सत्य का अनुसरण कैसे करें (22)
हाल की इस अवधि के दौरान मानवता के गुणों के बारे में जिन कथनों और विषय-वस्तु पर संगति की गई, उन्हें सुनने के बाद तुम लोग कैसा महसूस करते हो? क्या तुम्हें उन लोगों के बारे में थोड़ी और स्पष्टता मिली है, जिनमें वास्तव में मानवता होती है? (हमें पहले की तुलना में थोड़ी और स्पष्टता मिली है।) तो इसे सुनने के बाद क्या तुम लोग इस बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुँचे हो कि मानवता के गुण रखने वाले लोगों की मुख्य विशेषताएँ क्या होती हैं? क्या तुम लोग उन विवरणों और विशिष्टताओं के आधार पर, जिन पर संगति की गई थी, यह देख सकते हो कि किसी व्यक्ति की मानवता की विशेषताएँ क्या होती हैं? (परमेश्वर की हाल की संगति के माध्यम से अब मैं समझता हूँ कि मानवता के गुणों वाले लोगों में जमीर और विवेक होता है और वे सही और गलत का भेद पहचानने में सक्षम होते हैं।) जिस व्यक्ति की मानवता में जमीर और विवेक के गुण होते हैं, वह अपने जमीर और विवेक की नींव पर लोगों और चीजों को देखता है और आचरण और क्रियाकलाप करता है। लोगों के बारे में उसके विचार और स्व-आचरण के उसके सिद्धांत जमीर और विवेक की इसी नींव पर निर्मित होते हैं। यह बहुत सटीक है, है ना? (हाँ।) जिस व्यक्ति में जमीर और विवेक नहीं होता, उसके लोगों के बारे में विचार और स्व-आचरण के सिद्धांतों की कुछ विशेषताएँ होती हैं। इस बीच जिन लोगों में जमीर और विवेक होता है, उनके भी लोगों के बारे में विचारों और स्व-आचरण के सिद्धांतों की कुछ विशेषताएँ होती हैं और ये विशेषताएँ बिल्कुल भी खोखली नहीं होतीं; ये वास्तव में जमीर और विवेक वाले लोगों के दैनिक जीवन में प्रकट और अभिव्यक्त होती हैं। कोई व्यक्ति चाहे किसी भी युग में या कैसे भी सामाजिक परिवेश में रहता हो, यदि उसमें जमीर और विवेक है तो वह मानवता के कुछ गुण जिएगा। अपने जीवन के हर मामले के साथ या विचारों और दृष्टिकोणों तथा स्व-आचरण के सिद्धांतों से जुड़े अधिकांश मामलों के साथ वह स्पष्ट रूप से जमीर और विवेक के गुण प्रकट करेगा; यह बिल्कुल भी कोई खोखली चीज नहीं है। तुम लोग अपने आस-पास के लोगों से इसका मिलान करके देखो—क्या ऐसा नहीं है? (ऐसा ही है।) जब किसी में जमीर और विवेक होता है, तब उसमें ईमानदारी और दयालुता की अभिव्यक्तियाँ होंगी। चूँकि उसका जमीर उसे बाध्य करता है और उस पर कार्य करता है, इसलिए उसके आचरण और क्रियाकलाप करने के तरीके में कुछ सीमाएँ होंगी और उसके विवेक के कार्य और उसका जो निरोधक प्रभाव उस पर पड़ता है उसके कारण—या उसके विवेक की सीमाओं के भीतर—उसकी विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ और विशिष्ट जीवन-यापन होगा। इसलिए यह निर्धारित करने के लिए कि किसी में जमीर और विवेक है या नहीं, उसकी वास्तविक अभिव्यक्तियाँ देखो; यह देखो कि लोगों और चीजों को देखने और आचरण तथा क्रियाकलाप करने के उसके सामान्य दृष्टिकोण, सिद्धांत और सीमाएँ जमीर और विवेक के मानकों के अनुरूप हैं या नहीं और क्या उसकी सबसे निचली सीमा जमीर और विवेक के दायरे में और उसके जमीर और विवेक के नियंत्रण में है। यदि लोगों और चीजों को देखते समय और आचरण तथा क्रियाकलाप करते समय व्यक्ति का जमीर और विवेक काम नहीं करते और वह स्वयं अपने जमीर और विवेक द्वारा नियंत्रित और संयमित नहीं होता, तो वह अक्सर खुद को जमीर और विवेक के खिलाफ जाते हुए या अपना जमीर और विवेक खो चुके व्यक्ति के रूप में दिखाएगा। दैनिक जीवन में यह व्यक्ति जिसे अभिव्यक्त करता और जीता है, वह केवल जमीर की कमी और विवेक का अभाव है। जब वह मामलों का सामना करता है तो केवल कुतर्क झाड़ता है और उसके विचार और दृष्टिकोण विशेष रूप से चरम, हठीले और असामान्य होते हैं। वह अपने बोलने के तरीके के बारे में सावधान नहीं होता और बोलते समय वह अपनों और परायों के बीच अंतर करने में विफल रहता है; वह जो कुछ भी कहता है वह निरर्थक और उलझा हुआ होता है। उसके क्रियाकलाप भी अक्सर विवेक की सीमाएँ पार कर जाते हैं, वे सिद्धांतों, सीमाओं और यहाँ तक कि बुद्धि से भी रहित होते हैं और बहुत जल्दबाजी में किए गए होते हैं; वह केवल मूर्खतापूर्ण और बेवकूफी भरे काम करता है। चाहे दूसरों के साथ मिलना-जुलना हो या मामलों को सँभालना, वह कभी सही सिद्धांत या दिशा नहीं खोज सकता, उसके आचरण के तरीके में कोई सिद्धांत या सीमा होने की तो बात ही छोड़ दो। वह नहीं जानता कि आचरण कैसे करना है; वह नहीं जानता कि आचरण करने का क्या अर्थ होता है या उसे कैसा व्यक्ति बनने की कोशिश करनी चाहिए, न ही वह यह जानता है कि सच्चा जीवन क्या होता है या लोगों को कैसे मार्ग पर चलना चाहिए। उसके हृदय में इन चीजों की बिल्कुल भी कोई अवधारणा नहीं होती; वह बिना किसी लक्ष्य या दिशा के भ्रम में अपने दिन गुजारता है। जब भी वह किसी चीज का सामना करता है, तब वह जैसे-तैसे उससे निपटता है, उससे कोई अनुभव या सबक लेने में या अभ्यास का कोई सही मार्ग पाने में असमर्थ रहता है। वह चाहे कितना भी लंबा जीवन जिए, वह हमेशा मूर्ख और भ्रमित ही रहता है। क्या ऐसे लोगों में जमीर और विवेक होता है? (नहीं।) वे रोज काफी खुशी और आसानी से जीते हुए प्रतीत होते हैं, एक बेफिक्र मूर्ख की तरह क्रियाकलाप करते हैं और किसी भी कठिनाई का अनुभव नहीं करते। लेकिन जब वे मामलों का सामना करते हैं, तब इन मामलों में जितने अधिक विचार, दृष्टिकोण और स्व-आचरण के सिद्धांत शामिल होते हैं, वे उतने ही अधिक भ्रमित और किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं। विशेष रूप से जब वे जटिल लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करते हैं, तो उनमें स्व-आचरण के लिए सबसे बुनियादी ज्ञान, बुद्धिमत्ता और सिद्धांतों तक की कमी होती है। चाहे आईक्यू के संदर्भ में हो या स्व-आचरण के सिद्धांतों के संदर्भ में, ऐसे लोगों में मानवता के गुण नहीं होते। इस दुनिया में रहते हुए लोग सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों के साथ-साथ जीवन के बड़े और छोटे मामलों का सामना करेंगे। एक सच्चे इंसान में जमीर और विवेक होता है; जब वह इन लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करता है, तो उसके पास सिद्धांत होते हैं और उसके कुछ अपेक्षाकृत सही और सकारात्मक विचार और दृष्टिकोण होते हैं। इसके अलावा, इन लोगों, घटनाओं और चीजों को सँभालते समय वह तार्किकता की सीमाओं के भीतर निर्णय करेगा। भले ही उसने परमेश्वर का कार्य स्वीकार न किया हो और वह सत्य न समझता हो, फिर भी वह जमीर और विवेक की सीमाओं के भीतर निर्णय करेगा और इन मामलों को सँभालेगा। स्थितियों का सामना करते समय वह मूर्ख या भ्रमित नहीं होता, बल्कि अपने जमीर और विवेक द्वारा संचालित और संयमित होता है, इसलिए इन मामलों को सँभालने के लिए उसके पास स्व-आचरण के बुनियादी सिद्धांत होंगे। ईमानदारी और दयालुता के अलावा, जिन लोगों की मानवता में जमीर और विवेक के गुण होते हैं उनकी एक और सबसे स्पष्ट विशेषता शर्म की भावना होना है। मैंने पहले ईमानदारी और दयालुता की अभिव्यक्तियों पर संगति करते समय शर्म की भावना होने पर थोड़ी संगति की थी। उस समय मैंने जो संगति की थी, उसके अलावा अभी भी बहुत सारी विषय-वस्तु है जो अधिक विशिष्ट है और आज हम उसी पर आगे बढ़ेंगे।
चूँकि जमीर और विवेक रखने वाले व्यक्ति में एक कार्यशील जमीर होता है और उसमें विवेक भी होता है, इसलिए यह निश्चित है कि उसके आचरण में शर्म की भावना होने का गुण स्पष्ट रूप से होगा। पहले, आओ शर्म की भावना होने की उन कुछ अभिव्यक्तियों या कहावतों के बारे में बात करते हैं जिनका तुम लोगों ने दैनिक जीवन में सामना किया है। उदाहरण के लिए कुछ गंदे शब्द ऐसे होते हैं जिन्हें कहने के लिए तुम तैयार नहीं हो पाते; ऐसी बातें कहने का विचार ही तुम्हें शर्मनाक लगता है—क्या यह शर्म की भावना होना है? (हाँ।) और कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो भद्दी और दुष्ट होती हैं; उन्हें खुलेआम प्रदर्शित नहीं किया जा सकता और तुम उन्हें करने के लिए तैयार नहीं हो सकते—क्या यह शर्म की भावना होना है? जब तुम शर्मनाक चीजें करते हो, तब तुम अपने हृदय में पछतावा महसूस करते हो और खुद से नफरत करते हो—क्या यह शर्म की भावना होना है? (हाँ।) और क्या अभिव्यक्तियाँ हैं? (जिनलोगों में शर्म की भावना होती है, वे अपने गौरव की परवाह करते हैं और जरूरत पड़ने पर शर्मिंदा होना जानते हैं।) ये ऐसी चीजें हैं, जिनके बारे में कोई भी सोच सकता है। “शर्म की भावना होना” कहने का दूसरा तरीका क्या है? (शर्म महसूस करना।) दैनिक जीवन में क्या हम अक्सर यह नहीं कहते, “क्या तुम्हें कोई शर्म नहीं है?” (हाँ।) शर्म की भावना होने में मुख्य रूप से क्या शामिल है? क्या इसमें सत्यनिष्ठा और गरिमा शामिल है? (हाँ।) जब किसी व्यक्ति में शर्म की भावना होती है, तब वह अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा की विशेष परवाह करता है। वह अपनी सत्यनिष्ठा का त्याग नहीं करेगा या अपनी गरिमा का उपयोग उन चीजों से विनिमय के लिए नहीं करेगा जिन्हें लोग अच्छा मानते हैं या जो उनके लिए फायदेमंद हैं। एक निश्चित अर्थ में शर्म की भावना होने का मतलब है अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा की रक्षा करना, भले ही इसका मतलब व्यक्तिगत हितों का बलिदान करना हो। जब शर्म की भावना वाले लोग कोई कार्य करते हैं तो उनका जमीर काम करता है; यानी, दूसरों की नजर में उनमें अपेक्षाकृत अधिक सत्यनिष्ठा और गरिमा होती है। अपनी कथनी और करनी में उनके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं होता और वे स्पष्ट और निष्कपट होते हैं। वे घिनौने और घटिया काम नहीं करते और जिन सिद्धांतों का वे पालन करते हैं या जो तर्क वे व्यक्त करते हैं, वे लोगों की जाँच में खरे उतर सकते हैं; दूसरे लोग उनकी पीठ पीछे उनकी आलोचना नहीं करते या उनके बारे में गप नहीं करते। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि किसी व्यक्ति में शर्म की भावना है तो उसके काम करने के तरीके और विधियाँ अपेक्षाकृत स्पष्ट और निष्कपट होंगी। वे कुछ भी संदेहास्पद करने की कोशिश नहीं करते और वे घिनौने या घटिया नहीं होते। ऐसे लोगों के क्रियाकलापों की सीमाएँ और उनके कार्य करने के तरीके मूल रूप से जमीर और विवेक की सीमाओं के भीतर होते हैं। शर्म की भावना वाले लोग जिन सिद्धांतों और तरीकों से आचरण करते हैं और जो लक्ष्य वे स्व-आचरण के लिए निर्धारित करते हैं, वे बिल्कुल ऐसे ही होते हैं। इन चीजों के अलावा, शर्म की भावना वाले लोगों में निश्चित रूप से कुछ विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ होती हैं और वे कुछ विशिष्ट चीजों को जीते और प्रकट करते हैं। या कुछ मामलों में उनके पास कुछ अपेक्षाकृत सकारात्मक विचार और दृष्टिकोण होते हैं और वे इन सकारात्मक विचारों और दृष्टिकोणों के मार्गदर्शन में ही आचरण और क्रियाकलाप करते हैं। उदाहरण के लिए, जब कलीसिया सभी स्तरों पर अगुआओं का चुनाव कर रही होती है, तब चूँकि शर्म की भावना वाले लोगों में भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, इसलिए वे किसी भी अन्य व्यक्ति की तरह ही रुतबे से प्यार करते और महत्वाकांक्षाएँ रखते हैं; वे भी बहुत सम्मानित होना चाहते हैं और लोगों के बीच रुतबा और उच्च प्रतिष्ठा पाना चाहते हैं—इस संबंध में वे बाकी सभी के समान होते हैं। लेकिन शर्म की भावना वाला व्यक्ति रुतबा इस तरह नहीं प्राप्त करता कि वह भाई-बहनों का उच्च आदर पाने के लिए दिखावा करने और डींगें हाँकने का हर संभव प्रयास करे या बेशर्मी से दूसरों के साथ होड़ करे, घटिया काम करने के लिए असामान्य साधनों या अपमानजनक तरीकों का उपयोग करे। इसके बजाय वह अपनी वास्तविक क्षमताओं के आधार पर अगुआ चुना जाना चाहता है; उदाहरण के लिए, अपनी खूबियों का उपयोग करके या कष्ट सहकर और कीमत चुकाकर किसी पेशेवर क्षेत्र में कुछ परिणाम हासिल करके—या अपनी मानवता को अच्छी तरह से जीकर भाई-बहनों के लिए फायदेमंद काम करके—ताकि अधिकांश भाई-बहनों की मान्यता प्राप्त कर सके और इस प्रकार अगुआ के रूप में चुना जा सके। यदि वह नहीं चुना जाता, तो वह अंदर थोड़ी नाराजगी भी महसूस करता है। यह नाराजगी भ्रष्टता का एक सामान्य प्रकाशन है और भ्रष्ट मानवजाति की एक बहुत ही स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। लेकिन वह इस मामले को सही ढंग से सँभालने में सक्षम होता है : “यह तथ्य कि लोगों ने मुझे नहीं चुना, यह दर्शाता है कि मुझमें अभी भी कमी है। शायद कुछ क्षेत्रों में मुझमें अभी भी कमियाँ हैं। मैं नहीं चुना गया—मुझे अब इसके लिए हठपूर्वक होड़ करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। लोग मुझे चुनें इसके लिए मुझमें कम से कम, काबिलियत, मानवता या कार्यक्षमता की दृष्टि से वांछनीय गुण होने चाहिए। यदि कोई वांछनीय गुण न होने के कारण मुझे नहीं चुना गया, लेकिन फिर भी मैंने बेशर्मी से अगुआ बनने की जिद की तो यह कितना लज्जाजनक होगा!” हालाँकि चुनाव हारने के बाद वह अंदर से थोड़ा निराश और दुखी महसूस करता है, लेकिन वह आत्मचिंतन कर खुद को जानने और यह देखने में सक्षम होता है कि उनमें क्या कमियाँ और खामियाँ हैं। फिर वह यह देखता है कि चुने गए व्यक्ति में वास्तव में क्या खूबियाँ हैं, भाई-बहनों ने उस व्यक्ति को क्यों चुना, किन पहलुओं में वह उनसे बेहतर काम करता है और किस तरह से उस व्यक्ति की काबिलियत उनसे बेहतर है। शर्म की भावना वाला व्यक्ति इस मामले को तर्कसंगत ढंग से सँभालेगा; चुनाव हारने के बाद वह बिल्कुल भी प्रतिरोध नहीं करेगा, शिकायत नहीं करेगा, आलोचना नहीं करेगा या गालियाँ नहीं बकेगा। वह ये चीजें बिल्कुल नहीं करेगा। वह ये चीजें क्यों नहीं करेगा? क्योंकि ऐसे व्यक्ति में विवेक होता है। कुछ झटकों और असफलताओं का सामना करने पर भी वह अपना विवेक नहीं खोता; वह अभी भी विवेक की सीमाओं के भीतर रहता है। इस तरह वह विचाराधीन मामले को तर्कसंगत ढंग से सँभालेगा। भले ही उसके भ्रष्ट स्वभाव उसे परेशान होने, नकारात्मक होने या कुछ हद तक विद्रोही महसूस करने के लिए प्रेरित या प्रभावित तक करें, लेकिन उसमें विवेक होता है इसलिए वह थोड़े ही समय में अपनी मानसिकता और दशा जल्दी से ठीक कर लेगा और फिर चुनाव हारने के मामले को तर्कसंगत ढंग से सँभालेगा। वह अगुआ के पद के लिए होड़ नहीं करेगा, न ही वह अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए कपटपूर्ण हथकंडों या तरीकों का उपयोग करेगा; वह ऐसी चीजें नहीं करेगा जो सीमा पार कर जाएँ। कहने का तात्पर्य यह है कि दूसरों की नजर में यह व्यक्ति भ्रष्ट स्वभावों वाले अन्य लोगों के समान ही होता है : वह भी रुतबे से प्यार करता है और उसे पाने की महत्वाकांक्षा और इच्छा रखता है, लेकिन रुतबे के लिए उसका प्यार और उसे पाने का उसका तरीका उसकी मानवता के भीतर शर्म की भावना होने के गुण द्वारा नियंत्रित दायरे में आता है। वह रुतबा पाने के लिए असामान्य साधनों का उपयोग नहीं करेगा, न ही वह रुतबे की खातिर या अपनी महत्वाकांक्षा और इच्छा पूरी करने के लिए दिखावा करेगा, न उच्च आदर पाने के लिए बेशर्मी की बातें कहेगा। वह ऐसी चीजें बिल्कुल नहीं कहेगा या करेगा। इसके बजाय वह चुपचाप सत्य का अनुसरण और अपना कर्तव्य करने में मेहनत करता है। वह काम ज्यादा और बातें कम करता है और रुतबे के लिए अपनी महत्वाकांक्षा और इच्छा नियंत्रण में रखने की पूरी कोशिश करता है। वह अपने प्रयासों के माध्यम से परिणाम प्राप्त करने और बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद करता है और अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में सेवा करने की शर्तें पूरी करने के लिए अपना पर्याप्त आध्यात्मिक कद तैयार करता है। वह यह भी उम्मीद करता है कि उसके प्रयास भाई-बहनों द्वारा देखे और पहचाने जा सकते हैं और भविष्य में वह अगुआ चुना जा सकता है। भले ही शर्म की भावना वाले किसी व्यक्ति में अगुआ चुने जाने की महत्वाकांक्षा हो, फिर भी वह अपेक्षाकृत तर्कसंगत चीजें करता है जो जमीर और विवेक की सीमाओं के भीतर होती हैं। दूसरे शब्दों में, भले ही उसमें भ्रष्ट मानवजाति की महत्वाकांक्षाएँ हों, फिर भी वह अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा की परवाह करता है; अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा का त्याग किए बिना ऐसी चीजें करता है जिन्हें भ्रष्ट मानवजाति के विचारों और धारणाओं के अनुसार सही, उचित और अपेक्षाकृत सकारात्मक माना जाता है। इसलिए शर्म की भावना वाला व्यक्ति रुतबे और इच्छा के सामने भी इस शर्म की भावना को विशेष रूप से स्पष्टतः प्रदर्शित करता है। भले ही वह रुतबे से प्यार करता हो और अगुआ बनना चाहता हो, फिर भी वह अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा की परवाह करता है; यानी ऐसे मामलों के संबंध में उसके विचार और दृष्टिकोण और साथ ही कार्य करने के उसके तरीके और सिद्धांत अपेक्षाकृत तर्कसंगत और सकारात्मक होते हैं। पहले तो, वह धोखे से लोगों का विश्वास या उच्च आदर पाने के लिए तथ्यों को गढ़ता नहीं; इसके अतिरिक्त वह लोगों का उच्च आदर पाने के लिए चिकनी-चुपड़ी बातों या बनावटी बाहरी रूप का उपयोग नहीं करता, जो लोगों को उसे पसंद करने के लिए बहका सके। भले ही वह रुतबे से प्यार करता हो और अगुआ चुना जाना चाहता हो, फिर भी वह चीजें नहीं गढ़ता, धोखेबाजी में लिप्त नहीं होता या हथकंडे नहीं अपनाता। वह मानता है कि जिस बुनियादी सिद्धांत का उसे सबसे अधिक पालन करना चाहिए, वह है चीजें व्यावहारिक तरीके से करना, परमेश्वर जो भी अपेक्षा करता है और जो भी सही है उसे करने में कड़ी मेहनत के साथ खुद को लगाना, उसे अच्छी तरह से करने का प्रयास करना और सत्य में अधिक मेहनत लगाना। वह मन ही मन सोचता है, “यदि मैं सत्य अधिक समझ लूँ और जान जाऊँ कि सत्य पर संगति कैसे करनी है तो क्या भाई-बहन मुझे अगुआ नहीं चुनेंगे?” वह मनगढ़ंत चीजों से नहीं बल्कि अपने प्रयासों से, जमीर और विवेक की इन अभिव्यक्तियों को व्यावहारिक रूप से जीकर ही मान्यता प्राप्त करने की उम्मीद करता है। रोजमर्रा की भाषा में कहें तो वह अपनी वास्तविक क्षमताओं, असली प्रतिभाओं और व्यावहारिक कार्य के भरोसे मान्यता प्राप्त करना चाहता है और फिर अगुआ चुने जाने का अवसर पाना चाहता है। तो क्या तुम्हें लगता है कि ऐसे लोगों में शर्म की भावना होती है? (हाँ।) क्या तुम लोग कहोगे कि यह ऐसे व्यक्ति का एक वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन है? (हाँ, है।) यह किस तरह से वस्तुनिष्ठ है? (हालाँकि ऐसा व्यक्ति भी प्रतिष्ठा और रुतबे से प्यार करता है और उसमें भी महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ होती हैं, फिर भी वह खुद को संयमित करने के लिए जमीर के मानकों का उपयोग कर सकता है और अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा की परवाह करता है। वह लोगों का उच्च आदर और विश्वास पाने के लिए दिखावा या धोखेबाजी नहीं करता; बल्कि वह वास्तव में कीमत चुकाकर और मेहनत करके मान्यता प्राप्त करना चाहता है। मुझे लगता है कि तुलनात्मक रूप से कहें तो ऐसे लोगों में शर्म की थोड़ी भावना होती है।) यदि रुतबे के सामने किसी में जमीर और विवेक की अभिव्यक्तियाँ भी न हों, फिर भी लोग कहें कि उसमें शर्म की भावना है, तो क्या ये शब्द खोखले और अव्यावहारिक नहीं हैं? (हाँ हैं।) तो यह कहना कि किसी व्यक्ति में शर्म की भावना है, किन परिस्थितियों में वस्तुनिष्ठ है और खोखला नहीं है? ऐसा तब होता है जब मामलों का सामना करते समय उसमें वास्तव में जमीर और विवेक होने की अभिव्यक्तियाँ होती हैं, जिनमें सामान्य मानवता में पाई जाने वाली शर्म की भावना की अभिव्यक्ति शामिल है। क्या शर्म की भावना ऐसी चीज है जो सामान्य मानवता वाले लोगों में होनी चाहिए? (हाँ।)
अन्य लोगों के बीच होने पर शर्म की भावना वाले व्यक्ति की कैसी अभिव्यक्तियाँ होती हैं? वह व्यावहारिक कार्य करता है। वे अपनी मनचाही प्रतिष्ठा और रुतबा पाने के लिए खुशामद और चापलूसी करने, गुट बनाने, दूसरों को भड़काने, चीजें गढ़ने, दिखावा करने, धोखा देने, झूठ बोलने या लोगों के मुँह पर कुछ और पीठ पीछे कुछ और करने जैसे साधनों पर निर्भर नहीं रहते; इसके बजाय वे लगातार कड़ी मेहनत करते हैं। यहाँ वस्तुनिष्ठ तथ्य क्या है? वह यह है कि चूँकि शर्म की भावना वाले लोगों में भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, इसलिए वे बहुत स्वाभाविक रूप से भ्रष्ट मानवजाति के कुछ गुण, विचार और दृष्टिकोण तथा महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ प्रदर्शित करेंगे; यह बहुत सामान्य है। लेकिन महत्वाकांक्षाएँ होने और रुतबे से प्यार करने के बावजूद शर्म की भावना वाले लोग रुतबा पाने के लिए असामान्य साधनों का उपयोग नहीं करेंगे; बल्कि वे व्यावहारिक कार्य करने के लिए अपनी वास्तविक क्षमताओं पर भरोसा करना चाहते हैं। बेशक, यदि ऐसा व्यक्ति अपनी काबिलियत, मानवता और अन्य सभी पहलुओं के संबंध में मानक स्तर का है, तो बस कुछ ही समय की बात है, वह अगुआ चुन लिया जाएगा। लेकिन किसी सामाजिक समूह या कार्यस्थल में जमीर और विवेक वाले इन लोगों का क्या हश्र होता है? न केवल उन्हें पदोन्नत नहीं किया जाएगा या महत्वपूर्ण पदों पर नहीं रखा जाएगा, बल्कि उन्हें निकाला और दबाया तक जाएगा। वे ठकुरसुहाती और चापलूसी नहीं करते, न ही वे अगुआओं की खुशामद करते या उन्हें उपहार देते हैं, अपने सहकर्मियों के कृपापात्र होने की कोशिश करना तो दूर की बात है। वे हथकंडे नहीं अपनाते या धोखेबाजी में शामिल होने की कोशिश नहीं करते, न ही वे दोनों तरफ खेलने के लिए सांसारिक व्यवहारों के शातिर फलसफों का उपयोग करते हैं। यदि तुम उनसे ये काम करने के लिए कहो तो वे हमेशा शर्मिंदा महसूस करेंगे; वे इन्हें करने के लिए तैयार नहीं हो पाएँगे। यदि तुम उनसे अगुआओं की चापलूसी करने और उनके बारे में केवल अच्छी बातें कहने के लिए कहो, तो वे ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हो पाएँगे, क्योंकि उन्हें अगुआओं में कुछ भी अच्छा नहीं दिखता। यदि वे जैसा महसूस करते हैं उसके खिलाफ जाकर चापलूसी भरी कोई बात कहें जैसे, “अगुआ रोज अनगिनत मामलों से निपटते हैं और हमारे लिए जी-तोड़ मेहनत करते हैं,” तो वे शर्मिंदा महसूस करेंगे और इसे कहने के बाद खुद को थप्पड़ मारेंगे। वे मन ही मन सोचते हैं : “ये अगुआ पूरा दिन खाने, पीने और मौज-मस्ती करने में बिताते हैं; ये मोटे और लाल चेहरे वाले हैं। ये रोज अनगिनत मामलों से कैसे निपट रहे हैं? ये सभी भ्रष्ट अधिकारी हैं जो कोई उचित काम नहीं करते, बल्कि केवल खाते, पीते, वेश्यागमन करते और जुआ खेलते हैं। ये सभी ऐसे दानव हैं जो इंसानों का मांस खाते हैं और इंसानों का खून पीते हैं!” वे मन ही मन इन लोगों से गहरी नफरत करते हैं और जैसा वे वास्तव में महसूस करते हैं उसके खिलाफ नहीं जाना चाहते और चापलूसी का एक भी शब्द उनसे नहीं कहना चाहते। उन्हें लगता है कि चापलूसी भरी बातें कहना घृणास्पद है और वे मरते दम तक ऐसी बातें नहीं कहेंगे। हालाँकि वे सामाजिक प्रवृत्तियों से कुछ हद तक दूषित हो गए हैं और कुछ ऐसी बातें कह सकते हैं जो जैसा वे महसूस करते हैं उस के खिलाफ जाती हैं. लेकिन उनकी एक सीमा होती है; वे सीमा पार नहीं करेंगे और घृणित नहीं बनेंगे। यदि वे वास्तव में कोई काम करवाने के लिए उपहार देते हैं और एहसान माँगते हैं, तो ऐसा इसलिए होता है कि उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं होता। वे केवल तभी जैसा वे वास्तव में सोचते हैं उसके खिलाफ जाएँगे और ऐसा काम करेंगे, जब वे सचमुच जबरन कठिन परिस्थितियों में डाल दिए जाते हैं और उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं होता। लेकिन ऐसा करने के बाद वे पछताएँगे और महसूस करेंगे कि उन्होंने अपनी गरिमा खो दी है और वे इतने शर्मिंदा हैं कि किसी का भी सामना नहीं कर सकते। यह उनके दिलों पर एक निशान छोड़ जाता है और वे अपनी बाकी पूरी जिंदगी इस मामले से उबर नहीं पाएँगे। जब शर्म की भावना वाले लोग खुद को कुछ ऐसी विशेष परिस्थितियों में पाते हैं, जहाँ लाचारी की भावना, जीवन के दबावों या बाहरी दबाव के कारण उनके पास ऐसे काम करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं होता जिससे उन्हें अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा त्यागनी पड़ती है, तो यह उनके शेष जीवन के लिए अपमान का कारण बन जाता है। जब भी वे इसके बारे में सोचते हैं, तभी उन्हें पछतावा होता है और उनके दिलों में एक टीस उठती है और वे कसम खाते हैं कि फिर कभी ऐसा काम नहीं करेंगे।
शर्म की भावना होना मानवता के गुणों में एक स्पष्ट विशेषता होती है। यह विशेषता लोगों को ऐसी चीजें करने से रोक सकती है जिनसे उनकी सत्यनिष्ठा और गरिमा नष्ट होती है, या उन्हें ऐसी चीजें कम करने में मदद कर सकती है। यह लोगों को जमीर और विवेक की सीमाएँ पार करने से बचा भी सकती है और उन्हें अपेक्षाकृत सकारात्मक और सही चीजें करना चुनने में मदद भी कर सकती है। यह बहुत महत्वपूर्ण है। रुतबे, स्वार्थों और पैसे के सामने भी और यहाँ तक कि गुजारा करने और जीवित रहने की खातिर भी शर्म की भावना वाले लोग जो कुछ भी करते हैं, उसमें अभी भी अपने जमीर और विवेक द्वारा संयमित रहते हैं और वे ये सीमाएँ पार नहीं करेंगे। यदि वे कभी-कभार इन्हें पार कर भी जाते हैं और ऐसे काम कर देते हैं जो उनके जमीर और विवेक के खिलाफ जाते हैं जिससे उन्हें अपनी गरिमा त्यागनी पड़ती है और अपनी सत्यनिष्ठा खोनी पड़ती है, तो उनकी शर्म की भावना और भी मजबूत हो जाएगी और उनके जमीर से धिक्कार की भावना तीव्र हो जाएगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि एक बार जब ऐसा व्यक्ति अपनी शर्म की भावना द्वारा स्थापित सीमाएँ पार कर लेता है या अपनी शर्म की भावना द्वारा प्रदान किए गए नियंत्रण और संयम से मुक्त हो जाता है तो वह और भी अधिक बेचैन और दोषी महसूस करेगा और अपने दिल में खुद को और भी अधिक दोष देगा। इस प्रकार तुम देख सकते हो कि जब शर्म की भावना वाले लोग रुतबे और प्रतिष्ठा वाले लोगों के बीच होते हैं, तब वे बहुत अलग-थलग और बेगाने दिखाई देते हैं, यहाँ तक कि दूसरों को यह आभास देते हैं कि वे कुछ हद तक अजीब हैं। जिन लोगों में जमीर और विवेक बिल्कुल नहीं होते, वे एक-दूसरे के साथ पूरी तरह घुल-मिल जाते हैं, जबकि जमीर और विवेक वाले लोग ऐसे लोगों के साथ होने पर बहुत असहज महसूस करते हैं। जमीर और विवेक से रहित लोग अंदर से परेशान महसूस नहीं करते, चाहे उनकी बातें तथ्यों के कितने भी विपरीत हों और न ही वे कुछ महसूस करते हैं चाहे उनकी कही बातें कितनी भी बेशर्मी से भरी हों। इसके विपरीत, चूँकि जमीर और विवेक वाले लोगों में शर्म की भावना होती है, इसलिए वे न केवल ऐसी बातें कहने के लिए तैयार नहीं हो पाते, बल्कि असहज भी महसूस करते हैं और ऐसी बातें सुनना उनके लिए असहनीय होता है। इस प्रकार ऐसे लोगों के साथ मेल-जोल रखना उनके लिए एक प्रकार की यातना होती है, जिनमें शर्म की भावना नहीं होती। यह यातना एक ओर उनकी शर्म की भावना से उत्पन्न होती है और दूसरी ओर अलग-थलग कर दिए जाने से। चूँकि आचरण करने और मामले सँभालने के उनके सिद्धांत दूसरों को यह महसूस कराते हैं कि वे बहुत अजीब और अनोखे हैं, मानो वे सांसारिक मामलों से पूरी तरह से निर्लिप्त हों और उन्हें बगुलाभगत समझा जाता है, इसलिए लोग उन्हें बाहर कर देते हैं या उनसे दूर रहते हैं। इसलिए ऐसे व्यक्ति को गैर-विश्वासियों के बीच, विशेष रूप से कार्यस्थल में, किनारे कर दिया जाएगा; गैर-विश्वासियों के शब्दों में, ऐसे लोगों का कहीं भी स्वागत नहीं किया जाता। सभी गैर-विश्वासी तमाम तरह के असामान्य साधनों का उपयोग करके सफलता की सीढ़ी चढ़ना चाहते हैं और मनचाही चीज पाने के लिए कोई भी साधन अपना लेते हैं। इसके विपरीत शर्म की भावना वाले लोग अपनी क्षमताओं पर भरोसा करते हुए हमेशा निष्पक्ष, उचित और न्यायसंगत तरीके से आजीविका कमाना चाहते हैं। यह उन्हें किसी भी सामाजिक समूह में कहीं नहीं ले जाएगा, क्योंकि ऐसे किसी भी समूह में खेल के नियम न्यायसंगत नहीं होते; बल्कि हर कोई अनकहे नियमों का पालन करता है। जो लोग समृद्ध होते हैं और जिनकी प्रतिष्ठा होती है, वे इन अनकहे नियमों के अनुसार जीने में निपुण होते हैं, जबकि शर्म की भावना वाले लोग चूँकि अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा की रक्षा करते हैं, इसलिए वे समाज के उन अनकहे नियमों को कभी स्वीकार नहीं कर सकते। वे इन नियमों को नहीं समझते, वे इन्हें पसंद नहीं करते और इससे भी बढ़कर वे इनका उपयोग करने से इनकार करते हैं। इस प्रकार लोगों के समूहों के भीतर जहाँ दूसरे लोग पदोन्नति पा सकते हैं या अगुआओं द्वारा अत्यधिक सम्मानित किए जा सकते हैं, वहीं चूँकि उनमें शर्म की भावना होती है, इसलिए वे हमेशा सख्ती से नियमों के अनुसार बोलते और क्रियाकलाप करते हैं और उनके मन में जो कुछ भी होता है उसे कह देते हैं; फिर समय-समय पर वे अपने सहकर्मियों और अगुआओं को नाराज कर बैठते हैं, अगुआओं की दुखती रग पर हाथ रख देते हैं और वही बातें कह देते हैं जिन्हें अगुआ बिल्कुल नहीं सुनना चाहते। जब तक उन्हें इसका एहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। और अंत में क्या होता है? चाहे उन्होंने कितने भी वर्षों तक मेहनत की हो या वे कितने भी समय से काम कर रहे हों, उन्हें कभी पदोन्नत नहीं किया जाता और न महत्वपूर्ण पदों पर ही रखा जाता है। जमीर, विवेक और शर्म की भावना वाले लोगों के लिए ऐसे लोगों के बीच रहना आनंददायक है या पीड़ादायक? (पीड़ादायक।) जब वे इस समाज और इस भ्रष्ट मानवजाति की असलियत नहीं जान पाते, तब वे इस समाज में और जिन लोगों के बीच वे रहते हैं उनमें घुलने-मिलने का हर संभव प्रयास करते हैं। लेकिन चूँकि उनमें जमीर और विवेक होता है, इसलिए वे ऐसे काम करने के लिए तैयार नहीं हो पाते जो उनकी सत्यनिष्ठा और गरिमा के खिलाफ जाते हों। इसलिए चाहे वे कितनी भी कोशिश कर लें और कितनी भी मेहनत कर लें या कितने भी बलिदान दे दें, अंतिम परिणाम यह होता है कि वे इस समाज में या जिन लोगों के बीच वे रहते हैं उनमें कभी घुल-मिल नहीं पाते; वे हमेशा उन लोगों के बीच बेगाने रहते हैं और यह भी नहीं जानते कि ऐसा क्यों है। वे खुद से कहते हैं : “यह समाज बहुत अन्यायपूर्ण है। यदि तुम हथकंडे अपनाना या खुशामद और चापलूसी करना नहीं जानते, हमेशा अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा की रक्षा करना या अपने लक्ष्य हासिल करना चाहते हो, तो तुम लोगों के किसी भी समूह में कहीं नहीं पहुँचोगे।” शर्म की भावना वाले लोग समाज में जीते हुए यही अनुभव करते हैं। अंततः उनके मन में क्या भावना रह जाती है? क्या वे इस मानव-समाज को पसंद करते हैं या इससे निराश होते हैं? (निराश होते हैं।) वे निराश ही हो सकते हैं। वे पूरी उम्मीद के साथ खुद को समाज में झोंक देते हैं, उन्हें लगता है कि समाज में अभी भी अच्छे लोग बहुमत में हैं और समाज में निष्पक्षता, न्याय और ऐसी जगह है जहाँ लोग अपनी बात रख सकते हैं। लेकिन इतने वर्षों तक समाज में इतनी कड़ी मेहनत से भाग-दौड़ करने के बाद अंत में उन्हें अपने लिए क्या मिलता है? उन्हें यह एहसास मिलता है कि मानव-संसार में न केवल कोई निष्पक्षता या धार्मिकता नहीं है, बल्कि यह कपटपूर्ण भी है। जब कोई बाघ तुम पर झपटता है तो तुम कम से कम उससे बचने की कोशिश कर सकते हो; लेकिन जब लोग तुम्हारे पीछे पड़ते हैं तो तुम्हें कोशिश करने का अवसर भी नहीं मिलेगा। अंततः वे यही लेकर जाते हैं; वे समाज और मानवजाति से हताश और निराश हो जाते हैं। वे हथकंडे अपनाकर, खुशामद और चापलूसी करके, अगुआओं और वरिष्ठों के करीब जाकर, उपहार देकर और लोगों के कृपापात्र बनकर इन लोगों की नकल करना चाहते हैं, लेकिन चाहे वे कितनी भी कोशिश कर लें, वे कभी ये चीजें करना नहीं सीख सकते; यहाँ तक कि वे चापलूसी के कुछ शब्द भी ठीक से नहीं कह सकते और जब वे कोशिश करते हैं तो मुँह की खाते हैं और हँसी के पात्र बन जाते हैं। लेकिन इस समाज में रहते हुए उनके पास इस तरह से कार्य करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। रोज ही उनका जमीर आत्माभियोग और बेचैनी की भावना से लदा रहता है। उन्हें लगता है कि उनके जीवन में कोई उम्मीद नहीं है; हर चीज या तो तनावपूर्ण है या पीड़ादायक है और वे रोज कुंठा की भावना महसूस करते हैं। इस समाज और लोगों के इस समूह के सामने आने वाले विभिन्न मुद्दों का सामना करना उनके लिए पीड़ादायक होता है और यह पीड़ा उन्हें उनके दिलों में भारी बेचैनी की भावना देती है। हालाँकि वे कुछ बेशर्मी की बातें कहना सीख जाते हैं या अपने जमीर और विवेक के खिलाफ जाने वाली चीजें करने में दूसरों की नकल करते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर वे बेचैनी के साथ-साथ आत्म-धिक्कार और आत्माभियोग की भावना महसूस करते हैं। वे अंदर से जितना अधिक बेचैन महसूस करते हैं, उतनी ही अधिक नफरत वे अपने दिलों में इस समाज और मानवजाति से करते हैं, है ना? (हाँ। उन्हें लगेगा कि यह समाज अन्यायपूर्ण है और वे इससे नफरत करने लगेंगे।) वे मानवजाति से नफरत करेंगे और इस समाज से नफरत करेंगे। वे निष्पक्षता और धार्मिकता के उभरने की उम्मीद करते हैं, किसी ऐसे व्यक्ति के प्रकट होने की उम्मीद करते हैं जो न्याय और निष्पक्षता बनाए रख सके और उम्मीद करते हैं कि एक ऐसी जगह हो जहाँ लोग अपनी बात रख सकें। लेकिन ये केवल इच्छाएँ हैं; वास्तविक जीवन में ये पूरी नहीं हो सकतीं; समाज में ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ लोग अपनी बात रख सकें। हालाँकि इस समाज के प्रभाव और विभिन्न दुष्ट समूहों के बीच रहने के कारण वे अनजाने ही उन चीजों से दूषित हो जाते हैं जो दुष्ट प्रवृत्तियों द्वारा लोकप्रिय बनाई गई और समर्थित होती हैं या जो अपेक्षाकृत चलन में होती हैं, लेकिन उनके दिलों की गहराई में मौजूद शर्म की भावना और न्याय तथा सकारात्मक चीजों के लिए उनकी लालसा कभी गायब नहीं होतीं या बदलती नहीं। अपने दिलों में वे अभी भी निष्पक्षता और धार्मिकता के उभरने की उम्मीद करते हैं, ताकि उन्हें जैसा वे महसूस करते हैं उसके विपरीत आचरण न करना पड़े, अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा के साथ विश्वासघात न करना पड़े और आजीविका कमाने तथा जीवित रहने के लिए अपनी शर्म की भावना का त्याग न करना पड़े, इतनी बेशर्मी से न जीना और आचरण करना पड़े। हालाँकि समाज में और भ्रष्ट लोगों के बीच इतने लंबे समय तक घुलने-मिलने के कारण वे कुछ बुरी आदतों से दूषित और सामाजिक प्रवृत्तियों के अनुकूल हो गए हैं, जिससे ऐसा लगता है मानो उनका जमीर और विवेक नष्ट और धुँधले हो गए हैं, लेकिन यदि वे सच्चे इंसान हैं तो उनका जमीर और विवेक कभी खत्म नहीं होंगे। चूँकि उनका जमीर और विवेक खत्म नहीं होंगे, इसलिए उनकी शर्म की भावना हमेशा मौजूद रहेगी। बात बस इतनी है कि समाज में इतने लंबे समय तक रहने और सांसारिक व्यवहारों के लिए बहुत सारा ज्ञान प्राप्त कर लेने और कई फलसफे सीख लेने के बाद उनकी मानवता में कुछ बुरी आदतें आ गई हैं और उनके स्वभाव में शैतान और दानवों की कुछ चीजें शामिल हो गई हैं, इसलिए उनका जमीर और विवेक अपेक्षाकृत सुन्न और सुस्त हो गए हैं। लेकिन जब तक वे इंसान हैं और उनकी मानवता में जमीर और विवेक के गुण रहते हैं, तब तक उनकी शर्म की भावना हमेशा मौजूद रहेगी—ऐसे लोग वे लोग हैं जिन्हें बचाया जा सकता है।
जब व्यक्ति में जमीर और विवेक होता है, तब उसमें शर्म की भावना भी होती है। शर्म की भावना वाला व्यक्ति वह होता है, जिसमें सत्यनिष्ठा और गरिमा होती है और ऐसा व्यक्ति निष्पक्षता और धार्मिकता तथा सकारात्मक चीजों से प्यार करेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि उसके प्रकृति सार को देखते हुए वह सकारात्मक चीजों से प्यार करता है; बात बस इतनी है कि यह समझने से पहले कि सकारात्मक चीजें क्या हैं, वह नहीं जानता कि उसे क्या पसंद करना चाहिए और क्या नहीं। एक बार जब वह समझ जाता है कि सकारात्मक चीजें और नकारात्मक चीजें क्या हैं, तब सकारात्मक चीजों के लिए उसकी पसंद अधिक विशिष्ट और सटीक हो जाती है। यदि किसी में जमीर और विवेक है, तो उसकी मानवता के गुणों की एक बुनियादी अभिव्यक्ति निष्पक्षता और धार्मिकता के लिए प्यार होती है। वह उम्मीद करता है कि दूसरों के बीच रहते हुए उसके साथ बिना हथकंडे या चालें अपनाए और बिना किसी अनकहे नियम का पालन किए निष्पक्ष व्यवहार किया जा सके। वह उम्मीद करता है कि लोगों के बीच मेल-जोल निष्पक्ष हो सके और लोगों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार किया जा सके। यानी वह उम्मीद करता है कि चीजें सीधी और स्पष्ट हो सकें : यदि तुमने कुछ गलत किया है तो तुमने कुछ गलत किया है और तुम्हें वह सजा मिलनी चाहिए जिसके तुम हकदार हो, जबकि यदि तुमने कुछ गलत नहीं किया है और कोई योगदान दिया है, तो तुम्हें इनाम मिलना चाहिए। यदि लोगों के पास कौशल और वास्तविक ज्ञान तथा व्यावहारिक शिक्षा है, तो उनका सम्मान किया जाना चाहिए, उन्हें पदोन्नत किया जाना चाहिए और महत्वपूर्ण पदों पर रखा जाना चाहिए। यदि उनमें वास्तविक ज्ञान और व्यावहारिक शिक्षा की कमी है, तो उन्हें महत्वपूर्ण पदों पर नहीं रखा जाना चाहिए। जमीर और विवेक वाले लोग ऐसे लोगों को पसंद करते हैं और ऐसा जीवन परिवेश उन्हें भाता है। भले ही समाज में लंबा समय बिताने के बाद उन्होंने कुछ बुरी आदतें विकसित कर ली हों या दुष्ट प्रवृत्तियों के प्रभाव में कुछ भ्रामक विचार और दृष्टिकोण स्वीकार कर लिए हों और असफलताओं का सामना किया हो तथा ठोकर खाई हो, लेकिन अंततः उन्हें यही सही लगता है कि शर्म की भावना वापस अपनाई जाए। अपने क्रियाकलापों में वे अनजाने ही अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा की रक्षा करने के सिद्धांत पर वापस लौट आएँगे। जब ऐसा व्यक्ति समाज में और दूसरों के बीच लंबा समय बिताता है और उनसे प्रभावित होता है, तो यह ऐसा ही होता है जैसे कोई सुंदर रत्न कचरे के ढेर में फेंक दिया जाए और वह गंदगी से ढक जाए। भले ही गंदगी बहुत मोटी और मैली हो, रत्न का सार अपरिवर्तित रहता है; एक बार गंदगी हट जाने पर जो प्रकट होता है, वह अभी भी एक रत्न ही होता है। इसलिए जब जमीर, विवेक और शर्म की भावना रखने वाले लोग परमेश्वर के घर आते हैं, तब वहाँ का जीवन परिवेश और साथ ही परमेश्वर जो कार्य करता है और जो वचन वह व्यक्त करता है, वे उनके दिलों की गहराई में मौजूद जरूरतों को पूर्ण रूप से पूरा करते हैं। उनके दिलों की गहराई में मौजूद जरूरतें क्या हैं? वे निष्पक्षता और धार्मिकता से प्यार करते हैं, सकारात्मक चीजों से प्यार करते हैं, दुष्टता से घृणा करते हैं, समाज के अनकहे नियमों से घृणा करते हैं और लोगों के बीच आपसी कलह और पीठ में छुरा घोंपने से घृणा करते हैं। यदि ऐसे लोग परमेश्वर के घर आते हैं और परमेश्वर के वचनों के खुलासे, न्याय और ताड़ना का अनुभव करने के माध्यम से और फिर परमेश्वर के परीक्षणों और शोधन से गुजरते हुए और अंततः परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण करते हुए और उसके वचनों का न्याय ताड़ना स्वीकार करते हुए अपनी मानवता से प्रकट होने वाले विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों के साथ-साथ अपने भीतर की सामान्य गंदगी और बुरी आदतों को भी धीरे-धीरे उतार फेंकने में सक्षम हो जाते हैं, तो वे नए इंसान बन जाएँगे। कहने का तात्पर्य यह है कि एक बार जब शर्म की भावना वाले लोग मानवता का यह बुनियादी मानक—सत्य स्वीकार करना, परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण करना और परमेश्वर के वचनों के अनुसार लोगों और चीजों को देखना तथा आचरण और कार्य करना—पूरा कर लेते हैं तो वे परमेश्वर के वचनों के आधार पर अपने भ्रष्ट स्वभावों और विभिन्न गलत विचारों और दृष्टिकोणों के साथ-साथ आचरण के अपने गलत तरीकों और स्वयं द्वारा चुने गए गलत मार्गों को जान सकते हैं। चाहे व्यक्ति ने ये चीजें समाज से सीखी हों या वे सीधे शैतान की भ्रष्टता से आई हों, यदि उसमें शर्म की भावना है तो परमेश्वर के वचन स्वीकार करने के बाद वह सत्य का अभ्यास करने और धीरे-धीरे इन भ्रष्ट स्वभावों को उतार फेंकने में सक्षम होगा और इस प्रकार उसके उद्धार पाने की बहुत उम्मीद होगी।
यदि किसी व्यक्ति में शर्म की भावना नहीं है, तो उसमें मानवता की यह बुनियादी स्थिति बिल्कुल नहीं होती—परमेश्वर के वचन स्वीकार करना, परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण करना और परमेश्वर के वचनों के अनुसार लोगों और चीजों को देखना तथा आचरण करना और कार्य करना। वह इस बुनियादी स्थिति को पूरा क्यों नहीं करता? क्योंकि शर्म की भावना से रहित लोग नकारात्मक चीजों, समाज की विभिन्न दुष्ट प्रवृत्तियों या शैतान के फलसफों से विमुख नहीं होते; बल्कि वे इन चीजों के प्रति उत्सुक होते हैं और यहाँ तक कि इन दृष्टिकोणों को स्वीकार कर सकते हैं, इनकी वकालत कर सकते हैं और इनका प्रसार कर सकते हैं। उन्हें यह शर्मनाक नहीं लगता, न ही उन्हें यह लगता है कि यह जमीर और विवेक के खिलाफ जाता है। यानी उनमें शर्म की कोई भावना बिल्कुल नहीं होती। चाहे वे कैसे भी हथकंडे अपनाएँ या ऐसी चीजें करें जो जैसा वे वास्तव में महसूस करते हैं उसके खिलाफ जाती हों, वे शर्मिंदा महसूस नहीं करते। मानवता और शर्म की भावना वाले लोग उनके लिए शर्मिंदा महसूस करते हैं, लेकिन शर्म की भावना से रहित लोग न केवल ये चीजें करने से जरा भी घृणा नहीं करते, बल्कि वे वास्तव में इनमें आनंद लेते हैं। शर्म की भावना से रहित लोग समाज रूपी विशाल मलकुंड में, बिना किसी घृणा या नफरत की भावना के, बिल्कुल अपने रंग में होते हैं—यह बिल्कुल वही जगह है जहाँ वे मटरगश्ती करते हैं। वे निष्पक्षता और धार्मिकता से नफरत करते हैं और जब दूसरे लोग उनके साथ न्यायपूर्ण तरीके से व्यवहार करते हैं तो वे इससे भी नफरत करते हैं। वे समाज में बस इन अनुचित और अन्यायपूर्ण तरीकों को पसंद करते हैं, क्योंकि इससे उन्हें विभिन्न अनुचित साधनों के माध्यम से वह पाने का अवसर मिलता है जो वे चाहते हैं। उन्हें लगता है कि अन्याय बहुत अच्छा है और ये दुष्ट प्रवृत्तियाँ और अनकहे नियम अद्भुत हैं। उन्हें ये इतने अच्छे क्यों लगते हैं? क्योंकि इस दुष्ट मानव-संसार की विभिन्न प्रवृत्तियाँ और अनकहे नियम उन्हें वह सब कुछ पाने देते हैं जो वे चाहते हैं, उनकी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं के साथ-साथ उनकी विभिन्न दुष्ट माँगें भी पूरी करते हैं। इस प्रकार उन्हें लगता है कि यह दुनिया अद्भुत है। यदि समाज में निष्पक्षता और धार्मिकता उभर जाए, तो उनके जीवित रहने की कोई गुंजाइश नहीं होगी और वे अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को साकार करने में असमर्थ होंगे। ठीक इसलिए कि समाज अन्यायपूर्ण है और उसके अनकहे नियम हैं, उन्हें समृद्ध होने और बाकी लोगों बेहतर होने का अवसर मिलता है। यदि इस दुनिया में निष्पक्षता और धार्मिकता होती, तो शर्म की भावना से रहित ये दुष्ट लोग अलग नहीं दिख पाते। इसलिए जब वे निष्पक्षता और धार्मिकता की बातें सुनते हैं, तो उनसे बहुत घृणा करते हैं और आग-बबूला हो जाते हैं। इसके विपरीत जब शर्म की भावना वाले लोग निष्पक्षता और धार्मिकता की बातें सुनते हैं, तो वे अपने दिलों में महसूस करते हैं कि जीवन प्रकाश से भरा है और उनके पास उम्मीद है। प्रकाश देखकर उनके दिल मुक्त हो जाते हैं। यदि वे देखते हैं कि समाज दुष्टता से भरा है और सभी लोग शैतान के फलसफों से जीते हैं और अनकहे नियमों के अनुसार क्रियाकलाप करते हैं, तो उन्हें लगता है कि आगे का रास्ता उजाड़ और प्रकाश से रहित है। इसलिए शर्म की भावना वाले लोगों के लिए परमेश्वर का प्रकटन और कार्य तथा परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सत्य बिल्कुल वही हैं जिनकी उनके आंतरिक संसार को आवश्यकता है और वे वही हैं जिनके लिए वे अपने दिलों में प्यासे हैं और जिनकी उम्मीद करते हैं। परमेश्वर का प्रकटन, परमेश्वर का कार्य और यह तथ्य कि परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है, शर्म की भावना और मानवता के गुणों वाले लोगों को उम्मीद रखने और प्रकाश देखने देते हैं। परमेश्वर के घर में आने के बाद हालाँकि बोलते और कार्य करते समय उनके भ्रष्ट स्वभाव अभी भी प्रभारी होते हैं, लेकिन वे अपने दिलों में सकारात्मक चीजों के लिए तरसते हैं और सत्य स्वीकार करने के लिए तैयार रहते हैं। अपनी मानवता की जरूरतों के संदर्भ में वे जमीर और विवेक द्वारा शासित होते हैं, उनके शब्द और क्रियाकलाप संयमित किए जा सकते हैं और जब वे भ्रष्टता प्रकट करते हैं तब खुद को जान सकते हैं। यदि वे सत्य समझ सकें और सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकें, तो वे परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर सकते हैं। परमेश्वर के घर में रहते हुए वे आशान्वित महसूस करते हैं; वे आगे एक उज्ज्वल भविष्य देखते हैं और उनके दिल उम्मीद से भर जाते हैं। जब भी यह कहा जाता है कि “परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है, परमेश्वर धार्मिक है और जहाँ भी परमेश्वर का शासन है वहाँ निष्पक्षता और धार्मिकता है”, तो जमीर और विवेक वाले लोग अपने दिलों में आनंदित और सांत्वना दिया हुआ महसूस करते हैं और बेशक वे इसके लिए तरसते भी हैं। “तरसने” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि जब यह कहा जाता है कि “परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है”, तो वे अपने दिलों में खुश और मुक्त महसूस करते हैं; अंतर्तम में वे इन शब्दों के लिए आमीन कहते हैं और एक प्रकार की खुशी महसूस करते हैं। जब यह कहा जाता है कि “परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है और जहाँ भी परमेश्वर कार्य करता है, वहाँ निष्पक्षता और धार्मिकता का शासन होता है”, तो अपनी मानवता में जमीर और विवेक के गुण रखने वाले लोग अंदर से बहुत संतुष्ट महसूस करते हैं। ये दो कथन उनके जीवन को दिशा देते हैं और उनकी मानवता की जरूरतें भी पूरी करते हैं। जरूरी नहीं कि वे सत्य ज्यादा समझते हों और जरूरी नहीं कि वे परमेश्वर के कई वचनों का अभ्यास करने में सक्षम हों, लेकिन केवल यह वाक्यांश सुनकर कि “परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है”, वे अपने दिलों में बहुत सांत्वना दिया हुआ और संतुष्ट महसूस करते हैं। यह वाक्यांश उनके साथ दृढ़ता से गूँजता है और उनके दिलों को झकझोर देता है; यह उनकी मानवता की जरूरतों की एक अभिव्यक्ति है। इस वाक्यांश के प्रति व्यक्ति का रवैया और वह अपने अंतर्तम में क्या महसूस करता है, यह उसके सार और वर्गीकरण के बारे में बहुत कुछ कहता है। देखो, जब दानव और शैतान सुनते हैं कि “परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है”, तो वे घृणा महसूस करते हैं : “तुम्हारा क्या मतलब है ‘सत्य का शासन है’? मैंने तो सत्य का शासन नहीं देखा है!” जब वे सुनते हैं कि “परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है”, तो उन्हें लगता है कि यह उन्हें दोषी ठहरा रहा है और उनके जीवन को खतरे में डाल रहा है, इसलिए वे इससे घृणा करते हैं; जब दानव और शैतान ये शब्द सुनते हैं, तो वे इसी तरह प्रतिक्रिया करते हैं। इसके विपरीत, जब भ्रमित लोग और वे लोग जो जानवरों के हैं, ये शब्द सुनते हैं, तो वे मौखिक रूप से तो स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है, लेकिन अपने दिलों में बिल्कुल भी कुछ महसूस नहीं करते। वे कोई खुशी या आनंद महसूस नहीं करते, न ही वे कोई गूँज महसूस करते हैं। हालाँकि वे इस कथन से सहमत हो सकते हैं और इसका विरोध नहीं करते, लेकिन यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे वे अपने दिलों में चाहते हों। लेकिन एक सच्चा इंसान अलग होता है। वह निष्पक्षता और धार्मिकता के लिए तरसता और प्यासा होता है, इसलिए जब वह सुनता है कि परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है, तो उसका दिल उम्मीद से भर जाता है। भले ही वह कुछ विशेष कठिनाइयों और असफलताओं का सामना करे या मसीह-विरोधियों और दुष्ट लोगों का अनुचित व्यवहार सहे, लेकिन जब वह सोचता है कि परमेश्वर के घर में सत्य कैसे शासन करता है, तो उसका दिल उम्मीद से भर जाता है, उसकी दशा और बेहतर हो जाती है और कुछ तो असीम आनंद से भी भर जाते हैं। “परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है” शब्द सुनकर एक सच्चे इंसान की जो भावनाएँ होती हैं, वे उन लोगों की भावनाओं से अलग होती हैं जो शैतान और दानवों के हैं या जो जानवरों के हैं। देखो, जब कोई खरगोश गाजर और घास देखता है, तो वह उन्हें पसंद करता है और उन्हें लगातार चबाता रहता है। लेकिन जब कोई भेड़िया गाजर और घास देखता है, तो वह घृणा महसूस करता है और कहता है : “इसमें इतना स्वादिष्ट क्या है? मेरे खयाल से तो खरगोश और मुर्गियाँ कहींअधिक स्वादिष्ट हैं!” चाहे तुम उसे कितना भी बताओ कि गाजर और घास पौष्टिक हैं, भेड़िया पूरी तरह से अप्रभावित रहता है। इसलिए जब जानवरों से पुनर्जन्म लेने वाले लोग “परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है” शब्द सुनते हैं, तो हालाँकि वे सिद्धांत के संदर्भ में तो स्वीकार करते हैं कि ये शब्द सही हैं, लेकिन वे अपने दिलों में इनसे घृणा करते हैं। वे इन शब्दों को जरा भी स्वीकार नहीं करते और वे कभी यह स्वीकार नहीं करेंगे कि ये तथ्यापरक हैं। इसके विपरीत, जब एक सच्चा इंसान सुनता है कि “परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है और परमेश्वर के साथ निष्पक्षता और धार्मिकता है”, तब वह अपने दिल में बहुत संतुष्ट महसूस करता है। उसे लगता है कि अब उसके पास एक मार्ग है और एक व्यक्ति के रूप में उसके लिए उम्मीद है। देखो, एक ही मामले को सँभालने के तरीके में अलग-अलग वर्गीकरण के लोगों की अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ होती हैं। चूँकि एक सच्चे इंसान की “परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है” वाक्यांश के प्रति इतनी स्पष्ट भावनाएँ होती हैं, इसलिए जब अन्य सत्यों की बात आती है—जिनमें कुछ विशिष्ट अभ्यास और लोगों के लिए परमेश्वर की विशिष्ट शिक्षाएँ शामिल हैं—तब जमीर और विवेक वाले लोग उनके लिए विशेष रूप से प्यासे होंगे। भले ही वर्तमान में, जबकि उनके भ्रष्ट स्वभाव पूरी तरह से अपरिवर्तित रहते हैं, सत्य का अभ्यास करना उनके लिए कुछ हद तक कठिन होता है, क्योंकि उनका आध्यात्मिक कद छोटा होता है और वे शैतान द्वारा बहुत गहराई से भ्रष्ट किए जा चुके होते हैं, लेकिन जब भी वे परमेश्वर के ये वचन पढ़ते हैं तब वे अपने दिलों में द्रवित हो जाते हैं और प्रेरित महसूस करते हैं। वे परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण करने और उनका अभ्यास करने का मन बना लेंगे। उनके लिए परमेश्वर के वचन वह प्रेरक शक्ति हैं जो उन्हें मार्ग पर बने रहने के लिए प्रेरित करती है और बेशक, वे उनके लिए ऐसा व्यक्ति बनने का अनुसरण करने का व्यावहारिक मार्ग भी बनाते हैं, जिससे परमेश्वर प्यार करता है। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर नूह, अय्यूब, अब्राहम और पतरस की कहानियों के बारे में बोलता है, तब मानवता के गुणों वाले लोग उन्हें सुनने के बाद पहले ईर्ष्यालु महसूस करेंगे। वे कितने ईर्ष्यालु हो जाते हैं? एक अनुपयुक्त अभिव्यक्ति का उपयोग करें तो, वे उन पर “लार टपकाते” हैं। यानी जब वे सुनते हैं कि इन लोगों में परमेश्वर के प्रति ऐसा भय और समर्पण हो सकता है, तो वे भी वैसा व्यक्ति बनना चाहते हैं और सोचते हैं : “मैं अय्यूब और नूह की तरह परमेश्वर की आराधना करना चाहता हूँ और मैं बिना किसी व्यक्तिगत मिलावट के अब्राहम की तरह परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण हासिल करने की उम्मीद करता हूँ।” उनमें एक प्रकार की लालसा होती है; यानी जब वे इन हस्तियों की कहानियाँ और गवाहियाँ सुनते हैं, तो उनके दिलों में हलचल मच जाती है और वे प्रेरित महसूस करते हैं। उनके दिलों में हलचल मच जाने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि वे ऐसा व्यक्ति बनना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसा व्यक्ति बनना अच्छा है और यह उनकी आंतरिक आवश्यकता है; उन्हें लगता है कि इस तरह का व्यक्ति बनने से वे परमेश्वर को संतुष्ट करने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर के लिए गवाही देने में सक्षम होते हैं और यह सबसे अद्भुत, सार्थक और मूल्यवान चीज है। उनकी नजर में ये चीजें सबसे कीमती और सँजोने योग्य हैं। इसलिए जब वे इन सकारात्मक चीजों के बारे में सुनते हैं, तो वे अपने दिलों में द्रवित हो जाते हैं; वे उनसे बहुत प्यार करते हैं, उनमें बहुत रुचि रखते हैं और उनसे गहराई से प्रभावित होते हैं। चूँकि ये चीजें निष्पक्षता और धार्मिकता के लिए उनकी आंतरिक आवश्यकता और सकारात्मक चीजों के लिए उनकी प्यास को पूर्ण रूप से पूरा करती हैं, इसलिए ये वे चीजें हैं जिनमें वे रुचि रखते हैं और अपने जीवन में वे जिनके बिना नहीं रह सकते। जहाँ तक उन चीजों की बात है जो मूल्यहीन और अर्थहीन हैं, वे उनमें रुचि नहीं रखते। सत्य और परमेश्वर के वचनों के संपर्क में आने से पहले उन्होंने जीवन के दृष्टिकोण और जीवन के फलसफों के बारे में कुछ सांसारिक साहित्यिक कृतियाँ या लेख पढ़े होंगे, लेकिन परमेश्वर में विश्वास करने लगने और परमेश्वर के वचनों का सामना करने के बाद जब वे उन चीजों की तुलना परमेश्वर के वचनों में उल्लिखित हस्तियों की कहानियों या परमेश्वर के वचनों के सत्यों से करते हैं, तो वे अब गैर-विश्वासी दुनिया की उन चीजों को पसंद नहीं करते; वे जिसे सबसे ज्यादा पसंद करते हैं, वह सत्य से जुड़ी यह विषय-वस्तु है। कहने का तात्पर्य यह है कि उनके दिलों में सकारात्मक चीजों के लिए, परमेश्वर के वचनों के लिए और सत्य से जुड़ी हस्तियों की कहानियों के लिए एक प्यास और लालसा होती है। इसी नींव पर लोग कदम-दर-कदम सत्य समझ सकते हैं और सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं। शुरुआत के तौर पर सकारात्मक चीजें, सत्य और निष्पक्षता तथा धार्मिकता उनकी मानवता की जरूरतें होती हैं। अपनी मानवता में इन जरूरतों के साथ जब वे सत्य सुनते हैं, तो वे उसके लिए प्यास और लालसा प्रदर्शित करने में सक्षम होते हैं और केवल तभी वे उसे स्वीकार करने, उसके प्रति समर्पण करने और उसमें प्रवेश करने के लिए एक कदम आगे बढ़ सकते हैं। केवल ऐसे लोगों के पास ही शुद्ध होने और बचाए जाने की उम्मीद होती है। इसलिए व्यक्ति की मानवता में शर्म की भावना होना बहुत महत्वपूर्ण है।
यदि तुम शर्म की भावना वाले किसी व्यक्ति से उसकी सत्यनिष्ठा और गरिमा के खिलाफ जाने के लिए कहो, तो वह अंदर से यातना महसूस करेगा; गरिमा और सत्यनिष्ठा के साथ जीना उसकी मानवता की एक आवश्यकता है। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए, यह कहा जा सकता है कि उसके लिए सत्य स्वीकार करना एक बहुत ही स्वाभाविक बात है; हम यह भी कह सकते हैं कि यह एक आम बात है और स्वाभाविक रूप से यह ऐसी चीज है जो उसके लिए अपेक्षाकृत आसान है। हम इसे अपेक्षाकृत आसान इसलिए कह सकते हैं क्योंकि लोगों के भीतर अभी भी भ्रष्ट स्वभाव हैं, लेकिन केवल मानवता के संदर्भ में शर्म की भावना वाले लोगों के लिए सत्य स्वीकार करना आसान है। इसके अतिरिक्त, यदि शर्म की भावना वाले लोगों में कुछ खूबियाँ, गुण और प्रतिभाएँ हों तो एक बार जब वे कुछ योगदान देते हैं और कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाते हुए कुछ लाभ प्राप्त करते हैं, तब वे अपने जमीर और विवेक के प्रकाश में बहुत सामान्य रूप से उन्हें दूसरों के साथ साझा करेंगे। सभी लोग शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए हैं और जब शर्म की भावना वाले लोग अपने अनुभव, समझ और लाभ साझा करते हैं, तब वे कभी-कभार अपनी खूबियों और गुणों का दिखावा कर देते हैं। लेकिन चूँकि उनमें शर्म की भावना होती है, इसलिए वे अपने क्रियाकलापों में संयमित और नपे-तुले होते हैं। वह क्या चीज है, जो उन्हें नपा-तुला होने देती है? यह उनके जमीर और विवेक से आता है। हालाँकि वे कभी-कभी दिखावा करते हैं और अनजाने ही चाहते हैं कि दूसरे उनका उच्च आदर करें, लेकिन अपनी शर्म की भावना और अपनी मानवता के विवेक के संयम के कारण अगर वे दिखावा करते भी हैं, तो भी वे ज्यादा निरंकुश या ज्यादा हठी और असंयमित नहीं होंगे। इसलिए उनकी बातचीत अपेक्षाकृत वस्तुनिष्ठ और तार्किक होती है। उदाहरण के लिए, जब उनका दिखावा उनकी शर्म की भावना का उल्लंघन करने के बिंदु तक पहुँच जाता है, तो वे खुद को नियंत्रित कर लेंगे और रुक जाएँगे, बजाय इसके कि ढिठाई और बेईमानी से इतराएँ, दिखावा करें और अपना उत्कर्ष करें और अपनी ही गवाही दें या बेशर्मी के साथ किसी भी तरह से लोगों का उच्च आदर, प्रशंसा और सम्मान पाने की कोशिश करें। भ्रष्ट स्वभावों के प्रकाशन और अभिव्यक्तियाँ तथा भ्रष्ट स्वभावों द्वारा निर्देशित विचार या इच्छाएँ होने के बावजूद शर्म की भावना वाले लोग अपना कर्तव्य करते समय जमीर और विवेक के आधार पर और अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा की रक्षा करने की नींव पर क्रियाकलाप करेंगे। भले ही वे कोई भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करें, लेकिन इसकी सीमाएँ होती हैं। इसके विपरीत, शर्म की भावना से रहित लोग किसी भी परिस्थिति और किसी भी परिवेश में दिखावा करने और अपना उत्कर्ष करने के लिए हर संभव तरीका आजमाते हैं। वे बिना सोचे-समझे बोलते हैं और सभी तरह की बातें कहते हैं। यहाँ तक कि वे दूसरों द्वारा की गई अच्छी चीजों का श्रेय भी लेते हैं या दूसरों की कमियों और गलतियों का यह दिखावा करने के लिए उपयोग करते हैं कि वे दूसरों से श्रेष्ठ और बेहतर हैं, इस बारे में बात करते हैं कि वे कितने अच्छे हैं और दूसरों को दबाने और नीचा दिखाने के आधार पर वे दूसरों से कैसे श्रेष्ठ हैं। कुछ लोगों के लिए, जितने अधिक लोग होते हैं, दिखावा करने की उनकी इच्छा उतनी ही अधिक हो जाती है; जब कम लोग होते हैं तो उन्हें लगता है कि उनकी इच्छा पूरी नहीं हो सकती। इसलिए जितने अधिक लोग होते हैं, वे उतना ही अधिक दिखावा और प्रदर्शन करना चाहते हैं; जितने अधिक लोग होते हैं वे उतने ही अधिक बेशर्म हो जाते हैं और उनमें शर्म की भावना उतनी ही कम होती है—वे अंतहीन एकालाप करते रहते हैं और खुद को नियंत्रित करने में असमर्थ होते हैं। वे दिखावा करने और इतराने का हर अवसर तलाशते हैं, यह शान बघारते हैं कि उनका रुतबा और पद कितना महान है, उनकी शैक्षिक योग्यताएँ कितनी ऊँची हैं, उनका ज्ञान कितना समृद्ध है, समाज में उनका रुतबा कितना ऊँचा है, वे परमेश्वर के घर में किस स्तर के अगुआ रहे हैं, उन्होंने क्या योगदान दिया है, आदि। वे अपने उत्कृष्ट गुणों की शान बघारने और यह दिखावा करने का हर अवसर तलाशते हैं कि वे बाकी लोगों से अलग हैं। वे अंतहीन दिखावा करते हैं और जितना अधिक वे बोलते हैं, उतने ही अधिक उत्तेजित हो जाते हैं। यदि तुम उनसे सत्य के उनके ज्ञान या जीवन प्रवेश के उनके अनुभवों पर संगति करने के लिए कहो, तो उनके शब्द नीरस होते हैं और वे केवल कुछ ही बातें कहते हैं। लेकिन जब अपनी शान बघारने, इस बारे में बताने की बात आती है कि वे बाकी लोगों से कैसे अलग हैं और उन्होंने क्या योगदान दिया है, तो वे बिना रत्ती भर भी शर्म की भावना के लगातार और अंतहीन रूप से बोलते रहते हैं। जब वे ये बातें कहना समाप्त कर लेते हैं और उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं बचता, तो वे इस बारे में बताते हैं कि जब वे छोटे थे तो कितने जबरदस्त लड़ाके थे, कैसे कोई उन्हें हरा नहीं सकता था और कैसे उन्होंने एक अन्य बच्चे की एक आँख भी फोड़ दी थी। वे यहाँ तक कहते हैं : “सभी बड़े-बुजुर्ग कहते थे, ‘यह बच्चा साधारण नहीं है; यह जब बड़ा होगा तो कोई साधारण व्यक्ति नहीं होगा!’” क्या ये बातें कहने वाले लोग शर्म की भावना से रहित नहीं होते? उनमें शर्म की कोई भावना नहीं होती; यह बढ़ा-चढ़ाकर बोलना और दिखावा करना है। शर्म की भावना से रहित लोग दिखावा करने और अपना उत्कर्ष करने का हर मौका लपक लेते हैं और ऐसा करने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं। चाहे दूसरे उन्हें किसी भी नजर से देखें, उन्हें बिल्कुल भी शर्म नहीं आती। इसके विपरीत, जिन लोगों में शर्म की भावना होती है, वे भी दिखावा करेंगे और अपना उत्कर्ष करेंगे, लेकिन भले ही वे सत्य न समझते हों और ताड़ना और न्याय से न गुजरे हों, फिर भी ऐसी चीजें करते समय वे नपे-तुले होते हैं। उनके शब्द कम से कम वस्तुनिष्ठ होते हैं। वे यह नहीं कहेंगे कि वे वो चीजें कर सकते हैं जो वे नहीं कर सकते, वे बड़ी-बड़ी बातें नहीं करेंगे या डींगें नहीं हाँकेंगे, दूसरों द्वारा की गई अच्छी चीजों का श्रेय लेना तो दूर की बात है। वे मनगढ़ंत चीजें नहीं कहेंगे या वे तथ्य नहीं गढ़ेंगे। ऐसा क्यों होता है? वे ऐसी बातें कहने के लिए तैयार नहीं हो पाते। वे सोचते हैं, “यदि मैंने यह नहीं किया, तो मुझे क्यों कहना चाहिए कि यह मैंने किया?” उनका जमीर उन्हें दोषी ठहराएगा। उदाहरण के लिए, यदि जमीर और विवेक तथा शर्म की भावना वाले किसी व्यक्ति को स्कूल में खराब ग्रेड मिले थे, तो हालाँकि वह यह डींग हाँकना चाहेगा कि उसकी काबिलियत अच्छी है और वह औसत व्यक्ति से कम नहीं है, लेकिन वह अधिक से अधिक यह कहेगा : “मैंने कड़ी पढ़ाई की थी। मैंने काम आसानी से करवाने के लिए कोई पैसा खर्च किए बिना अपने दम पर जूनियर हाई और हाई स्कूल की प्रवेश परीक्षाएँ उत्तीर्ण की थीं और बाद में मैं मुश्किल से एक जूनियर कॉलेज में प्रवेश पा सका था।” वह केवल इतना कहता है, “मैं भी कॉलेज गया था” और किसी भी चीज के बारे में डींग नहीं हाँकता। इसे दिखावा करना नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह जो कहता है वह वस्तुनिष्ठ और सच होता है। हो सकता है वह ऐसी चीजें न बताए जिनसे उसे शर्मिंदगी होती हो या जिनसे उसका सम्मान कम होता हो, लेकिन वह यह बिल्कुल नहीं कहेगा, “मैं एक महान छात्र था; मैं हमेशा अपनी कक्षा में शीर्ष दस में रहता था।” वे तथ्य नहीं गढ़ेंगे, शून्य में से चीजें नहीं बनाएँगे या ऐसी बातें नहीं कहेंगे जो कभी नहीं हुईं। क्या कारण है कि वे ये बातें नहीं कहते? ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके भीतर जमीर और शर्म की भावना होती है। कुछ लोग कहते हैं, “क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके आस-पास का कोई व्यक्ति उनके बारे में वास्तविक सच्चाई जानता है?” अगर कोई उनके बारे में वास्तविक सच्चाई नहीं जानता, तो भी वे ये बातें कहने के लिए तैयार नहीं हो पाते क्योंकि उनमें शर्म की भावना होती है और वे अपने गौरव का ध्यान रखते हैं। उन्हें लगता है कि शून्य में से चीजें बनाना और तथ्य गढ़ना बहुत शर्मनाक है और यह सत्यनिष्ठा और गरिमा से रहित है। कुछ लोग कहते हैं, “यदि दूसरे उनके बारे में वास्तविक सच्चाई नहीं जानते, तो वे थोड़ा दिखावा कर सकते हैं। दिखावा करने में क्या बड़ी बात है?” लेकिन वे फिर भी ऐसा नहीं करेंगे। यह व्यक्ति की प्रकृति की बात है; यह व्यक्ति के वर्गीकरण पर निर्भर करता है। यदि तुम शर्म की भावना वाले व्यक्ति हो, तो तुम्हारी बातचीत और क्रियाकलाप हमेशा शर्म की भावना होने की सीमाओं के भीतर रहेंगे। तुम वे सीमाएँ पार नहीं कर सकते; यदि तुम कभी-कभार उनसे एक कदम आगे निकल जाते हो, तो यह एक बहुत ही विशेष परिस्थिति होती है। एक बार जब तुम उन्हें पार कर लेते हो, तो तुम अपने जमीर में बेचैनी और आत्माभियोग की भावना महसूस करते हो; तुम अंदर से असहज महसूस करते हो। इसलिए भले ही शर्म की भावना वाले लोग दिखावा करें और डींगें हाँकें, लेकिन इसमें एक सीमा और एक दायरा होता है। वे बेशर्मी से और बिना किसी हिचकिचाहट के डींगें हाँकने और दिखावा करने के लिए खोखले शब्द या बड़ी-बड़ी बातें बिल्कुल नहीं कहेंगे, न ही वे शून्य में से चीजें बनाएँगे और सभी अच्छे कामों का श्रेय खुद लेने के लिए तथ्य गढ़ेंगे। वे ऐसे व्यक्ति बिल्कुल नहीं होते। शर्म की भावना होने की बात करें तो, यह शर्म की भावना लोगों के भीतर एक कार्य करती है; यह कोई खोखली चीज नहीं है। चूँकि शर्म की भावना मानवता का एक गुण है, इसलिए यह लोगों के भीतर जन्मजात होती है; यह बाहरी लोगों, घटनाओं और चीजों के संयम द्वारा लाया गया प्रभाव बिल्कुल नहीं होता। बाहरी चीजें तुम्हारे विचारों और कार्यों को संयमित नहीं कर सकतीं; व्यक्ति के विचार, उसकी आंतरिक जरूरतें और उसका सार तथा वर्गीकरण उसके लिए आंतरिक मामले हैं। अगर शर्म की भावना वाला कोई व्यक्ति लोगों के बीच थोड़ी प्रतिष्ठा पाने के लिए दिखावा करना या अपना उत्कर्ष करना और अपनी गवाही देना चाहता भी हो, तो भी चूँकि उसमें शर्म की भावना होती है, इसलिए जब वह ये काम करता है तब एक सीमा और एक दायरा बना रहता है। यानी उसका जमीर उसे उसके दिल में लगातार चेतावनी देता है, “ऐसा करना हद पार करना और बेशर्मी है। ऐसा मत करो! यदि तुम ऐसा करते हो, तो जब लोग बाद में तुम्हारी असलियत उजागर करेंगे तो यह बहुत शर्मनाक और अशोभनीय होगा! यदि तुम इस तरह से आचरण करते हो, तो क्या तुम अभी भी एक इंसान हो?” ये विचार और दृष्टिकोण हमेशा उसे संयमित कर रहे होते हैं, इसलिए जब वह ऐसे काम करता है तो एक सीमा बनी रहती है। देखो, जब शर्म की भावना वाले लोग कपड़े पहनते हैं, तो भले ही उन्हें कोई कपड़ा अच्छा लगे, लेकिन यदि वे आईने में देखें और उन्हें लगे कि यह थोड़ा पारदर्शी है, तो उन्हें लगता है कि इसे पहनकर बाहर जाना ठीक नहीं रहेगा। दूसरे लोग कहते हैं, “यदि यह पारदर्शी है तो क्या फर्क पड़ता है? आजकल लोग ऐसे ही कपड़े पहनते हैं। यह केवल थोड़ा शरीर दिखाने वाला है और तुम शर्मिंदा महसूस करते हो—दूसरे लोग इससे कहीं ज्यादा शरीर दिखाने वाले कपड़े पहनते हैं और परवाह तक नहीं करते।” वे कहते हैं : “बिल्कुल नहीं; मैं इसे पहनकर बाहर नहीं जा सकता।” वे मरते दम तक ऐसे बाहर नहीं जाएँगे। ऐसा क्यों है? उनकी शर्म की भावना उन्हें इसकी इजाज़त नहीं देती; उनकी शर्म की भावना उन्हें संयमित करती है। शर्म की भावना वाले लोग इस बात में नपे-तुले होंगे कि वे कैसे आचरण करते और मामले सँभालते हैं, या अपने पहनावे और सजने-सँवरने में, जबकि शर्म की भावना से रहित लोग अलग होते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कुछ लोग भाई-बहनों के साथ होने पर तो ठीक-ठाक कपड़े पहनते हैं लेकिन घर पहुँचते ही अलग तरह के कपड़े पहन लेते हैं, जो कुछ भी गैर-विश्वासी पहनना पसंद करते हैं वे उसे पहनते हैं—कुछ लोग तो घर पहुँचते ही सभा में पहने हुए कपड़े उतार फेंकते हैं और कहते हैं : “मुझे सच में ये कपड़े पहनना पसंद नहीं है। ये बहुत फूहड़ हैं; मैं इनमें बिल्कुल गँवार दिखता हूँ। यह पोशाक कौन पहनना चाहेगा!” चाहे वे भाई-बहनों के साथ हों या नहीं, सच में शर्म की भावना रखने वाले लोगों का पहनावा और सजना-सँवरना हमेशा गरिमापूर्ण और शालीन होता है। भले ही वे परमेश्वर में विश्वास न करते हों, लेकिन वे फिर भी इसी तरह कपड़े पहनेंगे और अधिक अति नहीं करेंगे।
सभाओं में संगति करते और अपनी अनुभवजन्य समझ साझा करते समय यदि सत्यनिष्ठा और गरिमा वाला कोई व्यक्ति दिखावा करता और अपनी बड़ाई करता है तो वह अंदर से शर्मिंदा महसूस करेगा, मानो बहुत सारे लोग उसे देख रहे हों, और यह भावना उसे प्रेरित करती है, "यह कहना अच्छा नहीं है, है ना? यह करना अच्छा नहीं है, है ना?" वह शर्मिंदा महसूस करेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि वह चाहे कुछ भी कहे या करे या उसके शब्द या क्रियाकलाप किसी भी हद तक जाएँ, उसके हृदय की गहराई में मौजूद शर्म की भावना उसे लगातार प्रेरित करती है, संयमित करती है और नियंत्रित करती है। इस प्रकार उसके द्वारा कहे जाने वाले शब्द और किए जाने वाले कार्य सत्यनिष्ठा और गरिमा को अपेक्षाकृत कुछ हद तक दर्शाते हैं। भले ही ऐसे व्यक्ति में भ्रष्ट स्वभाव हों या उसकी मानवता में कुछ कमियाँ हों या वह दुष्ट प्रवृत्तियों से प्रभावित हो, लेकिन अपने जन्मजात वर्गीकरण के कारण वह लोगों को उजागर करने वाले और उनका न्याय करने वाले परमेश्वर के वचन सुनने पर अभी भी अवचेतन रूप से परमेश्वर के वचनों से अपना मिलान करने में सक्षम होता है। वह सोचता है, "इस कथन के द्वारा परमेश्वर मेरे बारे में बात कर रहा है। मुझमें इस तरह की दशा और प्रकाशन रहा है और मेरी भी इस तरह की अभिव्यक्ति रही है।" वह परमेश्वर के वचनों से अपना सचेत रूप से मिलान करने की दशा और अभिव्यक्ति प्रदर्शित करेगा। दूसरे शब्दों में, जब शर्म की भावना वाला कोई व्यक्ति लोगों को उजागर करने वाले और उनका न्याय करने वाले परमेश्वर के वचन सुनता है तो वह अवचेतन रूप से उन्हें स्वीकार कर लेगा और अवचेतन रूप से उनसे अपना मिलान करेगा। वह परमेश्वर के वचनों के आधार पर आत्म-चिंतन करेगा और स्वीकार करेगा कि वह इस तरह से भ्रष्ट है और उसमें ये प्रकाशन और अभिव्यक्तियाँ हैं। वह अंतर्मन में बेचैन महसूस करेगा : "अब पता चला कि मुझमें भी भ्रष्टता है। अब पता चला कि मैं घमंडी स्वभाव वाला व्यक्ति हूँ जैसा कि परमेश्वर के वचन उजागर करते हैं। मैं विद्रोही और अवज्ञाकारी भी हूँ और मैं अच्छा व्यक्ति नहीं हूँ। मैं इतना भ्रष्ट कैसे हो सकता हूँ? मैं सोचता था कि मैं शालीन हूँ, मैं जमीर और विवेक वाला एक अच्छा व्यक्ति हूँ जो दूसरों को देना पसंद करता है और जो दूसरों के प्रति सहानुभूति रखता है और उन पर दया दिखाता है। मैंने सोचा था कि परमेश्वर का कार्य स्वीकार करने के बाद मुझे सीधे उठा लिया जा सकता है। मैंने सोचा तक नहीं था कि मैं भी भ्रष्ट मानवजाति का सदस्य हूँ।" चूँकि उसमें शर्म की भावना होने की यह बुनियादी स्थिति होती है, इसलिए वह परमेश्वर के वचनों द्वारा उजागर किए गए लोगों के बारे में वास्तविक तथ्यों को स्वाभाविक और सामान्य रूप से स्वीकार कर लेगा और फिर आत्म-चिंतन करने और खुद को जानने के लिए उनसे अपना मिलान करेगा। यह उसे परमेश्वर के वचनों का सही ढंग से सामना करने, बिना किसी टकराव के परमेश्वर के वचन स्वीकार करने और फिर थोड़ा-थोड़ा करके समर्पण प्राप्त करने का एक शानदार अवसर देता है। यह सब किस पर आधारित है? यह उसमें शर्म की भावना होने पर आधारित है। इस प्रकार वह यह महसूस करने में सक्षम होता है कि उसके भीतर भ्रष्टता के कुछ शर्मनाक और दुष्ट प्रकाशन हैं और फिर उसकी शर्म की भावना के उस पर कार्य करने के कारण वह उन चीजों को सक्रिय रूप से त्यागने में सक्षम होता है जिन्हें वह नकारात्मक और शर्मनाक मानता है। जब वह मानवजाति के भ्रष्ट स्वभाव उजागर करने वाले परमेश्वर के वचनों में कथनों, दशाओं, विशिष्ट प्रकाशनों और यहाँ तक कि विशिष्ट घटनाओं को सुनता है, तो वह यह महसूस करने में सक्षम होता है कि उसके भीतर ये भ्रष्ट स्वभाव हैं। वह आत्म-चिंतन करने और खुद को जानने के लिए उन्हें स्वीकार कर लेगा। बाद में ऐसे मामलों का फिर से सामना करने पर यदि वह परमेश्वर के वचनों के खिलाफ जाता है या एक बार फिर परमेश्वर के वचनों में उजागर की गई दशाएँ प्रकट करता है तो उसकी शर्म की भावना अभी भी उसे उसके हृदय में प्रेरित करेगी : "ऐसा करके क्या तुम परमेश्वर के वचनों के खिलाफ नहीं जा रहे? तुम अच्छे व्यक्ति नहीं हो, न ही तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण करता है या सत्य से प्यार करता है!" चूँकि उसमें शर्म की भावना होती है, इसलिए वह परमेश्वर के वचनों का खुलासा और न्याय स्वीकार करने में सक्षम होता है। तब परमेश्वर के वचनों का उस पर संयमकारी प्रभाव होता है और वे उसके विचारों और दृष्टिकोणों को सुधार सकते हैं। देखो, क्या शर्म की भावना का प्रकार्य बहुत बड़ा नहीं है? (हाँ।) जब वह सत्य नहीं समझता, तब उसकी एक बुनियादी नैतिक सीमा होती है। जब वह सत्य सिद्धांतों को समझता है या परमेश्वर के वचनों के विवरण समझता है तो वह मानक, जिसके द्वारा उसकी शर्म की भावना उसे संयमित करती है, अब उसकी नैतिक सीमा नहीं रह जाता, न ही वह केवल उसके जमीर और विवेक की सीमा रह जाता है; बल्कि सत्य सिद्धांत उसकी सीमा बन जाते हैं। क्या यह सीमा व्यक्ति के जमीर और विवेक की सीमा से श्रेष्ठ नहीं है? क्या इस सीमा का मानक ऊँचा नहीं हो गया है? (हाँ।) शुरू में, जब शर्म की भावना वाले लोग सत्य नहीं समझते, तब उनके विचारों और दृष्टिकोणों में एक बुनियादी नैतिक सीमा होती है। सत्य समझने के बाद उनकी नैतिक सीमा ऊँची हो जाती है और धीरे-धीरे सत्य सिद्धांतों की ओर बढ़ती है। क्या तुम्हें नहीं लगता कि ऐसा व्यक्ति बदल गया है? मैं एक उदाहरण दूँगा और तुम लोग समझ जाओगे। उदाहरण के लिए, शुरू में दूसरों के साथ मेल-जोल रखते समय वह लोगों का फायदा नहीं उठाता था, लोगों को मारता नहीं था या गाली नहीं देता था, जानबूझकर दूसरों को धोखा देने और नुकसान पहुँचाने वाले काम नहीं करता था और दूसरों को छलता और ठगता नहीं था। उसे लगता था कि ऐसा करना काफी अच्छा है। क्या लोगों को मारने या गाली देने से बचना और उन्हें धोखा देने या नुकसान पहुँचाने से बचना लोगों के साथ व्यवहार करने का एक सत्य सिद्धांत है? (यह केवल मानवता की एक बुनियादी अभिव्यक्ति है; यह सत्य सिद्धांत नहीं है।) यह केवल इस बात की नैतिक सीमा है कि जमीर और विवेक वाले लोग कैसे आचरण करते हैं : लोगों को न मारने या गाली न देने और दूसरों को धोखा देने या नुकसान पहुँचाने वाले काम न करने की पूरी कोशिश करना। यह केवल बुरे काम करने से बचना है। लेकिन सत्य सिद्धांत व्यक्ति की नैतिक सीमा से ऊँचे होते हैं। लोगों के साथ सत्य सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करना अब केवल अपनी नैतिक सीमा का पालन करना नहीं रह जाता; यह उससे कहीं अधिक ऊँचा है। तो जब लोगों के साथ व्यवहार करने के इस सिद्धांत की बात आती है जो व्यक्ति की नैतिक सीमा से अधिक ऊँचा है तो परमेश्वर के वचन क्या अपेक्षा करते हैं? (लोगों के साथ सिद्धांतों के अनुसार निष्पक्ष व्यवहार करना।) सही कहा, लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना। यह एक सत्य सिद्धांत है। तो क्या यह सत्य सिद्धांत एक नैतिक सीमा है? (नहीं, यह सिद्धांत किसी नैतिक सीमा से श्रेष्ठ है।) यह कोई नैतिक सीमा नहीं है; यह एक सत्य सिद्धांत है जो एक नैतिक सीमा पर आधारित है और उससे श्रेष्ठ भी है। लोगों के साथ व्यवहार करने का यह सच्चा सिद्धांत है। लोगों को मारने या गाली देने से बचना और दूसरों को धोखा देने या नुकसान पहुँचाने वाले काम करने से बचना कोई सत्य सिद्धांत नहीं है; यह केवल नकारात्मक अर्थ में काम करने से बचना मात्र है। लेकिन केवल इसलिए कि तुम उन्हें करने से बचते हो, इसका मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे पास लोगों के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत हैं; लोगों को न मारने या गाली न देने का मतलब यह नहीं है कि लोगों के साथ व्यवहार करने के तुम्हारे सिद्धांत सही हैं। क्या उन्हें मारने या गाली देने से बचना और उन्हें धोखा देने या नुकसान पहुँचाने से बचना उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार करने के बराबर है? ऐसा नहीं है, है ना? यदि कोई ऐसा व्यक्ति है जिसने कभी तुम्हें नाराज किया था या जिसके साथ तुम्हारी नहीं बनती थी या यह कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे तुम पसंद नहीं करते लेकिन अपनी मानवता और काबिलियत के आधार पर वह अगुआ बनने के योग्य है, क्या तुम उसे चुनोगे? यदि तुम इसे लोगों को न मारने या गाली न देने और उन्हें धोखा न देने या नुकसान न पहुँचाने के सिद्धांत से मापो, तो तुम क्या करोगे? तुम्हारे पास अनुसरण करने के लिए कोई मार्ग नहीं होगा। एक भ्रष्ट इंसान के रूप में, लोगों के साथ व्यवहार करने के सटीक सिद्धांतों के बिना, तुम अधिक से अधिक यह कहोगे : "मैंने उसे मारा नहीं या उसे गाली नहीं दी, न ही मैंने यह कहा कि वह अच्छा है या बुरा। मैंने उसे रोका नहीं, इसलिए तुम यह नहीं कह सकते कि मैंने उसे धोखा दिया या नुकसान पहुँचाया। वैसे भी, मैं उसे पसंद नहीं करता, इसलिए मैं उसे नहीं चुनूँगा।" क्या उसे न चुनना लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना है? (नहीं।) असल में, यदि वह अगुआ के लिए एक उपयुक्त उम्मीदवार है तो तुम्हें उसे चुनना चाहिए; केवल यही लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना है। उसे चुनना लोगों को न मारने या गाली न देने और उन्हें धोखा न देने या नुकसान न पहुँचाने के सिद्धांत पर आधारित नहीं है, बल्कि किस पर आधारित है? यह परमेश्वर के वचनों द्वारा अपेक्षित लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करने के सिद्धांत पर आधारित है; केवल यही सत्य सिद्धांत है। इसलिए कुछ लोग सोचते हैं, "मैं लोगों को मारता या गाली नहीं देता, न ही मैं उन्हें धोखा देता या नुकसान पहुँचाता हूँ, तो क्या यह मुझे एक अच्छा व्यक्ति नहीं बनाता?" जिस पर मैं कहता हूँ, "तुम एक अच्छे व्यक्ति नहीं हो। अधिक से अधिक, यह भी तुम्हारा सौभाग्य ही है कि तुम्हें इंसान माना जाता है।" एक सचमुच अच्छा व्यक्ति वह है जो सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कर सकता है। यानी जब लोगों के साथ व्यवहार करने की बात आती है तो उन्हें मारने, गाली देने, धोखा देने या नुकसान पहुँचाने से बचने के अलावा तुम उनके साथ निष्पक्ष और न्यायपूर्ण व्यवहार भी कर सकते हो; केवल तभी तुम एक अच्छे व्यक्ति हो। क्या इस तरह संगति करने से यह स्पष्ट हो जाता है? (हाँ।) एक नैतिक सीमा उन लोगों के लिए स्व-आचरण का एक बुनियादी सिद्धांत है, जिनके पास मानवता का जमीर और विवेक होता है। हालाँकि स्व-आचरण का यह सिद्धांत मानवता के जमीर और विवेक के अनुरूप है, लेकिन यह सत्य सिद्धांतों की जगह नहीं ले सकता; सत्य सिद्धांतों की तुलना में इसमें अभी भी कमी है। अधिक से अधिक, नैतिक सीमा वाला व्यक्ति एक मानक व्यक्ति होता है, लेकिन उसे एक अच्छा व्यक्ति नहीं कहा जा सकता। केवल वे ही अच्छे लोग हैं, जो सत्य सिद्धांतों के अनुसार आचरण और क्रियाकलाप कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, यह पहले ही काफी अच्छा है यदि दूसरों के साथ व्यवहार करने की बात आने पर कोई आम व्यक्ति दूसरों को धोखा न देने या नुकसान न पहुँचाने और लोगों को न मारने या गाली न देने में सक्षम हो। लेकिन लोगों के साथ व्यवहार करने के एक अच्छे व्यक्ति के सिद्धांत इससे ऊपर उठे हुए होते हैं : वह लोगों के साथ निष्पक्ष रूप से और सत्य सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करने में सक्षम होता है। यानी एक सच्चे इंसान में एक नैतिक सीमा और शर्म की भावना होती है और वह उचित रूप से आचरण करने की बुनियादी शर्तें पूरी करता है। इस प्रकार ऐसे व्यक्ति के पास लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करने, सत्य सिद्धांतों के अनुसार आचरण करने और सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने का अवसर होता है। क्या नैतिक सीमा और सत्य सिद्धांतों के बीच कोई अंतर है? (हाँ।)
यदि किसी व्यक्ति की मानवता में शर्म की भावना है तो उसके आचरण और क्रियाकलाप करने के तरीके में सत्यनिष्ठा और गरिमा होती है। उसकी सीमा यह होती है कि उसे अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा की रक्षा करनी चाहिए और उन्हें खोना नहीं चाहिए। रोजमर्रा की भाषा में कहें तो ऐसे व्यक्ति ने मूल रूप से अपना जमीर नहीं त्यागा है; वह इस बारे में विशेष रूप से सजग रहता है कि वह कैसे काम करता है, वह सत्यनिष्ठा और चरित्र को महत्व देता है और उसमें मानवीय संवेदना होती है। वह चाहे कुछ भी करे, जब व्यक्तिगत हितों, रुतबे या पैसे की बात आती है, तो उस व्यक्ति की एक सीमा होती है। यह सीमा उसकी सत्यनिष्ठा और गरिमा की रक्षा करती है; यानी वह अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा से परे जाकर बेईमानी से ऐसे काम नहीं करेगा, जो नैतिक न्याय या मानवीय नैतिकता के हिसाब से अनुचित हों। यह शर्म की भावना होना है। इसके अतिरिक्त, अपनी मानवता में जमीर और विवेक के गुणों वाले लोगों के खाने, पीने और मौज-मस्ती करने तथा समाज में विभिन्न दुष्ट प्रवृत्तियों के संबंध में अपने अलग विचार और पसंद होती है। वे भ्रमित और भ्रष्ट जीवन जीने के लिए दुष्ट प्रवृत्तियों का अनुसरण बिल्कुल नहीं करेंगे, मनमाने ढंग से भोगासक्त नहीं होंगे और भ्रष्ट व्यवहार नहीं करेंगे। मानव-संसार के मामलों या दुष्ट प्रवृत्तियों के संबंध में उनके अपने चुनाव होते हैं। ये चुनाव उनकी ईमानदारी और दयालुता पर आधारित हो सकते हैं या वे उनकी शर्म की भावना पर आधारित हो सकते हैं; यह विचाराधीन मामले पर निर्भर करता है। दुनिया में दिखाई देने वाली विभिन्न चीजें चाहे कितनी भी लोकप्रिय हों और चाहे समाज तथा जनता द्वारा उन्हें कितना भी अनुमोदित किया जाए, अपने अंतर्मन में ऐसे लोग अभी भी इन चीजों के बारे में अपने अलग विचार और दृष्टिकोण रखते हैं और वे अभी भी अपने सही विकल्प ही चुनेंगे। अपने दिलों में वे मानते हैं : "परिस्थितियाँ चाहे जो भी हों, तुम अपनी मानवता नहीं छोड़ सकते। हर समय तुम एक इंसान हो। तुम वे चीजें नहीं कर सकते, जो जानवर करते हैं। तुम वे चीजें नहीं कर सकते, जो दानव करते हैं। तुम खुद को जानवरों और दानवों के समान नहीं बना सकते।" इसलिए वे चाहे कुछ भी करें, वे अपने जमीर और विवेक द्वारा संयमित होते हैं। विशेष रूप से, इस संयम का अर्थ है उनके जमीर और विवेक द्वारा लगातार प्रेरित और नियंत्रित किया जाना। उदाहरण के लिए, मान लो कि ऐसा कोई व्यक्ति और एक अन्य व्यक्ति दोनों व्यवसाय कर रहे हैं। दूसरा व्यक्ति लगातार लोगों को धोखा देता और ठगता है, दस युआन की चीज तीन सौ से पाँच सौ युआन में बेचता है, लेकिन वह उसे केवल पचास युआन में बेचता है और बस इतना ही कमाता है जिससे मुश्किल से गुजारा हो सके। दूसरे व्यक्ति को भारी मुनाफा कमाते देखकर, जबकि वह इतने वर्षों तक इतनी लगन से काम करके केवल अपना पेट भरने लायक ही कमा पाया है, वह हमेशा अपने हृदय में असंतुष्ट महसूस करता है। वह भी दूसरे व्यक्ति की तरह बेईमान होना चाहता है, लेकिन फिर वह सोचता है : "ऐसा करना मेरे जमीर के बहुत खिलाफ होगा। मैं ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हो सकता! यदि ऐसा करने के बाद मैं उजागर हो गया तो क्या होगा? क्या ऐसा करना कानून तोड़ना होगा? क्या मैं जेल जाऊँगा?" देखा तुमने, वह इस बारे में बहुत सोचता है और इस तरह सोच-विचार करने पर वह अपने जमीर से लगातार आत्माभियोग की भावना महसूस करता है। हालाँकि वह दुनिया की विभिन्न दुष्ट प्रवृत्तियों से गुमराह और प्रभावित होता है और एक अच्छे भौतिक जीवन का आनंद लेने के लिए अधिक पैसा भी कमाना चाहता है, लेकिन सोच-विचार करने के बाद अंततः वह दूसरों को धोखा देने और ठगने के लिए तैयार नहीं हो पाता। कुछ लोग कहते हैं, "ऐसे लोग बस डरपोक होते हैं, है ना?" उनमें से कुछ डरपोक होते हैं लेकिन कुछ नहीं होते; वे केवल अपने जमीर और विवेक द्वारा संयमित होते हैं और महसूस करते हैं कि वे दूसरों को धोखा नहीं दे सकते और न उन्हें ठग ही सकते हैं। अगर वे कभी-कभार ऐसा कर भी लें, तो भी बाद में उन्हें पछतावा होता है और वे रोज इस डर में जीते हैं कि कुछ गड़बड़ हो जाएगी और कोई उनके दरवाजे पर आ धमकेगा। वे मन ही मन सोचते हैं, "मैंने यह पैसा ईमानदारी से नहीं कमाया है। यदि लोगों को पता चल गया, तो क्या वे मेरी पीठ पीछे मेरी आलोचना करेंगे? मैं निश्चित रूप से दोबारा ऐसा नहीं करूँगा। जब वह पैसा, जो मैं खर्च करता हूँ, मेरी कड़ी मेहनत से कमाया गया होता है, केवल तभी मेरे मन को शांति मिलती है और केवल तभी सोते समय मुझे बुरे सपने नहीं आते।" इस तरह एक बार किसी को धोखा देने के बाद उनके लिए लंबे समय तक चीजें कठिन हो जाती हैं; वे ठीक से सो नहीं पाते, खाना उनके गले से नहीं उतरता और वे हमेशा अपने दिल में बेचैन महसूस करते हैं। बेशक समाज में ऐसा व्यक्ति मूल रूप से मौजूद नहीं होता। समाज ऐसे लोगों से भरा है जो दानवों के हैं और पशुओं के हैं; इस तरह दूसरों को धोखा देने और ठगने पर वे कुछ भी महसूस नहीं करते।
भले ही जमीर और विवेक वाला कोई व्यक्ति अक्सर खाने, पीने और मौज-मस्ती करने से जुड़े विभिन्न मामलों के संपर्क में आए, लेकिन उसका जमीर और विवेक अभी भी अपनी भूमिका निभाएँगे। वह अपनी विभिन्न इच्छाओं को पूरी तरह से संतुष्ट करने के लिए देह या दुष्ट प्रवृत्तियों का अनुसरण नहीं करेगा। इसके बजाय, वह चाहे कुछ भी खाए, पिए या किसी भी चीज का आनंद ले, उसकी एक सीमा होती है। वह सोचता है, "अच्छा भोजन करना, अच्छे कपड़े पहनना और सर्वोत्तम शारीरिक सुख का होना सब व्यर्थ है। क्या लोग वास्तव में इसी के लिए जीते हैं?" ऐसे व्यक्ति के हृदय में शारीरिक सुख, खाना, पीना और मौज-मस्ती करना उसके आंतरिक संसार की जरूरतें पूरी नहीं कर सकते। वह मन ही मन सोचता है, "लोग हमेशा अच्छी चीजों का आनंद लेने का अनुसरण करते हैं। अब मैंने स्वयं उनका आनंद लिया है और मुझे कोई खुशी महसूस नहीं होती। आखिर खुशी क्या है? सच्ची खुशी पाने के लिए व्यक्ति को कैसे जीना चाहिए? मैंने इस सारे खाने, पीने और मौज-मस्ती करने के साथ-साथ विभिन्न शारीरिक सुखों का आनंद लिया है—क्या मानव-जीवन में यही सब शामिल नहीं है? क्या यही जीवन है? यदि कोई अपना पूरा जीवन इसी तरह जीता है, केवल खाने, पीने और मौज-मस्ती करने का अनुसरण करने और शारीरिक सुखों का अनुसरण करने के लिए, तो वह किसी जानवर से कैसे अलग है? यदि इंसान भी जानवरों की ही तरह केवल दिन में तीन बार भोजन करने के लिए जीते हैं, यह नहीं समझते कि जीवन क्या है, अपने विचारों, अपने आध्यात्मिक संसार और अपने हृदय में अतृप्त रहते हैं और जीवन के बारे में कई चीजें नहीं समझते, तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस तरह जीने का क्या मतलब है?" जब लोग युवा होते हैं, तो दुनिया के बारे में जिज्ञासा से भरे होते हैं। ऐसी बहुत-सी चीजें होती हैं जिनके बारे में वे नहीं जानते और जो उन्होंने नहीं देखी होतीं और बहुत-सी चीजें हैं जिनका उन्होंने अनुभव नहीं किया होता और उन्हें लगता है कि यदि वे बाहर जाएँ और दुनिया का सामना करें, तो उनका जीवन बहुत खुशहाल और संतोषप्रद हो सकता है या वे एक अद्भुत और अनूठा जीवन जी सकते हैं। लेकिन समाज का वास्तव में अनुभव करने के बाद वे देखते हैं कि मानवजाति पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसी तरह जीती है। अपनी युवावस्था में मूर्ख और अज्ञानी होने से लेकर समाज में कुछ चीजों से गुजरने के माध्यम से बहुत कष्ट सहने और कुछ जीवन अनुभव प्राप्त करने तक सभी लोग इसी तरह अपना जीवन व्यतीत करते हैं। वे सभी संभावनाओं, प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण करने तथा खाने, पीने, मौज-मस्ती करने और शारीरिक सुखों पर ध्यान केंद्रित करने की प्रक्रिया से गुजरते हैं। अपने बाद के वर्षों में हालाँकि उन्होंने कुछ जीवन अनुभव प्राप्त कर लिया होता है, लेकिन ऐसा लगता है कि उन्होंने कुछ भी हासिल नहीं किया है, न ही वे समझते हैं कि जीवन क्या है। क्या एक व्यक्ति के लिए अपना पूरा जीवन इस तरह जीना अपेक्षाकृत अर्थहीन नहीं है? लोग अक्सर एक अकथनीय खालीपन महसूस करते हैं। यानी जब वे वास्तव में अपने हृदय में जीवन पर विचार करते हैं और कुछ सार्थक और मूल्यवान सोचने की कोशिश करते हैं तो वे कुछ नहीं सोच पाते और उनके हृदय पूरी तरह से खाली महसूस करते हैं। वे नहीं जानते कि ऐसा क्यों है, न ही वे जानते हैं कि उनके दिलों को किस चीज की आवश्यकता होनी चाहिए या उनके दिलों को कहाँ विश्राम करना चाहिए। उन्हें लगता है कि उनके पास भरोसा करने के लिए कुछ नहीं है और वे बहुत व्यग्र महसूस करते हैं और मन ही मन सोचते हैं, "मैंने इस जीवन में काफी चीजों का अनुभव किया है और मैंने विभिन्न कठिनाइयों और पीड़ाओं का स्वाद चखा है। क्या वाकई जीवन इसी तरह समाप्त हो जाता है?" जब वे वृद्ध लोगों को देखते हैं तो ऐसा लगता है कि उन्होंने भी जीवन इसी तरह गुजारा है। तब उन्हें लगता है कि लोगों का जीवन अर्थहीन है। वे हमेशा प्रसिद्धि और लाभ, रुतबे और शारीरिक सुखों का अनुसरण करते रहे हैं। जब ये उनके पास नहीं होते, तब वे इन्हें पाने पर तुले रहते हैं; जब वे इन्हें पा लेते हैं, तब वे थोड़ी खुशी महसूस करते हैं और कुछ समय के लिए थोड़ा आनंदित होते हैं, लेकिन अंततः उनके पास कोई उल्लेखनीय खुशी नहीं होती। अपने अधिकांश जीवन में भाग-दौड़ करने के बाद भी वे खालीपन महसूस करते हैं और उनके पास ऐसा कुछ नहीं होता, जिसे वे थामे रह सकें। उन्हें हमेशा ऐसा लगता है जैसे वे दोनों हाथों से हवा पकड़ रहे हों, फिर भी उससे कुछ पाने की उम्मीद कर रहे हों। क्या तुम लोग कहोगे कि यह भावना अच्छी है? (नहीं।) तो फिर यह भावना कैसे पैदा होती है? (बात यह है कि दुनिया में वह सारा खाना, पीना और मौज-मस्ती करना लोगों की आंतरिक जरूरतें पूरी नहीं कर सकता।) क्या हर कोई इसी तरह सोचता है? कैसे लोग इस तरह सोचते हैं? (जमीर और विवेक वाले लोग इस तरह सोचते हैं।) मुझे बताओ, क्या विचारहीन, तार्किक सोच से रहित लोग और वे लोग जो नासमझ हैं, इस तरह सोचेंगे? (नहीं।) नासमझ लोग वे होते हैं जिनमें जमीर और विवेक नहीं होता; वे पशुओं के होते हैं। वे मानवता के इन मामलों के बारे में नहीं सोचते, न ही वे मानव-जीवन, भविष्य या किस मार्ग पर चलना है, इस पर विचार करते हैं। वे इन चीजों पर कोई विचार नहीं करते। जब तक वे खा-पी सकते हैं, वे संतुष्ट रहते हैं। वे बिना किसी उद्देश्य के हर दिन बस जैसे-तैसे काट लेते हैं, जितने दिन जीते हैं मौज-मस्ती करते हैं और जितना हो सके, हर दिन का आनंद लेते हैं। वे जीवन से जुड़े इन मामलों पर विचार नहीं करते। तो फिर इन चीजों का मानवता के जमीर और विवेक से क्या लेना-देना है? यदि किसी में जमीर और विवेक है, तो वह जो कुछ भी करता है, उसमें तार्किकता प्रदर्शित करेगा। तार्किकता होना लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। जब लोगों में तार्किकता होती है, तो वे ज्यादातर समय भावनाओं के आधार पर नहीं जीते, बल्कि तार्किक रूप से जीते हैं, वर्तमान क्षण में तार्किक रूप से जीते हैं। वे विचार करेंगे, "क्या मैंने वास्तव में इस जीवन में कुछ हासिल किया है? क्या यह जीवन जीने लायक रहा है? क्या मैंने कुछ सार्थक और मूल्यवान किया है? क्या जिन चीजों का मैं अनुसरण करता हूँ, वे वही हैं जिनकी मुझे अंदर से आवश्यकता है? क्या मेरी आंतरिक जरूरतें पूरी हुई हैं? वे पूरी नहीं हुई हैं और मैं बहुत खालीपन महसूस करता हूँ। न तो कोई भौतिक चीज, न ही पारिवारिक स्नेह या दोस्ती, मुझे अंतर्मन में संतुष्ट कर सकती है। इनमें से कोई भी चीज वह नहीं है, जिसकी मेरी मानवता को आवश्यकता है।" वे इन चीजों के बारे में तार्किक रूप से सोचेंगे। यानी जितने ज्यादा वे प्रौढ़ होते जाएँगे, उतने ही ज्यादा तार्किक ढंग से वे इन चीजों को देखेंगे, और जितना ज्यादा वे उत्तर पाने में विफल होते हैं, उतना ही ज्यादा दर्द उन्हें महसूस होता है। इन चीजों का अनुभव करने से पहले लोग योजनाबद्ध तरीके से और सामान्य तार्किकता का उपयोग करके विवेक के दायरे में कुछ चीजों का आकलन और उनकी कल्पना करेंगे। लेकिन जब वे इन चीजों की प्रक्रिया से गुजर चुके होते हैं और पीछे मुड़कर देखते हैं, तब वे अधिक तार्किक हो जाते हैं। वे उन चीजों को तार्किक रूप से देखेंगे, जिनका उन्होंने अनुभव किया है और जिन चीजों को उन्होंने जिया है, और वे देखेंगे कि ये सभी चीजें व्यर्थ हैं और एक भी चीज सार्थक नहीं है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि लोग जो कुछ भी करते हैं, वह भोजन और कपड़ों के लिए, अपनी देह के लिए दिन में तीन बार का भोजन जुटाने के लिए और शारीरिक सुखों की रक्षा करने के लिए होता है। वे प्रसिद्धि और लाभ के लिए होड़ करते हैं और एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं। यदि कोई व्यक्ति अपना पूरा जीवन केवल इन चीजों के लिए जीता है, एक जानवर की तरह, तो वह एक जानवर से बहुत अधिक उन्नत नहीं है; इस तरह जीने का कोई मूल्य नहीं है। मानवीय विवेक वाले लोग अपने हृदयों में इन चीजों पर विचार करेंगे। इसलिए, जब वे एक निश्चित उम्र तक पहुँचते हैं, तो जीने के ये लगातार दोहराए जाने वाले तरीके, दुनियादारी के नियम और मामले सँभालने के तरीके उन्हें थका हुआ, विमुख, घृणा करता और ऊबा हुआ महसूस कराएँगे। अंततः उनमें खालीपन की भावना विकसित होगी, वे महसूस करेंगे कि उन्होंने इन सभी चीजों का आनंद और अनुभव लिया है, फिर भी उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ है और उन्हें कोई भी वास्तविक, ठोस चीज प्राप्त नहीं हुई है जो वास्तव में उनकी मानवता की जरूरतें पूरी करती हो। इन परिस्थितियों में, जमीर और विवेक वाले लोग आगे पता लगाएँगे, खोजेंगे और टटोलेंगे : सच्चा मानव-जीवन असल में क्या है? व्यक्ति को अपना जीवन वास्तव में कैसे जीना चाहिए? कुछ चतुर लोग जीवन में एक मार्ग खोजेंगे और धार्मिक आस्था ढूँढने का प्रयास करेंगे। इसी संदर्भ में कुछ लोग परमेश्वर के घर आते हैं। वे पाते हैं कि केवल परमेश्वर के वचन और सत्य, मार्ग और जीवन, जो परमेश्वर मानवजाति को प्रदान करता है, उनकी जरूरतें पूरी कर सकते हैं। जब वे जीवन का मूल्य और अर्थ क्या है, जैसे प्रश्नों के बारे में खोजबीन करते हैं, तब केवल परमेश्वर के वचन ही उन्हें उत्तर दे सकते हैं। केवल तभी उनमें परमेश्वर के वचनों के लिए प्यास विकसित होती है और इसके बाद वे परमेश्वर के वचन स्वीकार करते हैं और फिर उनके प्रति समर्पण करने के लिए एक कदम आगे बढ़ते हैं। परमेश्वर के वचनों के लिए उनकी प्यास, उनकी स्वीकृति और उनके प्रति उनका समर्पण सब उनके जीवन के अनुभव पर आधारित होते हैं और जीवन में उनके द्वारा अनुभव की गई कुछ चीजों पर उनके चिंतन से उत्पन्न होते हैं।
क्या तुम लोगों को लगता है कि हमने अभी जिस विषय पर संगति की, वह अमूर्त है? क्या तुम इसे समझ सकते हो? (यह अमूर्त नहीं है। हम इसे समझ सकते हैं।) यह विषय न तो अमूर्त है और न ही खोखला; यह सब वे चीजें हैं जिन्हें लोग वास्तविक जीवन में देख सकते हैं और जिनके संपर्क में आ सकते हैं। यदि कोई सोचता है कि मानवता के जमीर और विवेक पर संगति करना वास्तविक जीवन से कटा हुआ है और महसूस करता है कि यह विषय बहुत खोखला और अमूर्त है, मानो यह किसी दूसरी दुनिया में होने वाली कोई चीज हो और लोगों से बहुत दूर हो, तो उस व्यक्ति को कोई समस्या है, है ना? तुम स्व-आचरण से जुड़े मामले नहीं समझते और तुम्हारे स्व-आचरण में कोई जमीर या विवेक नहीं है। तो आखिर तुम क्या हो—दानव या जानवर? यह कहना कठिन है, लेकिन हर हाल में, तुम इंसान नहीं हो। जमीर और विवेक वाले लोग मानवता के जमीर और विवेक से संबंधित विचारों या अभिव्यक्तियों को समझ सकते हैं और उनसे जुड़ सकते हैं। यदि कोई इन सकारात्मक विचारों या अभिव्यक्तियों से नहीं जुड़ सकता, लेकिन नकारात्मक विचारों से जुड़ सकता है तो यह दर्शाता है कि उसके भीतर जमीर या विवेक नहीं है। कुछ लोग, जिनमें जमीर और विवेक नहीं होता, मानवता के जमीर और विवेक से संबंधित विचारों और दृष्टिकोणों तथा आचरण के तरीकों से गहराई से घृणा तक करते हैं, उन्हें ये चीजें शर्मनाक, घृणित या तिरस्कारपूर्ण लगती हैं—ये वे लोग हैं, जिनमें मानवता के गुण नहीं होते। जिन लोगों में मानवता के गुण नहीं होते, वे मानवता के जमीर और विवेक की अभिव्यक्तियों से अत्यधिक घृणा करते हैं और वे उन लोगों की मानवता द्वारा प्रदर्शित विभिन्न विशिष्ट विचारों, व्यवहारों और अभ्यास के सिद्धांतों को भी नहीं समझ सकते, जिनमें जमीर और विवेक होता है। चूँकि वे एक जैसे नहीं हैं, इसलिए वे उन्हें नहीं समझ सकते। मुझे बताओ, क्या जानवर समझ सकते हैं कि लोग किन सिद्धांतों पर कार्य करते हैं या वे उस तरह से कार्य क्यों करते हैं? (नहीं।) जानवर नहीं जानते। जानवर क्या जानते हैं? वे जानते हैं कि क्या करना है और कब करना है—बस वही तयशुदा चीजें : कब खाना है, कितनी देर खेलना है और उनके मालिक आम तौर पर उन्हें कहाँ ले जाते हैं। जहाँ तक इस बात का सवाल है कि उनके मालिक उन्हें वहाँ क्यों ले जाते हैं या क्यों नहीं ले जाते तो ये चीजें वे नहीं जानते। वे यह भी नहीं जानते कि सर्दियों और गर्मियों के बीच उन्हें मिलने वाले भोजन की मात्रा अलग-अलग क्यों होती है, न ही वे अपने लिए किए जाने वाले हर काम के पीछे अपने मालिकों के इरादे जानते हैं। वे केवल इतना जानते हैं : "जो भी हो, मेरा मालिक मेरे लिए अच्छा है। मेरा मालिक मुझे रोज स्वादिष्ट भोजन देता है और मेरा साथ भी देता है और मेरी रक्षा करता है। वह मेरे लिए अच्छा है, इसलिए वह मेरा मालिक है। दूसरे लोग मुझे खाना नहीं खिलाते या मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते, इसलिए वे मेरे मालिक नहीं हैं और मैं भी उनके करीब नहीं हूँ।" जानवर केवल ये सरल चीजें ही जानते हैं। इसी तरह, जो लोग पशुओं के हैं, वे मानवता, स्व-आचरण और विचारों तथा दृष्टिकोणों से जुड़े इन मामलों को कभी समझ या गहराई से बूझ नहीं पाएँगे। अगर तुम उन्हें सिखाते हो तो भी वे तुमसे जो सीखेंगे वह केवल धर्म-सिद्धांत ही होंगे। लेकिन किसी चीज को धर्म-सिद्धांत के संदर्भ में समझना वास्तव में उसे समझना नहीं है; वे न तो उसके निहितार्थ समझते हैं, न ही वे उन चीजों का मूल्य समझते हैं जिनके बारे में तुम उन्हें सिखाते हो। इसलिए जब मानवता के जमीर और विवेक से जुड़े मामलों के बारे में बात की जाती है, तब वे लोग जो पशुओं के हैं, उन्हें नहीं समझ सकते। दानव इन चीजों को धर्म-सैद्धांतिक रूप से समझ सकते हैं, लेकिन वे इन्हें स्वीकार नहीं करते। वे इन कथनों से घृणा करते हैं और इनसे विमुख होते हैं, सोचते हैं कि तुम बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हो और ये कथन मानवजाति के वास्तविक जीवन से कटे हुए हैं। चाहे बात यह हो कि वे इन्हें स्वीकार नहीं करते या यह कि वे इन्हें समझ नहीं सकते, मैं स्व-आचरण के बारे में ये बातें उन लोगों के सुनने के लिए नहीं कहता, जो दानवों के हैं या पशुओं के हैं। यदि वे इन्हें धर्म-सिद्धांतों के रूप में स्वीकार करने के इच्छुक हैं तो ठीक है; यदि वे अनिच्छुक हैं तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लोग अपनी किस्म के अनुसार छाँटे जाते हैं—उन्हें मजबूर नहीं किया जा सकता। जो भी तुम्हारा वर्गीकरण है, वही तय करता है कि तुम क्या चीजें पसंद करते हो। यदि तुममें कोई मानवता नहीं है और तुम मानवजाति के नहीं हो तो तुम सत्य से जुड़े वचन नहीं समझोगे और तुम उस मार्ग पर चलने के लिए अनिच्छुक होगे जिस पर मनुष्यों को चलना चाहिए। केवल मानव वर्गीकरण के लोग ही स्व-आचरण और सत्य से जुड़े इन विषयों को सुनने के लिए तैयार होंगे। यदि कुछ लोग सुनने के लिए अनिच्छुक हैं और इसे समझ नहीं सकते तो उन्हें सुनने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे लोग मानव वर्गीकरण के नहीं हैं और सत्य उनके सुनने के लिए नहीं बोला जाता है।
हमने अभी उल्लेख किया कि जिन लोगों की मानवता में जमीर और विवेक होता है, जब जीवन में उनकी शारीरिक जरूरतों की बात आती है—जैसे खाना, पीना और मौज-मस्ती करना—तो इन चीजों का अधिक अनुभव और सामना करने के साथ ही वे लगातार उन पर विचार करते हैं। जीवन में जितना अधिक वे खाने, पीने, मौज-मस्ती करने और दैहिक सुखों का अनुभव करते हैं, अपने हृदय में उतना ही अधिक वे महसूस करते हैं कि ये चीजें अर्थहीन और खोखली हैं। भले ही वे इस तरह जीना न छोड़ सकें, लेकिन वे इसमें आनंद नहीं पाते; बल्कि वे बहुत असहाय महसूस करते हैं। यह स्थिति उन्हें जीवन का अर्थ और लोग क्यों जीते हैं जैसे सवाल समझने का प्रयास करने के लिए और अधिक प्रेरित करती है। इसलिए, जब वे परमेश्वर का कार्य स्वीकार करते हैं और इन सवालों के जवाब पाते हैं, तब वे अपने दिलों में गहरी संतुष्टि महसूस करते हैं और सोचते हैं कि वाकई मानव-जीवन में यही सही मार्ग है। जब ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के वचनों के सत्य का पोषण स्वीकार करता है, तो उसे लगता है कि परमेश्वर के वचनों में उल्लिखित विभिन्न सकारात्मक चीजें और लोगों से विभिन्न अपेक्षाएँ उसकी मानवता के भीतर की जरूरतों को पूर्णरूपेण पूरा करती हैं या कुछ हद तक उनके अनुरूप होती हैं। इसलिए, वह परमेश्वर के वचन और लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाएँ आसानी से स्वीकार कर लेगा; वह मानता है कि वास्तव में यही वह मार्ग है जिस पर लोगों को चलना चाहिए और वास्तव में स्व-आचरण के यही वे सिद्धांत हैं जो लोगों में होने चाहिए। चूँकि उसकी ऐसी जरूरतें और ऐसे विचार होते हैं, इसलिए परमेश्वर के वचन उसका पोषण होते हैं और उसकी समयोचित सहायता बन सकते हैं। जब वह परमेश्वर के वचनों का पोषण स्वीकार कर लेता है, तो उसमें परमेश्वर को संतुष्ट करने और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार एक सच्चा इंसान बनने की इच्छा और संकल्प होगा। उदाहरण के लिए, परमेश्वर द्वारा उल्लिखित धार्मिक लोगों, जैसे नूह, अब्राहम, अय्यूब और पतरस—की कहानियों के लिए, कि उन्होंने परमेश्वर के प्रति कैसे समर्पण किया और उसके आदेशों को कैसे स्वीकार किया, ऐसा व्यक्ति अपने हृदय में बहुत तरसता है और उनकी प्रशंसा करता है। वह उम्मीद करता है कि एक दिन वह भी नूह, अब्राहम और अन्य लोगों की तरह परमेश्वर के प्रति सच्चा और पूर्ण समर्पण कर सकता है और वह यह अपेक्षा भी करता है कि एक दिन वह परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने और परमेश्वर द्वारा बताए गए धार्मिक लोगों में से एक बनने में सक्षम होगा। वह एक अच्छा व्यक्ति, एक धार्मिक व्यक्ति बनने के लिए तरसता है। परमेश्वर द्वारा बताई गई इन धार्मिक लोगों की कहानियाँ उसे गहराई से द्रवित करती हैं और उसका हृदय अक्सर उनकी कहानियों और परमेश्वर के प्रति उनके रवैये से प्रभावित और प्रेरित होता है। चूँकि उसकी मानवता में जमीर और विवेक के गुण होते हैं, इसलिए वह परमेश्वर के वचनों में उल्लिखित इन हस्तियों को रोल मॉडलों और मिसालों के रूप में लेने में सक्षम होता है; यह भी इस बात का संकेत है कि उसमें जमीर और विवेक है। बेशक ऐसी अभिव्यक्ति व्यक्ति के लिए परमेश्वर के वचन स्वीकार करने और उनके प्रति समर्पण करने तथा शुद्ध किए और बचाए जाने में सक्षम होने की एक बुनियादी शर्त भी है। कम से कम, ऐसे व्यक्ति की अभिव्यक्तियों से और जीवन का अनुभव करने की प्रक्रिया के दौरान वह जो प्रकट करता है, उससे आकलन करें तो, वह सुन्न और निष्ठुर नहीं होता। वह बिना विचारों वाला व्यक्ति नहीं होता, न ही वह ऐसा व्यक्ति होता है जिसके पास जीने, वास्तविकता या खाने, पीने और मौज-मस्ती करने जैसी चीजों पर कोई दृष्टिकोण नहीं होता। उसकी राय होती है, उसके अपने दृष्टिकोण होते हैं, और इससे भी बढ़कर, उसके सकारात्मक विचार और दृष्टिकोण होते हैं। यानी वह जीवन की विभिन्न चीजों के प्रति असंवेदनशील नहीं होता, बल्कि वह उनके बारे में सोचता है। विशेष रूप से सभी प्रकार के कठिन दौरों, रुकावटों और असफलताओं का अनुभव करने और जीवन के सुख-दुखों का स्वाद चखने के बाद वह और भी अधिक महसूस करता है कि यदि इसी तरह चलता रहा तो उसका जीवन खोखला और मूल्यहीन है; कि यदि वह बस इस दुनिया से गुजरता है और इस तरह आचरण करता है, तो इसका कोई मूल्य नहीं है और यह अर्थहीन है; और कि इस तरह आचरण करने से अंततः उसे कुछ भी हासिल नहीं होगा। वह इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होगा और इसे समझ से बाहर पाएगा : “क्या लोगों को वाकई इसी तरह जीना चाहिए, अपना पूरा जीवन इसी तरह बिताना चाहिए? पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस तरह जीने का क्या मतलब है?” देखो, हालाँकि वह अंततः इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता कि लोगों को कैसे जीना चाहिए, लेकिन कम से कम वह इसके बारे में सोचता है। वह खाने, पीने, मौज-मस्ती करने और दैहिक आराम, अपने परिवार के स्नेह या पारिवारिक जीवन की खुशी का आनंद लेने में डूबा नहीं रहता, अनिश्चय में जैसे-तैसे दिन नहीं काटता। जीवन के प्रति उसका रवैया जैसे-तैसे दिन काटने वाला बिल्कुल नहीं होता, क्योंकि विवेक द्वारा शासित होने के कारण वह अक्सर विचार करता है। खाने, पीने, मौज-मस्ती करने और दैहिक सुखों जैसी चीजें उसके दिल की जरूरतों को बिल्कुल भी पूरा नहीं करेंगी। इन परिस्थितियों में वह उन चीजों की तलाश करेगा, जो उसके दिल की जरूरतें पूरी कर सकें। अंततः केवल परमेश्वर के वचन और परमेश्वर का कार्य ही जीवन के बारे में इन सवालों के जवाब प्रदान कर सकते हैं जिन पर वह विचार करता है, और उसके हृदय की जरूरतें पूरी कर सकते हैं।
यदि कोई व्यक्ति दिन-ब-दिन, साल-दर-साल इसी तरह अपने दिन बिताता है, कभी यह विचार नहीं करता कि उसे किस मार्ग पर चलना चाहिए या कैसे जीना चाहिए; यदि रुकावटों, असफलताओं, कठिन दौरों और क्लेशों का अनुभव करने और जीवन के सुख-दुखों का स्वाद चखने के बाद भी वह इन चीजों पर बिल्कुल भी विचार नहीं करता, जीवन या आचरण करने के तरीके पर कोई दृष्टिकोण नहीं रखता और प्रसिद्धि, लाभ, रुतबे और सुख का अनुसरण करना जारी रखता है, यहाँ तक कि विभिन्न दुष्ट प्रवृत्तियों में खुद को झोंकने के लिए विशेष रूप से उत्सुक रहता है—और उसमें कोई जागरूकता नहीं होती, वह व्यथित या पीड़ित महसूस नहीं करता और यह महसूस नहीं करता कि इस तरह जीना खोखला है—तो ऐसा व्यक्ति निश्चित रूप से इंसान नहीं है। यदि वह इंसान होता, तो एक निश्चित उम्र तक पहुँचने के बाद वह जीवन से जुड़े इन सवालों के बारे में सोचता। कुछ लोग बीस साल की उम्र में ही जीवन के मामलों पर विचार करना शुरू कर देते हैं : “मेरे दादा-दादी की पीढ़ी और मेरे माता-पिता की पीढ़ी के सभी लोग उसी तरह जिए। क्या मैं भी उन्हीं की तरह जिऊँगा, एक निश्चित उम्र में शादी करके बच्चे पैदा करूँगा और बस यही मेरा पूरा जीवन होगा? क्या मैं वास्तव में केवल बच्चे पालने और प्रजनन करने के लिए जीता हूँ? यदि कोई व्यक्ति अपना पूरा जीवन इसी तरह जीता है, तो यह अर्थहीन है। यदि पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग इसी तरह जीते हैं, तो क्या यह फिर भी खोखला नहीं है?” वे अपने दिलों में हल्का-सा महसूस करते हैं कि भविष्य खोखला और अनिश्चित है। वे महसूस करते हैं, “यदि कोई व्यक्ति जीवन भर केवल खाने, पीने, मौज-मस्ती करने और दैहिक सुखों का अनुसरण करता है और फिर बच्चे पैदा करता है और उन्हें पालता-पोसता है, उनसे अपने बुढ़ापे में अपनी देखभाल करवाता है और खुद को उचित रूप से दफन करवाता है और शांति से अपने अंतिम वर्षों का आनंद ले सकता है—यदि वह इस लक्ष्य के पीछे भागता है तो उसका जीवन बहुत अर्थहीन होगा!” इससे पहले कि वे वास्तव में जीवन का अनुभव करना शुरू करें, वे पहले ही देख लेते हैं कि आगे का रास्ता अंधकारमय और प्रकाशरहित है; उन्होंने अपने आगे मौजूद जीवन का प्रत्येक पूर्व-नियोजित चरण पहले ही देख लिया होता है। वे अंदर ही अंदर धुँधला-सा महसूस करते हैं कि इस तरह जीना अर्थहीन है और इसमें कुछ भी आशाजनक नहीं है! कुछ लोग बीस साल की उम्र में पहुँचने पर घर बसाने, करियर बनाने और अच्छा जीवन जीने तथा अपने माता-पिता को अच्छे जीवन का आनंद दिलाने के बारे में सोचने लगते हैं। और कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो हमेशा महत्वाकांक्षाएँ रखते हैं; वे हमेशा खूब पैसा कमाना या अधिकारी बनना चाहते हैं, ताकि वे दूसरों से बेहतर बन सकें और अपने पूर्वजों का नाम रोशन कर सकें। चाहे वे अपने माता-पिता से प्रभावित हों या समाज से, संक्षेप में वे जीवन पर विचार करना नहीं जानते। उनका दृढ़ विश्वास होता है कि जीवन का मतलब केवल अच्छा खाना, अच्छे कपड़े पहनना और अच्छा जीवन जीना है और वे किसी अन्य चीज पर विचार नहीं करते। कुछ लोग कई असफलताएँ अनुभव करने के बाद ही यह स्पष्ट रूप से देख पाते हैं कि यह समाज और मानवजाति उतने अच्छे नहीं हैं जितने अच्छे होने की लोग कल्पना करते हैं और वे इस बात पर विचार करने लगते हैं कि ऐसा जीवन कैसे जिया जाए जो मूल्यवान और सार्थक हो और जो व्यर्थ न जाए। ऐसे लोग बहुत कम संख्या में होते हैं। संक्षेप में, जो लोग जीवन के मूल्य पर विचार करते हैं और महसूस करते हैं कि लोगों को जीवित रहते हुए व्यावहारिक मामलों पर ध्यान देना चाहिए, वे सब ऐसे लोग हैं जिनमें जमीर और विवेक है। यह तथ्य कि वे इन चीजों पर विचार कर सकते हैं, यह दर्शाता है कि उनके मूल्य दूसरों से अलग हैं। उनके मूल्य केवल अच्छा खाने और अच्छी चीजों का आनंद लेने, समृद्ध होने, दूसरों से आगे निकलने और इस जीवन में अच्छी संभावनाएँ रखने तक ही सीमित नहीं हैं। अच्छी संभावनाओं वाले कई लोग हैं, जैसे वे ऊँचे ओहदे वाले अधिकारी—क्या अंत में उनके लिए कुछ अच्छा इंतजार कर रहा है? क्या वे खुशी से जीते हैं? यदि तुम पर्दे के पीछे उनके जीवन को करीब से देखो, तो वे भी खुश नहीं हैं। इससे तुम्हें महसूस होता है कि यदि तुम भी रुतबे और संभावनाओं की तलाश करोगे, तो तुम भी उन्हीं की तरह दुखी होगे। सामान्य मानवता के विचारों वाले लोग सोचेंगे, “वे ऊँचे ओहदे वाले अधिकारी खुश नहीं हैं, जिससे साबित होता है कि वे जिस मार्ग पर चलते हैं, वह गलत है। तो फिर लोगों के चलने के लिए वह सही मार्ग कौन-सा है, जो वास्तव में उनके हृदय को सांत्वना दे सके?” सांत्वना पाने के लिए लोगों के दिलों को कुछ चाहिए होता है। सांत्वना का यह स्रोत धन, आलीशान घरों या शानदार कारों जैसे भौतिक सुख नहीं हैं, न ही वह कोई ऐसा विश्वासपात्र है जो उनके साथ क्लेशों का सामना कर सके, आदर्श विवाह या आज्ञाकारी बच्चे तो वह बिल्कुल भी नहीं है। इनमें से कोई भी चीज वास्तव में लोगों के दिलों को सांत्वना नहीं दे सकती। वास्तव में लोगों के दिलों को सांत्वना तो वही चीजें दे सकती हैं जिनकी उनके दिलों को आवश्यकता है। उन्हें कुछ जवाब चाहिए; यानी जीवन के दौरान कुछ ऐसी चीजें हैं जिन्हें लोग समझना चाहते हैं : लोग कहाँ से आते हैं? वे कब मरेंगे? मृत्यु को कौन नियंत्रित करता है? क्या जीवन में भाग्य जैसी कोई चीज होती है? भाग्य का प्रभारी कौन है? यदि व्यक्ति के माता-पिता इसके प्रभारी हैं, तो उसके माता-पिता के भाग्य का प्रभारी कौन है? माता-पिता अपने भाग्य को तो नियंत्रित कर नहीं सकते, तब क्या वे अपने बच्चों के भाग्य को नियंत्रित कर सकते हैं? साथ ही, लोगों को आचरण कैसे करना चाहिए? उन्हें कैसे आचरण करना चाहिए, ताकि उनका जीवन सार्थक हो और वे इस दुनिया से व्यर्थ ही न गुजर जाएँ? यदि लोगों में आत्माएँ हैं, तो उनके मरने के बाद क्या उनकी आत्माओं के पास जाने के लिए कोई जगह होती है? यदि आत्माओं के पास जाने के लिए कोई जगह होती है, तो क्या उसका इस जीवन से कोई संबंध होता है? लोगों को इस जीवन में क्या करना चाहिए, ताकि मृत्यु के बाद उनकी आत्माएँ किसी अच्छी जगह जा सकें? वे किसी खराब जगह जाने से कैसे बच सकते हैं या अपना मार्ग कैसे बदल सकते हैं? ये सब ऐसे सवाल हैं, जिनके बारे में लोगों को सोचना चाहिए। जब लोग इन सवालों के बारे में सोचते हैं लेकिन जवाब नहीं पा सकते, तब क्या वे अंदर से उत्पीड़ित महसूस करते हैं? (हाँ।) तुम जवाब पाने में जितने अधिक विफल रहते हो, अंदर से उतना ही अधिक उत्पीड़ित महसूस करते हो और जीवन, पारिवारिक स्नेह या रोमांटिक प्रेम का आनंद लेने की मनोदशा में तुम उतने ही कम होते हो, क्योंकि तुम चाहे उनका कैसे भी आनंद लो, ये चीजें तुम्हारे हृदय के खालीपन को केवल अस्थायी रूप से ही भर सकती हैं। एक बार जब तुम इन चीजों का आनंद ले चुकते हो, तब अंतर्मन में तुम और भी अधिक खालीपन महसूस करोगे, क्योंकि जो चीजें तुम्हारे पास अस्थायी रूप से होती हैं या जिनका तुम अस्थायी रूप से आनंद लेते हो, वे केवल तुम्हारे हृदय को सुन्न करती हैं और तुम्हारी अस्थायी जरूरतें पूरी करती हैं; वे उन सवालों के जवाब प्रदान नहीं कर सकतीं जिन पर तुम विचार करते हो। अंततः तुम्हारे पास चाहे कितना भी पैसा हो, तुम कितने भी अच्छे भौतिक जीवन का आनंद लो या तुम्हारे कितने भी बच्चे तुम्हारे साथ रहकर तुम्हारा सम्मान करें, इनमें से कोई भी चीज तुम्हारे हृदय की गहराई में मौजूद उन सवालों के जवाब नहीं दे सकती, न ही इनमें से कोई भी चीज तुम्हें वे जवाब खोजने में मदद कर सकती है जो तुम चाहते हो। यानी इस जीवन में तुम जिन चीजों का आनंद लेते हो, जो चीजें तुम पहले ही प्राप्त कर चुके हो, वे तुम्हें यह नहीं बता सकतीं कि तुम्हारा भविष्य कैसा होगा, इस जीवन के समाप्त होने के बाद तुम कहाँ जाओगे या तुम्हें दंडित किया जाएगा या पुरस्कृत। कोई भी तुम्हें इन सवालों का सटीक जवाब नहीं दे सकता और तुम किसी भी प्रकार की किताबों या संसाधनों में सटीक जवाब नहीं पा सकते। यदि इन सवालों पर विचार करते समय तुम थोड़ा-थोड़ा महसूस कर सकते हो कि जीवन खोखला है—कि पारिवारिक स्नेह का आनंद लेना खोखला है, कि रोमांटिक प्रेम, विवाह और अपने परिवार का आनंद लेना खोखला है, कि अपने बच्चों की संतानोचित आज्ञाकारिता का आनंद लेना खोखला है और खाने, पीने और मौज-मस्ती करने जैसी चीजों का आनंद लेना सब खोखला है—और जितना अधिक तुम इन चीजों का आनंद लेते और इन्हें प्राप्त करते हो, खालीपन की यह भावना उतनी ही अधिक मजबूत और भारी हो जाती है—तब तुम उत्तरोत्तर यह महसूस करोगे कि तुम्हारे हृदय को सांत्वना के लिए इन चीजों के अलावा किसी और चीज की आवश्यकता है। यह तुम्हें उन चीजों की तलाश करने के लिए, जो तुम्हारे हृदय को सांत्वना दे सकें, और जीवन के जवाब तथा जीवन का मार्ग खोजने के लिए और अधिक प्रेरित करेगा। जब ये चीजें प्राप्त नहीं की जा सकतीं, तो लोग सांसारिक मामलों के प्रति एक असहाय, लापरवाह रवैया अपनाते हैं : “मैं बस इसी तरह जिऊँगा। जो भी हो, लोग अपना पूरा जीवन इसी तरह जीते हैं।” जमीर और विवेक वाले व्यक्ति के पास मौजूद चीजें या वे चीजें जिनका वह आनंद लेता है, कितनी भी अच्छी हों, उसके लिए यह सब खोखला है। वह उन पशु-समान लोगों की तरह नहीं है, जो चाहे जितना भी खा लें, कभी तृप्त नहीं होते और चाहे जितना भी आनंद ले लें, कभी संतुष्ट नहीं होते और जो यहाँ तक सोचते हैं : “लोगों के लिए सबसे अच्छा यही है कि वे अपने पूरे जीवन इसी तरह आनंद लें। इस जीवन में बीमारी का होना और पैसे का न होना सबसे बुरा है।” यह जानवरों से पुनर्जन्म लेने वाले लोगों का तर्क है। यह कहावत—“बीमारी का होना और पैसे का न होना सबसे बुरा है”—जीवन का वह फलसफा है जिसे वे जीवन का अनुभव करने के बाद प्राप्त करते हैं। लेकिन जब जमीर और विवेक वाला व्यक्ति ये शब्द सुनता है, तो वह सोचता है, “गरीब होना वाकई बुरा लगता है; जब तुम्हें पैसे की आवश्यकता होती है लेकिन वह तुम्हारे पास नहीं होता, तो यह तुम्हें मुश्किल में डाल देता है। लेकिन क्या पैसा होना खालीपन की समस्या हल कर सकता है? यह इसे जरा भी हल नहीं कर सकता। बहुत अधिक पैसा होना भी एक परेशानी है। हमेशा ऐसे लोग होते हैं जो इसका लालच करते हैं और तुम्हें पता नहीं चलेगा कि इसे कहाँ सुरक्षित रखा जाए। इसे बैंक में रखना सुरक्षित नहीं लगता, इसका निवेश करने में तुम्हें कोई भरोसा महसूस नहीं होता और वैसे भी तुम इतना खर्च नहीं कर सकते। यदि तुम खाने, पीने और मौज-मस्ती करने के सुखों, आलीशान घर में रहने, शानदार कारें चलाने और लोगों की चापलूसी, प्रशंसा और उच्च आदर का आनंद लेने में पैसा खर्च करते हो, जिससे जहाँ भी तुम जाते हो, लोग तुम्हारा पीछा करते हैं और तुम्हें घेर लेते हैं, जैसे मक्खियों का झुंड लगातार तुम्हारे आसपास भिनभिनाता रहता है और एक पल के लिए भी तुम्हें नहीं छोड़ता—तो कुछ समय तक इन चीजों का आनंद लेने के बाद तुम अंदर से इनसे विमुख महसूस करोगे और सोचोगे कि कितना अच्छा होगा अगर कोई ऐसी जगह मिल जाए जहाँ कुछ देर शांत रहा जा सके और अपने मन को शांत किया जा सके। भले ही तुम दुनिया भर की यात्रा कर सको और अपना दायरा बढ़ा सको, लेकिन बाद में जब तुम अंदर से शांत होगे तो तुम फिर भी महसूस करोगे कि इस तरह जीना अर्थहीन है और तुम और भी अधिक खालीपन महसूस करोगे।” वास्तव में जब लोग इस सबके प्रति खालीपन महसूस करते हैं तो उनके हृदय को सांत्वना की आवश्यकता होती है। यानी जब वे एक निश्चित उम्र तक पहुँचते हैं और जीवन के मार्ग में एक निश्चित चरण तक पहुँचते हैं, तो उनके मन में जीवन के बारे में कई ऐसे सवाल और उलझनें होंगी जिन्हें वे नहीं समझते, जिनके जवाब पाने और जिन्हें हल करने की उन्हें आवश्यकता होगी। यदि ये सवाल हल न किए जा सके, तो वे हर चीज से अनिच्छा से निपटते हुए केवल एक चलती-फिरती लाश की तरह जी सकते हैं और हर चीज पर उनके दृष्टिकोण सक्रिय होने के बजाय बहुत नकारात्मक और निष्क्रिय होंगे। ये उन लोगों की जीने के बारे में कुछ भावनाएँ हैं जिनकी मानवता में जमीर और विवेक होता है।
जमीर और विवेक वाले लोगों में जीने के बारे में कुछ भावनाएँ तो होती ही हैं, इसके अलावा जब वे एक निश्चित उम्र तक पहुँचते हैं, तब उन्हें मानव-जीवन के बारे में कुछ एहसास होंगे और वे विभिन्न सवालों पर विचार करेंगे। चूँकि उनमें जमीर होता है—या सटीक रूप से कहें तो, चूँकि ऐसे लोगों में हृदय और आत्मा होती है—इसलिए अपने जमीर और विवेक के सतत प्रभाव में वे जीवन के विभिन्न चरणों में विभिन्न सवालों पर विचार करेंगे : सभी प्रकार के लोगों के साथ कैसे व्यवहार किया जाना चाहिए? व्यक्ति को अपने माता-पिता और बच्चों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए? जीवन वास्तव में क्या है? जीवन में खाना, पीना और सुख तथा प्रसिद्धि, लाभ, रुतबा और संभावनाएँ वास्तव में क्या हैं? जीवन के विभिन्न चरणों का अनुभव करने के बाद भले ही वे सत्य न समझते हों, फिर भी वे जीवन के बारे में कुछ निष्कर्ष निकालेंगे। चूँकि वे विचार करते हैं, इसलिए वे निष्कर्ष निकालेंगे। ये निष्कर्ष वस्तुनिष्ठ हो सकते हैं या वे केवल व्यक्तिगत एहसास हो सकते हैं। लेकिन कम से कम, जमीर और विवेक वाले लोग जीवन का अनुभव करने की प्रक्रिया में पहले ही कुछ चीजों से गुजर चुके होते हैं। जीवन के एक निश्चित अनुभव के साथ वे महसूस करेंगे, “इस जीवन में कई चीजें वैसे नहीं होतीं जैसे व्यक्ति चाहता है; कई चीजें व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर होती हैं। ऐसा लगता है मानो किसी अनदेखी जगह पर स्वर्ग ने यह सब व्यवस्थित किया हो।” यह वह एहसास है, जिसे वे जीवन का अनुभव करने से प्राप्त करते हैं और यह उनके लाभों में से एक भी होता है। मानवता के संदर्भ में यह लाभ जमीर और विवेक के कार्य द्वारा लाया गया एक बहुत ही सकारात्मक और स्वाभाविक प्रकार का चिंतन होता है। उनमें इस प्रकार का चिंतन क्यों होता है? वह इसलिए, क्योंकि जीवन का अनुभव करने की प्रक्रिया में कई चीजें उस तरह होती हैं जिस तरह वे चाहते हैं और कई चीजें उस तरह नहीं होतीं, ऐसी चीजें जो उनकी इच्छाओं के अनुरूप होती हैं और ऐसी चीजें जो उनकी इच्छाओं के अनुरूप नहीं होतीं। इन चीजों का अनुभव करने की प्रक्रिया में वे लगातार सबक सीखेंगे और अंततः एक निष्कर्ष पर पहुँचेंगे : लोगों के भाग्य होते हैं। चाहे व्यक्ति का जीवन सुचारु रूप से और वैसे चलता हो जैसे वे चाहते हैं या कठिन दौरों और निराशाओं से भरा हो, चाहे उसमें कष्ट शामिल हो या आनंद, भाग्य जैसी चीज होती है। इस आधार पर वे कुछ सवालों पर विचार करेंगे : “यह निश्चित है कि लोगों के भाग्य होते हैं, लेकिन क्या लोग अपने भाग्य खुद चुनते हैं? क्या उन्हें लोगों के माता-पिता द्वारा आकार दिया जाता है? ऐसा नहीं लगता कि ऐसा ही होता है। यदि बच्चों के भाग्यों को उनके माता-पिता द्वारा आकार दिया और तय किया जाता है, तो हर माता-पिता उम्मीद करेंगे कि उनके बच्चे समृद्ध हों और दूसरों से अलग दिखें और उनका एक सुखी जीवन हो जो उनकी इच्छा के अनुसार चले। लेकिन मेरा जीवन मेरे माता-पिता की इच्छाओं के अनुसार या मेरी इच्छाओं के अनुसार क्यों नहीं चला? स्पष्ट रूप से, भाग्य लोगों द्वारा तय नहीं किया जाता। यह कहना कि लोगों के भाग्यों को प्रकृति द्वारा आकार दिया जाता है, एक खोखली बात है; यह बिल्कुल असंभव है। निश्चित रूप से एक संप्रभु, स्वर्ग है जो अनदेखी दुनिया में इस मामले को व्यवस्थित कर रहा है।” जीवन के कुछ चरणों का अनुभव करने के बाद उन्हें कुछ एहसास होते हैं। या जीवन के कुछ ऐसे चरणों के लिए, जिनका उन्होंने अभी तक अनुभव नहीं किया होता, वे अपने माता-पिता या पूर्वजों से कुछ समझ और अंतर्दृष्टियाँ प्राप्त करते हैं; बेशक ये भी जीवन के बारे में एहसास ही होते हैं। सबसे पहले, वे भाग्य में विश्वास करते हैं और इस आधार पर वे यह विश्वास करते हैं कि स्वर्ग मौजूद है। क्या यह वस्तुनिष्ठ है? (हाँ।) शायद कुछ लोग कहेंगे : “तुम जो कहते हो, वह वस्तुनिष्ठ नहीं है। हम भी इंसान हैं, लेकिन हम उस तरह नहीं सोचते।” जब हम कहते हैं कि जमीर और विवेक वाले लोग जीवन के सवालों पर विचार करते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वे बिना कुछ किए बस बैठे रहते हैं और पैंतालीस मिनट तक इसके बारे में ऐसे सोचते हैं मानो वे कक्षा में हों, और फिर कोई जवाब प्रस्तुत कर देते हैं। बल्कि जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं और अधिक से अधिक चीजों का अनुभव करते हैं, अनजाने में ही वे जीवन के बारे में एहसास प्राप्त करते हैं। ये एहसास रातों-रात नहीं होते, न ही ये एक साल बाद आते हैं। शायद बीस साल की उम्र से वे जीवन का अनुभव करना और समाज तथा अन्य लोगों के साथ मेल-जोल रखना शुरू करते हैं; धीरे-धीरे विभिन्न चीजों का अनुभव करने के बाद वे थोड़ा-थोड़ा करके इकट्ठा करते हैं जो उन्हें ऐसे निष्कर्ष पर ले जाता है। यानी एक निश्चित उम्र तक पहुँचने पर जीवन की कुछ यात्राओं से गुजरने के बाद जमीर और विवेक वाले लोग सबसे पहले यह विश्वास करेंगे कि लोगों के भाग्य होते हैं और उनके भाग्य स्वर्ग की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अधीन हैं; वे यह निष्कर्ष निकालते हैं। वे और क्या निष्कर्ष निकालते हैं? “व्यक्ति इस जीवन में आशीषों का आनंद लेता है या कष्ट सहता है, वह गरीब होता है या अमीर, वह उच्च पदस्थ अधिकारी बनता है या बस एक आम व्यक्ति, इनमें से कुछ भी उसके हाथ में नहीं है।” यदि तुम मानवीय परिप्रेक्ष्य से इसके बारे में सोचो, तो कौन अधिकारी नहीं बनना चाहता, एक अच्छे भौतिक जीवन का आनंद नहीं लेना चाहता और एक सुखी, कठिनाई-मुक्त जीवन नहीं जीना चाहता, जहाँ सब कुछ उसकी इच्छा के अनुसार हो? लेकिन जरूरी नहीं कि ऐसी आकांक्षाएँ साकार हों; हर किसी का भाग्य भाग्य अलग होता है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग जब छोटे होते हैं तो वे साधारण और मैले-कुचैले दिखते हैं, लेकिन बड़े होने पर वे सफलता प्राप्त करते हैं; लोग इसे समझ नहीं पाते। उदहारण के लिए, मान लो एक लड़की है जो कम उम्र से ही उत्कृष्ट होने के लिए विशेष रूप से प्रेरित रही है; वह अपनी पढ़ाई में अच्छा करती है और असाधारण रूप से सुंदर है। लेकिन अंत में उसके साथ क्या होता है? वह एक गुंडे से शादी करती है, रोज पिटती है और उसके बच्चे भी उतने सुंदर नहीं होते जितनी उसने कल्पना की थी; वे सब अजीब और बदसूरत दिखते हैं। वह इतनी प्रेरित है, इतनी सुंदर है और उसके इतने सारे चाहने वाले हैं, फिर भी अपने सभी विकल्पों पर विचार करने के बाद अंततः उसने एक गुंडे को चुना; यह ऐसी चीज है जिसकी लोग कभी उम्मीद नहीं करेंगे। या मान लो कि कोई और है जो बहुत महत्वाकांक्षी है और बड़ा होकर जनरल या प्रांतीय गवर्नर बनने का सपना देखता है। और उसके साथ क्या होता है? जब वह बड़ा होता है तो खेती करके गुजारा करता है। वह काफी उच्च शिक्षित है, पूरे दिन चश्मा पहनता है और वाक्पटुता के साथ बोल सकता है। जहाँ भी वह जाता है, दूसरों को ऐतिहासिक किस्से-कहानियाँ सुनाता है। वह खगोल विज्ञान से लेकर भूगोल तक सब कुछ जानता है और भविष्य बता सकता है। लेकिन अंत में वह कुछ भी हासिल नहीं कर पाता और जीवन भर किसान ही रहता है। इन चीजों से यह देखा जा सकता है कि व्यक्ति के पूरे जीवन में उसका भाग्य स्वर्ग द्वारा व्यवस्थित किया जाता है। अगर तुम अच्छी आकांक्षाएँ और इच्छाएँ रखते हो तो भी, जरूरी नहीं कि वे साकार हों; और अगर तुम नहीं भी रखते तो भी, शायद अप्रत्याशित रूप से सौभाग्य तुम्हारे पास आ जाए। यह गैर-विश्वासियों की इस कहावत को पूरा करता है कि स्वर्ग की आँखें हैं। यह पूरी तरह से सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अधीन है। इसके अलावा, जो अभी गरीब है, जरूरी नहीं कि वह जीवन भर गरीब रहे। जब व्यक्ति गरीब होता है तो हो सकता है उसकी पत्नी उसका अनादर करे और उसे छोड़ दे। लेकिन कुछ वर्षों बाद उसका व्यवसाय समृद्ध हो जाता है और वह लखपति बन जाता है, शानदार कारें चलाता है, हवेली में रहता है और सोना-चाँदी पहनता है। तब उसकी पत्नी वापस आना चाहती है, लेकिन वह उसे वापस लेने के बजाय दोबारा कभी शादी नहीं करना चाहता। देखो, उसकी पत्नी का भाग्य ही अच्छा नहीं है; उसके भाग्य में गरीब होना लिखा है। इस जीवन में व्यक्ति गरीब है या अमीर, यह उसके नियंत्रण से बाहर है। तुम्हें कभी पता नहीं होता कि तुम कब अमीर बन जाओ और तुम्हें कभी पता नहीं होता कि किस वजह से तुम गरीब हो जाओ। कुछ अमीर लोग सोचते हैं कि वे जीवन भर धनवान रहेंगे, इसलिए वे गरीब लोगों को नीची निगाह से देखते हैं और उन्हें नजरअंदाज करते हैं। लेकिन कुछ वर्षों बाद वे गरीब हो जाते हैं और जिन लोगों को वे धौंस देते और नजरअंदाज करते थे, वे अब उनसे अधिक अमीर हैं और उन पर ध्यान नहीं देना चाहते। यह एहसास होने के अलावा कि व्यक्ति का अमीर या गरीब होना उसके नियंत्रण से बाहर है, जमीर और विवेक वाले लोग जीवन के बारे में और किन एहसासों पर पहुँचते हैं? कुछ लोग कहते हैं : “इस जीवन में भले ही तुम अच्छे काम न करो, लेकिन बुराई मत करो। स्वर्ग की आँखें हैं! उस परिवार को देखो; वे अपने दादा-दादी की पीढ़ी से ही बुरे हैं, हमेशा दूसरों को धोखा देते और नुकसान पहुँचाते हैं। और अंत में उनके साथ क्या हुआ? उनके पोते को प्रतिफल मिला; वह विकलांग पैदा हुआ। इसलिए बुराई मत करो। स्वर्ग की आँखें हैं; यदि तुम बुराई करते हो तो देर-सबेर तुम्हें प्रतिफल भुगतना पड़ेगा!” जमीर और विवेक वाले लोग कई चीजें अनुभव करते हैं और जब वे सत्य नहीं समझते तो बहुत कष्ट सहते हैं। जब वे पचास या साठ साल की उम्र में पहुँचते हैं, तब उन्हें जीवन के बारे में विभिन्न एहसास होंगे। ये एहसास अंततः भाग्य और स्वर्ग के अस्तित्व पर आ टिकते हैं, कि अनदेखी दुनिया में लोगों के भाग्य स्वर्ग की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अधीन है, कि लोग मरने के बाद प्रतिफल भुगतते हैं, कि व्यक्ति को बुराई नहीं करनी चाहिए और व्यक्ति चाहे जो भी बुराई करे, स्वर्ग की आँखें हैं और वह देख रहा है। यह मत सोचो कि दूसरे नहीं जानते कि तुमने बुराई की है; लोग भले ही न जानते हों, लेकिन स्वर्ग निश्चित रूप से जानता है। व्यक्ति पर इस जीवन में जो कर्ज हैं, वे उसे अगले जीवन में चुकाने ही होंगे और उन्हें चुकाने में कई जन्म भी लग सकते हैं। देखो, प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक जिन लोगों ने बहुत अधिक बुराई की है, उनका अंत बुरा हुआ है और उन्होंने प्रतिफल भुगता है। कुछ लोगों ने बहुत अधिक हत्याएँ कीं और उन्हें दंडित किया गया; सैकड़ों वर्षों तक उन्हें एक बार भी इंसान के रूप में पुनर्जन्म नहीं मिला। वे लगातार गायों और सूअरों के रूप में पुनर्जन्म लेते रहे और काटे जाने के बाद उन्होंने फिर से सूअरों और गायों के रूप में पुनर्जन्म लिया, वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस चक्र से गुजरते रहे। यह प्रतिफल भुगतना है। भले ही जमीर और विवेक वाले लोग सत्य न समझते हों, फिर भी उनमें जीवन के मामलों के बारे में कुछ भावनाएँ हो सकती हैं, वे कुछ सकारात्मक चीजें महसूस कर सकते हैं और अंततः कुछ सकारात्मक जवाब पा सकते हैं। ये सकारात्मक जवाब उन्हें स्व-आचरण के कुछ ऐसे सिद्धांत प्राप्त करने में सक्षम बनाते हैं जो लोगों में होने चाहिए और स्व-आचरण का वह मार्ग प्राप्त करने में सक्षम बनाते हैं जिस पर लोगों को चलना चाहिए। अपना पूरा जीवन इस तरह जीते हुए वे कम से कम, कम बुराई कर सकते हैं और कुछ दंड से बच सकते हैं। लोगों के पास जीवन का जितना अधिक अनुभव होता है और वे जीवन के बारे में जितने अधिक एहसास प्राप्त करते हैं, उतनी ही अधिक सही ढंग से वे अपनी संभावनाओं और भविष्य का सामना कर सकते हैं और उतना ही अधिक वे चीजों को उनके स्वाभाविक ढंग से होने दे सकते हैं, हर चीज वैसे ही होने दे सकते हैं जैसे वह होगी, बजाय इसके कि बलपूर्वक और जानबूझकर इन सभी चीजों को नियंत्रित करने का प्रयास करें। उदाहरण के लिए, अपने बच्चों की संभावनाओं और विवाह जैसी चीजों के या व्यक्ति के बच्चे बुजुर्गों के साथ कैसे व्यवहार करते हैं इसके संबंध में माता-पिता चीजों को उनके स्वाभाविक ढंग से होने देंगे और इन चीजों का सही ढंग से सामना करेंगे, बजाय इसके कि इस सबमें हेरफेर करने के लिए कृत्रिम साधनों या चरम व्यवहारों का उपयोग करें। इसलिए जब व्यक्ति में जीवन के बारे में ये एहसास होते हैं, तब वह कुछ हद तक स्वर्ग की व्यवस्थाओं और भाग्य की व्यवस्थाओं का पालन कर सकता है और कम मूर्खतापूर्ण काम कर सकता है या बिल्कुल नहीं कर सकता।
जीवन के बारे में कई एहसास हो सकते हैं। जिनके बारे में हमने अभी संगति की है, उनके अलावा तुम लोगों को और क्या एहसास हुए हैं? (यह कि जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु भी लोगों के नियंत्रण से बाहर हैं।) हाँ, जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु लोगों के नियंत्रण से बाहर हैं। देखो, कुछ लोग बहुत स्वस्थ होते हैं, लेकिन फिर उन्हें सर्दी लग जाती है और वे कुछ ही दिनों में मर जाते हैं। इस बीच कुछ लोग बीमार रहते हैं, पूरे साल दवा लेते हैं, फिर भी वे अस्सी साल से ज्यादा उम्र तक अच्छी तरह जीते हैं। व्यक्ति कब मरता है, यह भी उसके नियंत्रण से बाहर है; यह ऐसी चीज नहीं जिसे व्यक्ति चुन सके। जीवन के बारे में और क्या एहसास होते हैं? (यह कि रोमांटिक प्रेम और विवाह भी व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर हैं।) लोग उस समय कई चीजों की असलियत नहीं जान पाते, लेकिन जब वे एक निश्चित उम्र तक पहुँचते हैं, तब वे कुछ एहसासों पर पहुँचेंगे। उदाहरण के लिए, कई चीजें ऐसी हैं जिन्हें इंसानों द्वारा नहीं बनाया जा सकता; वे मनुष्य की इच्छा के अनुसार नहीं बदलतीं, न ही वे उसके द्वारा तय की जाती हैं। मुझे बताओ, जो व्यक्ति इन सवालों पर विचार कर सकता है और जिसे जीवन के बारे में ये एहसास होते हैं, जब वह परमेश्वर के वचन सुनता है तब क्या उसका हृदय बहुत ज्यादा रोशन नहीं हो जाता? (हाँ।) यदि वह परमेश्वर के वचनों से जवाब पा सकता है, तो क्या वह परमेश्वर के वचन स्वीकार कर सकता है? क्या वह परमेश्वर के वचनों की सच्चाई स्वीकार करेगा? (करेगा।) जमीर और विवेक वाले लोग जीवन के कुछ चरणों का अनुभव करने के बाद जीवन के बारे में कुछ एहसासों तक पहुँचेंगे। इन एहसासों में सबसे बुनियादी बात भाग्य में विश्वास और यह विश्वास है कि परमेश्वर मौजूद है। इस आधार पर जब वे परमेश्वर के सामने आते हैं, तब परमेश्वर के वचन उन्हें जवाब देते हैं और उन्हें एक मार्ग भी देते हैं जो जीवन का अनुभव करने की प्रक्रिया में प्राप्त किए गए उनके एहसासों की पुष्टि करते हैं और उन्हें विशिष्ट जवाब भी प्रदान करते हैं। यानी परमेश्वर के वचन उन कुछ विशिष्ट विवरणों के पूर्णतः पूरक बनते हैं, जिनका एहसास करने में वे जीवन का अनुभव करने की प्रक्रिया में विफल रहते हैं, उन्हें यह बेहतर ढंग से समझने और अधिक दृढ़ता से विश्वास करने में मदद करते हैं कि परमेश्वर मौजूद है और यह सभी संदेहों से परे है कि परमेश्वर लोगों के भाग्य पर संप्रभु है। उनके पास यह नींव पहले से ही थी और वे जीवन का अनुभव करने की प्रक्रिया में ऐसे जवाब पहले ही प्राप्त कर चुके थे। जब वे परमेश्वर के सामने आते हैं और परमेश्वर के वचनों से सत्य समझते हैं, तब परमेश्वर के वचन उन्हें उसके अस्तित्व और इस तथ्य पर अधिक दृढ़ता से विश्वास कराते हैं कि वह लोगों के भाग्य पर संप्रभु है। यानी परमेश्वर के वचन उन्हें इस बात की पुष्टि करने करने देते हैं कि उनके एहसास सही और सटीक हैं। इसलिए जीवन के बारे में एहसास होने के आधार पर वे और भी अधिक दृढ़ता से विश्वास करते हैं कि परमेश्वर वास्तव में मौजूद है और हालाँकि उसे देखा या छुआ नहीं जा सकता, फिर भी उसके अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता। वास्तव में उनमें परमेश्वर के सामने आने से पहले ही इसके बारे में जागरूकता और अनुभूति थी। जब वे परमेश्वर के वचनों से पुष्टि प्राप्त करते हैं, तब उनका विश्वास स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है; अधिक संदेहग्रस्त होने के बजाय उन्हें परमेश्वर में अधिक आस्था और उसके अस्तित्व में अधिक दृढ़ विश्वास होता है। परिणामस्वरूप उन्हें परमेश्वर के वचन स्वीकार करने में ज्यादातर लोगों से कम कठिनाई होती है। ठीक अय्यूब की तरह—जीवन के बारे में उसका क्या एहसास था? “यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है” (अय्यूब 1:21)। परमेश्वर द्वारा उसका परीक्षण किए जाने से पहले और परमेश्वर के उसके आमने-सामने आने से पहले वह यह महसूस कर चुका था। इसलिए जब परमेश्वर ने उसका परीक्षण किया, तब उसने अपने हृदय में अधिक दृढ़ता से विश्वास किया कि यह परमेश्वर का काम है और यह अचूक है। यानी जब परमेश्वर ने उसका परीक्षण किया, तब उसने परमेश्वर को जानने, परमेश्वर के कर्मों के संपर्क में आने और उन्हें जानने तथा परमेश्वर की संप्रभुता को जानने में शून्य से शुरुआत नहीं की; बल्कि वह परमेश्वर के कर्मों और परमेश्वर की संप्रभुता को पहले ही समझ और जान चुका था। इस आधार पर उसने और पुष्टि की कि उसका ज्ञान और उसके एहसास सही हैं और परमेश्वर वास्तव में इसी तरह कार्य करता है। जहाँ तक जमीर और विवेक वाले लोगों की बात है, जब वे जीवन के बारे में एहसास प्राप्त करने के बाद परमेश्वर के सामने आते हैं, तब उन्हें परमेश्वर के वचन स्वीकार करने में प्रायः कोई कठिनाई नहीं होती। वे और भी अधिक दृढ़ता से विश्वास कर सकते हैं कि परमेश्वर के वचन सही हैं। बात बस इतनी है कि जीवन के बारे में उनके एहसासों में कई विवरणों की कमी होती है, और इससे उन्हें और भी अधिक दृढ़ता से विश्वास और पुष्टि हो जाती है कि उनका ज्ञान सही है, जिससे उन्हें परमेश्वर के बारे में कोई संदेह नहीं रह जाता। चूँकि उन्हें परमेश्वर के बारे में कोई संदेह नहीं होता और वे उसके अस्तित्व में दृढ़ता से विश्वास करते हैं, तो क्या उनके लिए परमेश्वर की संप्रभुता और उसके वचन स्वीकार करना कठिन होता है? उन लोगों की तुलना में, जो परमेश्वर के अस्तित्व में बिल्कुल भी विश्वास नहीं करते या उसे बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते या जो इस पर सवाल उठाते हैं, क्या यह उनके लिए कम कठिन होता है? (हाँ।) अगर वे अपने भ्रष्ट स्वभावों से बाधित भी हों तो भी, कम से कम परमेश्वर के वचनों और सत्य के प्रति उनका रवैया बिना किसी संदेह के उनके इस दृढ़ विश्वास की नींव पर बना होता है कि परमेश्वर मानवजाति का संप्रभु है। यानी जब परमेश्वर उनका परीक्षण करता है या उन्हें ताड़ना देता है और उनका न्याय करता है, तब पहले, वे कम से कम परमेश्वर के अस्तित्व से इनकार नहीं करते; दूसरे, वे परमेश्वर की संप्रभुता पर सवाल नहीं उठाते; और तीसरे, वे परमेश्वर की संप्रभुता अस्वीकार नहीं करते। इसके बजाय वे बस अपने भ्रष्ट स्वभाव हल करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। यह दशा उन लोगों की दशा से अलग है, जो बिल्कुल भी विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर मौजूद है या जो परमेश्वर के प्रति संशयात्मक होते हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो परमेश्वर के अस्तित्व में बिल्कुल भी विश्वास नहीं करते, जब परमेश्वर की ताड़ना और न्याय उन पर आता है या परमेश्वर उन्हें अनुशासित करने के लिए परिवेश व्यवस्थित करता है, तब वे सबसे पहले परमेश्वर के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं। वे यह कहते हुए परमेश्वर के अस्तित्व से इनकार करते हैं, “यह परमेश्वर का काम नहीं है; परमेश्वर कभी ऐसा नहीं करेगा!” या “परमेश्वर कहाँ है? यह लोगों का काम है!” वे ठेठ छद्म-विश्वासियों की तरह व्यवहार प्रदर्शित करते और बयान देते हैं। इस बीच, जो लोग परमेश्वर के प्रति संशयात्मक होते हैं, वे हमेशा सोचते हैं, “क्या यह परमेश्वर का काम है? मुझे बिल्कुल विश्वास नहीं होता कि परमेश्वर ऐसा करेगा। परमेश्वर लोगों से प्यार करता है और उनके लिए चिंता दिखाता है; क्या वह अपनी संप्रभुता का इस तरह प्रयोग करेगा? मुझे नहीं लगता कि वह ऐसा करेगा। वैसे भी, मैं इसे स्वीकार नहीं करना चाहता; यदि कोई चीज मेरी धारणाओं के अनुरूप नहीं होती, तो मैं उसे स्वीकार नहीं करता!” देखो, परमेश्वर की ताड़ना और न्याय, अनुशासन और परीक्षणों के प्रति इन दो प्रकार के लोगों के रवैये अलग-अलग हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है, जिनकी मानवता में जमीर और विवेक के गुण होते हैं और जो वास्तव में परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हैं, जब परमेश्वर उनका परीक्षण करने के लिए परिवेश व्यवस्थित करता है, तब सबसे पहले वे परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित परिवेशों के साथ सृजित मानवजाति के परिप्रेक्ष्य से पेश आते हैं। वे सृष्टिकर्ता और परमेश्वर के साथ अपने हृदय में समर्पण के रवैये के साथ पेश आते हैं। उनका रवैया सवाल उठाने, अस्वीकार करने या नकारने का नहीं होता; बल्कि वे मानते हैं, “यह परमेश्वर का काम है; यह परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है।” हालाँकि उनमें विद्रोहशीलता और धारणाएँ भी विकसित हो सकती हैं और वे बहस करने का प्रयास कर सकते हैं, लेकिन कम से कम, परिवेशों के प्रति उनका रवैया यह होता है : “यह परमेश्वर का काम है; परमेश्वर हर चीज पर संप्रभुता रखता है।” इसके अलावा, कम से कम वे इस बात पर संदेह नहीं करेंगे कि क्या परमेश्वर वास्तव में मौजूद है; यह ऐसी चीज है जो बिल्कुल नहीं होगी। इसलिए परमेश्वर उन पर चाहे जो भी कार्य करे, परमेश्वर के प्रति उनका रवैया एक साधारण व्यक्ति के प्रति होने वाले रवैये के बजाय परमेश्वर के प्रति एक सृजित प्राणी का रवैया होता है। क्या जमीर और विवेक वाले लोगों का परमेश्वर के प्रति रवैया छद्म-विश्वासियों और उस पर संदेह करने वाले लोगों से अलग नहीं होता? (हाँ।)
छद्म-विश्वासी परमेश्वर के साथ इस तरह पेश आते हैं, मानो वह कुछ न हो और यहाँ तक कि उसके साथ अपने समान स्तर के एक साधारण व्यक्ति जैसा व्यवहार करते हैं। जो लोग परमेश्वर पर संदेह करते हैं, जब उनके साथ कुछ नहीं होता तब वे परमेश्वर के बारे में खोखली और अस्पष्ट कल्पनाएँ करते हैं; जब वे समस्याओं का सामना करते हैं तब वे परमेश्वर के प्रति सभी प्रकार के शक, संदेह और यहाँ तक कि संशयवाद भी पालते हैं। लेकिन जहाँ तक जमीर और विवेक वाले लोगों की बात है, चूँकि वे अपने हृदय में निश्चित होते हैं कि परमेश्वर का अस्तित्व है और वे परमेश्वर की पहचान और सार के प्रति निश्चित होते हैं, इसलिए चाहे वे परमेश्वर के प्रति कोई भी विद्रोहशीलता या धारणाएँ विकसित करें, कम से कम वे परमेश्वर के साथ सृष्टिकर्ता के प्रति एक सृजित प्राणी के रवैये के साथ पेश आते हैं। क्या इस प्रकार के व्यक्ति और पिछले दो प्रकारों के व्यक्तियों के बीच का अंतर बड़ा है? (हाँ।) वे परमेश्वर के प्रति संशयात्मक नहीं होंगे, न ही वे परमेश्वर के साथ एक साधारण व्यक्ति जैसा व्यवहार करेंगे। हम इस अंतर के बारे में बात क्यों करते हैं? वह इसलिए, क्योंकि जहाँ तक मानवता वाले व्यक्ति का संबंध है, चाहे वह कोई भी भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करे और चाहे वह परमेश्वर के प्रति धारणाएँ या विद्रोहशीलता विकसित करे, ये सभी उसकी मानवता के जमीर और विवेक के दायरे में आते हैं। पहले, वह परमेश्वर को कोसेगा नहीं; दूसरे, वह परमेश्वर की आलोचना नहीं करेगा या परमेश्वर की ईशनिंदा नहीं करेगा; और तीसरे, वह अपने ऊपर परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य का प्रतिरोध नहीं करेगा। अधिक से अधिक, वह बहस करने की कोशिश कर सकता है या मौजूदा स्थिति स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक हो सकता है या परमेश्वर के ऐसा कार्य स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक हो सकता है। लेकिन कम से कम, वह परमेश्वर के साथ परमेश्वर जैसा व्यवहार करता है और अगर उसमें विद्रोहशीलता की कुछ अभिव्यक्तियाँ होती भी हैं तो भी, ये जमीर और विवेक के दायरे तक सीमित होती हैं। इसके विपरीत, जो लोग परमेश्वर को नकारते हैं, जब वे किसी स्थिति का सामना नहीं कर रहे होते तब उन्हें इस बात का कोई भान नहीं होता कि परमेश्वर का अस्तित्व है या नहीं। लेकिन जब वे किसी स्थिति का सामना करते हैं, तब वे मानते हैं कि परमेश्वर ने उनके साथ कुछ प्रतिकूल किया है—शायद वह उन्हें अनुशासित कर रहा है या उन्हें किसी चीज से वंचित कर रहा है ताकि उनके कुछ व्यक्तिगत हितों का नुकसान हो जाए—और वे अपने हृदय में बेशर्मी से परमेश्वर की आलोचना करेंगे, परमेश्वर को कोसेंगे और परमेश्वर की ईशनिंदा करेंगे, उनमें परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बिल्कुल नहीं होता। परमेश्वर के प्रति उनका रवैया जमीर और विवेक वाले लोगों के रवैये से अलग होता है। वे परमेश्वर को कोसने का दुस्साहस करते हैं और यह कोसना केवल विद्रोहशीलता नहीं होती; वे बिना किसी संयम या रोक-टोक के परमेश्वर को कोसते हैं। वे संयम क्यों नहीं बरतते या खुद को क्यों नहीं रोकते? क्योंकि वे इंसान नहीं होते और उनमें कोई जमीर और विवेक नहीं होता; वे परमेश्वर के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं मानो वह आसपास का सबसे साधारण व्यक्ति हो। और यदि परमेश्वर के वचन उनकी समस्याओं का जिक्र करते हैं, तो वे परमेश्वर के साथ एक दुश्मन की तरह व्यवहार करते हैं और सोचते हैं, "यदि तुम्हारे वचन मेरे लिए प्रतिकूल हैं, तो मैं क्रोधित हो जाऊँगा और तुम पर पलटवार करूँगा! अगर तुम्हारे वचन और कार्य मुझे शामिल नहीं करते, तो मुझे तुमसे कोई समस्या नहीं होगी। यदि कुछ ऐसा होता है जो मेरे हितों को नुकसान पहुँचाता है या यदि मुझे गिरफ्तारी का सामना करना पड़ता है, तो मैं तुरंत परमेश्वर को नकार दूँगा और उसे ठुकरा दूँगा!" वे अपने हृदय में यह भी कहेंगे, "परमेश्वर में विश्वास करना व्यर्थ है—हमें उत्पीड़न और दमन तक सहना पड़ता है। मैं तो यह कष्ट नहीं सहूँगा!" देखो, वे हर समय परमेश्वर में अपना विश्वास छोड़ने और उसे त्यागने के विचार पालते हैं। जब वे ऐसी चीजों का सामना करते हैं जो उनकी इच्छा के अनुसार नहीं होतीं, तो उनके मन में ये विचार आते हैं और वे परमेश्वर से दूरी बनाना चाहते हैं। यह दानवों और छद्म-विश्वासियों की सबसे आम दशा होती है। एक बार जब ये लोग ऐसी चीजों का सामना करते हैं जो उनके प्रतिकूल होती हैं, तो वे परमेश्वर को नकारना, परमेश्वर में विश्वास बंद करना और परमेश्वर का नाम अस्वीकार कर भाग जाना चाहते हैं। वे न केवल परमेश्वर का नाम त्याग देते हैं, बल्कि यह शिकायत भी करते हैं कि परमेश्वर उनकी रक्षा नहीं कर सकता या उनके हितों की सुरक्षा नहीं कर सकता। कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं, "क्या परमेश्वर वास्तव में मौजूद है? क्या वह वास्तव में हर चीज पर संप्रभु हो सकता है?" और अन्य लोग कहते हैं, "परमेश्वर की सेवा करना आसान नहीं है; राजा की संगत में रहना बाघ की संगत में रहने के समान है!" देखो, वे अपमानजनक ढंग से विद्रोह भरी बातें कहने का दुस्साहस करते हैं। यदि तुम वास्तव में परमेश्वर के साथ परमेश्वर जैसा व्यवहार करते हो और वास्तव में विश्वास करते हो कि परमेश्वर है, तो एक सामान्य व्यक्ति के जमीर और विवेक से विचार करते हुए, क्या तुम ऐसी चीजों का सामना करने पर, जो तुम्हारे लिए प्रतिकूल हों, इस तरह परमेश्वर की आलोचना और ईशनिंदा करोगे? तुम ऐसा नहीं करोगे, क्योंकि तुम्हारा जमीर ऐसा करने ही नहीं देगा और इस प्रकार तुम ये विचार बिल्कुल भी विकसित नहीं करोगे। तो क्या तुम फिर भी ऐसी बातें कहोगे? ऐसे शब्द तुम्हारे मुँह से कभी नहीं निकलेंगे। जब वे दानव और छद्म-विश्वासी ऐसी चीजों का सामना करते हैं जो उनके प्रतिकूल होती हैं, तो वे परमेश्वर को कोसेंगे और उसकी ईशनिंदा करेंगे और अंततः परमेश्वर को त्याग देंगे और विश्वास करना बंद कर देंगे। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ऐसी चीजें का सामना करने पर, जो उनकी इच्छा के अनुसार नहीं होतीं, हड़ताल करके, अपना काम छोड़कर और अपने कर्तव्य करने से इनकार करके विरोध करते हैं। एक बार एक छद्म-विश्वासी था, जिसने बुराई की और परमेश्वर के घर को भारी नुकसान पहुँचाया। परमेश्वर के घर ने उसे बर्खास्त कर दिया और जब उसे एक साधारण कलीसिया में भेजा गया, तब उसने यह कहते हुए मना कर दिया, "यदि तुम मुझे एक साधारण कलीसिया में भेजते हो, तो मैं खाना नहीं खाऊँगा। मैं यहीं मर जाऊँगा!" तब कुछ भाई-बहनों ने उसकी काट-छाँट की और उसके साथ संगति की। मैंने कहा, "क्या तुम मूर्ख नहीं हो जो ऐसे व्यक्ति के स्तर तक गिर रहे हो? यह एक दानव है जो अपना असली रंग दिखा रहा है, तो तुम इसे इतनी गंभीरता से क्यों ले रहे हो?" यदि वह इंसान होता, तो क्या वह ऐसा काम कर सकता था? वह किसका विरोध कर रहा है? इस तथ्य को अलग रखते हुए कि उसने इतनी बुराई की और परमेश्वर के घर को इतना भारी नुकसान पहुँचाया—जिस स्थिति में परमेश्वर के घर का उससे निपटना पूरी तरह से न्यायोचित और सही है—अगर उसने कोई बुराई न भी की होती तो भी, क्या परमेश्वर के घर के लिए उसे बर्खास्त करना इसलिए भी उचित न होता कि वह काम करने में अक्षम था? यह सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना है, तो वह किस तरह की बेशर्मी भरी चाल चलने की कोशिश कर रहा था? बेशर्मी भरी चाल चलने की कोशिश करके वह बेनकाब हो गया और यह उसे चलता करने का एक और बड़ा कारण था। वह जहाँ चाहे जा सकता है; कलीसिया को बस उसका नाम हटाना है, और बात वहीं खत्म हो जाएगी। यह एक दानव है, तो तुम उसे इतनी गंभीरता से क्यों ले रहे हो? उसे गंभीरता से लेना मूर्खता है; क्या तुम किसी दानव के साथ बहस कर सकते हो? इस छद्म-विश्वासी में कोई जमीर और विवेक नहीं है, यह सभी प्रकार के घटिया काम करता है और बेशर्मी भरी चालें चलने की कोशिश करता है, यह सोचकर कि यदि वह ऐसा करता है तो परमेश्वर का घर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पाएगा। ऐसे व्यक्ति से निपटना आसान है; बस उसे चलता कर दो और बात खत्म—आँख ओट, पहाड़ ओट। क्या किसी छद्म-विश्वासी के साथ, जो एक दानव है, एक सामान्य व्यक्ति जैसा व्यवहार करना मूर्खता नहीं है? दानव सत्य बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करता, और चाहे वह कैसे भी विश्वास करे, वह सत्य प्राप्त नहीं करेगा। यदि तुम उसके साथ सत्य पर संगति करते हो, तो क्या यह प्रयास की बरबादी नहीं है? यदि तुम चाहते हो कि उसे शुद्ध किया और बचाया जाए, तो यह असंभव है। वह केवल एक दानव है जो अपना असली रंग दिखा रहा है, और उसे बाहर निकाल दिया जाना चाहिए। छद्म-विश्वासियों से इसी तरह निपटा जाना चाहिए।
वे भ्रमित लोग, जो पशुओं के वर्गीकरण के हैं, अपने हृदय की गहराई से परमेश्वर को स्वीकार नहीं करते और परमेश्वर के साथ परमेश्वर जैसा व्यवहार नहीं करते, न ही उनके मन में परमेश्वर के देह के प्रति सम्मान या स्वर्ग में बैठे परमेश्वर का भय होता है; उनके लिए केवल व्यक्तिगत लाभ मायने रखता है। यदि आज उन्हें ऐसे आशीष मिलते हैं जो उनके लिए फायदेमंद होते हैं, तो वे कहते हैं, "परमेश्वर अच्छा है, परमेश्वर महान है, परमेश्वर धार्मिक है, परमेश्वर नेक है!" लेकिन यदि किसी दिन परमेश्वर उनके लाभ छीन लेता है और उन्हें कष्ट देता है, तो वे परमेश्वर को नकार देंगे और उसे धोखा देंगे, यह तक कहेंगे, "जरूरी नहीं कि परमेश्वर पूरी तरह से अच्छा हो; मैं अब परमेश्वर में विश्वास नहीं करता!" यदि परमेश्वर का घर कुछ लाभ वितरित करता है और उन्हें मुफ्त में कुछ प्राप्त करने देता है, तो वे खुश महसूस करते हैं और कहते हैं : "परमेश्वर लोगों से बहुत प्यार करता है, परमेश्वर बहुत प्यारा है! मैं अपने हृदय में परमेश्वर की प्रशंसा करता हूँ!" वे इतने खुश हो जाते हैं कि खुशी से उछल पड़ते हैं और यहाँ तक कि रात को अपने सपनों में हँसते हुए जाग भी सकते हैं। यदि उन्हें बताया जाता है कि यह अब मुफ्त नहीं है, तो वे तुरंत अपना सुर बदल लेते हैं और नाखुश हो जाते हैं। वे अब यह नहीं कहते कि परमेश्वर प्यारा है या परमेश्वर को लोगों की चिंता है और इसके बजाय आलोचना करते हैं कि परमेश्वर का घर बहुत कंजूस है और उसमें कोई प्यार नहीं है; उनका व्यवहार इतनी जल्दी बदल जाता है। क्या ऐसे लोगों में जमीर और विवेक होता है? (नहीं।) जमीर और विवेक से रहित लोगों में कोई शर्म की भावना नहीं होती। जब उन्हें लाभ होता है, तो वे कहते हैं कि परमेश्वर अच्छा है; जब उन्हें लाभ नहीं हो पाता, तो वे अपना सुर बदल लेते हैं और कहते हैं : "परमेश्वर अच्छा नहीं है, कोई परमेश्वर नहीं है।" वे वास्तव में ऐसी बातें कह सकते हैं। वे दोमुँही बातें करते हैं, मानो उनका दोहरा व्यक्तित्व हो; वे ही हैं जो कहते हैं कि परमेश्वर अच्छा है, और वे ही हैं जो कहते हैं कि परमेश्वर अच्छा नहीं है। उनके शब्द किस बात पर आधारित होते हैं? वे पूरी तरह से इस बात पर आधारित होते हैं कि क्या उन्हें कुछ हासिल होने वाला है; यदि उन्हें कुछ हासिल होने वाला नहीं होता, तो वे कहते हैं कि परमेश्वर अच्छा नहीं है—वे वास्तव में ऐसी बातें कह सकते हैं। आम तौर पर, यदि जमीर और विवेक वाला कोई व्यक्ति ऐसी बातें कहता है, तो वह अंदर से दोषी महसूस करेगा : "ओह, मुझमें कोई जमीर नहीं है। मैंने अभी जो कहा, वह अनुचित था। मैं भविष्य में ऐसा नहीं कह सकता। एक बार जब तुम कुछ कह देते हो, तो तुम उसे वापस नहीं ले सकते; ऐसा कहने से मेरी मानवता प्रकट हो गई है।" फिर वह आत्मचिंतन करेगा और खुद को जानेगा। जानवरों से पुनर्जन्म लेने वाले लोग आत्मचिंतन नहीं करेंगे और खुद को नहीं जानेंगे। उन्हें लगता है कि वे चाहे जो भी कहें, वे सही हैं; जब वे खुश होते हैं तो एक बात कहते हैं, और जब वे नाखुश होते हैं तो दूसरी बात कहते हैं। उनमें कोई शर्म की भावना नहीं होती और कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं होती और वे इस बात की परवाह नहीं करते कि दूसरे उन्हें कैसे देखते हैं। तो क्या वास्तव में उनके हृदय में परमेश्वर होता है? सटीक रूप से कहें तो, नहीं होता। वस्तुनिष्ठ रूप से कहें तो, जब उन्हें उसकी आवश्यकता होती है, तो वे कहते हैं कि परमेश्वर है, कि परमेश्वर उनके साथ है, कि परमेश्वर उन पर अनुग्रह करता है और उनकी मदद करता है और कि परमेश्वर उनकी देखभाल और रक्षा करता है। लेकिन जब परमेश्वर उन्हें फटकारता और अनुशासित करता है, जिससे वे अपना सम्मान खो देते हैं और अपमानित महसूस करते हैं और उन्हें लगता है कि परमेश्वर जो करता है वह उनके लिए प्रतिकूल होता है, तो वे कहते हैं कि परमेश्वर अच्छा नहीं है और परमेश्वर के प्रति संशयात्मक होने लगते हैं। मुझे बताओ, ऐसे लोगों में क्या जमीर और विवेक होता है? वे परमेश्वर के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा वे लोगों के साथ करते हैं, और जमीर की किसी भी सीमा का बिल्कुल पालन नहीं करते। वे परमेश्वर के साथ झगड़ा और बहस करने का दुस्साहस तक करते हैं और बिना परमेश्वर के किसी खौफ या भय के, उसे चिल्लाकर अपशब्द कहने का दुस्साहस तक करते हैं। बाद में, वे इस पर पछताते हैं : "ओह, मैंने परमेश्वर को निराश किया है!" लेकिन जब वे दोबारा ऐसी चीजों का सामना करते हैं, तब भी वे वैसा ही व्यवहार करते हैं। उनके दिलों में कभी परमेश्वर का सच्चा भय नहीं होगा; उनके दिलों में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं होती। लेकिन जिस व्यक्ति में वास्तव में जमीर और विवेक होता है, उसके दिल में परमेश्वर के लिए एक निश्चित स्थान होता है और यह निश्चित स्थान उसे किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में परमेश्वर के प्रति अधिक ईमानदार, सच्चा और सम्मानपूर्ण बनाता है। यह ईमानदारी, सच्चाई और सम्मान उसमें मौजूद बुनियादी जमीर और विवेक के प्रभाव के कारण परमेश्वर के प्रति उसका रवैया बनाते हैं। इसलिए, किसी भी समय, चाहे वह कमजोर या नकारात्मक हो, या वह विफल हो गया हो या उसे अनुशासित किया गया हो, वह इस सीमा को पार नहीं करेगा। चाहे वह कितनी भी बड़ी कठिनाइयों का सामना करे या कितनी भी पीड़ा सहे, वह इस सीमा को पार नहीं करेगा क्योंकि वह एक सच्चा इंसान है। वह मानता है कि परमेश्वर का अस्तित्व है और वह लोगों के भाग्य पर संप्रभु है, इसलिए वह परमेश्वर के प्रति अपराध करने के लिए जमीर की सीमा पार नहीं करेगा, न ही वह यह जानते हुए कि वह ऐसा कर रहा है, जानबूझकर परमेश्वर को कोसेगा, परमेश्वर का प्रतिरोध करेगा या परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करेगा। उसके जानबूझकर ऐसा करने से बचने का अर्थ है कि वह अपने जमीर और विवेक द्वारा संयमित है। बेशक, अपने जमीर और विवेक के प्रभाव में वह कुछ ऐसे काम भी कर सकता है जो सामान्य मानवता वाले व्यक्ति को करने चाहिए। उदाहरण के लिए, परमेश्वर चाहे जो भी कार्य करे या परमेश्वर चाहे जो भी वचन बोले, जो उसकी धारणाओं के अनुरूप न हों, वह जानबूझकर आलोचना या टिप्पणियाँ नहीं करेगा। वह इन चीजों को सही ढंग से ले सकता है या अपनी धारणाएँ हल करने के लिए सत्य खोज सकता है; उसके अवचेतन में एक बुनियादी सीमा होती है। चूँकि वह मानता है कि परमेश्वर का अस्तित्व है, इसलिए अपने जमीर और विवेक के प्रभाव के कारण उसमें ये एहसास होंगे। आत्मचिंतन करने के बाद परमेश्वर के साथ व्यवहार करने के तरीके को लेकर उसका एक बुनियादी रवैया और बुनियादी सिद्धांत होंगे। केवल इन बुनियादी सिद्धांतों की नींव पर ही लोग परमेश्वर के साथ अपना रिश्ता सृष्टिकर्ता के प्रति एक सृजित प्राणी के रिश्ते जैसा बनाए रख सकते हैं, ऐसा सही, सामान्य और उचित रिश्ता बनाए रख सकते हैं। केवल यह रिश्ता होने पर ही लोग परमेश्वर के वचन सामान्य रूप से स्वीकार कर सकते हैं और परमेश्वर के वचनों के प्रति सामान्य रूप से समर्पण कर सकते हैं और उनका अभ्यास कर सकते हैं। मुझे बताओ, जो लोग अक्सर परमेश्वर को कोसते हैं, जो लोग आन की आन में परमेश्वर में विश्वास करना बंद करना चाहते हैं, और जो लोग यूँ ही परमेश्वर के बारे में शिकायत और उससे नफरत करते हैं, क्या वे परमेश्वर के वचन स्वीकार कर सकते हैं? क्या वे परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कर सकते हैं? (नहीं।) परमेश्वर के प्रति इन लोगों का जो रवैया होता है, वह परमेश्वर के प्रति दानवों का रवैया होता है। चूँकि परमेश्वर के प्रति दानवों का ऐसा रवैया होता है, इसलिए क्या वे परमेश्वर के वचनों को सत्य मान सकते हैं? कभी नहीं। केवल सृजित प्राणी ही परमेश्वर के वचनों को सत्य मान सकते हैं। परमेश्वर के वचनों को सत्य मानकर ही लोग परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने के लिए तैयार हो सकते हैं और फिर उनके प्रति समर्पण कर सकते हैं, उनका अभ्यास कर सकते हैं और उनमें प्रवेश कर सकते हैं और अंततः शुद्ध किए और बचाए जा सकते हैं।
जिस व्यक्ति की मानवता में जमीर और विवेक के गुण होते हैं, उसका परमेश्वर के साथ व्यवहार करने के तरीके को लेकर एक बुनियादी सिद्धांत होता है, जो कि समर्पण करने का इरादा रखना है। चाहे उसके साथ कुछ भी हो जाए, वह मनमाने ढंग से आलोचना बिल्कुल नहीं करेगा, बल्कि परमेश्वर से प्रार्थना करेगा और सत्य खोजेगा; यह वह अभिव्यक्ति है जो एक सामान्य व्यक्ति में होनी चाहिए। यदि व्यक्ति की अभिव्यक्तियाँ सामान्य मानवता के जमीर और विवेक के अनुरूप हैं या यदि उसमें जमीर और विवेक का नियमन, संयम और नियंत्रण है, तो यह व्यक्ति एक सच्चा इंसान है और ऐसा व्यक्ति है जिसे परमेश्वर बचाना चाहता है। यदि वह जमीर और विवेक के नियमन के बिना कार्य करता है, संयम की तो बात ही छोड़ दो, और भ्रमित है; यदि वह परमेश्वर के प्रति अच्छा रवैया रखना चाहता है लेकिन कभी रख नहीं पाता, यह नहीं जानता कि उसे परमेश्वर के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए, और यह नहीं जानता कि सही होने के लिए लोगों को परमेश्वर के सामने किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए—यदि वह इनमें से कुछ नहीं जानता है बल्कि केवल भ्रमित और किंकर्तव्यविमूढ़ रहता है, अच्छे लोगों के आसपास अच्छा और बुरे लोगों के आसपास बुरा व्यवहार करता है, तो वह किस तरह का व्यक्ति है? जब वह जमीर और विवेक वाले लोगों के आसपास होता है तो वह कोई बुरा काम नहीं करता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह मानवता वाला व्यक्ति है। यदि वह बुरे लोगों के आसपास होता है तो वह बुरे काम करेगा। जब बुरे लोग परमेश्वर को कोसते हैं, तो वह भी परमेश्वर के प्रति संशयात्मक हो जाता है; जब बुरे लोग परमेश्वर को नकारते और उसकी आलोचना करते हैं, तो वह घृणा महसूस नहीं करता, वह भेद पहचानने की क्षमता का इस्तेमाल नहीं करता और वह फिर भी बुरे लोगों के साथ मेलजोल रखना जारी रखता है। वह कभी परमेश्वर के घर के कार्य, परमेश्वर की गवाही या कलीसिया के हितों की रक्षा नहीं करता, बल्कि एक तमाशबीन की तरह व्यवहार करता है, यहाँ तक कि यह भी नहीं जानता कि क्या सही है और क्या गलत। ऐसा व्यक्ति जानवरों से पुनर्जन्म लेने वाले लोगों में से एक होता है; वह इंसान बिल्कुल नहीं होता। इसके विपरीत, जमीर और विवेक वाला व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का सामना करने से पहले स्वर्ग के प्रति एक बुनियादी सम्मान, खौफ या श्रद्धा रखता है, जिसे इंसान प्राप्त कर सकते हैं। कम से कम, उसके लिए स्वर्ग पावन, न्यायपूर्ण और उन्नत होता है। परमेश्वर का कार्य स्वीकार करने और कुछ ऐसे सत्य समझने के बाद, जिनके लोगों में होने की परमेश्वर अपेक्षा करता है, अपने जमीर और विवेक के प्रभाव के कारण, भले ही वह बहुत सारे सत्य न समझे, फिर भी वह उस विवेक और रवैये का पता लगा सकता है जो लोगों का परमेश्वर के प्रति होना चाहिए। चाहे इसमें परमेश्वर की पहचान शामिल हो या उसके देह के विभिन्न पहलू, उसमें कुछ सम्मान, श्रद्धा और खौफ होगा। इससे भी अच्छी बात यह है कि कुछ सत्य समझने के आधार पर उसमें परमेश्वर का भय हो सकता है। वह परमेश्वर के साथ लापरवाह, उदासीन, मनमाने या अपमानजनक तरीके से व्यवहार नहीं करता, बल्कि उसके साथ बहुत सावधानी और सतर्कता से व्यवहार करता है। खासकर जब इसमें परमेश्वर का कार्य, उसकी गवाही, उसका नाम, उसकी पहचान और रुतबा और उसकी भेंटें और साथ ही परमेश्वर के वचन, परमेश्वर की अपेक्षाएँ और परमेश्वर का कोई विशिष्ट निर्देश शामिल होता है, तब वह बहुत सावधान और सतर्क रहता है। वह इन चीजों के साथ परमेश्वर का भय मानने वाले दिल और सम्मानपूर्ण रवैये से व्यवहार करता है। वह इनके साथ लापरवाही से नहीं निपटता, न ही वह बेमन से और दिखावे के लिए चीजें करता है, बल्कि परमेश्वर से जुड़ी सभी दृश्य या अदृश्य चीजों के प्रति विनम्र हृदय और रवैया रखते हुए उनके साथ गंभीरता से व्यवहार करने में सक्षम होता है। यह वह रवैया है, जो जमीर और विवेक वाले व्यक्ति में परमेश्वर के प्रति सबसे ज्यादा होना चाहिए। जब तुम सत्य नहीं समझते, तब हो सकता है तुम्हें "परमेश्वर" शब्द की बहुत सटीक समझ न हो, न ही तुम परमेश्वर की पहचान और सार या परमेश्वर का स्वभाव समझते हो, लेकिन तुम्हारे मन में स्वर्ग के लिए कुछ सम्मान और खौफ होता है। परमेश्वर के कार्य को समझने, परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने और परमेश्वर के वचन स्वीकार करने के बाद परमेश्वर के प्रति तुम्हारी श्रद्धा और खौफ किस चीज में बदल जाएँगे? वे ईमानदारी, गंभीरता और भय या खौफ और कँपकँपी में बदल जाएँगे; यह परमेश्वर के प्रति वह रवैया है, जो सामान्य मानवता के जमीर और विवेक वाले व्यक्ति को विकसित करना चाहिए। यदि किसी ने कई वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास किया है और वह यह विश्वास करने का दावा करता है कि परमेश्वर का अस्तित्व है और मौखिक रूप से परमेश्वर का अस्तित्व स्वीकार करता है, फिर भी जमीर और विवेक के प्रभाव से उसने कभी वह रवैया विकसित नहीं किया है जो उसे परमेश्वर के प्रति रखना चाहिए, तो यह कल्पना करना आसान है कि इस व्यक्ति के भीतर किस चीज की कमी है। यदि उसमें परमेश्वर के प्रति सिर्फ ईमानदारी और गंभीरता की कमी है, लेकिन फिर भी उसमें परमेश्वर का थोड़ा खौफ और भय है, तो केवल यह कहा जा सकता है कि यह व्यक्ति बहुत अच्छा नहीं है; भले ही वह एक इंसान हो, लेकिन वह बहुत अच्छा इंसान नहीं है। हो सकता है कि वह समाज में शैतान की दुष्ट प्रवृत्तियों से बहुत अधिक प्रदूषित और प्रभावित हुआ हो या वह बहुत गहराई तक विषाक्त कर दिया गया हो और उसकी बुद्धि बहुत अधिक भ्रष्ट कर दी गई हो। फिर भी, यदि तुममें परमेश्वर का भय है, तो कम से कम, तुम अभी भी एक इंसान हो। यदि तुममें परमेश्वर के प्रति थोड़ी-सी भी ईमानदारी या खौफ नहीं है और परमेश्वर का बिल्कुल भी भय नहीं है, तो यह कहा जा सकता है कि तुम इंसान नहीं हो; तुम इंसान कहलाने के योग्य नहीं हो और इंसान के मानक से कम हो। जब परमेश्वर से जुड़ी सभी दृश्य या अदृश्य चीजों की बात आती है, यदि तुम उनके साथ लापरवाही, उदासीनता और सरसरी तौर पर व्यवहार करते हो या यहाँ तक कि उनके साथ असभ्य और बर्बर तरीके से व्यवहार करते हो, तो तुम इंसान नहीं हो। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर के साथ व्यवहार करने के अपने तरीके की दृष्टि से तुममें जमीर और विवेक के नियमन और संयम तक की कमी है, जो समस्या स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है और तुम जैसे व्यक्ति का इंसान न होने के रूप में निरूपण करने के लिए पर्याप्त है। जब तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते थे और परमेश्वर के घर नहीं आए थे, तो यह क्षम्य था कि तुममें परमेश्वर के प्रति स्पष्ट सम्मान या सही रवैये की कमी थी और तुम्हारी सख्त आलोचना नहीं की गई थी; लेकिन अब जबकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, यदि तुम परमेश्वर का अनुसरण करने और उसके जीवन के वचनों का पोषण स्वीकार करने के दौरान भी परमेश्वर के प्रति ईमानदारी, गंभीरता और भय विकसित नहीं कर सकते और उसके प्रति तुम्हारा रवैया असभ्य और बर्बर बना रहता है—जिसमें न केवल भय की कमी है, बल्कि तुम बहुत लापरवाह और उदासीन हो, बिल्कुल परमेश्वर के प्रति शैतान के रवैये की तरह—तो केवल यही कहा जा सकता है कि तुम जैसे व्यक्ति में कोई जमीर और विवेक नहीं है। यदि ऐसा व्यक्ति जमीर और विवेक के संयम के बिना, परमेश्वर के साथ भी ऐसा व्यवहार करता है, तो क्या वह अभी भी एक इंसान है? वह इंसान नहीं है।
इंसानी जमीर और विवेक के विभिन्न पहलुओं के संबंध में हम कमोबेश बस इतनी ही संगति करेंगे। चाहे हम जमीर और विवेक की जिन भी अभिव्यक्तियों के बारे में बात कर रहे हों, उन सभी में कुछ मानवीय विचार, दृष्टिकोण और व्यवहार शामिल हैं। इनमें से कोई भी पहलू खोखला नहीं है—कुछ में यह शामिल है कि लोगों, घटनाओं और चीजों के साथ कैसे व्यवहार किया जाए; कुछ में यह शामिल है कि सांसारिक व्यवहारों के फलसफों और जीवन के विभिन्न पहलुओं को कैसे लिया जाए; और अन्य में यह शामिल है कि सत्य और परमेश्वर के साथ कैसे व्यवहार किया जाए। चाहे तुम किसी भी पहलू पर ध्यान केंद्रित करो, जमीर और विवेक वाले व्यक्ति की एक प्रमुख विशेषता यह होती है कि उसका स्व-आचरण और उसके क्रियाकलाप जमीर और विवेक द्वारा संयमित और नियंत्रित होते हैं। उसके क्रियाकलापों में सीमाएँ और दायरे होते हैं—यह उसकी पारिभाषिक विशेषता है। केवल यह विशेषता होने से ही वह उद्धार पाने की बुनियादी शर्त पूरी करता है। क्या तुम समझते हो? (हाँ।) क्या कुछ ऐसा है, जिसे तुम नहीं समझते? आज जिन तीन पहलुओं पर संगति की गई है—कि जमीर और विवेक वाले लोगों में शर्म की भावना होती है, वे जीवन पर चिंतन करने में सक्षम होते हैं और उनमें परमेश्वर के प्रति एक बुनियादी सम्मान और खौफ होता है—उनके संबंध में क्या तुम लोगों को लगता है कि कोई ऐसा पहलू है जिससे तुम अपना मिलान नहीं कर सकते? क्या तुम लोगों को लगता है कि उनमें से कोई खोखला है? (नहीं। हमें लगता है कि हम उन सभी से अपना मिलान कर सकते हैं।) तो चलो, आज के लिए अपनी संगति यहीं समाप्त करते हैं। अलविदा!
1 जून 2024