमेश्वर का घर इस मामले में दबाव डालता है? नहीं, वह दबाव नहीं डालता । मैं भी कभी इस बारे में पूछताछ नहीं करता कि किसने कभी कोई भेंट नहीं चढ़ाई है या कौन हमेशा परमेश्वर के घर से गुजारे का खर्च माँगता रहता है। मैं इन मामलों के बारे में पूछताछ नहीं करता और मैं इनकी परवाह भी नहीं करता। मैं जिस चीज की परवाह करता हूँ, वह यह है कि तुम अपना कर्तव्य कैसे निभाते हो, क्या तुम कीमत चुका सकते हो और क्या तुम सही सलाह मान सकते हो; जब तुम्हारे साथ चीजें घटित होती हैं तब क्या तुम खुद से विद्रोह कर सकते हो और अपनी महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ छोड़ सकते हो; जब तुम्हारे पास रुतबा होता है तब क्या तुम अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर सकते हो और लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार कर सकते हो; चीजें करते समय क्या तुम सिद्धांतों की तलाश करते हो और क्या तुम्हारे दिल में सिद्धांत होते हैं; जिन मामलों में तुम सिद्धांतों को नहीं समझते, क्या उनमें तुम अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करोगे; अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने के बाद जब कोई इसे इंगित करता है, तो क्या तुम इसे स्वीकार कर सकते हो, पछतावा महसूस कर सकते हो और खुद को बदल सकते हो; क्या तुम उन लोगों से नफरत करोगे, उन्हें दबाओगे या सताओगे जो तुम्हारी आलोचना करते हैं; सामान्य मानव जीवन के दायरे के मामलों में—बोलने और कार्य करने, साथ ही जीवन की बुनियादी जरूरतों के संबंध में—तुम्हारे अपेक्षित मानक क्या हैं, और क्या तुम्हारी कोई सीमा है। मैं ऐसे मामलों की परवाह करता हूँ, जिनमें सत्य, व्यक्ति के आचरण के सिद्धांत, जीवन के प्रति व्यक्ति का दृष्टिकोण और वह मार्ग शामिल है जिस पर व्यक्ति चलता है। इसके अतिरिक्त, मैं भेंटों से जुड़े मामलों के बारे में भी पूछताछ और उनकी जाँच-पड़ताल करता हूँ। यदि कोई अगुआ भेंटों के खर्च से जुड़ा काम करते समय सिद्धांतों का पालन नहीं करता, बल्कि फिजूलखर्ची करता है और भेंटों की बरबादी करने के कृत्य में शामिल होता है, और उजागर किए जाने और काट-छाँट किए जाने के बाद उसे कोई पछतावा नहीं होता, न ही वह अपने पाप स्वीकार करता है और न पश्चात्ताप करता है, और वह न केवल नुकसान की भरपाई करने से इनकार करता है बल्कि बहस करने और खुद को सही ठहराने की कोशिश भी करता है—यहाँ तक कि उनमें से कुछ लोग चीजों में हेराफेरी भी करते हैं और झूठे सबूत गढ़ते हैं, या गंभीर मामलों में सबूत नष्ट भी कर देते हैं, इत्यादि—तो मैं इन मामलों के बारे में पूछताछ करूँगा और इनकी जाँच-पड़ताल करूँगा। क्या इन सभी मामलों में यह शामिल नहीं है कि व्यक्ति कैसे आचरण करता है और परमेश्वर में अपने विश्वास में वह किस मार्ग पर चलता है? (हाँ।) क्या तुम कहोगे कि मेरा इन मामलों की परवाह करना सही है? (हाँ।) कुछ लोग बहुत अच्छे परिवारों से हैं और काफी अमीर हैं; क्या तुम्हें लगता है कि मैं इस बारे में पूछताछ करता हूँ कि उनका परिवार साल में कितना कमाता है, क्या उन्होंने भेंटें चढ़ाई हैं या क्या उन्होंने दशमांश दिया है? मैंने सभाओं में उपदेश देते समय कभी ऐसी बातें नहीं कही हैं। कुछ लोग कहते हैं, “क्या ऐसा है कि तुम सार्वजनिक रूप से तो इस बारे में बात नहीं करते, लेकिन कुछ व्यक्तियों से गुप्त रूप से इसके बारे में पूछताछ करते हो?” तुम उन भाई-बहनों से पूछ सकते हो जो मुझसे मिले-जुले और जुड़ें हैं कि क्या मैंने कभी इन मामलों के बारे में पूछताछ की है—मैंने नहीं की है। मुझे बताओ, क्या ऐसा है कि मैं पूछना नहीं चाहता, या ऐसा है कि मेरी दिलचस्पी नहीं है? (तुम्हारी दिलचस्पी नहीं है।) मेरी दिलचस्पी नहीं है, जिसका अर्थ है कि मेरा मन ये चीजें नहीं रखता—ये चीजें मेरे मन में नहीं हैं। यह मामले का एक पहलू है। दूसरी बात, मैं सचमुच नहीं जानता कि भाई-बहनों के परिवारों की आर्थिक स्थितियाँ और उनका सामाजिक रुतबा क्या है। मैं क्यों नहीं जानता? क्योंकि मैं उनके बारे में उत्सुक नहीं हूँ और मैं उनके बारे में पूछताछ नहीं करता। यहाँ तक कि अगर मैं व्यक्तिगत मामलों के बारे में जानता भी हूँ, तो वह सिर्फ तुम लोगों को यह कहते हुए सुनने से कि उनका परिवार अमीर है; मैं केवल इतनी-सी बुनियादी जानकारी ही जानता हूँ। जहाँ तक इस बात का सवाल है कि वे किस तरह का काम करते हैं या वे साल में कितना कमाते हैं, मैं सचमुच नहीं जानता। मैं कभी तुम लोगों में से किसी के भी परिवार की आर्थिक स्थिति, तुम्हारी आय कितनी है, या तुम अमीर हो या गरीब, इस बारे में पूछताछ या इसकी परवाह नहीं करता—मैं इन चीजों पर ध्यान नहीं देता। कुछ लोग, भाई-बहनों के साथ कुछ बार मिलने-जुलने के बाद, उनके परिवारों की बुनियादी स्थितियों की काफी अच्छी समझ प्राप्त कर लेते हैं—उनके परिवार क्या करते हैं, कौन-से परिवार अमीर हैं, कौन-से गरीब हैं और उनके परिवारों के पास कितनी संपत्ति है। वे बस यही जाँच करने से रह जाते हैं कि उनके पूर्वजों की पिछली तीन पीढ़ियों ने गुजारे के लिए क्या किया था। वे इन मामलों में बहुत दिलचस्पी लेते हैं और वे इनके बारे में बहुत जल्दी पता लगा लेते हैं। क्या तुम लोग कहोगे कि ऐसे लोग अपने उचित कार्यों की उपेक्षा कर रहे हैं? (हाँ।) किसी से सिर्फ एक बार बातचीत करने या मिलने पर ही वे जान जाते हैं कि यह व्यक्ति महीने में कितना कमाता है, आम तौर पर इसके खाने और पहनने का स्तर क्या है और समाज में हैसियत और रुतबे वाले किन लोगों के साथ यह जुड़ता और मिलता-जुलता है—वे इन सभी चीजों को जानने में सक्षम होते हैं। किसी के साथ कई बार मिलने-जुलने के बाद भी मैं ये चीजें नहीं जानता। यदि वे मुझे यह बताने की पहल करते हैं कि दुनिया में वे क्या काम करते हैं और उनका वार्षिक वेतन क्या है, तभी मुझे थोड़ा पता चलेगा, लेकिन बाद में मुझे वह याद नहीं रहता। कुछ लोग कहते हैं, “तुम मनुष्य को बचाने का कार्य करते हो—क्या तुम्हारे लिए बाहरी दुनिया के कई मामलों के बारे में न जानना ठीक है?” मुझे बताओ, क्या उन मामलों के बारे में जानना जरूरी है जो सत्य से संबंधित नहीं हैं? (यह जरूरी नहीं है।) मैं केवल उन्हीं मामलों की जाँच-पड़ताल करता हूँ जो सत्य से संबंधित होते हैं; मैं केवल उन मुद्दों की जाँच-पड़ताल करता हूँ जिनमें तुम्हारा स्वभाव, तुम्हारी मानवता, तुम्हारा आचरण और वह मार्ग शामिल होता है जिस पर तुम चलते हो। मैं इसकी जाँच-पड़ताल नहीं करता कि तुम्हारे पास कितना पैसा है, न ही मैं इसकी जाँच-पड़ताल करता हूँ कि तुम्हारा पैसा कहाँ से आता है। मैं इन चीजों के बारे में पूछताछ करना या जानना नहीं चाहता और यह मेरा शौक नहीं है। जब मैं कहता हूँ कि मैं मनुष्य को बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ, तो मेरा मतलब यह होता है कि मैं मनुष्य के स्वभाव को समझता हूँ, उसकी भ्रष्टता के सार और उसकी वास्तविक स्थिति को समझता हूँ और सभी प्रकार के लोगों की मानवता को समझता हूँ; यह मामले का एक पहलू है। इसका अर्थ यह समझना भी है कि सभी प्रकार के लोगों द्वारा प्रकट किए जाने वाले स्वभावों में किस प्रकार का सार शामिल है, लोगों द्वारा प्रकट की जाने वाली विभिन्न अवस्थाओं में कौन-से मुद्दे शामिल हैं, और उनकी समस्याएँ हल करने और उन्हें उनकी मौजूदा दशा से बाहर निकालने में सक्षम बनाने के लिए कैसे संगति करनी है, कैसे उन्हें पोषण प्रदान करना है और कैसे उनकी मदद करनी है। संक्षेप में, मैं केवल उन्हीं मामलों की जाँच-पड़ताल करता हूँ जो मेरे कार्य से संबंधित होते हैं और सत्य से संबंधित होते हैं।

अपना कार्य करने में मैं तुम लोगों के प्रति जो जिम्मेदारी पूरी करता हूँ, वह तुम लोगों की समस्याएँ हल करना है। छोटे पैमाने पर, इसका अर्थ वे समस्याएँ हल करना है, जिसके साथ तुम्हारी मानवता तुम लोगों के दैनिक जीवन में जीती है; बड़े पैमाने पर, इसका अर्थ तुम लोगों के भ्रष्ट स्वभावों की समस्याएँ हल करना और तुम लोगों को स्पष्ट रूप से उद्धार का मार्ग दिखाना है। इसलिए, देहधारी परमेश्वर लोगों के बीच मानवजाति के नजरानों, खुशामद या अनुसरण का आनंद लेने नहीं आया है, न ही वह मानव संसार के सुखों का आनंद लेने आया है, बल्कि वह अपनी जिम्मेदारी पूरी करने आया है। उसके पास परमेश्वर की पहचान है और उसके पास परमेश्वर का जीवन है; वह लोगों के बीच परमेश्वर का कार्य करने और मनुष्य के प्रति वह जिम्मेदारी पूरी करने आया है जो स्वयं परमेश्वर को पूरी करनी चाहिए। चाहे यह कोई भी चरण हो या लोगों के किसी भी समूह के बीच हो, लोगों के साथ मिलते-जुलते समय परमेश्वर जो कार्य करता है, उसका बुनियादी लक्ष्य सभी प्रकार की समस्याएँ हल करने में उनकी मदद करना है। हालाँकि मैं कभी-कभी दैनिक जीवन के कुछ मामूली मामलों के बारे में बात करता हूँ और तुम लोगों को लग सकता है कि तुम बस कुछ कहानियाँ सुन रहे हो, लेकिन वास्तव में, जिन मामूली मामलों के बारे में मैं तुम लोगों के साथ संगति करता हूँ, उनमें तुम लोगों की समस्याएँ और वे सत्य शामिल होते हैं जो तुम लोगों को समझने चाहिए, जो ऐसी चीजें हैं जिन्हें तुम लोगों को हल करना चाहिए और जिनमें तुम लोगों को प्रवेश करना चाहिए। सुनने के बाद, जो लोग सत्य सिद्धांतों की तलाश करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं और सत्य का अभ्यास करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वे अनजाने ही कुछ सत्य समझ जाएँगे और अपना आचरण करने और कार्य करने के कुछ सिद्धांत समझ जाएँगे। लेकिन जिन लोगों में आध्यात्मिक समझ नहीं है, वे सुनने के बाद भी नहीं समझेंगे, यहाँ तक कि उन्हें लगेगा कि संगति में बस मामूली घरेलू मामले शामिल हैं। वास्तव में, तुम्हें ज्यादातर समय इन मामूली मामलों से सबक सीखने में भी सक्षम होना चाहिए। इसका कारण यह है कि हम चीजों के चाहे किसी भी पहलू पर संगति कर रहे हों—चाहे वह दैनिक जीवन से जुड़ी कोई चीज हो, व्यक्ति के कर्तव्य से जुड़ी कोई चीज हो या जीवन प्रवेश से जुड़ी कोई चीज हो—जिन सिद्धांतों और समझ के बारे में हम संगति करते हैं, उनका उद्देश्य कोई पहेली सुलझाना या किसी रहस्य पर से परदा हटाना नहीं है—बल्कि, हमारी संगति एक तथ्य समझाने, व्यक्ति के विचारों और दृष्टिकोणों की समस्याएँ हल करने और यह समस्या हल करने के लिए रोजमर्रा की भाषा का उपयोग करती है कि व्यक्ति सभी प्रकार की चीजों को कैसे देखता है और सभी प्रकार के लोगों के साथ कैसे व्यवहार करता है। उदाहरण के लिए, कपड़ों की शैली और रंग चुनने को ही ले लो। चाहे दैनिक पहनावे के लिए हो या कार्यक्रम बनाने के लिए, कपड़ों की शैली और रंग चुनने के मेरे सिद्धांत और मकसद तुम लोगों से अलग हैं। तुम लोगों के सिद्धांत और मकसद क्या हैं? वे हैं खुद को सुंदर या आकर्षक दिखाने के लिए कपड़े पहनना—जब तक तुम आकर्षक दिखते और ध्यान आकर्षित करते हो, तब तक तुम लोग संतुष्ट रहते हो। मेरे मूल इरादे और मकसद क्या हैं? वे हैं तुम लोगों को सादा, शालीन और मनुष्य जैसा और गरिमा से युक्त दिखाना, ताकि लोग तुम्हारा कुछ सम्मान करें और तुम्हारा अपमान करने, तुम्हारे साथ खिलवाड़ करने या तुम्हारे बारे में कोई कुटिल विचार या अनुचित विचार रखने की हिम्मत न करें। ऐसा करके मैं तुम्हें दिखावा करने के अवसर से वंचित नहीं कर रहा हूँ, बल्कि मैं तुम्हारी रक्षा कर रहा हूँ, तुम्हें मनुष्य की छवि से युक्त बना रहा हूँ और तुम्हें ऐसा बना रहा हूँ कि तुम्हारी उपस्थिति ईमानदार दिखे, ताकि बुरे इरादों वाले लोगों को तुम्हारा शोषण करने का कोई अवसर न मिले और वे दुष्ट लोग तुम्हारा फायदा उठाने या तुम्हें खिलौना समझने की हिम्मत न करें। उन्हें तुम्हारा सम्मान करना होगा। इस तरह, क्या तुम्हारी सत्यनिष्ठा की रक्षा नहीं होती? (हाँ।) कपड़ों की शैली और रंग चुनने जैसे सरल मामले में, तुम लोगों को लग सकता है कि मैं परमेश्वर के घर के हितों और प्रतिष्ठा की रक्षा करने के लिए ऐसा करता हूँ, लेकिन वास्तव में, यह वाकई मुख्य उद्देश्य नहीं है; प्राथमिक उद्देश्य तुम लोगों की रक्षा करना है। बस इस छोटे-से मामले में, मेरे दृष्टिकोण तुम लोगों से पूरी तरह से अलग हैं। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि तुम लोग अपने व्यक्तिगत जीवन में कैसे कपड़े पहनते हो और कैसे खुद को सँवारते हो, मैं तुम लोगों को आजादी देता हूँ और तुम लोगों को अपने अभिमान को संतुष्ट करने के लिए स्वतंत्र रूप से चुनने देता हूँ। ये मामले सत्य पर संगति किए जाने और उनके सत्य को समझ लेने के बाद लोगों में सामान्य मानवता होने पर निर्भर करते हैं, ताकि वे आत्म-संयम हासिल कर सकें और सादे, शालीन बन सकें और मनुष्य की छवि प्राप्त कर सकें। लेकिन जब तुम लोग सार्वजनिक स्थानों पर जाते हो, तब मुझे तुम लोगों के लिए चीजों की जाँच-परख करनी पड़ती है। यह विशुद्ध रूप से तुम लोगों की रक्षा करने के लिए है, तुम लोगों को नियंत्रित या बाध्य करने के लिए नहीं। तुम लोग चाहे जो भी सोचो, काम करने के मेरे सिद्धांत बस ऐसे ही हैं, और इस मामले में, मेरा ही निर्णय अंतिम है। अगर कुछ व्यक्ति थोड़े असंतुष्ट भी हों, अंदर से थोड़े चिढ़े हुए भी महसूस करें या इस मामले के बारे में उन्हें आपत्तियाँ भी हों, तो भी कोई बात नहीं; तुम भविष्य में समझ जाओगे। इसके अलावा, कपड़ों के रंग, बनावट और शैली के संबंध में मेरी पसंद रूढ़िवादी या पुरानी परंपराओं से बँधी हुई नहीं है; मैं पुराने विचार और धारणाएँ नहीं रखता। यदि तुम उम्र में बड़े हो, तो मैं तुम्हें इस तरह तैयार करता हूँ कि तुम अधिक जीवंत दिखो, तुम्हारे लिए कुछ चमकीले रंग के कपड़े चुनता हूँ ताकि तुम जवान दिखो लेकिन नखरेबाज नहीं। यह तुम्हारे लिए अच्छी बात है; जब लोग देखते हैं कि हालाँकि तुम उम्र में बड़े हो, फिर भी तुममें कुछ जोश दिखाई देता है और तुम काफी व्यवस्थित और आकर्षक दिखते हो, तो वे तुम्हारा सम्मान करेंगे और तुम्हें कुछ आदर देंगे, इस प्रकार यह सुनिश्चित होगा कि तुम्हारी गरिमा पूरी तरह से सुरक्षित है। यह ऐसी चीज है जिसके बारे में तुम लोग नहीं सोचोगे। संभव है कुछ व्यक्तियों ने इसके बारे में सोचा हो, लेकिन कौन इस सिद्धांत पर कायम रह सकता है और कौन इस सिद्धांत में महारत हासिल कर सकता है? तुम लोग सचमुच इसमें महारत हासिल नहीं कर सकते, है ना? (हाँ।) तुममें से कुछ लोग कहते हैं, “मैं बूढ़ा हूँ और बूढ़े लोगों को बूढ़े लोगों जैसा दिखना चाहिए। मुझे युवाओं के लिए एक मिसाल कायम करनी है और उनसे कुछ सम्मान पाना है।” तुम अपने सफेद होते बाल रँगते नहीं, चेहरे का रंग फीका होने के बावजूद थोड़ा-सा हलका मेकअप नहीं करते, अपने टूटे हुए सामने के दाँत नहीं बदलते, जिससे बोलते समय तुम्हारे दाँतों के बीच से हवा सीटी बजाती हुई निकलती है, और तुम चमकीले कपड़े नहीं पहनते, बल्कि केवल स्लेटी और काले रंग के कपड़े पहनते हो। परिणामस्वरूप, लोगों को तुम्हारे चेहरे पर बिल्कुल भी कोई रंगत नजर नहीं आती; तुम बस बीमार दिखते हो। मुझे बताओ, जब युवा लोग तुम्हें देखते हैं तो कैसा महसूस करते हैं? जब वे तुम्हें संबोधित करते हैं, तो उन्हें “बूढ़ा” शब्द जोड़ना पड़ता है और वे तुम्हें “बूढ़ी बहन” या “बूढ़े भाई” कहकर बुलाते हैं। क्या इससे तुम्हें सहज महसूस होता है? तुम इसे स्वीकार करने में हिचकिचाते हो और अपने मन में सोचते हो, “हालाँकि मैं उम्र में तुम लोगों से थोड़ा बड़ा हूँ, लेकिन क्या मैं सचमुच इतना बूढ़ा हूँ?” तुम्हें खुद को इतना बूढ़ा दिखाने के लिए किसने कहा? क्या ऐसे रंगों वाले कपड़े चुनना ठीक नहीं होगा जो तुम्हारा रंग-रूप निखारें? थोड़ा सज-सँवर लो, ताकि लोग देख सकें कि तुममें जोश है, और देख सकें कि हालाँकि तुम उम्र में बड़े हो, लेकिन तुम्हारी मानसिकता पुरानी नहीं है—क्या इससे तुम्हें सम्मान नहीं मिलेगा? एक बहन थी जिसकी उम्र चालीस के आसपास थी, और जब मैंने उसे एक कार्यक्रम के लिए गुलाबी पोशाक पहनने के लिए कहा, तो उसने कहा, “मेरी उम्र में गुलाबी रंग पहनना क्या खुद को अपनी उम्र से छोटा दिखाने की कोशिश करना नहीं होगा?” उसका दृष्टिकोण मेरे दृष्टिकोण से अलग था। मैंने कहा, “यह खुद को अपनी उम्र से छोटा दिखाना नहीं है; यह कैमरे पर होने की माँग है। मैं तुम्हें सुझाव देता हूँ और तुम्हें सँवरने में मदद करता हूँ ताकि तुम्हारे गालों पर कुछ रंगत दिखाई दे और तुम आकर्षक और व्यवस्थित दिखो। यदि तुम्हें लगता है कि यह खुद को अपनी उम्र से छोटा दिखाने की कोशिश करना है और तुम इसे इसी तरह देखती हो, तो इसे मत पहनो। यदि तुम कोई फूहड़ पोशाक पहनोगी, तो तुरंत दस साल बड़ी दिखोगी।” यदि तुम उससे कहो कि वह दस साल बड़ी दिखती है, तो वह इससे नाखुश होती है, लेकिन वह यह भी स्वीकार नहीं कर सकती कि तुम उसे थोड़ा छोटा दिखाने की कोशिश करो। क्या इस व्यक्ति से निपटना काफी मुश्किल नहीं है? (हाँ।) बस इन सरल मामलों में, यदि लोगों के पास सही विचार और दृष्टिकोण हों, तो वे उन्हें उपयुक्त रूप से, उचित रूप से और सिद्धांतों के अनुसार सँभालेंगे। लेकिन इन मामलों के संबंध में अधिकांश लोगों के विचार और दृष्टिकोण बहुत विरूपित, रूढ़िवादी या अतिवादी होते हैं, और कुछ लोग तो दिखावा भी करते हैं। अगर इन मामलों पर मेरे विचार और दृष्टिकोण सत्य न कहे जा सकें, तो भी कम से कम वे उपयुक्त, उचित और सामान्य मानवता के दायरे में हैं। इसलिए, कभी-कभी, इन छोटे मामलों पर भी, मैं तुम लोगों को किसी न किसी हद तक कुछ सुझाव और संकेत देता हूँ। यदि तुम चौकस रहते हो और सही विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकार कर सकते हो, तो तुम अनजाने ही इन चीजों को समझ जाओगे। यदि तुम चौकस नहीं रहते या हमेशा अपनी ही राय और विचार रखते हो या यदि तुम अभी भी अपने अंदर कई पुराने, परंपरागत, मूर्खतापूर्ण और अड़ियल विचार और दृष्टिकोण रखते हो, तो तुम मेरी बातें नहीं समझ पाओगे या उनका सही मतलब नहीं निकाल पाओगे। लेकिन चाहे जो भी हो, और चाहे जिस भी पहलू में हो, अगर यह उन मामलों में है जिनका सामना मेरे द्वारा किए जाने वाले कार्य के दायरे में किया जा सकता है, तो मैं तुम लोगों को लाभ पहुँचाने, तुम लोगों को सही दिशा की ओर ले जाने, तुम्हारे भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों को सही करने में तुम लोगों की मदद करने और सभी प्रकार के सही विचार और दृष्टिकोण स्थापित करने की पूरी कोशिश करता हूँ। यह मेरी जिम्मेदारी है। बस जिम्मेदारी पूरी करने के इसी बिंदु पर देहधारी परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य की प्रकृति मानवजाति के बीच रुतबे वाले किसी व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले कार्य की प्रकृति से पूरी तरह अलग होती है, है ना? (हाँ।)

मेरे विचार से, रुतबे को लेकर मनुष्य जो काम करते हैं, उसमें मूल रूप से दो चीजें शामिल होती हैं : एक है अपने रुतबे की रक्षा करना, और दूसरी है व्यक्तिगत फायदों की माँग करना। ये रुतबे को लेकर मनुष्यों की जरूरतें और माँगें हैं। रुतबे वाला कोई भी व्यक्ति चाहे जो भी काम करे, वह सत्य प्रदान करना या जीवन प्रदान करना नहीं होता, लोगों के लिए जीवन की दिशा और मार्ग दिखाना तो वह बिल्कुल भी नहीं होता। इसके बजाय, वह भौतिक या अभौतिक कार्यों में शामिल होता है, लोगों का प्रबंधन या उन्हें नियंत्रित करता है और किसी पेशेवर क्षेत्र या ज्ञान के किसी पहलू, चीजों के उत्पादन या विभिन्न अन्य क्षेत्रों के मामले में लोगों से अपनी अगुआई स्वीकार करवाता है। बाद में, वह अपनी ताकत का इस्तेमाल अपना अधिकार स्थापित करने और अपना रुतबा मजबूत करने के लिए करता है, जिसके माध्यम से वह व्यक्तिगत फायदे तलाशता है। ये फायदे दो प्रकारों में विभाजित हैं : आर्थिक फायदे और प्रतिष्ठा से जुड़े फायदे। इसलिए, लोगों के बीच रुतबा रखने वाले किसी भी व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले कार्य की प्रकृति देहधारी परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य की प्रकृति से पूरी तरह अलग होती है। वह न तो लोगों को पोषण प्रदान करता है और न ही उनकी मदद करता है, लोगों से माँगें न करना तो दूर की बात है। रुतबा हासिल करने और रुतबे की स्थिति से काम करने के बाद उन्हें जो रुतबा और वित्तीय फायदे मिलते हैं, उन्हें देखते हुए, लोगों के बीच रुतबा रखने वाला कोई भी व्यक्ति अंततः और अनिवार्य रूप से निहित स्वार्थों वाला व्यक्ति बन जाएगा। ऐसा इसलिए है कि उनके पास जो रुतबा होता है, वह व्यक्तिगत रूप से उन्हें फायदा पहुँचाता है और वे जो कुछ भी करते हैं, वह रुतबे और फायदों के लिए होता है; वह लोगों को पोषण प्रदान करने या उनकी मदद करने के लिए नहीं होता। इस संबंध में, यह उससे पूरी तरह अलग होता है जो देहधारी परमेश्वर करता है। इसके अलावा, रुतबे वाला कोई भी व्यक्ति लोगों से चाहे जो भी कहे या उनके साथ जो भी करे, उसका अंतिम लक्ष्य उनसे भावनात्मक निष्ठा, वित्तीय योगदानों और रुतबे के योगदानों की माँग करना होता है। यानी, अगर वह अच्छा बोलता और अच्छा करता है और लोगों का दिल जीत लेता है, जिससे लोग उसका बहुत आदर करते हैं और उसे स्वीकृति देते हैं, तो लोगों के दिलों में उस व्यक्ति के बारे में अच्छी राय बन जाएगी—उस व्यक्ति की अधिक प्रतिष्ठा होगी, उसका अधिक प्रभाव होगा और उसकी अधिक ख्याति होगी, और अधिक लोग उसके इर्द-गिर्द इकट्ठे होंगे और उसके कायल हो जाएँगे। यह वह भावनात्मक निष्ठा है, जिसकी वे लोगों से माँग करते हैं। यानी, लोग अपने दिलों में उन्हें अधिक पूजेंगे और उनकी अधिक प्रशंसा करेंगे, और उनकी अगुआई के तौर-तरीकों, उनकी बोलचाल और व्यवहार, और उनके आचरण और कार्य करने के ढंग और सलीके से अधिक आकर्षित होंगे और कायल हो जाएँगे। इस तरह, उनका रुतबा अधिक ऊँचा और अधिक सुरक्षित हो जाता है, और यह लोगों के बीच उनके रुतबे को पूरी तरह से मजबूत कर देता है। एक बार जब लोगों के दिलों में उनका रुतबा सुरक्षित हो जाता है, तो उसी समय, उन्हें मिलने वाले वित्तीय और भौतिक फायदे और भी अधिक प्रचुर हो जाते हैं। असल में वे लोगों के दिलों में अपना रुतबा सुरक्षित करने के लिए काम करते हैं, ताकि वे अधिक भौतिक और वित्तीय फायदे प्राप्त कर सकें। यह देहधारी परमेश्वर के लोगों के बीच मौजूद रुतबे और उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य से पूरी तरह अलग है। लोगों को यह स्पष्ट रूप से अवश्य देखना चाहिए। क्या यहाँ कोई अंतर है? (हाँ।) देखो, एक बार जब किसी के पास रुतबा आ जाता है और उसके प्रशंसक हो जाते हैं, तो वह अपने रुतबे की खातिर कई चीजें करता है। वह अपनी छवि चमकाता है, लच्छेदार बातें करना सीखता है और अपना निजी जीवन पूरी तरह से छिपाता है, जिसमें उसका जीवनसाथी का चुनाव, उसकी वैवाहिक स्थिति, यहाँ तक कि उसका व्यक्तिगत आवास और अन्य विवरण शामिल है। वह इन सभी चीजों को छिपाता है और दूसरों को इनके बारे में नहीं जानने देता। वह यह सब लोगों के बीच अपना रुतबा और छवि बनाए रखने के लिए करता है। उसके कई निजी मामले होते हैं जिन्हें गुप्त रखा जाता है, खुले तौर पर उजागर नहीं किया जाता और किसी और को उनके बारे में पता नहीं होता। सार्वजनिक रूप से, वह बहुत कुलीन, शानदार, सम्माननीय और सुंदर दिखने के लिए सजता-सँवरता है और उसकी बोलचाल बहुत सौम्य और विचारशील होती है; वह वही कहता है जिसे लोग सुनना चाहते हैं और वही दिखाता है जिसे लोग देखना चाहते हैं। वह अपनी व्यक्तिगत छवि गढ़ने के लिए बहुत तैयारी करता है और हर तरह की चीजें करता है। जब उसके द्वारा किया गया कोई घोटाला या कोई बुरा काम खुल जाता है और उसके प्रशंसकों को पता चल जाता है, तो वह खुद को सही ठहराने और अच्छा होने का दिखावा करने की पूरी कोशिश करेगा और मामले पर पर्दा डालने के लिए हर संभव तरीका अपनाएगा। ऐसे कुछ लोग तो खुद को पूरी तरह से बदल भी लेते हैं और लोगों के दिलों में अपनी छवि बनाए रखने के लिए हर संभव तरीका अपनाते हैं। यह सब करने में उनका उद्देश्य लोगों के बीच अपना रुतबा बनाए रखना होता है; एक बार जब लोगों के बीच उनका रुतबा बना रहता है, तब वे जिन भौतिक चीजों, पैसे और सुख-सुविधाओं का अनुसरण करते हैं, वे सब भी सुरक्षित रहते हैं। इसलिए, वे चाहे जो भी करें—और चाहे वह सार्वजनिक रूप से हो या निजी तौर पर—यह सब बेहद कपटपूर्ण होता है। तुम कभी नहीं जान पाओगे कि वे अपने दिल में क्या सोच रहे हैं, उनकी मानवता और चरित्र कैसे हैं या विभिन्न चीजों के बारे में उनके दृष्टिकोण और चुनाव सच में क्या हैं। तुम कभी नहीं सुनोगे कि वे सच में क्या सोचते हैं। अगर वे अपने प्रशंसकों और दर्शकों के लिए कई बदलाव और त्याग करते हैं तो भी, यह उनके सच्चे इरादों के खिलाफ किया जाता है। वे इस तरह अपने सच्चे इरादों के खिलाफ काम क्यों करते हैं? ऐसा वे अपना रुतबा बनाए रखने के लिए करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे जानते हैं कि यदि वे सार्वजनिक रूप से लोगों के देखने के लिए अपना असली चेहरा उजागर करेंगे तो वे कई प्रशंसक खो देंगे और उनके द्वारा तिरस्कृत और शापित भी होंगे। जब वे अपने प्रशंसक खो देंगे, तब उनके रुतबे में विनाशकारी गिरावट आएगी और इसके तुरंत बाद वह पैसा, वे फायदे, सुख-सुविधाएँ और भौतिक चीजें जिनके पीछे वे भागते हैं, यहाँ तक कि उनके रुतबे द्वारा उन्हें दी जाने वाली तमाम अनुकूल परिस्थितियाँ और उदार व्यवहार भी खत्म हो जाएँगे। इसलिए, वे सब अपनी छवि की रक्षा करने और अपना रुतबा बनाए रखने के लिए अपनी पूरी कोशिश करते हैं। वे अपना रुतबा और छवि बनाए रखने के लिए कोई भी कीमत चुकाएँगे और कोई भी तरीका अपनाएँगे—कुछ लोग अपना लिंग बदल लेते हैं, कुछ प्लास्टिक सर्जरी करवा लेते हैं, कुछ अपनी शादियाँ छिपाते हैं और कुछ तो गुप्त रूप से हत्या तक कर देते हैं; वे कुछ भी करेंगे। और फिर भी, लोगों के बीच, वे दूसरों के साथ जो करते हैं—और दूसरे उनसे जो प्राप्त कर सकते हैं—वह वस्तुतः किसी भी सकारात्मक मार्गदर्शन या सकारात्मक पोषण से रहित होता है। लोगों के बीच वे जो भूमिका निभाते हैं, वह केवल लोगों के अहंकार को संतुष्ट करना और उनकी महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ पूरी करना, लोगों को अपने नाम और अपनी शक्ति के अधीन इकट्ठा करना और फिर बेरहमी से लोगों को गुमराह करना और उन्हें भावनात्मक, मानसिक और वित्तीय रूप से वंचित करना है। इसलिए मैं कहता हूँ कि रुतबे वाला कोई भी व्यक्ति बुनियादी रूप से निहित स्वार्थों वाला व्यक्ति होता है। यह इसे अच्छे शब्दों में कहना है; मैं इससे अधिक कठोर कुछ नहीं कहना चाहता। तुम लोग खुद ही समझ सकते हो। तो, रुतबे वाले किसी भी व्यक्ति के साथ, ऐसा हो सकता है कि जब तुम उसे देखते हो, तब तुम्हें लगता है कि उसकी बातचीत की शैली असाधारण है और वह शालीन, सुरुचिपूर्ण और करिश्माई है, और हो सकता है तुम उसे बहुत अधिक पूजने लगो। विशेष रूप से, विपरीत लिंग के कुछ लोग तो खुद को उसे समर्पित करना भी चाह सकते हैं। ये सभी गुमराह होने और बुद्धि भ्रष्ट किए जाने के संकेत हैं। चलो, पर्दे के पीछे के उसके जीवन, उसकी सच्ची मानवता और सकारात्मक चीजों के प्रति उसके रवैये के बारे में बात नहीं करते—इन चीजों के बारे में पता लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तुम सच में खुद को उसे समर्पित करना चाहते, तो एक बार जब तुम उसके साथ रहना शुरू करते तो तुम भौचक्के रह जाते। तब तक तुम जान जाते कि वह उतना उच्च और असाधारण नहीं है जितना तुम अपने दिल में मानते थे; तुम अब उसे न पूजते और उसे एक साधारण व्यक्ति समझते। तुम लोगों के वर्तमान आध्यात्मिक कद के साथ, क्या उस हद तक जाने की आवश्यकता है? (नहीं।)

जब समाज में रुतबा रखने वाले लोग सार्वजनिक रूप से, ऑटोग्राफ सत्रों, प्रेस कॉन्फ्रेंस या लाइव प्रदर्शनों में दिखाई देते हैं, तब लोग उनकी जयजयकार करते हैं और उनसे बड़ी उम्मीदें रखते हैं। कुछ लोग तो उनसे एक बार हाथ मिलाते हैं और जीवन भर अपने हाथ नहीं धोना चाहते, और कुछ लोग उन्हें एक बार गले लगाते हैं और जीवन भर कभी शादी न करने का फैसला कर लेते हैं। क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि ऐसे लोग बहुत मूर्ख हैं? (हाँ।) तुम उनकी खातिर कभी शादी न करने का फैसला करते हो, लेकिन अगर किसी दिन तुम सड़क पर उनसे टकरा जाओ और नमस्ते कहो, तो क्या वे तुम पर कोई ध्यान देंगे? (नहीं।) वे रुतबे वाले लोग हैं, सम्माननीय लोग हैं, उच्च वर्ग के व्यक्ति हैं; उनकी नजरों में तुम कुछ नहीं हो। क्या तुम्हें सच में लगता है कि जब वे तुम्हें अपना ऑटोग्राफ देते हैं, तुमसे हाथ मिलाते हैं और तुम्हें गले लगाते हैं, तो वे तुम्हें पसंद करते हैं? तुम गलत हो; तुम बहुत भोले हो! जब उन्हें तुम्हारी जरूरत होती है, तब तुम उनके लिए खजाना हो; जब उन्हें तुम्हारी जरूरत नहीं होती, तब तुम बस खरपतवार हो—या, कहा जा सकता है कि तुम कुछ नहीं हो। समाज में रुतबे वाला कोई भी व्यक्ति—यहाँ तक कि सबसे निचले स्तर का अधिकारी भी—एक आम नागरिक के रूप में तुम्हारी पहुँच से बाहर है। यह कोई मायने नहीं रखता कि तुम वयस्क हो या तुम सक्षम हो—उनकी नज़रों में तुम बस एक नाचीज हो; वे तुम्हें बिल्कुल भी गंभीरता से नहीं लेते। यह समाज में रुतबे वाले लोगों का असली चेहरा है। इसलिए, उनके प्रकृति सार को देखते हुए, मानव संसार में ताकत और रुतबे वाले लोगों के वर्ग से संबंधित सभी लोग बुनियादी रूप से निहित स्वार्थों वाले लोग हैं। वे तुमसे कोई बड़ी उम्मीदें नहीं रखते और कोई जिम्मेदारी बिल्कुल नहीं उठाते, मुफ्त में कुछ देना या योगदान करना तो दूर की बात है—यह कहने की आवश्यकता नहीं कि वे तुम्हें कुछ प्रदान नहीं करते। वे बस तुमसे चीजों की माँग करना चाहते हैं—भावनात्मक स्तर पर तुमसे अपनी पूजा, प्रशंसा और अनुसरण करवाना और फिर तुमसे वित्तीय और भौतिक फायदे प्राप्त करना चाहते हैं। एक बार जब वे फायदे प्राप्त कर लेते हैं और उनका रुतबा सुरक्षित हो जाता है, तब यदि तुम उनके संगी-साथी बनना चाहते हो, उनके दोस्त बनना चाहते हो और उनके बराबर का दर्जा पाना चाहते हो, तो क्या वे सहमत होंगे? (नहीं।) यदि तुम उन्हें सहमत होने के लिए मजबूर करने की कोशिश करते हो, तो तुम्हें क्या लगता है कि वे क्या करेंगे? (वे खुलेआम तुम्हारे खिलाफ हो जाएँगे।) यह देखकर कि तुम उनके लिए अब किसी काम के नहीं हो, वे लात मारकर तुम्हें हटा देंगे, तुमसे “दफा हो जाओ” कहेंगे, यहाँ तक कि यह कहते हुए तुम्हारा अपमान भी करेंगे कि तुम एक गंदे भिखारी हो। तुम भौचक्के रह जाओगे, है ना? (हाँ।) चूँकि मनुष्य रुतबे को इस तरह से देखते हैं और चूँकि रुतबा उनके लिए विभिन्न अनुकूल परिस्थितियाँ या प्रचुर फायदे लाता है, ठीक इसलिए वे रुतबे को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं और उसे बहुत सँजोते हैं। लेकिन मानवजाति के बीच रुतबा रखने वाला कोई भी व्यक्ति जो करता है, वह मानवजाति के प्रति जिम्मेदारी निभाना नहीं होता, वह पोषण का कोई रूप नहीं होता और वह निःशुल्क नहीं होता; बल्कि, उसके पीछे उद्देश्य और माँगें होती हैं। उनके द्वरा रुतबे की अपनी स्थिति से कहे जाने वाले हर शब्द का एक उद्देश्य होता है और वे जो कुछ भी करते हैं, वह भी एक निश्चित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए होता है; बेशक, यह तुमसे अधिक बड़े फायदे प्राप्त करने के लिए—यहाँ तक कि तुम्हें कंगाल करने के लिए होता है। वे तुम्हारे साथ जो करते हैं, वह बुनियादी रूप से तुम्हें गुमराह करना, सुन्न करना और तुम्हारा शोषण करना है। इसे सबसे सरल और सीधे तरीके से कहें तो, यह तुम्हारी जेबें खाली करवाना है। तुम्हारी जेबें खाली करवाना, किसलिए? उनके टिकट खरीदने के लिए, उनके उत्पाद खरीदने के लिए, उनका सामान खरीदने के लिए और उन्हें वे चीजें देने के लिए, जिनकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है। तो, एक बार जब किसी व्यक्ति के पास रुतबा आ जाता है, तब फायदे स्वाभाविक रूप से उसके पीछे आते हैं। जब लोगों के पास रुतबा होता है और वे रुतबे का स्थान लेते हैं, तब उनके लिए दूसरों को गुमराह करना आसान होता है और उनके लिए काम करने हेतु अपने रुतबे का अपने फायदे के लिए उपयोग करना भी आसान होता है। मानवजाति के एक सदस्य के रूप में, चूँकि तुम रुतबे को पूजते हो, इसलिए तुम्हारे लिए रुतबे वाले लोगों या रुतबे का स्थान लेने वाले लोगों द्वारा गुमराह किया जाना, नियंत्रित किया जाना और उकसाया जाना—कई तरह की अलग-अलग चीजें करने के लिए उकसाया जाना बहुत आसान होता है। विशेष रूप से समाज में बहुत मशहूर वे सितारे और हस्तियाँ—जब वे मंच से चिल्लाते हैं, “तुम सब लोग कैसे हो? बहुत दिनों बाद मिले!” तब दर्शकों में मौजूद उनके प्रशंसक ग्लो स्टिक्स लहराते हैं, और वे चिल्लाते और चीखते हैं और पागल हो जाते हैं। वे कितने पागल हो जाते हैं? कुछ लोगों के चेहरों पर उसी समय आँसू बहने लगते हैं, और कुछ लोग मौके पर ही बेहोश हो जाते हैं और उन्हें तुरंत आपातकालीन कक्ष ले जाया जाता है। बस उन कुछ शब्दों से, बस वे कुछ गाने सुनने और वह एक कार्यक्रम देखने से वे इस तरह अपना आपा खो देते हैं और ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे उनका दिमाग खराब हो गया हो। क्या तुम कहोगे कि ये लोग मूर्ख हैं? (हाँ।) तो क्या वे बाद में भी इन कार्यक्रमों में जाते रहेंगे? (हाँ, जाते रहेंगे।) क्या यह गुमराह होना नहीं है? इस तरह के कार्यक्रम के टिकट शायद काफी महँगे होते हैं। तुम वह सारा पैसा देते हो और वे बस कुछ गाने गाते हैं और मंच पर थोड़ा उछल-कूद करते हैं। क्या वह सारा पैसा खर्च करना उचित है? क्या तुम्हारे साथ धोखाधड़ी नहीं हो रही है? कुछ लोग तो अपने माता-पिता पर अपने पसंदीदा सेलिब्रिटी के कॉन्सर्ट के टिकट खरीदने या उनका सामान खरीदने के लिए पैसे देने का दबाव भी डालते हैं। यदि उनका परिवार गरीब होता है और इसका खर्च नहीं उठा सकता, तो वे अपने माता-पिता को बेकार और अक्षम कहते हैं। उनके माता-पिता इसके बारे में कुछ नहीं कर सकते; इस समाज में बस यही चलन है। अपने बच्चों द्वारा इस तरह फटकारे जाने के बाद, कुछ माता-पिता तो काफी हीन भी महसूस करते हैं और दूसरों के सामने यह स्वीकार करने की हिम्मत नहीं करते कि वे फलाँ-फलाँ के माता-पिता हैं। क्या यह सामाजिक चलनों के कारण नहीं है? (हाँ।) तो यह चलन कैसे बना? यह रुतबे, प्रसिद्धि और लाभ पर मानवजाति के विचारों और दृष्टिकोणों के तेजी से दुष्ट होने और अंततः आज तक इस दुष्ट चलन के साथ विकसित होने के परिणामस्वरूप बना, जिसने लोगों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी नुकसान पहुँचाया है। रुतबे वाले लोग दूसरों के साथ क्या करते हैं? वे कौन-से शब्द हैं जो वे अपने ऊँचे पदों से लोगों पर चिल्लाते हैं? वे लोगों को क्या प्रदान करते हैं? वे भ्रामक और दुष्ट विचार और दृष्टिकोण प्रदान करते हैं; वे बुरे चलन प्रदान करते हैं; वे जो कुछ भी प्रदान करते हैं, वे सब नकारात्मक चीजें होती हैं। अंत में, तुम अभी भी स्वेच्छा से उनके टिकटों और उत्पादों पर अपना पैसा खर्च करने के लिए हाथापाई करते हो, और यदि तुम उन्हें नहीं खरीद सकते, तो तुम छिपकर रोते भी हो और हीन महसूस करते हो। क्या यह स्वेच्छा से अपना मूल्य घटाना नहीं है? (हाँ।) दुनिया वास्तव में ऐसी ही है; मानवजाति वास्तव में ऐसी ही है। मानवजाति के बीच दुष्ट चलन हमेशा हावी रहते हैं और ये दुष्ट चलन लगातार विकसित और प्रस्फुटित भी हो रहे हैं। वे चाहे कैसे भी प्रस्फुटित हों, रुतबे, ताकत और प्रतिष्ठा वाले लोगों का एक समूह हमेशा बुरे चलनों के अग्रिम मोर्चे पर सवार रहता है। इस अग्रिम मोर्चे के शीर्ष पर रहने वालों का अंततः क्या होगा? मैं नहीं बताऊँगा; तुम लोग खुद इस पर विचार कर सकते हो।

इन वचनों पर संगति करने का उद्देश्य, एक लिहाज से, तुम्हें यह जानने देना है कि रुतबा क्या होता है, और दूसरे लिहाज से, तुम्हें देहधारी परमेश्वर के रुतबे और मनुष्यों के रुतबे के बीच का अंतर जानने और समझने देना है। इनकी प्रकृति और सार पूरी तरह से अलग है। देहधारी परमेश्वर का रुतबा उसके सार और जीवन द्वारा निर्धारित होता है; यह कोई पद नहीं है, यह उसे मानवजाति द्वारा नहीं दिया गया है और यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे उसने मनुष्यों द्वारा इसलिए ऊँचा उठाए जाने से प्राप्त किया हो कि उसने समाज में ज्ञान और सिद्धांत हासिल कर लिए थे और पर्याप्त जीवन अनुभव प्राप्त कर लिया था। देहधारी परमेश्वर का रुतबा उसकी पहचान द्वारा निर्धारित होता है और उसकी पहचान उसके जीवन और उसके सार द्वारा निर्धारित होती है। ऐसी पहचान और सार होने के बावजूद वह मानवजाति के बीच प्रमुख रुतबा रखने वालों की तरह दूसरों से श्रेष्ठ और महान होने का दिखावा नहीं करता, लोगों पर अत्याचार नहीं करता, लोगों को फँसाता नहीं, मानवजाति से माँगें नहीं करता या लोगों पर धौंस नहीं जमाता। बेशक, देहधारी परमेश्वर कोई निहित स्वार्थों वाला व्यक्ति नहीं है। उसने कभी अपना अनुसरण करने वालों से कोई फायदे नहीं माँगे, जिनमें वित्तीय और भौतिक फायदे भी शामिल हैं। स्वाभाविक रूप से, उसने अपने अनुयायियों से किसी पारिश्रमिक की माँग भी नहीं की है। बल्कि, वह लगातार अपनी जिम्मेदारी निभाता है और अपनी पहचान के साथ और अपनी स्थिति से अपना कार्य करता है और अपना अनुसरण करने वालों द्वारा अपेक्षित सभी सत्य प्रदान करता है। बेशक, जिस अवधि में देहधारी परमेश्वर अपना कार्य करता है और अपनी जिम्मेदारी निभाता है, उसके दौरान वह मानवजाति के बीच तथाकथित रुतबे वाले लोगों की तरह ऊँची स्थिति से लोगों को नहीं पुकारता, न ही वह लोगों का दिल जीतने और उनसे अपनी प्रशंसा करवाने आदि के लिए एक खास माहौल बनाने, भव्य प्रदर्शन करने या चीजों का दिखावा करने के लिए किसी ऊँची स्थिति में खड़ा होता है। परमेश्वर, देहधारी परमेश्वर के रूप में अपनी पहचान में, इनमें से कोई चीज नहीं करता। उसकी पहचान और रुतबा उसके सार द्वारा निर्धारित होते हैं; वे मनुष्यों की प्रशंसा के परिणामस्वरूप नहीं आए, न ही वे मानवजाति द्वारा किए गए किसी मतदान का परिणाम हैं। तो वे कैसे आए? यह केवल इसलिए है क्योंकि परमेश्वर सत्य व्यक्त करता है और इन रहस्यों पर से परदा हटाता है कि मनुष्य यह जान पाता है कि यह देह स्वयं परमेश्वर है, जिसके पास परमेश्वर की पहचान और रुतबा है। कुछ लोग कहते हैं, “परमेश्वर अपनी गवाही क्यों देता है?” वह इसलिए, क्योंकि मानवजाति परमेश्वर को नहीं जानती और केवल परमेश्वर का विरोध और निंदा करने में सक्षम है, इसलिए केवल परमेश्वर द्वारा सत्य व्यक्त करने के माध्यम से ही उसकी पहचान और रुतबे की गवाही दी जा सकती है—अगर किसी व्यक्ति को पवित्र आत्मा से थोड़ी प्रबुद्धता प्राप्त हो तो भी, जरूरी नहीं कि वह स्पष्ट रूप से इसकी गवाही दे सके—वांछित परिणाम प्राप्त करने के लिए परमेश्वर को अपने बारे में गवाही देनी ही होगी। क्या परमेश्वर की गवाही देने के लिए मानवजाति पर निर्भर रहने से अपेक्षित परिणाम प्राप्त किया जा सकता है? (नहीं।) क्यों नहीं? (मनुष्य परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानता।) यह सही है; ऐसा इसलिए है, क्योंकि मानवजाति परमेश्वर को नहीं जानती—कोई नहीं जानता। इसलिए, परमेश्वर देहधारी हुआ, मनुष्य का पुत्र बना और प्रकट होकर कार्य करने लगा, मानवजाति को पुकारने लगा ताकि हर कोई परमेश्वर के कथन और वचन सुने। फिर पवित्र आत्मा ने कार्य करना शुरू किया, लोगों को एक साथ इकट्ठा किया, और फिर परमेश्वर ने लोगों से बोलना और उनके बीच कार्य करना शुरू किया। शुरुआत में, कुछ व्यक्ति इसे स्वीकार नहीं कर सके; उनके मन में देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाएँ थीं और वे उसे नहीं जानते या समझते थे। लेकिन, पवित्र आत्मा महान कार्य करता है और स्वयं परमेश्वर अपने कार्य को कायम रखता है। बोलने और कार्य करने के इन वर्षों में, क्या लोग कुछ हद तक परमेश्वर की पहचान और रुतबे को मानने नहीं लगे हैं? (हाँ।)

बहुत सारे लोगों ने कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है, जबकि उन्हें उसका कोई ज्ञान नहीं है—और हालाँकि विशेष रूप से उसकी पहचान और रुतबे के संबंध में उनके मन में कई धारणाएँ और कल्पनाएँ या इंसानी इच्छा की मिलावटें हैं—फिर भी इन तमाम वर्षों में परमेश्वर के बोलने और कार्य करने, लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने और उनके लिए खुद को खपाने से एक परिणाम पहले ही देखा जा सकता है। क्या तुम लोग जानते हो कि वह परिणाम क्या है? (मुझे लगता है कि वह परिणाम यह है कि लोग परमेश्वर के वचनों द्वारा जीत लिए गए हैं और उन्हें परमेश्वर का सार स्वीकार करना पड़ा है।) यह सही है कि लोग जीत लिए गए हैं। हालाँकि परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने से पहले लोगों को अभी भी लंबा सफर तय करना है, लेकिन वे उसके द्वारा जीत पहले ही लिए गए हैं। तो इस बात का क्या प्रमाण है कि लोग जीत लिए गए हैं? बिल्कुल शुरुआत में, जब परमेश्वर ने गवाही दी कि यह व्यक्ति देहधारी परमेश्वर है, तब कई लोगों के मन में धारणाएँ थीं, वे प्रतिरोध महसूस करते थे और इस तथ्य को मानने या स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। लेकिन अब तुम लोग—जिनमें तुममें से वे लोग भी शामिल हैं जो शुरुआत में बिल्कुल भी यह स्वीकार नहीं करना चाहते थे कि यह व्यक्ति परमेश्वर है, देहधारी परमेश्वर है—धैर्य और प्रत्याशा से भरे हुए, बैठ पाते हो और चुपचाप और गंभीरता से मेरी संगति सुन पाते हो। यह अकेला ही यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि लोग परमेश्वर द्वारा जीत लिए गए हैं, है ना? (हाँ।) दस साल से अधिक समय पहले, तुम लोगों के साथ मेरी सभाओं और संगतियों में, मेरे लगभग चालीस मिनट तक बोलने के बाद, ऐसे कई लोग होते थे जो अब और शांत नहीं बैठ सकते थे। कुछ लोग शौचालय जाते, कुछ पानी पीते, कुछ एक-दूसरे से फुसफुसाते और कुछ जम्हाई और अँगड़ाई लेते। व्यावहारिक रूप से साठ प्रतिशत से अधिक लोग परेशान हो जाते थे। मैं जो कह रहा होता था, वे उसे समझ नहीं पाते थे, बूझ नहीं पाते थे और आत्मसात नहीं कर पाते थे। मुझे बताओ, क्या तुम लोगों के साथ संगति करना मेरे लिए थका देने वाला नहीं होता था? मैंने देखा कि तुम लोगों का आध्यात्मिक कद बहुत छोटा था और तुम लोग उपदेश सुनने के लिए शांत नहीं बैठ सकते थे—क्या तुम लोग किंडरगार्टन के उन बच्चों की तरह नहीं थे जो लोगों द्वारा उनसे कही गई बातें समझ नहीं पाते? इसलिए मुझे धैर्य रखना पड़ा और धैर्यपूर्वक संगति करनी पड़ी और तुम लोगों का मार्गदर्शन करना पड़ा। बाद में, जैसे-जैसे लोगों ने अधिक सुना और कुछ चीजें समझीं और वे सत्य में रुचि लेने लगे, धीरे-धीरे, एक-दूसरे से फुसफुसाने वाले लोग कम होते गए और जम्हाई लेने वाले और अँगड़ाई लेने वाले लोग कम होते गए। सभाओं के दौरान, अधिकांश लोग अब पूरे ध्यान से उपदेश सुन सकते थे; वे शांत बैठ सकते थे और उन्हें आत्मसात कर सकते थे और जीवन के मार्ग की बुनियादी बातें समझ सकते थे। एक अच्छा संकेत और भी है : जब मैं सत्य सिद्धांतों के किसी पहलू के बारे में बात करता हूँ, तो कई लोग जल्दी से नोट्स लेते हैं। जरूरी और अहम बातें सुनकर वे उन्हें जल्दी से लिख लेते हैं, ताकि वे बाद में उन पर विचार कर सकें। यह अद्भुत है! इन लोगों में सच में बोध-क्षमता है; इन्होंने सत्य के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया है और ये वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित करना जानते हैं। चाहे मेरी सामान्य संगति में हो या लोगों के साथ बातचीत करते समय, अगर विषयवस्तु में सत्य सिद्धांत शामिल होते हैं, तो लोग गंभीरता से सुनते हैं और नोट्स लेते हैं; यह एक अच्छा संकेत है। जैसा कि तुम देख सकते हो, इस पूरी यात्रा के दौरान, कदम-दर-कदम, लोगों की अवस्थाएँ ज्यादा से ज्यादा बेहतर होती जा रही हैं। इसके अलावा, जैसा कि परमेश्वर के घर द्वारा बनाई गई अनुभवजन्य गवाही वीडियो और फिल्मों से दिखाई देता है, कई लोगों को पहली बार अपने कर्तव्य निभाना शुरू करने से लेकर अब तक कुछ वास्तविक अनुभव प्राप्त हुए हैं। तो लोगों का सबसे बड़ा लाभ क्या रहा है? वह यह है कि वे उन विभिन्न सत्यों के आधार पर सभी प्रकार की चीजों को देख और अनुभव कर सकते हैं, जिन पर मैंने पिछले वर्षों में संगति की है। उन सभी ने कुछ सत्य समझ लिए हैं और वे कुछ समस्याएँ हल करने में सक्षम हैं; उन्होंने परमेश्वर के इरादों की कुछ समझ और ज्ञान प्राप्त कर लिया है, वे परमेश्वर के प्रति समर्पण करने लगे हैं और उनके जीवन स्वभावों में बदलाव आए हैं। क्या ये वे चीजें नहीं हैं जो उन्होंने प्राप्त की हैं? (हाँ।) अतीत में, जब तुम लोगों ने पहली बार उपदेश सुनना शुरू किया था, तब तुम लोग शांत नहीं बैठ सकते थे। कुछ लोगों ने कहा कि यह तुम लोगों के युवा होने के कारण हो सकता है। वास्तव में, ऐसा नहीं है; चालीस-पचास साल के लोग भी शांत नहीं बैठ सकते थे, क्योंकि वे समझ नहीं पाते थे और यह उनकी समझ से बाहर था। उन्हें लगता था कि उन्होंने जो भी शब्द सुना वह सही है, लेकिन जैसे ही वे कुछ ऐसा सुनते जो उनकी धारणाओं के अनुरूप न होता, तो वे उसे अंदर से स्वीकार न कर पाते और फिर वे सुस्त होकर बैठने लगते, हिलने-डुलने लगते या एक-दूसरे से फुसफुसाने लगते, उनमें ज़रा-सी भी सामान्य मानवता न होती। इसलिए मुझे धैर्य के साथ बोलना पड़ा। मैंने इतने वर्षों तक बात की, सभी प्रकार के मुद्दों के बारे में थोड़ा-थोड़ा करके बोला, जिससे हर कोई बुनियादी बातें समझ सके। हालाँकि कई लोगों के पास अब जीवन प्रवेश के संबंध में बहुत अनुभव नहीं है और ज्यादातर समय उनके पास कोई जीवन प्रवेश नहीं होता, फिर भी कम से कम, वे कैसा महसूस करते हैं? वे सत्य में रुचि लेने लगे हैं और उनमें उसके प्रति जागरूकता है और उन्होंने अपने दिलों में सत्य के लिए कुछ लगाव विकसित कर लिया है। उनके मन में सत्य और सकारात्मक चीजों की कुछ संकल्पना है, आचरण कैसे करें इसकी कुछ संकल्पना है, सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने की कुछ संकल्पना है और उद्धार प्राप्त करने की कुछ संकल्पना है। इसलिए, उपदेश सुनते समय वे शांत बैठ सकते हैं और उसे आत्मसात कर सकते हैं। इन चीजों की संकल्पना होने का अर्थ है कि वे इन वचनों और इन सत्यों द्वारा जीत लिए गए हैं। उन्होंने स्वीकार किया है कि ये वचन सत्य हैं, स्वीकार किया है कि सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बीच अंतर है और स्वीकार किया है कि परमेश्वर जो कुछ भी कहता और करता है वह सत्य है और यह सब मनुष्य को बचाने के लिए है। देखो, लोगों के शांत न बैठ पाने से लेकर शांत बैठ पाने और यह स्वीकार करने तक कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं और परमेश्वर जो करता है वह सब उद्धार है—इतनी बड़ी छलाँग लगाने में कितने वर्ष लग गए? मुझे कितने वचन बोलने पड़े और मुझे कितना कार्य करना पड़ा? मनुष्य पर मेरे द्वारा किए गए कार्य—उसका भ्रष्ट सार उजागर करने, उसके विचार और दृष्टिकोण बदलने, उसके भ्रष्ट स्वभाव हल करने, सत्य समझने और परमेश्वर के प्रति समर्पण प्राप्त करने में उसकी मदद करने, उसे उद्धार प्राप्त करने के सही मार्ग पर लाने—के संदर्भ में ये परिणाम प्राप्त करने के लिए मुझे कितने वचन बोलने पड़े? मुझे बताओ, क्या कोई मनुष्य यह कार्य कर सकता था? रुतबे वाले लोगों में से कौन यह कार्य कर सकता था? (कोई नहीं कर सकता था।) एक बात तो यह है कि, मनुष्य इसे नहीं कर सकता। दूसरी बात, अगर कोई व्यक्ति बोल और कार्य कर भी रहा होता और उसके द्वारा बोले गए सभी वचन सही भी होते और दूसरे लोग उनमें रुचि भी लेते, तो भी यदि पवित्र आत्मा कार्य न करता, तो क्या इतने सारे लोगों का इस व्यक्ति के वचन सुनना और उनका प्रचार करना वे परिणाम प्राप्त कर सकता था, जो अब हमारे पास हैं? (नहीं कर सकता था; यह लोगों के दिलों को नहीं छू सकता था।) परमेश्वर के वचन और परमेश्वर का आत्मा मिलकर यह कार्य कर रहे हैं। देहधारी परमेश्वर, परमेश्वर के आत्मा के साथ समन्वय बिठाकर बोलता और कार्य करता है, जबकि परमेश्वर का आत्मा लोगों को उनके दैनिक जीवन में मार्गदर्शन देने और प्रबुद्ध करने के लिए देहधारी परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचनों के साथ एक ही समय पर समन्वय करता है। इन दोनों पहलुओं के संयोजन ने वे परिणाम प्राप्त किए हैं जो अब हमारे पास हैं और साथ ही वे परिणाम भी जो भविष्य में प्राप्त किए जाएँगे। मुझे बताओ, क्या इस साधारण व्यक्ति—देहधारी परमेश्वर—का रुतबा केवल रुतबा है? ऐसा नहीं है। उसका यह रुतबा किसी प्रकार का पद नहीं है। यह किसी की बुलंद छवि या शक्ति का प्रतीक नहीं है, जैसा कि मनुष्य इसे कह सकते हैं। तो फिर, यह क्या है? (यह परमेश्वर के सार का प्रतीक है।) उसका रुतबा इस बात का प्रतीक है कि उसके पास सत्य, मार्ग और जीवन है। मुझे बताओ, जब रुतबे वाला कोई भ्रष्ट मनुष्य कार्य करता है, तो क्या उसे स्वर्ग स्थित परमेश्वर का सहयोग प्राप्त होता है? (नहीं।) इसलिए, देहधारी परमेश्वर का रुतबा सरल अर्थ में रुतबा नहीं है, बल्कि परमेश्वर की पहचान, सार और जीवन का प्रतीक है। मेरे यह कहने का क्या अर्थ है? वह यह है कि तुम्हें देहधारी परमेश्वर के साथ वैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए, जैसा तुम दुनिया में रुतबे वाले किसी व्यक्ति के साथ करोगे। जब तुम दुनिया में रुतबे वाले लोगों के साथ व्यवहार करते हो, तब तुम उनके साथ जुड़ने के लिए सांसारिक आचरण के फलसफों का उपयोग करते हो। तुम्हें उनके सामने झुकना-गिड़गिड़ाना पड़ता है, उनकी बातों का छिपा हुआ अर्थ समझना पड़ता है और उनके हाव-भाव पर नजर रखनी पड़ती है और उन्हें खुश करने के लिए अच्छी-अच्छी बातें कहनी पड़ती हैं; तुम ईमानदारी से बात नहीं कर सकते, तुम कोई ताकत नहीं दिखा सकते, तुम उनसे बाजी नहीं मार सकते, आदि; अन्यथा वे तुम्हें दबाएँगे या तुम्हें परेशान करेंगे। लेकिन जब तुम देहधारी परमेश्वर के साथ जुड़ते और मिलते-जुलते हो, तब तुम्हें सत्य सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। यदि तुम उससे सत्य सिद्धांतों के अनुसार जुड़ते और मिलते-जुलते हो और उसके साथ सही व्यवहार कर सकते हो, तो भले ही तुम उसके रुतबे को गंभीरता से न लो, उसके प्रति बहुत सम्मान न रखो, उस पर श्रद्धा न रखो या उसकी प्रशंसा न करो, और तुम उसकी चापलूसी और खुशामद न करो, फिर भी वह तुम्हारे साथ सही व्यवहार करेगा, है ना? (हाँ।) तुम लोग “हाँ” कहते हो, लेकिन क्या तुम लोग सच में देहधारी परमेश्वर के साथ सत्य सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार कर सकते हो? (मुझे लगता है कि मैं अभी तक ऐसा नहीं कर पाता; मैं केवल इसके लिए प्रयास कर सकता हूँ।) तुम लोगों को इसके लिए प्रयास करने हेतु कड़ी मेहनत करनी होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम लोगों को सत्य का अनुसरण करना होगा और सभी चीजों में सत्य सिद्धांत खोजने होंगे; तब तुम लोग धीरे-धीरे ऐसा कर पाओगे। यदि तुम सत्य पर ध्यान केंद्रित करो, तो तुम महसूस करोगे कि हालाँकि देहधारी परमेश्वर के पास यह विशेष रुतबा है, फिर भी वह भ्रष्ट मानवजाति के बीच रुतबा रखने वाले लोगों से पूरी तरह अलग है। जब तुम यह महसूस करते हो और तुम स्वीकार करते हो कि वह दिव्य सार और परमेश्वर की पहचान वाला व्यक्ति है, तब तुम उसके साथ सत्य सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करोगे। तुम्हारे दिल में उसके लिए प्रेम और सम्मान होगा और तुम उसके साथ खुलेपन और ईमानदारी से पेश आओगे। साथ ही, तुम एक सृजित प्राणी की स्थिति से आज्ञाकारी और समर्पणशील भी होगे; तुम ऐसा ही बनना चाहोगे और तुममें ऐसी अभिव्यक्तियाँ होंगी। यदि तुम यह महसूस नहीं करते, तो तुम हमेशा विचार करोगे, “देखो, समाज में रुतबे वाले लोगों का कैसा अंदाज होता है; वे जहाँ भी जाते हैं, लोगों की भीड़ उन्हें घेर लेती है। वे शिक्षित होते हैं और परिष्कृत तरीके से बोलते हैं। उनका रूप-रंग, उनके कपड़े पहनने का अंदाज और उनकी सज-धज उनके उच्च वर्ग के होने का एहसास कराते हैं और उनके हाव-भाव और उनके चलने का तरीका शालीन होता है। एक नजर में ही तुम बता सकते हो कि वे साधारण लोग नहीं हैं। और उनका तामझाम देखो : जीवन और कार्य में उनकी मदद करने के लिए उनके पास निजी सहायक होते हैं, उनके खान-पान की जरूरतों के लिए निजी रसोइयों की टीमें होती हैं, उनके लिए लेख लिखने के लिए निजी सचिवों की टीमें होती हैं और प्रमुख मामलों पर चर्चा करने के लिए सलाहकारों और चिंतन-विशेषज्ञों की टीमें होती हैं। जब वे बाहर जाते हैं तो उनके पास निजी ड्राइवर होते हैं और जब उन्हें उड़ान भरनी होती है तो निजी पायलट होते हैं, और वे जहाँ भी जाते हैं, स्टार-रेटेड होटलों में ठहरते हैं। ये सभी प्रथम श्रेणी की व्यवस्थाएँ हैं। जब परमेश्वर के पास रुतबा है, तो उसे ऐसा व्यवहार क्यों नहीं मिलता? यदि उसे ऐसा व्यवहार मिलता, तो क्या हम अनुयायियों को भी प्रतिष्ठा न मिलती? वह जिस भी देश में जाए, वहाँ उसके लिए रेड कार्पेट बिछाया जाए, और वह जिस भी जगह का दौरा करे, वहाँ कई लोग उसका स्वागत करने के लिए कतार में खड़े हों—यह कितनी प्रतिष्ठा की बात होगी!” जब तुम परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर लोगे, तब तुम्हारे मन में ये माँगें या ये विचार नहीं होंगे।

हालाँकि देहधारी परमेश्वर भ्रष्ट मानवजाति के बीच रहता है, फिर भी वह भ्रष्ट मानवजाति का हिस्सा नहीं है, इसलिए उसे तथाकथित प्रतिष्ठा और रुतबे जैसी चीजों को लेकर वे जरूरतें नहीं होतीं, जो भ्रष्ट मनुष्यों को होती हैं। उसे वे जरूरतें क्यों नहीं होतीं, जो भ्रष्ट मनुष्यों को होती हैं? क्योंकि रुतबे और व्यक्ति के तथाकथित “मूल्य” को लेकर उसके दृष्टिकोण भ्रष्ट मनुष्यों जैसे नहीं हैं। उसे भ्रष्ट मनुष्यों की तरह संसाधित या भ्रष्ट नहीं किया गया है और पदानुक्रम के बारे में और रुतबे का आनंद लेने के बारे में उसके विचार और दृष्टिकोण भ्रष्ट मनुष्यों जैसे नहीं हैं। इसलिए, जहाँ तक व्यक्तिगत रूप से मेरा संबंध है, तो रुतबे और व्यक्ति के मूल्य के मामले में मेरे दिल में ये चीजें नहीं होतीं। मेरे दिल में बस लोगों के साथ एक परिवार की तरह रहने, जीवन और कार्य के मामलों के बारे में बात करने और लोगों की विभिन्न कठिनाइयों के बारे में बात करने का ही चाव है। मुझे कोई भव्य प्रदर्शन करने पसंद नहीं हैं और तथाकथित नफासत तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है। मैंने तुम लोगों को कई बार बताया है और यह ऐसी चीज है जो तुम लोगों को याद होगी : मेरे जीवन में कोई निजी सेविकाएँ, निजी सहायक या निजी सचिव नहीं हैं। मेरे पास इनमें से कोई नहीं है। समाज में उन उच्च-पदस्थ लोगों को देखो; उनके पास ऐसे लोग होते हैं जो सिर्फ उनके कपड़े धोते हैं, ऐसे लोग होते हैं जो सिर्फ उनके लिए खाना पकाते और पेस्ट्री बनाते हैं और उनके निजी ड्राइवर होते हैं। उन्हें अपने जीवन में किसी भी चीज की परवाह करने की जरूरत नहीं होती; उनके लिए विशेष रूप से चीजों का प्रबंधन करने वाले लोग होते हैं। व्यक्ति जितने ऊँचे पद पर होता है, उसका तामझाम उतना ही बड़ा होता है। यहाँ तक कि एक साधारण मेयर या प्रांतीय गवर्नर का भी अपना आधिकारिक मेयर-निवास या गवर्नर-निवास होता है, उनसे ऊँचे पदों पर बैठे लोगों का तो कहना ही क्या। क्या देहधारी परमेश्वर का कोई आधिकारिक निवास है? (नहीं।) तो क्या मैंने कलीसिया से मुझे कोई आधिकारिक निवास प्रदान करने के लिए कहा है? (नहीं।) मैंने कलीसिया से मुझे कोई आधिकारिक निवास प्रदान करने के लिए नहीं कहा है, न ही मैंने अपने लिए किन्हीं परिचारकगण या अंगरक्षक दिए जाने की माँग की है, कोई अन्य माँगें करने की तो बात ही छोड़ दो। बस एक ही बात है कि प्रूफरीडिंग टीम के लोग मेरे उपदेशों और संगति की भाषा परिष्कृत करते हैं, उन्हें पाठ के रूप में संकलित करते हैं और उन्हें वितरित करते हैं। उन्हें कार्य में विशेषज्ञ कर्मचारी माना जा सकता है, लेकिन वे अपना कर्तव्य निभा रहे हैं; वे व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए काम नहीं कर रहे हैं। यह कलीसिया का काम है। तो, क्या मैंने कभी तुम लोगों को अपने व्यक्तिगत मामलों से परेशान किया है? (नहीं।) मेरे कपड़े धोना, मेरा खाना बनाना, मेरे कमरे की सफाई करना, निजी यात्रा—क्या मैंने कभी तुम लोगों को इन चीजों से परेशान किया है? क्या मैंने कभी कलीसिया से मुझे निजी सेविकाएँ या निजी सहायक प्रदान करने के लिए कहा है? मैंने कभी ऐसी माँगें नहीं की हैं। मुझे बताओ, क्या ऐसी चीजें न होना मुझे परेशान करता है? क्या यह मुझे दुखी करता है? क्या मुझे तुम लोगों को धिक्कारना चाहिए और तुम लोगों से कहना चाहिए कि तुम लोगों में जमीर नहीं है? मैंने ऐसे मामलों को लेकर तुम लोगों को कभी नहीं धिक्कारा है, तुम लोगों से कोई माँग करने की तो बात ही छोड़ दो। मैं अपने भोजन, कपड़े, आवास और परिवहन का इंतजाम खुद करता हूँ। आम तौर पर मैं अनौपचारिक कपड़े पहनता हूँ और सभाओं के दौरान मैं औपचारिक सूट पहनता हूँ; यह जितना हो सके उतना सरल है। मैं शायद ही कभी अपने कपड़े ड्राई-क्लीन के लिए देता हूँ; वे बुनियादी रूप से हाथ या मशीन से ही धोए जाते हैं। जब मैं कोई कुत्ता पालता हूँ, तो वह कोई महँगी नस्ल का नहीं होता। दुनिया में मशहूर हस्तियाँ और रुतबे वाले लोग जो खाते, पहनते और इस्तेमाल करते हैं, अधिकांश लोग उसी का अनुसरण और नकल करते हैं। क्या तुम मुझे उनके जैसा ही पाते हो? जब कुछ लोग किसी मशहूर हस्ती के कुत्ते की नस्ल देखते हैं, तब वे भी वैसा ही कुत्ता पाना चाहते हैं। सभी अविश्वासी यही दृष्टिकोण रखते हैं; यहाँ तक कि कुत्ता पालने में भी वे चलनों का अनुसरण करते हैं और कोई महँगी नस्ल ही पाना चाहते हैं, उसी तरह का कुत्ता जैसा मशहूर हस्तियों के पास होता है। मैं जो कुत्ता पालता हूँ, वह बस एक साधारण कुत्ता होता है। अगर कुत्ते का व्यक्तित्व अच्छा है, वह स्नेही और वफादार है, आज्ञाकारी है, चीजें समझता है, लोगों के साथ घुल-मिल जाता है और आरामतलब नहीं है, तो यह ठीक है। कुछ लोग कहते हैं, “क्या तुम्हारे लिए कोई महँगी नस्ल का कुत्ता पालना बहुत आसान नहीं होगा?” यह बहुत आसान होगा, लेकिन मुझे वह पसंद नहीं आएगा। मैं कभी इस बारे में पूछताछ नहीं करता कि मशहूर लोग क्या पहनते या इस्तेमाल करते हैं, न ही मैं इसे खोजने का प्रयास करता हूँ। मैं उन कुछ लोगों की तरह नहीं हूँ जो एक बार रुतबा मिलने के बाद सोचते हैं, “अब मैं भी एक मशहूर हस्ती हूँ। मशहूर हस्तियाँ जो भी खाती, पहनती, इस्तेमाल करती हैं और बाहर जाते समय जिन कारों की सवारी करती हैं, मुझे उनकी नकल करनी है। मैं पीछे नहीं रह सकता।” मैंने कभी इन चीजों के लिए प्रयास नहीं किया है। मुझे नहीं पता कि मैं कोई मशहूर हस्ती हूँ या नहीं, न ही मुझे इसकी परवाह है। जो भी हो, मैं जो कुछ भी करता हूँ—सभी पहलुओं के साथ, जैसे कि मेरा दैनिक जीवन और काम के खर्च—उसमें मेरे अपने सिद्धांत हैं, मेरी अपनी जरूरतें हैं, चुनावों का मेरा अपना दायरा है और मेरा अपना मानक है। यह मानक बस बहुत साधारण और बहुत सरल होना है; बस आम होना ही ठीक है। अगर मेरा पहनावा, साज-सँवार, और भोजन, आवास और परिवहन ऐसा है कि लोग उन्हें देखकर मुझे सम्मान देते हैं और कम से कम मैं एक गरिमापूर्ण और सच्चा इंसान दिखता हूँ, तो उतना ही काफी है; यह बस इतना ही सरल है। जहाँ तक इस बात का सवाल है कि लोग मेरे कपड़े पहनने, सजने-सँवरने और मेरे रूप-रंग को देखने के बाद मेरा आदर करेंगे या नहीं और उनके दिलों में मेरा क्या रुतबा होगा, इनमें से कोई भी बात मेरे लिए मायने नहीं रखती। क्या तुम लोगों को लगता है कि रुतबे को लेकर मेरी कोई अत्यधिक माँगें हैं? (नहीं।) यह ऐसी चीज है जिसके बारे में तुम लोग सोच नहीं सकते और जिसकी तुम लोग असलियत नहीं जान सकते। संक्षेप में, मैं केवल यह अपेक्षा करता हूँ कि मैं तुम लोगों को जो बता रहा हूँ, तुम लोग उस पर विश्वास कर पाओ। यह तुम्हारे लिए अपने आप में बहुत कठिन है। तुम खुद जानते हो कि तुम्हारे दिमाग में क्या है और तुम क्या सोच रहे हो। मेरे द्वारा कहे गए इन वचनों पर विश्वास कर पाना, इन्हें सत्य के रूप में स्वीकार कर पाना और इन्हें तथ्य के रूप में स्वीकार कर पाना तुम्हारे लिए बहुत कठिन है। इसे किस नींव पर निर्मित करना होगा? इसे भरोसे की नींव पर निर्मित करना होगा, है ना? (हाँ।) रुतबे के प्रति मेरे यही विचार और दृष्टिकोण हैं और यही मेरी तदनुरूप अभिव्यक्तियाँ हैं। हालाँकि मेरे पास रुतबे का वह सामान्य साज-सामान नहीं है जिसकी मनुष्य की नजरों में शेखी बघारी जाती है या जिसकी मनुष्य माँग करता है, लेकिन यह मेरे द्वारा किए जाने वाले कार्य को बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करता, न ही यह तुम लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में मुझे प्रभावित करता है। मैं रुतबे की खातिर तुम लोगों से अपना आदर करवाने के लिए कभी खुद को आकर्षक बनाकर पेश नहीं करूँगा। जैसा कि देखने में आता है, तुम लोग अब तक उपदेश सुनते आ रहे हो और अभी भी काफी अच्छा कर रहे हो, और तुम लोगों की वर्तमान अभिव्यक्तियों को देखते हुए, तुम सभी सकारात्मक दिशा में विकसित हो रहे हो। इसलिए रुतबे, छवि और रुतबे से जुड़े साज-सामान का अनुसरण करना बेकार है। केवल सत्य ही मनुष्य को जीत सकता है और केवल सत्य ही मनुष्य को बदल सकता है। परमेश्वर के वचन मानवजाति को बदल सकते हैं और सब कुछ सृजित भी कर सकते हैं। एक लिहाज से, यह परमेश्वर के वचनों की शक्ति और परमेश्वर के वचनों के अधिकार द्वारा प्राप्त किया गया परिणाम है। दूसरे लिहाज से, यह परमेश्वर के आत्मा के कार्य द्वारा प्राप्त किया गया परिणाम भी है। मनुष्य के पास शेखी बघारने लायक कुछ नहीं है; बात यह है कि परमेश्वर के वचन अच्छे हैं, सत्य अच्छा है और परमेश्वर का कार्य तथा परमेश्वर के आत्मा ने मनुष्य पर जो कार्य किया है, वह बहुत ही अच्छा है। परमेश्वर द्वारा इस तरह से कार्य करने और मनुष्य में यह परिणाम प्राप्त करने से क्या तुम लोग यह देख सकते हो कि यह वाक्यांश “परमेश्वर के वचन मनुष्य के लिए उद्धार हैं” सत्य है? (हाँ।) परमेश्वर विश्वासपात्र है, परमेश्वर के वचन कभी खाली नहीं जाते और परमेश्वर सर्वशक्तिमान भी है—चाहे देहधारी परमेश्वर देखने में कितना भी मामूली लगे या उसमें कितनी भी कम ताकत क्यों न दिखाई दे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; इनमें से कोई भी चीज उसके सत्य व्यक्त करने को प्रभावित नहीं कर सकती, न ही वह उस परिणाम को प्रभावित कर सकती है जो उसके वचन मनुष्य में प्राप्त करते हैं। हालाँकि हो सकता है देहधारी परमेश्वर बाहरी तौर पर बहुत मामूली लगे, सामान्य और व्यावहारिक प्रतीत हो और मनुष्य द्वारा उसे तुच्छ समझा जाए—और मनुष्य किसी भी समय उसके प्रति धारणाएँ और शत्रुता तक विकसित कर ले—फिर भी चूँकि उसके पास परमेश्वर का सार और परमेश्वर का जीवन है, इसलिए वह जो सत्य व्यक्त करता है वह मनुष्य को जीतने में पूरी तरह से सक्षम है। अंततः, वह मनुष्य को परमेश्वर के सामने लाने और उसे उसके भ्रष्ट स्वभावों से छुटकारा दिलाने में भी सक्षम है ताकि उसे परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जा सके, परमेश्वर की छह हजार साल की प्रबंधन योजना पूरी हो सके और इस योजना का समापन हो सके। इसलिए, देहधारी परमेश्वर से जुड़ा रुतबा, छवि और ऐसी अन्य चीजें महत्वपूर्ण नहीं हैं। महत्वपूर्ण क्या है? (यही कि देहधारी परमेश्वर के पास परमेश्वर का सार है; कि वह सत्य, मार्ग और जीवन है और वह परमेश्वर के वचन व्यक्त कर सकता है।) महत्वपूर्ण यह है कि इस देहधारी परमेश्वर के पास न केवल परमेश्वर का दर्जा है, बल्कि उसके पास परमेश्वर की पहचान और सार भी है। वह परमेश्वर के वचन व्यक्त कर सकता है और उसके वचन मनुष्य को जीतने, मनुष्य को बचाने और मनुष्य को पूर्ण बनाने में सक्षम हैं, जिससे वह पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जा सके। यही सबसे महत्वपूर्ण है।

क्या देहधारी परमेश्वर से जुड़े इन विषयों पर संगति करने से मनुष्य को परमेश्वर को जानने में मदद मिलती है? (हाँ।) मैं तुम लोगों के साथ चाहे जिस भी विषय पर संगति करूँ, जिसमें देहधारी परमेश्वर से जुड़े विभिन्न विषय भी शामिल हैं, यह इसलिए कभी नहीं होता कि तुम लोग मेरा आदर करो और मुझ पर श्रद्धा रखो, और फिर मैं तुम लोगों को परमेश्वर की संप्रभुता स्वीकार करने और परमेश्वर का नियंत्रण स्वीकार करने के लिए मजबूर करूँ, तुम लोगों को बाध्य करूँ कि तुम लोग वही करो जो परमेश्वर कहता है। तुम लोगों को अपने प्रति मेरा रवैया समझना होगा। जब भी मैं तुम लोगों को सत्य का कोई पहलू प्रदान करता हूँ, तब मैं उस पर स्पष्ट रूप से संगति करता हूँ ताकि तुम लोग उसे समझ सको और फिर खुद उस पर विचार कर सको और उसका अनुभव कर सको। जिन लोगों में सत्य स्वीकार करने की इच्छा है और जो सकारात्मक चीजों से प्रेम करते हैं, वे इन दृष्टिकोणों और कथनों को, जिन पर मैं संगति करता हूँ, थोड़ा-थोड़ा करके स्वीकार करने का प्रयास करेंगे और फिर अपने जीवन की कठिनाइयाँ और समस्याएँ हल करने के लिए इन वचनों के अनुसार अभ्यास करेंगे। यदि कोई व्यक्ति सत्य स्वीकार करने और सकारात्मक चीजें स्वीकार करने का इच्छुक नहीं है और केवल अपने दिल में यह महसूस करता है कि ये वचन अच्छे हैं जबकि वास्तव में कभी इनका अभ्यास नहीं करता—बल्कि इन्हें केवल एक प्रकार के सिद्धांत के रूप में अपने दिमाग में जमा कर लेता है और बात वहीं छोड़ देता है—तो हम ऐसे लोगों की निंदा नहीं करते। क्या कारण है कि हम उनकी निंदा नहीं करते? एक बात तो यह है कि लोगों को यह चुनने का अधिकार है कि उन्हें किस मार्ग पर चलना है। दूसरी बात, हो सकता है कि कुछ लोग अभी सचमुच छोटे हों, उनका आध्यात्मिक कद छोटा हो और उनकी नींव उथली हो। इससे पहले कि वे सकारात्मक चीजों पर और मानव जीवन पर विचार कर सकें, उन्हें बड़े शोधन और क्लेश से गुजरना होगा और जीवन में कुछ बड़ी कठिनाइयों से गुजरना होगा। कुछ अन्य लोगों के मामले में, हो सकता है कि ऐसा इसलिए न हो कि वे छोटे हैं, बल्कि इसलिए हो कि उन्होंने पर्याप्त चीजों का अनुभव न किया हो और वे अभी तक जाग्रत न हुए हों। उनमें सकारात्मक चीजों और नकारात्मक चीजों की या उद्धार प्राप्त करने के लिए सत्य का अनुसरण करने की संकल्पना बिल्कुल नहीं होती। दूसरे शब्दों में, उनके मन अभी तक खुले नहीं हैं और वे परमेश्वर में विश्वास करने का उद्देश्य और महत्व नहीं जानते। वे बस यही सोचते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करना एक प्रकार का धार्मिक कर्मकांड है, कि परमेश्वर में विश्वास करना अच्छा है, कि परमेश्वर में विश्वास करने का मतलब बस एक अच्छा इंसान बनना और बुरे काम न करना है, और कि इससे उन्हें एक अच्छी मंजिल और अच्छा परिणाम भी मिल सकता है—वे इसे इतना ही सरल मानते हैं। इस प्रकार, उनमें सत्य का अनुसरण करने या सकारात्मक चीजों और नकारात्मक चीजों की कोई संकल्पना नहीं होती। शायद इन लोगों का एक हिस्सा कुछ विशेष मामलों का अनुभव करने के बाद आगे आएगा और वह सत्य स्वीकार करने और सकारात्मक चीजें स्वीकार करने में सक्षम होगा और सचमुच खुद को बदल लेगा। इस बीच, लोगों का एक और हिस्सा ऐसा है जिसने कभी किन्हीं बड़ी कठिनाइयों का अनुभव नहीं किया है या जो उनका अनुभव करने के बाद भी बहुत अड़ियल बना रहता है; वह कभी सचमुच खुद को नहीं बदलता, वह सत्य स्वीकार करने और सकारात्मक चीजें स्वीकार करने में असमर्थ रहता है और वह अभी भी अपनी इच्छा पर चलना और अपने कार्यों में मनमानी करना पसंद करता है और केवल अपनी इच्छाएँ पूरी करता है। परिणामस्वरूप, लोगों का यह समूह अंततः आगे आने में विफल रहेगा और सत्य प्राप्त नहीं करेगा। परमेश्वर में विश्वास करने के अपने समय में लोग चाहे जो भी अनुभव करें, जो लोग सत्य स्वीकार कर सकते हैं वे ही अंततः उद्धार प्राप्त करने में सक्षम होंगे। जो लोग सत्य स्वीकार नहीं कर सकते, वे अंततः कभी सचमुच पश्चात्ताप नहीं करेंगे और कभी सचमुच सत्य स्वीकार नहीं करेंगे या उसके प्रति समर्पण नहीं करेंगे। ऐसे लोग व्यर्थ ही विश्वास करते हैं और अंततः वे उद्धार प्राप्त नहीं कर पाएँगे। हो सकता है इस अवधि में वे अपने कर्तव्य निभाते समय अच्छे कर्म करें; उस स्थिति में, वे अंत में अधिक से अधिक बस जीवित बच पाएँगे। जहाँ तक मेरी बात है, तुम लोगों के प्रति मेरा रवैया यह है कि मैं तुम लोगों के साथ देहधारी परमेश्वर से जुड़े सत्य सहित, सत्य के विभिन्न पहलुओं पर कई कोणों और परिप्रेक्ष्यों से संगति करने की पूरी कोशिश करूँगा। रुतबे को किस नजरिये से देखा जाए, इससे जुड़े जिस सत्य के बारे में हमने अभी बात की, उसका उद्देश्य तुम लोगों को यह समझने में मदद करना कि तुम्हें रुतबे को किस नजरिये से देखना चाहिए, और रुतबे पर सही विचार और दृष्टिकोण स्थापित करने में तुम लोगों की मदद करना है। रुतबे के संबंध में मेरे विचार और दृष्टिकोण और साथ ही मेरी जीवन-शैली मेरी विशेष पहचान के कारण उत्पन्न होते हैं। तो क्या रुतबे पर मेरे विचार और दृष्टिकोण, जो मेरी विशेष पहचान का परिणाम हैं, सत्य हैं? क्या वे सकारात्मक चीजें हैं? क्या वे वो चीजें हैं जो उद्धार प्राप्त करने के लिए भ्रष्ट मनुष्यों के पास होनी चाहिए? क्या वे वो चीजें हैं जो सृजित प्राणियों के पास होनी चाहिए? (हाँ।) चूँकि मैंने जो बातें बताई हैं वे सत्य और सकारात्मक चीजें हैं, इसलिए मैं चाहे जिस भी पहचान के साथ इस रुतबे के प्रति नजरिया रखूँ और मेरा रवैया चाहे जो भी हो, तुम लोगों को ये वचन सत्य के रूप में स्वीकार करने चाहिए। ये मेरे विचार और दृष्टिकोण हैं, लेकिन ये सत्य हैं, इसलिए तुम लोगों को इन्हें स्वीकार करना चाहिए, इन्हें आत्मसात करना चाहिए और रुतबे को सही दृष्टिकोणों के अनुसार देखना चाहिए। इन विषयों के बारे में बात करने और तुम लोगों के साथ इस विषयवस्तु पर संगति करने का मेरा उद्देश्य तुम लोगों को सत्य का एक पहलू समझाना है। मैं इन चीजों के बारे में खुद को सही ठहराने या अपना बचाव करने के तरीके के रूप में बात नहीं करता, और ऐसा मैं तुम लोगों को यह बताने के लिए तो बिल्कुल भी नहीं करता कि मैं बाकी लोगों से अलग हूँ या मैं कोई असाधारण व्यक्ति हूँ। यदि तुम लोग केवल यह महसूस करते हो कि देहधारी परमेश्वर में कोई भ्रष्टता नहीं है, कि देहधारी परमेश्वर मानवजाति का कोई साधारण सदस्य नहीं है और कि वह एक विशेष व्यक्ति है, तो यह पूरी तरह से वह सत्य नहीं है जिसे मैं चाहता हूँ कि तुम लोग समझो। मैं चाहे जिस भी विषयवस्तु पर संगति करूँ और चाहे उसमें जो भी विशिष्ट उदाहरण शामिल हों, अंततः यह सब तुम लोगों को सत्य समझने में मदद करने के लिए ही होता है। मैं तुम लोगों को जो कुछ भी प्रदान करता हूँ और तुम लोगों के साथ जिस पर भी संगति करता हूँ, उसमें सभी प्रकार की चीजों के प्रति कैसा नजरिया रखा जाए, इसके बारे में विचार शामिल होते हैं। तुम लोगों से मेरी यह अपेक्षा है कि तुम लोग सही विचारों और दृष्टिकोणों को समझने और स्वीकार करने में सक्षम हो सको और उन गलत विचारों और दृष्टिकोणों को पहचान और त्याग सको। यानी, तुम लोगों को सकारात्मक चीजों के साथ-साथ नकारात्मक चीजों को भी पहचानने, सकारात्मक चीजों को स्वीकार करने और नकारात्मक चीजों को छोड़ने में सक्षम होना चाहिए। रुतबे के प्रति कैसा नजरिया रखा जाए, इस बारे में मैंने जिन विषयों पर संगति की है, उन्हें देखते हुए, क्या तुम लोग कहोगे कि रुतबे के संबंध में मेरे विचार, दृष्टिकोण, सिद्धांत और तरीके सकारात्मक चीजें हैं? क्या वे सत्य के अनुरूप हैं? क्या वे वो सत्य सिद्धांत हैं जिनका तुम लोगों को पालन करना चाहिए? (हाँ।) यदि तुम लोगों ने मुझे समझ लिया है, तो मैंने ये वचन व्यर्थ नहीं कहे हैं। रुतबे के संबंध में अविश्वासियों के विचार और दृष्टिकोण क्या हैं? क्या उनका कोई पहलू ऐसा है जो सत्य या मानवता के अनुरूप हो? रुतबे के संबंध में उनके विचारों और दृष्टिकोणों का सार क्या है? क्या यह घिनौना और दुष्टतापूर्ण है? (हाँ।) उनके विचार और दृष्टिकोण पूरी तरह से स्वार्थपूर्ण, घिनौने और दुष्टतापूर्ण हैं; वे हर किसी के लिए भ्रष्ट करने वाले और विनाशकारी हैं। चाहे लोगों के बीच तुम्हारा रुतबा हो या नहीं, यदि तुम ये भ्रामक विचार और दृष्टिकोण स्वीकार करते हो, तो भले ही तुम्हारे पास रुतबा हो, तुम इन विचारों और दृष्टिकोणों के पीड़ितों में से एक हो; भले ही तुम निहित स्वार्थों वाले व्यक्ति हो, तुम उनके पीड़ितों में से एक हो; भले ही तुम शासक वर्ग से संबंधित हो, तुम उनके पीड़ितों में से एक हो। इन विचारों और दृष्टिकोणों का पीड़ित होने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि तुम भी ऐसे व्यक्ति हो जिसे ऐसे विचारों और दृष्टिकोणों और ऐसे दुष्ट चलनों द्वारा भ्रष्ट और तबाह किया गया है। चूँकि तुम जिन्हें स्वीकार करते हो वे भ्रामक और दुष्ट विचार और दृष्टिकोण हैं, और चूँकि तुम न केवल उन्हें स्वीकार करते हो बल्कि उन्हें कार्यान्वित भी करते हो, इसलिए तुम उनके पीड़ितों में से एक हो। तो फिर कोई इस भ्रष्टता और तबाही से कैसे बाहर निकल सकता है और इसके द्वारा आगे और नुकसान पहुँचाए जाने से कैसे बच सकता है? इसका केवल एक ही तरीका है और वह है सही विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकार करना। कौन-से सही विचार और दृष्टिकोण? रुतबे को सही ढंग से देखने के विचार और दृष्टिकोण : रुतबे द्वारा नियंत्रित या बँधा हुआ न होना, व्यक्तिगत लाभ खोजने के लिए रुतबे का उपयोग न करना, दूसरों को तबाह और भ्रष्ट करने या दूसरों का शोषण करने के लिए रुतबे का उपयोग न करना—दूसरों को कुछ भी करने के लिए मजबूर न करना। जब तुम्हारे पास रुतबा होता है, तब तुम जो कुछ भी करते हो, उसमें तुम सत्य सिद्धांतों को खोजने, अपने व्यक्तिगत हित छोड़ने, यहाँ तक कि उन सुविधाओं और अनुकूल स्थितियों से विद्रोह करने और उन्हें अस्वीकार करने में सक्षम होते हो जो रुतबा तुम्हारे लिए लाता है। रुतबे के फायदों का आनंद लेने के बजाय तुम अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करने में सक्षम होते हो, वे जिम्मेदारियाँ पूरी करते हो जो तुम्हें अपने रुतबे के अनुसार करनी चाहिए। हालाँकि इन कुछ वाक्यों की विषयवस्तु बहुत अधिक नहीं है, फिर भी भ्रष्ट मनुष्यों के लिए इन्हें अभ्यास में लाना कोई आसान काम नहीं है। जब तुम्हारे पास रुतबा नहीं होता, तब तुम्हें लगता है कि “रुतबे के फायदों का आनंद न लेना” बस जो कहा गया है उसे करने की बात है और इसे हासिल करना आसान है। लेकिन जब तुम्हारे पास रुतबा होता है, तो “रुतबे के फायदों का आनंद न लेना” अब केवल किसी नुस्खे का पालन करने का मामला नहीं रह जाता। यह तुमसे चीजें त्यागने की अपेक्षा करता है, यह तुमसे विद्रोह करने की अपेक्षा करता है, यह तुमसे चीजें छोड़ने की अपेक्षा करता है और यह तुमसे अभ्यास के सही सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने, हर व्यक्ति के साथ न्यायसंगत ढंग से पेश आने और हर मामले के साथ न्यायसंगत ढंग और वस्तुनिष्ठ तरीके से पेश आने की अपेक्षा करता है। जब तुम्हें इस कथन को अभ्यास में लाने की आवश्यकता होती है, तब इसमें तुम्हारे हित शामिल होते हैं। जब तुम्हारे पास रुतबा नहीं होता, तब तुम कहते हो, “मैं रुतबे के फायदों का आनंद नहीं लेता; मैं रुतबे के फायदों का आनंद लेने का इच्छुक नहीं हूँ।” ये शब्द कोई भी कह सकता है। लेकिन जब तुम रुतबे के फायदों का आनंद लेने की स्थिति में होते हो, तब उन्हें छोड़ना और परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान करने के लिए केवल अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने की कोशिश करना उतना आसान नहीं रह जाता, है ना? (हाँ।) यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या तुम सत्य से प्रेम करते हो और क्या तुम देह से विद्रोह कर सकते हो।

अभी हमने जिस पर संगति की, वह इस विषय से संबंधित था कि देहधारी परमेश्वर रुतबे को क्या समझता है। अब जबकि हमने इस पर संगति समाप्त कर ली है कि व्यक्ति को रुतबे को कैसे देखना चाहिए, इसलिए आओ इस बात पर संगति करें कि व्यक्ति को कष्ट को कैसे देखना चाहिए। यह ऐसा विषय है, जिसके बारे में लोग अक्सर एक-दूसरे से बात करते हैं। व्यक्ति कष्ट को कैसे देखता है, इसमें उसके विचार और दृष्टिकोण, और साथ ही उसके अभ्यास के सिद्धांत शामिल होते हैं। लोग कष्ट को कैसे देखते हैं? कष्ट ऐसी चीज है, जिसका लोग अपने जीवन में या परमेश्वर में विश्वास करने के दौरान अक्सर सामना और अनुभव करते हैं, और यह एक ऐसा विषय भी है जिस पर वे अक्सर चर्चा करते हैं। अधिकांश लोग कष्ट को अपनी व्यक्तिगत पूँजी, अपनी प्रतिष्ठा और अपने रुतबे, और साथ ही अपनी भावी मंजिल से जोड़कर देखते हैं। इसलिए, जब अधिकांश लोग कष्ट सहते हैं तब उनके कुछ विचार होते हैं और वे इसे बहुत महत्व देते हैं। विशेष रूप से, व्यक्ति ने क्या कठिनाइयाँ सही हैं; व्यक्ति ने किस तरह का कष्ट उठाया है; व्यक्ति ने कितने समय तक कष्ट सहा है; अन्य कितने लोग उसके कष्ट के बारे में जानते हैं, अन्य कितने लोगों ने इसे देखा है और अन्य कितने लोग इसे मान्यता देते हैं—ये सभी वे विषय हैं जिनकी लोग बहुत परवाह करते हैं। इसके अलावा, व्यक्ति दूसरों के दिलों में रुतबा हासिल करने के लिए कष्ट का उपयोग कैसे कर सकता है, व्यक्ति इसका उपयोग अपनी मनचाही चीजें, जैसे कि फायदे, प्रतिष्ठा, रुतबा, दूसरों का उच्च सम्मान और व्यक्तिगत महिमा पाने के लिए कैसे कर सकता है, यहाँ तक कि कष्ट के माध्यम से परमेश्वर के घर का या परमेश्वर का प्रेम, मान्यता, स्वीकृति और स्मरण कैसे प्राप्त कर सकता है—ये भी वे चीजें हैं जिन पर लोग अपने दिलों में ध्यान केंद्रित करते हैं। इसलिए, लोगों के दिलों में कष्ट का मुद्दा सत्य का अभ्यास करने से ज्यादा महत्व रखता है। तो, व्यक्ति को कष्ट को वास्तव में उस तरीके से कैसे देखना चाहिए, जो सही और सत्य सिद्धांतों के अनुरूप हो? मैं कष्ट को कैसे देखता हूँ? इन वर्षों में, जब मैंने तुम लोगों के साथ संगति की है—और तुम लोगों के साथ अपने रोजमर्रा के मेलजोल के दौरान—क्या मैंने कभी इस बारे में बात की है कि मैंने क्या कठिनाइयाँ सही हैं, मैंने कितने समय तक कष्ट सहा है, मेरे कष्ट का उद्देश्य और महत्व क्या था या कष्ट सहने के बाद मेरी भावनाएँ क्या थीं? तुम लोगों की याद में, क्या मैंने कभी इन विषयों पर बात की है? क्या लिखित पाठ में, या उपदेशों की ऑडियो रिकॉर्डिंग में, या तुम लोगों द्वारा सुने गए वचनों में इसका कोई रिकॉर्ड है? (नहीं, हमारी याद में तो नहीं है।) अतीत में, मैंने तुम लोगों के बीच यह बात फैलती सुनी थी कि एक साल चीनी नव वर्ष के दौरान, मेरे पास जाने के लिए कोई जगह नहीं थी और लौटने के लिए कोई घर नहीं था, कि भाई-बहनों ने मेरी मेजबानी नहीं की, और कि बाद में मैं सड़कों पर भटकता रहा; ऐसा कहा जाता था कि मैंने यह कष्ट सहा था। क्या वास्तव में ऐसा हुआ था? (परमेश्वर ने पिछले उपदेश में कहा था कि तुमने कभी इसका अनुभव नहीं किया। यह लोगों द्वारा फैलाई गई एक कहानी थी।) मुझे खुद भी इस बारे में पता नहीं था। मैं किसी ऐसी चीज के बारे में कैसे जान सकता हूँ, जिसका मैंने कभी अनुभव ही नहीं किया? मैंने बस इस मामले को स्पष्ट किया था, है ना? ऐसी स्थिति कभी आई ही नहीं। तो जहाँ तक तुम लोग याद कर सकते हो, मैं बुनियादी रूप से कष्ट के बारे में बात नहीं करता, है ना? (हाँ।) कष्ट के मुद्दे के संबंध में, अधिकांश लोग मानते हैं कि कष्ट व्यक्तिगत पूँजी हासिल करने, दूसरों का उच्च सम्मान अर्जित करने और उन पर अपनी अच्छी छाप छोड़ने के लिए अभ्यास का एक बहुत अच्छा रूप है; वे मानते हैं कि यह परमेश्वर में विश्वास करने में शामिल सबसे बुनियादी अभ्यास है। लोग इसे चाहे जैसे भी देखें, अब सुनो कि कष्ट के मुद्दे पर मेरे विचार और दृष्टिकोण क्या हैं।

कष्ट कई प्रकार के होते हैं। सबसे आम तरह का कष्ट वह है जिसमें लोग अपना रुतबा बचाए रखने, दूसरों के बीच अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने और अच्छी संभावनाएँ तथा अच्छी मंजिल पाने के लिए कुछ कष्ट सहते हैं। इसमें अपने कर्तव्य निभाने में देर रात तक जागना और सुबह जल्दी उठना, और अच्छा खाना न खाना या अच्छे कपड़े न पहनना शामिल है। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो सुसमाचार का प्रचार करने और अपने कर्तव्य निभाने के लिए अपने परिवार और करियर छोड़ देते हैं। न केवल सरकार उन्हें गिरफ्तार करती और सताती है, बल्कि उनके परिवार भी उन्हें नहीं समझते, यहाँ तक कि उन्हें सताते भी हैं और बाधा भी पहुँचाते हैं। कुछ जीवनसाथी तो तलाक की धमकी तक देते हैं और उनके रिश्तेदारों की तरफ से होने वाली फालतू गपशप, बदनामी और अफवाहें भी होती हैं। उन्होंने बहुत अधिक कष्ट सहा होता है। लेकिन अच्छी संभावनाएँ और अच्छी मंजिल पाने और अपना रुतबा और प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए वे चाहे कितना भी कष्ट सहें या उनका कष्ट कितना भी बड़ा हो, इस तरह कष्ट सहने वाले लोग हमेशा की तरह काम करते रहते हैं और कभी हार नहीं मानते। संक्षेप में, ऐसे लोग अपने रुतबे और प्रतिष्ठा की खातिर, और अपनी संभावनाओं और मंजिल की खातिर कष्ट सहते हैं। वे लंबे समय तक घर से दूर भाग-दौड़ करते हैं, दूसरों की उपेक्षा सहते हैं, और दूसरों द्वारा बहिष्कृत किए जाते और गलत समझे जाते हैं, वे इतना ज्यादा कष्ट सहते हैं जितना आम लोग नहीं सहते। मुझे बताओ, क्या अपने रुतबे और प्रतिष्ठा की खातिर या अपनी संभावनाओं और मंजिल की खातिर कष्ट सहने का कोई मूल्य है? (नहीं।) क्या परमेश्वर इसे याद रखता है? (नहीं।) उनके कष्ट सहने का एकमात्र उद्देश्य अगुआओं और कार्यकर्ताओं से, और साथ ही भाई-बहनों से भी अपना बहुत सम्मान करवाना और अपनी प्रशंसा करवाना होता है, ताकि भाई-बहन अगले चुनाव में उन्हें फिर से अगुआ के रूप में चुन लें। वे कष्ट को अपने अनुसरण का लक्ष्य मानते हैं। अपना रुतबा बचाए रखने के लिए वे किसी भी तरह का कष्ट सह सकते हैं। वे अपनी सांसारिक भावनाएँ और करियर छोड़ देते हैं, यहाँ तक कि अपने रहन-सहन का बेहतर परिवेश भी छोड़ देते हैं और बहुत अधिक कष्ट सहते हैं। जब इस प्रकार के लोग यह कष्ट सहते हैं, तब वे हर जगह इतराते हैं, अक्सर सभाओं के दौरान या दूसरों की काट-छाँट करते समय इस बारे में संगति करते हैं कि उन्होंने कैसे कष्ट सहा। ऐसा करने में उनका उद्देश्य बहुत सरल होता है : यह बस अपना गौरव बचाए रखने और अपना रुतबा और घमंड बचाए रखने के लिए होता है। इस प्रकार, उनके द्वारा सहे गए कष्ट का कोई मूल्य नहीं होता। इस कष्ट के माध्यम से वे खुद को नहीं जान पाते, सत्य का अभ्यास करने में सक्षम होना तो दूर की बात है। इस तरह के कष्ट का तो जिक्र करना भी बेकार है। कुछ लोग सिर्फ अपने रुतबे और प्रतिष्ठा के लिए, और अपनी संभावनाओं और मंजिल के लिए कष्ट सहते हैं। वे अपना रुतबा और प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए हर तरह की कड़ी मेहनत कर सकते हैं और आशीष पाने के लिए किसी भी तरह का कष्ट सह सकते हैं। लेकिन वे परमेश्वर के घर के कार्य की रक्षा करने, परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने या भाई-बहनों के हितों की रक्षा करने के लिए थोड़ा-सा भी कार्य करने या एक शब्द भी कहने के लिए कभी आगे नहीं आते। अगर ऐसा करने में कोई कष्ट न हो या केवल एक वाक्य ही कहना पड़े, तो भी वे ऐसा नहीं कर सकते। इसलिए, इस प्रकार के लोगों द्वारा सहा गया सारा कष्ट व्यर्थ होता है और परमेश्वर इसे स्वीकार नहीं करता। इस प्रकार के लोग विशुद्ध रूप से पाखंडी फरीसी होते हैं; वे ऐसे लोग होते हैं जो दूसरों को गुमराह करते हैं और परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिए जाते हैं। अपने रुतबे की खातिर वे अपना कर्तव्य निभाने के लिए सुबह जल्दी उठ सकते हैं और देर रात तक जाग सकते हैं, और कष्ट और थकान सह सकते हैं। वे बिना रुके लंबे समय तक काम कर सकते हैं, यहाँ तक कि साल भर कोई छुट्टी भी नहीं लेते। वे सिर्फ अपने रुतबे के लिए व्यस्त होकर भाग-दौड़ करते हैं और वे जो कुछ भी कहते हैं, वह अपना रुतबा, गौरव और प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए होता है। जब कोई ऐसा काम करता है जो वास्तव में परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं के खिलाफ होता है, तब वे कभी उसकी आलोचना नहीं करते, उसे रोकना तो दूर की बात है। इसलिए, उनका कष्ट विशुद्ध रूप से अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की खातिर और अपने व्यक्तिगत हितों के लिए होता है। न केवल परमेश्वर इसे याद नहीं रखता, बल्कि इसकी निंदा भी की जाती है। विशेष रूप से, वे कष्ट का उपयोग व्यक्तिगत पूँजी के रूप में करते हैं जिससे वे अक्सर दूसरों को फटकारते हैं और परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश करते हैं, यह आशा करते हुए कि परमेश्वर उनके कष्ट को देखेगा और उन्हें अच्छा मूल्यांकन देगा। वे अक्सर परमेश्वर को यह देखने के लिए भी परखते हैं कि क्या वह उनके कष्ट से संतुष्ट है और क्या वे अपने द्वारा सहे गए कष्ट के लिए आशीष पा सकते हैं। इसलिए, ऐसे लोगों के कष्ट की प्रकृति के आधार पर, न केवल इसे याद नहीं रखा जाता, बल्कि इसकी निंदा भी की जाती है; और न केवल यह किसी प्रकार का अच्छा कर्म नहीं है, बल्कि एक प्रकार का बुरा कर्म भी है। इस प्रकार के लोग अक्सर इस बात की शेखी बघारते हैं कि उन्होंने कलीसिया का काम करने और अपना कर्तव्य निभाने की खातिर कितनी दूर तक यात्रा की है और कितना कष्ट सहा है, साथ ही उन्हें कितनी गंभीर बीमारियाँ हुई हैं और उन्हें कितनी दवा खानी पड़ी है। जब वे दवा लेते हैं, तब अक्सर उसे भाई-बहनों के सामने लेते हैं ताकि वे उन्हें दवा लेते हुए देख लें। वे ऐसे तरीके ढूँढते हैं जिनसे अधिक लोगों को यह पता चल जाए कि उन्होंने कितना काम किया है, कितना कष्ट सहा है और कितनी कीमत चुकाई है, और यह कि वे अधिक काम करने के कारण बीमार पड़ने के बाद ही दवा लेते हैं। वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि लोग उनका बहुत सम्मान करें, उनकी प्रशंसा करें और उनकी पूजा करें। क्या इस प्रकार के लोग घिनौने नहीं होते? (हाँ।) इसलिए, इस तरह के लोगों के कष्ट की एक धेले की भी कीमत नहीं है; यह घिनौना है। यहाँ तक कि इस प्रकार के लोगों का एक बड़ा हिस्सा कोई वास्तविक काम नहीं कर सकता। वे सिर्फ दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार काम करते हैं, ताकि दूसरों को दिखाने के लिए एक कृत्रिम आड़ बना सकें। वे एक भी ऐसा शब्द नहीं कहते या एक भी ऐसा काम नहीं करते, जिससे किसी को बुरा लगे। जब कलीसिया के कार्य की रक्षा करने से जुड़े मामलों की बात आती है, तो वे एक शब्द भी नहीं बोलते या थोड़ा-सा भी काम नहीं करते। जब उनका सामना कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधाएँ पैदा करने वाले किसी व्यक्ति से होता है, तब वे उस व्यक्ति के साथ सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार नहीं करते, बल्कि भावनाओं के आधार पर कार्य करते हैं। यदि वे किसी ऐसे व्यक्ति को कार्य में विघ्न-बाधाएँ पैदा करते देखते हैं जिसे वे नापसंद करते हैं, तो वे थोड़ा बोल देंगे और थोड़ा-बहुत कुछ कर देंगे, दिखावा करने और व्यक्तिगत पूँजी संचित करने के अवसर का लाभ उठाएँगे और समय आने पर श्रेय लेने और इनाम पाने की कोशिश करेंगे। लेकिन यदि कार्य में विघ्न-बाधाएँ पैदा करने वाला कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे वे पसंद करते हैं या जो उनका समर्थन करता है, तो वे न केवल उसे उजागर नहीं करते या रोकते नहीं, बल्कि वे उसे समायोजित भी करते हैं, उसे बचाते भी हैं और उसके किए पर पर्दा भी डालते हैं, यह अच्छा लगने वाला बहाना बनाते हुए कि “उसका आध्यात्मिक कद छोटा है, इसलिए हमें धैर्य रखना चाहिए और उसे सहारा देना चाहिए।” असल में, वे अपना रुतबा बचाए रखने के लिए ही किसी को नाराज न करने की कोशिश करते हैं। फिर भी, वे लोगों से अपना बहुत सम्मान करवाने के लिए अभी भी अपने कष्ट का उपयोग करना चाहते हैं और अपने रुतबे की रक्षा करने के लिए अपने कष्ट का उपयोग करना चाहते हैं। कुछ लोग आम तौर पर बहुत व्यस्त होने का दिखावा करते हैं। खाना खाते समय, वे जानबूझकर थोड़े-से चावल या उबले हुए बन सादे उबले पानी में भिगोते हैं और उसके साथ कुछ अचार वाली सब्जियाँ खाते हैं, और खाना खत्म करने के तुरंत बाद सभा में चले जाते हैं, जिससे भाई-बहनों को यह दिखे कि वे वास्तव में कष्ट सह सकते हैं। वे हमेशा एक ही कपड़ा पहनते हैं, गंदा होने पर भी उसे नहीं धोते और दूसरे लोगों से कहते हैं, “देखो, मैं इतना व्यस्त हूँ कि मेरे पास खाने या अपने कपड़े धोने का भी समय नहीं है!” कुछ लोग अपने कर्तव्य निभाते समय दूसरों के साथ फालतू बातें करते हैं और समय बर्बाद करते हैं, और फिर भी यह दिखावा करते हैं कि वे उनके साथ सभा और संगति कर रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे वे सुबह से रात तक अपना कर्तव्य निभाने में व्यस्त रहते हैं, और रात को जब उन्हें आराम करना चाहिए, तब वे कंप्यूटर पर ही सिर रखकर सो जाते हैं। वे ऐसा इसलिए करते हैं, ताकि लोग देख लें कि वे अपने कर्तव्य निभाने में कितना कष्ट सहते हैं और कितनी कीमत चुकाते हैं। उनके बाल अक्सर बिखरे और चेहरे गंदे होते हैं, और वे लंबे समय तक अपने कपड़े बदलते या धोते नहीं या नहाते नहीं, सिर्फ लोगों को यह ज्ञात करवाने के लिए कि वे कितना कष्ट सहते हैं और वे कितनी कीमत चुका सकते हैं। मुझे बताओ, यह कष्ट सहने का क्या मूल्य है? क्या यह सब सिर्फ एक दिखावा नहीं है? (हाँ।) परमेश्वर के घर का कुछ काम थोड़ा व्यस्त होता है, लेकिन इस हद तक नहीं कि लोगों के बाल बिखरे हों, चेहरे गंदे हों और वे मनुष्य जैसे न दिखें, है ना? कुछ कलीसियाओं में रहन-सहन की स्थितियाँ अपेक्षाकृत खराब होती हैं, लेकिन इस हद तक नहीं कि वहाँ के लोग रोज केवल उबले हुए बन और अचार वाली सब्जियाँ ही खाएँ, है ना? शायद कुछ विशिष्ट स्थानों पर ऐसा हो, लेकिन यह संभव नहीं कि अधिकांश स्थान ऐसे हों। परमेश्वर के घर का काम चाहे कितना भी भागदौड़ भरा क्यों न हो जाए, कम-से-कम, तुम्हें आठ घंटे की आरामदायक नींद जरूर लेनी चाहिए—ऐसा तो नहीं है कि तुम आठ घंटे की नींद भी नहीं ले सकते, है ना? इसमें कभी-कभार आने वाली वह विशेष परिस्थिति शामिल नहीं है, जो एक-दो दिन तक रह सकती है। मुख्यभूमि चीन में परमेश्वर के चुने हुए कुछ लोग शैतान के शासन द्वारा गिरफ्तारी और उत्पीड़न से बचने के लिए भागते फिरते हैं। कभी-कभी वे गुफाओं, सूखी घास के ढेरों और तबेलों में सोते और आराम करते हैं। ये विशेष परिस्थितियाँ हैं। विदेश आने के बाद, यदि लोग जानबूझकर कुछ “कष्ट के परिवेश” बनाते हैं और जानबूझकर कष्ट सहने का “प्रशिक्षण” लेते हैं, तो क्या वे बुनियादी रूप से तपस्वी भिक्षु नहीं हैं? हम उन्हें ऐसा क्यों कहेंगे? इसलिए कि वे जो कुछ भी कर रहे हैं, वह सिर्फ जानबूझकर कुछ कष्ट सहना, कुछ विनियमों का पालन करना और अपने शरीर अनुशासित करना है, जिसके बाद उन्हें लगता है कि वे बदल गए हैं। फिर वे दूसरों के सामने इस बात की शेखी बघारते हैं कि उन्होंने कितना कष्ट सहा है, यह आशा करते हुए कि वे स्वर्ग और जनसामान्य दोनों को प्रभावित कर लेंगे, और इस प्रकार अपने लिए प्रतिष्ठा और फायदे खोजते हैं और अपनी मनचाही अच्छी मंजिल प्राप्त करना चाहते हैं। यह मार्ग अव्यावहारिक है। जब परमेश्वर किसी व्यक्ति का परिणाम निर्धारित करता है, तब वह कभी यह नहीं देखता कि उसने कितना कष्ट सहा है या क्या उसने कड़ी मेहनत की है और महान योगदान दिया है, न ही वह कभी उसकी उम्र देखता है। परमेश्वर लोगों के परिणाम का निर्धारण किस आधार पर करता है? वह इसका निर्धारण इस आधार पर करता है कि लोगों के पास सत्य है या नहीं। यदि तुम केवल कष्ट सहने पर ध्यान केंद्रित करते हो लेकिन तुमने सत्य प्राप्त नहीं किया है, तो तुमने चाहे कितना भी कष्ट सहा हो, वह व्यर्थ ही गया है। यदि तुम बिना सिद्धांतों के कष्ट सहते हो और तुम अपने लिए कठिनाइयाँ भी पैदा करते हो और जानबूझकर कष्ट सहते हो, तो तुम्हारा कष्ट सहना ही नियत है। तुम्हारा कष्ट दया के योग्य नहीं है; तुमने खुद इसे अपने लिए उत्पन्न किया है। परमेश्वर ने मनुष्य को कष्ट सहने के लिए नहीं कहा है। परमेश्वर मनुष्य का न्याय करता है और उसे ताड़ना देता है, और मनुष्य का परीक्षण करता है और उसका शोधन करता है, उसे कष्ट देने के लिए नहीं, बल्कि उसे उसके भ्रष्ट स्वभावों से बचाने के लिए। मनुष्य जो बहुत-सा कष्ट सहता है, वह उसके भ्रष्ट स्वभावों के कारण होता है; मनुष्य से कष्ट सहन करवाना परमेश्वर का इरादा कभी नहीं रहा है।

परमेश्वर ने मानवजाति के लिए स्वर्ग, पृथ्वी और सब कुछ बनाया—सूर्य, चंद्रमा और तारे, धूप, हवा, मिट्टी, पानी, चारों मौसम और साथ ही मानवजाति के जीवन और अस्तित्व के लिए आवश्यक सभी प्रकार की भौतिक चीजें। खाने, पीने, उपयोग करने और देखने के लिए चीजें हैं; चारों मौसमों में सभी प्रकार की जीवित चीजों की भरपूर आपूर्ति होती है, है ना? (हाँ।) अनाज, सब्जियाँ, फल और मेवे हैं, पेड़ों पर और जमीन में उगने वाली चीजें हैं; सभी प्रकार की विभिन्न भौतिक चीजें अत्यधिक प्रचुर मात्रा में हैं, जिनमें हर स्वाद और रंग की भरपूर आपूर्ति है। परमेश्वर चाहता है कि मनुष्य उस खाद्य सामग्री का आनंद ले जो उसकी ओर से आती है; मनुष्य को परमेश्वर से जो खाद्य सामग्री मिलती है वह समृद्ध और प्रचुर है और मनुष्य उससे पोषण पाता है। जैसा कि तुम देख सकते हो, सृजित प्राणियों को सृष्टिकर्ता से जो मिलता है, वह समृद्ध और प्रचुर, अनंत और कभी न खत्म होने वाला है। परमेश्वर पूरी तरह से चाहता है कि मनुष्य इन सबका आनंद ले और सृजित प्राणियों को सृष्टिकर्ता द्वारा प्रदान की गई इन सब चीजों का उचित रूप से आनंद लेना चाहिए। सृजित प्राणी परमेश्वर से आशीष पाते हैं, कष्ट नहीं। मानवजाति के सृजन में परमेश्वर का मूल इरादा मनुष्य को कष्ट देना नहीं था, बल्कि यह था कि मनुष्य जीवन की यात्रा का अनुभव करते हुए परमेश्वर की ओर से आने वाली सामग्री का आनंद ले। परमेश्वर द्वारा सृजित विभिन्न प्रकार के जीवित प्राणियों और जीवित चीजों की भरपूर आपूर्ति है; किसी चीज की कमी नहीं है। इसमें सुनने वाली चीजें भी शामिल हैं—देखो कैसे परमेश्वर ने मनुष्य के लिए पक्षियों की चहचहाहट और झींगुरों के गाने तक के बारे में सोचा है। यानी, परमेश्वर ने हर उस चीज के बारे में सोचा है, जो मनुष्य की आंतरिक दुनिया में संतुष्टि, आराम और शांति लाती है। परमेश्वर ने सृजित प्राणियों के लिए जो तैयार किया है, उसकी भरपूर आपूर्ति है। जब सृजित प्राणी परमेश्वर द्वारा प्रदत्त हर चीज का आनंद लेते हैं, तब वे आशीषों का आनंद ले रहे होते हैं। वे लोग जो तपस्वी भिक्षुओं की तरह हैं, मानते हैं कि परमेश्वर बस मनुष्य को कष्ट देना चाहता है, कि वह यह बिल्कुल नहीं चाहता कि मनुष्य आशीषों का आनंद ले, कि अगर स्थितियाँ अनुकूल हों तो भी वह मनुष्य को उनका आनंद नहीं लेने देता, बल्कि मनुष्य से बस कष्ट सहन करवाता है। वे मानते हैं कि जब मनुष्य अत्यधिक कष्ट और थकान का सामना करता है, तब परमेश्वर खुश होता है, संतुष्ट होता है और उसने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया होता है। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोग बुरे इरादे नहीं रखते? क्या यह परमेश्वर के इरादों की विकृत व्याख्या नहीं है? (हाँ।) यह विचार कहाँ से आया? यह शैतान से आया, है ना? (हाँ।) परमेश्वर ने सभी चीजें बनाईं, लेकिन शैतान इसे स्वीकार नहीं करता। वह नहीं जानता कि उनका प्रबंधन या रखरखाव कैसे किया जाए, और वह नहीं चाहता कि ये सभी जीवित चीजें अस्तित्व में बनी रहें। इसलिए वह उन्हें बर्बाद और नष्ट कर देता है, ताकि मनुष्य उन सब चीजों का आनंद न ले सके जो परमेश्वर ने बनाई हैं। वह मनुष्य को गुमराह और भ्रष्ट करता है ताकि मनुष्य पर उसकी अच्छी छाप पड़े, और मनुष्य उसकी पूजा करे और उसका बहुत सम्मान करे। शैतान जो चाहे वो करता है और हर चीज में परमेश्वर का विरोध करता है। परमेश्वर मानवजाति को इन सब चीजों का आनंद लेने देता है, जबकि शैतान मानवजाति को इनका आनंद लेने के अधिकार से वंचित करता है, मानवजाति को इनका आनंद नहीं लेने देता और बस मनुष्य से कष्ट सहन करवाता है। परमेश्वर मानवजाति को सभी चीजों का प्रबंधन करने और सभी चीजों का आनंद लेने देता है, जबकि शैतान सभी चीजें बर्बाद कर देता है। वह सभी चीजों के अस्तित्व को नजरअंदाज करता है, सभी चीजों के अस्तित्व को तुच्छ समझता है, सभी चीजों के अस्तित्व की निंदा करता है और जानबूझकर मनुष्य से कष्ट की तलाश करवाता है। परमेश्वर ने मनुष्य के लिए जो नियम नियत किए हैं, उन्हें देखो : जब सूरज ढलता है और रात में अँधेरा हो जाता है, तब व्यक्ति को अपने शरीर को आराम देना चाहिए। दिन भर के श्रम की थकान आराम करने से दूर हो जाती है। रात में आराम करने के बाद व्यक्ति की शारीरिक शक्ति बहाल हो जाती है और वह ऊर्जा से भर जाता है। अगले दिन जब सूरज उगता है, तब व्यक्ति तरोताजा महसूस करता है और दूसरे दिन का श्रम शुरू करता है। यह कितना अद्भुत नियम है! कुछ लोग इस नियम का पालन नहीं करते। वे रात में अँधेरा होने पर ही काम करना शुरू करते हैं और सोने से पहले सुबह के चार-पाँच बजे तक जागते रहते हैं, काम और आराम के चक्र को उलट देना चाहते हैं। परमेश्वर कहता है कि जब सूरज ढलता है और चंद्रमा उगता है, तब मनुष्य को अपना दिन का श्रम रोक देना चाहिए और धीरे-धीरे अपनी गतिविधियाँ कम करनी चाहिए और आराम करना शुरू कर देना चाहिए; उसे सूर्य, चंद्रमा और तारों की गति नियंत्रित करने वाले नियमों के अनुसार काम या आराम करना चाहिए और इस नियम के खिलाफ नहीं जाना चाहिए। ये लोग, जो “कष्ट सहते” हैं, ठीक इसका उलटा करने पर जोर देते हैं। जब उन्हें आराम करना चाहिए, तब वे सोते नहीं; वे जानबूझकर देर रात तक जागते हैं, यहाँ तक कि बहुत उत्साहित भी हो जाते हैं। जब दूसरे लोग सबसे गहरी नींद में सो रहे होते हैं, तब वे सबसे ज्यादा व्यस्त होते हैं, तब वे कष्ट सह रहे होते हैं और खुद को थका रहे होते हैं। फिर, जब दिन में काम करने का समय होता है, तब क्या उनमें अभी भी ऊर्जा होती है? क्या उनकी ऊर्जा अभी भी एक दिन का काम सँभाल सकती है? (नहीं।) उनके पास उठकर काम जारी रखने से पहले एक-दो घंटे सोने के अलावा कोई चारा नहीं होता। सुबह, जब दूसरे लोग खा रहे होते हैं, तब वे सो रहे होते हैं। दिन में जब दूसरे लोग सामान्य रूप से काम कर रहे होते हैं, तब वे ऊँघ रहे होते हैं और सुस्त पड़े होते हैं। लेकिन रात में, जब दूसरे लोग आराम कर रहे होते हैं, तब वे चुस्त हो जाते हैं और काम करना और व्यस्त होना शुरू कर देते हैं। क्या यह काम और आराम के चक्र को उलट देना नहीं है? क्या यह असामान्य नहीं है? (हाँ।) और फिर भी वे खुद से काफी प्रसन्न महसूस करते हैं, सोचते हैं कि कोई और उनके जितना कष्ट नहीं सह सकता, कि दूसरे तमाम लोग बस लल्लू-पंजू हैं। आधी रात को, जब दूसरे लोग सोने वाले होते हैं, तब वे यह तक कहते हैं, “तुम इतनी जल्दी सो रहे हो?” दूसरा व्यक्ति कहता है, “आधी रात हो गई है; पहले ही बहुत देर हो चुकी है। इसके अलावा, मुझमें कोई ऊर्जा नहीं बची है; मेरी कार्यकुशलता प्रभावित होगी और मुझे अच्छे परिणाम नहीं मिलेंगे। जब सोने का समय हो, तब हमें सोना चाहिए।” वे कहते हैं, “आधी रात को सोना बहुत जल्दी है! मैं आधी रात को काम करना शुरू करता हूँ और सुबह के चार-पाँच बजे तक नहीं सोता।” उनके दिमाग में कुछ तो गड़बड़ है, है ना? वे न केवल खुद को सताते हैं, बल्कि दूसरों को भी बाधित करते हैं। जब दूसरे लोग आधी रात को आराम करते हैं, तब वे यह कहते हुए उनकी आलोचना तक करते हैं, “तुम दैहिक सुख में लिप्त रहते हो और तुममें कष्ट सहने का संकल्प नहीं है। चूँकि परमेश्वर ने तुम्हें इतना महत्वपूर्ण आदेश दिया है, इसलिए तुम्हें देर रात तक काम करना चाहिए और कष्ट सहना चाहिए; तुम्हें सोने से पहले कम-से-कम सुबह के दो बजे तक जागना चाहिए। केवल यही अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित होना है।” यदि कोई व्यक्ति सोने से पहले सुबह के दो बजे तक जागता है, तो क्या उसमें दिन में अपने कर्तव्य निभाने की ऊर्जा बचेगी? (नहीं।) मानव शरीर को नियंत्रित करने वाले प्राकृतिक नियमों के अनुसार, यदि कोई सुबह दो बजे सोता है, तो वह सुबह सात-आठ बजे तक नहीं उठ पाएगा। उठने के बाद वह शारीरिक रूप से थका हुआ होगा, मानसिक रूप से सुस्त होगा, उसके पैरों में सूजन होगी और वह पूरे शरीर में बेचैनी महसूस करेगा। अगर वह दोपहर में झपकी भी ले ले, तो भी उसका शरीर स्वस्थ नहीं होगा, क्योंकि वह परमेश्वर द्वारा मनुष्य के लिए नियत किए गए नियमों के खिलाफ गया, है ना? (हाँ।) वह न केवल खुद इस तरह कष्ट सहता है, बल्कि यह माँग भी करता है कि दूसरे भी उसी की तरह कष्ट सहें। यदि दूसरे लोग उसके तरीके से काम नहीं करते, तो वह उनकी निंदा करने के लिए एक सैद्धांतिक आधार लेकर आता है। भ्रमित लोग, जिनका आध्यात्मिक कद छोटा होता है और जिनमें भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती, इस प्रकार बाधित हो जाते हैं; वे भी वैसा ही करते हैं, खुद को थोड़ा-थोड़ा करके जगाए रखने के लिए मजबूर करते हैं और धीरे-धीरे उस बिंदु तक पहुँच जाते हैं जहाँ वे दो बजे के बाद सोते हैं। वे यह तक सोचते हैं, “कष्ट सहने का संकल्प होना वास्तव में आसान नहीं है। हमें सहना सीखना चाहिए, पूरी तरह से दृढ़ता पर निर्भर रहना सीखना चाहिए, देह के खिलाफ विद्रोह करना सीखना चाहिए और प्राकृतिक नियमों के खिलाफ जाना सीखना चाहिए। यदि हमें वास्तव में बहुत तेज नींद आ रही हो, तो हमें अपनी देह को सोने से रोकने के लिए व्यावहारिक रूप से खुद को प्रताड़ित करना चाहिए। केवल यही परमेश्वर के आदेश के प्रति समर्पित होना और कष्ट सहने का संकल्प रखना है और केवल ऐसा करने वाले लोग ही उद्धार प्राप्त कर सकते हैं!” देखो, क्या उनकी यह प्रेरणा काफी हद तक मंदिरों के भिक्षुओं और भिक्षुणियों के समान नहीं है? (हाँ।) तपस्वी भिक्षुओं की ही तरह वे केवल कष्ट सहना जानते हैं; सत्य समझना, सत्य का अभ्यास करना और उद्धार प्राप्त करना उनके दिलों से पूरी तरह गायब रहता है। तो क्या ऐसे लोग उद्धार प्राप्त कर सकते हैं? क्या वे बर्बाद नहीं हो गए हैं? (हाँ।) यह कैसे होता है? यह गलत विचारों और दृष्टिकोणों द्वारा बुद्धि भ्रष्ट किए जाने, गलत विचारों और दृष्टिकोणों से प्रभावित और बर्बाद होने का परिणाम है। यह सब लोगों के सत्य न समझने के कारण होता है; यह उनके गलत विचारों और दृष्टिकोणों द्वारा गहराई से नुकसान पहुँचाए जाने और सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने में असमर्थ होने के कारण होता है। तो, क्या अंततः वे दूसरे लोग हैं जो तुम्हें गुमराह और भ्रष्ट कर रहे हैं या यह शैतान है जो तुम्हें गुमराह और भ्रष्ट कर रहा है? संक्षेप में, मनुष्य जो गलत विचार और दृष्टिकोण स्वीकार करता है, वे शैतान से आते हैं, परमेश्वर से नहीं; वे नकारात्मक चीजें हैं, सत्य नहीं। बाहरी तौर पर, ऐसा लगता है कि तुमने अन्य लोगों से कुछ विचार और दृष्टिकोण स्वीकार किए हैं। लेकिन वास्तव में, ये विचार और दृष्टिकोण परमेश्वर से नहीं, बल्कि शैतान से आते हैं। बाहरी तौर पर, ऐसा लगता है कि दूसरे लोग तुमसे बात कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में, यह शैतान है जो तुम्हारे अंदर ये दृष्टिकोण डाल रहा है। क्या शैतान द्वारा मनुष्य में डाले जाने वाले दृष्टिकोण भी मनुष्य के माध्यम से ही नहीं फैलाए जाते? यदि तुम सत्य नहीं समझते और सत्य सिद्धांतों पर कायम नहीं रह सकते, तो अंततः तुम गुमराह हो जाओगे। एक बार गुमराह होने के बाद, तुम बस तपस्वी भिक्षुओं की तरह हो जाओगे, जो केवल हर दिन कष्ट सहना और विनियमों का पालन करना जानते हैं, और फिर भी यही सोचोगे कि तुम सत्य का अभ्यास कर रहे हो। अंत में, तुम्हें दंड दिया जाएगा और तुम बिना कुछ प्राप्त किए मर जाओगे। क्या इस तरह का कष्ट सहना तुम्हें उचित लगता है? (नहीं।) इस तरह का कष्ट सहना अंततः लोगों को कहाँ ले जाता है? (नरक में।) वे नरक में जा पहुँचते हैं, जहाँ वे शैतान को रिपोर्ट करते हैं। क्या परमेश्वर उन्हें चाहता था? (नहीं।) ऐसे लोगों ने इतना कष्ट सहा और खुद को परमेश्वर के प्रति इतना समर्पित माना, तो अंत में वे शैतान को रिपोर्ट करने कैसे जा पहुँचे? परमेश्वर ने उन्हें क्यों नहीं चाहा? क्या यह अफसोस की बात है? (नहीं, ऐसा नहीं है।) परमेश्वर में विश्वास करने में, यदि लोग केवल विनियमों का पालन करने और कष्ट सहने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, केवल आशीष पाने का अनुसरण करते हैं लेकिन सत्य का अनुसरण नहीं करते, परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं कर सकते, अभी भी शैतानी स्वभावों के अनुसार जीते हैं और अभी भी शैतान के हैं, तो ऐसे लोग चाहे कितना भी कष्ट सहें, उनके लिए उद्धार प्राप्त करना असंभव होगा। यह सब उस मार्ग से निर्धारित होता है, जिस पर लोग स्वयं चलते हैं।

जब कुछ लोग किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं जिसमें कष्ट सहने का बड़ा संकल्प होता है—चाहे उस व्यक्ति द्वारा सहा गया कष्ट सार्थक हो या न हो—तो वे विशेष रूप से ऐसा व्यक्ति बनने की लालसा करते हैं जो कष्ट सह सके। विशेष रूप से, वे उस तरह का व्यक्ति बनने की लालसा करते हैं जो अपने शरीर को अनुशासित कर सके, अपनी देह के खिलाफ विद्रोह कर सके और देह की असंयत इच्छाओं के खिलाफ विद्रोह कर सके; उनके मन में कष्ट सहने में सक्षम लोगों के लिए विशेष प्रशंसा होती है। वे जिस तरह का व्यक्ति बनने की लालसा करते हैं, वह ऐसा लगता है जैसे सांसारिक जीवन से विरक्त हो और निर्वात में रहता हो, जिसकी कोई मानवीय महत्वाकांक्षाएँ या इच्छाएँ न हों, न ही कोई व्यक्तिगत शौक, रुचियाँ, या यहाँ तक कि व्यक्तिगत चुनाव हों—ऐसा व्यक्ति जिसके पास इनमें से कोई चीज बिल्कुल न हो और जो इच्छाओं और अभिलाषाओं से मुक्त हो। वे अपने दिलों में इस प्रकार के लोगों की यह कहते हुए बहुत प्रशंसा करते हैं, “ऐसा कैसे है कि उनके स्वार्थपूर्ण मकसद नहीं हैं? ऐसा कैसे है कि उनकी कोई व्यक्तिगत प्राथमिकताएँ या इच्छाएँ नहीं हैं और वे कष्ट सहने में इतने सक्षम हैं? मैं कष्ट क्यों नहीं सह सकता? मैं बहुत गहराई तक भ्रष्ट हूँ! मैं केवल यही कह सकता हूँ कि मेरी भ्रष्टता उनकी तुलना में अधिक गहरी है।” एक बार जब उनके ऐसे विचार और दृष्टिकोण बन जाते हैं, तब वे अपने खिलाफ अभियान छेड़ देते हैं : जब वे भूखे होते हैं और खाना चाहते हैं, तब वे खुद को रोकते हैं और नहीं खाते; जब वे प्यासे होते हैं और पानी पीना चाहते हैं, तब वे खुद को नियंत्रित करते हैं और नहीं पीते; जब सोने का समय होता है, तब वे जानबूझकर नहीं सोते; वे जो कुछ भी करना चाहते हैं, वह जानबूझकर नहीं करते, और जो वे नहीं करना चाहते, वह जानबूझकर करते हैं—वे बस बिल्कुल उलटा करते हैं। वे इस बात पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते कि सामान्य मानवता के लिहाज से क्या जरूरी है, क्या किया जाना चाहिए, कौन-सी जिम्मेदारियाँ और दायित्व पूरे किए जाने चाहिए और जीवन के किन नियमों और सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए, और इसके बजाय वे जानबूझकर इन चीजों के खिलाफ जाते हैं। कुछ लोग तो इस हद तक चले जाते हैं कि जानबूझकर नियमों का उल्लंघन करते हुए कार्य करते हैं और जानबूझकर कष्ट ढूँढ़ते हैं। उदाहरण के लिए, जब रात में आराम करने का समय होता है, तब वे खुद को अपनी थकान सहने और न सोने के लिए मजबूर करते हैं। यदि उन्हें मीठा खाना पसंद है, तो वे केवल मसालेदार या कड़वा खाना खाते हैं। काम करते समय वे विशेष रूप से वे कार्य चुनते हैं जो उन्हें पसंद नहीं हैं। वे बस खुद को कठिनाइयों पर काबू पाने के लिए प्रशिक्षित करते हैं और खुद को कष्ट सहने में सक्षम होने के लिए प्रशिक्षित करते हैं, हर उस चीज को अस्वीकार करते हैं और उसके खिलाफ विद्रोह करते हैं जिसकी उन्हें जरूरत होती है और जो उन्हें पसंद होती है, और हर उस चीज को स्वीकार करते हैं जिसे वे नापसंद करते हैं और जिसकी उन्हें जरूरत नहीं होती। उन्हें लगता है कि इस तरह से कार्य करना सत्य का अभ्यास करना है और परमेश्वर निश्चित रूप से इसे वाकई पसंद करेगा और स्वीकार करेगा; वे सोचते हैं कि वे जितना अधिक कष्ट सहेंगे और जितनी अधिक असुविधा और पीड़ा महसूस करेंगे, परमेश्वर उतना ही अधिक प्रसन्न होगा और इसे स्वीकार करेगा। मुझे बताओ, ये किस तरह के विचार और दृष्टिकोण हैं? क्या यह पराकाष्ठा नहीं है? (हाँ।) यहाँ तक कि कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो कष्ट सहने और अपने शरीर को अनुशासित करने के लिए हर समय कंप्यूटर के सामने बैठे रहते हैं, चाहे उनके पास करने के लिए चीजें हों या न हों, और वे अपने लिए एक नियम भी बना लेते हैं कि उन्हें हर दिन बारह घंटे काम करना ही है, चाहे इससे परिणाम मिलें या न मिलें या चाहे वे कार्यकुशल हों या न हों। जब उनका दिमाग धुँधला हो जाता है तब भी वे आराम नहीं करते और जब वे बीमार पड़ते हैं तब भी डॉक्टर के पास नहीं जाते। वे मानते हैं कि यह देह के खिलाफ विद्रोह करना है, और सोचते हैं, “मैं इस पुरानी देह को इसकी मनमानी नहीं करने दे सकता; देह को सुखी बिल्कुल महसूस नहीं करना चाहिए। यदि यह सुखी महसूस करेगी, तो यह बुरे काम करेगी, इसलिए मुझे इससे कष्ट सहन करवाना होगा। एक बार जब यह कष्ट सहेगी, तब यह जान जाएगी कि परमेश्वर के लिए कार्य करना कितना कठिन है, और एक बार जब यह कष्ट सहेगी, तब यह परमेश्वर के सामने शांत हो पाएगी।” यह किस तरह का तर्क है? उनके जोश को देखते हुए, ऐसा लगता है कि उनमें थोड़ा संकल्प है और वे सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हैं, लेकिन क्या उनका तरीका और दृष्टिकोण थोड़ा टेढ़ा, थोड़ा अतिवादी नहीं है? (हाँ।) वे मानते हैं कि कष्ट सहना सत्य का अभ्यास करने को दर्शाता है, कष्ट सहना निष्ठा के साथ अपना कर्तव्य निभाने को दर्शाता है और कष्ट सहना कुशलतापूर्वक अपना कर्तव्य निभाने को दर्शाता है। वे सोचते हैं कि कष्ट सहना सर्वोच्च सत्य सिद्धांत और अभ्यास का सबसे सटीक रूप है और यही सत्य का अनुसरण करना है। चीजों को समझने का यह तरीका बेहद समस्यात्मक है! वे मानते हैं कि कोई व्यक्ति कष्ट सह सकता है या नहीं और वह कितना कष्ट सहता है, यही वह मानक है जिसका उपयोग परमेश्वर यह तय करने के लिए करता है कि अंततः उसका क्या परिणाम होगा; वे मानते हैं कि यही सत्य है। क्या उनका यह दृष्टिकोण सही है? (नहीं।) तो फिर भी वे इस पर कायम क्यों रहते हैं? (क्योंकि वे शैतान के गलत विचारों और दृष्टिकोणों से प्रभावित होते हैं।) यह मामले का एक पहलू है; इसका संबंध लोगों की समझ और धारणाओं से भी है। वे बस भ्रमों के सहारे जीते हैं, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के बीच जीते हैं, सोचते हैं कि कष्ट सहने के बदले में एक अच्छा परिणाम और मंजिल पाई जा सकती है। वे इस मामले में कभी सत्य नहीं खोजते—वे कभी यह समझने की कोशिश नहीं करते कि परमेश्वर कष्ट को कैसे देखता है, परमेश्वर मनुष्य से किन मानकों की अपेक्षा करता है या परमेश्वर के मनुष्य से कष्ट सहन करवाने का क्या महत्व है। वे कभी आत्म-चिंतन भी नहीं करते और अपने मन में नहीं सोचते, “मैं जिस तरह का कष्ट सह रहा हूँ, क्या वह सत्य सिद्धांतों के अनुरूप है? क्या परमेश्वर मनुष्य से ऐसा कष्ट सहने की अपेक्षा करता है? क्या यह वह प्रभाव प्राप्त कर सकता है जो परमेश्वर मनुष्य पर अपने कार्य के माध्यम से प्राप्त करना चाहता है? क्या यह कष्ट सहकर मनुष्य सत्य की समझ और परमेश्वर के इरादों की समझ प्राप्त कर सकता है? यदि नहीं, तो यह साबित करता है कि यह मार्ग गलत है और मुझे वापस लौट जाना चाहिए।” इस प्रकार के लोग इसलिए कष्ट सहते हैं, क्योंकि उनके विचार और दृष्टिकोण समस्यात्मक हैं। कष्ट के बारे में उनकी कई मानवीय धारणाएँ और कल्पनाएँ होती हैं। इसका संबंध लोगों की महत्वाकांक्षाओं और अनुसरणों से भी है। कुछ लोग अपने कष्ट के बदले में एक अच्छी मंजिल पाना चाहते हैं; कुछ लोग अपने बारे में डींगें हाँकने और दूसरों से अपना उच्च सम्मान करवाने के लिए कष्ट का उपयोग करना चाहते हैं; और कुछ लोग यह साबित करने के लिए कष्ट का उपयोग करना चाहते हैं कि उन्होंने अपने शरीर को अनुशासित कर लिया है और उनके पास सत्य वास्तविकता है, उनका लक्ष्य सत्य के अभ्यास को कष्ट सहने के कार्य से बदलना होता है। कुछ लोग ऐसे इसलिए होते हैं क्योंकि उनकी मंशाएँ और महत्वाकांक्षाएँ समस्यात्मक होती हैं, और दूसरे लोग ऐसे इसलिए होते हैं क्योंकि उनकी समझ समस्यात्मक होती है। समस्या चाहे जहाँ भी हो, यदि तुमने सत्य की समझ प्राप्त नहीं की है, तो जो कष्ट तुम सहते हो उसका कोई मूल्य नहीं है। दूसरे लिहाज से, जो कष्ट तुम सहते हो वह यदि खुद पैदा किया गया है, तो उसका बिल्कुल भी कोई महत्व नहीं है। यह वह कष्ट नहीं है जिसका इंतजाम परमेश्वर ने तुम्हारे लिए किया है, न ही यह वह कष्ट है जिसे एक सामान्य व्यक्ति के रूप में, सत्य का अनुसरण करने के लिए तुम्हें सहना ही चाहिए। इसलिए, तुम्हारे द्वारा सहे जाने वाले कष्ट का बिल्कुल भी कोई महत्व नहीं है। अपनी मंजिल की खातिर या रुतबे की खातिर कष्ट सहना उचित नहीं है। यह व्यर्थ है और पूरी तरह से महत्वहीन है; परमेश्वर इसे स्वीकार नहीं करता और वह इसे याद नहीं रखता। तो फिर अपना कष्ट सार्थक बनाने के लिए तुम्हें कौन-सा कष्ट सहना चाहिए? सत्य का अभ्यास करने के लिए कष्ट सहना, अपना स्वभाव बदलने के लिए कष्ट सहना और उद्धार पाने के लिए कष्ट सहना सार्थक है—यही वह कष्ट है जिसे तुम्हें जरूर सहना चाहिए। यदि तुम अपने रुतबे की रक्षा करने और मानवीय धारणाएँ और कल्पनाएँ पूरी करने के लिए कष्ट सहते हो, तो तुम्हारे द्वारा सहे जाने वाले कष्ट का बिल्कुल भी कोई महत्व नहीं है; यह अनावश्यक है। “अनावश्यक” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि यह पूरी तरह से गैर-जरूरी है। तुम भटक गए हो और तुम जिस मार्ग पर चलते हो, वह गलत है। तुम चाहे कितना भी कष्ट सहो या कितनी भी बड़ी कीमत चुकाओ, परमेश्वर उसे बिल्कुल याद नहीं रखता और परमेश्वर उसे स्वीकार नहीं करता। चूँकि तुम्हारे कष्ट का सत्य का अभ्यास करने से कोई लेना-देना नहीं है, उद्धार पाने से कोई लेना-देना नहीं है और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने से कोई लेना-देना नहीं है, इसलिए परमेश्वर उस पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता। क्या तुम समझते हो? (हाँ।) यह सबसे बेकार और अर्थहीन किस्म का कष्ट है।

एक और प्रकार का कष्ट भी है, जो मनुष्य में भ्रष्ट स्वभावों के होने के कारण होता है। मनुष्य का जीवन, उसका अनुसरण और वह मार्ग जिस पर वह चलता है, सभी उसके भ्रष्ट स्वभावों द्वारा नियंत्रित होते हैं। चूँकि मनुष्य में भ्रष्ट स्वभाव हैं, इसलिए उसमें अनिवार्य रूप से विद्रोहीपन और प्रतिरोध होता है; चूँकि मनुष्य में भ्रष्ट स्वभाव हैं, इसलिए वह अभी भी शैतान की शक्ति के अधीन जी रहा है। यदि मनुष्य अपने भ्रष्ट स्वभाव त्यागना और उद्धार पाना चाहता है, तो उसे परमेश्वर का न्याय और ताड़ना स्वीकार करने की आवश्यकता है और उसे बहुत अधिक काट-छाँट और अनुशासन का, और साथ ही परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित विभिन्न परीक्षणों और शोधन का अनुभव अवश्य करना चाहिए। कुछ लोगों को तो कुछ महाक्लेशों का भी अनुभव करना पड़ता है। यह सब मनुष्य को सत्य प्राप्त करने, अपने शैतानी स्वभाव त्यागने और अंततः उद्धार पाने में सक्षम बनाने के लिए है; यह किसी के लिए भी उद्धार पाने की आवश्यक प्रक्रिया है। अपने भ्रष्ट स्वभाव त्यागने और उद्धार पाने के लिए हर भ्रष्ट मनुष्य को बहुत अधिक कष्ट सहना ही चाहिए। एक लिहाज से, जब वह अपना कर्तव्य निभाते समय भ्रष्ट स्वभावों को प्रकट करता है, तब उसे न्याय और ताड़ना स्वीकार करनी होगी, काट-छाँट स्वीकार करनी होगी और परीक्षण और शोधन स्वीकार करने होंगे; यह वह कष्ट है जिसे सहा ही जाना चाहिए। दूसरे लिहाज से, अपने कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने के लिए, लोगों को कुछ व्यक्तिगत दोषों और अपनी स्थितियों की कमियों से पार पाना चाहिए और उन्हें कुछ पेशेवर ज्ञान प्राप्त करने चाहिए। इसके लिए भी लोगों को कष्ट सहने और कीमत चुकाने की आवश्यकता होती है। विशेष रूप से जब लोग खराब जीवन-स्थितियों वाले खतरनाक परिवेशों में कर्तव्य निभाते हैं, तब उन्हें कुछ कष्ट भी सहना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, जब लोग अपने कर्तव्य निभाते समय शैतानी स्वभावों में जीते हैं, तब वे अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं, यहाँ तक कि वे ऐसी चीजें भी करते हैं जो विघ्न-बाधाएँ पैदा करती हैं, इसलिए उन्हें हर दिन आत्म-चिंतन करने और परमेश्वर के वचनों का न्याय और ताड़ना स्वीकार करने की आवश्यकता है। उन्हें ताड़ना पाने, अनुशासित होने और शोधन किए जाने का कष्ट, या बेनकाब होने, बर्खास्त किए जाने और हटाए जाने का कष्ट भी सहना पड़ता है। यह सारा कष्ट वह है, जिसे लोगों को सहना ही चाहिए। यदि तुम यह कष्ट नहीं सहते, तो तुम्हारे लिए अंततः अपने भ्रष्ट स्वभाव त्यागना और उद्धार पाना बहुत कठिन होगा। चाहे वह परमेश्वर के वचनों द्वारा उजागर किया जाना और न्याय किया जाना हो, भाई-बहनों द्वारा काट-छाँट किया जाना हो या लोगों का परीक्षण करने और उनका शोधन करने के लिए परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित परिवेशों का सामना करना हो, ये सभी ऐसे प्रकार के कष्ट हैं जिन्हें लोगों को सहना ही चाहिए। ये वे प्रक्रियाएँ हैं, जिनका हर भ्रष्ट मनुष्य को उद्धार पाने के लिए अनुभव करना ही चाहिए, और ये सभी सार्थक और मूल्यवान हैं। इस प्रकार के कष्ट सहने का उद्देश्य यह है कि तुम अंततः उद्धार पा सको और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सको। यह बिल्कुल भी किसी प्रकार की व्यक्तिगत पूँजी नहीं है, क्योंकि तुम यह कष्ट अन्य लोगों की खातिर नहीं सह रहे हो। तुम अपना कर्तव्य अपने लिए निभाते हो, तुम सत्य का अभ्यास अपने लिए करते हो और तुम अपनी ही खातिर परमेश्वर के लिए खुद को खपाते और सभी प्रकार के कष्ट सहते हो। इसके अलावा, तुम्हारा अपने भ्रष्ट स्वभाव हल करने के लिए सत्य का अभ्यास करना, अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं के खिलाफ विद्रोह करना, अपनी विभिन्न प्राथमिकताओं और माँगों को छोड़ना, आदि—यह सब इसलिए है ताकि तुम अंततः उद्धार पा सको, परमेश्वर के प्रति समर्पण प्राप्त कर सको और ऐसा व्यक्ति बन सको जो परमेश्वर की आराधना करता है। तुम यह कष्ट इसलिए सहते हो, ताकि अंत में तुम जीवित बच सको और नई मानवजाति के सदस्य बन सको; हालाँकि यह मूल्यवान है, लेकिन यह परमेश्वर के लिए कोई योगदान नहीं है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह कोई योगदान नहीं है? क्योंकि तुम्हारे द्वारा सहा जाने वाला कष्ट किसी प्रकार की व्यक्तिगत पूँजी नहीं है; तुम इसे पूरी तरह से अपनी ही खातिर सहते हो। यह बिल्कुल खाने-पीने जैसा है : तुम केवल इसलिए खाते-पीते हो, ताकि तुम जीवित रह सको। तुम अपने दैनिक जीवन के दौरान जो भी गतिविधि करते हो, वह तुम्हारा भौतिक जीवन और अस्तित्व बनाए रखने के लिए होती है। वह अन्य लोगों के लिए नहीं होती, बल्कि केवल तुम्हारे अपने लिए होती है। इसलिए, भले ही तुम बहुत अधिक कष्ट सहते हो और भले ही तुम कुछ कठिन प्रक्रियाओं का अनुभव करते हो, इसका मतलब यह नहीं कि तुमने किसी प्रकार की व्यक्तिगत पूँजी प्राप्त कर ली है। यह उल्लेख करने लायक नहीं है—यह तो तुम्हें सहना ही चाहिए। तुम यह नहीं कह सकते, “जब मैं खाता हूँ, तब मैं इसे परमेश्वर के लिए करता हूँ, और मैं अपना जीवन परमेश्वर के लिए जीता हूँ!” तुम ये चीजें परमेश्वर की खातिर नहीं करते; तुम इन्हें अपने लिए करते हो। इसमें शेखी बघारने लायक कुछ नहीं है। इसलिए, कुछ लोग हमेशा कहते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने और अपना कर्तव्य निभाने की खातिर उन्होंने अपनी नौकरियाँ त्याग दी हैं और अपनी पढ़ाई छोड़ दी है, या वे इस बारे में बात करते हैं कि उन्होंने कितनी काट-छाँट सही है, छिपकर कितने आँसू बहाए हैं और गुप्त रूप से कितना कष्ट सहा है। वे यह सोचते हुए हमेशा इन चीजों का उल्लेख करते हैं कि अपना कर्तव्य निभाने और उद्धार पाने की खातिर उन्होंने जो बहुत अधिक कष्ट सहा है, वह व्यक्तिगत पूँजी का एक रूप है। यह पूरी तरह से गलत है। भ्रष्ट मनुष्यों को उद्धार पाने के लिए कष्ट सहना ही चाहिए; यह ठीक ही है कि तुम कष्ट सहते हो। यह ठीक क्यों है? क्योंकि तुम शैतान द्वारा बहुत गहराई तक भ्रष्ट किए गए हो, तुममें भ्रष्ट स्वभाव हैं और तुममें शैतानी प्रकृति है। यदि तुम्हें उद्धार पाना है और सत्य स्वीकार करने और यह समझने में सक्षम होना है कि तुम कितनी गहराई तक भ्रष्ट किए गए हो, तो तुम्हें बहुत अधिक पीड़ा सहनी होगी; विशेष रूप से, अपने भ्रष्ट स्वभाव त्यागने के लिए और भी अधिक दर्द सहने की आवश्यकता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई स्त्री बच्चे को जन्म देती है : उसे प्रसव-पीड़ा से गुजरना पड़ता है और बच्चे को जन्म देने का कष्ट सहना पड़ता है। तुम चाहकर भी इससे बच नहीं सकते। उद्धार पाने के लिए तुम जो कष्ट सहते हो, वह तुम अपनी ही खातिर सहते हो; तुम यह नहीं कह सकते कि तुम परमेश्वर के लिए पीड़ा सह रहे हो। तुम अपने ही उद्धार की खातिर न्याय और ताड़ना, काट-छाँट, और परीक्षण और शोधन सहते हो। यह वह कष्ट है जिसे तुम्हें सहना ही चाहिए, और यह एक आवश्यक प्रक्रिया है। इसलिए, इस बात की शेखी मत बघारो कि तुमने अपना कर्तव्य निभाने के लिए कितना कष्ट सहा है, तुमने उद्धार पाने के लिए कितना कष्ट सहा है, तुमने परमेश्वर के घर के लिए कितना काम किया है, तुमने परमेश्वर के लिए कितनी भाग-दौड़ की है या तुमने सुसमाचार का प्रचार करके कितने लोगों को प्राप्त किया है। इनमें से कुछ भी व्यक्तिगत पूँजी होने के बराबर नहीं है और तुम्हें इन चीजों का श्रेय लेने का दावा कदापि नहीं करना चाहिए। तुम यह तक नहीं जानते कि तुमने सत्य प्राप्त किया है या नहीं और तुम यह भी नहीं जानते कि तुम्हारा स्वभाव बदला है या नहीं, फिर भी तुम हमेशा ऐसी चीजों का श्रेय लेने की कोशिश करते हो। यह कोई विवेक न होने की अभिव्यक्ति है। यदि तुम श्रेय लेने का दावा करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें अभी सौ गुना प्रतिफल दे सकता है, तुम्हें भौतिक रूप से समृद्ध जीवन और दैहिक सुख दे सकता है और तुम्हें मानव संसार की महिमा और धन-दौलत का आनंद लेने दे सकता है। लेकिन यदि तुम परमेश्वर में केवल इसलिए विश्वास करते हो ताकि बदले में तुम्हें ये चीजें मिल जाएँ, और तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव त्यागे नहीं जा सकते और तुम उद्धार प्राप्त नहीं कर पाओगे। तुम इस जीवन का आनंद ले सकते हो, लेकिन परमेश्वर तुम्हें आगामी दुनिया में प्रवेश नहीं करने देगा। लेकिन यदि तुम परमेश्वर में विश्वास इस जीवन का आनंद लेने के लिए नहीं, बल्कि उद्धार पाने और नई मानवजाति का सदस्य बनने के लिए और अपने भ्रष्ट स्वभाव त्यागने और परमेश्वर की आराधना करने वाला सृजित प्राणी बनने के लिए करते हो, तो तुम जो कष्ट सहते हो वह तुम्हें सहना ही चाहिए, और इससे ज्यादा उल्लेखनीय यह नहीं है। इसे किसी के भी सामने उठाना कोई विवेक न होने की अभिव्यक्ति होगा। तुम्हारे कष्ट सहने का लक्ष्य, मूल्य और महत्व तुम्हारे ही उद्धार पाने के लिए है; इसमें शेखी बघारने लायक कुछ नहीं है। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।) कुछ लोग हमेशा इस बारे में बात करते हैं कि जब से उन्होंने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया है, तब से उन्होंने कितनी भाग-दौड़ की है और कितना कष्ट सहा है, और उन्होंने कितनी काट-छाँट, न्याय और ताड़ना का अनुभव किया है। वे हमेशा अपने कष्ट सहने के “गौरवशाली इतिहास” पर इतराते रहते हैं। मैं तुम्हें बताता हूँ : यह शर्मनाक, घृणित और जी मिचलाने वाला है! ये सभी वे चीजें हैं जो तुम्हें करनी और सहनी चाहिए। तुम्हें खुद को सही ठहराने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। तुमने किसी के सामने कोई श्रेय नहीं कमाया है। अगर तुम कलीसिया का कार्य करते हो, किसी कलीसिया की अगुआई करते हो और लोगों को कुछ सहारा और मदद प्रदान करते हो तो भी, वह केवल तुम्हारी जिम्मेदारी का हिस्सा है और वह है जो तुम्हें करना चाहिए। ऐसा क्यों है? एक बात तो यह है कि, तुम एक मानव का कर्तव्य निभा रहे हो। दूसरी बात, अगर तुम लोगों को सहारा देते हो, उनकी मदद करते हो और उनका भरण-पोषण करते हो तो भी, वह सत्य समझने के बाद एक मानव के रूप में केवल अपने दायित्व पूरे करना और दूसरों को उससे लाभ उठाने देना है। लेकिन सत्य तुम्हारा नहीं है; वह परमेश्वर से आता है। तुमने केवल उसे प्रसारित और साझा किया है। सत्य तुम्हारी निजी संपत्ति नहीं है; वह परमेश्वर का जीवन है और वह परमेश्वर का पोषण है। इसलिए, जब तुम लोगों को सहारा देने और उनकी मदद करने के लिए कलीसिया का कार्य करते हो, तो वह किसी प्रकार का श्रेय नहीं है; तुम एक दायित्व और एक जिम्मेदारी पूरी कर रहे हो। यदि तुम उसे अच्छी तरह से करते हो, तो तुम केवल अपना दायित्व पूरा कर रहे हो और तुममें थोड़ा जमीर और विवेक है। इसमें शेखी बघारने लायक कुछ नहीं है। यदि तुम उसे अच्छी तरह से नहीं करते, तो तुम्हें अपनी जाँच करनी चाहिए और आत्म-चिंतन करना चाहिए। कलीसिया का कार्य करते समय तुमने कभी चाहे कितने भी लोगों की अगुआई की हो या तुमने कभी चाहे कितने भी लोगों को सहारा दिया हो और उनकी मदद की हो, परमेश्वर की नजर में ये केवल उसके द्वारा याद रखे जाने वाले अच्छे कर्म हैं। लेकिन जहाँ तक लोगों का संबंध है, तुमने उनके साथ कोई श्रेय बिल्कुल नहीं कमाया है। अगर यह काम करते समय तुमने बड़ी कीमत भी चुकाई, बहुत कष्ट भी सहा और पर्दे के पीछे अपनी बहुत सारी नींद भी गँवाई, यहाँ तक कि तुममें से कुछ बीमार भी पड़ गए और बीमारी की पीड़ा भी झेली, तो भी इसका मतलब यह नहीं कि तुमने कोई श्रेय कमाया है। यह सारा कष्ट वह है जिसे भ्रष्ट मनुष्यों को उद्धार पाने से पहले सत्य प्राप्त करने के लिए सहना ही चाहिए; यह जरा भी शेखी बघारने लायक नहीं है। इसलिए, तुम्हें इसके लिए महिमा की माँग नहीं करनी चाहिए, न ही तुम्हें इसके लिए श्रेय की माँग करनी चाहिए। मैंने इतने वर्षों तक तुम लोगों के साथ सत्य पर संगति की है और तुम लोगों को पोषण प्रदान किया है, फिर भी मुझे नहीं लगता कि मैंने तुम लोगों के साथ कोई श्रेय कमाया है। इस बीच तुमने कष्ट सहकर और कीमत चुकाकर केवल सत्य समझा है और फिर उसे दूसरों के साथ साझा किया है—क्या इसका मतलब यह है कि तुमने कोई श्रेय कमाया है? अगर तुम्हारे कार्य दूसरों के लिए कुछ मददगार भी रहे हों तो भी, यह केवल परमेश्वर के वचनों और सत्य द्वारा प्राप्त किया गया परिणाम है। यदि परमेश्वर ने ये वचन या ये सत्य व्यक्त न किए होते, तो लोगों की मदद करने के लिए तुम्हारे पास क्या होता? तुमने लोगों को केवल भ्रष्टता और मानवीय धारणाएँ और कल्पनाएँ प्रदान की होतीं; सत्य नहीं। सत्य केवल परमेश्वर से आ सकता है। सत्य का स्रोत परमेश्वर है और वही वह स्रोत है जो मानवजाति को जीवन प्रदान करता है। तुम परमेश्वर से, उस स्रोत से पानी की एक बूँद प्राप्त करते हो और फिर उसे अन्य लोगों के साथ साझा करते हो। अगर यह उनकी प्यास बुझा दे तो भी, तुमने केवल अपनी जिम्मेदारी और दायित्व पूरा किया है। उन लोगों के लिए यह किसी प्रकार का अनुग्रह, कृपा, दान या पोषण बिल्कुल नहीं है; ज्यादा से ज्यादा, यह केवल मदद है। तुमने केवल वह जिम्मेदारी पूरी की है, जो एक सृजित प्राणी को पूरी करनी चाहिए। अपने अनुभवों के माध्यम से तुम परमेश्वर के वचन और परमेश्वर के इरादे दूसरों के साथ साझा करते और उन तक पहुँचाते हो, जिससे उन्हें उनसे पोषण और आपूर्ति प्राप्त हो सके। इस प्रकार, मेरी नजर में, सत्य स्वीकार करने और उद्धार पाने की अवधि में भ्रष्ट मनुष्यों द्वारा सहा जाने वाला कोई भी कष्ट उन्हें सहना ही चाहिए। चूँकि मनुष्य में भ्रष्ट स्वभाव हैं और उसे शैतान द्वारा नष्ट और भ्रष्ट किया गया है, शैतान द्वारा बुरी तरह से पैरों तले रौंदा गया है और उसमें शैतान के विभिन्न विचार और दृष्टिकोण और उसके अपसिद्धांत और भ्रांतियाँ डाली गई हैं और वह उनसे प्रभावित है, इसलिए मानवों के लिए सत्य स्वीकार करना कठिन है। मानव द्वारा सत्य स्वीकार करने और उद्धार पाने की प्रक्रिया एक गंभीर रूप से बीमार मरीज द्वारा इलाज करवाने जैसी है : उसे कष्ट सहना ही पड़ता है, जिसके बिना वह ठीक नहीं हो सकता। उद्धार पाने के लिए भ्रष्ट मनुष्यों को सत्य स्वीकार करना चाहिए, न्याय और ताड़ना स्वीकार करनी चाहिए और परीक्षण और शोधन स्वीकार करना चाहिए। बहुत अधिक कष्ट सहकर ही वह अंततः एक पूर्ण परिवर्तन से गुजर सकता है और नई मानवजाति का सदस्य बन सकता है। कष्ट के विभिन्न परिवेशों से गुजरे बिना मनुष्य के लिए इतने स्वाभाविक रूप से और सहजता से सत्य स्वीकार करना असंभव है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव गहरी जड़ें जमा चुके हैं और पहले ही उसका जीवन बन चुके हैं। इसलिए, अपने भ्रष्ट स्वभावों के खिलाफ विद्रोह करने, विभिन्न मानवीय महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं के खिलाफ विद्रोह करने, विभिन्न भ्रामक मानवीय विचार और दृष्टिकोण छोड़ने और सत्य स्वीकार करने के लिए मनुष्य को विभिन्न प्रकार के कष्टों का शोधन स्वीकार करना ही चाहिए और बहुत अधिक पीड़ा सहनी ही चाहिए। इस कष्ट के बदले में मनुष्य को जो मिलता है, वह है उद्धार और अपने भ्रष्ट स्वभावों का त्याग; उसे जो मिलता है, वह है सत्य के प्रति समर्पण और परमेश्वर की सच्ची आराधना; उसे जो मिलता है, वह है उसे, एक सृजित प्राणी को परमेश्वर की मान्यता। इसलिए, यह कष्ट अत्यंत मूल्यवान है। अपने भ्रष्ट स्वभाव त्यागने के लिए तुम चाहे किसी भी प्रकार का कष्ट सहो, एक बात याद रखो : यह वह कष्ट है जिसे तुम्हें सहना चाहिए और तुम्हें इसका हर जगह ढिंढोरा नहीं पीटना चाहिए। यदि यह कष्ट वह है जिसे तुम स्वेच्छा से सहते हो और वह है जिसे तुम्हें सहना ही चाहिए, तो तुम्हें इसके प्रति सही नजरिया अपनाना चाहिए और इसे परमेश्वर से स्वीकार करना चाहिए। तुम्हें इसे अपनी सच्ची समझ और अद्भुत अनुभवों में बदलना चाहिए और दिखावा करने और अपने लिए व्यक्तिगत पूँजी बटोरने के लिए अपने कष्ट के अनुभवों के बारे में बात करने के बजाय इसके बारे में लिखकर या बोलकर इसे दूसरों के साथ साझा करना चाहिए। तुम चाहे कितना भी कष्ट सहो, यह तुम्हारी व्यक्तिगत पूँजी नहीं है और इसका मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे पास वरिष्ठता है। किसी व्यक्ति में अंततः उद्धार पाने की योग्यता है या नहीं, इसे परमेश्वर इस बात से नहीं मापता कि वह कितना कष्ट सहता है। क्या कष्ट को इस तरह से देखना सही है? (हाँ।)

मुझे बताओ, क्या कष्ट सहने के संबंध में ये विचार और दृष्टिकोण, जिनके बारे में मैंने बात की है, जो मनुष्य के पास होने चाहिए, सत्य के अनुरूप हैं? (हाँ।) क्या कष्ट सहने को इसी तरह से नहीं देखा जाना चाहिए? (हाँ।) यदि तुम चीजों को इस तरह से देख सकते हो, तो तुम्हारे कार्यों में तर्क-बुद्धि और मानवता होगी और तुम्हारा घमंडी स्वभाव काफी कम हो जाएगा। पहले सही विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकार करो और फिर इन विचारों और दृष्टिकोणों का उपयोग अपनी भ्रष्टता से तुलना करने और उसे हल करने के बिंदु के रूप में करो। जब तुम चीजें करते हो, तब इन विचारों और दृष्टिकोणों के अभ्यास के सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करो, और तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव तुम्हें पता चले बिना ही हल हो जाएँगे। ज्यादातर समय, भ्रष्ट स्वभाव व्यक्ति द्वारा एक सही विचार और दृष्टिकोण स्वीकार करने पर त्यागे जाते हैं, पहले उसके दृष्टिकोणों में बदलाव आता है और फिर धीरे-धीरे उसके काम करने के तरीके और उसके स्वभावगत प्रकाशनों में बदलाव आता है। कष्ट सहने के मामले में पहले तुम्हें सही विचार और दृष्टिकोण रखने चाहिए और इस बारे में निश्चित होना चाहिए कि कष्ट सहना आखिर है क्या, तुम कष्ट क्यों सहते हो और क्या तुम्हारे कष्ट सहने का लक्ष्य और दिशा सही हैं। यदि तुम कष्ट सहने पर सही विचार और दृष्टिकोण रखते हो और तुम उसे इसलिए सहते हो ताकि तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव त्याग सको और सत्य सिद्धांतों का पालन कर सको, और इस कष्ट को सहने में तुम परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण कर रहे हो, तो यह कष्ट एक ऐसा दायित्व है जिसे एक सृजित प्राणी के रूप में तुम्हें पूरा करना चाहिए। यह वह अभ्यास है जो तुम्हें करना चाहिए, और यह तुम्हारा कर्तव्य भी है; यह वह है जो एक सच्चे सृजित प्राणी के रूप में तुम्हें करना चाहिए। यह वह जिम्मेदारी है जिससे तुम जी नहीं चुरा सकते; यानी, यह कष्ट वह है जो तुम्हें सहना चाहिए। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे, जब माता-पिता बच्चों को जन्म देते हैं, तब उन्हें उनका पालन-पोषण करना होता है; उनके वयस्क होने तक उनका पालन-पोषण करना माता-पिता की जिम्मेदारी है। अपने बच्चों का पालन-पोषण करने के दौरान वे चाहे कितना भी कष्ट सहें, यह वह जिम्मेदारी है जिसे माता-पिता को पूरा करना चाहिए, और इसमें शेखी बघारने लायक कुछ नहीं है। लोगों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने बच्चों को इसी तरह पाला है। बच्चों को पालने के लिए व्यक्ति को यह पीड़ा सहनी पड़ती है, जो अपने आप में एक जिम्मेदारी है। उद्धार प्राप्त करने, सत्य का अभ्यास करने और सत्य सिद्धांतों को बनाए रखने और अपनी गवाही में अडिग रहने के लिए लोगों को भी बहुत कष्ट सहना पड़ता है। लेकिन एक बात निश्चित है : यह कष्ट निरर्थक बलिदान बिल्कुल नहीं है, और यह अर्थहीन कष्ट नहीं है; बल्कि, यह सार्थक और मूल्यवान है। यदि तुम्हारे कष्ट सहने का लक्ष्य परमेश्वर की गवाही देना, सत्य के अस्तित्व की रक्षा करना, सकारात्मक चीजों के अस्तित्व की रक्षा करना और न्यायसंगत कार्यों के अस्तित्व की रक्षा करना और सत्य सिद्धांतों को बनाए रखना और इस तरह अपनी गवाही में अडिग रहना है, तो जो कष्ट तुम सहते हो वह मूल्यवान और सार्थक है। यदि तुम्हारे कष्ट सहने का लक्ष्य सही और सकारात्मक है, तो यह कष्ट वह है जो तुम्हें सहना चाहिए। इसका क्या अर्थ है कि यह वह है जो तुम्हें सहना चाहिए? इसका अर्थ है कि यह वह जिम्मेदारी है जो तुम्हें उठानी चाहिए और वह दायित्व है जिसे एक मानव के रूप में और परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन एक सृजित प्राणी के रूप में तुम्हें पूरा करना चाहिए; एक शब्द में, तुम "कर्तव्यबद्ध" हो। कर्तव्यबद्ध होने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कुछ भी माँगे बिना, सौदा करने की कोशिश किए बिना और श्रेय पाने की कोशिश किए बिना कुछ करना; यह बस वह है जो तुम्हें करना चाहिए। यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे जब परमेश्वर ने नूह को जहाज बनाने का आदेश दिया था। नूह ने जहाज बनाने के लिए एक सौ बीस साल की कीमत चुकाई, लेकिन उसने किससे श्रेय लेने की कोशिश की? उसने किसी से श्रेय लेने की कोशिश नहीं की। उन एक सौ बीस वर्षों में जहाज बनाते समय उसने कितना कष्ट सहा? उसने चाहे कितना भी कष्ट सहा हो, परमेश्वर की नजर में, इस आदेश को स्वीकार करने में उसने जो भी कष्ट सहा, वह उसे सहना ही चाहिए था। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह एक मानव था, और यह जिम्मेदारी उठाते हुए उसे यह पीड़ा स्वीकार करनी पड़ी, और यह पीड़ा और उसकी जिम्मेदारी एक ही समय पर प्रकट हुईं और एक साथ चलीं। एक मानव के रूप में, एक बार जब तुम परमेश्वर का आदेश स्वीकार कर लेते हो, तब तुम्हें उसमें शामिल हर प्रकार की पीड़ा स्वीकार करनी होती है; ऐसा करने के लिए तुम कर्तव्यबद्ध होते हो। नूह को अंततः अपने कष्ट के बदले में क्या मिला? वह जहाज में जीवित बच पाया और मानवजाति की अगली पीढ़ी का पूर्वज बन पाया; उसने अपने कष्ट के बदले अपना जीवन बचाया। इसलिए, जहाज बनाते समय उसने चाहे कितना भी कष्ट सहा हो, उसे कभी नहीं लगा कि यह मानवजाति या परमेश्वर के लिए कोई योगदान था। उसके पास तर्क-बुद्धि थी; उसने कभी ऐसी बातें नहीं कहीं। उसे लगा कि यह परमेश्वर का उद्धार और परमेश्वर का अनुग्रह था। आज की मानवजाति का भी यही रवैया होना चाहिए। यदि तुम स्वेच्छा से अपना कर्तव्य निभाते हो और स्वेच्छा से परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करते हो, और चाहे तुम कोई भी कर्तव्य करो या अपना कर्तव्य निभाने में तुम कितना भी कष्ट सहो और कुछ भी अनुभव करो, तुम्हारा लक्ष्य सृष्टिकर्ता द्वारा तुम्हें दिया गया आदेश और कर्तव्य पूरा करना और उद्धार प्राप्त करना है, तो तुम्हें कौन-सा कष्ट नहीं सहना चाहिए? तुम जो भी कष्ट सहते हो, वह एक ऐसी जिम्मेदारी और दायित्व है, जिसे तुम्हें पूरा करना चाहिए। साफ तौर पर कहें तो, इसे सहना तुम्हारी जिम्मेदारी और दायित्व है; यह शेखी बघारने लायक नहीं है। लोग हमेशा सोचते हैं, "मैंने कष्ट सहा है और कीमत चुकाई है। मुझे अपनी तारीफ करनी चाहिए; मुझे परमेश्वर को बताना चाहिए, और मुझे लोगों को बताना चाहिए, ताकि लोगों के दिलों में मेरी अच्छी छाप पड़े, और लोगों के बीच मेरा रुतबा और प्रतिष्ठा ऊँची हो।" यह फालतू और अनावश्यक है। कष्ट के माध्यम से तुमने वह सब पहले ही प्राप्त कर लिया है, जो तुम्हें प्राप्त करना चाहिए था। परमेश्वर तुम्हें जो सत्य और जीवन प्रदान करता है, वे सबसे अनमोल चीजें हैं। कोई प्रतिष्ठा, रुतबा या दूसरों से मिलने वाला उच्च सम्मान तुम्हारे द्वारा हासिल किए गए सत्य की बराबरी नहीं कर सकता। चूँकि तुमने पहले ही सबसे अनमोल चीज प्राप्त कर ली है, तो क्या अब भी दूसरों से आदर पाने के लिए अपने कष्ट और चुकाई गई कीमत के बारे में शेखी बघारने की कोई जरूरत है? इसकी कोई जरूरत नहीं है। चूँकि तुम सत्य प्राप्त करने और उद्धार पाने के लिए कष्ट सहते और कीमत चुकाते हो, इसलिए तुम्हें इस कष्ट को सहने के बारे में शेखी नहीं बघारनी चाहिए। जमीर और विवेक वाले लोग इस मामले को सही ढंग से लेंगे। और तो और, यदि तुम कष्ट के माध्यम से अधिक सत्य समझने लगते हो और तुम परमेश्वर के इरादे अधिक सटीकता से समझने लगते हो, तो तुम अपने लिए इन परिवेशों का इंतजाम करने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद दोगे और अपने द्वारा सहे गए कष्ट के लिए आभारी होगे। तुम कहोगे, "शुक्र है कि कष्ट के वे परिवेश थे। शुक्र है कि परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित की गई वे बीमारियाँ, निराशाएँ, असफलताएँ, बर्खास्तगी, काट-छाँट और न्याय और ताड़ना थीं। शुक्र है कि ये चीजें मेरे साथ रहीं।" यदि तुम्हारे साथ कष्ट के ये परिवेश न होते, तो तुम्हारे पास संभवतः वे लाभ न होते जो आज तुम्हारे पास हैं। तुम्हें परमेश्वर को धन्यवाद देना चाहिए, न कि कष्ट को ऐसी पूँजी मानना चाहिए जिसका उपयोग तुम श्रेय लेने और दूसरों के सामने बखान करने के लिए कर सको। देखो, जब मनुष्य को ऐसी किसी विशेष प्रकार की चीज की सटीक समझ होती है जो सत्य के अनुरूप होती है, तब ऐसी चीजों पर उसके दृष्टिकोण सटीक हो जाएँगे, उसका रुख सही होगा और उसकी तर्क-बुद्धि सामान्य हो जाएगी। मनुष्य की तर्क-बुद्धि में असामान्यता का मूल कारण यह है कि कई चीजों पर उसकी राय, दृष्टिकोण, रुख और परिप्रेक्ष्य भ्रामक होते हैं और शैतान द्वारा मनुष्य में डाले गए विचारों और दृष्टिकोणों पर आधारित होते हैं। इसलिए तुम भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों का उपयोग करते हो और इन चीजों को भ्रामक परिप्रेक्ष्य से देखते हो। तुम्हें हमेशा लगता है कि कष्ट सहने में तुम्हारे साथ बहुत अन्याय हुआ है और तुम्हारा इस्तेमाल किया गया है; तुम हमेशा खुद को सही साबित करना चाहते हो, हमेशा किसी के सामने अपनी शिकायतें उड़ेलना चाहते हो और हमेशा दूसरों से अपना उच्च सम्मान करवाना चाहते हो और उनके उच्च सम्मान से संतुष्टि का एहसास पाना चाहते हो। लेकिन अब चूँकि तुम कष्ट का मूल्य और महत्व पहचानते हो, इसलिए तुम परमेश्वर से आने वाले कष्ट को सही ढंग से स्वीकार कर सकते हो और अब तुम उसके प्रतिरोधी नहीं रहते। जब तुम्हारा आध्यात्मिक कद थोड़ा और बढ़ जाएगा और तुम्हारा जीवन कुछ हद तक बढ़ जाएगा, तब तुममें से कुछ पतरस की तरह प्रार्थना करेंगे और माँगेंगे कि परमेश्वर की ताड़ना और न्याय तुम्हें कभी न छोड़ें। क्या अब तुम लोगों का यह आध्यात्मिक कद है? (अभी नहीं, लेकिन हम इसके लिए प्रयास करने को तैयार हैं।) बस सत्य का अनुसरण करते रहो और इसके लिए प्रयास करते रहो। जैसे-जैसे तुम सत्य को अधिक समझोगे, तुम्हारा आंतरिक रूप से चीजों को देखने का तरीका धीरे-धीरे बदल जाएगा, और तुम्हारा जीवन धीरे-धीरे बढ़ेगा।

कुछ लोगों को अपना कर्तव्य निभाने के दौरान ऐसी बीमारियाँ हो जाती हैं, जो असामान्य होती हैं या जिनका इलाज करना मुश्किल होता है। इन बीमारियों का अनुभव करने के माध्यम से वे अंततः कुछ हासिल करते हैं। बीमारी चाहे बिगड़े, वैसी ही रहे या ठीक हो जाए, संक्षेप में, इस कष्ट का अनुभव करने से वे अंततः जो हासिल करते हैं, वह है परमेश्वर के इरादों की समझ और विभिन्न दृष्टिकोणों से अपनी समस्याओं का ज्ञान। वे अब परमेश्वर और सत्य के साथ उन गलत रवैयों और तरीकों से पेश नहीं आते, जिनका वे पहले उपयोग करते थे। यह लाभ ऐसी चीज है, जिसे तुम किसी अन्य प्रकार के अनुभव से प्राप्त नहीं कर सकते—इसे केवल कष्ट सहने के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है। उस समय तुम यह कहते हुए इस बीमारी के लिए आभारी होगे, "सौभाग्य से मुझे यह बीमारी हो गई थी; अन्यथा मेरे लिए ऐसे लाभ प्राप्त करना असंभव होता।" तो, जब तुम दूसरों के साथ संगति करते हो और यह अनुभव साझा करते हो, तब तुम इस बारे में संगति कर रहे होगे कि तुमने अपने अनुभव से क्या प्राप्त किया, तुमने इससे क्या बटोरा, और इसमें लोगों को कौन-से सत्य समझने चाहिए, न कि तुम स्वयं द्वारा सहे गए कष्ट पर जोर दोगे। तुम दूसरों के सामने अपनी बड़ाई नहीं करोगे और अपने बारे में गवाही नहीं दोगे कि तुमने कितना कष्ट सहा, यह कितना तकलीफदेह था और अंततः तुमने कष्ट सहने का संकल्प कैसे किया। तुम यह अपने बारे में गवाही देने और अपनी तारीफ करने के लिए नहीं कर रहे होगे, बल्कि अपने अनुभव साझा करने और परमेश्वर की गवाही देने के लिए कर रहे होगे। कष्ट सहने के मुद्दे को इसी तरह से समझा जाना चाहिए। मुख्य बात यह है कि कष्ट सहने में तुम्हारा लक्ष्य क्या है और तुम्हारे कष्ट सहने का मूल्य और महत्व क्या है। लेकिन वह चाहे कुछ भी हो, लोग जो भी कष्ट सहें और कितना भी कष्ट सहें, उनका कष्ट कभी भी उनके लिए व्यक्तिगत पूँजी का रूप नहीं हो सकता। इसके अलावा, भ्रष्ट मनुष्य देह में जीते हैं। अगर तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते तो भी, क्या तुम लोगों के बीच जीवित रहने के लिए कष्ट नहीं सहते? (हाँ, हमें इसके लिए भी कष्ट सहना पड़ता है।) क्या देह के लिए बिल्कुल भी कष्ट न सहना संभव है? (नहीं।) अगर कोई परमेश्वर में विश्वास नहीं करता, तो भी उसे बहुत कष्ट सहना पड़ता है। प्रसिद्धि, लाभ, रुतबे, शैक्षिक सफलता और धन-दौलत के अपने अनुसरण में, और साथ ही बच्चों का पालन-पोषण करने आदि में भी—इन सभी चीजों में कष्ट सहना शामिल होता है। कौन कष्ट नहीं सहता? इस मानव संसार में रहते हुए लोगों को कष्ट सहना ही पड़ता है; बात बस यह है कि कोई कष्ट सहना मूल्यहीन होता है—ऐसा कष्ट, जिसमें लोग जीवित रहने की खातिर और प्रसिद्धि और लाभ के लिए भाग-दौड़ करते हैं, एक-दूसरे से होड़ करते हैं, एक-दूसरे को बाहर निकालने की कोशिश करते हैं और एक-दूसरे को फँसाते हैं। अंत में, जब वे आखिरकार अपनी प्रसिद्धि, लाभ और रुतबा पाने में सफल हो जाते हैं, तब वे हमेशा उन्हें खोने के बारे में चिंतित रहते हैं और अपना रुतबा न खोने के लिए और अधिक कष्ट सहते हैं। बड़ी मुश्किल से वे अपना रुतबा बनाए तो रखते हैं, लेकिन वे शारीरिक और मानसिक रूप से थक जाते हैं और भावनात्मक रूप से सूख जाते हैं। इस दुनिया में अमीर और गरीब दोनों कष्ट सहते हैं। अमीरों के अपने कष्ट होते हैं और गरीबों के भी अपने कष्ट होते हैं। संक्षेप में, इस मानव संसार में रहना आसान नहीं है; यहाँ हर कोई कष्ट सहता है। परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग अपने जीवन और अस्तित्व के मामले में अपेक्षाकृत कम कष्ट सहते हैं, क्योंकि सत्य स्वीकार करने के बाद उनके कई विचार और दृष्टिकोण अविश्वासियों से अलग हो जाते हैं और वे कई चीजें छोड़ने में सक्षम हो जाते हैं, वे अब व्यर्थ के बलिदान नहीं देते या निरर्थक संघर्षों में शामिल नहीं होते—इस प्रकार, वे इस संबंध में अपेक्षाकृत कम कष्ट सहते हैं। वे केवल भोजन और कपड़े पाकर संतुष्ट रहने में सक्षम होते हैं; वे अपना बाकी समय सत्य का अनुसरण करने, उद्धार का अनुसरण करने और सृजित प्राणियों के रूप में अपना कर्तव्य पूरा करने में बिताते हैं, है ना? (हाँ।) लोगों को अपने दैहिक जीवन के लिए कुछ कष्ट सहने पड़ते हैं : उन्हें थकान और बीमारी की पीड़ाएँ, दुनिया की विभिन्न दुष्ट प्रवृत्तियों का प्रलोभन, बहिष्कृत किया जाना और लोगों के बीच लड़ाई और कलह सहनी पड़ती है—उन्हें यह सारा कष्ट सहना पड़ता है। इसके अलावा, कुछ लोग गरीबी में जीते हैं और बीमार पड़ने पर उनके पास इलाज के लिए पैसे नहीं होते। कई चीजें उनकी इच्छा के अनुसार नहीं होतीं और वे अक्सर असहाय महसूस करते हैं, लेकिन वे यह सारा कष्ट सहते हैं। लोग दोनों ही तरह से कष्ट सहते हैं, लेकिन तुम देह की खातिर जितना भी कष्ट सहते हो, वह उचित है; यह वह कष्ट है जो तुम्हें सहना चाहिए। यदि तुम जीवित रहना चाहते हो, तो तुम्हें कष्ट सहना होगा। हालाँकि परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों द्वारा सहे जाने वाले कष्ट का रूप कुछ हद तक अविश्वासियों द्वारा सहे जाने वाले कष्ट के समान होता है, लेकिन विश्वासी अंततः जो हासिल करते हैं वह सत्य है और साथ ही परमेश्वर की आराधना और उसके प्रति समर्पण है। तब यह कष्ट बेहद मूल्यवान और सार्थक होता है। तुम्हें परमेश्वर को धन्यवाद देना चाहिए कि उसने तुम्हारे लिए इन कष्ट-भरे जीवन-परिवेशों का इंतजाम किया, यह सुनिश्चित किया कि तुम सबक सीख सको और हर बार कष्ट का अनुभव होने पर परमेश्वर के प्रति समर्पण करना और अपनी गवाही में अडिग रहना सीख सको, न कि कष्ट के अनुभव का ऐसी पूँजी के रूप में उपयोग करो जिससे तुम इतरा सको और अपना उत्कर्ष कर सको। दूसरों का उच्च सम्मान पाने के लिए स्वयं द्वारा सहे गए कष्ट के बारे में बात करके हमेशा अपना उत्कर्ष करना और अपने बारे में गवाही देना—इस प्रकार के लोग शर्मनाक होते हैं। जो लोग विवेक से रहित होते हैं, वे शर्मनाक चीजों के अलावा कुछ नहीं करते। जब विवेकशील लोग ऐसा कुछ करते हैं जिसमें विवेक की कमी होती है, तब वे शर्मिंदा महसूस करते हैं; वे इसे रोक देते हैं और आगे ऐसा नहीं करते, है ना? (हाँ।)

मैंने कष्ट सहने के मुद्दे के संबंध में बहुत संगति की है। क्या मेरा इस तरह से संगति करना तुम लोगों के लिए मददगार रहा है? (हाँ।) इसने तुम लोगों की कैसे मदद की है? (परमेश्वर की संगति सुनने के बाद मैं समझ गया कि देह द्वारा सहे जाने वाले कष्ट वे कष्ट हैं जो मनुष्य को सहने ही चाहिए और न्याय और ताड़ना, काट-छाँट, क्लेशों और परीक्षणों आदि का अनुभव करने का कष्ट भी मनुष्य को सहना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य में शैतानी भ्रष्ट स्वभाव हैं, और यदि मनुष्य यह कष्ट नहीं सहता, तो उसके भ्रष्ट स्वभाव छोड़े नहीं जा सकते। इसके अलावा, परमेश्वर ने अभी उल्लेख किया कि एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए मनुष्य जो भी कष्ट सहता है, वह उसका दायित्व और जिम्मेदारी है और उसे परमेश्वर से श्रेय लेने की कोशिश करने के लिए उसका पूँजी के रूप में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। परमेश्वर की संगति के बाद, मुझे लगता है कि अब मैं कष्ट को तर्क-बुद्धि के साथ देख सकता हूँ।) इस तरह संगति करने के बाद, वे कुछ लोग जो हमेशा कष्ट का अनुसरण करते हैं, मुक्त हो जाएँगे। कुछ लोग हमेशा सोचते हैं, "मुझे कष्ट सहना होगा, वरना भाई-बहन मुझे तुच्छ समझेंगे और अगली बार मुझे अगुआ या कार्यकर्ता नहीं चुनेंगे। मुझे दिखावा करने में सक्षम होना चाहिए और दूसरों के सामने कष्ट सहना सीखना चाहिए।" तुम्हें दिखावा करने की कोई जरूरत नहीं है। यदि तुम्हारे पास ऐसा करने का समय है, तो तुम्हारे लिए बेहतर होगा कि तुम उसे परमेश्वर के अधिक वचन पढ़ने, अधिक सत्य समझने, अपनी जिम्मेदारियाँ और दायित्व पूरे करने और अपने कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने में बिताओ और अंततः सत्य के संदर्भ में लाभ बटोरो। चाहे दूसरे लोग तुम्हारा बहुत आदर करें या न करें, यदि तुमने स्वयं सत्य के संदर्भ में लाभ बटोरे हैं और यदि तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव त्याग दिए गए हैं—और तुम अंततः अपने लिए उद्धार पाने का अवसर और सृष्टिकर्ता की स्वीकृति अर्जित कर लेते हो—तो यह सबसे मूल्यवान चीज है; बुद्धिमान व्यक्ति इसे ही चुनेगा। यदि तुम हमेशा दूसरों के सामने दिखावा करते हो ताकि वे तुम्हारा बहुत आदर करें, और हमेशा दूसरों के सामने श्रेय लेते हो और इनाम माँगते हो, और इस बात की गवाही देते हो कि तुमने कितना कष्ट सहा है, तुमने कितनी शिकायतें झेली हैं, तुमने परमेश्वर के लिए खुद को कैसे खपाया है, तुमने कितनी कीमत चुकाई है और तुमने कितना अर्पण किया है, तो यह चीजें करने का एक मूर्खतापूर्ण तरीका है। चूँकि तुमने इतनी बड़ी कीमत चुकाई है, इतना अर्पण किया है और इतना कष्ट सहा है, तो यह कष्ट सहने और यह कीमत चुकाने के अपने अनुभव, और तुमने इससे क्या प्राप्त किया है, इसे सभी के साथ साझा करो, ताकि हर व्यक्ति कुछ लाभ प्राप्त कर सके और अभ्यास का मार्ग खोज सके। तुम्हें वे परिणाम प्रस्तुत करने चाहिए जो तुमने पाए और बटोरे हैं—तुमने परमेश्वर के इरादों के कौन-से पहलू समझे हैं और सत्य के कौन-से पहलू तुम्हारे भीतर जड़ जमा चुके हैं और तुम्हारा जीवन बन गए हैं। तुम्हें इन चीजों पर संगति करनी चाहिए और इन्हें साझा करना चाहिए। जब भाई-बहन सत्य का कोई खास पहलू नहीं समझते, या नहीं जानते कि किसी खास मामले में सत्य सिद्धांतों के अनुसार कैसे कार्य करना है, तो तुम्हें मदद और मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए अपने व्यक्तिगत अनुभवों पर संगति करनी चाहिए। चूँकि तुमने इतना कष्ट सहा है, इसलिए तुमने काफी कुछ प्राप्त किया होगा, तो उसे साझा करो; बहुत लोग तुमसे मदद पाना चाहते हैं। तुम्हें अपने कष्ट सहने की प्रक्रिया के बारे में, या तुमने कितना कष्ट सहा है इस बारे में बात करने की जरूरत नहीं है। बस इस बारे में बात करो कि कष्ट सहने के बाद तुम सत्य के कौन-से पहलू जान गए हो। अपने ज्ञान का और जो तुमने प्राप्त किया है उसका उपयोग लोगों को परमेश्वर के सामने लाने, परमेश्वर के साथ उनके टकराव हल करने और उसके प्रति उनके गलत विचार और दृष्टिकोण हल करने के लिए करो। उन्हें परमेश्वर के सामने लाना उन्हें सत्य वास्तविकता में लाना है। तुमसे बस यही माँगा जाता है; देखो कि क्या तुम इसे हासिल कर सकते हो। यदि तुम कर सकते हो, तो तुमने अपनी जिम्मेदारी और दायित्व पूरा कर लिया है और तुम्हारा कष्ट सहना मूल्यवान और सार्थक है। यदि तुम यह अपेक्षा भी पूरी नहीं कर सकते, तो बस अपना मुँह बंद रखो; तुम्हारे द्वारा सहा गया कष्ट बेकार है। यदि तुम हमेशा इस बारे में बात कर रहे हो कि तुमने कितना कष्ट सहा है, तो तुम इतरा रहे हो और भ्रष्टता प्रकट कर रहे हो; तुम शैतान की गवाही दे रहे हो, भ्रष्ट स्वभावों की गवाही दे रहे हो और शैतान के विचारों और दृष्टिकोणों की गवाही दे रहे हो—तुम लोगों को गुमराह कर रहे हो और बाधाएँ उत्पन्न कर रहे हो। यदि तुम कहते हो कि तुमने बहुत कष्ट सहा है और बड़ी कीमत चुकाई है, कि परमेश्वर के वचनों द्वारा तुम्हारा न्याय किया गया है, तुम्हें ताड़ना दी गई है, तुम्हारी काट-छाँट की गई है और तुम्हें अनुशासित किया गया है, और कि तुमने बहुत दर्द और शोधन का अनुभव किया है, तो तुम्हें अपने कष्ट सहने की अवधि के अपने अनुभव लेने चाहिए—तुमने कैसे समर्पण किया, तुम परमेश्वर के वचनों के साथ सही विचारों, दृष्टिकोणों और रवैयों से कैसे पेश आ सके, तुमने कैसे परमेश्वर के वचनों का न्याय और ताड़ना स्वीकार की, और पीड़ा और शोधन से निकलने के लिए तुमने कैसे सत्य की खोज की—और उन पर संगति करनी चाहिए और उन्हें सबके साथ साझा करना चाहिए। बहुत लोग धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं, ये बातें सुनने का इंतजार कर रहे हैं। अधिकांश लोग बिना सिखाए ही जानते हैं कि कष्ट कैसे सहना है, कीमत कैसे चुकानी है, कष्ट सहने और कीमत चुकाने के बाद दिखावा कैसे करना है और अपने बारे में गवाही कैसे देनी है, आदि। वे सब जानते हैं कि दिखावा कैसे करना है और अपनी खूबियों का बखान कैसे करना है। वे केवल कौन-सी चीजें नहीं समझते? वे नहीं समझते कि कार्य करने का कौन-सा तरीका सत्य का अभ्यास करना और सत्य सिद्धांतों के अनुसार चीजें करना है, और कार्य करने का कौन-सा तरीका विरूपित है; कार्य करने का कौन-सा तरीका परमेश्वर के इरादे पूरे करता है और कौन-सा तरीका उनका उल्लंघन करता है; लोगों के भीतर कौन-से गलत विचार और दृष्टिकोण हैं; जब वे चीजों का सामना करते और भ्रष्टता प्रकट करते हैं, तब खुद को कैसे जानें और अपना गहन-विश्लेषण कैसे करें; या कार्य करने के किस तरीके का अर्थ है कि वे पलट गए हैं, और कार्य करने के किस तरीके का अर्थ है कि वे बदल गए हैं और उन्होंने विकास किया है। ये वे चीजें हैं, जिनकी अधिकांश लोगों में कमी है। मानव प्रकृति के अनुसार, लोगों के भीतर का जीवन स्वाभाविक रूप से जो प्रकट करता और जीता है, वह है अपनी बड़ाई करना, अपने बारे में गवाही देना और दूसरों से उच्च सम्मान पाने के लिए दिखावा करना; इसी में लोग सबसे अच्छे और सबसे अधिक निपुण हैं। तुम्हें उन चीजों पर संगति करने या उन्हें साझा करने की कोई जरूरत नहीं जिनमें लोग सबसे अधिक निपुण हैं; परमेश्वर के वचनों के संबंध में अपने कुछ अनुभव, ज्ञान और समझ साझा करो। ये वे चीजें हैं, जिनकी लोगों को जरूरत है। ऐसी चीज पर संगति करो जिसकी लोगों को जरूरत है, ऐसे विषयों पर जो लोगों के अभ्यास, लोगों के अनुभवों और लोगों के उद्धार प्राप्त करने में मददगार हों और जो परमेश्वर के प्रति उनके प्रतिरोध हल करने में उनकी मदद करें। यह मूल्यवान है। तुम कहते हो कि तुमने बहुत कष्ट सहा है, कि तुमने अपने कष्ट में बहुत ऊर्जा और अपने दिल का खून खपाया है, और कि तुममें समर्पण भी है, तो तुमने क्या प्राप्त किया है? इसे जोर से बोलो, ताकि हर कोई सुन सके। सत्य के संबंध में अपना ज्ञान और समझ सभी के साथ साझा करना—जिसकी लोगों को जरूरत है—सबसे अधिक स्वागत-योग्य है। यह वह चीज है, जिसकी लोगों को जरूरत है। ऐसा करना एक सच्चा अच्छा कर्म है और यह तुम्हारी जिम्मेदारी और दायित्व है। यदि, दिखावा करने की खातिर, तुम इस बात की गवाही देते हो कि तुमने किस प्रकार के कष्ट सहे हैं, और उस पूँजी का दिखावा करते हो जिसके बारे में तुम मानते हो कि वह तुम्हें तुम्हारे कष्ट सहने से मिली है ताकि लोग तुम्हारा बहुत आदर करें और तुम्हारी आराधना करें, तो यह परमेश्वर के इरादों से भटकना है। ऐसा करना तुम्हारी जिम्मेदारी या दायित्व नहीं है; बल्कि, यह अपना जमीर और विवेक खो देने की अभिव्यक्ति है। यदि तुम वास्तव में खुद को रोक नहीं सकते और दिखावा करना चाहते हो, तो तुम अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए कुछ व्यक्तियों के साथ इस बारे में थोड़ी बात कर सकते हो, लेकिन तुम्हें पता होना चाहिए कि कब रुकना है। यह पूरी तरह से सुनिश्चित करो कि सार्वजनिक स्थानों पर खुल्लमखुल्ला इसका बखान न करो; इसे दिखावटी होना कहा जाता है और इसे खुद को मूर्ख बनाना कहा जाता है। दिखावटी होने और खुद को मूर्ख बनाने का क्या अर्थ है? यह सार्वजनिक रूप से नंगे होने और लोगों के देख लेने के बराबर है—यह इतना घिनौना है। किस तरह का व्यक्ति ऐसा काम करता है? यह मानसिक रूप से बीमार लोगों द्वारा किया जाने वाला काम है, उन लोगों द्वारा जिनमें शर्म-लिहाज नहीं होता और तर्क-बुद्धि नहीं होती। यदि तुममें विवेक है, तो तुम्हें ऐसा काम बिल्कुल नहीं करना चाहिए। कष्ट वह चीज है जो तुम्हें सहनी चाहिए, लेकिन कष्ट सहने के बाद तुमने क्या प्राप्त किया है? इसे अपने तक सीमित मत रखो; तुम्हें इसे परमेश्वर का अनुसरण करने वाले और सत्य का अनुसरण करने वाले सभी भाई-बहनों के साथ बिना किसी संकोच के साझा करना चाहिए। यदि तुम इसे साझा करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें आशीष देगा, और वह तुम्हें और अधिक प्रदान करेगा। यदि तुम जीवन-अनुभवों और परमेश्वर की गवाही देने से संबंधित विषयों पर बात नहीं करते, बल्कि इसके बजाय हमेशा इस बारे में बात करते हो कि तुमने कैसे कष्ट सहा और कीमत चुकाई और तुम्हारे पास कितनी पूँजी है, हमेशा दूसरों के सामने अपना परिष्कृत रूप प्रस्तुत करते हो, अपनी छवि ऊँची उठाते हो और अपना प्रोफाइल उन्नत करते हो, अपनी ही प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के लिए बोलते और कार्य करते हो और हर जगह बेशर्मी से दिखावा करते हो, तो परमेश्वर न केवल तुम्हें आशीष नहीं देगा, बल्कि जो कुछ तुम्हारे पास मूल रूप से था, वह भी छीन लेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम्हारे कार्य परमेश्वर द्वारा स्वीकार या मान्य नहीं किए जाते, बल्कि उसके द्वारा उनकी निंदा की जाती है। इसीलिए मैं तुम लोगों से कह रहा हूँ, तुम्हें यह मार्ग बिल्कुल नहीं चुनना चाहिए। तुमने चाहे कितना भी कष्ट सहा हो, और चाहे वह तुम्हें सहना चाहिए था या नहीं, या तुमने स्वेच्छा से कष्ट सहा हो या मजबूरी में निष्क्रिय होकर, तुम्हें अपने कष्ट को दिखावा करने के लिए पूँजी बिल्कुल नहीं मानना चाहिए। और लोगों से ऊँचा आदर पाने के लिए या उनसे कष्ट सहने के अपने संकल्प, कष्ट सहने के अपने तरीके या कष्ट के प्रति अपने रवैये का अनुकरण करवाने के लिए कभी इस बारे में ऐसे संगति न करो कि तुमने कितना कष्ट सहा है, मानो यह सत्य हो। ऐसा कभी न करो; यह अपने ही मार्ग पर चलना होगा। परमेश्वर यह कभी नहीं देखता कि व्यक्ति कितना कष्ट सहता है। वह केवल यह देखता है कि सत्य की खातिर, न्याय कायम रखने और परमेश्वर के कार्य की रक्षा करने की खातिर, अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने की खातिर, परमेश्वर के आयोजनों और सत्य के प्रति समर्पण करने की खातिर और सत्य सिद्धांतों का पालन करने की खातिर तुम कितने कष्ट से गुजरते हो, कितनी शिकायतें सहते हो और कितनी बड़ी कीमत चुकाते हो। वह यह देखता है कि कष्ट सहने के लिए तुम्हारे लक्ष्य, इरादे और मंशाएँ क्या हैं, न कि तुम्हारा कष्ट कितना बड़ा है या तुम कितना कष्ट सहते हो। यदि कष्ट सहने में तुम्हारा लक्ष्य अपने ही गौरव और व्यक्तिगत हितों की रक्षा करना है, तो तुम्हारे कष्ट का एक धेले का भी मूल्य नहीं है। यदि तुम परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने के लिए कष्ट सहते हो, तो भले ही तुम केवल एक ही वाक्य कहो जिससे अंततः कुछ लोग नाराज हो जाएँ लेकिन वह परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करता हो और कलीसिया के कार्य के लिए फायदेमंद हो, तो यह एक वाक्य परमेश्वर द्वारा याद रखा जाएगा। वह इस वाक्य को अनमोल मानेगा, और वह तुम्हें और अधिक प्रदान करेगा, तुम्हें मजबूत बनाने के लिए तुम्हें आस्था देगा, ताकि जब तुम चीजों का सामना करो, तब तुम दुष्ट लोगों या विरोधी शक्तियों से न डरो। वह तुम्हें मन की स्पष्टता देगा और तुम्हें सत्य के संबंध में ज्ञान, अंतर्दृष्टि, प्रकाश और प्रबुद्धता प्राप्त करने में सक्षम बनाएगा। जैसा कि तुम देख सकते हो, परमेश्वर का आशीष कितना बड़ा है!

अभी हमने कष्ट सहने के संबंध में जिन पर संगति की, वे सही विचार और दृष्टिकोण हैं। तुम पहले चाहे जैसे भी कार्य करते थे या कष्ट सहने को चाहे जैसे भी देखते थे, जब तुम कष्ट से संबंधित सत्यों को समझ जाते हो, तब तुम्हें खुद को बदल लेना चाहिए, सही विचार और दृष्टिकोण स्वीकार करने चाहिए, और अपने इरादे और लक्ष्य सही करने चाहिए, अपने कार्यों के सिद्धांतों, तरीकों और दिशा का मार्गदर्शन करने के लिए सही विचारों और दृष्टिकोणों का उपयोग करना चाहिए। इस तरह, तुम सत्य हासिल कर पाओगे। यदि व्यक्ति की मानसिकता सही नहीं है और वह सत्य बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करता, केवल उन शब्दों और धर्म-सिद्धांतों के बारे में बोलता है जिन्हें वह समझता है ताकि वह इतरा सके और दिखावा कर सके जिससे लोग उसका बहुत आदर करें, और काम करते समय वह अपनी मर्जी चलाता है, परमेश्वर में वर्षों से विश्वास करने के बावजूद बिल्कुल भी नहीं बदलता, तो यह ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम नहीं करता और सत्य स्वीकार नहीं करता। जो लोग सत्य स्वीकार करते हैं, वे सही विचार और दृष्टिकोण अपनाते हैं और उन्हें सुनने के बाद अपने दिल में उतार लेते हैं। जब वे चीजों का सामना करते हैं, तब वे अपने व्यवहार को विनियमित करने और अपने गलत इरादे और भ्रामक विचार और दृष्टिकोण सही करने के लिए सत्य को मापदंड के रूप में उपयोग करते हैं। फिर वे खुद को नियंत्रित करने और अपने व्यवहार को निर्देशित करने के लिए सही विचारों और दृष्टिकोणों का सिद्धांतों और अभ्यास के मार्ग के रूप में उपयोग करते हैं। अंत में, वे जो जीते और प्रकट करते हैं, वे अब भ्रष्ट स्वभाव नहीं होंगे, बल्कि वे सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होंगे, जो यह दर्शाता है कि उन्होंने सच्चे बदलाव का अनुभव किया है। क्या यह अच्छी चीज नहीं है? (हाँ।) लोगों को ठीक इसी तरह सत्य का अनुसरण करना चाहिए। एक बार जब तुम सत्य समझ जाते हो, तब परमेश्वर के वचन स्वाभाविक रूप से तुम्हारे हृदय में सत्ता सँभालेंगे; यानी परमेश्वर के वचन तुम्हारे भीतर जीवन बन जाएँगे और तुम परमेश्वर के वचनों को जीने में सक्षम होगे। जब परमेश्वर के वचन तुम्हारे भीतर कार्यभार सँभाल लेते हैं और ऐसा नहीं रह जाता कि तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव सर्वेसर्वा हैं, तब सत्य तुम्हारा जीवन होता है और तुम ऐसे व्यक्ति होते हो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है। जिन लोगों से परमेश्वर प्रेम करता है, क्या वे खुश होते हैं? (हाँ।) उनकी खुशी पूरी तरह से उचित है; हालाँकि वे कष्ट सहते हैं, फिर भी यह एक सम्मान होता है। वे जिसका अनुभव करते हैं वह कष्ट है, लेकिन वे जो प्राप्त करते हैं वह कुछ मधुर होता है। हालाँकि हो सकता है यह खुशी वर्तमान में तुम्हारी पहुँच से बाहर हो—या शायद बहुत दूर भी हो—फिर भी यदि तुम इस दिशा में लगन से अनुसरण करते हो, तो देर-सबेर एक दिन ऐसा आएगा जब तुम यह आनंद बटोरोगे और यह खुशी महसूस करोगे, और यह आनंद और खुशी अब तुम्हारे लिए उतनी दूर नहीं रहेगी। बस इस लक्ष्य की ओर प्रयास करो और इसका अनुसरण करो। देर-सबेर एक दिन ऐसा आएगा जब सत्य तुम्हारा जीवन बन जाएगा और जब तुम भ्रष्ट स्वभावों द्वारा नियंत्रित या बँधे हुए नहीं रहोगे, और तब तुम सोचोगे, "यह कष्ट सहना सार्थक है! जब मैं कष्ट सहता था, तब यह दुखद और पीड़ादायक होता था और मुझे लगता था कि कष्ट सहना कठिन चीज है। मैं थोड़ा कष्ट सहता था और फिर सोचता था कि मेरे पास पूँजी है। अब मुझे लगता है कि कष्ट पूँजी बिल्कुल नहीं है, न ही इसका कोई मूल्य है—मुझमें भ्रष्ट स्वभाव हैं, इसलिए मुझे कष्ट सहना ही चाहिए। थोड़ा कष्ट सहना अच्छा है; देह को कष्ट सहना ही चाहिए। सौभाग्यवश यह कष्ट मेरे साथ रहा है; केवल इसी तरह से मैं सत्य हासिल करने, भ्रष्ट स्वभावों के बंधन और नियंत्रण से मुक्त होने और आनंद और खुशी से जीने में सक्षम हो पाया हूँ। कष्ट के बाद ही मधुरता आती है।" देखो, जिसने इसे चखा है वह जानता है; जिसने इसे प्राप्त किया है वह जानता है। जब वह दिन आएगा, तब चीजें काफी अलग लगेंगी, है ना? (हाँ।)

ठीक है, आज के लिए हम अपनी संगति यहीं समाप्त करते हैं। अलविदा!

16 नवंबर 2024

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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