5. परमेश्वर में विश्वास करना अच्छा है, लेकिन मेरी सोच यह है कि सारे धर्म लोगों को अच्छे इंसान बनना सिखाते हैं। इसलिए चाहे लोग किसी भी धर्म को मानें, जब तक वे ईमानदार हैं और कोई बुराई नहीं करते, (क्या) निश्चित रूप से वे परमेश्वर द्वारा बचाए जाएँगे?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

धर्म में विश्‍वास क्‍या है? परमेश्‍वर में विश्‍वास क्‍या है? क्‍या दोनों में फर्क है? धर्म के सर्वसामान्‍य, प्रमुख लक्षण क्‍या हैं? लोग धर्म में विश्‍वास को आमतौर पर किस तरह परिभाषित करते हैं? धर्म में विश्‍वास आचरण में परिवर्तनों से बनता है—दूसरों से लड़ने, दूसरों को कोसने, दुष्‍कर्म करने, दूसरों का शोषण करने, दूसरों का फायदा उठाने और क्षुद्र चोरी-चकारियाँ करने जैसे आचरणों में परिवर्तन से बनता है। यह मुख्यत: आचरण में परिवर्तनों से सम्‍बन्‍ध रखता है। जब लोग धर्म में विश्‍वास करते हैं, तो वे सद्वयवहार करने की, भला इंसान बनने की कोशिश करते हैं; ये बाह्य आचरण हैं। लेकिन एक मानसिक अवलंब के रूप में धर्म क्‍या है? मानसिक क्षेत्र के बारे में क्‍या कहा जाएगा? आस्‍थावान व्‍यक्ति के पास एक मानसिक अवलंब होता है। इसलिए धर्म में विश्‍वास को इस तरह परिभाषित किया जा सकता है : सदाचारी होना, और मानसिक अवलंब का होना—और कुछ नहीं। जब इस तरह के ब्‍यौरों का सवाल उठता है कि जिसमें वे विश्‍वास करते हैं उसका क्‍या वास्‍तव में अस्तित्‍व है और वह ठीक-ठीक क्‍या है तथा वह उनसे क्‍या माँग करता है, तो लोग अनुमानों और कल्‍पनाओं का सहारा लेने लगते हैं। इस तरह के आधार से युक्त विश्‍वास को धर्म में विश्‍वास कहा जाता है। धर्म में विश्‍वास का मुख्‍यत: मतलब होता है आचरण में परिवर्तन लाने का प्रयास करना और एक मानसिक अवलंब का होना, लेकिन क्‍या इसके लिए व्‍यक्ति के जीवन के मार्ग में किसी तरह का परिवर्तन अनिवार्य होता है? उसमें न तो व्‍यक्ति के जीवन के मार्ग, ध्‍येय या दिशा में रत्ती-भर परिवर्तन होता है, न ही जीवन को जीने के उसके आधार में कोई परिवर्तन होता है। और परमेश्‍वर में विश्‍वास क्‍या है? स्‍वयं में विश्वास रखने के लिए परमेश्‍वर क्‍या परिभाषित करता है और क्‍या अपेक्षा करता है? परमेश्‍वर में विश्‍वास करना परमेश्‍वर के वचनों के प्रति आज्ञाकारी होना है; यह परमेश्‍वर द्वारा बोले गये वचनों के अनुरूप होना, उनके अनुरूप जीना, अपने कर्तव्‍यों का पालन करना और सामान्‍य मनुष्‍यता से संबंधित सारी गतिविधियों में शामिल होना है। इसका अभिप्राय यह है कि परमेश्‍वर में विश्‍वास करना परमेश्‍वर का अनुसरण करना है, परमेश्‍वर तुमसे जो कराना चाहता है वह करना और उस तरह का जीवन जीना है जैसा परमेश्‍वर चाहता है कि तुम जियो। परमेश्‍वर में विश्‍वास करना उसकी बतायी राह पर चलना है। और ऐसा करने में, क्‍या लोगों के जीवन का ध्‍येय और दिशा उन लोगों के जीवन के ध्‍येय और दिशा से पूरी तरह भिन्‍न नहीं होते जो धर्म में विश्‍वास करते हैं? परमेश्‍वर में विश्‍वास के लिए क्‍या अनिवार्य है? लोगों को सामान्‍य मनुष्‍यता की राह पर चलना चाहिए; उन्‍हें परमेश्‍वर के वचनों की आज्ञा माननी चाहिए, भले ही परमेश्‍वर उनसे कुछ भी करने को क्‍यों न कहे; और उन्‍हें परमेश्‍वर के वचनों के अनुरूप अभ्‍यास करना चाहिए। ये सारी चीजे़ं परमेश्‍वर के वचनों में शामिल हैं। परमेश्‍वर के वचन क्‍या हैं? (सत्‍य।) सत्‍य परमेश्‍वर में विश्‍वास का अंग है; वह जीवन का स्रोत और सही मार्ग है; वह उस मार्ग का हिस्‍सा है जिसे लोग अपने जीवन में अपनाते हैं; क्‍या धर्म में विश्‍वास में इनमें से कोई भी चीज़ शामिल है? नहीं। धर्म में विश्‍वास करने के लिए महज़ बाहरी स्‍तर पर अच्‍छा आचरण करना, खुद को संयमित रखना, नियमों का पालन करना, और एक मानसिक अवलंब का होना भर काफी है। अगर लोग अच्‍छा आचरण करते हैं और उनके पास एक मानसिक संबल और अवलंब है, तो क्‍या उनके जीवन का मार्ग बदल जाता है? (नहीं।) कुछ लोग कहते हैं, "धर्म में विश्‍वास करना और परमेश्‍वर में विश्‍वास करना एक ही बात है।" तो क्‍या वे परमेश्‍वर का अनुसरण करते हैं? धर्म में विश्‍वास महज़ आचरण-जन्य बदलाव की कोशिश है, जो एक मानसिक अवलंब तलाशने से ज्‍़यादा कुछ नहीं है और उसमें कोई सत्य शामिल नहीं होता। परिणामस्‍वरूप, इन लोगों के स्‍वभाव में कोई बदलाव नहीं आ सकता। वे सत्‍य को अमल में लाने में या किसी तरह का तात्विक परिवर्तन लाने में अक्षम होते हैं, उन्हें परमेश्‍वर का सच्‍चा ज्ञान नहीं होता। जब कुछ लोग धर्म में विश्‍वास करते हैं, तो उनका आचरण चाहे कितना ही अच्‍छा क्‍यों न हो, उनका मानसिक अवलंब चाहे कितना ही मज़बूत क्‍यों न हो, क्‍या वे परमेश्‍वर का अनुसरण करते हैं? (नहीं।) फिर वे किसका अनुसरण करते हैं? वे शैतान का अनुसरण करते हैं। और वे जिस तरह का जीवन जीते हैं, जिन चीज़ों की तलाश, आकांक्षा, अभ्‍यास करते हैं और अपने जीवन के लिए जिन चीज़ों पर निर्भर करते हैं, उनका आधार क्‍या होता है? वह आधार पूरी तरह से शैतान का भ्रष्‍ट स्‍वभाव और उसका सार होता है। वे स्‍वयं जिस तरह का आचरण करते हैं और जिस तरह दूसरों से बर्ताव करते हैं, वह शैतान की जीवन-शैली के तर्क और फलसफे के अनुरूप होता है; उनकी हर बात एक झूठ होती है, उसमें सत्‍य का रत्ती-भर भी अंश नहीं होता; उनके शैतानी स्‍वभाव में तनिक भी बदलाव नहीं आया होता, और वे शैतान का ही अनुसरण करते हैं। उनकी जीवन-दृष्टि, मूल्‍य, स्थितियों से पेश आने के उनके तौर-तरीके और उनके कार्यकलापों के सिद्धान्‍त, सभी कुछ उनकी शैतानी प्रकृति की अभिव्‍यक्तियाँ होते हैं; उनके बाहरी आचरण में सिर्फ एक छोटा-सा बदलाव आता है; उनके जीवन के मार्ग में, उनके जीने के ढंग में या उनके दृष्टिकोण में ज़रा-सा भी परिवर्तन नहीं आता। अगर तुम लोग परमेश्‍वर में सच्‍चा विश्‍वास करते हो, तो परमेश्‍वर में कई वर्षों तक विश्‍वास करने के बाद तुम में वास्‍तव में क्‍या परिवर्तन आया है? तुम्‍हारे जीवन की बुनियाद परिवर्तन की प्रक्रिया से गुज़रती है। तुम्‍हारे जीने का आधार क्‍या है? तुम हर रोज़ जो कुछ करते और कहते हो, वह किस चीज़ से संचालित होता है? वह सब किस चीज़ पर आधारित होता है? उदाहरण के लिए, तुम शायद अब झूठ नहीं बोलते—इसका क्‍या आधार है? तुम अब उस तरह बात क्‍यों नहीं करते? (क्‍योंकि परमेश्‍वर को यह अच्‍छा नहीं लगता।) तुम उस तरह नहीं बोलते या आचरण नहीं करते, तो इसका एक आधार है और वह आधार है परमेश्‍वर का वचन, वह जो परमेश्‍वर चाहता है और सत्‍य। इसलिए, क्‍या इस तरह के व्‍यक्ति के जीवन का मार्ग वही रह जाता है? सारांश यह है : धर्म में विश्‍वास क्‍या है? और परमेश्‍वर में विश्‍वास क्‍या है? जब लोग धर्म में विश्‍वास करते हैं, तो वे शैतान का अनुसरण करते हैं; जब वे परमेश्‍वर में विश्‍वास करते हैं, तो वे परमेश्‍वर का अनुसरण करते हैं। यही अंतर है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'धर्म में विश्‍वास से कभी उद्धार नहीं होगा' से उद्धृत

यद्यपि बहुत सारे लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन कुछ ही लोग समझते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने का क्या अर्थ है, और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप बनने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यद्यपि लोग "परमेश्वर" शब्द और "परमेश्वर का कार्य" जैसे वाक्यांशों से परिचित हैं, लेकिन वे परमेश्वर को नहीं जानते और उससे भी कम वे उसके कार्य को जानते हैं। तो कोई आश्चर्य नहीं कि वे सभी, जो परमेश्वर को नहीं जानते, उसमें अपने विश्वास को लेकर भ्रमित रहते हैं। लोग परमेश्वर में विश्वास करनेको गंभीरता से नहीं लेते और यह सर्वथा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर में विश्वास करना उनके लिए बहुत अनजाना, बहुत अजीब है। इस प्रकार वे परमेश्वर की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते। दूसरे शब्दों में, यदि लोग परमेश्वर और उसके कार्य को नहीं जानते, तो वे उसके इस्तेमाल के योग्य नहीं हैं, और उसकी इच्छा पूरी करने के योग्य तो बिलकुल भी नहीं। "परमेश्वर में विश्वास" का अर्थ यह मानना है कि परमेश्वर है; यह परमेश्वर में विश्वास की सरलतम अवधारणा है। इससे भी बढ़कर, यह मानना कि परमेश्वर है, परमेश्वर में सचमुच विश्वास करने जैसा नहीं है; बल्कि यह मजबूत धार्मिक संकेतार्थों के साथ एक प्रकार का सरल विश्वास है। परमेश्वर में सच्चे विश्वास का अर्थ यह है: इस विश्वास के आधार पर कि सभी वस्तुओं पर परमेश्वर की संप्रभुता है, व्यक्ति परमेश्वर के वचनों और कार्यों का अनुभव करता है, अपने भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करता है, परमेश्वर की इच्छा पूरी करता है और परमेश्वर को जान पाता है। केवल इस प्रकार की यात्रा को ही "परमेश्वर में विश्वास" कहा जा सकता है। फिर भी लोग परमेश्वर में विश्वास को अकसर बहुत सरल और हल्के रूप में लेते हैं। परमेश्वर में इस तरह विश्वास करने वाले लोग, परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ गँवा चुके हैं और भले ही वे बिलकुल अंत तक विश्वास करते रहें, वे कभी परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं करेंगे, क्योंकि वे गलत मार्ग पर चलते हैं। आज भी ऐसे लोग हैं, जो परमेश्वर में शब्दशः और खोखले सिद्धांत के अनुसार विश्वास करते हैं। वे नहीं जानते कि परमेश्वर में उनके विश्वास में कोई सार नहीं है और वे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं कर सकते। फिर भी वे परमेश्वर से सुरक्षा के आशीषों और पर्याप्त अनुग्रह के लिए प्रार्थना करते हैं। आओ रुकें, अपने हृदय शांत करें और खुद से पूछें: क्या परमेश्वर में विश्वास करना वास्तव में पृथ्वी पर सबसे आसान बात हो सकती है? क्या परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ परमेश्वर से अधिक अनुग्रह पाने से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता है? क्या परमेश्वर को जाने बिना उसमें विश्वास करने वाले या उसमें विश्वास करने के बावजूद उसका विरोध करने वाले लोग सचमुच उसकी इच्छा पूरी करने में सक्षम हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना' से उद्धृत

कुछ लोग हमेशा सोचते हैं: "क्या परमेश्वर पर विश्वास करना सिर्फ बैठकों में शामिल होना, गाने गाना, परमेश्वर के वचन को सुनना, प्रार्थना करना, और कुछ कर्तव्य निभाना नहीं है? क्या यह इसी बारे में नहीं है?" चाहे तुम लोगों ने कितने ही समय से परमेश्वर में विश्वास क्यों न किया हो, तुम लोगों ने अभी भी परमेश्वर में विश्वास के महत्व की सम्पूर्ण समझ को प्राप्त नहीं किया है। वास्तव में, परमेश्वर में विश्वास का महत्व इतना गहन है कि लोग इसकी थाह पा सकने में असमर्थ हैं। अंत में, लोगों के भीतर की चीज़ें जो शैतान की हैं और उनकी प्रकृति की चीज़ें अवश्य बदलनी चाहिए और सत्य की आवश्यकताओं के अनुरूप अवश्य बननी चाहिए; केवल इसी तरह कोई व्यक्ति वास्तव में उद्धार प्राप्त कर सकता है। यदि, जैसा कि जब तू धर्म के भीतर था तू किया करता था, तू कुछ सिद्धांतों के वचन झाड़ता या नारे लगाता है, और फिर थोड़े-बहुत अच्छे कर्म करता, थोड़ा और अच्छा व्यवहार करता है और कुछ पापों, कुछ स्पष्ट पापों को करने से दूर रहता है, तब भी इसका मतलब यह नहीं है कि तूने परमेश्वर पर विश्वास करने के सही मार्ग पर कदम रख दिया है। क्या नियमों का पालन कर पाना यह बताता है कि तू सही राह पर चल रहा है? क्या इसका मतलब है कि तूने सही चुना है? यदि तेरी प्रकृति के भीतर की चीज़ें नहीं बदली हैं, और अंत में तू अभी भी परमेश्वर का विरोध कर रहा है और अपमान कर रहा है, तो यह तेरी सबसे बड़ी समस्या है। यदि परमेश्वर में तेरे विश्वास में, तू इस समस्या का समाधान नहीं करता है, तो क्या तुझे बचाया हुआ माना जा सकता है?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सर्वाधिक जोख़िम उन्हें है जिन्होंने पवित्र आत्मा का कार्य गँवा दिया है' से उद्धृत

महज व्यवाहारिक बदलाव देर तक नहीं टिकते हैं; अगर लोगों के जीवन-स्वभाव में कोई बदलाव नहीं होता है, तो देर-सबेर उनके पतित पक्ष स्वयं को दिखाएंगे। क्योंकि उनके व्यवहार में परिवर्तन का स्रोत उत्साह है। पवित्र आत्मा द्वारा उस समय किये गए कुछ कार्य का साथ पाकर, उनके लिए उत्साही बनना या अस्थायी दयालुता दिखाना बहुत आसान होता है। जैसा कि अविश्वासी लोग कहते हैं, "एक अच्छा कर्म करना आसान है; मुश्किल तो यह है कि जीवन भर अच्छे कर्म किए जाएँ।" लोग आजीवन अच्छे कर्म करने में असमर्थ होते हैं। एक व्यक्ति का व्यवहार जीवन द्वारा निर्देशित होता है; जैसा भी उसका जीवन है, उसका व्यवहार भी वैसा ही होता है, और केवल जो स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है वही जीवन का, साथ ही व्यक्ति की प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है। जो चीजें नकली हैं, वे टिक नहीं सकतीं। जब परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए कार्य करता है, यह मनुष्य को अच्छे व्यवहार का गुण देने के लिए नहीं होता—परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य लोगों के स्वभाव को रूपांतरित करना, उन्हें नए लोगों के रूप में पुनर्जीवित करना है। इस प्रकार, परमेश्वर का न्याय, ताड़ना, परीक्षण, और मनुष्य का परिशोधन, ये सभी उसके स्वभाव को बदलने के वास्ते हैं, ताकि वह परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और धर्मनिष्ठा पा सके, और परमेश्वर की सामान्य ढंग से उपासना कर सके। यही परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य है। अच्छी तरह से व्यवहार करना परमेश्वर के प्रति समर्पित होने के समान नहीं है, और यह मसीह के अनुरूप होने के बराबर तो और भी नहीं है। व्यवहार में परिवर्तन सिद्धांत पर आधारित होते हैं, और उत्साह से पैदा होते हैं; वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान पर या सत्य पर आधारित नहीं होते हैं, पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन पर आश्रित होना तो दूर की बात है। यद्यपि ऐसे मौके होते हैं जब लोग जो भी करते हैं, उसमें से कुछ पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित होता है, यह जीवन की अभिव्यक्ति नहीं है, और यह बात परमेश्वर को जानने के समान तो और भी नहीं है; चाहे किसी व्यक्ति का व्यवहार कितना भी अच्छा हो, वह इसे साबित नहीं करता कि वे परमेश्वर के प्रति समर्पित हैं, या वे सत्य का अभ्यास करते हैं। व्यवहारात्मक परिवर्तन क्षणिक भ्रम के अलावा कुछ नहीं हैं; वे जोशो-ख़रोश का प्रस्फुटन हैं। उन्हें जीवन की अभिव्यक्ति नहीं माना जा सकता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'बाहरी परिवर्तन और स्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर' से उद्धृत

संसार में कई प्रमुख धर्म हैं, प्रत्येक का अपना प्रमुख, या अगुआ है, और उनके अनुयायी संसार भर के देशों और सम्प्रदायों में सभी ओर फैले हुए हैं; प्रत्येक देश में, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, भिन्न-भिन्न धर्म हैं। फिर भी, संसार भर में चाहे कितने ही धर्म क्यों न हों, ब्रह्मांड के सभी लोग अंततः एक ही परमेश्वर के मार्गदर्शन के अधीन अस्तित्व में हैं, और उनका अस्तित्व धर्म-प्रमुखों या अगुवाओं द्वारा मार्गदर्शित नही है। कहने का अर्थ है कि मानवजाति किसी विशेष धर्म-प्रमुख या अगुवा द्वारा मार्गदर्शित नहीं है; बल्कि संपूर्ण मानवजाति को एक ही रचयिता के द्वारा मार्गदर्शित किया जाता है, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी का और सभी चीजों का और मानवजाति का भी सृजन किया है—यह एक तथ्य है। यद्यपि संसार में कई प्रमुख धर्म हैं, किंतु वे कितने ही महान क्यों न हों, वे सभी सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन अस्तित्व में हैं और उनमें से कोई भी इस प्रभुत्व के दायरे से बाहर नहीं जा सकता है। मानवजाति का विकास, सामाजिक प्रगति, प्राकृतिक विज्ञानों का विकास—प्रत्येक सृष्टिकर्ता की व्यवस्थाओं से अविभाज्य है और यह कार्य ऐसा नहीं है जो किसी धर्म-प्रमुख द्वारा किया जा सके। धर्म-प्रमुख किसी विशेष धर्म के सिर्फ़ अगुआ हैं, और वे परमेश्वर का, या उसका जिसने स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों को रचा है, प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं। धर्म-प्रमुख पूरे धर्म के भीतर सभी का नेतृत्व कर सकते हैं, परंतु वे स्वर्ग के नीचे के सभी प्राणियों को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं—यह सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत तथ्य है। धर्म-प्रमुख मात्र अगुआ हैं, और वे परमेश्वर (सृष्टिकर्ता) के समकक्ष खड़े नहीं हो सकते। सभी चीजें रचयिता के हाथों में हैं, और अंत में वे सभी रचयिता के हाथों में लौट जाएँगी। मानवजाति मूल रूप से परमेश्वर द्वारा बनाई गई थी, और किसी का धर्म चाहे कुछ भी हो, प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन लौट जाएगा—यह अपरिहार्य है। केवल परमेश्वर ही सभी चीज़ों में सर्वोच्च है, और सभी प्राणियों में उच्चतम शासक को भी उसके प्रभुत्व के अधीन लौटना होगा। मनुष्य की कद-काठी चाहे कितनी भी ऊँची क्यों न हो, लेकिन वह मनुष्य मानवजाति को किसी उपयुक्त गंतव्य तक नहीं ले जा सकता, और कोई भी सभी चीजों को उनके प्रकार के आधार पर वर्गीकृत करने में सक्षम नहीं है। स्वयं यहोवा ने मानवजाति की रचना की और प्रत्येक को उसके प्रकार के आधार पर वर्गीकृत किया, और जब अंत का समय आएगा तो वह तब भी, सभी चीजों को उनकी प्रकृति के आधार पर वर्गीकृत करते हुए, अपना कार्य स्वयं ही करेगा—यह कार्य परमेश्वर के अलावा और किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता है। आरंभ से आज तक किए गए कार्य के सभी तीन चरण स्वयं परमेश्वर के द्वारा किए गए थे और एक ही परमेश्वर के द्वारा किए गए थे। कार्य के तीन चरणों का तथ्य परमेश्वर की समस्त मानवजाति की अगुआई का तथ्य है, एक ऐसा तथ्य जिसे कोई नकार नहीं सकता। कार्य के तीन चरणों के अंत में, सभी चीजें उनके प्रकारों के आधार पर वर्गीकृत की जाएँगी और परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन लौट जाएँगी, क्योंकि संपूर्ण ब्रह्मांड में केवल इसी एक परमेश्वर का अस्तित्व है, और कोई दूसरे धर्म नहीं हैं। जो संसार का निर्माण करने में अक्षम है वह उसका अंत करने में भी अक्षम होगा, जबकि जिसने संसार की रचना की है वह उसका अंत भी निश्चित रूप से करेगा। इसलिए, यदि कोई युग का अंत करने में असमर्थ है और केवल मानव के मस्तिष्क को विकसित करने में उसकी सहायता करने में सक्षम है, तो वह निश्चित रूप से परमेश्वर नहीं होगा, और निश्चित रूप से मानवजाति का प्रभु नहीं होगा। वह इस तरह के महान कार्य को करने में असमर्थ होगा; केवल एक ही है जो इस प्रकार का कार्य कर सकता है, और वे सभी जो यह कार्य करने में असमर्थ हैं, निश्चित रूप से शत्रु हैं, न कि परमेश्वर। सभी दुष्ट धर्म परमेश्वर के साथ असंगत हैं, और चूँकि वे परमेश्वर के साथ असंगत हैं, वे परमेश्वर के शत्रु हैं। समस्त कार्य केवल इसी एक सच्चे परमेश्वर द्वारा किया जाता है, और संपूर्ण ब्रह्मांड केवल इसी एक परमेश्वर द्वारा आदेशित किया जाता है। चाहे वह इस्राएल में कर रहा है या चीन में, चाहे यह कार्य पवित्रात्मा द्वारा किया जाए या देह के द्वारा, किया सब कुछ परमेश्वर के द्वारा ही जाता है, किसी अन्य के द्वारा नहीं। बिल्कुल इसीलिए क्योंकि वह समस्त मानवजाति का परमेश्वर है और किसी भी परिस्थिति से बाधित हुए बिना, स्वतंत्र रूप से कार्य करता है—यह सभी दर्शनों में सबसे महान है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है' से उद्धृत

पिछला: 4. यदि हम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, और केवल भले हैं, अच्छे कर्म कर रहे हैं और कोई बुराई नहीं कर रहे, तो क्या हम परमेश्वर द्वारा बचाए जाएँगे?

अगला: 6. मेरा मानना है कि एक परमेश्वर है, लेकिन मैं अभी भी युवा हूँ, मुझे अपने परिवार और अपने करियर के लिए कड़ी मेहनत करनी है, और अभी भी बहुत कुछ है जो मैं करना चाहता हूँ। यदि मैं बूढ़े होने की और परमेश्वर पर विश्वास करने का समय निकाल पाने की प्रतीक्षा करूँ, तो क्या मुझे फिर भी बचाया जाएगा?

अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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1. प्रभु ने हमसे यह कहते हुए, एक वादा किया, "मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो" (यूहन्ना 14:2-3)। प्रभु यीशु पुनर्जीवित हुआ और हमारे लिए एक जगह तैयार करने के लिए स्वर्ग में चढ़ा, और इसलिए यह स्थान स्वर्ग में होना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु लौट आया है और पृथ्वी पर ईश्वर का राज्य स्थापित कर चुका है। मुझे समझ में नहीं आता: स्वर्ग का राज्य स्वर्ग में है या पृथ्वी पर?

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