सत्य का अनुसरण कैसे करें (24)
पिछली बार हमने अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना की विषय-वस्तु पर संगति की थी, जो “सत्य का अनुसरण कैसे करें” में “त्याग देना” के बड़े विषय के अंतर्गत आती है। इस विषयवस्तु में देहधारी परमेश्वर के बारे में हमारी धारणाएँ और कल्पनाएँ शामिल हैं। हमने किन पहलुओं पर चर्चा की थी? (पिछली बार परमेश्वर ने मुख्य रूप से देहधारी परमेश्वर के बारे में हमारी कुछ धारणाओं और कल्पनाओं पर संगति की थी और उन्हें उजागर किया था और साथ ही परमेश्वर ने हमारे लिए अभ्यास के दो सिद्धांतों पर भी संगति की थी : एक था देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्ग के परमेश्वर से न करना और दूसरा था देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के बराबर न समझना।) देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं का समाधान करने के लिए लोगों को पिछली संगति में बताए गए इन दो सिद्धांतों का अभ्यास करना जरूरी है। पहला सिद्धांत क्या था? (देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्ग के परमेश्वर से न करना।) और दूसरा सिद्धांत क्या था? (देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के बराबर न समझना।) मुख्य रूप से ये दो सिद्धांत थे। पिछली बार मैंने पहले सिद्धांत—देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्ग के परमेश्वर से न करना—पर संगति की थी और संक्षेप में देहधारी परमेश्वर के जीवन से संबंधित उन विषयों का परिचय दिया था, जिन्हें लोग देख सकते हैं और जिन्हें वे अभी तक समझते नहीं हैं। आज मैं देहधारी परमेश्वर से संबंधित विषय पर संगति करना जारी रखूँगा। मैं जितनी अधिक संगति करूँगा, लोग उतना ही अधिक समझेंगे और उनकी समझ उतनी ही अधिक गहरी होगी। मैं देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता या उसकी विनम्रता और प्रच्छन्नता के महत्व पर जितनी अधिक संगति करूँगा, लोग देहधारी परमेश्वर को उतना ही ज्यादा समझेंगे और उसके बारे में लोगों की समझ उतनी ही ज्यादा व्यावहारिक होगी। वे देहधारी परमेश्वर के व्यावहारिक पक्ष या उसके उन पहलुओं के बारे में अधिक समझ पाएँगे, जिन्हें लोग देख सकते हैं और जिनके संपर्क में आ सकते हैं, और उनका ज्ञान अधिक सटीक और व्यावहारिक होगा। इस तरह, लोग स्वर्गिक परमेश्वर के बारे में अपनी उन धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देंगे, जो वास्तविकता के अनुरूप नहीं हैं। लोग स्वर्गिक परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को जितना अधिक छोड़ेंगे और देहधारी परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता को जितना अधिक जानेंगे और समझेंगे, लोगों और परमेश्वर के बीच का संबंध उतना ही अधिक सामान्य होगा। देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से न करने के बारे में एक बात यह है कि तुम्हें देहधारी परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता को समझना जरूरी है। तुम देहधारी परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता को जितना अधिक समझोगे, तुम स्वर्गिक परमेश्वर को उतना ही अधिक समझ पाओगे और स्वर्गिक परमेश्वर को अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से नहीं मापोगे। बेशक, वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण से, एक और बात भी होगी : परमेश्वर के प्रति तुम्हारा रवैया सही होगा, तुम देहधारी परमेश्वर द्वारा अपनी मानवता में प्रकट की गई विभिन्न अभिव्यक्तियाँ वस्तुनिष्ठ रूप से देखोगे और तुम स्वर्गिक परमेश्वर को भी अधिक सटीक और व्यावहारिक रूप से जानोगे। यह तुम्हें देहधारी परमेश्वर के बारे में हमेशा ऐसी धारणाएँ और कल्पनाएँ बनाने से रोकता है जो वास्तविकता के अनुरूप नहीं हैं, और यह तुम्हें हमेशा देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से करने से भी रोकता है। परमेश्वर के देहधारण—यानी मसीह—पर चर्चा करते समय एक खास विषय पर अक्सर बात की जाती है : देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता और उसकी विनम्रता और प्रच्छन्नता। लोग अक्सर उसकी सामान्यता और व्यावहारिकता की बात करते हैं और वे अक्सर उसकी विनम्रता और प्रच्छन्नता की बात भी करते हैं; लेकिन जब यहाँ शामिल व्यावहारिक मुद्दों की बात आती है, तो कहा जा सकता है कि सभी लोगों में स्पष्टता की कमी होती है। आखिर परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता क्या है? उसकी विनम्रता और अप्रच्छन्नता क्या है? यानी, जब लोगों के दिलों में देहधारी परमेश्वर की सामान्यता, व्यावहारिकता, विनम्रता और अप्रच्छन्नता की और साथ ही इन चीजों को समझने और जानने की बात आती है, तो लोग इस संबंध में सत्य या सार को लेकर स्पष्ट नहीं होते और बस इनके बारे में ऐसे उपदेश देते हैं जैसे कि ये कोई सिद्धांत या आध्यात्मिक शब्दावली हों। इसलिए, हमारे लिए देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता और उसकी विनम्रता और अच्छन्नता के इस विषय पर विस्तार से और व्यवस्थित रूप से संगति करने की बहुत आवश्यकता है। ऐसी संगति के माध्यम से लोगों को यह स्पष्ट हो जाएगा कि एक विशेष पहचान रखने वाले देहधारी परमेश्वर, मनुष्य के पुत्र की सामान्यता और व्यावहारिकता को जीने में क्या शामिल है।
अपनी शाब्दिक समझ के संदर्भ में या जहाँ तक तुम्हारी धारणाओं और कल्पनाओं का संबंध है, तुम लोग देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता के बारे में क्या समझ सकते हो? इतने सालों तक देहधारी परमेश्वर के संपर्क में रहने, उससे मिलने-जुलने या बातचीत करने के दौरान तुम लोगों ने उसकी सामान्यता और व्यावहारिकता के बारे में असल में क्या महसूस किया और जाना है? पहले जिन विषयों पर संगति की गई, उनमें से ज्यादातर भ्रष्ट मानवजाति की समस्याओं के बारे में थे। यानी, हमने तुम लोगों की विभिन्न समस्याओं पर संगति की, जिनमें भ्रष्ट स्वभाव, परमेश्वर की सेवा करना और कर्तव्य निभाना, साथ ही मानवता, काबिलियत, लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ और परमेश्वर के प्रति लोगों के रवैये और दृष्टिकोण शामिल हैं—हमने इन सबके बारे में बात की। मैंने बहुत सालों तक सत्य का प्रचार किया है और उपदेश दिए हैं, और यह सब तुम लोगों की समस्याओं के बारे में ही रहा है। इस बार, हम आखिरकार तुम लोगों की समस्याओं के बारे में नहीं, बल्कि देहधारी परमेश्वर से जुड़ी कुछ चीजों पर चर्चा कर रहे हैं, जिससे हमें चीजों को एक अलग कोण से देखने का मौका मिलेगा। क्या तुम लोगों को यह विषय काफी सुकून देने वाला, किसी बोझ से काफी मुक्त और सहज नहीं लगता? (हाँ।) फिर जब देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता या उसकी विनम्रता और प्रच्छन्नता की बात आती है, तो वे क्या चीजें हैं जिन्हें तुम लोग देख, सराह या समझ सकते हो? तुम सिद्धांतों या तथ्यों के बारे में बात कर सकते हो; कुछ भी चलेगा। तुम लोग जवाब नहीं दे पा रहे हो—उस हालत में, क्या तुम लोगों के मन में देहधारी परमेश्वर के देह के बारे में कोई विचार नहीं आता? बिल्कुल भी कोई जानकारी नहीं है? और बिल्कुल भी कोई भावना नहीं है? कुछ तो अवश्य होगी, है ना? कभी-कभी यह कोई क्षणिक विचार हो सकता है, कभी-कभी यह कोई ऐसी चीज हो सकती है जिसके बारे में तुम थोड़ी देर सोचते हो और कभी-कभी यह तुम्हारे दिल पर पड़ी कोई गहरी छाप हो सकती है। अगर यह कोई क्षणिक विचार है, तो हो सकता है तुम्हें याद न रहे; या कभी-कभी तुम्हारे अवचेतन में कोई विचार या दृष्टिकोण उभरता है और हो सकता है वह भी तुम्हें याद न रहे। लेकिन कभी-कभी तुम्हारे मन में देहधारी परमेश्वर के बारे में एक खास छाप बनती है और इसी छाप की वजह से तुम्हारा कोई दृष्टिकोण बनता है। यह छाप तुम्हारे मन में लंबे समय तक मौजूद रहेगी। तुम निश्चित रूप से इसे याद रख पाओगे। तुम्हारा मन खाली नहीं होना चाहिए, है ना? तो देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता या उसकी विनम्रता और प्रच्छन्नता के बारे में अपनी समझ पर बात करो। (परमेश्वर, देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता के बारे में मेरी समझ यह है कि उसकी भी देह की सामान्य जरूरतें होती हैं। उदाहरण के लिए, जब मसीह लंबे समय तक बोलता है, तो उसे प्यास लगती है और पानी पीने की जरूरत होती है। जब वह सभाओं में हमारे साथ तीन-चार घंटे तक संगति करता है, तो वह भी थक जाएगा और उसे आराम करने की जरूरत होगी। जब वह लंबे समय तक चलता है, तो उसे भी बीच-बीच में रुकने की जरूरत होगी। यानी, बाहर से मसीह किसी सामान्य व्यक्ति जैसा ही होता है और उसमें भी सामान्य मानवता की भावनाओं की पूरी शृंखला होती है : खुशी की बातें सुनकर उसे खुशी होती है और दुखद बातें सुनकर उसे दुख होता है। ये भी देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता की अभिव्यक्तियाँ हैं।) तुमने कुछ तथ्य बताए हैं। ये वे चीजें हैं जिन्हें तुम लोगों ने देखा है और ये वे चीजें भी हैं जिनके संपर्क में तुम लोग आ सकते हो और जिन्हें महसूस कर सकते हो। और कुछ? (परमेश्वर, मैं एक बात जोड़ूँगा : मैंने पहले सुना था कि जब तुम किसी पेशेवर काम का निर्देशन करने जा रहे होते हो, तो तुम्हें भी कुछ विशेषीकृत ज्ञान सीखना और समझना पड़ता है।) क्या यह बात तुम सभी लोगों ने सुनी है? कि जब मैं किसी पेशेवर काम का निर्देशन करता हूँ, तो मुझे भी जाकर उसके बारे में व्यावहारिक तरीके से सीखना पड़ता है और कुछ प्रासंगिक पेशेवर ज्ञान समझना और उसमें माहिर होना होता है—क्या ज्यादातर लोगों को यही जानकारी मिली है? क्या तुम सभी लोग यही सोचते हो? (नहीं। उदाहरण के लिए, जब तुम फिल्म निर्माण दल के काम का निर्देशन करते हो, तब तुम अद्यतन जानकारी प्राप्त करने के लिए बस कभी-कभी कुछ फिल्में और टीवी शो देखते हो; तुम इसके बारे में सीखने या शोध करने के लिए खास तौर पर समय नहीं निकालते।) गलतफहमी दूर करना जरूरी है। मेरे पास वाकई संसाधन खोजने या किसी तरह का पेशेवर ज्ञान सीखने की ऊर्जा नहीं है। बात बस इतनी है कि मैंने कुछ फिल्में देखी हैं और इसलिए मुझे थोड़ी-बहुत जानकारी है कि वे आम तौर पर कैसी होनी चाहिए; इसके अलावा, भाई-बहनों द्वारा दिए गए कुछ प्रासंगिक पेशेवर ज्ञान के आधार पर मैं तब प्रासंगिक सिद्धांतों का पता लगाता हूँ और उन्हें निकालता हूँ और पेशेवर काम के लिए कुछ दिशा-निर्देश देता हूँ। यहाँ मुख्य बात सिद्धांतों को समझना और सिद्धांतों के आधार पर उनका निर्देशन करना है। काम करने वालों की मुश्किल एक लिहाज से यह होती है कि उनका पेशेवर ज्ञान व्यापक नहीं होता और दूसरे लिहाज से यह कि वे सत्य सिद्धांतों को नहीं समझते, साथ ही उनकी काबिलियत भी कम होती है। इसलिए, जब मैं उन्हें सिद्धांतों को समझने के आधार पर कुछ मार्गदर्शन देता हूँ, तो नतीजे उनके खुद इसे करने की तुलना में बेहतर होते हैं। मैं इसे परमेश्वर के वचनों का प्रसार करने, परमेश्वर की गवाही देने, परमेश्वर को शर्मिंदा न करने और लोगों को परमेश्वर के काम के बारे में ज्यादा जानने और ज्यादा सत्य समझने में सक्षम बनाने के सिद्धांत के आधार पर करता हूँ और इसके कुछ नतीजे निकले हैं। वास्तविक पेशेवर कौशलों की बात करें तो, मेरे पास लगभग कोई कौशल नहीं है। मेरे पास शुरू से ही वह विशिष्ट ज्ञान नहीं है, न ही मैंने कभी खास तौर पर इसके बारे में सीखने की कोशिश की है, जैसा कि तुम लोगों ने कहा। मैं चाहे किसी भी तरह के पेशेवर काम में मार्गदर्शन दूँ, मैंने कभी उसके बारे में सीखने की कोशिश नहीं की, न ही मैंने शैक्षिक सामग्री, संसाधन या प्रासंगिक पेशेवर ज्ञान खोजा है। ज्यादा से ज्यादा, भाई-बहन कुछ प्रासंगिक शैक्षिक सामग्री या नमूने ढूँढ़कर मुझे देखने के लिए दे देते हैं और उनमें से मैं कुछ प्रासंगिक सिद्धांत और उस पेशे के लिए काम करने के कुछ तरीके निकालकर उनके आधार पर उनके काम का निर्देशन करता हूँ।
इस पहलू, देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता, के संबंध में लोगों ने उसके देह की सहज प्रवृत्तियों द्वारा प्रदर्शित कुछ सामान्यता और व्यावहारिकता देखी है। इसमें इंसानी सहज प्रवृत्तियाँ, साथ ही देह की विभिन्न जन्मजात स्थितियों के कुछ प्रकाशन और सीमाएँ शामिल हैं; यही इन शब्दों के सही अर्थ में सामान्यता और व्यावहारिकता है। चाहे यह वह हो जिसे वह बाहरी तौर पर प्रकट करता है या उसके आंतरिक विचार और दृष्टिकोण या उसकी मानवता के स्व-आचरण के आंतरिक सिद्धांत—संक्षेप में, देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता की सबसे सरल और सबसे बुनियादी समझ यह है कि वह असाधारण, उत्कृष्ट या अपरंपरागत नहीं है। यानी, देहधारी परमेश्वर के बाहरी रूप-रंग से तुम ऐसी कोई विशेष अभिव्यक्ति नहीं देख सकते, जो आम लोगों की अभिव्यक्तियों से अलग हो। अगर वह कुछ बोलता या करता नहीं है, तो बस उसके चेहरे के हाव-भाव, उसकी शारीरिक बनावट और उसका संपूर्ण व्यक्तित्व देखकर तुम कुछ भी असामान्य नहीं देख सकते। वह असाधारण, उत्कृष्ट या अपरंपरागत नहीं है; वह बस एक साधारण व्यक्ति है। सटीक या वस्तुनिष्ठ रूप से कहें तो, अगर यह व्यक्ति भीड़ में हो और बोले नहीं, काम न करे और सत्य व्यक्त न करे, तो तुम यह नहीं बता सकते कि यह व्यक्ति किसी भी अन्य व्यक्ति से कैसे अलग है। उदाहरण के लिए, अगर मैं तुम लोगों के बीच बैठा हूँ और कोई अजनबी अंदर आता है, तो वह देखेगा कि मैं बिल्कुल तुम लोगों जैसा ही दिखता हूँ। मैं सम्मान वाली सीट पर नहीं बैठता, न ही मैं सबसे अलग दिखता हूँ। मेरा रूप-रंग साधारण है; मैं असाधारण नहीं हूँ, बुलंद नहीं हूँ, और मैं किसी तरह की महान हस्ती जैसा नहीं लगता—मैं बस एक साधारण व्यक्ति हूँ। इसलिए वह यह नहीं बता पाएगा कि देहधारी परमेश्वर कौन है। अगर मैं लोगों के एक समूह के साथ रहता हूँ, तो भी तुम मुझमें कुछ अलग नहीं देख पाओगे। तुम बस इतना जानते हो कि यह देहधारी परमेश्वर एक महिला है, लेकिन तुम खुली आँखों से देखकर यह नहीं बता पाओगे कि देहधारी परमेश्वर कौन है, जब तक कि तुमने मेरे उपदेश बहुत अधिक न सुने हों, उस स्थिति में शायद तुम मेरी आवाज से बता सको। अगर किसी की आवाज मेरी आवाज जैसी हो, तो कुछ लोग तब भी गलती कर सकते हैं और यह मान सकते हैं कि वही देहधारी परमेश्वर है। क्या ऐसी चीजें होती हैं? यह निश्चित रूप से हुआ है। कुछ व्यक्ति उत्कृष्ट और श्रेष्ठ दिखते हैं, उनमें खास तौर पर आभा और शैली होती है और वे बहुत महान दिखते हैं, जैसे कोई रुतबे और निश्चित प्रतिष्ठा वाला व्यक्ति हो। कुछ नासमझ भाई-बहन या वे लोग जो खास तौर पर देहधारी परमेश्वर से मिलना चाहते हैं, गलती से सोच लेंगे कि यह व्यक्ति ही देहधारी परमेश्वर है और यहाँ तक कि उसके सामने झुककर घुटने भी टेक देंगे। जिस व्यक्ति के सामने झुका जाता है, वह मन ही मन बहुत खुश होता है और चुपचाप इसे स्वीकार भी कर लेता है। जब वह जाने लगती है, तो झुकने और घुटने टेकने वाले वे नासमझ लोग रोने तक लगते हैं और उससे अलग नहीं होना चाहते; वे उसके कपड़े पकड़ लेते हैं और यह कहते हुए उसे जाने नहीं देते, "तुम दोबारा कब आओगी? हम तुम्हें याद करेंगे!" वे बड़े उत्साह से यह तक कहते हैं, "आखिरकार मैं देहधारी परमेश्वर से मिल ही लिया। मुझे इस जीवन में कोई पछतावा नहीं है। अगर मैं मर भी जाऊँ, तो भी मेरा जीवन सार्थक हो गया होगा!" जिसके सामने झुका जाता है, वह स्थिति बिल्कुल भी स्पष्ट नहीं करती। क्या तुम लोगों ने ऐसी बातें सुनी हैं? (हाँ।) ऐसी चीज विदेशों में नहीं होगी। मुख्य भूमि चीन में यह क्यों हुई? चूँकि देहधारी परमेश्वर चीन में प्रकट हुआ और उसने वहाँ काम किया, उसकी छवि निश्चित रूप से एक चीनी व्यक्ति की है, इसीलिए इस तरह की चीज मुख्य भूमि चीन में हुई। हम इस बात पर चर्चा नहीं करेंगे कि इस मामले में शामिल दो पक्ष सही हैं या गलत। जहाँ तक इस मुद्दे की बात है, लोग देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता को चाहे जैसे भी समझें, अपनी धारणाओं के आधार पर वे यही मानते हैं कि देहधारी परमेश्वर की छवि बुलंद, रूप-रंग भव्य, और इससे भी बढ़कर, उसकी पहचान भव्य होनी चाहिए। उसका रूप-रंग और बात करने का तरीका भी अद्वितीय होना चाहिए, जिससे उसे देखने वाले हर व्यक्ति को बिना किसी संदेह के यह महसूस हो कि वह परमेश्वर जैसा है, वह परमेश्वर है। अगर वह लोगों को साधारण लगता है और लोग उसमें परमेश्वर की आभा या परमेश्वर की छवि नहीं देख पाते, तो उसका परमेश्वर होना असंभव है। लोग मानते हैं कि देहधारी परमेश्वर निश्चित रूप से बहुत बुलंद, महान और आभा-युक्त है और वह खास तौर से शाही पहचान वाले व्यक्ति जैसा दिखता है—चलते समय उसे गर्वीला दिखना चाहिए, उसकी आँखें चमकीली और भेदने वाली होनी चाहिए और उसकी नजर बहुत तेज होनी चाहिए; उसे किसी को देखने भर से तुरंत जान लेने में सक्षम होना चाहिए कि वह क्या सोच रहा है और एक नजर में ही बता देने में सक्षम होना चाहिए कि किसके मन में शत्रुता या बुरे विचार हैं। लोगों के ये विचार एक खास परिघटना दर्शाते हैं : लोगों के मन में देहधारी परमेश्वर के बारे में बहुत सारी कल्पनाएँ हैं। लेकिन असल में देहधारी परमेश्वर लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं वाले परमेश्वर जैसा नहीं है; उनमें अंतर है। देहधारी परमेश्वर का बाहरी रूप-रंग बहुत ही साधारण है। वह बुलंद बिल्कुल नहीं है, उत्कृष्ट बिल्कुल नहीं है और अलौकिक बिल्कुल नहीं है; यहाँ तक कि यह भी कहा जा सकता है कि उसमें कोई खास बात नहीं है। बाहर से वह सभी सृजित मनुष्यों से लगभग जरा भी अलग नहीं है। यानी, मनुष्यों के विभिन्न प्रकार्यों, साथ ही उनकी सहज प्रवृत्तियों, सामान्य सोच और विभिन्न क्षमताओं के मामले में वह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे परमेश्वर द्वारा सृजित मनुष्य होते हैं। ये वे बाहरी चीजें हैं, जिन्हें लोग अपनी खुली आँखों से सीधे देख सकते हैं और जिनके संपर्क में वे आ सकते हैं और जिन्हें वे समझ-बूझ सकते हैं। इन बाहरी चीजों को देखना और समझना लोगों के लिए आसान है, इसलिए ये हमारी संगति का केंद्र नहीं होंगी। हमारी संगति का केंद्र देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता और उसकी विनम्रता और प्रच्छन्नता होगी।
जहाँ तक इस बात का संबंध है कि लोगों को देहधारी परमेश्वर के बारे में क्या समझना चाहिए, तो चाहे वह उसकी सामान्यता और व्यावहारिकता हो या उसकी विनम्रता और प्रच्छन्नता, इसमें ऐसे विचार और जानने के तरीके शामिल हैं जो लोगों के दिलों में नहीं होते; ये विचार उनकी धारणाओं और कल्पनाओं तक में नहीं होते। इसमें यह शामिल है कि देहधारी परमेश्वर लोगों के बीच कैसे रहता है, वह मानवजाति के वास्तविक जीवन परिवेश में कैसे रहता है, वह अपना जीवन कैसे बिताता है और लोगों के बीच कैसे बोलता और काम करता है। इसमें देहधारी परमेश्वर के सार से जुड़े मुद्दे शामिल हैं और ये मुद्दे संगति करने लायक है। ये पहलू वे चीजें भी हैं, जिन्हें लोग देख नहीं सकते या जिन्हें समझना उनके लिए बहुत मुश्किल है, और बेशक, ये वे चीजें भी हैं जो देहधारी परमेश्वर के बारे में लोगों के ज्ञान या उनकी धारणाओं और कल्पनाओं में मौजूद नहीं हैं। यानी देहधारी परमेश्वर के बारे में लोगों का ज्ञान, समझ और कल्पनाएँ मूलतः देहधारी परमेश्वर के जीवन और अस्तित्व की वास्तविकता से असंबद्ध हैं। नतीजतन, देहधारी परमेश्वर के सार के बारे में लोगों का ज्यादातर ज्ञान व्यावहारिक और वस्तुनिष्ठ नहीं होता, यहाँ तक कि इसमें कुछ ऐसी धारणाएँ और कल्पनाएँ भी शामिल होती हैं जो वास्तविकता के अनुरूप नहीं होतीं। देहधारी परमेश्वर लोगों के बीच और इस भौतिक दुनिया में रहता है; उसकी सामान्यता और व्यावहारिकता उसके जीवन में और साथ ही उसके अस्तित्व की प्रक्रिया में भी झलकती है। उसके जीवन और उसके अस्तित्व की प्रक्रिया में एक तरफ तो इस देह का जीवन शामिल है और दूसरी तरफ देहधारी परमेश्वर द्वारा की जाने वाली सेवकाई शामिल है। आओ इन दो पहलुओं से देखें कि देहधारी परमेश्वर जिस सामान्यता और व्यावहारिकता को जीता है और जो उसमें मौजूद है, वह लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं से कैसे अलग है—इस सामान्यता और व्यावहारिकता के कौन-से हिस्से ऐसे हैं जिन्हें लोग देखकर भी समझ नहीं सकते या उन्हें खारिज कर देते हैं, लेकिन जो वास्तव में देहधारी परमेश्वर के देह में मौजूद सामान्यता और व्यावहारिकता की अभिव्यक्तियाँ हैं। चूँकि इसमें देहधारी परमेश्वर का जीवन और अस्तित्व शामिल हैं, इसलिए इसमें कई वास्तविक मुद्दे और साथ ही इन वास्तविक मुद्दों से जुड़े कई विचार और दृष्टिकोण भी शामिल हैं। ये विचार और दृष्टिकोण असल में देहधारी परमेश्वर के जीवन में और उसके द्वारा की जाने वाली सेवकाई में व्यावहारिक और वस्तुनिष्ठ रूप से प्रकट होते हैं और जिए जाते हैं। लेकिन, चूँकि लोगों के मन में बहुत सारी धारणाएँ और कल्पनाएँ होती हैं—चाहे वे स्वर्गिक परमेश्वर के बारे में हों या पृथ्वी पर मौजूद परमेश्वर के बारे में—और चूँकि ये सब खोखली होती हैं और वास्तविकता के अनुरूप नहीं होतीं, इसलिए ज्यादातर लोग उस सामान्यता और व्यावहारिकता को और उस विनम्रता और प्रच्छन्नता को खारिज कर देते हैं जिसे वे देहधारी परमेश्वर—परमेश्वर की इस विशेष पहचान में अभिव्यक्त होते देख सकते हैं। ज्यादातर लोग जिन चीजों पर ध्यान देते हैं, वे हैं चिह्न और चमत्कार, रहस्य, अलौकिक क्षमताएँ और वे चीजें जो गहरी, भव्य या अपेक्षाकृत उत्कृष्ट और अजीब आदि होती हैं। फिर भी, लोग उन वास्तव में वस्तुनिष्ठ, व्यावहारिक और असली चीजों को खारिज कर देते हैं, जिन्हें स्वयं परमेश्वर ने जिया और प्रकट किया है। चाहे देहधारी परमेश्वर मानवजाति के बीच कितने भी साल क्यों न रहे, चूँकि लोग इन चीजों को खारिज कर देते हैं, इसलिए परमेश्वर के बारे में उनका ज्ञान हमेशा उनकी खोखली और धुँधली कल्पनाओं पर अटका रहता है। नतीजतन, परमेश्वर के बारे में लोगों का ज्ञान हमेशा अवास्तविक और अव्यावहारिक होता है। आज, इस विषय पर संगति करने के माध्यम से, आओ हम देहधारी परमेश्वर के जीवन और उसके द्वारा की जाने वाली सेवकाई में प्रतिबिंबित सामान्यता और व्यावहारिकता को जानें। चाहे देहधारी परमेश्वर का जीवन हो या उसके द्वारा की जाने वाली सेवकाई, दोनों ही पहलुओं में उसकी सामान्यता और व्यावहारिकता को जीना शामिल है। इसमें सभी तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति देहधारी परमेश्वर—मनुष्य का वह पुत्र जिसकी एक विशेष पहचान है—के दृष्टिकोण और सभी तरह के मामले सँभालने के उसके सिद्धांत और तरीके शामिल हैं। तुम लोगों ने पिछले कुछ वर्षों की संगतियों में उन सिद्धांतों और तरीकों के बारे में सुना है, जिनसे देहधारी परमेश्वर सभी तरह के मामलों में पेश आता और उन्हें सँभालता है और अब तुम इन चीजों के बारे में जानते हो। इन सभी चीजों में, जो तुम लोगों को अपने मन में काफी ऊँची और भव्य लगती हैं, सत्य शामिल है। एक ओर वे स्वर्गिक परमेश्वर के इरादे दर्शाती हैं; वे लोगों से उस परमेश्वर की अपेक्षाएँ और शिक्षाएँ दर्शाती हैं, जिसके पास परमेश्वर की पहचान और उसका सार है। दूसरी ओर, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वे देहधारी परमेश्वर, इस मनुष्य के पुत्र के सिद्धांत, तरीके, विचार और दृष्टिकोण भी दर्शाती हैं कि वह सभी तरह के मामले कैसे देखता या सँभालता है। मैं पहले ही सत्य सिद्धांतों से जुड़ी इस विशाल विषयवस्तु पर तुम लोगों के साथ लंबे समय तक संगति कर चुका हूँ; इसमें कई विषय शामिल हैं और वे काफी लंबे हैं। यह विषयवस्तु देहधारी परमेश्वर—मनुष्य के पुत्र—के विचार और दृष्टिकोण, रवैये और सभी तरह के मामले सँभालने के सिद्धांत दर्शाने के लिए पर्याप्त है। आज हम इस पहलू के बारे में बात नहीं करेंगे।
जिस मुख्य विषय पर हम संगति करेंगे, वह है देहधारी परमेश्वर के स्व-आचरण के सिद्धांत और अपने जीवन और अस्तित्व में उसके काम करने के तरीके। इन दो पहलुओं पर मेरी संगति के माध्यम से तुम लोग देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता को बेहतर ढंग से समझ पाओगे और देहधारी परमेश्वर को अधिक जान पाओगे। एक ओर, मानवजाति के बीच रहते हुए देहधारी परमेश्वर के पास इस बात का एक सिद्धांत होता है कि वह आचरण कैसे करता है और उसके पास इस बात का भी एक सिद्धांत होता है कि वह काम कैसे करता है। ये सिद्धांत बहुत सरल हैं। मेरे स्व-आचरण का मेरा सिद्धांत नियमों का पालन करते हुए आचरण करना है और मेरा काम करने का सिद्धांत उन्हें कर्तव्य-निष्ठा से करना है। नियमों का पालन करते हुए आचरण करना और कर्तव्य-निष्ठा से काम करना—ये मेरे इन बातों के सिद्धांत और मत हैं कि मैं आचरण कैसे करता हूँ और काम कैसे करता हूँ। कुल मिलाकर ये कितने शब्द हैं? (दस शब्द।) ये दस शब्द बहुत सरल हैं और इनका शाब्दिक अर्थ समझना बहुत आसान है। ये बिल्कुल भी गूढ़ या खोखले नहीं हैं, बिल्कुल भी गहरे नहीं हैं और बिल्कुल भी ऊँचे और भव्य नहीं हैं। नियमों का पालन करते हुए आचरण करना और कर्तव्य-निष्ठा से काम करना—ये मेरे इन बातों के सिद्धांत और मत हैं कि मैं आचरण कैसे करता हूँ और काम कैसे करता हूँ। मैं आचरण और काम करते समय इन सिद्धांतों का पालन करता हूँ; मैं ठीक इसी तरह से करता हूँ। क्या तुम लोग देख सकते हो कि यह एक तथ्य है? क्या तुम लोग इसका मिलान तथ्यों से कर सकते हो? एक तरफ, जब मैं उपदेश देता और संगति करता हूँ, जब मैं लोगों के संपर्क में आता हूँ और उनसे मिलता-जुलता हूँ, और जब मैं लोगों से बातचीत करता हूँ, तो मैं हमेशा उनसे इसी तरह से आचरण करने के लिए कहता हूँ। दूसरी तरफ, मैं खुद भी इसी तरह आचरण करता हूँ—मैं नारे नहीं लगाता। तो फिर मैं लोगों को इन सिद्धांतों के बारे में क्यों बताता हूँ? वह इसलिए कि मैं खुद इसी तरह काम और आचरण करता हूँ; इसमें और कोई गहरी बात नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, "तुम्हारे आचरण के ये मत काफी साधारण हैं; ये बिल्कुल भी परिष्कृत नहीं हैं। ये देहधारी परमेश्वर की पहचान नहीं दर्शा सकते!" क्या यह सही है? (नहीं।) नियमों का पालन करते हुए आचरण करना और कर्तव्य-निष्ठा से काम करना—ये सिद्धांत और मत हैं। मैं अपने दैनिक जीवन में इनका अभ्यास करता हूँ और मैं अपनी सेवकाई करते समय यानी काम करते हुए भी इनका अभ्यास करता हूँ। मैं इसी तरह से आचरण करता हूँ और इसी तरह से काम करता हूँ। आओ इन चीजों के बारे में बस ऐसे बात करें जैसे हम बातचीत और गपशप कर रहे हों, ताकि तुम लोग थोड़ा आराम महसूस करो और मुझसे मेरे जीवन के बारे में कुछ और जान सको। क्या यह ठीक है? (हाँ।) अगर हमारी बातचीत के दौरान किसी बिंदु पर तुम लोगों में से कोई कहे, "मुझे आपत्ति है! तुम जो कह रहे हो वह तुम्हारी अभिव्यक्तियों से मेल नहीं खाता," तो मैं उसे फिर से कहने की कोशिश करूँगा और भविष्य में उसे सही कर लूँगा या सुधार लूँगा। अगर तुममें से कुछ लोग हाथ उठाकर कहें, "मैं सहमत हूँ! तुम जो कह रहे हो, वह पूरी तरह से उस बात से मेल खाता है जिसे हमने तुम्हारे जीवन में तुम्हें प्रकट करते देखा और सुना है; तुम जो कहते हो वह सच है," तो मैं उसे जारी रखूँगा। क्या यह ठीक है? (हाँ।)
नियमों का पालन करते हुए आचरण करना और कर्तव्य-निष्ठा से काम करना—चाहे जीवन में हो या काम में, मैं इन मतों पर हमेशा कायम रहता हूँ। तुम लोग शायद मेरे काम में इन्हें काफी हद तक महसूस कर पाए होगे, तो आओ पहले इस बारे में बात करते हैं कि ये मेरे जीवन में कैसे लागू होते हैं। देहधारी परमेश्वर एक ऐसा व्यक्ति है जो मानवजाति के बीच एक खास पहचान रखता है, लेकिन काम करते समय वह बिल्कुल भी ऐसे व्यवहार नहीं करता जैसे वह कोई खास व्यक्ति हो। वह कभी खुद को कोई खास हस्ती नहीं मानता; वह बस एक साधारण व्यक्ति है। वह जिस भी देश में होता है, वहाँ के कानूनों और विनियमों का पालन करता है। अगर कोई ऐसी चीज होती है जो उसे करनी हो लेकिन वह उसे समझ नहीं पाता, तो वह जल्दी से परामर्श करता है और पता लगाता है कि स्थानीय कानून और नीतियाँ क्या अपेक्षा करती हैं, क्या करना गैर-कानूनी है और क्या नहीं; और वह खुद को कोई विशेष अधिकारों वाला व्यवहार दिए बिना उसे उस तरह से करता है जो सही होता है। क्या इस तरह से चीजें करना नियम-पालक और कर्तव्यनिष्ठ होना है? (हाँ।) यह नियमों का पालन करते हुए आचरण करना और कर्तव्य-निष्ठा से काम करना है। किसी स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश में, अगर उसे काम करवाने के लिए प्रासंगिक कानूनों को समझने की जरूरत होती है, तो वह किसी वकील से परामर्श करता है या कानूनों और विनियमों का पता लगाता है। वह गैर-कानूनी काम नहीं करता, न ही कानूनी खामियों का फायदा उठाता है; वह सख्ती से कानूनों और विनियमों का पालन करता है, क्योंकि ज्यादातर देशों के कानून और विनियम लोगों के वैध अधिकारों और हितों की रक्षा करते हैं और लोगों को उनका पालन करना चाहिए। उदाहरण के लिए, अगर हम अहाते में कोई निर्माण कार्य कर रहे हैं और वहाँ कोई चीज रखना चाहते हैं, तो हमें पहले यह पता करना होगा कि इस बारे में सरकारी विनियम क्या हैं, क्या वह चीज अहाते में रखी जा सकती है; और अगर हाँ, तो उसे कहाँ रखना सही होगा। इस बारे में स्पष्ट जानकारी मिलने के बाद हम सरकारी विनियमों के अनुसार काम करते हैं। अगर सरकार इसकी अनुमति नहीं देती, तो हम यह काम नहीं करेंगे। हम बिना वजह कोई मुसीबत खड़ी करने की कोशिश नहीं करेंगे और ऐसा करने के लिए जान-बूझकर कानून का उल्लंघन बिल्कुल नहीं करेंगे। उदाहरण के लिए, अगर हम किसी तरह का ढाँचा बनाना चाहते हैं, तो हमें सरकारी स्वीकृति के लिए आवेदन करना होगा। जब सरकार स्वीकृति दे देगी, तब निर्माण कार्य शुरू किया जा सकता है। जब परियोजना पूरी हो जाती है, तब भी उसे सरकारी निरीक्षण से गुजरना पड़ता है। अगर वह निरीक्षण में पास हो जाता है, तो हम बेफिक्र होकर उसका इस्तेमाल कर सकते हैं। निर्माण की यही प्रक्रिया है। कुछ लोग कह सकते हैं, "क्या इस तरह की छोटी परियोजना के लिए भी सरकार हमसे स्वीकृति लेने की अपेक्षा करती है? अगर यह वैकल्पिक है, तो ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं है। हम खुद को परेशानी से बचा सकते हैं।" मैं कहता हूँ, "हमें निश्चित रूप से पता करना चाहिए। अगर इसके लिए सरकारी स्वीकृति की जरूरत हो और हम वह न लें, तो क्या होगा—क्या हम विनियमों का उल्लंघन नहीं करेंगे? हमें उनका उल्लंघन नहीं करना चाहिए। चूँकि हम यह ढाँचा निर्मित करने जा रहे हैं, इसलिए हमें स्वीकृति लेने की कोशिश करनी चाहिए। अगर सरकार कहती है कि स्वीकृति लेने की जरूरत नहीं है, तो हम उसके लिए आवेदन न करके निश्चिंत रहेंगे। अगर सरकार कहती है कि स्वीकृति लेना जरूरी है, तो हमारा स्वीकृति के लिए आवेदन करना सही और कानून का पालन करने वाला कदम होगा।" कानून या सरकारी विनियमों से जुड़ी किसी भी चीज के लिए हमें परामर्श जरूर करना चाहिए और पता निश्चित रूप से लगाना चाहिए। वरना, अगर कुछ गलत हो गया तो बहुत मुसीबत हो जाएगी। विदेश में रहने का एक बुनियादी नियम है कि कोई भी गैर-कानूनी काम मत करो या ऐसा कुछ मत करो जिससे सरकारी विनियमों का उल्लंघन हो। उदाहरण के लिए, अगर हम ग्रामीण इलाके में रह रहे हैं और मुर्गियाँ या भेड़ें पालना चाहते हैं, तो हमें सरकारी स्वीकृति लेनी होगी। इन चीजों के लिए सरकार के विस्तृत विनियम होते हैं और हमें उनका उल्लंघन बिल्कुल नहीं करना चाहिए या कोई विशेष अधिकार पाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अगर हम सरकारी विनियमों का उल्लंघन करते हैं और पकड़े जाते हैं, तो यह बहुत कष्टप्रद होगा। इसलिए यह जरूरी है कि हम कानून का पालन करें, और इसमें इसके सिद्धांत भी शामिल हैं कि हम कैसे आचरण करते हैं और कैसे जीते हैं। हम चाहे कहीं भी रहें, हमें नियमों का पालन करते हुए आचरण करना चाहिए और कर्तव्य-निष्ठा से काम करना चाहिए। अपने दैनिक जीवन में मैं अपने पड़ोसियों के साथ भी नियमों का पालन करने वाले तरीके से ही मिलता-जुलता हूँ। मैं शोर नहीं मचाता या दूसरों को परेशान नहीं करता। सरकार चाहे जो भी नियम बनाए, हमें उसका पालन करना चाहिए। यहाँ तक कि अगर तुम कुत्ता भी पालते हो, तो तुम्हें उसका ठीक से ध्यान रखना होगा ताकि वह लगातार भौंके नहीं और पड़ोसियों के आराम में खलल न डाले। खासकर सप्ताहांत में, जब तुम्हारे सभी पड़ोसी घर पर होते हैं, तुम्हें इस बात का और भी ज्यादा ध्यान रखना होगा कि उन्हें परेशानी न हो। जब सर्दियों में बर्फबारी होती है, तब तुम्हें बर्फ हटाने के लिए सुबह आठ बजे के बाद तक का इंतजार करना होगा। बहुत सुबह बर्फ हटाने से शोर होता है, जिससे तुम्हारे पड़ोसियों के आराम में खलल पड़ेगा और उन्हें परेशानी होगी। अगर सरकार के स्पष्ट विनियम हैं, तो तुम्हें उनका पालन करना होगा। जान-बूझकर सरकारी विनियमों का उल्लंघन मत करो; सरकार की नाराजगी मोल मत लो। इसे ही नियमों का पालन करते हुए आचरण करना कहते हैं। मैं चाहे कहीं भी रहूँ, मैं बुनियादी तौर पर शोर नहीं करता। मैं कभी बाहर संगीत नहीं बजाता और न ही शोर-शराबा करता या जोर से बोलता हूँ। कुत्ते को टहलाते समय मैं उसे लगातार भौंकने नहीं देता। मैं पूरी कोशिश करता हूँ कि अपने पड़ोसियों को परेशान न करूँ, उनके जीवन में दखल न दूँ और उन्हें नाराज न करूँ। क्या यह नियमों का पालन करते हुए आचरण करना नहीं है? (हाँ।) इसीलिए इतने सालों से मैंने अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे से निभाया है। हम एक-दूसरे के साथ शांति से रहते हैं, एक-दूसरे से मिलने पर अभिवादन करते हैं और दोस्ताना एवं सौहार्दपूर्ण ढंग से साथ रहते हैं। हम चाहे कहीं भी रहें, पड़ोसियों से मिलते-जुलते समय हमें नियमों का पालन जरूर करना चाहिए। हमें उनके लिए मुसीबत खड़ी नहीं करनी चाहिए और न ही उनकी खुशामद करनी चाहिए—हमें दूसरों के साथ सही तरीके से पेश आना चाहिए और निष्पक्ष एवं न्यायोचित ढंग से काम करना चाहिए। अगर हम ऐसा करते हैं, तो समय के साथ कोई टकराव नहीं होगा।
देहधारी परमेश्वर द्वारा नियमों का पालन करते हुए आचरण करने के मुद्दे के बारे में कुछ लोग कहते हैं, "क्या यह बहुत सामान्य बात नहीं है?" जिस पर मैं कहता हूँ, "तुम बिल्कुल सही हो; यह बिल्कुल सामान्य बात है।" यह सामान्यता कहाँ से आती है? यह मानवता के जमीर और विवेक से आती है। ठीक इसलिए कि देहधारी परमेश्वर में सामान्य मानवता का इष्टतम जमीर और विवेक है, जब स्व-आचरण की बात आती है—जिसे लोग बहुत मामूली चीज मानते हैं—तब वह जिस सिद्धांत का पालन करता है, वह भी बहुत मामूली होता है : नियम-पालक होना। यह सुनकर कुछ लोग कह सकते हैं, "इसमें भला इतना महत्वपूर्ण क्या है? क्या यह चर्चा करने लायक भी है? क्या यह सामान्य और व्यावहारिक होना है? ये तो मामूली बातें हैं।" फिर भी, देहधारी परमेश्वर द्वारा नियमों का पालन करते हुए आचरण करना उसकी सामान्यता और व्यावहारिकता की अभिव्यक्ति है, इसलिए इस पर बात करना जरूरी है और लोगों को इसके बारे में जानकारी होनी चाहिए। लोगों को लगता है कि मेरा नियमों का पालन करते हुए आचरण करना कोई खास बात नहीं है। लेकिन क्या होता अगर मैं अपने जीवन में हर जगह खुद को खास दर्जा देता और हर मौके पर खुद को बड़ा दिखाता और कहता, "मैं मसीह हूँ। मैं स्वर्ग से आया हूँ। मैं किसी और जैसा नहीं हूँ। मानवजाति में मैं सबसे अलग हूँ। पूरी मानवजाति, सभी सजीव चीजें और सभी प्राणी मेरे पैरों तले कुचले जाने चाहिए। सारी चीजें मेरे पैर रखने की चौकी हैं। चाहे कोई परमेश्वर का विश्वासी हो या गैर-विश्वासी, सभी को मेरे सामने झुकना होगा और मेरी आराधना करनी होगी। जब वे मेरे सामने आएँ, तो उन सभी को आदर और सम्मान दिखाना होगा"? क्या यह सामान्य होता? (नहीं।) वह असामान्य होता। क्या तुम्हें लगता है कि मैं उस तरह से व्यवहार करता हूँ? (नहीं।) मैं उस तरह से व्यवहार नहीं करता। मैं जिस किसी के भी संपर्क में आ सकता हूँ, उसके साथ सौहार्दपूर्ण ढंग से निभाता हूँ, खासकर गैर-विश्वासियों के साथ। मैं उनके साथ नियमों और शिष्टाचार के अनुसार पेश आता और मिलता-जुलता हूँ। जब मैं लोगों के साथ किसी चीज के बारे में संगति या परामर्श करता हूँ, तो मैं उनका बहुत सम्मान करता हूँ। जब ऐसी कोई चीज होती है जो मुझे समझ नहीं आती, तो मैं अधिक पूछता और पता लगाता हूँ; कुछ लोग मेरे सवालों का जवाब देने में बहुत धैर्य दिखाते हैं। बेशक, ऐसा नहीं है कि मैं सिर्फ उनके इस बरताव का प्रतिदान करने के लिए ही नियमों का पालन करते हुए आचरण करता हूँ; बल्कि ऐसा इसलिए है कि इस वास्तविक परिवेश में रहते हुए लोगों से मिलते-जुलते और काम करवाते समय देहधारी परमेश्वर सहज रूप से ऐसे सिद्धांत का पालन करता है। उदाहरण के लिए, पुस्तकालय पढ़ने और अध्ययन करने का स्थान होता है। जब तुम वहाँ जाते हो, तब तुम्हें वहाँ के नियमों का पालन करना चाहिए। तुम शोर नहीं मचा सकते और तुम्हें जितना हो सके, बात करने से बचने की कोशिश करनी चाहिए। अगर तुम बात करना चाहते हो, तो तुम्हें अपनी आवाज धीमी रखनी चाहिए या बाहर चले जाना चाहिए, और खास तौर से अगर तुम्हारा फोन बजता है, तो उसे सुनने के लिए तुम्हें जल्दी से बाहर चले जाना चाहिए, ताकि दूसरों की पढ़ाई में कोई खलल न पड़े या उस पर कोई बुरा असर न हो। इसे ही नियमों का पालन करना कहते हैं। ऐसे परिवेश में, अगर मुझे कोई फोन आता है, तो मैं उसे सुनने के लिए बाहर जाऊँगा। कुछ लोग कहते हैं, "यह बात कौन नहीं जानता?" सचमुच ऐसे लोग हैं जो यह नहीं जानते। पश्चिम में कुछ रेस्तरां, सुपरमार्केट और ऐसी जगहों पर जहाँ लोग अपने काम से जाते हैं, तुम अक्सर कुछ लोगों को बहुत जोर से बात करते हुए सुन सकते हो, और इससे वहाँ के बैरे और स्टाफ बहुत घृणा महसूस करते हैं। खासकर कुछ एशियाई लोग नियमों को बिल्कुल नहीं समझते और बहुत ही घटिया किस्म के लगते हैं। कुछ जगहों पर नियम स्पष्ट रूप से लिखे होते हैं, लेकिन वे ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे उन्होंने उन्हें देखा ही न हो। नियम अपनी मातृभाषा में लिखे देखकर भी वे उनका पालन नहीं करते, यहाँ तक कि उनका उल्लंघन भी करते हैं। जब कर्मचारी उन्हें याद दिलाते हैं, तो वे उनसे बहस तक करते हैं। क्या यह खुद को मूर्ख बनाना नहीं है? कुछ लोगों को अपने देश में अपने रुतबे का रोब जमाने की आदत होती है। जब वे पश्चिमी देशों में आते हैं, तो वे उन्हें भी अपना ही इलाका समझकर आक्रामक व्यवहार करते हैं और गोरिल्ले की तरह अकड़कर चलते हैं, नियमों का बिल्कुल भी पालन नहीं करते। नतीजतन, वे जहाँ भी जाते हैं, लोग उनसे घृणा करते हैं और उन्हें नापसंद करते हैं। कुछ लोग तो डीएमवी में टेस्ट देते समय भी मुसीबत खड़ी कर देते हैं। बाद में, जब वे अपने देशवासियों से मिलते हैं, तो वे डींगें मारते हैं, "हम चीनी लोग जहाँ भी जाएँ, आजाद होते हैं। हमारा कभी नियमों का पालन करने का मन नहीं करता। हम जितने बेफिक्र रहें, उतना ही बेहतर है। अगर कोई मुझे अनुशासित करने की कोशिश करेगा, तो मैं बहुत बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दूँगा!" क्या ऐसा व्यक्ति जीता-जागता दानव नहीं है? क्या तुम्हें लगता है कि तुम अपने देश में हो, जहाँ अगर तुम्हारे पास ताकत और रसूख है तो तुम अपना रोब जमा सकते हो? तुम विदेश में हो, एक ऐसे देश में जहाँ कानून का राज चलता है। अगर तुम कानूनों और विनियमों का उल्लंघन करोगे, तो तुम्हें कानूनी जिम्मेदारी उठानी होगी। कानूनों और विनियमों का पालन वह न्यूनतम चीज है जो हर व्यक्ति को करनी ही चाहिए। अगर कोई व्यक्ति इन बुनियादी नियमों को भी नहीं समझता, तो उसमें इंसानियत नाम की कोई चीज नहीं है।
मैं आम तौर पर सार्वजनिक जगहों पर बहुत सावधान रहता हूँ। खासकर जब सरकारी एजेंसियों में मामले निपटाने जाता हूँ, तो मैं सावधानी बरतता हूँ और उनके नियमों का उल्लंघन करने से बचता हूँ। चाहे मैं कोई भी फॉर्म भरूँ या किसी भी सवाल का जवाब दूँ, मैं हमेशा नियमों के अनुसार ही काम करता हूँ। कई बार मामले निपटाने के बाद मुझे अनुभव हो गया है। नियमों का पालन करना आसान है; चिंता की बात नियमों को समझ न पाना है। अपना मूर्ख बनने की चिंता छोड़ो—क्या इससे काम करवाने पर असर पड़ सकता है? पड़ सकता है, इसलिए इंसान को नियमों का पालन करते हुए आचरण करना चाहिए। पश्चिमी लोग बुनियादी तौर पर ये चीजें हासिल कर पाते हैं। देहधारी परमेश्वर में सामान्य तर्कसंगतता और जमीर है, इसलिए बेशक वह भी इन्हें हासिल कर सकता है और वह अग्रसक्रिय रूप से ऐसा करता भी है। वह खुद को सृजित मानवजाति में सबसे अलग व्यक्ति के रूप में वर्गीकृत नहीं करता, न ही वह कभी कोई खास सुविधा पाने के लिए इन कानूनों और विनियमों की उपेक्षा करता है। सरकारी एजेंसी में मैं चाहे कोई भी काम निपटा रहा होऊँ, मैं हमेशा प्रक्रियाओं का पालन करता हूँ। मैं कभी यह कहते हुए माँगें नहीं करता, "मेरा एक विशेष दर्जा और विशेष पहचान है। क्या तुम मेरे साथ कुछ विशेष व्यवहार कर सकते हो?" एक तो मैं इस तरह का रास्ता खोजने के लिए किसी से परामर्श नहीं करता। दूसरे, मैं कभी यह कहते हुए स्वर्ग के परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करता, "परमेश्वर, क्या तुम मेरे लिए चिह्न और चमत्कार दिखाकर इस काम को तुरंत पूरा कर सकते हो, ताकि मुझे इंसानों की तरह इन प्रक्रियाओं का पालन न करना पड़े?" मैं कभी इस तरह से प्रार्थना नहीं करता; इसके बजाय, मैं नियमों का पालन करते हुए प्रक्रियाओं के अनुसार मामले निपटाता हूँ। बेशक, इन मामलों को निपटाते समय मैं कुछ विशेष परिस्थितियों का भी सामना करूँगा। विशेष परिस्थितियाँ विशेष निपटान की अपेक्षा करती हैं। अगर शुल्क देना हो, तो मैं देता हूँ। अगर मुझे इंतजार करना पड़े, तो मैं इंतजार करता हूँ। अगर मुझे किसी चीज के लिए आवेदन करना हो या सरकार से दोबारा पुष्टि करवानी हो, तो मैं आवेदन करता हूँ और दोबारा पुष्टि करवाता हूँ। मैं निश्चित रूप से कानूनों और विनियमों के अनुसार प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन करूँगा और किसी के अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन नहीं करूँगा। चाहे मैं सुपरमार्केट में खरीदारी कर रहा होऊँ या किसी सरकारी एजेंसी में मामले निपटा रहा होऊँ, अगर लोग लाइन में खड़े हैं, तो मैं भी उनके साथ लाइन में खड़ा होता हूँ। जब मेरी बारी आती है, तो मैं तुरंत आगे बढ़ता हूँ। वे मुझसे जो भी करने के लिए कहते हैं, मैं उसे नियमों का पालन करने वाले तरीके से उनकी आवश्यकताओं के अनुसार करता हूँ। मैं इसी तरह आचरण करता हूँ। जीवन में चीजों का सामना करते हुए मैं इसी तरह से काम करता हूँ और उनका अनुभव करता हूँ। हालाँकि कुछ विशेष मौकों पर मुझे कुछ शिकायतें होंगी, फिर भी इसका असर "नियमों का पालन करते हुए आचरण करना और कर्तव्यनिष्ठा से काम करना" के मेरे मतों पर कभी नहीं पड़ता। मैं फिर भी वही करता हूँ, जो मुझे करना चाहिए। मैं, खास तौर से, एशियाई दिखता हूँ, मेरी कद-काठी छोटी है और रंग-रूप औसत, मैं तेज आवाज में नहीं बोलता और लोगों को साधारण और औसत लगता हूँ, मैं भीड़ में अलग नहीं दिखता और किसी का भी ध्यान बिल्कुल नहीं खींचता। इसलिए, कुछ विशेष परिवेशों में मामले निपटाते समय मैं अलग-अलग स्तर के भेदभाव का सामना करता हूँ या मुझे अलग-अलग स्तर का "विशेष बरताव" मिलता है। अगर तुम्हारा सामना ऐसी चीजों से हो, तो तुम लोग क्या करोगे? क्या तुम लोग उन लोगों से बहस करोगे, उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करोगे या परमेश्वर से उन्हें शाप देने की प्रार्थना करोगे? तुम लोग कौन-सा तरीका अपनाओगे? (अगर परिस्थितियाँ सही हों, तो हो सकता है कि मैं उनसे बहस करूँ।) और क्या तुम मन ही मन उन्हें शाप देने की प्रार्थना करोगे? (मैं इतना आगे नहीं जाऊँगा, लेकिन अंदर ही अंदर बहुत गुस्सा हो जाऊँगा।) जब तुम्हारे साथ असमान व्यवहार या भेदभाव किया जाए, तो तुम्हें चीजें शांत होने देनी चाहिए। जहाँ तक मेरा संबंध है, मैं उन्हें शाप देने की प्रार्थना नहीं करता, न ही मैं उनसे बहस या झगड़ा करता हूँ। इसके बजाय, मैं चीजें शांत होने देता हूँ और उन्हें सही तरीके से लेता हूँ। मैं दिल में थोड़ा असहज महसूस करूँगा, लेकिन कुछ दिनों बाद मैं ठीक हो जाऊँगा; मैं इसे स्वीकार कर लूँगा। भले ही तुम्हारी गरिमा और सत्यनिष्ठा का अपमान हो, तुम जल्दबाजी नहीं दिखा सकते; तुम चीजें जल्दबाजी में नहीं सँभाल सकते। तो तुम्हें उन्हें कैसे सँभालना चाहिए? अगर कोई तुम्हारे साथ भेदभाव करता है या तुम्हारा अपमान करता है, तो तुम्हें उसके साथ धैर्य से पेश आना चाहिए, उससे दूर रहना चाहिए और जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए; तब वह तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। बस इस बार थोड़ा नुकसान उठाने को एक सबक की तरह लो। अगर मेरा सामना ऐसी चीज से होता है, तो अपनी सामान्य मानवता की तर्कसंगतता और जमीर की वजह से मुझे दुख होगा और मुझे यह भी महसूस होगा कि मेरी सत्यनिष्ठा और गरिमा को ठेस पहुँची है। मुझे अंदर ही अंदर असहज महसूस होगा और दर्द होगा। लेकिन मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगेगा कि मेरे साथ बुरा हुआ है क्योंकि मेरी एक विशेष पहचान और एक विशेष दर्जा है; मेरे साथ भेदभाव करने वालों से मैं नफरत तो बिल्कुल नहीं करूँगा या उन्हें शाप तो बिल्कुल दूँगा। जितना मैं बड़ा हो रहा हूँ, उतना ही ज्यादा मुझे लगता है कि ये बातें पूरी तरह से सामान्य हैं। इस इंसानी दुनिया में, ऐसी भ्रष्ट मानवजाति के बीच रहते हुए, ये चीजें बिल्कुल सामान्य हैं। मुझे ऐसा इसलिए नहीं लगता कि मुझे इन चीजों की आदत हो गई है और मैं इनके प्रति सुन्न हो गया हूँ, बल्कि इसलिए कि सभी लोग भ्रष्ट इंसान हैं। उनका भेदभाव व्यक्तिगत रूप से तुम्हारे खिलाफ निर्देशित नहीं होता; बल्कि पूरी मानवजाति ही ऐसी है। देखो, प्रवासियों के बहु-नस्लीय देश अमेरिका में हर नस्ल के लोग कहेंगे कि उनके साथ भेदभाव हुआ है; यहाँ तक कि गोरे लोग भी ऐसा ही दावा करेंगे। लोग विभिन्न अवसरों पर. विभिन्न परिवेशों में और लोगों के विभिन्न समूहों के बीच भेदभाव का सामना करेंगे। कभी-कभी यह भेदभाव दूसरी नस्लों की तरफ से होता है और कभी-कभी व्यक्ति अपनी ही नस्ल के लोगों से भी कुछ भेदभाव या अनुचित बरताव का सामना करता है। जिसे तुम भेदभाव समझते हो, हो सकता है वह भ्रष्ट इंसानों का चीजें सँभालने का सबसे आम तरीका हो। यह मानवजाति ठीक ऐसी ही है, इसलिए ऐसी चीजों को बहुत गंभीरता से मत लो। गुस्सा आना सामान्य है, लेकिन तुम्हें इन मामलों की असलियत जल्दी से जानकर उन्हें छोड़ देना चाहिए। उन्हें जल्दबाजी में मत लो। किसी से बदला लेने या किसी को शाप देने के लिए प्रार्थना करने के बारे में मत सोचो। यह मत सोचो कि तुम आम इंसान नहीं हो। तुम एक आम इंसान हो और दूसरे लोग तुम्हारे साथ वैसा ही बरताव करते हैं। अगर उन्हें लगता है कि तुम एक कमजोर प्रतिद्वंद्वी हो, तो वे तुम पर धौंस जमाएँगे। क्या यह पूरी तरह से सामान्य नहीं है? धारणाओं और कल्पनाओं पर भरोसा करके यह मत सोचो, "मैं कोई आम इंसान नहीं हूँ। मेरी बहुत अहमियत और बहुत ऊँचा रुतबा है। जो भी मुझ पर धौंस जमाएगा, मैं उसे शाप देने के लिए प्रार्थना करूँगा। अगर मैं तुम्हें बता दूँ कि मेरे पीछे कौन है, तो तुम्हारे होश उड़ जाएँगे। जब भविष्य में मेरे पास शक्ति होगी, तो मैं तुम्हें घुटने टेकने और दया की भीख माँगने पर मजबूर कर दूँगा और तुमसे वैसे ही झुककर सलाम करवाऊँगा जैसे मुर्गी चावल चुगते हुए झुकती है।" मेरे मन में कभी ऐसे विचार नहीं आए। दुनिया में हर जगह भेदभाव है। लोगों का भेदभाव सिर्फ तुम पर ही निर्देशित नहीं है। यह दुनिया ही नाइंसाफी, भेदभाव, हर तरह की दुष्टता और हर तरह के बुरे कर्मों से भरी हुई है। जब मेरा सामना ऐसी चीजों से होता है, तो चूँकि मैं खुद को कोई विशेष हस्ती नहीं मानता, इसलिए मेरे लिए इन बातों को जाने देना बहुत आसान होता है। क्या यह भी नियमों का पालन करते हुए आचरण करना और कर्तव्य-निष्ठा से काम करना के मत का पालन करना नहीं है? (हाँ।)
देहधारी परमेश्वर अपने जीवन में अनिवार्य रूप से लोगों के साथ मेलजोल करता है और उनसे जुड़ता है, जिनमें परमेश्वर में विश्वास करने वाले कुछ भाई-बहन और कुछ गैर-विश्वासी भी शामिल हैं। बेशक परमेश्वर में विश्वास करने वाले भाई-बहनों से मेलजोल करते समय अपने स्व-आचरण के लिए और मानवता से संबंधित चीजों से निपटने के लिए उसके कुछ सिद्धांत होते हैं। हालाँकि वह शिष्टाचार, आपसदारी और दुनिया के तौर-तरीकों का सख्ती से पालन नहीं करता, फिर भी उपकारों के आदान-प्रदान के मामले में वह कोशिश करता है कि दूसरों का फायदा न उठाए या अपने लिए कोई विशेष सुविधा न माँगे। जब कुछ भाई-बहन मेरे व्यक्तिगत मामले सँभालने के लिए अपनी कुछ ऊर्जा और समय लगाते हैं, तब मैं उन्हें कोई छोटा-सा उपहार देने, उनसे मिलने जाने, उन्हें खाना खिलाने या कुछ और करने का मौका ढूँढ़ता हूँ। यह रिश्वत नहीं है; यह शिष्टाचार और आपसदारी है, न कि दूसरों का फायदा उठाना। जिन भाई-बहनों के साथ मेरे निजी लेन-देन नहीं रहे हैं, उनमें से किसी को भी मैंने इसलिए कभी उपहार नहीं दिए क्योंकि उनका रुतबा है या उन्होंने परमेश्वर के घर में योगदान दिया है, न ही मैंने उनमें से किसी को इसलिए चीजें या विशेष व्यवहार दिया है क्योंकि मैं उन्हें अहमियत देता हूँ या उनके साथ मेरे अच्छे संबंध हैं। ऐसी चीजें कभी नहीं हुईं। संक्षेप में, लोगों के साथ जुड़ते और मेलजोल करते समय मैं प्रयास करता हूँ कि उनका फायदा न उठाऊँ या अपने लिए कोई विशेष सुविधा न माँगूँ। मेरी विशेष पहचान मुझे यह सोचने पर मजबूर नहीं करेगी, "मैं तुम्हारा जैसे भी इस्तेमाल करूँ, वह सही है और तुम्हें उसे स्वीकार करना चाहिए; यह तुम्हारा उत्कर्ष है।" मैं ऐसा नहीं सोचूँगा। अगर तुम मेरे लिए कुछ व्यक्तिगत मामले, कलीसिया के काम से अलग मामले सँभालते हो, तो मैं इस उपकार को याद रखूँगा और उसका बदला चुकाऊँगा। इसी आधार पर मैं तुम्हारे साथ उपकारों का आदान-प्रदान करूँगा। गैर-विश्वासियों के मामले में तो कुछ कहने की जरूरत ही नहीं है—अगर किसी गैर-विश्वासी ने मेरे लिए कोई काम किया है और कुछ पैसे खर्च किए हैं, तो एक तो मैं यह पक्का करूँगा कि मुझ पर उसकी कोई वित्तीय देनदारी न रहे। मैं उसे उसकी जेब से पैसे खर्च नहीं करने दूँगा; जितने भी पैसे की जरूरत होगी, मैं उसे दूँगा। इसके अलावा, मेरे लिए यह काम करने में उसने बहुत कष्ट सहे, बहुत प्रयास किया और बहुत भाग-दौड़ की, इसलिए शिष्टाचार के नाते मुझे उसे कोई उपहार देना चाहिए, इस एहसान के लिए कुछ मुआवजा देना चाहिए और उसका फायदा नहीं उठाना चाहिए। वह यह काम करके अपनी जीविका चलाता है; मेरे लिए कोई काम करने की वजह से उसे नुकसान हो या उसे अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़े, ऐसा मैं नहीं होने दे सकता। यह अनुचित होगा। इसलिए, ऐसे मामलों में मैं अपने लिए कोई खास सुविधा नहीं चाहता। बेशक, यह खेल के नियमों का पालन करना नहीं है; बात बस इतनी है कि व्यक्ति को दुनिया के बुनियादी तौर-तरीकों और सौजन्य तथा आपसदारी पर टिके रहना चाहिए; इस मामले में कोई छूट नहीं दी जा सकती। अगर तुम किसी से कोई काम करवाते हो और उसे पैसे नहीं देते और हमेशा उसका फायदा उठाने की कोशिश करते हो, तो यह ईमानदारी न होने की अभिव्यक्ति है। इन मामलों में मेरे सिद्धांत क्या हैं? अगर तुम किसी से कोई काम करवाना चाहते हो और वह जो योजना देता है वह सही है और तुम उसकी कीमत चुका सकते हो, तो उसे करवा लो। अगर तुम यह खर्च नहीं उठा सकते, तो मत करवाओ; इसे करवाने के लिए कोई सस्ता व्यक्ति ढूँढ़ लो। वही करो, जिसका खर्च तुम उठा सकते हो। अपनी क्षमता से ज्यादा जिम्मेदारी मत लो और इस बारे में मत सोचो कि तुम दूसरों का फायदा कैसे उठा सकते हो। अगर तुम्हारे पास काम करवाने के लिए वित्तीय साधन नहीं हैं, तो या तो पैसे उधार ले लो, कर्ज ले लो या तब तक इंतजार करो जब तक तुम काम करवाने लायक पैसे न कमा लो। संक्षेप में, खुद कोई रास्ता निकालो; तुम दूसरों का फायदा नहीं उठा सकते। अगर यह उनका पेशा है, तो जब वे तुम्हारे लिए कोई काम करें, तुम्हें अपना वादा निभाना चाहिए और उन्हें भुगतान करना चाहिए। यह बिल्कुल स्वाभाविक और न्यायसंगत है। दूसरों का फायदा न उठाना, दूसरों को धोखा न देना, दूसरों का देनदार न होना, बेशर्मी से व्यवहार न करना और कर्ज न लेना—इसे ही नियमों का पालन करने वाला आचरण कहा जाता है। जब तुम मुश्किल में हो, तो दूसरों के सामने अपनी परेशानियों का रोना मत रोओ; जब तुम गरीब हो, तो दूसरों का फायदा मत उठाओ; जब तुम अमीर हो, तो अपनी दौलत का दिखावा मत करो; और अपनी पहचान और रुतबे की वजह से दूसरों से श्रेष्ठ होने का दिखावा मत करो। लोगों से मेलजोल करने और मामले सँभालने का मेरा यही सिद्धांत है। उदाहरण के लिए, कभी-कभी मैं अपना कोई काम करवाने के लिए किसी को ढूँढ़ूँगा। मान लो कि आम तौर पर इसमें एक हजार डॉलर लगते, लेकिन वह पाँच हजार डॉलर माँगता है। हालाँकि मैं यह खर्च उठा सकता हूँ, लेकिन मैं इस तरह ठगा जाना स्वीकार नहीं करूँगा। काम पूरा करने के लिए जितना खर्च आम तौर पर जरूरी होता है, मैं करता हूँ और लोगों से मोल-भाव नहीं करता। अगर मैं इसका खर्च नहीं उठा सकता, तो मैं किसी सस्ते व्यक्ति को ढूँढ़ूँगा। मैं बिल्कुल भी बेशर्मी नहीं करूँगा, न ही मैं कीमत कम करवाने के लिए गरीबी का रोना रोऊँगा; मैं ऐसी बातें कभी नहीं कहता। काम करवाने के लिए जितनी रकम की जरूरत होती है, मैं देता हूँ, बाजार की दर के हिसाब से भुगतान करता हूँ और नियमों के अनुसार काम करता हूँ। मैं इतना सख्त हूँ। कुछ अमीर लोग बहुत सुर्खियाँ बटोरने वाले और घमंडी होते हैं। वे डिजाइनर ब्रांड के कपड़े, हीरे की अँगूठियाँ और कंठहार पहनते हैं, सिर से पाँव तक जगमगाते आभूषणों से सजे-धजे रहते हैं। इसके अलावा, वे जहाँ भी जाते हैं ऊँची एड़ी के जूते पहनते हैं और आम तौर पर कालीन पर चलने से बचते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि बिना आवाज किए चलना बहुत साधारण बात है—वे खास तौर पर संगमरमर या लकड़ी के फर्श पर चलते हैं, ताकि लोगों को उनके आने का पता चले। यहाँ तक कि वे कमरे में घुसते समय भी अपना डिजाइनर धूप का चश्मा नहीं उतारते, और वे दरवाजे से ही कमरे में नजर दौड़ाकर देख लेते हैं कि वहाँ कौन है, मानो कह रहे हों, "क्या तुमने देखा कि रानी आ गई है?" वे जहाँ भी जाते हैं, पहले दिखावा जरूर करते हैं। अगर मैं गर्मियों में बाहर जाते समय धूप का चश्मा पहनता हूँ, तो अपनी मंजिल पर पहुँचते ही उन्हें जल्दी से बैग में रख लेता हूँ, ताकि लोग मुझे धूप का चश्मा पहने देखकर यह न सोचें कि मैं दिखावा कर रहा हूँ, जिससे गलतफहमी हो सकती है। मैं ज्यादातर ऐसे जूते पहनता हूँ जिनके तल्ले रबर या फोम के होते हैं और मैं चलते समय आवाज न करने की कोशिश करता हूँ। जब मैं मामले सँभालने के लिए कहीं जाता हूँ, तब अगर मुझे दरवाजे की घंटी बजाने की जरूरत होती है, तो मैं बजाता हूँ। अगर दरवाजे की घंटी बजाने की जरूरत नहीं होती, तो अंदर पहुँचने के बाद मैं पहले रिसेप्शनिस्ट को बताता हूँ कि मेरा अमुक व्यक्ति के साथ अमुक समय पर अपॉइंटमेंट है, और फिर वहाँ बैठकर इंतजार करता हूँ। मैं कुछ लोगों को देखता हूँ जो करने के लिए कुछ न होने पर बैठे हुए अपना फोन देखते रहते हैं। वे पैर पर पैर रखकर बैठते हैं, अपने घुँघराले बाल झटकते हैं और बगल में डिजाइनर बैग रखते हैं—वे बहुत आडंबरी होते हैं। मैं जहाँ भी जाता हूँ, बहुत विनम्र होकर रहता हूँ। मैं बैठने के लिए कोई कोना ढूँढ़ लेता हूँ और अपना बैग अपनी छाती से सटाकर रखता हूँ ताकि कोई बुरा आदमी उसे छीन न ले। मैं सचेत रहता हूँ और विनम्रता से रहता हूँ। जब मेरी बारी आती है, तो मैं बिना समय गँवाए अपना काम निपटाता हूँ, कोशिश करता हूँ कि लोगों का ध्यान मुझ पर कम से कम जाए। काम निपटाते समय मैं नियमों का पालन करता हूँ और लोगों का कुछ बकाया नहीं रखता। मैं जहाँ भी जाता हूँ, अपनी गतिविधियाँ नियंत्रण में रखता हूँ; मैं नहीं चाहता कि किसी का ध्यान मेरी ओर जाए। यानी, मैं जहाँ भी कोई काम निपटाने जाता हूँ, चुपचाप चलता हूँ, कभी इतनी आवाज नहीं करता कि मेरी मौजूदगी का पता चले। गैर-विश्वासियों से मिलते-जुलते समय, अगर उनके काम करने के कुछ नियम होते हैं, तो मैं उन नियमों का पालन करता हूँ। उदाहरण के लिए, अमुक उद्योग में यह नियम है कि जब कोई तुम्हारा काम करता है, तो उसके बाद तुम्हें उसे खाना खिलाना होता है। हमारे लेन-देन की कीमत के हिसाब से, खाने का खर्च आम तौर पर पंद्रह डॉलर के लगभग होना चाहिए, इसलिए मैं उसे लगभग उतने ही खर्च वाला खाना खिला देता हूँ। कुछ लोग कहते हैं, "जब तुम उसे खाना खिला ही रहे हो, तो दिखावे के लिए थोड़ा और पैसा खर्च कर दो।" इसकी कोई जरूरत नहीं है। उनके जो भी नियम हैं, हम उनका पालन करते हैं। जरूरत से ज्यादा खर्च मत करो और सिर्फ दिखावे के लिए पैसे बरबाद मत करो। पश्चिम में किसी से अपना कोई काम करवाने पर या घंटे के हिसाब से काम करने वाले कामगारों या मजदूरों को काम पर रखने पर टिप देने का रिवाज है। कुछ उद्योगों में टिप की रकम को लेकर नियम होते हैं, जबकि कुछ में नहीं। जिनमें ऐसे नियम नहीं होते, वहाँ ज्यादातर समय मैं विनम्रता और कर्मचारी के प्रति सम्मानवश उसकी दर, उसके काम की गुणवत्ता और उसके रवैये के आधार पर उचित टिप देता हूँ। अगर उसने अच्छा काम किया है, तो मैं उसे पाँच डॉलर अतिरिक्त दूँगा; अगर उसने औसत काम किया है और मैं भविष्य में उससे दोबारा काम नहीं करवाना चाहता, तो मैं उसे अतिरिक्त पैसे नहीं दूँगा, लेकिन उनकी कमाई से कम भी नहीं दूँगा। जहाँ तक टिप देने की बात है, मैं खुद को कोई अमीरजादा नहीं समझता और जानबूझकर अपनी दौलत का इस तरह दिखावा नहीं करता कि मुट्ठी भर नकदी निकाली और बिना गिने किसी को दे दी। मैं कभी ऐसी चीजें नहीं करता। इसके बजाय, उनके काम शुरू करने से पहले ही मैं उनकी दर के आधार पर पैसे अग्रिम रूप से तैयार कर लेता हूँ और जब वे जाते हैं तब उन्हें दे देता हूँ। ज्यादातर लोग इससे काफी संतुष्ट होते हैं। इसे पश्चिम में काम करवाने का एक नियम भी माना जा सकता है। चूँकि यह एक नियम है, इसलिए हमें इसका पालन करना चाहिए और इसे तोड़ना नहीं चाहिए। अगर तुम कहीं नए हो और वहाँ के नियम नहीं समझते, तो तुम्हारे लिए सबसे अच्छा यही होगा कि तुम उन्हें जान लो। जब तुम उन्हें समझ जाओ, तो अनजान मत बनो; नियमों के अनुसार काम करवाने की पूरी कोशिश करो। बेशक, ऐसा नहीं है कि मैं इस बात से डरता हूँ कि लोग मेरी पीठ पीछे मेरी आलोचना करेंगे या कहेंगे कि मैं नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण नहीं करता—यह इन चीजों के डर की वजह से नहीं है। बल्कि, मुझे लगता है कि इसे ऐसे ही किया जाना चाहिए; मुझसे ऐसा ही करने की अपेक्षा की जाती है। कुछ लोग कहते हैं, "अगर तुम उन्हें दस डॉलर कम देते, तो क्या तुम्हारे पास एक और भोजन के लिए काफी पैसे न होते?" तुम इसे उस नजरिये से नहीं देख सकते। उन्होंने यही कमाया था। अगर तुम उन्हें दस डॉलर कम देते हो, तो यह उनसे दस डॉलर लेने के बराबर है। दूसरों से लिया गया पैसा अपने खर्चों के लिए इस्तेमाल करना जमीर के खिलाफ है। अपने जमीर के खिलाफ काम करना मानवता के अनुरूप नहीं है; यह मानवता से रहित है। अगर तुम उन्हें इस तरह कम पैसे देने की कोशिश करते हो, तो तुम नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण नहीं कर रहे हो। नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण करने का मतलब है, कम से कम, निष्पक्ष व्यवहार करना और बिना लाग-लपेट के बोलना। मान लो तुम सेवा उद्योग में हो और गुजारे के लिए तुम्हें टिप पर निर्भर रहने की जरूरत है। अगर कोई व्यक्ति तुम्हारा फायदा उठाते हुए तुम्हें टिप नहीं देता, तो तुम्हें कैसा लगेगा? यह वही तर्क है। हो सकता है कि किसी खास उद्योग में टिप न देना कानून के खिलाफ न हो और कोई इसके लिए तुम्हारे पीछे न पड़े, लेकिन क्या तुम इसे अपने जमीर के सामने सही ठहरा सकते हो? अगर तुम इसे अपने जमीर के सामने सही नहीं ठहरा सकते, तो तुम पर अपने जमीर का कर्ज है। अगर तुम पर इस जीवन में ऐसे बहुत सारे कर्ज हैं, तो तुम उन्हें कब चुका पाओगे? तुम इस तरह से आचरण नहीं कर सकते। शायद तुम किसी को टिप न देकर उसका थोड़ा फायदा उठा लो, लेकिन क्या तुम्हें अपने जमीर से कोई आरोप महसूस नहीं होता? अगर वाकई नहीं होता, तो सचमुच तुम्हारे साथ कोई समस्या है। अगर तुम इतनी छोटी-सी बात पर किसी का फायदा उठाने की कोशिश करते हो, तो हो सकता है तुम और भी बुरे काम करने में सक्षम हो? ऐसी मानसिकता के साथ, क्या तुम अभी भी सत्य का अभ्यास कर सकते हो?
नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण करने के बारे में हमने जिन उदाहरणों पर संगति की है, उनका सामना अपनी जिंदगी में और जीवित रहने के दौरान हर व्यक्ति को करना पड़ सकता है। इस मानवजाति के बीच रहने वाले देहधारी परमेश्वर के लिए भी इन चीजों से बचना नामुमकिन है और उसे इनका सामना करना ही पड़ता है। इन चीजों को करते समय देहधारी परमेश्वर कुल मिलाकर नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करने के उसूलों और सिद्धांतों पर सख्ती से चलता है। मैं खुद ठीक यही करता हूँ। बेशक, जब तुम लोगों के साथ मेरे मिलने-जुलने में कलीसिया का काम या तुम लोगों का व्यक्तिगत जीवन शामिल होता है, तब अगर तुम लोग मुझसे अपने साथ संगति करने के लिए कहते हो या इस बारे में सलाह माँगते हो कि किसी खास समस्या से कैसे निपटें, तो मैं तुम लोगों के साथ सख्ती से अपने स्व-आचरण के उसूलों के अनुसार ही संगति करूँगा। चाहे तुम लोग उन्हें स्वीकार करो या न करो, मेरे दृष्टिकोण और मेरे आचरण के तरीके और सिद्धांत हमेशा अपरिवर्तित रहते हैं। मैं तुम लोगों को कभी कानून की कमियों का फायदा उठाकर अतिरिक्त लाभ लेने की बात बिल्कुल नहीं सिखाऊँगा; ऐसा करना बिल्कुल गलत है। चाहे कुछ भी हो, मैं पहले तुम लोगों से यह साफ-साफ पता लगाने के लिए कहूँगा कि क्या इस मामले में किसी खास उद्योग के कानून, नीतियाँ या विनियम शामिल हैं। अगर इसमें ये चीजें शामिल हों, तो मैं तुम लोगों से सरकारी अधिकारियों से या किसी वकील से परामर्श करने या संबंधित नियम ऑनलाइन पता लगाने के लिए कहूँगा। अगर इसमें वित्तीय मुद्दे जुड़े हों, तो तुम्हें किसी लेखापाल से परामर्श करना चाहिए। तुम चाहे किसी भी देश में हो, तुम्हें इसी तरह अभ्यास करना चाहिए। मैं इसी तरह चीजें करता हूँ और मैं तुम्हें इन उसूलों का उल्लंघन करने के लिए कभी प्रोत्साहित नहीं करूँगा। इसके बजाय, मैं तुमसे हर देश के कानूनों और विनियमों का सख्ती से पालन करने की अपेक्षा करता हूँ, जिनमें किसी सार्वजनिक जगह या उद्योग के नियम और प्रावधान भी शामिल हैं। अगर तुम उनके बारे में नहीं जानते, तो तुम्हें उनके बारे में जानने की पहल करनी चाहिए और लोगों से उनके बारे में परामर्श करना चाहिए। अगर तुम उनके बारे में जानते हो, तो तुम्हें उनका पालन करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। नियम जो भी कहते हों, हमें उसी तरह से चीजें करनी चाहिए। अगर कभी-कभी देश के नियम या कानून तुम्हारे कर्तव्य करने में लगने वाले समय या तुम्हारे कर्तव्य से जुड़े कुछ मामलों पर असर डालें तो भी, तुम्हें उनका पालन करना ही चाहिए। तुम अपना कर्तव्य करने के समय या परिवेश को इस तरह समायोजित करने के तरीके ढूँढ़ सकते हो, जिससे कि देश के कानूनों और विनियमों के साथ टकराव से बचा जा सके और ऐसे व्यवहारों में शामिल होने या ऐसी कोई घटनाएँ होने देने से भी बचा जा सके जिनसे देश के कानूनों और विनियमों का उल्लंघन होता हो। क्या इस तरह से चीजें करना सही है? (हाँ।) यह एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि कानून और विनियम चाहे किसी भी देश के हों, चाहे वे उचित हों या अनुचित, अगर सरकार ने उन्हें स्पष्ट रूप से निर्धारित किया है और अगर वे मेरे जीवन और अस्तित्व के दायरे में आते हैं, तो मैं यथासंभव उनका पालन करता हूँ और उन्हें मानता हूँ। मैं सरकार के उन कानूनों और विनियमों के किसी भी पहलू पर कोई टिप्पणी या उनकी आलोचना बिल्कुल नहीं करूँगा जो अनुचित हैं या जो लोगों के हित में नहीं हैं; इसके बजाय, सरकार जो भी नियम तय करती है, मैं उनका पालन करता हूँ। बेशक, जब मैं सरकार के कानूनों और विनियमों का पालन करने की बात करता हूँ, तो इसमें वे कानून शामिल नहीं हैं जो धार्मिक विश्वास का विरोध करते हैं या वे कानून जो परमेश्वर को नकारते हैं और उसका प्रतिरोध करते हैं। बल्कि यह उन कानूनों और विनियमों को संदर्भित करता है जो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं, सामाजिक व्यवस्था कायम रखते हैं और निष्पक्षता को बढ़ावा देते हैं; लोगों को इन्हीं का पालन करना चाहिए। लोगों के मन में चाहे जो भी विचार हों, कानूनों और विनियमों का पालन करना पहले आता है। व्यक्ति को देश के कानूनों का सम्मान करना चाहिए और किसी भी उद्योग के नियमों और प्रावधानों का सम्मान करना चाहिए। यदि तुम उनके अनुसार नहीं ढल सकते या उन्हें पसंद नहीं करते, तो तुम उस उद्योग से दूर रह सकते हो या देश छोड़ सकते हो। लेकिन तर्कसंगत ढंग से कहूँ तो, यदि तुम किसी खास देश में रहते हो या किसी खास उद्योग के लोगों के साथ तुम्हारे लेनदेन हैं, तो तुम्हें देश के कानूनों, उद्योग या कुछ विशेष अवसरों और परिवेशों के प्रावधानों और निर्देशों का, यहाँ तक कि कुछ नैतिक मानदंडों का भी पालन करना चाहिए। मैं मानवजाति के कानूनों, विनियमों और प्रावधानों का, सार्वजनिक स्थानों के कुछ विशेष नियमों और निर्देशों का और मानवता के बुनियादी नैतिक और व्यवहारगत मानदंडों का सख्ती से पालन करने का प्रयास करता हूँ। मैं कभी अपनी विशेष पहचान और दर्जे पर जोर नहीं देता, न ही किसी कानून, विनियम, निर्देश, प्रावधान आदि का उल्लंघन करता हूँ। मैं उन्हें चुनौती नहीं देता या जानबूझकर उन्हें तोड़कर अपनी मनमानी नहीं करता; इसके बजाय, मैं सख्ती से उनका पालन करता हूँ। मेरे इस सख्ती से नियमों का पालन करने के पीछे उनके कानूनों, विनियमों, प्रावधानों और नियमों के प्रति सम्मान है। यह वह सिद्धांत भी है, जिसका पालन व्यक्ति तब करता है जब वह नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करता है। शायद कुछ लोग नहीं समझते कि इन चीजों के प्रति मेरा रवैया क्या है; हो सकता है उनके मन में कुछ ऐसे विचार हों जो वास्तविकता से मेल न खाते हों या ऐसी चीजें करने के मेरे सिद्धांतों और उसूलों के बारे में उनकी कुछ खोखली धारणाएँ और कल्पनाएँ हों। इस तरह संगति करने से क्या तुम लोगों को इसमें कुछ भी खोखला लगता है? (नहीं।) यह कहने का कि इसमें कुछ भी खोखला नहीं है, मतलब यह है कि इन चीजों के प्रति मेरा रवैया मानवता के परिप्रेक्ष्य से उनके साथ तर्कसंगत ढंग से पेश आने का है। मैं श्रेष्ठता का स्थान ग्रहण नहीं करता, मैं तीसरे स्वर्ग के परिप्रेक्ष्य से खड़ा नहीं होता, और मैं परमेश्वर की पहचान रखने के विशेष दर्जे से इन चीजों के साथ पेश नहीं आता। इसके बजाय, मैं उनके साथ एक तर्कसंगत परिप्रेक्ष्य से मानवीय ढंग से पेश आता हूँ। इन चीजों के साथ पेश आने के तरीके में मैं कभी देहधारी परमेश्वर के रूप में अपनी पहचान पर जोर नहीं देता, न ही इस पहचान का लाभ उठाकर किसी को तिरस्कारपूर्ण ढंग से देखता हूँ। मैं कभी इन चीजों को चुनौती नहीं देता और मैं देश के कानून और विनियम या किसी उद्योग के नियम नहीं तोड़ता। बल्कि, मैं इन कानूनों, विनियमों, प्रावधानों और ऐसी अन्य चीजों का पूरी आज्ञाकारिता और कर्तव्यनिष्ठा के साथ पालन करता हूँ। इससे भी अधिक व्यावहारिक रूप से, जब लोगों के साथ मिलने-जुलने की बात आती है, तब भी मैं बहुत ही मानवीय सिद्धांत का पालन करता हूँ।
हमने देहधारी परमेश्वर के नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण करने की कुछ अभिव्यक्तियों पर संगति की है। हो सकता है तुम लोगों ने इन चीजों के बारे में कभी सोचा न हो या इन्हें कभी गंभीरता से न लिया हो; हो सकता है इन चीजों के बारे में तुम लोगों की जानकारी बहुत खोखली हो; या हो सकता है जब तुम लोग इन्हें देखते हो, इनके संपर्क में आते हो या इनके बारे में सुनते हो तो तुम इन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज कर देते हो। लेकिन ये चीजें देहधारी परमेश्वर के देह द्वारा अभिव्यक्त सामान्यता और व्यावहारिकता और उसकी विनम्रता और प्रच्छन्नता दर्शाती हैं। इसके अलावा, जब परमेश्वर का आत्मा स्वयं देह धारण करके लोगों के बीच आता है, तब ये उसके स्व-आचरण की सबसे सामान्य और व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ भी होती हैं। इन अभिव्यक्तियों के जरिये लोग बेहतर ढंग से समझ सकते हैं कि स्वर्गिक परमेश्वर आचरण करने और मानवजाति का सदस्य बनने के मुद्दे को कैसे देखता है, उसके साथ कैसे पेश आता है और उससे कैसे निपटता है। स्व-आचरण के ये उसूल और सिद्धांत लोगों को यह देखने और जानने देते हैं कि परमेश्वर कोई भी काम खोखले तरीके से नहीं करता, कि वह हर चीज व्यावहारिक तरीके से करता है, और वह मानवजाति के कानूनों और विनियमों तथा मानव समाज के विभिन्न क्षेत्रों के नियमों का पालन करते हुए व्यावहारिक तरीके से सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करता है। इन कानूनों और विनियमों का पालन करते हुए देहधारी परमेश्वर को अपनी सेवकाई भी करनी होती है और वह कार्य भी करना होता है जो वह करना चाहता है। चाहे उसका सामान्य मानवता को जीना हो या दिव्यता का कार्य करना हो, इनमें से कोई भी एक-दूसरे से टकराता नहीं या एक-दूसरे का खंडन नहीं करता। परमेश्वर द्वारा अपने सामान्य मानव जीवन में प्रदर्शित स्व-आचरण के उसूल और सिद्धांत देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता दिखाते हैं—यह एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि वह उस सामान्य मानवता को जीता है—जिसमें जमीर और विवेक होता है—जो परमेश्वर के आत्मा में तब होनी चाहिए जब वह लोगों के बीच व्यक्ति बनता है या देह धारण करता है। हालाँकि यह जीना अधिकतर समय देहधारी परमेश्वर द्वारा अपनी दिव्यता में की जाने वाली सेवकाई से असंबद्ध लगता है, फिर भी परमेश्वर का मानवता में जीना जिन उसूलों और सिद्धांतों का पालन करता है, वे सत्य के सार, परमेश्वर के स्वभाव और उसके दिव्य कार्य में व्यक्त मानवजाति से उसकी अपेक्षाओं के समान ही हैं। देहधारी परमेश्वर अपने मानव जीवन में स्व-आचरण के जिन सिद्धांतों का पालन करता है, वे हैं नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करना। फिर, दिव्यता में अपना कार्य करते समय वह कार्य के जिन सिद्धांतों का पालन करता है, वे भी मूल रूप से वही हैं—वह नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करता है; सिद्धांत नहीं बदलते। इसलिए, जहाँ तक देहधारी परमेश्वर का संबंध है, उसकी मानवता और दिव्यता कभी अलग नहीं होतीं; वे पूरी तरह से एक हैं। उसकी दिव्यता उसकी मानवता के माध्यम से व्यक्त हो सकती है और उसकी मानवता उसकी दिव्यता के एक हिस्से की ही अभिव्यक्ति है। इसलिए, जब देहधारी परमेश्वर मानवजाति के बीच रहता है, तब इस अवधि के दौरान लोग उसकी जिस मानवता और दिव्यता को देख सकते हैं, वे असंबद्ध या अलग नहीं होतीं; वे एक होती हैं। उसकी मानवता का जीना और उसके स्व-आचरण के उसूल और सिद्धांत कुछ हद तक परमेश्वर के आत्मा द्वारा निरीक्षित, प्रभावित और निर्देशित होते हैं। दूसरे पहलू से, यह भी कहा जा सकता है कि वह अपनी उस सामान्य मानवता को जीता है, जिसमें जमीर और विवेक होता है। सिर्फ ऐसी मानवता के साथ ही परमेश्वर का देहधारी देह अपने समग्र दिव्य कार्य का भार उठा सकता है, उस कार्य का, जो उसे अपनी दिव्यता में करना है; सिर्फ ऐसी मानवता के साथ ही परमेश्वर का देहधारी देह अपनी वह सेवकाई कर सकता है जो उसे करनी है और उसे अच्छी तरह से कर सकता है। यह एक समझ है। दूसरी समझ यह है कि देहधारी परमेश्वर द्वारा की जाने वाली सेवकाई ऐसी मानवता के माध्यम से हासिल की जाती है जिसमें सामान्यता और व्यावहारिकता होती है। किसी भी स्थिति में, देहधारी परमेश्वर का मानवता सार और उसकी दिव्यता, दोनों मिलकर देहधारी परमेश्वर को बनाती हैं, जिसके पास मसीह की विशेष पहचान है। इसलिए, देहधारी परमेश्वर की मानवता के स्व-आचरण के जो उसूल और सिद्धांत तुम देखते हो, जिनमें उसके हर एक काम में उसकी विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ, रवैये और दृष्टिकोण शामिल हैं, उसकी मानवता का हिस्सा हैं और बेशक उन्हें उसकी दिव्यता का हिस्सा भी कहा जा सकता है। इन दोनों को अलग नहीं किया जा सकता। यानी, जब तुम देहधारी परमेश्वर में ऐसी मानवता देखते हो, तो तुम्हें निश्चित होना चाहिए कि वह वो देह है जिसे परमेश्वर ने खुद धारण किया है। बेशक, जब तुम परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सत्य के संपर्क में आते हो, तो यह मानते हुए कि देहधारी परमेश्वर में दिव्यता है, तुम्हें यह भी मानना चाहिए कि उसकी मानवता देहधारी परमेश्वर का एक हिस्सा है, जिसकी एक विशेष पहचान है। किसी भी स्थिति में, अंततः लोगों को देहधारी परमेश्वर के इस सामान्य और व्यावहारिक पक्ष को देखने और स्व-आचरण के जो उसूल और सिद्धांत वह जीता है उन्हें जानने दिया जाता है, क्योंकि इनमें वे कई मुद्दे शामिल हैं जिनका सामना परमेश्वर का देह अपने अस्तित्व और जीवन में करता है। हालाँकि देहधारी परमेश्वर के मानव जीवन में दिखने वाली ये व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ उसके द्वारा की जाने वाली सेवकाई या लोगों को सत्य, मार्ग और जीवन के उसके पोषण के स्तर तक नहीं पहुँचते, फिर भी स्व-आचरण के ये सिद्धांत और उसूल देहधारी परमेश्वर के भीतर की दिव्यता से असंबद्ध नहीं हैं। चूँकि यह देह परमेश्वर का देहधारी देह है और वह देह है जिसे परमेश्वर के आत्मा ने धारण किया है, ठीक इसलिए इस देहधारी देह की सामान्य मानवता में स्व-आचरण के ऐसे उसूल और सिद्धांत हो सकते हैं। इसका मतलब यह है कि भ्रष्ट मानवजाति के किसी ऐसे सदस्य या भ्रष्ट मानवजाति के बीच किसी ऐसे व्यक्ति के लिए भी, जिसकी लाभप्रद पृष्ठभूमि, पहचान, सामाजिक मूल्य और कुलीन दर्जा हो, नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करना बहुत मुश्किल है; इसका कोई अपवाद नहीं है। इसलिए, सामान्यता और व्यावहारिकता का यह पहलू वह है जो देहधारी परमेश्वर की मानवता के पास है और जो वह स्वयं है, और बेशक, यह उसका भी एक हिस्सा है जो देहधारी परमेश्वर की दिव्यता के पास है और जो वह स्वयं है; बात बस यह है कि वह इसे अपनी मानवता के माध्यम से व्यक्त और प्रकट करता है। अगर देहधारी परमेश्वर जहाँ भी जाता वहीँ डींगें मारता, हमेशा अपना रुतबा जताता, आडंबरपूर्ण तरीके से बोलता, खुद को महान समझता, हर किसी को नीची नजर से देखता और घमंड एवं अहंकार से भरा व्यवहार करता और हर किसी को हमेशा अपने पैरों तले कुचलना चाहता; अगर वह हर उस व्यक्ति को शाप देता जो उसके सामने झुककर आराधना न करता, उसे राख में बदल देता, उसे तुरंत मार देता या अपनी तीक्ष्ण दृष्टि से उसे मार गिराता, तो यह कहना मुश्किल होता कि क्या सचमुच उसके भीतर दिव्यता सार है। एक तरफ, देहधारी परमेश्वर के पास अपने देह के समस्त जीवन, वचनों और कर्मों को बनाए रखने रखने के लिए सामान्य मानवता वाला जमीर और विवेक है। दूसरी तरफ, उसके भीतर उसकी दिव्यता भी काम करती है, क्योंकि आखिरकार दिव्यता ही उसका असली जीवन है। अगर उसकी मानवता भी भ्रष्ट मानवजाति की मानवता जैसी ही अहंकारी और खुद को सही मानने वाली होती, तो क्या तुम कहते कि यह व्यक्ति देहधारी परमेश्वर है? (नहीं।) मान लो किसी व्यक्ति में हमेशा अलौकिक अभिव्यक्तियाँ होतीं, वह हमेशा खुद को धरती पर उतरा हुआ कोई स्वर्गिक प्राणी समझता, उसे हमेशा यही एहसास होता और वह हमेशा लोगों से ऊँचे दर्जे से बात करता, जिससे लोग उसके शब्दों और कर्मों को आदर की नजर से देखते। मान लो उसके मन में हमेशा अलौकिक और अत्युत्तम विचार होते, वह एक नजर में ही बता सकता कि किसी के पिछले जीवन में क्या हुआ था, उसने क्या बुराइयाँ की थीं, क्या काम किए थे या वह कितनी बार इंसान या जानवर के रूप में पुनर्जन्म ले चुका था। इसके अलावा, मान लो यह व्यक्ति हमेशा खुद को बहुत महान समझता, बोलते समय हमेशा अलौकिक अभिव्यक्तियाँ दिखाता और उसके साथ चिह्न और चमत्कार होते, जिससे लोगों को लगता कि वह कोई खास व्यक्ति है। ऐसा व्यक्ति असामान्य होगा। एक तरफ, उसके भीतर का जीवन स्वभाव असामान्य होगा; दूसरी तरफ, उसके भीतर का जीवन दिव्यता का जीवन नहीं होगा। इसे कहने का यही एकमात्र तरीका है।
चाहे उसके स्व-आचरण के उसूल हों या मामलों से निपटने के सिद्धांत, देहधारी परमेश्वर जो कुछ भी प्रकट करता और जीता है, वह बहुत ही सामान्य और व्यावहारिक होता है। जो चीजें मैंने कही हैं और जो चीजें मैं अपने जीवन में करता हूँ, उन्हें देखो—क्या उनमें से कोई भी चीज असामान्य है? क्या उनमें से कोई भी चीज अलौकिक या अपरंपरागत है? (नहीं।) मैं चाहे कुछ भी सँभाल रहा हूँ, तुम्हें मुझमें कुछ भी असामान्य नहीं दिखेगा। मैं कोई असामान्य व्यक्ति नहीं हूँ; मैं बस एक सामान्य व्यक्ति हूँ। इसके अलावा, हर मामले से निपटने में मेरे विचार, दृष्टिकोण, सोच और तर्क विरूपित, चरम या अलौकिक नहीं होते। लोगों के साथ मिलते-जुलते या उनसे जुड़ते समय मैं शांत और संयमित रहता हूँ। अगर लोग मुझसे मिलना-जुलना चाहते हैं, तो मैं उनसे मिलता-जुलता हूँ; अगर वे नहीं चाहते, तो मैं उनके साथ मैत्रीपूर्ण होने की कोशिश नहीं करता। जब लोगों से मिलने-जुलने, मामलों से निपटने, तमाम तरह की चीजें करने और स्व-आचरण की बात आती है, तब क्या तुम्हें मेरी सोच सामान्य लगती है? (हाँ।) यह सब सामान्य है। मैंने कभी तुम लोगों को किसी देश की सरकार का विरोध करने के लिए नहीं कहा या उकसाया, न ही मैंने कभी तुम लोगों से ऐसा कुछ कहा है : "परमेश्वर में विश्वास रखने वाले सभी लोग परमेश्वर से आते हैं; तुम सभी तीसरे स्वर्ग से आते हो। इस दुनिया से मत डरो; इस दुनिया को अपने पैरों तले रौंद डालो! तुम सभी लोग विजयी बालक हो; इस दुनिया पर शासन करने के लिए और इस मानवजाति पर शासन करने के लिए लोहे का दंड उठाओ। सब कुछ तुम्हारे पैरों तले है!" क्या मैंने कभी ऐसा कहा है? (नहीं।) मैंने क्या कहा है? यही कि तुम लोग जो कुछ भी करते हो, उसमें तुम्हें नियमों का पालन करने वाला बनना चाहिए। तुम चाहे किसी भी देश में परमेश्वर में विश्वास और अपना कर्तव्य करते हो, तुम्हें कानून का पालन करना होगा और सरकारी विनियमों के अनुसार चीजें करनी होंगी। तुम्हें बिल्कुल भी लापरवाह या मनमाने ढंग से काम नहीं करना चाहिए; तुम्हें सावधान रहना चाहिए और असंयमित नहीं होना चाहिए। अगर तुम सरकार के कानूनों और विनियमों का उल्लंघन करते हो, और तुम्हारे खिलाफ कोई शिकायत दर्ज होती है, तो इससे तुम्हारे कर्तव्य निभाने पर असर पड़ेगा। मैं लगातार इस बारे में कह रहा हूँ। हालाँकि यह बात अपेक्षाकृत साधारण लगती है, फिर भी यह बहुत व्यावहारिक है, क्योंकि तुम लोगों के पास बहुत कम जीवन अनुभव है और तुममें अंतर्दृष्टि की कमी है और तुमसे गलतियाँ होने की बहुत संभावना रहती है। तुम परमेश्वर में विश्वास करने वाले हो। विभिन्न देशों में जाकर अपना कर्तव्य करने का तुम्हारा मकसद परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलना और परमेश्वर के लिए गवाही देना है, न कि किसी देश या किसी सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ होना। तुम बस वे सृजित प्राणी हो जो अपने कर्तव्य करते हैं; तुम्हें पूरी तरह से सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के प्रति समर्पण करना चाहिए और परमेश्वर जैसे भी चीजें आयोजित और व्यवस्थित करता है, तुम्हें उसके प्रति समर्पण करना चाहिए। तुम चाहे किसी भी देश में जाओ, किसी भी तरह के परिवेश में रहो या जो भाई-बहनें भी तुम्हें अपने घरों में ठहराएँ, तुम्हें नियमों का पालन करने वाला होना चाहिए और जितनी हो सके मदद करनी चाहिए। इसके अलावा, उस देश के जो भी कानून और विनियम हों, तुम्हें उनका पालन करना होगा। मैं तुम लोगों को बार-बार नसीहत करता हूँ कि नियमों को मत तोड़ो और अपने खिलाफ शिकायतें दर्ज मत करवाओ। अगर तुम्हारे खिलाफ कोई शिकायत दर्ज होती है, तो तुम्हें पता लगाना चाहिए कि तुमने क्या गलती की, किस विनियम का उल्लंघन किया और शिकायत क्यों दर्ज की गई। इससे सबक सीखो, ताकि दोबारा ऐसा न हो। अगर तुम सबक नहीं सीखोगे, तो तुम्हारे खिलाफ शिकायतें दर्ज होती रहेंगी। इस मामले में मेरे वचन वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित समस्याओं के समाधान हैं—मैं तुम्हें बता रहा हूँ कि कैसे जीना है, कैसे जीवित रहना है और कैसे नियमों का पालन करना है, ताकि तुम अपने जीवन और अस्तित्व के लिए बेवजह मुसीबत पैदा न करो। तुम चाहे किसी भी देश में जाओ, तुम वहाँ अपना कर्तव्य करने के लिए जाते हो। पहले, तुम्हें उस देश में एकीकृत होना होगा और उसके कानूनों और विनियमों का पालन करना होगा। तुम्हें वहाँ की मौजूदा व्यवस्था में कोई गड़बड़ी नहीं करनी है और न ही उनके लिए कोई परेशानी खड़ी करनी है। तभी वे तुम्हें स्वीकार करेंगे और देश का सदस्य मानेंगे, और सिर्फ इसी तरह से तुम अपना कर्तव्य करने के लिए वहाँ बस पाओगे। अगर तुम स्थानीय नियमों तक का पालन नहीं करते और ऐसी चीजें करते हो जिनसे नियमों का उल्लंघन होता है, जिसकी वजह से लोग लगातार शिकायतें करते हैं और तुम्हारे लिए मुसीबतें खड़ी करते हैं, यहाँ तक कि वे तुमसे बेहद घृणा करने लगते हैं और नहीं चाहते कि तुम वहाँ और रहो, तो तुम अपना कर्तव्य करने का सपना तक कैसे देख सकते हो? तुम चाहे कहीं भी रहो, तुम्हें स्थानीय कानूनों और विनियमों का पालन करना होगा। मुझे बताओ, क्या इस तरह से अभ्यास करना सही है? क्या इससे तुम लोगों को अपना कर्तव्य करने में फायदा होता है? (हाँ।) इस तरह से अभ्यास करना बहुत व्यावहारिक है। वास्तविक जीवन में कानूनों और विनियमों का पालन करना सामान्य समझ की बात है। यह बात का बतंगड़ बनाना नहीं है, यह जरूरत से ज्यादा संवेदनशील होना तो बिल्कुल नहीं है; यह वह सिद्धांत है, जिसका पालन तुम्हें वास्तविक जीवन में करना ही चाहिए। अगर कुछ घटित होता है या कोई समस्या आती है, तो हम उसका समाधान करने और उससे सबक सीखने के सबसे अच्छे तरीके के बारे में चर्चा करते हैं, ताकि तुम भविष्य में कम गलतियाँ करने या बिल्कुल भी गलतियाँ न करने की कोशिश कर सको और नियमों का पालन करने वाले और कर्तव्य-निष्ठ व्यक्ति बन सको। कुछ लोग जहाँ भी जाते हैं, नियमों का पालन नहीं करते। वे हर जगह कचरा फैलाते हैं और समय-समय पर शोर-शराबा करते हैं और अपने पड़ोसियों की शांति भंग करते हैं। गाँव में घुस आए जंगली जानवरों की तरह वे सामुदायिक परिवेश को प्रभावित और बाधित करते हैं, वे जहाँ भी जाते हैं, लोगों का तिरस्कार और विरोध आकर्षित करते हैं। मैं इन लोगों से कहता हूँ कि उन्हें स्थानीय कानूनों और विनियमों का सख्ती से पालन और नियमों का अनुसरण करना चाहिए, और केवल इसी तरह आचरण करने पर ही व्यक्ति में सामान्य मानवता होती है। मुझे बताओ, क्या इन मामलों से निपटने में मेरी सोच और मेरा प्रस्थान-बिंदु सही है? (हाँ।) मैं बहुत ऊँची और बड़ी या अमूर्त या लोकातीत या अपरंपरागत चीजें नहीं करता। मैं बस लोगों के जीवन की इन छोटी-मोटी बातों और उनके जीवन में होने वाली गलतियों एवं कमियों के बारे में सुधार और निर्देशन करता हूँ, उनकी समस्याएँ बताता और उन्हें ठीक करता हूँ और उन्हें सुझाव देता हूँ। क्या देहधारी परमेश्वर द्वारा इस तरह का आचरण करना व्यावहारिक है? (हाँ।) यह बहुत व्यावहारिक है! इन मामलों से निपटना बिल्कुल भी खोखला नहीं है और यह वास्तविक जीवन से बिल्कुल भी अलग नहीं है। इसलिए, चाहे देहधारी परमेश्वर के दैनिक जीवन में दिखने वाले उसके स्व-आचरण और काम करने के उसूलों और सिद्धांतों को देखें या उसके द्वारा अपनी सेवकाई में जिन सत्यों पर संगति की जाती है उन्हें देखें, दोनों ही पहलू बहुत सामान्य और व्यावहारिक हैं। दोनों ही पहलू ऐसी चीजें हैं जिन्हें सामान्य सोच वाले लोग, जो सकारात्मक चीजों को पसंद करते हैं और जिनमें जमीर और विवेक है, समझ सकते हैं, बूझ सकते हैं, स्वीकार कर सकते हैं और हासिल कर सकते हैं। कोई भी पहलू वास्तविक जीवन से बिल्कुल भी अलग नहीं है; यही सामान्य और व्यावहारिक होना है।
क्या जीवन की इन छोटी-छोटी बातों में, जिनका मैंने अभी उल्लेख किया, स्व-आचरण और काम करने के तरीके से जुड़े सिद्धांत शामिल हैं? क्या ये तुम लोगों के लिए मददगार हैं? (हाँ।) तो चलो आगे बढ़ते हैं। एक बार, हमारे अहाते के लॉन की छिड़काव-प्रणाली का पानी का पाइप कहीं से टूट गया और रिसता हुआ पानी पड़ोसी के अहाते में चला गया। मैंने जल्दी से किसी को पड़ोसी को बताने और यह देखने के लिए भेजा कि क्या हमें उनके यहाँ सफाई करने की जरूरत है। पड़ोसी इतना सारा पानी भरते देखकर थोड़ा नाराज था, लेकिन चूँकि हमने खुद पहल करके उसे बताया था, इसलिए उसने विनम्रता दिखाते हुए मामले को ज्यादा तूल नहीं दिया। बाद में, क्रिसमस पर हमने क्षमा-याचना के तौर पर उसे चॉकलेट का एक डिब्बा दिया। वह काफी हैरान और खुश हुआ और उसने हमसे कहा कि अगर हमें किसी मदद की जरूरत हो, तो बस कह दें या बेझिझक उनके दरवाजे पर आकर बता दें। शाम तक वह अपने बच्चे को लेकर हमें फलों की एक टोकरी देने भी आया और बोला, "छुट्टियों की शुभकामनाएँ! आप लोगों के उपहार के लिए धन्यवाद और हमारे समुदाय में आपका स्वागत है!" हमने थोड़ी हँसी-दिल्लगी की और फिर वह चला गया। मुझे लगा कि मामले को इस तरह से सँभालना काफी अच्छा रहा; अगर हम अपने पड़ोसियों के साथ इस तरह से मिल-जुलकर रहें, तो रिश्ते बहुत खराब नहीं होंगे। यह कोई समस्या पैदा होने पर रिश्ता सहज बनाने या चीजें ठीक करने के लिए दूसरे पक्ष को क्षमा-याचना के तौर पर उपहार देना है, उपहारों का सरल आदान-प्रदान करना है। बेशक, वह तुम्हारा उपहार मुफ्त में नहीं लेता, तुम्हारा फायदा नहीं उठाता; वह बदले में कुछ देता है। देखो, पश्चिमी लोग काफी खास होते हैं। जब वे उपहार देते हैं, तो वे बहुत सच्चे होते हैं। यह मायने नहीं रखता कि उपहार महँगे हैं या नहीं; अहम बात यह है कि उनका दिल बहुत सच्चा होता है। यह उपहारों का आदान-प्रदान है और मामले को इस तरह से सँभालना बहुत सही है। बेशक, इस तरह के मामले को सँभालने का एक संदर्भ होता है। जब कुछ न हो रहा हो, तो बेवजह किसी से बहुत ज्यादा घुलने-मिलने, उसके लिए चीनी खाना बनाने या उसे उपहार देने की पहल करने, उसके साथ रिश्ता बनाए रखने के लिए हद से ज्यादा कोशिश करने की जरूरत नहीं है। ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं है। सामान्य मेलजोल में, बस उसके मिलने पर नमस्ते करना और मिल-जुलकर रहना ही काफी है। लेकिन जब कोई समस्या आए—उदाहरण के लिए, अगर तुम कुछ गलत कर दो और तुम्हें माफी माँगने की जरूरत हो—तो जाकर माफी माँग लो। तुम ऐसा सामान्य मानवता की तर्क-बुद्धि के कारण करते हो; यह अतिरंजित या आडंबरपूर्ण बिल्कुल नहीं है। मुझे बताओ, क्या इसे इस तरह से सँभालना सही है? क्या यह सिद्धांतों के अनुसार है? (हाँ।) यह न तो चापलूस होना है, न ही यह अहंकारी या दबंग होना है। तुम खुद को दूसरों से बेहतर नहीं दिखाते, लेकिन अपनी गरिमा भी बनाए रखते हो। कुछ लोग सोचते हैं, "पश्चिमी लोगों को चीनी खाना पसंद है। अगर भविष्य में हम कोई नियम तोड़ते हैं तो उन्हें हमारे खिलाफ शिकायत करने से रोकने के लिए, चलो उनके लिए कुछ पकौड़े बना दें और उन्हें कुछ हलका नाश्ता दे दें।" बेवजह खुशामद करना—मुझे बताओ, क्या यह सही है? (नहीं।) एक तो, यह पक्का नहीं है कि तुम्हारे बनाए खाने का स्वाद ऐसा हो जैसे वह किसी प्रामाणिक रेस्तराँ से आया हो और दूसरा पक्ष उसे खाना भी चाहेगा या नहीं। इसके अलावा, वह तुम्हें अच्छी तरह से जानता भी नहीं है। अगर तुम उसे अपना बनाया खाना दोगे, तो क्या वह तुम पर भरोसा करेगा? दूसरी बात, जब खास तौर से कुछ नहीं हुआ है, तो तुम उसे उपहार किसलिए दे रहे हो? क्या वह तुम्हें अच्छी तरह से जानता है? क्या तुम्हारा उससे कोई लेन-देन है, या दोस्ती? नहीं है, तो क्या हमेशा उसे चीनी खाना देने की कोशिश करना किसी पागल व्यक्ति के काम जैसा नहीं होगा? (हाँ।) क्या लोगों को यह कष्टप्रद नहीं लगेगा? (हाँ।) पड़ोसियों के साथ मेलजोल करने के मेरे सिद्धांत देखो। क्या मेरी सोच सामान्य है? क्या मैं सिद्धांतों को सही ढंग और उचित तरीके से लागू करता हूँ? (हाँ।) क्या मुझमें विकृत सोच के तर्क की अभिव्यक्तियाँ दिखती हैं? (नहीं।) लोगों के साथ मेरे समस्त मेलजोल सामान्य होते हैं। सामान्य परिस्थितियों में मैं लोगों को कभी उपहार नहीं देता। अगर कोई सच में मेरी मदद करता है, तो मैं अपना आभार व्यक्त करने के लिए उसे कुछ दूँगा। लोगों के साथ इस तरह मेलजोल करना सही है। यह सामान्य और व्यावहारिक होना है, और यह नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करना भी है। ज्यादातर लोग इन सिद्धांतों को नहीं समझते; इसे मूर्ख और अज्ञानी होना कहा जाता है। क्या तुम लोग सहमत नहीं हो? (हाँ।) कुछ लोग अपने काम करने के तरीके में अपनी मूर्खता दिखाते हैं। वे हमेशा लोगों को बेवजह उपहार देते रहते हैं और उनकी खुशामद करते रहते हैं, और जब लोग यह देखते हैं, तो उन्हें लगता है कि उनमें कुछ तो गड़बड़ है। मैं ऐसा नहीं करता। मैं लोगों के साथ ज्यादा घुलता-मिलता नहीं हूँ। मेरी अपनी गरिमा है और काम करने के मेरे अपने सिद्धांत हैं। जब सच में कोई समस्या सामने आती है, तो मैं सिद्धांतों के अनुसार काम करता हूँ। मैं नियमों का पालन करता हूँ, मेरी अपनी एक सीमा है और मेरे सोचने का तरीका तार्किक, सामान्य सोच के अनुरूप और तर्क-बुद्धि के अनुरूप होता है। देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता के इस पहलू से जुड़ी बहुत सारी बातें हैं, लेकिन अनेक बातों पर विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है। संक्षेप में, इस संबंध में उसकी सोच निश्चित रूप से सामान्य है।
लोगों से मेलजोल करते समय मैं कभी अपना परिचय नहीं देता; यहाँ तक कि भाई-बहनों से मिलने पर भी मैं कभी अपना परिचय नहीं देता। लोगों के साथ मेलजोल में मैं कभी भी देहधारी परमेश्वर होने का दिखावा नहीं करता। क्या तुम्हें ये नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करने की सामान्य और व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ लगती हैं? (हाँ।) उदाहरण के लिए, कुछ भाई-बहन कहते हैं, "तुम परमेश्वर हो, तुम सृष्टिकर्ता हो। तुम्हारे लिए चीजें करना किसी के लिए भी सम्मान की बात है। अगर वह उन्हें ठीक से नहीं करता, तो यह मौत से प्रणय-निवेदन करना है!" जब मैं ऐसे लोगों से मिलता हूँ, तब कहता हूँ, "मुझसे दूर रहो! ऐसी बातें कहने का क्या फायदा? भले ही भाई-बहन मेरे लिए कुछ करें, मैं उनसे ऐसी माँगें नहीं करता।" मैं चाहे किसी से भी मेलजोल करूँ, मैं कभी उसे अपनी पहचान नहीं बताता। मुझे बताओ, क्या यह सामान्य सोच और सामान्य मानवता की अभिव्यक्ति है? (हाँ।) देखो, एक पागल व्यक्ति हमेशा अपना परिचय देते हुए कहेगा, "मैं जेड सम्राट हूँ! मैं पृथ्वी पर उतरी पश्चिम की रानी माँ हूँ! मैं स्वर्ग से आया हूँ। अगर तुम छोटे-मोटे सेवक लोग मेरी बात नहीं मानोगे, तो मैं तुम सभी लोगों का सफाया कर दूँगा!" ऐसा व्यक्ति क्या होगा? (एक शैतान और दानव।) वह एक शैतान और दानव होगा। इंसानी भाषा में, उसे मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति कहा जाएगा, ऐसा व्यक्ति जिसमें सामान्य तर्क-बुद्धि नहीं है। क्या कोई ऐसा व्यक्ति, जिसमें सामान्य तर्क-बुद्धि नहीं है, नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करेगा? (नहीं।) तुम नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम तभी कर सकते हो, जब तुममें कम से कम एक इष्टतम जमीर और मानक तर्क-बुद्धि हो। चूँकि देहधारी परमेश्वर में सामान्य मानवता है, इसलिए उसका आचरण और क्रियाकलाप सामान्य मानवता के जमीर और विवेक से नियंत्रित होते हैं और वह स्वाभाविक रूप से ऐसी सामान्य मानवता के भीतर रहता है जिसमें जमीर और तर्क-बुद्धि होती है; इसलिए, आचरण और काम करने में वह नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करने के सिद्धांतों का सख्ती से पालन करता है। अगर कुछ अविश्वासी मेरे किसी व्यक्तिगत मामले में गड़बड़ करते हैं या जानबूझकर मुझे धोखा देते हैं या जानबूझकर चीजों को नुकसान पहुँचाते हैं, तो मैं इससे सबक लेता हूँ और उनका दोबारा कभी उपयोग नहीं करता। जहाँ तक अविश्वासियों की बात है, उनकी बातें चाहे कितनी भी अच्छी क्यों न लगें, मुझे सावधान रहना होगा; अगर मैं सावधान नहीं रहा, तो मैं उनकी चालों में फँस जाऊँगा। इस दुनिया में बहुत सारे धोखेबाज हैं। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कौन हो; अगर वे तुम्हें धोखा दे सकते हैं, तो वे देंगे। आध्यात्मिक क्षेत्र में शैतान और दानव स्पष्ट रूप से देखते हैं कि सभी चीजों पर परमेश्वर की संप्रभुता है, और वे परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और परमेश्वर का सार देखते हैं, लेकिन वे कभी परमेश्वर का आदर नहीं करते, परमेश्वर का भय नहीं मानते या परमेश्वर की पहचान और सार स्वीकार नहीं करते। अब जबकि परमेश्वर देहधारी हुआ है, तो मुझे बताओ, शैतान द्वारा भ्रष्ट की गई मानवजाति में से कौन परमेश्वर को स्वीकार कर सकता है और उसके प्रति समर्पित हो सकता है? यहाँ तक कि जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे भी उसे पूरी तरह से स्वीकार नहीं करते, उसके प्रति समर्पित होने की तो बात ही छोड़ दो। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर के सामने झुकेंगे और उसकी आराधना करेंगे—वे स्वर्ग के सामने घुटने टेकने, क्रूस के सामने घुटने टेकने, यहोवा के नाम के सामने घुटने टेकने या प्रभु यीशु की तसवीर के सामने घुटने टेकने में तो सहज महसूस करते हैं, लेकिन वे अपने दिलों में मेरे, इस व्यक्ति के सामने घुटने टेकने के लिए तैयार नहीं हो पाते : "क्या यह तुम ही हो जिसमें मैं विश्वास करता हूँ? तुम तो परमेश्वर जैसे नहीं दिखते! अगर मैं तुम्हारे सामने घुटने टेकूँ, तो क्या मैं खुद को नीचा नहीं दिखाऊँगा? मैं स्वर्ग, पृथ्वी और अपने माता-पिता के सामने घुटने टेक सकता हूँ—लेकिन तुम जैसे मामूली इंसान के सामने कैसे घुटने टेक सकता सकता हूँ? खासकर इसलिए कि तुम एक महिला हो, तुम्हारा रूप-रंग साधारण है, तुम मशहूर नहीं हो और दुनिया में तुम्हारा कोई रुतबा या प्रतिष्ठा नहीं है—मैं तुम्हारे सामने घुटने क्यों टेकूँ?" वे अंदर से असहज महसूस करते हैं। जब वे घुटने टेकना चाहते हैं, तब वे हिचकिचाते हैं और घुटने टेकने से पहले ही वे फिर से खड़े हो जाते हैं, अनिच्छुक और अनुत्सुक। मैं कहता हूँ, "मेरे सामने घुटने मत टेको। अगर तुम घुटने टेकना ही चाहते हो, तो स्वर्गिक परमेश्वर के सामने टेको। मैं नहीं चाहता कि तुम मेरे सामने घुटने टेको; मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता। मुझमें इतनी बड़ी शक्ति नहीं है कि मैं तुम्हें हवा में ऊपर उठा सकूँ और तीसरे स्वर्ग तक ले जा सकूँ। मैं बस एक साधारण व्यक्ति हूँ। मैं तुम्हें, भ्रष्ट मानव को, परमेश्वर के सामने लाता हूँ। फिर मैं तुम्हें तुम्हारे अभ्यास के लिए वे सत्य बताता हूँ जिन्हें मैं जानता और समझता हूँ, ताकि तुम उद्धार पा सको; तुम्हें पूरी तरह से एक मानक सृजित प्राणी में बदलता हूँ और फिर तुम्हें सृष्टिकर्ता के पास वापस ले जाता हूँ—यह मेरी जिम्मेदारी और मेरी सेवकाई है। जहाँ तक तुम लोगों का सवाल है, मेरे लिए तुम लोगों का यही एकमात्र उपयोग है। मैंने तुम्हारे लिए कोई श्रेय मिलने लायक काम नहीं किया है, न ही मैंने स्वर्गिक परमेश्वर के लिए ऐसा किया है। मैं बस एक साधारण व्यक्ति हूँ जिसने वे चीजें की हैं जो मुझे करनी चाहिए थीं, वे बातें कहीं जो मुझे कहनी चाहिए थीं और वह कार्य किया है जो मुझे करना चाहिए था। चाहे तुम अपने दिल में इसके लिए तैयार हो या नहीं, अपनी मानवता के परिप्रेक्ष्य से मैं तुम्हारे घुटने टेकने और आराधना करने को स्वीकार करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हूँ। यही नहीं, तुम अपने दिल में इसके लिए अनिच्छुक और प्रतिरोधी हो, इसलिए मैं इसे बिल्कुल भी स्वीकार नहीं कर सकता।" देखो, क्या मेरी सोच सामान्य है? चाहे यह मानवता के किसी भी पहलू से आती हो, है यह सामान्य सोच की ही अभिव्यक्ति। चूँकि देहधारी परमेश्वर सामान्य मानवता में रहता है और वास्तविक जीवन में एक साधारण व्यक्ति की तरह जीता है और असाधारण नहीं है, इसलिए वह विभिन्न मामलों को कैसे लेता और सँभालता है, यह काफी हद तक उसकी मानवता के जमीर और विवेक से नियंत्रित होता है। इससे कई लोग धारणाएँ विकसित कर लेते हैं; वे सोचते हैं, "क्या वह बस एक साधारण, सामान्य व्यक्ति नहीं है?" अगर लोग देहधारण को मान भी लें और परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर भी लें, तो भी अपने दिल में वे इस व्यक्ति के सामने घुटने टेकना और इसकी आराधना करना या इसके प्रति समर्पण करना नहीं चाहते। वास्तव में, अपने दिल से कहूँ तो, मैं तुम्हारा घुटने टेकना और तुम्हारी आराधना स्वीकार नहीं करना चाहता, क्योंकि मुझमें गरिमा और तर्क-बुद्धि है। जब तुम हिचकिचाते हो तो कोई बात नहीं, अगर तुम मेरे सामने घुटने टेकने और मेरी आराधना करने के लिए तैयार भी होते, तो भी मैं इसे स्वीकार करने के लिए तैयार न होता। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि इस देहधारी परमेश्वर की मानवता के जमीर और विवेक के भीतर शर्म का बोध भी है। शर्म का बोध होने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि अगर कोई कहे, "मैं इस व्यक्ति के सामने घुटने टेकने और आराधना करने में हिचकिचाता हूँ; मैं अंदर से थोड़ा अनिच्छुक हूँ"; या अगर कोई भ्रम की अवस्था में जी रहा हो; या अगर कोई परमेश्वर के बारे में कल्पनाओं से भरा हुआ घुटने टेककर आराधना कर रहा हो, तो मैं कहूँगा कि इस तरह घुटने टेकना और आराधना करना सब गलत है। मुझे ऐसे रीति-रिवाजों की जरूरत नहीं है; तुम्हें ऐसे रीति-रिवाजों में बिल्कुल भी शामिल नहीं होना चाहिए। अगर तुम मेरे सामने घुटने टेकते भी, तो मुझे इसे स्वीकार करने में शर्म आती। अगर तुम मेरे सामने घुटने टेकने पर जोर देते हो, तो क्या मुझे कहना चाहिए, "तुम्हारा भला हो" या "धन्यवाद"? मुझे सच में पता नहीं होता कि मैं क्या कहूँ। क्यों? तुम अभी विभिन्न पहलुओं में अपनी स्थिति को लेकर ही स्पष्ट नहीं हो, फिर भी तुम मेरे सामने घुटने टेकने और मेरी आराधना करने की कोशिश करते हो; मैं वाकई इसे स्वीकार नहीं कर सकता। मैं नहीं जानता कि तुम सच में परमेश्वर की आराधना कर रहे हो या नहीं। अगर मैं तुम्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में स्वीकार करने की कोशिश करूँ जो परमेश्वर का भय मानता है और बुराई से दूर रहता है, तो तुम सच में उस कसौटी पर खरे नहीं उतरोगे। तो इस मामले में चीजें यहीं पर अटक जाती हैं—यह बहुत शर्मनाक है। मुझे अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि मैं तुम्हें किस रूप में स्वीकार करूँ या तुमसे क्या कहना सही होगा, इसलिए मैं अंदर से इस मामले का बहुत प्रतिरोधी हूँ। तुम सभी लोगों को बिल्कुल भी मेरे सामने घुटने नहीं टेकने चाहिए और मेरी आराधना नहीं करनी चाहिए। मुझे इसकी जरूरत नहीं है और मैं इसे पसंद नहीं करता। अगर तुम लोगों को सत्य का कोई पहलू समझना हो या स्व-आचरण और काम करने के सिद्धांतों के किसी पहलू की आवश्यकता हो, तो मैं उन पर संगति कर सकता हूँ। लेकिन अगर तुम लोग इस औपचारिकता में पड़ना चाहते हो, तो मैं तुम लोगों को सलाह देता हूँ कि ऐसा मत करो, कम से कम अभी नहीं। जब तक तुम्हारे दिलों में परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण न हो और जब तक तुम परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर न चल पड़ो, तब तक ऐसा मत करो; इस औपचारिकता में मत पड़ो। ऐसा करना अच्छा नहीं होगा; इससे हम दोनों के लिए चीजें बेढंगी हो जाएगी। सबसे अच्छा यह है कि ऐसा करने से बचो; ऐसे कर्मकांड में पड़ना बेकार है।
देहधारी परमेश्वर के बारे में लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं के विषय पर संगति करने में, मैंने देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता से जुड़े कई उदाहरण दिए। इन उदाहरणों में तुम लोग देख सकते हो कि देहधारी परमेश्वर असाधारण, सर्वोत्कृष्ट, अलौकिक या गैर-परंपरागत नहीं है। ये और ऐसी अन्य चीजें वे चीजें हैं जो लोगों को देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता, और उसकी विनम्रता और प्रच्छन्नता के बारे में समझनी चाहिए। उसका जीने का तरीका और स्व-आचरण के उसके उसूल और सिद्धांत, सब बहुत व्यावहारिक और बहुत सामान्य हैं; और जब वह चीजों का सामना करता है, तब वह धैर्यवान और सहनशील भी हो सकता है। देहधारी परमेश्वर चाहे जो भी करे, वह अपने जीवन में जो कुछ भी जीता और प्रकट करता है, वह यह दर्शाता है कि परमेश्वर का देहधारी शरीर कैसे आचरण करता है, इसका एक व्यावहारिक पक्ष है। यानी, वह विभिन्न चीजों का सामना कैसे करता है और विभिन्न समस्याओं से कैसे निपटता है, यह पूरी तरह से स्व-आचरण के उसके उसूलों और सिद्धांतों पर आधारित है, जो नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करना हैं। कुछ साल पहले, हमारे पड़ोसी का बच्चा कॉलेज जा रहा था, और उन्होंने जश्न मनाने के लिए घर के अहाते में एक पार्टी रखी थी, नाचने-गाने की। वे रात के एक-दो बजे तक भी माइक्रोफोन पर गा रहे थे और आस-पास के बहुत सारे पड़ोसी इसे साफ-साफ सुन सकते थे। पश्चिमी लोग शिकायतें दर्ज करवाना पसंद करते हैं, लेकिन इस स्थिति में किसी ने शिकायत दर्ज नहीं करवाई, क्योंकि हम सब उस समय कई सालों से पड़ोसी थे। सभी को लगा, "बच्चे इतने सालों से स्कूल में रहे हैं, उन्हें मनमर्जी करने का मौका शायद ही कभी मिलता है, इसलिए उन्हें ऊधम मचा लेने दो। कभी-कभार इस तरह परेशान किया जाना और एक रात ठीक से न सो पाना कोई बड़ी बात नहीं है; हम इसे बस देर रात तक जागने जैसा ही मान लेंगे।" क्या इस तरह से सोचना सामान्य है? क्या व्यक्ति में दूसरों के प्रति ऐसा धैर्य और सहनशीलता होनी चाहिए? (हाँ।) कुछ लोग कहते हैं, "तुम परमेश्वर हो, तुम शोर मचाने वाले भ्रष्ट इंसानों के प्रति धैर्य कैसे रख सकते हो? तुम्हें धैर्य नहीं रखना चाहिए; तुम्हारा आराम बहुत जरूरी है!" मैं कहता हूँ, "किसका आराम जरूरी नहीं है? हर किसी का आराम जरूरी है।" लेकिन बड़ों को कभी-कभी थोड़ी सहनशीलता रखनी चाहिए और थोड़ी समझदारी दिखानी चाहिए; खासकर बच्चों के प्रति हमें थोड़ी सहनशीलता दिखानी चाहिए। इसके अलावा, जब तुम इस दुनिया में रहते हो, तब कई चीजें तुम्हारी मर्जी के मुताबिक नहीं होतीं और बहुत बार तुम्हें बस धैर्य रखना पड़ता है। ये चीजें कुछ भी नहीं हैं; तुम्हें ऐसी चीजों का भी सामना करना पड़ता है जो इससे कहीं ज्यादा गंभीर होती हैं और जिनसे तुम्हें सचमुच नुकसान पहुँचता है। इस दुनिया में रहते हुए, जीवित रहने के दौरान, हर व्यक्ति ऐसी कई परिस्थितियों का सामना करता है जहाँ उसके पास कोई चुनाव नहीं होता। क्या ऐसी परिस्थितियों का सामना करते समय तुम सचमुच बस अटक जाओगे? क्या तुम आगे जीते नहीं रह पाओगे? सूरज अगले दिन फिर भी निकलेगा। जीवन चलते रहना चाहिए। किसी मामूली बात पर छोटी सोच रखने, उस पर अटके रहने और ऐसा व्यवहार करने की कोई जरूरत नहीं है मानो दुनिया खत्म हो रही हो। बखेड़ा खड़ा करने या राई का पहाड़ बनाने की कोई जरूरत नहीं है। ऐसी चीजों के लिए तुम्हें सहनशील और धैर्यवान होना चाहिए। जब किसी दिन तुम्हें ज्यादा अनुभव हो जाएगा, तब तुम अंतर्दृष्टि प्राप्त कर लोगे और जान जाओगे कि उनके साथ कैसे पेश आना है। मुझे बताओ, क्या इस तरह की सोच सामान्य है? (हाँ।) असामान्य सोच वाला व्यक्ति क्या सोचेगा? "ओ छोकरे, तू बड़ा हो गया है और पार्टी करने लगा है। ये अविश्वासी सचमुच दानव हैं! जानता है, मैं कौन हूँ? तूने मेरी नींद खराब की, इसलिए मैं तुझे पछताने पर मजबूर कर दूँगा। मैं तुझे शाप देता हूँ!" क्या ऐसे विचार सामान्य हैं? (नहीं।) ये विचार असामान्य हैं, इसलिए तुम्हें उस तरह से नहीं सोचना चाहिए। मैं खुद उस तरह से नहीं सोचूँगा। जब ये चीजें होती हैं, तब मैं धैर्य रख सकता हूँ और उनके साथ सही ढंग से पेश आ सकता हूँ; मैं इन चीजों के साथ एक वयस्क के विचारों और दृष्टिकोणों से पेश आ सकता और निपट सकता हूँ। बेशक, ये भी नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करने की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ हैं। कुछ लोग कहते हैं, "परमेश्वर की उदारता समुद्र और आकाश जितनी विशाल है, इसलिए ऐसे मामूली लोग परमेश्वर के लिए कुछ नहीं हैं। चाहे कितना भी शोर-शराबा हो, वह उसे नहीं सुनता; उसे कुछ महसूस नहीं होता। इसे ही ऊँचे स्तर पर होना कहते हैं, इसे ही अलग स्तर पर होना कहते हैं, इसे ही व्यापक सोच रखना कहते हैं।" क्या ऐसा ही है? (नहीं।) मैं सचमुच "व्यापक सोच" पर ध्यान केंद्रित नहीं करता। मुझे पक्का नहीं पता कि "व्यापक सोच" का क्या मतलब है, न ही मैं यह समझता हूँ कि "अलग स्तर पर होना" क्या होता है; और मैं उस "ऊँचे" स्तर पर भी नहीं हूँ। मैं बस इतना जानता हूँ कि सामान्य सोच और सामान्य तर्क-बुद्धि क्या होती है, मानवता और तर्क-बुद्धि के अनुरूप कार्य कैसे किया जाए, किन चीजों को धैर्यपूर्वक सहना चाहिए और किन चीजों को गंभीरता से लेना चाहिए, और लोगों के साथ मिलते-जुलते समय किन उसूलों और सिद्धांतों का सख्ती से पालन करना चाहिए, साथ ही, कुछ परिस्थितियों में इस तरह से कैसे सोचा जाए जो विरूपित, अतिवादी, अलौकिक या चरम न हो और बिना किसी एक तरफ झुके, सामान्य रूप से कैसे सोचा जाए। मैं ये चीजें जानता हूँ, लेकिन मैं यह कभी नहीं जान पाया कि "अलग स्तर पर होने," "व्यापक सोच रखने" और "अपने आचरण में विनम्र रहने" का क्या मतलब है। मैं बस नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करने के सिद्धांतों का पालन करता हूँ। क्या यह सरल नहीं है? (हाँ।) मैं चाहे कोई भी मामला सँभालूँ, अपने परिप्रेक्ष्य और रुख से, मैं हर मामले और हर व्यक्ति को सही, न्यायपूर्वक, उचित और तर्कसंगत ढंग से एक साधारण, सामान्य व्यक्ति के रूप में देखता हूँ; मैं जो कुछ भी करता हूँ, उसमें न्याय, निष्पक्षता, औचित्य और तर्क-बुद्धि हासिल करने की कोशिश करता हूँ, अतिवादी, खोखला या गैर-परंपरागत नहीं होता। इसके अलावा, मैं खुद को दूसरों से श्रेष्ठ नहीं समझता और मैं कभी किसी चीज को तीसरे स्वर्ग जैसी ऊँची या खोखली जगह से नहीं देखता। हालाँकि वास्तविक जीवन में मेरा कई चीजों को इस तरह सँभालना लोगों को बहुत साधारण लगता है, फिर भी ये कुछ ऐसे विचार और दृष्टिकोण और आचरण के तरीके हैं जो मानवजाति के एक सदस्य के तौर पर जीने और जीवित रहने के लिए व्यक्ति के पास होने जरूरी हैं। इस तरह जीना काफी जमीन से जुड़ाव महसूस कराने वाला होता है और थकाऊ नहीं होता, इसलिए बहुत सारे लोगों को लगता है कि मेरे साथ निभाना आसान है, उसमें तमाम तरह की अनावश्यक जटिलताएँ नहीं हैं। तुम लोगों को ये बातें बताने का मेरा उद्देश्य सिर्फ तुम लोगों को कुछ बातों की जानकारी देना नहीं है, बल्कि तुम लोगों को यह बताना है कि किसी से मिलते-जुलते समय या मामले सँभालते समय मेरे अपने सिद्धांत होते हैं—मैं कभी जबरदस्ती या धोखे से चीजें नहीं लेता, मैं कभी चिकनी-चुपड़ी बातें नहीं करता, लोगों से व्यवहार करते समय मैं कभी किसी का फायदा नहीं उठाना चाहता, और किसी मामले को सँभालने के लिए मैं कानून निश्चित रूप से नहीं तोड़ूँगा। संक्षेप में, मेरे स्व-आचरण के सिद्धांत हैं "नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करना, ताकि मैं अपने जमीर में शांत और काम करने में निष्पक्ष रहूँ, किसी को नुकसान न पहुँचाऊँ या धोखा न दूँ और दूसरे लोगों के हितों को नुकसान न पहुँचाऊँ। अगर मुझे किसी तरह का फायदा होता भी है, तो वह दूसरे लोगों के हितों को नुकसान पहुँचाने की नींव पर नहीं होगा; बल्कि मैं निष्पक्ष और न्यायसंगत होने की कोशिश करता हूँ। मैंने तुम लोगों को ये बातें बताई हैं और ये उदाहरण दिए हैं, और मैंने तुम लोगों को इस पहलू के सिद्धांतों और आचरण करने के तरीकों के बारे में भी सैद्धांतिक रूप से बताया है। मैं बस ऐसा ही व्यक्ति हूँ। अगर तुम लोग मेरे द्वारा बताई गई सामान्यता और व्यावहारिकता, और विनम्रता और प्रच्छन्नता का सत्यापन करने, और मैं वाकई "नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करने" के सिद्धांतों के अनुसार काम करता हूँ, इस बात का सत्यापन करने के लिए ज्यादा जानना चाहते हो, तो मैं तुम लोगों का स्वागत करता हूँ कि तुम हर जगह जाँच-पड़ताल कर लो और सबूत इकट्ठा कर लो, ताकि यह पता लगा सको कि मेरी बातें सच हैं या नहीं। संक्षेप में, तुम सभी लोगों को इन चीजों के बारे में स्पष्ट होना चाहिए। मूलतः ये सभी बातें देहधारी परमेश्वर के जीवन और अस्तित्व के बारे में हैं। ये ऐसी बातें हैं, जिन्हें तुम लोगों को समझना चाहिए और जिन्हें समझना तुम्हारे लिए जरूरी भी है।
देहधारी परमेश्वर न केवल अपने मानव जीवन में नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करने के उसूलों और सिद्धांतों का सख्ती से पालन करता है, बल्कि स्वयं द्वारा की जाने वाली सेवकाई में भी इन उसूलों और सिद्धांतों का सख्ती से पालन करता है। मैंने कई वर्षों तक काम किया और उपदेश दिया है और तुम लोग हमेशा वे वचन पढ़ते रहे हो जिन पर मैं संगति करता हूँ। विभिन्न विषयों के माध्यम से, तुम्हें विभिन्न मुद्दों के बारे में मेरे दृष्टिकोण, रुख और रवैये समझने में सक्षम होना चाहिए था। तुम लोग इसे सैद्धांतिक रूप से जानते हो, लेकिन क्या तुम लोग जानते हो कि मैं जो सेवकाई करता हूँ, उसमें मैं कैसे आचरण और काम करता हूँ? शायद तुममें से कुछ लोग केवल यह जानते हो कि मैंने क्या चीजें की हैं और यह जानते हो कि मैंने क्या अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित की हैं, लेकिन जब विशिष्ट मामलों की बात आती है, तो हो सकता है कि तुम लोग अभी तक यह न जानते हो कि मैं अपने दिल में क्या सोचता हूँ या मेरी योजनाएँ और इरादे क्या हैं। इसलिए, मैं एक संक्षिप्त परिचय दूँगा। जब मेरी सेवकाई करने की बात आती है, तो मूल रूप से, जो काम मैं कर सकता हूँ और मुझे करना चाहिए—और जिसमें मेरी सेवकाई शामिल है—उसमें मैं कोई कसर नहीं छोड़ता और किसी प्रतिबंध के अधीन नहीं होता। मैं तुम लोगों से कुछ नहीं माँगता, न ही श्रेय लेने का दावा करता हूँ। मैं बस सभी संभव तरीकों से यह स्पष्ट रूप से समझाने की कोशिश करता हूँ कि मैं क्या कर सकता हूँ, मैं क्या समझता हूँ और मैं क्या जानता हूँ। चीजें स्पष्ट रूप से समझाने के लिए, भले ही इसमें लंबा समय लगे या परेशानी हो, मैं चीजें स्पष्ट करने की पूरी कोशिश करता हूँ। मैं उस बिंदु तक पहुँचने का प्रयास करता हूँ, जहाँ मुझे अपने दिल में यह महसूस हो कि तुम लोग समझ गए हो और मैंने चीजें स्पष्ट रूप से समझा दी हैं, उस समय मैं बोलना बंद कर देता हूँ और विषय वहीं समाप्त हो जाता है। यदि मुझे लगता है कि मैंने बहुत कम कहा है और हो सकता है कि तुम लोग न समझे हो, तो मैं विस्तार से बताऊँगा, अधिक बोलूँगा, यहाँ तक कि उसे बार-बार कहूँगा, विषय को स्पष्ट रूप से समझाने का हर संभव तरीका आजमाऊँगा। मैं इस बात से नहीं डरता कि तुम लोग मुझ पर हँसोगे—मैं कुछ बुद्धिजीवियों के हँसने और यह कहने से नहीं डरता, "तुम बोलते समय वास्तव में बहुत लंबी-चौड़ी हाँकते हो!" मैं बस नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करने के सिद्धांतों के आधार पर अपनी जिम्मेदारी पूरी करता हूँ, जो बातें मैं कहना चाहता हूँ उन्हें स्पष्ट और सरल तरीके से समझाता हूँ। अगर लोग सत्य पर मेरी संगति की कुछ बातें समझ नहीं पाते और उन्हें सुनने के बाद भी अस्पष्ट महसूस करते हैं, तो मैं एक उदाहरण देकर और ज्यादा विशिष्ट रूप से बोलूँगा। हालाँकि इस तरह मुझे बहुत ज्यादा बोलना पड़ता है, जिससे मैं अंदर से खाली और मानसिक रूप से थका हुआ महसूस करता हूँ और मेरा मुँह सूख जाता है, फिर भी मुझे चीजें स्पष्ट रूप से समझाने के लिए हर संभव तरीका आजमाना होगा। अगर उस समय मेरे बोल चुकने के बाद भी तुम लोग नहीं समझते, तो मैं एक और सभा आयोजित करूँगा। और इसमें क्या होना अपरिहार्य है? एक और सभा आयोजित करना और तब तक बोलना जब तक मेरा मुँह न सूख जाए, इसमें यह होना अपरिहार्य है कि मैं बहुत थक जाऊँगा; इसमें यह होना अपरिहार्य है कि मुझे एक बार फिर से थकान झेलनी पड़ेगी। लेकिन मैं ढिलाई नहीं बरत सकता। सिर्फ इसलिए कि मैंने पिछली बार इस विषय पर बात की थी, मैं अगली बार थकान के डर से इस पर बात किए बिना नहीं रह सकता, चाहे तुम लोगों ने इसे समझा हो या नहीं। मुझे इस विषय को स्पष्ट रूप से समझाने के लिए हर तरीका आजमाना होगा। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि ये वचन सुनने के बाद तुम लोग सत्य समझ सकते हो, उसे स्वीकार कर सकते हो और उसका अभ्यास कर सकते हो या नहीं, तो यह तुम लोगों के व्यक्तिगत अनुसरण पर निर्भर करता है; मैं उस बारे में चिंता नहीं करता। लेकिन जिन विषयों पर मैं बात करना चाहता हूँ और जिन पर मैंने अभी तक बात नहीं की है, और जो जिम्मेदारियाँ मैंने अभी तक पूरी नहीं की हैं या जो दायित्व मैंने अभी तक नहीं निभाए हैं, मुझे निश्चित रूप से उन्हें पूरा करना होगा और यथासंभव उन्हें अच्छी तरह से सँभालना होगा, जब तक कि मैं अंदर से यह महसूस न करूँ, "अब यह स्पष्ट रूप से समझा दिया गया है। मैंने इस विषय में शामिल हर बात बता दी है। कम से कम, तुम लोग इसके बारे में जानते हो और इसे समझते हो।" तब मुझे अंदर से सुकून मिलता है। हो सकता है कि तुम लोगों के लिए कुछ और सभाएँ आयोजित करने से मैं इतना थक जाऊँ कि कई दिनों तक सो न पाऊँ, लेकिन अगली बार जब ऐसा होगा, तब भी मैं यही तरीका अपनाऊँगा। मैं यह कहते हुए ढिलाई नहीं बरतूँगा, "थकान से बचने के लिए मैं ज्यादा नहीं बोलूँगा और एक सभा कम आयोजित करूँगा। चलो इस विषय को यहीं खत्म करते हैं; वैसे भी ज्यादातर लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते।" मैं तुम लोगों के प्रति खानापूरी करने वाला नहीं बनूँगा, न ही अपनी सेवकाई के प्रति खानापूरी करने वाला बनूँगा। जब मैं ऐसा करता हूँ, तो मैं कभी यह नहीं कहता कि मुझे अपने जमीर के प्रति सही व्यवहार करना चाहिए या उन भाई-बहनों के प्रति सही व्यवहार करना चाहिए जो यहाँ बैठकर कई घंटों से मेरा उपदेश सुन रहे हैं। बल्कि, मैं स्वाभाविक रूप से और अपनी पूरी क्षमता से हर वह चीज तुम लोगों को बताता हूँ जो मुझे बतानी चाहिए, जो मैं करना चाहता हूँ और जो मैं कहना चाहता हूँ, ताकि तुम लोग उसे सुन सको और प्राप्त कर सको। मैं ढिलाई नहीं बरतता और खानापूरी नहीं करता। अगर मैं कोई चीज पहली बार में स्पष्ट रूप से नहीं समझाता, तो मैं उसे अलग-अलग तरीकों से दो-तीन बार दोहराता हूँ। अगर तुम लोगों के दिलों में मेरे बारे में कुछ मत भी हों या तुम यह भी कहो कि मैं बहुत लंबी-चौड़ी हाँकता हूँ, तो भी मुझे फर्क नहीं पड़ता। अगर मैं चीजें स्पष्ट रूप से समझा सकता हूँ और नतीजा हासिल कर सकता हूँ, तो यह काफी है। जब मैं बोलता हूँ, तो मैं इस सिद्धांत के आधार पर काम करता हूँ, "चीजें अच्छे से और पूरी तरह से करना, अपनी जिम्मेदारी निभाना और अपने मन की सारी बातें तुम लोगों को बता देना।" मैं ढिलाई नहीं बरतता या खानापूरी नहीं करता। अपनी सेवकाई पूरी करने में देहधारी परमेश्वर का यही रवैया होता है।
जहाँ तक उन चीजों की बात है जिनमें मेरी सेवकाई शामिल नहीं हैं, जैसे कि कभी-कभी तुम लोगों के कर्तव्यों के दायरे में आने वाले मामलों में तुम्हारा मार्गदर्शन करना, तो यह मेरी सेवकाई से बाहर है। हो सकता है तुम लोगों को इसका पता न हो। असल में, सत्य पर संगति करने और सत्य सिद्धांतों को समझने और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने में तुम लोगों का मार्गदर्शन करने के अलावा, किसी और चीज का मुझसे कोई लेना-देना नहीं है; यह मेरा काम नहीं है। मैं तुम लोगों को यह स्पष्ट बता दूँ। तुम लोगों के काम का मार्गदर्शन करना मेरी सेवकाई के दायरे में नहीं आता और उसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है। मैं यह काम करूँ या न करूँ, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; यह तुम इंसानों का काम है। यह पहली बार है जब मैंने इस बात का जिक्र किया है—तुम इंसानों का काम। यानी, तुम लोगों के काम, इंसानों के काम का मुझसे कोई लेना-देना नहीं है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? जो तुम लोग निभाते हो वह तुम्हारा कर्तव्य है और जो मैं करता हूँ वह मेरी सेवकाई है। मैं काम करता हूँ, जबकि तुम कर्तव्य निभाते हो; दोनों में अंतर है। तुम्हारे कर्तव्यों के दायरे में आने वाले मामलों में तुम लोगों का मार्गदर्शन करने के संबंध में, सत्य सिद्धांतों पर संगति करने के अलावा, अगर तुम लोग मुझसे पेशेवर कौशलों या सांसारिक कामों के बारे में पूछते हो, तो जो मैं समझता हूँ, जिसमें मेरी अंतर्दृष्टि है और जो सिद्धांत मैंने समझे हैं, उन्हें स्पष्ट रूप से व्यक्त करने की पूरी कोशिश करूँगा, ताकि तुम लोग उन्हें जान और समझ लो। मैं तुम लोगों को सिखाने और तुम लोगों के सीखने में मदद करने की पूरी कोशिश करूँगा। जिन चीजों के बारे में मुझे जानकारी नहीं है, उनके लिए मैं तुम लोगों से संसाधन खोजने के लिए कहूँगा, या अगर तुम लोगों में से कोई उसके बारे में जानता हो, तो मैं उससे परामर्श करूँगा, "तुमने इस पेशे की पढ़ाई की है, तो उद्योग की अध्ययन सामग्री इस मामले में क्या कहती है? ज्ञान के इस क्षेत्र में क्या नियम हैं? आओ यहाँ सिद्धांतों का पता लगाएँ, ताकि हमारा काम पेशेवरों की पसंद और उनकी भेद पहचानने वाली नजर के ज्यादा अनुकूल हो सके, जिससे हमारा उपहास न हो या हम हँसी के पात्र न बनें, ताकि हम उल्लू न बनें और परमेश्वर के घर को बुरा न दिखाएँ।" देखो, समवेत भजन, संगीत वीडियो, फिल्म निर्माण, पटकथा लेखन, कला और साथ ही नृत्य, वेशभूषा आदि जिन चीजों में मैं मार्गदर्शन देता हूँ—चाहे वह पेशेवर या गैर-पेशेवर काम का कोई भी पहलू हो, वह वो काम नहीं है जो मेरी सेवकाई के दायरे में आता हो। यह तुम लोगों का कर्तव्य है। इसे "तुम लोगों का कर्तव्य" कहने का मतलब है कि यह तुम लोगों का काम है और इसे तुम लोगों को खुद ही सँभालना चाहिए, क्योंकि इन मामलों में ज्ञान के कुछ क्षेत्र और कुछ उद्योगों से जुड़े तकनीकी और पेशेवर मुद्दे शामिल होते हैं, और ये ऐसी चीजें हैं जिनके बारे में तुम लोगों को सीखना होगा। तुम लोगों को जो पढ़ना चाहिए, वह तुम लोगों को पढ़ना है; तुम लोगों को जिसके बारे में पूछताछ करनी चाहिए, उसके बारे में तुम लोगों को पूछताछ करनी है और तुम लोगों को जिस चीज का अभ्यास करना चाहिए, उस चीज का अभ्यास तुम लोगों को करना है। असल में, इसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है। मैं जो काम करता हूँ, वह है वचन व्यक्त करने में परमेश्वर के देहधारी स्वरूप का प्रतिनिधित्व करना और तुम लोगों से बात करने और तुम लोगों पर काम करने में परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करना। जहाँ तक उस काम की बात है जिसका मेरी सेवकाई से कोई लेना-देना नहीं है, तो वह काम तुम इंसानों का है। इस काम के लिए, परमेश्वर ने तुम लोगों की अगुआई करने के लिए एक अगुआ और चरवाहा नियुक्त किया है, और उसने विभिन्न कार्य व्यवस्थाएँ और विभिन्न प्रशासनिक आदेश और विनियम भी स्थापित किए हैं। तुम लोगों को परमेश्वर द्वारा तुम लोगों के लिए स्थापित किए गए अगुआ—पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मनुष्य—की व्यवस्थाओं का सख्ती से पालन करना चाहिए और उसकी अगुआई के प्रति समर्पण करना चाहिए। और अपनी सेवकाई के दायरे से बाहर मैं जो भी कार्य करता हूँ, उसे क्या माना जाएगा? यह सब अतिरिक्त कार्य माना जाता है। मुझे कर्तव्य निभाने की जरूरत नहीं है। मैं कार्य और अपनी सेवकाई करता हूँ और तुम लोग अपना कर्तव्य निभाते हो। इसलिए, मैं तुम लोगों के काम का मार्गदर्शन तो कर सकता हूँ, लेकिन यह मेरी जिम्मेदारी नहीं है। अगर तुम सोचते हो, "तुम्हें यह काम करना ही होगा; यह तुम्हारा काम है। तम्हारे लिए इसे न करना ठीक कैसे हो सकता है? अगर तुम इसे नहीं करोगे, तो मैं इसकी जिम्मेदारी तुम पर डाल दूँगा और तुम्हें बख्शूँगा नहीं," तो मैं कहता हूँ कि तुम लोग गलत हो। तुम लोग इसकी जिम्मेदारी मुझ पर नहीं डाल सकते। यह तुम इंसानों का कर्तव्य है। जब तुम लोग अपने कर्तव्य के बारे में कोई चीज नहीं समझ पाते, तो तुम्हें आपस में संगति, चर्चा और खोज करनी चाहिए। अगर तुम मुझसे पूछते हो और उस समय मेरी स्थितियाँ अनुमति दें, तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ। अगर मेरे पास समय न हो और मैं तुम्हारी मदद न कर पाऊँ, तो इसमें मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं है। अगर तुममें से कुछ लोग गलत तर्क देकर कहते हैं कि यह काम मुझे करना चाहिए, तो तुम गलत हो। यह वह कर्तव्य है जो तुम लोगों को करना चाहिए और इसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है। अगर तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं करते, तो यह तुम्हारा गैर-जिम्मेदार और बेवफा होना है। अगर तुम अपना कर्तव्य पूरा नहीं करते और उसकी जिम्मेदारी मुझ पर डालने की कोशिश करते हो, तो यह विवेक न होने की अभिव्यक्ति है और परमेश्वर को यह बात बहुत बुरी लगती है। लेकिन अगर मुझे लगता है कि तुम लोग सच में कोई काम नहीं कर सकते, वह काम तुम्हारी पहुँच से बाहर है और तुम्हें उस काम को करने के सिद्धांत मालूम नहीं हैं, तो मुझे मदद करनी पड़ती है, तुम लोगों को एक-दो उदाहरण देने पड़ते हैं और तुम लोगों को सही रास्ते पर लाना पड़ता है। अगर तुम लोग फिर भी उसे नहीं कर पाते और मेरी स्थितियाँ मुझे ऐसा करने की अनुमति नहीं देतीं या मैं भी उसे नहीं कर पाता, तो हम बस इतना ही कर सकते हैं कि उस काम को रोक दें। हम बस इतना ही कर सकते हैं—तुम लोगों की क्षमताएँ इतनी सीमित होने और तुम लोगों की काबिलियत इतनी खराब होने का दोष किसे दिया जाए? लेकिन अगर मैं कोई काम करता हूँ, तो उसे जितना हो सके, सर्वोत्तम ढंग से करता हूँ। अगर मैं जानता हूँ कि कोई चीज कैसे करनी है, तो मैं उतना तुम्हें बता दूँगा और मैं तुम्हें यह भी बता दूँगा कि क्या करना मुझे नहीं आता। जिन हिस्सों के बारे में मैं नहीं जानता, उनके बारे में मैं तुम लोगों से परामर्श करूँगा। अगर तुम लोग भी नहीं जानते, तो मैं खुद चिंतन करूँगा, सोचूँगा और खोजूँगा। जब मुझे कोई मार्ग, कुछ विचार और अनुगमन के लिए कुछ सूत्र मिल जाएँगे, तब मैं तुम लोगों के साथ संगति करूँगा, इस काम को अच्छी तरह से और बखूबी करने का भरसक प्रयास करूँगा। एक तो, यह काम के प्रति जवाबदेह होना है। दूसरे, इससे मेरे मार्गदर्शन के दौरान तुम लोग कुछ सीख पाते हो। तुम पेशेवर काम के इस पहलू के लिए जरूरी वे सिद्धांत सीखते हो जिन्हें समझना जरूरी है और वे सत्य सीखते हो जिन्हें बूझना जरूरी है। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो थोड़ा पेशेवर ज्ञान होने के बावजूद कोई तैयार उत्पाद नहीं बना पाते, और इसलिए मैं उनका मार्गदर्शन करता हूँ। काम पूरा होने के बाद भी मैं उसके बारे में अनिश्चित महसूस करता हूँ, इसलिए मैं उनसे किसी उद्योग विशेषज्ञ से परामर्श करने और विशेषज्ञ से उसकी जाँच करवाने के लिए कहता हूँ। अगर विशेषज्ञ कहता है कि उसे इस तरह से करना उद्योग के मानकों के अनुरूप है और इससे हम हँसी के पात्र नहीं बनेंगे, तो हम कार्य के इसी तरीके पर कायम रहेंगे। अगर विशेषज्ञ कहता है कि यह किसी नौसिखिए का काम लगता है, यह शर्मनाक लगता है, सही नहीं है और मानकों के अनुरूप नहीं है, तो हम विशेषज्ञ से तुरंत उसमें कुछ बदलाव करवाएँगे। हम आत्मधर्मी नहीं हो सकते, हम कोई चीज समझने का दिखावा नहीं कर सकते जबकि हम उसे नहीं समझते, और हममें आत्म-जागरूकता होनी चाहिए। हमें खुद को धोखा नहीं देना चाहिए; हमें चीजें गंभीरता से लेनी चाहिए, काम पूरा करने के बाद पेशेवर कौशल के मामले में कुछ प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। इसलिए, इस तरह का काम करते समय, अगर मैं पेशेवर कौशलों के मामले में नौसिखिया भी हूँ और ज्यादा नहीं समझता, तो भी मैं अपना भरसक प्रयास करूँगा। कुछ लोग कहते हैं, "जब तुम खुद नहीं समझते, तब भी तुम उनका मार्गदर्शन क्यों करते हो?" ऐसा इसलिए है क्योंकि इन लोगों में सीमित पेशेवर कौशल हैं; जब पेशेवर कौशलों से जुड़े कलात्मक निर्माणों की बात आती है, तो उनमें वाकई कोई रचनात्मकता या अच्छे विचार नहीं होते। इस क्षेत्र में मेरी थोड़ी मजबूती है और मेरे पास कुछ विचार हैं, इसलिए मैं उन्हें इन लोगों को देता हूँ जिनमें किसी खास पेशे में थोड़ी-बहुत नींव या कुछ सामान्य समझ है, इन सभी लोगों को मेरे ये विचार काफी अच्छे लगते हैं। यह देखते हुए कि इन्हें मेरे सुझाव अच्छे लगते हैं, मैं आगे बढ़कर "ढिठाई से" उनका मार्गदर्शन करता हूँ और जिन कामों में मैं इस तरह से मार्गदर्शन करता हूँ, उनमें से कुछ काम ठीक-ठाक होते हैं। ऐसा कहने में मैं बेशर्म नहीं हो रहा हूँ; इस "ठीक-ठाक" का एक आधार है—मैं ऐसा सिर्फ इसलिए कहता हूँ क्योंकि उद्योग विशेषज्ञों ने उन्हें देखा है और कहा है कि वे ठीक-ठाक हैं। इस "ठीक-ठाक" का मतलब यह नहीं है कि वे बहुत अच्छे हैं या वे पेशेवर स्तर तक पहुँच गए हैं, बल्कि बस इतना है कि कम से कम, विशेषज्ञों ने यह सत्यापन किया है कि वे सही हैं, इसलिए मैं तसल्ली महसूस करता हूँ। अब तक, ज्यादातर लोगों को लगता है कि जिन कुछ कामों में मैंने मार्गदर्शन किया है, वे ठीक-ठाक हैं और स्पष्ट रूप से उनमें से कुछ ने तो कुछ प्रतिस्पर्धाओं में इनाम भी जीते हैं, है न? (हाँ।) चाहे मैं काम का कोई भी पहलू या किसी भी तरह का काम कर रहा हूँ, अगर मेरे पास कुछ विचार और सुझाव हैं या मुझे लगता है कि मेरे पास एक अच्छी रचनात्मक परिकल्पना है, तो मैं जरूर बोलूँगा। मैं हर तरह से कोशिश करूँगा कि भाई-बहन निर्माण में इन सुझावों को लागू करने में मदद करें, ताकि ज्यादा लोग इसे देखने के लिए तैयार हों। नतीजतन परमेश्वर का कार्य और परमेश्वर के वचनों का प्रसार ज्यादा, बेहतर और व्यापक रूप से होता है—इस तरह हमारा लक्ष्य हासिल हो जाता है। जहाँ तक मेरे काम करने के तौर-तरीकों की बात है, वे अभी भी नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करने के सिद्धांतों पर आधारित हैं। जब मैं काम करता हूँ, तब चुपचाप करता हूँ और काम पूरा करने और अच्छी तरह से करने की हर कोशिश करता हूँ। जब काम पूरा हो जाता है और अपलोड कर दिया जाता है, तो चरण पूरा हो जाता है।
देहधारी परमेश्वर अपनी सेवकाई के दायरे में जो भी काम करता है, वह नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करने के उसके सिद्धांतों पर आधारित होता है। इस दायरे से बाहर काम करते समय भी वह इसी तरह इन सिद्धांतों से अलग नहीं हटता; वह नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम भी करता है। जो समस्याएँ मैं देख सकता हूँ और जिनका मैं पता लगा सकता हूँ, उनके बारे में मैं या तो किसी से कहलवाता हूँ या फिर खुद शामिल होकर मार्गदर्शन देता और सुधार करता हूँ और उनका समाधान करने में मदद करता हूँ। संक्षेप में, अपनी वास्तविक जिंदगी में तुम लोग जिन चीजों के संपर्क में आ सकते हो या जिनके बारे में तुमने सुना है, चाहे वह जो कुछ भी हो, हर चीज मैं मूल रूप से इसी सिद्धांत के आधार पर सँभालता हूँ। इसके अलावा, मैं बड़े और छोटे मामलों में कोई फर्क नहीं करता। चाहे बिल्लियाँ पालना हो, कुत्ते पालना हो, सूअर-बाड़ा बनाना हो, भेड़ों का बाड़ा बनाना हो या खाना पकाना, कपड़े सिलना या यहाँ तक कि सफाई करना हो, मैं जो कुछ भी देखता हूँ उसी में लग जाता हूँ। जब मैं तुम लोगों को चीजें गलत करते हुए देखता हूँ, तब मैं तुम्हें निर्देश देता हूँ और सुधारता हूँ। जिनके पास दिल है वे इसे सुनेंगे और मानेंगे, जिनके पास नहीं है वे नहीं मानेंगे। बाद में, मैं देखता हूँ कि कौन सुनता और मेरे निर्देशों का पालन कर सकता है, और मैं उसका इस्तेमाल करता हूँ। तुम लोगों के साथ इतने वर्षों तक मेलजोल करने के दौरान, मैंने इसी तरह चीजें की हैं। तुम लोगों को यह बताने के बाद कि क्या करना है, मैं तब तक उसके बारे में जानकारी लेता रहता हूँ, जब तक कि मामला खत्म नहीं हो जाता और अच्छी तरह से नहीं कर लिया जाता। हालाँकि कई चीजें ऐसी हैं जिन्हें मैं अपने हाथों से नहीं करता, लेकिन मेरा दिल हमेशा उस काम पर केंद्रित रहता है जिस पर मैं नजर रख रहा होता हूँ; मेरा दिल कभी उन चीजों से नहीं हटता। अगर किसी चीज को तुरंत और तेजी से करने की जरूरत होती है, तो मैं उसे करने के लिए सुबह से शाम तक और देर रात तक काम करता हूँ, लगातार उस पर नजर रखता हूँ, उसका पर्यवेक्षण करता हूँ और निर्देश देता हूँ। लेकिन मेरी शारीरिक स्थिति को देखते हुए, जैसा कि तुम सोच सकते हो, यह काम करना काफी थकाऊ होता है। जब यह काम अंततः पूरा हो जाता है, तब मैं वहाँ जाना बंद कर देता हूँ। आखिरकार, कोई ध्यान देता है और कहता है, "परमेश्वर ने हमारे लिए यहाँ चीजें इतनी अच्छी तरह से व्यवस्थित की हैं, लेकिन वह इसका आनंद नहीं ले पाता; हम ही हैं जो इन सबका आनंद लेते हैं।" मैं कहता हूँ कि अगर तुम लोग इसका आनंद ले पाते हो, तो उतना ही काफी है। जब चीजें तुम लोगों के लिए ठीक हो जाती हैं और हर चीज तुम लोगों की जिंदगी और तुम्हारे कर्तव्य करने के लिहाज से उपयुक्त हो जाती है, तब मुझे इन चीजों में व्यस्त होने की जरूरत नहीं होती। असल में, देहधारी परमेश्वर का काम सत्य के बारे में संगति करना और सत्य प्रदान करना है; दुसरे काम से मेरा कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन इन सालों में, अपना काम करने के अलावा, मैं तुम लोगों के कर्तव्य करने में आने वाली समस्याएँ सुलझाने में तुम्हारी मदद करने में भी व्यस्त रहा हूँ, जिसके लिए मुझे काफी कड़ी मेहनत करनी पड़ी है। हालाँकि बहुत-से काम ऐसे हैं जो मेरे जिम्मे नहीं हैं और कई चीजें ऐसी हैं जो मैंने पहले कभी नहीं कीं—मैंने कभी कुछ खास तरह का ज्ञान या कुछ खास तरह के कौशल सुव्यवस्थित ढंग से नहीं सीखे या जीवन में ये चीजें नहीं सँभालीं—फिर भी जब कलीसिया और परमेश्वर के घर ने विभिन्न चीजों का सामना किया, तो मैं चुपचाप खड़ा नहीं रहा। इसके बजाय, मैं तुम सभी लोगों का मार्गदर्शन करने और तुम सभी लोगों की मदद करने की पूरी कोशिश करता हूँ, और जब रोजमर्रा की जिंदगी के मामलों की बात आती है, तो मैं तुम लोगों के लिए चीजें ठीक करने की भी हर संभव कोशिश करता हूँ। मानवता के परिप्रेक्ष्य से काम करते हुए, मैं जो कर सकता हूँ वह करता हूँ। अगर मैं कोई ऐसी चीज देखता हूँ जिसे करने की जरूरत होती है और मैं उसे नहीं करता, तो मुझे अंदर से बेचैनी महसूस होती है। अगर मुझे कोई समस्या पता चलती है और मैं उसे ठीक नहीं करता, तो मुझे अंदर से बेचैनी महसूस होती है। अगर कोई ऐसा काम होता है जिसे करने का तरीका कोई नहीं जानता और मेरे पास विचार होते हैं और मैं उसे कर सकता हूँ लेकिन नहीं करता, तो मुझे अंदर से बेचैनी महसूस होती है। इसलिए, मुझे बस कदम उठाना पड़ता है। इसलिए, बाहर से ऐसा लगता है कि बोलने और उपदेश देने के अलावा, मैंने और कुछ नहीं किया है। लेकिन मैंने तुम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और तुम लोगों के कर्तव्य निभाने के लिए जरूरी बुनियादी चीजों की खातिर कड़ी मेहनत की है। ज्यादातर लोगों की काबिलियत इतनी खराब है कि वे ये चीजें भी ठीक से नहीं कर पाते, इसलिए मुझे तुम लोगों का मार्गदर्शन करने के बारे में सोचना पड़ता है। हालाँकि मैं साधारण दिखता हूँ और कोई महत्वपूर्ण हस्ती नहीं हूँ, और मैंने समाज में किसी तरह का प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया है, फिर भी जब परमेश्वर के घर में कर्तव्य करने वाले कर्मियों की बुनियादी जरूरतों की बात आती है, तो जब मैं पहली बार तुम लोगों के संपर्क में आया था, तब से लेकर अब तक, तुम लोगों के बुनियादी जीवन परिवेश, रहन-सहन की स्थितियों और रोजमर्रा की जरूरतों का एक भी पहलू ऐसा नहीं है जिसमें मैंने कड़ी मेहनत न की हो। उदाहरण के लिए, खेत में सब्जियाँ उगाने को ही ले लो। शुरू में, यह देखते हुए कि खेत पर ज्यादातर लोग गाँवों से आए हैं और उन्होंने कुछ साल खेती का काम किया है, मैंने इस काम को सँभालने के लिए कुछ ऐसे लोगों को चुना जिन्हें खेती करनी आती थी। मैंने उन्हें बताया कि किस मौसम में कौन-सी सब्जियाँ उगानी हैं और कैसे उगानी हैं, और सोचा कि इसके बाद मुझे इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन कुछ समय बाद मैं खेत में गया और देखा कि सब कुछ पूरी तरह से गड़बड़ था। पर्यवेक्षक जिम्मेदारी नहीं सँभाल पाया और मजदूर भी ठीक से काम नहीं कर पाए। अंत में, मेरे पास खुद काम में लगने, काम पर नजर रखने और उन्हें थोड़ा-थोड़ा करके निर्देश देने के अलावा कोई चारा नहीं था। बीज चुनने और खरीदने से लेकर यह पता करने तक कि कितनी खेती करनी है और जमीन कैसे चुननी है, साथ ही हर मौसम में क्या उगाना है, कितना उगाना है, कैसे उगाना है, बुवाई की जिम्मेदारी किसकी होगी, खाद कैसे डालनी है और किन चीजों का ध्यान रखना है, मैंने उन्हें सब कुछ साफ-साफ समझाया। मैंने व्यक्तिगत रूप से उन्हें इस तरह निर्देशित किया; उनके लिए खाना पकाने और उन्हें खिलाने के अलावा, मैंने बाकी सब कुछ किया। कुछ लोग कहते हैं, "क्या तुम उनके साथ तीन साल के बच्चों जैसा बर्ताव नहीं कर रहे थे?" असल में वाकई ऐसा ही था। ये सभी लोग देखने में तो वयस्क थे, लेकिन असल में वे ये जिम्मेदारियाँ नहीं उठा सकते थे। मुझे बस उनका हाथ पकड़कर व्यक्तिगत रूप से उन्हें इस तरह से निर्देशित करना और सिखाना पड़ा था, तब जाकर चीजें ठीक होनी शुरू हुईं। बाद में, अपने कर्तव्य करने वाले लोग खुद उगाया गया अनाज और सब्जियाँ खाने में सक्षम हो गए। गर्मियों में वे कुछ फल भी खा सके और सर्दियों में वे जमा करके रखी गई सब्जियाँ खा सके। अगर ऊपरवाले ने दखल न दिया होता और इस काम पर नजर न रखी होती और उसे बस नीचे के लोगों को ही करने दिया होता, तो सब कुछ गड़बड़ हो गया होता। जो भी हो, मैं तुम लोगों को क्या तथ्य बता रहा हूँ? मैंने बहुत-सी चीजें बिना बताए की हैं, लेकिन जिन चीजों के बारे में मैं बताता हूँ, वे पक्के तौर पर वही हैं जो मैंने की हैं।
मैं इन चीजों पर संगति तुम लोगों को यह बताने के लिए नहीं करता कि मैंने कितनी चीजें की हैं, कितनी थकान झेली है या तुम लोगों की खातिर कितनी पीड़ा सही है। इन चीजों पर बात करने की कोई जरूरत नहीं है। तो मैं तुम लोगों को क्या बता रहा हूँ? देहधारी परमेश्वर इस इंसानी दुनिया में कार्य करने में परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने आता है। उसका कार्य उसके द्वारा की जाने वाली सेवकाई है। अंत के दिनों के इस चरण में उसका कार्य लोगों को वे सभी सत्य प्रदान करना है, जिनकी उन्हें उद्धार पाने के लिए आवश्यकता है। अपनी सेवकाई में वह नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करने के उसूलों और सिद्धांतों का सख्ती से पालन करता है। इसके अलावा, अपने मानवीय जीवन में और मानवता की अपनी अभिव्यक्तियों के संबंध में भी उसने इसी तरह इन सिद्धांतों और उसूलों का उल्लंघन नहीं किया है। चाहे तुम लोगों के कर्तव्य करने में मार्गदर्शन देना हो या जीवन की बुनियादी जरूरतों से जुड़े विभिन्न मामले सँभालने में तुम लोगों की मदद करनी हो, मैं नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करने के सिद्धांतों के अनुसार ही काम करता हूँ। मैं कभी नारे नहीं लगाता या आडंबरपूर्ण बातें नहीं करता, और मैं कभी आँख मूँदकर आदेश नहीं देता; मैं बस व्यावहारिक रूप से काम करता हूँ। मैं किस हद तक ऐसा करता हूँ? उदाहरण के लिए, खेत में बुवाई का निर्देशन करते समय मैंने उनसे उन सभी सब्जियों की किस्मों की सूची बनवाई जिनके बारे में वे जानते थे, उन सब्जियों के नाम क्या हैं, वे कैसी दिखती हैं, उन्हें उगाने की अवधि कितनी लंबी है और कौन-सी किस्म स्थानीय स्तर पर उगाने के लिए सबसे अच्छी और उपयुक्त है। अपनी जानकारी के आधार पर, मैंने हर सब्जी की एक या दो किस्में चुनीं, तय किया कि उन्हें उगाने के लिए कौन जिम्मेदार होगा, और अंततः ऐसी व्यवस्था की कि हर व्यक्ति हर मौसम में ताजी सब्जियाँ खा सके। मैं कभी यह कहते हुए नारे नहीं लगाता, "यह सब्जी बहुत पौष्टिक है। इसे खाने से लोगों को बहुत फायदा होता है। इसे उगाने का अमुक वैज्ञानिक तरीका है।" मैंने कभी पोषण का अध्ययन नहीं किया है, न ही मैं खेती-बाड़ी समझता हूँ। मैं क्या जानता हूँ? मैं जानता हूँ कि सब्जी की उस किस्म का चयन कैसे किया जाए जो किसी खास जगह पर उगाने के लिए उपयुक्त है, ताकि उगाए जाने के बाद उसका स्वाद अच्छा हो, हर व्यक्ति उसे खाना चाहे और उसे उगाना बेकार न जाए—मेरा तरीका बस इतना ही व्यावहारिक है। यह सब नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करना है। ये वे सिद्धांत और उसूल हैं जिनका मैं पालन करता हूँ; इतने सालों से मैंने इसी तरह से आचरण किया है। मैं कभी नारे नहीं लगाता और मुझे तुम लोगों के धन्यवाद की जरूरत नहीं है। अगर तुम लोगों के खाने और रहने की व्यवस्था ठीक है, और चीजें पूरी तरह बिगड़ी नहीं हैं, तो मैं निश्चिंत महसूस करता हूँ। जब कोई बाधा या परेशानी उत्पन्न करने वाला नहीं होता और हर जगह काफी साफ-सफाई दिखती है, अनाज और सब्जियाँ ठीक से उगाई गई होती हैं; सूअर, भेड़ और दूसरे मवेशी ठीक से पाले जा रहे होते हैं और अन्य सभी क्षेत्र काफी अच्छे होते हैं, अपने कर्तव्य करने वाले ज्यादातर लोगों के लिए बुनियादी जरूरतें कोई समस्या नहीं होतीं, तब मैं चिंता करना छोड़ सकता हूँ। इस मामले में मेरी अपेक्षाएँ बहुत कठोर नहीं हैं। देखो, क्या मैंने किसी काम में या तुम लोगों की बुनियादी जरूरतों से जुड़े मामलों में तुम लोगों का मार्गदर्शन करते हुए कभी नारे लगाए हैं? मैंने कभी नारे नहीं लगाए हैं। तुम लोगों के लिए चीजें व्यवस्थित करने के बाद मैं काम कार्यान्वित करने के लिए उपयुक्त लोगों को ढूँढ़ता हूँ। अगर ढूँढ़े गए लोग उपयुक्त नहीं होते और काम कार्यान्वित नहीं किया जा सकता, तो उन्हें बदल दिया जाता है। जब काम अंततः कार्यान्वित हो जाता है और ज्यादातर चीजें ठीक से सँभाल ली जाती हैं और अपने कर्तव्य करने करने वाले कर्मचारियों की बुनियादी जरूरतों की सही तरीके से व्यवस्था हो जाती है, तभी मैं अपना मानवीय काम रोक सकता हूँ, फिर मुझे इस बारे में और मेहनत करने की जरूरत नहीं पड़ती। कुछ लोग अभी भी मुझसे छोटी-छोटी बातों के बारे में पूछते रहते हैं। एक कहता है, "अगर नवजात मेमने को दूध न मिले, तो हमें क्या करना चाहिए?" दूसरा कहता है, "अगर हमारे बनाए कपड़े हमेशा सिकुड़ जाते हैं, तो हमें क्या करना चाहिए?" तुम लोगों को खुद पता लगाना होगा कि इन चीजों का समाधान कैसे किया जाए; यह तुम लोगों का काम है और इसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है। यहाँ तक कि सत्य के बारे में संगति करते समय भी, मैं सिर्फ एक बार कहता हूँ। उपदेशों और संगतियों की ऑडियो रिकॉर्डिंग मौजूद हैं। अगर तुम लोगों को समझ नहीं आए, तो तुम उन्हें कुछ और बार सुन सकते हो और सोचने, खोजने और संगति करने में जितना चाहे समय लगा सकते हो। अगर इस आधार पर, इसके बाद भी तुम लोग कुछ मुद्दों पर भ्रमित रहते हो और नहीं जानते कि उनसे कैसे निपटा जाए, तो हम मिलने पर उन पर संगति कर सकते हैं। लेकिन जब बात यह आती है कि लोग क्या हासिल कर सकते हैं, तो सबसे अच्छा यही है कि तुम लोग ऐसी चीजों से खुद ही निपटो। परमेश्वर ने लोगों के लिए स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजें बनाईं—सूरज, चाँद, तारे, पानी, हवा, धूप, भोजन और साथ ही वे अलग-अलग तरह के परिवेश और जीव-जंतु जिनकी लोगों को जरूरत होती है, जिसके बाद उसने लोगों को पृथ्वी पर बसाया। परमेश्वर लोगों के लिए सभी चीजों के बढ़ने और उनके काम करने के नियम बनाए रखता है और लोगों के जीवन परिवेश भी बनाए रखता है—लेकिन असल में जीवन जीना तो लोगों पर ही निर्भर करता है। किस मौसम में कौन-सी चीजें उगानी हैं, कब उनकी कटाई करनी है, कटाई के बाद उनका कैसे भंडारण करना है, उनसे खाना बनाते समय कौन-से तरीके अपनाने हैं, क्या ज्यादा खाना है, क्या कम खाना है, किस मौसम में क्या खाना है, रोज कितना खाना है—यह तुम लोगों का अपना मामला है। अब जबकि सत्य पर इतने स्पष्ट रूप से संगति की जा चुकी है और जीवन से जुड़े मामले तुम लोगों के लिए ठीक से सुलझा दिए गए हैं, तो अगर अभी भी तुम लोग मुझसे यह या वह काम करने में मदद माँगते हो या मुझसे इस या उस मामले पर अपने साथ संगति करने की उम्मीद करते हो, तो तुम लोग विवेक से बहुत वंचित हो। जिन चीजों पर मैं पहले ही संगति कर चुका हूँ, उन्हें मैं तुम लोगों से खुद ही सँभालने और हल करने के लिए कहता हूँ। कलीसिया में तुम्हारी अगुआई करने के लिए हर स्तर पर अगुआ हैं और साथ ही वह मनुष्य भी है जिसका इस्तेमाल पवित्र आत्मा करता है। तुम लोगों को चीजें खुद खोजनी और खुद हल करनी चाहिए; हर चीज के लिए मेरे पास मत आओ। कारण यह है कि जो कुछ भी कहा जाना चाहिए था, वह मैं पहले ही कह चुका हूँ; यहाँ तक कि मैंने तुम लोगों की बुनियादी जरूरतों की भी व्यवस्था कर दी है, और जब उन छोटे-छोटे मामलों की बात आती है, तो उनका समाधान करना मेरा नहीं, बल्कि तुम लोगों का काम है और तुम लोगों को उन्हें खुद ही सँभालना चाहिए।
देहधारी परमेश्वर चाहे कितने भी वचन बोले या कितने भी काम करे, लोगों को यह जानना चाहिए कि देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता, और उसकी विनम्रता और प्रच्छन्नता के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है : चाहे देहधारी परमेश्वर लोगों के बीच रहे या अपनी सेवकाई करे, उसकी मानवता के सबसे बुनियादी उसूल और सिद्धांत, जिन्हें उनका देह जीता है, नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करना हैं। यह परमेश्वर के देहधारी शरीर में दिखाई देता है और स्वाभाविक रूप से, यह उस परमेश्वर में भी दिखाई देता है जिसमें परमेश्वर की पहचान और सार है, जो अपनी अंतर्निहित पहचान में परमेश्वर है। बेशक, परमेश्वर के मामले में इसे "नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण करना" नहीं कहा जाता, बल्कि कम से कम, जिस तरह से परमेश्वर काम करता है और जिस तरह से वह लोगों और चीजों के साथ व्यवहार करता है, उसमें भी वह निश्चित रूप से इन सिद्धांतों का सख्ती से पालन करता है। यह दोनों है, जो देहधारी परमेश्वर की मानवता के पास है और जो वह स्वयं है और जो अपनी अंतर्निहित पहचान में परमेश्वर की दिव्यता के पास है और जो वह स्वयं है। जो उसकी मानवता के पास है और जो वह स्वयं है, उसमें नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करना शामिल है, जबकि अपनी अंतर्निहित पहचान में परमेश्वर के सार में परमेश्वर का लोगों के साथ नियमों का पालन करने वाले तरीके से आचरण और कर्तव्य-निष्ठा से काम करना शामिल है। हम इस बारे में और अधिक बात नहीं करेंगे। तुम चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य से देखो—परमेश्वर द्वारा सृजित सभी चीजों के संदर्भ में, मानवजाति पर परमेश्वर की संप्रभुता और उसका मार्गदर्शन, बड़े मामलों से लेकर छोटे मामलों तक, और स्थूल स्तरीय से लेकर सूक्ष्म स्तरीय तक—परमेश्वर हर काम नियमों का पालन करने वाले और कर्तव्य-निष्ठा के तरीके से करता है। जब परमेश्वर देहधारी नहीं हुआ था, तब वह सभी चीजों के बीच छिपा हुआ था। हालाँकि मानवजाति ने परमेश्वर का स्वरूप या उसका असली चेहरा नहीं देखा, फिर भी परमेश्वर हमेशा पूरी मानवजाति की अगुआई करता रहा है। वह हमेशा व्यावहारिक रूप से हर एक चीज भी करता रहा है, हर एक चीज का प्रबंधन भी करता रहा है और ब्रह्मांड की हर चीज पर अपनी संप्रभुता बनाए रखता रहा है, उसके द्वारा की गई कोई भी चीज खोखली नहीं होती। बेशक, परमेश्वर के हाथों से की गई कोई भी चीज केवल सिद्धांतों या नारों तक सीमित नहीं रहती। इसके बजाय, परमेश्वर जो कुछ भी करता है—चाहे तुम उसे समझ सको या न समझ सको, चाहे तुम उसे देख सको या न देख सको—वह उसे नियमों का पालन करने वाले तरीके से कर रहा है और कर्तव्य-निष्ठा से कर रहा है। वह जो काम करना चाहता है, उसे बहुत व्यावहारिक ढंग से करता है। वह कभी लोगों के सामने कोई घोषणा नहीं करता या लोगों के सामने खुद को सही साबित नहीं करता, न ही वह कोई नारे लगाता है। बल्कि, वह हमेशा कथन कहता और बोलता रहा है, व्यावहारिक रूप से पूरी मानवजाति की अगुआई करता रहा है और उसे पोषण प्रदान करता रहा है। यही वह है जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है। जो देहधारी परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, वह निश्चित रूप से जो स्वयं परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, उससे अलग या उसके विपरीत नहीं होगा। इसलिए, जब लोग जो देहधारी परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, उसे जान लेते हैं या वे स्व-आचरण के उन उसूलों और सिद्धांतों को जान लेते हैं जिनका देहधारी परमेश्वर पालन करता है, तब वे व्यापक रूप से परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान में उसके सार को और जो उसके पास है और जो वह स्वयं है, उसे जान जाएँगे। नतीजतन, स्वर्गिक परमेश्वर के बारे में लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ कुछ हद तक कम हो जाएँगी और परमेश्वर के बारे में उनका ज्ञान, समझ या उनके दृष्टिकोण अधिक व्यावहारिक हो जाएँगे। सापेक्ष रूप से कहूँ तो, वे देहधारी परमेश्वर के साथ भी अधिक सटीक, वस्तुनिष्ठ और तर्कसंगत ढंग से व्यवहार कर पाएँगे; वे जो उसकी मानवता के पास है और जो वह स्वयं है, उसकी निंदा नहीं करेंगे, या जो उसकी मानवता के पास है और जो वह स्वयं है, उसका तिरस्कार नहीं करेंगे या उसे खारिज नहीं करेंगे। इसके बजाय, एक तो वे उसके साथ सही व्यवहार कर पाएँगे और दूसरे, वे—जो उसकी मानवता के पास है और जो वह स्वयं है, उसके माध्यम से—जो उसकी दिव्यता के पास है और जो वह स्वयं है, उसे भी बेहतर ढंग से देख पाएँगे, इस तरह स्वर्गिक परमेश्वर और पृथ्वी पर मौजूद परमेश्वर, दोनों को ही अधिक सटीक ढंग से जान पाएँगे।
ठीक है, हम आज के लिए इस विषय पर अपनी संगति यहीं समाप्त करेंगे। अलविदा!
10 अगस्त 2024