सत्य का अनुसरण कैसे करें (28)

इस पहलू, देहधारी परमेश्वर से संबंधित सत्यों, के बारे में हमने पहले बहुत संगति की है। देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता से जुड़ी कुछ विशिष्ट विषय-वस्तु पर हमने कई बार संगति की है। क्या तुम लोग अब इस विषय-वस्तु के बारे में अधिक समझ गए हो? (हाँ।) क्या तुम लोगों को देहधारी परमेश्वर—मसीह—की सामान्यता और व्यावहारिकता और मसीह के सार की और अधिक समझ प्राप्त हुई है? (हाँ।) तो क्या तुम देहधारी परमेश्वर के बारे में अपनी कुछ धारणाओं और कल्पनाओं को छोड़ पाए हो? (हाँ।) यदि तुम केवल किसी के बारे में जान रहे हो, चाहे वह उसके स्वभाव के बारे में जानना हो या इस बारे में कि वह आचरण कैसे करता है, तो तुम कमोबेश उस साधारण व्यक्ति के विभिन्न पहलुओं के बारे में ही जान रहे हो—उसका व्यक्तित्व और मिजाज, या उसके आचरण के तरीके और विधियाँ, सांसारिक व्यवहारों के उसके फलसफे, उसके अनुसरण, उसकी कुछ रुचियाँ और शौक, या उसकी कुछ जन्मजात समस्याएँ। अधिक से अधिक, यह केवल इस व्यक्ति की मानवता के बारे में जानना है और इसमें सत्य बिल्कुल भी शामिल नहीं है। यह एक साधारण व्यक्ति के बारे में जानने के संबंध में है। इसलिए, चाहे तुम मानवजाति के बीच जिस किसी व्यक्ति या जिस किसी प्रकार के व्यक्ति के बारे में जानो, चाहे तुम उसके बारे में कितना भी पता लगाओ, उसे कितनी भी गहराई से समझो, या उसके बारे में तुम्हारी समझ व्यापक हो या नहीं, इनमें से किसी में भी सत्य शामिल नहीं है। लेकिन देहधारी परमेश्वर के बारे में जानना अलग है; देहधारी परमेश्वर के विभिन्न पहलुओं के बारे में जानने वाले सभी विषयों में सत्य शामिल होता है। देहधारण परमेश्वर द्वारा अपने कार्य की आवश्यकताओं के अनुसार अपनाया गया एक विशेष रूप है और यह परमेश्वर से जुड़े विभिन्न पहलुओं, जैसे परमेश्वर की पहचान, परमेश्वर के सार और परमेश्वर के स्वभाव से सीधे तौर पर संबंधित है; देहधारी परमेश्वर को जानना परमेश्वर को जानने का भी एक हिस्सा है और यह परमेश्वर को जानने से और परमेश्वर को जानने से संबंधित उन सत्यों से जुड़ा है जिन्हें लोगों को समझना चाहिए। इसलिए, देहधारी परमेश्वर को जानना सत्य का वह पहलू है जिसे लोगों को परमेश्वर का अनुसरण करते हुए परमेश्वर का ज्ञान और परमेश्वर के प्रति समर्पण प्राप्त करने के लिए अवश्य समझना और जानना चाहिए। चूँकि देहधारी परमेश्वर को जानने और देहधारी परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य के विभिन्न पहलुओं को जानने में वह सत्य वास्तविकता शामिल है जिसे लोगों को परमेश्वर में अपने विश्वास में समझना और जिसमें प्रवेश करना चाहिए, इसलिए देहधारी परमेश्वर को जानने की बराबरी किसी साधारण व्यक्ति, किसी भ्रष्ट मानव को जानने से नहीं की जा सकती। इनकी बराबरी न किए जा सकने का कारण यह है कि देहधारी परमेश्वर को जानने में परमेश्वर को जानने का सत्य शामिल है, जो सृष्टिकर्ता को जानने का एक हिस्सा है। चाहे इस विषय-वस्तु में कुछ भी हो, संक्षेप में, इसमें सृष्टिकर्ता को जानना शामिल है, इसमें स्वयं परमेश्वर को जानना शामिल है, और निस्संदेह, इसमें यह भी शामिल है कि परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को कैसे छोड़ा जाए। यह कहा जा सकता है कि जब तुम देहधारी परमेश्वर को समझ लेते हो और देहधारी परमेश्वर से संबंधित सत्यों को समझ लेते हो, तो काफी हद तक तुम पहले ही परमेश्वर के सार और परमेश्वर के स्वभाव के एक हिस्से को जान चुके होते हो। निस्संदेह, इसके अनुरूप, तुम परमेश्वर के बारे में अपनी कई धारणाएँ और कल्पनाएँ काफी हद तक छोड़ दोगे—यानी, स्वर्ग में परमेश्वर और सृष्टिकर्ता के बारे में अपनी धारणाएँ और कल्पनाएँ। इन धारणाओं और कल्पनाओं को छोड़ने से, कम से कम, तुम्हें परमेश्वर की अधिक सटीक समझ और अधिक यथार्थ वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने में मदद मिल सकती है। तो यह ज्ञान और समझ क्या भूमिका निभाते हैं? वे बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। शायद जब तुम परमेश्वर को नहीं जानते, तब तुम्हें लगता है कि परमेश्वर वह है जिससे लोग अपने मन और विचारों में, या अपनी परंपरागत धारणाओं में परिचित हैं, और वह है जो अदृश्य और अमूर्त है। लेकिन जब तुम देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता, साथ ही उसके स्वभाव और सार के बारे में जान और समझ लेते हो, तब तुम्हें परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान हो जाएगा। यह वास्तविक ज्ञान तुम्हें परमेश्वर के प्रति सटीक और वास्तविक रूप से समर्पण करने में सक्षम बना सकता है, बजाय ऐसा झूठा समर्पण करने के, जो केवल धारणाओं और कल्पनाओं में मौजूद होता है। कौन-सा अधिक वास्तविक और अधिक सटीक है—लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं से उत्पन्न आस्था और समर्पण, या परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान होने से उसके प्रति उत्पन्न आस्था और समर्पण? क्या तुम लोग बता सकते हो? परमेश्वर का ज्ञान होने से उत्पन्न होने वाली आस्था लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं पर आधारित आस्था नहीं है; बल्कि, यह आस्था परमेश्वर के वास्तविक, सटीक ज्ञान की नींव पर निर्मित है। इसलिए, जहाँ तक तुम्हारा संबंध है, यह आस्था तुम्हें वास्तविक जीवन में परमेश्वर के इरादों को अधिक सटीकता से समझने-बूझने दे सकती है, और हर वास्तविक परिवेश में या वास्तविक लोगों, घटनाओं और चीजों के बीच अधिक सटीकता से यह जानने दे सकती है कि परमेश्वर के इरादों के अनुसार कैसे कार्य किया जाए, ऐसे तरीके से कैसे कार्य किया जाए जो सटीक हो, परमेश्वर के प्रति वास्तविक समर्पण हो, और परमेश्वर में वास्तविक आस्था और उस पर निर्भरता दर्शाए। किसी भी कोण से देखने पर, देहधारी परमेश्वर को जानना किसी साधारण व्यक्ति के बारे में जानने-समझने जितना सरल नहीं है, क्योंकि इसमें सत्य के कई पहलू शामिल हैं, जैसे परमेश्वर का सार और मनुष्य का सार, सृजित प्राणी और सृष्टिकर्ता। पहले, परमेश्वर को जानने के संबंध में मैंने कुछ उदाहरण दिए थे और कुछ सत्यों के बारे में बात की थी; लोगों को इन विषयों को साधारण विषषय नहीं समझना चाहिए, बल्कि इन्हें सत्य के एक पहलू के रूप में जानने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि देहधारी परमेश्वर, आखिरकार, वह देह है जिसमें परमेश्वर का आत्मा सचमुच और वास्तव में साकार हुआ है, और वह दिव्य सार वाला व्यक्ति है; वह पृथ्वी पर परमेश्वर का प्रतिनिधि है और पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य की अभिव्यक्ति भी है। कार्य करने के लिहाज से और अपने सार के लिहाज से, वह स्वर्ग में परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में पूरी तरह से सक्षम है। यद्यपि उसके रूप के लिहाज से कुछ सीमाएँ हैं और बाहरी तौर पर वह स्वर्ग में परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने के लिए अपर्याप्त लग सकता है, फिर भी अपने सार और अपने स्वभाव के लिहाज से, वह स्वर्ग में परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में पूरी तरह से सक्षम है। इसलिए, इसे देखते हुए, लोगों को देहधारी परमेश्वर से जुड़े सत्य के विभिन्न पहलुओं को गंभीरता से लेना चाहिए और उनके बारे में सावधानी से जानना चाहिए। जब तुम उन्हें गंभीरता से लेते हो और पूरे दिल से उनके बारे में जानते हो, केवल तभी तुम वास्तव में परमेश्वर को समझ सकते हो। जब तुम पृथ्वी पर परमेश्वर को वास्तव में समझ लेते हो, केवल तभी तुम बहुत हद तक स्वर्ग में परमेश्वर को समझ सकते हो और सृष्टिकर्ता को समझ सकते हो। तुम यह बिल्कुल नहीं देख सकते कि सृष्टिकर्ता—परमेश्वर—स्वर्ग में और पूरे ब्रह्मांड और सभी चीजों के बीच कैसे बोलता है, वह लोगों के साथ किस तरीके से पेश आता है, वह लोगों के साथ किस रवैये से पेश आता है, वह चीजें कैसे करता है, उसके विचार क्या हैं, और ऐसे अन्य मुद्दे जिनमें परमेश्वर का स्वभाव और सार शामिल है। लेकिन जब परमेश्वर देहधारी होता है और एक साधारण व्यक्ति बनने के लिए, रूप और छवि वाला और हाड़-माँस वाला व्यक्ति बनने के लिए पृथ्वी पर आता है, तो उसके कार्य करने और लोगों के साथ मेलजोल करने और जुड़ने की अवधि के दौरान लोग उसके स्वभाव और सार को समझ सकते हैं। उसके विभिन्न वचनों और कर्मों, और उसके द्वारा व्यक्त की जाने वाली भावनाओं की पूरी शृंखला के माध्यम से तुम समझ सकते हो कि परमेश्वर वास्तव में कैसा है, उसकी विभिन्न भावनाओं के रूप कैसे हैं और उसके कार्य करने के तरीके और सिद्धांत क्या हैं, साथ ही वह किन रवैयों के साथ काम करता है। तुम उसे अधिक विशिष्ट रूप से समझोगे और उसे अधिक ठोस तरीके से छूने, देखने और सुनने में सक्षम होगे। इस वजह से यह सब तुम्हारे लिए स्वर्ग में परमेश्वर को समझने में अधिक लाभदायक है। देहधारी परमेश्वर को तुम देख और छू सकते हो; वह जो वचन बोलता है उन्हें तुम अपने कानों से सुन सकते हो और वह जिन सिद्धांतों और विधियों से चीजों को सँभालता है उन्हें तुम अपनी आँखों से देख सकते हो। यह तुम्हारे द्वारा देहधारी परमेश्वर के बोलने और कार्य करने का व्यक्तिगत अनुभव करने और देहधारी परमेश्वर का ज्ञान होने के बराबर है; इस तरह, तुम्हें स्वर्ग के परमेश्वर की भी एक निश्चित समझ और ज्ञान प्राप्त हो जाता है। यदि तुम देहधारी परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्यों को समझते हो, तो तुम परमेश्वर के स्वभाव को जान सकोगे—तब तुम जो जानते हो, वह ठीक स्वर्ग में परमेश्वर के सार का यही पहलू है। इसलिए, देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर कैसे कार्य करता और बोलता है, वह कौन-से स्वभाव प्रकट करता है और उसका सार कैसा है—काफी हद तक, इन्होंने पहले ही तुम्हें, इस सीमित स्थिति के तहत, परमेश्वर के वचनों और कर्मों, परमेश्वर के बोलने और कार्य करने के तरीकों, और यहाँ तक कि परमेश्वर के स्वभाव और सार को सटीक रूप से देखने, अपने कानों से सुनने या समझने और जानने दिया है। मैंने देहधारी परमेश्वर से संबंधित इन सत्यों के बारे में पहले भी कुछ बात की है, लेकिन यह कभी बहुत विशिष्ट नहीं था; इस बार मैंने उनके बारे में विशिष्ट रूप से बहुत बात की है। मुझे आशा है कि इसे सुनने के बाद तुम लोग सत्य के इस पहलू को अभ्यास से संबंधित किसी साधारण सत्य या विभिन्न प्रकार के लोगों को जानने से संबंधित किसी साधारण सत्य के रूप में नहीं लोगे, बल्कि इसे परमेश्वर को जानने से संबंधित सत्य के रूप में लोगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि, चाहे सिद्धांत में हो या वास्तविकता में, देहधारी परमेश्वर और स्वर्ग में परमेश्वर एक हैं; देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर परमेश्वर की अभिव्यक्ति और प्रकटन है और वह भी है जिसे पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य सौंपा गया है। तुम इसे चाहे जिस भी तरीके से कहो, सार और स्वभाव के लिहाज से यह देहधारी मनुष्य का पुत्र सबसे पहले स्वर्ग में परमेश्वर, सृष्टिकर्ता के साथ एक और उसके अनुरूप है। चूँकि वे एक हैं, इसलिए देहधारी परमेश्वर को जानना स्वर्ग में परमेश्वर को जानने का एक मार्ग है। निस्संदेह, देहधारी परमेश्वर को जानना तुम्हारे लिए स्वर्ग में परमेश्वर को जानने के सबसे अच्छे अवसरों में से एक है और ऐसा करने के लिए सबसे अनुकूल स्थिति प्रस्तुत करता है। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।) क्या तुम लोग कहोगे कि मैं बढ़ा-चढ़ाकर कह रहा हूँ? (नहीं।) क्या मैं जो कहता हूँ, वह तथ्यों के अनुरूप है? (हाँ, है।)

कुछ लोग कहते हैं, “स्वर्ग में परमेश्वर सभी चीजों का सृजन कर सकता है, सभी चीजों पर संप्रभुता रख सकता है और मानवजाति के भाग्य पर संप्रभुता रख सकता है। क्या देहधारी परमेश्वर ऐसा कर सकता है? चूँकि देहधारी परमेश्वर और स्वर्ग में परमेश्वर एक हैं, और चूँकि देहधारी परमेश्वर स्वर्ग में परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है, तो क्या वह सभी चीजों का सृजन कर सकता है? क्या वह सभी चीजों पर संप्रभुता रख सकता है?” जब कोई इस तरह का दृष्टिकोण साझा करता है, तो तुम लोग इसे कैसे समझाते हो? मुझे बताओ, क्या देहधारी परमेश्वर सभी चीजों का सृजन करने और सभी चीजों पर संप्रभुता रखने का कार्य कर सकता है? (हाँ।) तुम किस आधार पर “हाँ” कहते हो? मुझे अपना दृष्टिकोण बताओ। तुम क्या सोचते हो? (चूँकि देहधारी परमेश्वर स्वयं परमेश्वर भी है, इसलिए वह सभी चीजों का सृजन करने और सभी चीजों पर संप्रभुता रखने का कार्य कर सकता है। बात बस इतनी है कि देहधारी परमेश्वर के पास वह कार्य है जो उसे करना चाहिए; वह वे अन्य कार्य नहीं करता।) यह इसे कहने का एक तरीका है। सिद्धांत के लिहाज से क्या यह कथन सही है? क्या यह किसी भी तरह से विकृत या गलत है? (नहीं।) इस कथन का अर्थ है कि देहधारी परमेश्वर निश्चित रूप से सभी चीजों का सृजन करने और सभी चीजों पर संप्रभुता रखने का कार्य कर सकता है; यह बस इस बात पर निर्भर करता है कि वह इसे करता है या नहीं। यदि वह इसे नहीं करता, तो तुम इसे होते हुए नहीं देख सकते, लेकिन यदि उसे यह करना हो, तो वह बिल्कुल ऐसा कर सकता है। यह सिद्धांत सही है, लेकिन क्या इस सिद्धांत और देहधारी परमेश्वर के सार और सामान्यता और व्यावहारिकता को जानने के संबंध में हम जो संगति कर रहे हैं, उसके बीच कोई अंतर नहीं है? (हाँ, है।) तो इस पर थोड़ा और विचार करो। इस मुद्दे को हल करने के लिए इस पर कैसे संगति की जानी चाहिए? (परमेश्वर, मैं कुछ कहना चाहूँगा। परमेश्वर का सार सत्य है और परमेश्वर का आत्मा सत्य व्यक्त कर सकता है; देहधारी परमेश्वर भी मुख्य रूप से सत्य व्यक्त करता है। सत्य का अधिकार स्वयं हर चीज पर संप्रभुता रख सकता है और हर चीज को नियंत्रित कर सकता है। मुझे लगता है कि यह दिखा सकता है कि देहधारी परमेश्वर और स्वर्ग में परमेश्वर एक हैं और देहधारी परमेश्वर भी सभी चीजों पर संप्रभुता रख सकता है।) क्या यह कथन सही है? यह कथन सही है, लेकिन यह अभी तक मुद्दे की जड़ तक नहीं पहुँचा है और इसने व्यावहारिक मुद्दे को हल नहीं किया है। यह साबित करता है कि यह कथन केवल एक सिद्धांत है। देहधारी परमेश्वर के रूप के लिहाज से, वह जन्मजात स्थितियों और देह की प्रवृत्तियों द्वारा सीमित है—बाहर से ऐसा लगता है कि वह परमेश्वर के आत्मा की तरह कार्य नहीं कर सकता। वास्तव में, ऐसा नहीं है कि वह उन्हें नहीं कर सकता, बल्कि यह है कि, यह देखते हुए कि वह देहधारी हुआ है, वह वो कार्य करने आया है जो देहधारी परमेश्वर को करना चाहिए, और वह वो कार्य नहीं करता जो उसके उचित कार्य से असंबद्ध है। चूँकि देहधारी परमेश्वर का एक पक्ष ऐसा है जो सामान्य और व्यावहारिक है, इसलिए बाहरी तौर पर ऐसा लगता है कि देह में होने की जन्मजात स्थिति और विभिन्न वस्तुनिष्ठ कारकों द्वारा सीमित होने के कारण, उसकी तुलना स्वर्ग में परमेश्वर से नहीं की जा सकती। लेकिन देहधारी परमेश्वर के सार के लिहाज से, वह सभी चीजों का सृजन कर सकता है और सभी चीजों को नियंत्रित भी कर सकता है। चूँकि उसका सार परमेश्वर का सार है और उसका जीवन परमेश्वर का जीवन है, इसलिए वह ये चीजें कर सकता है। तुम लोगों ने अभी जो कहा, वह इस मुद्दे की जड़ तक नहीं पहुँचा, न ही उसने इस मुद्दे के केंद्र-बिंदु को छुआ। तो इस मुद्दे का केंद्र-बिंदु क्या है? देहधारी परमेश्वर सभी चीजों का सृजन कर सकता है और सभी चीजों पर संप्रभुता रख सकता है, यह एक तथ्य है; यह कोई सिद्धांत नहीं है, न ही यह केवल एक कथन है, कोई मानवीय धारणा तो यह बिल्कुल भी नहीं है। तो वे अभिव्यक्तियाँ कहाँ हैं जो दिखाती हैं कि देहधारी परमेश्वर सभी चीजों का सृजन करने और सभी चीजों पर संप्रभुता रखने का कार्य कर सकता है? चूँकि देहधारी परमेश्वर के पास परमेश्वर का सार और परमेश्वर का जीवन है, इसलिए वह परमेश्वर के वचन व्यक्त कर सकता है। जहाँ तक परमेश्वर के वचनों की बात है, वे अपने आप में अधिकार और सामर्थ्य रखते हैं; वे हर चीज पूरी कर सकते हैं, वे हर चीज का सृजन कर सकते हैं, और निस्संदेह, वे हर चीज पर संप्रभुता भी रख सकते हैं। क्या यह एक तथ्य नहीं है? (हाँ।) वह स्वयं जो वचन व्यक्त करता है उन्हें पूरा करता है और कोई भी शक्ति इसमें बाधा नहीं डाल सकती। देखो, देहधारी परमेश्वर, इस साधारण व्यक्ति, द्वारा बोले गए सभी वचन अधिकार और सामर्थ्य रखते हैं, चाहे वे किसी भी प्रकार के वचन हों या किसी के भी बारे में हों। यह एक बात है। इसके अतिरिक्त, चाहे कितने भी वर्ष लग जाएँ, उसके द्वारा बोले गए वचन बिना चूके, एक-एक करके पूरे और साकार होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे परमेश्वर अपने इन वचनों में कहता है, “परमेश्वर जो कहता है उसका वही अर्थ होता है, उसका जो अर्थ होता है, वह पूरा होगा, और जो वह करता है वह हमेशा के लिए बना रहेगा।” यह कथन परमेश्वर द्वारा सभी चीजों का सृजन करने और सभी चीजों पर संप्रभुता रखने के संबंध में सबसे वास्तविक और विशिष्ट स्पष्टीकरण है। उसके द्वारा बोले गए पहले वचन से लेकर आज तक, हर एक वचन धीरे-धीरे अलग-अलग स्तरों तक, दुनिया के अलग-अलग कोनों में और अलग-अलग अवधियों में साकार और पूरा हो रहा है। इस परिप्रेक्ष्य से, क्या देहधारी परमेश्वर हर चीज पर संप्रभुता रखने का कार्य कर सकता है? (हाँ।) क्या तुम इस संबंध में तथ्य देखते हो? (हाँ।) यह तथ्यों का एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि, देहधारी परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए ये वचन—यदि तुम परमेश्वर के कार्य के इस चरण को स्वीकार करते हो, परमेश्वर के सामने आते हो और इन वचनों को स्वीकार करने में सक्षम हो तो—तुम्हारा जीवन बन सकते हैं, जीवन के प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण बदल सकते हैं और तुम्हारे आचरण की दिशा बदल सकते हैं। इन वचनों को स्वीकार करने वाले लोगों का इनके द्वारा न्याय किया जाता है, उन्हें ताड़ना दी जाती है, उन्हें उजागर किया जाता है, उनकी निंदा की जाती है या उनके द्वारा उन्हें शाप तक दिया जाता है, लेकिन अंततः वे सभी इन वचनों द्वारा जीत लिए जाते हैं। इन वचनों द्वारा जीत लिए जाने के बाद सत्य का अनुसरण करने वाले लोग अंततः इन्हें प्राप्त कर लेते हैं; परमेश्वर के वचन और सत्य जल्दी ही उनका जीवन बन जाते हैं, और जब ऐसा होता है, तब ये लोग एक नई मानवजाति बन जाते हैं। एक नई मानवजाति का जन्म—मुझे बताओ, क्या यह परमेश्वर के वचनों द्वारा प्राप्त किया गया परिणाम है? (हाँ।) यद्यपि यह नई मानवजाति और आदम और हव्वा के समय की मानवजाति दोनों परमेश्वर द्वारा सृजित की गई थीं, लेकिन उनके सृजन का रूप और तरीका अलग-अलग हैं। इस नई मानवजाति के जन्म का अर्थ है कि परमेश्वर ने एक बार फिर मानवजाति का सृजन करने के लिए वचनों का उपयोग किया है। तो, चूँकि देहधारी परमेश्वर मानवजाति का सृजन करने के लिए वचनों का उपयोग करता है, तो क्या तुम्हें लगता है कि यह भी कहा जा सकता है कि देहधारी परमेश्वर सभी चीजों का सृजन कर सकता है? (हाँ।) जो लोग अब कार्य के इस चरण को स्वीकार करते हैं, परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करते हैं और परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करते हैं और शुद्ध किए जाते हैं, वे आदम और हव्वा के समय के मानवों या भ्रष्ट मानवों से बिल्कुल अलग प्रकार के लोग हैं—वे अलग-अलग जीवन वाले दो प्रकार के लोग हैं। जो लोग परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में स्वीकार करते हैं, वे एक नई मानवजाति के सदस्य हैं; उन्होंने भ्रष्ट मानवजाति की पुरानी प्रकृति उतार फेंकी है, उनके पास परमेश्वर के वचन उनके जीवन के रूप में हैं और वे एक नई मानवजाति बन गए हैं, जो जल्दी ही एक नए युग, एक नए काल में प्रवेश करने वाली है। इसे ध्यान में रखते हुए, क्या यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के देहधारी शरीर ने एक बार फिर एक नई मानवजाति का सृजन किया है? उसने एक ऐसी नई मानवजाति का सृजन करने के लिए वचनों का उपयोग किया है, जिसके पास परमेश्वर के वचन उसके जीवन के रूप में हैं। यह एक पहलू है। यह देहधारी परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य है। उसके कार्य के प्रभावों और अंतिम परिणाम को देखते हुए, वह सभी चीजों का सृजन करने और सभी चीजों पर संप्रभुता रखने का कार्य कर सकता है। वह यह कार्य इसलिए कर सकता है क्योंकि परमेश्वर का आत्मा इस देह के भीतर निवास करता है, और इसमें एक दिव्य सार, परमेश्वर की सामर्थ्य और परमेश्वर का अधिकार है, और निस्संदेह, इसमें वह सत्य और भी अधिक है जो परमेश्वर के पास है। स्वर्ग में परमेश्वर—सृष्टिकर्ता—ने सभी चीजों का सृजन करने के लिए वचनों का उपयोग किया; वह बोला, और यह अस्तित्व में आ गया; उसने आज्ञा दी, और यह स्थापित हो गया। और देहधारी परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य का यह अंतिम चरण बिल्कुल स्वर्ग में परमेश्वर द्वारा हर चीज पूरी करने के लिए वचनों का उपयोग करने और सभी चीजों का सृजन करने के लिए वचनों का उपयोग करने के कार्य के समान है; वे समान प्रकृति के हैं। यद्यपि कार्य के इस चरण को करने के लिए परमेश्वर ने जो देह धारण किया है, वह एक साधारण, सामान्य व्यक्ति जैसा दिखता है, जिसने जबरदस्त उपलब्धियाँ हासिल नहीं की हैं या कोई जबरदस्त कर्म नहीं किए हैं, फिर भी इन कई वर्षों में उसने जो वचन बोले हैं और जो सत्य व्यक्त किए हैं, उन्होंने पहले ही उसके लिए लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया है और पहले ही धीरे-धीरे परमेश्वर के वचनों और सत्य को लोगों के भीतर समाहित कर दिया है। जल्दी ही, एक ऐसी नई मानवजाति का जन्म होगा जिसके पास परमेश्वर के वचन उसके जीवन के रूप में होंगे; यह देहधारी परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य है। यह क्या कार्य है? यह परमेश्वर के कार्य का अंतिम चरण पूरा करने के लिए वचनों का उपयोग करना, वचनों को लोगों के भीतर समाहित करना, और एक बार फिर एक नई मानवजाति का सृजन करने के लिए वचनों का उपयोग करना है। यह एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि जब से परमेश्वर कार्य करने के लिए दूसरी बार देहधारी हुआ, तब से परमेश्वर के कार्य का दूसरा चरण—अनुग्रह के युग का कार्य—समाप्त घोषित कर दिया गया और उसका समापन कर दिया गया। जब अनुग्रह का युग समाप्त हो गया, तब अनुग्रह के युग का पवित्र आत्मा का कार्य और अनुग्रह के युग में परमेश्वर द्वारा किया गया समस्त कार्य समाप्त घोषित कर दिया गया। संपूर्ण धार्मिक दुनिया, अपने धार्मिक रूप और परमेश्वर द्वारा की गई उसकी परिभाषा के लिहाज से, अतीत की चीज हो गई। जब परमेश्वर ने अंत के दिनों में न्याय का कार्य करना शुरू किया, तब अनुग्रह के युग की कलीसियाओं और समूहों से पवित्र आत्मा का कार्य वापस ले लिया गया। कहने का तात्पर्य यह है कि, जिस क्षण से देहधारी परमेश्वर प्रकट हुआ और उसने कार्य किया, और वचन कहे और बातें कीं, तब से संपूर्ण धार्मिक दुनिया को परमेश्वर द्वारा धार्मिक स्थलों और धार्मिक समूहों के रूप में ठहराया गया; वे अब ऐसे स्थान नहीं रहे जहाँ परमेश्वर कार्य करता था, न ही वे परमेश्वर की देखभाल के पात्र रहे। परमेश्वर उन्हें पहले ही छोड़ चुका था, कहने का तात्पर्य यह है कि पवित्र आत्मा अब उन पर कार्य नहीं कर रहा था। चाहे वह ईसाइयत हो, कैथोलिक धर्म हो, यहूदी धर्म हो या इसी तरह का कोई अन्य धर्म हो, उन सभी को धर्मों के रूप में ठहराया गया। पवित्र आत्मा उनके बीच कार्य नहीं करता। परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से एक नए युग, एक नए काल में प्रवेश कर चुका है। यानी, जब से परमेश्वर दूसरी बार देहधारी हुआ और उसने औपचारिक रूप से कार्य करना और अपने वचन व्यक्त करना शुरू किया, तब से अनुग्रह का युग पूरी तरह से समाप्त हो गया। धार्मिक दुनिया के सभी कार्यों और गतिविधियों को भी समाप्त घोषित कर दिया गया, क्योंकि देहधारी परमेश्वर ने वचन और कार्य के इस चरण के सत्य के विभिन्न पहलुओं को व्यक्त करना शुरू कर दिया था। उनके समाप्त होने की इस घोषणा का अर्थ है कि पूरी मानवजाति के लिए विश्वास, धार्मिक रूप और धार्मिक नामों के निरूपण के संबंध में एक नया सूत्रीकरण है। वह युग बीत चुका है, कहने का तात्पर्य यह है कि, अनुग्रह का युग पूरी तरह से समाप्त हो गया है। अब जबकि हमारे पास यह नया सूत्रीकरण है, तो यह निर्धारित किया जा सकता है कि ईसाइयत या कैथोलिक धर्म को अब मानवजाति के बीच एक ऐसे प्रमुख धर्म के रूप में सम्मान नहीं दिया जाता जो मानवजाति के विश्वास में रुझानों का मार्गदर्शन करता है, बल्कि वह पहले ही अतीत की चीज बन चुका है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि देहधारी परमेश्वर ने पहले ही मानवजाति की अगुआई करनी शुरू कर दी है, जो अगले नए युग में प्रवेश करने वाली है और एक नए युग में कदम रखने वाली है। जब से देहधारी परमेश्वर ने अगले युग में कदम रखना शुरू किया, तब से ईसाइयत पूरी मानवजाति के बीच अतीत की चीज बन गई; वह एक पुराना धर्म बन गई। निस्संदेह, जब से देहधारी परमेश्वर ने कार्य करना और वचन व्यक्त करना शुरू किया, तब से पूरी मानवजाति, अनजाने में ही, एक नए युग, एक नए काल में लाई गई। पूरी मानवजाति में, चाहे धर्म से जुड़े विषय या प्रचलित शब्द हों, या विभिन्न क्षेत्रों में कुछ रुझान संकेतक हों, ये सब भी एक नई दिशा में विकसित हो रहे हैं और एक नए काल में लाए जा रहे हैं। निस्संदेह, देहधारी परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचन और किया गया कार्य, साथ ही कलीसिया में लोकप्रिय विभिन्न आध्यात्मिक शब्द और कथन, या विश्वास से जुड़े कुछ विचार और दृष्टिकोण, आने वाले समय में, कुछ समय के लिए इस मानवजाति को प्रभावित करेंगे, ठीक वैसे ही जैसे ईसाइयत ने दो हजार वर्षों तक विभिन्न क्षेत्रों में पूरी मानवजाति को प्रभावित किया है। जैसे-जैसे परमेश्वर का कार्य फैलता है, और सुसमाचार फैलता है, देहधारी परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन, या कलीसिया में परमेश्वर के कार्य के इस चरण के दायरे में आने वाले कुछ कथन और कुछ विचार और दृष्टिकोण, धीरे-धीरे अगले युग में मानवजाति का मार्गदर्शन और अगुआई करेंगे, और उसके जीने के तरीके को दिशा देंगे; यही रुझान है। निस्संदेह, जब देहधारी परमेश्वर ने कार्य का यह चरण शुरू किया, तब पवित्र आत्मा के कार्य के स्थान में बदलाव के कारण, धार्मिक दुनिया ने पवित्र आत्मा का कार्य खो दिया और वह उजाड़ अवस्था में आ गई। व्यावहारिक रूप से यह कहा जा सकता है कि कार्य के इस चरण द्वारा धार्मिक दुनिया को हटा दिया गया और विघटित कर दिया गया। कहने का तात्पर्य यह है कि, देहधारी परमेश्वर का आगमन और परमेश्वर के कार्य के इस चरण की शुरुआत न केवल पूरी दुनिया, मानवजाति, और उसके विश्वास के लिए एक चुनौती है, बल्कि एक निंदा भी है, और—निस्संदेह—एक प्रकार का बदलाव भी है, है ना? (हाँ।) जब से देहधारी परमेश्वर ने वचन व्यक्त करना और कार्य का यह चरण करना शुरू किया है, तब से पूरी मानवजाति के विश्वास की दिशा पूरी तरह से बदल गई है, और धार्मिक दुनिया भी पूरी तरह से बदल गई है; ये सभी तथ्य हैं। देहधारी परमेश्वर द्वारा बोले गए ये वचन और सत्य से जुड़े ये विभिन्न विषय भविष्य में विभिन्न क्षेत्रों और धार्मिक समूहों में फैलते हुए धीरे-धीरे दुनिया के सभी देशों और स्थानों में फैल जाएँगे। इन वचनों में जिन विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों का जिक्र किया गया है, वे जल्दी ही धार्मिक दुनिया और इस मानवजाति को प्रभावित करेंगे, और निस्संदेह, वे जल्दी ही इस मानवजाति और धार्मिक दुनिया को बदल देंगे, जिससे मानवजाति और धार्मिक दुनिया की वर्तमान स्थिति बदल जाएगी। यह ये कहने के बराबर है कि परमेश्वर के कार्य का यह चरण एक बार फिर पूरी मानवजाति और धार्मिक दुनिया को प्रभावित करने के लिए उसके वचनों का और विभिन्न चीजों पर उसके द्वारा व्यक्त किए गए दृष्टिकोणों का उपयोग कर रहा है। जहाँ तक स्वयं इन वचनों की बात है, तो इनमें मानवजाति, इस दुनिया और धार्मिक दुनिया को बदलने, मनुष्यों की उनकी किस्म के अनुसार छँटाई कर उन्हें वर्गीकृत करने और उनके परिणामों और मंजिलों की घोषणा करने का पर्याप्त अधिकार और सामर्थ्य है। निस्संदेह, जबकि परमेश्वर इन सभी वचनों को व्यक्त करता है, परमेश्वर का आत्मा भी निरंतर विभिन्न परिस्थितियों को बदल रहा है और सभी चीजों पर संप्रभुता रख रहा है। देहधारी परमेश्वर द्वारा बोले गए ये वचन जहाँ कहीं भी फैलते हैं, वहाँ जो लोग उन्हें सुनते और पढ़ते हैं, वे चाहे उन्हें स्वीकार करें या उनका प्रतिरोध करें, ये वचन उन्हें झकझोरते हैं, और वे सब जो उनके संपर्क में आते हैं, धीरे-धीरे प्रकट और वर्गीकृत कर दिए जाते हैं। यानी, इन वचनों की उपस्थिति में हर प्रकार के लोग—वे जो सत्य से प्रेम करते हैं और वे जो सत्य से विमुख हैं; भ्रष्ट मनुष्य, दानव, जानवर और चलती-फिरती लाशें; वे जिनके पास हर तरह के अनुसरण हैं और वे जिनके पास हर तरह के विचार और दृष्टिकोण हैं; तमाम तरह के अनुसरणों वाले लोग और तमाम तरह के विचारों और दृष्टिकोणों वाले लोग, साथ ही वे लोग जो विभिन्न धारणाओं, महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं के साथ परमेश्वर में विश्वास करते हैं—उन सभी का असली रूप प्रकट हो जाता है। इस तरह, सभी लोगों की अपनी किस्म के अनुसार छँटाई हो जाती है : सत्य से प्रेम करने वाली परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर के घर लौट आती हैं; इस बीच, जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते या उसे स्वीकार नहीं करते, वे परमेश्वर की भेड़ें नहीं हैं—उनके लिए दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं और उनकी निंदा कर उन्हें हटा दिया जाता है। इस प्रकार के लोग, जिनकी निंदा कर उन्हें हटा दिया जाता है, जल्दी ही परमेश्वर के वचनों में बताए गए महान दिन के न्याय की प्रतीक्षा करेंगे—यानी परमेश्वर के वचनों में बताई गई बुरे लोगों की सजा का। परमेश्वर द्वारा कार्य का यह चरण करने और इन वचनों को बोलने का मानवजाति पर अब और भविष्य दोनों में जो प्रभाव पड़ता है, वह पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों द्वारा प्राप्त किया गया परिणाम है और यह सब परमेश्वर के वचनों की सामर्थ्य द्वारा प्राप्त किया जाता है। ये वचन परमेश्वर द्वारा अपने देहधारण की अवधि के दौरान किए गए सभी कार्य और बोले गए वचन हैं। तो मुझे बताओ, इस प्रभाव को देखते हुए या उन विभिन्न परिणामों को देखते हुए जो पहले ही हासिल किए जा चुके हैं और जिन्हें लोग देख सकते हैं, क्या देहधारी परमेश्वर—अपने सार और अपनी पहचान के लिहाज से—सभी चीजों का सृजन करने और सभी चीजों पर संप्रभुता रखने का कार्य कर सकता है? (हाँ, वह कर सकता है।) यह कहना कि “वह कर सकता है”, कोई सिद्धांत या केवल एक कथन नहीं है, है ना? (हाँ।) यद्यपि देहधारी परमेश्वर, रूप के लिहाज से, उतना रहस्यमय और अथाह या सामर्थ्यवान नहीं है जितना स्वर्ग में परमेश्वर या परमेश्वर का आत्मा है, फिर भी अपने सार और अपने जीवन के लिहाज से, और उसके द्वारा व्यक्त किए जाने वाले वचनों के लिहाज से, वह एक नई मानवजाति का सृजन करने, इस दुनिया को बदलने और मानवजाति को बदलने, और मानवजाति पर संप्रभुता रखने में पूरी तरह से सक्षम है। ऐसा इसलिए है क्योंकि देहधारी परमेश्वर द्वारा यह सब पूरा करने के लिए वचनों का उपयोग करना स्वर्ग में परमेश्वर द्वारा हर चीज पूरी करने के लिए वचनों का उपयोग करने के पूरी तरह से अनुरूप और पूरी तरह से सुसंगत है। परमेश्वर के देहधारण के बाहरी रूप और उसकी बाहरी दिखावट के लिहाज से, ऐसा लगता है कि वह वो कार्य नहीं कर सकता जो स्वर्ग में परमेश्वर करता है और उसके पास स्वर्ग में परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य नहीं है। लेकिन अपने सार और जीवन के लिहाज से वह हर चीज पूरी करने, हर चीज का सृजन करने, और हर चीज बदलने के लिए वचनों का उपयोग करने का कार्य कर सकता है, है ना? (हाँ।) इस पर एक नजर डालो कि आज चीजें कैसी हैं : चाहे धार्मिक दुनिया हो या स्वयं यह दुनिया, उनके रूप कैसे हैं और वे किस अवस्था में हैं, ये सब परमेश्वर के वचनों से संबंधित हैं। एक लिहाज से, यह सब परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों को पूरा करता है; दूसरे लिहाज से, परमेश्वर द्वारा अपने नए वचनों की अभिव्यक्ति और सत्य की अभिव्यक्ति के कारण धार्मिक दुनिया और इस दुनिया को हटा दिया जाता है। तुम उन्हें चाहे जैसे भी देखो, वे वर्तमान में चाहे जिस भी अवस्था में हों, ये सभी अवस्थाएँ परमेश्वर के वचनों द्वारा बदली गई हैं, परमेश्वर के वचनों के परिणामस्वरूप घटित हुई हैं, और परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए जाने वाले वचनों से और परमेश्वर जो कहता है उसके सभी पहलुओं से संबंधित हैं। जैसे-जैसे सुसमाचार फैलता है और परमेश्वर के वचन अधिक व्यापक रूप से प्रसारित होते हैं, अधिक लोग—दुनिया के सभी देशों के लोग, सभी नस्लों और सभी क्षेत्रों के लोग—आएँगे और परमेश्वर के कार्य के इस नए चरण को स्वीकार करेंगे। इस तरह, अधिक लोग परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करेंगे, अधिक लोग परमेश्वर के वचनों द्वारा बदल दिए जाएँगे और अधिक लोग परमेश्वर के वचनों को प्राप्त करेंगे और एक नई मानवजाति बन जाएँगे। निस्संदेह, जैसे-जैसे सुसमाचार फैलता है और परमेश्वर के वचन अधिक व्यापक रूप से प्रसारित होते हैं, निकट भविष्य में—यह निकट भविष्य निश्चित रूप से अनुग्रह के युग के दो हजार वर्षों से बहुत छोटा होगा—मानवजाति का विश्वास और सभी प्रकार के मामलों पर उनके विचार और दृष्टिकोण परमेश्वर के वचनों द्वारा बदल दिए जाएँगे। जो लोग परमेश्वर के वचनों में विश्वास नहीं करते या उन्हें नहीं मानते, और जो लोग परमेश्वर को नहीं मानते, वे भी अलग-अलग स्तरों तक इन वचनों से प्रभावित होंगे। इन परिणामों को देखते हुए, बात अंततः सत्य के इस तथ्य पर आ टिकती है कि देहधारी परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन हर चीज पूरी कर सकते हैं और हर चीज बदल सकते हैं, है ना? (हाँ।)

हमने जिस विषय-वस्तु पर संगति की है, उसके इन पहलुओं को देखते हुए, क्या देहधारी परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य और बोले गए वचनों और स्वर्ग में परमेश्वर के कार्य और वचनों के बीच कोई अंतर है? (नहीं।) इस तथ्य में कि देहधारी परमेश्वर सभी चीजों का सृजन करने और सभी चीजों पर संप्रभुता रखने का कार्य कर सकता है, और इस तथ्य में कि स्वर्ग में परमेश्वर ने सभी चीजों का सृजन किया है और वह सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है, कोई विरोधाभास नहीं है; इन दोनों तथ्यों के बीच कोई दूरी या अंतर नहीं है। इस बात में कोई शक नहीं होना चाहिए। यह निश्चितता कोई सिद्धांत नहीं है, न ही यह कोई धारणा या कल्पना है, और यह सिर्फ कोई अच्छी लगने वाली कहावत तो बिल्कुल भी नहीं है; बल्कि, यह ऐसी बात है जिसे हम तथ्यों के आधार पर कहते हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि देहधारी परमेश्वर चाहे जो भी कहे या वह चाहे जिस प्रकार का कार्य करना चाहे, एक लिहाज से, उसके वचनों में ही अधिकार और सामर्थ्य है, और वे हर चीज पूरी करने का परिणाम हासिल कर सकते हैं। दूसरे लिहाज से, जैसे ही उसके वचन जारी होते हैं, परमेश्वर का आत्मा भी इन सबको पूरा करने के लिए उनके साथ-साथ कार्य कर रहा होता है। यह ऐसी चीज है, जिसे कोई भी व्यक्ति अपने वचनों या कार्यों से प्राप्त नहीं कर सकता। कोई भी साधारण व्यक्ति, जैसे कि कोई भविष्यवक्ता, कोई प्रसिद्ध हस्ती, या कोई विशेषज्ञ चाहे जो भी करे—चाहे वह किसी चीज का अनुमान लगाने या भविष्यवाणी करने की कोशिश करे, किसी घटना के बारे में बात करे, या कोई रिपोर्ट जारी करे—वह स्पष्ट रूप से यह नहीं समझा सकता कि चीजें विशेष रूप से कैसे विकसित होंगी या क्या होगा, और वे सौ प्रतिशत निश्चितता के साथ यह कहने की हिम्मत नहीं करते, “ये वचन अनिवार्य रूप से पूरे होंगे और अनिवार्य रूप से तथ्य बन जाएँगे।” यह ऐसी चीज है, जो लोगों के बस के बाहर है। लेकिन परमेश्वर के मामले में, चूँकि देहधारी परमेश्वर द्वारा बोला गया हर एक वचन परमेश्वर के स्वभाव और सार की अभिव्यक्ति होता है और परमेश्वर से आता है, इसलिए वह चाहे जिस भी बारे में बात कर रहा हो, वह अनिवार्य रूप से पूरा और साकार होगा। एक लिहाज से, यह परमेश्वर के वचनों की शक्ति और अधिकार है। दूसरे लिहाज से, तुम्हें यह समझना चाहिए कि यह परमेश्वर का आत्मा कार्य कर रहा है। क्या यह भी कहा जा सकता है कि जब देहधारी परमेश्वर कार्य कर रहा होता है, तो परमेश्वर का आत्मा भी कार्य कर रहा होता है, और देह और आत्मा अविभाज्य हैं और एक हैं? (हाँ।) तो मुझे बताओ, जब देहधारी परमेश्वर बोल रहा होता है, तो क्या यह देह बोल रहा होता है या परमेश्वर का आत्मा बोल रहा होता है? क्या तुम इसे स्पष्ट रूप से समझा सकते हो? यह परमेश्वर वचन व्यक्त कर रहा है, है ना? चूँकि यह परमेश्वर वचन व्यक्त कर रहा है, इसलिए उसके सभी वचन पूरे हो सकते हैं और सभी साकार हो रहे हैं। हमने इस बारे में बहुत संगति की है—क्या हमने अभी जिस मुद्दे का उल्लेख किया था, वह हल हो गया है? (हाँ।) परमेश्वर के वचन हर चीज पूरी करते हैं और परमेश्वर सभी चीजों का सृजन करने के लिए वचनों का उपयोग करता है—मुझे बताओ, क्या यह सत्य नहीं है? क्या यह एक तथ्य नहीं है? (हाँ।) यह सत्य है, और यह एक तथ्य भी है। इसलिए, देहधारी परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य से हासिल परिणाम ऐसे नहीं हैं जिन्हें कोई साधारण व्यक्ति हासिल कर सके और उसके कार्य और वचनों की प्रकृति और सार किसी साधारण व्यक्ति के वचनों की प्रकृति और सार नहीं हैं। यदि कोई पूछे, “क्या लोग सभी चीजों का सृजन कर सकते हैं, सभी चीजों पर संप्रभुता रख सकते हैं, और हर चीज पूरी कर सकते हैं?” तो हम निश्चित रूप से उत्तर दे सकते हैं, “नहीं!” यदि कोई पूछे, “तो क्या देहधारी परमेश्वर सभी चीजों का सृजन कर सकता है, सभी चीजों पर संप्रभुता रख सकता है और हर चीज पूरी कर सकता है?” तो हमें बिल्कुल भी संकोच नहीं करना चाहिए, और निश्चित रूप से उत्तर देना चाहिए, “हाँ!” ये वचन सिद्धांत नहीं हैं, बल्कि सत्य और तथ्य हैं।

पहले, जब वचन देह में प्रकट होता है का केवल पहला खंड ही व्यक्त किया गया था और बहुत सारे लोग सुसमाचार का प्रचार करने के लिए बाहर गए थे, तब अनेक धार्मिक लोगों ने परमेश्वर के वचन पढ़े और परमेश्वर के कार्य के इस चरण को स्वीकार कर लिया; धार्मिक दुनिया पूरी तरह से खंड-खंड हो गई। अब, दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवाँ, छठा और सातवाँ खंड भी व्यक्त किए जा चुके हैं और उसके बाद वे हर नस्ल और देश के हर कोने और धार्मिक स्थल तक फैल गए हैं। जब ये वचन पूरी मानवजाति के सामने सार्वजनिक किए जाते हैं, तब मुझे बताओ, इसका क्या प्रभाव होगा? यह कैसा दृश्य होगा? मानवजाति भिन्न होगी, है ना? (हाँ।) उस एक वर्ष के दौरान, जिसमें पूरे चीन में सुसमाचार व्यापक रूप से फैला, कुछ लोगों ने हर जगह, सड़कों, कारखानों और गाँवों जैसी जगहों पर सुसमाचार का प्रचार करने का जोखिम उठाया। उस समय, सच में अनेक लोग थे जिन्होंने सुसमाचार स्वीकार किया। जब वचन देह में प्रकट होता है का केवल पहला खंड ही व्यक्त किया गया था, तब भी पहले ही कई लोग थे जिन्होंने विश्वास किया और स्वीकार किया कि यही सच्चा मार्ग है। कुछ लोगों ने यह तो स्वीकार किया कि यह सच्चा मार्ग है, लेकिन बड़े लाल अजगर द्वारा किए जाने वाले उन्मत्त दमन, गिरफ्तारियों और उत्पीड़न के कारण वे इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं कर सके, फिर भी परमेश्वर के वचन पूरे चीन में फैल गए। हर प्रांत, शहर और काउंटी में सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया स्थापित हो गई। इससे बड़ा लाल अजगर डर से काँप उठा; उसने दमन और गिरफ्तारियाँ करने की पूरी कोशिश की, यहाँ तक कि धमकी भी दी कि “जब तक सफाया पूरा नहीं हो जाता, सेनाएँ वापस नहीं हटेंगी।” लेकिन किसी ने यह उम्मीद नहीं की थी कि दस साल बाद परमेश्वर के वचन दुनिया के सभी देशों और जगहों में फैल जाएँगे। विशेष रूप से, हमने एशिया में फिलीपींस में, उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका में और यूरोप और अफ्रीका में सुसमाचार कार्य का निरंतर व्यापक प्रसार देखा है। चीन में सुसमाचार का प्रचार करते समय “सामूहिक सुसमाचार-प्रचार” नामक एक शब्द था, जिसका अर्थ एक ही समय में कई या दर्जनों लोगों को सुसमाचार सूनाना था, जिसके बहुत अच्छे परिणाम मिले। बाद में, बड़े लाल अजगर द्वारा किए गए उन्मत्त दमन और गिरफ्तारियों के कारण इस तरीके को रोक दिया गया, लेकिन यह कुछ अन्य देशों में फिर से लोकप्रिय हो गया है। कुछ एशियाई देशों में लोग इसे “सामूहिक सुसमाचार-प्रचार” नहीं कहते, बल्कि “पूरे गाँवों, स्कूलों और कारखानों में सुसमाचार फैलाना” कहते हैं, और वे सरकारी एजेंसियों, पुलिस स्टेशनों और सैन्य इकाइयों तक में सुसमाचार फैलाते हैं। एक ऐसा ही दृश्य सामने आया : कई लोगों ने सुसमाचार स्वीकार कर लिया है। पूरी मानवजाति, चाहे वह किसी भी उद्योग में हो, किसी भी समूह का हिस्सा हो, या किसी भी जातीय समूह से हो, अंधकार, बेबसी और भटकाव में जीती है। वह नहीं जानती कि कैसे जीना है, और नहीं जानती कि कैसे आचरण करना है; मानवजाति को परमेश्वर के उद्धार की आवश्यकता है। यह उद्धार कोई औपचारिकता नहीं है, न ही यह कोई रस्म है। बल्कि, लोगों को बचाने के लिए परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के वचनों की अगुआई, परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन और प्रबोधन की और परमेश्वर द्वारा लोगों को दिशा और मार्ग बताने के लिए स्पष्ट भाषा का उपयोग करने और लोगों को यह भी सिखाने की आवश्यकता होती है कि आचरण कैसे करना है, किस तरह का व्यक्ति बनना है, किस तरह के मार्ग पर चलना है, और अपने सामने आने वाले हर मामले में किन सिद्धांतों का पालन करना है। इस मानवजाति को इन सत्यों की बहुत आवश्यकता है। इसलिए, जब सुसमाचार का प्रचार करने वाले लोगों ने इसे पूरे गाँवों, कस्बों, स्कूलों, कारखानों, सैन्य इकाइयों और पुलिस स्टेशनों में फैलाया, तब उन्होंने परमेश्वर के कुछ प्रासंगिक वचन उच्च स्वर में पढ़कर सुनाए और परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों की गवाही भी दी। अधिकांश सुसमाचार प्राप्तकर्ता सुनने और स्वीकार करने के इच्छुक थे और वे कलीसियाई जीवन में भी भाग लेना चाहते थे—बस उस समय उनकी परिस्थितियाँ इसकी अनुमति नहीं देती थीं; उन पर कुछ प्रतिबंध लगे थे। लेकिन सुसमाचार के प्रसार के दौरान हुई इन घटनाओं को देखते हुए, यह मानवजाति विशेष रूप से उदास, दयनीय जीवन जीती है और इसे परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन की आवश्यकता है। केवल परमेश्वर के वचन ही उसे दिशा और लक्ष्य प्रदान कर सकते हैं, बेहतर ढंग से जीने में सक्षम बना सकते हैं और जीवित रहने में सक्षम बना सकते हैं, ताकि वह अब शैतान या बुरी प्रवृत्तियों की पीड़ा न सहे। यदि सारी मानवजाति परमेश्वर के इन वचनों को स्वीकार कर ले और परमेश्वर से उसका पोषण और परमेश्वर के वचनों का मार्गदर्शन स्वीकार कर ले, तो मुझे बताओ, क्या वह बहुत खुशी से नहीं जिएगी? (हाँ।) एक बात निश्चित है : यदि यह मानवजाति परमेश्वर के वचनों का पोषण और मार्गदर्शन स्वीकार कर ले, तो वह परमेश्वर के आशीषों के बीच जिएगी और अब शैतान की पीड़ा नहीं सहेगी और उसका परिणाम इस वर्तमान भ्रष्ट मानवजाति के परिणाम से अलग होगा। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।) क्या तुम लोगों ने सुसमाचार का प्रचार करने के संबंध में इन स्थितियों के बारे में कुछ बातें सुनी हैं? (हाँ।) जिन लोगों ने कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है, वे लंबे समय तक परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ने के बाद अपने दिलों में केवल यही महसूस करते हैं, “ये परमेश्वर के वचन हैं, ये वचन अच्छे हैं और ये सत्य हैं,” और वे बहुत उत्साहित महसूस नहीं करते। लेकिन जिन लोगों ने अभी-अभी ये वचन सुने हैं, वे अपने दिलों की गहराई में पोषण महसूस करते हैं, जैसे मछली को वापस जलधारा मिल गई हो। एक कहावत है, “लंबे सूखे के बाद बारिश की तरह ताजगी भरा”—वे बिल्कुल ऐसा ही महसूस करते हैं। इसलिए, कई लोग परमेश्वर के वचन सुनने के बाद उन्हें स्वीकार करने के इच्छुक रहे हैं। स्कूलों में छात्र, पुलिस स्टेशनों में पुलिस अधिकारी और पुलिस प्रमुख, और सरकारी अधिकारी सभी उन्हें स्वीकार करने के इच्छुक रहे हैं। यहाँ तक कि धार्मिक दुनिया में ऐसे पादरी भी हैं जिन्होंने आगे बढ़कर उन्हें स्वीकार किया है और कुछ साथी पादरियों और विश्वासियों को कलीसिया में ले आए हैं। चाहे तुम इसे जैसे भी देखो, देहधारी परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन और व्यक्त किए गए सत्य न केवल मानवजाति की जरूरतों की आपूर्ति कर सकते हैं, बल्कि उनका भाग्य भी बदल सकते हैं। इसलिए, देहधारी परमेश्वर को जानने से संबंधित सत्य बहुत महत्वपूर्ण हैं और उसे जानना परमेश्वर को जानने का एक हिस्सा है; इसमें कोई संदेह नहीं है। क्या तुम लोग इन चीजों को जान गए हो? (परमेश्वर द्वारा इस तरह संगति करने से हम कुछ हद तक इन्हें जान गए हैं। अतीत में, देहधारी परमेश्वर के बारे में हमारा ज्ञान केवल धर्म-सिद्धांत था; हम जानते थे कि परमेश्वर हर चीज पर संप्रभुता रखता है, लेकिन हमने तथ्य नहीं देखे थे। परमेश्वर की संगति के बाद यह हमारे लिए अधिक स्पष्ट हो गया है।) अब जबकि यह तुम्हारे लिए अधिक स्पष्ट हो गया है, तो क्या तुम्हारी आस्था बढ़ी है? (हाँ।) यदि किसी दिन तुम्हारी स्थानीय कलीसिया में अधिकांश लोगों के मन में परमेश्वर के बारे में संदेह पैदा हो जाएँ, वे अब और विश्वास करने की हिम्मत न करें, और सरकार के उत्पीड़न और दुनिया की अस्वीकृति के कारण अपनी आस्था खो दें, और केवल तुम अकेले बचो, और इसके अलावा, कई लोग यह कहते हुए तुम्हारी आलोचना और निंदा करें, “तुम लोग जिसमें विश्वास करते हो, वह एक व्यक्ति है; तुम्हें गुमराह किया गया है,” तो तुम क्या करोगे? (मैं उन्हें नजरअंदाज करूँगा और विश्वास करता रहूँगा।) क्या तुम प्रभावित होगे? क्या तुम अकेला महसूस करोगे? क्या तुम्हारे मन में भी संदेह पैदा होंगे, और तुम मन ही मन सोचोगे, “इस दुनिया में इतने सारे लोग विश्वास नहीं करते; क्या मेरा विश्वास वास्तव में सही है? इस तरह विश्वास करते रहने से मैं क्या प्राप्त कर सकता हूँ? क्या मेरा परिणाम और मंज़िल अच्छी होगी?” क्या तुम लोग इस तरह सोचोगे? (अब यह देखकर कि परमेश्वर के कई वचन पहले ही साकार और पूरे हो चुके हैं, हमारे मन में ये विचार नहीं आएँगे, लेकिन कभी-कभी हममें अभी भी कुछ कमजोरी आ जाती है।) कमजोरी से डरने की कोई बात नहीं है। एक बिंदु है जिसके बारे में यदि तुम निश्चित हो सको, तो वह तुम्हें इस कमजोरी के कारण डगमगाने से बचाएगा। तुम्हें यह बात याद रखनी होगी : देहधारी परमेश्वर चाहे कितना भी सामान्य और व्यावहारिक हो, भले ही तुम उसमें वह देखो जिसे तुम कमियाँ और खामियाँ मानते हो, या भले ही तुम कुछ निराधार अफवाहें सुनो, या तुम्हें पता चले कि देहधारी परमेश्वर बीमार रहा है और उसमें दर्द और कमजोरी की अभिव्यक्तियाँ रही हैं, इनमें से कोई भी समस्या नहीं है। देहधारी परमेश्वर चाहे कितना भी सामान्य और व्यावहारिक हो, वह चाहे कितना भी साधारण हो, और उसका बाहरी रूप-रंग चाहे कैसा भी हो, बस एक बात पर दृढ़ता से कायम रहो—वह सत्य, मार्ग और जीवन है। तुम्हारे द्वारा उसका अनुसरण करने का यही कारण है, और यही परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास का आधार भी है। यदि तुम इस बात को लेकर निश्चित हो सको, तो इतना पर्याप्त है, और तुम्हें कभी पछतावा नहीं होगा। तुम किसी अन्य कारण से नहीं बल्कि इसलिए उसका अनुसरण करते हो, क्योंकि वह सत्य, मार्ग और जीवन है; वह तुम्हें परमेश्वर के सामने ला सकता है, वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और वह परमेश्वर का प्रकटन, परमेश्वर की अभिव्यक्ति और वह व्यक्ति है जिसे पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य सौंपा गया है। तुम्हारे लिए उसका अनुसरण करना सही है। उसका अनुसरण करने में, तुम किसी व्यक्ति का अनुसरण नहीं कर रहे हो, बल्कि परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हो। तुम परमेश्वर के अनुयायी हो, परमेश्वर की भेड़ों में से एक हो; तुमने गलत मार्ग नहीं चुना है। उसका अनुसरण करने में, तुम कभी गलत मार्ग पर नहीं जाओगे और कभी अपनी दिशा नहीं खोओगे। उसका अनुसरण करने में, तुम परमेश्वर के एक सृजित प्राणी हो; उसका अनुसरण करके तुम कभी गलत नहीं हो सकते। जब तुम इसके बारे में निश्चित हो जाते हो, तो परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास की नींव पड़ जाती है। देहधारी परमेश्वर तुम्हें चाहे कितना भी सामान्य और व्यावहारिक लगे, तुम चाहे कोई भी निराधार अफवाहें या भ्रांतियाँ सुनो, या तुम्हारी जो भी धारणाएँ अभी भी हल न हुई हों, इनमें से कोई महत्व नहीं रखता। भले ही तुममें कमजोरी और दर्द हो, वह भी कोई महत्व नहीं रखता। अगर तुममें सच्ची आस्था है, अगर तुम अपने सामने आने वाली कोई भी समस्या हल करने लिए सत्य खोज सकते हो, और तुम किसी भी समय परमेश्वर को कभी नहीं छोड़ते, तो अंत में तुम निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए व्यक्ति होगे, अगले युग में प्रवेश करने वाली नई मानवजाति के सदस्य होगे, और तुम आशीष पाने वाले व्यक्ति होगे। इसलिए, हर समय, तुम्हें बाहरी परिवेश से, किन्हीं भी टिप्पणियों से, किसी ऐसे व्यक्ति से जिसे तुम महान हस्ती या प्रसिद्ध व्यक्ति मानते हो, या किसी ऐसे व्यक्ति से जिसकी तुम पूजा करते हो, प्रभावित नहीं होना है। तुम्हें बस दृढ़ता से यह विश्वास करना है कि जो सत्य, मार्ग और जीवन है, वह स्वयं परमेश्वर है—इतना पर्याप्त है।

हमने अभी जिस बात पर संगति की, वह देहधारी परमेश्वर को जानने से संबंधित सत्यों का महत्व था। चूँकि देहधारी परमेश्वर, परमेश्वर का कार्य करने में स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में पूरी तरह सक्षम है, इसलिए स्वाभाविक रूप से, उसके द्वारा बोले गए वचनों और उसके द्वारा किए गए कार्य का पूरी मानवजाति पर प्रभाव भी धीरे-धीरे सामने आएगा और तुम्हें दिखाई देगा। चाहे जो भी हो, देहधारी परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य है, और जो वचन वह व्यक्त करता है, वे स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचन हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि देहधारी परमेश्वर की छवि या बाहरी रूप-रंग चाहे कैसा भी हो, वह स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में पूरी तरह सक्षम है। इसलिए, देहधारी परमेश्वर को जानना परमेश्वर को जानने का एक हिस्सा भी है, और तुम्हें इस संबंध में सत्य नजरअंदाज नहीं करने चाहिए। यदि तुम परमेश्वर को जानना चाहते हो और स्वर्ग में परमेश्वर को जानना चाहते हो, और यदि तुम स्वर्ग में परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को छोड़ना चाहते हो, तो पहले तुम्हें पृथ्वी पर परमेश्वर को जानना होगा, देहधारी परमेश्वर को जानना होगा, और देहधारी परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को छोड़ना होगा। ऐसा करने से परमेश्वर में तुम्हारी आस्था बढ़ाने और परमेश्वर के अनुयायी के रूप में तुम्हारी नींव मजबूत करने में और भी अधिक मदद मिल सकती है। अगर तुम इस बारे में निश्चित हो कि देहधारी परमेश्वर स्वयं परमेश्वर है, और वह सत्य, मार्ग और जीवन है, तो तुम उसे एक व्यक्ति नहीं मानोगे। तुम जितना अधिक उसका अनुसरण करोगे और जितना अधिक उसके वचनों और कार्य का अनुभव करोगे, उतना ही अधिक तुम महसूस करोगे, “यह साधारण व्यक्ति साधारण नहीं है। वह शब्द के सही अर्थों में साधारण व्यक्ति नहीं है; बल्कि, वह परमेश्वर के सार वाला साधारण व्यक्ति है।” जब तुम यह महसूस कर लेते हो, तब तुम उसे साधारण भ्रष्ट मानवजाति का सदस्य नहीं मानोगे, बल्कि उसे परमेश्वर की पहचान और सार वाला व्यक्ति समझोगे। यह इस बात से अलग होगा कि तुम सांसारिक आचरण के फलसफों और लोगों के बीच मौजूद चीजें सँभालने के तरीकों का उपयोग करते हुए साधारण भ्रष्ट मानवजाति के किसी सदस्य के साथ कैसे व्यवहार करते हो; बल्कि, तुम देहधारी परमेश्वर के साथ वैसे ही व्यवहार करोगे जैसे तुम परमेश्वर के साथ व्यवहार करते हो। इस देहधारी मानव-पुत्र के साथ इस तरह व्यवहार करके तुम उसे जान सकते हो। जब तुम उसके साथ उस तरह व्यवहार करते हो जिस तरह परमेश्वर चाहता है, तब तुम्हें डरने और चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है, न ही तुम्हें अतिसावधान होने की आवश्यकता है, और तुम्हें सतर्क रहने की तो बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है। बल्कि, तुम्हें उसके साथ उस तरीके और रवैये से व्यवहार करना चाहिए, जो परमेश्वर के साथ व्यवहार करने के लिए सबसे सही है। उसके साथ व्यवहार करने का यह तरीका, निश्चित रूप से, वह तरीका भी है जिससे एक सृजित प्राणी को परमेश्वर के साथ व्यवहार करना चाहिए। परमेश्वर के साथ व्यवहार करने के वे कौन-से तरीके थे, जिनका हमने पहले उल्लेख किया था? क्या तुम लोगों को अभी भी याद हैं? (पहला है निष्कपट और ईमानदार होना, दूसरा है सम्मान दिखाना, और तीसरा है उसके वचनों की आज्ञा मानना।) निष्कपट और ईमानदार होना, सम्मान दिखाना और उसके वचनों की आज्ञा मानना—ये तीन तरीके हैं। देखो, ये तीन तरीके कुल मिलाकर केवल कुछ ही शब्द हैं। बाहरी तौर पर, इन्हें हासिल करना काफी आसान लगता है, लेकिन यदि तुम्हारे द्वारा ग्रहण किया गया स्थान गलत है, और तुम्हारा रवैया गलत है, तो इन्हें हासिल करना बहुत मुश्किल है। देखो, इन्हें शाब्दिक रूप से समझना आसान है, लेकिन हासिल करना आसान नहीं है। मुझे बताओ, यदि लोग निष्कपट और ईमानदार होना, सम्मान दिखाना और देहधारी परमेश्वर के वचनों की आज्ञा मानना हासिल नहीं कर सकते, तो क्या वे स्वर्ग में परमेश्वर के साथ इसे प्राप्त कर सकते हैं? (नहीं।) क्यों नहीं? (क्योंकि यदि लोगों को परमेश्वर का सच्चा ज्ञान नहीं है, तो वे परमेश्वर के साथ अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर व्यवहार करेंगे।) यह लोगों के सार और भ्रष्ट स्वभावों द्वारा निर्धारित होता है। इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि तुम आंतरिक रूप से खुद को कैसे नियंत्रित करते हो या तुम्हारी किस तरह की इच्छाएँ हैं; यदि तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव हल नहीं होते, तो परमेश्वर के साथ इन तीन तरीकों से व्यवहार करना बहुत मुश्किल होगा। यदि तुम अपने कुछ भ्रष्ट स्वभाव हल कर लेते हो, और तुम्हें परमेश्वर की बुनियादी समझ और ज्ञान भी है, तो तुम इसमें से कुछ हासिल करने में सक्षम होगे, और एक सृजित प्राणी के रूप में अपना उचित स्थान ग्रहण करने और उस स्थान से उसके साथ व्यवहार करने में सक्षम होगे। इन तीन बिंदुओं को प्राप्त करने के लिए, एक तो तुम्हें कुछ भ्रष्ट स्वभाव हल करने होंगे और अपनी तर्क-बुद्धि कुछ हद तक बहाल करनी होगी; और दूसरे, तुम्हें परमेश्वर का कुछ ज्ञान अवश्य होना चाहिए। परमेश्वर को न जानने से काम नहीं चलेगा, है ना? (हाँ।) यह इस मामले में भी सच है कि तुम देहधारी परमेश्वर के साथ कैसे व्यवहार करते हो, और निश्चित रूप से, इस मामले में भी सच है कि तुम स्वर्ग में परमेश्वर के साथ कैसे व्यवहार करते हो। यदि तुम देहधारी परमेश्वर के साथ व्यवहार करने में ये तीन बिंदु हासिल नहीं कर सकते, तो कहने की आवश्यकता नहीं कि तुम स्वर्ग में परमेश्वर के साथ व्यवहार करने में भी इन्हें हासिल नहीं कर सकते। तुम स्वर्ग में परमेश्वर के कार्य और वचनों को देख, सुन या समझ नहीं सकते; यदि तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हो, तो यह केवल खोखली बात है। प्रारंभिक मानवजाति को देखो : परमेश्वर ने उनसे बलि चढ़ाने, वार्षिक फसल की पैदावार का दसवाँ हिस्सा अर्पित करने के लिए कहा। लोग अपने दिलों में समझते थे कि परमेश्वर ने जो माँगा है, उन्हें वह अवश्य देना चाहिए, लेकिन जब उसे परमेश्वर को अर्पित करने का समय आया, तब वे उसे नहीं देना चाहते थे। यहाँ तक कि यह सोचते हुए वे उसे अर्पित करने के बाद वापस भी लेना चाहते थे, “तुमने फसलें नहीं बोईं, और तुमने कोई श्रम नहीं किया, तो हमें यह तुम्हें क्यों देना चाहिए?” जब उन्होंने इसे अर्पित किया, तब वे अनिच्छुक थे, अंदर से असहज महसूस कर रहे थे, और वे क्रोधित हो गए। क्या यह सम्मान दिखाना था? वे इसे हासिल नहीं कर सके, है ना? इसलिए, परमेश्वर का सम्मान करना और उसके वचनों की आज्ञा मानना इतना आसान नहीं है; यदि लोगों के भ्रष्ट स्वभाव हल नहीं होते, तो वे इसे हासिल नहीं कर सकते। चाहे जो भी हो, देहधारी परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को छोड़ने के लिए, तुम्हें पहले देहधारी परमेश्वर के सार और देहधारी परमेश्वर से जुड़े विभिन्न सत्यों का ज्ञान और समझ होनी चाहिए, और अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को हल करना चाहिए। केवल तभी तुम देहधारी परमेश्वर के संबंध में सत्य के इन पहलुओं को वास्तव में समझ सकते हो, और परमेश्वर की पहचान और सार को वास्तव में जान सकते हो; और केवल उसके बाद ही तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण और उसका भय हासिल कर सकते हो।

पहले, हमने देहधारी परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को छोड़ने पर संगति की थी। पहला सिद्धांत देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्ग में परमेश्वर से न करना है, और दूसरा सिद्धांत देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के बराबर न समझना है। दूसरे सिद्धांत पर संगति करते समय यह उल्लेख किया गया था कि देहधारी परमेश्वर धोखा नहीं देता, होड़ नहीं करता, लड़ाई नहीं करता, साजिश नहीं रचता, हमला नहीं करता या बदला नहीं लेता। हम इन सभी पर पहले ही संगति कर चुके हैं। अब, हम अगले विषय—प्रलोभन न देना—पर संगति करेंगे। देहधारी परमेश्वर जिस तरह से आचरण करता है, जिस तरह से वह लोगों के साथ मिलता-जुलता है, या उसके कार्य करने के कुछ तरीके, जैसा कि उसके स्वभाव सार द्वारा प्रकट होता है, उनमें यह बात शामिल है : प्रलोभन न देना। इसे कैसे समझा जाना चाहिए? क्या लोगों की “प्रलोभन न देने” की शाब्दिक समझ इस तथ्य के अनुरूप है कि देहधारी परमेश्वर लोगों को प्रलोभन नहीं देता, जैसा कि उसके बोलने और कार्य करने के तरीके में प्रकट होता है? यदि उनकी समझ देहधारी परमेश्वर की अभिव्यक्तियों के विपरीत है, तो क्या लोग जो समझते हैं वह केवल मानवीय धारणाएँ नहीं है? इसकी बहुत अधिक संभावना है कि यह केवल मानवीय धारणाएँ और कल्पनाएँ है। तो आओ हम इस विषय “प्रलोभन न देना” पर संगति करें, जो देहधारी परमेश्वर की मानवता और सार से प्रकट होता है। इस विषय के बारे में तुम लोगों की बुनियादी समझ क्या है? क्या तुम लोग जानते हो कि परमेश्वर के बोलने का एक जैसा रहने वाला तरीका क्या है? क्या तुम लोगों ने यह पता लगाया है कि परमेश्वर लोगों से बात करने के लिए किन तरीकों का उपयोग करता है, और वह अपने वचन व्यक्त करने के लिए किन तरीकों का उपयोग करता है? (परमेश्वर बहुत स्पष्ट तरीके से बोलता है। परमेश्वर के बोलने के तरीकों में मदद करना, मार्गदर्शन करना और अगुआई करना, और साथ ही धैर्यपूर्ण मार्गदर्शन शामिल है; वह कोई प्रलोभन नहीं देता।) यह निश्चित है कि वह प्रलोभन नहीं देता, लेकिन लोग अभी भी पूरी तरह से यह नहीं समझते कि इस “प्रलोभन न देने” का वास्तव में क्या अर्थ है। परमेश्वर बोलते समय आम तौर पर भाषाई अभिव्यक्ति के जिन रूपों और भाषा की जिस शैली का उपयोग करता है, उसे देखते हुए, परमेश्वर बहुत ही सरल और स्पष्ट तरीके से बोलता है, और यह प्रयास करता है कि लोग समझें और जानें कि वह क्या कह रहा है। वह शब्दों का खेल नहीं खेलता, न ही वह ऐसी बातें करता है जो झूठी, आडंबरपूर्ण और खोखली हों, और उसके वचन औपचारिक तो बिल्कुल नहीं होते। बल्कि, वह विचारणीय विषय पर बात करता है, और इंसानी भाषा का तथा मानवजाति के अनुकूल बोलने के तरीकों का उपयोग करके लोगों से बात करने का हर संभव प्रयास करता है। उसके वचन सलाह, सांत्वना और नसीहत, और कभी-कभी चेतावनी देने की प्रकृति के होते हैं; बेशक, वे अक्सर पोषण, मदद, सहारा प्रदान करने और उजागर करने की प्रकृति के होते हैं—वे लोगों की भ्रष्ट प्रकृति और समस्याओं का सार उजागर करते हैं, है ना? उजागर करना, पोषण देना, मार्गदर्शन करना, सहारा देना और मदद करना वे तरीके हैं, जिनका वह सबसे अधिक उपयोग करता है। इन तरीकों में से कुछ में विशिष्ट उदाहरण देना शामिल है, और कुछ में ऐसे जीवंत रूपक शामिल हैं जो किसी जीवित चीज, जानवर, घटना, या लोगों के जीवन में उनके आस-पास होने वाली चीजों का उपयोग करते हैं। एक लिहाज से, यह परमेश्वर के वचनों के भीतर के उन सत्यों—या वास्तविकताओं—को, जिन्हें लोगों को समझना चाहिए, उनके लिए अधिक स्पष्ट कर देता है। दूसरी बात, परमेश्वर जो उदाहरण देता है, वे वो घटनाएँ होती हैं, जो कुछ विशेष व्यक्तियों के साथ घटित हुई होती हैं—इन घटनाओं का सबकों या उदाहरणों के रूप में उपयोग करने से तुम लोगों को यह देखने में मदद मिलती है कि इन लोगों की समस्याएँ क्या थीं, समस्याओं का सार क्या था, इन्होंने कौन-सी भ्रष्टता प्रकट की, और इसमें कौन-से सत्य शामिल थे। इस तरह, परमेश्वर लोगों को सत्य का कोई पहलू संप्रेषित करता है, ताकि सत्य के इस पहलू को समझने के आधार पर वे जान जाएँ कि परमेश्वर के इरादों के अनुसार और सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कैसे करना है। भाषा के सबसे स्पष्ट और सरल रूपों का उपयोग करने में परमेश्वर का उद्देश्य लोगों को सत्य प्रदान करना है। वह लोगों को सत्य इसलिए प्रदान करता है, ताकि जब वे विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करें, तब वे, नकारात्मक पक्ष से, लोगों के भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों, लोगों के भ्रष्ट स्वभावों और परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाली लोगों की अभिव्यक्तियों और सार को जान सकें। साथ ही, वह लोगों का सकारात्मक अर्थ में सत्य सिद्धांतों को समझने के लिए मार्गदर्शन करने हेतु ऐसा करता है, ताकि उनके पास अभ्यास का मार्ग हो और वे सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर जाएँ। लोगों को पोषण प्रदान करने में परमेश्वर का अंतिम उद्देश्य, ताकि वे सत्य समझें, सत्य का ज्ञान प्राप्त करें और सत्य सिद्धांतों को जानें, लोगों को परमेश्वर के सामने आने और उसके प्रति समर्पण, उसकी संप्रभुता के प्रति समर्पण, उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण, उसके आयोजनों के प्रति समर्पण और उससे आने वाली ताड़ना, न्याय, शोधन और परीक्षणों के प्रति समर्पण हासिल करने में सक्षम बनाना है, ताकि वे ऐसे लोग बनें जो परमेश्वर का भय मानते हैं और उसकी आराधना करते हैं, सच्चे सृजित प्राणी बनें—ऐसे सृजित प्राणी जो मानक स्तर के हों। परमेश्वर के वचनों और कार्यों के पीछे, जिनमें वह सब शामिल है जो वह करता है, ये विशिष्ट सिद्धांत होते हैं। परमेश्वर जो विशिष्ट वचन बोलता है और जो विशिष्ट कार्य करता है, वे प्रलोभन से रहित होते हैं; वे सब सार्वजनिक, प्रकट, खुले और निष्कपट होते हैं, और प्रकाश में होते हैं। उनमें कोई संदिग्ध योजनाएँ और साजिशें शामिल नहीं होतीं, मानवजाति के संबंध में कोई मनसूबे या अकथनीय इरादे और उद्देश्य तो बिल्कुल भी नहीं होते। चाहे वह परमेश्वर के वचनों के पीछे के उद्देश्य और महत्व में हो, या परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य में, लोगों के संबंध में उसके कभी कोई अनुचित उद्देश्य नहीं होते। इसके विपरीत, उसके सभी उद्देश्य सकारात्मक होते हैं; वह जो कुछ भी करता है, वह लोगों को लाभ पहुँचाने, लोगों को सत्य समझने और सत्य प्राप्त करने में मदद करने, और लोगों को जीवन में सही मार्ग पर चलने में मदद करने के लिए होता है। इसलिए, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और महत्व से, और परमेश्वर के बोलने और कार्य करने से आँकें तो, परमेश्वर के सार या परमेश्वर के कार्य के शुरुआती बिंदु में कोई प्रलोभन नहीं होता।

बाइबल में “प्रलोभन” शब्द बहुत पहले ही आ जाता है; क्या तुम सभी लोग यह जानते हो? (हाँ।) मनुष्य द्वारा पहली बार शैतान का प्रलोभन स्वीकार करने से पहले, परमेश्वर ने कुछ कहा था। परमेश्वर ने क्या कहा था? (“तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना : क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा” (उत्पत्ति 2:16-17)।) परमेश्वर के इस कथन में कितनी चीजें शामिल हैं? वाटिका के हर पेड़ का फल खाया जा सकता है—यह लोगों को उन चीजों के दायरे के बारे में बताता है, जिन्हें खाया जा सकता है। यह लोगों के लिए सबसे सकारात्मक पोषण है—यह लोगों को बता रहा है कि वे क्या खा सकते हैं। क्या ये वचन बहुत सरल और स्पष्ट नहीं हैं? (हाँ, लोग इन्हें समझ सकते हैं।) सही है। इनका विश्लेषण या शोध करने की कोई आवश्यकता नहीं है; लोग इन्हें सुनते ही समझ जाते हैं। अगला वाक्य है, “पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना।” यह वाक्य एक अपवाद का उल्लेख करता है। किस अपवाद का? यह लोगों को बताता है कि वाटिका में भले और बुरे के ज्ञान का एक वृक्ष है, और उन्हें उस पर उगने वाला फल नहीं खाना चाहिए। क्या ये वचन सरल और स्पष्ट नहीं हैं? (हैं।) ये कितने सरल और स्पष्ट हैं? (इतने कि लोग इन्हें सुनने के तुरंत बाद समझ सकते हैं।) इनका विश्लेषण या शोध करने की कोई आवश्यकता नहीं है; कान और दिमाग वाला कोई भी व्यक्ति इसे सुनने के बाद जान जाता है कि इस वाक्य का क्या अर्थ है। परमेश्वर ने लोगों को बताया कि वे क्या खा सकते हैं और क्या नहीं खा सकते। क्या नहीं खाया जा सकता था? भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल। लेकिन यह सुनने के बाद, क्या लोगों के दिलों में परमेश्वर के वचनों के बारे में संदेह थे? (हाँ।) इसके बाद, लोग पूछते, “हम उस वृक्ष का फल क्यों नहीं खा सकते?” लोगों के पूछने का इंतजार किए बिना, परमेश्वर ने कहा, “क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।” क्या ये वचन सरल हैं? (हाँ।) ये बहुत सरल हैं—यदि तुम इसे खाओगे, तो तुम अवश्य मर जाओगे। मृत्यु एक गंभीर बात है, इसलिए परमेश्वर ने यह निर्देश देना सुनिश्चित किया। क्या इस निर्देश में कुछ गलत है? (नहीं।) परमेश्वर के निर्देश का एक भी शब्द गलत नहीं है, न ही इसमें प्रलोभन का एक भी शब्द है। यह साफ तौर पर और स्पष्ट रूप से बताता है कि क्या खाया जा सकता है और क्या नहीं खाया जा सकता, और परमेश्वर ने लोगों को यह भी बताया कि यदि वे वह खाएँगे जो उन्हें नहीं खाना चाहिए, तो उसका परिणाम क्या होगा। ये तीन सरल वाक्य सुनने के बाद, तुम कई चीजें समझ जाते हो। सामान्य परिस्थितियों में, सृष्टिकर्ता द्वारा बोले गए वचन सुनने, उनके बारे में स्पष्टता प्राप्त करने, उन्हें समझने और उन्हें अपने दिलों में रखने के बाद, सृजित प्राणी जानते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए। उन्हें आज्ञाकारी होना चाहिए और वैसा ही करना चाहिए जैसा उन्हें बताया गया है, केवल वही चीजें खाना जो परमेश्वर ने उन्हें बताई हैं कि वे खा सकते हैं, और वह न खाना जो परमेश्वर ने उन्हें बताया है कि वे नहीं खा सकते। उन्हें परमेश्वर को परखना नहीं चाहिए, न ही उन्हें परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करना चाहिए। हम परमेश्वर के वचन न सुनने के परिणामों में नहीं जाएँगे। जहाँ तक परमेश्वर द्वारा बोले गए इन वचनों की बात है, परमेश्वर के बोलने के रूप और भाषाई शैली से आँकें तो, परमेश्वर ऐसे तरीके से बोलता है जिसे समझना लोगों के लिए बहुत आसान है। उसके वचन गूढ़ नहीं होते, और वह लोगों को उलझन में नहीं रखता, कोई छिपे हुए इरादे रखने की तो बात ही छोड़ो। यद्यपि परमेश्वर द्वारा बोले गए ये कुछ वाक्य सरल हैं, लेकिन ये लोगों को यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि परमेश्वर की बात स्पष्ट, सरल और समझने में आसान होती है। तो परमेश्वर का हृदय कैसा है? परमेश्वर का हृदय प्रेम, ईमानदारी और वफादारी से भरा है। यह प्रेम कहाँ झलकता है? यह परमेश्वर के इन कुछ निर्देशों में झलकता है। परमेश्वर के निर्देश बहुत विशिष्ट और संपूर्ण हैं। इन कुछ निर्देशों से आँकें तो, परमेश्वर में लोगों के प्रति जिम्मेदारी और फिक्र की भावना है। वह लोगों को समझने में मदद करने के लिए सरलतम भाषा का उपयोग करता है, और उनके समझ लेने के बाद, परमेश्वर मन की शांति के साथ चला जाता है। देखो, क्या परमेश्वर लोगों के संबंध में कोई मनसूबे रखता है? (बिल्कुल नहीं।) अपने प्रेम और फिक्र के भीतर, परमेश्वर आशा करता है कि लोग एक चीज प्राप्त करेंगे : आज्ञाकारी होना, परमेश्वर से विद्रोह न करना, परमेश्वर के प्रति शंकित न होना और परमेश्वर पर संदेह न करना। परमेश्वर के इन तीन निर्देशों के पीछे यही उद्देश्य और अपेक्षा है। आज्ञाकारी बनो। परमेश्वर पर संदेह मत करो। परमेश्वर द्वारा बोला जाने वाला हर वचन सत्य होता है; परमेश्वर वफादार है। परमेश्वर यह जिम्मेदारी प्रेम और फिक्र के साथ पूरी करता है और मानवजाति को ये तीन निर्देश प्रेम और फिक्र के साथ देता है। इससे, एक ओर, हम परमेश्वर का सार देखते हैं, और दूसरी ओर, हम परमेश्वर के मानवजाति से बात करने का तरीका और उसकी बातचीत का शुरुआती बिंदु भी देखते हैं। इस तरह बोलने में परमेश्वर का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जब लोग उसके वचन सुनें, तो वे उन्हें समझ सकें और उन्हें अपने दिलों में रख सकें। लोग इसे चाहे कैसे भी देखें, परमेश्वर का शुरुआती बिंदु बस यही रहता है। वह स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है; वह कोई कुटिल या अंधकारमय इरादे या उद्देश्य नहीं रखता। इसके अलावा, परमेश्वर के इन कुछ निर्देशों से आँकें तो, परमेश्वर सीधे मुद्दे की बात करता है। उसके बोलने का उद्देश्य तुम्हें परमेश्वर के इरादे समझाना और यह बताना है कि क्या करना है। परमेश्वर लोगों से कभी पहेलियों में बात नहीं करता; वह हमेशा बेबाक और स्पष्टवादी होता है। वह लोगों से रोजमर्रा की उस भाषा का उपयोग करके बातचीत करता है जिसे समझना लोगों के लिए सबसे आसान है, ताकि लोग समझ सकें और याद रख सकें कि वह क्या कहता है और उसका बोलना व्यर्थ न जाए। क्या परमेश्वर रुतबे के स्थान से बोलता है? क्या वह लोगों को भाषण देता है? (नहीं।) जब परमेश्वर मानवजाति से बातचीत करता है और लोगों को निर्देश देता है, अगर वह उन्हें परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से या किसी मनुष्य के माता-पिता या उसके बड़े के-से परिप्रेक्ष्य से निर्देश दे रहा हो तो भी, वह लोगों से सबसे स्पष्ट, सबसे सरल भाषा का उपयोग करके बातचीत करता है। वास्तव में, भ्रष्ट मनुष्यों की नजर में, परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्याकरणिक रूप से और इंसानी ज्ञान और भाषा के परिप्रेक्ष्य से आँकें तो, ये वचन केवल सीधी-सादी बात हैं; ये वो चीजें हैं जो तुम किसी बच्चे से कह सकते हो। कुछ लोग कहते हैं, “ये वचन गूढ़ नहीं हैं, ये उच्च या महान नहीं हैं, और ये प्रभावशाली भी नहीं लगते। इनमें किसी परिष्कृत शब्दावली या आलंकारिक वक्तृता का उपयोग भी नहीं होता।” यह सही है—परमेश्वर लोगों से इसी तरह बात करता है। परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, उसके पास सब कुछ प्रचुर मात्रा में है, और परमेश्वर सभी चीजों से परे है, लेकिन परमेश्वर सबसे सरल और सबसे स्पष्ट भाषा का उपयोग करते हुए मनुष्यों से बातचीत करता है। चूँकि मनुष्य परमेश्वर की नजर में बच्चों के समान हैं, इसलिए परमेश्वर उन्हें ऐसे शब्दों का उपयोग करके निर्देश देता है जिन्हें बच्चे भी समझ और जान सकते हैं—वे क्या खा सकते हैं, क्या नहीं खा सकते, और खाने के बाद क्या होगा। मनुष्यों को निर्देश देने के लिए वह ऐसे सरल शब्दों का उपयोग इसलिए करता है, ताकि वे समझ सकें। भ्रष्ट मनुष्यों की नजर में इसे क्या कहा जाता है? इसे अपना रुतबा कम करना कहा जाता है। लेकिन परमेश्वर इसे कैसे देखता है? यह उसका एक स्वाभाविक प्रकाशन है। परमेश्वर को अपना भेष बदलने की आवश्यकता नहीं है, न ही उसे ऐसा करते समय पहले से तैयारी करने या विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है; यह उसका एक स्वाभाविक प्रकाशन है। देखो, चूँकि ये वचन गूढ़ या रहस्यमय और अथाह नहीं हैं, इसलिए लोग अक्सर इन्हें गंभीरता से नहीं लेते। वे परमेश्वर के वचनों को संजीदा तरीके से नहीं ले सकते, और आज्ञाकारी और समर्पित नहीं हो सकते। यह भ्रष्ट मानवजाति की भ्रष्टता है, और यह सबसे प्रारंभिक मानवजाति की अज्ञानता भी है। जब मनुष्यों ने ऐसे कथन सुने जो परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों से भिन्न थे, तो वे परमेश्वर के प्रति सतर्क हो गए, परमेश्वर के वचनों पर संदेह करने लगे और उन्हें नकारने लगे, और परमेश्वर की बातों के पीछे के उद्देश्यों के प्रति शंकालु हो गए। इस तरह, मनुष्यों ने खुद को परमेश्वर से दूर कर लिया। मनुष्यों द्वारा शैतान का प्रलोभन स्वीकार करने और परमेश्वर के बारे में शंकाएँ और संदेह रखना शुरू करने के बाद, वे अब परमेश्वर के वचन नहीं सुन सके या परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण नहीं कर सके और परमेश्वर से अधिकाधिक दूर होते चले गए। लोगों द्वारा परमेश्वर के मुख का प्रकाश छोड़ने, परमेश्वर के वचन न सुनने और परमेश्वर के वचनों पर विश्वास न करने के क्या परिणाम हुए? वे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिए गए और आज तक भ्रष्ट बने हुए हैं।

मैंने अभी जिस बारे में बात की, वह उस समय की कहानी है जब बाइबल में पहली बार “प्रलोभन” शब्द आता है। इस कहानी से लोगों को परमेश्वर के बोलने के तरीके, परमेश्वर के स्वभाव और मानवजाति के प्रति परमेश्वर के रवैये की बुनियादी समझ होनी चाहिए। परमेश्वर का यह पहलू—कि उसका सार प्रलोभन से मुक्त है—देहधारी परमेश्वर में भी मौजूद है; इसे पहचानना बहुत आसान होना चाहिए। परमेश्वर ने क्या कहा या क्या किया, इसके बारे में बाइबल में ज्यादा कुछ दर्ज नहीं है, इसलिए लोगों को उसका सटीक ज्ञान होना मुश्किल है। अंत के दिनों में कार्य के इस चरण में देहधारी परमेश्वर ने कई वचन बोले हैं और कई कार्य किए हैं। इन अनेक वर्षों में तुम लोगों के साथ मेरे बोलने और संगति करने में, यहाँ तक कि दैनिक जीवन में तुम्हारे साथ मिलने-जुलने में भी, मेरे वचन और कार्य मूल रूप से उसी रवैये को दर्शाते हैं जो अभी बताई गई बाइबल की कहानी में मनुष्यों के प्रति परमेश्वर का था। मैं इस तरह से बोलने का प्रयास करता हूँ जिसे तुम लोग समझ-बूझ सको, इसलिए कभी-कभी मैं बहुत विशिष्ट रूप से और बहुत विस्तार से बोलता हूँ, यहाँ तक कि चीजों को बार-बार दोहराता भी हूँ, जिससे यह अनिवार्य रूप से थोड़ा लंबा हो जाता है। इसका एक ही कारण है : सृष्टिकर्ता—परमेश्वर—चाहे किसी भी रूप में प्रकट हो और कार्य करे, मानवजाति के संबंध में उसका हमेशा एक चिरकालिक, मुश्किल से बदलने वाला, अभ्यस्त रवैया और अभ्यस्त दृष्टिकोण होता है। हो सकता है, “अभ्यस्त” और “चिरकालिक” बहुत उपयुक्त न हों, लेकिन इंसानी भाषा बहुत सीमित है, इसलिए फिलहाल मैं इसे केवल इसी तरह कह सकता हूँ। तो यह दृष्टिकोण किसे संदर्भित करता है? यह इसे संदर्भित करता है कि कैसे, परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से, मानवजाति हमेशा परमेश्वर के हाथों रची गई शुरुआत वाली वही अज्ञानी, भोली मानवजाति रहेगी—ऐसी मानवजाति, जो बाहरी तौर पर वयस्क दिखाई देती है, लेकिन जिसका आंतरिक सार तीन साल के बच्चे के सार जैसा है। इसलिए, मानवजाति के प्रति परमेश्वर का रवैया हमेशा उस परिप्रेक्ष्य और रवैये से अलग होता है जिससे लोग मानवजाति को देखते हैं। ठीक इसी अंतर के कारण, कई बार जब परमेश्वर मानवजाति से बात करता है या उसे निर्देश देता है, तब परमेश्वर के बोलने का तरीका या ऐसा करने में उसका शुरुआती बिंदु इंसानी भाषा का उपयोग करना चाहने का अधिक होता है, ताकि लोग बेहतर ढंग से जान सकें कि वह क्या कह रहा है। परमेश्वर लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है और उनसे कैसे बात करता है, इसमें उसका उद्देश्य उन्हें यह अधिक स्पष्ट रूप से बताना है कि उसके इरादे क्या हैं, उसके अपेक्षित मानक क्या हैं, वह लोगों से जो भी करने की अपेक्षा करता है उसके सिद्धांत क्या हैं, और सभी लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति लोगों को क्या दृष्टिकोण रखने चाहिए। जब परमेश्वर सृष्टिकर्ता के परिप्रेक्ष्य से मानवजाति से ये वचन बोलता है, तो वह कोई भाषण नहीं दे रहा होता, न ही वह उन्हें ललकार रहा होता है, और बेशक, वह उनका आह्वान भी नहीं कर रहा होता; बल्कि, वह उन्हें पोषण प्रदान कर रहा होता है। पोषण प्रदान करना क्या है? मुझे बताओ, तुम लोग इसे क्या समझते हो। (यह उस चीज की भरपाई करना है जिसकी लोगों को आवश्यकता है और जिसकी लोगों में कमी है; इसे पोषण प्रदान करना कहा जाता है।) पोषण प्रदान करने में सहारा और मदद, और कभी-कभी नसीहत, चेतावनी, प्रोत्साहन आदि शामिल होते हैं। तो पोषण प्रदान करना क्या है? इसका अर्थ है कि मनुष्य चाहे कितने भी बड़े हों, उन्होंने जीवित रहने के कितने भी कौशलों में महारत हासिल कर ली हो या उनके ज्ञान का स्तर कितना भी ऊँचा हो, जब सत्य की बात आती है, तो मनुष्य हमेशा कोरे होते हैं। लोग जो ज्ञान समझते हैं, वह सत्य के साथ असंगत है। ऐसे बहुत-से सत्य हैं जिन्हें लोगों को समझना चाहिए, और लोगों को जिस पोषण की सबसे अधिक आवश्यकता है, वह सत्य और जीवन का पोषण है। इसलिए, केवल सत्य पर संगति करना ही लोगों के लिए सबसे अच्छा पोषण है। कहने का तात्पर्य यह है कि, सभी लोगों, घटनाओं और चीजों के सामने तुम्हारे दृष्टिकोण, समझ और रवैयों का सत्य से कोई लेना-देना नहीं है। तुम्हारे पास चाहे कितना भी ज्ञान हो, सांसारिक आचरण के लिए तुम्हारी रणनीतियाँ चाहे कितनी भी परिष्कृत हों, और तुम्हारे पास जीवन का चाहे कितना भी अनुभव हो, जब सत्य की बात आती है, तब तुम कोरे होते हो; तुम्हारे पास सत्य नहीं होता। भले ही कुछ लोगों ने कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया हो और वे कुछ धर्म-सिद्धांत समझते हों, फिर भी वे वास्तव में सत्य नहीं समझते। सत्य न समझने का क्या अर्थ है? एक ओर, वस्तुनिष्ठ तथ्यों के संदर्भ में, इसका अर्थ है कि तुम सत्य सिद्धांतों को नहीं समझते, तुम नहीं जानते कि अभ्यास कैसे करना है, और विशेष स्थितियों का सामना करने पर तुम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हो। दूसरी ओर, इसके पीछे एक व्यक्तिनिष्ठ कारण भी है, जो यह है कि लोगों में भ्रष्ट स्वभाव होते हैं। भ्रष्ट स्वभाव तुम्हें इस तरह बाधित करते और बाँधते हैं कि तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते। तुम उस थोड़े-से सत्य को भी अभ्यास में नहीं ला सकते, जिसे तुम समझते हो; तुम्हारे लिए सत्य का अभ्यास करना मुश्किल है, और ऐसा करने में बाधाएँ हैं। इसलिए, परमेश्वर की नजर में, मानवजाति हमेशा एक शिशु रहेगी। कुछ लोग कहते हैं, “क्या मनुष्य परमेश्वर की नजर में हमेशा एक शिशु रहेगा? क्या यह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति किस चरण में है?” यह इस पर निर्भर नहीं करता। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि व्यक्ति किस चरण में है? मनुष्य के सार के आधार पर, मानवजाति हमेशा मानवजाति है, और मनुष्य परमेश्वर के सामने हमेशा एक शिशु रहेगा। कुछ लोग कहते हैं, “तो क्या अब्राहम और अय्यूब शिशु थे?” हाँ। गवाही देने के बावजूद अब्राहम और अय्यूब शिशु क्यों थे? यह परमेश्वर के सार और परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की तुलना में है। लोग परमेश्वर द्वारा प्रदान किया गया सत्य चाहे कितना भी समझ लें, और वे परमेश्वर के प्रति चाहे कितना भी समर्पण कर सकें, परमेश्वर के स्वभाव सार का लोगों का ज्ञान और सत्य की उनकी समझ सीमित है। इस “सीमित” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि ये चीजें उनके जीवन और अस्तित्व के दायरे तक सीमित हैं। भले ही तुम सत्य के विभिन्न पहलुओं को समझ लो और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बना दिए जाओ, अंत में, अभी भी परमेश्वर ही तुम्हें पोषण प्रदान करता है। परमेश्वर हमेशा तुम्हारे जीवन और जीने का स्रोत रहेगा, और तुम हमेशा परमेश्वर के वचनों और परमेश्वर के जीवन के पोषण और सिंचन के प्राप्तकर्ता रहोगे। इस दृष्टिकोण से, मानवजाति परमेश्वर की नजर में हमेशा एक शिशु रहेगी। विशेष रूप से, चाहे तुम शिशु-वस्त्रों में लिपटे शिशु हो, स्तनपान करते शिशु हो या किसी अन्य चरण में हो, यह तुम्हारे द्वारा समझे जाने वाले सत्यों के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है। लेकिन चरण चाहे कोई भी हो, चूँकि मनुष्य, ये सृजित जीवित चीजें, सृजित प्राणी हैं, इसलिए वे सृष्टिकर्ता की नजर में हमेशा शिशु रहेंगे। इसलिए, एक शिशु की पहचान और सार के संदर्भ में देखा जाए तो, परमेश्वर के मानवजाति से बात करने का प्राथमिक उद्देश्य और प्रकृति पोषण है। बेशक, परमेश्वर जो पोषण प्रदान करता है, उसका दायरा बहुत व्यापक है : इसमें कुछ खुलासा होता है, कुछ फटकार होती है और कुछ अनुशासन होता है, जबकि कभी-कभी यह प्रकाशन होता है, कभी-कभी यह काट-छाँट करना होता है, कभी-कभी यह लोगों को सीधे तौर पर चीजें बताना होता है, कभी-कभी यह उन्हें स्पष्ट रूप से चीजें बताना होता है, और कभी-कभी यह लोगों को एक सिद्धांत बताने के लिए केवल एक उदाहरण देना होता है, ताकि वे स्वयं उस पर विचार और उसका अनुभव करें। वह चाहे किसी भी तरीके से बोले, जहाँ तक सृष्टिकर्ता के अपने द्वारा रचे गए मानवों से बात करने की प्रकृति का संबंध है, वह हमेशा पोषण का एक रूप होती है। तो जब परमेश्वर द्वारा लोगों को पोषण प्रदान करने की बात आती है, तब क्या तुम लोग देखते हो कि वह प्रलोभन से मुक्त होता है? (हाँ।) जहाँ तक लोगों का संबंध है, मानवजाति परमेश्वर से जो प्राप्त करती है, वह हमेशा सत्य, मार्ग और जीवन होता है; वह जो प्राप्त करती है वह लाभ होता है, और वह जो पाती है वह जीवन होता है। भले ही अंत में तुम्हें पूर्ण बना दिया जाए, तुम्हें अभी भी परमेश्वर की संप्रभुता स्वीकार करनी होगी और परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना होगा। तुम्हें अभी भी परमेश्वर का पोषण स्वीकार करना होगा, तुम्हें अभी भी परमेश्वर की अगुआई स्वीकार करनी होगी, और तुम अभी भी एक सृजित प्राणी हो; तुम्हारी पहचान कभी नहीं बदलेगी। बात बस यह है कि उस समय उस पहचान के भीतर तुम्हारा जो जीवन और आध्यात्मिक कद होगा, वह तुम्हारी वर्तमान पहचान के भीतर तुम्हारे जीवन और आध्यात्मिक कद से अलग होगा। उस समय, तुम्हारी पहचान और भी अधिक वैध होगी; तुम्हारे पास वह जीवन होगा जो नई मानवजाति का है। इस जीवन का सार परमेश्वर के वचनों से आता है। यह नई मानवजाति परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकती है और परमेश्वर की आराधना कर सकती है; वह अब शैतान की आराधना नहीं करती, उसने शैतान को अस्वीकृत कर दिया है, वह अब शैतान के प्रलोभन में नहीं आती, और वह अब जानवर का चिह्न धारण नहीं करती।

देहधारी परमेश्वर द्वारा बोले गए इन सभी वचनों में, जिस पहले दिन से तुम लोगों ने इन्हें पढ़ा है तब से लेकर अब तक—या जब तुम भविष्य में इन्हें पढ़ोगे—हर उस वचन में जिसे तुम पढ़ते हो और हर उस वचन में जिसे तुम सुनते और स्वीकार करते हो, हर बार जब परमेश्वर बोलता है, तब एक भी वचन ऐसा नहीं होता जिसमें प्रलोभन का कोई अंश हो। यहाँ तक कि जब मैं तुम लोगों से प्रश्न पूछता हूँ, तब भी मैं सीधे तौर पर ऐसा करता हूँ, तुम लोगों के दृष्टिकोण पूछता हूँ और यह पूछता हूँ कि तुम लोग किसी चीज को कैसे समझते और देखते हो। या मैं तुम लोगों के विचार करने के लिए कोई प्रश्न उठा सकता हूँ, और यदि मैं देखता हूँ कि तुम लोग इसे समझ नहीं सकते या चर्चा करने के बाद भी तुम्हें स्पष्टता प्राप्त नहीं हुई है, तो मैं सीधे इसके बारे में बात करूँगा। जब मैं अपनी बात पूरी कर लेता हूँ और तुम लोग उस मुद्दे को समझ जाते हो और उसे बूझ सकते हो, तब मैं उसके बारे में और बात नहीं करूँगा। कभी-कभी जब मैं बोलता हूँ, तब मैं उदाहरण देता हूँ। कुछ लोग उन्हें सुनते हैं और महसूस करते हैं, “क्या वह नन्हे बच्चों को पढ़ा रहा है?” मैं कहता हूँ, परमेश्वर में विश्वास करने वाले अधिकांश लोग बीस-तीस वर्ष से अधिक उम्र के वयस्क हैं; वे वास्तव में नन्हे बच्चे नहीं हैं। लेकिन परमेश्वर में विश्वास करने वाले जो कुछ खाते-पीते हैं वे परमेश्वर के वचन होते हैं, इसलिए कोई चाहे कितनी भी उम्र का हो, परमेश्वर के वचनों के सामने और परमेश्वर के सामने, वह नन्हा बच्चा ही है और हमेशा नन्हा बच्चा ही रहेगा। देखो, परमेश्वर के घर में लोग जीवन के सभी क्षेत्रों से आते हैं : मजदूर, किसान, तकनीशियन, सरकारी अधिकारी, साथ ही कॉलेज के छात्र, और यहाँ तक कि स्नातकोत्तर छात्र, पीएचडी छात्र, प्रोफेसर, आदि भी। लेकिन इन सभी लोगों में से कितने लोग सत्य समझ सकते हैं? जब मैं इस तरह उपदेश देता हूँ, तब कितने लोग उन्हें पूरी तरह से समझ सकते हैं? यदि मैं विस्तार से और विशिष्ट रूप से न बोलूँ, तो क्या लोग मेरी बात समझ सकते हैं? वे केवल थोड़ा-सा शाब्दिक अर्थ समझते हैं, और जब उनके अभ्यास और अनुभव करने का समय आता है, तो उनके पास मार्ग नहीं होता। इसलिए मुझे विस्तार से और विशिष्ट रूप से ही बोलना होगा और उदाहरण भी देने होंगे; बोलने के इन तरीकों में से किसी को भी छोड़ने से काम नहीं चलेगा। यदि कोई सोचता है कि यह नन्हे बच्चों को पढ़ाना है, तो वह सही है। जब मैं ये वचन बोलता हूँ, तो मैं वाकई नन्हे बच्चों से ही बोल रहा होता हूँ। तो मुझे बताओ, क्या तुम सभी लोग परमेश्वर के सामने नन्हे बच्चे नहीं हो? तुम लोगों में से कितने लोग परमेश्वर के वचन ग्रहण कर सकते हैं और परमेश्वर के वचन समझ सकते हैं? यदि तुम लोग वास्तव में खुद को नन्हे बच्चे समझते हो, तो तुममें वास्तव में विवेक है। परमेश्वर के वचन सुनते समय तुम लोगों को खुद को नन्हे बच्चे ही समझना चाहिए; यह मानसिकता सही है। देखो, जब मैं नन्हे बच्चों के लिए अभिप्रेत ये वचन बोलता हूँ, तब क्या तुम लोग इन्हें रोचक पाते हो और इन पर आमीन कहते हो? क्या मेरा इस तरह बोलना तुम लोगों की कठिनाइयाँ हल करता है? क्या यह तुम लोगों की समस्याएँ हल करता है? यदि तुम लोगों की समस्याएँ वास्तव में हल हो जाती हैं, तो लोगों को इन्हीं वचनों की आवश्यकता है, और मेरा इस तरह बोलना वास्तव में पूर्ण रूप से उपयुक्त है। भ्रष्ट मनुष्यों को वास्तव में मेरे इस तरह बोलने की आवश्यकता है—उदाहरण देना, रूपकों का उपयोग करना, और विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से और विभिन्न तरीकों का उपयोग करके बिना थके और बार-बार बोलना। इसके अलावा, मैं ऐसे शब्दों का उपयोग करता हूँ जो उन शब्दों के समान हैं जिनका उपयोग तुम किसी बच्चे के साथ कर सकते हो; ये सबसे सरल और सबसे स्पष्ट शब्द हैं। केवल इस तरह बोलने से ही लोग समझ सकते हैं। लेकिन मैं चाहे कैसे भी बोलूँ, इन सभी वचनों में से एक भी झूठ नहीं है या तुम लोगों को गुमराह करने के लिए नहीं है। वे सभी तुम लोगों को परमेश्वर की हर बात पर विश्वास करने के लिए कहते हैं; तुम्हें परमेश्वर के वचनों पर बिल्कुल भी संदेह नहीं करना चाहिए। जो कोई भी परमेश्वर के वचनों पर संदेह करता है, वह शैतान की चाल में फँस जाता है और खुद को उसके जाल में फँसा हुआ पाता है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर ने कहा, “पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना : क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा” (उत्पत्ति 2:17)। और शैतान ने लोगों को कैसे गुमराह किया? शैतान ने कहा, “जरूरी नहीं कि तुम मरोगे! ...” (उत्पत्ति 3:4)। इसने लोगों को गुमराह कर दिया। क्या मैंने जो कहा है उसमें शैतान के वचन के समान कोई वचन है, या कोई ऐसा वचन जिसके परिणामस्वरूप लोग वैसे ही गुमराह हुए हों जैसे वे शैतान द्वारा हुए थे? क्या मैंने कभी एक भी ऐसी बात कही है जो इस प्रकृति की हो? (नहीं।) एक तरह से, मैंने जो वचन बोले हैं वे तुम लोगों को शैतान के भ्रष्ट स्वभावों को और उन विभिन्न भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों को जानने में मदद करते हैं जो वह लोगों के मन में बैठाता है, जिससे तुम उन्हें जान पाते हो और उनका गहन-विश्लेषण कर पाते हो और फिर उन्हें त्याग पाते हो। दूसरी तरह से, वे तुम लोगों को बताते हैं कि परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण कैसे करना है, परमेश्वर का मार्ग कैसा है, लोगों के लिए परमेश्वर के अपेक्षित सिद्धांत क्या हैं और विभिन्न मामलों में लोगों को किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। मैंने जो कुछ भी कहा है, वह तुम्हें शैतान और बुरी प्रवृत्तियों से दूर रहने, शैतान को अस्वीकार करने, खुद को बुरी प्रवृत्तियों से अलग करने, परमेश्वर के सामने आने, विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों में परमेश्वर के इरादे और सत्य सिद्धांत खोजने, परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने और परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण करने में मदद करने के लिए कहा है। मैंने जो कुछ भी कहा है, वह तुम लोगों को अपने भ्रष्ट स्वभाव त्यागने और फिर ऐसे लोग बनने में मदद करने के लिए कहा है जो परमेश्वर का भय मानते हैं और परमेश्वर की आराधना करते हैं। मैंने कभी ऐसा कुछ नहीं कहा है, जो तुम लोगों को सांसारिक प्रवृत्तियों का पालन करने या दुनिया के विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों को अपनाने के लिए कहता हो। मैंने तुम लोगों को सच्चे मार्ग से विमुख करने या परमेश्वर से विमुख करने वाली एक भी बात नहीं कही है, न ही मैंने कभी तुम लोगों को परमेश्वर की आलोचना करने या परमेश्वर से असंतुष्ट होने के लिए कहा है। बेशक, मेरे वचनों ने देहधारी परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से कभी परमेश्वर का गलत प्रतिनिधित्व तो बिल्कुल नहीं किया है, न ही ऐसी गलत जानकारी दी है जिससे तुम लोग परमेश्वर को गलत समझो या उसके प्रति सतर्क रहो। बल्कि, मैं परमेश्वर के बारे में तुम लोगों के गलत विचार और दृष्टिकोण और परमेश्वर के बारे में तुम्हारी विभिन्न धारणाएँ और कल्पनाएँ हल करने की अपनी पूरी कोशिश करता हूँ, तुम लोगों को उसके सामने लाता हूँ—यहाँ तक कि तुम्हें उसकी ओर धकेलता हूँ—और तुम लोगों को बुरी प्रवृत्तियों से दूर रहने और विभिन्न भ्रामक विचार और दृष्टिकोण छोड़ने में मदद करता हूँ। देखो, विभिन्न भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों का गहन-विश्लेषण करने वाले ये सभी वचन—जिनमें विवाह, परिवार, कार्य, राजनीति, आकांक्षाओं, भविष्य की संभावनाओं, धन, रुतबे, प्रसिद्धि और लाभ, पुरुषों और महिलाओं के बीच संबंधों, साथ ही इस दुनिया में विभिन्न लोगों द्वारा अपनाए गए मार्गों, लोगों को विभिन्न भावनाओं का भेद कैसे पहचानना चाहिए, भावनाओं को कैसे लेना चाहिए, आदि पर मेरी संगति शामिल है—ये सभी तुम लोगों को सही और सकारात्मक विचार और दृष्टिकोण और सत्य प्रदान करते हैं। ये सभी वचन सत्य हैं। केवल सत्य स्वीकार करके ही मनुष्य विभिन्न भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों का भेद पहचानने, इस दुनिया के अंधकार और बुराई का भेद पहचानने, इस दुनिया को स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम होने और शैतान को अस्वीकार करने के लिए विभिन्न परिप्रेक्ष्यों का उपयोग कर सकता है; केवल सत्य स्वीकार करके ही वह वे सही विचार और दृष्टिकोण रख सकता है जो सत्य के अनुरूप हों जैसी कि परमेश्वर उससे अपेक्षा करता है, उज्ज्वल और सही मार्ग पर चल सकता है, और परमेश्वर के सामने आकर उसके प्रति समर्पण कर सकता है और उसकी आराधना कर सकता है। इसके अतिरिक्त, यदि मेरे ये वचन बोलने के पीछे कोई इरादा है, तो वह केवल एक ही है, जो कि तुम लोगों को सत्य समझने, अपनी दैहिक संभावनाओं और हितों और देह की विभिन्न अन्य चीजों को छोड़ने में सक्षम होने और फिर सत्य का अनुसरण करने में मदद करने के लिए हर संभव प्रयास करना है। वह लोगों को सत्य से जुड़े विभिन्न विषयों के बारे में बताने के लिए सभी प्रकार के विभिन्न तरीकों का उपयोग करना भी है, ताकि तुम लोग सत्य में रुचि लेने लगो। विशेष रूप से, मैं तुम लोगों की रुचि जगाने के लिए और तुम्हें सुनने का इच्छुक बनाने में मदद करने के लिए कुछ अपेक्षाकृत हास्य-विनोदपूर्ण तरीकों का उपयोग करता हूँ, ताकि तुम लोग इसे आत्मसात कर सको और फिर इसके भीतर बोला गया सत्य समझ सको। मैं तुम लोगों को आकर्षित करने और तुम लोगों को सुनने का इच्छुक बनाने में मदद करने के लिए किसी हास्यपूर्ण या रोचक कहानी का उपयोग कर सकता हूँ। इस तरह, इसे सुनने के बाद, कहानी याद रखने के अलावा, वास्तविक जीवन में किसी ऐसे ही मामले का सामना करने पर तुम लोग इसे याद भी कर पाओगे और इस मुद्दे से जुड़े सत्य भी खोज पाओगे। जैसे ही तुम खोजोगे, वैसे ही तुम पवित्र आत्मा का प्रबोधन प्राप्त करोगे और जानोगे कि इसके भीतर सत्य सिद्धांत क्या हैं, परमेश्वर के इरादे क्या हैं और लोगों को किन सत्यों का अभ्यास करना चाहिए। अर्थात्, मैं यह प्रयास करता हूँ कि जब तुम विभिन्न मामलों का सामना करो, तब तुम अब और दिग्भ्रमित न रहो, अब और तुम्हारे हाथ बँधे न रहें, और तुम अब और उलझन या दर्द में न रहो, बल्कि तुम्हारे पास एक व्यावहारिक मार्ग हो, और, इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम अब और पहले की तरह शैतान के विचारों और भ्रष्ट स्वभावों द्वारा नियंत्रित न रहो, अब और शैतान के भ्रष्ट स्वभावों को अपना जीवन न समझो, और विभिन्न मामले सँभालने के लिए शैतान द्वारा तुम्हारे भीतर बैठाए गए विचारों और दृष्टिकोणों का उपयोग न करो, बल्कि उन्हें परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों से बदल दो। देखो, मैं जो कुछ भी कहता हूँ उसमें चाहे मैं किसी भी तरीके का उपयोग करूँ, चाहे वह ऐसा हो जो तुम्हारी रुचि जगा सके या ऐसा हो जो तुम्हें आकर्षित करने में सक्षम हो, मैं तुम्हें सत्य समझने में मदद करने का प्रयास करता हूँ—यही मेरा अंतिम उद्देश्य है। भले ही मैं कभी-कभी कोई चुटकुला सुनाता हूँ या कोई किस्सा साझा करता हूँ, यह तुम लोगों के दिल शांत करने में मदद करने और तुम्हें स्थिर बैठने में सक्षम बनाने में मदद करने के लिए होता है; इस तरह तुम लोग सत्य सुनना चाहोगे और तुम्हारे पास सत्य स्वीकार करने का अवसर होगा। जहाँ तक उद्देश्यों की बात है, तो केवल यही एक उद्देश्य है। विशेष रूप से, कुछ ऐसे युवा लोगों के साथ जिन्होंने केवल थोड़े समय से परमेश्वर में विश्वास किया है और जिनका अनुभव कम है—लोगों का यह समूह जो अभी भी इस दुनिया के बारे में अपेक्षाओं और जिज्ञासा से भरा है—इन नए विश्वासियों को सच्चे मार्ग में नींव रखने में मदद करने के लिए मैंने कई वचन बोले हैं और बहुत कार्य किया है। सभी आयु-समूहों के अनुयायियों, सभी प्रकार की परिस्थितियों में अनुयायियों और सभी नस्लों के अनुयायियों के साथ मेरे बोलने के पीछे एकमात्र उद्देश्य और इरादा उन्हें परमेश्वर का अनुसरण करते हुए सत्य प्राप्त करने, सत्य सिद्धांतों और परमेश्वर के इरादों को समझने, परमेश्वर का अनुसरण करने और सही मार्ग पर चलने में सक्षम होने, अब और सांसारिक प्रवृत्तियों के पीछे न भागने, अब और शैतान के भ्रष्ट स्वभावों द्वारा नियंत्रित न होने और अब और शैतान की भ्रष्टता स्वीकार न करते रहने, बल्कि इसके बजाय सच्चे परमेश्वर की आराधना करने, सृष्टिकर्ता की आराधना करने, और सृष्टिकर्ता की आराधना करने के लिए सृजित प्राणियों के रूप में अपनी मूल स्थिति में लौटने में मदद करना है—मेरा केवल यही उद्देश्य है। इस एकमात्र उद्देश्य के संबंध में, अगर मैं कभी-कभी बोलते समय विशेष तरीकों का उपयोग करता हूँ और विशेष विषयों को शामिल करता हूँ, और अगर मैं कुछ ऐसे वचन कहता हूँ जो कुछ हद तक गूढ़ होते हैं और समझने में बहुत आसान नहीं होते, तो भी, स्थिति चाहे जो भी हो, मेरा उद्देश्य कभी भी प्रलोभन देना नहीं होता। मेरा केवल एक ही उद्देश्य है, जो तुम लोगों को पोषण और मार्गदर्शन प्रदान करना है, और यह पोषण और मार्गदर्शन एक प्रकार का धैर्यपूर्ण अनुदेशन है। एक अपूर्ण सादृश्य का उपयोग करें तो, तुम लोगों को पोषण और मार्गदर्शन प्रदान करना ग्रीनहाउस में फूलों की देखभाल करने जैसा है। मैं जरा-सा भी लापरवाह होने की हिम्मत नहीं करूँगा। वह बहुत गर्म या बहुत ठंडा नहीं हो सकता। जब मौसम अच्छा होता है, तब मुझे फूलों को कुछ धूप लगने देनी होती है, और मुझे हर समय तापमान पर नजर रखनी होती है। यदि वह बहुत गर्म हो, तो फूल सूख जाएँगे और मर जाएँगे; यदि तापमान अचानक गिर जाए और वह बहुत ठंडा हो जाए, तो छोटे फूल ठंड से मर जाएँगे। तुम लोगों के आध्यात्मिक कद बस ऐसे ही नाजुक हैं। नाजुक होने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि तुम बहुत अपरिपक्व हो और तुम्हारा कोई आध्यात्मिक कद नहीं है। कोई आध्यात्मिक कद न होने की वास्तविक अभिव्यक्ति क्या है? वह यह है कि जब अधिकांश लोग वास्तविक जीवन में चीजों का सामना करते हैं तो उनका व्यावहारिक रूप से कोई जीवन प्रवेश नहीं होता। बिना किसी जीवन प्रवेश के व्यक्ति का आध्यात्मिक कद कैसे हो सकता है? आध्यात्मिक कद धीरे-धीरे जीवन प्रवेश के निर्माण के आधार पर समय के साथ संचित और एकत्र होता है। इसलिए, जब मैं तुम लोगों से बात करता हूँ, तो मुझे विभिन्न कोणों से, विभिन्न दृष्टिकोणों से, विभिन्न तरीकों और उदाहरणों का उपयोग करके विभिन्न विषयों पर बिना थके तुम्हें पोषण और मार्गदर्शन प्रदान करना चाहिए—इसे ही धैर्यपूर्ण मार्गदर्शन देना कहा जाता है। यह अनुदेशन प्रलोभन नहीं है—यह मार्गदर्शन और पोषण प्रदान करना है; यह एक प्रकार की अगुआई है। इस प्रकार की अगुआई का कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं होता, न ही यह किन्हीं अनुचित इरादों से प्रेरित होती है। मेरे द्वारा बोले गए वचनों की जाँच करो : चाहे वह इरादे के संदर्भ में हो, या मेरे बोलने के तरीके, मेरे द्वारा शामिल किए जाने वाले विषयों या मेरे बोलने के रूप के संदर्भ में—और चाहे तुम लोग उपदेशों की ऑडियो रिकॉर्डिंग सुन रहे हो या पाठ पढ़ रहे हो—क्या मैं उन तरीकों में से किसी का उपयोग करता हूँ जिनका उपयोग शैतान लोगों को प्रलोभन देने के लिए करता है? (नहीं।) मैंने जो कुछ भी कहा है, उसे ध्यान से देखो। प्रत्येक गद्यांश में, लंबाई चाहे जो भी हो, जिस पर संगति की जाती है वह सत्य का एक पहलू होता है; यह सब सत्य से संबंधित है। चूँकि यह सब सत्य से संबंधित है, इसलिए यह सब तुम लोगों के लिए पोषण है, यह वह है जिसकी तुम लोगों को आवश्यकता है, यह उस जीवन से संबंधित है जिसे तुम लोग प्राप्त करने वाले हो, और यह तुम लोगों के भविष्य और मंज़िल से संबंधित है। इसलिए, अपनी ओर से, मैं निश्चित रूप से जरा-सा भी लापरवाह नहीं हूँ। यदि तुम लोग स्वयं कभी परमेश्वर के वचनों को गंभीरता से नहीं लेते, तो केवल यही कहा जा सकता है कि तुम लोग मूर्ख हो। मैं क्यों कहता हूँ कि तुम लोग मूर्ख हो? क्योंकि तुम लोगों का आध्यात्मिक कद इतना अपरिपक्व है कि सत्य तुम्हारी समझ से परे है, और तुम्हारी समझ में भटकाव हैं और वह बहुत हद तक एक बच्चे की समझ जैसी है। इसलिए, तुम लोगों के साथ तीन साल के बच्चों जैसा व्यवहार किया जाना बिल्कुल भी ज्यादती नहीं है। यह तुम लोगों का अनादर करना या तुम लोगों को नीचा दिखाना नहीं है; बल्कि बात यह है कि तुम लोगों का वास्तविक आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है और तुममें भेद पहचानने की क्षमता बिल्कुल भी नहीं है। क्या ये वचन सटीक हैं? (हाँ।)

क्या तुम लोग उस विषय के बारे में थोड़ा और समझते हो जिस पर हमने अभी संगति की है—कैसे देहधारी परमेश्वर लोगों को प्रलोभन नहीं देता? (हाँ।) मैंने जिन बातों पर संगति की, उन पर मूल रूप से इस बात को ध्यान में रखकर चर्चा की गई है कि देहधारी परमेश्वर कैसे बोलता और कार्य करता है—यानी, उन पर इस बात से जुड़े तथ्यों को ध्यान में रखकर कि परमेश्वर कैसे बोलता और कार्य करता है, और परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों को ध्यान में रखकर चर्चा की गई हैं। यह लोगों को यह देखने देता है कि परमेश्वर की वाणी, परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के सार में लोगों को प्रलोभन देने का ऐसा कोई तत्त्व नहीं है जो भ्रष्ट मनुष्यों या शैतान और दानवों में पाया जाता है, और न ही ऐसी कोई मंशा है। तो फिर तुम लोग देहधारी परमेश्वर, साधारण रूप-रंग वाले इस व्यक्ति के बारे में कितना जानते हो? और वे कौन-से तथ्य हैं, जो यह साबित कर सकते हैं कि देहधारी परमेश्वर की मानवता और उसका दिव्य सार एक हैं, कि उनमें आपस में कोई विरोध या टकराव नहीं है, कि वे एक-दूसरे के अनुकूल हैं, और कि इसी तरह देहधारी परमेश्वर शैतान या भ्रष्ट मानवजाति में पाई जाने वाली अभिव्यक्तियों के समान लोगों को प्रलोभन देने की कोई अभिव्यक्ति नहीं दिखाता? तुम लोग इस पहलू के बारे में कितना जानते हो? या, देहधारी परमेश्वर की किन अभिव्यक्तियों और प्रकाशनों ने तुम लोगों को यह पहचानने दिया है? यह ऐसी बात हो सकती है जिसे अधिकांश लोग अभी तक नहीं समझते, है ना? चूँकि ऐसा है, इसलिए मुझे इसे तुम लोगों के सामने विस्तार से प्रस्तुत करना होगा; मुझे इस तरह से चीजें प्रस्तुत करना हमेशा परेशानी भरा लगता है। दरअसल, तुम लोगों के साथ मिलने-जुलने और जुड़ने में, चाहे वह ऑनलाइन हो या वास्तविक जीवन में, यदि तुम लोग ध्यान दो और इस संबंध में देहधारी परमेश्वर की अभिव्यक्तियों और प्रकाशनों को गहराई से समझो, तो तुम उन्हें खोज सकते हो। लेकिन तुम लोग ध्यान नहीं देते, और इसके अलावा तुम लोगों को लगता है कि यह कोई महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है। तुममें से कोई भी इस मामले पर ध्यान नहीं देता, इसलिए तुम उन्हें खोज नहीं पाते। चाहे तुम लोगों ने ध्यान दिया हो या नहीं, चूँकि इस पहलू में परमेश्वर को जानने से संबंधित सत्य शामिल है, इसलिए हमें इस पर संगति करनी होगी। प्रलोभन न देने के पहलू पर संगति करते समय, इसे देहधारी परमेश्वर के लोगों के साथ बातचीत करने के तरीके से देखते हुए, जो पहली बात तुम्हें समझनी चाहिए वह यह है कि जब मैं तुम लोगों से बात करता हूँ या मामले सँभालता हूँ, तब मैं तुम्हें बहला-फुसलाकर तुम्हारे अंदर से जानकारी निकालने की कोशिश नहीं करता। बातचीत बस बातचीत होती है; मैं सीधे मुद्दे पर आता हूँ, मैं सीधी बात करता हूँ, और वही कहता हूँ जो मेरे मन में होता है। अगर कभी-कभी, तुम्हारी कमजोरी का लिहाज करते हुए या तुम्हारे अपरिपक्व आध्यात्मिक कद के कारण तुम्हारे अहं को ठेस न पहुँचाने के लिए, मैं तुमसे बात करने के लिए कुछ बुद्धिमत्तापूर्ण तरीके अपनाता हूँ, तो भी मैं तुम्हें बहला-फुसलाकर तुम्हारे अंदर से जानकारी निकालने की कोशिश नहीं करता, और न ही मैं तुम्हें कुछ कहने के लिए प्रलोभन देता हूँ। यदि तुम बोलना चाहते हो, तो बोलो; यदि तुम किसी चीज के बारे में नहीं बोलना चाहते, तो मैं तुमसे उसके बारे में पूछने की कोशिश नहीं करूँगा। मैं तुम्हें बहला-फुसलाकर तुम्हारे अंदर से जानकारी निकालने की कोशिश नहीं करूँगा। यदि मैं यह समझना चाहूँगा कि कुछ लोगों के साथ क्या चल रहा है, तो मैं उनके बारे में सीधे पूछूँगा : “तुम लोगों का कलीसिया-अगुआ कैसा है? तुम्हारे साथ सहयोग करने वाली बहन कितने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करती है? क्या परमेश्वर में उसके विश्वास की कोई नींव है? क्या तुम्हें लगता है कि वह ऐसी व्यक्ति है जो सत्य का अनुसरण करती है? क्या तुम लोगों को एक-साथ सहयोग करने में कोई समस्या आई है?” इन प्रश्नों को सुनो—क्या ये लोगों को बहला-फुसलाकर उनके अंदर से जानकारी निकालने की प्रकृति के हैं? (नहीं।) यदि तुम कुछ नहीं कहना चाहते, तो मैं तुम्हें कहने के लिए मजबूर नहीं करूँगा। मैं तुम्हें प्रलोभन देने के लिए किन्हीं चालों या साजिशों का सहारा नहीं लूँगा, और न ही मैं तुम्हारे दिल की बातें बाहर निकालने के लिए हर संभव कोशिश करूँगा। मेरा ऐसा कोई शौक नहीं है, मुझे ऐसा करने में कोई दिलचस्पी नहीं है, और मैं ऐसा कभी नहीं करूँगा। यदि तुम बिना कुछ छोड़े बोलना चाहते हो—चाहे तुम जो कहते हो वह अपेक्षाकृत वस्तुनिष्ठ हो या उसमें व्यक्तिगत पूर्वाग्रह शामिल हो, तो तुम उसे जैसे चाहो वैसे कह सकते हो—तुम्हारी बात सुनने के बाद मैं एक विशिष्ट विश्लेषण करूँगा। लेकिन अपने परिप्रेक्ष्य से, मैं तुमसे बहुत स्पष्ट रूप से बात करता हूँ। मैं जो कुछ भी कहता हूँ उसका शाब्दिक अर्थ बिल्कुल वही होता है जो मैं संप्रेषित करना चाहता हूँ। यदि मैं किसी चीज के बारे में जानना चाहता हूँ, तो मैं उसके बारे में सीधे पूछता हूँ। यदि तुम हमेशा घुमा-फिराकर बातें करते हो और सीधे नहीं बोलते, मेरे साथ शब्दों के खेल या दिमागी खेल खेलने की कोशिश करते हो, तो मैं बस तुमसे बातचीत नहीं करूँगा। मुझे शब्दों के खेल खेलना पसंद नहीं है, और मैं चालबाजी का सहारा भी नहीं लेता; मैं जानकारी निकालने के लिए कभी हर संभव कोशिश नहीं करूँगा। मान लो मैं किसी की स्थिति के बारे में जानना चाहता हूँ, जैसे कि वह कितने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करता है, क्या वह सच में परमेश्वर में विश्वास करता है, सत्य के बारे में उसकी समझ कैसी है, क्या वह पूर्णकालिक रूप से अपना कर्तव्य निभाता है, या क्या उसे विकसित करने का प्रयास करना उचित होगा—यदि कार्य की खातिर मुझे ये बातें जानने की आवश्यकता हो, तो मैं सीधे पूछ लूँगा। लेकिन जहाँ तक उनके निजी मामलों के सटीक विवरण की या वे अपने निजी जीवन में पर्दे के पीछे क्या करते हैं, इसकी बात है, तो मैं ऐसी चीजों के बारे में नहीं पूछता। मैं जिसके बारे में जानना चाहता हूँ, वह है तुम्हारा अनुसरण, सत्य और अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा रवैया, और, यदि तुम्हें अगुआ के रूप में चुना जाता है, तो तुम्हारा संकल्प, बोझ और मानवता कैसी है, साथ ही तुम्हारी आस्था कितनी बड़ी है—ये वे चीजें हैं, जिनके बारे में मैं जानना चाहता हूँ। जहाँ तक तुम्हारे निजी मामलों का संबंध है, जैसे कि तुम महीने में कितना पैसा कमाते हो, तुमने कौन-से घिनौने काम किए हैं, तुमने विपरीत लिंग के किन सदस्यों के साथ इश्कबाजी की है, या तुमने किसे धोखा दिया है या ठगा है, मैं वास्तव में ये चीजें नहीं जानना चाहता, और मैं कभी इनके बारे में नहीं पूछता। कुछ लोग मुझे बताते हैं कि उन्होंने कभी विपरीत लिंग से जुड़े अपराध किए थे। मैं कहता हूँ : “मुझे ऐसी चीजों के बारे में मत बताओ। एकांत में जाकर परमेश्वर से प्रार्थना करो। यदि परमेश्वर तुम्हें क्षमा कर देता है, तो तुम्हारा हृदय द्रवित हो जाएगा। यदि परमेश्वर तुम्हें क्षमा नहीं करता, तो प्रार्थना करना जारी रखो। मुझे मत बताओ; मैं ये चीजें नहीं सुनना चाहता।” जब मैं तुम लोगों से मिलता हूँ, तो मैं मुख्य रूप से परमेश्वर में विश्वास के मामलों, कलीसिया के कार्य, जीवन प्रवेश या तुम्हारी व्यक्तिगत अवस्था से जुड़े उन मुद्दों के बारे में बात करता हूँ जिनके बारे में तुम पूछते हो। ज्यादातर यही चीजें होती हैं, और कभी-कभी मैं दुनिया भर के मुद्दों के बारे में भी थोड़ी बात करता हूँ। हम चाहे किसी भी विषय पर चर्चा करें, मैं केवल विचाराधीन विषय पर ही अपने व्यक्तिगत विचार और मत व्यक्त करता हूँ; तुम जो चाहो वह सोचने और कहने के लिए स्वतंत्र हो। तुम जो कहना चाहते हो वह कह सकते हो, और तुम जितना कहना चाहते हो उतना कह सकते हो। यदि तुम्हें लगता है कि मुझसे सावधान रहने की कोई आवश्यकता नहीं है, तो तुम जो कहना चाहो वह कह सकते हो। यदि तुम अपने हृदय में मुझसे सावधान और आशंकित हो, डरते हो कि मैं तुम्हारे अतीत के बारे में पता लगा लूँगा या तुम्हारे रहस्य प्रकट कर दूँगा, और तुम बहुत अधिक नहीं कहना चाहते, तो मैं तुम्हारे साथ जबरदस्ती नहीं करूँगा; मैं तुम्हें स्वतंत्रता देता हूँ। लोगों के साथ मिलने-जुलने के संबंध में मेरा यही सिद्धांत है। सिर्फ इसलिए कि तुम चीजें अपने तक ही रखते हो, मैं तुम्हारे बारे में गुप्त रूप से चीजें जानने के लिए किसी को ढूँढ़ने की हर संभव कोशिश कभी नहीं करूँगा, न ही मैं सीधे तुम्हें बहला-फुसलाकर तुम्हारे अंदर से जानकारी निकालने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करूँगा, जिससे तुम खुद उन्हें कह दो। मैं ऐसे काम नहीं करता। मैं कभी किसी से सक्रिय रूप से चीजें मुझ पर प्रकट करने के लिए नहीं कहता। तुम्हें मुझ पर कुछ भी प्रकट करने की आवश्यकता नहीं है; मेरी तुमसे ऐसी कोई अपेक्षा नहीं है। अगर तुम बिना कोई विवरण छोड़े मुझ पर चीजें प्रकट कर भी दो, तो भी एक चीज है जिससे तुम बच नहीं सकते : तुम्हें सत्य का अनुसरण करना होगा। ऐसा नहीं है कि मेरे सामने सच कबूल कर लेने से तुम एक ईमानदार व्यक्ति बन जाते हो, तुम्हें अब और सत्य का अनुसरण करने की आवश्यकता नहीं रहती, और तुम ताड़ना और न्याय से बच सकते हो। बल्कि, तुम चाहे जो भी करो, मैं तुम्हारे साथ अपने तरीके से वैसा ही व्यवहार करूँगा जैसा तुम्हारे साथ किया जाना चाहिए। लेकिन यदि हमारे बीच कोई बातचीत या किसी भी तरह का वैचारिक आदान-प्रदान होता है, और तुम मुझसे चीजें छिपाना चाहते हो, मेरे साथ दिमागी खेल खेलना चाहते हो, शब्दों के खेल खेलना चाहते हो, या मेरे साथ चूहे-बिल्ली का खेल खेलना चाहते हो, तो मैं तुम्हें बहला-फुसलाकर तुम्हारे अंदर से जानकारी निकालने, तुम्हें कुछ कहने के लिए प्रलोभन देने, या तुमसे कुछ भी उगलवाने के लिए किसी तरीके या साधन का उपयोग बिल्कुल नहीं करूँगा। क्या तुम समझते हो? (हाँ।)

परमेश्वर द्वारा लोगों को बहला-फुसलाकर उनके अंदर से जानकारी न निकालने के इस पहलू के संबंध में, एक चीज है जिस पर तुम लोगों को स्पष्ट होना चाहिए। मानवजाति के बारे में परमेश्वर की समझ कुछ विशिष्ट प्रकाशनों, उसके जीवनयापन करने, या वास्तविक जीवन में उसके जीने के तरीकों पर आधारित नहीं है, न ही यह लोगों द्वारा कुछ चीजें करने पर आधारित है। तो मानवजाति के बारे में परमेश्वर की समझ और उसे समझने के बाद वह उसके प्रति जो रवैया अपनाता है वह किस पर आधारित हैं? वे शैतान के प्रकृति सार के बारे में परमेश्वर की समझ पर आधारित हैं। इसलिए, मानवजाति के बारे में परमेश्वर की समझ यह है कि वह समझता है कि उसमें भ्रष्ट स्वभाव हैं, वह उसके भ्रष्ट सार को समझता है और वह समझता है कि वह शैतान द्वारा कैसे भ्रष्ट की जाती और मूर्ख बनाई जाती है, साथ ही शैतान उसमें कौन-से भ्रामक विचार और दृष्टिकोण भरता है और यह समझ पर्याप्त है। यह तुम्हारा न्याय करने और तुम्हें ताड़ना देने के लिए पर्याप्त है, और तुम्हारा उद्धार करने के लिए तुम्हें सत्य और जीवन की आपूर्ति करने के लिए पर्याप्त आधार हैं। इसलिए, ऐसा मत सोचो कि जब तुम मुझसे मिलते-जुलते या बातचीत करते हो तो तुम्हें मेरे सामने चीजें प्रकट करनी ही होंगी। कुछ लोग कहते हैं, “क्या तुमने यह नहीं कहा था कि तुम्हारे साथ मिलने-जुलने में हमें पहले खुला और ईमानदार होना चाहिए?” खुला और ईमानदार होना एक रवैया है; यह चीजें प्रकट करने के बराबर नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि, चूँकि तुम एक भ्रष्ट मानव और पापी हो, इसलिए तुम्हें मेरे सामने हर चीज प्रकट करनी होगी और मुझे सब कुछ स्पष्ट रूप से समझाना होगा। यह अनावश्यक है; मुझे ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है, तुम्हारे प्रति मेरा रवैया ऐसा नहीं है। यदि तुम सोचते हो कि मेरे साथ खुले और ईमानदार होने का मतलब है कि तुम्हें मेरे सामने हर चीज प्रकट करनी होगी तो यह गलत है; यह तुम्हारी गलतफहमी है। क्या तुम समझते हो? (हाँ।) इसलिए, अगर ऐसी कई चीजें और कई शब्द हैं भी, जिन्हें मेरे मुँह पर कहना कठिन है या जिन्हें तुम कहने के इच्छुक नहीं हो तो भी इसका मतलब यह नहीं कि तुम खुले और ईमानदार नहीं बन रहे हो; यह बस इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्हारी मानसिकता क्या है। यदि ऐसी चीजें हैं जिन्हें कहने में तुम सहज नहीं हो, या आसपास बहुत सारे लोग होने पर तुम उन्हें कहने के इच्छुक नहीं हो, तो तुम्हें उन्हें कहने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हें बिल्कुल भी यह नहीं मान लेना चाहिए कि मैं वास्तव में तुम्हारी पृष्ठभूमि जानना चाहता हूँ या वास्तव में तुम्हारे रहस्य जानना चाहता हूँ। तुम्हें बिल्कुल भी गलत नहीं समझना चाहिए—मैं ये चीजें बिल्कुल नहीं जानना चाहता। मैं यह नहीं जानना चाहता कि तुम अतीत में कैसे थे, न ही मैं यह जानना चाहता हूँ कि तुम भविष्य में कैसे होगे; मुझे सरोकार सिर्फ इस बात से है कि तुम अब कैसे हो। क्या तुम अब ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अनुसरण करता है, अब तुम कितना सत्य समझते हो, क्या तुम्हारा हर रोज जीवन प्रवेश होता है, क्या तुमने उन सत्यों में प्रवेश किया है जिनमें वास्तविक जीवन में प्रवेश करने की आवश्यकता है—जैसे कि एक ईमानदार व्यक्ति होना, अपना कर्तव्य निष्ठापूर्वक निभाना, परमेश्वर के प्रति समर्पण करना और सभी चीजों में सत्य सिद्धांतों की तलाश करना—केवल यही वे चीजें हैं जिनसे मुझे सरोकार है। इसलिए, तुम लोगों को अपने दिलों में मेरे बारे में बिल्कुल भी कोई शंका नहीं रखनी चाहिए, न ही तुम्हें यह कहते हुए चिंता करने की आवश्यकता है कि “एक ईमानदार व्यक्ति होने के लिए क्या मुझे तुम्हें हर चीज स्पष्ट रूप से बतानी होगी और हर चीज से तुम्हें अवगत कराना होगा? यदि मैं कुछ नहीं कहता तो क्या तुम बहला-फुसलाकर मेरे अंदर से जानकारी निकालने और मुझे बोलने का प्रलोभन देने के लिए हर संभव कोशिश करोगे?” इस पर मेरा जवाब है, नहीं। जब हम गपशप करते हैं, बातचीत करते हैं, मामले सँभालते हैं और मिलते-जुलते हैं तो हमारे लिए यही पर्याप्त है कि हम एक खुले और ईमानदार रवैये और मानसिकता के साथ एक-दूसरे के पास आएँ, किसी को भी बहला-फुसलाकर उसके अंदर से जानकारी निकालने की कोशिश न करें। लोगों को बहला-फुसलाकर उनके अंदर से जानकारी निकालना भ्रष्ट मनुष्यों के बीच मिलने-जुलने में इस्तेमाल की जाने वाली एक आम चाल है और यह चीजों को सँभालने का ऐसा तरीका है जिसका वे आदतन सहारा लेते हैं। कुछ लोग दूसरों के निजी मामलों में या दूसरे पर्दे के पीछे क्या करते हैं, इसमें बहुत दिलचस्पी लेते हैं, खासकर जब बात यह आती है कि दूसरे उन्हें कैसे देखते हैं और उनका मूल्यांकन कैसे करते हैं, दूसरे उन्हें उच्च मानते हैं या तुच्छ, कुलीन मानते हैं या नीच, इत्यादि। इसलिए, वे अक्सर इन चीजों के बारे में पता लगाने के लिए दूसरों को बहला-फुसलाकर उनके अंदर से जानकारी निकालने के तरीके का उपयोग करते हैं। तुम लोगों को सच बताऊँ, मुझे इन चीजों में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं है। मुझे कोई ऐसा साधारण व्यक्ति मत समझो, जिससे तुम लोग मिलते-जुलते हो। मैंने कभी इस बात की परवाह नहीं की है कि तुम लोगों के दिलों में मेरा रुतबा है या नहीं—तुम मुझे कुलीन समझो या नीच, उच्च समझो या तुच्छ, मैं इन चीजों की परवाह नहीं करता। इसलिए, जब तुम लोग मुझसे बातचीत करते और मिलते-जुलते हो तो ऐसी शंकाएँ मत पालो। जब भ्रष्ट मनुष्य किसी के साथ बातचीत करते हैं तो वे हमेशा यही सोचते रहते हैं, “दूसरों के दिलों में वास्तव में मेरा क्या रुतबा है? मेरे बारे में उनकी राय वास्तव में अच्छी है या बुरी?” कुछ लोग हमेशा यह भी विचार करते रहते हैं, “उनके साथ मिलने-जुलने से मुझे क्या लाभ मिल सकता है? मुझे क्या फायदा प्राप्त हो सकता है? मैं इस समूह में कौन-सा स्थान प्राप्त कर सकता हूँ? क्या दूसरे लोग मेरा आदर करेंगे?” लोग हमेशा इन चीजों के बारे में सोचते रहते हैं और इनकी परवाह करते हैं। मैं ये प्रश्न कभी नहीं पूछता और मैं दूसरे लोगों के मामलों के बारे में पता लगाने की कोशिश नहीं करता। लोग हमेशा इन चीजों के बारे में पूछताछ करना पसंद करते हैं। यह शैतानी भ्रष्ट स्वभावों का एक स्वाभाविक प्रकाशन है और यह भ्रष्ट मनुष्यों का एक सामान्य लक्षण भी है। एक ओर, लोग विशेष रूप से दूसरों के निजी मामलों में पूछताछ करना पसंद करते हैं और उनमें बहुत रुचि रखते हैं; दूसरी ओर, वे विशेष रूप से यह जानना चाहते हैं कि दूसरों के दिलों में उनका स्थान और मूल्य क्या है। विशेष रूप से, कुछ अगुआ और कार्यकर्ता, या वे लोग जिनके पास कुछ गुण और प्रतिभाएँ हैं और कलीसिया में थोड़ी प्रतिष्ठा है, दूसरों के दिलों में अपने रुतबे और समूह के भीतर अपने दर्जे पर बहुत ध्यान देते हैं; अधिकांश लोग इसकी बहुत परवाह करते हैं। कभी-कभी वे दूसरों से विशेष प्रश्न पूछते हैं—उनकी मंशा और उद्देश्य समस्याएँ हल करना नहीं होता, बल्कि यह पता लगाना होता है कि क्या दूसरे उनका आदर और उनकी आराधना करते हैं। यह दर्शाता है कि उन्हें इसकी बहुत परवाह है कि अन्य लोगों के दिलों में उनका क्या स्थान है। इन चीजों को जानने का क्या उपयोग है? अगर दूसरे लोग तुम्हारा आदर करते हैं, तो क्या हुआ? क्या यह सत्य के तुम्हारे अनुसरण की जगह ले सकता है? यदि दूसरे तुम्हें तुच्छ समझते हैं तो क्या तुम नकारात्मक हो जाओगे और परमेश्वर में विश्वास करना छोड़ दोगे? दूसरों के तुम्हारा आदर करने का क्या प्रभाव हो सकता है? क्या यह तुम्हें प्रेरित या प्रोत्साहित कर सकता है? इसका बिल्कुल भी कोई प्रभाव नहीं होता। कुछ बुरे लोग भी होते हैं जो हमेशा दूसरों के बारे में जानकारी निकालते रहते हैं, यह पूछताछ करते रहते हैं कि दूसरे उनके पीठ पीछे उनके बारे में क्या कहते हैं और उनके बारे में उनके क्या विचार हैं, ताकि यह पता लग जाए कि कौन उनका सबसे अधिक विरोध करता है और उनका दुश्मन है और वे दूसरों को बहला-फुसलाकर उनसे सच निकालने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग भी करते हैं। कुछ लोग उनके प्रलोभन का सामना नहीं कर पाते और अंततः सच प्रकट कर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप वे उनकी साजिशों का शिकार हो जाते हैं। फिर बुरे लोग उन पर प्रहार करने और उनसे बदला लेने की हर संभव कोशिश करते हैं, उन्हें हर तरह के परिदृश्यों में दबाते और अलग-थलग कर देते हैं, उन्हें इतना दबाते हैं कि उनका दम घुटने लगता है, उन्हें इतनी तकलीफ देते हैं कि वे मरने की कामना करते हैं, मानो उन पर कोई बड़ी आपदा आ गई हो। यहाँ तक कि जब वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, तब भी वे परमेश्वर का मार्गदर्शन महसूस नहीं कर पाते; उनकी मदद करने वाला कोई नहीं होता और वे बुरे लोगों द्वारा बेबस कर दिए जाते हैं। अंततः, वे अपनी आस्था खो देते हैं। वे सोचते हैं कि परमेश्वर का विश्वासी होने पर भी उन्हें बुरे लोगों का सामना करना पड़ सकता है और वे उनके द्वारा सताए और प्रताड़ित किए जा सकते हैं; उन्हें लगता है कि परमेश्वर में विश्वास करना बहुत कठिन है और वे अब और विश्वास नहीं करना चाहते। इन बुरे लोगों से छुटकारा पाना आसान नहीं है। किसी बुरे व्यक्ति को नाराज करना बिच्छू द्वारा डसे जाने जैसा है; तुम उनसे पीछा नहीं छुड़ा सकते या उनसे दूर नहीं जा सकते और तुममें खुद उनसे लड़ने की आस्था नहीं होती, इसलिए अंततः तुम उनके द्वारा प्रताड़ित किए जाते हो। इस भ्रष्ट मानवजाति में—चाहे वे दानव हों जो शैतान के हैं या भ्रष्ट स्वभावों वाले मानव हों—यह प्रवृत्ति और यह सार दोनों है। चूँकि मनुष्यों में भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, इसलिए हर किसी में अलग-अलग स्तरों पर यह समस्या होती है; वे सभी अपनी प्रतिष्ठा, रुतबे और हितों के लिए अन्य लोगों को बहला-फुसलाकर उनके अंदर से जानकारी निकालने की कोशिश करते हैं, यहाँ तक कि लोगों को प्रताड़ित करने के लिए उन्हें पकड़ भी सकते हैं। देखो, चीन जनवादी गणराज्य की स्थापना के शुरुआती दिनों में, जब कम्युनिस्ट पार्टी दक्षिणपंथियों को प्रताड़ित करना चाहती थी, तब उसने लोगों से कहा, “राष्ट्रीय विकास के लिए प्रतिभावान लोगों की आवश्यकता है। यदि तुम लोगों की पार्टी के बारे में कोई राय है या राष्ट्रीय विकास के बारे में कोई शानदार विचार है तो तुम लोगों को खुलकर बोलना चाहिए। बोलने वाले को दोषी नहीं ठहराया जाएगा, बल्कि उसकी बातों पर चेतावनी की तरह ध्यान दिया जाएगा। तुम सभी को अपनी सलाह देनी चाहिए!” परिणामस्वरूप, कुछ लोगों ने यह सुना और कहा, “ओह, देश खंडहर हो चुका है और पुनर्निर्माण की प्रतीक्षा कर रहा है; इसे हमारे जैसे प्रतिभावान लोगों की आवश्यकता है। चूँकि देश प्रतिभावान लोगों को इतना महत्व देता है, इसलिए हमें सच बताना चाहिए।” उन सभी बुद्धिजीवियों और उच्च-पदस्थ हस्तियों ने यह सोचकर सच बता दिया कि कुछ भी बुरा नहीं होगा। देखो, शैतान लोगों को सच बताने का प्रलोभन देने के लिए अच्छी लगने वाली बातों का उपयोग करता है। जब लोगों का बचाव पूरी तरह से खत्म हो जाता है तो वे अपने दिलों की सारी बातें उड़ेल देते हैं, और परिणामस्वरूप, वे सीधे शैतान की साजिश में फँस जाते हैं। शैतान कहता है, “बढ़िया! अब मैंने तुम लोगों को पकड़ लिया है और मेरे पास तुम लोगों को सजा देने के लिए सबूत हैं!” तुरंत ही कम्युनिस्ट पार्टी ने दक्षिणपंथी-विरोधी अभियान शुरू किया और सच बोलने वाले सभी लोगों को दक्षिणपंथियों के रूप में वर्गीकृत कर दिया और उन बुद्धिजीवियों और उच्च-पदस्थ हस्तियों को प्रताड़ित किया गया। बाद में, सांस्कृतिक क्रांति शुरू हुई—सभी प्रसिद्ध हस्तियों और सक्षम लोगों को “गोशालाओं” में डाल दिया गया और उन्हें “पूँजीवाद-मार्गी” और “प्रति-क्रांतिकारी” लिखी तख्तियाँ पहनने के लिए मजबूर किया गया। परिणामस्वरूप, कई लोगों को बुरी तरह प्रताड़ित किया गया। देखो, शैतान मनुष्य के सार को नहीं समझता। वह स्वयं सही मार्ग पर नहीं चलता और वह नहीं जानता कि लोग अपने दिलों में क्या सोचते हैं। वह बस लोगों को सच बताने का प्रलोभन देता है और फिर उन्हें पकड़ लेता है और दोषी ठहराता है, उन्हें क्रूरता से मौत के घाट उतार देता है। परमेश्वर ने मानवजाति की रचना की। मानवजाति शैतान की भ्रष्टता से गुजरी है और हर कदम पर अधिक से अधिक गहराई से भ्रष्ट होती गई है। परमेश्वर ने अपनी चौकस आँखों से यह सब देखा है; वह इसे बहुत अच्छी तरह समझता है, इसलिए वह आकर लोगों को बचाने का उचित समय चुनता है। परमेश्वर लोगों के साथ चीजों पर चर्चा नहीं करता, न ही वह उनसे परामर्श करता है। जब परमेश्वर का समय आता है तो वह सत्य व्यक्त करने, लोगों के भ्रष्ट स्वभाव उजागर करने और उनकी सभी विभिन्न समस्याएँ उजागर करने के लिए देह धारण करके लोगों के बीच आता है। लोगों की समस्याओं को उजागर करके वह उन्हें परमेश्वर की आवाज सुनने, परमेश्वर के सामने आने और खुद को जानने देता है। फिर, परमेश्वर लोगों को सत्य प्रदान करता है, ताकि वे सही मार्ग पर चल सकें। इस तरीके और इस नजरिये का उपयोग करकर परमेश्वर मानवजाति को बचाता है। लेकिन शैतान हमेशा मानवजाति को गुमराह और भ्रष्ट करने की हर संभव कोशिश करता है। वह इस बात की परवाह नहीं करता कि लोग क्या सोचते हैं, वे क्या उम्मीद करते हैं, या उनमें किस चीज की कमी है; वह बस लोगों को पाप करने के लिए प्रलोभन देना चाहता है और उन्हें परमेश्वर को छोड़ने और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने का प्रलोभन देना चाहता है। वह लोगों को परमेश्वर के वचन पढ़ने से रोकता है और उन्हें परमेश्वर के सामने आने से रोकता है। शैतान हमेशा लोगों को लुभाना और प्रलोभन देना चाहता है; वह उन्हें बुराई करने के लिए प्रलोभन देता है और उन्हें अपनी समस्त सुरक्षा छोड़ने का प्रलोभन देता है, ताकि जब वे उसके प्रति पूरी तरह से असावधान हो जाएँ, तब वे विश्वास करें कि वह सच्चा और ईमानदार है और फिर उसकी ओर मुड़ें और उस पर निर्भर हो जाएँ। इसके बाद, अपनी सारी सावधानी छोड़कर वे उसे खुद को मूर्ख बनाने और भ्रष्ट करने देते हैं, और उसके द्वारा पूरी तरह से निगल लिए जाते हैं, है ना? (हाँ।) परमेश्वर मानवजाति के सार को जानता है; वह मानवजाति के भ्रष्ट स्वभावों को जानता है; वह परमेश्वर के खिलाफ मानवजाति के विद्रोह और प्रतिरोध की जड़ को जानता है। इस प्रकार, उसे जरूरत नहीं कि वह यह समझे कि तुमने पर्दे के पीछे क्या विशिष्ट चीजें सोचीं या कीं, या तुमने कौन-से निजी मामले प्रकट नहीं किए हैं, वह तुम्हारे प्रकृति सार को उजागर करने, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों और प्रकृति सार को अनावृत करने और उन्हें पूरी तरह से प्रकाश में लाने में पहले ही पूरी तरह सक्षम है, इस आधार पर तुम्हें परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करने के लिए पूरी तरह से इच्छुक बनाता है। तुम्हें तुम्हारे सार से अवगत कराने में परमेश्वर का उद्देश्य तुम्हें वास्तव में पश्चात्ताप करने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर की ओर मुड़ने में सक्षम बनाना है—यह तुम्हें प्रताड़ित करने और तुम्हें नकारात्मक और पतित बनाने के लिए बिल्कुल नहीं है। तुम्हें परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादे समझने चाहिए। परमेश्वर तुम्हारे प्रति जिम्मेदारी की भावना रखता है और तुम्हारी चिंता करता है, इसलिए परमेश्वर तुम्हारे बारे में पूरी तरह से विचार करते हुए इन चीजों को बड़ी बुद्धिमत्ता के साथ और बहुत ही व्यवस्थित तरीके से करता है। वह जो भी कदम उठाता है, तुम्हारे प्रति विचार करके उठाता है; उसका प्रत्येक कदम ध्यानपूर्वक व्यवस्थित और नियोजित होता है। यद्यपि वह मानवीय धारणाओं के अनुरूप नहीं होता, फिर भी लोग अंततः परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादे महसूस कर सकते हैं।

लोगों के उद्धार के मामले में परमेश्वर ज़रा भी लापरवाह नहीं है; बल्कि, वह श्रमसाध्य इरादे रखता है और इस मामले में अपने हृदय का सारा रक्त उँडेल देता है। लोगों का भ्रष्ट सार उजागर करने के आधार पर, विभिन्न समस्याओं पर संगति करने के माध्यम से, वह लोगों को अपनी समस्याएँ और अपना प्रकृति सार बेहतर ढंग से समझने में सक्षम बनाता है। फिर, वह सकारात्मक अर्थ में तुम्हारे लिए पोषण प्रदान करता है, जिससे तुम यह समझने में सक्षम होते हो कि सत्य क्या है और भ्रांति क्या है, सही क्या है और गलत क्या है, सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं, और फिर धीरे-धीरे सही मार्ग पर चलना शुरू कर देते हो। देखो, परमेश्वर तुम्हारे लिए जो कुछ भी करता है, वह तुम्हें बचाने की खातिर होता है। देहधारी परमेश्वर द्वारा किए गए इस समस्त कार्य को देखते हुए, उसका शुरुआती बिंदु, चाहे उसकी मानवता के परिप्रेक्ष्य से देखा जाए या उसकी दिव्यता के परिप्रेक्ष्य से, सृष्टिकर्ता के शुरुआती बिंदु के साथ सुसंगत है। इसलिए, जब यह देहधारी मानव-पुत्र तुम लोगों से मिलता-जुलता और जुड़ता है, तो उसका भी यही रवैया होता है, और उसका उद्देश्य तुम लोगों को परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग पर लाना और उद्धार के मार्ग पर चलना शुरू करने में तुम लोगों की सहायता करना है। इसलिए, जब मैं तुम लोगों के साथ मिलता-जुलता और जुड़ता हूँ, तब मेरे द्वारा तुम लोगों को बहला-फुसलाकर तुम्हारे अंदर से जानकारी निकालने की कोशिश करने का कभी कोई मसला नहीं होता। यदि मैं तुम लोगों से कुछ प्रश्न पूछता हूँ, तो यह बस प्रश्न पूछना होता है; मैं तुम लोगों को वे काम करने का प्रलोभन देने के लिए, जिन्हें तुम लोग नहीं करना चाहते, तुम लोगों को बहला-फुसलाकर तुम्हारे अंदर से जानकारी निकालने के तरीके का उपयोग कभी नहीं करता। ऐसा कभी नहीं होता। क्या अब तुम समझते हो? (हाँ।) दूसरी ओर, मैं कभी इस बात की परवाह नहीं करता कि तुम लोग गुप्त रूप से मेरे बारे में क्या विचार रखते हो, और न ही मैं कभी यह सोचूँगा, “जब तुम लोग देखते हो कि मैं अपेक्षाकृत छोटा हूँ, कि मेरा रूप-रंग साधारण है, और कि मैं इस तरह से बोलता हूँ और मेरे बोलने का लहज़ा ऐसा है, तो क्या इससे तुम लोगों में धारणाएँ पैदा होंगी? तुम लोगों के दिलों में मेरा किस तरह का स्थान है?” मैं कभी इन चीजों के बारे में पूछताछ नहीं करता, और जब मैं तुम लोगों से मिलता-जुलता हूँ, तब मैं कभी अप्रत्यक्ष रूप से यह पूछने के लिए किसी तरीके का उपयोग नहीं करता कि तुम लोग मुझे कैसे देखते हो; मैं इन चीजों की परवाह नहीं करता। मैं परवाह क्यों नहीं करता? क्योंकि मैं उन्हें महत्व नहीं देता। कुलीन होना, भव्य होना, रुतबा रखना, उच्च मूल्य रखना, अद्वितीय, महान और उच्च होना—मैं इन चीजों की परवाह नहीं करता। कोई उच्चस्तरीय है या नहीं, इससे क्या फर्क पड़ता है? यह किस चीज की जगह ले सकता है? अगर तुम लोगों के मन में मेरे बारे में बिल्कुल भी कोई धारणा न भी हो और तुम लोग मेरे प्रति पूरी तरह से आज्ञाकारी हो सकते हो, तो भी क्या? क्या इसका मतलब यह होगा कि मैं अभी जितना बोलता या कार्य करता हूँ, उससे कम बोल या कार्य कर सकूँगा? इनमें से कोई भी चीज किसी भी चीज की जगह नहीं ले सकती। बेशक, यह गौण है; मुख्य बात यह है कि मैं व्यक्तिगत रूप से इन चीजों की परवाह नहीं करता। मैं नहीं जानता कि मैं परवाह क्यों नहीं करता; मुझे बस इन चीजों से सरोकार रखना पसंद नहीं है। जब मैं तुम लोगों के लिए चीजें करता हूँ, चाहे वे तुम लोगों के जीवन के मामले हों, तुम लोगों के जीवन प्रवेश से संबंधित मामले हों, या तुम लोगों की मंज़िल और भविष्य से संबंधित मामले हों, और चाहे इसमें कुछ वचन बोलना या कुछ विशिष्ट चीजें करना शामिल हो, मैं कभी यह नहीं सोचता, “क्या पर्दे के पीछे कोई ऐसा व्यक्ति है जो मेरे प्रति गहराई से आभारी हो? क्या कोई कृतज्ञता के आँसू बहा रहा है? क्या कोई ये चीजें करने के लिए मेरी दयालुता याद रखता है?” मैं वास्तव में ऐसी चीजों से सरोकार नहीं रखता, और मैं उनके बारे में पता लगाने की कोशिश नहीं करता। एक ओर, जब मैं तुम लोगों के साथ सभा करता हूँ और संगति करता हूँ, तो मैं कभी इन चीजों के बारे में नहीं पूछता; दूसरी ओर, जब मैं तुम लोगों के साथ कार्य के बारे में संगति करता हूँ, तब भी मैं उनके बारे में नहीं पूछता। मैं चाहे किसी भी टीम के पास जाऊँ, मैं बस यही पूछता हूँ, “हाल ही में तुम लोग कैसे रहे हो? कोई ऐसी समस्या तो नहीं, जिसे तुम लोग हल नहीं कर सकते? क्या तुम अपना कर्तव्य निभाते समय सिद्धांतों को समझ सकते हो?” मैं बस इन्हीं चीजों के बारे में बात करता हूँ। मैं इस बात की परवाह नहीं करता कि मैं जो वचन बोलता और जो चीजें करता हूँ, उनका तुम लोगों के बीच कितना प्रभाव पड़ता है, कितने लोग मेरे आभारी होते हैं, कितने आभारी नहीं होते, या मुझे इस कार्य में कैसे सुधार करना चाहिए ताकि अधिक लोग आभारी हों; मैं ये चीजें नहीं करता। मैं इस बारे में ज्ञात करता हूँ कि तुम लोगों का कर्तव्य कैसा चल रहा है, और तुम लोगों की समस्याएँ और भटकाव इंगित करता हूँ और तुम लोगों से उन्हें ठीक करवाता हूँ, ताकि तुम कार्य अच्छी तरह से कर सको। यदि कुछ लोग बेकदर हैं या इसे नहीं मानते, तो मैं कुछ नहीं कर सकता; मैं इससे आगे नहीं जा सकता। तुम लोगों के दैनिक जीवन में, मैंने तुम लोगों के लिए चीजों की व्यवस्था करने और तुम्हारी मदद करने की पूरी कोशिश की है। यदि कुछ व्यक्ति असंतुष्ट हैं, तो मैं कुछ नहीं कर सकता; ऐसा इसलिए है क्योंकि उनकी व्यक्तिगत माँगें बहुत अधिक हैं। मैं बस बार-बार इस बात पर जोर देता हूँ कि ऐसा करने में परमेश्वर का घर किन सिद्धांतों का पालन करता है और ऐसा करने में उसका क्या उद्देश्य है, और इतना पर्याप्त है। जब मैं कुछ स्थानों पर जाता हूँ और कुछ लोगों को संगति करते हुए, इस बारे में बात करते हुए देखता हूँ कि परमेश्वर क्या कहता और करता है, तो मैं तुरंत वहाँ से चला जाता हूँ। मैं छिपकर बातें नहीं सुनता। मैं उत्सुक नहीं होता और यह नहीं सोचता, “तुम लोग मेरे बारे में क्या कह रहे हो? क्या तुम लोग मेरी बुराई कर रहे हो? क्या तुम लोग मेरे बारे में ऐसी बातें कह रहे हो, जो धारणाओं पर आधारित हैं? यदि ऐसा है, तो मैं तुम्हें प्रताड़ित करने और तुम्हारी हेकड़ी निकालने की हर संभव कोशिश करूँगा।” मैं ये काम नहीं करता; तुम लोग जो चाहो कह सकते हो। परमेश्वर को जानने का सबक सीखने में लंबा समय लगता है; यह रातों-रात नहीं होता। चाहे परमेश्वर को जानने पर तुम लोगों की संगति में धारणाओं की मिलावट हो या वह तुम लोगों की वास्तविक समझ हो, इसमें सही या गलत शामिल नहीं है; इसमें केवल यह शामिल है कि क्या यह सत्य के अनुरूप है। इसलिए, यदि किसी विषय पर तुम लोगों की संगति में विरूपण हैं, तो मैं उन्हें तुम लोगों के लिए ठीक कर सकता हूँ। यदि धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, तो हम उनके बारे में संगति कर सकते हैं। यदि तुम लोग जो संगति करते हो, वह सब सही और सत्य के अनुरूप है, लेकिन बस थोड़ी उथली है, तो बस धीरे-धीरे ज्ञान प्राप्त करने के लिए आओ।

क्या तुम लोग अब इस पहलू को समझते हो, कि परमेश्वर लोगों को बहला-फुसलाकर उनके अंदर से जानकारी नहीं निकालता? (हाँ।) लोगों को बहला-फुसलाकर उनके अंदर से जानकारी न निकालने का मतलब है कि जब मैं तुम लोगों के साथ बोलता और बातचीत करता हूँ, तो मैं ऐसा एक साधारण व्यक्ति की हैसियत से करता हूँ। मैं दबंग या अहंकारी नहीं हूँ, और मैं तुम्हें दबाता नहीं हूँ। मैं तुमसे कैसे मिलता-जुलता हूँ, इसके लिए मेरा सिद्धांत बिना प्रलोभन के और तुम्हें बहला-फुसलाकर तुम्हारे अंदर से कोई जानकारी निकाले बिना तुम्हारे साथ ईमानदारी से और दिल से बातचीत करना है। यानी, मैं तुम्हारे लिए जाल नहीं बिछाता, और मैं दिखावटी बातें नहीं कहता। बस इतना है कि यदि कुछ चीजें मुख्य विषय नहीं हैं, तो मैं बस एक सामान्य, सारांशित कथन कहकर आगे बढ़ सकता हूँ, बहुत विशिष्ट रूप से नहीं बोलता, लेकिन वह दिखावटी भी नहीं होगा। यानी, मैं जो वचन बोलता हूँ, वे तुम्हें गलत दिशा में सोचने, पाप करने, पतित होने, परमेश्वर के बारे में धारणाएँ विकसित करने, या परमेश्वर के बारे में गलतफहमियाँ रखने और उससे सावधान रहने के लिए प्रलोभन नहीं देते, और वे तुम्हें सत्य के किसी पहलू के प्रति संदेह का रवैया विकसित करने के लिए प्रेरित तो बिल्कुल भी नहीं करते। मैं जो कहता हूँ, उसमें वैसे शब्द नहीं होते जैसे शैतान ने कहे थे : “तुम लोग निश्चित रूप से नहीं मरोगे”—इस “निश्चित रूप से नहीं” की प्रकृति प्रलोभन देने की है। जब मैं तुम लोगों से बात करता हूँ, तो मैं “निश्चित रूप से नहीं” जैसे किन्हीं प्रलोभन देने वाले शब्दों का उपयोग नहीं करता। तुम लोग देख और जाँच सकते हो कि उस सारी विषय-वस्तु में, जिसकी मैंने संगति की है, ऐसे कोई शब्द हैं या नहीं। कुछ ऐसे शब्द हैं जिनके बारे में तुम लोग शायद निश्चित नहीं हो सकते या जिन्हें तुम पूरी तरह से नहीं समझ सकते, जैसे “शायद” और “हो सकता है” जैसे शब्द। हो सकता है, तुम लोग ऐसे शब्दों का उपयोग करने के मेरे सिद्धांत या कारण न समझ पाओ। ऐसे शब्दों का उपयोग करने का मेरा एक कारण है। ऐसा इसलिए है कि हम सत्य के जिन विभिन्न पहलुओं पर संगति करते हैं, वे किसी एक प्रकार के व्यक्ति पर निर्देशित नहीं होते, न ही वे किसी निश्चित व्यक्ति पर निर्देशित होते हैं, बल्कि वे उन सभी लोगों पर निर्देशित होते हैं जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर के वचन स्वीकार करते हैं। जब “सभी” का उल्लेख किया जाता है, तब इसमें सभी प्रकार के विभिन्न लोगों की अवस्थाएँ शामिल होती हैं। यानी, एक ही समस्या विभिन्न स्थितियों के अंतर्गत और विभिन्न परिवेशों में कई प्रकार के लोगों की अवस्थाओं पर लागू होती है, इसलिए इसे केवल “शायद” और “हो सकता है” का उपयोग करके ही व्यक्त किया जा सकता है। “शायद” और “हो सकता है” का क्या अर्थ है? इनका अर्थ है, शायद तुम इस अवस्था में हो, शायद तुम उस अवस्था में हो, शायद तुम ऐसे परिवेश में हो, या शायद तुम उस तरह के परिवेश में हो। लेकिन इस “शायद” का अर्थ अनिश्चितता संप्रेषित करना नहीं है; बल्कि इसका अर्थ है कि जो कहा जा रहा है, वह केवल कुछ लोगों पर लागू होता है। इन शब्दों “शायद” और “हो सकता है” में शैतान के “निश्चित रूप से नहीं मरोगे” का प्रलोभन देने वाला अर्थ नहीं है; मैं इन शब्दों का उपयोग अनुकूलित संगति प्रदान करने के लिए करता हूँ, जिससे तुम्हें यह पहचानने में मदद मिलती है कि तुम्हारी अवस्था क्या है और तुम किस परिवेश में हो। ठीक इसलिए कि मैं लोगों के इतने सारे समूहों का सामना करता हूँ, और लोगों की विभिन्न अवस्थाएँ इतनी जटिल होती हैं, मैं केवल “शायद” और “हो सकता है” का उपयोग करके ही चीजों को व्यक्त कर सकता हूँ और फिर तुम लोगों को यह देखने दे सकता हूँ कि तुम कहाँ फिट होते हो। क्या तुम लोग इस मुद्दे को समझते हो? (हाँ।) अब जबकि तुम इस मुद्दे को समझते हो, तो चलो अगले विषय पर चलते हैं।

देहधारी परमेश्वर द्वारा लोगों को प्रलोभन न देने के भीतर एक और विषय है, जो यह है कि वह लोगों को उकसाता नहीं—वह तुम्हें कुछ करने के लिए कभी उकसाएगा नहीं। यहाँ जिस उकसावे की बात हो रही है, उसके पीछे अन्यायपूर्ण, गलत या भ्रामक चीजें या ऐसे बुरे कर्म हैं, जो तुम्हें पतित बनाते हैं, तुमसे परमेश्वर का विरोध करवाते हैं या तुम्हें सही मार्ग से भटकाते हैं। जब देहधारी परमेश्वर तुम लोगों से बोलता है, तुमसे मिलता-जुलता और जुड़ता है, और तुम लोगों की अगुआई करता है, तब जो वचन वह बोलता है और जो कार्य वह करता है, उन सबका उद्देश्य तुम लोगों को परमेश्वर के सामने और सही मार्ग पर लाना होता है। वह हर वचन इसलिए बोलता है, ताकि तुम लोग तथ्यों का सत्य बेहतर ढंग से समझ सको, सही दृष्टिकोण और रुख से लोगों, घटनाओं और चीजों को जान सको, और परमेश्वर के इरादों और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों को अधिक सटीकता से समझ सको। परमेश्वर द्वारा बोला गया एक भी वचन तुम लोगों को परमेश्वर का प्रतिरोध करने या जाकर शैतान के खिलाफ लड़ने और निरर्थक बलिदान देने हेतु उकसाने के लिए नहीं होता। जब बात यह आती है कि लोगों को परमेश्वर के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, तब परमेश्वर का इरादा यह होता है कि लोग उसके प्रति समर्पण कर सकें और उसके साथ एक सृजित प्राणी के परिदृश्य से व्यवहार कर सकें। चाहे व्यक्ति किन्हीं भी चीजों का सामना करे, बाकी सबसे पहले, उसका रवैया उन्हें परमेश्वर से स्वीकारने और एक सृजित प्राणी के परिदृश्य से परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का होना चाहिए। यह एक बड़ी तस्वीर के संदर्भ में है; बेशक, यह मेरे द्वारा बोले जाने वाले सभी वचनों के पीछे का उद्देश्य भी है और यह वह सिद्धांत भी है, जिसकी मैं तुम लोगों से अपेक्षा करता हूँ। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि तुम शैतान, दुनिया, तुम लोगों को सताने वाली विरोधी शक्तियों और तुम लोगों को सताने वाले किसी भी अन्य व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करते हो, तो मैं तुम लोगों से जिस सिद्धांत की अपेक्षा करता हूँ, वह यह है कि तुम उनके साथ व्यवहार करने में बुद्धिमत्ता का उपयोग करो। ठीक वैसे ही, जैसा प्रभु यीशु ने कहा था, “इसलिए तुम सब साँपों के समान बुद्धिमान और कबूतरों के समान भोले बनो” (मत्ती 10:16)। तुम्हें कबूतरों की तरह परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए, और इस दुनिया, तुम्हारे प्रति शत्रुतापूर्ण लोगों, बुरे लोगों, शक्तिशाली शत्रुतापूर्ण शक्तियों और परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण शक्तिशाली शासनों के साथ व्यवहार करने में साँपों जैसी बुद्धिमत्ता रखनी चाहिए। अधिक व्यावहारिक शब्दों में, जब कलीसिया में बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों का सामना करने की बात आती है, या जब बाहरी शत्रुतापूर्ण शक्तियों का सामना करने की बात आती है, तो हमने बुद्धिमत्ता की कुछ अधिक विशिष्ट बातों पर और उनके साथ व्यवहार करने के तरीकों पर संगति की है। उनके साथ व्यवहार करने के ये तरीके और अभ्यास के विशिष्ट सिद्धांत, एक ओर, तुम्हें अधिक सटीकता से यह जानने में मदद करते हैं कि परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होने के लिए कैसे कार्य करना है और किन सिद्धांतों को बनाए रखना है, जो कि महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, उनका उद्देश्य तुम लोगों की रक्षा करना है—तुम लोगों की व्यक्तिगत सुरक्षा सुनिश्चित करना और तुम लोगों को लालच में पड़ने, शैतान द्वारा प्रलोभन दिए जाने, शैतान द्वारा पकड़े जाने और शैतान द्वारा दूर ले जाए जाने से बचाना है, साथ ही शत्रुतापूर्ण शक्तियों द्वारा सताए और नियंत्रित किए जाने के परिणामस्वरूप कठिन परिस्थितियों में पड़ने, नकारात्मकता और कमजोरी में पड़ने, और परमेश्वर का अनुसरण करने की आस्था में कमी होने से बचाना है—संक्षेप में, हर संभव तरीके से तुम लोगों की रक्षा करना है। तुम लोगों को बुद्धिमान होना सिखाने और तुम लोगों को वह मार्ग सिखाने में, जिसपर तुम्हें चलना चाहिए, मेरा उद्देश्य तुम लोगों को अपने उचित स्थान पर मजबूती से डटे रहने, परमेश्वर द्वारा तुम लोगों को सौंपा गया कर्तव्य मानक स्तर के तरीके से सफलतापूर्वक पूरा करने और इस मार्ग पर अच्छी तरह से चलने में सक्षम बनाना है। यदि तुम लालच में, विभिन्न कठिन परिस्थितियों में या शैतान के जाल या घेरे में फँस जाते हो, या कठिन परिस्थितियों या जानलेवा खतरे का सामना करते हो, तो तुम्हारे लिए परमेश्वर द्वारा तुम्हें सौंपा गया कर्तव्य पूरा करना और उद्धार प्राप्त करने के लिए सत्य का अनुसरण करना आसान नहीं होगा। तुम उद्धार प्राप्त कर सकते हो या नहीं, यह अज्ञात होगा, एक बड़ा प्रश्नवाचक चिह्न होगा—यह तुम्हारे लिए एक समस्या बन जाएगा। इसलिए, मैं तुम लोगों से कबूतरों के समान भोले और साँपों के समान बुद्धिमान होने के लिए कहता हूँ। साँपों के समान बुद्धिमान होना बहुत महत्वपूर्ण है; यह तुम्हें विभिन्न बुरे लोगों, मसीह-विरोधियों, विभिन्न भ्रांतियों और अपधर्मों, और तुम्हें सताने और दबाने वाली विभिन्न शक्तियों के साथ बुद्धिमत्ता और सिद्धांतों के साथ व्यवहार करने में सक्षम बनाता है, ताकि तुम सुरक्षित और सफलतापूर्वक मार्ग के अंत तक पहुँच सको और उद्धार प्राप्त करने की आशा रख सको। इस प्रकार, सामान्य तौर पर, जब परमेश्वर के घर का सामना ऐसे मामलों से होता है जिनमें बाहरी दुनिया से निपटना शामिल होता है, तब वह उन्हें सँभालने के लिए बुद्धिमत्ता और वास्तविक दुनिया के अनुभव वाले कुछ भाई-बहनों को ढूँढ़ेगा। जहाँ तक उन लोगों का संबंध है, जो युवा हैं और जिनका आध्यात्मिक कद छोटा है, या जो मूर्ख हैं और जिनके पास वास्तविक दुनिया का कोई अनुभव नहीं है, या यहाँ तक कि कुछ भ्रमित लोग, हम उन्हें जाकर ऐसी चीजों से निपटने के लिए प्रोत्साहित नहीं करते, और परमेश्वर का घर भी उनके लिए ऐसा करने की व्यवस्था नहीं करेगा। कुछ लोग बाहरी तौर पर काफी साहसी और सक्षम लगते हैं, लेकिन वास्तव में उनमें कोई बुद्धिमत्ता नहीं होती। जब किसी व्यक्ति में कोई बुद्धिमत्ता नहीं होती लेकिन वह काफी साहसी होता है, तो इसे क्या कहा जाता है? इसे लापरवाही से कार्य करना कहा जाता है; बोलचाल की भाषा में, इसे उतावला होना कहा जाता है। यदि इस तरह का कोई व्यक्ति बाहरी दुनिया से निपटने वाले मामले सँभालने जाता है, तो निश्चित रूप से समस्याएँ पैदा होंगी। इसलिए, बाहरी दुनिया से निपटने वाले इन मामलों का सामना करते समय, यदि कलीसिया के लिए यह कार्य करना आवश्यक हो, तो हम इसे करने के लिए उपयुक्त लोगों को ढूँढ़ते हैं। यह दृष्टिकोण बहुत अच्छा है। चाहे पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाने वाला व्यक्ति हो या मैं, हम कभी तुम लोगों के लिए सड़कों पर जाकर प्रदर्शन और विरोध करने की व्यवस्था नहीं करते, और हम तुम लोगों से राजनीतिक अधिकारों की वकालत में शामिल होने या कुछ खास तरह के प्रसिद्ध लोगों को सुसमाचार का उपदेश देने की अपेक्षा तो बिल्कुल भी नहीं करते; परमेश्वर का घर ये चीजें कभी नहीं करता। क्या तुमने कभी परमेश्वर के घर को इस तरह की कार्य-व्यवस्थाएँ करते हुए देखा है? (नहीं।) यहाँ तक कि सुसमाचार का उपदेश भी धर्म के उन लोगों को दिया जाता है जो सत्य के प्यासे हैं; उन फरीसियों और भरपेट निवाले खाने वालों पर ध्यान देने की कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर का घर कभी तुम लोगों को जोखिम उठाने के लिए नहीं उकसाता या तुम लोगों को लालच में या शैतान के जाल में नहीं फँसने देता; यानी, वह तुम लोगों को आग के गड्ढे में नहीं धकेलता, बल्कि परमेश्वर के घर में वर्तमान में उपलब्ध क्षमताओं और संसाधनों के साथ तुम लोगों की रक्षा करने की हर संभव कोशिश करता है। देखो, क्या परमेश्वर का घर इसी तरह से काम नहीं करता? (हाँ।) उदाहरण के लिए, यदि किसी स्थान पर आग लग जाती है, तो तुम्हें आग बुझाने के लिए दमकल विभाग को बुलाना चाहिए, और भाई-बहनों को जल्दी से बाहर निकल जाना चाहिए; आग बुझाने का काम पेशेवरों को करने देना अधिक सुरक्षित है। यह तुम लोगों को जोखिम उठाने, लालच में पड़ने और शैतान के जाल में फँसने से बचाने के लिए है। इसी तरह, जहाँ तक कलीसिया में दिखाई देने वाले विभिन्न नकारात्मक लोगों, जैसे कि मसीह-विरोधियों, बुरे लोगों और छद्म-विश्वासियों का संबंध है, परमेश्वर उन्हें प्रकट होने देता है। मैं तुम लोगों को उनका भेद पहचानना सीखने में मदद करने के लिए तुम लोगों के साथ संगति करता हूँ, फिर तुम लोगों को सिखाता हूँ कि उनके साथ व्यवहार करने के लिए किन तरीकों का उपयोग करना है, और अंत में, परमेश्वर का घर इस बात के लिए प्रशासनिक आदेश स्थापित करता है कि इन लोगों को कैसे सँभालना है, उन्हें उनकी किस्म के अनुसार छाँटता है और मसीह-विरोधियों, बुरे लोगों, छद्म-विश्वासियों और विघ्न-बाधाएँ डालने वालों का स्पष्ट रूप से भेद पहचानने के बाद उन्हें दूर कर देता है, ताकि तुम लोग मन की शांति के साथ अपना कर्तव्य निभा सको। बताओ, परमेश्वर का घर कार्य की इस मद को कैसे सँभालता है? (वह इसे अच्छी तरह से सँभालता है।) इस कार्य के अच्छी तरह से हो जाने के बाद विभिन्न देशों की कलीसियाओं में विघ्न-बाधाएँ डालने वाले लोग नहीं रहते, और कलीसियाई जीवन शांतिपूर्ण हो जाता है। एक बार बुरे लोगों को बाहर निकाल दिए जाने के बाद कलीसिया तुरंत शांतिपूर्ण हो जाती है। अधिकांश लोगों के दिल शांत हो जाते हैं, वे सामान्य रूप से सभा कर सकते हैं, कलीसियाई जीवन की व्यवस्था सामान्य हो जाती है, और विभिन्न प्रकार के कार्य भी सामान्य रूप से किए जा सकते हैं। तो, इस कोण से देखने पर, क्या परमेश्वर के घर में सत्य सत्ता सँभालता है? (हाँ।) परमेश्वर का घर यह कार्य इसलिए करता है ताकि सत्य का अनुसरण करने के इच्छुक, सत्य स्वीकार कर सकने वाले और अपने कर्तव्य के प्रति थोड़ी ईमानदारी रखने वाले अधिकांश लोग अपना कर्तव्य निभा सकें, उपदेश सुन सकें और मन की शांति के साथ सत्य का अनुसरण कर सकें—यह कलीसिया के कार्य के संदर्भ में है। इसके अलावा, जहाँ तक मेरी बात है, जब मैं तुम लोगों से मिलता-जुलता हूँ और मामले सँभालता हूँ, तब क्या मैं तुम लोगों के लिए जो कुछ भी विचार करता हूँ, वह तुम लोगों की अधिकतम रक्षा करने के लिए नहीं किया जाता? (हाँ।) क्या मैंने तुम लोगों को वे काम करने के लिए उकसाया है जो बुरे लोग करते हैं या उस मार्ग पर चलने के लिए उकसाया है जिस पर बुरे लोग चलते हैं? (नहीं।) एक ओर, मैं तुम लोगों को सत्य प्रदान करता हूँ ताकि तुम लोग सत्य सिद्धांतों को समझ सको, चीजों की असलियत जान सको, विभिन्न प्रकार के लोगों का भेद पहचान सको, विभिन्न बुरे लोगों के साथ बुद्धिमत्ता से व्यवहार कर सको और उनसे दूर रह सको। और दूसरी ओर, जब तुम खतरनाक मामलों का सामना करते हो, तब मैं तुम लोगों को बताता हूँ कि उन्हें कैसे सँभालना है। मैं तुम लोगों को बताता हूँ कि कैसे—परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पण करने की नींव पर—शैतान के लालच और जाल में फँसने से बचना है, और मैं तुम लोगों को मूर्ख न बनने, और जब तुम लोग कोई ऐसी चीज देखो जिससे विपत्ति आ सकती है तो उससे दूर रहने और बचने के लिए कहता हूँ। मैं तुम लोगों को कभी खतरनाक जगहों पर जाने के लिए भड़काता, उकसाता या प्रोत्साहित नहीं करता; बल्कि, मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि यदि तुम्हारा वर्तमान शहर खतरनाक है और तुम लोगों को वहाँ सताया जाएगा, तो तुम लोगों को किसी दूसरे शहर चले जाना चाहिए। देखो, क्या तुम लोगों के पास इस तरह से अभ्यास करने का मार्ग नहीं है? (हाँ।) मैंने कभी नहीं कहा, “सीसीपी हमें इतना दबाती और सताती है, और यह मानवजाति इतनी दुष्ट है कि हमें बर्दाश्त नहीं कर सकती, इसलिए हमें उनसे लड़ना चाहिए! प्रदर्शन करने के लिए नारों और बैनरों के साथ सड़कों पर उतरो और इस दुनिया का अंधकार और बुराई उजागर करो!” मैंने कभी ऐसी बातें नहीं कही हैं, न ही मैंने तुम लोगों से ये चीजें करने के लिए कहा है। मैंने इतना सब तुम लोगों को सत्य स्वीकार करने और उसका अनुसरण करने में मदद करने के उद्देश्य से कहा है, और मैं अक्सर तुम लोगों से यह भी कहता हूँ कि तुम चाहे कहीं भी रहो, तुम्हें नियमों का पालन करने वाले ढंग से आचरण करना चाहिए, कर्तव्यनिष्ठा से काम करना चाहिए, कानून का पालन करना चाहिए, और अविश्वासियों को तुम्हें पकड़ने या परेशानी पैदा करने का मौका नहीं देना चाहिए। हम अविश्वासियों की राजनीति में भाग नहीं लेते, न ही हम किसी सरकार का विरोध करते हैं। हम बस अपना कर्तव्य करते हैं—उसे अच्छी तरह से करते हैं और ध्यान आकर्षित किए बिना वह कार्य पूरा करते हैं जो हमें करना चाहिए, परमेश्वर के लिए अच्छी गवाही देते हैं। यह सबसे आवश्यक बात है; हमें किसी और चीज से सरोकार रखने की कोई आवश्यकता नहीं है। क्या मैंने तुम लोगों से यही नहीं कहा है? (हाँ।) हम इस दुनिया को जानने, बुरे रुझानों को जानने और भ्रष्ट मानवजाति के भ्रष्ट सार को जानने का प्रयास इसलिए नहीं करते कि हम धारा के विपरीत जा सकें या किसी देश या सरकार का विरोध कर सकें, बल्कि इसलिए करते हैं कि हम सत्य बेहतर ढंग से समझ सकें और आगे यह पुष्टि कर सकें कि परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं। इन चीजों को जानने का लक्ष्य परमेश्वर के प्रति समर्पण करने, सही मार्ग पर चलने और परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करने में सक्षम होना है। दुनिया के अंधकार का हमसे कोई लेना-देना नहीं है—हमने उसे अलविदा कह दिया है, है ना? क्या तुम लोग इस पहलू पर स्पष्ट हो कि परमेश्वर लोगों को उकसाता नहीं? (हाँ।) मैं तुम्हारे साथ इस पहलू पर—कि परमेश्वर लोगों को उकसाता नहीं—मुख्य रूप से तुम लोगों को यह बताने के लिए संगति करता हूँ कि तुम जो कुछ भी करते हो, उसमें तुम लोगों को स्पष्ट जानना चाहिए कि तुम लोगों के कार्यों के सिद्धांत क्या हैं। तुम जो कुछ भी करते हो, उसमें लोगों से लड़ने या स्पष्टीकरण माँगने के लिए उतावलेपन या क्षणिक साहस पर निर्भर न रहो; बल्कि, तुम जो कुछ भी करते हो उसमें तुम्हारे पास सिद्धांत होने जरूरी हैं, और तुम परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने का प्रयास करो, सत्य सिद्धांतों और परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य करने का प्रयास करो, और परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य करो। क्या तुम इस पहलू पर स्पष्ट हो? (हाँ।) देहधारी परमेश्वर के कर्म और प्रकाशन तुम लोगों को उकसाने का काम नहीं करते; यह भी एक पहलू है जिसे तुम लोगों को जानना चाहिए। बेशक, इसका ज्ञान प्राप्त करने के बाद तुम लोगों को इस बारे में अधिक निश्चित होना चाहिए कि तुम लोगों को किस मार्ग पर चलना चाहिए और किस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए, न कि केवल इसका धर्म-सैद्धांतिक ज्ञान रखना चाहिए और इसे वहीं छोड़ देना चाहिए।

देहधारी परमेश्वर द्वारा लोगों को प्रलोभन न देने के विषय में एक और विशिष्ट अभिव्यक्ति है, जो यह है कि वह लोगों को भड़काता नहीं। लोगों को न भड़काने और न उकसाने के बीच समानताएँ हैं। मैं इन समानताओं में नहीं जाऊँगा, बल्कि मैं संक्षेप में इनके अंतरों के बारे में बात करूँगा। कलीसिया में विभिन्न प्रकार के लोगों का भेद पहचानते समय—जिसमें मसीह-विरोधियों, बुरे लोगों और परमेश्वर के घर के कार्य में विघ्न-बाधा डालने वाले विभिन्न लोगों का भेद पहचानना शामिल है—एक बात तो यह है कि तुम्हें इन लोगों के चरित्र का भेद पहचानने की क्षमता रखनी होगी और तुम्हें इन लोगों को अस्वीकार करना होगा। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के घर के पास इन लोगों को सँभालने के तदनुरूप तरीके हैं। तुम लोगों को जो सबसे ज्यादा करना चाहिए, वह है विभिन्न प्रकार के लोगों के भ्रष्ट स्वभाव और उनका भ्रष्ट सार जानना और लोगों का सार जानने में सक्षम होना। इन चीजों को जानने के बाद, तुम्हें उस प्रकार का व्यक्ति नहीं होना चाहिए, तुम्हें उस तरह की चीजें नहीं करनी चाहिए, और तुम्हें अपनी वे अवस्थाएँ और अभिव्यक्तियाँ भी पहचाननी और छोड़ देनी चाहिए—साथ ही अपने क्रियाकलापों के पीछे की वे विशिष्ट मंशाएँ, उद्देश्य और दृष्टिकोण भी—जो उनके समान हैं। ऐसे लोगों का भेद पहचानने का लक्ष्य लोगों के एक समूह को दूसरे समूह पर हमला करने के लिए भड़काना नहीं है, न ही गुटीय संघर्षों में शामिल होना है; क्या यह बात स्पष्ट है? (हाँ।) देखो, जब हम औपचारिक सभाओं के दौरान मसीह-विरोधियों और बुरे लोगों के कुछ व्यवहारों और अभिव्यक्तियों पर संगति करते हैं, तो हम कभी लोगों के नाम नहीं लेते; हम केवल ऐसे लोगों की अभिव्यक्तियों का उल्लेख करते हैं, और फिर उनके कुछ व्यवहारों का सार और उनके दृष्टिकोण उजागर करते हैं और उनका गहन-विश्लेषण करते हैं, और अंततः निरूपण करते हैं कि उनका सार क्या है। जहाँ तक संगति के उद्देश्य और लक्ष्य की बात है, यह तुम लोगों की शैतान का असली रूप और शैतान का सार जान सकने और स्पष्ट रूप से देख पाने में मदद करने के लिए है, और तुम लोगों को यह अधिक स्पष्ट रूप से समझने में मदद करने के लिए है कि परमेश्वर किस तरह के लोगों से प्रेम करता है और किस तरह के लोगों से घृणा करता है। इसके अतिरिक्त, यह व्यक्तिगत रूप से तुम लोगों को यह समझने में मदद करने के लिए है कि चलने के लिए किस तरह का मार्ग सही है। परमेश्वर जिस तरह के लोगों को नापसंद करता है, तुम लोगों को उनसे सावधान रहना चाहिए, तुम्हें उनके काम करने के गलत तरीके अस्वीकार कर देने चाहिए और तुम्हें उनके भ्रामक विचार और दृष्टिकोण भी छोड़ देने चाहिए। शुरुआत के तौर पर हमारा इन मुद्दों पर संगति करने का लक्ष्य तुम लोगों को ऐसे लोगों पर हमला करने के लिए भड़काना नहीं है। भले ही, संगति के माध्यम से, लोगों में उनका भेद पहचानने की क्षमता आ जाए, वे अपने दिलों में उनसे विमुख हो जाएँ, और उन्हें अस्वीकार करने और उनसे मेलजोल न करने में सक्षम हो जाएँ, फिर भी इस तरह से संगति करना लोगों को कुछ भी करने के लिए भड़काना नहीं है। यानी, इन मुद्दों और विषयों पर संगति करने का लोगों को सताने के अभियानों या अविश्वासी दुनिया में पाए जाने वाले दलगत और गुटीय संघर्षों से कोई लेना-देना नहीं है। लोग सत्ता, लालसा और व्यक्तिगत हितों की खातिर गुटीय संघर्षों में शामिल होते हैं। दूसरी ओर, हम इस तरह से कुछ लोगों पर इसलिए संगति करते हैं, उन्हें उजागर करते हैं और उनका भेद पहचानते हैं, ताकि तुम सत्य बेहतर ढंग से समझ सको। ऐसी संगति का लक्ष्य तुम्हें परमेश्वर के सामने लाना और तुम्हें सही मार्ग पर चलाना, तुमसे यह पहचान करवाना कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं, और इस मामले के माध्यम से सही और गलत का भेद पहचानने की तुम्हारी क्षमता में सुधार करना है। जहाँ तक ऐसी संगति के माध्यम से उजागर होने वाले व्यक्ति की बात है, यदि वह पछतावा महसूस कर सके और उसमें पश्चात्ताप करने वाला दिल हो, तो भले ही लोग उसे स्वीकार करें या न करें, परमेश्वर उसे स्वीकार करता है। परमेश्वर द्वारा उसे स्वीकार करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि परमेश्वर उसके पश्चाताप को स्वीकार करता है; यदि वह पश्चात्ताप करता है तो परमेश्वर उसे दोषी नहीं ठहराएगा। लेकिन लोगों का पश्चात्ताप करना काफी दुर्लभ है, है ना? (हाँ।) यदि उन्होंने बुराई की है और अपराध किए हैं, तो भी हमें उनकी मदद करनी चाहिए। हम ऐसे व्यक्ति को पूरी तरह से खारिज नहीं कर सकते, यह तय नहीं कर सकते कि उससे कोई उम्मीद नहीं है और उसे कोई और मौके नहीं दिए जा सकते, और उसे कलीसिया से बाहर नहीं निकाल सकते; हमने कभी ऐसा नजरिया नहीं अपनाया है। परमेश्वर के घर ने पूर्णकालिक कर्तव्य वाली कलीसियाएँ, अंशकालिक कर्तव्य वाली कलीसियाएँ, साधारण कलीसियाएँ और ‘ब’ समूह स्थापित किए हैं; जब तक लोग उस बिंदु तक नहीं पहुँच जाते जहाँ उनसे पूरी तरह से उम्मीद खत्म हो जाए, उन्हें पश्चात्ताप करने के अवसर दिए जाएँगे। यहाँ तक कि जब कई लोगों की अभिव्यक्तियाँ मसीह-विरोधियों और बड़े लाल अजगर की अभिव्यक्तियों के समान रही हैं—जिसका अर्थ है कि वे एक ही प्रकार की अभिव्यक्तियाँ हैं—तब भी हमने उन लोगों को सीधे बाहर नहीं निकाला है। एकमात्र अपवाद वे मसीह-विरोधी हैं, जिनकी परिस्थितियाँ बहुत गंभीर हैं, जिन्होंने कई भाई-बहनों को गुमराह किया है, और जिन्होंने कलीसिया के कार्य को इतना गंभीर नुकसान पहुँचाया है जिसे रूपए-पैसे से नहीं मापा जा सकता—ऐसे लोगों को सीधे मसीह-विरोधी ठहराया जाता है और निष्कासित कर दिया जाता है। इस सबसे गंभीर स्थिति को छोड़कर, हम बाकी सभी को पश्चात्ताप करने के अवसर देते हैं और उनका सीधे ऐसे लोगों के रूप में निरूपण नहीं करते जो नष्ट हो जाएँगे। हम उन्हें अवसर इसलिए देते हैं कि हर व्यक्ति पहली बार अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को पहली बार स्वीकार कर रहा है—ऐसा नहीं है कि उन्होंने कई वर्षों तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है, बहुत सारे उपदेश सुने हैं, और कई अपराध किए हैं और फिर भी उन्हें अवसर दिए जा रहे हैं। तो फिर यह क्या है? बात यह है कि बहुत-से लोग बुराई करने में पहली बार के अपराधी हैं, या वे इसे अनजाने में करते हैं, या वे जो करते हैं उसके पीछे कुछ अन्य कारण होते हैं। चाहे कितने भी कारण हों, असल में, वास्तविक स्थिति के अनुसार, उन्हें बुराई नहीं करनी चाहिए थी। लेकिन परमेश्वर का घर अभी भी लोगों को छूट देता है और उन्हें पश्चात्ताप करने के अवसर देता है, और बार-बार उनकी अभिव्यक्तियों को देखता है। कुछ लोग बुराई करने के बाद पश्चात्ताप नहीं करते, इसलिए उन्हें पूर्णकालिक या अंशकालिक कर्तव्य वाली कलीसियाओं से साधारण कलीसियाओं या ‘ब’ समूहों में भेज दिया जाता है। यदि वे ‘ब’ समूह में भी पश्चात्ताप नहीं करते और बुराई करना तथा बाधाएँ डालना जारी रखते हैं, तो अंततः उन्हें कलीसिया से बाहर निकाल दिया जाता है। जिसे भी बाहर निकाला जाता है, उसे इसलिए बाहर निकाला जाता है क्योंकि उसने हर तरह के बुरे कर्म किए होते हैं और कई वर्षों तक कोई पश्चात्ताप नहीं दिखाया होता। सत्य स्वीकार न करने के लिए वे केवल खुद को ही दोष दे सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर के घर ने उन्हें पश्चात्ताप करने के कई अवसर दिए और उन्होंने उन्हें सँजोया नहीं और उन सभी को गँवा दिया; वे किसी और को दोष नहीं दे सकते। संक्षेप में, इन चीजों के बारे में बात करने का मेरा क्या उद्देश्य है? हम चाहे जिन लोगों का भी भेद पहचानें या उन्हें सँभाले, ऐसा करने का लक्ष्य लोगों को उठ खड़े होने और उन्हें सताने के लिए भड़काना नहीं है, न ही उन्हें गुटीय या गिरोह के संघर्षों में शामिल होने के लिए भड़काना है। बल्कि, यह विभिन्न प्रकार के लोगों के सार का भेद पहचानना, उसकी असलियत जानना सीखने और फिर बुरे लोगों को उचित दंड और प्रतिफल देने में मदद करने के लिए है, ताकि जिन लोगों को नुकसान पहुँचा है वे इन लोगों के बुरे कर्मों को देखने के बाद सबक सीख सकें, लोगों को पहचानना जान सकें और सत्य का एक पहलू समझ सकें। इसलिए, जब मैं कुछ लोगों द्वारा बुराई करने की विशिष्ट अभिव्यक्तियों पर तुम लोगों के साथ संगति करता हूँ, तो यह तुम लोगों को उनसे घृणा करने के लिए भड़काने और फिर तुम लोगों को मुझमें अधिक विश्वास और भरोसा करने हेतु राजी करने के लिए नहीं होता; यह मेरा उद्देश्य नहीं है। इसके अलावा, मैं तुम लोगों के साथ केवल उनके काम करने के उन तरीकों पर संगति करता हूँ जिन्हें वे बाहरी तौर पर प्रदर्शित करते हैं; मैंने तुम लोगों को उनकी उन कई विशिष्ट अभिव्यक्तियों के बारे में नहीं बताया है जो गुप्त रूप से होती हैं। हालाँकि कभी-कभी जब मैं तुम लोगों में से कुछ के साथ बातचीत करता हूँ और यह विषय उठता है, तो मैं थोड़ा और कह देता हूँ। तब भी मेरा उद्देश्य तुम्हें भड़काना या तुम्हें उठ खड़े होने और उनकी निंदा करने के लिए बाध्य करना नहीं होता, बल्कि सत्य के अनुसार लोगों को पहचानना सीखने में और यह जानने में कि लोगों को सँभालने के लिए परमेश्वर के घर के सिद्धांत वास्तव में क्या हैं, तुम्हारी मदद करना होता है। लोगों को सँभालने के लिए परमेश्वर के घर के सिद्धांत निष्पक्ष और न्यायसंगत हैं; वे लोगों को सताने के लिए नहीं हैं—मेरा उद्देश्य तुम्हें अपने हृदय में यह समझने में मदद करना है। इस तरह, अगर मैं अधिक विशिष्ट विवरण सामने लाता भी हूँ, तो भी यह तुम्हें भड़काने के लिए नहीं होता; यदि वाकई तुममें उजागर किए जा रहे व्यक्ति का भेद पहचानने की क्षमता है, तो तुम्हारे लिए इतना ही पर्याप्त है। कुछ लोग, जो बहुत ही उतावले होते हैं, हमेशा लड़ना चाहते हैं। मैं कहता हूँ कि यह अनुचित है—मामले निष्पक्ष रूप से सँभालो और लोगों के साथ सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करो; लड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि किसी ने पश्चात्ताप कर लिया है, तो हम उसे क्षमा कर देंगे और उसके साथ भाई या बहन के रूप में व्यवहार करेंगे। लेकिन यदि वे बिना ज़रा-सा भी पश्चाताप किए, काम करने के अपने मूल गलत तरीकों पर अड़े रहते हैं और अभी भी खुद को सही ठहराने और निर्दोष साबित करने की कोशिश करते हैं, हर अवसर पर बहस करते हैं, यहाँ तक कि लोगों की पीठ पीछे आलोचना करते हैं और बातें फैलाते हैं, तो हम उनके साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार करेंगे, उनसे कभी मेलजोल नहीं करेंगे और उन्हें कभी कलीसिया में प्रवेश नहीं करने देंगे। क्या ऐसा करना उचित है? (हाँ।) शुरू से अंत तक, काम करने के इन सभी तरीकों में, क्या तुम लोग यह नहीं देख सकते कि हर कदम सत्य सिद्धांतों का पालन करता है, और लोगों के साथ सही सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार किया जाता है? क्या इनमें से कोई भी नजरिया मानवीय इच्छा से प्रेरित है? क्या वह उतावलेपन पर निर्भर करता है? (नहीं।) क्या यहाँ जज्बात या भावनाएँ कोई भूमिका निभाती हैं? (नहीं।) क्या कभी लोगों को सताने का दृष्टिकोण अपनाया जाता है? क्या इसका उद्देश्य कभी किसी के रुतबे, कलीसिया की प्रतिष्ठा, किसी की गरिमा या मेरी अपनी गरिमा और छवि की रक्षा करना होता है? (नहीं।) ऐसा कभी नहीं होता।

चाहे किसी भी प्रकार के व्यक्ति या किसी भी व्यक्ति को सँभाला जा रहा हो, उसे सँभालने का हमारा तरीका मामले को कलीसिया को सौंपना होता है, जो उसे सिद्धांतों के अनुसार सँभालेगी। ज्यादातर स्थितियों में, निर्णयकर्ता समूहों के भाई-बहन ही इन मामलों में भाग लेते हैं। यदि अधिक भाई-बहनों के भाग लेने की आवश्यकता होती है, तो मामला अधिक कलीसिया अगुआओं या विभिन्न कलीसियाओं के भाई-बहनों को भेजा जाता है, ताकि वे उसकी स्पष्ट समझ प्राप्त कर सकें और फिर मतदान कर सकें और अपने दृष्टिकोण व्यक्त कर सकें। अंत में, भाई-बहन तय करते हैं कि इस व्यक्ति को कैसे सँभालना है। यह अधिकार कलीसिया और भाई-बहनों को सौंप दिया जाता है; कलीसिया चाहे जैसे भी उससे निपटे, यह तुम लोगों के निर्णय के अनुसार किया जाएगा। तो वे कौन-से सिद्धांत हैं जिनके द्वारा भाई-बहन विभिन्न प्रकार के लोगों को सँभालते हैं? लोगों को उन सिद्धांतों के अनुसार मापा जाता है, जिन पर मैं और पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाने वाला व्यक्ति इन तमाम वर्षों में संगति करते रहे हैं। उसे सँभाले जाने के बाद, तुम लोग ऊपरवाले को रिपोर्ट करोगे कि क्या हुआ। मैं उस पर एक नजर डालूँगा और पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाने वाला व्यक्ति भी उस पर एक नजर डालेगा; हम दोनों उसकी समीक्षा करेंगे। कभी-कभी, मैं देखता हूँ कि तुम लोगों ने स्थिति अपेक्षाकृत उचित रूप से सँभाली है, और कभी-कभी सँभाले जाने का परिणाम मेरे इरादे से बिल्कुल मेल नहीं खाता। कुछ व्यक्तियों के संबंध में, सँभाले जाने का परिणाम उससे अधिक गंभीर होता है जो मैंने सोचा था, और कुछ अन्य लोगों के लिए, बेशक, परिणाम उससे हलका होता है जो मैंने सोचा था। लेकिन मैं कभी कोई सुझाव नहीं देता; मैं तुम लोगों के निर्णयों का सम्मान करता हूँ और यह अधिकार तुम लोगों को और कलीसिया को सौंपता हूँ। मैं उसे तुम लोगों को क्यों सौंपता हूँ? तुम लोगों ने इतने वर्षों तक उपदेश और संगतियाँ सुनी हैं—मैं मानता हूँ कि तुम लोगों में से अधिकांश के पास बुरे लोगों और परमेश्वर के घर के हितों और भाई-बहनों के हितों को नुकसान पहुँचाने वालों के बुरे कर्मों को मापने का एक मानक है। इन लोगों को कैसे सँभालना है, इस बारे में अस्सी प्रतिशत से अधिक लोगों के दिलों में एक पैमाना होना चाहिए और उन्हें पता होना चाहिए कि उचित रूप से उन्हें कैसे मापना और सँभालना है। अगर कुछ कलीसिया अगुआओं और कार्यकर्ताओं द्वारा सँभालने में थोड़ा विचलन भी हो, तो भी सामान्य दिशा गलत नहीं होगी; यह निश्चित है। यह किस पर आधारित है? यह इस तथ्य पर आधारित है कि तुम लोगों ने उन वचनों को, जो मैंने तुम लोगों से कहे हैं और उन दृष्टिकोणों को, जो मैंने इन तमाम वर्षों में तुम लोगों को सिखाए और प्रदान किए हैं, समझ लिया है; तुम लोग जानते हो कि क्या करना है, और मुझे तुम लोगों में विश्वास है। इसलिए, इन स्थितियों को देखते हुए, परमेश्वर का घर चाहे किसी भी प्रकार के व्यक्ति की अभिव्यक्तियों के बारे में संगति करे और उन्हें उजागर करे, या वह किसी भी प्रकार के व्यक्ति को सँभाले, इसका उस तरह के भड़काने से कोई लेना-देना बिल्कुल नहीं है, जिसका उल्लेख अविश्वासी दुनिया में किया जाता है। परमेश्वर का घर चाहे किसी भी प्रकार के व्यक्ति या किसी भी व्यक्ति को सँभाले, ऐसा सँभालना कभी कोई अभियान नहीं होता; बल्कि, बुरे लोग, जो बुराई करते हैं, परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं, अनिवार्य रूप से प्रकट हो जाएँगे। यह एक अपरिहार्य परिणाम है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के परिदृश्य से, यह परमेश्वर है जो सत्य का अनुसरण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति और परमेश्वर का अनुसरण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए—बार-बार—सबक और परिवेश स्थापित कर रहा है। यह तुम्हारे लिए परमेश्वर के कार्य को जानने और बुरे लोगों का भेद पहचानने का अवसर है और यह तुम्हारे द्वारा समझे और बूझे गए सत्यों का तुम्हारा बार-बार का अभ्यास भी है। परमेश्वर से चीजें स्वीकार करने का अर्थ है सबक सीखना; यह इतना ही सरल है। ये स्थितियाँ तुम्हारे लिए सबक सीखने और बुरे लोगों का भेद पहचानने के उत्कृष्ट अवसर हैं। यदि परमेश्वर इन बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों को तुम्हारे सामने न रखता और तुम्हें अपनी आँखों से यह न देखने देता कि ये बुरे लोग कैसे बुराई और परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, तो बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों का भेद पहचानने के बारे में मैंने इन वर्षों में जिन वचनों पर संगति की है, वे तुम्हारे लिए केवल एक प्रकार का धर्म-सिद्धांत होकर रह जाते। तुम्हें लगता कि कलीसिया में ऐसे लोग नहीं हैं जो इतने बुरे हैं, और तुम्हारे हृदय में इन वचनों के आगे हमेशा एक प्रश्नचिह्न लगा रहता। भले ही तुम इन वचनों से इनकार न करते, लेकिन तुम हमेशा उन्हें एक प्रकार का धर्म-सिद्धांत ही मानते। लेकिन यदि कुछ बुरे लोग और मसीह-विरोधी प्रकट होते हैं और वास्तविक उदाहरण सामने आते हैं, तो तुम वास्तव में महसूस करोगे : “तो शैतान परमेश्वर के साथ ऐसे व्यवहार करता है। तो शैतान और मसीह-विरोधी सत्य से इतने विमुख हैं और सत्य से इतनी घृणा करते हैं। तो शैतान और दानव इतने दुष्ट, कपटी और लालची हैं और इस तरह परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। परमेश्वर कहता है कि शैतान कभी सत्य स्वीकार नहीं करता, और शैतान सत्य से विमुख है और सत्य से घृणा करता है; अब मैंने यह देख लिया है। ये बुरे लोग और मसीह-विरोधी लगातार झूठ बोलते हैं। यहाँ तक कि जब तथ्य उनकी आँखों के सामने होते हैं, तब भी वे बहस करने की कोशिश करते हैं; वे वास्तव में जीते-जागते शैतान हैं! शैतान वास्तव में कभी अपनी प्रकृति नहीं बदलते!” परमेश्वर इन लोगों, घटनाओं और चीजों को केवल तुम्हें सबक सीखने में मदद करने के लिए स्थापित करता है। क्या यह बात स्पष्ट है? (हाँ।) इसलिए, परमेश्वर का घर चाहे जिन लोगों को भी बाहर निकाले और सँभाले, और चाहे जिन लोगों को भी उजागर करे और उनका भेद पहचाने, इसकी प्रकृति दुनिया के किसी भी समूह या शक्ति के आंतरिक संघर्षों या अभियानों की प्रकृति से भिन्न होती है। कम से कम, परमेश्वर के घर में होने वाली ये चीजें परमेश्वर द्वारा आयोजित होती हैं। समय आने पर, परमेश्वर ये परिवेश स्थापित करता है ताकि बुरे लोग बाहर आएँ और अपनी हरकतें दिखाएँ, और फिर उन्हें प्रकट और उजागर करता है, ताकि परमेश्वर के लोग सबक सीख सकें। जब परमेश्वर के लोग ये चीजें घटित होते हुए देखते हैं, तब वे उनके बारे में संगति करते हैं। संगति के माध्यम से हर व्यक्ति अधिक से अधिक ज्ञान और भेद पहचानने की क्षमता प्राप्त करता है, और अधिकाधिक महसूस करता है कि बुरे लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, यहाँ तक कि सत्य से विमुख हैं और सत्य से घृणा करते हैं, और कि वे जीते-जागते शैतान हैं। अब वे बुरे लोगों का प्रकृति सार स्पष्ट रूप से देखते हैं, क्योंकि वास्तविक उदाहरण सामने होते हैं। इस बारे में परमेश्वर का घर जो कुछ भी करता है, उसे परमेश्वर द्वारा लोगों को बचाने की प्रक्रिया में परमेश्वर के सभी चुने हुए लोगों को अनुभव करना चाहिए। समग्र रूप से देखा जाए तो, यह सब परमेश्वर द्वारा आयोजित होता है, इसलिए यह कोई अभियान नहीं होता। जब ये चीजें होती हैं, तब मैं तुम लोगों से जो वचन कहता हूँ, वे तुम लोगों के लिए किसी भी अन्य उपदेश या संगति के समान होते हैं—वे एक प्रकार का पोषण हैं। यानी, परमेश्वर बड़े परिवेश के भीतर ऐसा मामला स्थापित करता है—और यहाँ मैं क्या भूमिका निभाता हूँ? मैं बस तुम लोगों की ओर मदद का हाथ बढ़ाता हूँ। जब तुम लोगों के पास इस मामले का स्पष्ट दृष्टिकोण या ज्ञान नहीं होता, तब मैं तुम लोगों की मदद करने, तुम लोगों को परामर्श देने और तुम लोगों को संकेत देने के लिए सत्य पर संगति करता हूँ। मैं क्या संकेत देता हूँ? वे जो तुम लोगों को वर्तमान मामले का केंद्र-बिंदु और इस समस्या का सार स्पष्ट रूप से पहचानने में सक्षम बनाते हैं। कुछ सरल संकेतों और इशारों से तुम लोग तुरंत स्पष्टता प्राप्त कर लेते हो और जान जाते हो कि क्या हो रहा है। इस थोड़ी-सी सहायता से ही तुम लोग इस मामले द्वारा प्रस्तुत परीक्षा आसानी से उत्तीर्ण कर लेते हो, ठीक वैसे ही जैसे तुम लोगों ने चाहा था, और परमेश्वर को एक संतोषजनक उत्तर देते हो। तुम लोगों में बुरे व्यक्ति का भेद पहचानने की क्षमता आ जाती है, अब तुम लोग उसका आदर नहीं करते, अब उसके द्वारा गुमराह नहीं होते और अब उसके द्वारा बोले गए दानवी शब्दों पर विश्वास नहीं करते। तुम लोगों को उसका स्पष्ट ज्ञान हो जाता है : वह लगातार झूठ बोलता है, वह कभी सत्य स्वीकार नहीं करता और वह दानव है। यह बात तय हो जाती है। पहले, तुम लोग उसका काफी समादर करते थे और महसूस करते थे कि वह ऐसा व्यक्ति है जो सच्चे मन से परमेश्वर को चाहता है। अब तुम्हें उसकी पहचान हो गई है और तुमने निर्धारित कर लिया है कि ऐसा व्यक्ति उद्धार प्राप्त नहीं कर सकता और कि ऐसा व्यक्ति परमेश्वर का दुश्मन है। कलीसिया में चाहे जो भी हो या तुम लोगों के काम में चाहे जैसी भी चीजें हों, मैं जो भी कार्य करता हूँ और जो भी वचन बोलता हूँ, उनके साथ, मैं बस तुम लोगों को लगातार खींच और घसीट रहा हूँ, तुम लोगों को परमेश्वर के सामने और सही मार्ग पर लाने की पूरी कोशिश कर रहा हूँ और सत्य समझने और प्राप्त करने में तुम लोगों की मदद कर रहा हूँ, ताकि तुम लोग अब मूर्ख या अंधे न रहो और किन्हीं लोगों, घटनाओं या चीजों के साथ पेश आने में अब उतावलेपन पर निर्भर न रहो या अपनी पुरानी धारणाओं से चिपके न रहो। मेरे बोलने का उद्देश्य और लक्ष्य अंततः तुम लोगों में चाहे जो भी परिणाम लाए, संक्षेप में, मेरा केवल एक ही लक्ष्य और दिशा है, जो कि तुम लोगों को परमेश्वर के सामने लाना और तुम लोगों को एक सृजित प्राणी के रूप में अपना उचित स्थान लेने में सक्षम बनाना है। इसलिए, यह भड़काना नहीं है। भड़काने में इंसानी इच्छा की साजिशें और लक्ष्य शामिल होते हैं, जिसमें पर्दे के पीछे अपने लक्ष्य प्राप्त करने के लिए दूसरों से जोखिम उठवाया जाता है। तो, क्या मैं जो करता हूँ वह तुम लोगों को भड़काना है? (नहीं।) जब तुम लोग सत्य प्राप्त कर लेते हो और कुछ सबक सीख लेते हो, तब मैं संतुष्ट हो जाता हूँ; मेरे कोई अन्य इरादे नहीं हैं। क्या मैं यह अपने स्वार्थ की खातिर कर रहा हूँ? (नहीं।) इसके विपरीत, मुझे कीमत चुकानी पड़ती है, विचार करना पड़ता है और तुम लोगों के साथ अथक रूप से संगति करने के लिए विस्तार से बात करनी पड़ती है, तुम लोगों को हर मुख्य बिंदु स्पष्ट रूप से समझाने के लिए हर संभव प्रयास करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी मामले में दस मुख्य बिंदु शामिल हों, और मैं उनमें से तीन या पाँच छोड़ दूँ, तो तुम लोग बहुत कुछ गँवा दोगे। यदि मैं इन दस मुख्य बिंदुओं पर केवल संक्षेप में संगति करूँ, तो खराब काबिलियत वाले लोग और भी कम प्राप्त करेंगे; अच्छी काबिलियत वाले लोगों को कुछ प्राप्त हो, इसके लिए भी इन बिंदुओं पर स्पष्ट रूप से संगति करनी जरूरी है और खराब काबिलियत वाले लोगों के समझने के लिए इन पर कई बार संगति किए जाने की आवश्यकता है। इसलिए, मुझे सभी दस मुख्य बिंदुओं को स्पष्ट रूप से समझाना पड़ता है, ताकि जब सभी लोग सभाओं के दौरान उन्हें एक-दूसरे के साथ साझा करें और संवाद करें, तो वे धीरे-धीरे उन सभी को प्राप्त कर लें। परमेश्वर का घर एक बड़ा परिवार है। कोई भी अकेला व्यक्ति सभी सत्य पूरी तरह से खा और पी नहीं सकता। सभी को एक-दूसरे के साथ साझा करने की आवश्यकता है; तुम्हें हमेशा मिलकर प्रार्थना-पाठ करना चाहिए, बातें साझा करनी चाहिए और संगति करनी चाहिए। केवल इसी तरह से तुम लोग अधिक चीजें समझ सकते हो और उन्हें अधिक व्यापक रूप से समझ सकते हो। इसलिए, कलीसियाई जीवन अपरिहार्य है और आपस में संगति और साझा किए बिना तुम्हारा भी काम नहीं चल सकता। हो सकता है कि तुमने उस समय मेरे द्वारा बताए गए उन दस मुख्य बिंदुओं में से तीन या पाँच प्राप्त किए हों, और बाद में, हर किसी के एक-दूसरे के साथ साझा करने के माध्यम से, तुम सात या आठ प्राप्त कर सको। कुछ और वर्षों के बाद, अन्य लोग भी साझा करते हैं, और शायद, जैसे-जैसे तुम्हारे लाभ दिन-ब-दिन और महीने-दर-महीने धीरे-धीरे संचित होते हैं, तुम सभी दस मुख्य बिंदु प्राप्त कर लोगे। इस तरह, मेरे वचन व्यर्थ नहीं बोले गए, है ना? (हाँ।) तो, तुम लोग सत्य प्राप्त करते हो और तुम्हारा आध्यात्मिक कद बढ़ता है—मुझे इससे क्या मिलता है? क्या मैं यह उम्मीद कर रहा हूँ कि तुम मेरे खाने के लिए कोई अच्छी चीज बनाओगे? या मेरे लिए कुछ अच्छे कपड़े खरीदोगे? शायद एक बड़ा घर? मैं इन चीजों को महत्व नहीं देता। यह ठीक वैसा ही है, जैसे दाऊद उस समय परमेश्वर के लिए एक मंदिर बनाना चाहता था—क्या तुम कहोगे कि परमेश्वर वह मंदिर चाहता था? उस समय, लोग वास्तव में परमेश्वर के इरादे नहीं समझते थे; वे वास्तव में काफी मूर्ख थे। हालाँकि परमेश्वर ने इसके लिए नहीं कहा था, फिर भी यह देखकर कि दाऊद के पास ऐसा हृदय है, परमेश्वर ने इसे स्वीकार कर लिया और इसके लिए मौन सहमति दे दी। उस युग के संदर्भ में, लोगों का आध्यात्मिक कद बस ऐसा ही था; परमेश्वर की लोगों से उच्च अपेक्षाएँ नहीं थीं। यदि आज ऐसा होता, तो लोगों के लिए ऐसा करना बहुत मूर्खतापूर्ण होता और यह सत्य सिद्धांतों के बिल्कुल भी अनुरूप नहीं होता।

मैं कभी भड़काने वाले वचन नहीं बोलता या लोगों को भड़काते वाली चीजें नहीं करता। यद्यपि मैं बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों से घृणा करता हूँ, फिर भी मैं हर किसी को उठ खड़े होने और उनसे घृणा करने और उन्हें अस्वीकार करने के लिए नहीं भड़काता। मैं जो कई वचन बोलता हूँ, वे सभी लोगों को सत्य समझने और तथ्यों की सच्चाई स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम बनाने के लिए होते हैं, इसलिए इसे भड़काना नहीं कहा जा सकता। मैं सत्य के चाहे जिस पहलू पर संगति करूँ, तुम लोगों को उसके साथ सही ढंग से पेश आना चाहिए और उसे सही ढंग से समझने में सक्षम होना चाहिए। कलीसिया का कार्य बस इसी तरह किया जाता है। मैं बस अथक रूप से संगति करता हूँ और सत्य प्रदान करता हूँ, और अथक रूप से सत्य के बारे में अपना ज्ञान और अंतर्दृष्टियाँ, विभिन्न चीजों पर अपने दृष्टिकोण, विभिन्न प्रकार के लोगों के बारे में अपना ज्ञान और उनके प्रति अपने विचार और रवैये साझा करता हूँ। इस तरह अथक रूप से संगति करने में मेरा अंतिम उद्देश्य तुम लोगों को सत्य समझने और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम बनाना है। तो, इस परिणाम के संदर्भ में, क्या मैंने इसे प्राप्त कर लिया है? क्या परमेश्वर के कार्य ने यह परिणाम प्राप्त कर लिया है? (हाँ।) लोगों का एक हिस्सा ऐसा है जो हमेशा गलत तरीके से विश्वास करने से डरता है; वे शैतान की निराधार अफवाहें सही मान लेते हैं, यह सोचते हुए कि उन्हें गुमराह किया गया है और वे जिस पर विश्वास करते हैं वह परमेश्वर नहीं बल्कि एक व्यक्ति है। तुम कहते हो कि तुम्हें गुमराह किया गया है, लेकिन क्या तुम जो वचन पढ़ते हो वे परमेश्वर के वचन नहीं हैं? क्या परमेश्वर के वचन सत्य नहीं हैं? क्या परमेश्वर के घर की सभाओं में जिस पर संगति की जाती है, वह सत्य नहीं है? क्या तुम किसी व्यक्ति में विश्वास करके सत्य प्राप्त कर सकते हो? परमेश्वर के घर द्वारा किया गया कौन-सा कार्य तुम्हें गुमराह कर रहा है? तुम किस आधार पर यह निर्धारित करते हो कि तुम्हें गुमराह किया गया है या नहीं? तुम्हें केवल तभी गुमराह किया गया होता है जब तुम जिस पर विश्वास करते हो वह सत्य नहीं होता। यदि तुम जिस पर विश्वास करते हो वह सत्य है, तो तुम यह नहीं कह सकते कि तुम्हें गुमराह किया गया है। अगर तुमने सत्य प्राप्त नहीं भी किया, तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि तुम्हें गुमराह किया गया है; केवल यही कहा जा सकता है कि तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते, कि तुम सही व्यक्ति नहीं हो और कि तुमने खुद को नुकसान पहुँचाया है। तुमने कई वर्षों तक प्रभु में विश्वास किया लेकिन सत्य प्राप्त नहीं किया—तब क्या समस्या थी? तुम निश्चित रूप से पादरियों की आराधना कर रहे थे और लोगों का अनुसरण कर रहे थे; वास्तव में गुमराह होने का यही अर्थ है। परमेश्वर का घर हर किसी के साथ निष्पक्ष व्यवहार करता है। यदि तुम अपना कर्तव्य निभाने के इच्छुक हो, तो परमेश्वर का घर तुम्हें एक कर्तव्य देता है और बिना बाल की खाल निकाले तुम्हारे रहन-सहन के खर्च भी उठाता है। क्या यह परमेश्वर का उत्कर्ष नहीं है? क्या तुम्हें विशेष कृपा नहीं मिल रही है? (हाँ।) तो तुम्हें कर्तव्य देने का लक्ष्य क्या है? यह इसलिए है ताकि तुम, एक सृजित प्राणी के रूप में, अपना कर्तव्य निभाते हुए सृष्टिकर्ता के साथ एक पुख्ता और स्थिर संबंध स्थापित कर सको। इस नींव पर, परमेश्वर तुम्हें सत्य प्रदान करता है और तुम्हारे सबक सीखने के लिए विभिन्न परिवेश भी स्थापित करता है। परमेश्वर का घर भी हमेशा तुम्हारे साथ सत्य पर और विभिन्न कर्तव्य निभाने के सिद्धांतों पर संगति करता है। क्या परमेश्वर लोगों को सत्य प्राप्त करने में मदद करने के लिए बहुत सोच-विचार करता है? क्या परमेश्वर का घर इस उद्देश्य के लिए बहुत काम करता है? (हाँ।) इन सबमें लोग सबसे बड़े लाभार्थी हैं। तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते, बल्कि केवल प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे का अनुसरण करते हो, फिर भी तुम कहते हो कि तुम्हें नुकसान हुआ है। क्या ऐसा कहकर तुम सही को गलत और गलत को सही नहीं कर रहे हो? क्या तुममें कोई जमीर है, जो तुम इस तरह की बात करते हो? कुछ लोग कहते हैं : “परमेश्वर के घर में कर्तव्य निभाना बहुत कठिन है; तुम्हें जो काम करना पड़ता है, उसका कोई अंत नहीं है!” अपना कर्तव्य निभाने में तुम्हारी कार्यकुशलता बहुत कम है, इसलिए तुम्हें तेजी लानी चाहिए। तुम हमेशा बिना कोई काम किए मुफ्त में खाना चाहते हो; यह सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। कुछ लोग हमेशा मुफ्त में खाना चाहते हैं और कोई काम नहीं करना चाहते; यहाँ क्या समस्या है? क्या ये लोग पेटू नहीं हैं? जरूर वे अपने पिछले जन्मों में भूख से मरे होंगे! वे परमेश्वर के घर में केवल मुफ्त में खाने के लिए आते हैं। जमीर और विवेक वाले लोग ऐसा करने के लिए अनिच्छुक होते हैं। यदि परमेश्वर का घर उन्हें भरपेट खाने देता है, तो वे परमेश्वर के अनुग्रह और प्रेम का प्रतिदान कर सकते हैं और वे कठिनाई या थकान की परवाह किए बिना अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सकते हैं। बिना जमीर और विवेक वाले लोग हमेशा मुफ्त में खाना चाहते हैं। वे इस बात से भयभीत रहते हैं कि थोड़ा-सा काम करने का मतलब यह हो सकता है कि उन्हें नुकसान उठाना पड़े, इसलिए वे परमेश्वर के घर का फायदा उठाने के लिए अधिक खाते हैं। क्या ऐसे लोग अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सकते हैं? मुझे लगता है कि देर-सबेर उन्हें निकाल दिया जाएगा। कुछ लोग यह भी कहते हैं, “परमेश्वर के घर में काम करना थका देने वाला है!” खैर, तुममें कोई खूबियाँ नहीं हैं। यदि तुम काम नहीं करते और अपना कर्तव्य नहीं निभाते, तो तुम्हें आजीविका कमाने के लिए दुनिया में वापस जाना होगा—क्या वहाँ तुम जो काम करोगे, वह थका देने वाला नहीं होगा? क्या तुम परमेश्वर के घर में मुफ्त में खाना चाहते हो? परमेश्वर का घर कोई परिचर्या-गृह नहीं है, न ही यह कोई धर्मार्थ संस्था है। यदि तुम हमेशा मुफ्त में खाना चाहते हो, तो क्या तुम जमीर से रहित नहीं हो? चलो इस बारे में बात तक नहीं करते कि परमेश्वर के घर ने तुम लोगों को भोजन, कपड़े और दैनिक खर्चों के लिए धन प्रदान करने पर कितना खर्च किया है—तुम लोगों ने जो सत्य प्राप्त किया है, केवल उसके संदर्भ में बात करें तो, तुम उसे किस चीज से खरीद सकते हो? क्या तुम उसे सोने या हीरों से खरीद सकते हो? तुम उसे किसी चीज से नहीं खरीद सकते; सत्य अनमोल है। तुम लोगों को सत्य प्रदान करने में क्या मैंने तुम लोगों से एक भी पैसा माँगा है? (नहीं।) तुम लोगों को उपदेश देने में मुझे अपने दिल का कितना खून खर्च करना पड़ता है? सत्य पर मेरी किस संगति ने तुम लोगों को लाभ प्राप्त नहीं करने दिया? कौन-सी सभा तुम लोगों के समय और ऊर्जा की बरबादी थी? (कोई नहीं।) मैंने तुम लोगों के साथ बहुत अच्छा किया है। हर बार जब मैं उपदेश देता हूँ, तब मैं तुम लोगों को कुछ प्राप्त करने देता हूँ। जब मैं तुम लोगों के साथ बातचीत और गपशप करता हूँ, यहाँ तक कि यदि मैं कोई चुटकुला भी सुनाता हूँ, तो वह सब तुम लोगों को सत्य समझने में मदद करने के लिए होता है। इसलिए, मैं लगातार बोलता रहता हूँ ताकि तुम लोग सत्य समझने में सक्षम हो सको। फिर भी, कुछ लोग अभी भी कहते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने से उन्हें गुमराह किया जा रहा है। क्या उन्हें गुमराह किया जा रहा है? (नहीं।) जो लोग कहते हैं कि उन्हें गुमराह किया जा रहा है, उनके बारे में एक बात निश्चित है : वे परमेश्वर की भेड़ें नहीं हैं। परमेश्वर की भेड़ें न होने के कारण वे सत्य समझने के आशीष का आनंद नहीं ले सकते। उन्हें पाप की यातना सहनी चाहिए और दर्द में जीना चाहिए, शैतान उन्हें अपनी इच्छानुसार सताए और उन्हें भ्रष्ट करता रहे, और फिर वे शैतान के साथ नष्ट हो जाएँ; यही उनकी उचित मंज़िल है। परमेश्वर की भेड़ें न होने के कारण वे उस आशीष का आनंद नहीं ले सकते। जैसे ही वे परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं, वे इसे सहन नहीं कर सकते या अपने हृदय में इसे सँभाल नहीं सकते, ठीक उन लोगों की तरह जो अभागे होते हैं और आशीषों को सँभाल नहीं सकते; यदि वे बहुत अच्छे जीवन का आनंद लेते हैं तो वे कम उम्र में ही मर जाएँगे। मुझे बताओ, मैंने इतने वर्षों तक तुम लोगों के साथ सभा और संगति की है—क्या मैंने कभी तुम लोगों से एक पैसा भी माँगा है? (नहीं।) कुछ लोगों ने सीधे तौर पर मुझे कुछ सौ युआन देने की कोशिश की है और मुझसे अपना स्वास्थ्य बेहतर बनाने के लिए कुछ सप्लीमेंट खरीदने के लिए कहा है। मैंने कहा : “मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है, मेरे पास पर्याप्त है। तुम पैसे अपने पास रखो, या देखो कि कलीसिया को क्या चाहिए और उसके लिए कुछ खरीद लो, या देखो कि किन भाई-बहनों को रहन-सहन के खर्च या यात्रा-खर्च के लिए पैसे चाहिए, और ये उन्हें दे दो। ये मुझे देने की कोई आवश्यकता नहीं है।” ऐसे लोग भी हैं जो सीधे तौर पर मुझे कुछ अच्छी चीजें देते हैं और मैं बिना किसी अपवाद के उन सभी को मना कर देता हूँ। शुरू से लेकर अब तक, मैंने कभी किसी व्यक्ति से एक भी पैसा या एक भी चीज नहीं ली है। कुछ लोग मुझे कुछ चीजें भेंट करते हैं और ज्यादातर समय मैं उन्हें मना कर देता हूँ। यदि वह वास्तव में कोई ऐसी चीज होती है जिसकी मुझे आवश्यकता हो, तो मैं थोड़ी-सी स्वीकार कर लूँगा, और फिर मुझे अपना आभार भी व्यक्त करना होगा। मैंने कभी किसी से कोई व्यक्तिगत चीज नहीं माँगी है। सिर्फ इसलिए कि मैं तुम्हें अच्छे कपड़े पहने या अच्छा खाना खाते देखता हूँ, मैं तुमसे एक कपड़ा मुझे देने या कुछ खाना मुझे भेजने के लिए नहीं कहूँगा; मैंने कभी इनमें से कोई चीज नहीं माँगी है। इतने वर्षों तक, तुम लोगों के साथ मेरी सभा और संगति निःशुल्क रही है। मैंने तुम लोगों से एक पैसा भी नहीं माँगा है, न ही मैंने तुम लोगों से एक भी धेला सौंपने के लिए कहा है। इसके अलावा, हम अपनी सभाओं और संगतियों में कभी भेंटें चढ़ाने के बारे में बात नहीं करते। इसलिए मुझे नहीं पता कि कुछ लोग, जिन्होंने कार्य का यह चरण स्वीकार किया है और इतने वर्षों से विश्वास किया है, अभी भी यह क्यों कह सकते हैं कि उन्हें गुमराह किया गया है। तुम्हें कैसे गुमराह किया गया? क्या तुमसे तुम्हारे पैसे ठगे गए या तुम्हें यौन संबंध बनाने के लिए बहकाया गया? दोनों में से कुछ नहीं किया गया। तो फिर तुम लोग ऐसे व्यक्ति का कैसे निरूपण करते हो, जो इस तरह की बातें कह सकता है? (वे छद्म-विश्वासी हैं।) वे छद्म-विश्वासी हैं। वे परमेश्वर की भेड़ें नहीं हैं; वे दानव हैं, इसलिए वे विषैली बदनामी उगल सकते हैं।

हम जब भी सभा करते हैं तो हमेशा सत्य पर संगति करते हैं, और इतने वर्षों तक संगति करने के बाद, तुम लोगों ने अंततः मूलभूत बातें सीख ली हैं। मैं देखता हूँ कि अब इतनी सारी अनुभवजन्य गवाहियों में, लोगों के पास जीवन में, विशेष रूप से अपना कर्तव्य निभाने में, अपने सामने आने वाली विभिन्न चीजों के संबंध में कुछ अनुभव और ज्ञान है। उन सभी ने सत्य में कुछ लाभ प्राप्त किए हैं और जीवन में कुछ विकास किया है। यह दर्शाता है कि अक्सर मुझे बोलते और उपदेश देते हुए सुनने के माध्यम से तुम लोगों ने सही विचार और दृष्टिकोण विकसित किए हैं और वास्तविक अनुभवजन्य ज्ञान साझा किया है; यही देखकर मुझे सबसे ज्यादा खुशी होती है। मैं तुम लोगों को अधिक अनुभवजन्य गवाही वाले लेख लिखने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ। अगर तुम्हारी समझ उथली भी है तो भी, अगर यह थोड़ी भी प्रासंगिक है तो इसे लिखो; तुम जितना अधिक लिखोगे, तुम्हारी समझ उतनी ही गहरी होती जाएगी। लोग इसी तरह सत्य को जानते हैं, सत्य को समझते हैं और सत्य का अनुभव करते हैं। तुम इसे जितनी अधिक गंभीरता से लोगे और अपने हृदय में इसे जितना अधिक महत्व दोगे, सत्य की तुम्हारी समझ में तुम्हारे विचार और दृष्टिकोण उतने ही अधिक निश्चित होंगे। तुम्हारे विचार और दृष्टिकोण जितने अधिक निश्चित होंगे, जब तुम लिखना शुरू करोगे तब तुम्हारे लिखे में उतना ही अधिक तत्त्व होगा, और तुम उसे लिखकर व्यक्त करने में उतने ही अधिक सक्षम होगे। लेकिन यदि तुम हमेशा केवल अवचेतन रूप से चीजों पर विचार करते हो या बस उनके बारे में सरलता से सोचते हो, तो तुम कोई निश्चित विचार या दृष्टिकोण विकसित नहीं कर पाओगे। जब तुम लिखना शुरू करोगे, तब तुम महसूस करोगे : “मुझे समझ है—मैं इसे लिखकर व्यक्त क्यों नहीं कर सकता?” तुम इसे इसलिए बाहर नहीं ला सकते क्योंकि तुम्हारे पास विचार या दृष्टिकोण नहीं हैं और तुम नहीं जानते कि कैसे लिखना है। विचारों और दृष्टिकोणों के बिना तुम्हारे द्वारा लिखे गए लेख में आत्मा, दिशा और लक्ष्य की कमी होगी और तुम लेख का मुख्य बिंदु निर्धारित नहीं कर पाओगे। यदि तुम नहीं जानते और निर्धारित नहीं कर सकते कि लेख लिखने का लक्ष्य क्या है, तुम उसके माध्यम से क्या परिणाम प्राप्त करने की आशा करते हो, उसमें कौन-से सत्य सिद्धांत शामिल हैं जिन्हें तुम समझ गए हो, और उसमें कौन-सा सत्य शामिल है जिसे तुम समझ गए हो, तो तुम लिखना शुरू नहीं कर पाओगे। यदि तुम ये चीजें निर्धारित कर सकते हो, यदि तुम जानते हो कि सत्य वास्तव में क्या है, तुम्हारी भ्रामकता और विरूपण कहाँ हैं, तुमने किन चीजों को बदल दिया है और अब सत्य समझने के माध्यम से तुमने क्या प्राप्त किया है—यदि तुम इन सभी चीजों पर स्पष्ट हो, तो तुम लिखना शुरू कर पाओगे। कई लोगों ने इस पहलू में पहले ही कुछ लाभ प्राप्त कर लिए हैं, जिसे परमेश्वर के घर द्वारा अपलोड किए गए इन अनुभवजन्य गवाही वाले लेखों से देखा जा सकता है। लोगों के एक हिस्से ने पहले ही निश्चित जीवन प्रवेश करना शुरू कर दिया है, और बेशक, लोगों के एक हिस्से ने सत्य में भी निश्चित लाभ प्राप्त कर लिए हैं। यह निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि सत्य में लाभ प्राप्त करने वाले लोगों के इस हिस्से के भीतर कुछ सत्य सिद्धांत पहले ही उनका जीवन बन गए हैं। यह एक बहुत अच्छी शुरुआत है और यह एक बहुत बड़ी परिघटना भी है। यह कहा जा सकता है कि ये लाभ प्राप्त होना वह प्रभाव है जो इसलिए प्राप्त हुआ है क्योंकि सत्य के विभिन्न पहलुओं पर हमारी संगति इन तमाम वर्षों में अधिक से अधिक विस्तृत और विशिष्ट हो गई है। यह उदाहरण देने का क्या अर्थ है? यह तुम लोगों को यह बताने के लिए है कि इतने वर्षों तक मेरे उपदेश और संगतियाँ सुनने के बाद, उन सत्यों के आधार पर जिन्हें तुम लोग समझ सकते हो, चाहे वे धर्म-सिद्धांत के स्तर पर हों या व्यावहारिक स्तर पर, तुम्हें अब यह नहीं सोचना चाहिए कि परमेश्वर का घर एक तथाकथित “मानव समूह” है। सत्य के चाहे जिस पहलू पर संगति की जा रही हो, तुम लोग चाहे जिस विशिष्ट मामले को जानने का प्रयास कर रहे हो या बुरे लोगों के चाहे जिन विशेष व्यवहारों और घटनाओं पर संगति की जा रही हो, तुम्हें अब उन्हें अविश्वासियों के विचारों और दृष्टिकोणों से नहीं मापना चाहिए। बल्कि, तुम्हें उन्हें परमेश्वर से स्वीकार करना चाहिए, सबक सीखने का प्रयास करना चाहिए, उन्हें गंभीरता से लेना चाहिए और फिर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए और वे सत्य सीखने चाहिए, जिन्हें इन चीजों के भीतर समझा जाना चाहिए। तुम्हें यह बात याद रखनी चाहिए : चाहे वह मेरी संगति हो, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति की संगति हो या नीचे के भाई-बहनों की संगति हो, यदि उसमें वास्तव में एक प्रकार के ऐसे बुरे व्यक्ति के बारे में बताया गया है जिसका भेद लोगों को पहचानना चाहिए या उसमें एक प्रकार का सबक है जिसे सीखा जाना चाहिए, तो अगर उसमें सत्य शामिल है और अगर वह सत्य का वह पहलू है जिसे तुम्हें समझना और बूझना चाहिए, तो तुम्हें उसके साथ सही ढंग से पेश आना चाहिए और उसे गंभीरता से लेना चाहिए। अगर कुछ व्यक्तियों के क्रियाकलाप कुछ हद तक उग्र और हठी भी हों, तो भी अगर तुम उस तरह से कार्य नहीं करते, तो यह ठीक है। सत्य पर ध्यान केंद्रित करो, सत्य में प्रयास करो, वर्तमान मामले के तथ्यों का सार जानो, नकारात्मक हस्तियों को जानो और उनका भेद पहचानो, सकारात्मक चीजों को स्वीकार करो और सकारात्मक मार्ग के अनुसार अभ्यास करो—ऐसा करने में तुम वांछित प्रभाव हासिल करोगे और अच्छा फल प्राप्त करने में सक्षम होगे। तुम्हें इसके साथ अविश्वासियों के दृष्टिकोणों से पेश नहीं आना चाहिए, हमेशा यह नहीं सोचना चाहिए : “परमेश्वर के घर का बुरे लोगों के बारे में संगति करना, उन्हें उजागर करना और उनकी सफाई करना एक अभियान चलाना है; यह हमें कुछ चीजें करने के लिए भड़का रहा है और प्रलोभन दे रहा है। मुझे डर है कि यदि मैंने बुरे लोगों को उजागर किया तो मैं मुसीबत में पड़ जाऊँगा और अपने लिए परेशानी खड़ी कर लूँगा।” इस बारे में चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है; परमेश्वर के घर में सत्य पूर्ण रूप से सत्ता सँभालता है। यदि तुम विश्वास करते हो कि परमेश्वर संप्रभुता रखता है, कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, और कि परमेश्वर धार्मिक है, तो तुम्हें इस मामले के प्रति सही समझ और रवैया रखना चाहिए, और हर मामले और इन विशेष घटनाओं का सामना करते समय सत्य में अच्छे फल प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए, न कि एक तमाशबीन या छद्म-विश्वासी के रूप में कार्य करके खुद को बचाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। क्या तुम समझते हो? (हाँ।) देखो, क्या ये वचन जो मैं बोलता हूँ, तुम लोगों के लिए सहायक हैं? (हाँ।) यदि तुम एक तमाशबीन बनना चाहते हो और डरपोक होकर जीना चाहते हो, तो परमेश्वर में तुम्हारी आस्था बहुत छोटी है; तुम परमेश्वर की धार्मिकता और सर्वशक्तिमत्ता के तथ्यों पर, या इस तथ्य पर कि परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है, विश्वास नहीं करते। अगर यह न कहा जा सके कि तुम छद्म-विश्वासी हो तो भी, कम से कम तुम्हारा रवैया संदेहात्मक है; तुमने अपना हृदय परमेश्वर को नहीं दिया है और तुम्हारे पास परमेश्वर के लिए सच्चा हृदय नहीं है। यह एक प्रकार का व्यक्ति है : यह बहुत डरपोक होता है, और जब कलीसिया सफाई का काम करती है और उसे मसीह-विरोधियों और बुरे लोगों को उजागर करने की आवश्यकता होती है, तो वह पीछे हट जाता है, बचता है और समझौता करता है। एक और प्रकार के छद्म-विश्वासी भी होते हैं, जो ऐसे मामलों का सामना करने पर सोचते हैं : “परमेश्वर का घर फिर से एक अभियान चला रहा है। मैं इसमें भाग नहीं लूँगा। मैं कुछ नहीं कहूँगा। यदि मैंने कुछ गलत कह दिया और मुझे निष्कासित कर दिया गया, तो क्या होगा? मैं किसी को उजागर नहीं करूँगा और किसी को दुश्मन नहीं बनाऊँगा। मुझे बस खुद को बचाना है; मुझे खुद को सुरक्षित रखना है। मैं किसी के बुरे कर्म नहीं देखता, मैं किसी की बेतुकी बातें नहीं सुनता और मैं किसी को ऐसे काम करते हुए नहीं जानता और देखता जो विघ्न-बाधाएँ पैदा करते हों या परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचाते हों। इस सबका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है।” यह एक छद्म-विश्वासी का दृष्टिकोण है। तुम न केवल परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने में विफल रहते हो, बल्कि परमेश्वर के घर पर हँसते भी हो, जबकि साथ ही खुद को बचाने की पूरी कोशिश करते हो और परमेश्वर के घर के हितों के साथ विश्वासघात करते हो। परमेश्वर की दृष्टि में ऐसा व्यक्ति किस प्रकार का व्यक्ति है? क्या परमेश्वर ऐसे लोगों को पसंद करता है? (नहीं, परमेश्वर की दृष्टि में ऐसा व्यक्ति अविश्वासी है।) यदि तुम ऐसे हो, तो परमेश्वर तुम्हें अविश्वासी समझता है। हो सकता है तुम अपना कर्तव्य निभा रहे हो, लेकिन परमेश्वर तुम्हें स्वीकार नहीं करता या तुम्हें अपने सृजित प्राणी के रूप में मान्यता नहीं देता—इसका मतलब तुम्हारे लिए परेशानी है। अगर तुम खुद को काफी अच्छी तरह से बचा लेते हो तो भी, उसका कोई उपयोग नहीं है; तुम्हें परमेश्वर को अपनी रक्षा करने देनी चाहिए। यदि परमेश्वर तुम्हारी रक्षा करता है, तो तुम पूरी तरह से सुरक्षित रहोगे; यदि परमेश्वर तुम्हारी रक्षा करता है, तो तुम सत्य और परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने में सक्षम होगे। तुम्हें परमेश्वर की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करनी चाहिए और वह कर्तव्य और जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए जो एक व्यक्ति को पूरी करनी चाहिए; अपने भरोसे खुद को बचाने की कोशिश मत करो। तुम कितने सक्षम हो, कि तुम अपने जीवन की रक्षा कर सकते हो? तुम कितने सक्षम हो, कि तुम अपनी मंज़िल सुरक्षित कर सकते हो? तुम इतने सक्षम नहीं हो; तुम्हारा खुद पर नियंत्रण नहीं है। यदि तुम समझदार हो, तो तुम्हें खुद को सौंप देना चाहिए, किसी भी मामले का सामना करते समय एक सृजित प्राणी के रूप में अपना उचित स्थान लेना चाहिए, अपनी जिम्मेदारियाँ और अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। यदि तुम अपना कर्तव्य निष्ठापूर्वक और अच्छी तरह से निभा सकते हो और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा कर सकते हो, तो देखो कि क्या परमेश्वर तुम्हें शैतान को सौंप देगा, क्या तुम मर जाओगे और क्या कलीसिया तुम्हें निष्कासित कर देगी। यदि तुम इसके बारे में भी निश्चित नहीं हो सकते, तो तुम एक पक्के छद्म-विश्वासी हो; तुम एक अविश्वासी हो। परमेश्वर अविश्वासियों का उद्धार नहीं करता या उन्हें पूर्ण नहीं बनाता; वह ऐसे लोगों को नहीं चाहता। क्या तुम समझते हो? (हाँ।) जब तुम्हारे पास ऐसे विचार और दृष्टिकोण आ जाएँ, तो अगली बार जब तुम किसी मामले का सामना करो, तब उससे अलग मत रहो। तुम्हें खुद को इस बड़े परिवार का एक सदस्य मानना चाहिए, जो कि परमेश्वर का घर है। परमेश्वर के घर के हित हर भाई-बहन के हितों से जुड़े हैं और वे तुम्हारे हितों से भी जुड़े हैं। जब परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचता है, तब तुम्हें यह समझना चाहिए कि तुम्हारे हितों को भी नुकसान पहुँचता है। तुम्हें इसे रोकने और इसका भेद पहचानने के लिए उठ खड़ा होना चाहिए और फिर परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने के लिए भाई-बहनों के साथ संगति करनी चाहिए। परमेश्वर के घर के लोगों को यही करना चाहिए और उन्हें यही व्यवहार प्रदर्शित करना चाहिए; परमेश्वर के लोगों और राज्य के अच्छे सैनिकों को यही करना चाहिए। क्या तुम समझते हो? (हाँ।)

ठीक है, आज हम अपनी संगति यहीं समाप्त करेंगे। अलविदा!

19 अक्टूबर 2024

पिछला: सत्य का अनुसरण कैसे करें (27)

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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