4. यदि हम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, और केवल भले हैं, अच्छे कर्म कर रहे हैं और कोई बुराई नहीं कर रहे, तो क्या हम परमेश्वर द्वारा बचाए जाएँगे?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

मनुष्य जिस मानक से दूसरे मनुष्य को जाँचता है उसका आधार चरित्र या व्यवहार है; वह जिसका आचरण अच्छा है, वह धार्मिक है, और जिसका आचरण घृणित है, वह दुष्ट है। परमेश्वर जिस मानक से मनुष्य को जाँचता है, उसका आधार है कि क्या व्यक्ति का मूलतत्व परमेश्वर की आज्ञा मानना है, वह जो परमेश्वर की आज्ञा मानता है, धार्मिक है, और जो परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानता है, वह शत्रु और दुष्ट व्यक्ति है—भले ही उस व्यक्ति का आचरण अच्छा हो या बुरा हो, भले ही इस व्यक्ति की वाणी सही हो या गलत हो। कुछ लोग अच्छे कर्मों का भविष्य में एक अच्छी नियति प्राप्त करने के लिए उपयोग करना चाहते हैं, और कुछ लोग अच्छी वाणी का एक अच्छी नियति खरीदने के लिए उपयोग करना चाहते हैं। लोग गलत ढंग से विश्वास करते हैं कि परमेश्वर मनुष्य के व्यवहार या वाणी के अनुसार उसका परिणाम निर्धारित करता है, और इसलिए बहुत से लोग धोखे से अस्थायी अनुग्रह प्राप्त करने के लिए इसका उपयोग करने का प्रयास करते हैं। जो लोग बाद में विश्राम के माध्यम से जीवित बचेंगे उन सबने क्लेश के दिन को सहन किया हुआ होगा और परमेश्वर की गवाही दी हुई होगी; ये वे लोग होंगे जिन्होंने अपने कर्तव्य पूरे किए हैं और परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहते हैं। जो लोग केवल सत्य का अभ्यास करने से बचने के लिए सेवा करने के अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं, वे नहीं बच पाएँगे। परमेश्वर के पास सभी लोगों के परिणामों के प्रबंधन के लिए उचित मानदण्ड हैं; वह केवल किसी के वचनों या आचरण के अनुसार इन निर्णयों को नहीं लेता है, न ही वह इन्हें किसी एक समयावधि के दौरान उनके व्यवहार के अनुसार लेता है। वह अतीत में किसी व्यक्ति द्वारा परमेश्वर के लिए की गयी किसी सेवा की वजह से किसी के समस्त दुष्ट व्यवहार के प्रति सर्वथा उदार व्यवहार नहीं करेगा, न ही परमेश्वर के लिए एक बार के व्यय की वजह से किसी को मृत्यु से बचा लेगा। कोई भी अपनी दुष्टता के लिए दण्ड से नहीं बच सकता है, न ही कोई अपने दुष्ट आचरण को छिपा सकता है और फलस्वरूप विनाश की पीड़ा से बच सकता है। यदि कोई वास्तव में अपने कर्तव्यों का पालन कर सकता है, तो इसका अर्थ है कि वह परमेश्वर के प्रति अनंतकाल तक विश्वसनीय है, और पुरस्कार की तलाश नहीं करता है, इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे उन्हें आशीषें मिले या वे दुर्भाग्य से पीड़ित हों। यदि आशीषों को देखते समय लोग विश्वसनीय रहते हैं किन्तु जब वे आशीषों को नहीं देख सकते हैं तो विश्वसनीयता खो देते हैं, और अभी भी अंत में वे परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ रहते हैं और अभी भी अपने उन कर्तव्यों को करने में असमर्थ रहते हैं जो उन्हें करने चाहिए, तो ये लोग जिन्होंने किसी समय विश्वसनीयता से परमेश्वर की सेवा की थी, तब भी नष्ट हो जाएँगे। संक्षेप में, दुष्ट लोग अनंतकाल तक जीवित नहीं बच सकते हैं, न ही वे विश्राम में प्रवेश कर सकते हैं; केवल धार्मिक लोग ही विश्राम के अधिकारी हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंज़िल उसकी आयु, वरिष्ठता, पीड़ा की मात्रा के आधार पर नहीं और जिस हद तक वे दया आकर्षित करते हैं उस पर तो बिल्कल भी नहीं बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि वे सत्य को धारण करते हैं या नहीं। इसे छोड़कर अन्य कोई विकल्प नहीं है। तुम्हें यह अवश्य समझना चाहिए कि वे सब जो परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण नहीं करते हैं, दण्डित किए जाएँगे। यह एक अडिग तथ्य है। इसलिए, वे सब जो दण्ड पाते हैं, वे परमेश्वर की धार्मिकता के कारण और अपने अनगिनत बुरे कार्यों के प्रतिफल के रूप में इस तरह से दण्ड पाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

जो परिवर्तन व्यवहार से अधिक किसी बात में नहीं होते, वे देर तक नहीं टिकते हैं। अगर लोगों के जीवन-स्वभाव में कोई बदलाव नहीं होता है, तो देर-सबेर उनका दुष्ट पक्ष स्वयं को दिखाएगा। क्योंकि उनके व्यवहार में परिवर्तन का स्रोत उत्साह है, जो पवित्र आत्मा द्वारा उस समय किये गए कुछ कार्य के साथ मिलकर, उनके लिए उत्साही बनना या कुछ समय के लिए अच्छा बनना बहुत आसान होता है। जैसा कि अविश्वासी लोग कहते हैं, "एक अच्छा कर्म करना आसान है, मुश्किल तो यह है कि जीवन भर अच्छे कर्म किए जाएँ।" लोग आजीवन अच्छे कर्म करने में असमर्थ हैं। उनका व्यवहार जीवन द्वारा निर्देशित होता है; जैसा भी उनका जीवन है, उनका व्यवहार भी वैसा ही होता है, और केवल वही जो स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है जीवन का और व्यक्ति के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है। जो चीजें नकली हैं, वे टिक नहीं सकतीं। जब परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए कार्य करता है, यह मनुष्य को अच्छे व्यवहार का गुण देने के लिए नहीं होता—परमेश्वर का कार्य लोगों के स्वभाव को बदलने के लिए, उन्हें नए लोगों में पुनर्जीवित करने के लिए होता है। इस प्रकार, परमेश्वर का न्याय, ताड़ना, परीक्षण, और मनुष्य का परिशोधन, ये सभी उसके स्वभाव को बदलने के लिए हैं, ताकि वह परमेश्वर के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता और निष्ठा पा सके, और परमेश्वर की सामान्य उपासना कर सके। यही परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य है। अच्छी तरह से व्यवहार करना परमेश्वर के प्रति आज्ञा-पालन करने के समान नहीं है, और यह मसीह के अनुरूप होने के बराबर तो और भी नहीं है। व्यवहार में परिवर्तन सिद्धांत पर आधारित होते हैं, और उत्साह से पैदा होते हैं—वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान पर या सत्य पर आधारित नहीं होते हैं, वे पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में आश्रित तो और भी कम होते हैं। यद्यपि ऐसे मौके होते हैं जब लोग जो भी करते हैं उसमें से कुछ पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित होता है, यह जीवन की अभिव्यक्ति नहीं है, और यह बात परमेश्वर को जानने के समान तो और भी नहीं है; चाहे किसी व्यक्ति का व्यवहार कितना भी अच्छा हो, वह इसे साबित नहीं करता कि वे परमेश्वर के प्रति आज्ञा-पालन करते हैं, या वे सत्य का अभ्यास करते हैं। व्यावहारिक परिवर्तन क्षणिक भ्रम हैं, वे उत्साह की अभिव्यक्ति हैं, और वे जीवन की अभिव्यक्ति नहीं हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'बाहरी परिवर्तन और स्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर' से उद्धृत

तुम्हारे अच्छे कर्म क्या मायने रखते हैं? क्या वे परमेश्वर की आराधना करने वाले किसी हृदय का स्थान ले सकते हैं? तुम सिर्फ़ कुछ अच्छे कार्य करके परमेश्वर के आशीष प्राप्त नहीं कर सकते, और परमेश्वर केवल इसलिए तुम्हारे साथ किए गए अन्याय का बदला नहीं ले सकता कि तुम्हें उत्पीड़ित किया गया और सताया गया है। जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और फिर भी परमेश्वर को नहीं जानते, परंतु जो अच्छे कर्म करते हैं—क्या वे सब भी ताड़ित नहीं किए जाते? तुम सिर्फ़ परमेश्वर पर विश्वास करते हो, सिर्फ़ यह चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हारे विरुद्ध हुए अन्याय का समाधान करे और उसका बदला ले, और तुम चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हें तुम्हारा दिन प्रदान करे, वह दिन, जब तुम अंतत: अपना सिर ऊँचा कर सको। लेकिन तुम सत्य पर ध्यान देने से इनकार करते हो और न ही तुम सत्य को जीने की प्यास रखते हो। तुम इस कठिन, खोखले जीवन से बच निकलने में सक्षम तो बिलकुल भी नहीं हो। इसके बजाय, देह में अपना जीवन बिताते हुए और अपना पापमय जीवन जीते हुए तुम अपेक्षापूर्वक परमेश्वर की ओर देखते हो कि वह तुम्हारी शिकायतें दूर करे और तुम्हारे अस्तित्व के कोहरे को हटा दे। परंतु क्या यह संभव है? यदि तुम्हारे पास सत्य हो, तो तुम परमेश्वर का अनुसरण कर सकते हो। यदि तुम जीवन जीते हो, तो तुम परमेश्वर के वचन की अभिव्यक्ति हो सकते हो। यदि तुम्हारे पास जीवन हो, तो तुम परमेश्वर के आशीषों का आनंद ले सकते हो। जिन लोगों के पास सत्य होता है, वे परमेश्वर के आशीष का आनंद ले सकते हैं। परमेश्वर उन लोगों के कष्टों का निवारण सुनिश्चित करता है, जो उसे संपूर्ण हृदय से प्रेम करते हैं और जो कठिनाइयाँ और दुःख सहते हैं, उनके नहीं जो केवल अपने आप से प्रेम करते हैं और जो शैतान के धोखों का शिकार हो चुके हैं। उन लोगों में अच्छाई कैसे हो सकती है, जो सत्य से प्रेम नहीं करते? उन लोगों में धार्मिकता कैसे हो सकती है, जो केवल देह से प्रेम करते हैं? क्या धार्मिकता और अच्छाई दोनों सत्य के संदर्भ में नहीं बोली जातीं? क्या वे उन लोगों के लिए आरक्षित नहीं हैं, जो परमेश्वर से संपूर्ण हृदय से प्रेम करते हैं? जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते और जो केवल सड़ी हुई लाशें हैं—क्या वे सभी लोग बुराई को आश्रय नहीं देते? जो लोग सत्य को जीने में असमर्थ हैं—क्या वे सब सत्य के शत्रु नहीं हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल पूर्ण बनाया गया मनुष्य ही सार्थक जीवन जी सकता है' से उद्धृत

क्या परमेश्वर के सामने एक संत या धर्मी व्यक्ति के रूप में पूर्ण बनाया जाना इतना आसान है? यह एक सच्चा वक्तव्य है कि "इस पृथ्वी पर कोई भी धर्मी नहीं है, जो धर्मी हैं वे इस संसार में नहीं हैं।" जब तुम लोग परमेश्वर के सम्मुख आते हो, तो विचार करो कि तुम लोग क्या पहने हुए हो, अपने हर शब्द और क्रिया, अपने हर विचार और धारणा, और यहाँ तक कि उन सपनों पर भी विचार करो, जिन्हें तुम लोग हर दिन देखते हो—वे सब तुम्हारे अपने वास्ते हैं। क्या यह सही स्थिति नहीं है? "धार्मिकता" का अर्थ भिक्षा देना नहीं है, इसका अर्थ अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना नहीं है, और इसका अर्थ लड़ाई-झगड़ों और विवादों, लूट या चोरी से अलग रहना नहीं है। धार्मिकता का अर्थ परमेश्वर के आदेश को अपने कर्तव्य के रूप में लेना और, समय और स्थान की परवाह किए बिना परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं का अपनी स्वर्ग से भेजी गई वृत्ति के रूप में पालन करना है, ठीक वैसे ही जैसे प्रभु यीशु द्वारा किया गया था। यही वह धार्मिकता है, जिसके बारे में परमेश्वर ने कहा था। लूत को धर्मी इसलिए कहा जा सका था, क्योंकि उसने अपने लाभ-हानि का विचार किए बिना परमेश्वर द्वारा भेजे गए दो फ़रिश्तों को बचाया था; केवल यही कहा जा सकता है कि उसने उस समय जो किया, उसे धर्मी कहा जा सकता है, परंतु उसे धर्मी पुरुष नहीं कहा जा सकता। चूँकि लूत ने परमेश्वर को देखा था, केवल इसलिए उसने उन फ़रिश्तों के बदले अपनी दो बेटियाँ दे दीं, किंतु अतीत का उसका समस्त आचरण धार्मिकता का प्रतिनिधित्व नहीं करता था। और इसलिए मैं कहता हूँ कि "इस पृथ्वी पर कोई धर्मी नहीं है।" यहाँ तक कि जो लोग सही हालत में आने की धारा में हैं, उनमें से भी किसी को धर्मी नहीं कहा जा सकता। तुम्हारे कार्य कितने भी अच्छे क्यों न हों, तुम परमेश्वर के नाम का महिमामंडन करते हुए कैसे दिखाई देते हो, दूसरों को मारते या श्राप नहीं देते, न ही दूसरों की चोरी करते और उन्हें लूटते हो, तब भी तुम्हें धर्मी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह बात तो किसी सामान्य व्यक्ति में भी हो सकती है। अभी जो महत्वपूर्ण है, वह यह है कि तुम परमेश्वर को नहीं जानते। केवल यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में तुममें थोड़ी-सी सामान्य मानवीयता है, लेकिन परमेश्वर द्वारा कही गई धार्मिकता का कोई तत्त्व नहीं है, और इसलिए जो कुछ भी तुम करते हो, उसमें से कुछ भी यह साबित करने में सक्षम नहीं है कि तुम परमेश्वर को जानते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दुष्टों को निश्चित ही दंड दिया जाएगा' से उद्धृत

हो सकता है तुम अपने रिश्तेदारों, मित्रों, पत्नी (या पति), बेटों और बेटियों, और माता पिता के प्रति स्नेहपूर्ण और निष्ठावान हो, और कभी दूसरों का फायदा नहीं उठाया हो, लेकिन अगर तुम मसीह के अनुरूप नहीं हो और उसके साथ तुम्हारा सामंजस्य नहीं है, तो भले ही तुम अपने पड़ोसियों की सहायता के लिए अपना सब कुछ खपा दो या अपने पिता, माता और घरवालों की अच्छी देखभाल की हो, तब मैं कहूँगा कि तुम धूर्त हो, और साथ में चालाक भी हो। बस इसलिए कि तुम दूसरों के साथ अच्छा तालमेल बिठा लेते हो या कुछ अच्छे काम करते हो तो यह न सोचो कि तुम मसीह के अनुरूप हो। क्या तुम यह विश्वास करते हो कि तुम्हारी उदारता स्वर्ग की आशीषों को चुरा सकती है? क्या तुम सोचते हो कि थोड़े-से अच्छे काम कर लेना तुम्हारी आज्ञाकारिता का स्थान ले सकते हैं? तुम लोगों में से कोई भी निपटारा और छंटाई स्वीकार नहीं कर सकता, और सभी को मसीह की सरल मानवता को अंगीकार करने में कठिनाई होती है। फिर भी तुम सब परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का दावा करते हो। तुम सबका ऐसा विश्वास तुम्हारे ऊपर उचित प्रतिकार लेकर आएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं' से उद्धृत

वे जो खोज करते हैं और वे जो खोज नहीं करते, वे अब दो भिन्न प्रकार के लोग हैं, और इन दो प्रकार के लोगों के दो अलग-अलग गंतव्य हैं। वे जो सत्य के ज्ञान का अनुसरण करते हैं और सत्य पर अमल करते हैं, परमेश्वर केवल उन्हीं का उद्धार करेगा। वे जो सच्चे मार्ग को नहीं जानते हैं वे दुष्टात्माएँ और शत्रु के समान हैं। वे महादूत के वंशज हैं, और उन्हें नष्ट कर दिया जाएगा। यहाँ तक कि एक अस्पष्ट परमेश्वर के धर्मपरायण विश्वासीजन—क्या वे भी दुष्टात्मा नहीं हैं? लोग जो विवेक रखते हैं परंतु सच्चे मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे भी दुष्टात्मा हैं, उनका मूलतत्व भी परमेश्वर का प्रतिरोध करना है। वे जो सत्य के मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, और भले ही ऐसे व्यक्ति बहुत सी कठिनाइयों से होकर गुजरें, वे तब भी नष्ट होंगे। वे जो संसार को छोड़ना नहीं चाहते, जो अपने माता-पिता से अलग होने की बात नहीं सह सकते, और जो स्वयं को देह के सुख से दूर रखना सहन नहीं कर सकते, वे सब परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी नहीं हैं—और वे सब नष्ट होंगे। प्रत्येक व्यक्ति जो देहधारण करने वाले परमेश्वर को नहीं मानता वह दुष्ट है, और वे सब के सब नष्ट होंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

पिछला: 2. कुछ लोग, चूँकि उन्होंने परमेश्वर को देखा नहीं है, कहते हैं कि दुनिया में कोई परमेश्वर नहीं है, जबकि अन्य लोग परमेश्वर के अस्तित्व की गवाही देने के लिए अपने व्यक्तिगत अनुभवों का उपयोग करते हैं। हम नहीं जानते कि क्या वास्तव में कोई परमेश्वर है, इसलिए हम यह कैसे निर्धारित कर सकते हैं कि परमेश्वर का अस्तित्व है या नहीं?

अगला: 6. मेरा मानना है कि एक परमेश्वर है, लेकिन मैं अभी भी युवा हूँ, मुझे अपने परिवार और अपने करियर के लिए कड़ी मेहनत करनी है, और अभी भी बहुत कुछ है जो मैं करना चाहता हूँ। यदि मैं बूढ़े होने की और परमेश्वर पर विश्वास करने का समय निकाल पाने की प्रतीक्षा करूँ, तो क्या मुझे फिर भी बचाया जाएगा?

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