सत्य का अनुसरण कैसे करें (23)
पिछले कुछ समय से हम इस विषय पर संगति कर रहे हैं कि सत्य का अनुसरण कैसे करें। हमने अभी तक इस पर संगति पूरी नहीं की है; यह एक बहुत बड़ा विषय है और सत्य का अनुसरण करने में सचमुच बहुत सारे मुद्दे शामिल हैं, है ना? (हाँ।) सत्य का अनुसरण कैसे करें, इस विषय के संबंध में हमने अभ्यास के दो पहलुओं पर संगति की है : अभ्यास का एक पहलू है त्याग देना और अभ्यास का दूसरा पहलू है खुद को समर्पित करना। हमने पहले “त्याग देने” के विषय पर काफी संगति की थी। हाल ही में हमने जिस विषय पर संगति की है, वह है “अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना,” जिसे कई पहलुओं में बाँटा गया है : धारणाएँ और कल्पनाएँ, अनुचित माँगें, सतर्कता और संदेह, और जाँच-परख और ताक-झाँक। क्या हमने पहले पहलू, धारणाएँ और कल्पनाएँ पर काफी संगति नहीं की है? धारणाओं और कल्पनाओं के पहलू के भीतर परमेश्वर के बारे में लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं से जुड़ी विषय-वस्तु में परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव सार और देहधारी परमेश्वर के बारे में उनकी धारणाएँ शामिल हैं। पहले हमने मुख्य रूप से परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की धारणाओं पर संगति की थी। यद्यपि हमने परमेश्वर के स्वभाव सार के बारे में लोगों की धारणाओं पर स्पष्ट और लक्षित रूप से संगति नहीं की, लेकिन हमने मानवजाति के विभिन्न पहलुओं से जुड़े कुछ मुद्दों पर संगति की थी। इन चीजों पर संगति करने के बाद, क्या लोगों को मानवजाति के विभिन्न मुद्दों के प्रति परमेश्वर का रवैया नहीं समझना चाहिए? क्या तब लोगों को यह नहीं समझना चाहिए कि परमेश्वर लोगों की जन्मजात स्थितियों, भ्रष्ट स्वभावों और मानवता के साथ कैसे व्यवहार करता है? (हाँ।) इन चीजों को समझने के बाद परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के स्वभाव सार के बारे में लोगों की धारणाएँ हल हो जानी चाहिए। हाल ही में हमने सभी प्रकार के लोगों के वर्गीकरणों पर संगति की है। मुझे बताओ, तुम्हें क्या लगता है कि हमने इस विषय पर संगति क्यों की? (सभी प्रकार के लोगों के वर्गीकरणों पर संगति करना एक लिहाज से हमें सभी प्रकार के लोगों का भेद पहचानने में मदद करने के लिए है—किसने इंसानों से पुनर्जन्म लिया है, किसने जानवरों से पुनर्जन्म लिया है और किसने दानवों से पुनर्जन्म लिया है। एक बार जब हममें भेद पहचानने की क्षमता आ जाती है, तो लोगों के साथ व्यवहार करने के तरीके में हमारे पास सिद्धांत होंगे। दूसरे लिहाज से, यह हमें इस सत्य की कुछ समझ प्राप्त करने में सक्षम बनाता है कि परमेश्वर वास्तव में किस तरह के लोगों को बचाता है, जिससे हम परमेश्वर के कार्य के साथ अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर व्यवहार नहीं करेंगे।) संक्षेप में, इन चीजों पर संगति करना लोगों को यह समझने देता है कि परमेश्वर सभी प्रकार के लोगों को कैसे देखता है, वह सभी प्रकार के लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है और वह सभी प्रकार के लोगों को कैसे सँभालता है। सभी प्रकार के लोगों के सार को समझकर या मानवजाति के विभिन्न मुद्दों को समझकर—वे जो लोगों में जन्मजात होते हैं और वे जो बाद में विकसित होते हैं—लोग मूल रूप से इस बात का सटीक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं कि मानवजाति के विभिन्न मुद्दों से निपटने के लिए परमेश्वर के सिद्धांत क्या हैं। एक बार जब लोग इन बातों को जान लेते हैं, तो परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के स्वभाव सार से जुड़ी उनकी धारणाएँ और कल्पनाएँ काफी हद तक हल हो जाती हैं। हमने लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं के विषय के अंतर्गत परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के स्वभाव सार से जुड़े मुद्दों पर संगति पूरी कर ली है। तुम लोगों को खुद धीरे-धीरे इन संगतियों की बातों का अनुभव करना चाहिए और उन्हें समझना चाहिए, और समय के साथ, तुम्हें परमेश्वर का कुछ ज्ञान प्राप्त हो जाएगा। जब तुम जीवन में इस तरह के मुद्दों का सामना करते हो, तो तुम्हें इन वचनों को लेकर ऐसे मुद्दों से उनका मिलान करना चाहिए, अधिक खोजना और प्रार्थना-पाठ करना चाहिए, और फिर संगति किए गए सिद्धांतों या विषय-वस्तु के आधार पर वास्तविक जीवन में सामने आने वाली समस्याएँ हल करनी चाहिए।
लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं के संबंध में अभी भी एक अंतिम बिंदु है जिस पर हमने संगति नहीं की है, और वह है देहधारी परमेश्वर के बारे में लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ। क्या इस मुद्दे पर संगति करने की आवश्यकता है? (हाँ।) देहधारी परमेश्वर, इस विशेष पहचान के संबंध में तुम लोगों की क्या धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं? क्या तुम लोग जानते हो कि देहधारी परमेश्वर के संबंध में वास्तव में तुम लोगों की सबसे बड़ी समस्या या कठिनाई क्या है? अधिकांश लोगों के लिए, देहधारी परमेश्वर के साथ सीधा संपर्क सभाओं के दौरान उपदेश और संगति सुनने से ज्यादा कुछ नहीं है। देहधारी परमेश्वर के साथ वास्तविक आमने-सामने का संपर्क केवल कुछ ही लोगों का होता है या जीवन में उसके साथ कुछ सीमित मेलजोल भी होते हैं। फिर, सभाओं के दौरान संगति सुनते समय या फिर काम या जीवन में उसके संपर्क में आते और मेलजोल करते समय देहधारी परमेश्वर के बारे में तुम लोगों की क्या धारणाएँ और कल्पनाएँ होती हैं? तुम लोगों की वास्तविक समस्याएँ और कठिनाइयाँ क्या हैं? देहधारी परमेश्वर के बारे में लोगों की निश्चित रूप से धारणाएँ और कल्पनाएँ होती हैं; ऐसा न होना उनके लिए असंभव है। लोग शून्य में नहीं रहते, न ही वे रोबोटों जैसे हैं जो सोच नहीं सकते। यदि तुम सोच सकते हो, तो तुम्हारे पास एक सक्रिय मन है, और यदि तुम्हारे पास एक सक्रिय मन है, तो देहधारी परमेश्वर के संपर्क में आने पर तुम्हारे मन में निश्चित रूप से विचार आएँगे। ये विचार अक्सर लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ होती हैं; इनमें सत्य शामिल नहीं होता, न ही ये सत्य के अनुरूप होते हैं। बात बस इतनी है कि अधिकांश लोग, तीन से पाँच साल तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद, मूल रूप से देहधारी परमेश्वर को कुछ हद तक मान्यता और स्वीकृति दे देते हैं। इसलिए, अगर उनकी कुछ धारणाएँ होती भी हैं तो भी, चूँकि उन्होंने बहुत सारा सत्य सुना होता है, इसलिए जब वे इन चीजों का सामना करते हैं, तो वे एक बुनियादी सिद्धांत या अपने विशिष्ट तरीकों का उपयोग करके—शायद परमेश्वर के वचन पढ़कर या अपनी काट-छाँट करके या प्रार्थना करके—उन्हें अपने आप हल कर सकते हैं और अधिकांश समय परमेश्वर के बारे में उनकी धारणाएँ और कल्पनाएँ हल हो जाती हैं। तो क्या वे इसलिए हल हो जाती हैं क्योंकि लोगों ने सत्य समझ लिया होता है, या इसलिए कि उन्होंने इंसानी तरीकों और साधनों का उपयोग करके उन्हें अस्थायी रूप से शांत कर दिया होता है? (उन्हें अस्थायी रूप से शांत कर दिया गया होता है।) यानी, यह समस्या अनसुलझी ही रहती है। ऊपर से देखने पर, उनके साथ सब कुछ शांत और स्थिर लगता है और कुछ समय के लिए उनमें कोई धारणा नहीं रहती, लेकिन इस समस्या की जड़ अभी भी उनके भीतर छिपी रहती है और उसका उन्मूलन नहीं हुआ होता। मुझे बताओ, क्या यह अच्छा है कि इस समस्या का उन्मूलन नहीं हुआ है? (नहीं।) यह अच्छा क्यों नहीं है? इसका लोगों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? (लोग देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाएँ और कल्पनाएँ बना लेंगे और परिस्थितियाँ उत्पन्न होने पर वे फूट पड़ेंगी। उदाहरण के लिए, जब वे ऐसी चीजों का सामना करते हैं जो उनकी अपेक्षा के अनुरूप नहीं होतीं, तो वे परमेश्वर को गलत समझेंगे और उसके बारे में शिकायत करेंगे या फिर वे परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करेंगे और उसका प्रतिरोध करेंगे।) यह एक वास्तविक समस्या है। यदि देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाएँ और कल्पनाएँ जड़ से हल नहीं की जा सकतीं, तो वे हमेशा तुम्हारे भीतर एक समस्या के रूप में मौजूद रहेंगी और उनका तुम पर कुछ प्रभाव पड़ेगा। जब तुमने किन्हीं विशेष परिस्थितियों का सामना नहीं किया है और तुम केवल परमेश्वर के वचन पढ़ते हो और अपने हृदय में परमेश्वर की पहचान और सार और साथ ही उसके स्वभाव में विश्वास करते हो, तब इस समस्या ने अभी तक तुम पर कोई प्रभाव नहीं डाला होता। जब देहधारी परमेश्वर तुम्हारे साथ मेलजोल करता है, तुमसे बात करता है या तुम्हें काम सौंपता है, तब यदि तुम्हारा सामना काट-छाँट किए जाने से या ऐसी चीजों से होता है जो तुम्हारी अपेक्षा के अनुरूप नहीं होतीं, तो तुम्हारी धारणाएँ और कल्पनाएँ तुम्हारे भीतर कुछ नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं। यदि देहधारी परमेश्वर के बारे में तुम्हारी धारणाएँ और कल्पनाएँ हल हो जाती हैं, तो इन चीजों का सामना करने पर तुम अभी भी दर्द और बेचैनी महसूस कर सकते हो और अधिक गंभीर मामलों में तुममें विद्रोहशीलता भी विकसित हो सकती है, लेकिन तुम इन समस्याओं का समाधान करने के लिए सत्य खोजने सक्रिय रूप से परमेश्वर के सामने आओगे, बजाय इसके कि तुम देहधारी परमेश्वर को एक साधारण व्यक्ति समझो या उसके खिलाफ विद्रोह करो, उसका प्रतिरोध करो और उसके विरोध में खड़े हो जाओ।
आओ, इस बात पर संगति करें कि लोगों को देहधारी परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाएँ और कल्पनाएँ कैसे हल करनी चाहिए। दरअसल, यह समस्या परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के स्वभाव सार से जुड़ी लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं की तुलना में हल करने में अधिक आसान है, जिन पर हमने पहले संगति की थी। परमेश्वर के कार्य का दायरा बहुत व्यापक है और इसमें बहुत सारी विषय-वस्तु शामिल है, जिसमें कई ऐसे सत्य हैं जिन्हें लोगों को जानने और समझने की आवश्यकता है। इसके अलावा, परमेश्वर का स्वभाव सार सभी सत्यों में सबसे गहरा सत्य है जिसे परमेश्वर में विश्वास करने वालों को समझना चाहिए, और लोगों के लिए इसे जानना सबसे कठिन भी है। लेकिन सत्य के उन दो पहलुओं की तुलना में देहधारी परमेश्वर से संबंधित सत्य लोगों के लिए अधिक प्रत्यक्ष है, इसलिए देहधारी परमेश्वर से जुड़ी धारणाएँ और कल्पनाएँ हल करना भी अधिक आसान है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के स्वभाव सार की तुलना में देहधारी परमेश्वर, आखिरकार, पूरी तरह से वास्तविक है—उसे लोगों द्वारा देखा और छुआ जा सकता है। वह अमूर्त नहीं है; बल्कि, उसकी एक विशिष्ट आवाज है और वह खुद को मौखिक रूप से व्यक्त कर सकता है, उसका एक विशिष्ट बाहरी स्वरूप, छवि, स्वभाव और व्यक्तित्व है जिसके संपर्क में लोग आ सकते हैं; इसके अलावा, वह सत्य के विभिन्न पहलू भी व्यक्त करता है। इसलिए, परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के स्वभाव सार के बारे में लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं की तुलना में देहधारी परमेश्वर के बारे में लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ अधिक ठोस हैं। कोई चीज जितनी ठोस होती है, लोगों के लिए उसे जानना उतना ही आसान होता है, उनके लिए उससे अपना मिलान करना उतना ही आसान होता है और उनके लिए उसे हल करना उतना ही आसान होता है। सिद्धांत में यह ऐसे ही काम करता है, लेकिन विशेष रूप से, देहधारी परमेश्वर के बारे में लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं को कैसे हल किया जाना चाहिए? अभ्यास के दो मार्ग हैं, यानी देहधारी परमेश्वर के प्रति लोगों को जो सही रवैया अपनाना चाहिए, उसके संबंध में अभ्यास के दो सिद्धांत हैं। पहला है, उसकी तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से न करना। दूसरा है, जो बहुत महत्वपूर्ण भी है, उसे भ्रष्ट मानवजाति के समकक्ष न रखना। यदि तुम ये दो काम कर सकते हो, तो देहधारी परमेश्वर के बारे में तुम्हारी धारणाएँ और कल्पनाएँ मूल रूप से अपनी जड़ से हल हुई मानी जाएँगी। देखो, क्या इन दो सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने का यह मार्ग सही है? (हाँ।) ये दो मार्ग देहधारी परमेश्वर के बारे में लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ हल करने का तरीका क्यों हैं? (क्योंकि लोग सबसे अधिक ये दो गलतियाँ करने में प्रवृत्त होते हैं। जब परमेश्वर देह बनता है, तो लोग देहधारी परमेश्वर के बहुत कल्पित होने की कल्पना करते हैं, सोचते हैं कि वह स्वर्गिक परमेश्वर की तरह चिह्न और चमत्कार दिखा सकता है, आदि। लोग देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के समकक्ष रखने में भी प्रवृत्त होते हैं, जो आसानी से परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुँचाता है।) तुम इस मामले को स्पष्ट रूप से देखते हो, है ना? (हाँ।) देहधारी परमेश्वर के बारे में लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ हल करने के लिए इन दो बातों के मार्ग और सिद्धांत बनने का कारण यह है कि देहधारी परमेश्वर के बारे में लोग जो धारणाएँ और कल्पनाएँ विकसित करते हैं, उनमें मुख्य रूप से ये दो पहलू शामिल होते हैं। एक लिहाज़ से, देहधारी परमेश्वर के संबंध में, यदि लोग यह निर्धारित करते हैं कि वह स्वर्ग से आया परमेश्वर है, परमेश्वर का आत्मा उसके भीतर उसके जीवन के रूप में निवास करता है और यह कि वह देह में साकार हुआ परमेश्वर का आत्मा है, और यदि वे यह निर्धारित करते हैं कि उसकी पहचान विशेष है और वह स्वर्गिक परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, तो वे उसकी तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से करेंगे। दूसरे लिहाज़ से, चूँकि देहधारी परमेश्वर बाहर से इंसानों से अलग नहीं दिखता और वह बस एक साधारण व्यक्ति है, इसलिए लोग उसे भ्रष्ट मानवजाति का एक सदस्य माने बिना नहीं रह पाते। लोग उसकी तुलना भ्रष्ट मानवजाति से करने या उसे भ्रष्ट मानवजाति के समकक्ष रखने के बहुत शौकीन होते हैं और यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर को मानवजाति का एक ऐसा सदस्य मानते हैं जो भ्रष्ट मनुष्य से अलग नहीं है। ये दो पहलू देहधारी परमेश्वर के बारे में लोगों द्वारा विकसित की जाने वाली धारणाओं और कल्पनाओं का मूल हैं। ये दो पहलू उन गलतियों का मूल कारण भी हैं, जो लोग अक्सर देहधारी परमेश्वर के साथ अपने व्यवहार में करते हैं, और ये उस विद्रोहशीलता, प्रतिरोध और विरोध की उन विभिन्न समस्याओं का भी मूल कारण हैं, जो देहधारी परमेश्वर के साथ उनके व्यवहार में उत्पन्न होती हैं। इसलिए, यदि ये दो समस्याएँ हल हो जाती हैं, तो देहधारी परमेश्वर के संबंध में तुम जो धारणाएँ और कल्पनाएँ और साथ ही विद्रोहशीलता और विरोध विकसित करते हो, वे भी धीरे-धीरे हल हो जाएँगे। चूँकि अभ्यास के ये दो मार्ग इतने महत्वपूर्ण हैं, इसलिए आओ एक-एक करके विवरणों पर संगति करें।
देहधारी परमेश्वर के बारे में लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ हल करने के लिए अभ्यास का पहला सिद्धांत उसकी तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से न करना है। स्वर्गिक परमेश्वर एक आध्यात्मिक शरीर है और पृथ्वी पर का परमेश्वर देह है। उसकी तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से न करने का निश्चित रूप से यह अर्थ है कि स्वर्गिक परमेश्वर और देहधारी परमेश्वर को एक साथ रखकर देखने की कोशिश न की जाए। चूँकि देहधारी परमेश्वर की पहचान और सार और साथ ही उसके द्वारा किया जाने वाला कार्य, सब स्वर्गिक परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए लोगों द्वारा देहधारी परमेश्वर और स्वर्गिक परमेश्वर को अक्सर एक साथ रखकर उनकी तुलना करना स्वाभाविक है। तो उनकी तुलना करने में क्या गलत है? उनकी तुलना क्यों नहीं की जा सकती? पहले, यह देखो कि लोग आम तौर पर क्या तुलना करते हैं, फिर तुम जान जाओगे कि क्या लोगों का इस तरह से उनकी तुलना करना सही है। तो, जब लोग देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से करते हैं, तो वे किस बात की तुलना करते हैं? वे उनके सामर्थ्य, उनके अधिकार और उनके स्वभावों की तुलना करते हैं; वे यह तुलना करते हुए और भी अधिक विशिष्ट हो जाते हैं कि क्या वे चिह्न और चमत्कार दिखाते हैं; वे उनके वचनों की शक्ति और उनके वचनों द्वारा प्राप्त नतीजों की भी तुलना करते हैं। वे और क्या तुलना करते हैं? (स्वर्गिक परमेश्वर मेघगर्जना की तरह बोलता है जिससे हर कोई डर जाता है, जबकि देहधारी परमेश्वर एक साधारण, सामान्य और बहुत वास्तविक तरीके से बोलता है। लोग इस संबंध में भी तुलना करते हैं।) यानी वे कई अलौकिक क्षमताओं की तुलना करते हैं। स्वर्गिक परमेश्वर ने सभी चीजों का सृजन किया; स्वर्गिक परमेश्वर मेघगर्जना की तरह बोलता है; स्वर्गिक परमेश्वर मरे हुओं को वापस जीवित कर सकता है; स्वर्गिक परमेश्वर शुरुआत से लेकर वर्तमान तक देखता है; स्वर्गिक परमेश्वर बोलता है और यह अस्तित्व में आ जाता है, वह आज्ञा देता है और यह स्थापित हो जाता है; स्वर्गिक परमेश्वर किसी चीज़ को शून्य में और शून्य को किसी चीज़ में बदल सकता है; स्वर्गिक परमेश्वर विभिन्न चिह्न और चमत्कार दिखा सकता है, आदि। लोग इन सभी चीजों की तुलना करते हैं : स्वर्गिक परमेश्वर क्या करता और कहता है, वह जो सामर्थ्य, अधिकार, सर्वशक्तिमत्ता और स्वभाव प्रदर्शित करता है और साथ ही उसकी सर्वोच्चता और सर्वशक्तिमत्ता। और क्या? स्वर्गिक परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है और सभी चीजों का आयोजन करता है, और वह लोगों के भाग्य पर भी संप्रभु है और उनकी व्यवस्था करता है; स्वर्गिक परमेश्वर लोगों के लिए सभी प्रकार के परिवेशों का इंतज़ाम करता है; वह सभी चीजों की जाँच-परख करता है, पूरी पृथ्वी की जाँच-परख करता है, और लोगों की हर हरकत और हर शब्द और कर्म की जाँच-परख करता है, वह जानता है कि हर व्यक्ति क्या सोचता और महसूस करता है। चाहे ऐसी सभी चीजों की लोगों की धारणाओं में कल्पना की गई हो या वे ऐसी चीजें हों जिनका लोगों को गहरा एहसास हुआ हो, अंततः वे सभी स्वर्गिक परमेश्वर में मौजूद सार और कुछ वास्तविक घटनाओं का हिस्सा हैं जिन्हें वह प्रदर्शित कर सकता है, जिनकी लोग समझने की अपनी क्षमता के दायरे में कल्पना कर सकते हैं। ये स्वर्गिक परमेश्वर के कार्य करने के तरीके की अभिव्यक्तियाँ हैं; विशेष रूप से ये वे काम हैं जो परमेश्वर का आत्मा कर सकता है। इनमें से कुछ पहलू परमेश्वर के आत्मा से मेल खाते हैं और उससे संबंधित हैं, जबकि कुछ पहलुओं में लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं की मिलावट है। लेकिन चाहे वे लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ हों या परमेश्वर के आत्मा से संबंधित सत्य हो, अंततः ये सभी चीजें उस जीवन-यापन या सार और प्रकाशनों का हिस्सा हैं, जो स्वर्गिक परमेश्वर के पास हैं और जिन्हें वह धारण करता है और जिन्हें वह हासिल कर सकता है। चूँकि वे स्वर्गिक परमेश्वर के पास मौजूद और उसके द्वारा धारण किए गए सार, स्वभाव या सामर्थ्य हैं, ठीक इसलिए ये अभिव्यक्तियाँ और प्रकाशन केवल परमेश्वर के आत्मा से संबंधित हैं—यानी वे परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान और सार से संबंधित हैं। स्वर्गिक परमेश्वर के पास मौजूद और उसके द्वारा धारण किया गया सार, स्वभाव या सामर्थ्य, जिसकी लोग कल्पना कर सकते हैं, जिसे महसूस कर सकते या जान सकते हैं, सृजित मानवजाति की तुलना में असाधारण और महान है, और यह एक सृजित प्राणी के गुणों वाले किसी भी इंसान की पहुँच से और भी अधिक बाहर है; वह सभी सृजित और गैर-सृजित प्राणियों से परे है। स्वयं देहधारी परमेश्वर में जो सार और सामर्थ्य है और जिसे वह धारण या प्रकट करता है, वे सभी परमेश्वर में अंतर्निहित हैं; वे परमेश्वर के स्वभाव या परमेश्वर के सार का कुछ हिस्सा हैं जो उन सबसे बढ़कर हैं जिसकी सभी सृजित और गैर-सृजित प्राणी कल्पना कर सकते हैं, जिसे वे जान या समझ सकते हैं। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि परमेश्वर वास्तव में कितना महान है, वास्तव में उसके पास कितनी सामर्थ्य है और वास्तव में वह सभी चीजों से कितना परे है, सृजित मानवजाति के लिए यह हमेशा एक अनसुलझा रहस्य रहेगा। लोग परमेश्वर को पूरी तरह से नहीं जान सकते; वे जो देखते हैं वह बहुत ही सीमित होता है। परमेश्वर के बारे में लोगों की अवास्तविक धारणाओं और कल्पनाओं वाले हिस्से को एक तरफ रख दें और केवल उस सच्ची सामर्थ्य, अधिकार और सार की बात करें जो परमेश्वर के पास है, तो देहधारी परमेश्वर जो कर सकता है, जिसे वह जी सकता है और प्रकट कर सकता है, वह बहुत ही सीमित है। इसका वर्णन करने के लिए यदि एक अनुपयुक्त मानवीय रूपक का उपयोग करें तो, शायद देहधारी परमेश्वर जिसे जीता है, जो वह प्रकट करता है और जो कर सकता है, वह परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान और सार के महासागर में केवल एक बूँद या हिमशैल के सिरे के समान है, और इससे अधिक कुछ नहीं। यानी परमेश्वर की पहचान, परमेश्वर के स्वभाव सार और परमेश्वर की सामर्थ्य में से देहधारी परमेश्वर जो जी सकता है और प्रकट कर सकता है, वह बहुत सीमित है। चूँकि देहधारी परमेश्वर एक सृजित इंसान के रूप में लोगों के बीच रहने वाला परमेश्वर है, इसलिए वह जो कर सकता है और जिन सहज प्रवृत्तियों और जन्मजात प्रकृति को वह जी सकता है, वे बहुत सीमित हैं। भले ही वह देह में साकार हुआ परमेश्वर का आत्मा है और परमेश्वर का आत्मा उसके भीतर निवास करता है, फिर भी चूँकि यह देह सृजित मानवजाति के एक सदस्य के रूप में है, इसलिए जो परमेश्वर का सार और परमेश्वर का स्वभाव वह जी सकता है, प्रकट कर सकता है और व्यक्त कर सकता है, वे बहुत सीमित हैं। यह एक कारण है। दूसरे लिहाज़ से, हर बार जब परमेश्वर देह बनता है, तो यह परमेश्वर के कार्य की आवश्यकताओं का एक अपरिहार्य नतीजा होता है—यानी परमेश्वर के कार्य के एक चरण की अपरिहार्य आवश्यकता, यानी परमेश्वर के कार्य के इस चरण में परमेश्वर को देह बनने की आवश्यकता होती है, जिसका अर्थ है कि इस चरण का कार्य करने के लिए परमेश्वर को देह बनना ही चाहिए। चूँकि परमेश्वर को देह बनने की आवश्यकता है, इसलिए वह अपने देहधारण के माध्यम से इस चरण का कार्य करता है, और परमेश्वर के स्वभाव, सार और सामर्थ्य के विभिन्न पहलू हैं जिन्हें परमेश्वर को व्यक्त करना है और जो कार्य के इस चरण के लिए आवश्यक हैं। कार्य के इस चरण में परमेश्वर को स्वभाव, सार और सामर्थ्य के जिन पहलुओं की भी आवश्यकता होती है, जब वह देह बनता है तब वह इस देह में कार्य के इस चरण की आवश्यकताओं से संबंधित परमेश्वर के स्वभाव, सार और सामर्थ्य को साकार करता है। सरल शब्दों में कहें तो, यह देह वे सभी कार्य पूरे कर सकती है जो परमेश्वर के देहधारण के कार्य के इस चरण के लिए आवश्यक है। उदाहरण के लिए, अंत के दिनों में कार्य के इस चरण में ताड़ना और न्याय का कार्य करने की आवश्यकता है। तब देहधारी परमेश्वर, परमेश्वर का क्रोध, प्रताप और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव व्यक्त कर सकता है; वह इस प्रकार का स्वभाव व्यक्त कर सकता है और इस प्रकार का कार्य भी कर सकता है। परमेश्वर के इस देहधारण के दौरान लोग जो देखते और अनुभव करते हैं, उसमें परमेश्वर की ताड़ना और न्याय, परमेश्वर का क्रोध, परमेश्वर का प्रताप और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव शामिल है। जब देहधारी परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य छुटकारे का कार्य होता है, जो मानवजाति को अनुग्रह और आशीष प्रदान करता है और लोगों के पाप क्षमा करता है, तब देहधारी परमेश्वर द्वारा दर्शाई गई परमेश्वर की छवि दया और प्रेमपूर्ण दयालुता से भरी, धैर्य और सहनशीलता से भरी और प्रेम से भरी होती है; वह लोगों को प्रचुर अनुग्रह भी प्रदान करता है—उस चरण के कार्य में परमेश्वर के स्वभाव और सार की ये स्पष्ट विशेषताएँ हैं। इसलिए, परमेश्वर का देहधारण चाहे कोई भी हो, लोगों के लिए स्वर्गिक परमेश्वर का स्वभाव और सार व्यापक रूप से देखना या जानना असंभव है। उदाहरण के लिए, अनुग्रह के युग के दौरान विश्वासियों ने प्रभु यीशु की जो विशेषताएँ देखीं, उनमें से एक यह थी कि उसके पास लोगों के लिए अपार सहनशीलता, धैर्य और क्षमा थी और साथ ही प्रचुर दया और प्रेमपूर्ण दयालुता थी। इसलिए, प्रभु में विश्वास करने वाले कुछ लोग परमेश्वर की ओर से आए धैर्य, सहनशीलता और असीम, अथाह प्रेम—यानी परमेश्वर की ओर से आई दया और प्रेमपूर्ण दयालुता का अनुभव कर सके। अनुग्रह के युग में छुटकारे का कार्य करने वाले देहधारी परमेश्वर की मुख्य विशेषता दया और प्रेमपूर्ण दयालुता थी। लेकिन अंत के दिनों में कार्य के इस चरण में, चूँकि देहधारी परमेश्वर लोगों के पाप क्षमा करने के बजाय उनके भ्रष्ट स्वभाव हल करना चाहता है, इसलिए कार्य के इस चरण में लोग देहधारी परमेश्वर से जो अनुभव करते हैं, वह है परमेश्वर का प्रताप, क्रोध, न्याय और ताड़ना। यहाँ तक कि लोग परमेश्वर का कठोर पक्ष भी देखते हैं, उसे लोगों का कठोरता से न्याय करते और उन्हें उजागर करते हुए देखते हैं—व्यावहारिक रूप से हर बार जब वह बोलता है, तब उसकी मूल विषय-वस्तु लोगों में मौजूद विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों, भ्रष्टता के खुलासों और भ्रष्ट दशाओं को निरंतर, अनवरत और अथक रूप से उजागर करना होती है। इस बार देहधारी परमेश्वर में लोग जो देखते हैं, वह है परमेश्वर का प्रताप और क्रोध, परमेश्वर द्वारा अपमान सहन न करना और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव; वे जिसका अनुभव करते हैं, वह है परमेश्वर की ताड़ना और न्याय एवं परीक्षण और शोधन। परमेश्वर जो कुछ भी कहता है, उसमें लोग परमेश्वर की धार्मिकता, प्रताप और अपमान के प्रति असहिष्णुता अनुभव करते हैं; साथ ही, अक्सर मानवजाति के प्रति परमेश्वर का क्रोध, नफरत, घृणा और अस्वीकार, और यहाँ तक कि उसके शाप और उसके द्वारा दोषी ठहराने को भी महसूस करते हैं। यद्यपि देहधारी परमेश्वर स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने, परमेश्वर की पहचान, परमेश्वर के स्वभाव और परमेश्वर के सार का प्रतिनिधित्व करने में पूरी तरह से सक्षम है, फिर भी चूँकि परमेश्वर के देहधारी शरीर का यह स्वरूप परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान के स्वरूप से भिन्न है, इसलिए वह देह के इस स्वरूप और इस स्वरूप की प्रवृत्तियों द्वारा सीमित है। देहधारी परमेश्वर में लोग परमेश्वर के सार, परमेश्वर के स्वभाव और परमेश्वर की सामर्थ्य के बारे में जो कुछ देख सकते हैं, वह परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान और सार के मुकाबले सीमित है। यह बहुत सामान्य है। लोगों को यह समझना चाहिए और आँख मूँदकर देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से नहीं करनी चाहिए; और फिर, उनका मिलान न कर पाने पर बहुत निराश नहीं होना चाहिए, उसकी आलोचना और निंदा नहीं करनी चाहिए, परमेश्वर को अस्वीकार नहीं करना चाहिए और परमेश्वर की पहचान, परमेश्वर के कार्य या परमेश्वर के सार को नकारना नहीं चाहिए। कुछ लोग तो किसी एक मामले के कारण धारणाएँ भी विकसित कर लेते हैं, देहधारी परमेश्वर का मिलान स्वर्गिक परमेश्वर से करने की कोशिश करते हैं और जब वे मिलान करने में विफल रहते हैं, तब नकारात्मक और कमज़ोर हो जाते हैं; कुछ लोग तो अपना विश्वास छोड़ने तक का विचार करने लगते हैं। यह एक बहुत ही मूर्खतापूर्ण अभिव्यक्ति है और बहुत अज्ञानतापूर्ण अभिव्यक्ति भी है।
अपनी पहचान और सार के लिहाज़ से देहधारी परमेश्वर, परमेश्वर से संबंधित है; उसमें परमेश्वर की पहचान और सार है। लेकिन चूँकि उसका दैहिक स्वरूप और स्वयं देह की विशेषताएँ सृजित मानवजाति की प्रवृत्तियों से संबंधित हैं और इन प्रवृत्तियों के दायरे तक सीमित हैं, इसलिए देहधारी परमेश्वर इस बार चाहे जो भी कार्य करे, वह जो कर सकता है, वह जो प्राप्त कर सकता है और परमेश्वर की जिस पहचान और सार का वह प्रतिनिधित्व कर सकता है, वे केवल इस देहधारण में उसके कार्य और उसकी सेवकाई से संबंधित हैं। वह परमेश्वर की उस पहचान और सार का प्रतिनिधित्व कर सकता है, जो इस बार उसकी सेवकाई और कार्य से संबंधित हैं। इस बार किया जाने वाला कार्य परमेश्वर की पहचान और सार का प्रतिनिधित्व करता है और परमेश्वर के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है। परमेश्वर के जिस भी स्वभाव का प्रतिनिधित्व उसे करना है, परमेश्वर का जो भी स्वभाव उसे व्यक्त करना है और परमेश्वर का जो भी कार्य उसे करना है, वह परमेश्वर के उस प्रासंगिक स्वभाव का प्रतिनिधित्व करेगा; वह परमेश्वर के प्रासंगिक स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने और वह प्रासंगिक कार्य करने में सक्षम होगा जो परमेश्वर करना चाहता है, लेकिन उसके लिए इन सबका प्रतिनिधित्व करना असंभव है। परमेश्वर के किसी भी देहधारण में किया गया कार्य उस स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने के लिए पर्याप्त है, जिसे परमेश्वर उस देहधारण में व्यक्त करना चाहता है और वह उस कार्य को व्यक्त करने के लिए भी पर्याप्त है, जिसे परमेश्वर उस देहधारण में करना चाहता है। इसके अलावा, परमेश्वर जो स्वभाव व्यक्त करता है और जो सार वह प्रकट करता है, वे परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान और सार के बिल्कुल भी विपरीत नहीं हैं, न ही वह इस संबंध में कोई गलती करता है। चूँकि देहधारी परमेश्वर की पहचान और सार पूरी तरह से परमेश्वर के अंतर्निहित सार या स्वर्गिक परमेश्वर के सार के साथ एक हैं, चाहे उसके वचनों, उसके द्वारा जिए जाने वाले जीवन या उसके कार्य के संदर्भ में हो या फिर परमेश्वर के स्वभाव, सार और अन्य पहलुओं के संदर्भ में हो जिन्हें लोग देख सकते हैं, देहधारी परमेश्वर स्वर्गिक परमेश्वर के समान है; वे एक ही हैं। चाहे वह परमेश्वर का उसकी समग्रता में प्रतिनिधित्व कर सके या नहीं, और चाहे लोग परमेश्वर को उसकी समग्रता में देख सकें या नहीं, संक्षेप में, उसकी पहचान और सार स्वर्गिक परमेश्वर से उत्पन्न होते हैं। भले ही, तुम्हारे दृष्टिकोण में, देहधारी परमेश्वर अपनी समग्रता में स्वर्गिक परमेश्वर का प्रतिनिधित्व न कर सकता हो, फिर भी उसकी पहचान और सार स्वयं परमेश्वर के ही हैं। भले ही, कई वर्षों तक उनकी तुलना करने के बाद, तुम अभी भी देहधारी परमेश्वर और उस स्वर्गिक परमेश्वर के बीच, जिसे तुम जानते हो, कोई संबंध नहीं खोज पाते, फिर भी देहधारी परमेश्वर की पहचान और सार नहीं बदलते, क्योंकि यह एक तथ्य है। और यह तथ्य क्या है? वह यह है कि देहधारी परमेश्वर का सार स्वर्गिक परमेश्वर का सार है और उसके सार के कारण उसकी पहचान कभी नहीं बदलती—यही परमेश्वर की पहचान है। शायद तीस साल पहले, यदि मैंने यह कहा होता तो अधिकांश लोगों ने मुझ पर विश्वास न किया होता, लेकिन तीस साल बाद, मुझे लगता है कि मैं यह कहने के योग्य हूँ। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? यदि इन तीस वर्षों का कार्य न किया गया होता और यदि ये सत्य व्यक्त न किए गए होते, तो यह कहना थोड़ी जल्दबाजी होती कि “देहधारी परमेश्वर स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है।” ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर के वचनों की अभिव्यक्ति, परमेश्वर के स्वभाव की अभिव्यक्ति और परमेश्वर की पहचान और सार की अभिव्यक्ति के बिना यदि तुम कहते “देहधारी परमेश्वर स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है,” तो लोग सोचते कि तुम असामान्य हो या वे सोचते कि तुम घोर विद्रोही हो। लेकिन परमेश्वर के वचनों की इतनी अधिक अभिव्यक्ति और परमेश्वर के स्वभाव सार और परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान की इतनी अधिक अभिव्यक्ति के साथ क्या तुम लोगों को लगता है कि यह कहना अनुचित है कि “देहधारी परमेश्वर स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है”? (नहीं।) क्या यह अतिशयोक्ति है? क्या यह अनुचित है? (नहीं।) यह कोई शेखी बघारना नहीं है। इसलिए, देहधारी परमेश्वर स्वर्गिक परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है या नहीं, उसमें स्वर्गिक परमेश्वर का स्वभाव और सार है या नहीं, और उसके पास स्वर्गिक परमेश्वर की पहचान है या नहीं, इसका आकलन उसके बाहरी रूप-रंग से नहीं किया जा सकता। शायद उसका बाहरी रूप-रंग बहुत ही मामूली हो और वह बहुत ही साधारण और सामान्य दिखता हो, यहाँ तक कि कुछ लोगों द्वारा उसे खारिज भी कर दिया जाता हो; शायद उसमें औसत से ऊपर कोई गुण न हो, न ही कोई अलौकिक अभिव्यक्ति हो, भ्रष्ट मानवजाति की नज़रों में तथाकथित अनूठे लक्षण होना तो दूर की बात है या फिर ऐसा कुछ भी न हो जिसकी भ्रष्ट मानवजाति प्रशंसा करती हो, जिसका आदर करती हो या जिस पर आश्चर्य करती हो। लेकिन चूँकि वह जो कार्य करता है, उसका सार और उसका स्वभाव स्वर्गिक परमेश्वर के स्वभाव और सार को व्यक्त करने में सक्षम हैं, इसलिए यह निर्धारित किया जा सकता है कि उसकी पहचान देहधारी परमेश्वर की है, स्वयं परमेश्वर की है।
आओ, हम देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से न करने के विषय पर संगति करना जारी रखें। हमने अभी उल्लेख किया था कि जब अधिकांश लोग देहधारी परमेश्वर के संपर्क में आते हैं, तो वे उसकी तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से करना पसंद करते हैं। यहाँ तक संगति करने के बाद, मुझे बताओ, क्या उनकी इस तरह तुलना करना उचित है? (नहीं।) क्या यह एक बहुत बड़ी गलती करना नहीं है? (हाँ।) क्या यह गलती करना मूर्खता है? क्या इसके कोई दुष्परिणाम हैं? (हाँ।) वे क्या हैं? (जब लोग अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर परमेश्वर को सीमित करते हैं, तो उनके परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और उसका प्रतिरोध करने की संभावना होती है और उनके परमेश्वर का कार्य या परमेश्वर का उद्धार स्वीकार न करने की भी संभावना होती है; इसके परिणाम बहुत गंभीर होते हैं।) तुम्हें देहधारी परमेश्वर के साथ तर्कसंगत ढंग से पेश आना चाहिए। तो तर्कसंगत होने के लिए तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें विचार करना चाहिए : स्वर्गिक परमेश्वर के अब अपना कार्य करने के लिए देहधारण करने का क्या अर्थ है? अभी देहधारी परमेश्वर ही है जिसके पास निर्णय करने का अधिकार है। वह अंत के दिनों में न्याय का कार्य करने के लिए पूर्ण अधिकार के साथ स्वर्गिक परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है। इसलिए यदि तुम्हारे सामने मुद्दे या समस्याएँ हैं, तो तुम्हें देहधारी परमेश्वर से मार्गदर्शन माँगना चाहिए। चूँकि वह स्वर्गिक परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है, इसलिए वह तुम्हारी समस्याएँ हल कर सकता है; वह तुम्हारे जीवन की समस्याएँ, परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास की समस्याएँ, तुम्हारे उद्धार से संबंधित समस्याएँ और तुम्हारी भविष्य की मंजिल और भाग्य से संबंधित समस्याएँ हल करने में स्वर्गिक परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है। दूसरी ओर, यदि तुम स्वर्गिक परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और उससे मार्गदर्शन माँगते हो, लेकिन पृथ्वी पर के इस परमेश्वर को नजरअंदाज करते हो और देहधारी परमेश्वर को नजरअंदाज करते हो, तो आगे बढ़ो और देखो कि क्या तुम अब भी स्पष्ट निर्देश, स्पष्ट प्रबुद्धता और रोशनी, और अभ्यास का स्पष्ट मार्ग प्राप्त कर सकते हो। यदि तुम स्वर्गिक परमेश्वर से प्रार्थना करके और उस पर निर्भर रहकर ये चीजें प्राप्त कर सकते हो, तो यह वास्तव में काफी अच्छा है; फिर तुम्हें देहधारी परमेश्वर से मार्गदर्शन माँगने की जरूरत नहीं होगी। लेकिन यदि लंबे समय तक स्वर्गिक परमेश्वर से प्रार्थना करने, उससे मार्गदर्शन माँगने और उस पर निर्भर रहने के बाद भी तुम्हें स्पष्ट रोशनी, अभ्यास का मार्ग या स्पष्ट समाधान नहीं मिला है, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? (परमेश्वर के वचनों में सत्य सिद्धांत खोजने चाहिए।) फिर कोई दूसरा तरीका नहीं है; तुम केवल देहधारी परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन और उसके द्वारा किया गया कार्य ही खोज सकते हो। अपना अहंकार छोड़ दो; तुम्हारा खुद को ही महत्वपूर्ण मानना तुम्हें नहीं बचा सकता, यह केवल तुम्हें नुकसान ही पहुँचा सकता है। स्वर्गिक परमेश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वोच्च, महान, असाधारण और उत्कृष्ट है, लेकिन मानवजाति उस तक नहीं पहुँच सकती। जब वह बोलता है, तो तुम उसे समझ या सुन नहीं सकते। यदि परमेश्वर सच में तुमसे बात करे, तो तुम्हारी नश्वर देह उसे बिल्कुल भी सह नहीं पाएगी या बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें देहधारी परमेश्वर से मार्गदर्शन माँगना चाहिए और देखना चाहिए कि देहधारी परमेश्वर ने पृथ्वी पर क्या वचन बोले हैं और क्या कार्य किया है, और तुमसे उसकी क्या विभिन्न अपेक्षाएँ हैं। इन चीजों को समझना सबसे महत्वपूर्ण है। हमेशा स्वर्गिक परमेश्वर से प्रार्थना मत करो और उस पर निर्भर मत रहो, हमेशा इस इंतजार में मत रहो कि स्वर्गिक परमेश्वर तुम्हें प्रकाशन देगा। यदि तुम ऐसा करते हो, तो स्वर्गिक परमेश्वर तुम्हें नजरअंदाज कर देगा। स्वर्गिक परमेश्वर ने कहा है, “मैं अब पृथ्वी पर कार्य कर रहा हूँ, कथन कह रहा हूँ और बोल रहा हूँ। मैं जो वचन बोलता हूँ, तुम उन्हें सुन और समझ सकते हो, और ये वचन तुम्हारे अभ्यास की समस्याएँ हल कर सकते हैं और तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव हल कर सकते हैं।” तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम हमेशा स्वर्गिक परमेश्वर द्वारा तुमसे स्वयं बात करने का इंतजार नहीं कर सकते। सत्य खोजने के लिए तुम्हें “झुककर” देहधारी परमेश्वर के सामने और उसके वचनों के सामने आना होगा, ताकि तुम पोषण और मदद प्राप्त कर सको। इसे तर्कसंगतता होना कहा जाता है; यह देहधारी परमेश्वर के साथ तर्कसंगत ढंग से पेश आना है। एक लिहाज से, जब तुम देहधारी परमेश्वर का बाहरी रूप-रंग देखते हो या उसे बोलते हुए सुनते हो, तो उसकी तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से मत करो; बस उसे एक ऐसा साधारण, सामान्य, वास्तविक व्यक्ति समझो, जो परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है। दूसरे लिहाज से, तुम्हें उसके द्वारा बोले गए वचनों, तुमसे की गई उसकी अपेक्षाओं और तुम्हें दिए गए उसके निर्देशों को लेकर उनकी जाँच-परख करने, उन पर माथापच्ची करने, उन्हें सत्यापित करने, उन पर चर्चा करने या उन्हें संसाधित करने की जरूरत नहीं है। बस सीधे उनका अभ्यास करो और उन्हें लागू करो, और सीधे समर्पण करो; देहधारी परमेश्वर की पीठ पीछे स्वर्गिक परमेश्वर से प्रार्थना करने, उससे मार्गदर्शन माँगने या उसका सत्यापन करने की कोई जरूरत नहीं है। यदि तुम अभ्यास करने, लागू करने और समर्पण करने से पहले सत्यापन प्राप्त करने की जिद करते हो ताकि तुम अपनी आत्मा में सहज महसूस करो और अपने दिल में इच्छुक हो सको, तो क्या यह बहुत परेशानी वाली बात नहीं है? (हाँ।) क्या ऐसे लोग हैं, जो ऐसा करते हैं? परमेश्वर में आठ या दस वर्षों से विश्वास करने वाले और अपने दिलों में परमेश्वर के बारे में पूरी तरह से निश्चित हो चुके अधिकांश लोग ऐसा नहीं करते; उन्हें यह बहुत परेशानी भरा लगता है। हमेशा वे लोग ऐसा करते हैं, जिन्हें विश्वास किए हुए तीन साल से कम समय हुआ है। वे स्वर्गिक परमेश्वर से कैसे प्रार्थना करते हैं? वे कहते हैं, “परमेश्वर, कृपया मुझे अपनी देहधारी देह के प्रति समर्पण करने दो। परमेश्वर, कृपया मुझे उन वचनों के प्रति समर्पण करने दो जो तुम पृथ्वी पर बोलते हो। परमेश्वर, कृपया मुझे उसके प्रति समर्पण करने दो जो तुम पृथ्वी पर व्यक्त करते हो। परमेश्वर, कृपया अपनी देहधारी देह के बारे में मेरी धारणाएँ त्यागने में मेरी मदद करो।” जब वे इस तरह प्रार्थना करते हैं, तो वे किससे प्रार्थना कर रहे होते हैं? (स्वर्गिक परमेश्वर से।) मुझे बताओ, क्या आम तौर पर इस तरह प्रार्थना करने वाले लोगों में पवित्र आत्मा की प्रेरणा होती है? क्या उनमें परमेश्वर की उपस्थिति होती है? (नहीं।) उनमें नहीं होती, और उनके लिए इसे प्राप्त करना आसान नहीं है। क्या परमेश्वर ऐसे लोगों पर कोई ध्यान देता है? (नहीं।)
चूँकि देहधारी परमेश्वर देह है, इसलिए वह एक साधारण, सामान्य मानव-पुत्र है। एक साधारण, सामान्य मानव-पुत्र की बात करने का अर्थ है कि उसमें एक साधारण, सामान्य व्यक्ति की सहज प्रवृत्तियाँ और जन्मजात स्थितियाँ, और साथ ही सामान्य मानवता का व्यक्तित्व, भावनाओं का दायरा, अभिव्यक्ति का तरीका और बोलने की शैली है। और क्या? सोचने का तरीका, जीवन-शैली और रहन-सहन की आदतें, साथ ही जीवन के सभी पहलुओं के संबंध में सामान्य मानवता के विभिन्न चुनाव। इन चुनावों में क्या शामिल है? उदाहरण के लिए, रहन-सहन का पसंदीदा माहौल, पसंदीदा रंग और बुनियादी जरूरतों के संबंध में कुछ प्राथमिकताएँ और चुनाव। इस बाहरी रूप, इन सहज प्रवृत्तियों और सामान्य मानवता की जन्मजात स्थितियों, साथ ही सामान्य मानव जीवन के दायरे में आने वाली विभिन्न अभिव्यक्तियों के साथ यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि देहधारी परमेश्वर पूरी तरह से एक मानक, सामान्य व्यक्ति, सृजित मानवजाति का एक साधारण सदस्य है। अपने गुणों और अस्तित्व के रूप के संदर्भ में, देहधारी परमेश्वर स्वर्गिक परमेश्वर से, यानी परमेश्वर के आत्मा से पूरी तरह से अलग है; उसका बाहरी रूप-रंग भी परमेश्वर के आत्मा के रूप-रंग से पूरी तरह अलग है। देहधारी परमेश्वर के कार्य की अवधि के दौरान, वह जो प्रकट करता है और जो करने में सक्षम है, वह कुछ ऐसा है जिसे इंसानी आँखें देख सकती हैं और इंसानी मन समझ सकते हैं। लेकिन परमेश्वर के स्वभाव, परमेश्वर के सार और परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान के बारे में लोगों का ज्ञान बहुत सीमित है। इस तथ्य के साथ कि लोग परमेश्वर के बारे में कई धारणाएँ और कल्पनाएँ रखते हैं, देहधारी परमेश्वर की मानवता की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ लोगों के लिए कुछ कठिनाइयाँ पैदा करती हैं। उदाहरण के लिए, बोलते समय मैं जिन शब्दों का उपयोग करता हूँ, वे रोजमर्रा की भाषा के होते हैं, और मैं अक्सर कुछ बोलचाल की और देशी भाषा का भी उपयोग करता हूँ। तब लोग मेरी तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से करेंगे और कहेंगे, “स्वर्गिक परमेश्वर को वाक्पटुता से बोलना चाहिए और सुंदर शब्दों का उपयोग करना चाहिए। यह व्यक्ति जिन शब्दों का उपयोग करता है, वे सुंदर क्यों नहीं हैं? यह कुछ बोलचाल की और देशी भाषा तक का उपयोग करता है, और कभी-कभी दैनिक जरूरतों से संबंधित शब्दावली और अभिव्यक्तियों का उपयोग करता है।” उदाहरण के लिए, मुझे एक निश्चित रंग पसंद है, और कोई कहता है, “तुम यह रंग कैसे पसंद कर सकते हो? यह रंग शुद्ध या पवित्र नहीं लगता! क्या परमेश्वर को सफेद रंग पसंद नहीं होना चाहिए? क्या परमेश्वर को आसमानी नीला या हरा रंग पसंद नहीं होना चाहिए? तुम यह रंग कैसे पसंद कर सकते हो? यह रंग परमेश्वर की पहचान और सार का प्रतिनिधित्व नहीं करता!” फिर वे अपने दिल में धारणाएँ विकसित कर लेते हैं। लेकिन मैं कहता हूँ कि मुझे वास्तव में यह रंग पसंद है—तुम्हें इसे कैसे लेना चाहिए? (हमें इसे सही ढंग से लेना चाहिए।) देहधारी परमेश्वर में सामान्य मानवता है। सामान्य मानवता के भीतर रहते हुए उसे उन सभी प्रकार की चीजों के संपर्क में आना होता है, जो एक सामान्य मानव जीवन के दायरे में आती हैं। इसलिए, बुनियादी जरूरतों के संबंध में उसकी व्यक्तिगत प्राथमिकताएँ हैं। ये प्राथमिकताएँ तुम्हारी धारणाओं और कल्पनाओं में मौजूद परमेश्वर की प्राथमिकताओं के साथ मेल खा सकती हैं या नहीं भी खा सकतीं। क्या होगा यदि वे मेल नहीं खातीं? क्या तुम गलत हो या मैं गलत हूँ? मुझे लगता है कि मैं गलत नहीं हूँ, क्योंकि मुझे अपनी पसंद की चीजें चुनने का अधिकार है। मैंने उन्हें तुम पर नहीं थोपा है, न ही मैंने यह कहा है कि वे सत्य हैं और तुम्हें उन्हें स्वीकार करना ही होगा। तुम्हारे भी अपने अधिकार हैं और मैं कभी उनमें हस्तक्षेप नहीं करता। मैं सफेद या नीला रंग पसंद करने के लिए कभी तुम्हारी निंदा नहीं करता, इसलिए तुम्हें भी अन्य रंग पसंद करने के लिए मेरी निंदा नहीं करनी चाहिए, है ना? कुछ लोग कहते हैं, “यह नहीं चलेगा। तुम जिसका प्रतिनिधित्व करते हो, वह उससे अलग है जिसका मैं प्रतिनिधित्व करता हूँ। मैं भ्रष्ट इंसानों का प्रतिनिधित्व करता हूँ और तुम स्वर्गिक परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते हो। यह एक जैसा कैसे हो सकता है?” मैं स्वर्गिक परमेश्वर का प्रतिनिधित्व जरूर करता हूँ, लेकिन स्वर्गिक परमेश्वर मेरी पसंद के रंगों की निंदा नहीं करता। तुम्हें लगता है कि सफेद रंग पवित्र है, लेकिन स्वर्गिक परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों को देखो—वे सभी रंगों में आती हैं। परमेश्वर द्वारा बनाए गए फूल कई रंगों के मिश्रण में आते हैं। कभी-कभी आकाश में दूसरे बादलों के बीच काले बादल भी होते हैं और काले बादल धूसर होते हैं। गर्मियों में जब बहुत गर्मी होती है, तब जैसे ही काले बादल सूरज को ढक लेते हैं, तुम्हें ठंडक और आराम महसूस होता है, और तुम परमेश्वर के अनुग्रह के लिए उसे धन्यवाद देते हो। क्या यह अच्छी चीज नहीं है? (हाँ।) कुछ अन्य लोग कहते हैं, “हरा रंग अच्छा है; परमेश्वर द्वारा बनाया गया हरा रंग जीवन का प्रतिनिधित्व करता है।” यह गलत है। परमेश्वर द्वारा बनाए गए अनाजों को देखो। उदाहरण के लिए, क्या मक्का कई रंगों में नहीं आता? पीला, सफेद, बैंगनी और काला मक्का होता है। क्या तुम कह सकते हो कि मक्का जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करता? मक्का परमेश्वर द्वारा बनाया गया है। वह जड़ पकड़ सकता है, अंकुरित हो सकता है, उसमें फूल आ सकते हैं और फल लग सकते हैं। वह जैविक होता है और जीवन का प्रतिनिधित्व भी करता है। साथ ही, क्या पेड़ की सभी पत्तियाँ हरी होती हैं? (नहीं, बैंगनी, पीली और लाल पत्तियाँ भी होती हैं।) ये सभी पत्तियों के रंग हैं; क्या ये जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करते? (करते हैं।) इसलिए जब कुछ लोग कहते हैं कि “हरा रंग जीवन का प्रतिनिधित्व करता है,” तो क्या वे गलत नहीं होते? (हाँ।) तो क्या कुछ लोगों के लिए यह कहना उचित है, “सफेद रंग शुद्धता का प्रतिनिधित्व करता है”? क्या यह बकवास नहीं है? सफेद रंग बस थोड़ा अधिक साफ और चमकीला दिखता है; यह शुद्धता का प्रतिनिधित्व नहीं करता। यहाँ तक कि अगर तुम जीवन भर सफेद कपड़े पहनो, तो भी इसका मतलब यह नहीं कि तुम शुद्ध हो; तुम अभी भी एक भ्रष्ट इंसान हो। इसलिए, जब रंग चुनने की बात आती है, तो उसके कोई विनियम नहीं हैं। यह बस व्यक्ति की त्वचा के रंग, व्यक्तिगत पसंद और व्यक्तित्व पर, और बेशक मौसम, जलवायु और तापमान पर भी आधारित होता है। सफेद बस एक रंग है; वह किसी चीज का प्रतिनिधित्व नहीं करता। काले रंग के बारे में क्या कहोगे? कुछ लोग कहते हैं, “काला रंग अंधकार, मृत्यु और दानव का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए काला रंग बुरा है!” मुझे बताओ, क्या काले रंग की निंदा करना अच्छा है? (नहीं।) कभी-कभी मैं भी काले कपड़े पहनता हूँ, जैसे कि काला ऊनी ओवरकोट, विंडब्रेकर, स्वेटर या पैंट, और सर्दियों में मैं कभी-कभी काला स्कार्फ और काले दस्ताने पहनता हूँ। कुछ लोग कहते हैं, “क्या काला रंग अंधकार और शैतान का प्रतिनिधित्व नहीं करता? तुम काले कपड़े कैसे पहन सकते हो? क्या तुम परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं करते? यदि तुम परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते हुए काले कपड़े पहनते हो, तो क्या यह उसे गलत तरीके से पेश करना नहीं है? स्वर्गिक परमेश्वर निश्चित रूप से काला रंग पसंद नहीं करता।” मैं कहता हूँ कि तुम गलत हो। तुम्हें कैसे पता कि स्वर्गिक परमेश्वर काला रंग पसंद नहीं करता? तुमने परमेश्वर को कब यह कहते सुना कि उसे काला रंग पसंद नहीं है? क्या यह बाइबल में दर्ज है या किसी दूत ने तुम्हें यह बताया है? अनाजों और फलियों में काले रंग के खाद्य पदार्थ देखो, जैसे कि काली फलियाँ, काले चावल और काले तिल—क्या उन्हें परमेश्वर ने नहीं बनाया? (हाँ।) लोग ये काले रंग के खाद्य पदार्थ खाना पसंद करते हैं और माना जाता है कि वे शरीर को पोषण देते हैं। साथ ही, सिल्की मुर्गियाँ पूरी तरह से काली होती हैं और उनका पोषण मूल्य साधारण मुर्गियों की तुलना में अधिक होता है। मछलियों में स्नेकहेड, स्तनधारियों में काले भालू और पक्षियों में कौवे भी होते हैं—क्या वे काले नहीं होते? (हाँ।) काले पत्थर होते हैं, काले बालों वाले लोग होते हैं और काली त्वचा वाले लोग होते हैं। जब कुछ लोगों के बाल चमकदार काले होते हैं, तो वे हमेशा दूसरों के सामने उन्हें दिखाते हुए कहते हैं, “देखो, मेरे बाल कितने काले हैं; ये कितने सुंदर हैं!” जब सफेद बाल बढ़ने लगते हैं, तो वे चिंता करने लगते हैं और महसूस करते हैं कि वे बूढ़े हो गए हैं। तो सफेद रंग किस चीज का प्रतिनिधित्व करता है? (बूढ़े होने का।) यह बूढ़े होने, शारीरिक प्रकार्यों में गिरावट, और यहाँ तक कि मृत्यु की ओर बढ़ने का प्रतिनिधित्व करता है। लोगों के जितने अधिक सफेद बाल होते हैं, वे उतने ही अधिक उदास, हताश और व्यथित हो जाते हैं और याद करते हैं कि जब वे जवान थे तो काले बाल होना कितना अच्छा था। इस समय उन्हें एहसास होता है कि वे कितने मूर्ख थे जो यह कहते थे, “सफेद रंग पवित्रता का प्रतिनिधित्व करता है,” और अब वे यह नहीं कहते कि काला रंग अंधकार, दानव और शैतान का प्रतिनिधित्व करता है; वे अब अपनी धारणाओं के आधार पर आँख मूँदकर नहीं बोलते। कुछ अनुभवों से गुजरने के बाद लोग इन चीजों को समझ जाएँगे, लेकिन कुछ लोग बुढ़ापे में पहुँचने पर भी इन्हें कभी नहीं समझ पाते। लोग कई चीजों के बारे में अपने दिलों में धारणाएँ रखते हैं। जब वे सुनते हैं कि मैं क्या कहता हूँ या देखते हैं कि मैं क्या करने जा रहा हूँ या क्या चुनाव करता हूँ, तो वे स्वर्गिक परमेश्वर के साथ मेरी तुलना करने की कोशिश किए बिना नहीं रह पाते और कुछ धारणाएँ बना लेते हैं। वे अक्सर विशेष रूप से जीवन की उन चीजों के बारे में धारणाएँ बनाते हैं, जिनके संपर्क में वे आ सकते हैं और जिन्हें वे देख सकते हैं। देखा तुमने, लोग रंगों के चुनाव के बारे में धारणाएँ बनाए बिना नहीं रह पाते, और वे इस छोटे-से मामले को भी तर्कसंगत ढंग से नहीं ले सकते और सही निर्णय नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए, तुम देखते हो कि बौद्ध भिक्षुणियों और भिक्षुओं द्वारा पहने जाने वाले कपड़े धूसर रंग के होते हैं, इसलिए तुम सोचते हो कि धूसर रंग बौद्ध भिक्षुणियों और भिक्षुओं का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए, यदि मैं तुम्हारे लिए एक धूसर रंग का टॉप चुनता हूँ, तो तुम सोचते हो, “क्या हम ईसाई नहीं हैं? क्या तुम देहधारी परमेश्वर नहीं हो? तुम फिर भी धूसर रंग के कपड़े कैसे चुन सकते हो? केवल बौद्ध भिक्षुणियाँ और भिक्षु ही धूसर रंग के कपड़े पहनते हैं! परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग वह रंग कैसे पहन सकते हैं, जो बौद्ध भिक्षुणियाँ और भिक्षु पहनते हैं? क्या यह हमें बौद्ध धर्म के समान मानना नहीं है? तुम इस वर्जना से भी नहीं बचते!” मैं कहता हूँ, इसमें बचने वाली क्या बात है? सभी रंग परमेश्वर द्वारा बनाए गए थे। मुझे जो भी रंग पसंद है, उसके लिए मेरे अपने कारण हैं; इसके अलावा, यह निश्चित रूप से तुम्हारे लिए अच्छा है और तुम्हारे लिए फायदेमंद है। तुम हमेशा भिक्षुओं और भिक्षुणियों का धूसर रंग के साथ या परमेश्वर में विश्वास करने वालों के साथ या अपने साथ संबंध जोड़ते हो—यह तुम्हारी समस्या है। मैं इसके बारे में इतने जटिल तरीके से नहीं सोचता। इस तरह से सोचने का मतलब है कि तुम तर्कसंगत नहीं हो। तुम इस रंग को अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के परिप्रेक्ष्य से देख रहे हो, तुमने इस रंग में अपना अर्थ जोड़ दिया है और तुमने इस रंग की विरूपित तरीके से व्याख्या की है। अंततः, तुम खुद को केवल सफेद रंग पसंद करने और केवल सफेद रंग पहनने तक सीमित कर लेते हो। लेकिन जब तुम अपना सिर सफेद बालों से भरा हुआ देखते हो, अपनी त्वचा और रंगत पीली पड़ती हुई देखते हो या तुम्हें सफेद दाग हो जाता है, तब तुम दुखी हो जाते हो और फिर तुम यह नहीं कहते कि तुम्हें सफेद रंग पसंद है, न ही तुम यह कहते हो कि सफेद रंग शुद्धता का प्रतिनिधित्व करता है। लोग इस बात को लेकर भी धारणाओं से भरे हुए हैं कि देहधारी परमेश्वर को कौन-से रंग पसंद हैं और वह कौन-से रंग चुनता है। मुझे बताओ, क्या यह बहुत परेशानी वाली बात नहीं है? मुझे आश्चर्य होता है : क्या इन लोगों ने वास्तव में वे कई सत्य समझे हैं जिन पर मैंने संगति की है? यदि वे यह छोटा-सा मामला भी नहीं समझ सकते, तो क्या वे सत्य समझ सकते हैं, जो इतना जटिल है? मुझे संदेह है कि वे वास्तव में सत्य समझते हैं या नहीं। यह कहना मुश्किल है, है ना? (हाँ।) वे केवल कुछ धर्म-सिद्धांत समझते हैं, लेकिन सत्य नहीं समझते, फिर भी वे वास्तविक जीवन में कुछ चीजों पर आँख मूँदकर विनियमों को लागू करते हैं और निर्णय सुनाते हैं। क्या यह लोगों की विकृति नहीं है? (हाँ।)
मुझे बताओ, लोगों को विभिन्न रंग कैसे देखना और समझना चाहिए? इस मानव-संसार को देखो : जिन वस्तुओं और जीवित चीजों को लोग खुली आँखों से देख सकते हैं—चाहे वे गतिशील हों या स्थिर—वे सभी प्रकार के रंगों में आती हैं और वे सब परमेश्वर द्वारा बनाई गई थीं। मछलियाँ, पक्षी, खूँखार जानवर, शाकाहारी जानवर, मुर्गियाँ और पशुधन सभी प्रकार के रंगों में आते हैं; पेड़ों पर और जमीन पर लगने वाले फल सभी प्रकार के रंगों में आते हैं। तुमने इन प्रचुर रंगों से क्या समझा है? परमेश्वर ने सृजित मानवजाति को एक उपयुक्त जीवन परिवेश प्रदान करने के लिए विभिन्न स्थिर वस्तुओं के रंग बनाए; ये रंग लोगों की आँखों और इंद्रियों के साथ-साथ उनके पूरे शरीर के अस्तित्व के लिए फायदेमंद हैं। परमेश्वर ने इन सब पर विचार किया है। परमेश्वर के लिए, किसी निश्चित रंग का उपयोग करने या किसी चीज के स्वरूप और आकार की परिकल्पना करने और साथ ही उसकी रहन-सहन की आदतें और पद्धतियों की भी परिकल्पना करने का एक विशेष कारण है; परमेश्वर के साथ कोई विनियम नहीं है। परमेश्वर न केवल सभी चीजें बनाने में विनियमों का पालन नहीं करता, बल्कि एक सबसे बुनियादी सिद्धांत भी है : उनके रंगों, स्वरूपों, रहन-सहन की आदतों और प्रकार्यों के साथ-साथ सभी चीजों के बीच प्रत्येक चीज द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका से आँकें तो, वे सब लोगों को ऐसे परिवेश में जीवित रहने के लिए उपयुक्त बनाते हैं और लोगों को विभिन्न खाद्य पदार्थों से विभिन्न आवश्यक पोषक तत्त्व प्राप्त करने में सक्षम बनाते हैं; वे इन चीजों के आधार पर बनाए गए थे। चूँकि लोग बहुत तुच्छ हैं और वे अपनी खुली आँखों से जो देख सकते हैं वह सीमित है, इसलिए वे अपनी खुली आँखों से जो देख सकते हैं उसके दायरे में, वे परमेश्वर को इस तरह के स्वरूप में या उस तरह के स्वरूप में सीमित कर देते हैं और सोचते हैं कि परमेश्वर को इस तरह से कार्य करना चाहिए या उस तरह से कार्य करना चाहिए। उदाहरण के लिए, लोगों की कल्पनाओं में शैतान आम तौर पर अँधेरे से निकलता है, इसलिए लोग सोचते हैं, “काला रंग बुरा है। परमेश्वर को काला रंग पसंद नहीं है; परमेश्वर काली चीजें नहीं बनाता।” तुम्हारा इस तरह से सोचना गलत है! कई काली चीजें हैं, जो लोगों के लिए फायदेमंद हैं। उदाहरण के लिए, कुछ खाद्य पदार्थ, जैसे काली फलियाँ और काले तिल, काले होते हैं, लेकिन वे मानव-शरीर के लिए फायदेमंद होते हैं। साथ ही, कुछ पक्षियों और जानवरों के रंग काले होते हैं और वे कुछ राज्य-संरक्षित प्रजातियाँ भी हैं। इसलिए, किसी चीज के रंग के आधार पर तुम्हारा यह तय करना गलत है कि वह अच्छी है या बुरी। शैतान का काले रंग का चुनाव यह साबित नहीं करता कि काला रंग बुरा है, न ही वह यह साबित करता है कि काला रंग कोई ऐसी चीज है जिसे परमेश्वर नापसंद करता है या जिसकी वह निंदा करता है। तो शैतान काला रंग क्यों चुनता है? क्योंकि शैतान दुष्ट और क्रूर है, वह प्रकाश सहन नहीं कर सकता और वह खुद को अँधेरे में छिपाना पसंद करता है। केवल खुद को अँधेरे में छिपाकर ही वह लोगों द्वारा खोजे जाने से बच सकता है। वह छिपना, धोखा देना, बुरे काम करना और बुराई करना आसान बनाने के लिए काला रंग चुनता है। लेकिन तुम काले रंग की सिर्फ इसलिए निंदा नहीं कर सकते, क्योंकि शैतान इसे चुनता है। सफेद रंग की तुलना में काला रंग अधिक से अधिक शैतान के लिए छिपना आसान बनाता है और शैतान द्वारा उसका इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए शैतान काले रंग को प्राथमिकता देता है। चूँकि परमेश्वर प्रकाश है, इसलिए वह अक्सर प्रकाश में चलता है, प्रकाश में लोगों से बात करता है और प्रकाश में लोगों के सामने प्रकट होता है। परमेश्वर प्रकाश में रहता है और परमेश्वर हमेशा सफेद प्रकाश चुनता है। इसलिए लोग सोचते हैं, “परमेश्वर को अन्य रंग पसंद नहीं हैं; परमेश्वर को केवल सफेद रंग पसंद है।” क्या यह दृष्टिकोण गलत नहीं है? (हाँ।) परमेश्वर द्वारा सृजित सभी चीजें देखो—वे सभी प्रकार के रंगों में आती हैं। तो ये सभी विभिन्न रंग कहाँ से आते हैं? ये सभी परमेश्वर के विचारों से उत्पन्न होते हैं। यदि तुम परमेश्वर के विचारों से उत्पन्न होने वाले विभिन्न रंगों की निंदा करते हो, तो यह किस तरह की समस्या है? क्या यह विद्रोह नहीं है? (हाँ।) यह बहुत मूर्खतापूर्ण है! यदि तुम देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता की अभिव्यक्तियों के संपर्क में आ सकते हो, उन्हें देख या सुन सकते हो, तो तुम्हें उनके साथ सही ढंग से पेश आना चाहिए। जब तक वे तुम्हारे द्वारा सत्य स्वीकार किए जाने को प्रभावित या बाधित नहीं करते, तब तक तुम्हें इन चीजों को जरूरत से ज्यादा अहमियत नहीं देनी चाहिए, उन पर शोध और विश्लेषण नहीं करना चाहिए, फिर उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं करना चाहिए और अंततः धारणाएँ विकसित नहीं करनी चाहिए, और देहधारी परमेश्वर की आलोचना नहीं करनी चाहिए, उसे दोषी नहीं ठहराना चाहिए, उसका प्रतिरोध नहीं करना चाहिए और उसे अस्वीकार नहीं करना चाहिए। यह बहुत गलत होगा! ऐसे लोग जमीर और विवेक से रहित होते हैं।
चूँकि देहधारी परमेश्वर एक साधारण, सामान्य व्यक्ति है, इसलिए उसके जीवन का एक निश्चित, सामान्य दायरा, रहन-सहन की आदतें, और यहाँ तक कि रहन-सहन की पद्धतियाँ भी हैं, साथ ही मानव-जीवन में शामिल सभी विभिन्न चुनाव, समझौते और भावनाओं का दायरा भी है। देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता के संबंध में, एक लिहाज से, लोगों को तर्कसंगत परिप्रेक्ष्य से इसके साथ सही ढंग से पेश आना चाहिए; दूसरे लिहाज से, उन्हें इसकी सही समझ होनी चाहिए। यदि तुम इसलिए धारणाएँ विकसित करते हो क्योंकि देहधारी परमेश्वर अपने जीवन और सामान्य मानवता के संबंध में जो करता है, तुम उसे देखते, सुनते या उसके संपर्क में आते हो, तो यह सुनिश्चित करने का सबसे सरल तरीका कि यह तुम्हारे जीवन प्रवेश या परमेश्वर के वचनों की तुम्हारी स्वीकृति को प्रभावित न करे, यह है कि देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से करने की कोशिश मत करो। देहधारी परमेश्वर सामान्य मानवता में रहता है; उसकी अपनी स्वतंत्रता है, उसके पास वह सेवकाई है जो उसे करनी चाहिए और उसका एक सामान्य मानव-जीवन भी है। तुम्हें इसे सही ढंग से लेना चाहिए। देखो, लोगों को बचाने के लिए परमेश्वर के कार्य के तीसरे चरण में कई सत्यों की अभिव्यक्ति की आवश्यकता है। सत्य के विभिन्न पहलुओं पर संगति करते समय वह रोजमर्रा की भाषा का उपयोग करता है, जिसमें अक्सर बोलचाल के मुहावरे, देशी भाषा और स्थानीय बोलियाँ शामिल रहती हैं और कभी-कभी वह अभिव्यक्ति के विशेष तरीकों का उपयोग करता है। अगर बोले गए सभी वचन सत्य हैं और वे सभी सत्य ऐसे हैं जिन्हें तुम्हें समझना और जिनमें प्रवेश करना चाहिए, तो तुम्हें समर्पण करना चाहिए; इस तरह, तुम उद्धार प्राप्त कर सकते हो। यदि तुम हमेशा मीन-मेख निकालते हो, हमेशा जाँच-परख करते हो और हमेशा संदेह करते हो, तो तुम सत्य प्राप्त नहीं कर पाओगे और तुम देहधारी परमेश्वर द्वारा लोगों को बचाने का अनमोल अवसर गँवा दोगे। तो तुम्हें देहधारी परमेश्वर के कार्य को सही ढंग से कैसे लेना चाहिए? पहले, तुममें विवेक होना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण करना सीखना चाहिए, तुम्हें अपने उचित कार्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना चाहिए, और तुम्हें उद्धार प्राप्त करने के लिए अपने भ्रष्ट स्वभाव हल करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। यह सबसे महत्वपूर्ण चीज है। तुम्हें दिन भर परमेश्वर की जाँच-परख करने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुममें चाहे कितनी भी धारणाएँ और कल्पनाएँ हों, वे सत्य नहीं हैं। तुम जीवन भर अपनी धारणाओं से चिपके रह सकते हो और फिर भी सत्य प्राप्त नहीं कर सकते और अंत में तुम्हें नरक में ही जाना पड़ेगा। एक बार जब तुम इन मुद्दों की असलियत जान लेते हो, तब तुम परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग पर प्रवेश कर पाओगे और परमेश्वर के वचन पढ़ते समय अपनी धारणाएँ और कल्पनाएँ छोड़ने में सक्षम होगे। पहले, देखो कि क्या इन वचनों में खोजने के लिए कोई सत्य है। यदि इन वचनों में सत्य और परमेश्वर के इरादे शामिल हैं और वे तुम्हें सत्य सिद्धांतों का कोई पहलू समझने में सक्षम बना सकते हैं, तो अधिक उदार बनो; हर बात का बतंगड़ मत बनाओ, संकुचित विचार वाले मत बनो और इस पर अटको मत। तुम्हें अपने दिल में क्या सोचना चाहिए? “यद्यपि देहधारी परमेश्वर सामान्य मानवता वाला एक साधारण व्यक्ति है, फिर भी वह सत्य व्यक्त कर सकता है और वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है। अगर अगर हमारे पास कुछ सीख है और हम वाक्पटुता से बोल सकते हैं, फिर भी हम सत्य व्यक्त नहीं कर सकते, न ही हम परमेश्वर का स्वभाव और जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है उसे व्यक्त कर सकते हैं, न ही हम सत्य सिद्धांतों पर स्पष्ट रूप से संगति कर सकते हैं। हमारे पास चाहे कितना भी ज्ञान हो या हमारा रुतबा कितना भी ऊँचा हो, इसका मतलब यह नहीं कि हमारे पास सत्य है, न ही हम परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। यद्यपि देहधारी परमेश्वर रोजमर्रा की भाषा में बोलता है जो सरल और समझने में आसान है, फिर भी उसके द्वारा बोले गए सभी वचन सत्य हैं। वह सत्य सिद्धांतों पर पूरी तरह से संगति भी कर सकता है और लोगों की विभिन्न समस्याएँ हल कर सकता है। इतना ही काफी है। क्या लोग सत्य प्राप्त करने के लिए परमेश्वर में विश्वास नहीं करते? मुझे हमेशा मीन-मेख नहीं निकालनी चाहिए और कमियाँ ढूँढने की कोशिश नहीं करनी चाहिए; यह अपने उचित कार्यों की उपेक्षा करना है।” यदि तुम्हारा यह रवैया है, तो तुम परमेश्वर के वचन पढ़ते समय सत्य समझ पाओगे और तुम सत्य का अनुसरण कर पाओगे। यदि तुममें यह रवैया नहीं है, तुम सत्य नहीं खोजते और उपदेश सुनते समय हमेशा वचनों में मीन-मेख निकालते हो और देहधारी परमेश्वर के वचनों और कार्य के बारे में हमेशा धारणाएँ रखते हो, तो यह सत्य की तुम्हारी समझ को प्रभावित करेगा। कुछ लोग हमेशा देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से करते हैं और हमेशा पूछते हैं, “देहधारी परमेश्वर एक आध्यात्मिक शरीर क्यों नहीं है? देह स्वर्गिक परमेश्वर की तरह मेघगर्जना वाली आवाज में क्यों नहीं बोलता?” वे यह भी मानते हैं कि देहधारी परमेश्वर का सच्चा परमेश्वर होना और कथन कहना और बोलना असंभव है। वे मानते हैं कि सच्चे परमेश्वर के क्रियाकलाप लोगों की कल्पनाओं से बढ़कर होने चाहिए—यदि वह ठीक एक सामान्य व्यक्ति की तरह बोलता है, तो वह परमेश्वर का प्रकटन और कार्य कैसे हो सकता है? वे बस यह विचार नहीं करते, “क्या कोई इंसान सत्य व्यक्त कर सकता है? देहधारी परमेश्वर बहुत सारे सत्य व्यक्त कर सकता है; क्या यह ऐसी चीज है, जिसे कोई व्यक्ति हासिल कर सकता हो? कई लोग इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते। परमेश्वर द्वारा इतने सारे सत्य व्यक्त करना मानवजाति के बीच परमेश्वर द्वारा किया गया सबसे महान कार्य है और यह ऐसी चीज है जिसे कोई व्यक्ति हासिल नहीं कर सकता।” लोगों को समझाने के लिए जब मैं सत्य पर संगति करता हूँ, तो मुझे इस पर ऐसे तरीके से संगति करनी होती है जो स्पष्ट और समझने में आसान हो; मुझे विस्तार से बोलना होता है, चीजें बार-बार कहनी होती हैं और उदाहरण भी देने होते हैं। इससे कई लोग धारणाएँ विकसित कर लेते हैं। यदि मैं वास्तव में सामान्य तरीके से संगति करूँ, तो कितने लोग मेरा कहा समझ पाएँगे? एक भी व्यक्ति इसे नहीं समझ पाएगा, मुख्य रूप से इसलिए क्योंकि तुम लोगों का आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है। मैं चीजें इतने विस्तार से समझाता हूँ, इतने विस्तार से कि वह उबाऊ हो जाता है; यहाँ तक कि मैं स्वयं भी इससे ऊब जाता हूँ और इसके बारे में बात करते रहना नहीं चाहता, लेकिन कुछ लोग फिर भी मेरी बात नहीं समझते और अपने मन में सोचते हैं, “कुछ और उदाहरण क्यों नहीं देते?” मैं इस हद तक बोल चुका हूँ कि मैं इससे ऊब गया हूँ और आगे नहीं बोलना चाहता, तो ऐसा कैसे है कि तुम अभी भी इसे नहीं समझते? यह साबित करता है कि तुम्हारे पास इंसानी दिमाग नहीं है, तुममें सत्य समझने की क्षमता नहीं है और मैं चाहे कितने भी विस्तार में जाऊँ, तुम फिर भी इसे नहीं समझोगे। इस तरह संगति करना, यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना कि थोड़ी-सी भी बोध-क्षमता वाला कोई भी व्यक्ति इसे समझ सके और उसे अभ्यास का मार्ग मिल सके, अनिवार्य रूप से थोड़ा उबाऊ होगा। इसके अलावा, सामान्य मानवता की ऊर्जा और अन्य पहलू सीमित हैं। विशेष रूप से सत्य पर संगति करते समय कुछ चीजों को शब्दों में व्यक्त करना बहुत मुश्किल होता है और इंसानी भाषा में बहुत कमी है। इसलिए, कभी-कभी दो-तीन सेकंड के भीतर सही शब्द ढूँढना बहुत मुश्किल होता है और मैं थोड़ा-सा प्रभाव हासिल करने के लिए केवल ऐसे शब्द का उपयोग कर सकता हूँ जो लगभग समान हो, इतना ही काफी है। लेकिन हर बार जब मैं संगति करता हूँ, तो मैं यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता हूँ कि मैं जिन वचनों पर संगति करता हूँ, वे एक विषय के इर्द-गिर्द घूम सकें, ताकि तुम लोगों को सत्य के इस पहलू की समझ हो सके, और अंततः जब तुम अपने वास्तविक अनुभव में सभी प्रकार की चीजों का सामना करो, तो तुम्हारे पास अनुसरण करने के लिए एक मार्ग हो। यह तुम लोगों के जीवन अनुभव के लिए अत्यंत लाभदायक है। यद्यपि इतने विस्तार से बोलने से मैं उबाऊ लग सकता हूँ, लेकिन जब तुम लोग इस तरह की समस्याओं का सामना करते हो, तो तुम दिशाहीन महसूस नहीं करोगे—तुम्हारे पास अनुसरण करने के लिए एक मार्ग होगा। तुम अब शब्दों और धर्म-सिद्धांतों के बीच नहीं जियोगे, बल्कि तुम्हारे पास एक व्यावहारिक मार्ग, एक व्यावहारिक आधार और व्यावहारिक सत्य सिद्धांत होंगे, जिनका मिलान तुम उन स्थितियों से कर सकते हो जिनका तुम सामना करते हो, ताकि तुम लोगों की समस्याएँ हल हो सकें। इसलिए, देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता जो प्राप्त कर सकती है, मैं उसे करने की पूरी कोशिश करता हूँ, और मैं वह सब कहने की पूरी कोशिश करता हूँ जो मैं सोच सकता हूँ। जब मैं इस हद तक बोलता हूँ कि तुम लोग कहते हो कि तुम सब समझ गए हो और मेरे लिए अब और संगति करने की कोई आवश्यकता नहीं है, तो मैं बोलना बंद कर दूँगा; मैं वास्तव में इतनी देर तक बोलते नहीं रहना चाहता।
देखो, स्वर्गिक परमेश्वर सरलता से बोलता है। उदाहरण के लिए, यहोवा परमेश्वर ने मूसा से कहा, “मूसा, आओ, मुझे तुमसे कुछ कहना है।” मूसा जल्दी से घुटनों के बल बैठ गया, परमेश्वर ने उसे घोषित करने के लिए कुछ बातें बताईं और मूसा ने यहोवा परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार उन्हें घोषित कर दिया। आज यदि देहधारी परमेश्वर तुम्हें कुछ बातें बताता है और तुमसे उन्हें करने के लिए कहता है, तो अपने अभ्यास के दौरान तुम सभी प्रकार के भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करोगे। इस समय क्या तुम अभ्यास के सिद्धांत और अभ्यास का मार्ग अपनाने में सक्षम होगे? (नहीं।) तुम नहीं होगे। तो तुम देखते हो कि परमेश्वर का आत्मा सरलता से बोलता है, लेकिन जब परमेश्वर का आत्मा कार्य करता है और कुछ वचन बोलता है, तो यह केवल विशेष अवसरों पर और विशेष संदर्भों में कुछ विशेष, एकल चीजें करते समय होता है, जिन्हें करने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं होता। लेकिन देहधारी परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य ठोस और व्यापक है। यह परमेश्वर के आत्मा द्वारा लोगों को प्रकाशन देने के लिए कुछ बातें कहने या आदेश जारी करने या भविष्यवाणी व्यक्त करने के लिए कुछ बातें कहने और फिर कार्य की यह सरल, एकल मद करने के बाद समापन करने जैसा नहीं है। देहधारी परमेश्वर का कार्य लंबी अवधि तक बोलना है। लोगों के स्वभाव बदलना और उनके भ्रष्ट स्वभाव उतार फेंकना ऐसी चीजें नहीं हैं, जिन्हें सरलता से कुछ बातें कहकर पूरा किया जा सकता हो। चूँकि मानवजाति बहुत गहराई तक भ्रष्ट हो चुकी है और शैतान के विभिन्न विष और स्वभाव लोगों के भीतर गहराई से मोरचाबंदी कर चुके हैं, इसलिए लोगों की भ्रष्टता पूरी तरह से शुद्ध करने के लिए देहधारी परमेश्वर को ठोस कार्य करने, ठोस वचन बोलने और लोगों द्वारा उद्धार प्राप्त करने के लिए आवश्यक सत्य के विभिन्न पहलू व्यक्त करने की जरूरत है। इतनी लंबी अवधि तक इस तरह से कार्य करने से ही उसके द्वारा बोले गए वचन और उसके द्वारा किया गया कार्य बहुत ठोस प्रतीत होता है, और शायद—लोगों की नजरों में—बहुत उबाऊ और लंबा भी। अपनी धारणाओं के अनुसार लोग सोचते हैं, “ओह, देहधारी परमेश्वर अपने कार्य में बिजली की तरह तेज नहीं है, न ही वह चीजें तेजी से हल करता है। वह बहुत अधिक विस्तार से बोलता है और बहुत अधिक कहता है; वह थोड़ा उबाऊ है। वह लोगों के साथ तीन साल के बच्चों जैसा व्यवहार करता है!” तुम्हारे आध्यात्मिक कद को देखते हुए मुझे नहीं लगता कि तुम तीन साल के बच्चे के स्तर पर भी हो—शायद तुम एक या दो साल के बच्चे के स्तर पर हो या शायद एक शिशु के स्तर पर ही। तुम्हारे साथ तीन साल के बच्चे जैसा व्यवहार करना वास्तव में तुम्हारा उत्कर्ष करना है। जब परमेश्वर लोगों को बातें बताने के लिए स्वर्ग से गड़गड़ाहट की तरह बोलता है, तो वह किस तरह के लोगों को संबोधित कर रहा होता है? वह अपने दूतों और अपने द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोगों को संबोधित कर रहा होता है। और देहधारी परमेश्वर अब लोगों के किस समूह के सामने है? वह भ्रष्ट मानवजाति के सामने है, उस मानवजाति के सामने जिसे वह बचाना चाहता है, न कि वह विशिष्ट व्यक्तियों से बात कर रहा है और उन पर कार्य कर रहा है। परमेश्वर के आत्मा द्वारा किए जाने वाले कार्य और देहधारी परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य की प्रकृति पूरी तरह से अलग है। परमेश्वर का आत्मा कभी भ्रष्ट मानवजाति के साथ नहीं रह सकता। केवल देहधारी परमेश्वर ही लोगों के साथ रह सकता है और इस तरह भ्रष्ट मानवजाति के साथ अथक रूप से बोलता और उस पर कार्य करता रह सकता है। देहधारी परमेश्वर लोगों के बीच आता है और उनके साथ रहता है। चूँकि वह उनके साथ रहता है, इसलिए वह हर चीज का निरीक्षण करता है। हर चीज का निरीक्षण करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि लोग कैसे आचरण करते हैं, कैसे जीते हैं, कैसे कार्य करते हैं, कैसे अपना कर्तव्य करते हैं और किस मार्ग पर चलते हैं, इनसे जुड़े मुद्दों के साथ-साथ लोगों के उद्धार, लोग परमेश्वर के साथ कैसा व्यवहार करते हैं और लोग परमेश्वर को कैसे जानते हैं, इनसे जुड़े मुद्दे भी हल किए जाने जरूरी हैं। पिछली बार जब परमेश्वर देहधारी हुआ था, तब यह लोगों को पाप से छुड़ाने के लिए क्रूस पर चढ़ने के लिए था। इस बार परमेश्वर लोगों की पापी प्रकृति को उसकी जड़ से हल करने के लिए देहधारी हुआ है। इसलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर को कई वचन बोलने और कई सत्य व्यक्त करने की आवश्यकता है और परमेश्वर के कार्य की अवधि भी बहुत अधिक समय तक बढ़नी जरूरी है। परमेश्वर का आत्मा मानवजाति के साथ नहीं रह सकता, क्योंकि मानवजाति के गुण परमेश्वर के आत्मा और परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान के गुणों से अलग हैं। उनके एक साथ रहने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए, इसे कुछ हद तक अनुपयुक्त रूप से कहें तो, तुम स्वर्ग के परमेश्वर का आदर करते हो, लेकिन स्वर्गिक परमेश्वर एक आध्यात्मिक शरीर है और वह हमेशा मानवजाति के साथ नहीं रह सकता। केवल जब परमेश्वर देहधारी होता है और एक साधारण व्यक्ति बन जाता है, तभी वह इस तरह से मानवजाति के साथ रह सकता है। इसे इस तरह से कहने पर समझना आसान है, है ना? (हाँ।) देहधारी परमेश्वर मानवजाति के साथ रहता है, साल-दर-साल इस तरह अथक रूप से बोलता और कार्य करता है। देहधारी परमेश्वर लोगों के साथ रहता है और उसके संपर्क में आ सकने वाले उसके आसपास के लोगों ने शायद कुछ चीजों का अनुभव किया होगा : उसने बुनियादी जरूरतों से जुड़ी वे सभी समस्याएँ हल कर दी हैं जिन्हें लोगों के लिए हल करने की आवश्यकता थी और उसने उस कार्य से परे भी बहुत कुछ किया है जो उसे करना चाहिए, जिसमें फिल्में बनाना, पटकथाएँ संशोधित करना, वीडियो निर्देशित करना, संवाद लिखना, साक्षात्कार की पटकथाएँ लिखना और महत्वपूर्ण लेखों को संशोधित करना शामिल है। मैंने यह सब कार्य किया है, जो मूल रूप से मुझे नहीं करना था। यह अतिरिक्त कार्य करने से मैं शारीरिक और मानसिक रूप से थक जाता हूँ, आराम करने में असमर्थ हो जाता हूँ और यहाँ तक कि इससे मेरे उपदेश देने में भी देरी हुई है। बहुत-से लोग इन चीजों को देखते हैं, लेकिन उन्हें इनका कोई एहसास नहीं होता। मैं इतने अथक रूप से बोलता और कार्य करता हूँ, फिर भी अधिकांश लोग अभी भी कम पड़ जाते हैं और अच्छी तरह नहीं समझते। मैं देखता हूँ कि यह मानवजाति वास्तव में दयनीय है, वास्तव में महत्वहीन है और वास्तव में अज्ञानी है। लिंग या उम्र चाहे जो हो, लोग कुछ नहीं हैं। यदि मैंने यह कार्य करने से पहले यह कहा होता, तो शायद तुम सोचते, “क्या तुम खुद को बहुत ऊँचा और महान नहीं समझ रहे? तुम हमें नीची नजर से देख रहे हो।” लेकिन कई वर्षों तक इन लोगों के साथ रहने के बाद मैं अपने हृदय की गहराई से आह भरता हूँ, “तुम लोगों ने वास्तव में मुझसे अपने लिए बहुत मेहनत करवाई है! तुम लोगों की काबिलियत खराब है और तुम्हारी विद्रोहशीलता बहुत बड़ी है। मैं वास्तव में तुम लोगों को नीची नजर से नहीं देख रहा हूँ।” मैं तुम लोगों के बीच सबसे ज्यादा अगोचर और सबसे कम ध्यान खींचने वाला हूँ, और चाहे बोल-चाल के संदर्भ में हो या रूप-रंग, ऊँचाई या ज्ञान के संदर्भ में, तुम लोग मुझे खुद से हीन पाते हो, लेकिन इन वर्षों में तुम लोगों के साथ अपने वास्तविक संपर्क और मेलजोल के माध्यम से मैं केवल एक ही बात क्या कह सकता हूँ? इस तथ्य को छोड़कर कि देहधारी परमेश्वर का अनुसरण करने का जो मार्ग तुम लोगों ने चुना है, वह सही है, तुम लोगों के पास और कुछ नहीं है। तुम लोग जीवन वास्तविकता से रहित केवल खाली खोल हो। जहाँ तक तुम लोगों के मानव-जीवन की बात है, वह बस पूरी तरह से अस्त-व्यस्त और पूरी तरह से अव्यवस्थित है। अधिकांश लोगों के पास कोई सच्चा कौशल या वास्तविक ज्ञान नहीं है, वे नहीं जानते कि कैसे जीना है, वे नहीं जानते कि पर्यावरण का प्रबंधन कैसे करना है या जानवरों का प्रबंधन कैसे करना है और वे नहीं जानते कि अपने व्यक्तिगत स्वास्थ्य का ध्यान कैसे रखना है। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें उनके पास कोई प्रक्रियाएँ नहीं होतीं, वे अव्यवस्थित होते हैं, और नहीं जानते कि चीजें कैसे शुरू करनी हैं या कैसे समाप्त करनी हैं। उनका चरित्र भी खराब होता है। चीजें करने में उनमें गंभीर, जिम्मेदार, कठोर और सूक्ष्म रवैये की कमी होती है। वे बस कलीसिया पर पलने के लिए लापरवाह तरीके से कार्य करते हैं, किसी तरह एक-एक दिन काटते हैं। फिर भी इन सभी लोगों की फिजूल इच्छाएँ होती हैं, वे महसूस करते हैं कि वे दूसरों से बेहतर हैं और वे प्रभारी बनना चाहते हैं और दूसरों को चीजें करने के लिए आदेश जारी करना चाहते हैं, लेकिन उनके लिए बहुत खेद की बात है कि उनमें से किसी में भी वह क्षमता नहीं है। मुझे आदेश जारी करने वाला प्रभारी बनना पसंद नहीं है, न ही मुझे ऊँचे पद पर बैठकर आदेश देना और लोगों को यह बताना पसंद है कि क्या करना है। मुझे बस वास्तविक कार्य करना पसंद है, हर काम सफाई और कुशलता से करना, उसे व्यवस्थित रूप से करना और अंत तक पूरी गंभीरता के साथ उनकी जिम्मेदारी लेना पसंद है। लेकिन अधिकांश लोगों में वास्तव में इसके लिए आवश्यक गुण नहीं हैं। वे यह जिम्मेदारी उठाने में सक्षम नहीं हैं और उनमें आदेश देने का कौशल या क्षमता नहीं है। मुझे यह कहना होगा कि तुम लोग पर्यावरण का प्रबंधन या रखरखाव नहीं कर सकते। मेरे मन में एक निश्चित खाका और एक निश्चित योजना है, इसलिए मैं तुम लोगों को अपनी योजना बताता हूँ। मैं तुम लोगों को बताता हूँ कि कैसे काम करना है, चीजें कैसे व्यवस्थित करनी हैं, कहाँ पेड़ लगाने हैं, कहाँ घास बिछानी है, कहाँ क्या बनाना है, कुछ चीजें कहाँ रखना उपयुक्त है और कुछ चीजों का प्रबंधन कैसे करना है, और फिर तुम लोग जाकर इसे करते हो—बस इतना ही करना होता है। जब तुम लोग काम पूरा कर लेते हो, तो हर कोई देखता है कि जो कुछ किया गया है, वह वास्तव में काफी अच्छा दिखता है। मैंने इन लोगों के साथ पाँच-छह साल बिताएँ हैं और इनके कौशल और क्षमताएँ सब सामने आ गए हैं। अब मैं जानता हूँ कि इस मानवजाति के सभी सदस्य शायद ऐसे ही हैं। हालाँकि मैं सभी विभिन्न देशों के चुने हुए लोगों के साथ नहीं रहा हूँ, फिर भी तुम लोगों की वास्तविक स्थिति अमेरिका में चीनी कलीसियाओं में परमेश्वर के चुने हुए लोगों की स्थिति के लगभग समान ही होनी चाहिए। मैं इन लोगों के साथ मिलता-जुलता हूँ, इसलिए इन्हें थोड़ा अतिरिक्त लाभ मिल जाता है और ये मेरी कृपा का थोड़ा आनंद ले लेते हैं। तुम लोग बहुत दूर हो और मैं तुम लोगों के संपर्क में नहीं आ सकता, इसलिए तुम लोग केवल सत्य का अनुसरण कर सकते हो। परिणाम वही है।
इस बार कार्य करने के लिए देहधारी होने में परमेश्वर मुख्य रूप से विभिन्न सत्यों की संगति करता है, जिससे लोग प्रत्येक सत्य समझकर, उसे स्वीकार कर और उसका अभ्यास करके उद्धार के मार्ग पर चल सकें और अंततः उद्धार प्राप्त कर सकें, जो इस प्रकार परमेश्वर की छह हजार साल की प्रबंधन योजना के कार्य को समाप्त कर देगा; यह वह कार्य है, जिसे करना परमेश्वर की जिम्मेदारी है। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि इस कार्य के कितने हिस्से लोगों की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं या स्वर्गिक परमेश्वर के साथ बिल्कुल मेल नहीं खाते जैसा कि लोग समझते हैं, तो उन्हें यह सब छोड़ देना चाहिए। तुम्हारी धारणाएँ चाहे जो भी हों, चूँकि देहधारी परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन और किया गया कार्य सत्य और परमेश्वर के इरादे व्यक्त करते हैं, स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं और परमेश्वर के स्वभाव और पहचान का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए तुम्हें उन्हें स्वीकार करना चाहिए और मीन-मेख नहीं निकालना चाहिए। इसके अलावा, यदि तुम लगातार मीन-मेख निकालते हो और देहधारी परमेश्वर के बारे में यह या वह धारणा रखते हो जो हमेशा तुम्हें सत्य स्वीकार करने से रोकती है, तो यह तुम्हारे लिए सबसे तकलीफदेह चीज है; यह तुम्हें केवल नुकसान ही पहुँचाएगी, लाभ जरा भी नहीं पहुँचाएगी। इसलिए, तुम्हें देहधारी परमेश्वर के साथ अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर व्यवहार नहीं करना चाहिए, न ही तुम्हें अपनी धारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग करके देहधारी परमेश्वर का मूल्यांकन करना चाहिए। इसके बजाय, तुम्हें देहधारी परमेश्वर के बारे में अपनी प्रारंभिक धारणाओं और कल्पनाओं के साथ-साथ उसके बारे में अपनी वर्तमान धारणाएँ और कल्पनाएँ भी त्याग देनी चाहिए। तुम्हारी धारणाएँ और कल्पनाएँ चाहे जो भी हों, तुम्हें उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए; तुम्हें उनका गहन-विश्लेषण करना चाहिए और उन्हें जानना चाहिए, और फिर उनकी निंदा करनी चाहिए और उन्हें त्याग देना चाहिए। उन्हें त्यागने के बाद ही तुम्हारे पास परमेश्वर के वचन और परमेश्वर द्वारा तुम पर किए जाने वाला उद्धार-कार्य स्वीकार करने के लिए एक स्पष्ट हृदय हो सकता है और तभी तुम परमेश्वर के सामने आ सकते हो और उद्धार प्राप्त करने की आशा कर सकते हो। लोगों को सत्य प्रदान करने के लिए बोलने और लोगों को ताड़ना देने, उनका न्याय करने और उन्हें बचाने का कार्य करने के अलावा देहधारी परमेश्वर वास्तव में लोगों के जीवन के कुछ मामलों के संबंध में कुछ सहायक मार्गदर्शन भी देता है। यद्यपि इस कार्य में सत्य या लोगों को बचाने का कार्य शामिल नहीं है और यह देहधारी परमेश्वर की सेवकाई के भीतर शामिल कार्य नहीं है, फिर भी अमेरिका स्थित चीनी कलीसियाओं में लोगों के साथ अपने संपर्क और मेलजोल में मैंने उनके जीवन की समस्याओं के संबंध में बहुत सारा मार्गदर्शन, आलोचना और सुधार भी दिया है। है ना? (हाँ।) यह वह कार्य है, जो मैं बस चलते-फिरते कर देता हूँ। अधिकांश लोग बाहर से ऐसे लगते हैं जैसे वे कुछ हद तक सक्षम हैं, लेकिन वे कार्य की एक भी मद का भार नहीं उठा सकते, और यहाँ तक कि उनके रहन-सहन के परिवेश भी पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हैं। यह देखकर कि इन लोगों से दस साल के भीतर भी अपने रहन-सहन का परिवेश साफ-सुथरा रखने और अपना जीवन सही पटरी पर लाने की मूल रूप से कोई उम्मीद नहीं है, मैंने कुछ चीजों में भाग लेकर उनका मार्गदर्शन किया, उन्हें आँगन साफ रखने और परिवेश व्यवस्थित करने में मदद की। कुछ जगहों पर कमरों में मेजें, कुर्सियाँ, सोफे और गमले वाले पौधे, दीवारों पर लटकी तसवीरें और शीशे, और बाथरूम की चीजें पूरी तरह से अव्यवस्थित थीं। इसे दो वाक्यांशों में वर्णित करें तो, यह “पूरी तरह से अव्यवस्थित” था, जिससे तुम्हारे पास “खड़े होने के लिए भी जगह नहीं” बचती थी। यहाँ तक कि अंदर चलने-फिरने की कोशिश करने पर भी तुम्हें चिंता होगी कि तुम किसी चीज से टकरा सकते हो। हर बार जब मैं वहाँ गया, तो मुझे अंदर से असहनीय घुटन महसूस हुई। अंदर चीजें जिस तरह से व्यवस्थित की गई थीं, उसे देखकर मुझे असहज महसूस हुआ। हर तरह के सामान के ढेर लगा दिए गए थे और कई चीजें गलत जगह पर रख दी गई थीं। अध्ययन कक्ष में चावल और आटे की बाल्टियों के ढेर लगे हुए थे, लेकिन रसोई की उन अलमारियों में कुछ नहीं था जो अनाज के भंडारण के लिए थीं। बर्तन रखने के रैक पर पेचकस थे और रेफ्रिजरेटर में टूलबॉक्स थे। मैंने वहाँ के लोगों से कहा, “क्या तुम्हारे औजारों को ठंडे करने की जरूरत है? क्या तुम्हें डर है कि वे बाहर बहुत गर्म हो जाएँगे?” मुझे यह बस अकल्पनीय लगा। मेरी एक आदत है : घर के अंदर कदम रखते ही मैं पहले यह देखना पसंद करता हूँ कि वह जगह ठीक से और सही ढंग से व्यवस्थित है या नहीं, और क्या हर चीज वहाँ रखी गई है जहाँ उसे होना चाहिए। मैंने कई बार उनकी जगह का अवलोकन किया और वास्तव में मैं अब उसे और नहीं देख सकता था। मैंने कहा, “आज मेरे पास कुछ खाली समय है, इसलिए मैं तुम लोगों की जगह साफ कर दूँगा। मेरे साफ करने के बाद यदि तुम लोगों को लगे कि यह उपयुक्त है, तो इसे ऐसे ही रखना; यदि तुम्हें लगे कि यह उपयुक्त नहीं है, तो तुम लोग इसे बदल सकते हो।” मैंने मोटे तौर पर देखा कि वहाँ क्या बुनियादी साज-सामान है, और फिर, जगह के आकार और संरचना के आधार पर, मैंने सभी से फर्नीचर, रसोई के विभिन्न बर्तन और उनके कपड़े उनके संबंधित स्थानों पर रखवाए, उन्हें ठीक से व्यवस्थित किया। मैंने उनसे जाले और फर्श पर पड़ी रेत और धूल भी साफ करवाई। साफ-सफाई के बाद सभी को बहुत अच्छा लगा। उन्होंने बाद में इस बुनियादी व्यवस्था को बनाए रखा; उन्हें बस इसे साफ रखने की आवश्यकता थी। मैंने लोगों की उनके आँगनों का परिवेश अभिकल्पित करने में भी मदद की है। हमने कुछ जगहों पर फूलों वाले पेड़ लगाए और अन्य जगहों पर चिनार के पेड़, और फूलों की क्यारियों में कुछ फूल लगाए। इस तरह का भूदृश्य-निर्माण काफी अच्छा होता है। सब कुछ व्यवस्थित होने के बाद, कुछ जगहों पर इसका काफी अच्छी तरह से रखरखाव किया जाता है, जबकि अन्य जगहों पर कोई चीजों को गंभीरता से नहीं लेता और वे कुछ भी रखरखाव नहीं रखते। जब फूल और पौधे लंबे हो जाते हैं और उनकी शाखाएँ निकल आती हैं, तो उन्हें यह भी नहीं पता होता कि उन्हें उनकी छँटाई करनी चाहिए। मैं हैरान हुआ हूँ, ये लोग मूर्ख हैं या क्या? परिवेश व्यवस्थित किए जाने के बाद उन्हें नहीं पता होता कि यह अच्छा है या नहीं, और वे नहीं बता सकते कि क्या चीज कहाँ रखी जानी चाहिए। तुम कमरे में एक मेज रखते हो, उस पर एक डेस्क-लैंप रखते हो और उसके चारों ओर कुछ कुर्सियाँ रखते हो। रात में लैंप के नीचे किताबें पढ़ना और भजन सुनना, यहाँ शांति से अपनी आध्यात्मिक भक्ति करना व्यक्ति के लिए काफी अच्छा है। जो लोग इसे नहीं समझते, उन्हें लगता है कि कमरे में पर्याप्त सामान नहीं है, इसलिए वे अंदर दो छोटी मेजें और रख देते हैं और मेजों पर कुछ चावल, आटे और कुत्ते के खाने का ढेर लगा देते हैं। जहाँ भी थोड़ी-सी जगह होती है, वे अंदर चीजें ठूँस देते हैं, कमरे को तब तक अव्यवस्थित करते हैं जब तक कि वह गोदाम जैसा न दिखने लगे। उन्हें लगता है कि जब चीजें छाँटकर और सहेजकर रखी जाती हैं तो उन्हें प्राप्त करना असुविधाजनक होता है, और जब सब कुछ एक साथ ढेर कर दिया जाता है तो उन्हें किसी भी समय प्राप्त करना सुविधाजनक होता है। मैं कहता हूँ, “यह लोगों के रहन-सहन का परिवेश है। यदि तुम नहीं जानते कि इसका ध्यान कैसे रखना है या इसका रखरखाव कैसे करना है, तो इस तरह से रहने और सुअर के बाड़े में रहने के बीच क्या अंतर है?” कुछ लोग देखते हैं कि मैं रहन-सहन का परिवेश कैसे साफ रखता हूँ और इससे सीखते हैं; वे कुछ चीजें सीख सकते हैं और थोड़ा समझ सकते हैं। लेकिन कुछ लोग सीखने की कोशिश तक नहीं करते; वे अपने रहन-सहन का परिवेश या अपनी व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए नहीं रखते। मैं जहाँ भी जाता हूँ, यदि मैं देखता हूँ कि यह जगह काफी साफ है, यहाँ चीजों की अधिकता नहीं है और यह आलीशान नहीं है लेकिन काफी साफ-सुथरी है, पूरी तरह से अस्त-व्यस्त नहीं है और यहाँ कोई कचरा नहीं है, तो मेरा वहाँ रहने का मन करता है। मुझे लगता है कि यह जगह वास्तव में अच्छी है; यह रोशन, साफ और शांत है। मैं स्वयं जिस स्थान पर रहता हूँ, वहाँ आलीशान चीजों या भव्य साज-सामान की आवश्यकता नहीं है। झूमर, सिमंस के गद्दे, यूरोपीय शैली का फर्नीचर—मुझे इनकी आवश्यकता नहीं है। बस एक साधारण बिस्तर, एक ड्रेसिंग टेबल, एक डेस्क और एक कुर्सी। वहाँ बैठकर मैं किताबें पढ़ सकता हूँ, कंप्यूटर का उपयोग कर सकता हूँ और गीत सुन सकता हूँ। यह काफी अच्छा और काफी साधारण है। साधारण चीजें होना मुख्य बात नहीं है। मुख्य बात क्या है? वह यह है कि सब कुछ बड़े करीने से रखा गया है। किताबें वहाँ बड़े करीने से व्यवस्थित हैं। यहाँ तक कि जो कपड़े मैं वर्तमान में नहीं पहन रहा हूँ, उन्हें भी मैं बस लापरवाही से एक तरफ नहीं फेंकता; बल्कि, मैं उन्हें तह करके बड़े करीने से रख देता हूँ—उन्हें देखकर तुम बता सकते हो कि उन्हें व्यवस्थित किया गया है। मेजों या ड्रेसर पर कोई धूल नहीं होती; यदि होती है, तो मैं उसे पोंछ देता हूँ। जब मैं कुछ जगहों पर जाता हूँ और देखता हूँ कि कमरे काफी साफ हैं, तो यह दर्शाता है कि घर का मालिक साफ-सफाई को लेकर काफी गंभीर है। कुछ जगहों पर कमरों में चीजें पूरी तरह से अव्यवस्थित होती हैं और यह बहुत गंदा भी होता है, जिसमें बाल, धूल, जाले, कीड़े और बाकी सब कुछ होता है; यह घृणित लगता है। ऐसी जगह जाने का मेरा मन नहीं करेगा। मुझे जिन जगहों पर रहना पसंद है, वे जरूरी नहीं कि बहुत आरामदायक हों, लेकिन वे निश्चित रूप से साफ-सुथरी होंगी। कुछ जगहों पर अंदर जाते ही तुम्हें एक अजीब-सी गंध आ सकती है और किसी ने कमरे में चीजें व्यवस्थित नहीं की होतीं; यह पूरी तरह से अस्त-व्यस्त होता है। मैं ऐसी जगह पर रहने के लिए तैयार नहीं होऊँगा। यदि मुझे किसी काम से वहाँ जाना ही पड़े, तो मैं इसे सहने की कोशिश कर सकता हूँ, लेकिन जब मैं अपनी सीमा पर पहुँच जाता हूँ, तो मैं उनसे इसकी सफाई करवाता हूँ। कुछ लोग सफाई करने के लिए तैयार नहीं होते, ऐसे में मैं स्पष्ट रूप से बात करता हूँ। मैं कहता हूँ, “अपने उस सुअर के बाड़े को साफ करो!” मुझे बताओ, यदि कोई अपने रहने के परिवेश का रखरखाव करना भी नहीं जानता, तो वह क्या कर सकता है? कुछ जगहों पर रसोईघर काफी साफ रखा जाता है। वहाँ मूल रूप से कोई मक्खियाँ नहीं होतीं, डाइनिंग टेबल पर कोई धूल नहीं होती, बचा हुआ खाना जालीदार ढक्कन से ढका होता है, सिंक के आसपास पानी के दाग नहीं होते, हर कपड़ा साफ-सुथरा होता है और किसी भी कैबिनेट के दरवाज़े के हैंडल पर चिकनाई के दाग नहीं होते। वह कितना साफ होता है! यह ये जानना है कि रहन-सहन के परिवेश का रखरखाव कैसे किया जाए। लेकिन अधिकांश लोग नहीं जानते कि अपने रहन-सहन के परिवेश का रखरखाव कैसे किया जाए। अगर तुम उनके कमरे साफ करने में उनकी मदद भी कर दो, तो भी वे उन्हें केवल कुछ दिनों तक ही ऐसा रख सकते हैं। यदि तुम कुछ दिनों बाद वापस जाओ, तो वे पहले जैसे बिल्कुल नहीं लगेंगे; तुम्हें लगेगा कि तुम गलत कमरे में आ गए हो। हालाँकि अधिकांश जगहों पर मैं किसी के बेडरूम में नहीं जाता; मैं बस लिविंग रूम, किचन और डाइनिंग रूम जैसे आम क्षेत्रों में जाता हूँ। यदि मुझे गंदे क्षेत्र मिलते हैं, तो मैं उनमें से एक-दो को साफ कर दूँगा। जहाँ तक उन जगहों की बात है जहाँ मैं अक्सर नहीं जाता, वे उन्हें जैसे चाहें वैसे व्यवस्थित कर सकते हैं।
कुछ लोग फिल्में या गीत और नृत्य कार्यक्रम फिल्माते समय खुद को बहुत अच्छी तरह से साफ-सुथरा कर लेते हैं और काफी आकर्षक दिखते हैं। लेकिन कभी-कभी, विशेष परिस्थितियों में, हमें काम के मामलों पर चर्चा करने के लिए वीडियो कॉल करने की आवश्यकता होती है, और वे बिना तैयारी किए, बिना मेकअप किए या बिना खुद को सँवारे वीडियो कॉल पर आ जाते हैं; उन्हें देखते ही मैं सोचता हूँ, “ये लोग इतने बेतरतीब क्यों हैं? ये खुद को साफ-सुथरा तक नहीं करते। क्या ये वास्तव में इतने व्यस्त हैं?” कुछ लोग अपने पूरे बेडरूम में बहुत सारा कबाड़ छिपाकर रखते हैं। वे अपने तकियों और कंबलों के नीचे खाने-पीने की बहुत सारी चीजें छिपाकर रखते हैं, जैसे कुकीज़, सूरजमुखी के बीज आदि, साथ ही अंडरवियर, मोज़े और यहाँ तक कि कंप्यूटर, सेल फोन, नोटबुक वगैरह भी। जब वे रात में सोने जाते हैं, तो उन्हें सोने की जगह बनाने के लिए इन चीजों को एक तरफ सरकाना पड़ता है। ये लोग अपने बिस्तरों पर चार वर्गमीटर से भी कम जगह साफ नहीं रख सकते। वे सब कुछ अपने बिस्तरों पर रख देते हैं और कौन जानता है कि वे इसे साफ किए बिना कितने दिन गुजार सकते हैं। जब उनके कंबलों में सीलन आ जाती है और उनसे फफूँदी की बदबू आने लगती है, तो वे उन्हें धूप में हवा नहीं लगाते। जैसे ही तुम कमरे में जाते हो, तुम्हें बदबू आ सकती है, जो उनके स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। घर चाहे कैसा भी हो, बेडरूम हवादार होना जरूरी है। हवा तभी ताजा हो सकती है, जब तुम सूरज को अंदर आने दो। जिन गद्दों पर तुम लेटते हो और जिन कंबलों को तुम ओढ़ते हो, उन्हें समय-समय पर धूप में हवा लगानी चाहिए। यदि उनसे कोई अजीब गंध आने लगे या वे गंदे हो जाएँ, तो उन्हें धोना चाहिए। साफ-सुथरे रहने का यही एकमात्र तरीका है। साथ ही, तकिए के नीचे चीजें अस्त-व्यस्त रखना एकदम अस्वीकार्य है; वे चीजें वहाँ होने पर मैं सो नहीं सकता। कुछ लोगों की यह आदत होती है : वे अपनी सभी व्यक्तिगत चीजें अपने तकियों के नीचे और अपने बिस्तर के नीचे ठूँस देते हैं। यदि उन्हें कोई चीज नहीं मिलती, तो उन्हें उसके वहाँ मिलने की गारंटी है। केवल पुरुषों में ही ये बुरी आदतें नहीं होतीं; आश्चर्यजनक रूप से, कुछ युवा महिलाएँ भी ऐसी होती हैं। ये लोग आम तौर पर बाहर से काफी साफ-सुथरे दिखते हैं। वीडियो फिल्माते समय और कार्यक्रम बनाते समय वे बहुत आकर्षक दिखते हैं और उनका रूप-रंग भी बुरा नहीं होता। वे काफी जीवंत और सम्मोहक दिखते हैं। ऐसा कैसे है कि वे अपने व्यक्तिगत रहने के परिवेश का रखरखाव करना भी नहीं जानते और बुनियादी साफ-सफाई भी नहीं रख सकते? बताओ, ऐसे लोग क्या कर सकते हैं? कुछ भी करने के लिए आत्म-अनुशासन की आवश्यकता होती है; तुम्हें चीजें व्यवस्थित और प्रणालीबद्ध तरीके से करनी चाहिए और दृढ़, सतर्क, गंभीर और जिम्मेदार होना चाहिए—तुममें मानवता के ये गुण होने चाहिए। यदि, जब तुम्हारे अपने निजी स्थान और परिवेश की बात आती है, तब तुम्हारा रवैया आलस भरा, ढीला-ढाला, लापरवाह और गैर-जिम्मेदार रहता है, तो तुम कलीसिया के कार्य की विभिन्न मदें अच्छी तरह से कैसे कर सकते हो? कुछ लोग कहते हैं, “मैं काम में बहुत व्यस्त हूँ। मेरे पास इन चीजों का ध्यान रखने का समय नहीं है।” क्या यह एक बहाना नहीं है? (हाँ।) स्पष्ट रूप से कहें तो, ऐसे लोग बस आलसी होते हैं।
सामान्य मानवता वाले सभी लोगों की अपने रहने के परिवेश के लिए आवश्यकताएँ होती हैं। अपने रहने के परिवेश के लिए मेरी भी आवश्यकताएँ हैं। कम से कम, वह स्वच्छ, साफ और सुथरा होना चाहिए और देखने में आरामदायक होना चाहिए। मैं इस पर और अधिक बात नहीं करूँगा। आओ, हम परमेश्वर द्वारा सभी चीजों के सृजन और प्रबंधन को लें—क्या वह उनका अच्छी तरह से प्रबंधन करता है? परमेश्वर द्वारा सृजित सभी चीजों—नदियाँ और झीलें और उनमें मौजूद हर चीज, पहाड़, घाटियाँ और मैदान और सभी प्रकार के जानवर और पौधे—का प्रबंधन उसी के द्वारा किया जाता है। मुझे बताओ, क्या परमेश्वर उनका अच्छी तरह से प्रबंधन करता है? (हाँ।) क्या हर प्रकार के जीवित प्राणी का प्रबंधन अच्छी तरह से किया जाता है? (हाँ।) क्या कुछ भी अराजक या फीका होता है? (नहीं, परमेश्वर उनका प्रबंधन बहुत व्यवस्थित, प्रणालीबद्ध तरीके से करता है।) परमेश्वर उनका प्रबंधन नियमितता, व्यवस्था, संगठन और स्पष्टता के साथ, असाधारण कठोरता और सटीकता के साथ करता है। इंसानी शब्दों में कहें तो, उसके द्वारा इन चीजों का प्रबंधन बहुत साफ-सुथरा और व्यवस्थित होता है, जिसमें कोई चीज किसी अन्य चीज में हस्तक्षेप नहीं करती और कुछ भी उलटा-पुलटा नहीं होता। देखो, महासागरों की अपनी सीमाएँ हैं, नदियों का अपना दायरा है और पहाड़ों, भूमि और मैदानों के अपने-अपने प्रकार्य हैं। किस प्रकार के पेड़ किन स्थानों पर उगते हैं, और जानवर, पक्षी और जीव-जंतु किन परिवेशों और क्षेत्रों में पनपते हैं—ये सब व्यवस्थित और दायरे में हैं। परमेश्वर उनका प्रबंधन पूर्ण व्यवस्था के साथ करता है। समुद्र में मछलियाँ और विभिन्न अन्य जीवित चीजें भी असाधारण नियमितता के साथ रहती हैं। परमेश्वर ने उनके लिए सब कुछ सही जगह पर रखा। हर तरह की जीवित चीज के रहने के दायरे के आधार पर उसने उसकी रहने की आदतें, दिनचर्या और उसके लिए अनुकूल तापमान स्थापित किया और उसने वह भोजन भी बनाया जिसकी उसे आवश्यकता होती है। परमेश्वर प्रत्येक मामले पर बहुत बारीकी से विचार करता है और सभी चीजों का प्रबंधन बहुत संगठित तरीके से करता है। अब देखो : लोग अपने परिवेश का रखरखाव कैसे करते हैं? किसी कलीसिया या क्षेत्र का प्रबंधन करने के बारे में तो भूल ही जाओ—तुम अपने बेडरूम या आराम करने की जगह का भी अच्छी तरह से रखरखाव नहीं कर सकते। कुछ लोग अपने बिस्तर जितनी छोटी जगह भी साफ नहीं रख सकते। मुझे बताओ, तुम संभवतः क्या करने में सक्षम हो सकते हो? यह मानवता का दोष है। स्वर्गिक परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानक पूरे करना तो दूर की बात है, यदि तुम उस मानक को ही पूरा कर पाओ जो देहधारी परमेश्वर—यानी मैं—तुमसे करने की अपेक्षा करता है, तो यह भी बुरा नहीं है। ये सभी वे चीजें हैं, जिन्हें सामान्य मानवता वाले लोगों को हासिल करना चाहिए। यदि तुम सामान्य मानवता के मानक भी पूरे नहीं कर सकते, तो तुम्हारे लिए उद्धार प्राप्त करना वास्तव में थोड़ा मुश्किल होगा। जब अपने परिवेश का रखरखाव करने की बात आती है, तो लोगों से ये अपेक्षाएँ की जाती हैं। यदि लोग इसमें थोड़ा भी प्रयास करते हैं, तो वे ये अपेक्षाएँ पूरी कर सकते हैं; यह कोई मुश्किल चीज नहीं है। अपने रहने के परिवेश का रखरखाव करने के साथ अपना प्रवेश शुरू करो; फिर, जो काम और कर्तव्य तुम करते हो, उसका प्रबंधन करना सीखो। इन चीजों में थोड़ा-थोड़ा करके प्रवेश करो, सामान्य मानवता के संदर्भ में कुछ अच्छी आदतें विकसित करो, और कुछ काम करने या रहने की क्षमताएँ विकसित करो जिन्हें सामान्य मानवता वाले लोग हासिल कर सकते हैं। धीरे-धीरे, जब तुम इस सामान्य मानवता के भीतर रहने की कोशिश करते हो, तब तुम्हें कुछ सकारात्मक, अच्छी रहने की आदतें और रहने के परिवेश अपनाने चाहिए और धीरे-धीरे उन्हें अपनी सामान्य मानवता का हिस्सा बनाना चाहिए। यह तुम्हारे कर्तव्य के निर्वहन, तुम्हारे काम और तुम्हारे जीवित रहने के लिए लाभदायक होगा। है ना? (हाँ।) ये दैनिक जीवन से जुड़े कुछ मुद्दे हैं।
चूँकि देहधारी परमेश्वर देह है, इसलिए उसमें सामान्य मानवता और सृजित मानवजाति की सहज वृत्तियाँ होनी चाहिए और उसे सृजित मानवजाति के जीवन के दायरे में रहना चाहिए। इस प्रकार, देहधारी परमेश्वर में भी सामान्य मानवता की कुछ ज़रूरतें और अभिव्यक्तियाँ होती हैं। यद्यपि बाहरी तौर पर ये ज़रूरतें और अभिव्यक्तियाँ परमेश्वर की पहचान और सार से या परमेश्वर के उस स्वभाव से जिसका परमेश्वर प्रतिनिधित्व करता है, सीधे संबंध नहीं रखतीं—फिर भी कम से कम वे उस सामान्य मानवता के अनुरूप होती हैं, जिसकी स्वर्गिक परमेश्वर लोगों से अपेक्षा करता है; वे इसके विपरीत नहीं हैं, न ही ये चीजें बिल्कुल भी टकराती हैं। इसके अलावा, देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता के प्रकाशन और अभिव्यक्तियाँ मानवजाति को कोई नुकसान नहीं पहुँचातीं। देहधारी परमेश्वर सामान्य मानवता के दायरे में तुमसे चाहे जो भी अपेक्षा करे, और तुमसे मिलते-जुलते समय वह चाहे जो भी प्रकट करे, ये चीज़ें निश्चित रूप से तुम्हें चोट नहीं पहुँचाएँगी और वे निश्चित रूप से तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाएँगी। परमेश्वर न केवल ऐसा कोई काम नहीं करेगा जो तुम्हें नुकसान पहुँचाए, बल्कि वह अपनी मानवता के दायरे में—जिसमें सामान्य मानवता है—वह कार्य भी करेगा जो वह करना चाहता है, वे वचन बोलेगा जो वह बोलना चाहता है और वह स्वभाव और सार व्यक्त करेगा जो वह व्यक्त करना चाहता है और लोगों को परमेश्वर के सामने और उद्धार पाने के मार्ग पर ले जाएगा। ऐसे देहधारी परमेश्वर का बाहरी रूप तुम्हें चाहे कितना भी मामूली और कितना भी सामान्य और व्यावहारिक लगे और सृजित मानवजाति के बीच वह चाहे कितना भी साधारण और सामान्य हो, वह जिस सामान्य मानवता को जीता है, वह फिर भी स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करती है और स्वयं परमेश्वर से संबंधित है। इसलिए, सिर्फ़ इस वजह से कि वह सामान्य मानवता प्रकट करता है या सामान्य मानवता से संबंधित कुछ काम करता है—जैसे कि तुम्हारे रहने के परिवेश को साफ-सुथरा रखने में या तुम्हारे आस-पास की चीज़ों का प्रबंधन करने में तुम्हारी मदद करना—तुम्हें यह नहीं सोचना चाहिए, “परमेश्वर ये चीजें कैसे कर सकता है? क्या वह स्वर्गिक परमेश्वर नहीं है? क्या उसे स्वयं परमेश्वर का कार्य नहीं करना चाहिए? वह इन चीज़ों का प्रबंधन कैसे कर सकता है? क्या यह मक्खी मारने के लिए तोप चलाना नहीं है?” यदि तुम्हारे ऐसे विचार हैं, तो तुम पूरी तरह से और सरासर गलत हो। कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं, जो यह सोचते हों, “परमेश्वर देहधारी परमेश्वर है—क्या यह देहधारी परमेश्वर ऊँचा और महान है? क्या यह सांसारिक चीज़ों से विरक्त है? क्या वह परिवेश जिसमें यह रहता है, इसके जीवन का दायरा या जीवन के लिए इसकी ज़रूरतें हम आम लोगों से अलग हैं?” मैं तुम्हें बता दूँ, इस देहधारी परमेश्वर के जीवन के हर पहलू की अभिव्यक्तियाँ बहुत ही साधारण और बहुत ही सामान्य हैं; वे ऊँची बिल्कुल नहीं हैं और यहाँ तक कि कई लोगों की नज़र में वे बस मामूली हैं। अपने जीवन की गुणवत्ता के लिए उसकी कोई सख्त ज़रूरतें या फिजूल इच्छाएँ नहीं हैं; वह बस सबसे सरल, सबसे सादे तरीके से रहना पसंद करता है। कुछ लोग कहते हैं, “क्या देहधारी परमेश्वर उच्च जीवन-स्तर का आनंद लेना नहीं जानता?” ऐसा वास्तव में नहीं है कि मैं नहीं जानता, न ही ऐसा है कि मैं अच्छी चीज़ों से परिचित नहीं हूँ। मुझे बस ऐसी चीज़ें पसंद नहीं हैं। मेरी उस तरह की ज़रूरतें नहीं हैं। जीवन के लिए मेरी ज़रूरतें और मानक आम लोगों जैसे ही हैं : गर्मियों में कुछ तले-भुने व्यंजन और सलाद खाना, सर्दियों में कुछ स्टू और स्टू किया हुआ टोफू खाना और जब ठंड हो और बर्फ़ गिरे तो कुछ डंपलिंग खाना। कुछ लोग कहते हैं, “तो क्या तुम खाना पकाना जानते हो?” मैं खाना पकाना भी जानता हूँ और मैं हाथ से बेले गए नूडल्स बना सकता हूँ। कुछ साल पहले मैं भाप में पके बन और ट्विस्टेड रोल भी बनाता था, बर्तन धोता था और साफ-सफ़ाई करता था। मैं अपने कंबल बहुत सफाई से तह करता हूँ। जैसे ही मेरे कपड़े थोड़े गंदे होते हैं, मैं उन्हें धोना चाहता हूँ और मुझे अजीब गंध सूँघना पसंद नहीं है। जब जीवन की बात आती है, तो मेरी सख्त ज़रूरतें नहीं हैं। मुझे शांति पसंद है और शोर-शराबा पसंद नहीं है। मैं ऐसी जगहों पर रहना नहीं चाहता, जहाँ बहुत से लोग बहुत ज़ोर से बात करते हों और जहाँ बहुत शोर-शराबा हो, और मुझे शहर पसंद नहीं हैं। मुझे बताओ, क्या यह ऊँचे मानक रखना है? (नहीं।) जब मैं कार में सफ़र करता हूँ, तो बस अंदर शांति होनी चाहिए और इतना काफ़ी है। मुझे वातानुकूलन बहुत ठंडा रखना पसंद नहीं है, और हीटिंग के मामले में, अगर थोड़ी गर्माहट हो और पैडेड जैकेट पहनने पर मुझे ठंड न लगे, तो यह ठीक है। फर्नीचर खरीदते समय मुझे ऐसे बड़े कैबिनेट खरीदना पसंद है जिनमें बहुत सारी चीज़ें आ सकें, ताकि मैं जो कुछ भी अंदर रखूँ उसे सफाई से व्यवस्थित किया जा सके। मैं जो चीज़ें इस्तेमाल करता हूँ, उन्हें साफ रखना पसंद करता हूँ। यहाँ तक कि जब वे लंबे समय तक इस्तेमाल होने के बाद घिस जाती हैं, तब भी उन पर पसीने के दाग नहीं होते और उनसे अजीब गंध नहीं आती, उन पर बाल या रूसी होने की तो बात ही छोड़ दो। मैं अलमारी में रखने से पहले अपने पहने हुए कपड़े ज़रूर धोऊँगा; मैं गंदे कपड़े कभी अलमारी में नहीं रखता। जब रहन-सहन की बात आती है, तो मेरी कोई सख्त ज़रूरतें नहीं होतीं। जब मैं कुत्ता पालता हूँ, तो मैं कोई विशिष्ट नस्ल का कुत्ता नहीं पालता; अगर वह आज्ञाकारी, दयालु और समझदार है, परेशानी पैदा नहीं करता और लगातार टहलने या खेलने के लिए बाहर नहीं जाना चाहता, तो इतना काफी है। कुछ लोग कहते हैं, “क्या देहधारी परमेश्वर को केवल महँगी, शानदार चीज़ें ही पसंद हैं?” मैं ऐसी चीज़ों से अनजान नहीं हूँ, लेकिन मुझे वे सच में पसंद नहीं हैं। मुझे व्यावहारिक चीज़ें पसंद हैं—चाहे मेरे कपड़े हों, मेरे द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली चीज़ें हों या मेरे रहने की जगह हो, अगर वह व्यावहारिक है, तो इतना काफ़ी है। अगर कोई ऐसा कपड़ा या जूतों की जोड़ी है जिसे कई सालों तक पहना जा सकता है और वह मेरी ज़रूरत की चीज़ है, तो मैं उसे ज़रूर खरीदूँगा। अगर कोई चीज़ बहुत महँगी, कीमती और मूल्यवान है, लेकिन वह ऐसी चीज़ है जिसे मैं मुश्किल से एक दशक में एक बार इस्तेमाल करूँ, तो मैं उसे तब भी नहीं चाहूँगा जब वह मुझे मुफ्त में दी जाए। मुझे ऐसी चीज़ें पसंद नहीं हैं। कुछ लोग कहते हैं, “अपने कंप्यूटर के संबंध में, क्या तुम ऐसा कंप्यूटर इस्तेमाल करते हो जो सबसे कीमती, सबसे महँगा, सबसे आधुनिक और सबसे तेज़ हो?” मैं जो कंप्यूटर इस्तेमाल करता हूँ, वह काफी तेज़ है, लेकिन वह सबसे महँगा नहीं है। अगर मैं उसका इस्तेमाल मौसम का पता लगाने और संदेश पढ़ने, और कुछ रोज़मर्रा के काम करने के लिए कर सकता हूँ, तो इतना काफी है। मैं चाहे जो भी डिवाइस इस्तेमाल करूँ, मैं कभी सबसे महँगा डिवाइस इस्तेमाल नहीं करता; साधारण, व्यावहारिक डिवाइस ठीक हैं। यहाँ तक कि अगर मेरी साधारण चीजें इस्तेमाल से पुरानी भी हो जाएँ, तो भी मैं उन्हें पूरी तरह से साफ और बिना किसी नुकसान के रखने की और यह सुनिश्चित करने की पूरी कोशिश करता हूँ कि उनका सामान्य रूप से इस्तेमाल किया जा सके।
देहधारी परमेश्वर लोगों के साथ मेल-जोल रखने के मामले में भी चयनशील है। उसे लोगों के साथ बहुत अधिक घुलना-मिलना पसंद नहीं है, न ही उसे लोगों के साथ बहुत गहरे संबंध बनाना पसंद है। हालाँकि, दूसरों के साथ मिलते-जुलते समय लोगों के बारे में उसके कुछ बुनियादी विचार और उनसे कुछ अपेक्षाएँ भी होती हैं; कम से कम, वह जिनके साथ बातचीत करता है, उन्हें दूसरों के साथ ईमानदारी से पेश आना चाहिए। एक खास तरह के लोग होते हैं, जो बोलते समय केवल डींगें मारते हैं और बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। उनकी दस में से नौ बातें असत्य और अव्यावहारिक लगती हैं या उनकी बातों में दूसरों के प्रति तिरस्कार और उन्हें नीचा दिखाने की भावना होती है और वे बुरे इरादे रखते हैं। हर बार जब तुम ऐसे लोगों से बात करते हो और उनसे मिलते-जुलते हो, तो वे ऐसे ही होते हैं; तुम कभी भी उनकी असलियत की तह तक नहीं पहुँच सकते और तुम उनकी ईमानदारी महसूस नहीं कर सकते। ऐसे लोग अविश्वसनीय और ओछे होते हैं; वे आवारा होते हैं और मुझे उनके साथ मेल-जोल रखना पसंद नहीं है। एक और तरह के लोग होते हैं, जो हर समय झूठ बोलते हैं और बेकार की बातें और बकवास करने में लगे रहते हैं, कभी कोई वास्तविक बात नहीं कहते। यदि तुम उनसे किसी चीज के बारे में पूछते हो और कोई गंभीर जवाब पाने की कोशिश करते हो, तो वे घुमा-फिराकर बात करते हैं और तुम्हें सच नहीं बताते। मैं हमेशा उनसे पूरी तरह से वास्तविक तरीके से बात करता हूँ और उन्हें नीचा नहीं दिखाता, उन्हें नुकसान पहुँचाने की तो बात ही छोड़ दो, फिर भी वे मुझे सच नहीं बताते; ऐसे लोगों से बातचीत करने का कोई तरीका नहीं है। एक प्रकार के वे आवारा लोग हैं जो डींगें मारते हैं, बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और ओछे होते हैं—मैं ऐसे लोगों के साथ मेलजोल रखने का इच्छुक नहीं हूँ। दूसरे प्रकार के वे लोग हैं जो हर समय झूठ बोलते हैं और कभी कोई वास्तविक बात नहीं कहते; मुझे ऐसे लोगों के साथ भी मेलजोल रखना पसंद नहीं है—मुझे ऐसे लोगों से घृणा है और मैं उनसे नफरत करता हूँ। यदि मुझे कलीसिया का काम करने के दौरान ऐसे लोगों से निपटना पड़े, तो मैं इसे सह सकता हूँ—यह बस काम से काम रखना है। यदि सँभालने के लिए कोई काम नहीं होता, तो मैं ऐसे लोगों से दूर रहने और उनसे मेलजोल न रखने की पूरी कोशिश करता हूँ। एक और तरह के लोग भी होते हैं : इससे पहले कि तुम्हारा उनके साथ कोई वास्तविक वास्ता पड़े, वे यह हिसाब लगाना शुरू कर देते हैं कि वे तुम्हारा इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं, वे तुमसे कुछ उपयोगी जानकारी कैसे निकाल सकते हैं, वे तुमसे पैसे कैसे कमा सकते हैं या तुम्हारी सहानुभूति, भरोसा और उच्च सम्मान पाने के लिए वे तुम्हें कैसे धोखा दे सकते हैं। वे तुम्हारे खिलाफ साजिश रचने के हर संभव तरीके के बारे में सोचते हैं। मैं ऐसे लोगों के साथ मेलजोल रखने का इच्छुक नहीं हूँ; मुझे वे घिनौने लगते हैं और मैं उनसे जितना हो सके दूर रहता हूँ। एक और तरह के लोग भी होते हैं : तुम्हें बस उनके साथ थोड़ा संपर्क रखना होता है और वे यह देखने की कोशिश करेंगे कि वे तुम्हारे सामने कहाँ ठहरते हैं और तुम्हारे साथ अपनी तुलना करेंगे और यहाँ तक कि वे तुमसे ईर्ष्या भी करेंगे। उदाहरण के लिए, यदि तुम बाल कटवाते हो, तो वे कहेंगे कि तुम्हारे बाल खराब लग रहे हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद वे बिल्कुल वैसे ही बाल कटवा लेंगे। या वे तुम्हें अच्छे कपड़े पहने हुए देखेंगे और पूछेंगे कि तुमने उन्हें कहाँ से खरीदा, जबकि तुम्हारे मुँह पर कहेंगे कि रंग बहुत गहरा है, शैली पुरानी है, ये तुम पर अच्छे नहीं लग रहे, आदि, लेकिन कुछ दिनों बाद वे बिल्कुल वैसे ही कपड़े खरीद लेते हैं और उन्हें दिखाते हुए लगातार तुम्हारे आस-पास घूमते रहते हैं। तुम्हारे पास जो कुछ भी है, जब वे उसे देखते हैं, उन्हें भी वह चाहिए ही होता है। यदि तुम पचास सेंट प्रति पाउंड के हिसाब से कुछ पत्तागोभी खरीदते हो, तो वे कहते हैं, “यह बहुत महँगी है!” लेकिन वे मुड़कर किसी दूसरे स्टोर पर जाते हैं और एक डॉलर प्रति पाउंड के हिसाब से पत्तागोभी खरीदते हैं, और यहाँ तक कहते हैं, “मैंने जो सब्जियाँ खरीदी हैं, वे तुम्हारी सब्जियों से सस्ती हैं।” क्या वे सरासर झूठ नहीं बोल रहे हैं? तुम उनसे बहुत परिचित नहीं हो और तुम्हारा उनके साथ कोई करीबी वास्ता नहीं है, फिर भी वे तुम्हारे साथ इस तरह होड़ करने और तुमसे ईर्ष्या करने की कोशिश करते हैं, हर मामले में तुम्हारे साथ अपनी तुलना करते हैं; यहाँ तक कि तुम जो कुछ भी कहते हो, वे उसमें भी तुमसे आगे निकलने की कोशिश करते हैं। क्या यह किसी पागल कुत्ते का सामना करने जैसा नहीं है? जब मेरा ऐसे लोगों से सामना होता है, तो मैं उनसे बचता हूँ और उन्हें नजरअंदाज करता हूँ; ऐसे व्यक्ति के साथ घुलना-मिलना असंभव है जिसमें सामान्य मानवता नहीं है। एक और तरह के लोग भी होते हैं, जिनका तुम लोगों ने भी सामना किया होगा; ऐसे व्यक्ति से निपटना बेहद मुश्किल होता है। उदाहरण के लिए, वे शिकायत करते हैं कि कमरे में गर्मी है। यदि तुम उन्हें हवा आने के लिए दरवाजा खोलने को कहते हो, तो वे कहते हैं, “नहीं, दरवाजा खुला रहने पर मक्खियाँ अंदर आ जाएँगी।” यदि तुम उन्हें जालीदार दरवाजा लगाने का सुझाव देते हो, तो वे कहते हैं कि इससे आने-जाने में परेशानी होगी। यदि तुम उन्हें पंखा चालू करने के लिए कहते हो, तो वे कहते हैं कि उन्हें हवा के झोंके से सर्दी लगने का डर है और इससे बिजली बर्बाद होती है। यदि तुम्हारा सामना किसी ऐसे व्यक्ति से होता है, जो कमरे में गर्मी होने की शिकायत करने पर तुम्हारे द्वारा दिया गया हर सुझाव खारिज कर देता है, तो तुम जान जाओगे कि यह व्यक्ति सच में एक टेढ़ी खीर है। वह आखिर किस तरह का प्राणी है? क्या वह सही बातें स्वीकार कर सकता है? (नहीं। उसमें सामान्य मानवता नहीं है।) तो क्या तुम फिर भी उससे बात करोगे? (नहीं।) जब मेरा इस तरह के व्यक्ति से सामना होता है, तो मैं अपने दिल में उसके बारे में एक राय बना लेता हूँ : “ओह, तो तुम इस तरह के व्यक्ति हो। तुममें सामान्य मानवता नहीं है, तुम सही बातें स्वीकार नहीं करते, तुम हमेशा मीन-मेख निकालते हो और कमियाँ ढूँढते हो, और तुम्हें जानबूझकर दूसरों के लिए मुश्किलें खड़ी करने के लिए कठिन समस्याएँ पैदा करना पसंद है। तुम अच्छे इंसान नहीं हो।” ऐसे व्यक्ति का निरूपण कैसे किया जाना चाहिए? आम भाषा में ऐसे लोगों को “हर बात में नहीं कहने वाला” कहा जाता है; ऐसे लोग कोई तर्क नहीं समझते। वे शिकायत करते हैं कि कमरे में गर्मी है, लेकिन तुम जो भी समाधान सुझाते हो, वे कहते हैं कि यह गलत है या यह काम नहीं करेगा। लेकिन जैसे ही तुम कमरे से बाहर निकलते हो, वे तुरंत दरवाजा और खिड़कियाँ खोल देते हैं और पंखा चालू कर देते हैं, फिर वे इस बात की चिंता नहीं करते कि मक्खियाँ अंदर आ जाएँगी या हवा के झोंके से उन्हें सर्दी लग जाएगी। ऐसे लोगों की सोच मुझसे मेल नहीं खाती। उनसे संवाद करना असंभव है और मुझे उनके साथ मिलना-जुलना पसंद नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, “तुम्हें इस तरह के लोग पसंद नहीं हैं, तुम्हें उस तरह के लोग पसंद नहीं हैं—तुम किसी से सिर्फ इसलिए वास्ता नहीं रख सकते क्योंकि वे तुम्हें पसंद नहीं हैं?” मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि मैं उनसे सिर्फ इसलिए वास्ता नहीं रख सकता क्योंकि वे मुझे पसंद नहीं हैं। यदि मुझे काम के लिए या रोजमर्रा के जीवन में उनसे मिलना-जुलना पड़े, तो मैं इसे सह सकता हूँ। मैं ऐसे लोगों के साथ मिलने-जुलने से सिर्फ इसलिए इनकार नहीं कर सकता क्योंकि वे मुझे पसंद नहीं हैं, जिससे काम में देरी हो जाए या उन कुछ चीजों पर असर पड़े जिन्हें किया जाना है। लेकिन जब जरूरी न हो, तो मैं ऐसे लोगों के साथ बिल्कुल भी मेलजोल नहीं करूँगा।
एक और तरह का व्यक्ति होता है जो उचित कामों की उपेक्षा करके बस खाना, पीना और मौज-मस्ती करना पसंद करता है। यदि ऐसा इसलिए है कि यह युवा और अपरिपक्व है, अभी तक अपने किरदार में नहीं ढला है या इसलिए कि घर पर इसे बहुत लाड़-प्यार मिला था, कि यह नहीं जानता कि सही मामलों पर कैसे ध्यान दिया जाए या उचित कार्यों पर कैसे ध्यान केंद्रित किया जाए—और यह कोई तकनीकी कौशल सीखने या ज्ञान और विशेषज्ञता हासिल करने की कोशिश नहीं करता—तो इसे माफ किया जा सकता है। लेकिन कुछ लोग पहले ही बीस, तीस या चालीस साल के हो चुके हैं और फिर भी उचित कार्यों की उपेक्षा करते हैं और दिन भर मटरगश्ती करते रहते हैं। जब उनके पास करने के लिए कुछ नहीं होता, तो उन्हें गप्पे मारना, बातें करना और इधर-उधर घूमते हुए जैसे-तैसे जिंदगी गुजरना पसंद होता है। वे कभी सही मामलों के बारे में नहीं सोचते या उचित कामों पर ध्यान केंद्रित नहीं करते और वे कोई तकनीकी कौशल सीखने या कोई ज्ञान और विशेषज्ञता हासिल करने की कोशिश नहीं करते। वे परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ते, जीवन के मामलों पर विचार नहीं करते या इस बात पर मनन नहीं करते कि लोगों को किस मार्ग पर चलना चाहिए। वे कभी इस बात पर चिंतन नहीं करते कि दूसरों को गलत मार्ग पर जाते देखकर उन्हें उस पर चलने से कैसे बचना चाहिए, न ही वे उन लोगों को देखते हैं जिन्होंने परमेश्वर के वचनों और सत्य में प्रवेश किया है और उनसे कुछ हासिल किया है, ताकि वे इन लोगों से सीख सकें। वे कभी इन सही मामलों पर विचार नहीं करते। जब वे खाली होते हैं तो बस खाते-पीते और मौज-मस्ती करते हैं, मनोरंजन की खबरें पढ़ते हैं और विभिन्न उद्योगों की गतिविधियों पर नजर रखते हैं। तमाम तरह के समाचार स्रोतों, पत्रिकाओं और सामाजिक रुझानों में डूबे हुए वे बस जिंदगी में निरुद्देश्य और अनायास जीते हैं। लगभग एक दशक तक ऐसे ही दिन काटने के बाद भी उनमें कोई जागरूकता नहीं होती और वे कभी व्यथित महसूस नहीं करते। चाहे जो भी उनकी काट-छाँट करे या उन्हें उजागर करे, वे इसकी परवाह नहीं करते, सुन्न और मंदबुद्धि बने रहते हैं और सत्य खोजना नहीं जानते। ऐसे लोग बस जैसे-तैसे जिंदगी गुजार रहे हैं, मुफ्त की रोटियाँ तोड़ रहे हैं और मरने का इंतजार कर रहे हैं। ऐसा व्यक्ति अक्सर दोषदर्शी भी होता है, उसे लगता है कि सब कुछ अनुचित है और वह जहाँ भी जाता है, उसे अपनी प्रतिभा दिखाने का कोई मौका नहीं मिलता। फिर भी वह अपने प्रयास की कमी के कारण कुछ भी सीखने में विफल रहता है, उसने कभी किसी भी काम को गंभीरता से नहीं लिया है, कभी किसी एक भी सही बात को गंभीरता से नहीं लिया है और वह कभी नहीं सोचता कि भविष्य में उसे क्या करना चाहिए। वह खुद को काफी स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है और उसके पास विचार, आदर्श और इच्छाएँ होती हैं, लेकिन वह बस उन्हें अमल में नहीं लाता। वह जो धर्म-सिद्धांत बोलता है, वे काफी अच्छे और ऊँचे होते हैं और लोगों को वे समझदारी भरे और उचित और यहाँ तक कि सुनने में काफी सुखद भी लगते हैं, लेकिन जब वास्तविक जीवन में व्यावहारिक काम करने की बात आती है, तो वह कोई ऊर्जा नहीं जुटा पाता और कोई व्यावहारिक कार्रवाई नहीं करता। मुझे ऐसे लोग पसंद नहीं हैं। हो सकता है कि तुम्हारी काबिलियत बहुत औसत हो या तुम काफी मंदबुद्धि हो, तुम्हारी स्वाभाविक अभिक्षमता कम हो, और तुममें कोई गुण या प्रतिभा न हो। लेकिन तुम बहुत स्थिरचित्त हो, तुम चीजों में बहुत मेहनत करते हो और उन्हें लगन से करते हो, तुम कष्ट सहने के इच्छुक हो और तुम कीमत चुका सकते हो। चाहे कोई भी तुम्हें कोई काम सौंपे, तुम बहुत ईमानदार और जिम्मेदार होते हो और तुम अंत तक उसकी जिम्मेदारी ले सकते हो। तुम सिद्धांतों का सख्ती से पालन भी करते हो, इस हद तक कि कभी-कभी तुम दूसरों के बाधित होने का कारण भी बन जाते हो; लोगों को लगता है कि तुम बहुत गंभीर हो और सिद्धांतों का बहुत सख्ती से पालन करते हो, लेकिन तुम ऐसा करते रहने में सक्षम हो। मुझे ऐसा व्यक्ति पसंद है। इसका कोई महत्व नहीं कि तुम्हारी काबिलियत थोड़ी खराब है और तुम थोड़े मंदबुद्धि हो—कम से कम तुम चिकनी-चुपड़ी बातें करने वाले, धूर्त, धोखेबाज व्यक्ति या जिंदगी जैसे-तैसे गुजारने वाले व्यक्ति तो नहीं हो। यद्यपि तुम्हारी काबिलियत अधिक नहीं है और तुम्हारी स्वाभाविक अभिक्षमता कम है, लेकिन तुम्हें चीजें सीखना पसंद है और तुम लापरवाह हुए बिना विशेष रूप से गंभीर, व्यावहारिक तरीके से सीखते हो। जब दूसरों ने कुछ सीखने की कोशिश करना छोड़ दिया होता है, तब भी तुम कोशिश करना जारी रखते हो जब तक कि तुम इसे समझ नहीं लेते। मुझे ऐसे लोग पसंद हैं। वे स्थिर, नपे-तुले कदमों से आचरण और कार्य करते हैं, कभी बहुत ऊँचा लक्ष्य नहीं रखते और बहुत ईमानदार होते हैं। वे लोगों और चीजों के साथ ईमानदारी से पेश आते हैं। यहाँ तक कि किसी कुत्ते को नहलाते समय भी वे उसे पूरी तरह से साफ और अच्छी तरह से नहलाते हैं; अन्यथा उन्हें लगता है कि वे लापरवाह हो रहे हैं—वे एक कुत्ते के साथ भी सही बर्ताव करते हैं। मुझे ऐसे लोग पसंद हैं। कुछ लोग दूसरों को धोखा दे सकते हैं और वे परमेश्वर को भी धोखा दे सकते हैं और उसके साथ लापरवाह हो सकते हैं; वे बहुत अच्छी तरह से बोलते हैं लेकिन व्यावहारिक चीजें नहीं करते। मैं ऐसे लोगों पर ध्यान देने या उनके साथ मिलने-जुलने का इच्छुक नहीं हूँ। हो सकता है कि तुम वाक्पटु हो और तुम जानते हो कि चापलूसी कैसे करनी है और अच्छी लगने वाली बातें कैसे कहनी हैं, लेकिन मैं ऐसे शब्द सुनने का इच्छुक नहीं हूँ—मैं इन चीजों के झाँसे में नहीं आऊँगा।
मैं ये बातें इसलिए कहता हूँ, ताकि तुम लोग मुझे समझ सको। मैं सामान्य मानवता में जीने वाला बस एक साधारण व्यक्ति हूँ। स्वर्गिक परमेश्वर की तुलना में मैं बहुत तुच्छ हूँ; मैं एक बहुत ही आम, बहुत ही साधारण व्यक्ति हूँ। मेरी कोई ऊँची छवि नहीं है और मुझमें कोई असाधारण क्षमताएँ नहीं हैं। मैं दूसरों से श्रेष्ठ नहीं हूँ, भीड़ से अलग दिखने की इच्छा तो बिल्कुल नहीं रखता। मैं बस एक बहुत ही आम व्यक्ति हूँ और एक बहुत ही सरल व्यक्ति भी हूँ। मुझे लगता है कि मेरे जैसा एक साधारण व्यक्ति, जो सामान्य मानवता में रहता है, अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य के इस चरण की जिम्मेदारी उठाने में पूरी तरह सक्षम है और वे सभी सत्य व्यक्त करने में भी सक्षम है जिन्हें परमेश्वर अंत के दिनों में व्यक्त करना चाहता है, ताकि तुम लोग मुझसे परमेश्वर की ओर से आने वाले सत्य के वे सभी पहलू प्राप्त कर सको जो उद्धार पाने के लिए जरूरी हैं। तुम लोगों के मामले में, परमेश्वर का देहधारी देह तुम लोगों को उद्धार पाने देने के लिए काफी है; इस देह का कोई भी पहलू या पक्ष, जिसे तुम लोग देख सकते हो और जिसके संपर्क में आ सकते हो, वास्तव में इस उद्देश्य के लिए पहले से ही काफी है। इसलिए, एक सामान्य व्यक्ति के रूप में, यदि तुममें जमीर और विवेक है, तो तुम्हें लगातार देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से नहीं करनी चाहिए। यदि तुम ऐसा करते हो, तो एक तो इससे तुम्हें कोई फायदा नहीं है, और दूसरी बात, स्वर्गिक परमेश्वर को तुम्हारा ऐसा करना पसंद नहीं आएगा। इसके अलावा, यदि तुम लगातार देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से करते हो, तो यह काफी हद तक देहधारी परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों और किए गए कार्य की तुम्हारी स्वीकृति को प्रभावित करेगा, साथ ही उससे आने वाले सत्य के उन सभी पहलुओं के पोषण को भी प्रभावित करेगा, जिनकी तुम्हें जरूरत है। एक इससे भी महत्वपूर्ण पहलू है, जो यह है कि देहधारी परमेश्वर चाहे कितना भी मामूली, कितना भी सामान्य या कितना भी साधारण हो, वह आखिरकार पृथ्वी पर परमेश्वर की अभिव्यक्ति, पृथ्वी पर परमेश्वर का प्रकटन और पृथ्वी पर परमेश्वर का प्रतिनिधि है। चाहे वह परमेश्वर का जितना भी प्रतिनिधित्व कर सकता हो या परमेश्वर को जितना भी प्रकट कर सकता हो, कम से कम, परमेश्वर की नजर में, वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है और वह परमेश्वर की पहचान, परमेश्वर के सार और परमेश्वर के स्वभाव का आंशिक प्रतिनिधि है। इसलिए, कम से कम वह परमेश्वर की पहचान का प्रतिनिधित्व करता है और वह उस कार्य का भी प्रतिनिधित्व करता है जिसे परमेश्वर पृथ्वी पर करना चाहता है; वह परमेश्वर की जगह लेता है, या यह कहा जा सकता है कि वह पृथ्वी पर कार्य करने के लिए परमेश्वर की जगह लेता है। तुम स्वर्गिक परमेश्वर का चाहे कितना भी आदर करते हो या तुम स्वर्गिक परमेश्वर की कितनी भी आराधना करते हो, परमेश्वर को तुम्हारा देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से करना पसंद नहीं है, न ही उसे तुम्हारा देहधारी परमेश्वर को स्वर्गिक परमेश्वर से अलग करना पसंद है। यदि देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से करते समय तुम स्वर्गिक परमेश्वर को तो ऊँचा मानते हो लेकिन पृथ्वी के परमेश्वर को नीचा समझते हो या यदि तुम स्वर्गिक परमेश्वर के लिए तो प्रशंसा और श्रद्धा से भरे हो लेकिन पृथ्वी पर मौजूद परमेश्वर के प्रति शत्रुता और भेदभाव से भरे हो, और यहाँ तक कि उसकी आलोचना करते हो, उसे दोषी ठहराते हो और उस पर हमला करते हो, तो यह उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं है। इसलिए, जब यह बात आती है कि लोग देहधारी परमेश्वर के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, तो एक बात तो यह है कि उन्हें उसके साथ सही व्यवहार करना चाहिए और उसकी सामान्य मानवता को स्वीकार करना चाहिए; दूसरी बात, उन्हें परमेश्वर की पहचान और रुतबे के अनुसार उसके द्वारा व्यक्त सत्य और उसके द्वारा व्यक्त स्वभाव स्वीकार करना चाहिए। जब वह सामान्य मानवता प्रकट करता है और परमेश्वर का स्वभाव व्यक्त करता है या परमेश्वर का सार अभिव्यक्त करता है, तो तुम जो देखते हो और जो तुम समझ सकते हो, वह बिल्कुल वही है। अंततः तुम्हें, एक सृजित प्राणी के परिप्रेक्ष्य और रवैये के साथ, उसके द्वारा व्यक्त परमेश्वर के वचनों या उसके द्वारा प्रकट परमेश्वर के स्वभाव और सार के प्रति समर्पण करना चाहिए और उन्हें स्वीकार करना चाहिए। देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से न करते हुए तुम्हें देहधारी परमेश्वर और स्वर्गिक परमेश्वर के साथ अलग-अलग व्यवहार भी नहीं करना चाहिए। चूँकि स्वर्गिक परमेश्वर और देहधारी परमेश्वर आखिरकार तत्त्वतः एक ही हैं—बस खुली आँखों से सीधे देखने पर उनके प्रकटन के रूप में अंतर होता है—इसलिए चाहे तुम देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से करो या नहीं, अंततः, तुम देहधारी परमेश्वर के साथ कैसा व्यवहार करते हो, यह इस तथ्य पर आधारित होना चाहिए कि उसके पास परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर का सार है। खुली आँखों से देखने पर देहधारी परमेश्वर में तुम्हें चाहे जिस भी तरह की सामान्य मानवता या जिस भी तरह के प्रकाशन और अभिव्यक्तियाँ दिखाई दें या वह जितना भी सामान्य, साधारण और व्यावहारिक लगे, तुम्हें एक सृजित प्राणी के परिप्रेक्ष्य से उसे स्वीकार करना चाहिए, अपनाना चाहिए और उसके प्रति समर्पण करना चाहिए, न कि उसका विरोध करना चाहिए। लोग हमेशा देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से करना पसंद करते हैं। इसके बारे में सबसे बुरी बात यह है कि लोग देहधारी परमेश्वर की आलोचना करने, उसे दोषी ठहराने या उसे अस्वीकार करने के लिए परमेश्वर के बारे में मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग करने में सबसे अधिक प्रवृत्त होते हैं। इसलिए, देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से करना तुम्हारे लिए एक ऐसा मार्ग है, जो मृत्यु की ओर ले जाता है। मृत्यु की ओर ले जाने वाले मार्ग का क्या अर्थ है? यह उस बात को संदर्भित करता है जो मैंने पहले कही है—जरूर तुम मृत्यु की कामना कर रहे हो! और मृत्यु की कामना करना क्या है? इसका अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर का घर तुम्हें बाहर निकाल देगा या तुम्हें निष्कासित कर देगा—बल्कि इसका अर्थ यह है कि तुमने जो बुराई की है, वह इतनी गंभीर है कि तुम सजा भुगतोगे और नष्ट कर दिए जाओगे; यह दुर्भाग्य को बुलावा देना है। जब तुम ऐसी बुराई करते हो, तो लोग तो तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते, लेकिन परमेश्वर तुम्हारे बुरे कर्मों के आधार पर तुम्हें दोषी ठहराएगा। तो फिर मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि यह मृत्यु की कामना करना है? मेरे इस वाक्यांश “जरूर तुम मृत्यु की कामना कर रहे हो” का उपयोग करने का एक कारण है : तुम्हारा यह दृष्टिकोण उस मार्ग को दर्शाता है, जिस पर तुम चलते हो। अभी तुम किस तरह के मार्ग पर चल रहे हो? तुम्हारा यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि तुम एक ऐसे मार्ग पर चल रहे हो, जो विनाश की ओर ले जाता है। विनाश की ओर ले जाने वाले इस मार्ग का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि परमेश्वर स्पष्ट रूप से गवाही देता है कि पृथ्वी पर यह देहधारी परमेश्वर उसका प्रतिनिधित्व करता है और अंत के दिनों में उसके इरादों का प्रतिनिधित्व करता है, और कि यह देहधारी परमेश्वर उसका प्रकटन और अंत के दिनों में उसके कार्य का वाहक है, फिर भी तुम इन वचनों को स्वीकार नहीं करते। तुम इस देहधारी परमेश्वर की पहचान और सार को स्वीकार करने से हठपूर्वक इनकार करते हो और तुम उसके वचनों और कार्य को स्वीकार नहीं करते। तुम न केवल उन्हें स्वीकार नहीं करते, बल्कि तुम उन्हें अस्वीकार भी करते हो और तुम अक्सर स्वर्गिक परमेश्वर से प्रार्थना और विनती तक करते हो, देहधारी परमेश्वर को दरकिनार करके स्वर्गिक परमेश्वर से स्वीकृति पाना और इस तरह उद्धार पाना चाहते हो। यानी, तुम केवल स्वर्गिक परमेश्वर में विश्वास करते हो, जबकि देहधारी परमेश्वर को—जिसे पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य सौंपा गया है—तुम स्वीकार नहीं करते। ऐसे में, तुम स्वर्गिक परमेश्वर द्वारा पृथ्वी पर आने के बाद किए गए कार्य और बोले गए वचनों को अस्वीकार कर रहे हो; तुम उस व्यक्ति को अस्वीकार कर रहे हो जो परमेश्वर पृथ्वी पर बना है, और इसलिए तुम जिस मार्ग पर चलते हो वह विनाश का मार्ग है। तुम चाहे स्वर्गिक परमेश्वर की कितनी भी आराधना और कितना भी आदर करो, परमेश्वर इसे स्वीकार नहीं करता या इसे मान्यता नहीं देता। तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो, वह विनाश का मार्ग है; इसे मृत्यु की कामना करना कहा जाता है। मृत्यु की कामना करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि तुमने जो बुराई की है, वह बहुत बड़ी है और उसके कारण तुम्हें सजा मिल सकती है; यह दुर्भाग्य को बुलावा देना है। तुम जिस मार्ग पर चलते हो और अभ्यास का जो मार्ग तुम अपनाते हो, वे गलत हैं। तुम खुद को परमेश्वर के खिलाफ खड़ा कर रहे हो, तुम परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हो रहे हो। ऐसा मत सोचो : “मैं स्वर्गिक परमेश्वर पर भरोसा करता हूँ। देहधारी परमेश्वर बस एक साधारण व्यक्ति है। वह जो वचन बोलता है मैं उन्हें स्वीकार करता हूँ, लेकिन जहाँ तक स्वयं उस व्यक्ति की बात है, मैं यह स्वीकार नहीं करता कि वह मसीह है, कि वह परमेश्वर है। वह परमेश्वर की पहचान का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है? मैं बस यह स्वीकार नहीं करता कि वह पृथ्वी पर परमेश्वर है। स्वर्गिक परमेश्वर के अलावा कोई अन्य परमेश्वर नहीं है।” यदि तुम ये बातें कहते हो, तो तुम मुसीबत में हो। तुम विनाश के मार्ग पर चल रहे हो; यह मृत्यु की कामना करना है। क्या इतिहास में ऐसे लोग थे, जिन्होंने “मृत्यु की कामना की थी”? क्या ऐसे लोग थे, जो स्पष्ट रूप से विनाश के मार्ग पर चले थे? क्या पौलुस उनमें से एक था? (हाँ।) पौलुस ऐसा ही व्यक्ति था और वे शास्त्री, फरीसी और महायाजक भी ऐसे ही थे। वे केवल यहोवा के नाम में विश्वास करते थे और केवल स्वर्गिक परमेश्वर में विश्वास करते थे। जब परमेश्वर देहधारी हुआ और पृथ्वी पर आया, तो उन्होंने देखा कि प्रभु यीशु बस एक साधारण व्यक्ति है और वह भी एक गरीब बढ़ई का बेटा, और इसलिए उन्होंने किसी भी सूरत में उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया : “मैं बस तुम्हें स्वीकार नहीं करूँगा। मैं केवल स्वर्गिक परमेश्वर में विश्वास करता हूँ!” और स्वर्गिक परमेश्वर ने उनसे क्या कहा? “तुम जरूर मृत्यु की कामना कर रहे हो!” वही वाक्यांश जिसका मैंने अभी उपयोग किया। परिणाम क्या हुआ? तथ्य साबित करते हैं कि उन्होंने मृत्यु की कामना की थी, है ना? (हाँ, की थी।) क्या तुम लोग ऐसे मार्ग पर चलना चाहते हो? (नहीं।) तो ऐसे मार्ग पर मत चलो। यदि तुम पहले ऐसे मार्ग पर चले हो, तो जल्दी करो और वापस लौटो, पश्चात्ताप करो और अपने पाप स्वीकार करो; अब भी वापस लौटने में बहुत देर नहीं हुई है। लेकिन तुम लोगों को “जरूर तुम मृत्यु की कामना कर रहे हो” वाक्यांश का लापरवाही से उपयोग नहीं करना चाहिए। जब भी तुम लोग इसे कहते हो, तो इसमें उतावलापन होता है। अपराध की दुनिया के लोग अक्सर कहते हैं, “तुम जरूर मृत्यु की कामना कर रहे हो!” उनके कहने का अर्थ यह होता है कि वे किसी को मारना चाहते हैं। लेकिन जब मैं यह कहता हूँ, तो यह उनके कहने से अलग होता है। जब मैं यह कहता हूँ, तो इसमें कोई उतावलापन नहीं होता और मैं कोई कठोर बात कहने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ। मैं बस तुम्हें याद दिलाना चाहता हूँ : पौलुस के मार्ग पर मत चलो; इसका अर्थ मृत्यु की कामना करना होगा, और यह विनाश का मार्ग है। यदि तुम इस मार्ग पर चलोगे, तो नष्ट हो जाओगे और तुम्हारा वही परिणाम होगा जो पौलुस का हुआ था; वह बहुत भयानक होगा। पौलुस ने उस समय अनेक सत्य नहीं सुने थे। उसका मृत्यु की कामना करना उसकी अपनी गलती थी और यह उसकी प्रकृति द्वारा निर्धारित था। लेकिन अब तुम्हारे पास पौलुस की चेतावनी भरी कहानी है, इसलिए तुम लोगों को मृत्यु की कामना नहीं करनी चाहिए—विनाश के उस मार्ग पर मत चलो। देहधारण का सत्य अब बहुत स्पष्टता से समझाया जा चुका है, और उद्धार पाने के बारे में विभिन्न सत्य भी बहुत स्पष्टता से समझाए जा चुके हैं। यदि तुम अब भी जानबूझकर देहधारी परमेश्वर का विरोध करते हो और उसे स्वीकार करने से हठपूर्वक इनकार करते हो, तो क्या यह मृत्यु की कामना करना नहीं है? यह साबित करता है कि तुम पौलुस जैसे ही व्यक्ति हो। तुम लोगों को इस मार्ग पर बिल्कुल नहीं चलना चाहिए!
अब जबकि मैंने इतनी संगति कर ली है, क्या तुम्हें यह स्पष्ट हो गया है कि तुम लोगों को देहधारी परमेश्वर के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए और देहधारी परमेश्वर और स्वर्गिक परमेश्वर के बीच का संबंध कैसे ठीक से सँभालना चाहिए? (हाँ।) तो इस संबंध में क्या सिद्धांत हैं? कितने सिद्धांत हैं? इसका सारांश दो। (आज परमेश्वर की संगति के माध्यम से पहला सिद्धांत जो मैं समझ पाया हूँ, वह देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता को स्वीकार करना और परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह की सामान्य मानवता के साथ सही ढंग से पेश आना है, जिसमें उसकी सामान्य मानवता के भीतर उसकी बुनियादी जरूरतों और चुनावों के साथ सही ढंग से पेश आना शामिल है। एक अन्य सिद्धांत यह है कि पृथ्वी पर परमेश्वर के पास परमेश्वर का सार है, इसलिए अगर वह सत्य व्यक्त कर सकता है और लोगों को बचा सकता है, तो हमें उसे स्वीकार करना चाहिए और उसके प्रति समर्पण करना चाहिए। यह महत्वपूर्ण है।) मैं कुछ और बातों पर जोर देना चाहता हूँ। सिद्धांत रूप में, देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता में सत्य शामिल नहीं है, न ही इसमें वह कार्य शामिल है जिसे परमेश्वर करना चाहता है। सटीक रूप से कहूँ तो, सामान्य मानवता उन चीजों को संदर्भित करती है, जो देहधारी परमेश्वर के जीवन के दायरे में हैं। जहाँ तक इस व्यक्ति की बात है—उसे क्या पसंद है, उसका व्यक्तित्व, वह जिन भावनाओं का अनुभव करता है, साथ ही जीवन और समाज के संबंध में उसके विभिन्न मत, दृष्टिकोण, समझ, चुनाव और अन्य चीजें—मानवता के दृष्टिकोण से आकलन करने पर, क्या उसकी ये अभिव्यक्तियाँ सामान्य मानवता के जमीर और तर्कसंगतता के अनुरूप हैं? (हाँ।) जो लोग “हाँ” कहते हैं, उन्हें इसके लिए जिम्मेदारी लेनी चाहिए। तुम्हें स्पष्ट रूप से समझाना चाहिए : तुम्हारी यह “हाँ” कहाँ से आती है? क्या यह धर्म-सिद्धांत है, दूसरों की हाँ में हाँ मिलाना है या क्या तुम्हें सचमुच इसका अनुभव और ज्ञान है? (परमेश्वर, मेरा दृष्टिकोण यह है कि, चाहे परमेश्वर सामान्य मानवता को जीने में हमारा मार्गदर्शन करे या हमारे सामने आने वाले कुछ लोगों, घटनाओं और चीजों का भेद पहचानने में हमारी मदद करे, यह सब हमें बताता है कि सामान्य मानवता को कैसे जिएँ और ईमानदार लोग कैसे बनें; यह सब हमें सही मार्ग पर ले जा रहा है। इसलिए, परमेश्वर द्वारा सभी पहलुओं में लोगों का मार्गदर्शन उनके लिए लाभदायक है।) मैं यह कहने में तो सावधानी बरतूँगा कि यह सब लोगों के लिए लाभदायक है, लेकिन कम से कम, मेरा मानना है कि “सामान्य मानवता” में “सामान्य” शब्द समझाने लायक है। तो “सामान्य” को कैसे समझाया जाना चाहिए? एक लिहाज से, इसका अर्थ यह है कि देहधारी परमेश्वर जिस परिप्रेक्ष्य और रुख से लोगों, घटनाओं और चीजों को देखता है, वे सही हैं। मैं अपनी संगतियों में पहले ही इस बारे में बात कर चुका हूँ कि मैं सभी प्रकार के लोगों और सभी प्रकार की चीजों के साथ कैसा व्यवहार करता हूँ। यह कहा जा सकता है कि दुनिया पर, मानवजाति पर और विभिन्न बुरी प्रवृत्तियों और वैचारिक प्रवृत्तियों पर मेरे विभिन्न विचार एक व्यक्ति के रूप में मेरे अपने हैं, लेकिन यह भी कहा जा सकता है कि वे परमेश्वर से आते हैं। यहाँ इन चीजों के बारे में विस्तार से बताना संभव नहीं है—तुम लोग खुद धीरे-धीरे इन पर विचार करो। देहधारी परमेश्वर जिस रुख और परिप्रेक्ष्य से लोगों, घटनाओं और चीजों को देखता है, वे सामान्य हैं—यह एक लिहाज से है। दूसरे लिहाज से, विभिन्न चीजों की अपनी समझ से वह जो दृष्टिकोण और विचार विकसित करता है, वे सामान्य हैं; वे विकृत या चरम नहीं हैं। मैं यह कहने का साहस नहीं करूँगा कि मेरे तुम लोगों के साथ रहने और मिलने-जुलने के दौरान मेरी सामान्य मानवता के प्रकाशनों से तुम लोगों को कितना लाभ हो सकता है या यह कि वे तुम लोगों को वही लाभ दे सकते हैं जो सत्य देता है, लेकिन कम से कम, मैं तुम लोगों को नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा। एक सबसे बुनियादी बात भी है, जो यह है कि अपने व्यक्तिगत विचारों और इच्छाओं से मैं कभी किसी को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहता। यदि मैं देखता हूँ कि तुम अपनी बातचीत में गलतियाँ करते हो या तुम्हारे जीने के तरीके, जीने की आदतें या जीवन के प्रति रवैये गलत हैं—उदाहरण के लिए, किसी प्रकार का खाना खाने के बारे में तुम्हारी समझ विकृत है—तो मैं तुमसे बात करूँगा और तुम्हारे विचार और दृष्टिकोण सही करूँगा। एक लिहाज से, सामान्य मानवता की समझ से मैं तुम्हारी जीने की कुछ गलत आदतें सुधारने में मदद करता हूँ, ताकि तुम्हारे विचार और दृष्टिकोण सही हों और तुम इस मामले को तर्कसंगत ढंग से ले सको। दूसरे, अधिक गहरे लिहाज से, मैं ऐसा इसलिए करता हूँ ताकि तुम कुछ सत्य समझने और उनमें प्रवेश करने में सक्षम हो सको। यह भी देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता की एक अभिव्यक्ति है। इसके अलावा, सामान्य मानवता में परमेश्वर के जीवन की विभिन्न जरूरतें और जैसे वह सभी प्रकार के लोगों के साथ मिलता-जुलता है वह भी सामान्य है। यह “सामान्य” किस चीज को संदर्भित करता है? क्या तुम लोगों ने कभी मुझे किसी को धौंस देते हुए, किसी को नुकसान पहुँचाते हुए, किसी को दबाते हुए या किसी को धोखा देते हुए सुना है? (नहीं।) मैंने वास्तव में कभी ऐसी चीजें नहीं की हैं। अपनी पहचान और रुतबे के साथ क्या मेरे लिए कुछ कठोर शब्द कहना या किसी को दबाना बहुत आसान न होता? मेरा ऐसा करना मेरे अधिकारों के भीतर होता, लेकिन मैंने वास्तव में कभी किसी को धौंस नहीं दी है, किसी के साथ झगड़ा नहीं किया है, किसी के साथ विवाद नहीं किया है या पीठ पीछे किसी के बारे में बखेड़ा खड़ा नहीं किया है—मेरी कभी इनमें से कोई अभिव्यक्ति नहीं रही। लोगों के बीच होने पर मैं बस उनसे सामान्य रूप से मिलता-जुलता हूँ; मैं अच्छी मानवता वालों के थोड़ा करीब जाता हूँ और बुरी मानवता वालों से दूर रहता हूँ। जब मैं कर सकता हूँ तब मदद करता हूँ और जब नहीं कर सकता तब चीजों को उनके स्वाभाविक क्रम में होने देता हूँ। सामान्य मानवता की इन अभिव्यक्तियों के संबंध में—चाहे वे मेरी भावनाएँ हों या जीने की आदतों की श्रेणी हो या लोगों से मिलने-जुलने के मेरे तरीके और सिद्धांत हों—तुम लोग जो देख सकते हो, जिसके संपर्क में आ सकते हो, जिसे समझ सकते हो और प्रत्यक्ष रूप से जान सकते हो, उससे क्या तुम लोगों को कोई ऐसा पहलू दिखाई देता है जो असामान्य हो? (कुछ भी असामान्य नहीं है; यह सब वास्तव में व्यावहारिक है।) “यह सब वास्तव में व्यावहारिक है”—हो सकता है कुछ लोग इसे अच्छी तरह न समझें, इसलिए मैं तुम्हें सही कर दूँ : देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता की इन सभी अभिव्यक्तियों में सिद्धांत हैं; इनमें कुछ भी खोखला या दिखावटी नहीं है। मेरा मानना है कि मैं कभी दिखावा नहीं करता और मुझे आदेश जारी करना बहुत नापसंद है; बल्कि, मुझे वास्तविक कार्य करना पसंद है। मैं जो कुछ भी जानता और समझता हूँ, वह सब सिखाता हूँ, कुछ भी छिपाकर नहीं रखता। देखो, जब मैं किसी ऐसी मद के बारे में तुम लोगों को सिखाता हूँ जिसमें पेशेवर कौशल शामिल होते हैं, तो मैं जितना जानता हूँ उतना कहता हूँ। क्या मैंने कभी कुछ छिपाकर रखा है? (नहीं, तुमने नहीं रखा है।) मैं चीजों को छिपाकर या दबाकर नहीं रखता; मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करने और तुम्हें सिखाने की पूरी कोशिश करता हूँ। तुम बहुत गंभीरता से सीखते हो, बहुत मेहनत करते हो और बहुत कष्ट सह सकते हो, और अंत में, तुम उस चीज में महारत हासिल कर लेते हो जो मैंने सिखाई है और स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकते हो, अब तुम्हें मेरे मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं रहती। इससे बहुत खुशी होती है और मुझे ईर्ष्या महसूस नहीं होती। यहाँ तक कि मैं तुम्हें स्वतंत्र रूप से काम करने के लिए प्रोत्साहित भी करता हूँ और मैं चाहता हूँ कि तुम उपलब्धियाँ प्राप्त करो। जब तुम उपलब्धियाँ प्राप्त करते हो और हर व्यक्ति तुम्हारी प्रशंसा करता है, तो मैं तुम्हें बधाई भी देता हूँ। जब तुम मुझसे चीजें सीखते हो और उपलब्धियाँ प्राप्त करते हो और हर कोई तुम्हारी इज्जत करता है, तो इससे साबित होता है कि तुम सक्षम हो और मैं सचमुच ईर्ष्यालु नहीं होता; मैं तुम्हारी वाहवाही लूटने की कोशिश नहीं करता, न ही मैं तुमसे श्रेय लेने की कोशिश करता हूँ। मैं यह नहीं कहूँगा, “तुम सबको यह क्यों नहीं बताते कि तुमने यह मुझसे सीखा है? तुम मेरे प्रति आभारी क्यों नहीं होते?” मैं कहता हूँ, “मैंने बस सिद्धांतों पर संगति की और बहुत ज्यादा नहीं सिखाया; यह तुम ही हो जिसने इसे अच्छी तरह समझा।” देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता के भीतर कई व्यावहारिक चीजें हैं और इस व्यावहारिकता के भीतर कई ठोस चीजें हैं। शायद मेरे इस तरह से अपना परिचय देने से, तुम लोगों में से जो मेरे साथ मिले-जुले हैं, वे धीरे-धीरे समझ जाएँगे। लोगों के साथ अपनी बातचीत में मैं बहुत सरल हूँ; मैं स्पष्टवादी हूँ, मैं कोई चाल नहीं चलता, मैं लोगों के खिलाफ साजिश नहीं रचता और मैं लोगों का उपयोग नहीं करता, काम करते समय दूसरों पर अपने रुतबे का रोब दिखाना या कोई व्यक्तिगत लाभ प्राप्त करने के लिए अपने रुतबे के फायदों का उपयोग करना तो दूर की बात है। यदि तुम मेरी लल्लो-चप्पो और चापलूसी करने की कोशिश करते हो, तो मैं काफी असहज और बेचैन महसूस करता हूँ और मुझे तुमसे दूर रहना पड़ता है। यदि तुम मेरी लल्लो-चप्पो या चापलूसी करने की कोशिश किए बिना मेरे साथ सामान्य रूप से मिलते-जुलते हो, तो मैं काफी सहज महसूस करता हूँ और मैं तुम्हारे साथ मिलने-जुलने के लिए पूरी तरह तैयार रहता हूँ।
लोगों के साथ मिलने-जुलने के अपने वर्षों में इतने समय तक जीने के बाद मैं अपनी सामान्य मानवता में सभी प्रकार के काफी लोगों के संपर्क में आया हूँ। मैंने उन सभी को देखा है—बड़ी जटिलता वाले लोग और बड़ी मूर्खता वाले लोग; बड़े घमंड और अतर्कसंगतता वाले लोग और बड़ी बुराई वाले लोग। बाद में, धीरे-धीरे, मैंने पाया कि लोग वास्तव में एक-दूसरे से अलग होते हैं। लोगों के साथ अपने मेलजोल में मैं सरल हूँ; मैं बहुत ही सरलता और स्पष्टता से बोलता हूँ और मैं खुल भी सकता हूँ। फिर भी, सभी प्रकार के लोगों का सामना करते हुए मैंने देखा कि मानवता भीतर से बहुत अधिक जटिल है। लेकिन मैं चाहे कितने भी जटिल लोगों का सामना करूँ, अपनी सामान्य मानवता में कोई चीज व्यक्त करते समय या कोई मामला हल करते समय मेरा रुख, सिद्धांत, तरीके और व्यक्तिगत प्राथमिकताएँ कभी नहीं बदलतीं। मैं चाहे किसी भी तरह के लोगों से निपटूँ, अंततः, मैं लोगों के साथ जिस तरह से व्यवहार करता हूँ, वह उन सिद्धांतों पर आधारित होता है जो पहले से ही मेरे भीतर हैं। यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अनुसरण करता है और जिसमें मानवता है, तो हम अधिक मिल-जुल सकते हैं, अधिक संपर्क में आ सकते हैं और अधिक संगति कर सकते हैं, दिल से दिल की बात कर सकते हैं। यदि तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो सत्य का अनुसरण करता है, तुम अपना कर्तव्य नहीं करते और तुम्हारी मानवता बहुत बुरी है, तो मैं तुम्हारे साथ संपर्क और मेलजोल कम रखने की पूरी कोशिश करूँगा; मैं बस उतना ही करता हूँ, जितना शिष्टता बनाए रखने के लिए पर्याप्त हो। यदि तुम सत्य खोज सकते हो और समस्याएँ होने पर ईमानदारी से खोजते हो, तो मैं तुम्हारे साथ संगति कर सकता हूँ, लेकिन तुम इसे स्वीकार कर सकते हो या नहीं, यह तुम्हारा अपना मामला है। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो दुर्भावनापूर्ण इरादे या द्वेष रखते हैं, मेरे पास उन्हें सँभालने और उनके साथ व्यवहार करने के उपयुक्त तरीके और सिद्धांत भी हैं। बाहर से, उनके साथ मेरे व्यवहार करने का तरीका नहीं बदलता; मैं अभी भी उन वचनों की संगति करता हूँ और अभी भी ये चीजें करता हूँ और यह अभी भी मेरी सामान्य मानवता का प्रकाशन है—लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं यह नहीं देख सकता कि वे किस तरह के व्यक्ति हैं। बाहर से, तुम देखते हो कि मैं हमेशा ऐसा ही हूँ, लोगों के साथ व्यवहार करने में सरल, सामान्य मानवता में हर व्यक्ति के साथ तर्कसंगत ढंग से व्यवहार करता हूँ। यह वह है जो तुम बाहर से देखते हो, लेकिन क्या तुम जानते हो कि मैं अपने हृदय में उनके बारे में क्या सोचता हूँ? इस तरह के व्यक्ति के संबंध में मेरे सिद्धांत और विचार हैं। ये सिद्धांत और विचार क्या हैं? यदि मैं अपनी सामान्य मानवता के जमीर और विवेक के परिप्रेक्ष्य से उनका आकलन करूँ तो, उनकी समस्या कोई बड़ी समस्या नहीं है; लेकिन यदि मैं अपनी दिव्यता के परिप्रेक्ष्य से वह मार्ग, जिस पर वे चलते हैं और उनके भविष्य का परिणाम देखूँ, तो उनकी समस्या बहुत गंभीर है। इसलिए, मेरे साथ, कभी-कभी मेरी सामान्य मानवता और मेरी दिव्यता के बीच सामंजस्य बिठाया जा रहा होता है। जब मैं उनके बीच सामंजस्य बिठा रहा होता हूँ, तब हो सकता है कि मैं तुम्हारे प्रति उदार हो रहा हूँ, तुम्हें एक अवसर दे रहा हूँ, तुम्हारा अवलोकन कर रहा हूँ और तुम्हारे वापस मुड़ने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, और यह भी हो सकता है कि स्वर्गिक परमेश्वर तुम्हें एक अवसर दे रहा हो। मेरे साथ, यह मेरी सामान्य मानवता और मेरी दिव्यता के बीच सामंजस्य की एक प्रक्रिया है। मैं तुम्हारे संपर्क में आने का इच्छुक नहीं हूँ, लेकिन चूँकि, शायद, तुमने प्रशासनिक आदेशों या परमेश्वर के घर के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं किया है, इसलिए तुम अभी भी परमेश्वर के घर में हो। जहाँ तक मेरा संबंध है, अपनी मानवता के परिप्रेक्ष्य से, मैं तुम्हारे साथ धैर्य रख सकता हूँ और तुमने जो किया उसका मुद्दा नहीं बना सकता, लेकिन अपनी दिव्यता के परिप्रेक्ष्य से मैं तुम्हें पहले ही दोषी ठहरा चुका हूँ। जब मैं लोगों को दोषी ठहरा रहा होता हूँ और साथ ही उन्हें बख्श रहा और क्षमा कर रहा होता हूँ और चीजों को नजरअंदाज कर रहा होता हूँ, तब कुछ लोग परमेश्वर द्वारा उजागर कर दिए जाते हैं और अन्य लोग बड़ी बुराई करते हैं, गंभीर परिणाम लाते हैं और निष्कासित कर दिए जाते हैं। जब मैं प्रतीक्षा करता हूँ, तब कुछ लोग अभी भी परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य करते हैं। अपने कर्तव्य करने के दौरान वे धीरे-धीरे चीजों को सकारात्मक दिशा देते हैं, बदलते हैं और सत्य की ओर प्रयास करते हैं; वे अपने हृदय में वापस मुड़ते हैं। अपनी सामान्य मानवता के परिप्रेक्ष्य से मैं—जब उचित हो—वापस मुड़ने वालों के साथ मेलजोल और वार्तालाप कर सकता हूँ, उन्हें कुछ संगति और मदद दे सकता हूँ। लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान कुछ लोग अभी भी बिल्कुल नहीं बदलते। उनकी अभी भी पहले जैसी ही अभिव्यक्तियाँ होती हैं, वे सत्य का अनुसरण नहीं करते और अभी भी अपने मूल मार्ग पर चलते हैं। तब, मेरे परिप्रेक्ष्य से, तुमने मेरे साथ चाहे जो भी किया हो या तुम मुझे चाहे जैसे भी देखते हो, मैं तुम्हें बस ऐसा व्यक्ति समझता हूँ जो परमेश्वर में विश्वास करता है। हालाँकि, मेरी सामान्य मानवता के आकलन में, चूँकि तुम अभी भी नहीं बदले हो, इसलिए भविष्य में तुम्हारे लिए ऐसा करना बहुत मुश्किल होगा। दरअसल, मेरी दिव्यता में यह पहले ही निर्धारित किया जा चुका है कि ऐसा व्यक्ति उस प्रकार का है जो नष्ट हो जाएगा और वह विनाश का पात्र है और उसके लिए बदलना मूलभूत रूप से असंभव है। लेकिन यह इसे मेरी दिव्यता के परिप्रेक्ष्य से देखना है। मानवता की, आखिरकार, अपनी सीमाएँ हैं—कभी-कभी, अपने जमीर या तर्कसंगतता की सीमाओं के तहत देहधारी परमेश्वर के कुछ मानवीय अच्छे इरादे होंगे और वह लोगों के लिए सर्वश्रेष्ठ की आशा करेगा; वह आशा करेगा कि कुछ लोग एक निश्चित अवधि के दौरान या भविष्य के किसी निश्चित मामले में या किसी बड़ी घटना के दौरान खुद को बदल लेंगे—शायद वे बदलने में सक्षम होंगे। ऐसी परिस्थितियों में वह कुछ लोगों को उनके साथ व्यवहार करने के तरीके के संदर्भ में अवसर देता है।
एक लिहाज से, देहधारी परमेश्वर की यह सामान्य मानवता उसकी दिव्यता के कुछ कार्यों में सहयोग कर रही है या कुछ मत और दृष्टिकोण व्यक्त कर रही है। दूसरे लिहाज से, यह सहायता भी प्रदान कर रही है या लोगों के कुछ सार, प्रकृतियाँ या मार्ग लगातार सत्यापित कर रही है, जिन्हें परमेश्वर की दिव्यता देखती है। इसलिए, देहधारी परमेश्वर की यह सामान्य मानवता केवल मसीह और मनुष्य के पुत्र की सेवकाई का भार उठाने के लिए नहीं है। लोगों के लिए जो अधिक महत्वपूर्ण है, वह यह है कि यह उन्हें स्वर्गिक परमेश्वर की अधिक समझ प्राप्त करने में सक्षम बनाती है। यानी, यह लोगों को स्वर्गिक परमेश्वर को बेहतर ढंग से समझने और देहधारी परमेश्वर से उसका सार अधिक देखने के और अधिक अवसर देती है। एक और लिहाज से, यह भ्रष्ट मानवजाति और स्वर्गिक परमेश्वर के बीच के संबंध में बेहतर सामंजस्य बिठाने का काम करती है। शायद तुम लोग “सामंजस्य बिठाना” शब्द अच्छी तरह नहीं समझते। यदि तुम इसे नहीं समझते, तो कुछ नहीं किया जा सकता; इससे अधिक उपयुक्त कोई शब्द नहीं है। मैं एक उदाहरण दूँगा। जब तुम परमेश्वर के इरादों या परमेश्वर की अपेक्षाओं के किसी निश्चित पहलू के बारे में धारणाएँ विकसित कर लेते हो, तो तुम ये इरादे या अपेक्षाएँ स्वीकार नहीं कर सकते। तुम्हारे मन में विचार आने लगते हैं और तुममें विद्रोहीपन विकसित हो जाता है और फिर तुम समर्पण करने में असमर्थ हो जाते हो। इस समय, देहधारी परमेश्वर तुम्हारी कठिनाइयाँ और कमजोरियाँ समझता है और उनके प्रति विचारशीलता दिखाता है। वह कुछ वचन बोलता है, कुछ कार्य करता है और कुछ उदाहरण देता है। संगति के माध्यम से वह यह देखने में तुम्हारी मदद करता है कि परमेश्वर के इरादे क्या हैं, परमेश्वर के प्रति तुम्हारे रवैये में कहाँ त्रुटियाँ हैं और परमेश्वर के प्रति समर्पण हासिल करने के लिए तुम्हें इस विद्रोही दशा को कैसे उलटना चाहिए। देहधारी परमेश्वर की मानवीकृत संगति या मानवीकृत मदद और समर्थन के माध्यम से परमेश्वर के बारे में तुम्हारी धारणाएँ और गलतफहमियाँ दूर हो जाती हैं। बाद में परमेश्वर के प्रति तुम्हारे रवैये में कुछ बदलाव आता है; यह विद्रोही और अवज्ञाकारी होने से समर्पण करने के लिए तैयार होने में बदल जाता है। तब तुम खुद को जानने लगते हो, खुद से नफरत करने लगते हो और यह समझने लगते हो कि परमेश्वर का इस तरह से कार्य करना उचित है और परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादे हैं। देहधारी परमेश्वर अपनी ऐसी संगति, सामंजस्य, समर्थन और मदद के माध्यम से स्वर्गिक परमेश्वर का स्वभाव, सार और इरादे क्या हैं, इसका परिचय देकर तुम्हें परमेश्वर के इरादे समझने में सक्षम बनाता है और वह तुम्हें यह जानने में भी सक्षम बनाता है कि तुम कहाँ गलत हो और पश्चात्ताप कैसे करना है। एक बार जब इन दो पहलुओं पर स्पष्ट रूप से संगति कर ली जाती है और तुम अंततः उस बिंदु पर पहुँच जाते हो जहाँ तुम अब परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह या उसकी अवज्ञा नहीं करते और तुममें समर्पण करने की इच्छा होती है, तो तुम्हारे प्रति स्वर्गिक परमेश्वर का रवैया कुछ हद तक बदल जाएगा। वह अब तुम्हें दोषी नहीं ठहराएगा और अब तुमसे नफरत नहीं करेगा; तुम्हारे प्रति उसका क्रोध दूर हो जाएगा। एक बार जब परमेश्वर का क्रोध दूर हो जाता है, तो तुम अपने हृदय में शांति, आराम और आनंद महसूस करते हो; जब तुम फिर से प्रार्थना करने के लिए परमेश्वर के सामने आते हो, तो तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पास उससे कहने के लिए बातें हैं, तुम परमेश्वर की उपस्थिति महसूस करते हो और तुम्हारा हृदय शांत और सुकून में होता है। पुरानी बातें याद करने पर तुम्हें एहसास होता है कि तुम पहले परमेश्वर के प्रति बहुत विद्रोही थे और तुम्हारी अपनी इच्छा बहुत प्रबल थी, जिसके कारण परमेश्वर ने तुमसे नफरत की। तब तुम्हें पछतावा होता है और जब तुम भविष्य में फिर से ऐसी चीजों का सामना करते हो, तब तुम परमेश्वर के खिलाफ फिर कभी विद्रोह नहीं करोगे। देहधारी परमेश्वर की संगति और समर्थन के माध्यम से परमेश्वर के प्रति तुम्हारा रवैया पूरी तरह से बदल जाता है और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध पूरी तरह से बदलकर बेहतर हो जाता है, इस हद तक कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध अब अपनी पिछली अवस्था में नहीं रहता, बल्कि एक सकारात्मक दिशा में विकसित होता है। देखो, यदि देहधारी परमेश्वर ने ये वचन न बोले होते या यह कार्य न किया होता, तो शायद, अपनी इच्छा और अपनी प्रकृति को देखते हुए तुम हमेशा परमेश्वर के खिलाफ अवज्ञा की अवस्था में रहते। तब परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध में गतिरोध कायम रहता और वह ऐसे ही दुष्चक्र में बना रहता। क्या स्वर्गिक परमेश्वर तुम्हारे प्रति अपना रवैया इसलिए बदलेगा, क्योंकि तुम परमेश्वर के साथ इस तरह गतिरोध की स्थिति में बने हुए हो? यह असंभव होगा। यदि तुम परमेश्वर के साथ इस तरह गतिरोध की स्थिति में बने रहते हो, तो परमेश्वर तुमसे विमुख होने और तुमसे नफरत करने से आगे बढ़कर तुम्हें ठुकरा देगा। एक बार जब यह उस बिंदु पर पहुँच जाता है जहाँ वह तुम्हें ठुकरा देता है, तो क्या तुम्हारे पास अभी भी उद्धार प्राप्त करने का कोई अवसर होता है? (नहीं।) तुम्हारे पास कोई अवसर नहीं होगा और परमेश्वर तुम्हें त्याग देगा। एक बार जब वह तुम्हें त्याग देता है, तो एक विश्वासी के रूप में तुम्हारा जीवन वहीं समाप्त हो जाता है। मैं अब तुम्हें बचाना नहीं चाहूँगा और मुझे तुम्हारे संपर्क में आने की कोई आवश्यकता नहीं होगी। तुम्हें उन लोगों की श्रेणियों से पूरी तरह से बाहर निकाल दिया जाएगा, जिन्हें मैं बचाता हूँ। मैं तुम्हें दोबारा देखना नहीं चाहूँगा, क्योंकि जिस समय मैंने प्रतीक्षा की, तुमने कभी मार्ग नहीं बदला। तुम्हारे जमीर और विवेक ने काम नहीं किया और कोई भी तुम्हें मार्ग बदलने के लिए प्रेरित नहीं कर सका। मैंने तुम्हें इतने लंबे समय तक अवसर दिए, फिर भी तुमने मार्ग नहीं बदला। इसलिए, ऐसी स्थितियों में, यदि परमेश्वर और मनुष्य के बीच के संबंध में सामंजस्य बिठाने के लिए कोई सामने नहीं आता, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध छिन्न-भिन्न हो जाएगा। अंतिम परिणाम यह होगा कि परमेश्वर ठुकरा देगा, तुम परमेश्वर के चहरे के प्रकाश से हमेशा के लिए दूर हो जाओगे और तुम परमेश्वर की नजरों में अब एक सृजित प्राणी नहीं रहोगे; तब तुम पूरी तरह से नष्ट हो जाओगे। लेकिन देहधारी परमेश्वर की उपस्थिति तुम्हें परमेश्वर के साथ अपने संबंध में सामंजस्य बिठाने का अवसर देती है। यदि देहधारी परमेश्वर प्रकट न होता और कार्य न करता, तो एक बार जब लोगों और स्वर्गिक परमेश्वर के बीच के संबंध में गतिरोध आ जाता, तो वह आसानी से परमेश्वर द्वारा मानवजाति को ठुकराने का कारण बन जाता। लोगों के लिए परमेश्वर के साथ अपना संबंध मधुर बनाने के लिए किसी तीसरे पक्ष या बाहरी दुनिया से कोई अवसर या किसी प्रकार का संदेश प्राप्त करना असंभव होता। केवल देहधारी परमेश्वर ही यह भूमिका निभा सकता है और यह कार्य कर सकता है; वह स्वर्गिक परमेश्वर और मानवजाति के बीच सामंजस्य बिठाने वाला बन जाता है। ऐसे सामंजस्य के साथ पूरी मानवजाति परमेश्वर के देहधारण की अवधि के दौरान अनजाने ही कई और अवसर प्राप्त कर लेती है। ये अवसर लोगों के लिए उद्धार प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं और कोई भी इनके बिना काम नहीं चला सकता। चाहे तुम वर्तमान में सत्य का अनुसरण कर रहे हो या भविष्य में सत्य का अनुसरण करोगे, अगर तुम उद्धार प्राप्त करना चाहते हो, तो ये अवसर तुम्हारे लिए सबसे महत्वपूर्ण चीजें हैं। इसलिए, देहधारी परमेश्वर की यह भूमिका तुम्हारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है! देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता देहधारी परमेश्वर का एक अपरिहार्य हिस्सा है। केवल देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता ही ऐसा अवसर देख सकती है, ऐसा अवसर पकड़ सकती है, यह जान सकती है कि मानवजाति को ऐसे अवसर की आवश्यकता है और मानवजाति के लिए ऐसा अवसर सुरक्षित कर सकती है और फलस्वरूप लोगों और परमेश्वर के बीच गतिरोध में पड़े संबंध की समस्या हल कर सकती है। लेकिन यदि देहधारी परमेश्वर में सामान्य मानवता न होती और केवल दिव्यता होती, तो मनुष्य और परमेश्वर के बीच का संबंध मानवजाति और स्वर्गिक परमेश्वर के बीच का संबंध ही बना रहता। उस स्थिति में, यह कहा जा सकता है कि लोगों के लिए उद्धार प्राप्त करने का अवसर पाना और परमेश्वर के साथ अपना संबंध मधुर बनाना बहुत मुश्किल होता। चूँकि देहधारी परमेश्वर में सामान्य मानवता है और चूँकि इस सामान्य मानवता में मानवता का जमीर और विवेक है, इसलिए वह—सामान्य मानवता के जमीर और विवेक के दायरे में—देख सकता है कि लोगों और परमेश्वर के बीच उत्पन्न होने वाले विभिन्न संघर्षों के केंद्रबिंदु, कारण और मूल वजहें क्या हैं। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि ये संघर्ष और मूल समस्याएँ कैसे हल की जानी चाहिए ताकि लोगों और परमेश्वर के बीच फिर कोई संघर्ष न रहे और ताकि उनके संबंध में फिर गतिरोध न रहे, तो केवल सामान्य मानवता के जमीर और तर्कसंगतता के दायरे में रहने वाला मनुष्य का पुत्र—देहधारी परमेश्वर—ही इसे देख सकता है, वास्तव में यह समस्या हल कर सकता है और यह कार्य कर सकता है। इस तरह, परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करने की प्रक्रिया में और उद्धार प्राप्त करने की प्रक्रिया में लोग परमेश्वर के प्रति अपना विद्रोहीपन, परमेश्वर के खिलाफ अपनी अवज्ञा और परमेश्वर के प्रति अपना विरोध लगातार हल कर सकते हैं, है ना? (हाँ।) जैसे-जैसे तुम परमेश्वर के प्रति विद्रोहीपन, विरोध और अवज्ञा की ये समस्याएँ हल करते हो, परमेश्वर लगातार तुम्हें क्षमा करता है, तुम्हें स्वीकार करता है और तुम्हें मान्यता प्रदान करता है। तुम विद्रोहीपन, विरोध और अवज्ञा से लगातार अपने पाप स्वीकार करने और पश्चात्ताप करने और फिर सत्य स्वीकार करने की इच्छा रखने, सच्चा समर्पण प्राप्त करने और परमेश्वर के खिलाफ फिर विद्रोह न करने पर जाते हो। इस प्रक्रिया में तुम्हें परमेश्वर द्वारा क्षमा कर दिया जाता है और फिर तुम सत्य प्राप्त करते हो, धीरे-धीरे परमेश्वर के सामने आते हो, धीरे-धीरे परमेश्वर के साथ अपना संबंध सुधारते हो और धीरे-धीरे परमेश्वर द्वारा स्वीकार किए जाते हो। देखो, यहाँ अंतिम लाभार्थी कौन है? (लोग।) लोगों को बहुत लाभ होता है! यह प्रक्रिया तुम्हें जीने की आशा और बचे रहने की आशा दिखाती है। लेकिन देहधारी परमेश्वर द्वारा अपना कार्य करने से पहले लोगों में परमेश्वर के बारे में कई धारणाएँ और कल्पनाएँ थीं, साथ ही सभी प्रकार का विद्रोहीपन भी था; मनुष्य और परमेश्वर के बीच के संबंध में कई समस्याएँ थीं। जिस अवधि में देहधारी परमेश्वर ने कार्य किया है और बहुत सारे सत्य व्यक्त किए हैं, मानवजाति की ये समस्याएँ धीरे-धीरे हल हो गई हैं। परमेश्वर के प्रति लोगों के दृष्टिकोण, रवैये, रुख और परिप्रेक्ष्य धीरे-धीरे सुधरे हैं, और जैसे-जैसे वे धीरे-धीरे सुधरे हैं, परमेश्वर के प्रति लोगों के रवैये भी बदल गए हैं। जब लोग बदलेंगे, तभी परमेश्वर धीरे-धीरे उन्हें मान्यता प्रदान करेगा, धीरे-धीरे उन्हें स्वीकार करेगा और पसंद करेगा और धीरे-धीरे उनके प्रति अपनी नफरत, घृणा, अस्वीकृति और अपने शाप छोड़ देगा। यदि परमेश्वर देह न बना होता, तो तुमने इन वर्षों में परमेश्वर में अपने विश्वास में चाहे कितनी भी ऊर्जा लगाई हो या कितनी भी कीमत चुकाई हो, क्या तुम ये लाभ प्राप्त कर पाते? (नहीं।) देहधारी परमेश्वर के बिना लोगों और परमेश्वर के बीच का संबंध कभी न सुधरता। देहधारी परमेश्वर के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसमें सामान्य मानवता है और वह सामान्य मानवता के भीतर रहता है। केवल सामान्य मानवता के भीतर रहकर, सामान्य मानवता का जमीर और तर्कसंगतता रखकर और सही ढंग से सोचने, न्याय करने और निर्णय लेने में सक्षम होकर, साथ ही सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों को समझकर और जानकर ही वह सामान्य रूप से, थोड़ा-थोड़ा करके, लोगों के लिए आवश्यक विभिन्न सत्य प्रदान कर सकता है, ताकि लोग धीरे-धीरे परमेश्वर द्वारा स्वीकार किए जा सकें और मान्यता प्राप्त कर सकें। केवल इसी तरह से लोग अपने विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों से बाहर आ सकते हैं, परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करना बंद कर सकते हैं और परमेश्वर की अवज्ञा करने के लिए शैतान के बंधन में जीना बंद कर सकते हैं, बल्कि इसके बजाय, परमेश्वर द्वारा सत्य व्यक्त करने की प्रक्रिया में—यानी, परमेश्वर द्वारा अपना कार्य करने की प्रक्रिया में—वे धीरे-धीरे परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण और परमेश्वर का सच्चा भय रखना सीख जाते हैं। इस प्रकार, तुम इसे चाहे जैसे भी देखो, मानवजाति के लिए देहधारी परमेश्वर का महत्व बहुत अधिक है!
देहधारी परमेश्वर का मुख्य प्रतिनिधित्व देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता है और यह सामान्य मानवता अपरिहार्य है। इसलिए, यदि देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता के बारे में तुम्हारी कई धारणाएँ हैं जिन्हें तुम कभी नहीं छोड़ सकते, और तुम अक्सर देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से करते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम पूरी तरह से मानवता से रहित हो। तुमने परमेश्वर की इस सामान्य मानवता से बहुत कुछ प्राप्त किया है, फिर भी तुम यह नहीं जानते कि तुमने सत्य के ये विभिन्न पहलू कैसे प्राप्त किए। क्या तुम अंधे नहीं हो? तुम जमीर से रहित हो, है ना? (हाँ।) तुम जमीर से रहित हो और नहीं जानते कि चीजें कैसे काम करती हैं। कुछ लोग कहते हैं, “यदि परमेश्वर बोलने और कार्य करने के लिए देह न बना होता, तो हमने बहुत पहले ही उद्धार प्राप्त कर लिया होता और हम बहुत पहले ही परमेश्वर के सामने उठा लिए गए होते।” क्या ये चीजें भ्रामक नहीं हैं? क्या ऐसी बातें कहना बहुत बेतुका नहीं है? (हाँ।) इन वर्षों में देहधारी परमेश्वर के वचनों और कार्य के बिना क्या तुम लोग आज भी जीवित होते? इसलिए, यदि इतने वर्षों तक देहधारी परमेश्वर का अनुसरण करने के बाद और इतने वर्षों तक उसे सत्य की संगति करते हुए सुनने के बाद तुमने गहराई से यह महसूस किया और समझा है, “देहधारी परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य मेरे लिए बहुत लाभदायक है! मुझे वास्तव में बहुत लाभ हुआ है!”—यदि तुम वास्तव में इसे समझ सकते हो, तो यह क्या दर्शाता है? यह दर्शाता है कि तुम्हारे पास जमीर है और तुम्हारी समझ सही है। जमीर और विवेक से रहित लोग अभी भी इसे नहीं समझ सकते, जो खतरनाक है। यदि वे इसे अभी तक नहीं समझे हैं, तो क्या वे इसे अगले बीस वर्षों में समझ पाएँगे? निश्चित रूप से नहीं। यह स्पष्ट है कि ऐसा व्यक्ति जमीर से रहित है। न केवल वह यह नहीं समझ सकता कि देहधारी परमेश्वर के सभी वचन और कार्य लोगों के लिए उद्धार हैं, बल्कि वे यह भी कहेंगे, “इतने वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करने से मुझे क्या मिला है?” परमेश्वर ने बहुत सारे सत्य व्यक्त किए हैं—क्या तुमने उन्हें प्राप्त नहीं किया है? क्या तुम्हें नहीं लगता कि सत्य सबसे कीमती चीज है? यदि तुम्हें नहीं लगता कि सत्य सबसे कीमती चीज है, तो तुम सच्चे विश्वासी नहीं हो; तुम बस मुफ्तखोर हो। यदि तुमने यह महसूस नहीं किया है कि तुमने सत्य प्राप्त किया है, तो तुम्हारे पास जमीर नहीं है। क्या जमीर से रहित व्यक्ति इंसान है? (नहीं।) जमीर से रहित व्यक्ति इंसान नहीं है। देखो, कोई जानवर चाहे कितने भी साल जिए, वह कभी नहीं जानेगा कि सृष्टिकर्ता का अस्तित्व है; और कोई दानव चाहे हजारों-करोड़ों साल जिए, वह कभी परमेश्वर का अस्तित्व स्वीकार नहीं करेगा। क्या जानवरों को यह न जानने के लिए दोषी ठहराया जाएगा कि परमेश्वर का अस्तित्व है? (नहीं।) कुत्ते लगभग दस साल जीते हैं, घोड़े बीस-तीस साल जीते हैं और हाथी सौ साल से अधिक भी जी सकते हैं। वे सृष्टिकर्ता के अस्तित्व को नहीं जानते, फिर भी उनमें से किसी को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जाता, क्योंकि उनका वर्गीकरण जानवरों का है। परमेश्वर की उनसे कोई अपेक्षा नहीं है और वह उन्हें बचाता भी नहीं है। इंसान अलग हैं। परमेश्वर को लोगों से अपेक्षाएँ हैं और उसने उनमें अपनी आशाएँ रखी हैं। इतने वर्षों तक देहधारी परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के बाद तुम्हें इसे समझने में सक्षम होना चाहिए, है ना? तो लोगों को देहधारी परमेश्वर के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? यह सब वापस उसी बात पर जाता है जो मैंने पहले कही है : देहधारी परमेश्वर चाहे जितना भी तुम्हारी धारणाओं और कल्पनाओं के या तुम जो चाहते हो उसके अनुरूप न लगे—शायद वह तुम्हारे जितना लंबा न हो, तुम्हारे जितना सुंदर न हो, तुम्हारे जितना ज्ञान और शिक्षा न रखता हो और तुम्हारे जितना ऊँचा सामाजिक रुतबा न रखता हो—यदि तुम यह समझ सकते हो कि इन वर्षों में उसने जिन सत्यों की संगति की है, उन्होंने तुम्हें बहुत कुछ बटोरने और सत्य प्राप्त करने दिया है, तो तुम्हें यह तथ्य स्वीकार करना चाहिए कि वह परमेश्वर है और उसके पास परमेश्वर की पहचान है। यदि तुममें वाकई तर्कसंगतता है, तो तुम्हें हमेशा देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से नहीं करनी चाहिए। क्या इस तरह से उनकी तुलना करने का कोई अर्थ है? हमेशा उनकी इस तरह से तुलना करके तुम केवल खुद को एक कठिन स्थिति में डालोगे; साथ ही, परमेश्वर तुमसे घृणा करेगा और अंततः तुम्हें कुछ प्राप्त नहीं होगा। हमेशा इस तरह से उनकी तुलना करने से तुम्हारा सत्य और उद्धार प्राप्त करना प्रभावित होगा। इसलिए, केवल इस वजह से कि देहधारी परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सत्य तुम्हें उद्धार प्राप्त करने में सक्षम बना सकते हैं, तुम्हें अब देहधारी परमेश्वर की तुलना स्वर्गिक परमेश्वर से नहीं करनी चाहिए, और तुम्हें देहधारी परमेश्वर को स्वीकार करना चाहिए; उसे स्वीकार करने में अब भी बहुत देर नहीं हुई है। कुछ लोग कहते हैं, “तो स्वीकृति का क्या अर्थ है? मैं शुरू से ही तुम्हारे उपदेश सुन रहा हूँ, है ना? क्या यह स्वीकृति नहीं है?” उपदेश सुनना स्वीकृति के समान नहीं है। तो स्वीकृति वास्तव में क्या है? इस पर खुद विचार करो : उसे स्वीकार न करने की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं, और उसे स्वीकार करने की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? इस पर विचार करो और आपस में इस पर संगति करो। आओ, आज के लिए अपनी संगति यहीं समाप्त करते हैं। अलविदा!
27 जुलाई 2024