सत्य का अनुसरण कैसे करें (26)
हाल ही में हमने देहधारी परमेश्वर के विषय पर संगति की है। इस विषय में “सत्य का अनुसरण कैसे करें” के तहत “त्याग देने” का अभ्यास शामिल है और हमने “अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देने” के विषय के तहत “परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देने” पर संगति की। हमने इस पहलू पर कई बार संगति की है और मुख्य रूप से इस पर चर्चा की है कि देहधारी परमेश्वर से कैसे पेश आएँ। हमने इस विषयवस्तु को दो विषयों में विभाजित किया है। क्या तुम लोग मुझे बता सकते हो कि वे दो विषय क्या हैं? (देहधारी परमेश्वर के संबंध में परमेश्वर ने हमें अभ्यास के दो सही सिद्धांत दिए हैं : पहला है उसकी तुलना स्वर्ग के परमेश्वर से नहीं करना और दूसरा है उसे भ्रष्ट मानवजाति के साथ एक ही तराजू में नहीं तोलना।) हमने इन दोनों विषयों के कुछ विवरणों पर संगति की है जिसमें देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता की कुछ अभिव्यक्तियाँ शामिल हैं। इसमें इस बात पर संगति शामिल थी कि देहधारी परमेश्वर मनुष्यों के बीच जीने, अस्तित्व में रहने, आचरण करने और कार्य करने में किन विशिष्ट सिद्धांतों को देखता है और पालन करता है। इन विषयों पर संगति का उपयोग लोगों को यह समझने और जानने में सक्षम बनाने के लिए किया जाता है कि देहधारी परमेश्वर, एक विशिष्ट पहचान वाला यह व्यक्ति, मनुष्यों के बीच रहते हुए किन अभिव्यक्तियों को प्रदर्शित करता है। हमने मुख्य रूप से देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता के विषय पर संगति की और कई विशिष्ट बारीकियों पर संगति की। इसे सुनने के बाद तुम लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा? क्या देहधारी परमेश्वर के बारे में तुम्हारी धारणाएँ और कल्पनाएँ कम हुई हैं या तुमने कुछ नई धारणाएँ बना ली हैं? (देहधारी परमेश्वर के बारे में हमारी धारणाएँ और कल्पनाएँ कम हुई हैं।) तो क्या इस विषय पर संगति देहधारी परमेश्वर को जानने में लोगों के लिए मददगार है? (हाँ, है।) यह बहुत ही अच्छा है।
देहधारी परमेश्वर के विषय पर हमारी संगति मुख्य रूप से देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता से संबंधित विशिष्ट प्रकाशनों और अभ्यासों पर केंद्रित होती है जिसका उद्देश्य लोगों को देहधारी परमेश्वर, एक विशिष्ट पहचान वाले इस व्यक्ति की ज्यादा ठोस समझ प्रदान करना है। तो क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता को जितना ज्यादा समझते हो, उतना ही ज्यादा तुम्हें महसूस होता है कि वह बस एक सामान्य व्यक्ति है, कुछ भी उल्लेखनीय नहीं है, और तुम देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता को जितना ज्यादा समझते हो, तुम्हें उसके दिव्य प्रभामंडल का उतना ही कम आभास होता है? क्या तुम्हारे ऐसे विचार हैं? (नहीं। परमेश्वर द्वारा दिए गए कुछ ऐसे उदाहरणों को सुनकर जिनमें देहधारी परमेश्वर के व्यावहारिक जीवन जीने और प्रकाशनों के बारे में बात की गई, मुझे लगता है कि परमेश्वर की बाहरी छवि साधारण और सामान्य है, लेकिन उसकी सामान्य मानवता के प्रकाशन हम मनुष्यों से कहीं बढ़कर हैं; ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें हम प्राप्त नहीं कर सकते। परमेश्वर की सामान्य मानवता में कोई भ्रष्ट स्वभाव, कोई घमंड या धोखेबाजी, कोई मानवीय अभिमान या भोग-विलास नहीं है। वैसे तो देहधारी परमेश्वर बाहर से साधारण और सामान्य दिखता है, लेकिन उसकी विनम्रता से उसकी महानता देखी जा सकती है। मुझे ऐसा ही लगता है।) आमतौर पर जब मशहूर लोग, महान लोग या मानवजाति के बीच सफल बड़ी हस्तियाँ विभिन्न पहलुओं से अपना परिचय देती हैं तब क्या वे अपनी सामान्यता, व्यावहारिकता, साधारणता और आम होने के बारे में बात करती हैं? (नहीं।) अगर भ्रष्ट मानवजाति में से कोई दूसरों को अपने बारे में बताने के लिए अपना परिचय देता है तो वह बिल्कुल भी यह वर्णन नहीं करेगा कि वह कितना साधारण, आम और सामान्य है। इसके विपरीत, वह अपने परिचय और अपने वर्णनों के जरिए लोगों को यह महसूस करवाने का प्रयास करेगा कि वह दूसरों से भिन्न, असाधारण और महान है और उसमें अलौकिक क्षमताएँ हैं। अगर कोई उसे एक अनोखे व्यक्ति के रूप में भी देख सके तो वह ज्यादा खुश होगा। देखो कि भ्रष्ट मनुष्य अपना परिचय कैसे देते हैं। सबसे पहले वे यह वर्णन करेंगे कि वे कितने पूर्ण हैं, उनमें कोई दोष या कमी नहीं है। वे यह दिखावा भी करेंगे कि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि बहुत ही शानदार है, उनका ओहदा बहुत ही कुलीन है, उनके पास क्या शैक्षिक योग्यताएँ हैं और उनके रूप-रंग में क्या उत्कृष्ट है। अगर उनके चेहरे पर तिल है तो उन्हें उसका वर्णन करने का भी एक अनूठा तरीका ढूँढ़ना पड़ता है, जैसे, “देखो, यहाँ तक कि इस तिल की जगह भी असामान्य है; कहा जाता है कि इस जगह पर तिल वाले लोगों की नियति में धन या कुलीनता लिखी होती है।” जब उनके रूप-रंग की बात आती है तब वे दिखावटी ढंग से प्रचार करते हैं कि उनके चेहरे की हर विशेषता बहुत अनूठी है और उनके चेहरे की हर विशेषता के लिए मुखाकृति विज्ञान में क्या सकारात्मक व्याख्याएँ हैं, जैसे कि नियति में धन या कुलीनता लिखी होना या शोहरत हासिल करने में समर्थ होना और लोगों के बीच वे उस मछली जैसे हैं जो अपने तालाब के हिसाब से बहुत ही बड़ी है। इसके अलावा, उन्हें विशेष क्षेत्रों में अपने गुणों और शक्तियों का, उनकी सोच और विचार कितने असाधारण और विशिष्ट हैं इसका दिखावा करने में और यह दिखावा करने में विशेष आनंद आता है कि उन्होंने किन समूहों में क्या उपलब्धियाँ हासिल की हैं, कैसे प्रतिष्ठित लोग उनकी तारीफ करते हैं, उनके बारे में ऊँची राय रखते हैं, उनसे ईर्ष्या करते हैं और उनकी सराहना करते हैं या उन्होंने किस उद्योग में क्या महान योगदान दिया है और उनके वरिष्ठ उनकी कितनी तारीफ करते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे जो कहते हैं वह सच है या नहीं, अपने आत्म-परिचय के हर पहलू में वे लोगों को यह महसूस करवाने का प्रयास करते हैं कि वे दूसरों से भिन्न हैं, लोगों के बीच वे बेमिसाल हैं, अनोखे हैं, सभी सामान्य लोगों से बढ़कर हैं। वे सबको ऐसे अंदाज से देखते हैं मानो वे सबसे श्रेष्ठ हों; वे बाकी सबको दीन-हीन और नीच आम लोग समझते हैं, जबकि सिर्फ खुद वे ही सबसे महान, सबसे कुलीन और सबसे असाधारण हैं। अगर तुम उनसे उनकी शैक्षिक योग्यताओं के बारे में पूछोगे तो वे कहेंगे कि उन्होंने किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से स्नातक किया है, उनके पास स्नातकोत्तर या पीएचडी की डिग्री है, जबकि सच तो यह है कि उन्होंने सिर्फ एक साधारण विश्वविद्यालय से ही शिक्षा प्राप्त की है। वे कभी भी अपने खुद के दोषों, कमियों, भ्रष्ट स्वभावों, अपने नीच चरित्र के पहलुओं या उन गलत चीजों के बारे में नहीं बोलते हैं जो उन्होंने की हैं। जब भी दूसरों को अपने बारे में बताने के लिए अपना परिचय देने की बात आती है, वे दिखावा करने, तारीफ करने और खुद को बहुत महान, असाधारण और असामान्य के रूप में वर्णित करने का हर संभव प्रयास करेंगे। अगर वे बीमार पड़ जाते हैं तो भी वे कहेंगे कि यह “अमीरों की बीमारी” है जिससे लोगों को लगेगा कि वे नाज़ुक, लाड़-प्यार पाने वाले और दूसरों से भिन्न हैं। चाहे कुछ भी हो जाए, वे लोगों को यह बिल्कुल भी महसूस नहीं होने देंगे कि वे सिर्फ एक साधारण, आम व्यक्ति हैं। इसके बजाय, वे लोगों से अपना सम्मान करवाने, अपने बारे में ऊँची राय बनवाने और अपनी तारीफ करवाने के लिए सारे तरीके आजमाएँगे। अगर लोग उनका अनुसरण कर सकें और अपने दिलों में उन्हें जगह दे सकें तो वे खुद से और भी ज्यादा खुश महसूस करते हैं। अगर तुम कहते हो कि वे साधारण और सामान्य हैं, आम जनता के सदस्य हैं तो उन्हें लगता है कि उन्होंने अपना सम्मान खो दिया है और तुमने उनके अभिमान को वाकई ठेस पहुँचाई है; यहाँ तक कि यह ऐसा है मानो यह उन्हें मार ही डालेगा। वे जीवन भर अद्वितीय और असाधारण बनने का प्रयास करते रहते हैं। बहुत-से लोग अपने भ्रष्ट स्वभावों और ऐसी इच्छाओं के कारण बहुत ऊँचे, उत्कृष्ट और महान दिखने के लिए अक्सर एक बाहरी छवि बनाते हैं और उनके द्वारा अपनाया गया बाहरी आचरण, उनके शब्द और उनके क्रियाकलाप बहुत हद तक किसी महान हस्ती का अंदाज प्रदर्शित करते हैं। किसी भी समूह में अगर कोई उनसे कहता है, “इस भीड़ में मैंने तुम्हें एक ही नजर में पहचान लिया; तुम्हारी नजरों से, तुम्हारे नैन-नक्श से और तुम्हारे सम्मोहक व्यक्तित्व से मैं बता सकता हूँ कि तुम कोई साधारण व्यक्ति नहीं हो” तो वे बहुत खुश हो जाते हैं। वे इस मामले को बेहद बढ़ा-चढ़ाकर कहेंगे और जीवन भर उन शब्दों को अपनी जबान पर रखेंगे, हर जगह दिखावा करेंगे, “भीड़ में लोग मुझे एक ही नजर में पहचान सकते हैं और समझ सकते हैं कि मैं अगुआ हूँ, ऐसी मछली हूँ जो अपने तालाब के हिसाब से बहुत बड़ी है, मैं कोई साधारण व्यक्ति नहीं हूँ!” उन्हें इस तरह का व्यक्ति होना विशेष रूप से अच्छा लगता है, खुद को एक ऐसे असाधारण, असामान्य व्यक्ति के रूप में स्थापित करना विशेष रूप से अच्छा लगता है जो दूसरों से भिन्न हो और यहाँ तक कि विलक्षण भी हो। बहुत-से लोग मशहूर लोगों, महान लोगों और समाज में रुतबे और प्रतिष्ठा वाले लोगों पर विशेष ध्यान देते हैं, उनके बारे में हर खबर पर, उनके शब्दों और कार्यों पर और उनके रोजमर्रा के जीवन पर ध्यान देते हैं। इस ध्यान का उद्देश्य मनोरंजन नहीं होता, बल्कि उनकी नकल करना और उनका अनुसरण करना होता है। ये लोग जो भी खाते-पीते हैं, उनके बीच जो भी लोकप्रिय होता है, वे उसकी नकल करते हैं। ये लोग जिन भी विषयों पर चर्चा करते हैं, वे भी उन्हीं पर चर्चा करते हैं। वे बहुत बारीकी से उनका अनुसरण करते हैं, इस बात से डरते हैं कि कहीं उन्हें पूरे चलन से बाहर न रख दिया जाए, वे डरते हैं कि वे पीछे न रह जाएँ और नीची नजर से न देखे जाएँ। वे बस भीड़ में अलग से दिखने वाला और असाधारण व्यक्ति बनना चाहते हैं और एक सामान्य, साधारण व्यक्ति बनने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं होते। कुछ लोग, भले ही वे औसत काबिलियत के हों, उनमें कोई शक्ति या गुण न हो और उनमें ऐसी जन्मजात स्थितियाँ हों जो सभी पहलुओं से बहुत साधारण और आम हैं, फिर भी वे एक साधारण व्यक्ति बनने के इच्छुक नहीं होते, मामूली व्यक्ति बनने के इच्छुक नहीं होते। बल्कि वे बहुत ऊँचे और उत्कृष्ट होने के लिए बढ़िया पोशाकें पहनते हैं या खुद को कोई मामूली व्यक्ति नहीं बल्कि बहुत ही असामान्य व्यक्ति बताते हैं। कुछ लोग तो महान हस्तियों, योग्य और कुशल लोगों और बेहतरीन कौशल वाले लोगों की नकल करने के लिए कड़ी मेहनत भी करते हैं। वे ध्यान से देखते हैं कि ये लोग क्या करते हैं, क्या कहते हैं, क्या चर्चा करते हैं और उनकी नकल करते हैं, उनकी तरह असाधारण महान हस्तियाँ बनने का प्रयास करते हैं, वे अब साधारण, आम लोग नहीं रहना चाहते। इसलिए, जब हम देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता पर संगति करते हैं तब कुछ लोग अनिवार्य रूप से सोचते हैं : “मनुष्य पूरे जोश से इस बारे में अपनी तारीफ करते हैं, खुद को आकर्षक रूप से दिखाते हैं और अपने बारे में शेखी बघारते हैं कि वे दूसरों से बहुत भिन्न हैं, बहुत असाधारण और महान हैं, फिर भी तुम हमेशा खुद को बहुत सामान्य और व्यावहारिक बताते हो। क्या यह जरा-सा अतार्किक नहीं है? क्या यह जरा-सा मूर्खतापूर्ण नहीं है? तुम देहधारी मसीह हो, जिसकी बहुत ही कुलीन पहचान है, बहुत ही महान प्रभामंडल है और सिर पर बहुत बड़ा ताज है। तुम खुद को एक साधारण, सामान्य और व्यावहारिक व्यक्ति कैसे बता सकते हो? और इस डर से कि लोग इस पर विश्वास नहीं करेंगे, तुम यह प्रमाणित करने के लिए बहुत सारे उदाहरण भी देते हो कि तुम कितने सामान्य, व्यावहारिक और साधारण हो। यह स्वाभाविक रूप से कुछ हद तक उलझन में डालने वाला है।” वैसे तो यह मानवीय धारणाओं के अनुरूप नहीं है, लेकिन तथ्य सचमुच ऐसे ही हैं। देहधारी परमेश्वर की सामान्यता, व्यावहारिकता और साधारणता के विशिष्ट प्रकाशन ठीक ऐसे ही हैं; यह एक तथ्य है, मैं इसे गढ़ नहीं सकता। कुछ लोग कहते हैं: “क्या तुम्हें कम-से-कम कुछ ऐसे उदाहरणों का जिक्र नहीं करना चाहिए जिनसे लोगों को यह लगे कि तुम दूसरों से भिन्न और असाधारण हो और तुम्हारी पहचान और छवि विशेष रूप से ऊँची और प्रभावशाली है?” अच्छा, तुम्हें निराश करने का मुझे अफसोस है, लेकिन वास्तव में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है। दरअसल, मैं जीवन और कार्य में जिस तरीकों से आचरण करता हूँ और कार्य करता हूँ उनके मेरे वर्णन देहधारी परमेश्वर के सच्चे प्रकाशन हैं; यह बस उतना ही वस्तुनिष्ठ है। यह सब वास्तव में ऐसा ही है; ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जिससे लोग मुझे दूसरों से अलग, असाधारण, महान, या ऊँची, प्रभावशाली छवि वाले के रूप में देखें। कुछ लोग कहते हैं, “क्या तुम कुछ गढ़ नहीं सकते? इससे लोगों के दिलों पर बेहतर प्रभाव पड़ेगा और वे निराश नहीं होंगे। तुम खुद को बहुत सामान्य और व्यावहारिक, बस एक साधारण व्यक्ति बताते हो; तुम्हारी छवि बिल्कुल भी ऊँची नहीं है! फिर कौन तुम्हें पूजेगा और तुम्हारा सम्मान करेगा? अगर लोग तुम्हारा सम्मान नहीं करते हैं या तुम्हें नहीं पूजते हैं तो क्या तब भी उनके दिलों में तुम्हारे लिए जगह हो सकती है?” मैं कहता हूँ, मैं सच में यह नहीं चाहता। अगर तुम मेरा सम्मान नहीं करते हो या मुझे नहीं पूजते हो तो कोई बात नहीं; मुझे कोई फिक्र नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, “अगर लोग तुम्हारा सम्मान नहीं करते हैं या तुम्हें नहीं पूजते हैं तो क्या तब भी उसे परमेश्वर का अनुसरण करना कहा जाता है?” चाहे तुम मेरा सम्मान या पूजा करो या न करो—ये चीजें महत्वपूर्ण नहीं हैं; मुझे सच में इनकी परवाह नहीं है। अगर तुम मेरा सम्मान नहीं करते हो या मुझे नहीं पूजते हो, लेकिन मेरे कहे हर वचन पर, मेरे द्वारा संगति किए गए सत्य के हर पहलू पर अपने दिल से चिंतन कर सकते हो, उसे परमेश्वर के वचनों के रूप में स्वीकार सकते हो और इन वचनों के आधार पर आचरण कर सकते हो, कार्य कर सकते हो और लोगों और चीजों को देख सकते हो तो इतना काफी है—मेरा वचन बोलना व्यर्थ नहीं जाएगा। मान लो कि तुम मेरा सम्मान नहीं करते हो या मुझे नहीं पूजते हो, लेकिन मेरे द्वारा बोले गए वचन और मेरे द्वारा प्रचार किए गए धर्मोपदेश तुम्हें परमेश्वर के सामने लाते हैं, तुम्हें यह जानने में समर्थ बनाते हैं कि सत्य का अनुसरण कैसे करना है, हर मामले से सामना होने पर सत्य सिद्धांतों के अनुसार कैसे कार्य करना है, तुम्हें यह सीखने में समर्थ बनाते हैं कि आचरण और कार्य कैसे करना है, एक सृजित प्राणी का कर्तव्य कैसे करना है, तुम्हें यह जानने में समर्थ बनाते हैं कि परमेश्वर के प्रति वफादार कैसे होना है और ऐसे किस तरीके से कार्य करना है जो मानक-स्तर का हो, परमेश्वर के प्रति समर्पण कैसे करना है, परमेश्वर का भय कैसे मानना है और बुराई से कैसे दूर रहना है और अंततः ये तुम्हें अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ देने और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने में समर्थ बनाते हैं। तब मेरा वचन बोलना व्यर्थ नहीं जाएगा और उनका उद्देश्य पूरा हो चुका होगा। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, अगर तुम मुझसे सही ढंग से पेश आ सको, मुझसे सिद्धांतों के अनुसार न्यायसंगत और उचित रूप से पेश आ सको तो यह पर्याप्त है। तुम लोगों से मेरी अपेक्षाएँ ज्यादा नहीं हैं। इससे पहले मैंने हमारी बातचीत के लिए तीन सिद्धांतों का जिक्र किया है : मसीह के साथ निष्कपट रहो, उसका आदर करो और उसके वचनों को मानो। अगर तुम लोग इन तीन सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कर सको तो यह पर्याप्त है। मुझे लोगों से अपनी पूजा करवाने की जरूरत नहीं है और न ही मुझे लोगों की सराहना या उच्च सम्मान की जरूरत है। मुझे इसकी जरूरत नहीं है कि लोग अपने दिलों में मेरी छवि रखें। मुझे इन चीजों में कोई दिलचस्पी नहीं है। बहुत-से लोग उन हस्तियों को विशेष रूप से पूजते हैं जिनकी छवि ऊँची होती है, जो दूसरों से अलग, असाधारण रूप से सक्षम और उत्कृष्ट होते हैं, वे मानते हैं कि देहधारी परमेश्वर एक सामान्य, व्यावहारिक और साधारण मानव-पुत्र नहीं हो सकता। जो लोग मुझसे कभी नहीं मिले हैं, वे स्वाभाविक रूप से मान लेते हैं कि सामान्य लोगों की तुलना में मेरी छवि ज्यादा ऊँची है, विशेष रूप से रोबदार है। तुम्हें इस तरीके से बिल्कुल नहीं सोचना चाहिए। मैं बिल्कुल भी रोबदार नहीं हूँ; मेरा कद छोटा है और मैं ठिगना हूँ। दैनिक जीवन में मेरे वचन और क्रियाकलाप विशेष रूप से सामान्य और व्यावहारिक हैं। मेरे दैनिक जीवन के सभी पहलू—मैं कैसे तैयार होता हूँ, मेरे कपड़े, भोजन, आवास और परिवहन—विशेष रूप से साधारण हैं। मैं कभी भी विलक्षण बनने का प्रयास नहीं करता और न ही मैं कभी अनोखा बनने का प्रयास करता हूँ। मैं सिर्फ नियमों का पालन करते हुए चीजें करने, अपने उचित पद के अनुसार आचरण करने, अपना कार्य अच्छी तरह से करने, अपनी सेवकाई पूरी करने और जो कहने की जरूरत है उसे स्पष्ट और पूरी तरह से कहने का प्रयास करता हूँ। ये मेरे आचरण और कार्य करने के सिद्धांत हैं। मेरा भिन्न बनने, असाधारण और महान बनने का मानवीय लक्ष्य नहीं है और न ही मैं कभी यह प्रयास करता हूँ कि लोग मुझे भीड़ में एक नजर में पहचान लें। अगर तुम मुझे भीड़ में नहीं पहचानो तो भी मैं बिल्कुल भी दुखी या परेशान नहीं होऊँगा और न ही मुझे कभी ऐसा महसूस होगा कि मैंने अपना सम्मान खो दिया है और यकीनन मैं यह बिल्कुल नहीं कहूँगा कि तुम मुझे नाराज कर रहे हो।
जब मैं बोलता हूँ और कार्य करता हूँ और तुम लोगों के संपर्क में रहता हूँ, चाहे मैं सत्य के किसी भी पहलू पर संगति कर रहा होता हूँ या किसी भी पहलू की समस्याएँ हल करने के लिए संगति कर रहा होता हूँ या बस रोजमर्रा की चीजों के बारे में गपशप कर रहा होता हूँ या किसी चीज के बारे में बात कर रहा होता हूँ, तब मैं हमेशा तुम लोगों को अपनी बात समझाने का प्रयास करता हूँ और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं किस चीज के बारे में बात करता हूँ, मैं ऐसा लोगों को फायदा पहुँचाने के लिए करता हूँ। यकीनन अगर संगति उन मुद्दों के बारे में हो जिनमें सत्य शामिल है तो यह और भी जरूरी है कि यह लोगों को सत्य का अभ्यास करने के लिए सिद्धांत प्राप्त करने और उन मुद्दों को हल करने के मार्ग ढूँढ़ने में समर्थ बनाए। अगर यह सिर्फ रोजमर्रा की चीजों के बारे में गपशप है तो यह और भी सामान्य है क्योंकि यह सामान्य मानवता की जरूरत है। सामान्य मानवता की इस जरूरत का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि कभी-कभी लोगों को अपने दैनिक जीवन में दिखाई और सुनाई देने वाली चीजों को संप्रेषित करने और साझा करने की जरूरत होती है। रोजमर्रा की चीजों के बारे में बात करना, गपशप करना और दूसरों के साथ साझा करना, ये सभी सामान्य मानवता के जमीर और तार्किकता की जरूरतें हैं। मेरे लिए, चीजें साझा करना ज्यादातर तुम्हें इस दुनिया, इस समाज और इस मानवजाति के बारे में ज्यादा समझने में मदद करने के बारे में है और यह बताने के बारे में भी है कि तुम्हें इस समाज और इस मानवजाति के बीच होने वाली कुछ चीजों को कैसे देखना चाहिए, बुरे चलनों को कैसे समझना चाहिए, विभिन्न चीजों को कैसे समझना चाहिए और विभिन्न तरह के लोगों को कैसे समझना चाहिए। यहाँ तक कि रोजमर्रा के मामलों पर गपशप या बात करते समय भी मैं समय-समय पर या संक्षेप में लोगों, घटनाओं और चीजों से संबंधित कुछ जरूरी मुद्दों पर चर्चा करूँगा। इसलिए, चाहे कोई भी अवसर हो, जब लोगों का मुझसे संपर्क रहता है तब वे मेरे बारे में यही देखते, सुनते और बूझते हैं कि मैं बिल्कुल भी असाधारण नहीं हूँ, बल्कि पूरी तरह से सामान्य, व्यावहारिक और साधारण हूँ। ऐसे मानवीय रूप-रंग के साथ जीते हुए जब मैं लोगों के साथ रहता हूँ तब मैं विशेष रूप से स्वतंत्र और सहज महसूस करता हूँ। अगर तुम्हें लगता है कि मेरे ऐसे कुछ क्रियाकलाप हैं जो असाधारण हैं और दूसरों से भिन्न हैं या मेरे चेहरे की बाहरी विशिष्टताओं का कोई हिस्सा या मेरा कोई दूसरा पहलू दूसरों से भिन्न है या विशेष रूप से असाधारण है तो अगर तुम इस तरीके से सोचते हो तो मैं बहुत असहज और परेशान महसूस करूँगा। मुझे लोगों का ऐसी चीजें कहना वाकई नापसंद है और मुझे लोगों का मुझे उस तरीके से देखना भी वाकई नापसंद है। विशेष रूप से कुछ लोग, जब वे मुझसे पहली बार मिलते हैं तब मेरी जाँच-परख करते हैं, मेरी आँखों के भाव, मेरे चेहरे की विशिष्टताओं की बारीकी से जाँच करते हैं, मेरे द्वारा उपयोग किए गए हर वचन को और मेरी आवाज के लहजे को बड़े ध्यान से सुनते हैं, वे यह देखना चाहते हैं कि क्या मैं उतना ही असाधारण और दूसरों से अलग हूँ जितनी उन्होंने कल्पना की थी। मैं कहता हूँ, उसकी कोई जरूरत नहीं है; मेरी जाँच-परख या पड़ताल करने की कोई जरूरत नहीं है। मैं एक बहुत ही साधारण और सामान्य व्यक्ति हूँ। जब तुम लोग मुझसे मेलजोल रखते हो तब तुम्हें तनावमुक्त, स्वतंत्र और सहज होना चाहिए। अगर तुम लोग हमेशा जाँच-परख और पड़ताल करते रहोगे तो जितनी ज्यादा तुम पड़ताल करोगे, उतने ही ज्यादा थक जाओगे और उतने ही ज्यादा उलझन में पड़ जाओगे। अगर तुम मेरी पड़ताल और जाँच-परख करोगे तो तुम्हारे प्रति मेरी नापसंदगी और नफरत का एहसास उत्तरोत्तर बढ़ता जाएगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम मेरी पड़ताल कैसे करते हो, अगर तुम मेरी बात नहीं समझते, यह नहीं जानते कि मेरे वचनों का वास्तव में क्या मतलब है और यहाँ जिन सत्य सिद्धांतों को समझा जाना चाहिए वे क्या हैं तो तुम्हारी पड़ताल का क्या फायदा? तुम्हारी पड़ताल तो और भी घिनौनी है। एक बार किसी ने—मुझे नहीं पता कि वह लंबे समय से जाँच-परख कर रहा था या उसने यह अनजाने में देख लिया—कहा कि मेरी आँखों में एक चमकीला धब्बा है और यह दिखाने के लिए एक नजर ही काफी है कि मैं परमेश्वर हूँ। मैंने कहा, “तुमने और क्या देखा? क्या तुमने परमेश्वर की आत्मा को फाख्ता की तरह मुझ पर उतरते देखा? क्या तुमने मेरे मुँह से दोधारी तलवार बाहर निकलकर आती देखी? क्या तुमने मेरा पूरा शरीर प्रकाश के स्तंभ जैसा देखा? क्या तुमने मेरे हाथ में कोई लोहे की छड़ देखी? तुम कहते हो कि तुमने मेरी आँखों में एक चमकीला धब्बा देखा, लेकिन तुम जो कहते हो वह गलत है। बाइबल कहती है, ‘उसकी आँखें आग की ज्वाला के समान थीं।’ तुम्हारी समझ के अनुसार, परमेश्वर के दिव्य प्रभामंडल जैसा कुछ समझने के लिए तुम्हें मेरी दोनों आँखों को ज्वाला के समान देखना चाहिए था, लेकिन तुमने सिर्फ एक चमकीला धब्बा देखा, तो इसका मतलब है कि तुम परमेश्वर को बदनाम कर रहे हो।” मुझे बताओ, क्या इस व्यक्ति ने खुद को मूर्ख नहीं बनाया? क्या यह छोटे आध्यात्मिक कद की अभिव्यक्ति नहीं है? (हाँ।) मैं तुम लोगों से कहता हूँ, तुम्हें इन चीजों की जाँच-परख या पड़ताल करने की जरूरत नहीं है। मेरे द्वारा व्यक्त इन वचनों को सुनना ही तुम लोगों को सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने और उद्धार के मार्ग पर चल पड़ने में समर्थ बनाने के लिए पर्याप्त है। अगर तुम जाँच-परख करने पर अड़े रहे तो कौन-सी समस्याएँ उत्पन्न होंगी? न सिर्फ कोई नतीजा नहीं मिलेगा, बल्कि तुम परमेश्वर को जरा-सा भी जान नहीं पाओगे और परमेश्वर के बारे में तुम्हारी धारणाएँ उत्तरोत्तर मजबूत होती जाएँगी। देहधारी परमेश्वर का परमेश्वर के व्यक्तित्व या परमेश्वर के सच्चे शरीर से जिसके बारे में वह बात करता है या प्रकाशन में परमेश्वर द्वारा भविष्यवाणी की गई परमेश्वर की छवि से या परमेश्वर की उस छवि से जिसको मानवजाति ने अतीत के रिकॉर्ड के जरिए देखा है, कोई संबंध नहीं है। इसलिए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम देहधारी परमेश्वर की जाँच-परख कैसे करते हो, वह हमेशा सामान्य और व्यावहारिक, एक साधारण व्यक्ति है; वह तुम्हें ऐसा कोई पक्ष नहीं दिखाएगा जो असाधारण हो या दूसरों से भिन्न हो। तो इन शब्दों को कहने से मेरा क्या मतलब है? मैं बस तुम लोगों को यह बता रहा हूँ कि तुम्हें देहधारी परमेश्वर की जाँच-परख या पड़ताल नहीं करनी चाहिए। तुम जितनी ज्यादा परमेश्वर की पड़ताल करोगे, परमेश्वर तुमसे उतना ही दूर होगा। अगर तुम उसकी पड़ताल नहीं करते हो, बल्कि शुद्ध रूप से समर्पण करते हो और सत्य स्वीकार पाते हो तो पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध और प्रकाशित करेगा, सत्य समझने के लिए तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा। अगर तुम हमेशा उसकी जाँच-परख और पड़ताल करते रहोगे तो पवित्र आत्मा तुम्हें छोड़ देगा। जब पवित्र आत्मा तुम्हें छोड़ देगा तब यह ऐसा होगा मानो तुम्हारी पूरी दृष्टि धुँधली हो गई है और तुम एक भी चीज समझ नहीं सकोगे। जब तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ोगे तब वे तुम्हें समझ नहीं आएँगे; जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होगा तब तुम उसकी असलियत नहीं देख पाओगे या यह नहीं जान पाओगे कि क्या करना है और जब तुम दूसरों के साथ संगति करोगे तब तुम्हें पता नहीं होगा कि कहाँ से शुरुआत करनी है। तुम्हें बहुत अटपटा महसूस होगा और तुम वह सबसे सरल चीज करने में भी घबराने लगोगे जिसे तुम पहले करने में समर्थ थे। यही समय है जब चीजें पूरी तरह से बिगड़ जाती हैं। क्या ये अच्छे संकेत हैं? (नहीं।) इसलिए, जब ये संकेत दिखाई दें तब तुम्हें जल्दी से वापस मुड़ जाना चाहिए और परमेश्वर की जाँच-परख और पड़ताल बंद कर देनी चाहिए। और जब ये संकेत दिखाई नहीं दें तब भी ऐसा मत करो। तुम्हें ऐसा क्यों नहीं करना चाहिए? यह मार्ग कहीं नहीं ले जाता; तुम्हें यह मार्ग नहीं अपनाना चाहिए। परमेश्वर का अनुसरण करने में तुम्हें जो मार्ग अपनाना चाहिए वह है सत्य स्वीकारना और परमेश्वर के प्रति समर्पण करना, न कि परमेश्वर की जाँच-परख, पड़ताल या परीक्षण करना। विशेष रूप से देहधारी परमेश्वर के साथ, अगर तुमने उसे कभी नहीं देखा है और तुम नहीं जानते कि वह कैसा दिखता है तब पहली मुलाकात में ध्यान से उसकी थाह लेना सामान्य है। उसकी थाह लेने के बाद तुम्हारे पास उसकी एक छवि होती है और तुम उसकी आवाज को धर्मोपदेश रिकॉर्डिंग में बोलने वाली आवाज से मिला सकते हो, “तो देहधारी परमेश्वर ऐसा दिखता है, यह उसका कद है, वह ऐसे तैयार होता है। वह सच में सामान्य, व्यावहारिक और साधारण है—यह सब सच है, ठीक वैसा जैसे परमेश्वर के वचनों में वर्णित है।” इतना काफी है; यहीं रुक जाओ। अपने दिल में इस मामले की पड़ताल करने का प्रयास मत करते रहो। इसके बाद तुम्हें परमेश्वर जो संगति कर रहा है उसे ध्यान से सुनना चाहिए, इस पर चिंतन करना चाहिए कि परमेश्वर जिस मामले पर संगति कर रहा है उसमें सत्य का कौन-सा पहलू शामिल है, उसे जल्दी से लिख लेना चाहिए, फिर अपने दिल से उस पर मनन करना चाहिए और उसे समझने के बाद उसे अभ्यास में लाना चाहिए। यही मसीह—देहधारी परमेश्वर—से पेश आने का सही तरीका है। मैं चाहे कैसे भी संगति करूँ, मैं चाहे किसी भी विषय पर संगति करूँ, जब इसमें देहधारी परमेश्वर शामिल होता है तब मैं उसे असाधारण, महान, अनोखा या दूसरों से भिन्न होने से जोड़ने या उसे इस रूप में जानने के बजाय हमेशा तुम लोगों को परमेश्वर की सामान्यता, व्यावहारिकता और साधारणता के बारे में बताने का प्रयास करता हूँ। मैं जिस भी मामले के बारे में बोलता हूँ, मैं जो भी उदाहरण देता हूँ, वह देहधारी परमेश्वर की सामान्यता, व्यावहारिकता और साधारणता के इस विषय से संबंधित होता है। मैं ऐसा कुछ भी बिल्कुल नहीं गढ़ूँगा जिससे तुम लोग गलती से यह सोच बैठो कि मैं दूसरों से भिन्न, असाधारण या महान हूँ, मुझमें एक अगुआ का आचरण है, किसी महान व्यक्ति की उदारता है या किसी महान व्यक्ति के मन की विशालता और उसकी ऊँचाई है। मैं तुम लोगों को बता दूँ, मुझे कभी यह समझ नहीं आता कि “ऊँचाई” या “मन की विशालता” का क्या मतलब है और न ही मैं इन पहलुओं पर चिंतन करता हूँ या उनमें अपना दिल लगाता हूँ। मैं क्या चिंतन करता हूँ? मैं यह चिंतन करता हूँ कि मैं तुम लोगों के साथ ऐसे किन विषयों पर संगति करूँ जो तुम लोगों को सत्य वास्तविकता में ला सकें, कौन-से विषय तुम्हें आग्रह कर सकते हैं, तुम्हारी अगुआई और मदद कर सकते हैं और तुम्हारा मार्गदर्शन कर सकते हैं ताकि तुम लोगों में कष्ट सहने और कीमत चुकाने की इच्छा और संकल्प हो और तुम सत्य का अनुसरण कर पाओ, अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कर पाओ और उद्धार प्राप्त कर पाओ। मैं हमेशा यह चिंतन करता हूँ कि मैं किन विषयों पर बोलूँ और कौन-से धर्मोपदेश दूँ ताकि लोग उद्धार के मार्ग पर चलना शुरू कर सकें, मानक-स्तर के तरीके से अपने कर्तव्य कर सकें और सच्चे सृजित प्राणी बन सकें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं किस विषय पर बोलता हूँ, मैं हमेशा तुम लोगों को मानक-स्तर के सृजित प्राणी बनने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर का भय मानने वाला दिल विकसित करने में मदद करने का प्रयास करता हूँ। मैं कभी यह चिंतन नहीं करता कि मैं ऐसे कौन-से वचन कहूँ जिससे तुम लोग मेरा सम्मान करोगे या ऐसी कौन-सी चीजें करूँ जिससे तुम लोग मेरी सराहना करोगे ताकि अपने दिलों में तुम लोगों को महसूस हो कि मैं किसी मशहूर या महान व्यक्ति के समान अथाह हूँ; मेरे दिल में इनमें से कोई भी चीज नहीं है। मैंने कभी इस बारे में नहीं सोचा कि मुझे कैसे बोलना चाहिए, मेरे बोलने का ढंग कैसा होना चाहिए या मुझे खुद को क्या उपाधि देनी चाहिए जिससे तुम लोग यह महसूस करो कि मैं बहुत ऊँचा हूँ, तुम लोग मेरी थाह न ले पाओ या मुझ तक न पहुँच पाओ और तुम लोग बहुत तुच्छ और जाहिल दिखो। मैं अपने दिल में इन चीजों के बारे में कभी नहीं सोचता और अपने रुतबे, छवि या पहचान की रक्षा करने के लिए न कभी बोलता हूँ, न ही कोई कार्य करता हूँ; मैं सिर्फ पूरे दिल से अपनी सेवकाई करता हूँ।
कभी-कभी जब मैं थक जाता हूँ तब मैं भाई-बहनों के रहने की जगहों पर सैर करने और आस-पास की चीजें देखने चला जाता हूँ। कभी-कभी मैं खेत के आस-पास भी टहलता हूँ, सब्जियों के खेतों को, सूअरों और भेड़ों को देखता हूँ। जब मुझे कोई बिल्ली का बच्चा दिखाई पड़ता है तब मैं उसे सहलाता हूँ, गले लगाता हूँ और उससे बातें करता हूँ। जब मुझे कोई प्यारा-सा पिल्ला दिख जाता है तब मैं उसे भी गले लगाता हूँ। एक कुतिया थी जिसने दस से ज्यादा पिल्लों को जन्म दिया था। वह लोगों के सामने बहुत ही खुश थी, मानो उसने कोई नाम कमाया हो। मैंने उसकी तारीफ की, कहा : “अब तुम खुद से खुश हो, है ना? देखो, तुमने कितने सारे पिल्लों को जन्म दिया है, तुमने सच में बहुत अच्छा काम किया, बहुत खूब, शाबाश!” मैंने उसे सहलाया और गले से लगाया। मैं कुत्तों के रहने की जगहों पर, खेत में और सब्जियों की बाड़ियों में भी जाता हूँ, हर जगह नजर दौड़ाता हूँ; यह वाकई अच्छा लगता है। मुझे बताओ, क्या वे महान हस्तियाँ इन गंदी, बदबूदार, अस्त-व्यस्त जगहों पर जाती हैं? वे नहीं जातीं। विशेष रूप से बदबूदार जगहों पर जैसे कि कुत्तों के रहने की जगहें और सूअरों के बाड़े—ज्यादातर लोग वहाँ जाने के इच्छुक नहीं होते हैं। मुझे भी दुर्गंध या अप्रिय गंध पसंद नहीं हैं, लेकिन पिल्ले की थोड़ी-सी गंध बर्दाश्त हो जाती है। कभी-कभी पिल्ले मेरी टाँगों से रगड़ खाते हैं, मेरे चेहरे को चूमते और चाटते हैं और मैं उन्हें गले लगा लेता हूँ। जानवर बहुत सरल होते हैं; उन्हें अपने मालिकों पर विश्वास होता है और चौकन्ना रहने की जरूरत नहीं होती, इसलिए वे अपने मालिकों के साथ जी भरकर खेल सकते हैं और घुल-मिल सकते हैं। उनके जीवन बहुत ही सरल होते हैं। कुछ लोग हमेशा कहते हैं कि उन्हें कुत्ते पसंद हैं, छोटे जानवर पसंद हैं और वे छोटे जानवरों की देखभाल करते हैं, लेकिन जब तुम उन्हें किसी पिल्ले को गले लगाने के लिए कहते हो तब वे आनाकानी करते हैं। वे कहते हैं, “कुत्ते गंदे और बदबूदार होते हैं और उनमें वायरस भी हो सकते हैं!” मैं कहता हूँ, “तुम बहुत ही मीन-मेख निकालने वाले व्यक्ति हो। क्या तुम्हें छोटे जानवर पसंद नहीं हैं? यह उन्हें सही मायने में पसंद करना नहीं है।” क्या ऐसे लोग काफी पाखंडी नहीं हैं? (हाँ।) वे खुद को साधारण लोग नहीं मानते हैं; उन्हें लगता है कि वे कुलीन हैं, उनके पास प्रतिष्ठा है और वे महान हस्तियाँ हैं, इसलिए वे इन छोटे जानवरों के साथ कैसे घुल-मिल सकते हैं जिन्हें लोग तुच्छ समझते हैं? अगर वे उन्हें अपने हाथों से छू भी लें तो उन्हें जल्दी से अपने हाथ धोने पड़ते हैं और खुद को कीटाणुरहित करना पड़ता है, और यहाँ तक कि वे अपने कपड़े भी बदल लेते हैं और घर पहुँचते ही तुरंत नहाते हैं। वे सफाई को इस हद तक ले जाते हैं। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोग अजीब नहीं हैं? अगर तुम्हें छोटे जानवर सच में पसंद नहीं हैं तो दिखावा मत करो। एक बार जब लोग देख लेते हैं कि तुम दिखावा कर रहे हो तब वे समझ जाते हैं कि तुम बहुत ही पाखंडी और निष्ठाहीन हो, तुम्हें देखकर उन्हें उबकाई आती है और उनके मन में तुम्हारी एक खराब छवि बन जाती है। अगर तुम्हें जानवर पसंद नहीं हैं तो यह दिखावा बिल्कुल भी मत करो और न ही खुद को अच्छा दिखाने का प्रयास करो। तुम खुद को अच्छा दिखाने का जितना ज्यादा प्रयास करोगे, लोग तुम्हें उतना ही बदसूरत और नीच समझेंगे। ईमानदार और सच्चा होना बहुत ही बेहतर है। अगर तुम ईमानदार और सच्चे नहीं हो सकते तो यह प्रमाणित करता है कि तुम्हारी मानवता में कोई समस्या है। बहरहाल, देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता एक तथ्य है और उसकी साधारणता भी एक तथ्य है। बहुत से लोगों ने उसके संपर्क में रहकर इन चीजों को देखा है और वे जानते हैं कि ये तथ्य हैं। ये वे तथ्य हैं जिन्हें तुम लोगों को सबसे ज्यादा समझना और जानना चाहिए। ऐसा ही एक साधारण, सामान्य व्यक्ति देहधारी परमेश्वर है और यह बात लोगों की धारणाओं के खिलाफ जाती है। अगर वह भ्रष्ट मानवजाति की तरह व्यवहार करता और चाहे उसने कुछ बड़ा किया हो या छोटा, इस बारे में दिखावा करता कि वह दूसरों से कितना भिन्न है और खुद को अलग रखने का प्रयास करता तो हो सकता है कि यह लोगों की धारणाओं के अनुरूप होता। एक तरफ यहाँ भ्रष्ट मानवजाति की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं और दूसरी तरफ यहाँ देहधारी परमेश्वर है, जो इतना सत्य व्यक्त करने के बावजूद अभी भी ऐसी अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करता है जो एक साधारण व्यक्ति के समान ही सामान्य हैं—इनमें से कौन-सी अभिव्यक्तियाँ वह सकारात्मक चीज है जो लोगों को फायदा पहुँचाती है? वह नकारात्मक चीज कौन-सी है जिससे लोग नफरत करते हैं और जिसे अस्वीकार करते हैं? क्या अब तुम लोग कुछ हद तक इसका भेद पहचानने में समर्थ हो? (हाँ।) तो फिर हमें और विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है; आओ, पिछली बार के विषय के साथ जारी रखें।
पिछली बार हमने देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देने के एक दूसरे विषय पर संगति की थी : देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के साथ एक ही तराजू में नहीं तोलना, है ना? (हाँ।) इस विषय पर मैंने, देहधारी परमेश्वर अपनी मानवता के परिप्रेक्ष्य से कैसे आचरण और कार्य करता है इस मामले में उसकी कुछ विशिष्ट अभिव्यक्तियों को और साथ ही उसके स्वभाव सार की कुछ अभिव्यक्तियों को सूचीबद्ध किया—धोखा नहीं देना, बहस नहीं करना, संघर्ष नहीं करना, षड्यंत्र नहीं करना, दूसरों को नीचा नहीं दिखाना, पलटवार नहीं करना, प्रलोभन नहीं देना वगैरह-वगैरह। पिछली बार हमने इनमें से धोखा नहीं देना, बहस नहीं करना और संघर्ष नहीं करना पर जरा-सी संगति की थी। इस बार हमें किस अभिव्यक्ति पर संगति करनी चाहिए? (षड्यंत्र नहीं करना।) धोखा नहीं देना, बहस नहीं करना और संघर्ष नहीं करना की तरह ही षड्यंत्र नहीं करना भी एक सिद्धांत है जिसके अनुसार देहधारी परमेश्वर, यह साधारण व्यक्ति, आचरण और कार्य करता है। यकीनन इस सिद्धांत में उसका मानवता सार और उसका स्वभाव भी शामिल है। षड्यंत्र नहीं करना भी देहधारी परमेश्वर, इस साधारण व्यक्ति, के स्वभाव सार और स्वभाव की एक विशिष्ट अभिव्यक्ति है या स्व-आचरण का एक पहलू है। क्या “षड्यंत्र नहीं करना” वाक्यांश को समझना आसान है? क्या तुम सभी इसे समझते हो? (हाँ।) षड्यंत्र नहीं करने की सबसे मूलभूत समझ है चालबाजी नहीं करना और युक्तियों या चालाकी भरे षड्यंत्रों का सहारा नहीं लेना। यानी जब तुम लोगों के साथ मेरा संपर्क रहता है और मैं तुम लोगों से मेलजोल रखता हूँ, चाहे कार्यस्थल पर हो या दैनिक जीवन में, तब मैं हमेशा ईमानदार और सच्चा रहता हूँ। मैं युक्तियों का सहारा नहीं लेता, चालाकी भरे कुचक्रों में शामिल नहीं होता और न ही चालबाजी करता हूँ। बल्कि मैं सच्चाई से बोलता हूँ, जो भी मेरे दिल में होता है वही कहता हूँ और चीजें जैसी हैं वैसी ही तुम लोगों को बताता हूँ। मैं तुम लोगों के खिलाफ षड्यंत्र नहीं करता और न ही तुम लोगों को धोखा देता हूँ। मैं तुम लोगों का विश्वास हासिल करने और फिर तुम लोगों को खुद को खपाने, कष्ट सहने और कीमत चुकाने का इच्छुक बनाने के लिए अलंकृत वचनों का उपयोग नहीं करूँगा। क्या तुम लोगों ने मुझे ऐसी चीजें करते देखा है? (नहीं।) जब मैं तुम लोगों से पूछता हूँ तब तुम लोग निश्चित रूप से कहोगे कि नहीं, लेकिन क्या तुम लोग इसे समझाने के लिए कोई उदाहरण दे सकते हो? अगर तुम लोगों में से हर कोई एक उदाहरण दे सके तो फिर यह तथ्य निर्विवाद रूप से प्रमाणित हो जाएगा और तुम लोगों के पास इस बिंदु—षड्यंत्र नहीं करना की सही मायने में कुछ समझ होगी। उदाहरण के लिए, कोई कहता है कि दुनिया में उसने कुछ कौशल सीखे और वह एक विशेष पेशे की समझ रखता है। संयोग से परमेश्वर के घर में एक ऐसा कार्य या जिम्मेदारी है जो उसके द्वारा सीखे हुए इस पेशे से जुड़ा है। मैं उससे बात करता हूँ, कहता हूँ, “तुम इस पेशे के बारे थोड़ा जानते हो और संयोग से परमेश्वर के घर में इस क्षेत्र में कार्य है। क्या अपने पेशेवर ज्ञान के आधार पर और तुम लोगों के क्षेत्र के नियमों या सिद्धांतों के अनुसार तुम इस कार्य को अच्छी तरह से कर सकते हो? अगर तुम इच्छुक हो तो यह कार्य तुम्हारा हुआ।” क्या इसमें कोई षड्यंत्र करने वाले या शोषणकारी वचन हैं? क्या ऐसे वचन हैं जो किसी चालबाजी को छिपाते हैं? (नहीं।) क्या तुम्हें यकीन है कि ऐसे वचन नहीं हैं? (बिल्कुल।) चूँकि तुमने अपनी सिफारिश की और इस पेशे को समझने वाले व्यक्ति के रूप में अपना परिचय दिया और मुझे तुम्हारी स्थिति के बारे में पता चला, इसलिए मैंने यह कार्य तुम्हें निर्दिष्ट किया। अगर तुम इसे करने के इच्छुक हो और तुम कहते हो, “मैं इसे परमेश्वर से स्वीकारता हूँ; मैं यह कार्य, यह कर्तव्य स्वीकारता हूँ,” यानी तुम इसे करने के लिए अपने आप को पेश कर रहे हो तो तुम्हें इसे अच्छी तरह से करना चाहिए। अगर तुम इच्छुक नहीं हो तो तुम मेरे मुँह पर कह सकते हो कि तुम यह कर्तव्य नहीं करना चाहते। क्या मैं तुम्हें मजबूर करूँगा? (नहीं।) लोगों से पेश आने के मेरे सिद्धांतों के अनुसार, मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूँगा। मैं घोड़े को पानी पीने के लिए बिल्कुल भी मजबूर नहीं करूँगा, अपनी व्यक्तिगत इच्छा के अनुसार चीजें करने के लिए तुम पर दबाव नहीं डालूँगा। अगर तुम नहीं चाहते तो मैं तुम्हें चीजें करने के लिए मजबूर नहीं करूँगा और न ही ऐसे कार्य करूँगा मानो, क्योंकि मेरी यह पहचान है इसलिए, मेरे वचन प्रभावपूर्ण होने ही चाहिए या वे अपनी निश्चितता और अटल होने में किसी सम्राट के वचनों जैसे होने ही चाहिए। मैं लोगों के साथ सहनशीलता से पेश आता हूँ; मैं तुम्हें अपने लिए चुनने की आजादी देता हूँ। मैं हमेशा परमेश्वर के घर के कार्य की जरूरतों के आधार पर कार्य की व्यवस्था करता हूँ। अगर उस क्षेत्र में अनुभव रखने वाले लोग हैं या विषय के जानकार लोग हैं जो कार्य करने के इच्छुक हैं और उसे बेहतर ढंग से कर सकते हैं तो यह निश्चित रूप से बहुत अच्छा है। अगर किसी को भी इसकी समझ नहीं है तो फिर हमारे पास जो क्षमताएँ हैं उनसे हम जितना कर सकते हैं, जिस भी हद तक कर सकते हैं, करते हैं। यही मेरा सिद्धांत है। अगर तुम्हें कुछ खास कार्य सौंपा जाता है, लेकिन तुम कहते हो, “मैं यह नहीं करना चाहता। मुझे लोगों द्वारा शोषित होना या परमेश्वर के घर द्वारा निर्देशित होना पसंद नहीं है; मैं अपने चयन खुद करता हूँ” तो ठीक है, परमेश्वर का घर तुम्हारा उपयोग नहीं करेगा। अपना कर्तव्य करना कुछ ऐसी चीज है जिसे तुम तत्परता से और खुशी से करते हो। लोग जब परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद अपना कर्तव्य करने के इच्छुक होते हैं, सिर्फ तभी कलीसिया उनके लिए कार्य की व्यवस्था कर सकती है। अगर तुम अपना कर्तव्य करने के इच्छुक नहीं हो तो परमेश्वर का घर तुम पर दबाव नहीं डालेगा और कलीसियाई कार्य करने के लिए तुम पर दबाव डालने के लिए मैं अपनी पहचान और रुतबे का उपयोग तो और भी नहीं करूँगा। यह पूरी तरह से सत्य समझने के जरिए ही है कि परमेश्वर के चुने हुए लोग अपना कर्तव्य करते हैं और कार्य करते हैं। जब लोग सत्य नहीं समझते हैं तब परमेश्वर का घर उन पर अपना कर्तव्य करने के लिए दबाव नहीं डालेगा और न ही उनसे अपेक्षा करेगा और मैं लोगों को पूरी तरह से अपनी इच्छा के अनुसार कार्य तो और भी नहीं करवाऊँगा। इसलिए, अगर मैं चाहता हूँ कि तुम कुछ करो तो मैं इसे स्पष्ट रूप से कहूँगा। तुम्हें अपना अर्थ समझाने के लिए मैं बिल्कुल भी युक्तियों का सहारा नहीं लूँगा, अप्रत्यक्ष संकेत नहीं दूँगा और न ही अस्पष्ट भाषा का उपयोग करूँगा। मैं ऐसा नहीं करूँगा। अगर तुम्हारे पास आध्यात्मिक कद है और तुममें परमेश्वर के घर के लिए कुछ कार्य करने का दायित्व बोध है तो मैं स्पष्ट रूप से तुमसे पूछूँगा, “क्या तुम यह कार्य स्वीकारने के इच्छुक हो?” या मैं और भी स्पष्ट रूप से कहूँगा, “बस यह कार्य संभाल लो।” मैं सच्चे ढंग से, सब कुछ सादी भाषा में बोलता हूँ। जब तक तुम मनुष्य हो तब तक तुम समझ सकते हो। तुम्हें यह सोचने-विचारने और समझने में दिमाग खपाने की जरूरत नहीं है कि मेरे वचनों का वास्तव में क्या अर्थ है या मैंने वे वचन क्यों कहे। मेरे वचनों का अर्थ समझने के लिए मैं तुम लोगों से दिमाग पर जोर नहीं डलवाऊँगा; मैं तुम लोगों को स्पष्ट रूप से बता दूँगा। मेरे वचनों का जो भी शाब्दिक अर्थ है, वही इसका अर्थ है। इसके अलावा, मैं तुमसे यह कार्य करने के लिए क्यों कहता हूँ? क्योंकि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य कर रहा है और तुम परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य करने के इच्छुक हो। इसलिए, परमेश्वर के घर में अपने हिस्से का योगदान देने के लिए परमेश्वर का घर तुमसे जो भी कार्य करने की अपेक्षा करता है उसे हाथ में लेना तुम्हारा दायित्व है। मैं तुम्हें जो भी कार्य या जो भी जिम्मेदारियाँ सौंपता हूँ, मैं उन्हें तुम्हें पूरी तरह से इसलिए सौंपता हूँ क्योंकि मैं तुम्हें परमेश्वर में विश्वासी मानता हूँ। तुम्हें उन्हें अपनी जिम्मेदारी, दायित्व और कर्तव्य के रूप में स्वीकारना चाहिए; ऐसा करना सही है। चाहे यह तुम्हें कार्य सौंपना हो या तुम्हें कार्य निर्दिष्ट करना, यह सब तुम्हारे द्वारा एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करने की खातिर है और साथ ही तुम्हारे द्वारा सत्य की तलाश करने और अपना कर्तव्य करने में सत्य प्राप्त करने के लिए भी है। यहाँ कोई लेन-देन से संबंधित रिश्ता नहीं है और न ही मैं तुम्हें फुसला रहा हूँ या धोखा दे रहा हूँ। ये सभी बोले गए वचन और निर्दिष्ट जिम्मेदारियाँ सकारात्मक और खुली हैं; यहाँ कोई रहस्य नहीं है। यहाँ धन, भौतिक चीजों या हितों का कोई रिश्ता शामिल नहीं है और न ही शोषण करने या शोषित होने का कोई रिश्ता शामिल है। यह फायदा हासिल करने के उद्देश्य से परमेश्वर के घर के लिए तुम्हारी शक्तियों, कौशलों या पेशेवर ज्ञान का उपयोग करने का मामला बिल्कुल नहीं है; परमेश्वर का घर ऐसा बिल्कुल नहीं करेगा। कर्तव्य करना पूरी तरह से इस बात से आता है कि व्यक्ति इसके लिए तैयार और इच्छुक है; परमेश्वर का घर कभी किसी पर दबाव नहीं डालता। तुम्हारे द्वारा यह कर्तव्य स्वीकारना वह कार्य है जो तुम्हें एक सृजित प्राणी के रूप में करना चाहिए। यह कर्तव्य करना तुम्हारे लिए परमेश्वर के कार्य को अनुभव करने और उद्धार प्राप्त करने का मार्ग भी है। अपना कर्तव्य करके तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण करना, सत्य प्राप्त करना सीखते हो और इस प्रकार परमेश्वर की स्वीकृति, स्मरण और मान्यता प्राप्त करते हो। यही वह फसल है जो तुम्हें तुमने जो समर्पित किया है उससे काटनी चाहिए। इसलिए, तुम्हें बिना किसी अविश्वास या संदेह के इस कार्य को अपने कर्तव्य के रूप में स्वीकारना चाहिए। मैं तुमसे जो भी करवाना चाहता हूँ, मैं तुम्हें वह सच-सच बता दूँगा। मुझे दो टूक बोलना पसंद है। मुझे तुम्हें तीन वर्ष के बच्चे की तरह फुसलाने, तुमसे घुमा-फिराकर और अस्पष्ट ढंग से बात करने की जरूरत नहीं है। मैं ऐसा नहीं करूँगा। अगर तुम गा सकते हो या नृत्य कर सकते हो और तुममें ये जन्मजात स्थितियाँ हैं तो जब तुम्हें यह कर्तव्य करने के लिए व्यवस्थित किया जाता है तब तुम्हें इसे स्वीकारना चाहिए। अगर तुम कहते हो, “मेरी जन्मजात स्थितियों के आधार पर मैं इस कर्तव्य के लिए पूरी तरह से योग्य नहीं हूँ। अगर मैंने यह कर्तव्य नहीं किया तो क्या यह ठीक है?” कोई बात नहीं। यह तुम्हारी आजादी है; मैं तुम पर दबाव नहीं डालूँगा।
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं क्या कहता हूँ या तुम लोगों से क्या करने के लिए कहता हूँ, इसमें कोई षड्यंत्र शामिल नहीं है। जब मैं अगुआओं और कार्यकर्ताओं से बात करता हूँ तब मैं उनसे पूछता हूँ, “हाल ही में कलीसियाई जीवन कैसा रहा है? नए लोगों ने कलीसियाई जीवन जीना शुरू कर दिया है—उनकी अभी भी क्या समस्याएँ हैं? क्या वे हल हो चुकी हैं? परमेश्वर के घर की फिल्में या अनुभवजन्य गवाहियाँ देखने के बाद उनके क्या विचार हैं?” कुछ अगुआ और कार्यकर्ता उत्तर नहीं दे सकते हैं। वे अपने दिलों में सोच-विचार करते हैं, “क्या तुम मुझसे अपनी असली स्थिति प्रकट करवाने के लिए झाँसा देने का प्रयास कर रहे हो? क्या तुम जाँच रहे हो कि मैंने कोई वास्तविक कार्य किया है या नहीं? मुझे सावधानी से उत्तर देना चाहिए और लापरवाह नहीं होना चाहिए! मैं उस कार्य के बारे में बात कर सकता हूँ जो अच्छी तरह से किया गया है, लेकिन अगर कोई कार्य नहीं किया गया है या अच्छी तरह से नहीं किया गया है तो मुझे उसका बिल्कुल जिक्र नहीं करना चाहिए। एक बार मैंने उसका जिक्र कर दिया तो समस्या उजागर हो जाएगी!” इसलिए, जब वे अपने कार्य की रिपोर्ट देते हैं तब वे हमेशा एक भी अतिरिक्त शब्द कहने से हिचकिचाते हैं और समस्याओं को उजागर करने से बहुत डरते हैं। ऐसे लोगों के मन पेचीदा होते हैं। जब मैं उनसे कुछ पूछता हूँ तब शब्द वास्तव में उनकी ज़ुबान पर होते हैं, लेकिन वे उन्हें सीधे नहीं कहते हैं। उन्हें अपने मन में इस पर सोच-विचार और काम करना होता है, “तुम यह क्यों पूछ रहे हो? मैं उचित रूप से कैसे उत्तर दूँ ताकि एक तरफ तुम वास्तविक स्थिति न जानो और दूसरी तरफ तुम संतुष्ट भी हो जाओ?” दरअसल, मैं अपने द्वारा कहे जाने वाले एक भी वचन को दिमागी छलनी से नहीं गुजारता। जब मैं प्रश्न पूछता हूँ तब मेरी क्या अवस्था होती है? जब मैं किसी को देखता हूँ और यह जानता हूँ कि वह किस कार्य के लिए जिम्मेदार है तब मैं इस बारे में तुरंत सोचता हूँ कि वह कौन-सी विशिष्ट जिम्मेदारियाँ पूरी कर सकता है, अपने कार्य में उसकी किन समस्याओं से सामना होने की संभावनाएँ ज्यादा हैं और उसे किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इन बातों पर विचार करते हुए मैं उससे सीधे पूछता हूँ, “तुम जिन कलीसियाओं के लिए जिम्मेदार हो, वहाँ हाल ही में कलीसियाई जीवन कैसा रहा है? क्या सभी कलीसियाई अगुआ और उपयाजक उपयुक्त हैं? क्या भाई-बहन जानते हैं कि परमेश्वर के वचनों को कैसा खाना और पीना है? क्या उनमें से ज्यादातर लोग आध्यात्मिक भक्ति में शामिल होते हैं? क्या वे अपने खाली समय में भजन और नृत्य सीखते हैं? सुसमाचार कार्य कैसा आगे बढ़ रहा है?” मेरे द्वारा पूछा गया हर प्रश्न सीधा और स्पष्ट होता है जिसमें कोई परीक्षण या गुप्त उद्देश्य नहीं होता। मैं बस कार्य और लोगों के जीवन प्रवेश पर गौर कर रहा हूँ। तुम चाहे कैसे भी उत्तर दो, तुम्हारा परीक्षण नहीं किया जाएगा और न ही मैं किसी भी चीज को तुम्हारे खिलाफ हथियार के रूप में प्रयोग करूँगा; इसमें अनजाने में अपना भेद बता देने या किसी चीज को तुम्हारे खिलाफ इस्तेमाल किए जाने का कोई मुद्दा नहीं है। मैं बस कार्य के बारे में पता लगाने का प्रयास कर रहा हूँ, मैं जानबूझकर किसी की स्थिति के बारे में पूछताछ नहीं कर रहा और न ही मैं किसी को सँभालने या बरखास्त करने के लिए निशाना बना रहा हूँ। कलीसिया वर्ग संघर्ष या गुटीय विवादों में शामिल नहीं होती—वह वास्तविक कार्य करती है। कभी-कभी जब मैं भाई-बहनों या अगुआओं और कार्यकर्ताओं से मिलता हूँ तब मैं बस यूँ ही गपशप करना चाहता हूँ, कुछ दिल को छू जाने वाले वचन कहना चाहता हूँ और रोजमर्रा की कुछ चीजों के बारे में बात करना चाहता हूँ। कभी-कभी मैं यह भी पूछता हूँ कि कलीसिया के कार्य में अभी भी क्या समस्याएँ मौजूद हैं। मैं जो कुछ भी कहता हूँ वह रोजमर्रा की भाषा होती है, वह सच्चे वचन हैं। उदाहरण के लिए, मैं तुमसे पूछता हूँ, “हाल ही में कलीसियाई जीवन कैसा रहा है? क्या भाई-बहनों को हर सभा से फायदा पहुँच सकता है? क्या कलीसियाई जीवन जीने से वास्तविक समस्याएँ हल करने में मदद मिल सकती है?” कुछ लोग जवाब देते हैं, “हाल ही में कलीसियाई जीवन अच्छा नहीं रहा है। भले ही हम इकट्ठा हो रहे हैं, फिर भी कोई बड़ा फायदा नहीं होता है और मूलभूत समस्याएँ नहीं सुलझाई जा सकती हैं।” फिर मैं पूछता हूँ, “समस्या कहाँ मौजूद है?” ज्यादातर लोग उत्तर नहीं दे सकते हैं। मुझे बताओ, क्या मेरे प्रश्न में कोई छल है? क्या इसके पीछे कोई चालबाजी है? बिल्कुल नहीं। मैं बस कार्य के बारे में पता लगाने और स्थिति पर पकड़ बनाने के लिए पूछता हूँ ताकि मैं तुम्हारे साथ सत्य की संगति कर सकूँ और समस्याएँ सुलझा सकूँ। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कैसे उत्तर देते हो, तुम्हारा परीक्षण नहीं किया जाएगा। कुछ अपेक्षाकृत सरल लोग सच्चाई से बोल सकते हैं। वे कहते हैं, “भाई-बहनों ने अभी-अभी परमेश्वर का कार्य स्वीकाऱा है और उन्हें अभी तक ज्यादा अनुभव नहीं है। सभाओं में उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं होता। अगर वे बहुत ही ज्यादा परमेश्वर के वचन पढ़ लेते हैं तो वे उन्हें समझ नहीं सकते और साथ ही उन्हें नींद भी आने लगती है और वे उन्हें आत्मसात नहीं कर सकते। हमें नहीं पता कि इसे कैसे सुलझाया जाए।” मैं कहता हूँ, “इसे सुलझाना आसान है। हर कोई पहले एक भजन गा सकता है, फिर जरा-सा नृत्य कर सकता है, फिर परमेश्वर के कुछ वचन पढ़ सकता है। जिन्हें समझ है वे अपनी समझ के बारे में बात कर सकते हैं और जिन्हें अनुभव है वे अपने अनुभव के बारे में बात कर सकते हैं। जिन्हें कोई समझ या अनुभव नहीं है वे भी अपनी वास्तविक कठिनाइयों का जिक्र कर सकते हैं और उन्हें हल करने के लिए अनुभवी भाई-बहनों से मदद ले सकते हैं। क्या इस तरीके से सभाएँ उपयोगी नहीं होंगी? छोटे आध्यात्मिक कद वाले लोगों की भी नैतिक उन्नति की जा सकती है।” देखो, क्या इससे यह समस्या सुलझ नहीं जाती? जब मैं लोगों से गपशप करता हूँ, कभी-कभी कुछ प्रश्न पूछता हूँ तब कुछ पेचीदा मन वाले लोग सोच-विचार करते हैं, “तुम्हारा प्रश्न काफी सीधा है। मुझे नहीं पता कि तुम यह पूछकर क्या कहना चाहते हो। मुझे अपने उत्तर में सावधान रहना चाहिए!” मैं कहता हूँ, तुमने इसे गलत समझ लिया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं किससे बात करता हूँ या क्या प्रश्न पूछता हूँ, अंतिम लक्ष्य हमेशा समस्याओं का पता लगाना और उन्हें सुलझाना होता है, तुम्हारी सहायता और मार्गदर्शन करना होता है और समस्याएँ सुलझाने में तुम्हारी मदद करना होता है। पहली बात, इसका उद्देश्य तुम्हें खोलकर रख देना और तुम्हें मूर्ख दिखाना नहीं है। दूसरी बात, इसका उद्देश्य तुम्हारा यह परीक्षण करना नहीं है कि तुम सच बोल रहे हो या नहीं या क्या तुम निष्कपट व्यक्ति हो। तीसरी बात, इसका उद्देश्य तुमसे अपनी वास्तविक स्थिति का खुलासा करवाने के लिए तुम्हें धोखा देना नहीं है। चौथी बात, इसका उद्देश्य यह परीक्षण करना तो और भी नहीं है कि तुम कार्य करने में कुशल हो या नहीं या तुम वास्तविक कार्य कर सकते हो या नहीं। दरअसल, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं कैसे गपशप करता हूँ, यह सब तुम्हें अपना कर्तव्य पूरा करने, कार्य अच्छी तरह से करने, समस्याएँ सुलझाने में तुम्हारी मदद और मार्गदर्शन करने के लिए है। कुछ लोग मेरी सरल पूछताछ को लेकर बहुत ही ज्यादा सोचते हैं, बहुत डरते हैं कि इसमें कोई छिपा अर्थ है। कुछ तो यह तक संदेह करते हैं कि मैं उनके खिलाफ षड्यंत्र कर रहा हूँ। स्पष्ट रूप से, मैं समस्याएँ सुलझाने में तुम्हारी मदद करना चाहता हूँ, फिर भी तुम गलती से सोचते हो कि मैं तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र कर रहा हूँ। क्या यह मेरे साथ अन्याय करना नहीं है? (हाँ।) तो यहाँ क्या मुद्दा है? मानव दिल धोखेबाज है! हालाँकि हो सकता है कि लोग जोर से कहें, “तुम परमेश्वर हो, मुझे तुम्हें सच बता देना चाहिए और तुम्हारे साथ स्पष्टवादी होना चाहिए। मैं तुम्हारा अनुसरण करता हूँ, मैं तुममें विश्वास रखता हूँ!”, लेकिन अपने दिल की गहराई में वे इस तरीके से नहीं सोचते। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे प्रश्न कितने साधारण और सरल हैं, लोग अक्सर उनकी व्याख्या अत्यधिक संवेदनशील तरीके से करते हैं। वे अपने अनुमानों और फिर जाँच-पड़ताल के जरिए कई आश्चर्यजनक बदलावों से गुजरते हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि वे अंतिम उत्तर पा लेते हैं, लेकिन दरअसल, यह मेरे वचनों के मूल इरादे से दूर है। यह स्पष्ट रूप से एक बहुत सरल प्रश्न है, फिर भी वे इसे लेकर बहुत ही ज्यादा सोचते हैं। क्या ऐसे लोग अत्यधिक संवेदनशील नहीं हैं? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं क्या पूछता हूँ, इसे सुनने के बाद उनके दिलों में उथल-पुथल मच जाती है : “तुम यह क्यों पूछ रहे हो? मैं ऐसे किस तरीके से उत्तर दूँ जो तुम्हें संतुष्ट कर दे और कोई कमी प्रकट न करे? मुझे पहले क्या और बाद में क्या कहना चाहिए?” तीन से पाँच सेकंड में बिना किसी देरी के शब्द निकल आते हैं। उनके दिमाग कंप्यूटर से भी तेज हैं। इतने तेज क्यों हैं? दरअसल, यह प्रक्रिया पहले से ही उनकी मूल प्रवृत्ति है; लोगों से निपटने और मामलों को सँभालने में यह उनकी सामान्य चाल और शैली है। वे सबके खिलाफ षड्यंत्र करते हैं। इसलिए, चाहे मेरी पूछताछ कितनी भी सरल क्यों न हों, वे उसे लेकर बहुत ही ज्यादा सोचते हैं, वे मानते हैं कि मेरा कुछ मकसद या लक्ष्य है। वे अपने दिलों में सोच-विचार करते हैं, “अगर मैंने सच्चाई से उत्तर दे दिया तो क्या मैं अपनी वास्तविक स्थिति को उजागर नहीं कर दूँगा? यह तो खुद से गद्दारी करने के समान है। मैं तुम्हें अपनी वास्तविक स्थिति जानने नहीं दे सकता। तो मुझे कैसे उचित ढंग से उत्तर देना चाहिए? मैं कैसे तुम्हें खुश और संतुष्ट कर सकता हूँ, अपने बारे में एक अच्छी छवि बनवा सकता हूँ और मेरा उपयोग करना तुमसे जारी रखवा सकता हूँ?” देखो, ये लोग कितने धोखेबाज हैं! इन लोगों के मन बहुत ही ज्यादा पेचीदा हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं इनसे कैसे बात करता हूँ, वे संदेह और जाँच-पड़ताल करेंगे। क्या ऐसे लोग सत्य का अभ्यास कर सकते हैं? क्या वे परमेश्वर के लिए उपयोगी हो सकते हैं? बिल्कुल नहीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोगों के मन बहुत ही ज्यादा पेचीदा होते हैं और बिल्कुल भी सरल नहीं होते; जो कोई भी लंबे समय तक उनके संपर्क में रहता है, वह इसे देख सकता है। लोग षड्यंत्र करने में विशेष रूप से अच्छे होते हैं, लेकिन जब मैं तुम लोगों से बात करता हूँ और संप्रेषण करता हूँ तब क्या मैंने तुम्हारे खिलाफ कभी षड्यंत्र किया है? (नहीं।) चाहे मैं तुम्हारी व्यक्तिगत अवस्था के बारे में पता लगाने का प्रयास कर रहा होता हूँ या तुम्हारी कार्य स्थिति के बारे में, यह हमेशा तुम्हारी मदद करने, कार्य की समस्याएँ हल करने के लिए होता है। भले ही तुम गलतियाँ करो और तुम्हारी काट-छाँट कर दी जाए या तुम्हें बरखास्त कर दिया जाए, मैं तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र नहीं करूँगा और न ही तुम्हें सताऊँगा। एक बार समस्या सुलझ जाती है तो बात समाप्त हो जाती है। परमेश्वर का घर तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र नहीं करेगा और न ही तुम्हें सताएगा और ऐसा तो मैं और भी नहीं करूँगा कि तुम्हारी गलतियों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करूँ और उन्हें जाने देने से इनकार कर दूँ, या तुम्हें बदनाम करने, सबको तुम्हें अलग-थलग कर देने और तुम्हें ठुकरा देने के लिए तैयार करने के तरीके सोचूँ जिससे तुम निराश महसूस करो और खुद ही इस्तीफा दे दो। मैं ऐसा बिल्कुल नहीं करूँगा। अगर तुम अगुआ या कार्यकर्ता होने के लिए उपयुक्त नहीं हो तो ज्यादा-से-ज्यादा मैं यही कहूँगा, “तुम्हारी काबिलियत बहुत ही खराब है और तुममें आध्यात्मिक समझ की कमी है। तुम अगुआ या कार्यकर्ता बनने के लिए उपयुक्त नहीं हो। अगर तुम्हें अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में चुन लिया जाता है तो भी तुम वास्तविक कार्य नहीं कर सकते।” परमेश्वर का घर इस कारण से तुम्हें बिल्कुल भी नहीं सताएगा और न ही तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करेगा।
परमेश्वर के घर के पास इस बारे में सिद्धांत हैं कि किस तरह के लोगों को पदोन्नत और इस्तेमाल करना है और किस तरह के लोगों को इस्तेमाल नहीं करना है, और किन लोगों को विकसित करना है और किन लोगों को नहीं करना है; यह सब परमेश्वर के घर के कार्य की जरूरतों पर आधारित है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसे पदोन्नत किया जाता है और किसे इस्तेमाल किया जाता है, उद्देश्य उन्हें विकसित करना है ताकि वे अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कर सकें और यह जान सकें कि परमेश्वर के कार्य का कैसे अनुभव करना है, और वे सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य की जिम्मेदारी उठाने और कार्य करने में समर्थ बन सकें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस समस्या को सुलझाया जा रहा है, उद्देश्य उन्हें ज्यादा सत्य समझने में और यह सीखने में सक्षम बनाना है कि जिन विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों से उनका सामना होता है, उनसे वे कैसे सबक सीखें और भेद पहचानने की क्षमता प्राप्त करें। इस तरीके से उनके लिए सभी पहलुओं से सत्य वास्तविकता में प्रवेश करना आसान हो जाता है। यह तुमसे सेवा करवाने के लिए तुम्हारा शोषण करने के बारे में नहीं है और इस बारे में तो और भी नहीं है कि किसी रिक्त पद को भरने के लिए तुम्हारा शोषण किया जा रहा है क्योंकि कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिल रहा है और जब कोई उपयुक्त व्यक्ति आ जाता है तब तुम्हें धक्के मारकर बाहर निकाल दिया जाता है। यह ऐसा नहीं है। दरअसल यह तुम्हें खुद को प्रशिक्षित करने का अवसर दे रहा है। अगर तुम सत्य का अनुसरण करते हो तो तुम मजबूती से डटे रहोगे; अगर तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते हो तो अभी भी तुम मजबूती से डटे नहीं रह पाओगे। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि परमेश्वर के घर को तुम अप्रिय लगते हो, इसलिए वह तुम पर अपना रोब जमाएगा और तुम्हें हटाने का अवसर ढूँढ़ेगा। जब परमेश्वर का घर कहता है कि वह तुम्हें विकसित करेगा और तुम्हें पदोन्नत करेगा तब वह सही मायने में तुम्हें विकसित करेगा। जो बात मायने रखती है वह यह है कि तुम सत्य के लिए कैसे प्रयास करते हो। अगर तुम सत्य रत्ती भर भी नहीं स्वीकारते तो परमेश्वर का घर तुम पर से भरोसा खो देगा और तुम्हें अब और विकसित नहीं करेगा। कुछ लोग एक अवधि तक विकसित किए जाने के बाद इसलिए बर्खास्त कर दिए जाते हैं क्योंकि उनकी काबिलियत खराब होती है और वे वास्तविक कार्य नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग अपने विकसित किए जाने की अवधि के दौरान सत्य रत्ती भर भी नहीं स्वीकारते हैं, मनमाने ढंग से कार्य करते हैं और परमेश्वर के घर के कार्य में गड़बड़ करते हैं और बाधा डालते हैं और बर्खास्त कर दिए जाते हैं। कुछ दूसरे लोग सत्य का बिल्कुल भी अनुसरण नहीं करते हैं, मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चलते हैं, हमेशा शोहरत, लाभ और रुतबे के लिए कार्य करते हैं और बर्खास्त कर दिए जाते हैं और हटा दिए जाते हैं। इन सभी स्थितियों को लोगों का उपयोग करने के लिए परमेश्वर के घर के सिद्धांतों के अनुसार सँभाला जाता है। परमेश्वर का घर अभी भी उन लोगों को विकसित करेगा जो सत्य स्वीकार सकते हैं और सत्य के लिए प्रयास कर सकते हैं, भले ही वे कुछ गलतियाँ करके अपराध करें। अगर यह कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो सत्य स्वीकार सकता है, और जब उसकी काट-छाँट की जाती है तब वह सत्य नहीं स्वीकारता है, तो फिर उसे सीधे बर्खास्त कर देना चाहिए और हटा देना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं: “क्या यह बेरहमी से किसी के सारे संसाधनों का फायदा उठाने के बाद उसे एक तरफ फेंक देने जैसा नहीं है? क्या यह लोगों का शोषण करना नहीं है?” मुझे बताओ, क्या परमेश्वर के घर द्वारा कभी किसी को इसलिए बर्खास्त किया गया है, हटा दिया गया है या उसे आगे और विकसित नहीं किया गया है क्योंकि शोषण करने के लिए उसके पास और कुछ नहीं बचा था? क्या कभी भी ऐसी चीज हुई है? (नहीं।) तो फिर किन हालातों में परमेश्वर का घर लोगों को बर्खास्त करता है या हटा देता है? (परमेश्वर का घर किसी को तभी बर्खास्त करता है या हटाता है जब वह कार्य की जिम्मेदारी नहीं उठा सकता या जब वह गड़बड़ियाँ और विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करता है और बुराई करता है।) किसी को भी अकारण बर्खास्त नहीं किया जाता। कुछ लोगों में खराब काबिलियत होती है और वे ठोस कार्य नहीं कर सकते। कुछ लोगों में एक विशेष काबिलियत होती है, लेकिन वे ठोस कार्य नहीं करते और न ही परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करते हैं; वे वह कार्य नहीं करते जिसमें वे सक्षम हैं, कलीसिया के कार्य को लेकर चिंतित होने और उसे करते हुए खुद को थका देने के इच्छुक नहीं होते, कष्ट सहने और कीमत चुकाने के इच्छुक नहीं होते और लोगों को नाराज करने के इच्छुक नहीं होते। ऐसे लोग वास्तविक कार्य नहीं कर सकते, इसलिए उन्हें हटा देना चाहिए; उनके लिए उस पद पर अब और बने रहना उचित नहीं है। वे न सिर्फ कलीसिया के कार्य में रुकावट डालते हैं, बल्कि वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश को भी प्रभावित करते हैं। ऐसी स्थिति में उनमें आत्म-जागरूकता होनी चाहिए और उन्हें जल्दी से इस्तीफा दे देना चाहिए ताकि जो लोग वास्तविक कार्य कर सकते हैं, वे इस कार्य को स्वीकार सकें। कुछ लोग वास्तविक कार्य नहीं करते, फिर भी वे रुतबे के फायदों का आनंद लेते हैं और यहाँ तक कि विघ्न-बाधाएँ और गड़बड़ियाँ भी उत्पन्न करते हैं। उन्हें हमेशा इस बात की चिंता सताती रहती है कि ऊपरवाला उनकी समस्याओं का पता लगा लेगा और उन्हें बर्खास्त कर देगा, इसलिए जब अपने कार्य के बारे में रिपोर्ट देने का समय आता है तब वे सत्य तलाशने के लिए कुछ प्रश्न उठाने का दिखावा करते हैं और विशेष रूप से अग्रसक्रिय दिखते हैं, ऊपरवाले के सामने एक अच्छी छवि प्रस्तुत करना चाहते हैं और यह प्रमाणित करना चाहते हैं कि वे ऐसे लोग हैं जो सत्य तलाशते हैं और वास्तविक कार्य कर सकते हैं। ऊपरवाला लोगों को इस आधार पर पदोन्नत और इस्तेमाल नहीं करता कि वे अच्छी तरह से बोल सकते हैं या नहीं, वे प्रश्न उठाने में कुशल हैं या नहीं या वे हाजिरजवाब हैं या नहीं, बल्कि लोगों को इस आधार पर चुनता और विकसित करता है कि वे सत्य से प्रेम करते हैं या नहीं, वे सत्य का अनुसरण करते हैं या नहीं और वे लगन से अपना कर्तव्य कर सकते हैं या नहीं। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो न सिर्फ ठोस कार्य नहीं करते या परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं करते, बल्कि गड़बड़ भी करते हैं और बाधा भी डालते हैं और परमेश्वर के घर के हितों को धोखा भी देते हैं। परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाएँ स्पष्ट रूप से निर्धारित करती हैं कि क्या करने की अनुमति नहीं है और क्या करना चाहिए, फिर भी वे एक भी मद कार्यान्वित नहीं करते और यहाँ तक कि लापरवाही से बुरे कर्म भी करते हैं। ऐसे बहुत-से लोग हुए हैं और उन सभी को बर्खास्त कर दिया गया है। स्थिति चाहे जो भी हो, जब परमेश्वर का घर इन लोगों को पदोन्नत करता है तब यह हमेशा उन्हें विकसित करने और उन्हें सत्य वास्तविकता की तरफ ले जाने के लिए होता है, वह यह उम्मीद करता है कि वे कलीसिया का कार्य अच्छी तरह से कर सकेंगे और उन कर्तव्यों को पूरा कर सकेंगे जो उन्हें पूरे करने चाहिए। अगर तुम्हें यह पता नहीं भी हो कि किसी कार्य को कैसे करना है क्योंकि तुम बेवकूफ हो और तुममें अंतर्दृष्टि की कमी है या क्योंकि तुम्हारी काबिलियत खराब है, जब तक तुम सत्य सिद्धांतों के लिए प्रयास करते हो, तुममें जिम्मेदारी का यह बोध है, तुम इस कार्य को अच्छी तरह से करने के इच्छुक हो और कलीसिया के कार्य का बचाव कर सकते हो, तब तक परमेश्वर का घर अब भी तुम्हें विकसित करेगा, भले ही तुमने अतीत में कुछ मूर्खता भरी चीजें की हों। कुछ लोग, हालाँकि उनकी काबिलियत जरा-सी खराब होती है, फिर भी कुछ आसान कार्य कर सकते हैं। हालाँकि समस्याओं को हल करने के लिए सत्य पर उनकी संगति अच्छे नतीजे नहीं दे सकती, लेकिन वे कलीसिया के कार्य का बचाव कर सकते हैं। हर सभा में सत्य के जिस भी पहलू पर संगति की जाती है, वे उसे स्वीकार पाते हैं और आज्ञाकारी और विनम्र बन पाते हैं। अगर कोई कार्य अच्छी तरह से नहीं किया जाता है तो वे उससे सबक सीख सकते हैं। हालाँकि उनकी काबिलियत जरा-सी खराब होती है, लेकिन उनके दिल सत्य के लिए प्रयास कर सकते हैं। एक अवधि तक कार्य करने के बाद वे प्रगति करते हैं और उनके नतीजे उत्तरोत्तर बेहतर होते जाते हैं। मेरी नजर में ऐसे लोगों के पास उद्धार प्राप्त करने की उम्मीद होती है। ज्यादातर लोग मानते हैं कि अच्छी काबिलियत वाले लोगों को उद्धार प्राप्त करने की संभावना होती है। मेरे विचार से आवश्यक रूप से ऐसा नहीं है। मुख्य बात यह है कि लोगों को सत्य का अनुसरण करना होगा ताकि वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकें, अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ सकें और उद्धार प्राप्त कर सकें। कुछ लोगों में औसत काबिलियत होती है और उनके कर्तव्य के नतीजे भी औसत होते हैं, लेकिन परमेश्वर के घर से वर्षों तक सिंचाई और भरण-पोषण प्राप्त करने के बाद वे सत्य में अपने दिल लगाने शुरू कर देते हैं और वे कुछ सत्यों को सचमुच समझने लगते हैं। वे कुछ व्यावहारिक अनुभव भी प्राप्त करते हैं, कुछ चीजों की असलियत जान सकते हैं और कुछ समस्याओं को सुलझा सकते हैं, जिससे वे कलीसिया के कार्य में उत्तरोत्तर प्रगति करते जाते हैं। यह काफी अच्छा है; ऐसे लोग विकसित किए जाने योग्य हैं। हालाँकि हो सकता है कि तुम इस कार्य के लिए पूरी तरह से योग्य न हो, लेकिन कम-से-कम ऊपरवाले के पास इस कार्य को करने में तुम्हारे प्रति कुछ पुष्टि है। मुझे बताओ, क्या कोई कर्तव्य करने के लिए लोगों की व्यवस्था करना उनका शोषण करना है? (नहीं।) इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कितना कार्य करने में सक्षम हो या तुम्हारी काबिलियत क्या है, तुम्हें पदोन्नत और इस्तेमाल करना तुम्हारा शोषण करना नहीं है। बल्कि इरादा यह है कि इस अवसर का उपयोग तुम्हें कार्य करने में प्रशिक्षित होने देने के लिए और सत्य के तुम्हारे अनुसरण के जरिए, कड़ी मेहनत करके और भारी दायित्व उठाकर तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए किया जाए। एक तरफ यह तुम्हें व्यक्तिगत रूप से पूर्ण बनाना है; दूसरी तरफ यह परमेश्वर के घर का कार्य पूरा करना भी है। तुमने अच्छे कर्म तैयार किए हैं और अपने व्यक्तिगत जीवन प्रवेश में लाभ भी प्राप्त किए हैं। यह बहुत ही अच्छा है! यह एक ही प्रयास में दो अच्छे नतीजे प्राप्त करना है। जिन लोगों को बेनकाब कर दिया गया और हटा दिया गया, उनमें से कुछ लोगों ने एक बार कहा था, “क्या तुम परमेश्वर के घर की सेवा करवाने के लिए मेरा शोषण करने का प्रयास कर रहे हो? नामुमकिन! मैं इतना बेवकूफ नहीं हूँ!” वे ऐसे शब्द कहने में भी सक्षम हैं—क्या वे सचमुच परमेश्वर में विश्वास रखते हैं? क्या ऐसे लोग सत्य समझते हैं? जरा-सा कर्तव्य करने के लिए लोगों की व्यवस्था करना उनका शोषण करना कैसे है? अगर तुम सही मायने में ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य समझता है तो तुम्हें सृष्टिकर्ता के इरादों को समझना चाहिए और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करना चाहिए। यही एक मनुष्य के रूप में अपनी जिम्मेदारी और दायित्व पूरे करना है। अगर तुममें इतना भी जमीर और विवेक नहीं है तो क्या तुम एक सृजित प्राणी कहलाने योग्य हो? अगर तुममें सही मायने में जमीर और विवेक है तो तुम्हें अपने कर्तव्य से सही ढंग से पेश आना चाहिए। अगर तुममें इसके लिए काबिलियत है तो तुम्हें सत्य के लिए प्रयास करना चाहिए। अगर तुम अग्रसक्रिय रूप से अपने हिस्से की जिम्मेदारी पूरी करने के इच्छुक हो तो परमेश्वर का घर तुम्हारे लिए निश्चित कार्य करने की, एक दायित्व उठाने की व्यवस्था करेगा। यह तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करना या तुम्हारा शोषण करना नहीं है, बल्कि तुम्हें पदोन्नत करना, तुम्हें विकसित करना, तुम्हें प्रशिक्षित होने देना और तुम्हें सत्य वास्तविकता में ले जाना है। यह इतना ही सरल है। कुछ लोग कहते हैं: “अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ, मेरा जोश काफी नहीं है और मेरी शारीरिक शक्ति कम होती जा रही है। मैं यह दायित्व अब और नहीं उठाना चाहता। क्या मैं इस्तीफा दे सकता हूँ?” मैं कहता हूँ कि कोई बात नहीं, लेकिन इस्तीफा देने से पहले तुम्हें इस पर अच्छी तरह से विचार कर लेना चाहिए। अगर यह सही मायने में शारीरिक कारणों से नहीं बल्कि इसलिए है क्योंकि तुम्हारे व्यक्तिगत विचार बदल गए हैं, तुम्हारे मन में कुछ अलग विचार आ गए हैं, तुम कष्ट सहने से डरते हो, थक जाने से डरते हो और ऊँचाई पर चढ़ने और फिर बुरी तरह से गिरने से डरते हो, तुम्हारा हमेशा यह विचार और दृष्टिकोण रहता है कि शिखर पर अकेलापन है—तो तुम्हें सावधान रहना होगा। इस आदेश, इस विशेष कर्तव्य को मत ठुकराओ; तुम्हें इस पर बड़े ध्यान से विचार करना चाहिए। ऐसे अवसर कभी-कभार ही मिलते हैं—वे दुर्लभ हैं, है ना? शायद तुम अड़ जाओगे, कहोगे, “तुम्हें मुझे इसके लिए राजी करने की जरूरत नहीं है। मैंने लंबे समय से इस बारे में सोचा है और पहले से ही फैसला कर लिया है। तुम मुझे इसके लिए राजी नहीं कर सकते; मैं इस थकान को अब और नहीं सहना चाहता। बाकी सभी आराम से हैं, अकेला मैं ही क्यों इतना थका-हारा रहूँ? क्या कष्ट सहना ही मेरी नियति है? मैं ऐसी कठिनाई सहने का इच्छुक नहीं हूँ! मैं खुद को किस्मत के भरोसे छोड़ने का इच्छुक नहीं हूँ! कलीसिया को मेरे खिलाफ षड्यंत्र नहीं करना चाहिए; मैं कलीसिया का गुलाम नहीं हूँ और न ही मैंने खुद को कलीसिया को बेचा है!” तुम्हें ये अप्रिय बातें कहना जारी नहीं रखना चाहिए; और ज्यादा कहने से तुम बहुत सारे पाप कर बैठोगे और तुम्हें अपने कहे शब्दों और अपने किए चुनावों की जिम्मेदारी लेने की जरूरत है। पहली बात, तुम आशीष पाने के लिए परमेश्वर में विश्वास रखते हो; तुमने खुद को परमेश्वर के घर को बेचा नहीं है। दूसरी बात, अगर तुम खुद को परमेश्वर के घर को बेचना भी चाहते तब भी परमेश्वर के घर को इस पर बड़े ध्यान से विचार करना पड़ता कि तुममें यह मूल्य है या नहीं, तुम्हें खरीदना उपयोगी होगा या नहीं। इसलिए अगर तुम्हें लगता है कि परमेश्वर का घर तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र कर रहा है और सेवा करवाने के लिए तुम्हारा शोषण करना चाहता है तो तुम गलत सोच रहे हो क्योंकि लोगों की जाँच करने के परमेश्वर के घर के मानक ये हैं कि वे परमेश्वर में सच्चाई से विश्वास रखते हैं या नहीं, वे सत्य से प्रेम करते हैं या नहीं, वे परमेश्वर के वचनों का पालन कर सकते हैं या नहीं और परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हैं या नहीं। परमेश्वर का घर इन मानकों के आधार पर लोगों को चुनता है और उन्हें विकसित करता है। अगर तुम परमेश्वर के घर के बारे में इतना बुरा सोचते हो तो तुम्हारे पास बिल्कुल भी जमीर या विवेक नहीं है और तुम पूरी तरह से बेकार हो। परमेश्वर का घर न सिर्फ तुम्हें अपने कर्तव्य के लिए इस्तेमाल नहीं करेगा, बल्कि उसे तुम्हें, एक छद्म-विश्वासी को, तुरंत हटा भी देना पड़ेगा। अगर तुम परमेश्वर में सच्चे विश्वासी नहीं हो तो तुम्हें परमेश्वर का घर तुरंत छोड़ देना चाहिए; परमेश्वर के घर में बस यूँ ही समय मत काटते रहो। तुम्हें परमेश्वर के घर में नहीं होना चाहिए; परमेश्वर के घर को ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है। जल्दी से चले जाओ।
चाहे मैं गपशप कर रहा होऊँ या औपचारिक रूप से संगति कर रहा होऊँ और उपदेश दे रहा होऊँ, मैं जो भी वचन बोलता हूँ, जिस भी मामले के बारे में बात करता हूँ और सत्य के जिस भी पहलू पर संगति करता हूँ उसका उद्देश्य तुम्हें अपनी भ्रष्ट अवस्थाओं को जानने, अपने दोषों, कमियों, अपर्याप्तताओं और कठिनाइयों को पहचानने और, सबसे महत्वपूर्ण रूप से, अपने भ्रष्ट स्वभावों और विभिन्न पृष्ठभूमियों और परिवेशों में अपने भ्रष्ट स्वभाव के प्रकाशनों को जानने में सक्षम बनाना है। जैसे ही तुम लोग अपने भ्रष्ट स्वभावों को जान लोगे, तुम्हें अपनी गहरी समझ हो जाएगी, तुम अपना माप जान जाओगे, तुम थोड़े ज्यादा विवेकी बन जाओगे। और तुम परमेश्वर के वचनों से अपनी तुलना करोगे और अपनी कठिनाइयों को हल करने के लिए परमेश्वर के वचनों में अभ्यास के प्रासंगिक सिद्धांतों और अभ्यास के मार्गों को ढूँढ़ोगे, चाहे यह तुम्हारे द्वारा दैनिक जीवन में प्रकट किए जाने वाले भ्रष्ट स्वभावों को हल करना हो या मानवता में कमियों को। धीरे-धीरे तुम इन भ्रष्ट स्वभावों और विभिन्न शैतानी विचारों और दृष्टिकोणों को, जिनसे परमेश्वर नफरत करता है, छोड़ दोगे और सत्य स्वीकारकर चीजों के बारे में अपने नजरियों में और अपने जीवन स्वभावों में सच्चे बदलाव प्राप्त करोगे। यही वह एकमात्र मार्ग है जो परमेश्वर के इरादों के अनुसार है। मैं जो वचन बोलता हूँ, चाहे दैनिक जीवन में तुम्हारे साथ गपशप करते हुए या औपचारिक रूप से संगति करते हुए और उपदेश देते हुए, इन सभी वचनों में हर वचन तुम लोगों की वास्तविक स्थितियों के आधार पर बोला जाता है। मैं ये वचन इसलिए बोलता हूँ क्योंकि मैंने तुम लोगों की जरूरतें देखी हैं। हालाँकि हो सकता है कि मेरे द्वारा सूचीबद्ध तथ्य कुछ सरल प्रक्रिया से गुजरे हों, लेकिन ये उदाहरण तुम लोगों की भ्रष्टता के प्रकाशनों और तुम लोगों के क्रियाकलापों के तथ्यों के आधार पर चुने गए प्रतिनिधि उदाहरण हैं। इन तथ्यों और उदाहरणों का उपयोग करके मैं मानवजाति के भ्रष्ट स्वभावों और प्रकृति सार को उजागर करता हूँ ताकि लोग आत्म-चिंतन कर सकें, और यह अच्छे नतीजे प्रदान करेगा। इसलिए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं किस विषय पर संगति करता हूँ, पहली बात, इसमें कोई जाल नहीं है; दूसरी बात, इसमें कोई चालबाजी नहीं है; और तीसरी बात, इसमें कोई परीक्षण नहीं है। यह सब तुम लोगों को परमेश्वर के इरादों और उसकी अपेक्षाओं को बेहतर ढंग से समझने में, लोगों और चीजों को देखने में सफल होने में, सत्य सिद्धांतों के अनुसार आचरण करने और कार्य करने में और अंततः परमेश्वर के सामने आने और उसके प्रति समर्पण और भय रखने में समर्थ बनाने के लिए है। ये सभी तथ्य हैं। इसलिए, जब मैं दैनिक जीवन में होने वाले कुछ मामलों पर तुम्हारे साथ संवाद या गपशप करता हूँ या औपचारिक कार्य-संबंधी आदान-प्रदान और पूछताछ करता हूँ तब चाहे कितने भी वर्ष बीत जाएँ, जब तुम पीछे मुड़कर देखोगे तब क्या तुम्हें मेरे वचनों में कोई चालबाजी या जाल दिखाई देगा? (नहीं।) क्या इसमें तुम लोगों का शोषण करने का कोई इरादा है? क्या इसमें तुमसे जबरन वसूली करने का कोई इरादा है? (नहीं।) क्या तुम्हें यकीन है? (बिल्कुल।) उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति किसी खेत में पशुपालन के लिए जिम्मेदार है। मैं उससे पूछता हूँ कि मुर्गी को एक अंडा देने में कितने दिन लगते हैं और वह सोचने लगता है : “तुम यह पूछकर कहना क्या चाहते हो? क्या तुम यह देखने का प्रयास कर रहे हो कि मैं मुर्गियों को ठीक से दाना खिला रहा हूँ या नहीं? तो फिर मुझे उचित ढंग से कैसे उत्तर देना चाहिए? अगर मैंने कहा कि वह दिन में एक अंडा देती है तो यह वास्तव में साध्य नहीं है; यह झूठ बोलना होगा। अगर मैंने कहा कि वह हर दो-तीन दिनों में एक अंडा देती है तो क्या तुम सोचोगे कि मैंने मुर्गियों को ठीक से नहीं खिलाया है और उन्हें पौष्टिक दाना नहीं दिया है? तो फिर मुझे कैसे उचित ढंग से उत्तर देना चाहिए?” वह अपने दिल में सोच-विचार करता रहता है और कभी उत्तर नहीं देता। वास्तव में यह पूछने के पीछे मेरा कोई और इरादा नहीं है; मैं बस इस बारे में कुछ जानकारी प्राप्त करना चाहता हूँ कि मुर्गियों को कैसे पाला जा रहा है। लेकिन जैसे ही मैं पूछता हूँ, वह इसका बहुत ही ज्यादा मतलब निकाल लेता है और यह अनुमान लगाने का प्रयास करता रहता है कि यह पूछकर मैं क्या कहना चाहता हूँ। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोगों से निपटना मुश्किल है? क्या ऐसे लोगों के संपर्क में रहते हुए सामान्य रूप से संवाद करना भी संभव है? संवाद करना असंभव हो जाता है। मेरी एक आदत है : मुझे इधर-उधर घूमकर चीजों का जायजा लेना हमेशा अच्छा लगता है। कभी-कभी मुझे कुछ समस्याओं का पता चल जाता है। अगर यह पर्यावरणीय स्वच्छता का मुद्दा है तो उसकी साफ-सफाई की जानी चाहिए। अगर यह कर्मचारियों से संबंधित मुद्दा है तो समायोजन किए जाने चाहिए। अगर यह पेशेवर कौशल से जुड़ा मुद्दा है तो हमें सलाह लेनी चाहिए और सीखना चाहिए। जब समस्याओं का पता चलता है तब उन्हें ठीक किया जाना चाहिए। हर रोज की गपशप के दौरान कई समस्याओं का अनजाने में ही पता चला है और उन्हें हल किया जा चुका है; कुछ वास्तविक समस्याओं को आसानी से हल कर दिया गया। इसलिए, लोगों को मेरे संपर्क में आते समय और मेरे साथ मेलजोल रखते समय इतना घबराने की कोई जरूरत नहीं है। बहुत-सी समस्याएँ लोगों के संपर्क में रहने से पता चलती हैं और आसानी से हल कर दी जाती हैं। लोगों के संपर्क में रहना और उनसे गपशप करना बहुत जरूरी है; यह सिर्फ स्थिति का पता लगाने और समस्याओं को ढूँढ़ निकालने के बारे में नहीं है, बल्कि साथ ही, समस्याओं को हल करने के बारे में भी है। क्या यह लाभ नहीं है? (हाँ।) जब मैं लोगों से गपशप करता हूँ तब कुछ लोग सच्चाई से बोलते हैं, जबकि दूसरे लोग बहुत पेचीदा तरीके से सोचते हैं और सच्चाई से बोलने की हिम्मत नहीं करते, हमेशा हैरान होते हैं कि मेरे शब्दों के छिपे हुए अर्थ तो नहीं हैं या मैं किसी के खिलाफ षड्यंत्र करने का प्रयास तो नहीं कर रहा हूँ। इसलिए, जैसे ही मैं उनसे कुछ पूछता हूँ, वे घबरा जाते हैं और उनके माथे से पसीना छूटने लगता है। मैं कहता हूँ, “गर्मी तो नहीं है, फिर तुम्हें पसीना क्यों आ रहा है?” वे कहते हैं, “हो सकता है कि तुम्हें गर्मी ना लग रही हो, पर मुझे तो लग रही है! तुम्हारी बातों ने मुझे इतना डरा दिया कि मेरा दिल सीने से उछलकर लगभग बाहर ही आ गया। अब मेरी हथेलियाँ और तलवे पसीने से तर हैं, मेरा दिल जोरों से धड़क रहा है और मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या करूँ।” मैं कहता हूँ, “तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं है। मैं तो सिर्फ यूँ ही बात कर रहा हूँ, सिर्फ गपशप कर रहा हूँ। अगर सच में कोई समस्या है तो हम उसे आसानी से हल कर लेंगे। मुझे इतना डरावना मत समझो, मानो किसी भी समस्या का पता चलने पर मैं तुम्हारे पूरे कुनबे को फाँसी पर लटका दूँगा। मैं लोगों को ‘हल’ नहीं करता; मैं समस्याओं को हल करता हूँ। समस्याओं को हल करना ही कुंजी है।” तुममें किस तरह की आस्था होनी चाहिए? एक तरफ मैं निश्चित रूप से सिद्धांतों के अनुसार, पूरी तरह से न्यायसंगत रूप से कार्य करता हूँ। मैं भावनाओं में बहकर, हठधर्मिता या मनमानी से कार्य नहीं करूँगा : ऐसा नहीं होगा कि तुम मुझे अप्रिय लगोगे, फिर मैं तुम्हारी गलतियाँ निकालूँगा, तुममें नुक्स निकालूँगा या कमियाँ ढूँढूँगा, और फिर तुम्हें बाहर निकाल दूँगा और कार्य करने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ लूँगा जो मुझे प्रिय लगता हो। दूसरी तरफ, मैं सभी से वास्तविक स्थिति और वास्तविक समस्या के आधार पर निपटता हूँ; इसके लिए कुछ सिद्धांत हैं। लोगों को गलतियाँ करने, बेवकूफ, कमजोर और नकारात्मक होने की अनुमति है। लेकिन एक चीज की अनुमति नहीं है : अगर तुम परेशान करने वाले व्यक्ति हो और जानबूझकर कलीसिया के कार्य में गड़बड़ करते हो और बाधा डालते हो तो तुम्हें आत्म-चिंतन करना चाहिए। अगर तुम परमेश्वर के घर के हितों का बचाव नहीं करते हो, अगर तुम हमेशा परमेश्वर के घर के हितों के साथ विश्वासघात करते हो तो कलीसिया को तुम्हारा कर्तव्य करने के लिए तुम्हारी जरूरत नहीं है; परमेश्वर के घर को तुम्हारी जगह लेने के लिए एक उपयुक्त व्यक्ति ढूँढ़ना पड़ेगा। यह सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना है। मैं समस्याओं को कैसे सुलझाता हूँ, मैं मुद्दों को कैसे सँभालता हूँ, मैं लोगों से कैसे निपटता हूँ—यह सब सिद्धांतों के अनुसार किया जाता है। तुम्हें इस बात की चिंता करने की जरूरत नहीं है कि अगर मुझे तुममें किसी समस्या का पता चला तो मैं तुमसे निपटूँगा; यह इस बात पर निर्भर करता है कि यह समस्या क्या है और समस्या की प्रकृति के अनुसार स्थिति को सँभाला जाएगा। अगर तुम्हारी समस्या की प्रकृति बहुत गंभीर नहीं है, अगर तुमने इसे जानबूझकर नहीं बल्कि क्षणिक चूक या बेवकूफी के कारण उत्पन्न किया है तो फिर इसे सत्य पर संगति के जरिए हल किया जाएगा। सबक सीखो और यह गलती दोबारा मत करो। कभी-कभी ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लोगों में ज्ञान और अनुभव की कमी होती है और वे कुछ पेशेवर कौशल नहीं समझते हैं; ऐसे में जल्दी से पेशेवर कौशल सीख लो और आलसी मत बनो। लेकिन अगर यह सोचा-समझा और इरादतन है, अगर तुम इस कर्तव्य को करने के अनिच्छुक हो और यहाँ तक कि परमेश्वर के घर की संपत्ति को नुकसान भी पहुँचाते हो तो इसे गंभीरता से सँभाला जाना चाहिए। जिन्हें बर्खास्त किया जाना चाहिए उन्हें बर्खास्त कर दिया जाएगा और जिन्हें भेज दिया जाना चाहिए उन्हें भेज दिया जाएगा; डरने का कोई फायदा नहीं है। अगर तुम लोगों में यह आस्था है तो जब मैं तुम लोगों से बात करता हूँ और तुम लोगों के साथ मामलों को सँभालता हूँ तब तुम लोग और ज्यादा सहज महसूस करोगे। जब मैं तुमसे बात करता हूँ या कार्य या पेशेवर मामलों पर चर्चा करता हूँ तब तुम्हें रिलैक्स रहना आना चाहिए, यह पता होना चाहिए कि परमेश्वर किसी के खिलाफ षड्यंत्र नहीं करेगा और न ही वह तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करेगा; तुम आश्वस्त रह सकते हो। अगर तुममें इतनी भी आस्था नहीं है, अगर तुम यह नहीं मानते कि परमेश्वर दयालु और धार्मिक है तो जब तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, देहधारी परमेश्वर का अनुसरण करते हो, मसीह का अनुसरण करते हो—तब तुम्हारी आस्था कहाँ है? तुम उसके साथ स्पष्टवादी होने में सफल कैसे हो सकते हो? अगर तुम हर मोड़ पर उससे सतर्क रहते हो, उसके बारे में अनुमान लगाते हो, उस पर संदेह करते हो और उसकी पड़ताल करते हो तो तुम्हारी उसमें सच्ची आस्था नहीं है। अगर तुम्हें इस व्यक्ति पर सच्चा भरोसा नहीं है, उसमें सच्ची आस्था नहीं है तो तुम मेरे वचनों पर किस हद तक विश्वास कर सकते हो? क्या ऐसा कोई कथन है जिस पर तुम सही मायने में विश्वास कर सकते हो, जिसे सही मायने में स्वीकार सकते हो? लगभग कोई भी नहीं है, है ना? (हाँ।)
एक बार मैं किसी कलीसिया में यह देखने गया कि वहाँ चीजें किस हाल में हैं। जब मैं कमरे में दाखिल हुआ तब सबसे पहले मैंने सबका अभिवादन किया। कुछ लोग मेरे पास आए, तुरंत मुझे बैठने के लिए एक कुर्सी दी और फिर कहा कि वे किसी बात पर चर्चा कर रहे हैं। जब वे बातें कर रहे थे तब अचानक मेरा ध्यान इस चीज पर गया कि कुछ क्षण पहले कमरे में चार-पाँच लोग थे, लेकिन अब सिर्फ दो ही बचे हैं। मैंने सोचा कि शायद वे अपने बालों में कंघी करने और हाथ-मुँह धोने वापस अपने कमरों में चले गए होंगे और थोड़ी देर में बाहर आ जाएँगे, मैं वहाँ काफी देर तक ठहरा रहा, लेकिन वे बाहर नहीं आए। तब मुझे समझ आया : उन्होंने मेरा स्वागत नहीं किया; मैं असुविधाजनक समय पर आ गया था। मैं बिन बुलाया मेहमान था। मेरे आने से उन्होंने बाधित और असहज महसूस किया। उन्होंने सोचा, “क्या तुम्हारे आने का कोई उद्देश्य है?” उन्हें जाल में फँसने का डर था, छले जाने का डर था, किसी चालबाजी का डर था, इसलिए उन्होंने मुझसे आमने-सामने मिलने से इनकार कर दिया और मुझसे संवाद या बातचीत करने से इनकार कर दिया। यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात नहीं है और न ही मैंने इसमें कोई नमक-मिर्च लगाया है। मैं कोई कहानी नहीं सुना रहा हूँ—यह सच में हुआ था। शायद जब मैं दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया तब जाकर उन्होंने राहत की साँस ली और कहा, “आखिर वह चला ही गया! अरे, डर के मारे मेरी तो जान ही निकल गई थी!” मैंने मन ही मन सोचा, क्या मुझमें इतना “जादू” है कि मैं लोगों को इस हद तक डरा सकता हूँ? मुझे बताओ, जब लोग ऐसी अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करते हैं तब यह किस समस्या का संकेत देता है? मैंने लोगों को परमेश्वर में इस तरह विश्वास रखते सच में कभी नहीं देखा। इस प्रकार का व्यक्ति अँधेरे कोनों में रहना पसंद करता है; वह प्रकाश में रहना पसंद नहीं करता और वह खुले और ईमानदार ढंग से रहना पसंद नहीं करता। मुझे बताओ, जब मैं तुम लोगों के संपर्क में होता हूँ तब क्या तुम लोग अटपटा और परेशान महसूस करते हो, क्या तुम लोग मेरे साथ संवाद नहीं करना चाहते? या क्या तुम मेरे संपर्क में आने के इच्छुक होते हो, कुछ सत्य प्राप्त करना चाहते हो और अगर इससे तुम्हें थोड़ी घबराहट हो तो भी तुम्हें कोई आपत्ति नहीं होती? तुम लोगों के मन की अवस्था क्या होती है? (वैसे तो हमें थोड़ी घबराहट होती है, लेकिन जब तक हम सत्य समझ सकते हैं और कुछ फायदा प्राप्त कर सकते हैं तब तक कोई बात नहीं।) ज्यादातर लोगों को मेरे संपर्क में आने और दो-तीन घंटे मेरे साथ संवाद करने के बाद, मेरी संगति के कई वचन बहुत महत्वपूर्ण लगते हैं, उन्हें वे ऐसी चीजें लगती हैं जो उन्होंने पहले कभी नहीं सुनी हैं, इसलिए उन्हें महसूस होता है कि उस दिन इन वचनों को सुनना अत्यंत सार्थक था और वे मेरी संगति सुनने के लिए विशेष रूप से इच्छुक हो जाते हैं। अगर मैं कभी-कभार कुछ हल्की-फुल्की बातचीत में शामिल होता हूँ तो वे थोड़ा निराश महसूस करते हैं और सिर्फ तभी संतुष्ट होते हैं जब वे मेरे वचनों से कुछ प्राप्त कर सकते हैं। ऐसे लोगों के लिए मैं कुछ सत्यों पर संगति करने का इच्छुक हूँ, जिसमें वास्तविक जीवन के मामले शामिल हों ताकि सभी को फायदा पहुँच सके। कुछ लोग जब मुझे देखते हैं तब हमेशा इस बात से डरते हैं कि मैं उनसे विशेष स्थितियों के बारे में पूछ लूँगा और उन्हें पता नहीं होगा कि कैसे उत्तर देना है और वे बहुत अजीब लगेंगे। ऐसे लोगों के मन बहुत ही जटिल होते हैं; वे सरल नहीं होते। दूसरे लोग सत्य की तलाश करने के इच्छुक होते हैं, वे अपना मजाक उड़ाए जाने के भय के बिना, अपनी सभी कठिनाइयों को खुलकर साझा करते हैं—इससे पेश आने का यही सही तरीका है। हमारी बातचीत और संवाद का सिद्धांत यह है कि हम अपने दिलों को खोलें और जो कुछ भी हमारे मन में है उसे कह दें, सच्चाई से बोलें। मैं सामान्य मानवता के भीतर तुम लोगों से जुड़ता हूँ और अंतःक्रिया करता हूँ। अपनी पहचान और रुतबे के कारण मुझे तुम लोगों से ज्यादा पता है, इसलिए यकीनन मुझे ज्यादा बोलना चाहिए। अगर तुम लोग सुनने के इच्छुक हो तो तुम कुछ प्राप्त कर सकते हो; अगर तुम सुनने के इच्छुक नहीं हो तो मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूँगा। जिन विषयों पर हम चर्चा करते हैं उन पर अगर तुम्हारे पास अंतर्दृष्टि, विचार, अनुभव, समझ या ज्ञान है तो तुम भी उन्हें साझा कर सकते हो। इसे अंतःक्रिया कहते हैं; यह सामान्य मानवता है। अगर तुम्हें लगता है कि मैं जो कह रहा हूँ वह बहुत महत्वपूर्ण है तो तुम्हें ध्यान से सुनना चाहिए। अगर मैं जो कह रहा हूँ उसे तुम आत्मसात नहीं कर सकते तो मैं बोलना बंद कर दूँगा और तुम्हें बोलने दूँगा। अगर तुम्हारे पास कहने के लिए कुछ नहीं है तो मैं तुमसे प्रश्न पूछूँगा और तुम्हारा मार्गदर्शन करूँगा। उदाहरण के लिए, हो सकता है कि मैं पूछूँ, “हाल ही में तुम्हारा कलीसियाई जीवन कैसा रहा है? क्या अपना कर्तव्य करने में तुम्हें कोई कठिनाई आ रही है?” अगर तुम्हें कठिनाइयाँ हैं तो तुम्हें उनके बारे में सच्चाई से बोलना चाहिए और मैं उन्हें हल करने में तुम्हारी मदद करूँगा। इसे अंतःक्रिया कहते हैं और यह कुछ ऐसी चीज है जो सामान्य मानवता में मौजूद होनी चाहिए। क्या यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे सभी पसंद करते हैं? (हाँ।) अगर तुममें जमीर और विवेक है तो तुम्हारी मानवता सामान्य होगी और हमारी बातचीत और वार्तालाप स्पष्टवादिता, भरोसे और सम्मान की नींव पर खड़ी की जा सकती हैं जिससे हम खुलकर बात कर सकेंगे और अपने दिलों में जो है उसे बोल सकेंगे। अगर तुममें जमीर और विवेक नहीं है और तुम सत्य की तलाश नहीं करना चाहते तो अभ्यास करने के लिए तुम्हारे लिए सिर्फ एक ही मार्ग है : अब से पड़ताल नहीं करना, मेरे वचनों और अभिव्यक्तियों से मेरे मन को पढ़ने का प्रयास नहीं करना, बेबस नहीं होना और परीक्षा लेने वाले शब्द नहीं बोलना सीखो। हो सकता है कि कुछ लोग कहें, “मैं ये चीजें प्राप्त नहीं कर सकता।” ऐसे में बस अपना मुँह बंद रखो। अगर तुम्हें चुप रहने के लिए कहा जाता है, लेकिन तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र कर रहा हूँ और तुम्हें बेबस कर रहा हूँ तो इसे भी सँभालना आसान है : तुम जा सकते हो। मैं जिससे भी मिलता हूँ, उससे मेरी कोई माँग नहीं होती और मैं कभी भी लोगों को बेबस नहीं करता। अगर कोई हमेशा मुझमें गलतियाँ ढूँढ़ता है और चाहे मैं उससे बात करूँ या न करूँ, उसे कभी ठीक नहीं लगता तो मैं ऐसे व्यक्ति से सिर्फ दूर ही रह सकता हूँ और उसके संपर्क से बच सकता हूँ। अगर कुछ लोग मेरे संपर्क में रहने से हमेशा डरते हैं, हमेशा यही सोचते रहते हैं कि मैं उनके खिलाफ षड्यंत्र करूँगा, लेकिन फिर भी कुछ सत्य प्राप्त करने के लिए मेरे संपर्क में रहना चाहते हैं तो मैं कहता हूँ कि ऐसी मानसिकता के साथ तुम सत्य प्राप्त नहीं कर सकते; तुम सत्य से प्रेम करने वाले व्यक्ति नहीं हो। लोगों के बारे में तुम हमेशा सबसे बुरा सोचते हो, यह मानते हो कि कोई भी तुम जितना अच्छा नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं तुमसे क्या कहता हूँ, तुम हमेशा यही सोचते हो कि मैं जरूर तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र कर रहा हूँ। तुम मेरा विश्वास नहीं करते और तुम्हें मुझ पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है। ऐसे में हमारे लिए मिलजुलकर रहना नामुमकिन है; कम-से-कम, मानवता के लिहाज से हम तालमेल में नहीं हैं। हमारा कोई एक जैसा शौक या रुचि नहीं है, अनुसरण करने या आकांक्षा करने के लिए कोई एक जैसा लक्ष्य नहीं है। मानवता के लिहाज से, तुम जिस मार्ग पर चलते हो, तुम्हारी खुशी, गुस्सा, दुःख और आनंद और तुम्हारी पसंद और रुचियाँ, ये सब मेरे से अलग हैं। तुम्हें जो कुछ भी पसंद है वह नकारात्मक है, जबकि मैं जिन विषयों पर बात करना चाहता हूँ, वे सभी सकारात्मक चीजें हैं। तुम हमेशा मेरी पड़ताल करने का प्रयास करते रहते हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं किस सत्य पर संगति करता हूँ, तुम हमेशा यही सोच-विचार करते रहते हो कि क्या उसमें कोई चालबाजी है, क्या मैं षड्यंत्र कर रहा हूँ, क्या तुम्हारा कोई नुकसान हो सकता है या तुम्हें धोखा दिया जा सकता है। अगर तुम हमेशा इन चीजों पर सोच-विचार करते रहते हो तो जब हम एक-दूसरे से बात करेंगे और मेलजोल रखेंगे तब किस तरह का नजारा बनेगा? (अटपटा-सा।) उस स्थिति में मुझे तुम्हारे आस-पास असहज महसूस होगा और तुम्हें मेरे आस-पास असहज महसूस होगा; हम दोनों असहज महसूस करेंगे। क्या इस तरह से एक-दूसरे के आस-पास रहना सिर्फ एक-दूसरे के लिए यातना नहीं होगी? क्या इसमें कोई खुशी होगी? इसमें कोई खुशी नहीं होगी। अगर मैं जो कहता हूँ उसे सुनना तुम्हें पसंद है, अगर तुम सुनने के इच्छुक हो, अगर मैं जिन विषयों पर बात करता हूँ वे वही हैं जिनकी तुम आकांक्षा करते हो, जिन्हें तुम दिल में संजोते हो, जिनका तुम अनुसरण करते हो और जो तुम्हारी मानवता की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं तो हमारे दिलों में कोई विमुखता या प्रतिरोध नहीं होगा, भले ही हम चुपचाप ही क्यों न बैठे रहें। हम मेलजोल रख सकते हैं और साथ रहकर हम तालमेल प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन मान लो कि मैं जो वचन बोलता हूँ तुम उन्हें सुनना नापसंद करते हो और यहाँ तक कि अपने दिल में विमुखता और प्रतिरोध भी महसूस करते हो, भले ही वे सभी बहुत ही व्यावहारिक और लोगों के लिए फायदेमंद हों। मैं जिन सकारात्मक चीजों के बारे में बोलता हूँ और समस्याएँ सुलझाने के लिए सत्य पर संगति के जो वचन बोलता हूँ, विशेष रूप से भ्रष्ट स्वभावों को हल करने के विषय, उन्हें तुम सही मायने में आत्मसात नहीं कर सकते और तुम्हें यह भी लगता है कि मैं तुम्हारा ब्रेनवॉश कर रहा हूँ, तुम्हें धोखा दे रहा हूँ, सुसमाचार का प्रचार करने और परमेश्वर के घर के प्रभाव को प्रसारित करने के लिए ज्यादा लोग प्राप्त करने के लिए तुम्हारा उपयोग करने का प्रयास कर रहा हूँ। ऐसे में तुम ही गलत हो। तुम हमेशा विकृत तरीके से सोचते हो, हमेशा तथ्यों को तोड़ना-मरोड़ना चाहते हो, काले को सफेद कहना चाहते हो, और यहाँ तक कि सत्य के हिसाब से जो सकारात्मक चीजें हैं, उन्हें भी ऐसी नकारात्मक, दुष्ट चीजों के रूप में वर्णित करना चाहते हो जो सामाजिक चलन के अनुरूप नहीं हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं क्या कहता हूँ, तुम यह विश्वास नहीं करते कि यह सत्य है, यह एक सकारात्मक चीज है। तो फिर हम संवाद नहीं कर सकते; क्योंकि कोई साझी भाषा नहीं है, हम तालमेल में नहीं रह सकते। हम एक ही मेज पर खाना नहीं खा सकते; हम एकदिल और एकमन नहीं हो सकते। तो फिर तुम किस तरह के व्यक्ति हो? सटीकता से कहा जाए तो तुम परमेश्वर के घर का हिस्सा नहीं हो; तुम एक अविश्वासी हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं जिन विषयों पर बात करता हूँ वे कितने उचित हैं, या अभ्यास के मार्ग और अभ्यास के सिद्धांत कितने उचित हैं, तुम हमेशा उनमें कुछ और ही मतलब ढूँढ़ लेते हो। तुम हमेशा उन्हें एक दुष्ट परिप्रेक्ष्य से और एक दुष्ट रुख और दृष्टिकोण से देखते, समझते और उनकी व्याख्या करते हो; मैं अभ्यास के जो सही मार्ग और अभ्यास के जो सिद्धांत बोलता हूँ, तुम उन्हें नहीं स्वीकारते। इसलिए, मुझे बोलते हुए सुनने से तुम्हें असहज महसूस होता है। इससे असहज महसूस क्यों होता है? क्योंकि ये तुम्हारी मानवता की जरूरतें नहीं हैं। तुम्हें किसकी जरूरत है? आजादी तलाश करने की, दौलत कमाने की, खाने, पीने और मौज-मस्ती करने की। तुम्हारे जीवन के आदर्श वाक्य हैं, “जीवन सिर्फ अच्छा खाने और सुंदर कपड़े पहनने के बारे में है” और “जब तक कर सकते हो, भरपूर मजे करो।” तुम्हें क्या पसंद है? तुम्हें बुरे चलन, अजीबोगरीब कपड़े, चर्चित हस्तियाँ और मशहूर लोग और मनुष्य की असाधारणता और महानता पसंद है। ऐसा होने पर तुम परमेश्वर में सच्चे विश्वासी नहीं हो, तुम परमेश्वर के घर का हिस्सा नहीं हो; तुम्हारी मानवता को सकारात्मक चीजों की कोई जरूरत नहीं है। जब मैं तुमसे मेलजोल रखता हूँ तब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं क्या कहता हूँ, मैं क्या करता हूँ या मैं यह कैसे करता हूँ, जिन लोगों में जमीर, विवेक या सामान्य मानवता की जरूरतें नहीं हैं, उनके लिए यह सब सिर्फ एक सिद्धांत है, एक कहावत है, एक विधि है। कुछ लोग तो यहाँ तक सोचते हैं, “जब तुम बोलते हो तब तुम बहुत विस्तार में चले जाते हो और उदाहरण भी देते हो। क्या यह सिर्फ अपने विचारों और नजरियों को लोगों के दिलों में गहराई से बिठाने का प्रयास नहीं है? क्या यह सिर्फ लोगों को तुम्हारे विचार और नजरिये स्वीकार करवाने, उनका ब्रेनवॉश करने और समय के साथ उन्हें अपने विभिन्न विचारों और नजरियों से सुन्न करने का प्रयास नहीं है?” अगर तुम सच में ऐसा महसूस करते हो, अगर तुम मानते हो कि ये वचन सत्य नहीं हैं, वह सच्चा मार्ग नहीं है जिसे लोगों को स्वीकारना चाहिए और अभ्यास करना चाहिए और न ही वे सिद्धांत हैं जिनका लोगों को पालन करना चाहिए तो तुम इन्हें स्वीकारने से इनकार कर सकते हो; यह तुम्हारी आजादी है। तुम कलीसिया छोड़ भी सकते हो। तुम्हारे पास अपने लिए चुनने का अधिकार है और सत्य स्वीकारने से इनकार करने का अधिकार भी है। लेकिन तथ्यों को तोड़ो-मरोड़ो नहीं और न ही काले को सफेद कहो। सत्य हर समय सत्य ही होता है; कुछ दानवों और राक्षसों द्वारा इसे नकारने और इसकी निंदा करने के कारण यह सत्य होना बंद नहीं हो सकता और यह सत्य होना इसलिए तो बिल्कुल भी बंद नहीं हो सकता क्योंकि बहुत से लोग इसे नापसंद करते हैं या स्वीकार नहीं करते। सत्य हमेशा अस्तित्व में रहता है; यह अनंतकाल तक अपरिवर्तनशील है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसे कितने लोग स्वीकार सकते हैं, सत्य हमेशा के लिए सत्य है। तुम लोगों के साथ मेरी वार्तालाप, संवाद और अंतःक्रियाएँ तुम लोगों का मुझमें जो भरोसा है पूरी तरह से उसकी नींव पर निर्मित हैं; यह सबसे मूलभूत सिद्धांतों में से एक है। भरोसा प्राप्त करने के लिए सबसे जरूरी चीज यह है कि तुम सभी को अपने दिलों में यह पुष्टि करनी होगी कि वह हर वचन जो मैं कहता हूँ, वह हर प्रश्न जो मैं पूछता हूँ और वह हर मुद्दा जिसके बारे में मैं बात करता हूँ उसमें कोई षड्यंत्र, कोई चालबाजी, कोई जाल और यकीनन तुम्हारी कोई परीक्षा नहीं है। इसलिए तुम लोग निश्चिंत रह सकते हो—जब मैं तुम लोगों से मेलजोल रखता हूँ तब इससे तुम्हें पूरी तरह से आजाद और तनावमुक्त महसूस होना चाहिए। अगर तुम लोगों को लगता है कि मुझसे मेलजोल रखना आजाद या तनावमुक्त करने वाला नहीं है, तुम या तो बेबस हो जाते हो या बहुत असहज हो जाते हो या फिर अपने दिलों में हमेशा सतर्क रहते हो तो फिर मैं कहता हूँ कि यह सच में मेरी समस्या नहीं है, बल्कि तुम लोगों की समस्या है। तुम लोगों की समस्या किस पहलू में मौजूद है? खुद तुम लोगों को इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि तुम लोगों की क्या समस्याएँ हैं और तुम अपने दिलों में क्या सोच रहे हो; फिर विशिष्ट समस्याओं को विशिष्ट रूप से सुलझाओ। तुम लोगों को जिन भी समस्याओं का पता चलता है, उन्हें सुलझाओ। अगर तुम्हें बहुत-सी समस्याओं का पता चलता है तो उन्हें दर्ज कर लो और फिर उन्हें एक-एक करके सुलझाओ। अगर हर समस्या को तुरंत नहीं सुलझाया जा सकता तो उन्हें एक समय में एक-एक करके धीरे-धीरे सुलझाओ। जब ये चीजें घटित हों तब तुम्हें जाँच और चिंतन करना चाहिए, यह देखना चाहिए कि उस समय तुम वास्तव में क्या सोच रहे थे, तुम किन मुद्दों पर उस तरीके से सोचते हो और किन मुद्दों पर तुम्हारे क्या दृष्टिकोण बनते हैं; फिर धीरे-धीरे उन्हें हल करो। एक दिन जब तुम अपने दिल में मौजूद इन विचारों और दृष्टिकोणों को जाने दोगे तब ये सभी समस्याएँ हल हो जाएँगी और तुम सही मायने में सत्य समझ जाओगे और सत्य का मूल्य देखोगे, तब जाकर तुम मुझ पर भरोसा करोगे। तुम विश्वास करोगे कि मैं किसी भी व्यक्ति और किसी भी समस्या से सत्य सिद्धांतों के अनुसार पेश आ सकता हूँ और तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र बिल्कुल नहीं करूँगा। नतीजतन, हमारी बातचीत तनावमुक्त और आनंदमय हो सकेगी, हम तालमेल में रह सकेंगे और फिर हमारे इस तालमेल से खुशी का विस्तार हो सकेगा। खुशी, सुख, शांति और आनंद होना—क्या यह अच्छा नहीं है? (हाँ है।)
जब मैं लोगों के संपर्क में आता हूँ तब कभी-कभी मैं उनसे पूछता हूँ कि उन्हें परमेश्वर में विश्वास रखते हुए कितने वर्ष हो गए हैं। कोई कहता है कि उन्हें विश्वास रखते हुए सिर्फ तीन वर्ष हुए हैं और वे शर्मिंदा महसूस करते हैं। वे अपने दिल में सोचते हैं कि उन्हें परमेश्वर में विश्वास रखते हुए बहुत कम समय हुआ है और उनका आध्यात्मिक कद छोटा है, इसलिए जब वे अपनी तुलना उन लोगों से करते हैं जिन्हें विश्वास रखते हुए दस, बीस या तीस वर्ष हो चुके हैं तब वे हमेशा खुद को उनसे हीन, कमतर महसूस करते हैं। वे सोच-विचार करते हैं, “क्या तुम यह इसलिए पूछ रहे हो ताकि मुझे यह याद दिलाओ कि मुझे परमेश्वर में विश्वास रखते हुए थोड़ा समय ही हुआ है, मेरा आध्यात्मिक कद छोटा है और परमेश्वर के घर ने मुझे पदोन्नत करने में नियमों में छूट दी है, और ताकि मुझे परमेश्वर के घर के प्रति बहुत ही एहसानमंद महसूस करवाओ?” ऐसा प्रश्न उन्हें इतना अजीब क्यों बना देता है? वह इसलिए क्योंकि वे मेरे प्रश्न को बहुत ही ज्यादा जटिल बना देते हैं, सोचते हैं कि मेरे वचनों में कोई चालबाजी है और मैं उनके खिलाफ षड्यंत्र कर रहा हूँ। वे इतने सरल प्रश्न में भी अर्थ की कई परतें ढूँढ़ लेते हैं। तीन वर्ष से विश्वास रखने की बात कहने के बाद उन्हें महसूस होता है कि वे एक मुश्किल स्थिति में पड़ गए हैं। क्या वे अपने दिल में मेरे प्रश्न से असंतुष्ट नहीं हैं? दरअसल मैंने यह प्रश्न बिना किसी विशेष इरादे से पूछा है और मैं यह उम्मीद नहीं करता कि यह तुम्हें किसी मुश्किल स्थिति में डाल देगा। तो फिर तुम्हें ऐसा क्यों लग रहा है कि तुम किसी मुश्किल स्थिति में पड़ गए हो? वह इसलिए क्योंकि तुम्हारा मन बहुत ही ज्यादा जटिल है। क्या मेरे प्रश्न में कुछ गड़बड़ है? (नहीं।) मैं तो बस इसे यूँ ही पूछ रहा हूँ। अगर मैं तुमसे पूछूँ कि तुम्हारे कितने प्रेमी रह चुके हैं तो यह अनुचित हो सकता है क्योंकि यह तुम्हारे निजी मामलों में ताक-झाँक करना होगा। लेकिन मैं जिस बारे में पूछ रहा हूँ वह परमेश्वर में तुम्हारी आस्था से संबंधित कुछ है—मैं तुमसे पूछ रहा हूँ कि तुम कितने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रख रहे हो। क्या यह उचित नहीं है? (हाँ, है।) तो फिर तुम उत्तर देने की हिम्मत क्यों नहीं करते? यह वाकई मेरी समस्या नहीं है; यह तुम्हारी समस्या है। तुम्हारा मन बहुत ही ज्यादा जटिल है। तुम्हारे इस जटिल मन में क्या समस्या है? क्या ऐसा नहीं है कि तुम्हारा स्वभाव दुष्ट और धोखेबाज है? (हाँ।) मैं तुमसे यह क्यों पूछता हूँ कि तुम कितने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रख रहे हो? यह मैं तुम्हारे आध्यात्मिक कद और इस बारे में पता लगाने के लिए पूछता हूँ कि तुम कौन-से सत्य समझते हो, क्या तुमने कोई आधार स्थापित किया है, तुम्हें क्या कठिनाइयाँ हैं, क्या तुम कोई कर्तव्य कर सकते हो और क्या तुमने किसी परीक्षा का अनुभव किया है। इन चीजों के आधार पर मैं तय करता हूँ कि तुम्हारे साथ किस बारे में संगति करनी है, क्या प्रेरणाएँ देनी हैं, और बस इतना ही। मेरे इतने सरल विचार का तुम यह गलत मतलब निकाल लेते हो कि मेरे कुछ छिपे हुए मकसद हैं, जिससे तुम मेरे प्रति विमुख हो जाते हो। मुझे बताओ, क्या यह बस मेरे अच्छे इरादों के बदले में मुझे परेशानी मिलना नहीं है? (हाँ।) जब मैं तुमसे पूछता हूँ कि तुम कितने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रख रहे हो तब क्या मेरा ऐसा कोई मकसद होता है जो तुम्हें नीचा दिखाने का प्रयास कर रहा हो? (नहीं।) क्या कोई दुर्भावना होती है? क्या तुम्हें अटपटा महसूस करवाने और बुरा दिखाने का कोई इरादा होता है? (नहीं।) चाहे तुम कुछ महीनों से परमेश्वर में विश्वास रख रहे हो या एक-दो वर्षों से, मेरा इरादा बस तुम्हारी मदद करना है। यह देखकर कि तुम अपने अनुसरण में काफी ईमानदार हो, काफी उत्साही हो, यह देखकर कि तुम बहुत कष्ट सहते हो, बहुत कीमत चुकाते हो और बहुत कुछ छोड़ देते हो, मैं तुमसे वार्तालाप करना चाहता हूँ ताकि तुम कुछ ऐसा प्राप्त कर सको जो तुम्हें सामान्य रूप से नहीं मिलेगा। यह प्रश्न कि तुम कितने वर्षों से विश्वास रख रहे हो, एक तरफ तो तुम्हारे प्रति चिंता की वजह से आता है और दूसरी तरफ तुम्हें प्यारा समझने की वजह से आता है। क्या इसमें कोई दुर्भावना है? (नहीं।) यह बहुत ही उचित प्रश्न है, फिर भी उस व्यक्ति ने इसे तोड़-मरोड़कर क्या बना दिया है? “तुम चाहते हो कि सभी को पता चल जाए कि मुझे परमेश्वर में विश्वास रखते हुए लंबा समय नहीं हुआ है, मेरा आध्यात्मिक कद छोटा है और मैं कोई सत्य नहीं समझता, मैं दूसरों से बदतर हूँ, मैं कमतर हूँ और तुम मुझे शर्मिंदा करना चाहते हो।” अगर तुम इस तरीके से सोचते हो तो क्या फिर भी हम मेलजोल रख सकते हैं? (नहीं।) इसलिए, हमें मेलजोल रखने और तालमेल से रहने में सफल होने के लिए पहली बात यह है कि तुम लोगों को मुझ पर भरोसा करना होगा और तुम लोगों को मुझ पर संदेह नहीं करना चाहिए और न ही मेरे बारे में अनुमान लगाना चाहिए। अगर हमारे बीच कोई बातचीत नहीं होती है तो समस्या कहाँ मौजूद है? यह लोगों में मौजूद है; यानी लोगों को हर किस्म की कठिनाइयाँ हैं। और ये विभिन्न कठिनाइयाँ कहाँ से उत्पन्न होती हैं? ये लोगों के विभिन्न गलत विचारों और नजरियों से उत्पन्न होती हैं। तो अभी-अभी जिस व्यक्ति का जिक्र किया गया है, उसके क्या गलत विचार और दृष्टिकोण हैं? वह सोचता है कि परमेश्वर में विश्वास रखते हुए तीन ही वर्ष होने का मतलब है वह कलीसिया में एक नया विश्वासी है, विश्वास रखते हुए सिर्फ थोड़ा समय ही होना शर्मनाक है, यह उसे कमतर बनाता है, वह सत्य का बहुत ही कम हिस्सा समझता है और अभी भी अनुभवजन्य गवाहियाँ साझा नहीं कर सकता। इस प्रकार वह खुद को “द्वितीय श्रेणी का नागरिक”, दूसरों द्वारा नीची नजर से देखा जाने वाला व्यक्ति समझता है और उसे इस बारे में बात करना शर्मनाक और अपमानजनक लगता है। दूसरी तरफ, दूसरे लोग दस-बीस वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखे हुए हैं, जबकि वह सिर्फ तीन वर्षों से विश्वास रखे हुए है और इसलिए उसे चिंता होती है कि दूसरे लोग उससे कहेंगे, “तुम उन सभी वर्षों के दौरान क्या कर रहे थे? तुमने इसे जल्दी क्यों नहीं स्वीकार किया? क्या तुम्हारा कोई शर्मनाक अतीत है?” सांसारिक लोगों की नजर में योग्यताओं, अनुभवों और पृष्ठभूमियों को बहुत महत्व दिया जाता है और वे लोगों को अलग-अलग श्रेणियों में वर्गीकृत करने के लिए इनका उपयोग करते हैं। तो इस व्यक्ति का दृष्टिकोण क्या है? वह लोगों की पृष्ठभूमियों और अनुभवों को भी बहुत महत्व देता है, इसलिए उसके दिल में इस आधार पर अलग-अलग श्रेणियाँ हैं कि व्यक्ति तीन वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखे हुए है, या पाँच वर्षों से, दस वर्षों से, बीस वर्षों से या फिर तीस वर्षों से। यह श्रेणीकरण उसे महसूस करवाता है कि उसके तीन वर्षों की आस्था कलीसिया में कुछ हद तक शर्मनाक चीज है, यह “द्वितीय श्रेणी का नागरिक” होने जैसा है। उसके लिए यह शर्मिंदगी की, अपमान की निशानी है। वह व्यक्ति को परमेश्वर में विश्वास रखते हुए कितने वर्ष हो गए, इस संख्या को बहुत महत्वपूर्ण मानता है और संयोग से उसे परमेश्वर में विश्वास रखते हुए सिर्फ तीन ही वर्ष हुए हैं। अगर तीन के बाद एक शून्य जोड़ दिया जाए जिससे यह तीस वर्षों की आस्था हो जाए तो उसे लगेगा कि यह गौरव की बात है। वह कहेगा : “मैं परमेश्वर के कार्य को स्वीकारने वाले पहले समूह में था। मैंने परमेश्वर का अनुसरण तब किया जब उसने प्रकट होना और कार्य करना शुरू किया। इन सभी वर्षों के दौरान मैं हर जगह सुसमाचार का प्रचार करता रहा हूँ और परमेश्वर की गवाही देता रहा हूँ, परमेश्वर के राज्य के निर्माण के लिए उसके साथ-साथ लड़ता रहा हूँ! मैं परमेश्वर के घर में एक अनुभवी व्यक्ति हूँ, एक संस्थापक हस्ती हूँ!” उसे लगेगा कि यह विशेष रूप से गौरवशाली है। कुछ लोग परमेश्वर का कार्य स्वीकारने के बाद देखते हैं कि परमेश्वर ने बहुत सारे सत्य व्यक्त किए हैं और परमेश्वर के घर में बहुत सारी अनुभवजन्य गवाहियाँ हैं और उन्हें लगता है कि उन्होंने परमेश्वर में विश्वास रखना बहुत देर से शुरू किया। अगर वे कहते हैं कि उन्हें विश्वास रखते हुए एक से तीन वर्षों के बीच कोई समय हुआ है तो उन्हें बोलना मुश्किल लगता है और वे अपने दिलों में सोच-विचार करने लगते हैं : “मैंने उन वर्षों के दौरान विश्वास क्यों नहीं रखा? परमेश्वर ने बहुत सारे सत्य व्यक्त किए, मैंने छानबीन क्यों नहीं की? परमेश्वर में विश्वास रखने से मुझे किसने रोका? किसके कारण मुझे ऐसा पीड़ादायक कष्ट हुआ? उन धार्मिक पादरियों के कारण; वे लोग सच में दानव और राक्षस हैं जो लोगों की आत्माएँ निगल जाते हैं। अगर मैं स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सका तो मुझे उनका हिसाब चुकाना पड़ेगा!” फिर वे दोबारा सोचते हैं, “हाय, यह तो बस मेरी फूटी किस्मत है; मेरे पास वह आशीष नहीं है।” लेकिन फिर वे सोचते हैं, “नहीं, यह सही नहीं है। परमेश्वर सर्वशक्तिमान है; परमेश्वर मुझे, इस खोई हुई नन्ही भेड़ को, अपने घर जल्दी वापस क्यों नहीं लाया?” और इस तरह से वे दोष परमेश्वर पर मढ़ देते हैं। दरअसल, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे क्या सोचते हैं, पहली बात, विश्वास रखने के तीन वर्ष बनाम तीस वर्ष को लेकर उनका दृष्टिकोण गलत है। वे आस्था के वर्षों की संख्या का उपयोग लोगों को श्रेणीबद्ध करने के लिए करते हैं, उनका मानना है कि आस्था की छोटी अवधि व्यक्ति को कमतर बना देती है। जब वे यह दृष्टिकोण विकसित कर लेते हैं उसके बाद जब मैं उनसे पूछता हूँ कि वे कितने वर्षों से विश्वास रख रहे हैं तब उन्हें बोलने में शर्म आती है। “तीन वर्ष” कहने से उन्हें बहुत अटपटा, बहुत असहज, बहुत शर्मिंदा महसूस होता है, मानो उनकी कीमत और श्रेणी उसी क्षण उजागर हो गई हो। वे इसे बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं; यही दृष्टिकोण मेरे प्रश्न के प्रति उनके रवैये को प्रभावित करता है। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।) मान लो कि उनका दृष्टिकोण था : “यह सच है कि मैं तीन वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रख रहा हूँ और सिर्फ तीन वर्षों की आस्था होने से मेरा आध्यात्मिक कद सचमुच छोटा है। जब बहुत-से सत्यों की बात आती है तब मैं धर्म-सिद्धांतों तक को स्पष्ट रूप से नहीं समझा सकता। चूँकि परमेश्वर मुझसे पूछता है कि मैं कितने वर्षों से विश्वास रख रहा हूँ, इसलिए मैं बस सच कहूँगा। इसमें शर्मिंदा होने की कोई बात नहीं है। परमेश्वर के सामने सब कुछ खुला है, सब कुछ खोलकर रखा हुआ है। परमेश्वर जो भी पूछेगा, मैं उसका उत्तर दूँगा।” अगर वे इस तरीके से सोचें तो यह सरल होगा। इसमें कोई पहचान, रुतबा, मूल्य या श्रेणी शामिल नहीं होगी। वे किसी भी गलत विचार या नजरिए द्वारा प्रतिबंधित, प्रभावित, नियंत्रित या हेरफेर किए हुए नहीं होंगे और अंत में वे आसानी से और ईमानदारी से कह पाएँगे, “मैं तीन वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रख रहा हूँ।” फिर मैं जारी रखूँगा और पूछूँगा, “तुम तीन वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रख रहे हो; क्या तुम दर्शनों से संबंधित सत्यों के बारे में स्पष्ट हो?” अगर यह कोई जटिल मन वाला व्यक्ति हुआ तो वह सोचेगा : “अगर मैंने कहा कि मैं स्पष्ट नहीं हूँ तो क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि मैं अपनी आस्था में अपने उचित कार्य पर ध्यान नहीं दे रहा हूँ? तीन वर्षों से विश्वास रखना और फिर भी दर्शनों से जुड़े सत्यों के बारे में स्पष्ट नहीं होना, क्या इसका मतलब यह नहीं है कि मैं परमेश्वर के वचनों को लगन से खा और पी नहीं रहा हूँ? लेकिन अगर मैंने कहा कि मैं स्पष्ट हूँ तो परमेश्वर इस विषय पर संगति नहीं करेगा और मैं यह अवसर खो दूँगा। अगर मैंने कहा कि मैं स्पष्ट नहीं हूँ तो क्या यह हो सकता है कि वह मेरे साथ थोड़ी और संगति करे, कुछ और जोड़े? अगर मैंने कहा कि मैं स्पष्ट हूँ तो वह मेरे लिए कुछ और नहीं जोड़ेगा, लेकिन हो सकता है कि वह मेरे बारे में ऊँची राय बना ले?” देखो, वह फिर से विकृत तरीके से सोच रहा है, है ना? क्या ऐसे व्यक्ति का मन बहुत ज्यादा जटिल नहीं है? (हाँ।) ऐसे लोग सचमुच परेशान करने वाले लोग होते हैं। चाहे वे किसी से भी बात कर रहे हों, वे हमेशा यह जोड़-भाग कर रहे होते हैं कि बिना अपना सम्मान गँवाए या अपने हितों को कोई नुकसान पहुँचाए कैसे उत्तर देना है। इसके अलावा, वे हमेशा अपने प्रति दूसरों के रवैये देख रहे होते हैं, हमेशा यह जोड़-भाग कर रहे होते हैं कि कैसे अपने बारे में दूसरों से ऊँची राय बनवाई जाए और कैसे अपने खुद के रुतबे को ऊँचा उठाया जाए। वे हमेशा इन चीजों को लेकर जोड़-भाग कर रहे होते हैं, इसलिए उनके लिए संगति में खुलकर बात करना और यह बोलना आसान नहीं होता कि उनके दिलों में क्या है। जब मैं उनसे पूछता हूँ, “क्या परमेश्वर में अपनी आस्था में तुम दर्शनों से संबंधित सत्यों के बारे में स्पष्ट हो?” क्या इस प्रश्न का कोई गूढ़ अर्थ है? (नहीं।) मैं यह प्रश्न सीधे क्यों पूछता हूँ? आमतौर पर जिन लोगों को विश्वास रखते हुए एक से तीन वर्ष का समय हुआ है, उन्हें अभी भी दर्शनों से संबंधित सत्यों पर संगति की जरूरत पड़ती है; यह आम बात है। अगर वे दर्शनों से संबंधित सत्यों के बारे में स्पष्ट हैं तो उन पर संगति करने की कोई जरूरत नहीं है और हम दूसरे विषयों के बारे में बात कर सकते हैं। अगर वे कहते हैं, “मैं अभी भी दर्शनों से संबंधित सत्यों के बारे में, विशेष रूप से मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर के न्याय के कार्य के बारे में जो सत्य है उसके बारे में, जो कि बहुत ही गहन है, ज्यादा स्पष्ट नहीं हूँ और मैं अभी भी उसे नहीं समझता। क्या तुम इस पर संगति कर सकते हो?” तो फिर हमें एक साझा विषय मिल गया होगा और मैं इस पर संगति करूँगा। अगर हर कोई इसे एक बार और सुन लेगा तो उसे थोड़ा और फायदा हो जाएगा, है ना? (हाँ।) कुछ लोग नहीं समझते हैं, लेकिन फिर भी वे समझने का दिखावा करते हैं। तुम लोग किसलिए दिखावा कर रहे हो? तुम दिखावा करते रहते हो, जो सुझाता है कि तुम सब कुछ समझते हो और अगर मैं और कहूँगा तो यह अनावश्यक होगा। ऐसे में मैं कुछ नहीं कहूँगा और तुम्हें कुछ प्राप्त नहीं होगा। इसलिए, चाहे स्थिति कुछ भी हो, अगर तुम लोग सच्चाई से, बिना किसी संदेह के, बिना मेरे वचनों का जरूरत से ज्यादा अर्थ लगाए बोल सकते हो तो हमारी बातचीत और संवाद रोचक अंतःक्रिया के स्तर तक पहुँच सकते हैं। हम सामान्य मानवता के भीतर संवाद कर सकते हैं, जुड़ सकते हैं और बातचीत कर सकते हैं, उन विषयों पर चर्चा कर सकते हैं जो हम सभी को पसंद हैं। क्या यह अच्छा नहीं है? (हाँ, है।) इस तरीके से तुम लोग लाभ प्राप्त करोगे। कुछ लोग बहुत जोड़-भाग करते हैं। जब मैं उनसे पूछता हूँ कि क्या वे दर्शनों से संबंधित सत्यों के बारे में स्पष्ट हैं तब वे अपने दिलों में सोच-विचार करते हैं, “यह पूछकर तुम क्या कहना चाहते हो? क्या तुम यह देखने का प्रयास कर रहे हो कि क्या मैं सच्चे मार्ग के बारे में निश्चित हूँ, क्या मैंने कोई नींव रखी है, क्या तुम यह देखने का प्रयास कर रहे हो कि मेरी काबिलियत कैसी है, तुम मेरी काबिलियत की परीक्षा लेने का प्रयास कर रहे हो? तो मुझे कहना ही पड़ेगा कि मैं स्पष्ट हूँ।” इसलिए वे कहते हैं : “इन तीन वर्षों में, मैं परमेश्वर के वचनों को लगातार खाता और पीता रहा हूँ, मैंने परमेश्वर के घर से कई फिल्में देखी हैं, मैं अक्सर धर्मोपदेश और संगति सुनता हूँ और मैं सभाओं में अक्सर अपनी अनुभवजन्य समझ को साझा करता हूँ। मैं दर्शनों से संबंधित इन सभी सत्यों के बारे में स्पष्ट हूँ।” ऐसा कहने में उनका क्या उद्देश्य है? वे मुझ पर अच्छी छाप छोड़ना चाहते हैं, मुझे यह महसूस करवाना चाहते हैं कि उनकी काबिलियत बहुत अच्छी है और अपने बारे में मुझसे ऊँची राय बनवाना चाहते हैं। क्या तुम सोचते हो कि मैं सिर्फ इसलिए उनके बारे में ऊँची राय बना लूँगा क्योंकि वे ये कुछ शब्द कहते हैं? (नहीं।) क्या मैं किसी के बारे में इतनी आसानी से ऊँची राय बना लूँगा? बिल्कुल नहीं; उन्होंने इस मामले में गलत राय बनाई है। अगर तुम कहते हो कि तुम दर्शनों से संबंधित सभी सत्यों के बारे में स्पष्ट हो तो मुझे तुम्हारी परीक्षा लेने दो। मैं दर्शनों से संबंधित उन सत्यों पर तुम्हारी परीक्षा लूँगा जिन्हें तुम लोग अक्सर पढ़ते हो। परमेश्वर ताड़ना और न्याय का कार्य क्यों करता है? ताड़ना और न्याय कौन-सा मुख्य प्रभाव प्राप्त करने के लिए है? अपनी आस्था के इन तीन वर्षों के दौरान क्या तुम्हें ताड़ना और न्याय के कार्य का कोई अनुभव हुआ है? क्या तुमने एक बार भी ताड़ना और न्याय का अनुभव किया है? ताड़ना और न्याय का अनुभव करते समय क्या तुमने सत्य सिद्धांतों पर पकड़ बनाई है? क्या तुम्हें पता था कि परमेश्वर के इरादे क्या हैं? क्या तुम कोई विशिष्ट अनुभव साझा कर सकते हो? ज्यादातर लोग बस कुछ धर्म-सिद्धांत बोलेंगे और कोई व्यावहारिक अनुभवजन्य समझ साझा नहीं कर सकेंगे। लोगों में बहुत-सी चीजों की कमी है, इसलिए जब हम वार्तालाप करते हैं तब चर्चा के लिए बहुत-से विषय होते हैं। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस तरह के विषय पर चर्चा की जाती है, तुम्हें जितना पता है, उतनी ही संगति करो। अगर तुम्हें कोई चीज नहीं पता तो बस इतना कहो कि तुम्हें नहीं पता। विकृत तरीके से मत सोचो। तुमसे जो भी प्रश्न पूछा जाए, बस उसका उत्तर दो। उस समय तुम अपने दिल में जो भी सोच रहे हो, उसे कह दो। सच्ची स्थिति जो भी हो, बस उसके बारे में सच बोलो। गोलमोल बातें मत करो, बढ़ा-चढ़ाकर मत बताओ, सिर्फ खुद को बेहतर दिखाने और आकर्षक रूप से पेश करने के लिए झूठी छवि बनाने वाली चीजें मत कहो, झूठ मत बोलो और धोखा मत दो। ये सब ऐसी चीजें हैं जो तुम्हें नहीं करनी चाहिए। इसलिए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं तुमसे क्या प्रश्न पूछता हूँ या तुम्हारे साथ किस तरह के विषय पर संगति करता हूँ, तुम उतना ही बोलो जितना तुम्हें पता है। अगर मुझे लगा कि तुम सत्य के किसी विशेष पहलू को नहीं समझते या तुम्हारी समझ धर्म-सैद्धांतिक है या तुम्हारी समझ विकृत है और तुम्हारे पास गलत विचार और नजरिए हैं तो मैं तुरंत तुम्हें सही करूँगा, तुम्हारा मार्गदर्शन करूँगा और तुम्हारी मदद करूँगा ताकि तुम सत्य के इस पहलू को समझ सको, तुम्हारे पास शुद्ध समझ हो सके और अभ्यास का एक सटीक मार्ग हो सके। इस तरीके से हमारी संगति प्रभावी होगी। इसलिए किसी विषय पर संगति करने का सिद्धांत सच्चाई से बोलने की नींव पर, सत्य और सकारात्मक चीजों पर संयुक्त संगति और चर्चाओं या आदान-प्रदान की नींव पर खड़ा होता है ताकि लोग संगति किए जा रहे सकारात्मक विषय के बारे में ज्यादा स्पष्ट हो सकें, उसे ज्यादा सटीक रूप से समझ सकें और उनके पास अभ्यास का एक स्पष्ट मार्ग हो सके। इसे संदेह, षड्यंत्र और धोखे की नींव पर खड़ा नहीं किया जाना चाहिए।
क्या तुम लोगों को लगता है कि देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता जैसे विषयों पर संगति करना अच्छा है? (यह अच्छा है।) और यह कैसे अच्छा है? (हमारा मानना है कि यह देहधारी परमेश्वर के बारे में हमारी धारणाओं और कल्पनाओं को हल कर सकता है।) कुछ लोग कहते हैं, “तुमने अपना सच्चा स्वरूप हमारे सामने खोलकर रख दिया है और अब हम जानते हैं कि तुम किस तरह के व्यक्ति हो। तुम स्पष्ट सत्य बोलकर बहुत ही ज्यादा सीधे-सादे बन रहे हो! तुममें सामान्य और व्यावहारिक होने की ये अभिव्यक्तियाँ तो हैं, लेकिन तुम स्पष्ट सत्य कैसे बोल सकते हो? तुम्हें लोगों को यह महसूस करवाना होगा कि तुम रहस्यमय, अथाह, उच्च और अभेद्य हो। भले ही तुम लोगों के खिलाफ षड्यंत्र नहीं करते, तो भी तुम्हें यह कहना होगा कि तुम ऐसा कर सकते हो। तुम्हें यह दावा करना होगा कि तुम्हारे पास लोगों के साथ हेर-फेर करने की कला है और उनका उपयोग करने की कला है, तुम ‘द थर्टी-सिक्स स्ट्रैटेजम’ जानते हो और सभी तरह के लोगों से तुम्हारे लिए काम करवाने के लिए उनका शोषण करने में समर्थ हो। सिर्फ इस तरीके से बोलने से ही लोग तुम्हें पूजेंगे; तुम स्पष्ट सत्य नहीं बोल सकते। तुम्हारे इतना स्पष्ट सत्य बोलने से मुझे क्यों लगता है कि तुम बिल्कुल भी रहस्यमय या अथाह नहीं हो? तुम परमेश्वर जैसे नहीं हो? दुनिया की उन महान हस्तियों को देखो—जो सैन्य मामलों या राजनीति में शामिल होती हैं—और बीते युगों के सम्राटों को देखो। उन महान हस्तियों, उन असाधारण लोगों में से किसने कभी स्पष्ट सत्य बोला? क्या उनमें से किसी ने कभी कहा है कि वह सामान्य, व्यावहारिक और साधारण है, बस एक आम व्यक्ति है? उनकी अत्यधिक लालसा होती है कि लोग यह सोचें कि वे बाकियों से अलग हैं, उन्हें स्वर्ग से भेजा गया और यह कि भले ही अब वे एक आम व्यक्ति बन गए हों, वे अभी भी रहस्यमय और अथाह हैं और वे साधारण लोगों के लिए अभेद्य हैं—सिर्फ तभी लोगों पर शासन करना आसान होता है!” उन सभी सम्राटों के पास शाही शासन की कलाएँ थीं और उनके मंत्री और आम जनता यह असलियत नहीं जान पाती थी कि वे किस तरह के लोग हैं। वह कहावत है ना? “सम्राट की इच्छा समझना मुश्किल होता है और उसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।” अविश्वासी दुनिया के सभी अधिकारियों की यही मानसिकता होती है; यहाँ तक कि एक छोटे-से विभाग प्रमुख, अनुभाग प्रमुख या प्रबंधक की भी यही मानसिकता होती है। वह नहीं चाहता कि लोग यह असलियत जान जाएँ कि उसका सच्चा माप क्या है, उसकी मानवता में क्या दोष हैं, उसने क्या गलतियाँ की हैं या उसके क्रियाकलापों में क्या कमियाँ हैं। जैसे ही उसकी विफलताएँ उजागर हो जाती हैं, वह उन्हें छिपाने और गुप्त रखने के भरसक प्रयास करता है और अगर उसके बुरे कर्म उजागर हो जाते हैं और उनका भेद खुल जाता है तो वह कोई बलि का बकरा ढूँढ़ लेता है। ऐसा करने का उसका उद्देश्य मामले की सच्चाई पर पर्दा डालना होता है ताकि लोग उसका सम्मान करते रहें और उसे पूजते रहें। इस तरह का व्यक्ति चाहे कुछ भी करे, वह इसे अपने खुद के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए पहले से सोच-समझकर और योजना बनाकर करता है ताकि सबको लगे कि वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है, वह स्थिति को नियंत्रित कर सकता है, वही सब कुछ निर्देशित कर रहा है। वह कभी भी लोगों को यह एहसास नहीं होने देगा कि वह एक सामान्य, व्यावहारिक और साधारण व्यक्ति है। दरअसल वह बस एक साधारण भ्रष्ट मनुष्य है जिसके पास एक औसत व्यक्ति की तुलना में कहीं ज्यादा धूर्त षड्यंत्र हैं और वह साजिशों और चालबाजियों में शामिल होने में माहिर होता है। वह कभी भी लोगों को यह पता कैसे चलने दे सकता है कि उसकी मानवता कितनी भयावह और दुर्भावनापूर्ण है? क्या इससे उसकी छवि पर बट्टा नहीं लग जाएगा? सभी भ्रष्ट मनुष्यों की मानसिकता ऐसी ही होती है और वे सब फरीसियों की तरह पाखंडी होते हैं जिनके दिल मनहूस और दुर्भावनापूर्ण होते हैं। हालाँकि वे अपने दिलों में स्वीकारते हैं कि परमेश्वर देहधारी हो सकता है, लेकिन वे यह कैसे मान सकते हैं कि देहधारी परमेश्वर एक साधारण, सामान्य व्यक्ति होगा? वे अपने दिलों में यह विश्वास करते हैं कि अगर परमेश्वर सच में देहधारी हो जाता तो कम-से-कम लोग उसके देह में उसके दिव्य आभामंडल और परमेश्वर की पहचान और सार के विभिन्न चिह्नों को देख पाते। वे दृढ़ता से यह भी विश्वास करते हैं, “सभी लोगों को देखते समय, देहधारी परमेश्वर के पास आम जनता की भीड़ को नीची नजर से देखने वाला परिप्रेक्ष्य और आचरण होना चाहिए, लेकिन मैं तुममें ये चीजें नहीं देख सकता। तुम हमेशा यह भी कहते हो कि तुम नियमों का पालन करते हुए आचरण करते हो और अपने उचित पद के अनुसार चीजें करते हो। क्या इससे यह पूरी तरह से उजागर नहीं हो जाता कि तुम वास्तव में एक साधारण व्यक्ति ही हो? क्या लोगों के दिलों में देहधारी परमेश्वर की ऊँची, रहस्यमयी और अथाह छवि पूरी तरह से नष्ट नहीं हो जाएगी?” क्या तुम लोग सोचते हो कि यह विनाश अच्छा है? (हाँ, यह अच्छा है। यह हमारी धारणाओं और कल्पनाओं को नष्ट कर देता है।) मैं ये वचन तुम लोगों के सपनों, तुम लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं को नष्ट करने के लिए ही कहता हूँ ताकि तुम लोग अब और किसी सपने में नहीं बल्कि वास्तविकता में जियो। यह उन सत्य सिद्धांतों के साथ पूर्ण तालमेल में है जिनका मैं तुम लोगों से पालन करने की अपेक्षा करता हूँ : तुम नियमों का पालन करते हुए आचरण करो, तुम अपने उचित पद के अनुसार चीजें करो और एक सृजित प्राणी की जगह पर खड़ा रहने वाला साधारण व्यक्ति बनो क्योंकि मैं खुद इसी तरीके से चीजें करता हूँ। मैं तुम लोगों से मेलजोल रखते समय और अपने निजी जीवन में, कभी भी डींग हाँकते हुए या खोखले तरीके से बात नहीं करता और न ही मैं कभी दिखावा करता हूँ या अपनी शान दिखाता हूँ। यह कुछ ऐसा है जिसे तुम लोग देख सकते हो और महसूस कर सकते हो। साथ ही, मैं कभी भी किसी के भी खिलाफ षड्यंत्र नहीं करता, जब मैं चीजें करता हूँ तब मैं ढुलमुल नहीं होता और कभी भी कामचोरी नहीं करता और मैं नियमों का पालन करते हुए आचरण करता हूँ। जमीर के इस न्यूनतम मानक को बनाए रखना चाहिए। कुछ लोग बोलते और कार्य करते समय षड्यंत्रों का उपयोग करते हैं, दूसरों को सुखद लगने वाली चीजें कहते हैं और फिर उन्हें अपने जाल में फँसाने, उनसे अपनी सेवा करवाने और अपने लिए काम करवाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। मैं ऐसी चीजें नहीं करता। अगर मैं चाहता हूँ कि कोई किसी चीज में मेरी मदद करे तो मैं उससे सीधे कहूँगा। कुछ लोग कहते हैं, “तुम्हारी यह पहचान और रुतबा है, तो क्या किसी से कुछ करवाना तुम्हारे कह देने भर से नहीं हो जाता है?” भले ही यह सिर्फ कह देने भर से हो जाता हो, फिर भी मुझे इसे नियमों का पालन करते हुए सँभालना होगा और मैं लोगों पर दबाव नहीं डाल सकता, फिर उन्हें उन चीजों को करने के लिए मजबूर करने की बात तो छोड़ ही दो जो वे नहीं करना चाहते। अगर तुम इच्छुक हो तो इसे करो; अगर तुम इच्छुक नहीं हो तो तुम मना कर सकते हो। परंतु अगर मैं तुमसे कुछ करने के लिए कहता हूँ तो मैं हमेशा स्पष्ट सत्य बोलूँगा। मैं ऐसा बिल्कुल नहीं करूँगा कि तुम्हें छलने के लिए घुमा-फिराकर बात करूँ या गोल-मोल बातें करूँ या तुम्हें फुसलाने के लिए लालच दूँ और फिर तुमसे खुशी से अपनी सेवा करवाऊँ और अपने लिए काम करवाऊँ; फिर, तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करने के बाद तुमसे यह भी कहलवाऊँ कि तुमने खुशी से ऐसा किया और ऐसा महसूस भी करवाऊँ कि मुझ पर तुम्हारा कोई एहसान नहीं है। मैं यह कभी भी और कतई नहीं करूँगा। ये अभ्यास—चाहे लोग इन्हें दूसरों का उपयोग करने की कला कहें, खेल के नियम कहें, लोगों के साथ खिलवाड़ करने की युक्तियाँ कहें या दूसरों के साथ हेर-फेर करने की शाही रणनीतियाँ कहें—इनमें से कोई भी मेरे पास मौजूद नहीं है। मैं लोगों के साथ खिलवाड़ नहीं करता—दूसरे शायद ऐसा करते हों, लेकिन मैं ऐसा नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी नकल करूँगा या उनसे सीखूँगा। मैंने ‘द आर्ट ऑफ वॉर’ या ‘द थर्टी-सिक्स स्ट्रैटेजम’ जैसी चीजें कभी नहीं पढ़ी हैं और मैं बोलते समय बिल्कुल भी छल-कपट नहीं करूँगा और न ही काले को सफेद कहूँगा। जब मैं बोलता हूँ और कार्य करता हूँ तब एक एक होता है और दो दो होता है। एकमात्र अपवाद तब होता है जब विशेष परिस्थितियों के कारण हो सकता है कि मैं बातों को चतुर तरीके से कहूँ, लेकिन यह सिर्फ लोगों की कमजोरियों, कठिनाइयों और उनके छोटे आध्यात्मिक कद को ध्यान में रखते हुए किया जाता है। यह उनकी रक्षा करने और उन्हें संजोने के लिए होता है और इसमें कोई दुर्भावना नहीं होती, इसलिए यह कोई षड्यंत्र करना भी नहीं है। शायद कुछ लोग यह सोचकर बहुत निराश हो जाएँ, सोचें, “तो पता चलता है कि तुम्हारे दिल और दिमाग में दुनिया के मशहूर और महान लोगों के विभिन्न षड्यंत्र नहीं हैं। तो यह पता चलता है कि तुम बहुत ही सरल हो!” क्या बहुत सरल होना अच्छा नहीं है? षड्यंत्र नहीं करने का मतलब यह नहीं है कि मैं लोगों की असलियत नहीं देख सकता; इसका मतलब यह नहीं है कि मैं चीजों का सत्व और सार नहीं देख सकता; इसका मतलब यह नहीं है कि मैं सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों को सँभालना नहीं जानता। बिना षड्यंत्र किए मैं अभी भी सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों को उनके परिवेश और पृष्ठभूमि के अनुसार उचित और सटीक रूप से सँभालने के लिए सिद्धांतों को लागू कर सकता हूँ, लोगों को ठगने के लिए युक्तियों का उपयोग करने, धोखा देने या उनके साथ खिलवाड़ करने के बजाय उन्हें स्वाभाविक रूप से अपनी भूमिकाएँ निभाने और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के तहत अपने नियमों और विधानों के भीतर जीने के लिए तैयार कर सकता हूँ। मैं जिन सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता हूँ, जिन सिद्धांतों के अनुसार विभिन्न समस्याएँ सँभालता हूँ और जिन सिद्धांतों के अनुसार सभी तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों से पेश आता हूँ, उन सभी पर वर्षों से मेरी संगतियों और उपदेशों में चर्चा की जा चुकी है। जब मैं इन चीजों के बारे में बोलता हूँ तब मैं नारे नहीं लगा रहा होता; ये चीजें मेरे विचारों और मेरे मानवता सार से आती हैं और मैं सभी तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों को सँभालने के लिए अपने विचारों और नजरियों को भी लागू करता हूँ। इसलिए, जब मैं सभी तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों को सँभालने के लिए अपने विचारों और नजरियों को लागू करता हूँ या उन्हें इन सिद्धांतों के अनुसार सँभालता हूँ तब तुम लोग क्या कहोगे, अंतिम नतीजा परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करना है या उसके खिलाफ विद्रोह करना है? (परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करना है।) इसलिए, चाहे मैं, देहधारी परमेश्वर, लोगों को कितना भी सामान्य, व्यावहारिक और साधारण लगूँ—रहस्यमय बिल्कुल भी नहीं लगूँ, यह तुम लोगों की सत्य की समझ को बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करेगा और न ही मैं तुम लोगों को गलत दिशा में ले जाऊँगा। इसके विपरीत, चूँकि मैं जिस तरीके से आचरण करता हूँ और कार्य करता हूँ उसमें खुद मेरे सिद्धांत होते हैं, ठीक इसी कारण से अगर तुम लोग सत्य का अनुसरण कर सकते हो, मैं जिन सिद्धांतों के बारे में बोलता हूँ उनके अनुसार आज्ञाकारी और नियमों का पालन करते हुए आचरण और कार्य कर सकते हो और मैं जिस दिशा और लक्ष्यों पर ध्यान दिलाता हूँ उनके अनुसार अभ्यास कर सकते हो तो देर-सवेर तुम लोग उद्धार प्राप्त कर लोगे, परमेश्वर के प्रति समर्पण प्राप्त कर लोगे और ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर का भय मानता है और बुराई से दूर रहता है। यह एक सच्चाई है। उद्धार प्राप्त करने में समर्थ होना—क्या यही वह लक्ष्य नहीं है जिसका परमेश्वर में सच्चाई से विश्वास रखने वाले लोग अनुसरण करते हैं? तो फिर तुम लोग और क्या तलाशते हो? जहाँ तक यह प्रश्न है कि क्या मैं रहस्यमय और अथाह हूँ, ऊँचा हूँ या बाकियों से भिन्न हूँ या क्या मेरे पास कुछ विशेष क्षमताएँ हैं जिनकी तुम लोग कल्पना नहीं कर सकते या जो तुम्हारे पास नहीं हैं, तो यह महत्वपूर्ण नहीं है। इसके अतिरिक्त, यह भी महत्वपूर्ण नहीं है कि क्या तुम लोग मुझे सामान्य और व्यावहारिक समझते हो और तुम्हारे द्वारा पूजे जाने या सम्मान किए जाने योग्य नहीं समझते। क्या महत्वपूर्ण है? वह यह है कि मैं, यह मामूली व्यक्ति, यह साधारण और सामान्य व्यक्ति, जो वचन बोलता हूँ वे तुम्हें परमेश्वर के सामने ले आएँगे इसकी गारंटी है और वे तुम लोगों को उद्धार प्राप्त करने में सक्षम बना देंगे इसकी गारंटी है। एक और चीज है जो निश्चित है : अगर तुम लोग इन वचनों के अनुसार अभ्यास और अनुभव करते हो जिन्हें मैंने बोला है तो इस बात की गारंटी है कि एक दिन तुम लोगों के विचार, नजरिए और जीवन स्वभाव, ये सभी रूपांतरित हो जाएँगे और तुम एक नए मनुष्य बन जाओगे। तुम नई मानवजाति के सदस्य बन सकते हो—मैं इस बारे में निश्चित हो सकता हूँ। क्या तुम लोगों को इस बारे में यकीन है? (हाँ।)
क्या अब तुम लोगों के पास देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता की अभिव्यक्तियों की कुछ नई समझ है? (हाँ।) अगर तुम लोग देखते हो कि मेरा आचरण और कार्य करने का तरीका, और मेरे विचार और दृष्टिकोण, ये सभी सामान्यता और व्यावहारिकता के दायरे में हैं और अगर मेरे कार्य करने के सिद्धांत और मेरे विचार और दृष्टिकोण किसी भी समय तुम लोगों को प्रभावित कर सकते हैं और तुम लोग उन्हें खुशी से स्वीकारोगे तो मैं निश्चयपूर्वक कुछ कहूँगा : क्योंकि तुम लोग सत्य से इस तरीके से प्रेम करते हो, देहधारी परमेश्वर की सामान्य और व्यावहारिक अभिव्यक्तियों से सत्य की तलाश कर पाते हो, और उन सिद्धांतों को जिनके द्वारा देहधारी परमेश्वर विभिन्न मामलों में आचरण करता है और उसके विचारों और नजरियों को भी स्वीकार सकते हो, इसलिए तुम लोगों के लक्ष्य और तुम लोगों के आचरण की दिशा स्वाभाविक रूप से सकारात्मक दिशा में विकसित होगी। यानी जैसे-जैसे तुम विश्वास रखना जारी रखोगे, वैसे-वैसे तुममें अधिकाधिक सामान्य मानवता आती जाएगी और तुम अधिकाधिक मानव के समान जीते जाओगे और तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के ज्यादा पास भी आते जाओगे और अंततः उद्धार प्राप्त करोगे। तुम्हारे द्वारा ऐसे लाभ प्राप्त करना देहधारी परमेश्वर, इस साधारण, सामान्य व्यक्ति, की सिंचाई और भरण-पोषण से सीधे संबंधित है। अगर तुम लोग देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता के इन सारों और अभिव्यक्तियों को, और साथ ही जिस तरीके से वह आचरण करता है और ऐसा करने के लिए जो उसके सिद्धांत हैं उन्हें, स्वीकार सकते हो और उनसे प्रेम भी कर सकते हो तो तुम लोगों की अभिव्यक्तियाँ और तुम लोगों की मानवता उत्तरोत्तर बेहतर होती जाएँगी। इसका क्या अर्थ है कि वे उत्तरोत्तर बेहतर होती जाएँगी? यह कहना कि तुम उत्तरोत्तर एक अच्छे मनुष्य की तरह बन जाओगे, जरा-सा खोखला हो सकता है। इस “उत्तरोत्तर बेहतर होते रहना” का अर्थ है कि तुम्हारा जमीर और तुम्हारी तार्किकता सकारात्मक दिशा में विकसित होंगे। परंतु अगर तुम देहधारी परमेश्वर की सामान्यता, व्यावहारिकता और साधारणता से नफरत करते हो या उससे विकर्षित होते हो या यहाँ तक कि उसके साथ भेदभाव करते हो, उसे नहीं स्वीकारते हो, उसके प्रति प्रतिरोधी महसूस करते हो और उसका उपहास करते हो तो तुम्हारे लिए उसके द्वारा व्यक्त सभी सत्यों को स्वीकारना बहुत मुश्किल होगा और उसके पास जो सामान्य मानवता है उसके व्यावहारिक महत्व और प्रभाव को समझना तुम्हारे लिए मुश्किल होगा। इसके विपरीत, तुम परमेश्वर की सामान्य मानवता में उसके द्वारा व्यक्त सभी सत्यों से भी विमुख होगे और उससे नफरत भी करोगे। इस तरीके से तुम्हारे लिए एक सामान्य व्यक्ति के समान जीना और एक ऐसा व्यक्ति बनना बहुत मुश्किल हो जाएगा जिससे परमेश्वर खुश है क्योंकि तुम जिन चीजों की पूजा करते हो, वे सकारात्मक चीजें नहीं बल्कि नकारात्मक चीजें हैं। तुम बस समाज की मशहूर हस्तियों, सितारों और सामाजिक चलनों की लालसा करते हो और उनकी पूजा करते हो। ऐसे में तुम जिस मार्ग पर चलते हो वह गलत है और जहाँ तक तुम्हारे अनुसरण और विकास की दिशा का प्रश्न है, एक बात तो निश्चित है : तुम सकारात्मक दिशा में नहीं बल्कि घातक दिशा में विकसित होगे। उदाहरण के लिए, मैं कहता हूँ कि मैं लोगों के खिलाफ षड्यंत्र नहीं करता और कुछ लोग कहते हैं, “अगर तुम लोगों के खिलाफ षड्यंत्र नहीं करते हो तो तुम इतना महान कार्य कैसे कर सकते हो? जब तुम लोगों से मेलजोल रखते हो और उनसे निपटते हो तब तुम्हें षड्यंत्र करना ही पड़ता है। अगर तुम षड्यंत्र करना नहीं जानते तो तुम लोगों के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते और तुम उस काम के लिए उपयुक्त नहीं होगे।” मैं कहता हूँ कि अगर तुम ऐसी बातें कह सकते हो तो तुम्हारा काम तमाम हो चुका है। तुम्हारे विचार और दृष्टिकोण न सिर्फ विकृत हैं, बल्कि उससे भी ज्यादा, वे दुष्ट हैं। तुम्हारे लिए सही मार्ग पर चल पड़ना असंभव है क्योंकि तुम्हारी मानवता में सत्य और सकारात्मक चीजों से प्रेम करने का तत्व नहीं है। तुम्हारे लिए उद्धार के मार्ग पर चल पड़ना असंभव है।
जब मैं सामान्य मानवता वाले लोगों से बातचीत करता हूँ तब बातचीत निर्बाध रूप से प्रवाहित नहीं होने का मुद्दा उत्पन्न हो जाता है। निर्बाध रूप से प्रवाहित नहीं होने से मेरा क्या मतलब है? कभी-कभी जब मैं किसी से बिल्कुल सामान्य तरीके से मेलजोल रख रहा होता हूँ और वार्तालाप कर रहा होता हूँ तब वह चीजों को बहुत ही ज्यादा जटिल बना देता है या उनके बारे में बहुत ही ज्यादा सोचता है और बातचीत जारी नहीं रह सकती। अगर यह जारी नहीं रह सकती तो मैं क्या करता हूँ? मैं बस उस व्यक्ति से मेलजोल रखना बंद कर देता हूँ—मैं किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ लेता हूँ जो दूसरों से मेलजोल रख सकता है, जो संवाद और वार्तालाप करने का तरीका जानता है, जिसकी सोच सामान्य मानवता जैसी है और फिर मैं उसके साथ वार्तालाप करता हूँ और मेलजोल रखता हूँ। तुम लोगों के साथ अपने संपर्क में मुझे यह सबसे आम स्थिति दिखाई देती है कि लोगों को लगता है, “जब तुम लोगों से बात करते हो और संवाद करते हो तब तुम्हारी पहचान और रुतबे का बहुत ही ज्यादा प्रभाव रहता है। तुम देहधारी परमेश्वर हो और हम सृजित प्राणी हैं। अगर हम कुछ गलत कहते हैं तो हमारे लिए समान रुतबा ग्रहण करने और परमेश्वर के स्वभाव को नाराज करने की संभावना रहती है। साथ ही, देहधारी परमेश्वर के रूप में तुम्हारा कार्य मानवता को बचाना है और तुम खुद परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते हो, इसलिए तुम्हारी जिम्मेदारी या तुम्हारे द्वारा हाथ में लिया जाने वाला कार्य सिर्फ सत्य व्यक्त करना ही हो सकता है ताकि तुम भ्रष्ट मानवता के उद्धार के मुद्दे का समाधान कर सको। तुम्हें सिर्फ कार्य के बारे में या उन विषयों के बारे में बात करनी चाहिए जो दिव्यता से उत्पन्न होते हैं। तुम सामान्य मानव जीवन—भोजन, कपड़े, आवास और परिवहन के मामलों—के बारे में या इस बारे में बात नहीं कर सकते कि अमुक व्यक्ति कैसा है। अगर तुम इस बारे में बात करते हो कि वह कैसा है तो तुम उसके बारे में राय बना रहे हो या तुम्हारे कुछ गुप्त मकसद हैं।” चूँकि लोग ऐसी धारणाएँ रखते हैं, इसलिए वे देहधारी परमेश्वर को कोई गैर-मानवीय हस्ती मानते हैं। इसलिए, जब मैं ऐसे लोगों से मेलजोल रखता हूँ जिनमें सामान्य सोच और सामान्य मानवता की कमी है और मैं रोजमर्रा के मामलों या दैनिक जरूरतों के बारे में जरा-सी बात करता हूँ तब कुछ लोग मानसिक बाधा खड़ी कर लेते हैं, सोचते हैं “इस बारे में बात करने का क्या फायदा है? यह आध्यात्मिक नहीं है! साथ ही, क्या यह बात उठाने के पीछे तुम्हारे गुप्त इरादे हैं?” अगर मैं किसी व्यक्ति की स्थिति पर चर्चा करता हूँ तो कुछ लोग सोचते हैं, “क्या यह लोगों के पीठ पीछे उनके बारे में राय बनाना या उनके खिलाफ षड्यंत्र करना है? क्या तुम उनके साथ कुछ करने वाले हो? क्या तुम उन्हें पदोन्नत करने वाले हो या हटा देने वाले हो? क्या तुम उनका उपयोग करना जारी रखने वाले हो या उन्हें बर्खास्त करने वाले हो?” अगर मैं किसी के मुद्दों के बारे में बात करता हूँ तो कुछ लोग सोचते हैं, “क्या तुम उस व्यक्ति को नापसंद करते हो या उसके प्रति नफरत महसूस करते हो? क्या उसने तुम्हें चोट पहुँचाने के लिए कुछ किया? क्या उसने तुम्हें नाराज करने के लिए कुछ कहा या किया?” विशेष रूप से, अगुआओं और कार्यकर्ताओं से संबंधित संवेदनशील विषयों पर चर्चा करते समय कुछ लोग तो शामिल होने से और भी डरते हैं, कहते हैं, “तुम कार्य के लिए इनके बारे में बात कर रहे हो, लेकिन हम तुम्हारे साथ इन पर चर्चा नहीं करेंगे। ये संवेदनशील विषय हैं। जैसे ही हम कुछ गलत कहेंगे, तुम हमें उजागर कर दोगे, हमारी काट-छाँट करोगे, तुम हमारी भ्रष्टताओं का प्रकाशन देखोगे और इससे हमारे बारे में तुम्हारे मन पर एक गलत छाप पड़ेगी, जो कि अनुचित होगा।” ऐसे भी समय हैं जब मैं कुछ विषय उठाता हूँ, जैसे कि पूछता हूँ, “तुम लोगों के परिवार में कौन परमेश्वर में विश्वास रखता है?” मुख्यभूमि चीन में यह एक संवेदनशील विषय है। हालाँकि मुख्यभूमि में कुछ ऐसे लोगों से पूछना संवेदनशील नहीं माना जाता जिन्हें तुम अपेक्षाकृत लंबे समय से सँभाल रहे हो और जिनसे तुम काफी परिचित हो—विदेशों में तो ऐसा और भी कम माना जाता है। लेकिन अगर मैंने यह पूछा तो कुछ लोग उत्तर तक देने की हिम्मत नहीं करते हैं। वे सोच-विचार करते हैं, “क्या तुम यह पूछकर कि मेरे परिवार में कौन विश्वास रखता है मेरी पृष्ठभूमि की छानबीन करने का प्रयास कर रहे हो?” अगर मैंने पूछा, “तुम लोगों की स्थानीय कलीसिया में कितने लोग हैं? कलीसियाई अगुआ कौन है?” तो वे सोचते हैं, “अरे नहीं, क्या तुम कलीसिया के बारे में पता लगाने का प्रयास कर रहे हो? मैं इस बारे में तुमसे बात नहीं कर सकता। अगर मैंने कुछ कह दिया और कलीसियाई अगुआ को पता लग गया तो मुसीबत खड़ी हो जाएगी।” देखो, वे कलीसिया के मामलों पर बात करते समय भी सतर्क रहते हैं और कुछ भी कहने से डरते हैं। बहुत-से लोग कलीसियाई अगुआओं और कलीसियाई कार्य से संबंधित विषयों पर चर्चा करने या उनके मन में जो है उसे खुलकर कहने की हिम्मत नहीं करते। इसके मुख्य कारणों में से एक कलीसिया की स्थिति उजागर हो जाने और अगुआओं और कार्यकर्ताओं को नाराज कर देने का डर है और साथ ही, अनजाने में अपने विचारों और नजरियों को प्रकट कर देने और काट-छाँट किए जाने या उजागर हो जाने का डर भी है। यह ऐसा कुछ है जिसे होता हुआ वे नहीं देखना चाहते। इसलिए, जब मैं बहुत-से लोगों से मेलजोल रखता हूँ तब साधारण संवाद तक निर्बाध रूप से प्रवाहित नहीं हो सकता। जब मैं ऐसे अविश्वासियों से मेलजोल रखता हूँ जिनके मन और पृष्ठभूमि जटिल हैं और उनके साथ चीजें सँभालता हूँ, तब जैसे ही मैं चीजें सँभालना समाप्त करता हूँ, मैं जल्दी से वहाँ से चला जाता हूँ—मैं गहरे रिश्ते नहीं बना सकता या बहुत ज्यादा करीब नहीं आ सकता। लेकिन जब मैं भाई-बहनों से मेलजोल रखता हूँ तब भी मुझे ज्यादातर लोग ऐसे ही लगते हैं : मैं बहुत ज्यादा करीब नहीं आ सकता या गहरे रिश्ते नहीं बना सकता। ऐसा नहीं है कि मैं खुद को श्रेष्ठ समझता हूँ और ज्यादातर लोगों से मेलजोल रखने का अनिच्छुक हूँ; बल्कि जब मैं उनके पास जाता हूँ या उनसे संपर्क बनाने का प्रयास करता हूँ तब वे ही अवचेतन रूप से मुझसे कतराते हैं या मुझसे दूर भागते हैं। तुम मुझसे दूर क्यों भागते हो? अगर तुमने कुछ गलत कह दिया तो मैं तुम्हारी निंदा नहीं करूँगा या इस बात को मुद्दा नहीं बनाऊँगा। अगर तुम अगुआ या कार्यकर्ता हो तो हम सत्य की संगति कर सकते हैं और ऐसे किसी भी विषय पर वार्तालाप कर सकते हैं जो तुम्हें समझ नहीं आता है। अगर तुम कोई साधारण भाई या बहन हो और तुम वाकई कुछ गलत कह भी देते हो या तुम्हारे कुछ त्रुटिपूर्ण विचार और नजरिए हैं तो यह इस बात पर निर्भर करता है कि मैं इस बारे में तुमसे बात करने का इच्छुक हूँ या नहीं। अगर मैं देखता हूँ कि तुम्हारी काबिलियत कमजोर है, तुममें समझने की क्षमता की कमी है और तुम किसी भी चीज की असलियत नहीं जान सकते हो तो मैं तुमसे वार्तालाप नहीं करना चाहता और अगर हम वार्तालाप कर भी लेते हैं तो भी इससे कोई नतीजा नहीं मिलेगा। लेकिन अगर तुम्हारी काबिलियत अच्छी है, तुम्हारे पास समझने की क्षमता है और तुम कुछ चीजों की असलियत जान सकते हो तो तुमसे वार्तालाप करने से नतीजे मिल सकते हैं और यह बातचीत निष्फल नहीं होगी। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं किससे यूँ ही वार्तालाप करता हूँ या मैं किन समस्याओं का पता लगाता हूँ, सबसे पहली बात, मैं अपने दिल में उनकी निंदा नहीं करूँगा, दूसरी बात, मैं उन्हें कोसूँगा नहीं, और तीसरी बात, मैं उनके परिणामों को निर्धारित नहीं करूँगा। उस तरीके से कार्य करना निराधार होगा और मैं बेवकूफी भरी चीजें नहीं करता। सामान्य मानवता के लिहाज से, कभी-कभी जब किसी परिचित व्यक्ति से मेरी मुलाकात होती है तब मैं बस जरा-सी बात करना और वार्तालाप करना चाहता हूँ। अगर तुम तैयार हो तो मैं तुमसे बात करूँगा। अगर नहीं हो तो मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूँगा। कुछ लोग मुझसे वार्तालाप करने से डरते हैं। मैं चाहे कुछ भी कहूँ, वे मुझसे सतर्क रहते हैं और अपने विचार व्यक्त नहीं करते, डरते हैं कि वे कुछ गलत कह देंगे और मुझे उनके बारे में गलत राय बनाने के लिए कुछ मिल जाएगा। अगर मैंने देखा कि तुम अपने दिल की बात बोलने के इच्छुक नहीं हो तो मैं उचित बिंदु पर रुक जाऊँगा। अगर तुम हमेशा मुझसे सतर्क रहोगे, हमेशा डरते रहोगे कि मैं तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र कर रहा हूँ तो तुमसे बात करने का मेरा मन नहीं होगा। मुझे बताओ, क्या मेरी यह तार्किकता सामान्य है? (हाँ।) जब मैं किसी से बात और संवाद करता हूँ तब हमेशा कोई न कोई संदर्भ जरूर होता है। उदाहरण के लिए, अगर तुम किसी खेत में पशुपालन के लिए जिम्मेदार हो तो हम पशुपालन के बारे में बात करेंगे। अगर तुम कलीसियाई अगुआ हो तो हम कलीसिया के मामलों के बारे में, भाई-बहनों से संबंधित मामलों के बारे में, भाई-बहनों की वर्तमान स्थिति के बारे में या कलीसियाई जीवन के बारे में चर्चा करेंगे। अगर तुम सुसमाचार प्रचारक हो तो हम सुसमाचार कार्य के बारे में बात करेंगे। यह सामान्य मानवता के दायरे में लोगों से मेलजोल रखना है और यह मेरे कार्य का हिस्सा भी है। कुछ मामलों में कलीसियाई कार्य शामिल नहीं होता है, लेकिन फिर भी वे परमेश्वर के घर के सामान्य मामले होते हैं। जब हम मिलते हैं तब इन चीजों के बारे में वार्तालाप करना सामान्य है। तुम परमेश्वर के घर में मामले सँभाल रहे हो और अपना कर्तव्य कर रहे हो, इसलिए जब हम मिलते हैं तब मुझे तुम्हारा अभिवादन करना चाहिए, तुम्हारे साथ वार्तालाप करनी चाहिए और देखना चाहिए कि कहीं तुम्हें कोई कठिनाई तो नहीं है। कभी-कभी हल्की-फुल्की वार्तालाप के दौरान मैं कुछ ऐसा पूछ लेता हूँ, “पिछली कुछ रातों से तापमान में गिरावट आई है—क्या तुम लोगों का घर ठंडा है?” कुछ लोग यह नहीं सुनना चाहते, वे सोचते हैं, “हम वयस्क हैं; क्या अपने बारे में चिंता करने के लिए हमें तुम्हारी जरूरत है?” अच्छे इरादों की बेकद्री की जाती है, है ना? दूसरे समय, जब मैं रसोई में जाता हूँ तब पूछता हूँ, “इस वर्ष की सब्जियाँ कैसी हैं? क्या वे खाने के लिए पर्याप्त हैं? तुम लोगों को कौन-सी सब्जियाँ या भोजन पसंद हैं?” ये बहुत सामान्य चीजें हैं, है ना? (हाँ।) लेकिन लोगों के दिल बहुत जटिल होते हैं और कुछ मामलों में जब मैं सामान्य ढंग से उनसे मेलजोल रखता हूँ और संवाद करता हूँ तब भी निर्बाध प्रवाह मौजूद नहीं होता। ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लोग अपने मुद्दों और अपनी असली स्थितियों को उजागर करने से हमेशा डरते हैं। और दूसरे लोग किस बात से डरते हैं? वे डरते हैं कि : “अगर मैंने अपनी असली स्थिति प्रकट कर दी तो तुम सभाओं में अपने धर्मोपदेशों में मुझे उजागर कर दोगे और मेरा उपयोग लक्ष्य के रूप में करोगे।” तुम लक्ष्य क्यों नहीं बन सकते? जब मैं तुम्हारी समस्याओं से संबंधित सत्य पर संगति करता हूँ तब वह उन्हें हल कर देती है। क्या यह कुछ अतिरिक्त चीज नहीं है जो तुमने प्राप्त की है? क्या यह तुम्हारा सौभाग्य नहीं है? यह अच्छी चीज है। इससे प्रमाणित होता है कि मैं तुम्हें गंभीरता से लेता हूँ और मुझमें तुम्हारे लिए कुछ सम्मान है। क्या यह सही है? अगर मैं तुम्हें अनदेखा कर देता और तुम मेरे दिल में नहीं होते और अगर मुझे तुममें किसी समस्या का पता लगता, लेकिन मैं उस पर ध्यान नहीं देता और तुम्हें मार्गदर्शन और संगति नहीं देता तो क्या तुम सत्य समझ पाते और अपनी समस्याओं को सुलझा पाते? क्या तुम इससे खुश होते? अगर तुम इससे संतुष्ट होते, यह सोचते, “परमेश्वर जो मुद्दे उजागर करता है उनमें से कोई भी मुझसे संबंधित नहीं है, इसलिए इससे प्रमाणित होता है कि मुझमें कोई समस्या नहीं है,” अगर तुम इस तरीके से परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते तो तुम सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति नही हो। कुछ लोग वर्षों की आस्था के बाद भी कभी भी काटे-छाँटे नहीं गए हैं, उन्होंने एक बार भी बतौर विषमता सेवा नहीं की है, फिर भी वे गर्वित और भाग्यशाली महसूस करते हैं, सोचते हैं कि वे बहुत अच्छे हैं, उनमें कोई समस्या नहीं है और वे निश्चित रूप से बचाए जाएँगे। क्या यह बहुत परेशानी वाली बात नहीं है? ऐसा व्यक्ति निश्चित रूप से उद्धार प्राप्त नहीं कर सकता।
सामान्य मानवता की सोच वाले लोग सामान्य मानवता के भीतर दूसरों से संवाद करते और मेलजोल रखते समय सामान्य मानवता के जमीर और विवेक के बोध का पालन करेंगे। इस बोध के कारण उनके पास दूसरों से पेश आने का एक न्यूनतम मानक और सिद्धांत होते हैं। जब तुम सामान्य मानवता की सोच वाले लोगों से बात करते हो और मेलजोल रखते हो तब एक तरफ लोग यह महसूस कर पाते हैं कि तुममें मानवता के जमीर की जागरूकता है। दूसरी तरफ तुम औचित्य के बोध से कार्य करते हो जिससे तुम दूसरों को अप्रिय नहीं लगते। एक और महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि जब तुम दूसरों से संवाद और बातचीत करोगे तब उन्हें तुम्हारे द्वारा संवाद किए गए शब्दों से फायदा होगा और वे कुछ ऐसी चीजें प्राप्त करेंगे जिनकी मानवता को जरूरत है। इसे ही हम लोगों से मेलजोल रखना और संवाद करना कहते हैं। संवाद करने का क्या मतलब है? सादे शब्दों में कहा जाए तो यह हल्की-फुल्की वार्तालाप करना है। ज्यादातर लोग हल्की-फुल्की वार्तालाप करना नहीं जानते; जैसे ही वे बोलते हैं, वे बहस और कहा-सुनी में उलझने की प्रवृत्ति रखते हैं या दूसरों से अपनी बात मनवाने के लिए दिखावा करते हैं और उन्हें उपदेश देते हैं। जिन लोगों में जरा-सी वाक्पटुता होती है, वे जैसे ही अपना मुँह खोलते हैं, दूसरों को उपदेश देना चाहते हैं और उनके शिक्षक के रूप में कार्य करते हैं। ये सभी अभिव्यक्तियाँ भ्रष्ट स्वभावों के प्रकाशन हैं। भ्रष्ट स्वभावों वाले लोग दूसरों से सामान्य रूप से हल्की-फुल्की वार्तालाप नहीं कर सकते। अगर वे कुछ देर सामान्य रूप से बोल भी लें तो भी यह लंबे समय तक नहीं चल सकता। किसी बिंदु पर, वे बहस करना शुरू कर देंगे, उनका चेहरा तमतमा जाएगा और वे उसमें पूरी तरह से उलझ जाएँगे। यह सामान्य हल्की-फुल्की वार्तालाप नहीं है। सामान्य हल्की-फुल्की वार्तालाप, निश्चित रूप से सही और गलत पर बहस करना या झगड़ा करना और कहा-सुनी करना नहीं है, यह लोगों के बारे में राय बनाना या उनकी निंदा करना तो बिल्कुल नहीं है। आओ, हल्की-फुल्की वार्तालाप को परिभाषित करें। यह जानकारी का आदान-प्रदान करना और इसे साझा करना है—इसे ही हम हल्की-फुल्की वार्तालाप कहते हैं। क्या यह परिभाषा सटीक है? (हाँ।) यह किस तरीके से सटीक है? जानकारी का आदान-प्रदान करना और इसे साझा करना सामान्य मानवता के जमीर और तार्किकता की नींव पर बने होते हैं। देखो—जमीर और विवेक वाले लोग कैसे वार्तालाप और संवाद करते हैं? वे बहस नहीं करते और वे एक-दूसरे का सम्मान कर पाते हैं जिससे सामने वाले को फायदा होता है। सामने वाले ने जो साझा किया है, उसे सुनने के बाद उन्हें कुछ नई जानकारी मिलती है। फिर वे बदले में सामने वाले को कुछ ऐसी जानकारी देते हैं जो उन्हें पता है ताकि सामने वाले को भी फायदा हो और वह अपनी मानवता में अनुभव, अंतर्दृष्टि और ज्ञान प्राप्त कर सके। सामने वाले का सम्मान करने और उसके साथ समान स्तर पर सामंजस्यपूर्ण ढंग से रहने के सिद्धांतों के आधार पर उन्हें जो जानकारी पता होती है, उसे उसके साथ साझा करना और फिर सामने वाले द्वारा साझा की गई जानकारी को प्राप्त करना—क्या यह आपसी मदद नहीं है? यह समानता, आपसी सहयोग, सामंजस्य और निष्पक्षता की नींव पर बना है। संवाद और हल्की-फुल्की वार्तालाप करने का यही मतलब है। मुझे बताओ, क्या मेरी परिभाषा सटीक है? (हाँ।) इस सिद्धांत के आधार पर वार्तालाप करने का और संवाद का अभ्यास करना सही है। अगर संवाद और वार्तालाप षड्यंत्रों, बहस, संघर्षों, चालबाजियों, छलों, जालों और परीक्षाओं से भरे हैं और अगर जो प्रकट होता है वे सब भ्रष्ट स्वभाव हैं, अगर यह सब आपसी दमन है जिसमें हर व्यक्ति दिखावा कर रहा होता है, एक-दूसरे से मुकाबला कर रहा होता है, यह देखने की होड़ कर रहा होता है कि कौन ज्यादा शानदार ढंग से बोलता है या ज्यादा कहता है तो यह सामान्य संवाद नहीं है। यह सामान्य मानवता के जमीर और तार्किकता के दायरे में संवाद नहीं है। यह संवाद जानकारी का आदान-प्रदान करना और जानकारी साझा करना नहीं है, बल्कि खुल्लमखुल्ला और गुप्त संघर्ष और कहा-सुनी हैं। क्या ऐसा ही नहीं है? (हाँ।)
बिना षड्यंत्र रचे दूसरों से संवाद में सफल होने के लिए तुम्हें सामान्य मानवता के जमीर और तार्किकता के दायरे में संवाद करना सीखना होगा। संवाद का उद्देश्य दूसरों की मदद करना है और साथ ही, उनसे मदद और फायदे प्राप्त करना भी है। यह सामान्य संवाद है और इस तरीके से तुम बिना षड्यंत्र रचे संवाद में सफल हो सकते हो। अविश्वासियों का संवाद और वार्तालाप देखो; क्या यह सामान्य संवाद का प्रभाव प्राप्त कर सकता है? (नहीं।) जब भ्रष्ट लोग संवाद और वार्तालाप करते हैं तब क्या उनके संवाद की विषयवस्तु, मकसद और लहजा सामान्य होते हैं? (नहीं।) उनका संवाद बस मुर्गों की लड़ाई या कुत्तों की लड़ाई जैसा होता है। क्या उनका संवाद निर्बाध रूप से आगे बढ़ सकता है? (नहीं।) वे दूसरों के खिलाफ षड्यंत्र न रचने या उनसे बहस न करने में भी सफल नहीं हो सकते। संवाद को निर्बाध रूप से प्रवाहित होने के लिए प्रेमपूर्ण दिल, एक-दूसरे की मदद करने की इच्छा और कमजोरियों की भरपाई करने के लिए एक-दूसरे की शक्तियों से सीखने की तत्परता होनी चाहिए। जब मैं तुम लोगों से संवाद और वार्तालाप करता हूँ तब सिर्फ मेरा षड्यंत्र न रचना ही काफी नहीं है; तुम्हें भी इस सिद्धांत के अनुसार षड्यंत्र न रचने और संदेही नहीं होने का अभ्यास करना होगा। अगर मैं षड्यंत्र न रचूँ, लेकिन तुम लोग लगातार षड्यंत्र रचते जाओ और न सिर्फ खुद षड्यंत्र रचो, बल्कि यह संदेह भी करो कि मैं षड्यंत्र रच रहा हूँ तो हमारा संवाद निर्बाध रूप से प्रवाहित नहीं हो सकता और न ही हम सच्ची, फायदेमंद बातचीत कर सकते हैं या सामंजस्यपूर्ण ढंग से रह सकते हैं। कुछ लोग जब मुझे आते हुए देखते हैं तब छिपने के लिए जल्दी से कोई जगह ढूंढ़ लेते हैं। अगर वे वाकई मुझसे बच नहीं सकते तो वे अनिच्छा से मेरा अभिवादन करते हैं, लेकिन अपने दिलों में वे मुझसे मिलना नहीं चाहते, सोचते हैं, “कितना तकलीफदेह है। तुम फिर से हमारी वास्तविक स्थिति का पता लगाने यहाँ चले आए हो। ऐसा करने के बाद तुम फिर से सत्य सिद्धांतों की संगति करोगे और हमें शर्मिंदा करोगे। हमें क्या करना चाहिए?” अगर तुम मुझसे मिलने या मेरे साथ मेलजोल रखने के इच्छुक नहीं हो और मेरे साथ मेलजोल रखने के दौरान तुम अंदर से थके हुए महसूस करते हो और तुम्हें हमेशा लगता है कि मैं तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र रच रहा हूँ तो जब तुम मुझे आते देखो तब मुझसे बच सकते हो। अगर तुम्हें लगता है कि जब तुम मुझसे मेलजोल रखते हो तब मैं षड्यंत्र नहीं करता और इससे तुम्हें आराम, खुशी, आजादी और सुकून मिलता है तो चलो, हम मिलें, वार्तालाप करें और हाल ही में चीजें कैसी रही हैं, इस बारे में जानकारी साझा करें। अगर तुम मुझसे पूछते हो, “आजकल तुम्हारे क्या हाल-चाल है?” तो मैं ईमानदारी से उत्तर दूँगा। अगर मैंने तुमसे पूछा, “हाल ही में चीजें कैसी रही हैं? क्या तुमने कोई जीवन प्रगति की है? क्या अपना कर्तव्य करने से तुमने कोई फायदा प्राप्त किया है?” और तुम भी ईमानदारी से उत्तर दे सकते हो तो यह बहुत अच्छा है। हर मुलाकात सुखद माहौल में आगे बढ़ सकती है। अगर मुझे देखकर लोगों का हमेशा मुझसे छिपना सही नहीं है तो क्या जानबूझकर मेरी खुशामद करने के लिए हमेशा झूठी चापलूसी करना सही है? (नहीं।) यह सही क्यों नहीं है? (खुशामद करना पसंद करना असत्यता और धूर्तता के समान है। हमारे लिए बेहतर यही है कि हम ज्यादा सच्चाई से बोलें और हमें परमेश्वर के साथ बस सामान्य मानसिकता से पेश आने की जरूरत है। एक बात तो यह है कि हमें उसके साथ स्पष्टवादी होना चाहिए। दूसरी बात यह है कि हमें परमेश्वर की खुशामद नहीं करनी चाहिए, चापलूसी कर उसकी कृपा पाने के लिए जानबूझकर प्रयास नहीं करना चाहिए या जानबूझकर उससे घनिष्ठ होने का प्रयास नहीं करना चाहिए।) मेरी बस एक ही अपेक्षा है : जब मैं तुम्हें देखूँ तब मुझसे छिपो मत और जब मैं तुम्हें नहीं ढूँढ़ रहा होऊँ तब मुझे परेशान मत करो। वही करो जो तुम्हें करना चाहिए और सब कुछ सामान्य बनाओ। मैं तुम लोगों के कर्तव्य-निर्वहन को प्रभावित नहीं करूँगा और तुम लोगों को मुझे प्रभावित नहीं करना चाहिए। मुझसे छिपना और मुझे परेशान करना, ये दोनों ही वे सिद्धांत नहीं हैं जिनका लोगों को मेरे संपर्क में रहने और मेरे साथ मेलजोल रखते समय पालन करना चाहिए। तो सिद्धांत क्या है? यह है सामान्य मानवता के जमीर और विवेक के दायरे में संवाद करना और स्पष्टवादिता से बातचीत कर पाना और स्पष्ट सच बोल पाना; मैं जो भी पूछूँ, उसका तुम्हें सच्चाई से उत्तर देना चाहिए। लोग स्पष्ट सत्य क्यों नहीं बोल पाते? उदाहरण के लिए, मान लो कि मैं तुमसे पूछता हूँ, “इस महीने सुसमाचार का प्रचार करने में तुमने कितने लोग प्राप्त किए?” और तुम उत्तर नहीं देना चाहते। अगर मैंने देखा कि तुम असहज हो रहे हो तो मैं और जोर नहीं दूँगा। मैं लोगों को मुश्किल स्थिति में नहीं डालना चाहता और मैं कभी भी किसी को बोलने के लिए मजबूर नहीं करता। कुछ लोग, चाहे दूसरे उनसे कुछ भी पूछें, हमेशा सोच-विचार करते हैं, “उसका यह पूछने का क्या अर्थ है?” वे सीधे उत्तर नहीं देना चाहते, उन्हें गलत जवाब देने और अपने लिए समस्याएँ खड़ी करने का बहुत डर होता है। अगर तुम हमेशा इस तरह से अटकलें लगाते रहोगे और षड्यंत्र रचते रहोगे तो हम संवाद नहीं कर सकेंगे। तुम्हें मेरे प्रश्नों के अर्थ की पड़ताल करने की जरूरत नहीं है और न ही तुम्हें मेरे खिलाफ षड्यंत्र रचना चाहिए। अगर तुम सरल हो सकते हो और अपने दिल की बात कहने के लिए खुद को खोल सकते हो तो फिर हम एक-दूसरे से संवाद कर सकते हैं। यह आसान है या नहीं? (आसान है।) यह कहना आसान है, लेकिन हो सकता है कि इसे वास्तव में करना जरा-सा मुश्किल हो। यह सुनने में जितना आसान लगता है, उतना है नहीं। उदाहरण के लिए, हो सकता है कि मैंने एक बार तुमसे कोई प्रश्न पूछा हो और तुमने उस समय सच नहीं बताया हो—तुमने झूठ बोला हो। वह संपर्क और संवाद विफल हो गया। विफल होने के बाद तुम्हें क्या करना चाहिए? इतना हिम्मती बनने का प्रयास करो कि अगली बार हमारी मुलाकात होने पर इसे मान सको : “पिछली बार मैंने झूठ बोला था। अब से मैं स्पष्ट सच बोलूँगा।” तब मैं तुम्हें प्रोत्साहित करूँगा—मैं तुम्हारी तारीफ करूँगा और सहमति का इशारा करूँगा : तुम सत्य का अभ्यास करने और ईमानदार व्यक्ति बनने में सफल रहे हो। क्या यह बढ़िया नहीं है? (हाँ।)
जब षड्यंत्र नहीं करने के विषय पर संगति करने की बात आती है तब चाहे कितने भी उदाहरण दिए जाएँ, तुम लोगों को जो बताया जा रहा है वह एक सिद्धांत है। क्या तुम्हें पता है कि वह सिद्धांत क्या है? (परमेश्वर को मापने के लिए या परमेश्वर पर संदेह करने के लिए भ्रष्ट मानवजाति के परिप्रेक्ष्य का उपयोग मत करो।) सही कहा। परमेश्वर से भ्रष्ट मानवजाति के परिप्रेक्ष्य से मत पेश आओ। तो किस सिद्धांत का पालन करना चाहिए? (परमेश्वर से परमेश्वर की तरह पेश आओ।) क्या उससे मनुष्य की तरह पेश आना ठीक नहीं है? क्या उससे एक सामान्य, साधारण व्यक्ति की तरह पेश आना ठीक नहीं है? चाहे तुम उससे परमेश्वर की तरह पेश आओ या मनुष्य की तरह, अंतर्वैयक्तिक मेलजोल के लिए सबसे जरूरी सिद्धांत एक-दूसरे से स्पष्टवादी होना है। जब मैं तुमसे बात करता हूँ और तुम्हारे साथ चीजें करता हूँ तब मैं तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र नहीं करता और तुम्हें भी मेरे साथ स्पष्टवादी होना चाहिए। तो अगर कोई तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करता है तो क्या तुम्हें भी उसके खिलाफ षड्यंत्र करना चाहिए? (नहीं।) अगर कोई तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करता है तो तुम्हें उससे भी सिद्धांतों के अनुसार पेश आना चाहिए। यही सही तरीका है। यह सिर्फ ऐसा नहीं है कि चूँकि मैं तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र नहीं करता, इसलिए तुम षड्यंत्र या संदेह किए बिना मेरे साथ स्पष्टवादी बनो। बल्कि भले ही दूसरे लोग तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करें, तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकते हो और मामलों को सँभाल सकते हो। यह सिद्धांतों का पालन करना है। कुछ लोग कहते हैं, “उन्होंने मेरे खिलाफ षड्यंत्र किया—ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं पलटवार न करूँ? अगर मैं उन्हें सच्ची स्थिति नहीं दिखाऊँ और बस उन्हें ऐसे ही मुझे डराने-धमकाने दूँ तो क्या मैं हार नहीं जाऊँगा? क्या मुझ पर धौंस जमाना इतना आसान है?” मुझे बताओ, क्या उनके तर्क का कोई अर्थ निकलता है? आँख के बदले आँख, दाँत के बदले दाँत—दुनिया के लोगों के बीच इसका अर्थ निकलता है। लेकिन अगर सत्य से मापा जाए तो यह कथन गलत है। उनका तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करना बुरा कर्म है। अगर तुम पलटवार करते हो, उनके खिलाफ षड्यंत्र करने के लिए उन्हीं विधियों का उपयोग करते हो तो परमेश्वर की नजर में सार एक ही है; दोनों ही बुरे कर्म हैं। परमेश्वर यह नहीं कहेगा कि चूँकि उन्होंने तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र किया, इसलिए तुम्हारा वापस हमला करना पूरी तरह से जायज है और सिद्धांतों के अनुसार है और यह बुरा कर्म नहीं है। परमेश्वर यह नहीं देखता कि तुमने किस कारण से उनके खिलाफ षड्यंत्र किया; वह यह देखता है कि क्या तुम्हारा कार्य खुद एक षड्यंत्र है, क्या यह बुरा कर्म है और क्या तुम इस मामले को सत्य द्वारा या मानवीय नैतिक नजरियों द्वारा मापकर इससे पेश आते हो। अगर मामले को मानवीय नैतिक नजरियों द्वारा मापा जाता है तो “आँख के बदले आँख, दाँत के बदले दाँत” सही माना जाएगा। उन्होंने पहले तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र किया, इसलिए तुम्हारा भी उन्हीं तरीकों का उपयोग करके पलटवार करना और उनके खिलाफ षड्यंत्र करना सही है और उन्हें ऐसे नतीजे स्वीकार करने चाहिए। अगर मानवीय नैतिक नजरियों का उपयोग करके मानवीय परिप्रेक्ष्य से मापा जाता है तो यह गलत नहीं है। और अगर कानून के अनुसार मापा जाता है तो शायद यह गैर-कानूनी नहीं है। लेकिन परमेश्वर की नजर में यह सत्य के विपरीत है। कोई भी चीज जो सत्य के विपरीत चलती है, वह बुरा कर्म है और परमेश्वर की नजर में निंदित है। अगर तुम्हारा वापस हमला करना जायज हो, तो भी परमेश्वर सिर्फ इस कारण से तुम्हारी निंदा करने से नहीं रुकेगा क्योंकि तुम्हारा वापस हमला करना उचित और नैतिक रूप से जायज है। परमेश्वर यह देखेगा कि उनका तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करने के बाद तुम उनसे किस तरीके से पेश आते हो। अगर तुम उनसे उसी तरीके से पेश आते हो तो परमेश्वर तुम्हारी निंदा करेगा। लेकिन अगर तुम उनसे सत्य सिद्धांतों के अनुसार पेश आते हो और उनसे परमेश्वर द्वारा सिखाए ढंग से निष्पक्षता से और न्यायपूर्वक पेश आते हो तो भले ही नैतिक रूप से लोगों की धारणाएँ हों और वे तुम्हारी निंदा करें और कानूनी रूप से तुम्हें अपराधी घोषित कर दिया जाए, लेकिन परमेश्वर की नजर में, परमेश्वर कहता है कि इस मामले में तुमने सिद्धांत के अनुसार कार्य किया है और यह बुरा कर्म नहीं है—वह तुम्हारी निंदा नहीं करेगा। अगर तुम लोगों से सत्य सिद्धांतों के अनुसार पेश आ सकते हो तो यह सत्य का अभ्यास करना है। तुम्हें मसीह से अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार या अपने भ्रष्ट स्वभावों के आधार पर पेश नहीं आना चाहिए या उसके खिलाफ चालबाजियों और छल-कपट का उपयोग नहीं करना चाहिए। तुम लोगों से कैसे पेश आते हो इसमें भी यह ऐसा ही होना चाहिए। अगर तुम मसीह, इस साधारण व्यक्ति, से सही ढंग से पेश आ सकते हो तो उसी तरीके से तुम दूसरों से भी सही ढंग से पेश आ सकते हो। चाहे व्यक्ति कोई भी हो, तुम्हें इस बारे में सही रवैया अपनाना चाहिए कि तुम उससे कैसे पेश आते हो। इस तरह, लोगों से पेश आने के लिए तुम्हारे सिद्धांत और विधियाँ सही होंगी। अगर तुम लोगों के प्रति अपने रवैये में या उनसे पेश आने के तरीके के बारे में अपने विचारों और दृष्टिकोणों में कोई गलती करते हो तो तुम तुरंत परमेश्वर के वचनों के अनुसार आत्म-चिंतन करोगे और अपने विचारों और दृष्टिकोणों को ठीक करोगे और साथ ही, अपने व्यवहार को लगातार नियमित करोगे और धीरे-धीरे, लोगों से पेश आने के तरीके के बारे में तुम्हारे विचार और दृष्टिकोण, और आचरण और कार्य करने के लिए तुम्हारे सिद्धांत उत्तरोत्तर सत्य के अनुरूप होते जाएँगे। जब सत्य सिद्धांत तुम्हारा जीवन बन जाएँगे तब तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव छुट चुका होगा और परिवर्तित हो चुका होगा और तुम लोगों से निष्पक्षता से, न्यायपूर्वक और परमेश्वर के इरादों के हिसाब से पेश आ पाओगे। अगर वे तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र नहीं करते हैं तो तुम सोचते हो कि उनके खिलाफ षड्यंत्र नहीं करना तुम्हारे लिए सही है। लेकिन अगर वे तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करते हैं और तुम उनके खिलाफ षड्यंत्र करने से खुद को रोक सकते हो और सत्य की तलाश कर सकते हो और उनसे सत्य सिद्धांतों के अनुसार पेश आ सकते हो तो क्या यह प्रगति नहीं है? क्या यह परिवर्तन नहीं है? (हाँ।) अगर वे तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करते हैं और तुम भी उनके खिलाफ षड्यंत्र करते हो तो क्या तुम उसी मार्ग पर नहीं चल रहे हो जिस पर तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करने वाला व्यक्ति चल रहा है? ऐसे में तुममें और दुनिया के लोगों में क्या अंतर रह जाता है? लोगों, चीजों, आचरण करने और कार्य करने के बारे में तुम्हारे नजरिए नहीं बदले हैं। वे परमेश्वर के वचनों या सत्य सिद्धांतों पर आधारित नहीं बल्कि दुनिया के लोगों के सिद्धांतों पर आधारित हैं : जो कोई भी तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करता है, तुम उसके खिलाफ षड्यंत्र करते हो—आँख के बदले आँख, दाँत के बदले दाँत। तुम दुनिया के लोगों से, अविश्वासियों से बिल्कुल भी अलग नहीं हो। अगर, इस बात की परवाह किए बगैर कि कोई तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करता है या नहीं, तुम कभी भी उसके खिलाफ षड्यंत्र नहीं करते, बल्कि उससे परमेश्वर के वचनों के अनुसार और सत्य सिद्धांतों के अनुसार पेश आते हो तो यह रुख और परिप्रेक्ष्य सही है; यह सत्य का अभ्यास करना है। अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु ने लोगों से क्या कहा? अगर कोई तुम्हारे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे तो तुम्हें क्या करना चाहिए? (प्रभु यीशु ने कहा, “जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उसकी ओर दूसरा भी फेर दे” (मत्ती 5:39)।) कुछ लोग कहते हैं, “अगर वह मुझे थप्पड़ मारेगा तो मैं उसे वापस थप्पड़ मार दूँगा! अगर उसने मेरे बाएँ गाल पर थप्पड़ मारा तो मैं उसके बाएँ गाल पर थप्पड़ मार दूँगा। अगर उसने मेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारा तो मैं उसके दाहिने गाल पर थप्पड़ मार दूँगा। यह न तो नैतिक रूप से निंदित है और न ही कानूनी रूप से।” परमेश्वर कहता है, “गलत। अगर वह तुम्हारे बाएँ गाल पर थप्पड़ मारे तो अपना दाहिना गाल भी उसकी ओर फेर दो। वापस थप्पड़ मत मारो।” क्या तुम ऐसा कर सकते हो? इस बात की परवाह किए बगैर कि मानवीय नजर में परमेश्वर की अपेक्षा स्वीकार्य है या नहीं—शायद कुछ लोगों के लिए यह बेवकूफी भरी कहावत हो, बेवकूफी भरा अभ्यास हो—तुमसे परमेश्वर की यही अपेक्षा है। क्या तुम यह कर सकते हो? तुम कहते हो, “मैं यह नहीं कर सकता। अगर उसने मेरे बाएँ गाल पर थप्पड़ मारा तो मुझे उसे वापस थप्पड़ मारना ही पड़ेगा, नहीं तो मेरा अभिमान और गरिमा चली जाएगी और मैं अपना सम्मान पूरी तरह से खो चुका होऊँगा।” इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा यह कथन भ्रष्ट मानवजाति के बीच टिकता है या नहीं, अगर परमेश्वर की नजर में तुम्हारा कथन गलत है, तुम्हारा दृष्टिकोण गलत है और तुम्हारा व्यवहार गलत है तो फिर परमेश्वर की नजर में तुम्हारा व्यवहार निंदित है। इसके निंदित होने का क्या कारण है? वह यह है कि तुमने परमेश्वर के वचनों पर ध्यान नहीं दिया, तुम परमेश्वर के मार्ग पर नहीं चले। परमेश्वर ने तुमसे कहा कि अगर कोई तुम्हारे बाएँ गाल पर थप्पड़ मारे तो तुम्हें अपना दाहिना गाल भी उसकी ओर फेर देना चाहिए। क्या तुमने ऐसा किया? परमेश्वर बस तुमसे पूछता है : क्या तुमने परमेश्वर के वचनों पर ध्यान दिया? क्या परमेश्वर ने तुम्हें जो निर्देश दिया, तुमने उसके अनुसार अभ्यास किया? अगर तुमने इस तरह से अभ्यास नहीं किया तो फिर तुम परमेश्वर के मार्ग पर नहीं चले और तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करता है; तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो सत्य का अभ्यास करता है और ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार चीजों को देखता है और आचरण करता है। ऐसे में परमेश्वर तुम्हें पसंद नहीं करता है, तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जिसे परमेश्वर स्वीकारता है और परमेश्वर की नजर में वह थप्पड़ जो तुमने लौटाया, वह बुरा कर्म है। शायद तुम्हें हमेशा यही लगेगा कि यह पूरी तरह से जायज था, यह तुम्हारी गरिमा और अधिकारों की रक्षा करने का एक जरूरी उपाय था। लेकिन परमेश्वर की नजर में उस थप्पड़ का मतलब है कि तुम परमेश्वर के मार्ग पर नहीं चले हो और न ही तुम चलना चाहते हो, तुम परमेश्वर के वचनों पर ध्यान नहीं देते हो और तुम्हारी नजर में परमेश्वर के वचन सिर्फ धर्म-सिद्धांत हैं, खोखले शब्द हैं। तुम परमेश्वर के वचनों का सिर्फ प्रचार करते हो, उनका कभी अभ्यास नहीं करते। परमेश्वर तुम्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में निरूपित करेगा जो परमेश्वर के मार्ग पर नहीं चलता। तो फिर क्या अब भी तुम परमेश्वर की स्वीकृति पा सकते हो? अगर तुम परमेश्वर के मार्ग पर नहीं चलते हो तो परमेश्वर के वचन कभी तुम्हारा जीवन नहीं बन सकते। तुम अपने खुद के तर्क के समर्थन में परमेश्वर से चाहे कितनी भी बहस कर लो, वह तुम्हारी नहीं सुनेगा। परमेश्वर यह नहीं कहेगा, “किसी ने अकारण ही तुम्हारे बाएँ गाल पर थप्पड़ मार दिया और तुम काफी दयनीय हो। अपनी गरिमा की रक्षा करने के लिए तुम वापस थप्पड़ मार सकते हो। वापस थप्पड़ मारने के बाद तुम प्रार्थना कर सकते हो और अपना पाप कबूल कर सकते हो और परमेश्वर तुम्हें माफ कर देगा और तुम्हारी निंदा नहीं करेगा।” परमेश्वर ने ऐसा नहीं कहा। परमेश्वर ने कहा कि अगर कोई तुम्हारे बाएँ गाल पर थप्पड़ मारे तो तुम्हें अपना दाहिना गाल भी उसकी ओर फेर देना चाहिए। अगर तुम ऐसा कर सकते हो तो तुम परमेश्वर के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति हो। अगर तुम ऐसा नहीं कर सकते तो परमेश्वर की नजर में तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करता है, ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं करता है या परमेश्वर के मार्ग पर नहीं चलता है, जो एक बुरा व्यक्ति है। बुरे लोगों के प्रति परमेश्वर का क्या रवैया है? परमेश्वर कहता है, “मेरे पास से चले जाओ! मैं तुम लोगों को नहीं जानता।” परमेश्वर ऐसे लोगों को नहीं चाहता। समझे? (समझ आ गया।) यही बात षड्यंत्र करने पर भी लागू होती है। तुम कहते हो, “उन्होंने मेरे खिलाफ षड्यंत्र किया, तो मेरा उनके खिलाफ षड्यंत्र करने में क्या गलत है?” तुम्हारा लोगों के खिलाफ षड्यंत्र करना बस गलत है। यह किस तरीके से गलत है? यह इसलिए गलत है क्योंकि षड्यंत्र करना अपने आप में एक बुरा कर्म है, कोई अच्छा कर्म नहीं है। इसलिए, जब वे लोगों के खिलाफ षड्यंत्र करते हैं तब परमेश्वर उनकी निंदा करता है। अगर तुमने भी ऐसा ही किया तो परमेश्वर उसी तरीके से तुम्हारी भी निंदा करेगा। तुम्हें किसी ऐसे तरीके से कार्य करना चाहिए जो षड्यंत्र करने से मुक्त हो, एक ऐसे तरीके से जिसे परमेश्वर स्वीकारता है। तुम्हारा कर्तव्य परमेश्वर द्वारा तुम्हें बताए गए अभ्यास के मार्ग और सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करना है, अपने तर्क के समर्थन में बहस करना या अपनी व्यक्तिगत गरिमा या सम्मान की रक्षा करना नहीं। तुम्हारा व्यक्तिगत चेहरा, रुतबा और गरिमा महत्वपूर्ण नहीं है। क्या महत्वपूर्ण है? महत्वपूर्ण यह है कि क्या परमेश्वर के वचन तुममें कार्यान्वित किए जाते हैं, क्या परमेश्वर के वचन तुम्हारा जीवन बन गए हैं, क्या तुमने परमेश्वर के वचनों को जिया है और क्या परमेश्वर के वचन तुममें पूरे किए गए हैं। समझे? (समझ आ गया।) कुछ लोग कहते हैं, “उन्होंने मुझे गाली दी, इसलिए मैं उन्हें वापस गाली दूँगा।” क्या ऐसा कहना सही है? (नहीं।) दूसरे लोग कहते हैं, “वे हमेशा मुझसे तुच्छता से पेश आते हैं, तो मैं उनसे तुच्छता से क्यों नहीं पेश आ सकता? अगर मैंने ऐसा नहीं किया तो क्या मैं भोंदू नहीं लगूँगा?” क्या यह महत्वपूर्ण है कि दूसरे तुम्हें कैसे देखते हैं? (नहीं।) लोग हमेशा इज्जत को लेकर परेशान रहते हैं, हमेशा डरते हैं कि दूसरे लोग उन्हें भोंदू और बेअक्ल समझेंगे। दरअसल, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरे लोग तुम्हें कैसे देखते हैं। किससे फर्क पड़ता है? जब वे तुम्हें भोंदू के रूप में, बेअक्ल के रूप में देखते हैं, जब वे तुम्हारी खिल्ली उड़ाते हैं तब तुम कैसे प्रतिक्रिया करते हो? क्या तुम आवेगशीलता से, मानवीय विधियों और उपायों से या परमेश्वर द्वारा तुम्हें बताए गए सिद्धांतों के अनुसार प्रतिक्रिया करते हो? क्या तुमने परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास किया है? क्या तुमने अपना कर्तव्य मजबूती से पकड़कर रखा है? वे तुम पर हँसते हैं और तुम्हें भोंदू कहते हैं, बस इस कारण से तुम झल्ला उठते हो और अपना कार्य छोड़ देते हो, “तुम मुझे भोंदू समझते हो, इसलिए अब मैं इसे और नहीं करूँगा!” तुम यह उनके लिए नहीं कर रहे हो। अगर तुमने अपना कर्तव्य छोड़ दिया तो परमेश्वर क्या कहेगा? “किसी ने तुम्हें भोंदू कहा, इसलिए तुमने वह कर्तव्य छोड़ दिया जो तुम्हें मैंने सौंपा था। तुममें कोई वफादारी नहीं है!” परमेश्वर इसे इसी तरीके से देखेगा। अगर तुम्हारे दिल में सही मायने में परमेश्वर है, अगर तुममें परमेश्वर के प्रति सही मायने में वफादारी है तो अगर कोई तुम पर हँसता है और तुम्हें भोंदू कहता है तो सबसे पहले तुम्हें सोच-विचार करना चाहिए : “तुम कहते हो कि मैं भोंदू हूँ, तुम कहते हो कि मैं बेअक्ल हूँ और तुम मेरे पीठ-पीछे मुझ पर हँसते हो। मैं तुमसे बहस नहीं करूँगा और न ही इस कारण से तुमसे नाराजगी रखूँगा। मैं बेवकूफ हूँ और मेरी काबिलियत खराब है, लेकिन परमेश्वर ने मेरा उन्नयन किया है और वह मुझसे नफरत नहीं करता। यह कर्तव्य मुझे तुमने नहीं दिया, यह मुझे परमेश्वर ने दिया था : यह मेरे लिए परमेश्वर का आदेश है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम मेरे बारे में ऊँची राय रखते हो या नहीं। मैं तुम्हारे देखने के लिए अपना कर्तव्य नहीं कर रहा हूँ। अपना कर्तव्य करना मेरा मिशन है। मुझे अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करना चाहिए और परमेश्वर के प्रति वफादार रहना चाहिए। मुझे इस कर्तव्य को संजोना चाहिए और परमेश्वर के उन्नयन और भरोसे पर खरा उतरना चाहिए। मुझे अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित रहना चाहिए। तुमने मुझे भोंदू कहा, इस कारण से मैं अपना कर्तव्य नहीं छोड़ सकता और परमेश्वर को निराश नहीं कर सकता। उससे मैं सच में भोंदू बन जाऊँगा।” क्या इस तरीके से सोचना सिद्धांतों के अनुसार नहीं है? क्या यह आवेगशीलता को छोड़ देना नहीं है? यह आवेगशीलता से प्रतिक्रिया करना नहीं है। जब तुम लोग इस तरीके से कार्य कर सकोगे तब तुम सही मायने में बदल चुके होगे और तुम्हारा आध्यात्मिक कद होगा। तुम लोगों, घटनाओं या चीजों से बाधित नहीं होगे। हालात चाहे कैसे भी हों, तुम परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों को अपने मन में मजबूती से रखोगे और किसी भी मामले से आवेगशीलता, भावनाओं, मिजाज, व्यक्तिगत पसंद, इच्छाओं या महत्वाकांक्षाओं से पेश नहीं आओगे। परमेश्वर के वचन तुम्हारे दिल में सबसे ऊँची और सबसे महान चीजें होंगी और जब कुछ भी होगा तब तुम सबसे पहले परमेश्वर के वचनों की तलाश करोगे, “परमेश्वर के वचन यह कहते हैं, इसलिए मैं इन्हें मजबूती से पकड़कर रखूँगा। अगर दूसरे लोग मुझे भोंदू समझते हैं तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क इससे पड़ता है कि परमेश्वर मुझे कैसे देखता है। वैसे तो मैं बेवकूफ हूँ और मेरी काबिलियत खराब है, लेकिन फिर भी परमेश्वर ने मुझे करने के लिए एक कर्तव्य सौंपा है। मैंने परमेश्वर से कितने बड़े उन्नयन का आनंद लिया है! यह एक आशीष है!” अगर जिन चीजों से तुम्हारा सामना होता है उनसे तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार पेश आ सको तो तुम जान जाओगे कि सत्य सिद्धांतों के अनुसार कैसे अभ्यास करना है।
चलो, षड्यंत्र नहीं करने के मामले के बारे में बात करना जारी रखें। दैनिक जीवन में लोगों के साथ जो विभिन्न चीजें होती हैं उनमें दूसरे लोग अक्सर उनके खिलाफ षड्यंत्र करते हैं। कुछ लोग शोहरत और लाभ के लिए तुमसे होड़ करते हैं, कुछ लोग तुमसे सही और गलत पर तर्क करते हैं, कुछ लोग तो तुमसे एक अकेले शब्द पर बहस करते हैं, कुछ लोग तुम्हारे बारे में राय बनाते हैं और तुम्हारे पीठ पीछे तुम्हें कमजोर करते हैं और कुछ लोग तुमसे गलतियाँ करवाते हैं और तुमसे अनुचित ढंग से पेश आते हैं। विभिन्न लोगों के षड्यंत्रों से सामना होने पर तुम उन्हें कैसे सँभालते हो? तुम्हें एक सिद्धांत का दृढ़ता से पालन करना होगा : “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरे मेरे खिलाफ कैसे षड्यंत्र करते हैं, मैं उनके खिलाफ षड्यंत्र नहीं करूँगा; मैं उनसे दूर रहूँगा! मुझे समझना होगा कि परमेश्वर के इरादे क्या हैं और वह कौन-सा सबक है जो परमेश्वर चाहता है कि मैं सीखूँ? मुझे अपनी स्थिति में डटकर खड़ा रहना होगा और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करना होगा और अपने कर्तव्य को मजबूती से पकड़कर रखना होगा। परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना कभी गलत नहीं होगा और इससे कभी नुकसान नहीं होगा। दूसरे लोग मेरे बारे में कितनी भी ऊँची राय क्यों न रखें, यह कोई ताज या इनाम नहीं है; यह एक आफत है!” अगर तुम ऐसे किसी सिद्धांत का पालन करते हो तो यह तुम्हें बुराई करने से और परमेश्वर द्वारा निंदा किए जाने से बचा सकता है। अगर तुम जीवन भर एक सृजित प्राणी की स्थिति में डटकर खड़े रह सकते हो, एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा कर सकते हो, पूरे दिल और मन से परमेश्वर द्वारा तुम्हें सौंपा गया कार्य पूरा कर सकते हो और अपने सारे विचार अपना कर्तव्य करने को समर्पित कर देते हो—भले ही तुम इसमें इतने तल्लीन हो जाओ कि भोजन और नींद की भी परवाह न करो या अपना दिमाग खपाओ—तुम परमेश्वर द्वारा तुम्हें सौंपा गया कार्य अच्छी तरह से करते हो और तुम अपना कर्तव्य मानक-स्तरीय तरीके से करने में सफल होते हो तो तुम एक अर्थपूर्ण जीवन जिओगे। इस जीवन में हमें बड़ी चीजें करने, कोई भी उद्यम चलाने या कोई चमत्कार तैयार करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। हम तो बस तुच्छ लोग हैं और हमें परमेश्वर के ज्यादा वचन पढ़ने चाहिए, हमारे साथ होने वाली चीजों में सत्य समझने का प्रयास करना चाहिए, अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए और हमें जो करना चाहिए, उसे अच्छी तरह से करना चाहिए। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम हर मामले में सत्य सिद्धांतों के अनुरूप हो सकें, हम जो कर्तव्य करते हैं वह कार्य-व्यवस्थाओं द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों के अनुरूप हो और जब हम अपने द्वारा की जाने वाली हर चीज की प्रेरणा, उद्देश्य और सिद्धांतों की ध्यान से जाँच करें तब वे सभी परमेश्वर के वचनों की अपेक्षाओं के अनुरूप हों और जाँच-पड़ताल और परमेश्वर की जाँच सह सकें। हर रोज तुम सामान्य रूप से, शांति और खुशी से अपना कर्तव्य करते हो, हमेशा परमेश्वर के सामने जीते हो। जब तुम्हारे दिल में परमेश्वर से कहने के लिए कुछ होता है तब तुम उससे प्रार्थना करते हो; जब तुम्हारे पास प्रार्थना करने के लिए कोई शब्द नहीं होता तब भी तुम अपने दिल में परमेश्वर के करीब जा सकते हो और जब तुम प्रार्थना करते हो तब तुम्हें परमेश्वर का प्रबोधन और मार्गदर्शन मिलता है और तुम उससे प्रेरित हो उठते हो। तुम अपना कर्तव्य करते समय भी परमेश्वर के प्रति वफादार हो सकते हो और खुले और ईमानदार ढंग से आचरण कर सकते हो। यह कितना बढ़िया है ना! लोगों से पेश आने और उनसे मेलजोल रखने और संवाद करने में आमतौर पर तुममें कमियाँ और अपराध लगातार कम होते जाते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरे तुम्हारे खिलाफ कैसे षड्यंत्र करते हैं, तुम आवेगशीलता से प्रतिक्रिया नहीं करते। जब भी तुम अपनी आवेगशीलता पर काबू पाने में असमर्थ महसूस करते हो तब तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो; जब तुम कमजोर होते हो तब भी तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो। जब पवित्र आत्मा तुम्हें जरा-सा प्रेरित करेगा तब तुम्हें आवेगशीलता पर काबू पाने की ताकत मिल जाएगी और तुम इस बाधा को फाँद जाओगे। हर बार जब तुम लोगों के षड्यंत्रों, हमलों, पलटवार वगैरह का सामना करते हो तब यह एक बाधा को फाँदने जैसा, किसी मुश्किल पर काबू पाने जैसा होता है। अंततः तुम इन सभी षड्यंत्रों पर काबू पा सकते हो, लोगों के हमलों, पलटवार और तुम्हारे खिलाफ संघर्षों पर, आवेगशीलता या भ्रष्ट स्वभावों के आधार पर प्रतिक्रिया करके नहीं बल्कि सिद्धांतों का पालन करने में समर्थ होकर, काबू पा सकते हो। तब तुम सही मायने में विजेता हो। यह कितना बढ़िया है ना! लेकिन मान लो कि तुम दिन भर आवेगशीलता और भ्रष्ट स्वभावों में जीते हो। जब कोई तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करता है या कुछ अप्रिय कहता है तब तुम इसे दिल पर ले लेते हो, इससे अत्यधिक परेशान हो जाते हो, अशांत हो जाते हो, तुम्हारी आंखों से अंगारे बरसने लगते हैं और तुम आगबबूला हो उठते हो। या फिर, अप्रिय शब्द सुनने के बाद तुम अपने दिल में असहज महसूस करते हो, तुम्हारे मुँह में छाले पड़ जाते हैं, खाने-पीने की चीजों की भूख मर जाती है और तुम रात को सो नहीं सकते। फिर तुम परमेश्वर से दूर हो जाते हो। तुम या तो आवेगशीलता में जीते हो या भावनाओं में, हर दिन दुख में बिताते हो, परमेश्वर के वचनों को सामान्य रूप से खाने और पीने में असमर्थ होते हो, सामान्य रूप से अपना कर्तव्य करने में असमर्थ होते हो, तुम्हारा दिल सही और गलत के इन मामलों में पहले से ही व्यस्त और उलझा रहता है। एक बार उलझ जाने पर तुम्हारे लिए इससे आजाद हो पाना बहुत मुश्किल होता है और कभी-कभी तुम कई महीनों तक ऐसा नहीं कर पाते। अगर यह कोई बड़ा मामला हो, जैसे कि शादी या मुकदमा, तो षड्यंत्र और भी गंभीर हो जाते हैं और एक बार जब तुम इन चीजों में उलझ जाते हो तब महीने—या यहाँ तक कि वर्ष भी—बस यूँ ही बीत जाते हैं, तुम्हारे जीवन के बेहतरीन वर्ष नष्ट हो जाते हैं। अंत में तुम्हारा पूरा जीवन बर्बाद हो जाता है—तुम न तो अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कर पाओगे और न ही तुम सत्य प्राप्त कर पाओगे। क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम पूरी तरह से तबाह हो गए हो? अगर तुम लगातार झगड़ों, षड्यंत्रों, संघर्षों और तुच्छता में जी रहे हो तो क्या फिर भी तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कर सकते हो? तुम न सिर्फ अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं करोगे, बल्कि षड्यंत्र और संघर्ष करके तुम बहुत-से बुरे कर्म भी इकट्ठे कर लोगे। लोगों के बीच षड्यंत्रों और संघर्षों में रहते हुए तुम कितने बुरे कर्म करोगे, कितने घमंडी शब्द, विद्रोही शब्द, सत्य का उल्लंघन करने वाले शब्द और परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले शब्द कहोगे? ये सभी दानवों के शब्दों के रूप में वर्गीकृत किए जाते हैं। भले ही कुछ शब्द जोर से नहीं बोले जाएँ, वे तुम्हारे मन में संसाधित होते हैं; तुम अपने दिल में लोगों से नफरत करते हो, उन्हें गाली देते हो और कोसते हो। ये सभी चीजें परमेश्वर की नजर में दिन के उजाले की तरह स्पष्ट हैं। परमेश्वर देखता है कि तुम्हारे मंसूबे क्या हैं, तुम कैसे योजना बनाते हो और जब तुम्हारे साथ चीजें होती हैं तब तुम कैसे अभ्यास करते हो। इन षड्यंत्रों और संघर्षों में जीते हुए तुम कभी भी आत्म-चिंतन करना, पछतावा करना और परमेश्वर के सामने अपने पाप कबूल करना नहीं जानते हो और न ही तुम इन मामलों में सत्य की तलाश करना जानते हो, बल्कि तुम आँख बंद करके उनका “आनंद” लेते हो। वैसे तो तुम शारीरिक और मानसिक रूप से थक चुके हो, लेकिन फिर भी तुम कभी आत्म-चिंतन नहीं करते या परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करते और परमेश्वर के अनुशासन और मार्गदर्शन को नहीं स्वीकारते, परमेश्वर के वचनों को अपने दिल में नहीं स्वीकारते और परमेश्वर को राज नहीं करने देते। तुम परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने का कभी भी संकल्प नहीं लेते। इससे प्रमाणित होता है कि तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो सच्चाई से परमेश्वर में विश्वास रखता है और सत्य का अनुसरण करता है। जो लोग सच्चाई से परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं, वे अपने दिलों में सत्य का अभ्यास कैसे करना है इस पर और मानव के समान जीने पर ध्यान केंद्रित करते हैं और सभी चीजों से ज्यादा परमेश्वर की स्वीकृति की कद्र करते हैं। यह उन्हें संघर्षों और षड्यंत्रों से दूर रहने में समर्थ बनाता है; उनके दिल अक्सर परमेश्वर के करीब जा सकते हैं और वे परमेश्वर के सामने जी सकते हैं। नतीजतन, उनके कर्तव्य और भी ज्यादा फल देते हैं, उन्हें लगता है कि इस तरह से जीने का महत्व है और यह मानवजाति के लिए कुछ योगदान देता है और इसलिए उनके दिलों में सच्ची शांति और खुशी होती है। वे एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा कर सकते हैं, इसलिए उनके द्वारा जिए गए हर दिन का सच्चा महत्व और अर्थ होता है। लेकिन अगर तुम विभिन्न तरह के संघर्षों और षड्यंत्रों में जीते हो तो तुम अपने जीवित रहने के हर दिन पाप इकट्ठा करते जाते हो। तुम न सिर्फ उस महत्व और अर्थ को जीने में विफल होते हो जो एक सृजित मनुष्य में होने चाहिए, बल्कि तुम अपने भविष्य के लिए भी पाप इकट्ठा करते हो। परमेश्वर अपने दिल में तुम्हें उत्तरोत्तर ठुकराता जाता है और तुमसे उत्तरोत्तर निराश होता जाता है। अगर परमेश्वर देखता है कि तुम्हारे लिए उसकी चिंता और उम्मीदें बेकार जाने वाली हैं तो परमेश्वर तुम्हारे बारे में कैसा महसूस करेगा? अगर तुम जो चीजें करते हो वे परमेश्वर को उत्तरोत्तर निराश करती जाती हैं, परमेश्वर को उत्तरोत्तर हतोत्साहित करती जाती हैं, और अंततः एक दिन आता है कि तुम सच में वापस नहीं मुड़ते और परमेश्वर तुमसे उम्मीद रखना छोड़ना चाहता है तो मुझे बताओ, तुम्हारे जीवन और परमेश्वर में तुम्हारी आस्था का क्या महत्व और अर्थ है? तुम्हारे जीवन में क्या उम्मीद बची है? सिर्फ इस कारण से कि दूसरे तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करते हैं और तुम्हारे बारे में राय बनाते हैं, तुम अपने गौरव के लिए लड़ने के लिए और अपनी इज्जत और गरिमा वापस पाने के लिए लोगों से झगड़ों में उलझ जाते हो और अपने उचित मामलों में देरी कर देते हो। कभी-कभी सिर्फ इस कारण से कि कोई कुछ अप्रिय कह देता है या तुम्हें एक विशेष नजर से देखता है जिससे तुम्हें बुरा लगता है, जिससे तुम्हारी नाक कट जाती है और तुम्हारे आत्म-सम्मान को ठेस पहुँचती है, यहाँ तक कि तुम अपने दिल में भी क्रोधित हो जाते हो और उसके साथ अंतहीन विवादों में उलझ जाते हो। और अंत में क्या होता है? तुम अपना सारा कीमती समय इन चीजों में बर्बाद कर देते हो, उद्धार प्राप्त करने का मौका नष्ट कर देते हो और कोई सत्य प्राप्त नहीं करते। नतीजतन, परमेश्वर तुम्हें ठुकरा देता है, वह अब तुम पर और ध्यान नहीं देता और तुम पूरी तरह से तबाह हो जाते हो। तो इन चीजों की संगति करके मैं तुम लोगों को क्या बताने का प्रयास कर रहा हूँ? यह चुनना कि कैसे आचरण करना है, यह चुनना कि किस तरीके से आचरण करना है, बहुत महत्वपूर्ण है। लोगों के बीच रहते हुए हर व्यक्ति अक्सर षड्यंत्रों, संघर्षों, निजी हितों में लाभ और नुकसान और तारीफ, बुराई, आलोचना, न्याय और निंदा की विभिन्न आवाजों का सामना करेगा; हर कोई इन चीजों का सामना करेगा। मैं भी इसी दुनिया में इस युग तक रहा हूँ और मैं भी शून्य में नहीं रहता। मैं भी इन चीजों का सामना करता हूँ, लेकिन मेरा दिल षड्यंत्र नहीं करेगा। मुझे देखो—मैं कैसे रहा हूँ? ये चीजें मेरे जीवन या मेरे कार्य को रत्ती भर भी प्रभावित नहीं करतीं। हर रोज मैं सिर्फ अपना कार्य करने पर ध्यान केंद्रित करता हूँ। अब तक रहते हुए मैं बाहरी परिवेश से प्रभावित नहीं हुआ हूँ। मेरी पहचान और रुतबा, लोगों की नजरों में मेरी कीमत—इनमें से कुछ भी प्रभावित नहीं हुआ है। सिर्फ इतना ही नहीं, मुझे इस बात की भी चिंता है कि तुम लोग गलती से यह सोचोगे कि मैं बहुत ऊँचा, बहुत असाधारण हूँ और दूसरों से बहुत भिन्न हूँ, इसलिए मुझे अपनी सामान्यता, व्यावहारिकता और साधारण होने के कुछ वास्तविक उदाहरण अधिक विशिष्ट तरीके से देने होंगे ताकि तुम लोग मुझे न पूजो और मेरे बारे में कुछ अवास्तविक कल्पनाएँ और धारणाएँ न रखो। सिर्फ मेरे ये कह देने के बाद ही कुछ लोग देखते हैं कि मैं बस एक साधारण, सामान्य व्यक्ति हूँ और फिर वे मेरे प्रति उदासीन हो जाते हैं। मैं इन चीजों की परवाह नहीं करता। जब तक तुम इन वचनों को स्वीकार सकते हो जिन्हें मैं बोलता हूँ तब तक यह काफी है; मेरी कोई और अपेक्षा नहीं है। अगर तुम लोग सारा दिन मुझे घूरते हुए, मेरी पड़ताल करते हुए, मेरे हाव-भाव पढ़ते हुए बिताओ तो यह मुझे असहज कर देगा। मुझे लोगों का मुझे पूजना या मेरी चापलूसी करना पसंद नहीं है और मुझे यह तो और भी पसंद नहीं है कि लोग हमेशा मेरे आस-पास भीड़ लगाए रखें। मुझे चुप्पी पसंद है। देखो, क्या मैंने ये वर्ष काफी अच्छी तरह से नहीं जिए हैं? तो फिर तुम लोग उसी तरीके से जीने का प्रयास क्यों नहीं करते? देखो कि क्या तुम शोहरत और लाभ के लिए होड़ किए बिना, रुतबे के लिए होड़ किए बिना, अपनी खुद की गरिमा बचाए बिना, शब्दों में किसी अधिकार के लिए लड़े बिना जीवित रह सकते हो। अगर तुम परमेश्वर के वचनों और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करते हो, जीते हो, आचरण करते हो, चीजें करते हो और अपना कर्तव्य करते हो तो देखो कि तुम्हारा जीवन कैसा होगा—देखो कि क्या तुम्हें खुशी प्राप्त होगी और क्या तुम्हारे दिल में शांति होगी। जीने का एक अलग तरीका आजमाओ, सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करो, स्पष्ट लक्ष्य रखो और फिर तुम्हें आगे एक उज्ज्वल भविष्य दिखाई देगा। अगर तुम इन चीजों के बीच रहते हुए हमेशा इस बात का हिसाब रख रहे हो कि कौन तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र कर रहा है, कौन तुम्हारे रुतबे को प्रभावित कर रहा है, किसकी प्रतिष्ठा तुम्हारी प्रतिष्ठा से ऊँची है, कौन तुम्हारे पीठ पीछे तुम्हारे बारे में बात कर रहा है वगैरह-वगैरह तो तुम्हारे लिए आगे कोई मार्ग नहीं है, सिर्फ अँधेरा है। तुम हमेशा खोए हुए रहोगे, यह महसूस करोगे, “मेरा जीवन थकाऊ है, इसमें कोई आनंद नहीं है, मेरे पास कोई आशीष नहीं है!” तुम परमेश्वर द्वारा तुम्हें दिए गए आशीषों का आनंद नहीं लोगे, बल्कि नरक में धँसते जाओगे। मुझे बताओ, क्या तुम्हारे पास आशीष हो सकते हैं? क्या तुम्हारे पास खुशी और शांति हो सकती है?
इन विषयों पर संगति करने के बारे में तुम कैसा महसूस करते हो? (अच्छा।) यह किस तरीके से अच्छा है? (हमें लगता है कि यह उन कठिनाइयों को हल कर सकता है जिनसे हमारा वास्तविक जीवन में सामना होता है और उन भ्रष्ट स्वभावों को हल कर सकता है जिन्हें हम प्रकट करते हैं। परमेश्वर ने हमारे लिए कुछ विशेष मार्ग भी बताए हैं : दूसरों से संघर्ष करने और उनके खिलाफ षड्यंत्र करने से कैसे बचें और कैसे लोगों, घटनाओं और चीजों से बेबस होने से आजाद हों और प्रकाश में जिएँ।) इन सिद्धांतों पर संगति करने का मुख्य उद्देश्य क्या है? यह सिर्फ तुम्हें दूसरों से संघर्ष करने के जीवन से बचने में मदद करना नहीं है; जरूरी बात यह है कि तुम्हें सामान्य मानवता में जीने और सामान्य मानवता का जीवन जीने में सक्षम बनाया जाए। अगर तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य करते हो तो तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण प्राप्त कर सकते हो, उसके वचनों और सत्य को अपना जीवन बना सकते हो, उद्धार प्राप्त कर सकते हो, परमेश्वर का भय मान सकते हो और बुराई से दूर रह सकते हो। तुम ऐसे व्यक्ति बन सकते हो। समझे? (हाँ।) यह सिर्फ दूसरों के खिलाफ षड्यंत्र करने और दूसरों से संघर्ष करने के जीवन से बचने के लिए नहीं है; अगर यह सिर्फ उसी के लिए हो तो तुम सत्य प्राप्त नहीं करोगे। मुझे बताओ, सत्य प्राप्त किए बिना किसी व्यक्ति के अभ्यास का क्या लक्ष्य है? क्या यह अब भी खोखला नहीं होगा? इस समाज में लोगों के बीच रहते हुए जब तुम्हारे साथ चीजें होंगी तब तुम्हारे पास हमेशा अपने विचार और नजरिए होंगे; यह असंभव है कि बिल्कुल भी कोई विचार या नजरिया न हो, मानो तुम शून्य में जी रह रहे हो। ऐसी स्थिति मौजूद नहीं है। जब कोई तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र नहीं करता है या तुमसे संघर्ष नहीं करता है तब तुम दूसरों के खिलाफ षड्यंत्र नहीं करने या उनसे संघर्ष नहीं करने में सफल हो सकते हो। लेकिन जब कोई तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करता है या तुमसे संघर्ष करता है तब तुम क्या करते हो? क्या सिर्फ "मैं उनसे संघर्ष नहीं करूँगा, मैं उनके खिलाफ षड्यंत्र नहीं करूँगा" जैसे नारे लगाने से समस्या सुलझ जाती है? (नहीं।) तो समस्या कैसे सुलझाई जानी चाहिए? कुछ लोग नारे लगाते हैं, कहते हैं, "क्या मैं इतना बूढ़ा नहीं हो गया हूँ कि अब भी षड्यंत्र करूँ? परमेश्वर का कार्य इतनी प्रगति कर चुका है, लेकिन फिर भी मैं षड्यंत्र किए जा रहा हूँ? उन चीजों के बारे में षड्यंत्र करने का क्या फायदा है?" क्या ये शब्द समस्या को सुलझा सकते हैं? (नहीं।) जब लोगों के साथ चीजें होती हैं तब ज्यादातर लोग अभी भी अपने दिलों में त्याग नहीं सकते और अभी भी दूसरों के खिलाफ षड्यंत्र करते हैं और उनसे संघर्ष करते हैं। तो इस समस्या को कैसे सुलझाया जाना चाहिए? इसे परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों के अनुसार लोगों के विचारों, नजरियों और उनके भ्रष्ट स्वभावों के मुद्दों को सुलझाकर हल किया जाना चाहिए। जब तुम्हें कोई सही विचार या दृष्टिकोण प्राप्त होता है तब ऐसे मामलों पर तुम्हारा परिप्रेक्ष्य, रवैया और रुख बदल जाते हैं। इन मामलों के बारे में तुम्हारी भावनाएँ अलग होंगी; तुम्हें लगेगा कि दूसरों से संघर्ष करना निरर्थक है—यह तुम्हारी ऊर्जा बर्बाद करता है, कार्य में अड़चन डालता है, आंतरिक असहजता उत्पन्न करता है और इसमें कोई खुशी या शांति नहीं है। फिर जब तुम परमेश्वर के वचनों में ऐसे मामलों की निंदा पढ़ोगे तब तुम्हारे दिल में इन मामलों के बारे में नजरिया पूरी तरह से बदल जाएगा, तुम्हारी भावनात्मक अवस्था अलग होगी, दूसरों से संघर्ष करने की तुम्हारी तेज इच्छा कम हो जाएगी, तुम्हारा गुस्सा कम हो जाएगा और तुम्हारी आवेगशीलता गायब हो जाएगी। अगर दूसरे लोग तुमसे संघर्ष करते हैं, तुम्हें लगातार उकसाते हैं तो तुम प्रभावित नहीं होगे, तुम्हें लगेगा कि यह कोई बड़ी बात नहीं है और उनसे लड़ने की कोई जरूरत नहीं है। यहाँ तक कि देखने वाले भी इसे देखना सह नहीं सकेंगे, वे कहेंगे, “वे तुमसे ऐसे पेश आते हैं, ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम्हें कुछ महसूस ही नहीं होता? क्या तुम बेवकूफ हो?” तुम कहोगे, “पहले मैं ऐसे मामलों को बहुत गंभीरता से लेता था; ऐसा लगता था जैसे आसमान गिर रहा हो। अगर मैं उन्हें चीजें स्पष्ट नहीं करता या अगर वे मुझे कोई सफाई नहीं देते तो मैं इसे आसानी से जाने नहीं देता था। लेकिन अब यह अलग है। अब मैं दूसरों के खिलाफ षड्यंत्र नहीं करता और न ही उनसे संघर्ष करता हूँ, इसलिए नहीं कि मेरी उम्र बढ़ गई है, बल्कि इसलिए कि परमेश्वर के वचनों में मैंने मानवजाति के भ्रष्ट सार की असलियत जान ली है। उनका व्यवहार एक बुरे व्यक्ति के, एक मसीह-विरोधी के, एक शैतान के ठेठ प्रकाशन और अभिव्यक्तियाँ हैं, जैसा कि परमेश्वर के वचनों में उजागर किया गया है। पहले मुझमें भी ये अभिव्यक्तियाँ थीं, लेकिन अब परमेश्वर के वचनों में मैं देखता हूँ कि इस तरह का असली चेहरा, इस तरह का स्वभाव, बहुत ही ज्यादा बदसूरत और घिनौना है; परमेश्वर इससे नफरत करता है! अब मैं खुद इससे नफरत करता हूँ और अपने दिल में उस भ्रष्ट स्वभाव में जीने को तैयार नहीं हूँ। इसलिए जब वे मेरे साथ फिर से संघर्ष करते हैं तब मैं बस उनसे तंग आ जाता हूँ, मुझे उनसे घिन आती है और मुझे संघर्ष करने में कोई दिलचस्पी नहीं होती और न ही इसकी इच्छा होती है। परमेश्वर के वचनों में मुझे अभ्यास के सिद्धांत भी मिल गए हैं और मैं जानता हूँ कि ऐसे लोगों से कैसे पेश आना है।” परमेश्वर के वचन क्या कहते हैं? एक तरफ परमेश्वर के वचन ऐसे लोगों को उजागर और निरूपित करते हैं; दूसरी तरफ परमेश्वर लोगों से कहता है कि दूसरों से पेश आने का सिद्धांत उनसे निष्पक्ष रूप से पेश आना है। अगर वे सच्चे भाई-बहन हैं और वे भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं तो हमें उनसे प्रेम से पेश आना चाहिए, उनके अपराधो और भ्रष्ट स्वभावों को हल करने के लिए सत्य की संगति करनी चाहिए ताकि वे अब परमेश्वर का और प्रतिरोध न करें और न ही अपराध करें। शायद मदद के जरिए उनकी समस्याएँ सुलझ जाएँगी। अगर वे मदद नहीं स्वीकारते हैं, सत्य नहीं स्वीकार सकते हैं, लेकिन अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकते हैं और कलीसिया के कार्य में बाधा नहीं डालते हैं तो उन्हें कलीसिया में अपना कर्तव्य करते हुए रहने की अनुमति दी जानी चाहिए। अगर वे अपना कर्तव्य उचित रूप से नहीं करते हैं और फिर भी दूसरों के साथ संघर्ष और षड्यंत्र करते हैं जिससे विघ्न उत्पन्न होता है तो फिर उन्हें परमेश्वर के घर के प्रशासनिक आदेशों और लोगों से पेश आने के लिए परमेश्वर के घर के सिद्धांतों के अनुसार दूर कर देना चाहिए। क्या तब हमारे दिल शांतिपूर्ण नहीं होंगे? परमेश्वर के घर में बुरे लोगों से निपटने के लिए सिद्धांत और मार्ग हैं। इन लोगों का भेद कैसे पहचानें और इनसे कैसे निपटें, इन लोगों से कैसे पेश आएँ—इस सब के लिए परमेश्वर के वचनों में सिद्धांत और मार्ग हैं। अगर लोग परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करते हैं तो इसे आसानी से और खुशी से सँभाल लिया जाएगा, उन्हें ऐसा नहीं लगेगा कि यह कोई मुश्किल मामला है, उनके दिल बिल्कुल भी परेशान नहीं होंगे और यह बहुत स्वाभाविक रूप से हल हो जाएगा। अगर ऐसे मामलों से उनका कुछ वर्ष पहले सामना हुआ होता तो वे उनसे निपट नहीं पाते, उन्हें पता नहीं होता कि उन्हें कैसे हल करना है। लेकिन अब कुछ वर्षों का जीवन अनुभव होने के कारण यह मामला उनके लिए और मुश्किल नहीं रहा; वे इसे हल कर सकते हैं। अचानक उन्हें पता चलता है कि उनका आध्यात्मिक कद बढ़ गया है और वे सही मायने में बदल गए हैं। तब इनमें से ज्यादातर लोग कैसा महसूस करते हैं? “पहले मुझे हमेशा लगता था कि मेरी काबिलियत खराब है और मैं अक्सर परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करता था और उसका प्रतिरोध करता था, मानो मुझे बचाया नहीं जा सकता। अब इस मामले को सँभालकर मुझे लगता है कि मेरी कोई कठिनाई नहीं है, मैं समस्याएँ सुलझा सकता हूँ और मेरे पास उम्मीद है।” क्या उम्मीद है? (उद्धार प्राप्त करने की उम्मीद है।) जब तुम उद्धार प्राप्त करने की उम्मीद देखते हो तब क्या तुम्हें आगे प्रकाश दिखाई देता है या अँधेरा? (प्रकाश।) इससे वह कहावत पूरी हो जाती है—प्रकाश मुझे इशारे से बुला रहा है। है ना? (हाँ।) जब तुम्हारा आध्यात्मिक कद इस स्तर तक पहुँच सकेगा तब तुम्हें सही मायने में लगेगा कि सत्य का अभ्यास करने के लिए नारे लगाने की वास्तव में जरूरत नहीं है; यह बहुत ही आसान और आनंददायक है। जब तक तुम परमेश्वर के वचनों को स्वीकारते हो, जब तक तुम परमेश्वर से आने वाले सत्य सिद्धांतों को स्वीकारते हो तब तक सत्य का अभ्यास करना बहुत ही आसान होता है और तुम्हारा आध्यात्मिक कद बिना तुम्हें पता चले बढ़ जाता है। जब तुम्हें लगता है कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बढ़ गया है, तुम बदल गए हो, परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास रखने के वर्षों ने फल दिया है और वे बेकार नहीं गए हैं तब अगर कोई धृष्ट शब्द बोले, यह कहे, "मैंने परमेश्वर में विश्वास रखकर क्या प्राप्त किया है? परमेश्वर में मेरे विश्वास रखने के इन 20 वर्षों में मैंने सिर्फ कष्ट ही सहा है और प्रयास किए हैं; मैंने बहुत कुछ छोड़ा है और खपाया है, लेकिन फिर भी मैंने एक भी आशीष का आनंद नहीं लिया है—बस अंतहीन थकान ही हुई है!" तो तुम अपने दिल में उससे नफरत करोगे, “इस व्यक्ति में कोई जमीर नहीं है और यह सिर्फ दानवी शब्द बोलता है! वह कितना दयनीय दिखता है, इसे देखा जाए तो उसने सही मायने में कुछ भी प्राप्त नहीं किया है—वह बस अतार्किक और बाधक हो सकता है और सिर्फ धृष्ट शब्द कह सकता है!” वह हमेशा कहता है, “मैंने परमेश्वर में विश्वास रखने से क्या प्राप्त किया है?” तो तुम परमेश्वर में विश्वास रखकर आखिर क्या प्राप्त करने की उम्मीद करते हो? क्या तुम भौतिक अनुग्रह और आशीष प्राप्त करने की उम्मीद कर रहे हो या तुम सत्य प्राप्त करने और उद्धार पाने की उम्मीद कर रहे हो? परमेश्वर में विश्वास रखने में व्यक्ति को यही मार्ग चुनना चाहिए। तुम वास्तव में किस मार्ग पर चल रहे हो? अगर तुम सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति हो और तुम जिन सत्यों को समझते हो उन सभी को अभ्यास में लाते हो और उन्हें अपनी वास्तविकता बना लेते हो तो फिर अंत के दिनों में तुम अनंत जीवन प्राप्त कर चुके होगे और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के बाद तुमने व्यर्थ में विश्वास नहीं रखा होगा। अगर तुम सिर्फ अनुग्रह का आनंद लेने पर ध्यान केंद्रित करते हो, लेकिन सत्य और जीवन प्राप्त नहीं करते और तुम परमेश्वर के खिलाफ शिकायत करते हो, यह कहते हो, “मैंने क्या प्राप्त किया है?” तो इससे प्रमाणित होता है कि तुम सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति नहीं हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कितने अनुग्रह का आनंद लेते हो, अगर तुमने जरा-सा भी सत्य प्राप्त नहीं किया है तो तुम्हारी आस्था बहुत ही ज्यादा दयनीय है; यह दिखाता है कि तुम एक अंधे व्यक्ति हो। अब परमेश्वर लोगों को जीवन की आपूर्ति करने के लिए सत्य व्यक्त करता है, हर रोज नए वचन बोलता है, इतने सारे कि लोग उन्हें हमेशा खा और पी सकते हैं और उनका आनंद ले सकते हैं। ऐसे बहुत सारे सत्य हैं जिनका अभ्यास किया जाना चाहिए और जिनमें प्रवेश किया जाना चाहिए; बहुत-से सत्य तो ऐसे हैं जो एक जीवनकाल में भी पूरी तरह से अनुभव नहीं किए जा सकते हैं। जिन लोगों ने बहुत-से वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा हुआ है और सत्य का अनुसरण किया है, उन्होंने बहुत कुछ प्राप्त किया है और बहुत प्रचुरता से प्राप्त किया है। लेकिन अगर लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, सत्य से प्रेम नहीं करते हैं और सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं तो उन्हें हमेशा लगेगा कि उन्होंने कुछ भी प्राप्त नहीं किया है। जो लोग सत्य का आनंद लेते हैं, वे इन वचनों से सही मायने में लबालब भरे हुए महसूस करते हैं। अब, चाहे सत्य के लिहाज से हो या भौतिक आशीषों के लिहाज से, परमेश्वर लोगों को जो प्रदान करता है वह भरपूर है; यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर का घर ऐसी जमीन है जहाँ दूध और शहद बहते हैं। सभाओं में खाए और पिए जाने वाले परमेश्वर के वचन भरपूर हैं; अनुभवजन्य गवाहियाँ, फिल्में, भजन, नृत्य—यहाँ सब कुछ है, भरपूर है। भौतिक चीजें—भोजन, कपड़े और रोजमर्रा का सामान—भी भरपूर हैं। इसके अलावा, बड़े लाल अजगर द्वारा की जाने वाली सेवा जिसका परमेश्वर ने इंतजाम किया है, मसीह-विरोधियों और नकली अगुआओं के प्रदर्शन और हर रोज लोगों के सामने विभिन्न तरह की नकारात्मक चीजों की नुमाइश—ये सब लोगों को सबक सीखने और भेद पहचानने की क्षमता बढ़ाने का अवसर देते हैं। अगर तुम एक बार में पूरा सबक नहीं सीख सकते तो परमेश्वर तुम्हारे लिए परिवेशों, लोगों, घटनाओं और चीजों का इंतजाम करता रहेगा और उन्हें सिर्फ तभी हटाएगा जब तुम पर्याप्त सीख चुके होगे। इसलिए, अगर तुम परमेश्वर का कार्य स्वीकार सकते हो, अगर तुम सत्य से प्रेम करने वाले व्यक्ति हो तो तुम एक शानदार भोज में शामिल हो रहे हो। कुछ वर्षों की आस्था तुम्हारे लिए बहुत प्रगति और वास्तविक बदलाव लेकर आएगी। इन वर्षों में परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से अपने चुने हुए लोगों की चरवाही की है, उनका सिंचन किया है और उनकी अगुआई की है। जो लोग सत्य स्वीकार सकते हैं, वे सभी यह महसूस कर सकते हैं कि उन्होंने बहुत कुछ प्राप्त किया है और उनमें कुछ सच्चे बदलाव आए हैं। विशेष रूप से, जो लोग अपना कर्तव्य पूर्णकालिक रूप से करते हैं, वे और भी ज्यादा बदल गए हैं। तुम यह महसूस कर सकते हो कि परमेश्वर का अनुसरण करते समय मार्ग उत्तरोत्तर उज्ज्वल होता जाता है और तुममें उद्धार प्राप्त करने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने में सच्ची आस्था होती है। लेकिन अगर तुम हमेशा सत्य स्वीकारने से मना करते हो और अपने दिल में सत्य का अभ्यास करने को तैयार नहीं हो तो तुम्हें यह महसूस नहीं हो पाएगा कि तुम्हारे पास उद्धार की कोई उम्मीद है। तुम अपने आस-पास के लोगों से पूछते रहोगे, “क्या तुम्हें लगता है कि मेरे पास आध्यात्मिक समझ है?” अगर कोई कहता है, “ऐसा तो नहीं लगता कि तुम्हारे पास आध्यात्मिक समझ है” तो तुम सोचोगे, “सब समाप्त हो गया, मेरे पास कोई उम्मीद नहीं है!” दरअसल, ऐसा नहीं है कि तुम्हारे पास कोई उम्मीद नहीं है; बस यही है कि तुम सच का अनुसरण नहीं करते हो। अगर तुम सत्य समझते हो और सत्य का अभ्यास भी कर सकते हो तो तुम धीरे-धीरे आध्यात्मिक समझ प्राप्त कर लोगे। जैसे ही तुममें आध्यात्मिक समझ आ जाएगी, तुम उत्तरोत्तर ज्यादा सत्य समझते जाओगे और तुम हर पहलू में कुछ अनुभवजन्य गवाहियाँ साझा कर पाओगे। तुम अंदर से बहुत समृद्ध और संतुष्ट महसूस करोगे और यह महसूस करोगे कि तुमने परमेश्वर का अनुसरण करके बहुत कुछ प्राप्त किया है। है ना? (हाँ।) अगर कोई व्यक्ति सत्य का अभ्यास नहीं करता है या इसे अपने जीवन के रूप में नहीं स्वीकारता है तो वह अपने दिल में हमेशा खोया हुआ, लक्ष्यहीन और सच्ची आस्था से रहित महसूस करेगा। वह हमेशा अपने आस-पास के लोगों से पूछेगा कि क्या उसके पास उद्धार प्राप्त करने की कोई उम्मीद है। कुछ लोग लगातार दूसरों से पूछते रहते हैं कि क्या उनमें आध्यात्मिक समझ है, वे खुद में आध्यात्मिक समझ होने या नहीं होने को इस बात का प्रमाण मान लेते हैं कि उनके पास उम्मीद है या नहीं। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोग बेवकूफ होते हैं? (बेवकूफ होते हैं।) चाहे तुममें आध्यात्मिक समझ हो या न हो, तुम्हें सत्य के लिए प्रयास करना चाहिए—और सिर्फ इसे समझने का ही नहीं, बल्कि इसका अभ्यास करने का भी प्रयास करना चाहिए। जब तुम सत्य समझ सकोगे और सत्य का अभ्यास कर सकोगे, तब क्या उद्धार प्राप्त करने की उम्मीद नहीं होगी? क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।) तुम लोगों को इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए।
तो आज की हमारी संगति के लिए बस इतना ही। अलविदा!
7 सितंबर 2024