सत्य का अनुसरण कैसे करें (29)

हमने देहधारी परमेश्वर से संबंधित कुछ सत्यों पर पहले ही संगति कर ली है। क्या तुम लोगों को लगता है कि सत्य के इस पहलू पर संगति करना परमेश्वर को जानने में सहायक है? (हाँ।) तो यह अच्छा है। हमने इस विषय पर पहले थोड़ी संगति की है, लेकिन हमने एक-एक करके, विस्तार से संगति नहीं की; बल्कि, हमने इस पर टुकड़ों में संगति की थी। इस बार हम देहधारी परमेश्वर के विषय के अंतर्गत उन सत्यों पर संगति कर रहे हैं, जिनमें परमेश्वर के बारे में मनुष्य की धारणाएँ और साथ ही परमेश्वर के प्रति उसका रवैया और परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान शामिल है। एक ओर, इन सत्यों पर संगति इसलिए की जा रही है ताकि मनुष्य परमेश्वर को समझ और जान सके, और परमेश्वर के प्रति अपने रवैये और दृष्टिकोणों से जुड़े वे सत्य समझ सके जिन्हें जानना उसके लिए आवश्यक है। दूसरी ओर, ऐसा इसलिए है क्योंकि ये विषय बहुत महत्वपूर्ण हैं। इन्हें क्या चीज महत्वपूर्ण बनाती है? असल में, मनुष्य स्वर्ग स्थित परमेश्वर को देख या छू नहीं सकता और महसूस भी मुश्किल से ही कर सकता है; स्वर्ग स्थित परमेश्वर मनुष्य से बहुत दूर है। यदि व्यक्ति परमेश्वर के साथ संबंध स्थापित करने का प्रयास करे, तो यह उसके लिए बहुत ही खोखला और काल्पनिक होगा। यह खोखलापन और काल्पनिकता एक ओर मनुष्य के परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं से भरा होने के कारण है। दूसरी ओर, यह इस कारण है कि मनुष्य को परमेश्वर की वास्तविकता और व्यावहारिकता या परमेश्वर की पहचान और सार की बिल्कुल भी समझ नहीं है और वह पूरी तरह से अपने इच्छाजनित विश्वास से उपजी धारणाओं और कल्पनाओं के बीच जीता है। इसलिए, परमेश्वर का अनुसरण शुरू करने के बाद मनुष्य परमेश्वर के साथ जो संबंध स्थापित करता है, वह मूलभूत रूप से उसकी धारणाओं और कल्पनाओं पर, उसके इच्छाजनित विश्वास की नींव पर, और साथ ही परमेश्वर से उसकी विभिन्न माँगों और उसके लिए उसकी इच्छाओं पर बना होता है। इस तरह की नींव पर बना मनुष्य और परमेश्वर के बीच का संबंध बहुत अस्थिर, बहुत असुरक्षित और, बेशक, बहुत अविश्वसनीय होता है। हवा की ज़रा-सी सरसराहट से या किसी असामान्य स्थिति के पैदा होने पर इस तरह का संबंध आसानी से टूट सकता है और आसानी से खत्म हो सकता है। उदाहरण के लिए, जब मनुष्य का सामना ऐसी चीजों से होता है जो उसकी इच्छा के अनुसार नहीं होतीं, जब वह पीड़ा, असफलताओं और नाकामियों का सामना करता है, या जब वह उन सभी प्रकार की चीजों का सामना करता है जो उसकी धारणाओं के अनुरूप नहीं होतीं या उसके दैहिक हित भंग कर देती हैं—जब मनुष्य इनमें से किसी भी ऐसी स्थिति का सामना करता है जिसके बारे में वह मानता है कि उसकी धारणाओं के अनुसार वह नहीं होनी चाहिए—तो वह स्वाभाविक रूप से परमेश्वर पर संदेह करेगा। वह परमेश्वर के अस्तित्व पर संदेह करेगा, वह इस बात पर संदेह करेगा कि जिन तरीकों से परमेश्वर मनुष्य पर संप्रभुता रखता है—और जिन तरीकों से परमेश्वर उसके लिए चीजों का आयोजन और व्यवस्था करता है—वे सही हैं या नहीं, और बेशक, वह इस बात पर संदेह करेगा कि परमेश्वर का इस तरह कार्य करना सही है या नहीं, साथ ही परमेश्वर की मनुष्य के प्रति कोई छिपी हुई मंशा या बुरे इरादे हैं या नहीं, इत्यादि। संक्षेप में, मनुष्य और परमेश्वर के बीच का यह संबंध बहुत अस्थिर और असुरक्षित है; मानवीय शब्दों में, यह अनिश्चितता से भरा है। चूँकि मनुष्य और परमेश्वर के बीच का यह संबंध मनुष्य की धारणाओं और कल्पनाओं पर, और इच्छाजनित विश्वास से मनुष्य द्वारा परमेश्वर से की जाने वाली विभिन्न माँगों की नींव पर बना है, इसलिए मनुष्य को परमेश्वर में अपनी आस्था चाहे कितनी भी बड़ी लगे, या परमेश्वर का अनुसरण करने का अपना संकल्प उसे चाहे कितना भी बड़ा लगे, परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से, वह इस तरह के संबंध को मान्यता नहीं देता। बेशक, वस्तुनिष्ठ तथ्यों के संदर्भ में, यह अस्थिर है; सभी प्रकार के परिवेशों और विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों में बदलावों के साथ-साथ विभिन्न विशेष स्थितियाँ पैदा होने के कारण, यह किसी भी समय और कहीं भी टूट सकता है या खत्म हो सकता है। अगर व्यक्ति कुछ सत्य समझता भी है, तो भी जब वह परमेश्वर को नहीं समझता या नहीं जानता, तब वह परमेश्वर पर संदेह करेगा। अगर वह परमेश्वर के अस्तित्व पर संदेह नहीं करता, तो भी वह इस बात पर संदेह करेगा कि उनके प्रति इस तरह कार्य करने में परमेश्वर का उद्देश्य क्या है और क्या उसके लिए ऐसा करना सही है। इसलिए, यह कहा जा सकता है कि जब मनुष्य परमेश्वर को नहीं समझता या नहीं जानता, तब वह परमेश्वर के साथ जो संबंध स्थापित करता है, वह किसी परीक्षा का सामना नहीं कर सकता और वह शायद ही किसी विशेष परिवेश का उतर-चढ़ाव सह सकता है। इसका कारण यह नहीं है कि परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं में गलतियाँ या अशुद्धियाँ हैं या परमेश्वर विचारशील नहीं है और मनुष्य की कमजोरियों या उसकी विभिन्न जरूरतों का ध्यान रखने में विफल रहता है; बल्कि, इसका कारण यह है कि भ्रष्ट मनुष्य सहज रूप से परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं से भरे हुए हैं। शुरुआत से ही, चूँकि मनुष्य में भ्रष्ट स्वभाव हैं, इसलिए परमेश्वर के साथ उसका यह संबंध एक सृजित प्राणी और सृष्टिकर्ता के बीच के सामान्य संबंध की नींव पर नहीं बना है। इसलिए मनुष्य गलत रुख और विचार अपनाता है और गलत दृष्टिकोणों का उपयोग करके परमेश्वर के साथ अपना संबंध स्थापित करता है और वह इस संबंध को बनाए रखने के लिए गलत विचारों और दृष्टिकोणों के साथ ही गलत तरीकों का भी उपयोग करता है। इस तरह, मनुष्य और परमेश्वर के बीच का यह संबंध असामान्य हो जाता है। यह न केवल मनुष्य को परमेश्वर, उसके आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति बेहतर तरीके से समर्पण करने में मदद करने में विफल रहता है ताकि वह मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी कर सके, बल्कि यह मनुष्य के मन में परमेश्वर के प्रति घृणा और विरक्ति भी पैदा करता है, यहाँ तक कि इसके कारण मनुष्य उद्धार प्राप्त करने का अपना अवसर भी खो देता है। जब मनुष्य लंबे समय तक परमेश्वर का अनुसरण करता है, जब वह अधिक से अधिक सत्य समझता है, और जब वह अपना कर्तव्य निभाने के दौरान कुछ पूँजी जमा करता है और कुछ अनुभव और सबक प्राप्त करता है, तब उसे उत्तरोत्तर यह लगने लगता है कि परमेश्वर के साथ उसका संबंध सही और सुरक्षित है। लेकिन परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान के संदर्भ में, मनुष्य और परमेश्वर के बीच का इस तरह का संबंध परमेश्वर की नजर में अभी भी असामान्य रहता है। इसे अभी भी सुधारे और परखे जाने की आवश्यकता होती है और मनुष्य को अभी भी अधिक सत्य समझने और परमेश्वर के बारे में अधिक समझ और ज्ञान रखने की आवश्यकता होती है। केवल इसी तरह से मनुष्य और परमेश्वर के बीच का संबंध परमेश्वर की नजर में वास्तव में मानक स्तर का हो सकता है, और बेशक, केवल तभी मनुष्य सृष्टिकर्ता के साथ अपने व्यवहार में, परमेश्वर के साथ अपने व्यवहार में अधिक सटीकता और तार्किकता से एक सृजित प्राणी का स्थान ग्रहण कर सकता है। इसलिए, देहधारी परमेश्वर को जानने—पृथ्वी पर मौजूद परमेश्वर को जानने—के संबंध में सत्य किसी प्रकार का अकादमिक ज्ञान या एक प्रकार की सामान्य समझ नहीं है, किसी प्रकार का सिद्धांत या नारा तो वह बिल्कुल भी नहीं है। बल्कि, यह सत्य का वह पहलू है जिसे मनुष्य को परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध स्थापित करने के लिए, एक सृजित प्राणी और सृष्टिकर्ता के बीच संबंध स्थापित करने के लिए अवश्य समझना चाहिए। यह सत्य का वह पहलू है जिसमें परमेश्वर का सार जानना, परमेश्वर के कार्य करने और बोलने के तरीके जानना और वे सिद्धांत जानना शामिल है जिनके द्वारा परमेश्वर सभी प्रकार की चीजें करता है। जब मनुष्य सत्य के इस पहलू को समझ लेता है, देहधारी परमेश्वर को जान लेता है और उसे परमेश्वर की बुनियादी समझ हो जाती है, तो वह परमेश्वर के साथ ऐसा संबंध स्थापित करेगा जो सबसे उचित और सबसे उपयुक्त है—एक सृजित प्राणी और सृष्टिकर्ता के बीच का संबंध। केवल इस तरह के संबंध की नींव पर ही परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सत्य का अभ्यास करने का मनुष्य का अनुसरण और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और उसकी आराधना करने का उसका अनुसरण एक सकारात्मक दिशा में विकसित होगा; केवल तभी मनुष्य बुराई से उत्तरोत्तर दूर रहेगा और उद्धार के मार्ग पर अग्रसर होगा।

इस पर विचार करो : यदि किसी को परमेश्वर का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है—यानी, यद्यपि वह परमेश्वर में विश्वास करता है, लेकिन वह परमेश्वर के कार्य करने के सिद्धांतों और तरीकों, और उन्हें करने के उसके उद्देश्य के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं से भरा है, और वह परमेश्वर द्वारा सभी प्रकार के कार्य करने के विशिष्ट विवरणों के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं से भरा है—तो जब वह विभिन्न चीजों का सामना करता है, तो वह उनसे कैसे निपटेगा? वह सत्य कैसे खोजेगा? उसका आधार क्या होगा? उसके सिद्धांत क्या होंगे? उसके लक्ष्य क्या होंगे? ये सरल प्रश्न नहीं हैं। यदि व्यक्ति परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं से भरा है, और उसे परमेश्वर के कार्य करने के सिद्धांतों और तरीकों की ज़रा-सी भी समझ नहीं है और वह बिल्कुल नहीं समझता कि सभी प्रकार के कार्य करने में उसका उद्देश्य क्या है और वह परमेश्वर के साथ पूरी तरह से मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं, परंपरागत संस्कृति और ज्ञान-आधारित तर्क के आधार पर व्यवहार करता है, तो क्या वह परमेश्वर को जान सकता है और उसके प्रति समर्पण कर सकता है? (नहीं।) यदि परमेश्वर को जानने का व्यक्ति का अनुसरण कुल मिलाकर मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं, ज्ञान और फलसफे और परंपरागत संस्कृति पर आधारित है और उसका अनुसरण इस नींव पर बना है और इन चीजों द्वारा प्रतिबंधित है, तो क्या यह अनुसरण परमेश्वर की अपेक्षा पूरी करने से बहुत दूर नहीं होगा? क्या यह परमेश्वर की अपेक्षाओं के विपरीत नहीं होगा? (हाँ।) जब तुम लोग संगति के माध्यम से ये पहलू—देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता; उसके बोलने और कार्य करने के सिद्धांत और तरीके; और उसके बोलने और कार्य करने के पीछे के उद्देश्य, इरादे और लक्ष्य—समझ लेते हो, तब संगति के माध्यम से तुम्हें परमेश्वर के कार्य करने और बोलने के सिद्धांतों और तरीकों और साथ ही ऐसा करने के उसके उद्देश्य की बुनियादी समझ हो जाएगी। यह समझ परमेश्वर के बारे में मनुष्य की धारणाओं और कल्पनाओं से नहीं आती, न ही यह कोई ऐसी चीज है जिसे मनुष्य अपने ज्ञान के आधार पर निकालता है, और यह कोई ऐसी चीज तो बिल्कुल भी नहीं है जिसकी मनुष्य परंपरागत संस्कृति के आधार पर कल्पना करता है; बल्कि, इसमें पृथ्वी पर मौजूद परमेश्वर की वे अत्यंत व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ शामिल हैं जिन्हें मनुष्य देखता है, जिनके संपर्क में आता है और जिनका अनुभव करता है। देहधारी परमेश्वर के बोलने और कार्य करने के सिद्धांत और तरीके—साथ ही ऐसा करने का उसका उद्देश्य—जिन्हें वह पूरी तरह से व्यावहारिक तरीकों से प्रदर्शित करता है, तुम्हें परमेश्वर का सार और स्वभाव, साथ ही परमेश्वर के क्रियाकलाप करने, कार्य करने और बोलने के विशिष्ट सिद्धांत और तरीके और ऐसा करने का उसका उद्देश्य समझने और जानने देने के लिए पर्याप्त से कहीं अधिक हैं। इसलिए, देहधारी परमेश्वर के विभिन्न पहलुओं को समझना परमेश्वर—सृष्टिकर्ता—को समझने का एक मार्ग है। यद्यपि देहधारी परमेश्वर को जानने से सृष्टिकर्ता का पूर्ण और व्यापक ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता, लेकिन कम से कम, देहधारी परमेश्वर को जानना स्वर्ग स्थित परमेश्वर को जानने और सृष्टिकर्ता को जानने का एक मार्ग है। तुम्हें ये चीजें बताने में मेरा उद्देश्य क्या है? यद्यपि परमेश्वर को समझना और जानना ऐसी चीजें हैं जिन्हें सीखने के लिए मनुष्य को अपना पूरा जीवन बिताना होता है और यद्यपि मनुष्य जीवन भर प्रयास करने पर भी परमेश्वर को पूरी तरह से और गहराई से नहीं जान सकता, फिर भी देहधारी परमेश्वर को जानने के माध्यम से तुम स्वर्ग स्थित परमेश्वर और सृष्टिकर्ता को अधिक व्यावहारिक तरीके से, अधिक सटीकता और वस्तुनिष्ठता के साथ समझोगे—इतना पर्याप्त है। यानी, तुम्हारे लिए देहधारी परमेश्वर को जानने के माध्यम से परमेश्वर को समझना और जानना पर्याप्त है; तुम्हारे लिए परमेश्वर को जानने और उसके साथ एक सामान्य संबंध स्थापित करने की शर्तें पूरी करने के लिए इतना ही काफी है। देहधारी परमेश्वर को जानना तुम्हें स्वर्ग स्थित परमेश्वर और सृष्टिकर्ता को जानने देने के लिए पर्याप्त है।

यदि व्यक्ति स्वर्ग स्थित परमेश्वर को पूरी तरह से जानना चाहे और उसका पूर्ण, व्यापक ज्ञान प्राप्त करने की उम्मीद करे, तो क्या यह संभव होगा? (नहीं।) वह ऐसा कभी नहीं कर पाएगा। चूँकि यह असंभव है, तो फिर मनुष्य से परमेश्वर को जानने के लिए क्यों कहा जाता है? क्योंकि, यदि तुम परमेश्वर को सटीकता से और व्यावहारिक रूप से जान सकते हो, तो यह तुम्हारे लिए परमेश्वर का अनुसरण करने, सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में लाभदायक और मददगार है। इसके अतिरिक्त, तुम्हारे लिए सत्य का अभ्यास करने और उद्धार प्राप्त करने के लिए परमेश्वर को जानना अत्यंत महत्वपूर्ण और आवश्यक है। तो तुम्हें क्या करना चाहिए? (हमें परमेश्वर को जानने से संबंधित सत्यों को महत्व देना चाहिए। हमें सत्य के इस पहलू को ऐसे समझने की कोशिश नहीं करनी चाहिए जैसे कि यह कोई साधारण सत्य हो।) एक तो, तुम्हें देहधारी परमेश्वर के साथ सही रवैये से पेश आना चाहिए। इसके अतिरिक्त, तुम्हें इस बात की जाँच करनी चाहिए कि देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर के बारे में तुम्हारी क्या धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, और यह पता लगाना चाहिए कि उन्हें कैसे छोड़ना है। परमेश्वर के साथ अपने मेल-जोलों और जुड़ावों में, चाहे वे दैनिक जीवन में हों, अपना कर्तव्य निभाने के दौरान हों या अपने जीवन का अनुभव करने के दौरान हों, तुम्हें इस बात की जाँच करनी चाहिए कि परमेश्वर के बारे में तुम्हारी क्या धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं और क्या परमेश्वर के प्रति तुम्हारे रवैये में ये दो समस्याएँ हैं : एक है देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्ग स्थित परमेश्वर से करना, और दूसरी है देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के बराबर रखना। इन दो समस्याओं की जाँच करने से तुम परमेश्वर के बारे में अपनी कुछ धारणाएँ और कल्पनाएँ पहचान सकते हो, या यह पता लगा सकते हो कि तुम्हारे और परमेश्वर के बीच क्या समस्याएँ हैं; या यह तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपने कुछ गलत विचार और दृष्टिकोण तथा गलत रवैये अनावृत करने में भी मदद कर सकता है। इस तरह अपनी जाँच करने का उद्देश्य परमेश्वर के संबंध में अपने विभिन्न गलत विचार, दृष्टिकोण और रवैये स्पष्ट रूप से पहचानने में तुम्हारी मदद करना है, ताकि तुम उन्हें त्याग सको और परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के कार्य और स्वयं परमेश्वर के साथ सही विचारों और दृष्टिकोणों, सही रवैये और सही तरीकों से पेश आ सको। केवल इस तरह से अभ्यास करने से ही तुम्हारे और परमेश्वर के बीच का संबंध धीरे-धीरे सामान्य हो सकता है और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है—है ना? (हाँ।) यदि तुम इस तरह से अभ्यास करते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध धीरे-धीरे एक सृजित प्राणी और सृष्टिकर्ता के बीच के संबंध के आधार पर और मनुष्य से परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानक की नींव पर विकसित होगा। इस मानक को पूरा करने के बाद ही मनुष्य और परमेश्वर के बीच का संबंध उत्तरोत्तर सामान्य हो सकता है। यहाँ “सामान्य” का क्या अर्थ है? क्या तुम लोग जानते हो? (इसका अर्थ है कि मनुष्य सृष्टिकर्ता के साथ अपने व्यवहार में बेहतर तरीके से एक सृजित प्राणी का स्थान ग्रहण कर सकता है। उसके मन में परमेश्वर के प्रति अब कोई सावधानी और संदेह नहीं रहता, बल्कि वह परमेश्वर के साथ खुलेपन और ईमानदारी से पेश आ सकता है।) क्या किसी और को कुछ कहना है? (जब परमेश्वर के साथ किसी का संबंध सामान्य हो जाता है, तो फिर वह न केवल परमेश्वर के प्रति सावधानी या संदेह नहीं रखता, बल्कि फिर वह परमेश्वर से माँगें भी नहीं करता, उसकी कोई बेजा इच्छाएँ नहीं होतीं और वह वास्तव में परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर सकता है।) तुमने पते की बात कही। उद्धार प्राप्त करने वाले लोगों में देखी जाने वाली अंतिम अभिव्यक्ति यह है कि वे एक सृजित प्राणी के उचित स्थान पर खड़े हो सकते हैं और सृष्टिकर्ता के प्रति समर्पण कर सकते हैं। जब मनुष्य परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है, तो वह वास्तव में परमेश्वर की आराधना करता है; वास्तव में परमेश्वर की आराधना करके ही वह परमेश्वर का भय प्राप्त कर सकता है और वास्तव में परमेश्वर का भय मान सकता है और बुराई से दूर रह सकता है। इसलिए, जब बात यह आती है कि मनुष्य का परमेश्वर के साथ कैसा संबंध है या वह परमेश्वर के साथ कैसा संबंध स्थापित करता है, तो यह किस पर निर्भर करता है? यह मनुष्य के अनुसरण और परमेश्वर के प्रति उसके रवैये पर और इस बात पर निर्भर करता है कि वह परमेश्वर को कितना जानता है। यदि तुम्हें परमेश्वर का कोई ज्ञान नहीं है और तुम उसके बारे में धारणाओं और कल्पनाओं और उसके लिए बेजा इच्छाओं से भरे हो, तो भले ही तुम कुछ सत्यों का अभ्यास कर सको और कुछ ऐसे कर्तव्य निभा सको जो एक सृजित प्राणी को निभाने चाहिए, जहाँ तक परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध की बात है, तुम्हारे द्वारा निभाए जाने वाले कर्तव्य या तुम्हारे द्वारा अभ्यास किए जाने वाले सत्य बहुत सीमित हैं। उदाहरण के लिए, अपना कर्तव्य निभाने में तुम त्याग करने और खुद को खपाने और कष्ट सहने और कीमत चुकाने में सक्षम हो, या तुम कलीसिया में कुछ ऐसा काम कर सकते हो जो तुम्हारी क्षमताओं के भीतर हो। लेकिन जब परमेश्वर तुम्हारे साथ ऐसी चीजें करता है जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं होतीं या जब वह तुम्हें वंचित करता है या तुम्हें ताड़ना देता और अनुशासित करता है, तो क्या तुम समर्पण कर पाते हो? यदि तुम्हें परमेश्वर की सच्ची समझ और ज्ञान है, तो तुम बहुत स्वाभाविक रूप से एक सृजित प्राणी का स्थान ग्रहण कर लोगे और समर्पण का रवैया रखोगे। लेकिन यदि तुम्हें परमेश्वर की सच्ची समझ और ज्ञान नहीं है, तो जब तुम्हारा सामना ऐसी चीजों से होता है जो तुम्हारी इच्छा के अनुसार नहीं होतीं या जब तुम ऐसी चीजों का सामना करते हो जिनमें तुम्हारे व्यक्तिगत हित शामिल होते हैं, तो तुम बहुत स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के बारे में सभी प्रकार के विचार और सभी प्रकार की धारणाएँ और कल्पनाएँ विकसित कर लोगे। इस तरह, एक सृजित प्राणी के रूप में, तुम्हारे लिए परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण प्राप्त करना बहुत कठिन होगा। अगर तुममें कुछ सतही समर्पण या समर्पण करने की इच्छा हो, तो भी यदि वह परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है तो तुम्हारा यह समर्पण वह नहीं है जो परमेश्वर चाहता है। यदि तुम्हारा यह समर्पण पूरी तरह से मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं से उत्पन्न होता है, परमेश्वर के बारे में और परमेश्वर के कार्य के बारे में तुम्हारे ज्ञान के साथ टकराता है और सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, तो यह एक मिलावटी समर्पण है; यह सच्चा समर्पण नहीं है और यह वह समर्पण नहीं है जो परमेश्वर चाहता है। परमेश्वर ऐसे समर्पण को स्वीकृति नहीं देता। उसकी नज़र में, तुम समर्पण से पूरी तरह रहित हो। यदि तुम वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में असमर्थ हो, तो इसका अर्थ यह है कि तुम्हारा तथाकथित “अनुसरण” और तथाकथित “सत्य का अभ्यास” मूलभूत रूप से परमेश्वर के साथ ऐसा संबंध स्थापित करने में तुम्हारी मदद करने में विफल रहे हैं, जो एक सृजित प्राणी और सृष्टिकर्ता के बीच का संबंध है। तुम जो कुछ भी करते हो उसमें से अधिकांश में, तुम अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं, धारणाओं और कल्पनाओं के बीच जी रहे हो, जिसे परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं हो सकती। परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त न करने का अंततः एक ही परिणाम होता है : तुम जो करते हो और जिसका अभ्यास करते हो, वह परमेश्वर की अपेक्षाओं से कम पड़ता है, और तुम अपने इच्छाजनित विश्वास के बीच या अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के बीच जीते हो। अंत में, तुम जो करते हो और जिसका अभ्यास करते हो, और तुम जिस मार्ग पर चलते हो, वह तुम्हें उद्धार के मार्ग पर चलाने और उद्धार प्राप्त कराने में सक्षम नहीं होगा। तो क्या तुम्हारे क्रियाकलाप व्यर्थ नहीं जाएँगे? (हाँ।) इन परिस्थितियों में, तुम्हारे क्रियाकलाप व्यर्थ जाएँगे। तो क्या मूलभूत रूप से तुमने इन सभी वर्षों में परमेश्वर में अपने विश्वास से ‘कुछ नहीं’ हासिल नहीं किया होगा? (हाँ।) कुछ नहीं हासिल करने का क्या कारण है? (लोग हमेशा अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं, धारणाओं और कल्पनाओं के बीच जीते हुए परमेश्वर में विश्वास करने के मार्ग पर चलते हैं।) यह तथ्य कि कई वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी तुम्हें कुछ हासिल नहीं होता, इसलिए नहीं है कि तुमने कीमत नहीं चुकाई है, तुम कष्ट सहने के लिए अनिच्छुक रहे हो या तुम खुद को खपाने के लिए अनिच्छुक रहे हो, और इसलिए तो बिल्कुल भी नहीं है कि तुमने अपना कर्तव्य नहीं निभाया है। तो फिर इसका क्या कारण है? वह यह है कि, कष्ट सहने और कीमत चुकाने, चीजें त्यागने और खुद को खपाने और अपना कर्तव्य निभाने के दौरान तुम जो कुछ भी करते हो, उसमें से अधिकांश केवल तुम्हारे इच्छाजनित विश्वास के परिणामस्वरूप किया जाता है और तुम उसे परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार करने के बजाय अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के बीच जीते हुए करते हो। फिर भी तुम हमेशा यही मानते हो कि तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य कर रहे हो। चूँकि तुम्हारा यह विश्वास धारणाओं से भरा है, इसलिए तुम अंततः सत्य प्राप्त करने में और उद्धार प्राप्त करने का परिणाम हासिल करने में विफल रहते हो। तब तुम्हारे सभी कार्य व्यर्थ हो गए। यदि कोई अंततः इस बिंदु तक पहुँच जाता है, तो क्या तुम लोग यह नहीं कहोगे कि यह काफी शोचनीय है? (हाँ।) ऊपर से तो ऐसा लगता है कि लोग अपने कर्तव्य निभा रहे हैं, परमेश्वर के वचनों का प्रचार कर रहे हैं और कष्ट सह रहे हैं और कीमत चुका रहे हैं, लेकिन वास्तव में, वे कई धारणाएँ और कल्पनाएँ, और कई गलत विचार, दृष्टिकोण और रवैये रखते हुए परमेश्वर का अनुसरण और उसकी सेवा कर रहे हैं। यदि तुम इन मिलावटों के साथ अपना कर्तव्य निभाते हो, तो अंततः जब परमेश्वर तुम्हें परखता है, तब तुम नहीं जान पाओगे कि परमेश्वर ऐसा क्यों करता है या परमेश्वर तुमसे क्या अपेक्षा करता है और इस तरह तुम्हें परखकर वह तुममें क्या परिणाम हासिल करने का इरादा रखता है। अंत में, जब परमेश्वर तुम्हें परखता है, तब तुम परमेश्वर से जो शब्द कहते हो वे और तुम्हारी प्रार्थनाएँ शिकायतों, नासमझी और संदेह से भरी होंगी, यहाँ तक कि दुख और पीड़ा से और परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं से भरी होंगी। तो क्या इस पूरे समय में तुम्हारा अनुसरण विफलता में परिणत नहीं हुआ होगा और क्या तुम्हारे द्वारा सहा गया कष्ट और चुकाई गई कीमत व्यर्थ नहीं गई होगी? (हाँ।) उदाहरण के लिए, मान लो तुमने कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है और हमेशा कष्ट सहा है और कीमत चुकाई है; तुमने बाहरी तौर पर वह सब कुछ किया है जो परमेश्वर ने तुमसे करने के लिए कहा था और इन वचनों को मजबूती से पकड़े रखा है। लेकिन एक दिन, अय्यूब की तरह का कोई परीक्षण तुम पर आ पड़ता है और तुम अचानक संदेह से भर जाते हो : “क्या मेरा विश्वास गलत हो सकता है? क्या ऐसा हो सकता है कि मैं गलत मार्ग पर चल रहा हूँ? परमेश्वर मेरे लिए ऐसे परिवेश का इंतजाम क्यों करेगा? परमेश्वर मुझ पर इस तरह का कार्य क्यों करेगा? वह मेरे साथ ऐसी चीज क्यों होने देगा?” तुम नहीं समझते, और नहीं जानते कि क्या हो रहा है। एक तो, व्यक्तिपरक रूप से, ऐसा बहुत कुछ है जिसे तुम नहीं समझते। इसके अतिरिक्त, लोगों की सबसे बड़ी समस्या क्या है? जब वे सभी प्रकार की चीजों का सामना करते हैं, तो वे केवल प्रार्थना करना और खुद को इन स्थितियों से बाहर निकालने का प्रयास करना जानते हैं। जो लोग थोड़े बेहतर हैं, वे खुद को जानने की कोशिश करेंगे ताकि यह पता लगा सकें कि क्या उन्होंने परमेश्वर को नाराज किया है, क्या परमेश्वर उन्हें अनुशासित कर रहा है, क्या उनके बारे में ऐसा कुछ है जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं है, या क्या उनके कार्यों और कर्मों ने उनके लिए परमेश्वर की घृणा अर्जित की है। हालाँकि, जब अधिकांश लोग ऐसी चीजों का सामना करते हैं, तो वे नहीं जानते—सकारात्मक अर्थ में—कि परमेश्वर के कार्य के लिए सक्रिय रूप से अपनी भूमिका कैसे निभाएँ और परमेश्वर के साथ सहयोग कैसे करें, उन सिद्धांतों के अनुसार, जिनका एक सृजित प्राणी को पालन करना चाहिए, या सृष्टिकर्ता के निर्देशों के अनुसार कैसे अभ्यास करें, या वर्तमान समस्या हल करने के लिए सक्रिय रूप से अभ्यास का मार्ग और सत्य सिद्धांत कैसे खोजें। यह अधिकांश लोगों के बस की बात नहीं है। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।) देखो, जब लोग चीजों का सामना करते हैं, तब वे अलग-अलग जगहों पर कारण खोजने की कोशिश करते हैं—वे खुद में खोज सकते हैं, वे वस्तुनिष्ठ कारण खोजने की कोशिश कर सकते हैं, वे कुछ ऐसे बहाने लेकर आने की कोशिश कर सकते हैं जिनका उपयोग वे बहस करने और खुद को सही ठहराने के लिए कर सकें, या वे अन्य लोगों पर संदेह कर सकते हैं और उनमें कारण ढूँढ़ सकते हैं। लेकिन बिरले ही कोई सक्रिय रूप से सत्य सिद्धांतों को खोजने और सक्रिय रूप से समस्या हल करने के लिए परमेश्वर के सामने आता है। अंततः, जब परमेश्वर उस स्थिति या परिवेश को हटा देता है जिसका लोग सामना कर रहे होते हैं, तब लोग कितना प्राप्त कर सकते हैं? अधिकांश लोग केवल यह जानते हैं कि अगली बार ऐसी चीजों का सामना करने पर उन्हें सावधान रहना होगा, और वे केवल यह जानते हैं कि कि इन चीजों के फिर से सामने आ सकने के संकेत होने पर इनसे कैसे बचा जाए या इन्हें कैसे बेअसर किया जाए। लेकिन बहुत कम लोग इस बात पर विचार करते हैं कि ऐसी चीजों का सामना करने पर उन्हें सक्रिय रूप से कैसे सहयोग करना चाहिए, परमेश्वर द्वारा लोगों को बताए गए सिद्धांतों के अनुसार कैसे अभ्यास करना चाहिए और सत्य सिद्धांतों के अनुसार समस्या कैसे हल करनी चाहिए। अधिकांश लोगों के लिए ऐसा करना आसान नहीं है, है ना? (हाँ।)

क्या देहधारी परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्यागने के विषय पर संगति करने का देहधारी परमेश्वर को जानने से कोई संबंध है? (हाँ, है।) क्या संबंध है? (यदि हम देहधारी परमेश्वर को नहीं जानते और केवल अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो अंत में बहुत संभव है कि हम खाली हाथ रह जाएँगे और हमारे सारे प्रयास व्यर्थ हो गए होंगे और हमें कुछ हासिल नहीं हुआ होगा। इसलिए, यदि हम परमेश्वर में अपने विश्वास में सही मार्ग पर आना चाहते हैं, तो हमें देहधारी परमेश्वर को जानना ही चाहिए। यह सत्य बहुत महत्वपूर्ण है।) यह तो तुम्हें सैद्धांतिक रूप से समझना चाहिए—तो फिर तुम्हें इसका अभ्यास कैसे करना चाहिए? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। देहधारी परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने के बाद तुम्हें वास्तविक जीवन में सभी प्रकार की चीजें इस ज्ञान के आधार पर ही सँभालनी और हल करनी चाहिए और इसका इस्तेमाल करके यह पता लगाना चाहिए कि सभी प्रकार की चीजों के लिए अभ्यास के सिद्धांत क्या होने चाहिए। तुम्हें चाहे जिस भी प्रकार का ज्ञान हो, इस ज्ञान के होने का उद्देश्य समस्याएँ हल करना है, न कि तुम्हारा किसी सिद्धांत में महारत हासिल करना। देखो, हमने देहधारी परमेश्वर से जुड़े बहुत सारे विषयों पर संगति की है, लेकिन विषय चाहे जो भी हो, उसमें वास्तविक जीवन की असली समस्याएँ शामिल रहती हैं। जब तुम इन वास्तविक समस्याओं का सामना करते हो, तब तुम्हें इन पर कुछ विचार करना चाहिए। तुम इनके बारे में क्या सोचते हो? इनके प्रति तुम्हारा क्या रवैया है? तुम इन्हें हल करने की क्या योजना बना रहे हो? तुम बस इन्हें नजरअंदाज कर दोगे या इन्हें हल करने के लिए सत्य खोजोगे? यदि इन विषयों पर मेरी संगति सुनने के बाद तुम केवल कुछ सिद्धांत याद रखते हो, लेकिन अपनी कठिनाइयाँ और समस्याएँ हल करने के लिए मेरे वचन वास्तविक जीवन में लागू नहीं कर सकते, तो तुमने जो प्राप्त किया है वह केवल धर्म-सिद्धांत है, जिससे तुम्हें कोई मदद नहीं मिलेगी। लेकिन यदि इन विषयों पर मेरी संगति सुनने के बाद तुम मेरे वचन वास्तविक जीवन में लागू करते हो, परमेश्वर के प्रति अपने गलत दृष्टिकोण और गलत रवैये सुधारते हो, परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से छुटकारा पाते हो और परमेश्वर के साथ अपना संबंध बेहतर बनाते हो, तो तुमने जो हासिल किया है वह सत्य है। यदि तुम उन वचनों और विषय-वस्तु का, जिन पर मैंने तुम्हारे साथ संगति की है, उपयोग अपनी धारणाएँ और कल्पनाएँ, परमेश्वर के बारे में अपने गलत विचार और दृष्टिकोण और अपने गलत रवैये हल करने के लिए करते हो, तो तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित कर पाओगे। लेकिन यदि तुम अपनी समस्याएँ नजरअंदाज करते हो और उनकी परवाह नहीं करते, कभी यह देखकर चिंतन नहीं करते कि तुम परमेश्वर के वचनों से कितना मेल खाते हो, और स्पष्ट रूप से यह जानने के बावजूद कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारे रवैये में समस्याएँ हैं, तुम यह वास्तविक समस्या हल करने के लिए सत्य नहीं खोजते, तो मेरे वचनों का तुम्हारे लिए कोई अर्थ नहीं रहा और तुमने उन्हें व्यर्थ ही सुना, है ना? (हाँ।) तुम लोगों की स्थिति कैसी है? (यद्यपि हम जानते हैं कि हमें परमेश्वर के वचनों को धर्म-सिद्धांत नहीं समझना चाहिए और हमें वास्तविक जीवन में उनका अभ्यास करना चाहिए, फिर भी अभी हमारा प्रवेश अपेक्षाकृत उथला है।) तुम्हारे जीवन प्रवेश का उथला होना चिंता की कोई बात नहीं है—अगर तुम लगातार सत्य खोजते हो, तो तुम धीरे-धीरे गहरा प्रवेश हासिल कर लोगे। इस नींव पर, धीरे-धीरे चीजों पर विचार करो और अपनी जाँच करो, और परमेश्वर के वचनों से अपना मिलान करो, और फिर अपने गलत विचार और दृष्टिकोण—और परमेश्वर के प्रति अपने गलत रवैये—सुधारो और सही विचारों और दृष्टिकोणों, और सही रवैये के साथ परमेश्वर के साथ पेश आओ और उसे जानो। इस तरह, कदम-दर-कदम, परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध और भी अधिक सामान्य हो जाएगा।

देहधारी परमेश्वर के विषय के बारे में हमने जो बातें की हैं, वे अमूर्त या खोखली नहीं हैं। वे बहुत विशिष्ट हैं, वास्तविक जीवन से जुड़ी हैं और वास्तविक जीवन से बिल्कुल भी अलग नहीं हैं, इसीलिए मैं कहता हूँ कि वे खोखली या अमूर्त नहीं हैं। यदि तुम दिल से सुनते और विचार करते हो, तो तुम सत्य के इस पहलू पर अधिकाधिक स्पष्ट हो जाओगे। संक्षेप में, यदि कोई परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त करना चाहता है और एक सृजित प्राणी और सृष्टिकर्ता के बीच सामान्य संबंध स्थापित करना चाहता है, तो परमेश्वर को जानने का यह सबक उसे सीखना ही चाहिए और परमेश्वर को जानने की इस प्रक्रिया का उसे अनुभव करना ही चाहिए। परमेश्वर को जानने का यह सबक दो चीजों से शुरू होना चाहिए : देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता को जानना और देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाएँ और कल्पनाएँ त्यागना। यह भी कहा जा सकता है कि यह सबक सबसे बुनियादी पहलुओं से शुरू होना चाहिए। जब तुम देहधारी परमेश्वर के साथ एक सृजित प्राणी और सृष्टिकर्ता के बीच का सामान्य संबंध स्थापित कर लेते हो और मनुष्य और परमेश्वर के बीच का सामान्य संबंध स्थापित कर लेते हो, तब तुम मानवीय परिप्रेक्ष्य अपनाओगे और देहधारी परमेश्वर, उसके वचनों और कार्य के साथ और तुम्हारे प्रति उसका जो भी रवैया है उसके साथ सही विचारों और दृष्टिकोणों, और सही रवैये के साथ पेश आओगे। जब तुम देहधारी परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध—मनुष्य और परमेश्वर के बीच का संबंध—स्थापित कर लेते हो, तब तुम्हारे लिए परमेश्वर के प्रति खुला और ईमानदार होना, उसके प्रति सम्मानपूर्ण होना और उसके प्रति आज्ञाकारी होना बहुत मुश्किल नहीं होना चाहिए, है ना? (हाँ।) यह वह लक्ष्य है जिसका मनुष्य को अनुसरण करना चाहिए, और यह वह सिद्धांत भी है जिसका मनुष्य को अभ्यास करना चाहिए। देहधारी परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करने की शुरुआत उसके साथ मेलजोल करने, जुड़ने, संवाद करने और व्यवहार करने से होनी चाहिए। इस नींव पर, तुम्हें देहधारी परमेश्वर के बारे में अपनी समझ बढ़ानी चाहिए, उसके साथ अक्सर बातचीत और संवाद करना चाहिए और इस प्रकार परमेश्वर की सच्ची समझ और ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। यदि स्वर्ग स्थित परमेश्वर के साथ बातचीत करना, संवाद करना और मेलजोल करना मनुष्य के लिए बहुत दूर और यहाँ तक कि पहुँच से बाहर की बात है और अवास्तविक और गैर-वस्तुनिष्ठ भी है, तो मनुष्य परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करने की नींव पर उसके साथ कैसे मेलजोल कर सकता है, संवाद कर सकता है और संबंध बना सकता है? इस अवधि के दौरान जिसमें देहधारी परमेश्वर बोल और कार्य कर रहा है, मनुष्य के लिए ये चीजें हासिल करने की स्थितियाँ मौजूद हैं; चाहे जीवन में हो या कार्य करने में, ये स्थितियाँ उपलब्ध हैं। चूँकि ये स्थितियाँ उपलब्ध हैं, इसलिए मनुष्य को चूकना नहीं चाहिए। यह मनुष्य के लिए सृष्टिकर्ता के साथ सही ढंग से पेश आने का प्रशिक्षण लेने का एक अच्छा अवसर है। यदि मनुष्य इस अवसर का लाभ उठाता है और इसका सदुपयोग करता है, तो उसके पास स्वर्ग स्थित परमेश्वर को अधिक व्यावहारिक तरीके से समझने और जानने का अवसर और साधन होगा। तब मनुष्य के लिए स्वर्ग स्थित परमेश्वर को समझना और जानना ऐसी चीज बन जाता है जो अब कल्पित और खोखली नहीं रहती, और बेशक, यह ऐसी चीज नहीं रहती जिसके बारे में वह केवल सोच सकता है लेकिन उसे प्राप्त नहीं कर सकता। मनुष्यों के देहधारी परमेश्वर के संपर्क में आने और उससे जुड़ने की प्रक्रिया में एक ओर वे धीरे-धीरे अपने बारे में जानते हैं और परमेश्वर के बारे में अपनी विभिन्न धारणाएँ और कल्पनाएँ जान जाते हैं। इसके अलावा, वे धीरे-धीरे परमेश्वर के सुख, क्रोध, दुख और ख़ुशी, मनुष्य के प्रति परमेश्वर के विभिन्न रवैयों और उन सिद्धांतों और तरीकों के बारे में, जिनके द्वारा परमेश्वर बोलता और कार्य करता है, और साथ ही ऐसा करने में उसके उद्देश्य के बारे में भी जानते हैं। यहाँ जो चीज महत्वपूर्ण है, वह है मनुष्य अपनी आँखों से जो देखता है, अपने कानों से जो सुनता है और अपने हृदय से जिसका अनुभव करता है, उसके माध्यम से उसे परमेश्वर के वचनों और कार्यों के विभिन्न पहलुओं को अधिक व्यावहारिक और सटीक रूप से समझने देना। इन परिस्थितियों में, मनुष्य अब परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के बीच नहीं जी रहा होगा। यदि अंत के दिनों में परमेश्वर ने देहधारण न किया होता, अगर मनुष्य अभी भी अनुग्रह के युग के प्रभु यीशु में विश्वास करता और उसने कई वर्षों तक ऐसा किया होता, तो भी परमेश्वर के बारे में उसकी समझ और ज्ञान व्यावहारिक रूप से शून्य होता; उसे परमेश्वर का थोड़ा-सा भी सच्चा ज्ञान न होता। इसलिए, धार्मिक दुनिया में ऐसा कोई नहीं है जो वास्तव में परमेश्वर को जानता हो। अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर को स्वीकार करने वालों द्वारा प्राप्त किया गया परमेश्वर का ज्ञान अलग है; जिनके पास यह ज्ञान है, वे अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु में विश्वास करने वालों की तुलना में परमेश्वर के बारे में बहुत अधिक जानते हैं। चूँकि अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर लंबे समय से कार्य कर रहा है, कई सत्य व्यक्त करता है, बहुत सारा कार्य करता है, लंबे समय तक मनुष्य के साथ मिला-जुला है, जुड़ा है और रहा है, और लोगों की एक विस्तृत शृंखला के संपर्क में आता है, इसलिए मनुष्य के लिए परमेश्वर को समझने और जानने की स्थितियाँ अधिक अनुकूल हैं। यानी, इस देहधारण ने मनुष्य को परमेश्वर के संपर्क में आने के लिए अधिक अनुकूल स्थितियाँ और अवसर प्रदान किए हैं, अपने कानों से परमेश्वर की आवाज सुनने दी है और अपनी आँखों से परमेश्वर की हर गतिविधि, परमेश्वर का सुख, क्रोध, दुख और खुशी, और साथ ही परमेश्वर के दैनिक जीवन के विभिन्न पहलुओं के कई विवरण देखने दिए हैं। देहधारी परमेश्वर की मानवता के बाहरी स्वरूप के अलावा, जिसके संपर्क में मनुष्य आ सकता है, परमेश्वर के जीवन और उसके सार से जुड़े तमाम विवरण मनुष्य को परमेश्वर की गहरी और अधिक सटीक समझ प्राप्त करने देने के लिए पर्याप्त होने चाहिए। बेशक, इस गहरी और अधिक सटीक समझ से मनुष्य को परमेश्वर के साथ एक बेहतर, अधिक स्वस्थ संबंध स्थापित करने और विभिन्न धारणाओं और कल्पनाओं से मुक्त होने में सक्षम होना चाहिए, उसे परमेश्वर के बारे में अपनी सभी धारणाएँ और कल्पनाएँ छोड़ देनी चाहिए। है ना? (हाँ।) इसलिए, मैं चाहे जिस पर भी संगति करूँ, संगति का उद्देश्य मनुष्य की परमेश्वर को बेहतर ढंग से समझने और जानने में मदद करना है। बेशक, मैंने कभी एक व्यक्ति के रूप में देहधारी परमेश्वर के परिवार, उसने जो शिक्षा प्राप्त की या जिस माहौल में वह बड़ा हुआ, उसके बारे में बात नहीं की है, और उसके पारिवारिक इतिहास, उसके परिवार के रीति-रिवाजों, उसके घर के माहौल या उसके परिवार द्वारा अपनाई गई विशिष्ट जीवन-शैली और शिक्षा के तरीकों के बारे में तो बिल्कुल भी बात नहीं की है। बेशक, मैंने तुम लोगों को कभी यह भी नहीं बताया कि मेरा व्यक्तित्व कैसा है या मेरी रहन-सहन की आदतें क्या हैं, न ही मैंने कभी बुनियादी जरूरतों के संबंध में अपने जीवन के मामूली विवरणों के बारे में बात की है। इसके विपरीत, मैंने किस बारे में बात की है? (उन कुछ सिद्धांतों के बारे में, जिनके द्वारा देहधारी परमेश्वर आचरण और कार्य करता है।) चाहे उदाहरण देना रहा हो, किसी चीज के तथ्यों के बारे में बात करना रहा हो या सत्य के किसी पहलू के बारे में बात करना रहा हो, मैंने जिसके बारे में भी बताया है, उसमें परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का सार और परमेश्वर की पहचान शामिल रही है; यह सब मनुष्य के परमेश्वर संबंधी ज्ञान से जुड़ा है। अगर मैं बुनियादी जरूरतों से जुड़े कुछ उदाहरण भी देता हूँ, तो भी मेरा उद्देश्य यह नहीं होता कि तुम लोग इस बात पर ध्यान केंद्रित करो कि मैं क्या खाता हूँ, क्या पहनता हूँ या मेरे रहन-सहन की आदतें क्या हैं, बल्कि तुम लोगों को यह जानने में मदद करना होता है कि जब परमेश्वर देह में आता है और लोगों के साथ रहता है तो उसके आचरण और कार्य करने के सिद्धांत क्या होते हैं। अगर मैं जिस बारे में बात करता हूँ उसमें देहधारी परमेश्वर के जीने के कुछ तरीके शामिल होते भी हैं, तो भी यह तुम लोगों को इन चीजों के संबंध में उसके दृष्टिकोण और सिद्धांत समझने, एक लिहाज से सिद्धांतों को समझने-बूझने और इस नींव पर परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता, और साथ ही उसके आचरण और कार्य करने के सिद्धांत बेहतर ढंग से समझने में मदद करने के लिए होता है। इन सिद्धांतों के विशिष्ट विवरण समझना ठीक तुम लोगों को यह समझने में सक्षम बनाना है कि देहधारी परमेश्वर, इस साधारण व्यक्ति का जीवन कैसा है और इसका जीवन परमेश्वर से कैसे जुड़ा है। मैं इसी सिद्धांत के अनुसार संगति करता हूँ। मेरा उद्देश्य तुम लोगों से बुनियादी जरूरतों के संबंध में अपने चुनावों, अपनी विशिष्ट जीवन-शैली या मुझे कौन-से रंग पसंद हैं, उनकी नकल करवाना नहीं है। यह मेरा उद्देश्य नहीं है। मैं केवल तुम लोगों को अपने सिद्धांत बता रहा हूँ। उदाहरण के लिए, जब मैं तुम्हें बताता हूँ कि मैं क्या खाता हूँ या मेरी रोजमर्रा की आदतें क्या हैं, तो इसलिए नहीं बताता कि तुम मेरी नकल कर सको या किसी नियम का पालन कर सको, बल्कि तुम्हें इस बात से अवगत कराने के लिए बताता हूँ कि जब देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर आता है तो उसकी साधारणता और सामान्यता में क्या शामिल होता है और उसके आचरण और कार्य करने के सिद्धांत क्या हैं। यह पर्याप्त है कि मेरे द्वारा दिए गए उदाहरणों के माध्यम से और कुछ तथ्यों के माध्यम से तुम सिद्धांतों, सत्य के इस पहलू और परमेश्वर के जीवन और स्वभाव को समझो, जिन्हें तुम्हें जानना चाहिए। इसलिए, मैं तुम्हें कभी यह नहीं बताता कि मुझे लंबे बाल पसंद हैं या छोटे बाल; मैं तुम्हें केवल यह बताता हूँ कि बाल लंबे करने या छोटे रखने के कारण और सिद्धांत क्या हैं, ताकि तुम सिद्धांतों को समझ सको। देहधारी परमेश्वर के बारे में इन सत्यों पर संगति करने में मनुष्य का परमेश्वर के सार और परमेश्वर की पहचान का ज्ञान शामिल है और इसमें परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता शामिल है। यदि कोई यह मानता है कि पृथ्वी पर मौजूद परमेश्वर का संबंध केवल परमेश्वर के कार्य और वचनों से है और केवल स्वर्ग स्थित परमेश्वर का ही परमेश्वर के कर्मों से संबंध है, तो क्या यह समझ सही है? (नहीं।) तो क्या पृथ्वी पर मौजूद परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन और किया गया कार्य स्वर्ग स्थित परमेश्वर से उत्पन्न होते हैं? (हाँ।) यदि तुम इसे इस तरह समझ सकते हो, तो अच्छा है। मैंने तुम लोगों को कभी नहीं बताया कि मेरा जन्म कहाँ हुआ था, मेरा बचपन कैसा बीता या मैंने किस तरह की शिक्षा प्राप्त की, न ही मैंने कभी उस माहौल के बारे में जिसमें मैं पला-बढ़ा, उस शैक्षिक माहौल के बारे में जिसमें मैं रहा या अपने पारिवारिक इतिहास के बारे में बात की, क्या मैंने ऐसा किया है? (नहीं।) कुछ लोग कहते हैं, “तुम्हारा परिवार कोई प्रमुख परिवार नहीं है। तुम एक साधारण व्यक्ति की तरह ही पले-बढ़े हो। यह बताने लायक नहीं है, इसलिए तुम इसका जिक्र नहीं करते।” क्या यही कारण है कि मैं इन चीजों के बारे में बात नहीं करता? (नहीं।) तो फिर मैं इनके बारे में बात क्यों नहीं करता? (इन चीजों के बारे में बात करने से हमें देहधारी परमेश्वर को जानने में कोई मदद नहीं मिलेगी।) इनका देहधारी परमेश्वर को जानने से कोई लेना-देना नहीं है, इसलिए मैं इनके बारे में बात नहीं करता। यदि मैं इन चीजों के बारे में बात करूँ, तो तुम लोग जा सकते हो और सुनोगे नहीं। लेकिन यदि मैं तुम्हें देहधारी परमेश्वर के कार्य, वचनों, स्वभाव और सार के साथ-साथ उसके जीवन की विभिन्न अभिव्यक्तियों और प्रकाशनों के बारे में बताऊँ, तो तुम लोगों को ध्यान से और गंभीरता से सुनना चाहिए। तुम लोगों को वह सुनना ही चाहिए जिसमें सत्य शामिल हो; इस विषय-वस्तु को सुनना तुम लोगों के लिए परमेश्वर को जानने में मददगार है। कुछ लोग कहते हैं, “परमेश्वर को जानने का मेरे सत्य का अनुसरण करने से क्या संबंध है?” मुझे बताओ, क्या कोई संबंध है? (हाँ।) क्या परमेश्वर को जानना सत्य का अनुसरण करने की जगह ले सकता है? परमेश्वर को जानने और सत्य का अनुसरण करने के बीच क्या संबंध है? क्या तुम लोगों को लगता है कि देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता में प्रकट होने वाले कार्य करने और बोलने के सिद्धांतों का, जिन पर मैं अभी तुम लोगों के साथ संगति कर रहा हूँ, सत्य से कोई संबंध है? (हाँ।) तो परमेश्वर को जानने का सत्य का अनुसरण करने से क्या संबंध है? (मुझे लगता है कि परमेश्वर को जानना ही सत्य का अनुसरण करना है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर को जानना हमें उन विभिन्न सिद्धांतों को, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है और उन विभिन्न स्वभावों को, जिन्हें परमेश्वर प्रकट करता है, जानने देता है और हमें अपने कार्यों और कर्मों तथा हमारे द्वारा प्रकट किए जाने वाले भ्रष्ट स्वभावों पर चिंतन करने में मदद करता है। यह हमें हमारे अभ्यास के लिए एक दिशा भी देता है। एक बात तो यह है। दूसरी बात यह है कि परमेश्वर को जानना मनुष्य को सत्य का अनुसरण करने के लिए प्रेरित कर सकता है। जब व्यक्ति के पास परमेश्वर के सार और स्वभाव का कुछ ज्ञान होता है, तब उसके हृदय में एक सकारात्मक इच्छा और संकल्प उत्पन्न होगा—वह परमेश्वर को और अधिक जानना चाहेगा और सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना चाहेगा—और वह धीरे-धीरे अपने भ्रष्ट स्वभाव त्याग देगा और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित छवि जिएगा। इसलिए, मुझे लगता है कि परमेश्वर को जानना ही सत्य का अनुसरण करना है, और यह मनुष्य को सत्य का अनुसरण करने के लिए प्रेरित कर सकता है।) जब कोई व्यक्ति परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण कर रहा होता है, तो वह वास्तव में सत्य का अनुसरण भी कर रहा होता है; वह सत्य को गंभीरता से ले रहा होता है और यह देख रहा होता है कि परमेश्वर ठीक कैसे कार्य करता है और विभिन्न क्षेत्रों में परमेश्वर क्या अपेक्षा करता है। जब मनुष्य इन चीजों को विस्तार से समझ लेता है, तो उसके पास अपने अभ्यास में एक स्पष्ट लक्ष्य और अधिक सटीक दिशा होगी। परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करना ही सत्य का अनुसरण करना है—यह कथन गलत नहीं है और ये दोनों चीजें आपस में टकराती नहीं हैं। तो, क्या सत्य का अनुसरण करना तुम्हें परमेश्वर को जानने देता है? (हाँ।) जब तुम सत्य का अनुसरण करते हो, तब तुम धीरे-धीरे परमेश्वर को भी जानने लगते हो। सत्य का अनुसरण करने की प्रक्रिया सत्य का अभ्यास करने की प्रक्रिया है। जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो, तब तुम धीरे-धीरे परमेश्वर के इरादे और तुमसे परमेश्वर की अपेक्षाएँ समझते हो और तुम यह भी समझते हो कि विशिष्ट मामलों में परमेश्वर के अपेक्षित मानक, इच्छाएँ और इरादे क्या हैं। जब तुम इन चीजों को समझ लेते हो, तब तुम धीरे-धीरे परमेश्वर को जानने लगते हो। समझने की यह प्रक्रिया ही परमेश्वर को जानने की प्रक्रिया है। ये दोनों चीजें एक-दूसरे की पूरक हैं; इनमें से कोई भी अलग से मौजूद नहीं है। सत्य के चाहे जिस भी पहलू में तुम्हें सच्चा अनुभव, ज्ञान और समझ हो, सत्य के चाहे जिस भी पहलू में तुम्हें ये लाभ प्राप्त हों, तुम जो कुछ प्राप्त करते हो उसमें परमेश्वर का ज्ञान भी शामिल होगा। जब तुम्हारे पास सत्य का अनुभव और ज्ञान होता है, तब उसी समय तुम्हारे पास परमेश्वर का ज्ञान और समझ भी होती है। जब तुम्हारे पास परमेश्वर का ज्ञान होता है, तब तुम परमेश्वर के इरादों और परमेश्वर के अपेक्षित मानकों के बारे में अधिक निश्चित हो सकते हो। बाद में, जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो, तब तुम अधिक सटीक होगे और तुम धारणाओं और कल्पनाओं को पकड़े नहीं रहोगे; तुम स्पष्ट रूप से जानोगे कि परमेश्वर के इरादे क्या हैं और परमेश्वर तुमसे क्या करवाना चाहता है। परमेश्वर को जानना और सत्य का अनुसरण करना एक-दूसरे से स्वतंत्र नहीं हैं और वे एक-दूसरे से टकराते नहीं; बल्कि, वे एक-दूसरे के पूरक हैं। इसलिए, देहधारी परमेश्वर को जानना तुम्हारे सत्य के अनुसरण और अभ्यास के लिए मददगार और लाभदायक है। यह इस संबंध में एक प्रेरक शक्ति के रूप में काम कर सकता है। इससे पहले, बहुत-से लोग सोचते थे, “अब जबकि मेरे पास देहधारी परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए ये वचन हैं, तो मैंने परमेश्वर को प्राप्त कर लिया है। जब मैं चीजों का सामना करता हूँ, तब मुझे बस इन वचनों के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता है। अगर मुझे परमेश्वर की समझ या ज्ञान न हो, तो भी ठीक है; इससे मेरा सत्य का अभ्यास प्रभावित नहीं होगा।” लेकिन जब उन्होंने वास्तविक जीवन में सत्य का अभ्यास करने की कोशिश की, तो वे सभी महसूस कर सकते थे कि, यद्यपि परमेश्वर ने बहुत विशिष्टता के साथ बात की और उसके वचनों से वे समझ सकते थे कि कई विशिष्ट मामलों के लिए अभ्यास के सिद्धांत और परमेश्वर के अपेक्षित मानक क्या हैं, फिर भी जब उनके दैनिक जीवन में होने वाली कई चीजों की बात आई, तो उनमें अभी भी निश्चितता की कमी थी। वे शत-प्रतिशत निश्चित नहीं थे कि चीजों को इस तरह से करना सही है या चीजों को इस तरह से करना परमेश्वर के इरादों के अनुसार है। लेकिन जब तुम उन सटीक सिद्धांतों को समझ लेते हो, जिनके द्वारा देहधारी परमेश्वर आचरण और कार्य करता है, तब तुम पूरी तरह से निश्चिंत महसूस करोगे। जब तुम फिर से वैसी ही चीजों का सामना करोगे, तब तुम उन्हें पहले की तरह नहीं सँभालोगे जब तुम अनुमान के आधार पर ऐसे कार्य करते थे मानो तुम जुआ खेल रहे हो, और बाद में यह नहीं जानते थे कि तुमने जो किया वह सही था या गलत। देहधारी परमेश्वर के बोलने और कार्य करने के सिद्धांत समझने के माध्यम से, परमेश्वर के बारे में मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ अनजाने ही कम और क्षीण हो जाएँगी, और वे धीरे-धीरे हल हो जाएँगी। यानी, जब तुम देहधारी परमेश्वर को जानते हो और विशेष रूप से जब तुम वे सिद्धांत और तरीके जानते हो जिनके द्वारा वह आचरण और कार्य करता है, तब तुम्हारे पास सत्य का अभ्यास करने और जीवन में सभी प्रकार की चीजें सँभालने के लिए एक अधिक सटीक लक्ष्य और दिशा होगी। जब परमेश्वर ने देहधारण नहीं किया था और स्वर्ग का परमेश्वर या पवित्र आत्मा मनुष्य पर कार्य कर रहा था, तब मनुष्य को कभी इन चीजों के उत्तर न मिलते, न ही वह कभी स्वर्ग स्थित परमेश्वर से मानव जीवन के वे विभिन्न विशिष्ट मुद्दे समझने का लाभ प्राप्त कर पाता, जिन्हें मनुष्य को समझना चाहिए। अगर मनुष्य कुछ व्यवस्थाओं और आज्ञाओं का पालन कर सके, तो भी जहाँ तक सत्य सिद्धांतों और उस मार्ग की बात है जिस पर वह चलता है, यदि परमेश्वर ने कार्य करने और बोलने के लिए देहधारण न किया होता, तो मानवजाति कभी उन्हें जानने या समझने में सक्षम न होती। मनुष्य उन्हें पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से प्राप्त नहीं कर सकता, न ही वह उन्हें स्वर्ग स्थित परमेश्वर से प्राप्त कर सकता है। एकमात्र मार्ग देहधारी परमेश्वर से ये सत्य सिद्धांत प्राप्त करना है, जिन्हें मनुष्य को जीने और जीवित रहने के लिए समझना ही चाहिए। संक्षेप में, देहधारी परमेश्वर को जानना परमेश्वर को जानने का मार्ग है, परमेश्वर को समझने का मार्ग है, और इससे भी बढ़कर, मनुष्य के लिए परमेश्वर के साथ संबंध स्थापित करने या बनाए रखने का एक आवश्यक मार्ग है।

पिछली बार हमने “परमेश्वर का मनुष्य को प्रलोभन न देना” पर संगति की थी, जो देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के बराबर न रखने के व्यापक विषय में शामिल एक विषय है। हमने कहाँ छोड़ा था? (परमेश्वर ने परमेश्वर के मनुष्य को प्रलोभन न देने की तीन विशिष्ट अभिव्यक्तियों पर संगति की थी : मनुष्य को बहला-फुसलाकर उसके अंदर से जानकारी न निकालना, मनुष्य को न भड़काना और मनुष्य को न उकसाना। हमने मनुष्य को न उकसाने पर संगति पूरी कर ली थी।) इन तीनों विषयों—मनुष्य को बहला-फुसलाकर उसके अंदर से जानकारी न निकालना, मनुष्य को न भड़काना और मनुष्य को न उकसाना—में परमेश्वर के मनुष्य को प्रलोभन न देने की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ शामिल हैं। क्या हमारी पिछली संगति के बाद तुम लोगों के मन में कोई विचार आए? उन बातों को देखो जो मैंने इन वर्षों में तुम लोगों से कही हैं—क्या वे परमेश्वर द्वारा मनुष्य को प्रलोभन न देने का सिद्धांत दर्शाती हैं? (हाँ। परमेश्वर ने हमसे बात करते समय कभी हमें बहला-फुसलाकर हमारे अंदर से जानकारी निकालने की कोशिश नहीं की है। तुम हमेशा स्पष्ट बात करते हो। तुम हमें धैर्यपूर्वक और क्रमिक रूप से निर्देश देते हो, हमेशा हमारा मार्गदर्शन करते हो और हमें पोषण प्रदान करते हो और हमारा समर्थन और मदद करते हो।) तुम लोगों से बात करते समय मेरे सिद्धांतों में से एक है तुम्हें प्रलोभन न देना, जिसकी विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ हैं तुम्हें बहला-फुसलाकर तुम्हारे अंदर से जानकारी न निकालना, तुम्हें न भड़काना और तुम्हें न उकसाना। कभी-कभी मैं तुम लोगों से कुछ चीजों के बारे में पूछ सकता हूँ, लेकिन इसमें प्रलोभन देना बिल्कुल नहीं होता। इसलिए, जब तुम परमेश्वर को गलत समझते हो, तो तुम्हें विचार अवश्य करना चाहिए, “परमेश्वर के किसी भी वचन में प्रलोभन देना या बहला-फुसलाकर व्यक्ति के अंदर से जानकारी निकालना नहीं है। मुझे परमेश्वर को गलत बिल्कुल नहीं समझना चाहिए। परमेश्वर के वचनों का शाब्दिक अर्थ ही उसका वास्तविक अर्थ है। परमेश्वर मुझसे जो कुछ भी पूछता है, मैं उसका सच्चाई से उत्तर दूँगा और उसे खुले तौर पर और ईमानदारी से बताऊँगा। मैं उतना ही कहूँगा जितना मैं जानता हूँ, और यदि मैं कोई चीज नहीं जानता तो मैं उतना ही कहूँगा और परमेश्वर से कहूँगा कि उत्तर देने से पहले मुझे इसके बारे में पता लगाना होगा।” इसे खुला और ईमानदार होना कहा जाता है। तुम लोगों से बात करने और मामले सँभालने में यदि मैं देखता हूँ कि तुम लोग कठिनाइयों का सामना कर रहे हो या मुझे तुम लोगों में कोई समस्याएँ नजर आती हैं—चाहे वे समस्याएँ तुम्हारे द्वारा अपना कर्तव्य निभाने में हों या तुम्हारी मानवता में—तो मैं तुम लोगों से बातचीत करने का अवसर ढूँढ़ूँगा। ऐसा करने में मेरा उद्देश्य तुम लोगों को यह स्पष्ट रूप से देखने में मदद करना है कि तुम्हारी समस्याओं का सार क्या है, ताकि तुम उन्हें जानने के बाद हल कर सको। तुम्हारी समस्याएँ हल करने में तुम्हारी मदद करने में मेरा उद्देश्य, एक ओर, यह है कि तुम्हारी मानवता के दोष या समस्याएँ सुधर जाएँ और तुम भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार न जिओ और मनुष्य की छवि जिओ। दूसरी ओर, यह इसलिए है ताकि तुम अपना कर्तव्य बेहतर ढंग से निभा सको। मेरा उद्देश्य परमेश्वर के घर के लिए तुमसे मेहनत करवाना नहीं है, बल्कि अधिक सहजता से मानक स्तर तक अपना कर्तव्य निभाने, विघ्न-बाधाएँ पैदा न करने, अपनी पूरी क्षमता से वे काम करने जो तुम्हें करने चाहिए, अपनी भूमिका निभाने और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने में तुम्हारी मदद करना है। यदि तुम्हारी मानवता में समस्याएँ हैं, तो मैं तुमसे उनके बारे में संक्षेप में बात करूँगा। यदि तुम इसे स्वीकार कर सकते हो, तो यह स्वाभाविक रूप से सबसे अच्छा है; यदि तुम उस समय इसे स्वीकार नहीं कर सकते, तो मैं तुम्हें सूचित करने के लिए अपने तरीके का उपयोग करूँगा, ताकि तुम जान सको कि तुम्हारी समस्याएँ क्या हैं। संक्षेप में, मेरा उद्देश्य हमेशा तुम्हारा समर्थन करना और तुम्हारी मदद करना है। मेरा इरादा कभी तुम्हें ऐसे मार्ग पर चलने के लिए प्रलोभन देना नहीं होता जो गलत या बुरा हो, जिससे तुम पतित हो जाओ या बुराई करो। मेरा उद्देश्य केवल तुम्हारी मदद करना है; मेरे इरादे नेक हैं और इसके पीछे का इरादा सही और सकारात्मक है। बेशक, जब मैं ये वचन कहता हूँ और ये चीजें करता हूँ, तो इसमें कोई जबरदस्ती नहीं होती। यानी, इन वचनों को सुनने के बाद तुम्हें मेरे द्वारा बाध्य नहीं होना चाहिए। भले ही मैं तुम्हारी मानवता की समस्याओं के बारे में निश्चितता के साथ बोलूँ या तुम्हारे द्वारा अपना कर्तव्य निभाने में आने वाली समस्याओं का गहन-विश्लेषण करूँ, फिर भी तुम कह सकते हो, “मैं अभी तक वे समस्याएँ नहीं पहचान पाया हूँ जिन्हें तुमने मुझमें उजागर किया है; मुझे उन पर विचार करने की आवश्यकता है।” मैं कहता हूँ कि तुम्हें इस तरह से विचार करना चाहिए या इस समस्या पर सभी के साथ संगति करनी चाहिए। मैं जबरदस्ती यह माँग नहीं करता कि तुम मेरी व्यक्तिगत इच्छाओं के अनुसार कुछ करो; बल्कि, मैं तुम्हें पर्याप्त स्वतंत्रता देता हूँ। जब मैं तुम्हारी समस्याएँ उजागर करता हूँ, तब मैं तुम्हें याद दिला रहा होता हूँ। याद दिलाने के इस तरीके में अस्पष्ट रूप से बोलना शामिल नहीं है, बल्कि—तुम्हारे द्वारा प्रकट और प्रदर्शित किए गए शब्द या व्यवहार उजागर करके—किसी तथ्य पर संगति करना शामिल है, ताकि तुम्हें पता चल सके कि तुममें वास्तव में ये समस्याएँ हैं। मैं तुम्हें स्पष्ट रूप से और साफ-साफ बताऊँगा। मैं तुम पर गलत प्रभाव डालने के लिए अस्पष्ट शब्दों का उपयोग बिल्कुल नहीं करूँगा, जिससे तुम नकारात्मकता, कमजोरी और आत्मविस्मृति में पड़ जाओ, या तुम्हें यह महसूस हो कि मेरे वचन इतने गहरे, क्लिष्ट और अथाह हैं, ताकि तुम मेरे बारे में ऊँची राय रखो। मैं ऐसा नहीं करूँगा। मैं तुम्हें सीधे और स्पष्ट रूप से बताऊँगा; मैं घुमा-फिराकर बात नहीं करूँगा और तुम्हें अनुमान लगाने के लिए नहीं छोड़ूँगा। उदाहरण के लिए, कुछ लोग अत्यधिक भावुक होते हैं और मिलावट के साथ बोलने के आदी होते हैं। मैं उन्हें बेलाग बताता हूँ, “तुम्हारी बातें बहुत मिलावटी है, तुम पूरी तरह से अपनी भावनाओं के आधार पर बोलते हो और तुम परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं करते। तुम बस सबको खुश रखने वाले व्यक्ति हो।” मैं बस इतना स्पष्टवादी हूँ। जब कुछ लोगों को यह नहीं पता होता कि किसी स्थिति का सामना करने पर अभ्यास कैसे करना है, तब मैं उन्हें सीधे बताता हूँ, “इस मामले में तुम्हें इस तरह से करना चाहिए; उस मामले के लिए इस तरह से अभ्यास करो।” जब मैं उन्हें बताता हूँ तो मैं इतना स्पष्ट होता हूँ। इसे सुनकर, जो लोग चीजों में अपना दिल लगाते हैं और जो लोग तर्कशील हैं, वे स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं; वे उलझन में नहीं पड़ते या भ्रमित नहीं होते और वे वाकई अपने दिल में जानते हैं कि क्या करना है। बेशक, विरूपित समझ वाले कुछ भ्रमित लोग मुझे इस तरह बोलते सुनकर उलझन में पड़ जाते हैं। वे चाहे सुनने की कितनी भी कोशिश करें, वे इसका मतलब नहीं समझ पाते या सिद्धांतों को नहीं समझ पाते; उन्हें अभी भी मेरे उदाहरण देने और चीजों को विस्तार से समझाने की जरूरत होती है। लेकिन अगर मैं कोई उदाहरण दे भी दूँ और उन्हें फिर से सिखा दूँ तो भी, वे अभी भी नहीं समझ सकते और नहीं जानते कि अभ्यास कैसे करना है। ऐसा इसलिए नहीं है कि मैंने चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं समझाया, बल्कि इसलिए है क्योंकि उनकी काबिलियत बहुत खराब है और वे स्वयं बहुत भ्रमित हैं। संक्षेप में, मेरे बोलने का सिद्धांत यह सुनिश्चित करना है कि मेरी बात सुनने के बाद तुम लोग भ्रमित न हो और तुम्हारे मन में अभ्यास का एक स्पष्ट मार्ग हो और तुम जान जाओ कि सटीक रूप से अभ्यास कैसे करना है। तुम लोगों से बात करने में मेरा यही उद्देश्य है।

मनुष्य को प्रलोभन न देने के इस सिद्धांत के भीतर इन तीन अभिव्यक्तियों—मनुष्य को बहला-फुसलाकर उसके अंदर से जानकारी न न निकालना, मनुष्य को न भड़काना और मनुष्य को न उकसाना—के अलावा एक और अभिव्यक्ति है : अस्पष्ट न होना। अस्पष्ट होने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है सत्याभासी चीजें कहना, स्पष्ट और असंदिग्ध शब्दों में बात न करना, चीजें धुँधली बनाना और ऐसे शब्द बोलना जो सुनने में तो सही लगते हों, लेकिन जिनका अभ्यास या कार्यान्वयन न किया जा सकता हो और जो केवल खोखली बातें हों। इसे अस्पष्ट और अशुद्ध होना कहा जाता है। तो, अस्पष्ट न होने का अर्थ है कि व्यक्ति के शब्द इन गुणों से मुक्त हैं और उनमें यह सार नहीं है; बल्कि, वे साफ और सीधे हैं, अर्थ में सटीक हैं और वे मनुष्य को अनुसरण करने के लिए एक मार्ग देते हैं। देखो, जब मैं सत्य के विभिन्न पहलुओं पर संगति करता हूँ, हर बार मैं एक नया विषय पेश करता हूँ, तब मैं पहले तुम्हें सत्य के इस पहलू के लिए एक परिभाषा प्रदान करने का प्रयास करता हूँ। तुम्हें परिभाषा प्रदान करने में मेरा क्या उद्देश्य होता है? यह तुम्हारे लिए संकल्पना स्पष्ट करना और तुम्हें उस सत्य की सटीक परिभाषा जानने में सक्षम बनाना है जिसके बारे में मैं बात कर रहा हूँ। जब तुम इस सटीक परिभाषा के बारे में स्पष्ट हो जाते हो और इसे ठीक से जान लेते हो, तब तुम्हारे पास एक लक्ष्य और एक दिशा होगी। मनुष्य को जो परिभाषाएँ मैं प्रदान करता हूँ, उनके माध्यम से यह परिणाम प्राप्त करके वह अपने हृदय में अधिक स्पष्ट रूप से यह जानने में सक्षम होता है कि उसे क्या अभ्यास करना चाहिए और किसका पालन करना चाहिए। फिर, मैं कुछ विशिष्ट उदाहरण देता हूँ। उदाहरण देने में मेरा उद्देश्य मनुष्य को सत्य के इस पहलू पर अधिक स्पष्टता प्राप्त करने में मदद करना, उसे इसका सटीक ज्ञान प्राप्त करने में मदद करना और उसे यह जानने में मदद करना है कि इसका अभ्यास कैसे किया जाए। तब, मेरा बोलना अपना प्रभाव और अपना उद्देश्य प्राप्त कर चुका होगा। इस उद्देश्य को प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है? यह तुम्हें परिभाषाओं और उदाहरणों के माध्यम से यह ज्ञात करवाना है कि तुम्हें किन सत्य सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। भले ही ऐसे बहुत-से लोग हों जिनमें आध्यात्मिक समझ नहीं है और जो, जिस पर चर्चा की जा रही है उसके भीतर सत्य सिद्धांतों का अर्थ नहीं समझ सकते, केवल यह जानते हैं कि कुछ नियमों का पालन कैसे करना है, फिर भी कम-से-कम, वे जिन विनियमों का पालन करते हैं वे स्पष्ट होते हैं। उदाहरण के लिए, सत्य सिद्धांतों के एक निश्चित पहलू पर संगति करते समय, मैं कुछ उदाहरण दे सकता हूँ, यह कहते हुए कि मनुष्य के लिए कुछ चीजें खाना अस्वास्थ्यकर है और मनुष्य द्वारा किए गए कुछ चुनाव और उसके द्वारा की गई कुछ चीजें गलत हैं। जिन लोगों में आध्यात्मिक समझ और बोध-क्षमता है, वे तब जान जाएँगे, “तो ऐसी चीज की सटीक समझ यह है। अब मैं सिद्धांतों को जानता हूँ, और मैं जानता हूँ कि अभ्यास कैसे करना है, कैसे चुनना है और क्या स्वीकार या अस्वीकार करना है।” लेकिन जिन लोगों में आध्यात्मिक समझ नहीं है, वे जब इसे सुनते हैं तब वे कहते हैं, “मैं समझता हूँ। परमेश्वर हमें यह नहीं खाने देता और वह उपयोग नहीं करने देता।” आध्यात्मिक समझ न रखने वाले इन लोगों की अभिव्यक्तियाँ भी कुछ दर्शाती हैं : वे दिखाती हैं कि जो उदाहरण मैं देता हूँ वे बहुत विशिष्ट हैं और वे ऐसी चीजें हैं जिनका मनुष्य अपने वास्तविक जीवन में सामना कर सकता है। वे बिल्कुल भी खोखले नहीं हैं और वे सिद्धांत, नारे या गहन ज्ञान नहीं हैं।

देहधारी परमेश्वर अस्पष्ट या संदिग्ध ढंग से बात नहीं करता; यह न केवल तब के लिए सच है जब मैं सभाओं के दौरान संगति करता हूँ, बल्कि तब के लिए भी सच है जब मैं साधारण ढंग से तुम लोगों से बात करता हूँ। कभी-कभी मैं तुम्हारे कर्तव्यों के बारे में बात करता हूँ, कभी-कभी मैं कलीसिया के कार्य के बारे में बात करता हूँ और कभी-कभी मैं मनुष्य की भ्रष्ट अवस्थाओं और उसके अभ्यास में होने वाले भटकावों के बारे में बात करता हूँ। मैं चाहे जिस भी मुद्दे पर संगति करूँ, मैं हमेशा तुम लोगों की अवस्थाओं, तुम लोगों के आध्यात्मिक कद और तुम लोगों की वर्तमान समस्याओं के आधार पर अपनी अपनी संगति करता हूँ। जब मैं तुम लोगों के साथ संगति करता हूँ, तब मैं कभी नारे नहीं लगाता; बल्कि, मैं विशिष्ट स्पष्टीकरण देता हूँ और चीजों को विस्तार से समझाता हूँ और फिर तुम लोगों के लिए एक मार्ग दिखाता हूँ। कभी-कभी मैं इतना अधिक बोलता हूँ कि मुझे भी लगता है कि मैं बात को लंबा खींच रहा हूँ, लेकिन अंत में, तुम लोग फिर भी उसे समझ जाते हो। यह काफी अच्छा परिणाम है। यह कहने से मेरा क्या मतलब है? मेरा मतलब यह है कि, जब मैं दैनिक जीवन में तुम लोगों के साथ किसी बात पर संगति करता हूँ, भले ही उस संगति में केवल तुम्हें कोई साधारण काम सौंपना ही शामिल हो, तब मैं यह सुनिश्चित करता हूँ कि मैं जो कहता हूँ वह तुम लोगों को स्पष्ट हो और तुम उसे समझ जाओ, उसमें कोई अस्पष्टता न हो। मेरे वचनों में कोई अस्पष्टता न होने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि मैं बड़े-बड़े विचार नहीं झाड़ता, मैं किसी नौकरशाह की तरह बात नहीं करता और मैं शब्द और धर्म-सिद्धांत या खोखली, डींग मारने वाली बातें नहीं बोलता। मैं जो कहता हूँ उसका अर्थ निश्चित और स्पष्ट होता है, उसमें कोई अस्पष्टता नहीं होती। मैं न केवल स्पष्ट रूप से और साफ-साफ बोलता हूँ, बल्कि मैं तुम लोगों को यह भी जानने देता हूँ कि अभ्यास कैसे करना है। उदाहरण के लिए, विदेश में रहते समय, यदि हमें आँगन में दैनिक उपयोग के लिए कुछ ढाँचे बनाने की आवश्यकता होती है, तो मैं इसे सँभालने वाले व्यक्ति से कहूँगा कि वह इस बारे में सरकार से परामर्श करे कि ऐसे ढाँचे बनाने के लिए क्या अपेक्षाएँ और शर्तें हैं। जब वे सब कुछ स्पष्ट रूप से समझ लेते हैं, तब उन्हें पूरी तरह से सरकार द्वारा अपेक्षित शर्तों और विशिष्टताओं के अनुसार ही ढाँचे बनाने होते हैं। यदि हम सरकार द्वारा अपेक्षित शर्तें पूरी नहीं कर सकते, तो हम बस उन्हें न बनाने का विकल्प चुन सकते हैं। इस मामले को सँभालते समय, मैं उस व्यक्ति को कुछ चीजों पर ध्यान देने के लिए कहता हूँ और उन्हें यह निर्देश भी देता हूँ कि ऐसी कुछ विशेष स्थितियों से कैसे निपटना है जिनके बारे में उन्होंने नहीं सोचा होगा। मैं सब कुछ स्पष्ट रूप से कहता हूँ और मेरी बात सुनने के बाद वे जानते हैं कि मामले को कैसे सँभालना है। जब कुछ लोग दूसरों को काम सौंपते हैं, तब वे अस्पष्ट और अशुद्ध रूप से बोलते हैं; वे नौकरशाह की तरह बात करने और धर्म-सिद्धांत तथा खोखले शब्द बघारने के अलावा कुछ नहीं करते। उदाहरण के लिए, जब वे किसी को कोई काम सँभालने के लिए सरकारी विभाग में जाने की व्यवस्था करते हैं, तब वे बस इतना कहते हैं, “सरकार के पास जाओ और इधर-उधर पूछकर पता लगाओ कि वहाँ के क्या विनियम हैं।” यह सुनने के बाद, मामले को सँभालने वाले व्यक्ति को नहीं पता होता कि क्या करना है या उन्हें इस मामले के बारे में कैसे पूछताछ करनी चाहिए; वे बस इधर-उधर पूछते हैं और बात वहीं खत्म हो जाती है, और अंत में वे कोई परिणाम प्राप्त नहीं कर पाते। क्या लोगों को इस तरह काम सौंपना नौकरशाह की तरह व्यवहार करना नहीं है? (हाँ।) जब मैं कोई विशिष्ट कार्य कर रहा होता हूँ, तो मैं कार्य में मौजूद समस्याओं पर, साथ ही पूर्वानुमानित समस्याओं और तुम लोगों द्वारा उठाई गई समस्याओं पर भी एक-एक करके संगति करूँगा और उन्हें हल करूँगा। प्रत्येक समस्या पर संगति करते समय, एक ओर, मेरा लक्ष्य उसे सत्य सिद्धांतों के अनुसार हल करना होता है; और इसके अलावा, जब कुछ विशेष स्थितियाँ शामिल होती हैं, तब मैं तदनुसार उन्हें सँभालूँगा और उन पर संगति करूँगा। मैं जो सिद्धांत निर्धारित करता हूँ और जिस विषय-वस्तु पर संगति करता हूँ, वे कभी अस्पष्ट नहीं होते। कम-से-कम, मेरा उद्देश्य स्पष्टता के लिए प्रयास करना और तुम्हें एक व्यापक सिद्धांत देना है, ताकि जब तुम ऐसी चीजों का सामना करो, तब तुम इस सिद्धांत को लागू कर सको और इसके अनुसार कार्य कर सको। यह सुनिश्चित करता है कि तुम्हारे पास अनुसरण करने के लिए एक मार्ग है और दैनिक जीवन में चीजों का सामना करते समय तुम हक्के-बक्के नहीं रह जाते, बल्कि यह जानते हो कि समस्याएँ कैसे सँभालनी हैं और कार्य कैसे करना है। मैं तुम्हें गुमराह करने या दबाने के लिए सत्याभासी धर्म-सिद्धांतों और सिद्धांतों के बारे में बड़े-बड़े भाषण नहीं देता या तुमसे स्वीकार और समर्पण करवाने के लिए ज्ञान या सिद्धांत की सत्याभासी बातों से तुम्हें नहीं सिखाता; मैं ऐसा नहीं करता। मैंने कभी लोगों को अपने सामने बिठाकर सिद्धांतों के बारे में अपनी शब्दाडंबरपूर्ण बातें नहीं सुनाई हैं, जिससे मेरे बात खत्म करने के बाद वे पूरी तरह से चकरा जाएँ और उन्हें ऐसा लगे कि उन्होंने कुछ समझ और प्राप्त कर लिया है, लेकिन उन्हें ऐसा भी लगे कि कोई समस्या बिल्कुल भी हल नहीं हुई, जिससे उन्हें यह एहसास हो कि संगति के ये कुछ घंटे समय की बर्बादी रहे। मैं ऐसा नहीं करता। यदि तुम लोगों को समस्याएँ हैं, तो मैं उन्हें हल करता हूँ; यदि तुम लोगों को कोई समस्या नहीं है, तो मैं तुम लोगों को परेशान न करने की पूरी कोशिश करता हूँ। मैं तुम लोगों से जो कहता हूँ, वह सब बहुत विशिष्ट होता है। उदाहरण के लिए, जब भजन कार्य में समस्याएँ होती हैं, तब मैं तुम लोगों के साथ भजनों से संबंधित मुद्दों पर संगति करता हूँ। यद्यपि मैंने इस क्षेत्र में प्रासंगिक पेशेवर ज्ञान का अध्ययन नहीं किया है, फिर भी मैं सिद्धांतों पर संगति कर सकता हूँ। जब अनुवाद कार्य में समस्याएँ होती हैं, तो यद्यपि मैं अंग्रेजी में निपुण नहीं हूँ, फिर भी मैं तुम लोगों के साथ अनुवाद के सिद्धांतों पर संगति करूँगा और सिद्धांत की वे समस्याएँ हल करने में तुम लोगों की मदद करूँगा जिन्हें तुम लोग नहीं सँभाल सकते, और यह सुनिश्चित करने का प्रयास करूँगा कि मेरी संगति के माध्यम से तुम लोग सत्य का अभ्यास करने के कुछ सिद्धांत समझ सको। शायद, मुझे सुनने के बाद तुम लोग कोई गहरे सत्य या रहस्य न समझो, लेकिन तुम लोग अभ्यास के सिद्धांतों का एक पहलू या जिस कार्य में तुम लोग लगे हुए हो उसमें समस्याएँ हल करने का मार्ग जरूर जान जाते हो—यही वह परिणाम है जिसे मैं तुम लोगों के संपर्क में आने, तुम लोगों से मिलने-जुलने और तुम लोगों के साथ मामले सँभालने पर तुम लोगों में हासिल करने का लक्ष्य रखता हूँ।

अस्पष्ट न होने के विषय में एक मद और शामिल है : जब किसी विशेष प्रकार के व्यक्ति या किसी विशेष प्रकार की चीज का भेद पहचानने की बात आती है, तब जिन सिद्धांतों पर मैं तुम्हारे साथ संगति करता हूँ, उनका उद्देश्य तुम्हें उस प्रकार के व्यक्ति का सार और उस प्रकार की चीज की प्रकृति स्पष्ट रूप से पहचानने में मदद करना होता है और तुम्हारे हृदय में इस बात को स्पष्ट करने में मदद करना होता है कि उस प्रकार के व्यक्ति का सार क्या है, उस प्रकार की चीज की प्रकृति क्या है, तुम्हें उनके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए और उनके संबंध में तुम्हारे सही दृष्टिकोण और रवैये क्या होने चाहिए। इन मुद्दों पर संगति करने में मेरा उद्देश्य तुम्हें सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति सही दृष्टिकोण, रवैये और रुख रखने में मदद करना है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि जब तुम सिद्धांतों पर कायम रहते हो, तब तुम सही सिद्धांतों पर कायम रहते हो, न कि उन सिद्धांतों पर जो गलत हैं। मेरा उद्देश्य तुम्हें लोगों, घटनाओं और चीजों का भेद पहचानने में सक्षम बनाना है ताकि तुम जान सको कि सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों का सार और असलियत क्या है; तुम्हें सकारात्मक चीजों और—साथ ही—नकारात्मक चीजों को जानने देना है; और तुम अपने दैनिक जीवन में चाहे जिस भी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करो, तुम्हें अपना सही रुख रखने में तुम्हारी मदद करना है। सही रुख रखने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि तुम सिद्धांतों पर कायम रहने के लिए सही रुख अपना सकते हो, बीच का रास्ता नहीं अपनाते और एक भ्रमित व्यक्ति, नासमझ व्यक्ति या सबको खुश रखने वाले व्यक्ति नहीं बनते। देखो, शुरुआत में, जब साँप ने आदम और हव्वा को प्रलोभन दिया था, तब उसने उनसे कहा था, “परमेश्वर तुम लोगों को भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल नहीं खाने देता। परमेश्वर ने कहा था कि इसे खाने के बाद तुम लोग निश्चित रूप से मर जाओगे, लेकिन वास्तव में, यह जरूरी नहीं कि तुम लोग मरोगे।” यद्यपि साँप का यह कथन बहुत अस्पष्ट था, फिर भी इसका आदम और हव्वा पर प्रलोभित करने वाला प्रभाव पड़ा, जिसका एक घातक परिणाम सामने आया। यह परिणाम क्या था? आदम और हव्वा ने परमेश्वर के वचनों को सुनना बंद कर दिया, परमेश्वर के वचनों पर विश्वास करना बंद कर दिया, उनका रुख सही नहीं रहा और वे अपने मूल रुख और मूल सिद्धांतों पर कायम नहीं रहे। इसके बजाय, परमेश्वर पर अपने संदेह के आधार पर उन्होंने परमेश्वर के निर्देशों पर विश्वास नहीं किया और इस बात पर विश्वास नहीं किया कि यदि वे भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खाएँगे तो वे मर जाएँगे। फिर उनके मन में विचार आने लगे और जब यह हो रहा था, तब उन्होंने हाथ बढ़ाकर भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल तोड़ लिया। यह प्रलोभन की एक प्रक्रिया थी और यह आदम और हव्वा के प्रलोभन में आने का परिणाम भी था। प्रलोभन की इस प्रक्रिया में उनका शैतान की बातें सुनना और उन पर विश्वास करना, मन में विचार आना, परमेश्वर पर संदेह करना शुरू करना और अब परमेश्वर के वचनों पर विश्वास न करना शामिल था। आदम और हव्वा के प्रलोभन में आने का परिणाम यह हुआ कि वे परमेश्वर के वचनों के खिलाफ गए और उन्होंने भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खा लिया। यद्यपि साँप ने यह नहीं कहा था, “यदि तुम लोग इसे खाओगे तो तुम लोग निश्चित रूप से नहीं मरोगे; परमेश्वर ने जो कहा वह गलत है और परमेश्वर तुम लोगों को धोखा दे रहा है,” फिर भी साँप के इस कथन में कि “यदि तुम लोग इसे खाओगे तो जरूरी नहीं कि तुम मरोगे,” ये “जरूरी नहीं” अस्पष्ट शब्द थे। ये अस्पष्ट शब्द प्रकृति में प्रलोभन देने वाले थे; इनके कारण मनुष्य ने परमेश्वर पर संदेह किया और परमेश्वर के वचनों पर अविश्वास किया। इन अस्पष्ट शब्दों के कारण मनुष्य ने अपना सही रुख भी खो दिया और साथ ही सिद्धांतों पर कायम रहने का अपना उत्साह और विश्वास भी खो दिया। अंत में क्या हुआ? मनुष्य साँप द्वारा प्रलोभन दिए जाने के मार्ग पर चल पड़ा, उसने परमेश्वर को धोखा दिया और पाप में जीने लगा। इस दृष्टि से देखा जाए तो, मनुष्य को प्रलोभन देते समय साँप द्वारा बोले गए वाक्यांश “जरूरी नहीं” का बहुत बड़ा नकारात्मक प्रभाव पड़ा। इसने सीधे तौर पर परमेश्वर के वचनों को नहीं नकारा या सीधे तौर पर मनुष्य को परमेश्वर के वचनों को न सुनने के लिए नहीं कहा और इसने सीधे तौर पर मनुष्य को परमेश्वर पर शक और संदेह करने के लिए नहीं कहा, और इसने मनुष्य को असंदिग्ध रूप से यह तो बिल्कुल नहीं बताया कि “इसे खाने के बाद तुम नहीं मरोगे।” फिर भी “जरूरी नहीं” जैसा एक अस्पष्ट वाक्यांश मनुष्य के दिमाग को चलाने, उसे धोखा देने और उसे भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खाने के लिए प्रलोभन देने के लिए पर्याप्त था। ये अस्पष्ट शब्दों द्वारा मनुष्य पर लाए गए परिणाम हैं। यह अस्पष्ट वाक्यांश “जरूरी नहीं” कहाँ से आया? बिल्कुल शुरुआत में, यह वाक्यांश उन वचनों से आया था जो साँप ने हव्वा को प्रलोभन देते समय कहे थे। इससे पहले, परमेश्वर ने आदम और हव्वा को जो कुछ निर्देश दिए थे, उनमें तुम एक भी अस्पष्ट शब्द नहीं ढूँढ सकते, न ही तुम्हें अस्पष्टता का ज़रा-सा भी संकेत मिल सकता है। यानी, परमेश्वर जो वचन बोलता है वे सभी सच्चे, वास्तविक और सटीक होते हैं। उसके द्वारा बोला गया हर वाक्य एक सही रुख और एक सही और सटीक दृष्टिकोण दर्शाता है, इन सभी पर मनुष्य को कायम रहना चाहिए और इनके प्रति मनुष्य को हमेशा समर्पण करना चाहिए और इन पर कभी संदेह नहीं करना चाहिए। परमेश्वर का कोई भी वचन अस्पष्ट नहीं होता, इसलिए परमेश्वर का कोई भी वचन मनुष्य को प्रलोभन नहीं देता। नकारात्मक अर्थ में कहें तो, परमेश्वर के वचनों में मनुष्य के लिए ज़रा-सा भी प्रलोभन या धोखा नहीं है; सकारात्मक अर्थ में, यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर जो कुछ भी कहता है, वह मनुष्य की रक्षा और सुरक्षा करने का काम करता है और मनुष्य के जीवन को बचाने तथा उसके और परमेश्वर के बीच का यह सबसे घनिष्ठ संबंध बनाए रखने में सक्षम है। लेकिन साँप के इस अस्पष्ट वाक्यांश—“जरूरी नहीं”—ने इस संबंध को पूरी तरह से तोड़ दिया और मनुष्य को परमेश्वर से पूरी तरह से दूर कर दिया, जिससे वह परमेश्वर पर संदेह करने लगा और परमेश्वर से दूर हो गया और परमेश्वर के सामने आने में बहुत शर्म महसूस करने लगा। इस नींव पर साँप ने मनुष्य को और अधिक प्रलोभन दिया, भ्रष्ट किया और तबाह कर दिया। आदम और हव्वा को दिए गए परमेश्वर के निर्देशों वाले अंश से आँकें तो, परमेश्वर के वचनों का सार और उसके बोलने का उद्देश्य मनुष्य के लिए बहुत लाभदायक है—परमेश्वर के वचन सुनना और परमेश्वर के प्रति समर्पण करना वह रुख है जो मनुष्य का होना चाहिए, और यह वह सत्य सिद्धांत भी है जिसका मनुष्य को हमेशा पालन करना चाहिए। परमेश्वर हमेशा मनुष्य से प्रेम करता है, उसकी देखभाल करता है, उसकी रक्षा करता है और उसे सँजोता है, जबकि शैतान के बोलने और कार्य करने का उद्देश्य मनुष्य को प्रलोभन देना और भ्रष्ट करना है, मनुष्य को परमेश्वर पर संदेह करने और उससे दूर होने के लिए प्रलोभन देना है और फिर मनुष्य को अपनी आराधना करने और अपने द्वारा भ्रष्ट किए जाने के लिए प्रलोभन देना है। चूँकि देहधारी परमेश्वर के पास परमेश्वर का जीवन और परमेश्वर का सार है, इसलिए उसके पास भी अपने वचनों और कार्यों में अस्पष्ट न होने की यह विशिष्ट अभिव्यक्ति और सिद्धांत है। मेरे सभी उपदेशों के माध्यम से और अपने दैनिक जीवन में देहधारी परमेश्वर के संपर्क में आने के माध्यम से तुम लोग निश्चित रूप से धीरे-धीरे यह जान जाओगे कि परमेश्वर मनुष्य को जो भी सत्य प्रदान करता है, उनमें शैतान के शब्दों में पाई जाने वाली शब्दावली जैसी कोई अस्पष्ट शब्दावली नहीं होती और वैसी कोई अस्पष्ट अभिव्यक्तियाँ भी नहीं होतीं जैसी शैतान इस्तेमाल करता है, है ना? (हाँ।) अस्पष्ट न होना परमेश्वर के बोलने और कार्य करने में उसकी वास्तविकता और विश्वासपात्रता का प्रकाशन है और यह परमेश्वर के सार का प्रकाशन भी है। यानी, परमेश्वर के पास उस प्रकार का सार नहीं है जो शैतान के पास मनुष्य को प्रलोभन देने के लिए बोलते समय होता है; परमेश्वर का सार इससे मुक्त है। इसलिए, अगर देहधारी परमेश्वर के वचन कुछ छोटी-मोटी चीजों के मामले में बहुत विस्तृत या स्पष्ट न हों तो भी, वह किसी भी तरह से वैसे अस्पष्ट वचन इस्तेमाल नहीं करेगा, जैसे शैतान मनुष्य को प्रलोभन देने के लिए इस्तेमाल करता है, और वह ऐसी भाषा, बोलने के तरीके या कार्य करने के तरीके का हरगिज उपयोग नहीं करेगा जो तुम्हें हक्का-बक्का कर दे या जिससे तुम परमेश्वर के बारे में संदेह पालो और खुद को परमेश्वर से दूर कर लो। बल्कि, परमेश्वर चाहे जैसे भी बोले और वह चाहे जो कुछ भी कहे, वह जो अंतिम लक्ष्य हासिल करना चाहता है वह यह है कि तुम परमेश्वर के अधिकाधिक करीब आओ, परमेश्वर के वचनों से उसके इरादे समझो, सही विचार और दृष्टिकोण और सही रुख अपनाओ और सत्य सिद्धांतों पर कायम रहने के लिए अधिक प्रेरित होओ। यह मामले का एक पहलू है। दूसरी बात यह है कि, परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि तुम इन स्पष्ट और साफ वचनों से एक लक्ष्य, जीवन में एक सही दिशा और आगे बढ़ने की दिशा प्राप्त करो। बेशक, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि जब सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण और रुख सही होते हैं और तुम सत्य सिद्धांतों पर कायम रहते हो, तो तुम परमेश्वर की सुरक्षा और देखभाल प्राप्त करोगे और उसके बाद परमेश्वर की मान्यता और स्वीकृति प्राप्त करोगे। तो, क्या तुम लोग लाभार्थी नहीं हो? (हाँ।) केवल इस तथ्य ने कि परमेश्वर के वचन और कार्य अस्पष्ट नहीं हैं, तुम लोगों को इतने बड़े लाभ पहुँचाए हैं। क्या तुम लोग अब तक इस बात को थोड़ा-बहुत समझ पाए हो? (हाँ।) मेरे यह सब कहे बिना तुम लोग शायद जीवन-भर इसे समझ न पाते। तुम लोग बस यही महसूस करते, “तुम्हारे वचन सत्य हैं। तुम्हारे वचन अपेक्षाकृत सटीक और वस्तुनिष्ठ हैं और हमारे बारे में तुम्हारी समझ अपेक्षाकृत गहरी है,” लेकिन तुम लोग शायद यह न पहचान पाते कि देहधारी परमेश्वर जब बोलता है तो वह अस्पष्ट नहीं होता, है ना? (हाँ।)

देहधारी परमेश्वर के वचनों में अस्पष्टता की कमी होने की एक और अभिव्यक्ति है, जो यह है कि, मैं तुम लोगों के साथ जिन विभिन्न विषयों पर संगति करता हूँ, चाहे वे पेशेवर कार्य से संबंधित हों या जीवन प्रवेश से, उनमें मेरी संगति में कोई ज्ञान, फलसफा या धर्मशास्त्र शामिल नहीं होता—वह इन चीजों से पूरी तरह मुक्त होती है। यहाँ तक कि अगर उसमें पेशेवर कार्य की कोई मद शामिल हो, तो भी मैं जिन अधिकांश चीजों पर संगति करता हूँ, उनका मर्म मुख्य रूप से तुम लोगों को यह बताना होता है कि प्रासंगिक सत्य सिद्धांतों को कैसे समझें और इस क्षेत्र में पेशेवर ज्ञान और कौशल सही ढंग से कैसे लागू करें, ताकि तुम लोग परमेश्वर की बेहतर गवाही दे सको और अपना कर्तव्य उस तरीके से निभा सको जो मानक स्तर का हो। मैं तुम लोगों में ज्ञान नहीं भरता। कभी-कभी मैं तुम लोगों के साथ कुछ सामान्य समझ साझा करता हूँ, जैसे कि सर्दी-जुकाम से बचने की सामान्य समझ : सर्दियों में खुद को गर्म रखना सुनिश्चित करो। ठंड मत लगने दो। जब खिड़की खुली हो तब उसके पास मत बैठो, ताकि हवा के झोंके से बच सको। यह सब सामान्य समझ है। सामान्य समझ से क्या तात्पर्य है? (कुछ जीवन अनुभव जो व्यक्ति को अपने दैनिक जीवन में जानना चाहिए।) यह अपना स्वास्थ्य बनाए रखने के बारे में जीवन अनुभव और अंतर्दृष्टि है, है ना? (हाँ।) मैं तुम लोगों में सामाजिक ज्ञान या धर्मशास्त्रीय ज्ञान नहीं भरता। मैं तुम लोगों में ये चीजें क्यों नहीं भरता? (इन चीजों से हमें कोई फायदा नहीं है।) यह इसके एक पक्ष का उत्तर देता है। और क्या? (सामाजिक ज्ञान शैतान का है; परमेश्वर हमें गुमराह करने के लिए ये चीजें हममें नहीं डालेगा।) मुझे बताओ, क्या मेरे पास ऐसा कुछ है जो शैतान का है? (नहीं।) जब मैं तुम लोगों के साथ संगति और बातचीत करता हूँ, तब वह क्या होता है जिसके बारे में मैं बात करता हूँ? (वे सब सकारात्मक चीजें होती हैं, और यह सब सत्य है।) शैतान का ज्ञान, फलसफा, तर्क, विवेक-बुद्धि और धर्मशास्त्र—मैं कभी ये चीजें सीखने की कोशिश नहीं करता और तुम इन्हें मेरे भीतर नहीं पाओगे। कुछ लोग कहते हैं, “तुम थोड़ा-सा सीखने की कोशिश क्यों नहीं करते?” यह सच में मेरा शौक नहीं है। मुझे वे चीजें पसंद नहीं हैं। जब मैं लोगों को धर्मशास्त्र के बारे में बात करते सुनता हूँ, तब मुझे घिन और अरुचि महसूस होती है। धर्मशास्त्र केवल सत्याभासी धर्म-सिद्धांत और सिद्धांत है; वह व्यावहारिक नहीं है, है ना? कुछ लोग बाइबल को पूरी तरह से जानते हैं और हमेशा नबियों की पुस्तकों और भविष्यवाणी की पुस्तकों का अध्ययन करते रहते हैं—किसी खास अध्याय और पद में क्या भविष्यवाणी की गई है, वह कैसे पूरी होगी और उसके भीतर क्या रहस्य हैं। मैं कभी इन चीजों का अध्ययन नहीं करता और मेरे लिए इनका अध्ययन करने में मेहनत करने की कोई जरूरत नहीं है। मुझे सहज रूप से ये चीजें नापसंद हैं। जब मैं दैनिक जीवन में चीजों का सामना करता हूँ, तब मैं बस यही विचार करता हूँ कि उचित रूप से कैसे कार्य किया जाए, इस तरह कैसे कार्य किया जाए कि ये मुद्दे हल किए जा सकें और इन्हें हल करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है। बहुत-से लोग जब चीजों का सामना करते हैं, तब वे शिकायत करते हैं, पछतावा महसूस करते हैं या भ्रमित हो जाते हैं, या वे ऊँचे धर्म-सिद्धांत बघारते हैं और नारे लगाते हैं। जब मैं चीजों का सामना करता हूँ, तब मैं शांति से उन्हें हल करने के उचित तरीके पर विचार करता हूँ; मैं समाधानों पर विचार करता हूँ। इसलिए, जब मैं तुम लोगों के साथ बोलता और संगति करता हूँ, तब मैं वास्तविक चीजों के बारे में बात करना पसंद करता हूँ, उन चीजों के बारे में जो तुम लोगों द्वारा अपना कर्तव्य निभाने के दौरान सामने आती हैं, यहाँ तक कि दैनिक जीवन में शामिल चीजों के बारे में भी, जैसे कि कुछ लोग, घटनाएँ और चीजें, बुनियादी जरूरतें, इत्यादि। मैं केवल वास्तविक चीजों के बारे में बात करता हूँ। मैं खोखली बातों से भरे आडंबरपूर्ण भाषण नहीं देता। जब तुम लोग मेरे साथ लंबा समय बिता लेते हो, तब तुम देखोगे कि मैं जीवन में वास्तविक चीजों और वास्तविक समस्याओं के बारे में बहुत गंभीर और संजीदा हूँ। मैं बस इसी तरह का व्यक्ति हूँ। मैं किसी भी चीज के बारे में अस्पष्ट नहीं हूँ—विशेष रूप से, जब उसमें तुम लोगों द्वारा अपना कर्तव्य निभाना या तुम लोगों का जीवन प्रवेश शामिल हो, तब यह बात और भी ज्यादा लागू होती है, है ना? (हाँ।) यह अस्पष्ट न होने का एक पहलू है।

देहधारी परमेश्वर का अस्पष्ट न होना परमेश्वर द्वारा मनुष्य को प्रलोभन न देने के विषय से भी संबंधित है। परमेश्वर के अस्पष्ट न होने का अर्थ है कि जिस तरीके से मैं बोलता और कार्य करता हूँ, वह बहुत स्पष्ट है। मैं दिन को दिन और रात को रात कहता हूँ; मैं कोई सत्याभासी शब्द इस्तेमाल नहीं करता या मेरे काम करने के कोई सत्याभासी तरीके नहीं हैं। यहाँ तक कि जब कुछ ऐसी चीजें होती हैं जिनके बारे में उस समय जल्दबाजी में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सकता, तब मैं तुम लोगों को बताऊँगा, “आओ, कुछ समय तक इस व्यक्ति पर नजर रखें। आओ, इस मामले में थोड़ा इंतजार करें। अभी हम बस वही कर सकते हैं जो मानवीय रूप से संभव है। अगले कदम के लिए, देखते हैं चीजें किस दिशा में विकसित होती हैं। हम चीजों के विकसित होने की दिशा के आधार पर धीरे-धीरे योजनाएँ बना सकते हैं और लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं।” जैसा कि तुम लोग देख सकते हो, मैं तुम लोगों को चीजें स्पष्ट रूप से समझाऊँगा और मौजूदा सिद्धांतों को और तुम्हें अपने क्रियाकलाप किस दिशा में ले जाने चाहिए, यह स्पष्ट रूप से बताऊँगा। मैं तुम लोगों को ऐसा महसूस कराने के लिए सत्याभासी शब्दों का उपयोग बिल्कुल नहीं करूँगा कि तुम लोग नहीं जानते कि क्या करना है या तुम लोग नहीं जानते कि कुछ चीजें कैसे सँभालनी हैं। यहाँ तक कि कुछ लोगों का निरूपण करते समय मैं उनके द्वारा की गई कुछ विशेष चीजों के आधार पर और उनकी विभिन्न अभिव्यक्तियों के आधार पर संगति करता हूँ, ताकि इस प्रकार के व्यक्ति का सार स्पष्ट रूप से पहचानने में और यह जानने में कि उनके साथ कैसा व्यवहार करना है, तुम लोगों की मदद कर सकूँ। है ना? (हाँ।) यानी, मैं मामले सँभालने के अपने तरीके में व्यक्तिगत भावनाएँ या निजी शिकायतें कभी नहीं मिलाता। यहाँ तक कि कुछ लोगों से निपटते समय भी, यदि तुम लोग ऐसे व्यक्ति के सार के बारे में स्पष्ट नहीं हो, तो मैं इस पर विशेष रूप से संगति करूँगा, तुम लोगों को स्पष्ट रूप से समझाऊँगा कि उनमें क्या समस्याएँ हैं और फिर सत्य का उपयोग करके यह पहचानूँगा कि वे कहाँ फिट बैठते हैं और उनके सार का गहन-विश्लेषण करूँगा, और तुम लोगों को यह स्पष्टता प्राप्त करने में मदद करूँगा कि परमेश्वर का घर उनसे इस तरह क्यों निपटता है, ऐसे व्यक्ति के साथ व्यवहार करने के लिए परमेश्वर के घर के सिद्धांत ऐसे क्यों हैं और उनसे निपटने का परिणाम वैसा क्यों होता है। अगर कुछ लोग निपटे जाने के बाद अपने पाप स्वीकार नहीं करते या पश्चात्ताप नहीं करते, और यह नहीं जानते कि उन्हें बर्खास्त क्यों किया गया या चलता क्यों कर दिया गया या उन्हें बाहर क्यों निकाल दिया गया, तो भी यह केवल उनका स्वयं को न जानना और उन्हें कोई पछतावा न होना है। लेकिन जहाँ तक इस बात का संबंध है कि परमेश्वर का घर उनसे क्यों निपटा और उनसे निपटने का परिणाम एक खास तरह का क्यों रहा, तो हमें मुद्दों को खुलकर सामने रखने की जरूरत है ताकि तुम लोग इन मुद्दों का विवरण जान सको, यह जान सको कि इन लोगों में क्या समस्याएँ हैं, परमेश्वर के घर के उनसे निपटने के क्या कारण हैं और उनसे निपटने का क्या आधार है। संक्षेप में, शुरुआत से लेकर अब तक मैंने तुम लोगों के साथ जिन वचनों पर संगति की है, उन सभी में दिव्यता की भाषा में बोले गए उस हिस्से को छोड़कर, जहाँ लोग नहीं जानते कि क्या कहा जा रहा है, इसके भीतर के सत्य की असलियत नहीं जान सकते और उससे अनजान हैं, जब तुम लोगों के जीवन प्रवेश से जुड़े किसी मुद्दे की बात आती है—चाहे वह मनुष्य का मसीह-विरोधी स्वभाव उजागर करना हो या मनुष्य के भ्रष्ट स्वभावों की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ और खुलासे उजागर करना हो—मैं हमेशा इन चीजों को विशेष रूप से स्पष्ट और सटीक रूप से चिह्नित करता और समझाता हूँ, यह जानने में तुम लोगों की मदद करता हूँ कि कौन-सी चीजें सकारात्मक हैं, कौन-सी चीजें नकारात्मक हैं, तुम लोगों को किसे बनाए रखना चाहिए और तुम लोगों को किसे सुधारना चाहिए, किसके खिलाफ विद्रोह करना चाहिए और किसे अस्वीकार करना चाहिए। संक्षेप में, बोलने के लिए मेरा संगत सिद्धांत सत्य, परमेश्वर के इरादों, मनुष्य के लिए परमेश्वर के अपेक्षित मानकों और अभ्यास के सिद्धांतों के उन विभिन्न पहलुओं पर स्पष्ट रूप से संगति करना है जिनका मनुष्य को पालन करना चाहिए, ताकि तुम लोगों को एक सटीक लक्ष्य, सटीक दिशा और अभ्यास के सटीक सिद्धांत और अभ्यास का मार्ग दिया जाए। इसके अलावा, तुम लोगों से बात करते समय मैं उन लोगों के अंतिम परिणाम और अंत पर भी स्पष्ट रूप से संगति करता हूँ जो विभिन्न सिद्धांतों का पालन नहीं करते; विशेष रूप से, मैं तुम लोगों को स्पष्ट रूप से बताता हूँ कि हर व्यक्ति में पाई जाने वाली विभिन्न समस्याओं का कैसे निरूपण किया जाता है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग अपना कर्तव्य निभाने में खानापूरी करने वाले होते हैं, वे सत्य का अनुसरण नहीं करते और उनके पास कभी जीवन प्रवेश नहीं होता, जिस पर मैं कहता हूँ, “तुम्हारे कर्तव्य निभाने का निरूपण किया जा चुका है : तुम श्रम कर रहे हो। यदि तुम अंत तक इसी तरह विश्वास करते रहे, तो तुम्हारे लिए उद्धार प्राप्त करना असंभव होगा। तुम्हें सत्य का अनुसरण करना होगा, जीवन प्रवेश पाना होगा, श्रमिक होने की यह अवस्था त्यागनी होगी और उद्धार के मार्ग पर चलने का प्रयास करना होगा। अपना कर्तव्य निभाने का उद्देश्य उद्धार प्राप्त करना है, न कि मशक्कत करना या श्रम करना।” देखो, क्या यह बहुत स्पष्ट नहीं है? (हाँ।) यह स्पष्ट रूप से तुम्हें जानने देता है कि सत्य का अभ्यास न करने और जीवन प्रवेश न होने के क्या परिणाम होते हैं। इसके अतिरिक्त, मैं चाहे सत्य के जिस भी पहलू पर संगति करूँ, मैं उस पर केवल एक कोण या एक परिप्रेक्ष्य से संगति नहीं करता, बल्कि विभिन्न तरीकों का उपयोग करते हुए और कई उदाहरण देते हुए कई कोणों और परिप्रेक्ष्यों से संगति करता हूँ। मैं तुम लोगों को मौजूदा सत्य सिद्धांतों को समझने में सक्षम बनाने का प्रयास करता हूँ, बजाय इसके कि तुम लोग केवल धर्म-सिद्धांत या विनियमों के किसी पहलू को समझो या सरल तरीके से ज्ञान के किसी पहलू के बारे में सीखो। जब परमेश्वर पहली बार मानवजाति के संपर्क में आया और उसने मनुष्य को अपना पहला निर्देश दिया, तब से लेकर अब तक, परमेश्वर के बोलने का सिद्धांत अपरिवर्तित रहा है। चाहे परमेश्वर आत्मा के रूप में बोले और कार्य करे या देह में बोले और कार्य करे, उसने हमेशा इस सिद्धांत का पालन किया है : स्पष्ट और सटीक ढंग से बोलना। मानवीय परिप्रेक्ष्य से, वह जो कुछ मनुष्य से कहता है और जो कुछ उसे प्रदान करता है, वे सभी निर्देश होते हैं, और बेशक, वे पोषण भी होते हैं। यानी, सृजित मनुष्यों के रूप में, लोगों को परमेश्वर द्वारा बोले गए हर वचन को दृढ़ता से मन में रखना चाहिए और अपने दैनिक जीवन में, विशेष रूप से जब अपने कर्तव्य निभाने की बात आती है तब परमेश्वर के वचनों को धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों का एक समुच्चय मानने के बजाय, सख्ती से उनका पालन करना चाहिए। परमेश्वर द्वारा बोला गया हर वचन और परमेश्वर द्वारा मनुष्य को प्रदान किया जाने वाला सत्य का हर पहलू मनुष्य को सही मार्ग पर ले जाने और मनुष्य को एक स्पष्ट लक्ष्य और दिशा देने के लिए होता है। यदि मनुष्य उनका पालन करता है, तो वह एक ऐसा सृजित मनुष्य बन जाएगा जो मानक स्तर का है और जिसे परमेश्वर द्वारा मान्यता प्राप्त है।

क्या अस्पष्ट न होने के इस पहलू के संबंध में कोई अन्य मुद्दे हैं? तुम लोग और क्या सोच सकते हो? पहले मुख्यभूमि चीन में, कार्य के इस चरण के आधिकारिक रूप से शुरू होने से पहले, जब कुछ तथाकथित अगुआओं को पता चलता था कि कोई व्यक्ति यौन अनैतिकता में शामिल है, तो वे इस बात को बहुत जोर-शोर से पकड़ लेते थे। वे संबंधित व्यक्ति को जमीन पर घुटने टेकने और अपने पाप स्वीकार करने के लिए मजबूर करते थे और वे अगुआ उनकी हर बात सुनते थे। वे परमेश्वर की भूमिका निभाते थे, इस साधारण विश्वासी को अपने पाप स्वीकार करते हुए सुनते थे, और जब वे वो हिस्से सुनते थे जिन्हें पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं किया गया होता था, तो वे विवरण देने के लिए दबाव तक डालते थे। वास्तव में, ऐसा करना अनावश्यक था—अगर व्यक्ति अपने पाप स्वीकार कर लेता है, पश्चात्ताप करता है, और उन्हें दोबारा नहीं करेगा, तो इतना पर्याप्त होना चाहिए। लोग अपने पाप परमेश्वर के सामने स्वीकार करते हैं, मनुष्य के सामने नहीं। लोगों को न्यायाधीश के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए, परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने का प्रयास तो बिल्कुल नहीं करना चाहिए। लेकिन ये तथाकथित अगुआ व्यक्ति पर अपने पापों का विवरण देने के लिए बहुत दबाव डालते थे, जिसे सुनकर ही दूसरे लोगों को घिन आ जाती थी और वे असहज महसूस करते थे। अगुआ तब तक चैन से नहीं बैठते थे जब तक कि वे उस व्यक्ति से अत्यधिक शर्मिंदगी की हद तक पूछताछ नहीं कर लेते थे। यह सुनकर तुम लोगों को कैसा लगता है? (हमें बहुत घिन आती है।) ऐसे अगुआ नकली अगुआ होते हैं और उनमें बुरे लोगों का सार होता है। यहाँ तक कि वे न्यायाधीश के रूप में कार्य करना और मुकदमों की सुनवाई करना भी चाहते थे; उनमें सच में शर्म की कोई भावना नहीं होती थी! जब साधारण विश्वासी पाप करते थे, विशेष रूप से यौन अनैतिकता का पाप, तो ये अगुआ बहुत रुचि लेने लगते थे, विस्तृत प्रश्न पूछते थे और विशिष्ट विवरण प्रदान करने के लिए दबाव डालते थे। वे कलीसिया का कार्य कभी इस तरह से नहीं करते थे, लेकिन जब उन्हें यौन अनैतिकता के मुद्दे पता चलते थे, तब वे असामान्य रूप से आकर्षित और अत्यधिक संजीदा हो जाते थे, पाप करने वाले व्यक्ति से इतनी ज्यादा पूछताछ करते थे कि वह चाहता कि धरती फट जाए और वह उसमें समा जाए। उन्हें यहाँ तक लगता था कि वे चीजों को गंभीरता से ले रहे हैं और अस्पष्ट नहीं हैं, और उन्हें लगता था कि वे वास्तविक कार्य करने में सक्षम हैं। क्या यह बहुत बेतुका नहीं है? कुछ लोगों को लगता है कि चूँकि उनके पास रुतबा है, इसलिए वे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, इसलिए वे कुछ चीजें करने के लिए अपने रुतबे का फायदा उठाते हैं। चूँकि साधारण विश्वासियों में भेद पहचानने की क्षमता ज्यादा नहीं होती, वे सही और गलत के बीच का फर्क नहीं जानते, और यह नहीं जानते कि मनुष्य से परमेश्वर की क्या अपेक्षाएँ हैं, इसलिए वे जो कुछ भी तथाकथित अगुआ उनसे करने के लिए कहते थे उसका पालन करते थे, वे सोचते थे कि अगुआओं का आज्ञापालन न करना परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करना होगा। यहाँ तक कि अत्यधिक शर्मिंदगी की हद तक पूछताछ किए जाने पर भी वे शिकायत नहीं करते थे, यहाँ तक कि वे यह भी मानते थे कि वे परमेश्वर के प्रति समर्पण कर रहे हैं और परमेश्वर के साथ ईमानदार और सच्चे हो रहे हैं। वे तथाकथित अगुआ सोचते थे, “इतनी बड़ी चीज हो गई है—हम इसके साथ व्यवहार करने में अस्पष्ट नहीं हो सकते। तुम यौन अनैतिकता में शामिल थे; तमाम विवरण सामने लाने होंगे। तुम्हें हर किसी के सामने अपने पाप स्वीकार करने होंगे!” अंत में, वे उस व्यक्ति से तब तक पूछताछ करते जब तक कि वह अत्यधिक शर्मिंदा और पीड़ाग्रस्त न हो जाता, इस हद तक कि वह अब और जीना भी न चाहता। तुम लोग उनके द्वारा किए गए कार्य के बारे में क्या सोचते हो? (यह अच्छी तरह से नहीं किया जाता था।) क्या तुम लोग कभी मुझे ऐसी चीजें करते हुए देखते हो? जब मैं तुम लोगों के साथ मिलता-जुलता हूँ, तब क्या मैंने कभी तुम लोगों के निजी मामलों के बारे में जानने की कोशिश की है? (कभी नहीं।) मुझे बताओ, क्या मैं तुम लोगों के निजी मामलों या तुम लोगों द्वारा छिपकर किए गए बुरे कर्मों के बारे में जानना चाहता हूँ? मैं इन चीजों के बारे में नहीं जानना चाहता। जब मैं कहता हूँ कि मैं उनके बारे में नहीं जानना चाहता, तब क्या ऐसा है कि मैं दिखावा कर रहा होता हूँ या कि मेरे पास इन चीजों के बारे में जानने का कोई अवसर नहीं होता? (इन दोनों में से कोई नहीं; परमेश्वर उनके बारे में नहीं जानना चाहता।) मैं उनके बारे में इसलिए नहीं जानना चाहता क्योंकि मुझे उनमें कोई दिलचस्पी नहीं है, और क्योंकि मुझे उनके बारे में जानने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तुम लोगों को कोई समस्या है, तो तुम्हें स्वयं परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए या उसे हल करने के लिए सत्य खोजना चाहिए; यह सबसे अच्छा है। जब कुछ लोग अगुआ बन जाते हैं, तो वे उन चीजों को करने के लिए अपने रुतबे का फायदा उठाना चाहते हैं जिन्हें रुतबे वाले लोग करना चाहते हैं, वे लोगों के विचार और निजी मामले जानने की कोशिश करते हैं। वे कोई भी ऐसा वास्तविक कार्य नहीं करते जो अगुआओं और कार्यकर्ताओं को करना चाहिए, फिर भी वे लोगों के निजी मामलों में ताँक-झाँक करने के बारे में काफी गंभीर होते हैं। उन्हें यहाँ तक लगता है कि इस तरह से कार्य करने से हर कोई उनका कायल हो जाता है; वे काफी सम्मानित महसूस करते हैं। क्या ऐसे लोगों में कोई विवेक होता है? वे पूरी तरह से विवेकहीन होते हैं और उनमें बिल्कुल भी मानवता नहीं होती।

परमेश्वर के वचनों और कार्य से हर व्यक्ति इस तथ्य को समझ सकता है कि परमेश्वर अस्पष्ट नहीं है। यदि तुम परमेश्वर द्वारा कहे गए हर वाक्य और उसकी बोलचाल के हर दृष्टांत को गंभीरता से समझते हो और खुद पर परमेश्वर के कार्य को गंभीरता से समझते और अनुभव करते हो, तो तुम और भी अधिक विश्वास करोगे कि परमेश्वर विश्वासपात्र है और उसके कार्य और वचनों में मनुष्य के लिए उसका प्रेम और चिंता शामिल है। मनुष्य के लिए परमेश्वर के जीवन के प्रावधान ने उसे कभी गुमराह नहीं किया है। यानी, परमेश्वर ने कभी मनुष्य को गलत मार्गदर्शन या गलत प्रदर्शन नहीं दिए हैं, न ही उसने कभी गलत कथन कहे हैं, मनुष्य को भ्रमित करने वाले सत्याभासी कथन कहने की तो बात ही छोड़ दो। बल्कि, विषयवस्तु चाहे जो भी हो या उसमें सत्य का चाहे जो भी पहलू शामिल हो, वह मनुष्य को अथक रूप से सकारात्मक और सही कथन प्रदान करता है। यहाँ तक कि जब उसमें लोगों के दैनिक जीवन से संबंधित विषयवस्तु शामिल होती है, तब भी मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर जीवन के बारे में सामान्य समझ की कुछ छोटी-मोटी रोचक बातें साझा करूँगा। विशेष रूप से, जब मैं कुछ युवाओं का मार्गदर्शन कर रहा होता हूँ, तब मैं उन्हें जीवन जीने की सामान्य समझ की कुछ छोटी-मोटी रोचक बातें बताऊँगा, ताकि वे अनावश्यक रूप से चक्करदार रास्तों पर जाने से बचें और जीवन जीने के गलत तरीके न अपनाएँ या गलत आदतें विकसित न करें। इसलिए, चाहे सत्य पर संगति करने की बात हो या दैनिक जीवन की, देहधारी परमेश्वर पूरी तरह से तुम लोगों को पोषण प्रदान करने, तुम लोगों को सहारा देने और तुम लोगों की मदद करने का काम करता है। देहधारी परमेश्वर के कार्य करने और सत्य पर संगति करने के संदर्भ में, वह जो कार्य करता है और जो वचन बोलता है, वे इस योग्य हैं कि तुम लोग उनका पालन करो और तुम लोग पूर्ण रूप से और असंदिग्ध रूप से उनका पालन और उनके प्रति समर्पण करो। ऐसा इसलिए है, क्योंकि ये वचन परमेश्वर के जीवन और परमेश्वर के सार से आते हैं—ये उद्धार के मार्ग पर तुम लोगों का मार्गदर्शन करते हैं और ये ऐसे वचन हैं जो परमेश्वर की ओर मुड़ने में तुम लोगों का मार्गदर्शन करते हैं। दैनिक जीवन में मेरे द्वारा कहे गए कुछ वचनों को तुम्हें दिल पर लेने की जरूरत नहीं है, लेकिन जहाँ तक व्यक्तिगत रूप से मेरी बात है, मेरा इरादा किसी को चोट पहुँचाना बिल्कुल नहीं है। अगर मुझे तुम्हारा व्यक्तित्व, तुम्हारा स्वभाव, तुम्हारे काम करने का तरीका या तुम्हारा कोई पहलू बहुत पसंद न आए तो भी, मैं तुम्हें चोट बिल्कुल नहीं पहुँचाऊँगा, न ही मैं कभी तुम्हें प्रलोभन देने के लिए कुछ करूँगा जैसा कि साँप ने किया था। मैं तुम्हें ऐसे मार्ग पर चलने के लिए प्रलोभन नहीं दूँगा जो गलत या बुरा हो, न ही मैं तुम्हें पतित होने, पाप करने या ऐसी चीजें करने के लिए प्रलोभन दूँगा जो परमेश्वर का प्रतिरोध करती हों; मैं ऐसा बिल्कुल नहीं करूँगा। यहाँ तक कि अगर तुम्हारे बारे में कुछ ऐसा हुआ जो मुझे बहुत पसंद न आए या जो मेरे व्यक्तित्व के साथ बहुत संगत न हो, और अगर मैं दैनिक जीवन में तुम्हारे साथ न जुड़ूँ या मेलजोल न करूँ, तो भी अपनी पहचान को देखते हुए, मैं तुम्हारे साथ बिल्कुल सही व्यवहार करूँगा। यदि तुम कोई ऐसी चीज खोजते हो जिसमें सत्य या जीवन प्रवेश शामिल हो, तो मैं तुम्हें बिल्कुल ऐसे तरीके से अभ्यास का मार्ग बताऊँगा जो स्पष्ट होगा, अस्पष्ट नहीं। एक बात निश्चित है : अगर मैं तुम्हें पसंद न करूँ तो भी, मैं तुम्हें गुमराह नहीं करूँगा। मैं तुम्हारे साथ सही तरीके से व्यवहार करूँगा। यदि तुम सत्य का अनुसरण करने के इच्छुक हो और उद्धार के मार्ग पर चलने के इच्छुक हो, तो मैं तुम्हारे साथ अभ्यास के उन सिद्धांतों पर संगति करूँगा जिनका तुम्हें पालन करना चाहिए; यह निश्चित है।

परमेश्वर द्वारा मनुष्य को प्रलोभन न देने के विषय में यह भी शामिल है कि मनुष्य देहधारी परमेश्वर के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, है ना? (हाँ।) चूँकि भ्रष्ट स्वभावों की ये अभिव्यक्तियाँ—लोगों को भड़काना, लोगों को उकसाना, लोगों को बहला-फुसलाकर उनके अंदर से जानकारी निकालने की कोशिश करना, और संदिग्ध और अस्पष्ट रूप से बोलना—मनुष्य में बहुत आम हैं और ये सब मानवजाति के भ्रष्ट सार की अभिव्यक्तियाँ हैं, इसलिए मनुष्य देहधारी परमेश्वर के साथ इन्हीं तरीकों, परिप्रेक्ष्यों और दृष्टिकोणों से व्यवहार करता है। तो, यह आवश्यक है कि मनुष्य इन पहलुओं को जाने, और मनुष्य को देहधारी परमेश्वर द्वारा प्रदर्शित इन अभिव्यक्तियों को स्पष्ट रूप से समझाना भी आवश्यक है : मनुष्य को न भड़काना, मनुष्य को न उकसाना, मनुष्य को बहला-फुसलाकर उसके अंदर से जानकारी न निकालना और अस्पष्ट न होना। इन चीजों को समझने के बाद मनुष्य देहधारी परमेश्वर को एक नए आलोक में जानने लगेगा। एक ओर, यह मनुष्य को देहधारी परमेश्वर के उन पहलुओं का अधिक ज्ञान प्राप्त करने दे सकता है जिनमें परमेश्वर का सार शामिल है, जिससे वह स्वर्ग स्थित परमेश्वर को बेहतर ढंग से जान और समझ सकता है। दूसरी ओर, यह मानवों को देहधारी परमेश्वर के साथ उस तरह से व्यवहार करने से रोक भी सकता है, जिस तरह से वे अन्य भ्रष्ट मनुष्यों के साथ व्यवहार करते हैं। इन चीजों पर संगति करने से मनुष्य को देहधारी परमेश्वर के साथ सही तरीके से व्यवहार करने में बहुत मदद मिलेगी और उसे परमेश्वर के प्रति अपना रवैया सुधारने में भी बहुत मदद मिलेगी, जिससे वह देहधारी परमेश्वर के साथ सही रवैये और तरीकों का उपयोग करके व्यवहार कर सकेगा। इसी तरह, देहधारी परमेश्वर के साथ सही तरीके से व्यवहार करने से मनुष्य को सृष्टिकर्ता के साथ सही तरीके से व्यवहार करने में भी मदद मिलेगी। यानी, यदि तुम सृष्टिकर्ता के साथ सही रवैये और सही तरीकों का उपयोग करके व्यवहार करना चाहते हो और यदि तुम एक सृजित प्राणी के रूप में सृष्टिकर्ता के साथ एक सामान्य संबंध स्थापित करना चाहते हो और एक सृजित प्राणी के सही रवैये के साथ सृष्टिकर्ता के साथ व्यवहार करना चाहते हो, तो पहले तुम्हें सही रवैये और तरीकों का उपयोग करके देहधारी परमेश्वर के साथ व्यवहार करना होगा। जब तुम सही रवैये और तरीकों का उपयोग करके देहधारी परमेश्वर के साथ व्यवहार करते हो, तब तुम्हारे पास सृष्टिकर्ता के साथ सही तरीके से व्यवहार करने का अवसर या बुनियादी साधन होगा। इसलिए, देहधारी परमेश्वर के साथ कैसे व्यवहार किया जाए, यह एक ऐसी बाधा है जिससे मनुष्य पार नहीं पा सकता। यदि तुम देहधारी परमेश्वर के साथ सही व्यवहार करने की यह बाधा आसानी से पार करना चाहते हो, तो तुम्हें देहधारी परमेश्वर के सार को जानना होगा, देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता को जानना होगा और यह जानना और समझना होगा कि देहधारी परमेश्वर का जीवन सार, उसका जीवन यापन और उसकी जीवन अभिव्यक्तियाँ क्या हैं। जब तुम इन चीजों को जानोगे और समझोगे, तभी तुम्हारे पास देहधारी परमेश्वर के साथ सही व्यवहार करने का अवसर और साधन होगा। यदि मनुष्य परमेश्वर के प्रति समर्पण करना और उसकी आराधना करना चाहता है, तो परमेश्वर में विश्वास करने और उसका अनुसरण करने में यह एक ऐसी बाधा है जिसे उसे पार करना ही होगा। यदि तुम यह बाधा पार कर सकते हो, तो तुम्हारे लिए परमेश्वर की नजर में मानक स्तर का सृजित प्राणी बनने की उम्मीद होगी और तुम्हारे लिए परमेश्वर द्वारा स्वीकार किया जाने वाला व्यक्ति बनने की उम्मीद होगी।

अभी हमने जिन कई विषयों पर संगति की, उनके अलावा एक और विषय है जिसे तुम लोगों को समझने की जरूरत है, जो यह है कि देहधारी परमेश्वर रुतबे के साथ किस तरह से और किस रवैये से पेश आता है। मानवजाति के लिए यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है, जीवन-अनुभव में एक ऐसा विषय जिससे बचा नहीं जा सकता। इसमें सीधे तौर पर मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन की वह वास्तविक मानसिकता शामिल है, जो उसके जीवन के सभी पहलुओं से जुड़ी है। इसलिए, देहधारी परमेश्वर रुतबे को कैसे लेता है, इस पर उसके रवैये और सिद्धांतों पर भी तुम लोगों के साथ संगति करना आवश्यक है। मानवजाति के बीच रुतबे को एक ऐसा मुद्दा कहा जा सकता है जिससे लोग जीवन भर नहीं बच सकते, और यह ऐसी चीज भी है जिसके पीछे अधिकांश लोग भागते हैं। रुतबे की बात करें तो, हर किसी के दिल में यह एक खास जगह रखता है और इसका एक खास महत्व होता है। रुतबा होना हर किसी के लिए समाज में प्रतिष्ठित स्थान का प्रतीक है, साथ ही समाज में उच्च वर्ग और शक्ति का भी प्रतीक है। रुतबा होने पर मनुष्य उससे मिलने वाले सम्मान और बेहतर जीवन-शैली का आनंद ले सकते हैं, साथ ही इसके द्वारा प्रदान किए जाने वाले विभिन्न लाभों और शक्तियों का भी आनंद ले सकते हैं; इसलिए रुतबा हर किसी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन मानवजाति रुतबे को चाहे कितना भी महत्व दे, या रुतबा मानवजाति के लिए चाहे कितना भी महत्वपूर्ण हो, क्या देहधारी परमेश्वर भी इसे उसी तरह देखता है? (नहीं।) निश्चित रूप से नहीं। रुतबा मानवजाति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन जहाँ तक देहधारी परमेश्वर, इस साधारण व्यक्ति का—यानी, व्यक्तिगत रूप से मेरा—संबंध है, तो मैं रुतबे के बारे में कोई विचार ही नहीं करता, न ही मैं उसके पीछे भागने की इच्छा रखता हूँ। बेशक, मेरे मन में उसके बारे में कोई विचार या जागरूकता होने का कोई सवाल ही नहीं है—मेरे पास इनमें से कोई चीज नहीं है। मैं जन्म से ही ऐसी भावनाओं से मुक्त रहा हूँ; यानी, जब से मैं चीजें याद रखने लायक उम्र का हुआ और यह समझ सका कि चीजें कैसे काम करती हैं, तब से मुझमें यह जागरूकता नहीं रही है। चाहे वह परिवार में रुतबा हो, स्कूल में रुतबा हो, या लोगों के बीच मेरा स्थान और मूल्य हो, मेरा हृदय इन चीजों से मुक्त है; मुझमें यह जागरूकता ही नहीं है। जागरूकता की यह कमी कैसे प्रदर्शित होती है? मैं कभी दूसरों के साथ होड़ करने की नहीं सोचता, और मैं कभी किसी के साथ रुतबे के लिए होड़ करने का विचार मन में नहीं लाता। जब कोई मेरे साथ होड़ करने की कोशिश करता है, तो मैं कहता हूँ, “तुम किस चीज के लिए होड़ कर रहे हो? ऐसा करने का क्या मतलब है?” जैसे-जैसे मैं धीरे-धीरे बड़ा हुआ, मैंने लोगों और चीजों को अधिक स्पष्ट रूप से देखना सीखा। सभी प्रकार के लोगों और चीजों का अनुभव और सामना करने की प्रक्रिया में मुझे पता चला कि सभी लोग एक-दूसरे के साथ होड़ करना पसंद करते हैं। लोग रुतबे, शक्ति, प्रतिष्ठा और हितों के लिए होड़ करते हैं; लोग इन चीजों के लिए होड़ करते हैं। जब मैं छोटा था, तो मुझमें इन चीजों के लिए होड़ करने की कोई समझ नहीं थी। बड़ा होने के बाद, मैं केवल ऐसी होड़ का भेद पहचानने में सक्षम हो पाया, और केवल यह समझ पाया कि लोग मेरे साथ होड़ क्यों करते हैं, लेकिन फिर भी मुझमें स्वयं किसी और के साथ होड़ करने की कोई इच्छा नहीं थी। मैं लोगों के साथ होड़ न करने की क्या अभिव्यक्तियाँ दिखाता हूँ? जब दूसरे लोग मेरे साथ होड़ करने की कोशिश करते हैं, तो मैं मन ही मन सोचता हूँ, “यदि तुम मेरे साथ होड़ करके वह प्राप्त कर सकते हो जो तुम चाहते हो, तो तुम मुझसे आगे निकल गए; यदि प्राप्त नहीं कर सकते, तो मैं तुमसे आगे निकल गया हूँ, लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता कि मैं तुमसे महान हूँ। यहाँ तक कि अगर मैं तुमसे आगे निकल भी जाता हूँ तो भी, मैं तुम्हें धमकाऊँगा या सताऊँगा नहीं; मुझे इससे कोई लाभ नहीं मिलेगा, न ही मैं तुमसे अधिक कुलीन महसूस करूँगा।” देखो, मुझमें बस ऐसी ही मानसिकता, ऐसी ही सामान्य अवस्था है; रुतबे के बारे में मेरी जागरूकता और समझ ऐसी ही है। कलीसिया में आने के बाद भी ऐसा ही रहा। चूँकि जब मैं पहली बार एक साधारण विश्वासी बना, तब मैं काफी उत्साही था और उच्च-स्तरीय अगुआओं द्वारा मेरी सराहना की जाती थी, इसलिए कुछ लोग मुझसे ईर्ष्या करने लगे। मैंने सोचा, “इसमें ईर्ष्या करने वाली क्या बात है? यदि तुम भी उतने ही उत्साही हो और कीमत भी चुकाते हो, अधिक भजन सीखते हो, अधिक प्रार्थना करते हो, कलीसियाई जीवन में अधिक भाग लेते हो और भाई-बहनों की अधिक मदद करते हो, तो क्या उच्च-स्तरीय अगुआओं द्वारा तुम्हारी भी सराहना नहीं की जाएगी?” उन परिस्थितियों में, मुझे ऐसा नहीं लगा कि सराहा जाना किसी प्रकार का सम्मान है, रुतबा होने या किसी प्रकार की उन्नत पहचान प्राप्त करने का प्रतीक है; मुझे ऐसा कुछ भी महसूस नहीं हुआ। बाद में, धीरे-धीरे, मेरा रुतबा उत्तरोत्तर विशेष होता गया, और वह अधिकाधिक ऊँचा होता गया। जब मैंने औपचारिक रूप से कार्य करना शुरू किया, तब भी मुझे ऐसा नहीं लगा कि मेरा रुतबा इतना ऊँचा है, या मैं दूसरों से अधिक कुलीन हूँ या दूसरों से अलग हूँ। व्यक्तिपरक रूप से, मुझमें स्वयं यह जागरूकता नहीं थी, लेकिन जिस तरह कुछ लोग मुझे देखते और मेरे साथ पेश आते थे, वह पहले से अलग था। तब कहीं मुझे एहसास हुआ कि रुतबा हासिल करने के बाद लोगों के बीच रहने पर ऐसा ही महसूस होता है। जब मेरे पास रुतबा था और मैंने कार्य करना शुरू किया, तो जिस तरह लोग मुझे देखते थे वह अलग था, मुझसे बात करते समय उनका रवैया अलग होता था, और उनके शब्दों का चयन, लहजा और प्रत्येक अन्य पहलू अलग होता था। एक व्यक्ति के रूप में मैं नहीं बदला हूँ। मेरा रूप-रंग अभी भी वैसा ही है, और मेरा व्यक्तित्व, मेरे रहन-सहन की आदतें और मेरे बोलने का तरीका नहीं बदला है। तो लोगों का मेरे प्रति रवैया अलग क्यों है? यह लोगों की रुतबे की इच्छा है, जो काम कर रही है। सभी लोग रुतबे का सम्मान करते हैं; जब मेरे पास रुतबा आ गया, तब मेरे प्रति लोगों का रवैया बदल गया। यह रुतबा था जिसे लोग पसंद करते थे, मैं नहीं—क्योंकि मैं नहीं बदला था। एकमात्र चीज जो बदली थी, वह मेरा स्थान था। मैं उपदेश सुनने वाले एक साधारण विश्वासी से मंच से उपदेश देने वाला व्यक्ति बन गया और मेरे प्रति लोगों का रवैया अलग हो गया। जब मेरे प्रति लोगों का रवैया अलग हो गया, तब कहीं मुझे एहसास हुआ कि मेरे पास रुतबा है। लोग मुझसे अधिक विनम्रता से बात करते थे और मुझे सम्मानजनक उपाधियों से संदर्भित करते थे। जब मैं वहाँ बैठकर बोलता था, तब कोई मेरे लिए गिलास में पानी डाल देता; जब खाने का समय होता, तब कोई मुझे खाना परोस देता और मेरे लिए चॉपस्टिक ले आता। तब कहीं मैंने ध्यान दिया कि लोग मेरे साथ ऐसा व्यवहार केवल इसलिए करते हैं क्योंकि मेरे पास रुतबा है। लेकिन, जहाँ तक मेरी बात है, मुझे अभी भी ऐसा नहीं लगा कि “रुतबा होने का अर्थ शक्ति होना है; रुतबा होना अपने और दूसरों के बीच दूरी पैदा करता है, व्यक्ति को श्रेष्ठता प्रदान करता है, और व्यक्ति को अपनी मर्जी से काम करने देता है, वह जो चाहे कर सकता है।” मुझमें यह जागरूकता नहीं थी, न ही मुझे ऐसा महसूस हुआ। इसलिए, जब मैं एक साधारण विश्वासी था, तब मैं लोगों के साथ सामान्य रूप से मिल-जुल सकता था, और जब मेरे पास रुतबा हो गया, तब भी लोगों के साथ मिलने-जुलने का मेरा तरीका नहीं बदला; मैं अभी भी उनके साथ सामान्य रूप से निभा सकता था।

रुतबा होना शक्ति होने का प्रतीक है, लेकिन मैंने कभी किसी को दबाने के लिए शक्ति का उपयोग नहीं किया है और न ही किसी को उपदेश देने के लिए अपने रुतबे का उपयोग किया है। मैंने कभी यह भी महसूस नहीं किया है कि चूँकि मेरे पास रुतबा है, इसलिए हर चीज में अंतिम निर्णय मेरा हो सकता है, और मैं अपने रुतबे का फायदा उठा सकता हूँ और अपनी शक्ति का उपयोग वे चीजें करने के लिए कर सकता हूँ जो मैं करना चाहता हूँ। मेरे मन में कभी ऐसे विचार नहीं आए और मैंने कभी इस तरह से कार्य नहीं किया है। मैं अभी भी कलीसिया के प्रशासनिक आदेशों, कलीसिया के नियमों और कलीसिया की कार्य-व्यवस्थाओं का पालन करता हूँ। मुझमें रुतबे की कोई जागरूकता नहीं है, न ही कुछ करने या अपने लिए कोई लाभ प्राप्त करने के लिए शक्ति का उपयोग करने की कोई जागरूकता है। मैंने कभी ऐसी बातें नहीं कही हैं, न ही मैंने कभी ऐसे काम किए हैं। मान लो कोई मेरे पास आता है और कहता है कि उसे अपना कर्तव्य करने में कुछ कठिनाइयाँ हो रही हैं, और पूछता है कि क्या मैं उसे किसी अन्य कर्तव्य पर नियुक्त कर सकता हूँ। कोई शक्तिसंपन्न व्यक्ति आम तौर पर क्या कहेगा? “मुझे बस एक शब्द कहना है, है ना? मैं ही वह व्यक्ति हूँ जिसका इसमें अंतिम निर्णय होता है!” यह वह तकिया कलम है जिसका उपयोग भ्रष्ट मनुष्य अक्सर करते हैं, लेकिन मैंने कभी ऐसा कुछ नहीं कहा है। मैं कहता हूँ, “तुम्हें यह कर्तव्य निभाने में कठिनाइयाँ हैं, तो मुझे विशिष्ट स्थिति के बारे में पूछना होगा। कलीसिया आम तौर पर सिद्धांतों के आधार पर और व्यक्ति की स्थितियों के आधार पर लोगों की कर्तव्य संबंधी नियुक्तियों में समायोजन करती है। मुझे इसके बारे में पता लगाने और इसे हल करने के लिए अगुआओं और कार्यकर्ताओं के पास जाना होगा।” इस मामले के संबंध में मेरे सिद्धांत क्या हैं? मेरे विचार क्या हैं? वह इस मामले को मेरे ध्यान में लाता है, और मैंने केवल वही सुना है जो उसे कहना है, और मैं नहीं जानता कि उसने क्या किया है या पर्दे के पीछे उसकी क्या अभिव्यक्तियाँ हैं; मैं केवल उसके कहे को सच नहीं मान सकता। भले ही उसके मेरे साथ अच्छे संबंध हों या वह मुझे कभी नाराज न करता हो, फिर भी मैं अपनी शक्ति प्रदर्शित करने के लिए मनमाने ढंग से खुद उसके कर्तव्य की व्यवस्था नहीं कर सकता। मुझे कलीसिया के अगुआओं से पूछना होगा कि वह आम तौर पर कैसा व्यवहार करता है, क्या उसके लिए यह कर्तव्य करने की व्यवस्था करना उचित था, क्या अगुआओं के कोई विचार थे, और क्या यह सिद्धांतों पर आधारित था। यदि यह सिद्धांतों पर आधारित है, तो उसका कर्तव्य मनमाने ढंग से समायोजित नहीं किया जा सकता, है ना? (हाँ।) मैं बिल्कुल नहीं कहूँगा, “मुझे बस एक शब्द कहना है। मेरे पास ऐसा करने की शक्ति है। मैं जाकर अगुआओं से कहूँगा—देखो, वे मेरा कहा कैसे करते हैं।” मैं ऐसा नहीं करूँगा, न ही मैंने कभी ऐसी बातें कही हैं। जब मैं अपने गृहनगर की कलीसिया में था, तब मैंने इस तरह का काम नहीं किया था, और बाद में, कलीसिया का समग्र कार्य करते हुए और विभिन्न प्रांतों की कलीसियाओं की यात्रा करते हुए भी मैंने ऐसे काम नहीं किए। यानी, मैंने कभी अपनी शक्ति का उपयोग व्यक्तियों पर सिद्धांतहीन उपकार करने के लिए नहीं किया है; मैंने कभी ऐसी कोई मिसाल कायम नहीं की है। चाहे अब हमारी कलीसिया में जितने भी लोग हों, या वे जितनी भी जातियों से संबंधित हों और जिन भी देशों से आते हों, मेरी पहचान के ही संदर्भ में, क्या तुम लोग नहीं कहोगे कि मेरा रुतबा काफी ऊँचा है? क्या मेरी शक्ति काफी अपार नहीं है? (हाँ।) भ्रष्ट मानवजाति के बीच यह रुतबा बहुत बड़ी बात होगी और यह शक्ति अपार होगी! एक औसत व्यक्ति इसे सँभाल नहीं पाएगा; वह नहीं जानता होगा कि इस शक्ति का उपयोग कैसे किया जाए, और वह तो यह तक नहीं जानता होगा कि क्या खाए या क्या करे। लेकिन देखो, मैं तुम लोगों के साथ कैसे बोलता और मिलता-जुलता हूँ। मैं सभी लोगों के साथ मिलता-जुलता हूँ, चाहे वे अगुआ और कार्यकर्ता हों या साधारण विश्वासी। यहाँ तक कि मैं उन लोगों के साथ भी मिला-जुला हूँ जो मेहनत और शारीरिक श्रम करते हैं, सबसे अगोचर लोग, और नए विश्वासी। जब मैं देखता हूँ कि तुम लोगों को समस्याएँ हैं, तब मैं तुम लोगों के साथ संगति और बातचीत करता हूँ। कभी-कभी, नए विश्वासियों के साथ मिलते-जुलते समय, मैं पूरी कोशिश करता हूँ कि उन्हें मेरी पहचान पता न चले। यह सबसे अच्छा है कि वे मुझे केवल एक साधारण व्यक्ति के रूप में देखें। यदि वे मेरी बात सुनना चाहें, तो वे थोड़ा सुन सकते हैं; यदि वे न सुनना चाहें, तो मैं उन्हें मजबूर नहीं करता। मैं उन्हें आजादी देता हूँ। मैं खुद को दूसरों से ऊपर बिल्कुल नहीं रखूँगा, न ही मैं कोई दिखावा करूँगा। मैं अपना परिचय बिल्कुल नहीं दूँगा जिससे उन्हें पता चले कि मैं कौन हूँ, जिससे उन्हें पता चले कि मेरा रुतबा कितना ऊँचा है या मेरी शक्ति कितनी महान है, और वे मुझसे डरें। मुझे ऐसा करना पसंद नहीं है और मैंने कभी ऐसा नहीं किया है। कभी-कभी जब मैं ऐसे भाई-बहनों से मिलता हूँ जिनसे मैं परिचित नहीं होता, और उनके साथ बातचीत करता हूँ, तब वे मुझे ऊपर से नीचे तक देखते हैं और मन ही मन सोचते हैं, “तुम खुद को समझते क्या हो? तुम हमारे साथ संगति क्यों कर रहे हो?” मैं देखता हूँ कि यह व्यक्ति अजनबी है, कि यह मुझे कुछ शत्रुता के साथ देखता है, और कि यह मेरी जाँच-परख करना चाहता है और मुझे तुच्छ समझता है, लेकिन मैं बुरा नहीं मानता। यदि वह मुझे तुच्छ समझता है और मेरी संगति नहीं सुनना चाहता, तो मैं बस अपनी संगति छोटी कर दूँगा; यदि वह मेरी बात सुनना चाहता है, तो मैं उसके साथ थोड़ी और बातचीत करूँगा। कुछ लोग मेरी संगति सुनने में आनंद लेते हैं और उसमें रुचि लेने लगते हैं, और वे मुझे भोजन के लिए रुकने के लिए भी कहते हैं और मेरे साथ बातचीत करने की पहल करते हैं। इसके बाद, मैं यह नहीं पूछता कि वे किस कलीसिया से हैं, वे क्या कर्तव्य निभाते हैं, या उनकी स्थिति क्या है; मैं बस उनके साथ सामान्य और सही तरीके से व्यवहार करता हूँ।

मैं चाहे जिसके साथ भी मिलूँ-जुलूँ—चाहे वे सत्य का अनुसरण करने वाले लोग हों या न करने वाले, चाहे वे समाज में रुतबा रखने वाले लोग हों या रुतबा न रखने वाले, चाहे वे अगुआ और कार्यकर्ता हों या साधारण विश्वासी—कार्य के बारे में तुम लोगों के साथ संगति करते समय या दैनिक जीवन में तुम लोगों के साथ मिलते-जुलते समय मैं कभी खुद को श्रेष्ठ नहीं मानता। उदाहरण के लिए, यदि तुम कहते हो कि तुम प्यासे हो, तो मैं तुम्हें गिलास में पानी डालकर दे दूँगा। ऐसा नहीं है मानो मुझे दिखावा करना हो और तुमसे अपनी सेवा करवानी हो, न ही मैं यह कहूँगा, “हमारे बीच रुतबे और अहमियत में फर्क है; मैं किसी की सेवा करने का इस तरह का काम बिल्कुल नहीं करूँगा।” मेरे मन में ऐसे विचार नहीं हैं। यदि तुम मुझे गिलास में पानी डालकर देते हो, तो मैं इसे भाई या बहन के नाते किया गया काम मानता हूँ; यदि तुम प्यासे हो और चाहते हो कि मैं तुम्हें गिलास में पानी डालकर दे दूँ, तो मैं भी तुम्हें गिलास में पानी डालकर दे सकता हूँ। जब मैं सभाओं में संगति कर रहा होता हूँ, तो कुछ लोग धारणाएँ और शत्रुता पाल लेते हैं, या उनका रवैया खराब होता है, या वे रुचि नहीं लेते और मुझे नजरअंदाज करते हैं। उस स्थिति में मैं नियमों के अनुसार काम करता हूँ; यदि संगति करने की आवश्यकता हो तो मैं संगति करता हूँ, और यदि समस्याएँ हल करने की आवश्यकता हो तो मैं समस्याएँ हल करता हूँ। मैं खुद को श्रेष्ठ नहीं समझता या दिखावा नहीं करता। अगर तुम मेरे प्रति शत्रुता रखते हो तो भी, मैं वह कार्य करता हूँ जो मुझे करना चाहिए और वे वचन बोलता हूँ जो मुझे बोलने चाहिए। मैं तुमसे बिल्कुल भी प्रभावित नहीं होता, और मैं कार्य में ज़रा भी देरी नहीं करता; तुम्हें जो प्राप्त करना है, वह भी ज़रा भी प्रभावित नहीं होता। यदि यह मेरी सेवकाई का हिस्सा है और इसमें सत्य, सिद्धांत और कलीसिया का कार्य शामिल है, तो चाहे कोई भी समस्या लेकर मेरे पास आए, मैं यह बिल्कुल नहीं कहूँगा, “क्या तुम्हारा पद पर्याप्त ऊँचा है? वैसे तुम हो कौन? क्या तुम कोई क्षेत्रीय अगुआ हो या जिला अगुआ? या तुम किसी खास स्तर पर टीम अगुआ या पर्यवेक्षक हो?” मैं ये बातें नहीं पूछता। यदि तुम किसी समस्या के बारे में मेरे पास आते हो या किसी खास अगुआ के साथ या कलीसिया के कार्य के किसी खास पहलू के साथ किसी समस्या की रिपोर्ट करते हो, तो मैं आवश्यकतानुसार तुम्हारे साथ संगति करूँगा। मैं खुद को श्रेष्ठ नहीं समझूँगा और मैं तुम्हारे पद के बारे में नहीं पूछूँगा। शायद तुम्हें परमेश्वर में विश्वास किए ज्यादा समय न हुआ हो और तुम्हें लगता हो कि परमेश्वर के घर में तुम्हारा रुतबा ऊँचा नहीं है, इसलिए तुम पूछने में बहुत शर्मिंदगी महसूस करते हो। लेकिन मैं चीजों को इस तरह नहीं देखता; मैं मनुष्य के साथ उसके रुतबे के आधार पर व्यवहार नहीं करता। इसलिए, चाहे तुम लोग अगुआ और कार्यकर्ता हो या साधारण भाई-बहन, जब मैं तुम लोगों के साथ जीवन प्रवेश पर संगति करता हूँ या तुम्हारे कार्य का मार्गदर्शन करता हूँ, तो मैं बिल्कुल भी किसी नौकरशाह की तरह बात नहीं करूँगा या तुम लोगों को अनिश्चितता की हालत में नहीं छोड़ूँगा, न ही मैं तुम लोगों के लिए चीजें कठिन बनाने के लिए तमाम तरह के प्रश्न पूछूँगा। मैं तुम लोगों पर कार्य करते समय और तुम लोगों से बात करते समय कोई कसर नहीं छोड़ता। मैं बेबाक बोलता हूँ और उतना ही कहता हूँ जितना जानता हूँ। मैं खुद को श्रेष्ठ नहीं समझता, मैं तुम लोगों का मजाक नहीं उड़ाता और मैं तुम लोगों के लिए चीजें कठिन नहीं बनाता। जब मैं देखता हूँ कि तुम लोगों को अपने कार्य में कठिनाइयाँ हैं और तुम लोग नहीं जानते कि इसे कैसे करना है, तो मैं तुम लोगों को मार्गदर्शन और सलाह देता हूँ। मैं तुम लोगों को अधिक जानने और अपने पेशागत कौशलों में कुछ सिद्धांत समझने और सत्य की थोड़ी और समझ भी प्राप्त करने में मदद करने के लिए चीजें कहता और करता हूँ। चाहे सार्वजनिक रूप से हो या निजी तौर पर, मैं इसी तरह कार्य करता हूँ। चाहे आमने-सामने मिल-जुल रहा हूँ या तुम लोगों के साथ ऑनलाइन संगति और बातचीत कर रहा हूँ, मैं कभी श्रेष्ठता का दिखावा नहीं करता। श्रेष्ठता का दिखावा करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है हमेशा दिखावा करना और एक प्रभावशाली उपस्थिति रखना, जिससे तुम लोगों को यह महसूस हो कि मैं असाधारण और दबंग हूँ, और कि मैं तुम लोगों से ऊपर हूँ। मैं कभी इस तरह श्रेष्ठता का दिखावा नहीं करता। इसके अतिरिक्त, सभाओं के दौरान, मैं एक बुलंद छवि बनाए रखने या अपमान सहन न करने पर खास ध्यान नहीं देता, और मैं स्वर्ग में परमेश्वर की भूमिका नहीं निभाता; मैं ऐसी चीजें नहीं करता। एक बार किसी ने मुझसे पूछा कि क्या सभाओं के दौरान उपयोग के लिए विशेष रूप से मेरे लिए एक मेज बनाने की आवश्यकता है। मैंने कहा, “इसकी कोई आवश्यकता नहीं है; कोई भी मेज चलेगी।” फिर उन्होंने एक बहुत पुरानी मेज ढूँढ़ी और मैंने बस उसी से काम चला लिया। मैंने यह नहीं कहा, “यह कैसी मेज है जो तुमने मेरे लिए ढूँढ़ी है! मेरी पहचान को देखते हुए, तुमने मेरे लिए कोई अच्छी मेज क्यों नहीं ढूँढ़ी? क्या तुम इसी तरह चीजें सँभालते हो!” मैंने कुछ नहीं कहा, न ही मैंने किसी उच्च कोटि की या सोने की परत चढ़ी मेज का उपयोग करने की माँग की; मैं कभी इन चीजों के बारे में मीन-मेख निकालने वाला नहीं रहा हूँ। बाद में, ऑनलाइन सभा होने पर, मैं एक साधारण स्टूल पर भी बैठा और मैंने एक साधारण डेस्क का भी उपयोग किया, जिस पर एक डेस्क लैंप और प्रत्येक संगति का विषय और रूपरेखा लिखने के लिए एक नोटबुक थी। यह बस इतना ही सरल है। कलीसिया में सभा करते समय मैं साधारण पेशेवर पोशाक पहनता हूँ—आम तौर पर एक सूट जैकेट, ड्रेस पैंट और चमड़े के जूते, और सर्दियों में मैं एक ऊनी ओवरकोट भी पहनता हूँ—जो कि बहुत ही साधारण पोशाक है, केवल रोजमर्रा के कपड़ों की तुलना में थोड़ी अधिक औपचारिक दिखती है। सभाओं के दौरान उपयोग किए जाने वाले उच्च-स्तरीय उपकरण केवल माइक्रोफोन, एंप्लीफायर और कंप्यूटर हैं; केवल यही उच्च-स्तरीय, मूल्यवान चीजें हैं। देखो, यह बस इतना ही सरल है। यह विदेश में होने की बदौलत है, जहाँ विश्वास की स्वतंत्रता है और ये स्थितियाँ मौजूद हैं। एंप्लीफायर का उपयोग करने से भाई-बहन कमरे के कोनों से भी स्पष्ट रूप से सुन सकते हैं और इससे मेरे लिए बोलना बहुत कम श्रमसाध्य रहता। उधर मुख्यभूमि चीन में ये स्थितियाँ मौजूद नहीं थीं। मेरा शारीरिक गठन कमजोर और आवाज धीमी है। जब किसी सभा में बहुत सारे लोग होते थे, तब मुझे जोर से बोलना पड़ता था और श्रोताओं को मेरी आवाज फिर भी धीमी ही लगती थी। एक या दो दिन तक चलने वाली सभा में मुझे पूरे समय इसी तरह जोर से बोलते रहना पड़ता था। बताओ, क्या यह थका देने वाला नहीं है? (हाँ।) जब हम मुख्यभूमि चीन में बड़ी सभाएँ किया करते थे, तब मैं बहुत थक जाता था। अब जबकि हम विदेश आ गए हैं और स्वतंत्र हैं, एंप्लीफायर का उपयोग करने से मुझे इतनी जोर से नहीं बोलना पड़ता। इससे मेरी बहुत मेहनत बच जाती है और लोग भी अत्यधिक स्पष्ट रूप से सुन सकते हैं। जब मैं सभाओं में तुम लोगों को उपदेश देता हूँ और सत्य के उन विभिन्न पहलुओं पर संगति करता हूँ जिनकी मनुष्य को आवश्यकता है, तब कोई औपचारिकता नहीं होती और मैं कोई भव्य प्रदर्शन करने की कोशिश नहीं करता। मैं बस तुम लोगों के साथ सत्य के उन विभिन्न पहलुओं पर संगति करता हूँ जिन्हें तुम लोगों को समझना चाहिए और जिनकी तुम लोगों को आवश्यकता है, ताकि तुम लोग उन्हें समझ सको, सच्चे मार्ग पर नींव रख सको, धीरे-धीरे स्पष्टता प्राप्त कर सको और सत्य के विभिन्न पहलुओं में रुचि विकसित कर सको, और फिर जान सको कि उनका अभ्यास कैसे करना है, धीरे-धीरे अपने दिल परमेश्वर की ओर मोड़ने में सक्षम हो सको, और परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सको। इतना पर्याप्त है। देखो, क्या मैंने इन वर्षों में इसी तरह कार्य नहीं किया है? (हाँ।) मैं सभाओं में जिन वचनों पर संगति करता हूँ, वे पुस्तकों में छापे जाते हैं। भ्रष्ट मनुष्यों की कल्पनाओं के अनुसार, चूँकि ये वचन सत्य हैं और परमेश्वर की अभिव्यक्तियाँ हैं, इसलिए ये किसी प्रकार की औपचारिकता के साथ या किसी प्रकार के भव्य प्रदर्शन के साथ व्यक्त किए गए होंगे। वास्तव में, यह बहुत साधारण है। जब मैं सभाओं में उपदेश देता हूँ, तब मेरी सेवा करने के लिए आस-पास कोई नहीं होता। जब बोलते-बोलते मेरा मुँह सूख जाता है, तब मैं अपने पीने के लिए थोड़ा पानी उड़ेल लेता हूँ। कभी-कभी मैं अपने गले को आराम देने के लिए थोड़ा शहद मिला पानी पीता हूँ और कभी-कभी मैं बस सादा पानी पीता हूँ। मेरा जीवन बहुत सरल है; यह उससे भी अधिक सरल है जिसकी तुम लोग कभी कल्पना कर सकते हो। कुछ लोग सोच सकते हैं, “तुम दिखावा कर रहे हो। तुम्हें किस चीज की कमी हो सकती है? अपनी पहचान और रुतबे के साथ तुम्हारे लिए इतनी सादगी से रहना असंभव है।” मेरा जीवन वास्तव में इतना ही सरल है। मैं वर्षों तक पीने के एक ही कप का उपयोग करूँगा, और उसे तभी बदलूँगा जब वह टूट जाएगा या बहुत पुराना हो जाएगा, और फिर मैं उसके बदले मिले कप का उपयोग अगले कई वर्षों तक करूँगा। यही वास्तविकता है। जन्म से लेकर अब तक, रुतबे के प्रति मेरा यही रवैया रहा है। मेरे पास रुतबा हो या न हो, मेरे लिए एक ही बात है; मैं बस एक सरल और नियमित तरीके से जीवन जीता हूँ। जो लोग नहीं जानते, वे सोचेंगे, “तुम्हारे पास यह रुतबा और ये साधन हैं; कौन जाने तुम कितनी ऐश-ओ-आराम की जिंदगी जी रहे होगे!” सच तो यह है कि मैंने कभी कोई ऐश-ओ-आराम नहीं किया है। कभी-कभी भाई-बहन कुछ सब्जियाँ ले आते हैं, और वे जो कुछ भी लाते हैं मैं खा लेता हूँ। यह बस इतना ही सरल है। मैं जो खाता हूँ, उसे जटिल नहीं बनाता। मैं बिना सोचे-समझे जिस किसी तरह का मांस नहीं खाता, न ही मैं विचित्र और असामान्य खाद्य पदार्थ खाता हूँ। मैं बहुत सादगी से खाता हूँ; यह सब बस साधारण घर का बना खाना होता है। इसके अलावा, इतने वर्षों तक कार्य करने के बाद भी मैंने कभी यह महसूस नहीं किया है, “हमारी कलीसिया में इतने सारे लोग हैं; मुझमें सम्मान की भावना और श्रेष्ठता की भावना है।” मुझे सम्मान की कोई भावना महसूस नहीं होती, न ही मुझे लगता है कि मैंने कलीसिया में योगदान दिए हैं, या कि मेरे सिर पर कोई आभामंडल है। मुझमें ये भावनाएँ नहीं हैं, न ही मैं इन चीजों में आनंद लेता हूँ। बाहरी लोग सोच सकते हैं, “हालाँकि तुम बाहर से साधारण और सामान्य दिखते हो, लेकिन तुम जो कार्य करते हो उसे और तुम्हारी वर्तमान स्थितियों को देखते हुए, इतने सारे लोगों द्वारा तुम्हारा अनुसरण किए जाने के साथ, तुम्हारा रुतबा काफी ऊँचा है और तुम्हारी शक्ति काफी महान है—तुम्हें अपने रुतबे का आनंद लेना चाहिए, तुम जो भी करते हो उसमें प्राथमिकता रखनी चाहिए, और तुममें श्रेष्ठता-बोध होना चाहिए।” मैं कहता हूँ कि मुझमें कभी कोई श्रेष्ठता-बोध नहीं रहा है, न ही मैं रुतबे के फायदों का आनंद लेता हूँ। इसका मतलब यह नहीं कि मैं इस जागरूकता या इन विचारों और भावनाओं के प्रति विद्रोह करता हूँ, बल्कि यह है कि ये विचार बस मुझमें कहीं नहीं पाए जाते; मुझे ऐसी चीजों के अस्तित्व का एहसास नहीं होता। इसलिए, कभी-कभी जब जीवन में मैं ऐसी चीजों का सामना करता हूँ जिन्हें मैं खुद सँभाल सकता हूँ, तो मैं बस जाता हूँ और उन्हें सँभाल लेता हूँ, अपने लिए उन्हें दूसरों से नहीं करवाता। कोई कह सकता है, “फलाँ भाई या फलाँ बहन इस मामले को सँभालने में तुम्हारी मदद करने की स्थिति में है।” मैं कहता हूँ, “मैंने ऐसा क्यों नहीं सोचा? मेरा दिमाग उस तरफ क्यों नहीं गया?” लोगों की नजरों में मैं बहुत मूर्ख हूँ और नहीं जानता कि सुख कैसे भोगा जाए। वे सोचते हैं, “इतने सारे लोगों द्वारा तुम्हारा अनुसरण किए जाने और ऐसी अनुकूल स्थितियाँ होने के बावजूद तुम अभी भी छोटे-मोटे मामले व्यक्तिगत रूप से सँभालते हो। क्या तुम नहीं जानते कि अपने रुतबे का आनंद कैसे लिया जाए, क्या तुम सांसारिक मामलों से ऊपर हो, या तुम दिखावा कर रहे हो? ऐसा क्यों है कि तुम नहीं समझते? ऐसा क्यों है कि तुम यह करना नहीं जानते?” ऐसा इसलिए कि मेरे मन में कभी यह जागरूकता नहीं रही है; यह एक तथ्य है।

जब अविश्वासियों को थोड़ी शक्ति मिल जाती है, तो वे ऐसा व्यवहार करने लगते हैं जैसे वे बहुत बड़ी चीज हों। जब उन्हें थोड़ा रुतबा मिल जाता है, तो वे ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे कोई उनके बराबर नहीं है। न केवल उन्हें लाने और ले जाने के लिए निजी कारें होती हैं और उनके रक्षार्थ साथ जाने के लिए विशेष कर्मचारी होते हैं, बल्कि जब वे बाहर जाते हैं, तो उनके बैग उठाने और कपड़े पकड़ने के लिए भी लोग होते हैं। उन्हें नहलाने, उनकी मालिश करने और उनके लिए पौष्टिक भोजन तैयार करने के लिए भी लोग होते हैं। मेरे पास इनमें से कोई चीज नहीं है और मैंने कभी लोगों से मेरे साथ ऐसा व्यवहार करने के लिए नहीं कहा है। जब भ्रष्ट मनुष्यों में थोड़ी-सी क्षमता आ जाती है या वे थोड़ा-सा कुछ हासिल कर लेते हैं, तब वे ऐसा व्यवहार करने लगते हैं जैसे वे बहुत बड़ी चीज हों। उन्हें लगता है कि उनके सिर पर आभामंडल है, वे ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे कोई उनके बराबर नहीं है, और वे राजा-महाराजाओं की तरह व्यवहार करने लगते हैं। जब लोग रुतबा प्राप्त कर लेते हैं, तब उन्हें लगता है कि उनका मूल्य बढ़ गया है—लेकिन वे इतने अक्षम क्यों हो जाते हैं? वे अब खुद कुछ भी करने में असमर्थ हो जाते हैं। एक पूरी तरह से स्वस्थ, हट्टा-कट्टा व्यक्ति किसी के सहारे के बिना चल भी नहीं सकता। मैं कहता हूँ कि मुझे निश्चित रूप से किसी के सहारे की आवश्यकता नहीं है। कार में बैठते समय, जहाँ तक संभव हो, मैं इस बात से बचता हूँ कि कार का दरवाजा खोलने के लिए कोई मेरे आसपास हो। मेरे दो हाथ और दो पैर हैं—मैं सब कुछ खुद कर सकता हूँ; मुझे तुम्हारी मदद की आवश्यकता नहीं है। देखो, जब रुतबे से निपटने की बात आती है, तो देहधारी परमेश्वर और भ्रष्ट मनुष्यों के रवैये पूरी तरह से अलग होते हैं। भ्रष्ट मनुष्यों की विभिन्न अभिव्यक्तियों और खुलासों को देखते हुए, वह रुतबे को विशेष महत्व देती है और इसके प्रति विशेष रूप से जुनूनी है, जिससे मनुष्यों के बीच एक प्रतिकूल माहौल और चलन पैदा होता है। यह कहा जा सकता है कि रुतबा ही किसी व्यक्ति के बारे में सब कुछ तय करता है—यह उसका मूल्य, उसकी बातों का महत्व, और वे लाभ और शक्तियाँ तय करता है जिनका वह आनंद ले सकता है। जिनके पास रुतबा नहीं होता, वे इन चीजों पर विचार करने या इनका आनंद लेने के योग्य नहीं होते, इसलिए मनुष्य अपनी पूरी ताकत से रुतबा हासिल करने की कोशिश करता है। तो परमेश्वर के घर में रुतबा किस बात का प्रतीक है? परमेश्वर रुतबे को कैसे देखता है? यदि परमेश्वर तुम्हें रुतबा देता है, तो यह परमेश्वर द्वारा तुम्हें एक आदेश और एक जिम्मेदारी दिए जाने के बराबर है। यह जिम्मेदारी का प्रतीक है, एक सृजित प्राणी के रूप में तुम्हारे द्वारा अपनी जिम्मेदारियाँ और दायित्व पूरे करने का प्रतीक है; इसका कोई अन्य अर्थ नहीं है। यदि तुम्हारे पास यह रुतबा है और तुम अपनी जिम्मेदारियाँ अच्छी तरह से पूरी करते हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा तुमसे की गई अपेक्षाओं पर खरे उतरने में विफल नहीं हुए हो, न ही तुम परमेश्वर द्वारा तुम्हें दिए गए इस रुतबे और जिम्मेदारी पर खरे उतरने में विफल हुए हो। यदि तुम इस जिम्मेदारी को ठीक से नहीं निभाते और इसे पूरा करने में विफल रहते हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा तुम्हें दिए गए इस रुतबे और जिम्मेदारी पर खरे उतरने में विफल रहे हो। परमेश्वर लोगों को रुतबा केवल इसलिए देता है ताकि वे अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर सकें, अपने मिशन पूरी कर सकें, और इस रुतबे का बेहतर उपयोग करके वह कर सकें जो उन्हें करना चाहिए और अपनी उचित जिम्मेदारियाँ पूरी कर सकें। जब परमेश्वर तुम्हें रुतबा देता है, तब वह तुम्हें कोई विशेष शक्ति प्रदान नहीं कर रहा होता, न ही वह तुम्हें शक्ति इसलिए प्रदान कर रहा होता है कि तुम रुतबे का आनंद लो या किसी प्रकार के विशेष व्यवहार का आनंद लो। इसके अलावा, यदि तुम यह जिम्मेदारी पूरी कर सकते हो और अपने मिशन के साथ न्याय कर सकते हो, तो तुम्हारी पहचान और मूल्य इस रुतबे से मेल खाएँगे। लेकिन यदि तुम अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में विफल रहते हो, यदि तुम इस मिशन पर खरे उतरने में विफल रहते हो, और यदि तुम इस मिशन या आदेश को अच्छी तरह से पूरा नहीं करते, तो तुम इस रुतबे को रखने के योग्य नहीं हो, और तुम्हारा कोई मूल्य नहीं है। यदि तुम अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हो, तो परमेश्वर की नजर में तुम्हारी अहमियत है; यदि तुम अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में विफल रहते हो, तो परमेश्वर की नजर में तुम्हारा मूल्य तुच्छ है। यह कहा जा सकता है कि कोई व्यक्ति प्रतिष्ठित है या नहीं और उसका जीवन मूल्यवान है या नहीं, यह इस पर निर्भर नहीं करता कि उसका रुतबा ऊँचा है या नीचा, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि उसने परमेश्वर द्वारा सौंपा गया आदेश पूरा किया है या नहीं और उसने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी की हैं या नहीं। परमेश्वर तुम्हें एक आदेश सौंपता है और तुमसे यह जिम्मेदारी पूरी करने के लिए कहता है, और तुम्हें यह जिम्मेदारी पूरी करने के लिए आवश्यक विभिन्न स्थितियाँ भी देता है : यदि तुम अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हो, तो तुम अपने मिशन पर खरे उतरोगे, और परमेश्वर संतुष्ट होगा; लेकिन, यदि तुम अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करते, और इसके बजाय अपना रुतबा जताते हो और अपने हित, महत्वाकांक्षाएँ, और इच्छाएँ पूरी करने के लिए कार्य करते हो, तो यही वह चीज है जिससे परमेश्वर को सबसे ज्यादा वितृष्णा होती है और जिससे वह सबसे ज्यादा घृणा करता है। यदि तुम अपनी शक्ति का उपयोग पूरी तरह से अपनी प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे की खातिर करते हो, व्यक्तिगत लाभ के लिए साजिश करते हो, दूसरों को दबाते हो और रुतबे के फायदों में लिप्त होते हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा तुम्हें सौंपे गए इस आदेश पर खरे उतरने में विफल रहे हो, और तुम इस आदेश के अयोग्य हो। यदि, परमेश्वर का आदेश स्वीकार करने के बाद, तुम अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करते हो और कार्य अच्छी तरह से करते हो, रुतबे के फायदों में लिप्त नहीं होते या अपने रुतबे या अपने पद के अधिकारों का उपयोग व्यक्तिगत लाभ पाने के लिए नहीं करते, तो तुम अपना मिशन पूरा कर रहे हो, तुम अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर रहे हो, और तुम परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने में सक्षम होगे।

सभी भ्रष्ट मनुष्य रुतबा पसंद करते हैं; एक बार जब उनके पास रुतबा आ जाता है, तब वे सभी रुतबे के फायदों में लिप्त हो जाते हैं। यदि कोई किसी स्तर का अगुआ है या लोगों के बीच थोड़ी-सी प्रतिष्ठा रखता है और उसके पास थोड़ी-सी शक्ति है, तो वह ऐसा व्यवहार करने लगेगा जैसे वह कोई बहुत बड़ी चीज हो। जिस क्षण से उसे रुतबा मिलता है, उसी क्षण से वह अपनी शक्ति का उपयोग व्यक्तिगत लाभ प्राप्त करने के लिए करेगा, और वह ऐसी कई चीजें करेगा जो सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं, यहाँ तक कि कुछ बेतुकी चीजें भी करेगा। अगर कुछ व्यक्ति कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत बोल सकते हों तो भी, जब वे लोगों के साथ मिलते-जुलते और संगति करते हैं, तब वे पक्षपात करेंगे। यदि वे किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं जो अमीर है और जिसके पास रुतबा है, जो उनका समर्थन करता है, उनके साथ घुल-मिलकर रहता है और उनकी चापलूसी करता है, तो वे उस व्यक्ति के साथ अधिक बात करेंगे। यदि वे किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं जो गरीब है, चापलूसी करना नहीं जानता, जो उन्हें नापसंद है या जो एक नया विश्वासी है जिसकी कोई नींव नहीं है, तो वे उसे नज़रअंदाज़ करने के बहाने बनाएँगे। देखो, क्या उनके काम करने के तरीके में कोई सिद्धांत है? (नहीं।) एक बार जब उनके पास रुतबा आ जाता है, तब वे ऐसा व्यवहार करने लगते हैं जैसे वे कोई बहुत बड़ी चीज हों, वे जानते हैं कि एक नौकरशाह की तरह कैसे बात करनी है और नारे कैसे लगाने हैं, और वे जानते हैं कि अपना रुतबा कैसे जताना है और खुद को श्रेष्ठ कैसे दिखाना है। क्या लोगों में ऐसी कई अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं? (हाँ।) उदाहरण के लिए, यदि कोई ऐसी समस्या है जिसे दूसरे नहीं समझते लेकिन वे समझते हैं, और वे किसी को इसके बारे में उनसे पूछते हुए नहीं देखते, तो वे मन ही मन सोचते हैं : “तुम लोगों में से कोई मुझसे विनती नहीं कर रहा या मेरी खुशामद नहीं कर रहा, और कोई मेरी बड़ाई नहीं कर रहा या मेरा आदर नहीं कर रहा। यदि तुम लोग मुझसे विनती करो तो हो सकता है मैं तुम लोगों को बता दूँ, लेकिन फिर भी यह मेरे मूड पर निर्भर करता है। यदि कोई मुझसे विनती नहीं करता, तो मैं कुछ नहीं कहूँगा; मैं बस तुम लोगों को जानने नहीं दूँगा। मुझे बस एक वाक्य कहना होगा, लेकिन यदि मैं उसे नहीं कहता, तो तुम लोगों में से कोई नहीं समझेगा!” क्या ऐसे लोग दयालु होते हैं? (नहीं।) इसके अतिरिक्त, एक बार जब लोगों के पास रुतबा आ जाता है, तब वे जो चाहें, वही करेंगे। यदि वे किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं जो उनके आगे झुकता नहीं या जिसे उनसे शिकायतें हैं, तो वे विचार करेंगे कि उस व्यक्ति को कैसे सताया जाए और उस पर कैसे हमला किया जाए, और उसे कैसे अपने अधीन किया जाए। देखो, मेरे पास रुतबा और शक्ति है, लेकिन अविश्वासियों सहित लोगों के साथ मेरे व्यवहार करने के तरीके में क्या मुझमें वे अभिव्यक्तियाँ हैं? (नहीं।) बुरे लोग जिन्हें पसंद नहीं करते, उनका महत्व घटाने और उन्हें सताने के तरीके सोचेंगे, यहाँ तक कि उन्हें पैरों तले रौंद भी देंगे। मैंने उन लोगों के साथ कभी ऐसा नहीं किया है जिन्हें मैं पसंद नहीं करता, और मैं शायद ही कभी दूसरों से मेरे लिए काम करने के लिए कहता हूँ। मैंने देखा है कि जब कुछ लोग मुझे रोजमर्रा की सब्जियाँ और भोजन देते हैं, तब वे मेरे लिए विशेष रूप से खराब और घटिया चीजें चुनते हैं। जब दूसरे लोग कुछ अच्छी चीजें चुनते हैं, तब वे उन्हें खराब चीजों से बदल तक देते हैं। जब कोई मुझे कुछ भोजन भेजता है, तो भंडार का प्रभारी व्यक्ति उसे बस वहीं पड़ा रहने देता है और उसे खराब होने और सड़ने देता है। अपने दिलों में, ये लोग सोचते हैं, “तुम बस एक साधारण व्यक्ति हो, फिर भी तुम चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिए काम करूँ। मैं इसे इस तरह से करता हूँ, यही बहुत है। मैं तुम्हारे लिए थोड़ी मेहनत तभी करता जब तुम्हारे पास अतिमानवीय क्षमताएँ होतीं या तुम बड़े काउंटी मजिस्ट्रेट होते।” मैं समझ गया : वे मेरे लिए काम करने के अनिच्छुक थे। मुझे लगा था कि चूँकि वे कलीसिया में भाई-बहन हैं, इसलिए वे मेरे लिए कम से कम थोड़ा सम्मान रखेंगे। मुझे उम्मीद नहीं थी कि वे अनिच्छुक होंगे, कि वे मुझे तुच्छ समझेंगे और मेरे साथ बहुत बुरा व्यवहार करेंगे। वे अपने माता-पिता के लिए, अपने मालिकों के लिए, सरकारी अधिकारियों के लिए और रुतबे वाले लोगों के लिए काम करेंगे। लेकिन मैं उनके लिए कुछ नहीं था, इसलिए वे मेरे लिए काम नहीं करेंगे। मैंने मन ही मन सोचा : “तो तुम ऐसे व्यक्ति हो। तब मैं तुमसे मेरे लिए काम करने के लिए नहीं कहूँगा। यदि तुम इसे करने के अनिच्छुक हो, तो मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूँगा और मैं तुम्हें दबाने के लिए अपने रुतबे का उपयोग नहीं करूँगा। मैं बस एक साधारण व्यक्ति हूँ और मैं तुम्हें भाई-बहन समझता हूँ, फिर भी तुम पलटकर मेरे साथ ऐसा व्यवहार करते हो। तो मैं इसे करने के लिए किसी और को ढूँढ़ लूँगा; मैं अब तुम्हारा उपयोग नहीं करूँगा।” कलीसिया में ऐसे काफी लोग हैं; वे सभी छद्म-विश्वासी हैं। वे चाहे कितने भी उपदेश सुन लें, वे सत्य नहीं समझते और उनमें परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बिल्कुल नहीं है। इस तरह की स्थितियों के माध्यम से वे बेनकाब हो जाते हैं। ऐसे लोगों ने इतने सारे उपदेश सुने हैं, फिर भी वे मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं? वे मेरे साथ अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से भी बुरा व्यवहार क्यों करते हैं? क्या ऐसे लोग बहुत मतलबी नहीं हैं? (हाँ।) हर जगह कलीसियाओं में ऐसे लोग हैं। वे सत्य से प्रेम नहीं करते, तो उनमें परमेश्वर के प्रति सच्चे समर्पण का अंश मात्र भी कैसे हो सकता है? न केवल वे समर्पण से रहित हैं, बल्कि वे घृणा भी पालते हैं। वे अन्य लोगों को अच्छी सब्जियाँ और भोजन दे सकते हैं, फिर वे विशेष रूप से मुझे सबसे घटिया चीजें क्यों देते हैं? इन सब्जियों और भोजन के लिए वास्तव में किसने पैसे दिए? इस खेत को स्थापित करने के लिए किसने पैसे दिए? इन चीजों पर कोई विचार नहीं करता। बाद में, जब इन मामलों का गहन-विश्लेषण किया गया, तब अंततः लोगों की आँखें खुलीं, लेकिन उस समय किसी ने इन लोगों को उजागर करने और इनसे निपटने की पहल नहीं की।

मानव संसार में, किसी देश का सर्वोच्च शासक वह व्यक्ति होता है, जिसका लोगों के बीच सबसे ऊँचा रुतबा होता है। सबसे ऊँचे रुतबे वाले लोग क्या खाते हैं और किस चीज का आनंद लेते हैं? मूलभूत रूप से, वे लोगों का मांस खाते हैं और उनका खून पीते हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? देखो कि अतीत में चीनी सम्राटों द्वारा पहने जाने वाले ड्रैगन लबादे कैसे बनाए जाते थे। वे सभी कस्टम-मेड होते थे; एक ड्रैगन लबादे की तीन साल से अधिक समय तक विभिन्न कपड़ों और बुनाई के तरीकों का उपयोग करके सावधानीपूर्वक कढ़ाई की जाती थी, फिर भी इनमें से कुछ कपड़े पूरे जीवन में केवल एक या दो बार ही पहने जाते होंगे। यदि सम्राटों के पास वह रुतबा न होता, तो क्या वे इन चीजों का आनंद ले सकते थे? (नहीं।) रुतबा होने का अर्थ है शक्ति होना, और शक्ति होने का अर्थ है कि व्यक्ति जो चाहे कर सकता है और समस्त धन और महिमा का आनंद ले सकता है और कोई उनके खिलाफ एक शब्द कहने की हिम्मत नहीं कर सकता। लोग यहाँ तक महसूस करते हैं, “हमारे देश के सम्राट को इन चीजों का आनंद लेना चाहिए; यह बिल्कुल सही है कि वह ऐसा करता है! यदि वह अच्छे जीवन का आनंद नहीं लेता, तो इसका हम आम लोगों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। यह हमारे लिए सम्मान की बात है कि सम्राट ने इतने शानदार कपड़े पहने हैं!” ये लोग कितने नीच हैं! क्या इनके शासकों द्वारा इनका अनुकूलन नहीं किया गया है? (हाँ।) यदि देहधारी परमेश्वर, पृथ्वी पर आकर, थोड़े बेहतर जीवन का आनंद लेता है, तो लोग क्या सोचेंगे? “यह नहीं चलेगा। तुम परमेश्वर हो—तुम्हें कष्ट सहना होगा। यदि तुम कष्ट नहीं सहते, तो क्या तुम इस लायक हो कि हम तुम्हारा अनुसरण करें? तुम्हें अच्छा बिल्कुल नहीं खाना चाहिए या अच्छे कपड़े बिल्कुल नहीं पहनने चाहिए; तुम्हें बहुत कष्ट सहना अवश्य चाहिए—तभी तुम परमेश्वर हो!” क्या ऐसे मनुष्यों में कोई मानवता है? (नहीं।) क्या इस मानवजाति में परमेश्वर के प्रति कोई अच्छे इरादे हैं? क्या उनके दिल बहुत सड़ नहीं गए नहीं हैं? शासक लोगों का शोषण करते हैं, उन्हें नियंत्रित करते हैं और उन्हें गंभीर नुकसान पहुँचाते हैं, फिर भी लोग स्वेच्छा से स्वयं को उनके द्वारा नियंत्रित होने और गंभीर नुकसान पहुँचाने देते हैं। दूसरी ओर, परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए कार्य करता है; वह मनुष्य के लिए चिंतित है, मनुष्य से प्रेम करता है और उस पर दया करता है, और वह मनुष्य को सब कुछ प्रदान करता है। फिर भी परमेश्वर के प्रति मनुष्य का क्या रवैया है? मनुष्य को लगता है, “परमेश्वर का कष्ट सहना बिल्कुल सही है। वह जितना अधिक कष्ट सहता है, मैं उतना ही अधिक खुश होता हूँ; मुझे बिल्कुल भी बुरा नहीं लगता। चूँकि परमेश्वर आया है, इसलिए उसे इस तरह कष्ट सहना चाहिए।” क्या मानवों की यही मानसिकता नहीं है? लेकिन वास्तव में, चाहे कोई भी देहधारण हो, परमेश्वर के पास यह रुतबा और शक्ति होती है, फिर भी वह कभी उनमें लिप्त नहीं हुआ है, न ही उसने सांसारिक सुखों या मनुष्य के नजरानों का लालच किया है। देखो, मानव संसार में थोड़ा-सा भी रुतबा रखने वाला कोई भी व्यक्ति विशेष व्यवहार का आनंद लेना चाहता है; वह जो भोजन खाता है और जो पानी पीता है, वह उसे विशेष रूप से प्रदान किया जाता है। क्या परमेश्वर को विशेष रूप से कुछ प्रदान किया जाता है? (नहीं।) खेत में जो भी सब्जियाँ उगती हैं, मैं वही खाता हूँ; यह सब बस घर का बना साधारण खाना होता है। हो सकता है कुछ दयालु लोग मौसम के अनुसार मेरे लिए कुछ अच्छी सब्जियाँ चुन लें, लेकिन अन्यथा, कोई अंतर नहीं होता—मैं बुनियादी रूप से वही खाता हूँ जो तुम लोग खाते हो। यहाँ तक कि जब तुम लोग छिपकर कुछ अच्छी चीजें खाते हो और मुझे कोई अच्छी चीज नहीं भेजते, तब क्या मैंने कभी तुम लोगों के साथ इसे कोई मुद्दा बनाया है? (नहीं।) कुछ लोग मुझे अच्छी सब्जियाँ प्रदान करने के लिए कभी तैयार नहीं होते; वे मेरे लिए केवल वही बचा हुआ खाना चुनते हैं जिसे वे खाने के अनिच्छुक होते हैं। मुझे कुछ अच्छी सब्जियाँ खाते देखकर वे असहज हो जाते हैं। मैं चाहे जो कुछ भी खाऊँ, मैं अपना भोजन खाता हूँ; मैं तुम्हारा भोजन नहीं खाता, तो तुम नाखुश क्यों होते हो? मैंने कभी विशेष रूप से मुझे प्रदान की गई किसी चीज का आनंद नहीं लिया है और मैंने कभी भी भेंटों को हिस्सों में नहीं बाँटा है, एक हिस्सा अपना स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए, एक हिस्सा अपने दैनिक कपड़ों और सजने-सँवरने के लिए और एक हिस्सा अपनी यात्रा और मनोरंजन के लिए अलग नहीं रखा है—मैंने ऐसा कभी नहीं किया है। मेरा जीवन सरल है। अधिकांश भेंटों का उपयोग परमेश्वर के घर के कार्य के लिए और तुम लोगों के जीवन और तुम लोगों की बुनियादी जरूरतों का इंतजाम करने के लिए किया जाता है; मैंने अपने लिए कुछ नहीं रखा है। है ना? (हाँ।) देखो, साधारण सरकारी अधिकारी किस चीज का आनंद लेते हैं? वे मीडिया के प्रवक्ता केवल सौंदर्य-प्रसाधनों पर ही साल में हजारों युआन खर्च कर देते हैं और उनके पास हर काम के खर्च के लिए विशेष फंड होते हैं। देखो कि मैं क्या पहनता हूँ, क्या उपयोग करता हूँ और किस चीज का आनंद लेता हूँ—उनकी तुलना में, क्या यह ऊँट के मुँह में जीरे के बराबर भी है? यह उतना भी नहीं है। मैं एक उदाहरण और देता हूँ। हमारी कलीसिया में भाई-बहनों के बीच वित्तीय साधनों वाले अमीर लोगों को ही ले लो—वे किस चीज का आनंद लेते हैं? वे क्या पहनते और उपयोग करते हैं? (नामी ब्रांड।) वे नामी ब्रांड के कपड़े और सामान पहनते हैं, अमीरों और उच्च वर्ग की जीवन-शैली का आनंद लेते हैं। चीन में कुछ लोग विशेष रूप से आयातित चीजों के दीवाने हैं; वे पहनने और इस्तेमाल करने के लिए विशेष रूप से विदेशी उत्पाद खरीदते हैं। उस हवा के स्थानीय होने के अलावा, जिसमें वे साँस लेते हैं, वे जो कुछ भी खाते, पहनते और इस्तेमाल करते हैं, वह एक अंतरराष्ट्रीय नामचीन ब्रांड होता है। जिन चीजों का वे आनंद लेते हैं, उनमें से कुछ चीजें तो ऐसी हैं जिन्हें हमने कभी देखा भी नहीं है। जब अमीरों के पास रुतबा होता है, तब वे क्या खरीदते हैं? आलीशान हवेलियाँ, कारें और क्रूज जहाज, और साथ ही निजी जेट, निजी गोल्फ कोर्स, निजी क्लब, इत्यादि। क्या वे जिस चीज का आनंद लेते हैं, वह फिजूलखर्ची नहीं होती? (हाँ।) क्या तुम मुझे इन चीजों का आनंद लेते हुए देखते हो? (नहीं।) मैं कई वर्षों तक एक ही जोड़ी जूते पहनूँगा, और यदि वे फटे नहीं हैं तो मैं उन्हें पहनता रहूँगा। ऐसा वास्तव में नहीं है कि मेरे पास नए जूते खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं; यह बस मेरी रहन-सहन की आदतों में से एक है। मैं रुतबे और शक्ति के प्रति यही नजरिया रखता हूँ। मेरी कोई बड़ी और भव्य इच्छाएँ नहीं हैं; मेरा जीवन साधारण, सरल और अत्यधिक नियमित है। कुछ लोगों की नजर में, मेरा जीवन बहुत नीरस है। इसका निरूपण केवल एक नियमित दिनचर्या, मितव्ययिता और काफी शांत और साफ-सुथरा होने से होता है—इसमें कुछ भी शानदार, उच्च-स्तरीय या बहुत उत्कृष्ट नहीं है। लेकिन एक बार जब कलीसिया में कुछ लोग एक निश्चित स्तर के अगुआ बन जाते हैं, तब उनमें किस प्रकार की अभिव्यक्तियाँ होती हैं? (वे हर चीज में सर्वश्रेष्ठ का आनंद लेना चाहते हैं।) एक बार जब वे अगुआ बन जाते हैं, तब वे ऐसा व्यवहार करने लगते हैं जैसे वे कोई बहुत बड़ी चीज हों और उन्हें लगता है कि उनके पास रुतबा है। वे जहाँ भी जाते हैं, किसी को उन्हें बैठने के लिए जगह अवश्य देनी चाहिए; यदि कोई नहीं देता तो वे क्रोधित हो जाते हैं। जब वे बोलते हैं, तब दूसरों को हमेशा उनकी मर्जी चलने देनी होगी। वे जहाँ भी जाते हैं, हमेशा लोग उनके पीछे-पीछे चलते हैं, कोई उनका बैग लेकर चलता है और कोई उनके साथ चलने वाले लोगों के समूह का हिस्सा होता है। यदि वे लंबे समय तक कहीं बाहर रहते हैं और उन्हें भूख-प्यास लगती है, तो कोई ठीक उनके पास भोजन और पेय ले आता है; यदि वे थक जाते हैं, तो कोई उनकी मालिश कर देता है। मैं कहता हूँ, यह बड़ी बात है; एक बार जब उनके पास रुतबा आ जाता है, तब वे विशेष हो जाते हैं और वे अब मानव नहीं रह जाते, है ना? (हाँ।) तो, रुतबा होने के बारे में मैं कुछ क्यों महसूस नहीं करता? रुतबे के बिना भी मेरा गुजारा काफी आराम से हो जाता है। जब मेरे पास रुतबा होता है, तब दूसरे हमेशा मुझे एक विशेष हस्ती समझते हैं और मुझे हर जगह अजीब और असहज महसूस होता है। रुतबा न होना काफी अच्छा है, इसलिए मैं बस ऐसा व्यवहार करता हूँ जैसे मेरे पास कोई रुतबा ही न हो, और मैं लोगों के साथ एक साधारण व्यक्ति की तरह मिलता-जुलता हूँ और बहुत स्वतंत्र महसूस करता हूँ। तुम लोग भी स्वतंत्र महसूस करते हो और मैं भी स्वतंत्र महसूस करता हूँ; इस तरह लोगों के साथ घुलना-मिलना काफी अच्छा है। आम तौर पर, जब भ्रष्ट मनुष्यों को रुतबा मिल जाता है, तब उन्हें हमेशा अपनी सेवा-टहल के लिए आस-पास कुछ लोग चाहिए होते हैं। जब उन्हें पानी चाहिए होता है, तो किसी को उनके लिए पानी डालना चाहिए; जब वे खाना चाहते हैं, तो किसी को उन्हें उनकी चॉपस्टिक्स पकड़ानी चाहिए; जब वे बाहर जाते हैं, तो किसी को उनके पीछे-पीछे चलना चाहिए। उन्हें नामी ब्रांड के कपड़े भी खरीदने होते हैं, सिर से पैर तक अपने रुतबे से मेल खाते कपड़ों की एक पूरी नई अलमारी जुटानी होती है। मैं कहता हूँ, “अगुआ के रूप में सेवा करना एक आदेश और एक जिम्मेदारी है जो परमेश्वर तुम्हें देता है—क्या यह रुतबा होना है? तुम क्या वास्तविक कार्य कर सकते हो, जो तुम पहले से ही श्रेष्ठ होने का दिखावा कर रहे हो? यदि तुम वास्तव में कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर का घर तुम्हें कपड़े और कार्य उपकरण, और साथ ही एक अच्छा सेल फोन और कंप्यूटर प्रदान करेगा। लेकिन तुम कोई वास्तविक कार्य नहीं कर सकते, और फिर भी तुम आँख मूँदकर दिखावा करते हो। क्या तुम केवल इन चीजों—रुतबे, प्रसिद्धि और लाभ—का अनुसरण करने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हो? तुम इतने उथले क्यों हो?” मैंने इतने वर्षों तक कार्य किया है और मेरे कार्य का पैमाना काफी बड़ा है, लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता कि मेरे पास रुतबा है। मेरे पास कोई प्रथागत भत्ते नहीं हैं, न ही मेरी सेवा-टहल और देखभाल करने के लिए विशेष कर्मचारी हैं। मैं इन चीजों के बारे में बिल्कुल भी नखरेबाज नहीं हूँ। क्या तुम कहोगे कि मैं चीजों के बारे में तुनकमिजाज होना नहीं जानता? (नहीं, परमेश्वर बस इन चीजों की परवाह नहीं करता।) यदि मैं तुनकमिजाज होना चाहता, तो मैं हो सकता था, और मैं यह भी जानता कि अच्छी चीजें कैसे चुनी जाती हैं। लेकिन वह एक तरीका कौन-सा है जिसमें मैं तुम लोगों से अलग हूँ? मैं इन चीजों के साथ सही नजरिया रखता हूँ। मैं अपने कपड़ों और सजने-सँवरने का उपयोग अपने रुतबे से मेल खाने के लिए सिर्फ इसलिए नहीं करूँगा क्योंकि मेरे पास यह है, न ही मैं इसका उपयोग अपने रुतबे और मूल्य को प्रमाणित करने के लिए करूँगा। मैं जो कुछ भी खरीदता या रखता हूँ, वह केवल इसलिए है क्योंकि मुझे वह पसंद है या मुझे उसकी आवश्यकता है और वह मुझे अपने उपयोग के लिए उपयुक्त लगता है। मैं कोई चीज इसलिए नहीं खरीदूँगा या रखूँगा क्योंकि मेरे पास रुतबा और शक्ति है या उसे अपने मूल्य के कारण नहीं खरीदूँगा या रखूँगा।

मैं तुम लोगों के साथ इस विषय पर बात कर रहा हूँ कि देहधारी परमेश्वर रुतबे को कैसे देखता है, ताकि तुम लोग मुझे थोड़ा समझ सको और जान सको कि रुतबे के प्रति मेरा दृष्टिकोण वास्तव में क्या है और मैं उसे कैसे देखता हूँ। बेशक, मैं यहाँ तुम लोगों को सबसे ज्यादा क्या बताना चाहता हूँ? एक बात तो यह है कि, तुम लोगों के लिए स्वयं देहधारी परमेश्वर और भ्रष्ट मनुष्यों के बीच रुतबे को देखने के तरीके में अंतर जानना आवश्यक है। दूसरी बात यह है कि, यह मनुष्य को सटीक रूप से यह समझने देना है कि रुतबा वास्तव में क्या है और उसे कैसे अपने उचित स्थान पर रहना चाहिए और अपनी जिम्मेदारियाँ और अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। ये वे सही विचार और दृष्टिकोण हैं जो हर व्यक्ति के पास होने चाहिए। ऐसे सही विचारों और दृष्टिकोणों के साथ, जब तुम्हारे कर्तव्य, तुम्हारी जिम्मेदारियों, यहाँ तक कि परमेश्वर के घर द्वारा तुम्हें दिए गए रुतबे की बात आती है, तब तुम इन चीजों को सत्य और सिद्धांतों के अनुसार देखोगे। मैंने तुम लोगों के साथ इस विषय पर काफी संगति की है कि देहधारी परमेश्वर रुतबे को कैसे देखता है। इनमें से कुछ चीजें तुम लोग पहले ही देख चुके हो और वास्तविकता से उनका मिलान कर सकते हो। जहाँ तक अन्य चीजों की बात है, तुम लोगों ने केवल मुझे उनके बारे में बोलते सुना है लेकिन तुम लोग मेरे संपर्क में नहीं आए हो, इसलिए तुम लोगों के पास वास्तविकता से उनका मिलान करने का कोई तरीका नहीं है। चाहे तुम लोगों ने उन्हें देखा हो या केवल उन तथ्यों को सुना हो जिनके बारे में मैंने बात की है, अगर तुम लोग उन्हें सही ढंग से समझ सकते हो और उन पर विश्वास कर सकते हो, तो यह पर्याप्त है। यदि तुम्हें अभी भी संदेह हैं, तो यह देखने के लिए कि मैंने जो कहा है वह तथ्यात्मक और सटीक है या नहीं, समय के साथ अपने दैनिक जीवन में चीजों का निरीक्षण करो। जब तुम पुष्टि प्राप्त कर लोगे, तब तुम जान जाओगे कि परमेश्वर के लिए रुतबे का वास्तव में क्या अर्थ है, परमेश्वर रुतबे को कैसे देखता है, वह साधारण भ्रष्ट मनुष्यों के नजरिये से कैसे भिन्न है और वह सत्य क्या है जिसे मनुष्य को इस संबंध में समझना या अभ्यास करना चाहिए। इस विषयवस्तु की बुनियादी समझ होने से तुम लोग परमेश्वर को बेहतर ढंग से समझने और परमेश्वर को अधिक सटीक रूप से जानने में सक्षम होगे। इसके अलावा, यह तुम लोगों को रुतबे के मुद्दे को सही ढंग से देखने में भी मदद करेगा, साथ ही तुम लोगों को इसे सँभालने का एक सही दृष्टिकोण और एक सही तरीका भी देगा, है ना? (हाँ।)

ठीक है, आज के लिए हम अपनी संगति यहीं समाप्त करते हैं। अलविदा!

26 अक्टूबर 2024

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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