सत्य का अनुसरण कैसे करें (25)

हमारी पिछली संगति की विषय-वस्तु “अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना” के विषय से संबंधित थी, जिसमें विशेष रूप से परमेश्वर के देहधारी शरीर से संबंधित पहलुओं पर चर्चा की गई थी। हमने इस बात पर संगति की थी कि लोगों को कैसे परमेश्वर के देहधारी शरीर को जानना और उसके साथ व्यवहार करना चाहिए। पहला सिद्धांत है देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्ग में परमेश्वर से न करना। दूसरा सिद्धांत क्या है? (दूसरा सिद्धांत है देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के बराबर न समझना।) अब जबकि हमने देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्ग में परमेश्वर से न करने के विषय पर संगति समाप्त कर ली है, तो क्या तुम लोगों में इस बारे में कोई नई समझ है कि देहधारी परमेश्वर के साथ कैसे व्यवहार किया जाए? क्या तुमने देहधारी परमेश्वर के बारे में अपनी कुछ पिछली धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग दिया है और पृथ्वी पर परमेश्वर को अधिक व्यावहारिक रूप से जानने में सक्षम हुए हो? क्या तुमने यह महसूस किया है कि परमेश्वर के संबंध में तुम लोगों के पिछले कुछ विचार, समझ या रवैये मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं के परिणाम थे? अब, इस तरह से संगति करने के माध्यम से, सबसे पहले, ज्ञान के लिहाज से, तुमने देहधारण के संबंध में अपनी कई धारणाओं और कल्पनाओं को सही कर लिया है, और आगे चलकर, जिस रवैये और नजरिये से तुम परमेश्वर के साथ व्यवहार करते हो, वह भी थोड़ा अधिक व्यावहारिक और सटीक हो सकता है। क्या तुम सभी के पास इस बारे में कुछ अनुभवजन्य ज्ञान है? (हाँ। पहले, परमेश्वर के देहधारी शरीर के बारे में मेरी कुछ विचित्र धारणाएँ और कल्पनाएँ थीं, मुझे लगता था कि परमेश्वर सब कुछ समझता है और सर्वज्ञ है। परमेश्वर की पिछली दो संगतियों के माध्यम से मुझे समझ में आया कि देहधारी परमेश्वर बहुत सामान्य और व्यावहारिक है। उदाहरण के लिए, जब वह किसी देश में जाता है, तो वह स्थानीय कानूनों को भी देखता है और नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्यनिष्ठा से काम करने को अपना उसूल मानता है। इस बात ने मुझे थोड़ा प्रभावित किया, क्योंकि मैं नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण या कर्तव्यनिष्ठा से काम नहीं करता; कभी-कभी मैं अनुशासनहीन हो जाता हूँ, और यहाँ तक कि मैं कमियों का फायदा भी उठाना चाहता हूँ। परमेश्वर की संगति सुनने के बाद, मुझे लगा कि मेरे हृदय में परमेश्वर की छवि अचानक व्यावहारिक और ठोस हो गई।) अब, इस विषय-वस्तु पर संगति करने के माध्यम से, लोगों ने परमेश्वर के बारे में कुछ अधिक वस्तुनिष्ठ और व्यावहारिक ज्ञान और भावनाएँ प्राप्त कर ली हैं। क्या ये भावनाएँ तुम्हें परमेश्वर के व्यावहारिक अस्तित्व को और भी अधिक महसूस कराती हैं, या देहधारी परमेश्वर को इतनी सामान्यता और व्यावहारिकता से बोलते और कार्य करते देखकर तुम्हें लगता है कि परमेश्वर इतना साधारण—यहाँ तक कि अकल्पनीय भी—है कि इसके बजाय तुम्हारे मन में संदेह पैदा हो जाता है और तुम परमेश्वर से और दूर हो जाते हो? परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता की ये अभिव्यक्तियाँ परमेश्वर के बारे में उन धारणाओं और कल्पनाओं के साथ पूरी तरह से असंगत हैं जिन्हें अधिकांश लोग अपने भीतर रखते हैं; वे बहुत अलग हैं, और वे ऐसी चीजें भी हैं जिनके बारे में लोगों ने कभी सोचा भी नहीं था। तो, इस विषय-वस्तु को सुनने के बाद, क्या तुम परमेश्वर के देहधारी शरीर से बहुत निराश महसूस करते हो? (नहीं। सुनने के बाद, मुझे लगता है कि मेरे हृदय में मसीह की छवि अधिक ठोस हो गई है और वह बहुत सुलभ लगता है। पहले, मुझे लगता था कि मसीह पृथ्वी पर आया स्वर्ग में का परमेश्वर है, और उसे बहुत प्रभावशाली और महान होना चाहिए। लेकिन अब मैं देखता हूँ कि मसीह बहुत साधारण और व्यावहारिक है; वह उसी तरह मानव संसार के कानूनों का पालन करता है, और साथ ही हमें पोषण देने के लिए व्यावहारिक रूप से सत्य व्यक्त करता है। इससे वह मुझे अत्यंत व्यावहारिक और ठोस लगता है। मुझे लगता है कि परमेश्वर के साथ मेरा रिश्ता अब उतना दूर का नहीं रहा, और इसके बजाय मैं परमेश्वर के और करीब आ गया हूँ।) क्या तुम सभी लोग ऐसा ही महसूस करते हो? क्या तुम सभी ने ऐसे ही लाभ प्राप्त किए हैं? (हाँ।) ऐसा है तो, इस विषय-वस्तु पर संगति करना अभी भी आवश्यक है। यह सत्य का वह पहलू है, जिसकी लोगों को आवश्यकता है और जो उनमें होना चाहिए; यह अपरिहार्य है। सत्य का अनुसरण करने की प्रक्रिया में, सत्य का यह वो पहलू है जिसे लोगों को अवश्य समझना चाहिए। जब लोग सत्य के इस पहलू को समझ लेते हैं, तब लोगों और परमेश्वर के बीच का रिश्ता अधिक सामान्य हो जाएगा। है ना? (हाँ।) इस विषय-वस्तु में मुख्य रूप से परमेश्वर के देहधारी शरीर की सामान्यता और व्यावहारिकता की कुछ अभिव्यक्तियों पर संगति करना शामिल है, जिससे लोग परमेश्वर के देहधारी शरीर का सार, और साथ ही आचरण और कार्य करने के उसके कुछ शुरुआती बिंदु और सिद्धांत जान सकें। ये शुरुआती बिंदु, सिद्धांत और कार्य करने के विशिष्ट दृष्टिकोण जानकर, लोग परमेश्वर को अधिक वस्तुनिष्ठ और व्यावहारिक रूप से समझ सकते हैं और उसकी सामान्यता और व्यावहारिकता को समझ सकते हैं।

देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता को समझने के माध्यम से, क्या तुम्हें स्वर्ग में परमेश्वर के बारे में अपनी कुछ धारणाओं और कल्पनाओं को पहचानने में सक्षम नहीं होना चाहिए? जब देहधारी परमेश्वर लोगों के बीच आता है, तब आचरण और कार्य करने में वह नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्यनिष्ठा से काम करने के सिद्धांत का पालन करता है। तो फिर, स्वर्ग में परमेश्वर के बारे में क्या कहोगे? यद्यपि उसके पास स्व-आचरण के ठोस व्यवहार नहीं हैं और वह स्व-आचरण के विभिन्न पहलुओं में शामिल नहीं है, फिर भी, यह देखते हुए कि परमेश्वर किस तरह कार्य करता है—चाहे वह बाइबल के अभिलेखों पर आधारित हो या परमेश्वर के कार्यों के बारे में लोग जो समझते, देखते और अनुभव करते हैं, उस पर आधारित हो—क्या देहधारी परमेश्वर जिस तरह आचरण और कार्य करता है, उसका उसके सार और सिद्धांतों के साथ कोई टकराव है? (नहीं।) सैद्धांतिक रूप से, हमें यह निश्चित करने में सक्षम होना चाहिए कि कोई टकराव नहीं है। यद्यपि स्वर्ग में परमेश्वर को लोगों द्वारा देखा या छुआ नहीं जा सकता, फिर भी, वह भी कर्तव्यनिष्ठा से और व्यावहारिक रूप से कार्य करता है। परमेश्वर के देहधारी शरीर का एक सामान्य और व्यावहारिक पक्ष है जिसे लोग देख और जान सकते हैं, और स्वर्ग में परमेश्वर का भी इसी तरह एक सामान्य और व्यावहारिक पहलू है। हम परमेश्वर की सामर्थ्य, अधिकार, बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता, इत्यादि की बात नहीं करेंगे—वह परमेश्वर को जानने, परमेश्वर के सार को जानने और परमेश्वर की पहचान को जानने का एक पहलू है, जो शायद तुम लोगों की पहुँच से बाहर हो। लेकिन परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कुछ कार्यों के संदर्भ में, जिन्हें लोग देख और अनुभव कर सकते हैं, स्वर्ग में परमेश्वर अभी भी इस सामान्य और व्यावहारिक पहलू को प्रकट करता है। उदाहरण के लिए, बाइबल में दर्ज है कि परमेश्वर ने आदम और हव्वा को बनाया, उनमें अपनी साँस फूँकी ताकि वे आत्माओं वाले जीवित लोग बन जाएँ, और फिर उन्हें अदन की वाटिका में रख दिया। परमेश्वर द्वारा मानवजाति के पूर्वजों, आदम और हव्वा को बनाने से पहले, परमेश्वर ने कई कार्य किए, जो सभी परमेश्वर द्वारा बनाए गए इन दो लोगों के लिए तैयार किए गए थे। मनुष्य के लिए परमेश्वर ने स्वर्ग और पृथ्वी, नदियाँ और झीलें, पृथ्वी पर विभिन्न जीवित चीजें, चार ऋतुएँ, और मनुष्य की जरूरत की अन्य सभी चीजें बनाईं। इन दो लोगों को बनाने से पहले परमेश्वर ने यह कार्य कदम-दर-कदम पहले ही पूरा कर लिया था। उसके द्वारा उठाए गए हर कदम के साथ परमेश्वर द्वारा बनाई गई ये सभी चीजें व्यावहारिक रूप से इस भौतिक संसार में धीरे-धीरे उभरकर सामने आ गईं, और ये सभी ऐसी चीजें हैं जिन्हें इंसानी आँखों से देखा जा सकता है। जब ये दो लोग अस्तित्व में आए, तब यह सब तैयार था। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि इन दो लोगों को बनाने के बाद परमेश्वर ने उनके लिए क्या किया, तो यह भी बाइबल में दर्ज है। पहले, परमेश्वर ने उन्हें अदन की वाटिका में रखा, और फिर उसने बहुत ही व्यावहारिक तरीके से उनसे कुछ कहा। उसने क्या कहा? (“तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना : क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा” (उत्पत्ति 2:16-17)।) परमेश्वर ने मानवजाति को यह निर्देश दिया, और फिर कई घटनाएँ हुईं। उसके बाद, परमेश्वर ने आदम और हव्वा के लिए क्या किया? (उसने उनके लिए चमड़े के अँगरखे बनाए।) परमेश्वर ने उन्हें पहनाने के लिए चमड़े के अँगरखे बनाए; तुम लोग इस कहानी से बहुत अच्छी तरह परिचित होने चाहिए। क्या परमेश्वर द्वारा कही गई, की गई और निर्देशित की गई चीजों की इस शृंखला से एक जीवंत तस्वीर नहीं बनती? (बनती है।) इन दृश्यों के माध्यम से, लोग गहराई से या सचमुच यह समझ पाते हैं कि परमेश्वर की हर एक गतिविधि में जो कुछ प्रकट या शामिल होता है, वह खोखला नहीं है, और इसके अलावा, परमेश्वर द्वारा की गई हर चीज से लोगों के सामने प्रस्तुत होने वाले दृश्य भी खोखले नहीं हैं। है ना? (हाँ।) परमेश्वर द्वारा किया गया एक भी कार्य खोखला नहीं है और एक भी कार्य केवल सिद्धांत या नारा नहीं है; वह सब कुछ व्यावहारिक रूप से करता है। कुछ लोग कहते हैं, “कभी-कभी परमेश्वर एक विचार से ही काम पूरे कर देता है और कभी-कभी वह सिर्फ एक वचन से ही काम पूरे कर देता है।” परमेश्वर इस मामले को चाहे जैसे भी पूरा करे, हर हाल में वह इसे व्यावहारिक रूप से कर रहा है; वह व्यावहारिक और कर्तव्यनिष्ठ तरीके से कार्य कर रहा है। वह नारे नहीं लगाता या धर्म-सिद्धांत नहीं बघारता, न ही वह लोगों को धोखा देता है। व्यावहारिक रूप से कार्य करने में क्या शामिल है? परमेश्वर योजना बनाता है और विचार करता है, और जब वह कुछ करता है, तब वह अपने विचारों का उपयोग कर सकता है, या अपने वचनों का उपयोग कर सकता है, या व्यक्तिगत रूप से उसे अपने हाथों से कर सकता है। इंसानी भाषा में “व्यक्तिगत रूप से कुछ करने” को हम कैसे व्यक्त करते हैं? इसका अर्थ है व्यक्तिगत रूप से मामले को सँभालने जाना, व्यक्तिगत रूप से उसमें व्यस्त होना, और व्यक्तिगत रूप से उसे अपने हाथों से करना। “व्यक्तिगत रूप से” के इन सभी उदाहरणों को देखते हुए, क्या परमेश्वर अपने कार्य करने के तरीके में विशेष रूप से व्यावहारिक और कर्तव्यनिष्ठ नहीं है? (है।) निस्संदेह, मनुष्य जिस तरह से कार्य करते हैं, उसका वर्णन करने वाले इन शब्दों का उपयोग स्वर्ग में परमेश्वर के कार्य करने के तरीके का वर्णन करने के लिए करना बहुत उचित नहीं है, लेकिन इंसानी भाषा सीमित है। अगर लोग यह समझ सकते हैं कि परमेश्वर इतने व्यावहारिक और यथार्थवादी तरीके से कार्य करता है, कि वह व्यवस्थित है, कभी बेमन से काम नहीं करता और कभी नारे नहीं लगाता, तो इतना पर्याप्त है। इंसानी हाथों द्वारा दर्ज किए गए परमेश्वर के सभी कार्यों में से, कौन-सा ऐसा कार्य है जिसकी परमेश्वर ने स्वयं व्यक्तिगत रूप से योजना नहीं बनाई, जिसे कदम-दर-कदम लागू नहीं किया, और व्यक्तिगत रूप से जिस पर अनुवर्ती कार्रवाई नहीं की, जिसका निरीक्षण और सत्यापन नहीं किया? यद्यपि ये बातें इंसानी हाथों द्वारा दर्ज की गई हैं और लिखित रूप में प्रस्तुत की गई हैं, लेकिन इन्होंने मानवजाति के लिए परमेश्वर को जानने और समझने का सबसे अच्छा ठोस प्रमाण छोड़ा है।

आदम और हव्वा को बनाने के बाद परमेश्वर ने एक अन्य कार्य किया : उसने उन्हें बताया कि अपना जीवन कैसे जीना है, पुरुष को कौन-सी जिम्मेदारियाँ उठानी चाहिए और स्त्री को कौन-से कार्य करने चाहिए। देखो, परमेश्वर के वचन कितने विस्तृत और विशिष्ट हैं! मानव इस तरह से अपना काम नहीं करेंगे, है ना? (हाँ।) परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य का हर कदम इतना विशिष्ट, व्यावहारिक और यथार्थवादी है; वह परिणामों का लक्ष्य रखता है। और यह क्या दर्शाता है? स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजें बनाने जैसे बड़े मामले को एक तरफ रख दें; केवल परमेश्वर ने मानवजाति से जो कहा है और मानवजाति को जो नसीहतें दी हैं, उनकी और साथ ही उसकी चिंताओं की बात करें, जिनमें हर एक बात के लिए उसकी विशिष्ट नसीहतें, निर्देश और चेतावनियाँ शामिल हैं, तो ये क्या दर्शाती हैं? एक पहलू से, तुम देखते हो कि परमेश्वर अपने कार्य करने के तरीके में बहुत सख्त और गंभीर है। दूसरे पहलू से—और यह ऐसी बात भी है जो मानवजाति को जाननी चाहिए—परमेश्वर ने मानवजाति को बनाया, और उसके लिए अपनी चिंता के अलावा, वह हमेशा उसके प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करता रहा है। यह जिम्मेदारी पूरी करना कोई खोखली बात नहीं है; परमेश्वर हमेशा इसे निभाता रहा है। जब से परमेश्वर ने मानवजाति को बनाया है, तब से लेकर अब तक परमेश्वर हमेशा लोगों के जीवन को केंद्र में रखकर मानवजाति का पोषण और अगुआई करता रहा है। मानवजाति के प्रति परमेश्वर के कार्य अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के अलावा कुछ नहीं रहे हैं। “अपनी जिम्मेदारी पूरी करना” वाक्यांश लिखना आसान है और कहना आसान है, लेकिन परमेश्वर ने जितने कार्य किए हैं, वे इंसानी कल्पना से परे हैं। व्यापक रूप से कहें तो, इसका अर्थ है परमेश्वर द्वारा हर आत्मा के पुनर्जन्म की व्यवस्था करना—वे किस तरह के परिवार में रहेंगे, वे कैसे दिखेंगे, वे कब परमेश्वर में विश्वास करने आएँगे, इस जीवन में उनका भाग्य कैसा होगा, और ऐसी ही कई अन्य चीजें। ये वे व्यवस्थाएँ हैं, जो परमेश्वर लोगों के लिए बड़े स्तर पर करता है। जहाँ तक इससे छोटी चीजों का सवाल है, तो परमेश्वर तुम्हारी दैनिक जरूरतों का इंतजाम करता है, सुनिश्चित करता है कि तुम भोजन और कपड़ों की चिंताओं से मुक्त रहो, और तुम्हारा भौतिक जीवन सुरक्षित रहे। जहाँ तक और भी छोटी चीजों का संबंध है, परमेश्वर रोज तुम्हारे बढ़ने के साथ तुम्हारा साथ देने के लिए और हर दिन, हर भिन्न अवधि और यहाँ तक कि हर विशेष अवधि से गुजरते समय तुम्हारे साथ रहने के लिए विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों की व्यवस्था करता है, जिससे तुम सृष्टिकर्ता, मानवजाति, स्वयं और जीवन के बारे में लगातार नई समझ और नई भावनाएँ प्राप्त कर सको। परमेश्वर ने बहुत सारे सत्य व्यक्त किए हैं और बहुत सारे कार्य किए हैं—उसका कौन-सा वचन केवल एक नारा या धर्म-सिद्धांत है? उसके द्वारा किया गया कौन-सा कार्य खोखला और अव्यावहारिक है? उसके द्वारा किया जाने वाला एक भी कार्य खोखला नहीं है, और उसके द्वारा बोला जाने वाला एक भी वचन केवल नारा या धर्म-सिद्धांत नहीं है। इसके विपरीत, परमेश्वर हमेशा से ये कार्य करता आ रहा था, यहाँ तक कि मानवजाति को इनके बारे में जताने से पहले भी। यद्यपि मानवजाति इन तथ्यों को नहीं जानती, समझती, इन पर विश्वास नहीं करती या इन्हें स्वीकार नहीं करती, फिर भी परमेश्वर ने इन्हें दृढ़ता से करना जारी रखा है। चलो, इन बातों को एक तरफ रख दें कि परमेश्वर ने मानवजाति के लिए कितने कार्य किए हैं, उसने मानवजाति पर कितना श्रम किया है और उसने मानवजाति पर कितना अनुग्रह किया है। केवल परमेश्वर के कर्मों की बात करें, तो उनमें से कौन-सा कर्म व्यावहारिक तरीके से और कदम-दर-कदम नहीं किया गया है? (वह हर एक कार्य व्यावहारिक तरीके से करता है।) देखो, मनुष्य अपने बच्चों की परवरिश कैसे करते हैं : वे खानापूरी करते हैं और जैसे-तैसे काम चलाते हैं; कभी-कभी वे भावुक हो जाते हैं, कभी-कभी अति कर देते हैं, और कभी-कभी अपनी व्यक्तिगत पसंद बीच में ले आते हैं, अपनी बेटियों को ज्यादा महत्व नहीं देते, लेकिन अपने बेटों पर प्यार लुटाते हैं, उन्हें बिगाड़ते हैं और सिर पर चढ़ाते हैं, गैर-जिम्मेदाराना तरीके से काम करते हैं और परिणामों पर विचार नहीं करते। बच्चों की परवरिश करना और उन्हें शिक्षित करना लोगों की जिम्मेदारी है, लेकिन क्या लोगों ने इस जिम्मेदारी को पूरा किया है? (नहीं।) देखो, परमेश्वर द्वारा हर काम कितनी पूर्णता से किया जाता है, जिससे मानवजाति परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के तहत सही मार्ग पर चलने, और परमेश्वर के मार्गदर्शन में जीने में सक्षम होती है। परमेश्वर के कार्य का एक भी कदम या उसके द्वारा किया जाने वाला एक भी कार्य खोखला नहीं है; वह सब व्यावहारिक है। दुनिया के निर्माण से लेकर अब तक, परमेश्वर ने चाहे कितना भी कार्य किया हो, और मानवजाति यह सब जानती या इसे स्वीकार करती हो या नहीं, लोगों के प्रति परमेश्वर के कार्य और उनके प्रति जो जिम्मेदारी वह पूरी करता है, वे हर हाल में व्यापक और पूर्ण हैं, उनमें जरा भी कमी नहीं है। वह कभी खानापूरी करने वाला नहीं होता और बिल्कुल भी कभी लापरवाह नहीं होता। “कभी लापरवाह नहीं” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि वह हर व्यक्ति के साथ गंभीर तरीके से, विशेष ईमानदारी और सख्ती के साथ, हमेशा नियमों का पालन करने वाले तरीके से व्यवहार करता है और व्यक्तिगत पसंद के अनुसार कभी नहीं करता, और मनुष्य की मनमानी या खानापूरी के बिना करता है। चलो, बाकी सब चीजें एक तरफ रख देते हैं; बस लोगों की सुरक्षा संरक्षित करने के मामले को लो—परमेश्वर इसे कितनी अच्छी तरह करता है? हर व्यक्ति का जीवन, मृत्यु और व्यक्तिगत सुरक्षा परमेश्वर के हाथों में है। परमेश्वर के लिए यह सबसे बड़ा मामला है। यहाँ तक कि अगर तुम कभी-कभी किसी खतरे का सामना करते हो और मृत्यु के आमने-सामने आ जाते हो, तो भी यदि वह दिन तुम्हारी मृत्यु का दिन नहीं है, तो परमेश्वर तुम्हें मरने नहीं देगा। यदि परमेश्वर द्वारा तुम्हारी मृत्यु नियत नहीं है, तो परमेश्वर तुम्हारी सुरक्षा की गारंटी देगा। यह अचूक है, और परमेश्वर इसे बहुत गहन और सटीक तरीके से सँभालता है। संक्षेप में, मैंने जो कुछ भी कहा है वह सब सच है और इसे लोगों द्वारा देखा जा सकता है। लोग यह नहीं देख सकते कि स्वर्ग में परमेश्वर कैसे कार्य करता है, लेकिन देर-सबेर वे परमेश्वर द्वारा किए गए कार्यों के तथ्य और उसके द्वारा प्राप्त किए जाने वाले परिणाम देख पाएँगे। पृथ्वी पर मानवजाति के कई हजार वर्षों के जीवन के दौरान, कौन परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के बिना रह पाया है? कौन परमेश्वर के पोषण और मार्गदर्शन के बिना काम चला पाया है? (कोई भी उनके बिना काम नहीं चला सकता।) परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाएँ, उसका पोषण और मार्गदर्शन, सब स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किए जाते हैं और व्यावहारिक रूप से किए जाते हैं। परमेश्वर के इतने व्यावहारिक और कर्तव्यनिष्ठ तरीके से कार्य किए बिना मानवजाति बहुत पहले ही अराजकता में होती; कम से कम, कोई भी मानवजाति के लिए व्यवस्था बनाए रखने में सक्षम न होता। इसलिए, चाहे छोटी बातों में हो या बड़ी बातों में, जिन लोगों ने अब तक परमेश्वर का अनुसरण किया है, उन्हें यह समझने में सक्षम होना चाहिए कि परमेश्वर न केवल अपने देहधारी शरीर में बोलता है, चीजें करता है और कार्य करता है, मानवजाति को सत्य, मार्ग और जीवन प्रदान करता है, बल्कि परमेश्वर का आत्मा भी निरंतर मानवजाति पर संप्रभुता रख रहा है, उसकी अगुआई कर रहा है और उसका पोषण कर रहा है, और यह सब व्यावहारिक रूप से किया जाता है। बात बस यह है कि लोग देहधारी परमेश्वर को बोलते और कार्य करते हुए देख सकते हैं, सुन सकते हैं और व्यावहारिक रूप से समझ सकते हैं, जबकि स्वर्ग में परमेश्वर जो करता है, उसका दायरा बहुत बड़ा है और लोगों से थोड़ा अलग है, इसलिए लोग इसे उस तरह से करीब से महसूस नहीं कर सकते और समझ नहीं सकते, जिस तरह से वे देहधारी परमेश्वर के बोलने और कार्य करने पर करते हैं। इसलिए, जब स्वर्ग में परमेश्वर या पृथ्वी पर परमेश्वर को जानने की बात आती है, तो लोगों को मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं से छुटकारा पाना चाहिए, खोखले सिद्धांतों और नारों से मुक्त होना चाहिए, और परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्यों और उसके द्वारा बोले जाने वाले वचनों के माध्यम से परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता को और साथ ही उसकी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को व्यावहारिक रूप से समझना चाहिए। इस तरह, एक पहलू से, तुम परमेश्वर के देहधारी शरीर के साथ सही ढंग से व्यवहार कर सकते हो; दूसरे पहलू से, तुम स्वर्ग में परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से बेहतर तरीके से छुटकारा पा सकते हो; और एक और पहलू से, तुम बेहतर तरीके से जान सकते हो कि पृथ्वी पर परमेश्वर और स्वर्ग में परमेश्वर एक ही हैं, बजाय इसके कि तुम स्वर्ग में परमेश्वर के बारे में अपनी काल्पनिक धारणाओं और कल्पनाओं को परमेश्वर के देहधारी शरीर पर थोपो—ऐसा करना एक बड़ी गलती होगी। यानी, एक पहलू से, तुम काल्पनिक धारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग करके स्वर्ग में परमेश्वर का मूल्यांकन कर रहे होगे, और साथ ही, तुम पृथ्वी पर परमेश्वर को बेहतर तरीके से स्वीकार और ग्रहण करने में सक्षम नहीं होगे। ये दोनों चीजें करने से न केवल तुम परमेश्वर के करीब नहीं आ पाओगे, बल्कि इसके बजाय तुम उससे और दूर हो जाओगे, जिससे तुम अपनी ही खोखली धारणाओं और कल्पनाओं में जीने लगोगे, और परमेश्वर द्वारा की जाने वाली सभी चीजों को समझने में असमर्थ हो जाओगे।

“देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्ग में परमेश्वर से न करने” पर संगति करने के माध्यम से, क्या लोग इस संबंध में सटीक रूप से अभ्यास करने में सक्षम हैं? (हाँ।) संक्षेप में, देहधारी परमेश्वर के साथ व्यवहार करने में, यदि तुम उसे स्वीकार कर सको, और फिर उसकी सामान्यता और व्यावहारिकता को जान सको, और उसके वचनों और कार्य तथा लोगों से उसकी अपेक्षाओं को स्वीकार कर सको और उनके प्रति समर्पण कर सको, तो इतना पर्याप्त है। जहाँ तक देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता के भीतर देह की प्रवृत्तियों और अंतर्निहित स्थितियों का संबंध है, लोगों को बस उनकी सही समझ होनी चाहिए और उन्हें उनके साथ सही ढंग से व्यवहार करने में सक्षम होना चाहिए। देहधारी परमेश्वर एक साधारण मानव-पुत्र है; उसमें निश्चित रूप से देह की वे अंतर्निहित स्थितियाँ और सामान्य प्रवृत्तियाँ तथा प्रकार्य मौजूद हैं जो एक व्यक्ति में होने चाहिए। उदाहरण के लिए, जब किसी साधारण व्यक्ति का हाथ आग को छूता है तो उसे गर्मी महसूस होगी, और देहधारी परमेश्वर भी इसका अपवाद नहीं है। एक सामान्य व्यक्ति को ठंड लगने के बाद छींक आएगी, और यदि मामला गंभीर हुआ तो उसे जुकाम हो जाएगा। क्या देहधारी परमेश्वर भी ऐसा ही है? (हाँ।) यदि भोजन में बहुत अधिक नमक हो तो मानवों को प्यास लगेगी, और यदि वे अपाच्य भोजन खाएँगे तो उनका पेट खराब हो जाएगा। क्या परमेश्वर के देहधारी शरीर में ये भावनाएँ हैं? (हाँ।) गर्म मौसम में मानवों को गर्मी लगेगी और वे कोई ठंडी जगह खोजना चाहेंगे; देहधारी परमेश्वर भी ऐसा ही है। तुम लोग पहले क्या सोचते थे? क्या तुम अपने मन में यह सोचते थे, “हम मनुष्यों की यह नश्वर देह तापमान तीस या चालीस डिग्री सेल्सियस तक पहुँचने पर गर्मी बर्दाश्त नहीं कर सकती, लेकिन परमेश्वर का देहधारी शरीर गर्मी से नहीं डरता; वह देह से परे है और उसमें ये संवेदनाएँ नहीं हैं”? यहाँ क्या निहितार्थ है? क्या लोग सोचते हैं कि देहधारी परमेश्वर किसी रोबोट या लकड़ी की मूर्ति की तरह है, जो खाता, सोता और बीमार नहीं पड़ता? यह गलत है। देहधारी परमेश्वर का देह का जीवन है, जो किसी सामान्य व्यक्ति के समान ही है। वह असाधारण या अपरंपरागत नहीं है। इस देह का एक सामान्य और व्यावहारिक पक्ष है, जो यह है कि उसके देह के प्रकार्य और प्रवृत्तियाँ मानवजाति के समान ही हैं। हमने पहले इस बारे में संगति की थी कि कैसे देह के प्रकार्य और प्रवृत्तियाँ सभी वे चीजें हैं जो परमेश्वर ने मानवजाति को तब प्रदान की थीं जब उसने उसे बनाया था; वे मानवजाति में जन्मजात रूप से हैं, वे नकारात्मक चीजें नहीं हैं। तो फिर तुम लोग हमेशा इस तथ्य को नजरअंदाज क्यों करते हो कि देहधारी परमेश्वर में देह के सामान्य प्रकार्य और प्रवृत्तियाँ हैं? क्या लोगों के इसे नजरअंदाज करने का कारण यह है कि वे सोचते हैं कि ये चीजें असामान्य हैं, देह के सामान्य प्रकार्यों की इन अभिव्यक्तियों के खिलाफ अपने हृदय में पूर्वाग्रह रखते हैं, और देहधारी परमेश्वर में इन अभिव्यक्तियों के होने के विरोधी हैं? (बेशक मैं भी अपने हृदय में इन व्यावहारिक चीजों को तुच्छ समझता हूँ।) यद्यपि लोग इन चीजों को तुच्छ समझ सकते हैं, या सचेत स्तर पर इस बारे में अनिश्चित रह सकते हैं कि ये सही हैं या गलत, लेकिन अवचेतन रूप से वे इनकी निंदा करेंगे। यह साबित करता है कि लोगों में मानव देह की प्रवृत्तियों, प्रकार्यों और उसकी कुछ अंतर्निहित स्थितियों की गहन समझ का अभाव है, जो सभी परमेश्वर द्वारा बनाई गई थीं, और यही कारण है कि उनके कई विरूपित विचार हो सकते हैं, या कई अव्यावहारिक धारणाएँ और कल्पनाएँ हो सकती हैं। मुझे बताओ, क्या देहधारी परमेश्वर को सोने की आवश्यकता है? (हाँ।) जब वह सोता है, तो क्या वह तब भी कार्य के बारे में सोच रहा होता है? (नहीं, वह सो रहा होता है।) यह एक ईमानदार जवाब है; वह वास्तव में सो रहा होता है। अन्यथा, उसे आराम कैसे मिल सकता है? उसके मस्तिष्क को भी आराम की आवश्यकता है; यह देह का एक सामान्य प्रकार्य है, और देह की एक प्रवृत्ति भी है। जब ठंड होती है तो वह मोटे कपड़े पहनता है, और जब गर्मी होती है तो वह पतले कपड़े पहनता है। वह सर्दी, गर्मी, बारिश और बर्फ महसूस कर सकता है। यह सामान्य मानवता है; यह बिल्कुल भी खोखली नहीं है। यदि तुम कुछ भी महसूस नहीं कर सकते, तो क्या तुम थोड़े मूर्ख नहीं हो? क्या तुम मंदबुद्धि नहीं हो? (हाँ।) परमेश्वर के देहधारी शरीर की सभी इंद्रियाँ और शारीरिक प्रकार्य वास्तविक हैं, वे वास्तव में मौजूद हैं, और वे सामान्य रूप से कार्य करते हैं; वे बिल्कुल भी खोखले नहीं हैं। फिर भी तुम लोग उनके खोखले और अलौकिक होने की कल्पना करते हो। मैं एक बार एक चीनी व्यक्ति से मिला, जिसकी आस्था थोड़ी विचित्र थी। उसका मानना था कि आस्था में कुछ विचित्र और भयानक चीजें शामिल होनी चाहिए, और केवल यही आस्था है। उदाहरण के लिए, जब बारिश होती थी, तो वह किसी प्रकार का मंत्रोच्चार करता था और बारिश उस पर नहीं गिरती थी, और जब वह कोई दूसरा मंत्रोच्चार करता था, तो बारिश रुक जाती थी। वह इसका दिखावा तक करता था और सोचता था कि उसमें वास्तविक क्षमताएँ हैं। उसका मानना था कि यही आस्था है, और यह साधारण आस्था से उच्चतर है। क्या तुम लोग कहोगे कि यह व्यक्ति काफी बेतुका है? (हाँ।) यह एक दुष्ट आत्मा है। लेकिन इस तरह के व्यक्ति के विचार और दृष्टिकोण लोगों के एक हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। अनेक लोग देहधारी परमेश्वर के बारे में हमेशा धारणाओं और कल्पनाओं से भरे रहते हैं, वे अपने हृदय में कहते हैं : “परमेश्वर का देहधारी शरीर निश्चित रूप से कोई असाधारण व्यक्ति होगा या कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने ‘मार्ग’ प्राप्त कर लिया है। वह वे कार्य कर सकता है जो साधारण लोग नहीं कर सकते, वे वचन बोल सकता है जो साधारण लोग नहीं बोल सकते, वे चीजें देख सकता है जो साधारण लोग नहीं देख सकते, और वे ध्वनियाँ सुन सकता है जो साधारण लोग नहीं सुन सकते। वह जानता है कि लोग उसकी पीठ पीछे क्या कहते और करते हैं। वह महसूस कर सकता है और जान सकता है कि क्या उसके आस-पास कोई अपसामान्य घटनाएँ या अज्ञात सत्ताएँ हैं, और वह यह तक जानता है कि स्वर्ग में परमेश्वर क्या कर रहा है। केवल यही देहधारी परमेश्वर है!” इस तरह का विचार उन धारणाओं और कल्पनाओं के समान ही है जो अविश्वासियों के मन में परमेश्वर के बारे में होती हैं। सभी लोग ऐसे परमेश्वर से मिलने की आशा करते हैं, और यदि किसी दिन वे इस परमेश्वर को देख सकें और इसके संपर्क में आ सकें, तो यह जीवन भर का आशीर्वाद होगा। लेकिन देहधारी परमेश्वर का लोगों के बीच आना और उनके साथ रहना लोगों के लिए बहुत निराशाजनक रहा है। कोई भी देहधारी परमेश्वर में कोई अलौकिक अभिव्यक्ति नहीं देख सकता, न ही कोई उससे इन अलौकिक चीजों को महसूस कर सकता है। फिर भी लोगों की कल्पनाएँ अभी भी बहुत समृद्ध हैं; लोगों के मन में अभी भी देहधारी परमेश्वर के बारे में कई धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, और वे अभी भी अपनी कल्पनाओं में जीते हैं। चूँकि लोगों के मन में देहधारी परमेश्वर के बारे में इतनी सारी धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, तो क्या उनके मन में स्वर्ग में परमेश्वर के बारे में और भी अधिक धारणाएँ और कल्पनाएँ नहीं होंगी? (हाँ।) वे धारणाएँ और कल्पनाएँ और भी अधिक विचित्र हैं, तथ्यों के साथ और भी अधिक असंगत हैं, यहाँ तक कि वे और भी कम वस्तुनिष्ठ हैं, और लोगों के मन में बहुत सारे अत्यंत भयानक, अकल्पनीय विचार तक हैं। हर हाल में, हमने जिस विषय-वस्तु पर संगति की है, उसके माध्यम से लोग मूलभूत रूप से देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता, या देह की सामान्यता, वस्तुनिष्ठता और व्यावहारिकता सही ढंग से समझने, सही ढंग से जानने और उसके साथ सही ढंग से व्यवहार करने में सक्षम होंगे। इसके अतिरिक्त, देह के माध्यम से—जिसे लोग देख सकते हैं और जिसके संपर्क में आ सकते हैं—लोगों के साथ व्यावहारिक रूप से संगति करने और बोलने, लोगों के साथ मिलने-जुलने, और लोगों पर कार्य के विभिन्न पहलुओं को करने से, लोग यह जान सकते हैं कि परमेश्वर कैसे चीजें करता है और परमेश्वर बेहतर, अधिक व्यावहारिक और अधिक वस्तुनिष्ठ तरीके से कैसे काम करता है। देहधारी परमेश्वर को जानने के माध्यम से लोग स्वर्ग में परमेश्वर को भी बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

परमेश्वर के देहधारी शरीर की सामान्यता और व्यावहारिकता पर इस विषय-वस्तु के संबंध में, हमने पहले इस बात पर संगति की कि देहधारी परमेश्वर कैसे आचरण और कार्य करता है, वह कौन-से कार्य करता है और कार्य करने के उसके क्या सिद्धांत हैं। हमने इन पहलुओं पर काफी विस्तार से संगति की है। क्या कुछ ऐसा है, जो तुम लोग अभी भी नहीं समझते? क्या मुझे कुछ और जोड़ने की आवश्यकता है? क्या तुम लोग देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता के बारे में थोड़ा और समझते हो? (हाँ।) इन व्यावहारिक अभिव्यक्तियों से तुम लोग क्या देख सकते हो? (मैं देखता हूँ कि देहधारी परमेश्वर सामान्य और व्यावहारिक है।) देहधारी परमेश्वर सामान्य और व्यावहारिक है; उसे भी बोलने से पहले सोचना पड़ता है, और उसकी बातचीत और व्यवहार सभी सामान्य हैं, जिनमें जरा-सी भी अलौकिक अभिव्यक्ति नहीं है। यह ऐसी चीज है जिसकी तुम लोगों ने अपेक्षा नहीं की थी, है ना? (हाँ।) देहधारी परमेश्वर के पास तीसरी आँख नहीं है, न ही उसके पास अलौकिक श्रवण-शक्ति है, देह की प्रवृत्तियों से परे किसी असाधारण अलौकिक क्षमता होने की तो बात ही छोड़ दो। यदि कहीं बिजली के खुले तार हों, तो मैं भी उन्हें नहीं छूऊँगा। मैं उन्हें क्यों नहीं छूऊँगा? (तुम्हें बिजली का झटका लगेगा और तुम घायल हो जाओगे।) तुम लोगों की कल्पना के अनुसार, यदि मैं उन्हें सीधे छू भी लूँ, तो मुझे बिजली का झटका नहीं लगेगा और मैं घायल नहीं होऊँगा। लेकिन मुझमें वास्तव में वह क्षमता नहीं है, और मैं भी उन्हें नहीं छूऊँगा नहीं। एक पहलू से, मैं जानता हूँ कि बिजली का झटका लगने से चोट लगती है; मुझमें इस संबंध में सामान्य समझ है, और मुझमें सामान्य तर्क-बुद्धि है। दूसरे पहलू से, मैं कभी यह बिल्कुल नहीं कहूँगा, “कोई बात नहीं। मैं एक विशेष पहचान और विशेष दर्जे वाली विशेष हस्ती हूँ। बिजली मुझे नुकसान नहीं पहुँचाएगी। मैं बस इसे छूऊँगा और देखूँगा कि क्या मैं मरता हूँ।” मैं ऐसी तर्कहीन चीज नहीं करूँगा। तुम लोगों की धारणाओं के अनुसार, किसी भी खतरनाक चीज को, जिसे लोग छूने की हिम्मत नहीं करते, मैं छूने की हिम्मत करूँगा; तुम लोग ऐसी चीजों से डरोगे, लेकिन मैं नहीं डरूँगा, क्योंकि मेरी पहचान विशेष है, मैं तुम लोगों से अलग हूँ, मैं स्वर्ग से आया हूँ, और मैं देहधारी परमेश्वर हूँ, इसलिए मैं नहीं डरता और उस तरह से कार्य कर सकता हूँ। मुझे बताओ, क्या मैं उस तरह से कार्य करूँगा? (नहीं।) मैं उस तरह से कार्य नहीं करूँगा। यह किस पर आधारित है? सामान्य मानवता की तर्क-बुद्धि पर। देहधारी परमेश्वर की मानवता से संबंधित जमीर और तर्क-बुद्धि भी सामान्य हैं। यदि देहधारी परमेश्वर में जमीर की कोई जागरूकता न होती, और यदि उसकी तर्क-बुद्धि सामान्य न होती, तो वह सामान्य मानवता में कार्य कैसे कर सकता था? यदि उसमें जमीर की कोई जागरूकता न होती और उसकी तर्क-बुद्धि सामान्य न होती, तो यह किस प्रकार का मनुष्य है? क्या यह अमानुष नहीं है? (है।) इसलिए, देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता की सोच और जीवन-शैली के बारे में लोगों की सभी धारणाएँ और कल्पनाएँ अव्यावहारिक हैं; वे सभी असाधारण, अजीब, भयानक और विचित्र हैं, और वे सभी देहधारी परमेश्वर की मानवता से संबंधित जमीर और तर्क-बुद्धि से असंबद्ध हैं। मुझे बताओ, यदि हम एक साथ बैठे हैं और आस-पास मच्छर हैं, तो क्या वे मुझे काटेंगे? (हाँ।) क्या तुम लोग पहले सोचते थे, “मच्छर चाहे किसी और को काटें, वे मसीह को नहीं काटेंगे। मच्छर परमेश्वर द्वारा बनाए गए थे; वे सृष्टिकर्ता को नहीं काट सकते”? क्या इस तरह सोचना गलत है? क्या यह वास्तविकता से कटा हुआ है? (हाँ।) मच्छर भी मुझे कोई शिष्टाचार नहीं दिखाते। उनमें कोई भावनाएँ नहीं होतीं; अगर कोई नश्वर देह का है और उसके शरीर में रक्त है, तो वे काटेंगे, और उनके काटने के बाद एक ददोरा उभर आता है। ददोरा उभर आए तो तुम्हें क्या करना चाहिए? मैं जल्दी से लहसुन का एक टुकड़ा काटता हूँ और उसे उस पर लगाता हूँ। लहसुन सूजन कम कर सकता है, बैक्टीरिया मार सकता है और खुजली रोक सकता है। इसे थोड़ी देर लगाने के बाद मच्छर के काटने की जगह पर खुजली बंद हो जाती है, और ददोरा धीरे-धीरे गायब हो जाता है। यह सामान्य समझ है। तुम सोच सकते हो कि यह मामूली बात है, लेकिन यह बहुत व्यावहारिक है। देखो, जब तुम लोग जीवन में समस्याओं का सामना करते हो, तो तुम कुछ घरेलू उपचार और चतुराई भरे छोटे-मोटे उपाय खोजते हो, और मैं भी वैसा ही हूँ। इससे मेरा क्या आशय है? मेरा आशय तुम लोगों को यह बताना है कि देहधारी परमेश्वर की मानवता में मौजूद जमीर और विवेक, उसकी सोच और विचार, साथ ही वास्तविक जीवन में लोगों और चीजों को देखने और विभिन्न समस्याओं का सामना करने पर वह जो विचार, दृष्टिकोण और रवैये बनाता है और जो समाधान निकालता है, वे सभी सामान्य और व्यावहारिक होते हैं; वे विचित्र, अजीब, अलौकिक, विरूपित या अतिवादी नहीं होते। समझे? (समझे।) मैं ये उदाहरण इसलिए देता हूँ, ताकि तुम लोग देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता के जीवन और अभिव्यक्तियों की अधिक व्यावहारिक समझ प्राप्त कर सको। ये अभिव्यक्तियाँ बिल्कुल भी खोखली नहीं हैं, न ही वे अजीब हैं, उनके असाधारण होने की तो बात ही छोड़ दो; बल्कि, वे बहुत सामान्य और व्यावहारिक हैं। यह सामान्यता और व्यावहारिकता सच्ची सामान्यता और व्यावहारिकता है। आचरण और कार्य करने के लिए उसके पास मौजूद दृष्टिकोणों और सिद्धांतों के अलावा, उसके देह की प्रवृत्तियाँ और प्रकार्य भी सामान्य हैं। उदाहरण के लिए, जब तुम लोगों को जुकाम होता है, तब तुम लोगों को छींक और खाँसी आती है, और ठीक होने में एक-दो सप्ताह लगते हैं। यदि मुझे जुकाम होता है, तो मुझमें भी ये लक्षण होंगे, और मुझे भी ठीक होने में एक-दो सप्ताह लगेंगे। तुम लोग ऐसे हो, और देहधारी परमेश्वर भी ठीक ऐसा ही है। ये पहलू वास्तविकता से बिल्कुल भी कटे हुए नहीं हैं, न ही वे उसके विशिष्ट कार्य करने को प्रभावित करते हैं, या लोगों के बीच उसके द्वारा वह कार्य करने को प्रभावित करते हैं, जिसे वह करना चाहता है। यानी, देहधारी परमेश्वर का यह सामान्य और व्यावहारिक पहलू देहधारी परमेश्वर द्वारा की जाने वाली सेवकाई को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं करेगा, न ही यह चीजों को रोकेगा या परमेश्वर के कार्य के परिणामों को प्रभावित करेगा, परमेश्वर के कार्य की प्रगति प्रभावित करने की तो बात ही छोड़ दो। देहधारी परमेश्वर द्वारा की जाने वाली सेवकाई ठीक एक सामान्य और व्यावहारिक देह के माध्यम से वचन व्यक्त करना, कार्य करना और लोगों के बीच चलना है।

हर वह चीज जिस पर हमने ऊपर संगति की है, परमेश्वर के देहधारी शरीर की सामान्यता और व्यावहारिकता के बारे में है। इस विषय-वस्तु पर संगति करने का उद्देश्य लोगों की उस समस्या का समाधान करना है जिसमें वे हमेशा देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्ग में परमेश्वर से करते हैं। हमने जिस विषय-वस्तु पर संगति की है, उसमें मूल रूप से देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता की सहज वृत्तियों की सामान्यता और व्यावहारिकता की अभिव्यक्तियों का एक पहलू शामिल है; दूसरे पहलू में मुख्य रूप से यह शामिल है कि परमेश्वर का देहधारी शरीर कैसे आचरण और कार्य करता है। बेशक, इसका मतलब यह नहीं है कि चूँकि लोग जानते हैं कि देहधारी परमेश्वर अपनी बोलचाल और कार्यों में कितना सामान्य और व्यावहारिक है, इसलिए वे देहधारी परमेश्वर के साथ पूर्णतः सही तरीके से व्यवहार करने में सक्षम हैं; यह अभी भी अपर्याप्त है। अब जबकि हम जानते हैं कि देहधारी परमेश्वर कैसे बोलता और काम करता है, और वह कैसे आचरण और कार्य करता है, तो आओ हम इस बात पर संगति करें कि देहधारी परमेश्वर कौन-सी चीजें नहीं करता या वह किन तरीकों से मानवजाति से अलग है।

परमेश्वर के देहधारी शरीर की सामान्यता और व्यावहारिकता की कुछ अभिव्यक्तियाँ, कई तरह से, मानवजाति की सहज वृत्तियों—यानी, मानव देह की सहज वृत्तियों, प्रकार्यों और जन्मजात स्थितियों के समान हैं। यह कहा जा सकता है कि सहज वृत्तियों के मामले में देहधारी परमेश्वर और साधारण मानवजाति एक-समान हैं। लेकिन इस समानता को छोड़कर, उसका जीवन सार, पहचान, स्वभाव आदि भ्रष्ट मानवजाति से पूरी तरह से अलग हैं। इसमें वे तरीके शामिल हैं, जिनमें उसके जीवन यापन की अभिव्यक्तियाँ और उसका स्वभाव सार भ्रष्ट मानवजाति से अलग हैं। इस बारे में बात करने से हम उस अगले विषय पर आते हैं जिस पर हम संगति करने जा रहे हैं, जो देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं को त्यागने से संबंधित दूसरा विषय है : देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के बराबर न रखना। इस समस्या का समाधान करने के लिए, हमें अभी भी अपनी संगति देहधारी परमेश्वर द्वारा अभिव्यक्त विभिन्न प्रकाशनों और जीवन यापन के विभिन्न पहलुओं पर आधारित करनी होगी। सैद्धांतिक रूप से, क्या तुम लोग इस कथन से सहमत हो, “देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के बराबर न रखो”? (हाँ।) तुम लोग भी इस कथन के अनुसार अभ्यास करना चाहते हो, और इस समस्या का समाधान करने के इच्छुक हो, लेकिन क्या तुम लोगों के पास इस बात के लिए अभ्यास का कोई मार्ग है कि देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के बराबर रखने से कैसे बचा जाए? अभ्यास का मार्ग खोजना बिल्कुल भी आसान नहीं है, है ना? देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के बराबर न रखना तुम लोगों से की गई एक अपेक्षा है, लेकिन ऐसी अपेक्षा क्यों की गई है? यह विचारणीय है। जब लोग देहधारी परमेश्वर के संपर्क में आते हैं, तो उसके देहधारण के रूप और उसके बाहरी रूप-रंग के कारण वे अक्सर स्वाभाविक रूप से उसके साथ भ्रष्ट मानवजाति के एक सदस्य के रूप में व्यवहार करते हैं। यह देहधारी परमेश्वर के साथ एक ऐसे व्यक्ति के रूप में व्यवहार करने, जिसका परमेश्वर के सार, पहचान और स्वभाव से बिल्कुल भी कोई लेना-देना नहीं है, और फिर उसके साथ मेलजोल करते समय भ्रष्ट मानवजाति के सोचने का तरीका अपनाने और देहधारी परमेश्वर के साथ व्यवहार करने के लिए उन तरीकों का उपयोग करने के बराबर है, जिनसे वे दूसरों के साथ व्यवहार करते हैं। इस तरह, लोगों का परमेश्वर के साथ व्यवहार करने का तरीका एक लिहाज से उसके प्रति उनके गलत रवैये को प्रकट करता है, और दूसरे लिहाज से उनके भीतर मौजूद एक बहुत बड़ी समस्या को प्रकट करता है : वे देहधारी परमेश्वर को नहीं जानते। यद्यपि लोग मौखिक रूप से देहधारी परमेश्वर को स्वीकार करते हैं और औपचारिक रूप से उसका अनुसरण करते हैं, लेकिन उन्होंने वास्तविक रूप से इस साधारण व्यक्ति को जाना नहीं है या स्वीकार नहीं किया है। इस साधारण व्यक्ति को स्वीकार न करने का अर्थ है इस साधारण व्यक्ति को देहधारी परमेश्वर न समझना; इसका निहितार्थ यह है कि लोग इस साधारण व्यक्ति को भ्रष्ट मानवजाति का एक सदस्य समझते हैं। इस समस्या से बचने और इसका समाधान भी करने के लिए आज हम एक बार फिर देहधारी परमेश्वर के दैनिक जीवन में उसकी सामान्य मानवता की अभिव्यक्तियों पर संगति करेंगे, और इस पर भी कि लोगों को उन विभिन्न अभिव्यक्तियों को कैसे जानना और समझना चाहिए जिन्हें वह लोगों के साथ अपने मेलजोल और आचरण में प्रकट करता है। आओ पहले देहधारी परमेश्वर से संबंधित कुछ ऐसे मुद्दे देखें जिन्हें लोग समझ नहीं सकते, या कुछ ऐसे मुद्दे जिन्हें लोग आसानी से भ्रष्ट मानवजाति के नजरिये से देखते हैं। पहले, आओ यह तय करें कि यह साधारण मनुष्य का पुत्र, देहधारी परमेश्वर, कौन-सी चीजें नहीं करता, या उसमें प्रकट होने वाली कुछ ऐसी चीजें जिन्हें लोग पहचानने में विफल रहते हैं। वास्तव में इन चीजों से क्या तात्पर्य है? सबसे पहले, वह धोखा नहीं देता, न ही वह प्रतिस्पर्धा करने, लड़ाई करने, साजिश रचने, हमला करने, बदला लेने, प्रलोभन देने आदि जैसी चीजें करता है। लोगों को ये चीजें क्यों समझनी चाहिए? जब तुम इन चीजों को समझ लेते हो, तब तुम्हें देहधारी परमेश्वर के स्वभाव और सार की सच्ची समझ हो जाएगी। केवल सच्ची समझ के साथ ही तुम देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के बराबर न रखने में सफल हो सकते हो। केवल जब तुम देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के बराबर न रखने में सफल होते हो, तभी तुम देहधारी परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध हासिल कर सकते हो, एक सृजित प्राणी के उचित स्थान पर खड़े हो सकते हो, और देहधारी परमेश्वर के साथ उस रवैये से व्यवहार कर सकते हो जो एक सृजित प्राणी में होना चाहिए।

देहधारी परमेश्वर जो चीजें नहीं करता, उनके संबंध में, आओ पहले धोखा न देने के पहलू पर संगति करें। धोखे की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? झूठ बोलना, जालसाजी करना, दिखावा करना, खुद को उस रूप में पेश करना जो तुम नहीं हो, बड़ी-बड़ी बातें करना, डींगें मारना, आदि। मैंने अभी जिन अभिव्यक्तियों का उल्लेख किया, क्या वे आम तौर पर भ्रष्ट मानवजाति में देखी जाती हैं? (हाँ।) धोखा देना और झूठ बोलना भ्रष्ट मानवजाति की प्रमुख और स्पष्ट विशेषताएँ हैं; ये पूरी भ्रष्ट मानवजाति का एक आम लक्षण हैं, और बिना किसी अपवाद के, कोई भी इससे बच नहीं सकता। हर व्यक्ति झूठ बोलता है, हर व्यक्ति स्वाँग करता है, और हर व्यक्ति खुद को उस रूप में पेश करता है जो वह नहीं है, दिखावा करता है और ढोंग करता है। इसके अलावा, यह उनमें स्वाभाविक रूप से आता है; उन्हें अपने माता-पिता द्वारा सिखाए जाने की जरूरत नहीं होती, न ही उन्हें किसी के द्वारा प्रभावित किए जाने, उकसाए जाने या भड़काए जाने की जरूरत होती है। वे जन्मजात झूठे होते हैं। क्या ऐसा कहना हद पार करना है? (नहीं।) परमेश्वर के देहधारी शरीर के बारे में क्या विचार है? आओ, बहुत दूर की चीजों के बारे में बात न करें; जहाँ तक मेरे बोलने के तरीके का संबंध है, मानवीय शब्दों में, मैं खरी बात कहता हूँ। उदाहरण के लिए, किसी पेशेवर कार्य में तुम लोगों का मार्गदर्शन करते समय, अगर कोई ऐसी चीज होती है जिसे करना मैं नहीं जानता, तो मैं कहूँगा, “मैं इस मामले के बारे में बहुत स्पष्ट नहीं हूँ। मैं नहीं जानता कि इसे कैसे करना है। तुम लोगों को कुछ संदर्भ सामग्री देखनी चाहिए।” अगर मैं मामले के बारे में थोड़ा जानता हूँ, तो मैं उतना ही कहूँगा जितना मैं जानता हूँ। मैं जो जानता और समझता हूँ, उसे कहने के बाद, मैं कहूँगा, “अगर मुझसे कुछ छूट गया है और तुम लोग उसे जानते हो, तो तुम लोग उसे कह सकते हो।” देखो, क्या ये जो शब्द मैं कहता हूँ, वस्तुनिष्ठ और ईमानदार हैं? (हाँ।) तुम लोग इन सभी वर्षों में मुझे बोलते हुए सुन रहे हो, तो क्या तुम लोगों को मेरी बातों में कोई धोखा दिखाई देता है? कोई दिखावा? कोई जालसाजी? (नहीं।) जब मैं सभाओं में संगति करता हूँ या आम तौर पर किसी पेशेवर कार्य का मार्गदर्शन करता हूँ, तब अक्सर दैनिक जीवन की कुछ छोटी, साधारण चीजों का हवाला देते हुए उदाहरण देता हूँ। यद्यपि कुछ मामलों में प्रक्रिया के कुछ विवरण छूट सकते हैं, लेकिन मामला अपने आप में एक तथ्य होता है। इसके अलावा, मैंने उन मामलों को कैसे सँभाला और कैसे उनमें लगा रहा, इसके गवाह मौजूद हैं। क्या मैंने कभी झूठ बोला है? (नहीं।) मैं झूठ नहीं बोलता, न ही मैं दिखावा या ढोंग करता हूँ। देखो, मैं बाहर जाते समय वही कपड़े पहनता हूँ जो मैं घर पर पहनता हूँ। कभी-कभी, अगर मेरे कपड़े गंदे होते हैं, तो मैं बाहर जाते समय साफ कपड़े पहन लेता हूँ। यह केवल थोड़े अधिक साफ कपड़े पहनना है; मैं सिर्फ बाहर जाने के लिए महँगे, ब्रांडेड कपड़ों का जोड़ा नहीं पहनूँगा। घर पर साधारण कपड़े पहनना और बाहर जाते समय थोड़े अधिक साफ कपड़े पहनना—यह नाटक करना नहीं है; यह सामान्य मानवता है।

धोखा देना, दिखावा करना और ढोंग रचना—ये वे चीजें हैं जिन्हें भ्रष्ट मानवजाति अक्सर करती है। देखो, मानव जो कुछ भी कहते हैं, उसमें से अधिकांश में मिलावट होती है; विशेष रूप से जब इसमें उनके हित, निजता, मान-सम्मान, रुतबा या प्रतिष्ठा शामिल होती है, तब लोग झूठ बोलते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग बहुत लंपट होते हैं, अक्सर हँसी-मज़ाक करते हैं, अपना कर्तव्य निभाने में बहुत ढिलाई बरतते हैं, और जो कुछ भी करते हैं उसके बारे में गंभीर नहीं होते। जब अगुआ आसपास नहीं होता, तो वे गपशप करते हैं, चाय पीते हैं, कभी शौचालय जाते हैं तो कभी आँगन में टहलते हैं, और बहुत आरामतलब जिंदगी जीते हैं। जब अगुआ आता है, तो वे हड़बड़ी में काम में लग जाते हैं, और बहुत जिम्मेदार होने का दिखावा करते हैं। क्या यह जालसाजी करना नहीं है? क्या यह ढोंग रचना नहीं है? (हाँ।) भ्रष्ट मानवजाति में एक और कमी है : वे खुद को बहुत कुलीन और ऊँचे, विशेष रूप से गहरी समझ रखने वाले और संपन्न, और विशेष रुतबे और पृष्ठभूमि वाले लोगों के रूप में वर्णित करना पसंद करते हैं। वे उन घिनौनी या मूर्खतापूर्ण चीजों का उल्लेख कभी नहीं करते जो उन्होंने छिपकर की होती हैं, जो गलतियाँ उन्होंने की होती हैं, या जो कमियाँ और दोष उनमें होते हैं—वे कभी इन चीजों का रत्ती भर भी जिक्र नहीं करते, या उन्हें थोड़ा-सा भी प्रकट नहीं करते, वे इस बात से बहुत डरते हैं कि दूसरे उनकी असलियत जान लेंगे और उन्हें तुच्छ समझेंगे। क्या यह जालसाजी करना नहीं है? क्या यह झूठ बोलना और धोखा देना नहीं है? (हाँ।) वे उन कामों को भी करने का दावा करते हैं, जिन्हें वे नहीं कर सकते। यदि उन्होंने पहले किसी स्तर पर अगुआ के रूप में काम किया होता है, कोई महत्वपूर्ण काम किया होता है या कोई योगदान दिया होता है, तो उन्हें इसका खूब प्रचार करना होता है, वे इस बात से बहुत डरते हैं कि दूसरे उन्हें तुच्छ समझेंगे। जब डींगें मारने और बड़ी-बड़ी बातें करने की बात आती है, तो वे “कुछ भी करने में सक्षम” होते हैं, लेकिन वे कभी अपनी कमियों या अपनी मानवता के दोषों का उल्लेख नहीं करते। सभी लोग इसी तरह आचरण और कार्य करते हैं। लोग इन अभिव्यक्तियों को मानवजाति का एक आम लक्षण मानते हैं, और सोचते हैं कि इस तरह आचरण करना बहुत सामान्य और आम है और यह सामान्य मानवता का हिस्सा है, इसलिए, बहुत-से लोग स्वाभाविक रूप से इस दृष्टिकोण को देहधारी परमेश्वर पर थोप देते हैं और सोचते हैं, “क्या देहधारी परमेश्वर भी झूठ बोलता और धोखा देता है?” उदाहरण के लिए, जब मैं कहता हूँ कि मैं डंपलिंग बनाना जानता हूँ, तो कुछ लोग इस पर विश्वास नहीं करते, और कहते हैं, “हूँ, सत्य व्यक्त करने के अलावा, तुम खाना बनाना भी जानते हो? यह असंभव है।” वे सोचते हैं, “किसने कभी झूठ नहीं बोला है? किसने कभी बड़ी-बड़ी बातें नहीं की हैं?” देहधारी परमेश्वर उस “किसने” में शामिल रहता है। क्या उनका ऐसा कहना सही है? (नहीं।) उनसे कहाँ गलती हुई? (उन्होंने देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के बराबर रखा।) चूँकि पूरी मानवजाति झूठ बोलने में सक्षम है, इसलिए तुम सोचते हो कि देहधारी परमेश्वर भी झूठ बोल सकता है, तुम देहधारी परमेश्वर की कल्पना भ्रष्ट मानवजाति के समान ही करते हो, और यहाँ तक कि अपने हृदय में कहते हो, “अगर देहधारी परमेश्वर सत्य व्यक्त कर सकता है, तो इतना ही काफी है। अगर तुम कभी-कभार झूठ बोलते भी हो, तो भी हमें कोई आपत्ति नहीं है; इससे देहधारी परमेश्वर के रूप में तुम्हारी पहचान प्रभावित नहीं होती।” यह तुम्हें आपत्ति होने या न होने का मामला नहीं है; तुम्हें इस बात पर विचार करना होगा कि देहधारी परमेश्वर के बारे में तुम्हारे ये विचार सही हैं या नहीं। यद्यपि सैद्धांतिक रूप से तुम जानते हो कि यह गलत है और तुम्हें इस तरह नहीं सोचना चाहिए, फिर भी तुम्हें इस बात पर विचार करना होगा कि तुम इस तरह क्यों सोच सकते हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम बहुत धोखेबाज और बेईमान हो, यही कारण है कि तुम सोचते हो कि हर कोई झूठ बोल सकता है और ढोंग रच सकता है, और कि देहधारी परमेश्वर भी इसका अपवाद नहीं है। क्या तुम इस तरह सोचकर गलती नहीं कर रहे हो? यद्यपि यह गलती करना कोई बड़ी बात नहीं है और यह तुम्हारे सत्य पाने को प्रभावित नहीं करता, फिर भी इस मामले के बारे में सतर्क रहना होगा और इसे स्पष्ट रूप से समझाना होगा। यदि तुम देहधारी परमेश्वर द्वारा कहे गए साधारण वचनों के साथ ऐसे संदेहपूर्ण और अविश्वासी रवैये से पेश आते हो, तो जब वह सत्य पर संगति करता है, सत्य व्यक्त करता है और परमेश्वर के इरादे व्यक्त करता है, और जब वह तुम्हारा न्याय करता है, तुम्हें उजागर करता है, तुम्हारी निंदा करता है और तुम्हारी काट-छाँट करता है, तब तुम इसके साथ किस तरह पेश आओगे? क्या तुम अपना रवैया बदलोगे? तुम नहीं बदलोगे; तुम इसके साथ उसी रवैये से पेश आओगे, सोचोगे कि जरूरी नहीं कि देहधारी परमेश्वर द्वारा कहे गए सभी वचन सही हों। सैद्धांतिक रूप से, तुम स्वीकार करते हो कि वह जो कहता है वह सही है और वह सब सत्य है, लेकिन जब तुम ऐसी चीजें करते हो जो सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं और वह तुम्हारी काट-छाँट करता है और तुम्हें उजागर करता है, तो तुम अपने हृदय में सोचते हो, “इस मामले में परमेश्वर के वचन सत्य नहीं हैं, क्योंकि मैं इसके बारे में वैसा नहीं सोचता। मेरे पास इसके लिए एक बहुत अच्छा बहाना और कारण है, इसलिए मैं इसे स्वीकार न करने का चुनाव कर सकता हूँ। मैं इसे अनदेखा करने, विषय से बचने और इसे स्वीकार न करने के रवैये के साथ उसे अस्वीकार कर सकता हूँ और उसका विरोध कर सकता हूँ, और देहधारी परमेश्वर के साथ उसी रवैये से व्यवहार कर सकता हूँ जिसका उपयोग मैं किसी व्यक्ति के साथ बहस करते समय करता हूँ।” यदि तुम देहधारी परमेश्वर के साथ ऐसे रवैये से व्यवहार करते हो, तो समस्या का सार क्या है? देहधारी परमेश्वर के प्रति तुम्हारा रवैया विद्रोही है या उचित है? (यह विद्रोही है, उचित नहीं है।) यदि तुम सोचते हो कि देहधारी परमेश्वर धोखा दे सकता है, झूठ बोल सकता है, बड़ी-बड़ी बातें कर सकता है, ऊँचे-ऊँचे विचार बघार सकता है और नारे लगा सकता है, तो जब वह तुम्हारी काट-छाँट करता है और तुम्हें उजागर करता है, तो तुम सोचोगे कि तुम्हारे पास इसे स्वीकार न करने और इसे अस्वीकार करने का एक कारण है : “मैं बस इसे स्वीकार नहीं करूँगा, और मैं उसका विरोध करूँगा। क्या वह सिर्फ एक साधारण व्यक्ति नहीं है? वह जो कहता है, उसे मुझे क्यों स्वीकार करना चाहिए? वह जो कहता है, अगर वह सही है तो मैं उसे स्वीकार करूँगा, और जो मुझे गलत लगता है उसे मैं स्वीकार नहीं करूँगा; अगर मैं खुश हूँ तो मैं उसे स्वीकार करूँगा, और अगर मैं खुश नहीं हूँ तो मैं उसे स्वीकार नहीं करूँगा; वह जो कहता है, अगर वह मेरे हितों, पसंद और मनोदशा के अनुरूप है तो मैं उसे स्वीकार करूँगा, और अगर वह मेरे हितों और मनोदशा के अनुरूप नहीं है तो मैं उसे स्वीकार नहीं करूँगा। क्या यह बिल्कुल स्वाभाविक और उचित नहीं है? यह बहुत उचित है, यह मेरा अधिकार है, और मुझे अपने हृदय में रत्ती भर भी ग्लानि महसूस नहीं होती।” यदि परमेश्वर के प्रति तुम्हारा यह रवैया है, तो क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध वास्तव में एक सृजित प्राणी और सृष्टिकर्ता के बीच का संबंध है? क्या यह मनुष्य और परमेश्वर के बीच का संबंध है? (नहीं।) तुम्हारे रवैये या अभिव्यक्तियों को देखते हुए, देहधारी परमेश्वर और तुम्हारे बीच का संबंध केवल एक साधारण व्यक्ति और एक साधारण भ्रष्ट मनुष्य के बीच का संबंध है; यह केवल लोगों के बीच के संबंध के स्तर पर ही रहता है। क्या यहाँ कोई समस्या नहीं है? (हाँ।) इसलिए, तुम्हें पहले इस बारे में निश्चित होना चाहिए कि चूँकि देहधारी परमेश्वर मानवजाति से ईमानदार लोग होने की अपेक्षा करता है, इसलिए पहले वह खुद ईमानदार है। उसकी मानवता में ईमानदारी का सार है; यह संदेह से परे है। तुम्हें यह बात माननी चाहिए, और तुम्हें यह अपने हृदय से स्वीकार भी करनी चाहिए। तुम्हें न केवल इसे अपने हृदय में मानना होगा, बल्कि वास्तविक जीवन में भी तुम्हें स्वीकृति का ऐसा ही रवैया रखना होगा। भ्रष्ट मानवजाति किसी भी परिस्थिति में झूठ बोल सकती है और जालसाजी कर सकती है, और कोई भी ढोंग रच सकता है, डींगें मार सकता है और बड़ी-बड़ी बातें कर सकता है। भ्रष्ट मानवजाति ऐसा इसलिए कर सकती है, क्योंकि शैतान का भ्रष्ट स्वभाव मनुष्य का जीवन और प्रकृति बन गया है, यही कारण है कि उनमें ये स्वाभाविक प्रकाशन होते हैं। लेकिन देहधारी परमेश्वर की मानवता में ईमानदारी का पहलू है। ठीक इसलिए कि उसका जीवन दिव्य है, ईमानदारी का तत्व और भी अधिक उसके सार का एक पहलू है। यह संदेह से परे है, और लोगों को इस पर संदेह नहीं करना चाहिए।

एक बार मैं किसी से बात कर रहा था, और उसने कहा कि उसका पेट खराब है, उसने अस्पताल से बहुत सारी दवाइयाँ ली हैं और वह कई सालों से उन्हें ले रहा है। बाद में उसके पेट की समस्या थोड़ी ठीक हो गई। मैंने उससे पूछा, “तुम्हें पेट की किस तरह की समस्या है? क्या यह पेट की ठंड है, पेट का अल्सर है या पेट में अम्ल ज्यादा बनना है?” जब उसने मुझे विवरण माँगते हुए सुना, तो उसने मुझे सीधा जवाब नहीं दिया, बल्कि यही कहता रहा, “मेरा पेट खराब है और मैंने बहुत सारी दवाइयाँ ली हैं।” मैंने उससे यह क्यों पूछा? यह सिर्फ एक सामान्य बातचीत थी, यह जानने के लिए कि उसे पेट की किस तरह की समस्या है। कभी-कभी मेरा पेट भी खराब हो जाता है, इसलिए अगर उसे इस तरह की समस्या थी, तो शायद वह कुछ मदद कर सकता। बातचीत करना सत्य पर संगति करने या औपचारिक रूप से काम करने जैसा नहीं होता, जहाँ स्पष्ट लक्ष्य, कठोर प्रक्रियाएँ और गंभीर रवैया होता है। बातचीत अधिक अनौपचारिक होती है, जिसमें कोई विशेष उद्देश्य या योजना शामिल नहीं होती। लेकिन जब मैंने उससे पूछा कि उसे असल में पेट की किस तरह की समस्या है, तो उसने मुझे सीधा जवाब नहीं दिया। क्या वह झूठ बोल रहा था? क्या वह सच बोल रहा था? (वह सच नहीं बोल रहा था।) तो फिर उसने सच क्यों नहीं बोला? क्योंकि वह इस मुद्दे को छिपाना चाहता था और इसे छिपाने का उसका कारण यह था कि वह इस बारे में चिंतित था कि उसकी बीमारी के बारे में जानने के बाद मैं उसके साथ कैसा व्यवहार करूँगा। चाहे वह इसलिए चिंतित रहा हो कि मैं उसे तुच्छ समझूँगा, या इसलिए कि मैं उसे बर्खास्त कर दूँगा या उसके कर्तव्य नियोजन में बदलाव कर दूँगा जिससे उसका उद्धार प्रभावित होगा, संक्षेप में, वह चिंतित था, इसलिए वह इसे छिपाना चाहता था। बताओ, क्या इसकी कोई जरूरत थी? क्या उसका ऐसा करना बहुत मूर्खतापूर्ण नहीं था? (था।) तो फिर ऐसे लोग किस तरह का स्वभाव प्रकट करते हैं? (एक दुष्ट स्वभाव।) दुष्टता कहाँ निहित होती है? (वे परमेश्वर के बारे में अटकलें लगाते हैं, अपने हृदय में लगातार चीजों की कल्पना करते हैं, अपनी कल्पनाओं को तथ्य मानते हैं, परमेश्वर के वचनों के पीछे के इरादे के बारे में अटकलें लगाते हैं, और हर लिहाज से परमेश्वर से वैसे ही सावधान रहते हैं जैसे वे लोगों से सावधान रहते हैं।) यदि तुम्हारी अटकलों और सावधानी का पात्र भ्रष्ट मानवजाति का कोई सदस्य होता, तो यह कुछ हद तक आवश्यक होता, क्योंकि आज समाज बहुत जटिल है, लोग जटिल हैं, और मानव हृदय कुटिल हैं। तुम नहीं जानते कि तुम्हारी वास्तविक स्थिति पता चलने के बाद कौन तुम्हारी पीठ पीछे दुर्भावनापूर्ण कृत्य कर सकता है, इसलिए तुम नहीं चाहते कि बाहरी लोग तुम्हारी वास्तविक स्थिति के बारे में बहुत अधिक जानें; यह समझा जा सकता है। लोगों के साथ मिलते-जुलते समय तुम्हें हर लिहाज से सावधान और सतर्क रहना पड़ता है, और तुम बाहरी लोगों को अपनी वास्तविक स्थिति के बारे में कुछ नहीं बता सकते। लोगों के साथ मिलते-जुलते समय यह सांसारिक आचरण की एक दार्शनिक रणनीति या सिद्धांत है। लेकिन उसने इस सिद्धांत और रणनीति को कहाँ लागू किया? उसने इसे मेरे साथ मिलने-जुलने में लागू किया। मैं पहले कभी उसके साथ मिला-जुला नहीं था, लेकिन सिर्फ उस एक बातचीत से, मैं इस व्यक्ति को पूरी तरह से समझ गया : यह बहुत अधिक झूठ बोलता है। बताओ, क्या मैं कोई ऐसा व्यक्ति हूँ जो तुम्हें फँसाएगा या तुम्हें नुकसान पहुँचाएगा? क्या मैं कोई ऐसा व्यक्ति हूँ जिससे तुम्हें सावधान रहने की जरूरत है? (नहीं।) यदि मैं भी कोई ऐसा व्यक्ति हूँ जिससे तुम सावधान रहते हो, तो परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास का क्या अर्थ या मूल्य है? इतने छोटे-से मामले के बारे में भी सच बोलने की हिम्मत न करना, सच बोलने के साहस की भी कमी होना—तुम ऐसे व्यक्ति को क्या कहोगे? क्या ऐसा व्यक्ति बहुत धोखेबाज नहीं है? (हाँ।) क्या मेरे साथ सांसारिक आचरण के तरीके और अविश्वासियों के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत लागू करना पूरी तरह से अनावश्यक नहीं है? क्या मैं वास्तव में तुम्हारे बारे में पता लगाना चाहता हूँ? क्या यह सिर्फ बातचीत नहीं है? अगर मैं तुम्हारे बारे में पता लगाना भी चाहता, तो भी मैं तुम्हें फँसाता नहीं या तुम्हें नुकसान न पहुँचाता, न ही मैं तुम्हारी पीठ पीछे इसे कोई मुद्दा बनाता। इसलिए, जहाँ तक तुम लोगों में से प्रत्येक का संबंध है, मैं कभी-कभी तुम लोगों से बातचीत करता हूँ, पूछता हूँ कि तुम लोग जहाँ हो वहाँ जीवन कैसा है, जलवायु कैसी है, क्या अब अपना कर्तव्य निभाने का परिवेश उपयुक्त है, क्या तुम्हें हाल ही में अपना कर्तव्य निभाने में कोई कठिनाई हुई है। या, मुख्य भूमि चीन से अभी-अभी आए कुछ लोगों से मैं पूछता हूँ कि वहाँ का परिवेश कैसा है और अधिकांश लोग अपना कर्तव्य निभाने में कितने सफल हो रहे हैं। यह सिर्फ सामान्य बातचीत है। एक लिहाज से, यह सामान्य मानवता की जरूरतों से उपजता है; दूसरे लिहाज से, चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, इसलिए हम जिन चीजों के बारे में बातचीत करते हैं, वे सभी परमेश्वर में विश्वास से संबंधित मामले होते हैं, और हम अविश्वासी दुनिया के विषयों जैसे सितारों, मशहूर हस्तियों, सामाजिक प्रवृत्तियों या राजनीति के बारे में बातचीत नहीं करते। यदि तुम लोगों को सामान्य बातचीत के दौरान भी सावधान रहना पड़ता है, तो मैं तुम लोगों के साथ अब और बातचीत नहीं करूँगा। कुछ लोग हमेशा सोचते हैं, “क्या हमारे साथ बातचीत करने में तुम्हारा कोई विशेष उद्देश्य है? जब तुम हमसे मिलते-जुलते हो तो तुम हमेशा हमसे कुछ सवाल पूछते हो; क्या तुम कुछ पता लगाना चाहते हो? मैं तुम्हें वास्तविक स्थिति बिल्कुल नहीं बता सकता।” यदि तुम इस तरह सोचते हो, तो तुम्हें पहले ही कह देना चाहिए, “हमारे साथ बातचीत मत करो। मुझे डर है कि तुम कुछ जानकारी हासिल कर लोगे। मैं तुम्हें बताना नहीं चाहता, इसलिए और मत पूछो!” जब मैं सुन लूँगा कि तुम बातचीत करने के इच्छुक नहीं हो, तब मैं इसे छोड़ दूँगा। क्या तुम्हें लगता है कि मुझे तुम्हारे साथ बातचीत करनी ही है? अधिकांश लोगों में सामान्य मानवता नहीं होती और मैं ऐसे लोगों के साथ बातचीत करने का इच्छुक नहीं हूँ।

हमने अभी इस बात पर संगति की है कि देहधारी परमेश्वर कैसे धोखा नहीं देता। यह कथन किसी सिद्धांत के स्तर पर नहीं रहता, न ही यह कोई यांत्रिक कहावत है। सबसे पहले, धोखा न देना उस देहधारी परमेश्वर के सार के जीवन यापन और प्रकाशन का एक पहलू है, जिसके पास परमेश्वर की पहचान है। यह कोई सिद्धांत नहीं है, कोई नारा तो बिल्कुल भी नहीं है, बल्कि यह एक सच्चा जीवन यापन है, एक व्यावहारिक जीवन यापन है। चाहे रोजमर्रा के जीवन में हो या सत्य पर संगति करते समय और काम पर चर्चा करते समय, मैं जो वचन बोलता हूँ उनमें कोई धोखा बिल्कुल नहीं होता, कोई झूठ बिल्कुल नहीं होता; मैं मनगढ़ंत बातें तो बिल्कुल भी नहीं करूँगा। उदाहरण के लिए, जब मैं किसी विषय पर संगति कर रहा होता हूँ और मुझे कोई शब्द याद नहीं आता, तो मैं पूछूँगा कि क्या तुम लोगों को वह शब्द याद है। कभी-कभी तुम लोगों को वह याद आ जाता है, और कभी-कभी तुम लोगों को वह याद नहीं आता, इसलिए मैं इसे व्यक्त करने के लिए किसी अन्य शब्द का उपयोग करूँगा, या कहूँगा कि मुझे भी वह याद नहीं आ रहा है। एक लिहाज से, मेरा रवैया ईमानदार होता है और मैं मनगढ़ंत बातें नहीं करता; अगर मैं भूल गया हूँ, तो मैं कहता हूँ कि मैं भूल गया हूँ, और अगर मुझे याद नहीं आ रहा, तो मैं कहता हूँ कि मुझे याद नहीं आ रहा। दूसरे लिहाज से, कभी-कभी मुझे सही शब्द नहीं मिल पाता या मैं अपने विचारों का क्रम भूल जाता हूँ, ऐसे में मैं खाँसने का ढोंग नहीं करूँगा, या यह नहीं कहूँगा, “दरवाजे की घंटी बज रही है; मैं जाकर दरवाजा खोलूँगा,” या “फोन बज रहा है; मैं इसका जवाब दूँगा।” मैं जालसाजी नहीं करूँगा। तुम लोगों के साथ बातचीत करते समय और आमने-सामने काम के बारे में संगति करते समय मैं जैसा होता हूँ, वैसा ही मैं अपने रोजमर्रा के जीवन में तुम लोगों की नजरों से दूर भी होता हूँ। मैं बस ऐसा ही व्यक्ति हूँ; मैं तुम लोगों के मुँह पर भी वैसा ही होता हूँ जैसा मैं तुम लोगों की पीठ पीछे होता हूँ। अगर मुझे कोई चीज खाना पसंद है, तो मैं कहता हूँ कि मुझे वह चीज खाना पसंद है; मैं झूठ नहीं बोलता। उदाहरण के लिए, मैं कहता हूँ, “मुझे हरे प्याज के साथ मिला हुआ टोफू, और सिरके के साथ कटे हुए आलू खाना पसंद है।” कुछ लोग कहते हैं, “मुझे विश्वास नहीं होता। अब तुम्हारे पास किस चीज की कमी हो सकती है? तुम शायद हर दिन भुना हुआ सूअर का मांस और डंपलिंग खाते होगे!” मैं कहता हूँ, “यद्यपि भुना हुआ सूअर का मांस स्वादिष्ट होता है, लेकिन मुझे वास्तव में बहुत अधिक चिकनाई वाली चीजें खाना पसंद नहीं है। नाश्ते में मैं बस एक कटोरी दलिया और कुछ साथ में ली जाने वाली चीजें खाता हूँ; यह इतना ही सरल है।” ये सभी वास्तविक तथ्य हैं; एक भी वाक्य झूठ नहीं है। मैं तुम लोगों से जो वचन बोलता हूँ, जो उदाहरण मैं देता हूँ, या वास्तविक जीवन की जिन चीजों का मैं उल्लेख करता हूँ—चाहे तुम लोग उन्हें काफी मानवीय, साधारण और सामान्य मानो, या थोड़ा अपरिष्कृत—हर हाल में, मैं जो कहता हूँ वह सब एकदम सच होता है, सब तथ्यों पर आधारित होता है। यह तुम लोगों को यह दिखाने के लिए नहीं होता, “देखो मैं कितना साधारण हूँ, मैं मानव जीवन में कितना घुल-मिल जाता हूँ, मैं कितना सरल और अनलंकृत हूँ।” मेरे मन में वास्तव में ऐसे विचार नहीं होते। कभी-कभी, सत्य के किसी पहलू पर संगति करने के लिए, मैं जीवन की कुछ छोटी-मोटी चीजों का उल्लेख करता हूँ, और कुछ लोग सोचते हैं कि यह परमेश्वर की विनम्रता और अप्रकटता है। वास्तव में, मेरा वह अर्थ वाकई नहीं होता। जब मैं उन चीजों का उल्लेख करता हूँ, तो मैं बस जस का तस बता रहा होता हूँ; मैं कोई ऊँची और बड़ी बात नहीं कहता। इसका उद्देश्य लोगों को सत्य बेहतर ढंग से समझने देना होता है, और मेरे कोई अन्य इरादे नहीं होते। अपनी बोलचाल और कार्यों में मैं ऐसी चीजें बिल्कुल नहीं करूँगा जैसे कि जानबूझकर सच को तोड़-मरोड़कर पेश करना, दूसरों को डराने के लिए किसी की मिसाल देना या दूसरों को चेतावनी देने के लिए लोगों को कड़ी सजा देना। अतीत में, जब हम उन जगहों पर जाते थे जहाँ भाई-बहन रहते थे, तो वे डंपलिंग बनाने, मांस भूनने और व्यंजन पकाने में व्यस्त हो जाते थे। वास्तव में, हमारी इस तरह मेजबानी करने की कोई जरूरत नहीं है। मैं कहता हूँ कि मैं आम तौर पर अपने भोजन के बारे में इतना नखरेबाज नहीं हूँ; मेरा भोजन बहुत सरल होता है, और मुझे तड़क-भड़क पसंद नहीं है। कुछ लोग मेरे कहे पर कभी विश्वास नहीं करते; वे हमेशा सोचते हैं कि मैं झूठ बोल रहा हूँ। मैं चाहे कुछ भी कहूँ, वे उस पर विश्वास नहीं करते। ऐसे लोग बहुत सिरदर्द होते हैं; वे पूरी तरह से विवेकहीन होते हैं। ऐसा नहीं है कि मैं अविश्वसनीय हूँ, या मेरे द्वारा बोले गए वचनों में असत्य होते हैं, बल्कि तुम बहुत दुष्ट हो। मैं चाहे कुछ भी कहूँ, तुम उसे सही तरीके से लेने में असमर्थ रहते हो; मैं जो कुछ भी कहता हूँ, तुम उसके प्रति संदेहपूर्ण रवैया रखते हो, और यहाँ तक कि उसके बारे में विकृत तरीके से सोचते हो, उसे पूरी तरह से धोखा मानते हो, और तुम सावधान भी हो जाते हो। तुम कभी विश्वास नहीं करते कि मैं जो वचन बोलता हूँ, वे सभी एकदम सत्य होते हैं। यह किस तरह की समस्या है? तुम दानवों और शैतानों की बातों पर विश्वास कर सकते हो, तो तुम मेरे वचनों पर विश्वास क्यों नहीं कर सकते? तो क्या तुम परमेश्वर में इस तरह विश्वास करके भी सत्य पा सकते हो? सत्य निश्चित रूप से खोखले शब्द नहीं, बल्कि लोगों द्वारा जी जाने वाली जीवन वास्तविकता है। मैं तुम लोगों से जो वचन बोलता हूँ, वे सभी व्यावहारिक वचन हैं। यदि तुम लोग उन पर विश्वास नहीं करते, तो तुम लोग परमेश्वर में कैसे विश्वास कर सकते हो? परमेश्वर के सभी वचन ईमानदार और सत्य हैं; वह कभी झूठ नहीं बोलता, जालसाजी नहीं करता, ढोंग नहीं करता, या खुद को उस रूप में पेश नहीं करता जो वह नहीं है। यदि तुम लोग आचरण के इन रूपों को समझ सकते हो, तो तुम लोगों को परमेश्वर की समझ हो जाएगी, और केवल इसी तरह तुम लोग, देहधारी परमेश्वर के माध्यम से, धीरे-धीरे यह समझ और जान सकते हो कि परमेश्वर अपने कार्यों और बोलचाल में व्यावहारिक है, और जो वचन वह बोलता है और जिन सत्यों पर वह संगति करता है, उन्हें वास्तव में समझ सकते हो। हमने धोखा न देने के पहलू पर संगति पूरी कर ली है।

आओ, होड़ न करने के पहलू पर संगति जारी रखें। होड़ न करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है बहस न करना, रुतबे के लिए होड़ न करना, प्रतिस्पर्धी न होना और किसी न किसी बात को लेकर तुमसे बहस न करना। मैं तुमसे जो कहता हूँ, यदि तुम उसे मानते हो तो तुम उसे स्वीकार करते हो; यदि तुम उसे नहीं मानते तो मैं तुम्हारे साथ जबरदस्ती नहीं करूँगा। यदि तुम्हारी समझ विरूपित है तो मैं तुम्हें उजागर करूँगा और तुम्हें सही करूँगा। यदि तुम इसे शुद्धता से समझ सकते हो, तो यह सबसे अच्छा है; यदि तुम इसे शुद्धता से नहीं समझ सकते तो मैं तुमसे इसे जबरदस्ती स्वीकार नहीं करवाऊँगा। तुम बस चीजों को उनके स्वाभाविक रूप से होने दे सकते हो और इसे धीरे-धीरे जान सकते हो। इसके अलावा, लोगों के बीच मिलने-जुलने में हो या बातचीत में, बोलते समय लोग हमेशा प्रतिष्ठा के लिए होड़ करते हैं, श्रेष्ठता के लिए होड़ करते हैं, दिखावा करने के लिए होड़ करते हैं और दूसरों का उच्च सम्मान पाने के लिए होड़ करते हैं। देहधारी परमेश्वर के संपर्क में आने पर भी लोग अक्सर इसी तरह करते हैं। तुम लोगों को देहधारी परमेश्वर के साथ उन दृष्टिकोणों से व्यवहार नहीं करना चाहिए जिनसे तुम मानवजाति के साथ व्यवहार करते हो, देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के समान नहीं देखना चाहिए। देखो, जब मैं तुम लोगों के साथ बात कर रहा होता हूँ, तब मैं चीजों को बातचीत जैसा रखने की कोशिश करता हूँ, ताकि तुम सभी अपने दिल की बात खुलकर कह सको और जो तुम जानते और समझते हो, उसके बारे में बातचीत कर सको। हो सकता है कि तुम जो कहते हो, वह तथ्यों के अनुरूप न हो या बहुत वस्तुनिष्ठ न हो, लेकिन फिर भी मैं तुम्हें बोलने का अवसर देता हूँ। हमारी सामान्य बातचीत कोई औपचारिक सभा नहीं होती; हर व्यक्ति को बोलने का अधिकार होता है। मैं ऐसा नहीं करूँगा कि तुम सभी लोग सिर्फ मेरी बात सुनो, बल्कि हर किसी को बोलने देने की कोशिश करूँगा। कभी-कभी, अनौपचारिक बातचीत के माध्यम से कार्य में कुछ समस्याओं का पता चलता है, और हम आगे बढ़कर उन समस्याओं का समाधान करते हैं। यदि कोई समस्या नहीं होती, तो हर व्यक्ति अपना दिल खोलकर बातचीत कर सकता है, सहज महसूस कर सकता है और इसे बस मनोरंजन के रूप में ले सकता है। चाहे अवसर जो भी हो या मैं लोगों के जिस भी समूह के साथ हूँ, मैं यह नहीं कहूँगा, “किसी की भी आवाज़ मेरी आवाज़ से तेज़ नहीं होनी चाहिए। मुझे आवश्यक रूप से तुम सभी से श्रेष्ठ होना है। विशेष रूप से किसी मुद्दे पर चर्चा करते समय, मुझे आवश्यक रूप से सबसे अधिक बोलना है और मेरी अंतर्दृष्टियाँ सबसे गहरी होनी चाहिए। कोई और मुझसे आगे नहीं निकल सकता। यदि तुम मुझसे आगे निकलते हो तो मैं श्रेष्ठता के लिए तुमसे होड़ करूँगा।” मैं ऐसा नहीं करूँगा। यद्यपि अवसर चाहे जो भी हो, मेरा बोलना आवश्यक होता है, फिर भी मैं बहुत अधिक बोलने का ज्यादा इच्छुक नहीं होता; मुझे हर किसी को बोलने देना पसंद है। कभी-कभी मैं हर व्यक्ति से पूछता हूँ, “क्या तुम हाल ही में कोई नृत्य सीख रहे थे? तुमने कौन-से नृत्य सीखे हैं?” यदि कोई कुछ गलत कहता है या वह जो कहता है वह वस्तुनिष्ठ या सटीक नहीं होता तो बहस करने की कोई आवश्यकता नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, “यदि किसी ने तुम्हें अपमानित कर दिया तो?” मुझे अपमानित करने का क्या अर्थ है? मुझे वास्तव में ऐसा कोई नहीं मिला है जो सार्वजनिक रूप से मेरी आलोचना करता हो, मुझे कोसता हो या मेरी बात का खंडन करता हो। यदि वास्तव में ऐसा कोई व्यक्ति होता तो मुझे उससे पूछना पड़ता, “तुम ऐसा क्यों कर रहे हो? तुम जो कहते हो, क्या वह तथ्यों के अनुरूप है?” यदि उसने जो कहा वह सही होता, तो मैं उससे माफी माँग लेता। यदि वह गलत होता, तो मुझे उसके साथ सत्य पर संगति करनी पड़ती, ताकि वह अपनी समस्या पहचान सके और इतना पर्याप्त होता। मैं श्रेष्ठता के लिए उसके साथ होड़ न करता, इस बात पर ज़ोर न देता कि वह मेरी बात माने और स्वीकार करे कि मैं बॉस हूँ। इसलिए, कभी-कभी जब सभी एक-साथ बातचीत कर रहे होते हैं, तो कुछ लोगों की आवाज़ें ज्यादा तेज़ हो जाती हैं और चर्चा काफी गरमा जाती है; मैं बस धैर्यपूर्वक उन्हें बोलते हुए सुनता हूँ। भ्रष्ट मानवजाति अलग है। देखो, जब कुछ लोग एक-साथ बात करते हैं तो वे अंततः बहस करने लगते हैं। मन ही मन, वे एक-दूसरे को तुच्छ समझते हैं और वे अंतहीन बहस करते हैं, इस बात पर होड़ करने पर ज़ोर देते हैं कि कौन सही है और कौन गलत, हर किसी से फैसला करने के लिए कहते हैं और किसी को भी उन्हें अपमानित नहीं करने देते। कभी-कभी जब कुछ लोग मेरे साथ बातचीत करते हैं, तो वे बीच में टोकते हैं, बात में आगे कूद पड़ते हैं या कुछ बचकानी टिप्पणियाँ करते हैं, यहाँ तक कि मुझे अपमानित भी कर देते हैं। मुझे लगता है कि यह कोई बड़ी बात नहीं है; वे ऐसा जानबूझकर नहीं कर रहे हैं। सभी लोगों में भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, इसलिए इस तरह का आचरण होना बहुत सामान्य है। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो मेरे साथ मामले सँभालते समय, मेरे बोलने का इंतज़ार किए बिना सीधे निर्णय ले लेते हैं। मैं अपने मन में सोचता हूँ, “तुमने इस मामले पर हर व्यक्ति के साथ चर्चा किए बिना सीधे निर्णय ले लिया, लेकिन तुम्हारा इसे सँभालने का तरीका उचित है, इसलिए यह ठीक है।” फिर मैं कुछ नहीं कहता। मैं तुमसे बहस नहीं करता; मैं ऐसा करने में सक्षम हूँ और मैं वास्तव में ऐसा कर रहा हूँ। यदि अगुआ और कार्यकर्ता मुझसे कलीसिया में पेशेवर कार्य की विभिन्न मदों के बारे में पूछते हैं तो उस समय मेरे मन में जो भी आता है, उसके आधार पर मैं संगति करता हूँ और सुझाव देता हूँ और फिर अगुआ और कार्यकर्ता कलीसिया में जाकर उसे बताते और कार्यान्वित करते हैं। बाद में, जब मैं कलीसिया में जाता हूँ और कुछ लोगों को देखता हूँ तो जब वे काम पर संगति करते हैं तो मैं बस किनारे बैठकर सुनता हूँ। वास्तव में, मैं ये सभी चीजें जानता हूँ, लेकिन कुछ लोग सोचते हैं कि मैं नहीं जानता। वे सोचते हैं, “यह हम इंसानों का काम है; इसका तुमसे कोई लेना-देना नहीं है। तुम एक दर्शक हो, इसलिए तुम्हें बस हमें बोलते हुए सुनना चाहिए।” उस स्थिति में, मैं ज्यादा कुछ नहीं कहता; मैं लोगों से बहस नहीं करता। लेकिन भ्रष्ट मानवजाति ऐसा करने में असमर्थ है। जिसके पास भी थोड़ा रुतबा होता है या जो कुछ जिम्मेदारी वहन करता है, वह चाहता है कि लोगों के बीच उसी की बात मानी जाए, वह अपने रुतबे की रक्षा करना चाहता है और अपने आधिकारिक पद की रक्षा करना चाहता है। यदि कोई उसे गंभीरता से नहीं लेता तो वह बहुत परेशान महसूस करता है, उसे महसूस होता है कि उसकी गरिमा, मान-सम्मान और चरित्र को बहुत बड़ी चुनौती दी गई है। मुझे इस तरह की चीज को लेकर कुछ महसूस नहीं होता; अपने हृदय और मन में मैं लोगों के बीच रुतबे, प्रतिष्ठा और इज्जत जैसी चीजों में कोई दिलचस्पी नहीं रखता। यदि मैं जहाँ भी जाता हूँ, हमेशा लोग मेरे पीछे चलते हैं, हमेशा मुझे ऐसे घेर लेते और मेरे चारों ओर भीड़ लगाते हैं जैसे कि मैं आकर्षण का केंद्र हूँ, या यदि लोग हमेशा मुझे सम्मानसूचक शब्दों से संबोधित करते हैं, मेरे प्रति बहुत विनम्र होते हैं, मेरी चापलूसी करते हैं और मेरे साथ किसी असाधारण व्यक्ति या रुतबे वाले बुजुर्ग की तरह व्यवहार करते हैं तो मैं वास्तव में असहज महसूस करता हूँ। यदि तुम मेरे साथ बराबरी की स्थिति में खड़े होते हो और शांति से बातचीत करते हो तो मैं काफी सहज महसूस करता हूँ; यदि तुम मेरे सामने चापलूसी भरा और बहुत बनावटी व्यवहार करते हो तो मैं वास्तव में काफी असहज महसूस करता हूँ। लेकिन भ्रष्ट मानवजाति का लगभग सौ प्रतिशत हिस्सा रुतबे, प्रतिष्ठा और मान-सम्मान की बाधा पार नहीं कर सकता; वे सभी इन चीजों का अनुसरण करते हैं और इनका आनंद लेते हैं।

जब मैं किसी के साथ बातचीत कर रहा था, तब उसने कोई बात छेड़ी और उसके विषय का अनुसरण करते हुए मैंने भी कोई बात छेड़ी। उसने अपने मन में सोचा कि मैं श्रेष्ठता के लिए उसके साथ होड़ करना चाहता हूँ, इसलिए उसने यह देखने के लिए तुरंत दो और बातें छेड़ दीं कि क्या मैं दो और बातें छेड़ सकता हूँ। मैंने कहा है कि बातचीत करना काम करने जितना गंभीर और कठोर नहीं होता; यह बस अनौपचारिक होता है। जब तक हर व्यक्ति खुश है, तब तक ठीक है; इसमें बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं होते। मैं एक सीधा-सादा व्यक्ति हूँ। कोई जिस बारे में भी बात करता है, मैं बस उसमें शामिल हो जाता हूँ और उसी तर्ज पर थोड़ी बातचीत कर लेता हूँ, लेकिन इससे परेशानी खड़ी हो गई। उसका क्या मतलब था? वह जिस भी विषय पर बातचीत करता, मैं उसके बारे में और बात नहीं कर सकता। यदि मैं बोलता रहता, तो वह श्रेष्ठ न दिखता और अपने हृदय में शिकायत करता, “तुम इतने नासमझ क्यों हो? तुम समझते क्यों नहीं कि मेरा क्या मतलब है? तुम खुद को समझते क्या हो? तुम मेरे साथ बराबरी के स्तर पर बातचीत भी करना चाहते हो!” यह देखकर कि उसे इस तरह बातचीत करना पसंद नहीं आया, मुझे बात समझ आ गई। मैं सामान्य मानवता के तरीकों का उपयोग करके लोगों के साथ मेल-जोल करता हूँ। यदि यह काम नहीं करता तो मैं तर्कसंगत ढंग से झुक जाऊँगा; मैं लोगों से बहस नहीं करूँगा। अविश्वासियों के साथ निभना असंभव है और कलीसिया में कुछ लोग भी विवेकहीन होते हैं। जब तुम उनके साथ संगति करते हो तो उनका अभिमान-बोध उन्हें सीधे तौर पर कुछ भी कहने से रोकता है, लेकिन उनके भीतर भ्रष्ट स्वभाव होते हैं और वे फिर भी तुम्हारे साथ होड़ करेंगे। वे होड़ करने से खुद को रोकने में असमर्थ होते हैं। क्यों? यही उनका जीवन है। जिन मामलों में सत्य सिद्धांत शामिल नहीं होते, उनके संबंध में बहस शुरू करने की कोई आवश्यकता नहीं है। उदाहरण के लिए, पूर्वी लोग कहते हैं कि चाय पीना स्वास्थ्यवर्धक है, जबकि पश्चिमी लोग कहते हैं कि कॉफी पीना स्वास्थ्यवर्धक है। वास्तव में कौन-सा स्वास्थ्यवर्धक है? ऐसी चीजों के बारे में बहस करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस मामले में सत्य सिद्धांत शामिल नहीं हैं; बस अपनी पसंद, रहन-सहन की स्थितियों और जीवन शैली की आदतों के आधार पर चुन लो। यदि तुम्हारे पास चाय पीने के साधन हैं तो चाय पियो; यदि नहीं हैं तो सादा उबला हुआ पानी पियो। तुम चाहे जो भी पियो, यह तुम्हारे आचरण के तरीके को बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करता। कभी-कभी हमारे विचार और दृष्टिकोण अलग होते हैं फिर भी मैं तुम्हारे साथ बाल की खाल नहीं निकालता; मैं अभी भी अपने सिद्धांतों का पालन करता हूँ। मैं तुम्हारे साथ उन चीजों पर बहस नहीं करूँगा, जिनमें सिद्धांत शामिल नहीं हैं। मैं तुम्हारे साथ किसी ऐसे कथन पर, जिसमें किसी भी तरह से सिद्धांत शामिल नहीं हैं या किसी धर्म-सिद्धांत या सिद्धांत पर साँस फूल जाने की हद तक बहस बिल्कुल नहीं करूँगा, वह भी सिर्फ खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाने के लिए जो सिद्धांतों का दृढ़ता से पालन करता है। मैं ऐसा बिल्कुल नहीं करूँगा! कभी-कभी जब कुछ लोग मुझसे सवाल पूछते हैं, तब मैं उनके साथ सिद्धांतों पर संगति करूँगा और विशेष परिस्थितियों में मैं उन्हें सीधे बता दूँगा कि क्या करना है। बाद में वे इसे करने का एक अन्य तरीका प्रस्तावित करते हैं और मुझसे पूछते हैं कि क्या वह कारगर है। यह सुनकर कि उनके प्रस्तावित तरीके का प्रभाव मेरे तरीके के लगभग समान है, मैं कहता हूँ, “यदि तुम्हारे लिए इसे करना सुविधाजनक है और स्थानीय परिस्थितियाँ उपयुक्त हैं तो तुम इसे अपने तरीके से कर सकते हो; तुम्हें इसे मेरे कहे अनुसार करने की आवश्यकता नहीं है।” मैं यह बिल्कुल नहीं कहूँगा, “मेरा वचन कानून है; मैं जो कहता हूँ वही होता है और तुम लोगों को सुनना ही होगा।” यदि तुम नहीं सुनते तो भी ठीक है। यदि तुम जो कहते हो वह उचित है, मेरे द्वारा सुझाए गए तरीके से बहुत अलग नहीं है, उसका लक्ष्य समान है और प्रभाव लगभग समान है, तो तुम मेरे सुझाव को न सुनने का चुनाव कर सकते हो। मैं तुम्हारे साथ जबरदस्ती बिल्कुल नहीं करूँगा।

कुछ साल पहले कुछ लोगों ने एक कार्यक्रम के लिए नृत्य प्रस्तुत किया। यह देखकर कि उनके कुछ नृत्य मुद्राओं में कुछ समस्याएँ हैं, मैंने उन्हें उनके बारे में बताया। उनमें से कुछ यह सुनकर नाखुश हुए और इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए। मैंने उनसे बहस नहीं की; मैंने बस उनसे इसे कुछ बार ध्यान से देखने के लिए कहा, ताकि वे देख सकें कि उन मुद्राओं के साथ समस्याएँ हैं या नहीं। मैंने कहा, “यदि तुम लोग अभी भी मेरे द्वारा बताई गई समस्याएँ महसूस नहीं कर सकते तो मैं तुम लोगों को एक और विकल्प दूँगा। इस विकल्प को आजमाओ और इसकी तुलना पिछले वाले से करके देखो कि कौन-सा बेहतर है।” पता चला कि उन्होंने मेरे द्वारा सुझाए गए विकल्प के अनुसार इसे करने की कोशिश की और महसूस किया कि मेरा विकल्प वास्तव में बेहतर है, तब कहीं उन्होंने स्वीकार किया कि पिछले नृत्य की मुद्राओं में कुछ समस्याएँ हैं। वे उस समय इसे महसूस नहीं कर सके। शायद बात सिर्फ इतनी हो कि दर्शकों को कार्यक्रम में शामिल लोगों की तुलना में ज्यादा साफ दिखता है। वे उन मुद्राओं में कुशल हो गए थे क्योंकि वे उन्हें लगातार कर रहे थे, इसलिए अचानक मुझे यह कहते सुनकर कि कुछ मुद्राएँ अच्छी नहीं हैं, उन्हें लगा होगा कि उनके अभिमान को ठेस पहुँची है और वे क्षणिक रूप से इसे स्वीकार करने में असमर्थ थे। मैं कहता हूँ कि युवाओं का ऐसा होना सामान्य है। तुम लोगों को यह बताने का क्या उद्देश्य है? मैं बस तुम लोगों को यह बताना चाहता हूँ कि सामान्य परिस्थितियों में मैं तुम लोगों के साथ उन मुद्दों पर बिल्कुल भी बहस नहीं करूँगा, जिनमें सिद्धांत शामिल नहीं हैं। यदि इसमें सिद्धांत का मामला शामिल है तो मैं केवल तुम लोगों के लिए एक समाधान बताऊँगा। मैं तुम लोगों को दबाने और तुम लोगों को अपनी बात सुनने के लिए मजबूर करने के लिए जबरन रुतबे का उपयोग नहीं करूँगा। ज्यादातर मामलों में, मैं धीरे-धीरे चीजों को सुलझाता हूँ, उन पर बात करता हूँ और उन्हें हल करता हूँ। यदि ये सभी तरीके काम नहीं करते तो शायद कुछ लोगों की काट-छाँट करनी पड़े। बेशक, कुछ लोगों की काट-छाँट इसलिए नहीं की जाती कि उन्होंने मुझे अपमानित किया, बल्कि इसलिए की जाती है कि उन्होंने प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन किया, सिद्धांतों का उल्लंघन किया और कलीसिया के काम में विघ्न-बाधाएँ पैदा कीं। इसलिए, जब कोई व्यक्ति गलती या विद्रोह करता है और अनुशासित या दंडित किया जाता है, तो ऐसा इसलिए नहीं किया जाता कि उसने परमेश्वर की पहचान या परमेश्वर के दर्जे को अपमानित किया, इसलिए नहीं कि उसने परमेश्वर को अपमानित किया, बल्कि इसलिए कि उसने सिद्धांतों का उल्लंघन किया और प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन किया। पूरी दुनिया को देखो : क्या कोई ऐसा है जिसे परमेश्वर को अपमानित करने के लिए दंडित किया गया है या उसे प्रतिशोध झेलना पड़ा है? ऐसा कोई नहीं है। इस दुनिया में ऐसे बहुत-से लोग हैं जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, जो परमेश्वर को कोसते हैं, जो निरर्थक बातें बोलते हैं और जो घमंड की बातें बोलते हैं। जब अंततः उन्हें दंडित किया जाता है, तब उनमें से किसे परमेश्वर को अपमानित करने के लिए दंडित किया जाता है? उनमें से किसी को नहीं; यह सब इसलिए होता है कि उन्होंने कई बुराइयाँ की होती हैं और उन्हें इन बुरे कर्मों के आधार पर दंडित किया जाना चाहिए। ऐसे मामलों का सामना करते समय, जो बहस का कारण बन सकते हैं, मैं तुम्हारे साथ उन पर विस्तार से चर्चा करने की कोशिश करता हूँ जिससे तुम यह समझ सको कि मामले को सँभालने के सिद्धांत क्या हैं। यदि तुम्हारे पास कोई बेहतर योजना है तो निश्चित रूप से तुम उस पर भी टिके रह सकते हो। मैं श्रेष्ठता के लिए तुम्हारे साथ होड़ नहीं करूँगा, न ही मैं यह कहूँगा, “चूँकि मैंने बोल दिया है, इसलिए इसे मेरी योजना के अनुसार लागू किया जाना चाहिए। अगर तुम्हारी योजना अच्छी भी हो तो भी उसे लागू नहीं किया जा सकता। इस मामले में मेरा निर्णय ही अंतिम होना चाहिए!” मैं ऐसा नहीं करूँगा। मैं तुम लोगों की राय लेने और हर किसी की खूबियों का इस्तेमाल करने की कोशिश करूँगा। यदि तुम लोगों में से किसी की कोई राय या विचार न हुआ तो मेरा निर्णय ही अंतिम होगा—यह तो कहने की जरूरत नहीं है। लेकिन मैं तुम लोगों में से किसी के साथ अभिमान, रुतबे या अंतिम निर्णय किसका होगा, इस पर बिल्कुल भी होड़ नहीं करूँगा। इन वर्षों में तुम लोगों के साथ मिलने-जुलने और व्यवहार करने के बाद, शायद तुम लोग भी इसे समझ गए होगे : कई बार मैंने तुम लोगों से बातें कही हैं और मेरे बोलने के बाद, तुम लोगों के अपने विचार थे और तुमने, मैंने जो कहा उसका अभ्यास या कार्यान्वयन नहीं किया। तब मैं इसे और अधिक स्पष्ट रूप से समझाने का कोई तरीका खोजने की कोशिश करूँगा। यदि तुम लोग इसे स्वीकार कर सकते हो तो यह ज्यादा बेहतर है। यदि तुम इसे स्वीकार नहीं करते और यह कलीसिया के काम को प्रभावित करता है तो कलीसिया के पास प्रशासनिक आदेश हैं : यदि तुम्हें बर्खास्त किया जाना चाहिए तो तुम्हें बर्खास्त किया जाएगा; यदि तुम्हारी काट-छाँट की जानी चाहिए तो तुम्हारी काट-छाँट की जाएगी; कलीसिया तुम्हें वैसे ही सँभालेगी, जैसे उसे सँभालना चाहिए। जहाँ तक खुद मामले का संबंध है, मैं अपना मान-सम्मान वापस पाने या अपने रुतबे और प्रतिष्ठा की रक्षा करने के लिए तुम्हारे साथ किसी भी बात पर बिल्कुल भी कभी बहस नहीं करूँगा। मैं केवल मामले की पूरी कहानी और वे सिद्धांत स्पष्ट रूप से समझाने पर ध्यान केंद्रित करता हूँ, जो लोगों को समझने चाहिए। मैं धैर्यपूर्वक चीजों को बार-बार समझाता हूँ, ताकि तुम सत्य बेहतर ढंग से समझ सको और सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सको। इस विषयवस्तु पर संगति करने का उद्देश्य तुम लोगों को देहधारी परमेश्वर को बेहतर ढंग से समझने देना है। बाहर से देहधारी परमेश्वर के सामान्य और व्यावहारिक जीवनयापन की समझ होने के अलावा, तुम लोग देहधारी परमेश्वर के सार, स्वभाव, विचारों और दृष्टिकोणों की और भी अधिक समझ प्राप्त कर सकते हो। हमने अभी होड़ न करने के विषय पर संगति की है। जब रुतबा और मान-सम्मान शामिल होते हैं, तब देहधारी परमेश्वर जिस सिद्धांत का पालन करता है, वह लोगों के साथ बहस न करना, और रुतबे, मान-सम्मान या प्रतिष्ठा के लिए लोगों के साथ होड़ न करना है। इन चीजों को लेकर दूसरों के साथ होड़ करने की प्रवृत्ति भ्रष्ट स्वभावों को प्रकट करने वाली भ्रष्ट मानवजाति की एक प्रमुख अभिव्यक्ति है। इसलिए, होड़ न करना भी वह है जिसमें देहधारी परमेश्वर की मानवता का सार मानवजाति की मानवता के सार से अलग है और यह उस विषयवस्तु का एक पहलू है जिसे लोगों को समझना चाहिए।

अब जबकि हमने होड़ न करने के पहलू पर संगति समाप्त कर ली है, तो आओ हम लड़ाई न करने के पहलू पर संगति करें। लड़ाई न करना कुछ हद तक होड़ न करने के समान है, लेकिन इनमें कुछ अंतर भी हैं। होड़ न करने की उन अभिव्यक्तियों के अलावा, देहधारी परमेश्वर के लड़ाई न करने के पहलू में कुछ व्यावहारिक जीवन-यापन और प्रकाशन भी हैं। इस जीवन-यापन और इन प्रकाशनों के माध्यम से, लोग देहधारी परमेश्वर के मानवता सार के एक पहलू को भी बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। लड़ाई न करने के इस पहलू में आम तौर पर क्या शामिल होता है? इसमें अभी भी लोगों के साथ मिलना-जुलना और जुड़ना शामिल होता है। लोगों के साथ मिलने-जुलने और जुड़ने के लिए देहधारी परमेश्वर का सिद्धांत है लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना, सिद्धांतों के अनुसार काम करना और अपने दिल में या गुप्त रूप से लोगों के साथ दिमागी खेल न खेलना या चालें न चलना। लोगों के साथ मिलते-जुलते और कुछ विषयों पर चर्चा करते समय, वह अपने दिल में यह विचार बिल्कुल नहीं करेगा, “इससे तुम्हारा क्या मतलब है? क्या तुम जानबूझकर मुझे निशाना बना रहे हो? क्या तुम्हारी बातों का कोई छिपा हुआ अर्थ है? क्या गुप्त रूप से कुछ और चल रहा है? मुझे सोचना होगा कि तुमसे कैसे बात करूँ, तुम्हें कैसे दिखाऊँ कि मैं किस मिट्टी का बना हूँ, या तुम्हारे साथ कैसे लड़ाई करूँ।” जब मैं तुम लोगों से मिलता-जुलता और बातचीत करता हूँ, तो मेरे मन में ऐसे विचार नहीं होते। अगर दूसरा पक्ष जानबूझकर लड़ाई करना भी चाहता हो, तो भी मैं उसके साथ बिल्कुल भी कभी लड़ाई नहीं करूँगा। अगर दूसरा पक्ष कोई अविश्वासी भी हो, जो वास्तविक स्थिति का पता लगाना चाहता हो या मेरे खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए कोई बात पकड़ना चाहता हो, तो भी मैं सिद्धांतों के अनुसार काम करता हूँ। मैं उसके साथ लड़ाई नहीं करता; मैं वही करता हूँ जो मुझे करना चाहिए और मैं वही कहता हूँ जो मुझे कहना चाहिए। मैं आचरण के लिए अपने सिद्धांतों और अपनी सीमाओं के अनुसार कार्य करता और बोलता हूँ। संक्षेप में, चाहे कोई भी हो, मैं उसके साथ लड़ाई नहीं करता। उदाहरण के लिए, मैं किसी से पूछता हूँ, “इस महीने सुसमाचार प्रचार के परिणाम कैसे हैं?” वह अपने मन में सोचता है, “यह अचानक इस महीने सुसमाचार प्रचार की स्थिति के बारे में क्यों पूछ रहा है? इसका क्या मतलब है? क्या किसी ने मेरी पीठ पीछे मेरे बारे में किसी समस्या की रिपोर्ट की है? क्या यह मेरी स्थिति की सच्चाई का पता लगाने और मुझे बर्खास्त करने की कोशिश कर रहा है?” वह ऐसा क्यों सोचेगा? क्या यह पूछने में मेरा कोई छिपा हुआ मकसद है? क्या इसका कोई छिपा हुआ अर्थ है? (नहीं।) वह लड़ाई करना चाहता है, इसलिए उसे लगता है कि मेरी बातों का कोई छिपा हुआ अर्थ है; या, चूँकि उसने पर्दे के पीछे कुछ बुरे काम किए हैं और उसे अपराध-बोध है, इसलिए उसे लगता है कि मेरे बोलने का कोई छिपा हुआ मकसद होगा। वास्तव में, जब मैं पूछता हूँ कि इस महीने सुसमाचार प्रचार कैसा चल रहा है, तो इस वाक्य का ठीक वही अर्थ है जो सतह पर दिखाई देता है; इसका कोई अन्य अर्थ नहीं है। मेरा लड़ाई करने का कोई इरादा नहीं है, न ही मैं तुमसे तुम्हारा राज उगलवाने की कोशिश कर रहा हूँ, न ही तुमसे यह स्वीकार करवाना चाहता हूँ कि इस महीने के परिणाम अच्छे नहीं हैं, और न ही तुमसे इस बारे में सच उगलवाना चाहता हूँ कि हाल ही में सुसमाचार प्रचार कैसा चल रहा है, ताकि मैं उसे एक बहाने के रूप में इस्तेमाल करके तुम्हारी काट-छाँट करने और तुम्हें बर्खास्त करने के लिए कोई बात पकड़ सकूँ। इसके बजाय, मैं व्यावहारिक तरीके से कलीसिया के कार्य की स्थिति के बारे में पता लगाने और तुम्हें अपना कर्तव्य निभाने में मौजूद समस्याएँ हल करने में तुम्हारी मदद करने की कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन अगर तुम हमेशा मेरी बातों का अलग ही अर्थ निकालना चाहते हो, और हमेशा मेरे साथ लड़ाई करना चाहते हो, तो मैं तुमसे नहीं पूछूँगा। मैं अन्य लोगों से पूछ सकता हूँ। मैं उसके पास जाऊँगा जिससे मैं वास्तविक स्थिति का पता लगा सकूँ, जो सामान्य रूप से बातचीत कर सके, एक सामान्य मानव की तरह बोल सके, और सच बता सके। तुम हर बात का बतंगड़ बनाते हो और बहुत बड़ी परेशानी हो। तुम बहुत शक्की हो और तुम्हारा दिमाग बहुत जटिल है, इसलिए मैं तुमसे बातचीत नहीं करूँगा। लोगों के साथ मिलने-जुलने और बातचीत करने का मेरा यही सिद्धांत है। क्या तुम लोग कहोगे कि यह सरल है? (हाँ, यह सरल है।) उदाहरण के लिए, किसी ने मेरे सामने एक लक्जरी क्रूज शिप पर जाने की डींगें मारीं। मैंने कहा : “मैं वास्तव में किसी लक्जरी क्रूज शिप पर नहीं गया हूँ। तुम लोग अमीर हो; तुम लोगों ने दुनिया देखी है।” ये गुस्से में कहे गए शब्द नहीं हैं, न ही ये उतावलेपन में कहे गए हैं। मैं किसी क्रूज पर नहीं गया हूँ, इसलिए मैं बिल्कुल सत्य बताता हूँ; मैं दिखावा नहीं करता। ऐसे व्यक्ति से सामना होने पर मैं पीछे हट जाता हूँ और उसके साथ बिल्कुल भी लड़ाई नहीं करता। कुछ चीनी लोग हमेशा मुझसे अंग्रेजी में बात करते हैं, और कुछ ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जो मैंने पहले नहीं सुने हैं। यह देखकर कि मैंने उन्हें नहीं सुना है, वे और भी जोर-शोर से दिखावा करते हैं : “मैं विशेष रूप से वे बातें कहूँगा जो तुम नहीं जानते। मैं यह सुनिश्चित करूँगा कि तुम मुझे समझ न सको, तुम्हें ईर्ष्या और जलन महसूस करवाऊँगा, और तुम्हें गुस्सा दिलाऊँगा!” क्या यह लड़ाई करना नहीं है? (है।) मैं कहता हूँ, “मैंने तुम्हारे द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्द नहीं सुने हैं। तुम्हारी अंग्रेजी काफी अच्छी है।” कुछ लोगों को दिखावा करना और लोगों को तुच्छ समझना पसंद होता है, वे हमेशा खुद को श्रेष्ठ दिखाते हैं, सोचते हैं कि वे कुछ खास हैं, और महसूस करते हैं कि वे सक्षम और दूसरों से एक कदम आगे हैं। ऐसे लोगों से सामना होने पर, मैं उनके साथ भी सही ढंग से व्यवहार कर सकता हूँ। अगर तुम्हें दिखावा करना पसंद है, तो मैं तुम्हें पूरी सीमा तक दिखावा करने दूँगा। मैं तुम्हें बीच में नहीं टोकूँगा, तुम्हारे साथ लड़ाई करने की तो बात ही छोड़ दो।

तुम हर जगह ऐसे लोगों को देख सकते हो, जिन्हें लड़ाई करना पसंद है; जहाँ भी लोगों के समूह होते हैं, वहाँ ऐसे लोग होंगे जिन्हें लड़ाई करना पसंद है। वे अक्सर दूसरों के साथ होड़ और लड़ाई करते हैं, और वे किसी एक शब्द, एक चीज या एक मामले पर भी लड़ाई कर लेंगे। मैंने ऐसे बहुत सारे लोगों को देखा है। हालाँकि, मैं लोगों के साथ लड़ाई नहीं करता। मैं क्यों नहीं करता? क्योंकि लड़ाई करना मेरे लिए स्वभाविक नहीं है। कलीसिया में ऐसे भी कई लोग हैं, जो मुझसे मिलते-जुलते और बोलते समय हमेशा दिमागी खेल खेलते हैं। वे हमेशा अटकलें लगाते हैं, “तुम्हारे कहने का क्या मतलब है? क्या तुमने मेरी पीठ पीछे मेरे किसी बुरे व्यवहार के बारे में पता लगा लिया है? क्या तुम मुझे बर्खास्त करने वाले हो?” “तुम ऐसा क्यों कह रहे हो? क्या तुम कोई इशारा कर रहे हो? क्या तुम्हारी बातों में कोई छिपा हुआ अर्थ है? क्या तुम मुझसे कुछ करवाना चाहते हो?” उदाहरण के लिए, किसी ने टी-शर्ट पहनी हुई थी, और मैंने कहा : “तुम्हारी टी-शर्ट का रंग काफी अच्छा है। क्या इससे तुम्हें ठंडक मिलती है? क्या यह सूती है?” क्या यह बहुत ही सामान्य और साधारण बात नहीं है? (हाँ।) तब उस व्यक्ति ने अपने मन में सोचा, “क्या तुम यह इसलिए पूछ रहे हो कि तुम्हें भी ऐसी ही टी-शर्ट चाहिए? क्या अधिकारी आम तौर पर आम लोगों से इसी तरह चीजें नहीं माँगते? वे खुलकर नहीं माँगते, बल्कि घुमा-फिराकर बात करते हैं, जिससे लोग इशारा समझ जाएँ और स्वेच्छा से चीजें उनके दरवाजे तक पहुँचा दें। इस तरह, अगर बाद में यह बात उठती है, तो वे कह सकते हैं कि उन्होंने इसकी माँग नहीं की थी, और यह जबरन वसूली नहीं है। क्या परमेश्वर का यही मतलब था? अगर उसका यही मतलब था, तो मुझे जल्दी से कुछ टी-शर्ट खरीदकर भेज देनी चाहिए।” यह सोचकर, उसने कुछ टी-शर्ट खरीदीं और मुझे भेज दीं। उसने सोचा कि चूँकि मैंने कहा था कि शर्ट अच्छी है, इसलिए मुझे भी वैसी ही टी-शर्ट चाहिए थी। दरअसल, मुझे सच में वह नहीं चाहिए थी; मैं तो बस बातचीत कर रहा था। अगर मुझे सच में चाहिए होती, तो मैं सीधे तौर पर कह देता; मैं लोगों को कभी बातों का छिपा अर्थ निकालने के लिए मजबूर बिल्कुल नहीं करूँगा। इसलिए मैं शर्टें स्वीकार नहीं कर सका, और मैंने जल्दी से उन्हें वापस करवा दिया। मेरे पास पहनने के लिए कपड़ों की कमी नहीं है। मैं क्या पहनता हूँ, इसके लिए मेरी अपनी पसंद है, और कोई दूसरा उसका पता नहीं लगा सकता। क्या यह स्पष्ट है? (हाँ।) जब मैं लोगों के साथ बात करता हूँ तब, यहाँ तक कि अनौपचारिक बातचीत में भी, मैं बहुत विशेष रूप से और गंभीरता से बोलता हूँ। अक्सर, जटिल दिमाग वाले कुछ लोग मेरी बातों का विकृत अर्थ निकालेंगे, और अटकलें लगाएँगे कि क्या मेरी बातों का कोई छिपा हुआ अर्थ है, और वे लड़ाकू हो जाएँगे। मैं तुम लोगों पर एक चीज स्पष्ट कर दूँ : मेरा किसी के साथ लड़ाई करने का बिल्कुल भी कोई इरादा नहीं है। बोलते समय मैं जो बताता हूँ, वह ठीक वही होता है जो मेरे वचनों का शाब्दिक अर्थ होता है; मैं जो कहता हूँ उसमें कोई छिपा हुआ अर्थ बिल्कुल नहीं होता। इसलिए जब तुम मेरे साथ बातचीत करते हो, तब तुम मुझे जो भी कहते हुए सुनते हो, उसका ठीक वही मतलब होता है। उसकी अति-व्याख्या मत करो, उसके बारे में बहुत अधिक मत सोचो और दिमागी खेल मत खेलो, मुझे परखने या मेरे बारे में अटकलें लगाने के लिए कोई चालें चलने की तो बात ही छोड़ दो। मैं जो शब्द बोलता हूँ, वे सबसे सरल और सबसे स्पष्ट होते हैं; थोड़ी-सी सामान्य सोच रखने वाला कोई भी व्यक्ति मेरी बात समझ सकता है। अगर तुम लड़ाई नहीं करते, तो हमारे लिए एक-दूसरे के साथ निभाना और मामले सँभालना आसान होगा। जब मैं तुम्हें कुछ करने का निर्देश देता हूँ, तो मैं चीजों को उलझाता नहीं; तुम्हें बस ठीक वैसा ही करने की जरूरत है जैसा मैं कहता हूँ। अगर तुम लड़ाई करते हो, तो इससे इसके बजाय चीजों में देरी होगी, और मुझे तुम्हारे प्रति विरक्ति की भावना महसूस होगी। मैं कहूँगा : “तुम्हें लड़ाई करना पसंद है, तुम्हारा दिमाग बहुत अधिक जटिल है, और तुम स्पष्टवादी नहीं हो। मुझे तुम जैसे लोगों के साथ मिलना-जुलना या बातचीत करना पसंद नहीं है। मैं तुम्हारे साथ बातचीत करने या मिलने-जुलने के बजाय अपने पालतू कुत्ते के साथ खेलना पसंद करूँगा। तुम दिन भर किसी न किसी व्यक्ति के साथ लड़ाई करते रहते हो; यह ऐसी चीज नहीं है जिसे करना मुझे पसंद हो। प्रकृति से, मैं जब चीजें कहता और करता हूँ तो जो जैसा है उसे वैसा ही कहता हूँ; मैं लोगों के साथ लड़ाई नहीं करता।” तुम्हें बिल्कुल भी लड़ाई नहीं करनी चाहिए। अगर तुम हमेशा लड़ाई करते रहते हो, तो तुम अपनी सत्यनिष्ठा खो दोगे, और मेरे दिल में तुम्हारा कोई महत्व नहीं रहेगा। जब किसी चीज के बारे में पूछा जाए, तो बस सच बताओ। उस समय जो मन में आए, वही कहो, और जितना ज्यादा याद आए, उतना कहो। हमेशा यह मत सोचो कि मैं किसी चीज के बारे में क्यों पता लगाना चाहता हूँ, अगर तुम इसके बारे में सच बताते हो तो इसके क्या दोष होंगे, या क्या यह तुम्हारे रुतबे को या ऊपरवाला तुम्हें कैसे देखता है, इस बात को प्रभावित करेगा। अगर तुम हमेशा इन चीजों के बारे में सोचते हो, तो तुम खुद को परेशानी में पाओगे। मैं तुमसे कह रहा हूँ, ईमानदारी से बोलो, और दिमागी खेल मत खेलो या चालें मत चलो। अगर तुमने कुछ गलत किया हो, तो भी तुम्हें सच बताना चाहिए और उसे छिपाना नहीं चाहिए। अगर तुम अपने कर्तव्यों के लिए उपयुक्त नहीं हो, तो भी परमेश्वर का घर तुम्हें केवल सिद्धांतों के अनुसार ही बर्खास्त करेगा और तुम्हारे प्रति नफरत नहीं रखेगा। लेकिन अगर तुम हमेशा वास्तविक स्थिति छिपाते हो और मेरे साथ बात करते समय हमेशा दिमागी खेल खेलते हो, तो भले ही तुम्हें बर्खास्त न किया जाए, मैं अंदर से तुमसे घृणा करूँगा। जब भी मैं तुम्हारे बारे में सोचूँगा, मुझे घिन आएगी, और अगर मुझे तुम्हारा उपयोग करना पड़ा तो इससे मुझे कोई खुशी नहीं मिलेगी। तो तुम लोग कौन-सा मार्ग चुनते हो? (हम सच बोलेंगे।) यह सही है। कभी दिमागी खेल मत खेलो। चाहे कोई भी समय हो, ईमानदार बातें बोलना, ईमानदार चीजें करना और सच बताना तुम्हारे स्व-आचरण के लिए सीमा होनी चाहिए, और साथ ही वह सबसे बुनियादी सिद्धांत भी होना चाहिए जिसका तुम्हें आचरण करते समय पालन करना चाहिए। हमेशा दिमागी खेल मत खेलो। विशेष रूप से मेरे साथ बात करते या मामले सँभालते समय तुम्हें दिमागी खेल बिल्कुल नहीं खेलने चाहिए। बोलते समय घुमा-फिराकर बात मत करो या लोगों को असमंजस में मत रखो, और मामले सँभालते समय दिमागी खेल मत खेलो। अगर तुम चतुर बनने की कोशिश करते हो, और अपने मन में सोचते हो, “मैं तुम्हारे सामने इस मामले को सँभालूँगा ताकि तुम्हें दिखा दूँ कि मैं कितना व्यस्त हूँ, और मेरे काम की व्यवस्था कितनी सख्ती और कड़ाई से की गई है, लेकिन तुम्हारी पीठ पीछे मैं कुछ नहीं करूँगा”—अगर तुम इस तरह सोचते हो, तो तुम परेशानी की ओर बढ़ रहे हो। मैं तुम्हारे साथ नियमों के अनुसार निपटता हूँ और सिद्धांतों के अनुसार चीजें सँभालता हूँ। मैं तुम्हारे साथ लड़ाई नहीं करूँगा; मैं तुम्हारे तरीके या लड़ाई करने के लिए तुम्हारे द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली चालें इस्तेमाल करके तुम्हारे साथ लड़ाई नहीं करूँगा। कलीसिया के पास प्रशासनिक आदेश हैं, और परमेश्वर के घर में लोगों को सँभालने के सिद्धांत हैं। देर-सबेर तुम्हें जवाबदेह ठहराया जाएगा और तुम्हें अपने इन अनुचित व्यवहारों और यहाँ तक कि अपने बुरे कर्मों की कीमत चुकानी पड़ेगी। क्या यह स्पष्ट है? (हाँ।)

कभी-कभी हम अमेरिका में कुछ चीनी कलीसियाओं का दौरा करने जाते हैं। जैसे ही हम पहुँचते हैं और भाई-बहनों से मिलते हैं, कुछ लोग यह चिल्लाते हुए दूसरों को खबर कर देते हैं, “परमेश्वर यहाँ है! भाई यहाँ है!” वे काम में ढिलाई बरत रहे थे, लेकिन यह सुनकर माहौल अचानक बदल जाता है। कुछ लोग लॉन की घास काटने के लिए मशीनें चालू कर देते हैं, कुछ लोग सफाई करने लगते हैं, और वे व्यस्त हो जाते हैं। मैं कहता हूँ : “मुझे आता देखकर तुमने सफाई करना क्यों शुरू कर दिया? क्या तुम यह सिर्फ मुझे दिखाने के लिए कर रहे हो? क्या तुम ऐसा करके विवेक से काम ले रहे हो?” लोग अन्य लोगों के साथ दिमागी खेल खेल सकते हैं और उन्हें धोखा देने की कोशिश कर सकते हैं, और वे परमेश्वर के साथ भी ऐसा ही करते हैं; यह मानव-प्रकृति है। यह मानव-प्रकृति के किस पहलू को प्रकट करता है? क्या ऐसे लोग नीच चरित्र के नहीं होते? (हाँ।) लोग बहुत अधिक धोखेबाज और गंभीर रूप से घटिया होते हैं। उन्हें लोगों के साथ लड़ाई करने की आदत हो गई है, यहाँ तक कि वे परमेश्वर के साथ भी लड़ाई करना चाहते हैं। तुम हमेशा मुझसे सतर्क रहते हो और हमेशा अपने दिल में प्रतिरोधी रहते हो; तुम मुझे किस तरह का व्यक्ति समझते हो? वास्तव में, मेरे आसपास न रहने पर तुम क्या करते हो, यह देखने की मेरी कोई इच्छा नहीं होती। मैं बस तुम्हें जीवन के सही मार्ग पर ले जाने और तुमसे सभी चीजों में सिद्धांतों के अनुसार काम करवाने के लिए सत्य पर संगति करता हूँ। अगर तुम सचेत रूप से सही मार्ग पर चल सकते हो, तो तुम एक इंसान हो। अगर तुम सही मार्ग पर नहीं चलते, बल्कि मेरी पीठ पीछे क्षुद्र चालें चलते हो और मेरे साथ लड़ाई करते हो, तो तुम इंसान नहीं हो; तुम एक दानव हो, एक जानवर हो। उस स्थिति में, मैं चाहे कितना भी कहूँ, वह बेकार है; परमेश्वर तुम जैसे लोगों को नहीं बचाता। तुम लड़ाई करना चाहते हो, लेकिन मैं वास्तव में तुम्हारे साथ लड़ाई नहीं करूँगा; मैं तुमसे बहुत दूर रहूँगा। मैं न केवल उन जगहों पर न जाने की कोशिश करूँगा जहाँ तुम रहते और काम करते हो, बल्कि तुम्हें भी उन जगहों में प्रवेश न करने की कोशिश करनी चाहिए जहाँ मैं व्यक्तिगत रूप से रहता और काम करता हूँ। क्यों? क्योंकि मुझे तुम्हारे साथ लड़ाई करना पसंद नहीं है। तुम्हें लड़ाई करना बहुत पसंद है; अगर तुम हमेशा मेरे करीब रहोगे, तो क्या मैं थका हुआ महसूस नहीं करूँगा? कुछ लोग कहते हैं : “अगर तुम लड़ाई नहीं करते, तो तुम थका हुआ महसूस क्यों करते हो?” अगर तुम हमेशा मेरे साथ लड़ाई करते हो, तो मुझे लगातार तुम्हारे साथ सत्य पर संगति करनी पड़ेगी। यहाँ तक कि किसी छोटे मामले के लिए भी मुझे तुम्हारे साथ इस पर लंबे समय तक संगति करनी पड़ेगी। क्या तुम्हें नहीं लगता कि मैं थका हुआ महसूस करूँगा? अगर मैं तुम्हारे साथ चीजों पर बात नहीं करूँगा और तुम्हें समझाऊँगा नहीं, तो तुम्हारे दिल में हमेशा नाराजगी की भावना रहेगी, तुम हमेशा नकारात्मक रहोगे, गलतफहमियाँ रखोगे, और शिकायत करोगे, और तुम्हारा मन नकारात्मक चीजों से भरा रहेगा। मनुष्य का प्रकृति सार शैतान का है, और शैतान का स्वभाव उसका जीवन बन गया है। भ्रष्ट मानवजाति लड़ाई करने में प्रवृत्त होती है, और मनुष्य के लिए लड़ाई करने से बचना बहुत मुश्किल है। इसलिए, जब तुम लोग मेरे साथ मिलते-जुलते और बोलते समय अब और दिमागी खेल नहीं खेलते, जब तुम लोग मेरे द्वारा कही गई हर बात गंभीरता से ले सकते हो और उसे शुद्ध रूप से समझ सकते हो, और जब हम एक-दूसरे के साथ खुले और ईमानदार हो सकते हैं और किसी भी चीज के बारे में बात कर सकते हैं, तब हमारे बीच सौहार्द होगा। बिना बोले भी, हम आत्मा में संगत होंगे, हमारे बीच कोई बाधा या गलतफहमी नहीं होगी, और हम अपने दिलों में पूरी तरह से संवाद करने में सक्षम होंगे। तब हम एक साथ और मिल-जुलकर रहने में सक्षम होंगे। अभी मैं एकतरफा रूप से तुम लोगों के साथ लड़ाई नहीं करता, लेकिन तुम लोग खुद को लड़ाई करने से नहीं रोक सकते। इसलिए, अगर तुम लोग खुले तौर पर मेरे वचनों का विरोध करने, उन्हें अस्वीकार करने, उनकी आलोचना करने और उनकी निंदा करने के लिए खड़े नहीं होते, तो भी तुम अपने दिलों में प्रतिरोधी रहोगे और अभी भी चोरी-छिपे मेरे साथ लड़ाई करोगे। यह साबित करता है कि मनुष्य अपने भ्रष्ट स्वभाव हल किए बिना सच्चा समर्पण नहीं कर सकता। अधिकांश मामलों में, तुम लोग न केवल मेरे साथ एकता हासिल नहीं कर सकते, बल्कि तुम्हारे पास मेरे साथ सबसे बुनियादी सौहार्द या मेरी समझ तक नहीं है; तुम इसे बिल्कुल भी हासिल नहीं कर सकते। इस प्रकार, हमारे लिए एक-साथ इस तरह से रहना बहुत मुश्किल होगा, जहाँ हर व्यक्ति खुश हो और आनंदित महसूस करे। अगर मैं तुम लोगों के साथ होता, तो मैं हमेशा तुम लोगों को सही मार्ग पर ले जाना चाहता, ताकि तुम लोग शुद्ध समझ रख सको और सभी मामलों में सही चुनाव कर सको, ताकि जीवन में हो या अपने आचरण में या परमेश्वर में विश्वास करने के मार्ग पर, तुम सही मार्ग पर चल सको, और चाहे मैं बोलूँ या न बोलूँ, तुम लोगों के दिलों में मेरे प्रति सबसे बुनियादी भरोसा और साथ ही आज्ञाकारिता और समर्पण हो। लेकिन अभी, लोग यह सबसे बुनियादी भरोसा, आज्ञाकारिता और समर्पण तक प्राप्त नहीं कर सकते; लोगों के मन बहुत जटिल हैं। अगर मैं तुम्हारे साथ थोड़ा अच्छा होता हूँ, तो तुम सोचोगे कि कोई भी तुम्हारी बराबरी नहीं कर सकता और तुम हर किसी से ऊँचे हो, और मेरे साथ अपने जुड़ाव के कारण तुम धौंस जमाने लगोगे और हुक्म चलाने के लिए मेरे नाम का इस्तेमाल करोगे। अगर मैं तुम्हारे साथ सामान्य रूप से या थोड़ा रूखेपन से व्यवहार करता हूँ, तो तुम्हें लगेगा कि मुझमें कोई प्रेम नहीं है। अगर मैं तुम्हारे साथ थोड़ा सख्त होता हूँ या हमेशा तुम्हारी काट-छाँट करता हूँ और तुम्हें भाषण पिलाता हूँ, तो तुम्हें लगेगा कि तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है और अनुचित व्यवहार किया गया है, और तुम सोचोगे कि मेरे मन में तुम्हारे लिए कोई प्रेम या सहनशीलता नहीं है। मैं चाहे कुछ भी करूँ, तुम लोगों की उस पर अपनी राय होगी, क्योंकि तुम लोगों की समस्याएँ बहुत गंभीर हैं और तुम लोगों के मन बहुत जटिल है। इसलिए, अगर मैं तुम लोगों के साथ रहता भी हूँ, तो भी हमारे संवाद करने और मिलने-जुलने में लगातार समस्याएँ पैदा होंगी। अंत में, ये समस्याएँ लगातार टकराव को जन्म देंगी, और एक बार टकराव तेज हो जाने पर यह कहना मुश्किल होगा कि तुम लोग परमेश्वर में विश्वास करने के इस मार्ग पर चलना जारी रख पाओगे या नहीं। तुम लोगों ने सोचा था कि तुममें बहुत बड़ी आस्था है? तुम लोगों का आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है! यहाँ तक कि अब जबकि मैंने एक बहुत ही साधारण व्यक्ति के रूप में देहधारण किया है, और तुम लोगों के साथ इतने लंबे समय तक बात की है और तुम लोगों पर कार्य किया है, फिर भी तुम लोगों से मिलना-जुलना बड़ी कठिनाइयाँ पेश करता है। इन कठिनाइयों की जड़ क्या है? (हम बहुत अधिक धोखेबाज हैं और लड़ाई करने में प्रवृत्त हैं।) लोगों के मन शुद्ध नहीं है, और लोग ईमानदार नहीं हैं; वे भ्रष्ट स्वभावों से भरे हुए हैं। जब मुझे पता चलता है कि तुम भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हो या तुम्हारी मानवता में कुछ दोष हैं, तब अगर मैं तुम्हें उनके बारे में नहीं बताता, तो यह मेरी ओर से गैर-जिम्मेदाराना लगेगा। अगर मैं तुम्हें ऐसी बातें बताऊँ और तुम उन्हें स्वीकार कर सको, तो यह निश्चित रूप से बेहतर होगा। लेकिन अगर तुम इसे स्वीकार नहीं करते, तो क्या मुझे तुम्हें खुली छूट देनी चाहिए या मुझे तुम्हारी काट-छाँट करनी चाहिए और तुम्हें सख्ती से अनुशासित करना चाहिए? अगर मैं तुम्हें खुली छूट दूँ, तो यह मेरे जमीर के साथ मेल नहीं खाएगा। अगर मैं तुम्हारी काट-छाँट करूँ, तो तुम इसे स्वीकार नहीं कर सकोगे और तुम्हें लगेगा कि तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है। अगर मैं हमेशा तुम्हारे साथ सत्य पर संगति करूँ और तुम फिर भी उसे अपने दिल में स्वीकार न करो, तो बताओ, क्या मेरे लिए ऐसा करना उचित होगा? क्या मैं थका हुआ महसूस नहीं करूँगा? (हाँ।) अगर मैं तुम लोगों में से हर एक को हर दिन उपदेश दूँ, तो क्या मैं एक रोबोट नहीं बन जाऊँगा? क्या मैं एक उपकरण नहीं बन जाऊँगा? यह वह कार्य नहीं है जो मुझे करना है। मैं पूरी मानवजाति से बात करता हूँ; यह मेरी सेवकाई है। मेरे वचन किसी विशिष्ट व्यक्ति पर निर्देशित नहीं हैं। मैं पूरी मानवजाति से बात करता हूँ, और तुम मानवजाति के एक सदस्य हो, इसलिए ये वचन तुम पर लागू होते हैं। उन्हें खुद धीरे-धीरे खाओ और पियो, धीरे-धीरे उनके साथ अपनी तुलना करो, और धीरे-धीरे अनुभव करो और बदलो। लेकिन इस धीमे बदलाव में कितना समय लगेगा? तीन से पाँच साल, या दस से बीस साल? और तुम किस हद तक बदलोगे? यह तुम्हारे व्यक्तिगत संकल्प और बोध-क्षमता पर निर्भर करता है। इस अवधि के दौरान, जब हम एक-दूसरे के साथ मिलते-जुलते हैं, तब तुम लोग झूठ बोलते और धोखा देते हो, होड़ और लड़ाई करते हो, और चालें चलते हो। इसलिए हमारे लिए सामंजस्य, सौहार्द और एकता हासिल करना या अपने मिलने-जुलने में खुश और आनंदित महसूस करना वास्तव में आसान नहीं है। जो भी हो, चाहे वे ऐसे लोग हों जिनसे मेरा नजदीकी संपर्क हो या ऐसे लोग जिनसे मेरा दूर का संपर्क हो, अभी तक मैंने किसी से भी ईमानदारी या बदलाव महसूस नहीं किया है, न ही किसी से खुशी या आराम की भावना महसूस की है। इसके अलावा, इतने लंबे समय तक जीने के बाद, अब मेरी सबसे गहरी अनुभूति क्या है? यह सटीक रूप से कहा जा सकता है कि एक चीज जिसे करने का मैं सबसे ज्यादा अनिच्छुक हूँ, वह है लोगों के साथ निकट संपर्क रखना और उनके साथ करीब से मिलना-जुलना। मैं किसी को धोखा नहीं देता, किसी के साथ होड़ या लड़ाई नहीं करता, लेकिन लोग हमेशा होड़ करना, लड़ाई करना और धोखा देना चाहते हैं। मुझे क्या करना चाहिए? क्या मुझे लोगों के धोखे, होड़ और लड़ाई के आगे झुक जाना चाहिए, या मुझे लोगों के धोखे, होड़ और लड़ाई को बदलना चाहिए? मैं लोगों के आगे झुक नहीं सकता। मेरे पास वास्तव में लोगों को बदलने की कुछ क्षमता और कुछ मार्ग हैं, लेकिन बदलाव की यह प्रक्रिया बहुत लंबी और बहुत कठिन है। अंत में, मैं दूसरी सबसे अच्छी चीज पर सहमत हो जाता हूँ : लोगों के संपर्क में आने पर मैं उन लोगों की मदद करने की पूरी कोशिश करता हूँ जिनकी मदद की जा सकती है। जो लोग किसी भी स्थिति में मदद स्वीकार नहीं करते, मैं उनसे संपर्क करने और मिलने-जुलने से बचने की कोशिश करता हूँ, और प्रतीक्षा करने में समय बिताता हूँ!

भ्रष्ट स्वभावों को उतार फेंकने और शुद्धिकरण प्राप्त करने के लिए सत्य स्वीकार करना और सत्य के प्रति समर्पण करना एक प्रक्रिया है; यह कोई आसान चीज नहीं है। लोगों के साथ मिलने-जुलने के इन वर्षों में मैं खुद को चाहे लोगों के किसी भी समूह में पाऊँ, और लोग चाहे उम्र, रूप-रंग, त्वचा के रंग, व्यक्तित्व और रहन-सहन की पृष्ठभूमि की दृष्टि से कितने भी अलग हों, मुझे हमेशा लगता है कि उनका प्रकृति सार बहुत परिचित है, जैसे मैंने यह सब पहले देखा हो। मुझे लगता है कि सभी प्रकार के लोगों का स्वभाव सार एक जैसा है, और उनसे मिलने-जुलने के बाद, वे सभी बिल्कुल मेरी उम्मीद के मुताबिक ही निकलते हैं। इन परिस्थितियों में, मैं किस तरह की मनोदशा में होता हूँ? क्या यह मनोदशा अच्छी होती है? (नहीं।) कोई नहीं जानता कि मेरी मनोदशा खराब क्यों है। क्या लोगों को मुझसे मिलते-जुलते समय इस बात का एहसास होता है? (नहीं।) भ्रष्टता में जीते हुए, मानवजाति जीने के लिए धोखे, होड़ और लड़ाई जैसे जीवित रहने के साधनों पर निर्भर करती है। इस तरह लोग पूरी तरह से अपने रंग में होते हैं, और बेफिक्र और आराम से जीते हैं। वे पाप में जीते हैं, निश्चिंत होकर पाप के सुखों का आनंद लेते हैं, और उन्हें नहीं लगता कि यह दर्दनाक है। ठीक इसलिए कि सभी लोगों की प्रकृति पापपूर्ण है, पाप लोगों का जीवन है, और लोगों के जीवन का सार पाप है, वे यह महसूस नहीं करते कि पाप में जीना दर्दनाक है। यह एक सूअर की तरह है; सूअर एक गंदी चीज है, एक मैली चीज है। वह कीचड़ के गड्ढों और कचरे के ढेरों में खाता और सोता है और उसे गंदा या मैला महसूस नहीं होता। कीड़े भी होते हैं; वे गोबर के ढेरों और बदबूदार नालियों में रहते हैं और उन्हें कभी थोड़ा-सा भी मैलापन महसूस नहीं होता—वे तो वहाँ काफी घर जैसा चैन और आराम महसूस करते हैं। लोग अपने भ्रष्ट स्वभावों के भीतर और होड़ और लड़ाई के बीच जीते हैं और उन्हें भी यह दर्दनाक या कष्टदायक नहीं लगता। कुछ लोगों को तो यह तक लगता है कि अगर वे एक भी दिन होड़ किए, लड़ाई किए या चालें चले बिना गुजार दें, तो उनका जीवन बहुत उबाऊ और नीरस हो जाएगा, इसलिए उन्हें लड़ाई करने के लिए कोई चीज या चालें चलने के लिए कोई व्यक्ति ढूँढना पड़ता है। उनकी नजर में, देह में जीते हुए और मानव त्वचा पहने हुए, लोगों को होड़ और लड़ाई करनी ही चाहिए; अगर वे ऐसा नहीं करते, तो उनके अस्तित्व का मूल्य खत्म हो जाता है। मेरे लिए, यह भावना पूरी तरह से अलग है। मुझे लगता है कि लोगों के साथ होड़ और लड़ाई करना बहुत थका देने वाली चीज है, और साथ ही कष्टप्रद भी है; यह वह बड़ी चीज है जिससे मैं इस जीवन में सबसे ज्यादा बचना चाहता हूँ। मैं नहीं जानता कि होड़ या लड़ाई कैसे की जाती है, न ही मैं होड़ या लड़ाई करने का इच्छुक हूँ। जब मैं वास्तव में होड़ और लड़ाई से जुड़े मामलों का सामना करता हूँ, तो मैं बस पीछे हटना, उनसे बचकर निकलना और दूर रहना चाहता हूँ, इसलिए मुझे ये चीजें विशेष रूप से कष्टप्रद लगती हैं। मेरे कई वर्षों तक परेशान रहने के बाद, ये भावनाएँ जमा हो गई हैं और अपनी सीमा पर पहुँच गई हैं, और अंततः मुझे यह महसूस होने लगा है कि मानवों के साथ मिलना-जुलना दुनिया में सबसे दर्दनाक चीज है। हर बार जब मेरा सामना किसी ऐसे व्यक्ति से होता है जो मेरे साथ होड़ और लड़ाई करता है, तो ऐसा लगता है जैसे मुझे मीट ग्राइंडर में धकेला जा रहा हो, जैसे मेरे साथ खिलवाड़ किया जा रहा हो; यही भावना होती है। ये भावनाएँ होने के बाद, मैं विचार करता हूँ : “उनके भ्रष्ट स्वभाव का यह पहलू कैसे उजागर होता है? इस तरह के व्यक्ति का सार क्या है? अगर कोई अवसर मिला, तो मैं उनके साथ इस बारे में संगति करूँगा। अगर वे सत्य स्वीकार कर सकें, तो यह सबसे अच्छा होगा, और वे वास्तव में मदद के लायक हैं। अगर वे सत्य स्वीकार नहीं करते, तो मैं बस चीजों को उनके प्राकृतिक तरीके से होने दूँगा, और भाग्य को उनके साथ जो करना है वह करने दूँगा।” जो लोग सत्य स्वीकार नहीं करते, वे मानवता से रहित लोग हैं, और वे आशीषों से रहित लोग भी हैं; वे सबसे मूर्ख लोग हैं, सबसे बेकार लोग हैं। कई लोगों के साथ मिलने-जुलने के बाद, मैंने लोगों और सांसारिक मामलों के बारे में यह विचार और दृष्टिकोण विकसित किया है : लोगों के साथ मिलना-जुलना एक थका देने वाली चीज हो गई है। यह शारीरिक थकावट नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक थकावट है। इस थकावट के भीतर नीरसता, दमन और दर्द की भावना भी है। अगर मैं लोगों के साथ मिलना-जुलना नहीं करता, तो मैं अपने साथ होड़ और लड़ाई करने वाले लोगों के कम मामलों का सामना करता हूँ, और मेरी आत्मा काफी मुक्त और तनावमुक्त महसूस करती है।

हाल के वर्षों में, कुछ भाई-बहनों के साथ मिलते-जुलते समय, मैं अक्सर कुछ लोगों को यह कहते हुए सुनता हूँ : “मैंने अभी गलत बोल दिया; मैं इसे सुधार लेता हूँ,” या “मैंने पहले जिस स्थिति के बारे में जाना था, उसमें थोड़ी विसंगति है; मैं इसे ठीक कर देता हूँ।” साथ ही, कुछ लोगों का मामले सँभालने का रवैया पहले से अधिक उचित हुआ है, और वे थोड़े अधिक गंभीर और जिम्मेदार हो गए हैं। इसके अलावा, वे कष्ट सह सकते हैं और कीमत चुका सकते हैं, और उनकी शिकायतें कम हो गई हैं। अधिकांश लोग मिलकर अपना कर्तव्य निभाते समय एक-दूसरे के साथ चीजों पर चर्चा कर सकते हैं और सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग कर सकते हैं। कुछ साल पहले की तुलना में, वे बहुत बेहतर हैं और थोड़ा बदल गए हैं। हर बार जब मैं ऐसा होते हुए देखता हूँ, तो मुझे काफी अच्छा लगता है। मुझे लगता है कि इन सभी वर्षों में इन बातों को बार-बार दोहराना व्यर्थ नहीं गया है—आखिरकार, लोगों के एक हिस्से ने इन वचनों को गंभीरता से लिया है। इन वचनों को सुनने के बाद, वे सत्य समझ सकते हैं और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करना जानते हैं। चाहे वे कितना भी अभ्यास में ला सकें, कम से कम, उनके पास जीवन प्रवेश है और वे कुछ हद तक बदल गए हैं। संक्षेप में, सत्य के प्रति उनके रवैये और दृष्टिकोण अपेक्षाकृत उचित और सही हो गए हैं। हालाँकि कुछ लोग थोड़ा बदल गए हैं, लेकिन वे पर्याप्त नहीं बदले हैं। कभी-कभी, विभिन्न मामलों का सामना करते समय, अभी भी लोगों के होड़ और लड़ाई करने के उदाहरण मिलते हैं; समस्या जड़ से हल नहीं हुई है। तुम लोग केवल थोड़ा ही बदले हो, और अभी तक पूरी तरह से समर्पण करने में सक्षम होने के बिंदु तक नहीं पहुँचे हो। तुम लोगों को अभी भी सत्य का अनुसरण करना जारी रखना होगा, और काट-छाँट, परीक्षणों और शोधन का अनुभव करना जारी रखना होगा। बदलाव कोई बाहरी बदलाव नहीं होता—तो वास्तव में क्या बदलता है? मैंने इतने वर्षों तक बात की है, और तुम लोग यह पहचान गए हो कि तुम लोगों में कई भ्रष्ट स्वभाव हैं, और वास्तव में तुम्हारी मानवता में भी कई दोष हैं। तुम्हें यह स्पष्ट होना चाहिए कि अपने भ्रष्ट स्वभाव कैसे उतार फेंकने हैं और अपने कर्तव्य उचित ढंग से कैसे निभाने हैं, और अपने कर्तव्य मानक स्तर तक निभाने के लिए सत्य का अभ्यास कैसे करना है, है ना? कम से कम, तुम सभी को इस बात पर स्पष्ट होना चाहिए कि ईमानदार लोग कैसे बनें, और यह भी जानना चाहिए कि इसका अभ्यास कैसे करें। यदि, उन समस्याओं के संबंध में जिन्हें तुम लोग समझते हो और जो तुम्हारी क्षमताओं के भीतर हैं, तुम उन्हें एक-एक करके हल करने के लिए सत्य खोजने में प्रयास कर सको, अपनी विभिन्न कठिनाइयाँ दूर करने के लिए थोड़ा कष्ट सह सको, और सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हो सको, तो हो सकता है, मैं तुम लोगों को मूलभूत रूप से थोड़ा मानव के समान मानने लगूँ। भले ही जब मैं तुम्हारे साथ बातचीत करता हूँ तब तुम कभी-कभार लड़ाई करने की थोड़ी-सी प्रवृत्ति दिखाते हो, फिर भी, अगर मुझे लगता है कि यह जाहिर नहीं है, तो तुम्हारे बारे में मेरा विचार पहले से बहुत अलग होगा, और हमारे लिए मिल-जुलकर रहना बहुत कम मुश्किल होगा। तुम लोगों को इस बारे में संगति करनी चाहिए और योजनाएँ बनानी चाहिए कि बदलाव हासिल करने के लिए अनुसरण कैसे किया जाए। तुम बस अपने कर्तव्य के निर्वहन में थोड़ा प्रयास करने, थोड़ी मेहनत करने, खानापूरी करने, गलत काम न करने, विघ्न-बाधाएँ पैदा न करने, या बस बर्खास्त न किए जाने या बाहर न निकाले जाने से संतुष्ट नहीं हो सकते। इसके बजाय, तुम्हें सत्य में, सत्य का अभ्यास करने में, और सत्य स्वीकार करने और उसके प्रति समर्पण करने में प्रयास करना चाहिए। इस संबंध में, मुझे अधिकांश बहनों की सराहना करनी होगी; अधिकांश बहनें अच्छा कर रही हैं, जबकि अधिकांश भाई खराब काम कर रहे हैं। अनुभवजन्य गवाही वीडियो से, मैं देखता हूँ कि कलीसिया के कार्य की विभिन्न मदों में, प्रमुख भूमिकाएँ निभाने वालों और पर्यवेक्षकों के रूप में काम करने वालों में से अधिकांश बहनें हैं; भाई बहुत कम हैं। जब पेशेवर कार्य की विभिन्न मदों की बात आती है, तब अधिकांश भाई चीजों को गंभीरता से नहीं लेते, न ही वे तब चीजों को गंभीरता से लेते हैं जब सत्य सिद्धांतों और जीवन प्रवेश, या परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और उद्धार प्राप्त करने के संबंध में विभिन्न सत्यों की बात आती है। इससे भी बढ़कर, कई भाइयों का तो बिल्कुल भी कोई आध्यात्मिक जीवन नहीं है; वे परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ते, उपदेश और संगति नहीं सुनते, परमेश्वर के घर की फिल्में और वीडियो नहीं देखते, और समस्याओं का सामना करने पर वे सत्य नहीं खोजते या भाई-बहनों के साथ संगति नहीं करते। बहनें इस संबंध में भाइयों से बेहतर करती हैं। विशेष रूप से कुछ बहनें, जो वर्तमान में परमेश्वर के घर में महत्वपूर्ण कार्य के लिए पर्यवेक्षकों के रूप में काम करती हैं, पहले से अधिक आज्ञाकारी और समर्पित हैं। वे कष्ट सह सकती हैं, कीमत चुकाने को तैयार हैं, चीजें सावधानी से करती हैं, और बहुत गंभीर, सख्त और सच्ची हैं। काट-छाँट किए जाने पर वे अपने कर्तव्य नहीं छोड़तीं या शिकायत नहीं करतीं; वे अभी भी प्रार्थना और समर्पण करने में सक्षम रहती हैं, और अपने भ्रष्ट स्वभाव जानने और हल करने के लिए सत्य खोज सकती हैं। भाइयो, तुम लोग देख सकते हो कि तुम्हारे आस-पास की बहनें कैसे काम करती हैं। वे तुम लोगों से अधिक सावधान हैं, और अपने क्रियाकलापों में तुम लोगों से अधिक गंभीर, जिम्मेदार और सच्ची हैं; इसके अलावा, वे आज्ञाकारी और समर्पणशील हैं, और काम करते समय सत्य सिद्धांतों को खोजने पर ध्यान केंद्रित करती हैं। बेशक, भाइयों का भी एक हिस्सा ऐसा है जो अपेक्षाकृत आज्ञाकारी है और अपने कामों में सावधान और सच्चा हो सकता है, लेकिन अधिकांश भाई हमेशा थोड़े लापरवाह होते हैं। अविश्वासी इसे बेतकल्लुफ और बेझिझक होना कहते हैं। परमेश्वर के घर में “बेतकल्लुफ होना” नहीं चलता; परमेश्वर का घर सत्य पर संगति करने और सिद्धांतों के अनुसार मामले सँभालने, और गंभीरता और सख्ती से काम करने पर जोर देता है। असावधान और लापरवाह होना बिल्कुल अस्वीकार्य है। अधिकांश भाई मामले सँभालने में लापरवाह होते हैं और कभी गंभीर नहीं होते, हमेशा सोचते हैं : “‘मोटे तौर पर’ या ‘ठीक-ठाक’ से काम चल जाएगा; इतना काफी है।” जब वे कुछ बहनों को सत्य में प्रयास करते और उसे गंभीरता से अपनाते, और अपने कर्तव्यों के प्रति गंभीर और सख्त होते देखते हैं, तब वे उन्हें तुच्छ तक समझते हैं, और कहते हैं : “हम असली मर्द हैं। क्या उन चीजों को इतने सूक्ष्म, छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देकर किया जाना जरूरी है? सत्य पर यह सारी संगति, यह सारी प्रार्थना और खोज—जब तक हम मूलभूत रूप से सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, तब तक सब ठीक है। इतना नकचढ़ा होने का क्या फायदा? अगर हम हर चीज के बारे में इतने मीन-मेख निकालने वाले होंगे, तो क्या हम खुद को मर्द कह पाएँगे? लोग हम पर हँसेंगे!” तुम्हारा यह रवैया गलत है। गंभीरता से काम करने के लिए तुम पर कौन हँसेगा? अगर वे हँसना चाहते हैं तो उन्हें हँसने दो। एक सच्चे मर्द को गंभीरता से काम करने चाहिए; इसमें कोई शर्म की बात नहीं है। गंभीरता से काम करना सत्य के प्रति, जिम्मेदारियों के प्रति और कर्तव्यों के प्रति वह रवैया है, जो सभी इंसानों—सृजित प्राणियों—में होना चाहिए, चाहे उनका लिंग कुछ भी हो। जब कड़ा शारीरिक श्रम करने या मशीनरी जैसी चीजें चलाने की बात आती है, तो पुरुषों और महिलाओं के बीच अंतर होता है, लेकिन सत्य का अनुसरण करने में ऐसा कोई अंतर नहीं है। सत्य केवल पुरुषों या महिलाओं पर निर्देशित नहीं है, बल्कि मानवजाति पर निर्देशित है, जिसमें पुरुष और महिलाएँ दोनों शामिल हैं। उन सभी सत्यों में से, जिन पर हमने संगति की है, केवल विवाह से जुड़े मामलों में ही पुरुषों और महिलाओं के बीच अंतर है, जिसमें पुरुषों को पुरुषों की जिम्मेदारियाँ पूरी करने और महिलाओं को महिलाओं की जिम्मेदारियाँ पूरी करने की आवश्यकता होती है। सत्य के अन्य पहलुओं में पुरुषों और महिलाओं के बीच कोई अंतर नहीं है; वे सब वो चीजें हैं जिनका लोगों को अभ्यास करना चाहिए। विशेष रूप से सत्य सिद्धांतों से जुड़े मामलों में, तुम्हें गलती नहीं करनी चाहिए, और तुम्हारी दिशा और लक्ष्य भी गलत नहीं होने चाहिए। सत्य का अनुसरण करने में, जब व्यक्ति के भ्रष्ट स्वभाव, उसके द्वारा प्रकट की जाने वाली अवस्थाएँ, और उसके विचार और मत शामिल हों, तो तुम्हें विस्तार से उनकी जाँच करनी चाहिए और उनका भेद पहचानना चाहिए। अगर तुम उनकी जाँच नहीं करते, तो तुम्हें कभी मूल समस्या का पता नहीं लगेगा। अगर तुम उसका पता नहीं लगा सकते, तो तुम उसे हल नहीं कर सकते, और तुम हमेशा अपने भ्रष्ट स्वभावों के भीतर जिओगे, उनके द्वारा परेशान किए और बहकाए जाओगे—तुम बदलाव हासिल करने में असमर्थ रहोगे, और अपने भ्रष्ट स्वभाव उतार फेंकने में असमर्थ रहोगे।

आज हमने “देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के बराबर न रखने” के विषय में शामिल कई पहलुओं पर संगति की। यह मुख्य रूप से तुम लोगों को उन सिद्धांतों के बारे में बताने के लिए, जिनके द्वारा मैं आचरण करता और लोगों से मिलता-जुलता हूँ, और साथ ही लोगों से मिलते-जुलते समय के अपने आंतरिक स्वभाव और सार के बारे में बताने के लिए थी। तुम लोग बाहर से इन चीजों को देख, समझ या बूझ नहीं सकते, इसलिए मैंने तुम लोगों के साथ अपनी भावनाएँ और काम करने के अपने सिद्धांत साझा किए। मैं अपनी गवाही नहीं दे रहा हूँ; मैं बस ये चीजें तुम्हारे साथ साझा कर रहा हूँ ताकि तुम लोग वे सिद्धांत, जिनके द्वारा मैं आचरण और चीजें करता हूँ, और वह जीवन, स्वभाव और सार जान और समझ सको जिन्हें मैं जीता हूँ। ये कोई रहस्य नहीं हैं, न ही ये कोई भेद हैं। तुम लोग इन्हें समझ लोगे और इनके बारे में स्पष्ट हो जाओगे, तब तुम परमेश्वर को और परमेश्वर के देहधारी रूप को अधिक सटीकता से जानने में सक्षम हो जाओगे। अन्यथा, हो सकता है यह कथन कि “परमेश्वर का देहधारी रूप स्वर्ग के परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और उसके पास परमेश्वर की पहचान और सार है” तुम लोगों के लिए हमेशा एक खोखला वाक्यांश रहे या यह हमेशा तुम लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं के भीतर रहे या यह हमेशा तुम लोगों के लिए एक रहस्य रहे। वास्तव में, यह एक हल किया जा सकने वाला मुद्दा है; यह कोई सिद्धांत नहीं है, न ही यह कोई फार्मूलाबद्ध कहावत है। यद्यपि जिस रूप में देहधारी परमेश्वर का जीवन मौजूद है, वह उस रूप से कुछ अलग है जिसमें स्वर्ग का परमेश्वर मौजूद है—वह देह में मौजूद परमेश्वर का आत्मा है—फिर भी उनके जीवन में कोई अंतर नहीं है, और उनके जीवन सार में कोई अंतर नहीं है। तो ये चीजें, जिनके बारे में हमने बात की—परमेश्वर का देहधारी शरीर लोगों को धोखा नहीं देता, उनके साथ होड़ या लड़ाई नहीं करता—कहाँ से आती हैं? ये परमेश्वर के जीवन से आती हैं; सटीक रूप से कहें तो, ये परमेश्वर के स्वभाव की अभिव्यक्ति से आती हैं। इसलिए, तुम लोगों से यह कहना कि “मैं किसी को धोखा नहीं देता, किसी के साथ होड़ या लड़ाई नहीं करता” बात कहने का कोई नौकरशाही तरीका नहीं है, न ही यह कोई रहस्य है। वह बस ऐसा ही व्यक्ति है, वह बस ऐसे ही जीवन के भीतर जीता है, और उसके आचरण के सिद्धांतों, साथ ही उसके द्वारा जिए जाने वाले जीवन, स्वभाव और सार, सभी में लोगों को धोखा न देने, होड़ न करने और लड़ाई न करने के तत्त्व शामिल हैं। क्या यह स्पष्ट है? (हाँ।) हम आज की अपनी संगति यहीं समाप्त करेंगे। अलविदा!

17 अगस्त 2024

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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