5. परमेश्वर में विश्वास करना अच्छा है, लेकिन मेरी सोच यह है कि सारे धर्म लोगों को अच्छे इंसान बनना सिखाते हैं। इसलिए चाहे लोग किसी भी धर्म को मानें, जब तक वे ईमानदार हैं और कोई बुराई नहीं करते, (क्या) निश्चित रूप से वे परमेश्वर द्वारा बचाए जाएँगे?
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
तो अब, परमेश्वर में आस्था की अवधारणा को लेकर तुम लोगों के पास क्या ज्ञान और अनुभूति है? यह धर्म के दायरे में रहते हुए परमेश्वर में आस्था की तुम लोगों की समझ से कितनी अलग है? क्या अब तुम लोग सचमुच समझ गए हो कि धर्म में विश्वास और परमेश्वर में आस्था का क्या अर्थ है? क्या धर्म में विश्वास और परमेश्वर में आस्था में कोई अंतर है? यह अंतर कहाँ है? क्या तुम इन सवालों की जड़ तक पहुँच गए हो? धर्म में विश्वास करने वाले आम तौर पर कैसे लोग होते हैं? उनके ध्यान का केंद्र क्या होता है? धर्म में विश्वास को कैसे परिभाषित किया जा सकता है? धर्म में विश्वास करना यह स्वीकार करना है कि एक परमेश्वर है, और धर्म में विश्वास करने वाले अपने व्यवहार में कुछ बदलाव करते हैं : वे लोगों को मारते-पीटते या उनके साथ गाली-गलौज नहीं करते, वे लोगों को नुकसान पहुँचाने वाले बुरे काम नहीं करते, और वे विभिन्न अपराध नहीं करते या कानून नहीं तोड़ते। रविवार को, वे कलीसिया में जाते हैं। ये धर्म में विश्वास करने वाले लोग होते हैं। इसका मतलब है कि अच्छा व्यवहार करना और अक्सर सभा में भाग लेना इस बात का प्रमाण है कि इंसान धर्म में विश्वास करता है। जब कोई धर्म में विश्वास करता है, तो वह स्वीकार करता है कि एक परमेश्वर है, और उसे लगता है कि परमेश्वर में विश्वास करना एक अच्छा इंसान होना है; अगर वह पाप या बुरे काम नहीं करता, तो मरने के बाद वह स्वर्ग में जा सकेगा, उसका एक अच्छा परिणाम होगा। उसकी आस्था उसे आध्यात्मिक स्तर पर पोषण देती है। इसलिए, धर्म में विश्वास को इस तरह भी परिभाषित किया जा सकता है : धर्म में विश्वास करना, अपने दिल में यह स्वीकार करना है कि एक परमेश्वर है, और यह विश्वास करना है कि मरने के बाद तुम स्वर्ग में जा सकोगे, इसका मतलब है दिल में एक आध्यात्मिक संबल होना, अपने व्यवहार को थोड़ा बदलना, और एक अच्छा व्यक्ति होना। बस इतना ही। जहां तक इस बात का संबंध है कि वे जिस परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वह मौजूद है या नहीं, क्या वह सत्य व्यक्त कर सकता है, वह उनसे क्या माँगता है—उन्हें कुछ भी नहीं पता होता। वे बाइबल की शिक्षा के आधार पर यह सब अनुमान लगाते हैं और कल्पना करते हैं। यह धर्म में विश्वास है। धर्म में विश्वास मुख्य रूप से व्यवहारगत परिवर्तन और आध्यात्मिक पोषण की खोज है। लेकिन जिस मार्ग पर ये लोग चलते हैं—आशीषों के पीछे दौड़ने का मार्ग—वह नहीं बदला है। परमेश्वर में आस्था के बारे में उनके गलत विचारों, धारणाओं और कल्पनाओं में कोई बदलाव नहीं आया है। उनके अस्तित्व की नींव और अपने जीवन में वे जिन लक्ष्यों और दिशा का अनुसरण करते हैं, वे परंपरागत संस्कृति के विचारों और मतों पर आधारित हैं और बिल्कुल नहीं बदले हैं। धर्म में विश्वास करने वाले हर व्यक्ति की यही अवस्था होती है। तो परमेश्वर में आस्था क्या है? परमेश्वर में आस्था की परमेश्वर की परिभाषा क्या है? (परमेश्वर की संप्रभुता पर विश्वास।) यह परमेश्वर के अस्तित्व और उसकी संप्रभुता में विश्वास होना—यह सबसे बुनियादी है। परमेश्वर में विश्वास करना परमेश्वर के वचनों का पालन करना, उनके अनुसार जीना, अपना कर्तव्य निभाना और सामान्य मानवता की सभी गतिविधियों में संलग्न होना है। निहितार्थ यह है कि परमेश्वर में विश्वास करना परमेश्वर का अनुसरण करना है, वह करना है जो परमेश्वर कहता है, उस तरह जीना है जिस तरह परमेश्वर कहता है; परमेश्वर में विश्वास करना परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करना है। क्या परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों के जीवन के लक्ष्य और दिशा धर्म में विश्वास करने वाले लोगों से बिल्कुल अलग नहीं हैं? परमेश्वर में आस्था में क्या शामिल है? इसमें यह शामिल है कि लोग परमेश्वर के वचनों को सुनने, सत्य को स्वीकारने, भ्रष्ट स्वभाव त्यागने, परमेश्वर के अनुसरण के लिए सब कुछ त्यागने और अपने कर्तव्यों में समर्पित होने में सक्षम हैं कि नहीं। इन चीजों का इस बात से सीधा संबंध है कि उन्हें बचाया जा सकता है या नहीं। अब तुम परमेश्वर में आस्था की परिभाषा जानते हो; तो फिर, परमेश्वर में आस्था का अभ्यास कैसे किया जाना चाहिए? परमेश्वर अपने विश्वासियों से क्या अपेक्षा रखता है? (कि वे ईमानदार लोग हों, और वे सत्य का अनुसरण करें, अपने स्वभाव में बदलाव के लिए प्रयास करें, और परमेश्वर का ज्ञान अर्जित करने का प्रयत्न करें।) लोगों के बाहरी व्यवहार के लिए परमेश्वर की क्या अपेक्षाएँ हैं? (वह अपेक्षा करता है कि लोग धर्मनिष्ठ हों, स्वच्छंद न हों, और वे सामान्य मानवता के साथ जीवन जिएं।) लोगों में एक संत जैसा बुनियादी शिष्टाचार होना चाहिए और उन्हें सामान्य मानवता का जीवन जीना चाहिए। तो फिर, सामान्य मानवता के लिए मनुष्य के पास क्या होना चाहिए? इसका संबंध उन बहुत-से सत्यों से है जिनका एक विश्वासी के रूप में अभ्यास किया जाना चाहिए। ये सभी सत्य वास्तविकताएं रखने वाला ही सामान्य मानवता रख सकता है। अगर कोई सत्य का अभ्यास नहीं करता तो क्या वह परमेश्वर में विश्वास रखता है? सत्य का अभ्यास न करने के क्या परिणाम होते हैं? लोगों को उद्धार प्राप्त करने के लिए और परमेश्वर के प्रति समर्पण और उसकी आराधना के लिए, परमेश्वर में किस तरह विश्वास करना चाहिए? इन सब चीजों का संबंध परमेश्वर के वचनों और बहुत-से सत्यों के अभ्यास से है। इसलिए, मनुष्य को परमेश्वर के वचनों और उसकी अपेक्षाओं के अनुसार उसमें विश्वास करना चाहिए, और उसकी अपेक्षाओं के अनुसार अभ्यास करना चाहिए; सिर्फ यही परमेश्वर में सच्ची आस्था रखना है। इस मामले का यही मूल है। सत्य का अभ्यास करना, परमेश्वर के वचनों का अनुसरण करना, और परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीना : यही मानव-जीवन का सही मार्ग है; परमेश्वर में आस्था मानव-जीवन के मार्ग से संबंधित है। परमेश्वर में आस्था बहुत सारे सत्यों से संबंधित है, और परमेश्वर के अनुयायियों को ये सत्य समझने चाहिए। अगर वे सत्य को नहीं समझते और उसे स्वीकार नहीं करते, तो वे परमेश्वर का अनुसरण कैसे कर सकते हैं? जो लोग धर्म में विश्वास करते हैं, वे यह स्वीकार करते हैं कि एक परमेश्वर है, और यह भरोसा करते हैं कि एक परमेश्वर है—लेकिन वे इन सत्यों को नहीं समझते, न ही वे इन्हें स्वीकार करते हैं, इसलिए जो लोग धर्म में विश्वास करते हैं, वे परमेश्वर के अनुयायी नहीं हैं। धर्म में विश्वास करने के लिए महज बाहरी तौर पर अच्छा आचरण करना, खुद को संयमित रखना, विनियमों का पालन करना, और आध्यात्मिक पोषण होना भर काफी है। अगर लोग अच्छा आचरण करते हैं और अपनी आत्मा के लिए उनके पास एक संबल और पोषण है, तो क्या उनके जीवन का मार्ग बदल जाता है? (नहीं।) कुछ लोग कहते हैं कि धर्म में विश्वास करना और परमेश्वर में आस्था रखना एक ही बात है। तो क्या ये लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं? क्या वे परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप उसमें विश्वास करते हैं? क्या उन्होंने सत्य को स्वीकार किया है? अगर कोई इनमें से कुछ भी नहीं करता तो वह परमेश्वर में विश्वास रखने वाला या उसका अनुसरण करने वाला नहीं है। किसी व्यक्ति में धर्म में विश्वास अभिव्यक्त होने का सबसे स्पष्ट तरीका यह है कि उसमें परमेश्वर के वर्तमान कार्य और उसके द्वारा व्यक्त सत्य को स्वीकार करने की कमी होती है। यह वह गुण है जो धर्म में विश्वास रखने वालों का निरूपण करता है; वे परमेश्वर के अनुयायी कतई नहीं हैं। धर्म में विश्वास केवल व्यवहारगत बदलाव और आध्यात्मिक पोषण का अनुसरण है; इसका किसी सत्य से कोई संबंध नहीं है। इसलिए धर्म में विश्वास रखने वालों के जीवन स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आएगा; न तो वे सत्य का अभ्यास करेंगे, न ही परमेश्वर के वचनों को सुनने और उसके प्रति समर्पण करने में सक्षम होंगे। इससे यह तय हो जाता है कि उन्हें परमेश्वर का कोई सच्चा ज्ञान भी प्राप्त नहीं होगा। जब कोई व्यक्ति धर्म में विश्वास करता है, तो उसका व्यवहार कितना ही अच्छा क्यों न हो, परमेश्वर के लिए उसकी स्वीकृति कितनी ही ठोस क्यों न हो, और परमेश्वर में उसकी आस्था का सिद्धांत कितना ही उन्नत क्यों न हो, वह परमेश्वर का अनुयायी नहीं हो सकता। तो फिर वे किसका अनुसरण करते हैं? वे अभी भी शैतान का अनुसरण करते हैं। वे अपने जीवन में जो जीते हैं, जो अनुसरण और कामनाएँ रखते हैं, और जो अभ्यास करते हैं, उनका आधार क्या होता है? उनका अस्तित्व किस चीज पर निर्भर होता है? ये निश्चित ही परमेश्वर के वचनों में निहित सत्य नहीं होते। वे शैतान के भ्रष्ट स्वभाव के साथ जीते रहते हैं, और शैतान के तर्क और फलसफे के अनुसार आचरण करते और संसार से व्यवहार करते हैं। वे जो कुछ भी कहते हैं वह कोरा झूठ होता है, जिसमें लेशमात्र भी सत्य नहीं होता। उनके शैतानी स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आता और वे बस शैतान का ही अनुसरण करते रहते हैं। जीवन, मूल्यों, दुनिया के साथ व्यवहार के तौर-तरीकों को लेकर उनका नजरिया और उनके आचरण के सिद्धांत शैतान की प्रकृति के खुलासे ही हैं। सिर्फ उनके बाहरी व्यवहार में थोड़ा बदलाव आता है, पर उनके जीवन पथ, जीने के तरीके, और चीजों को लेकर उनके नजरिए में कोई बदलाव नहीं आता। अगर कोई परमेश्वर में सच्चा विश्वास रखता है, तो कुछ ही वर्षों में उसमें क्या बदलाव आ सकता है? (जीवन और मूल्यों को लेकर उसका नजरिया बदल जाएगा।) उस व्यक्ति के अस्तित्व की आधारशिला ही बदल जाएगी। अगर उसके जीवन की आधारशिला ही बदल जाती है तो उसके जीवन की बुनियाद क्या होगी? (उसका जीवन परमेश्वर के वचनों और सत्य पर आधारित होगा।) तो, क्या तुम लोग अब अपनी कथनी और करनी में हर रोज परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी रहे हो? उदाहरण के लिए, तुम अब झूठ नहीं बोलते : ऐसा क्यों है? इसके पीछे तुम्हारा आधार क्या है? (परमेश्वर की यह अपेक्षा कि तुम्हें एक ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए।) जब तुम झूठ बोलना और छल करना छोड़ देते हो, तो यह परमेश्वर के वचनों पर, एक ईमानदार व्यक्ति होने की अपेक्षा पर, और सत्य पर आधारित होता है। तो क्या तब तुम जीवन में जिस रास्ते पर चल रहे होते हो वह एक अलग रास्ता नहीं होता?
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, धर्म में आस्था रखने या धार्मिक समारोह में शामिल होने मात्र से किसी को नहीं बचाया जा सकता
यद्यपि बहुत सारे लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन कुछ ही लोग समझते हैं कि परमेश्वर में विश्वास का अर्थ क्या है और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप चलने के लिए उन्हें वास्तव में कैसे कार्य करना चाहिए। ऐसा इसलिए है कि लोग यूँ तो “परमेश्वर” शब्द को और “परमेश्वर का कार्य” जैसे वाक्यांशों को जानते हैं, लेकिन वे परमेश्वर को नहीं जानते और उससे भी कम वे उसके कार्य को जानते हैं। तो कोई आश्चर्य नहीं कि वे सभी, जो परमेश्वर को नहीं जानते, उसमें अपने विश्वास को लेकर विवेकरहित होते हैं। लोग परमेश्वर में विश्वास को गंभीरता से नहीं लेते और यह सर्वथा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर में विश्वास करना उनके लिए बहुत अनजाना, बहुत अजीब है। इस प्रकार वे परमेश्वर की अपेक्षाओं पर बहुत कम खरे उतरते हैं। दूसरे शब्दों में, यदि लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं और उसके कार्य को नहीं जानते हैं तो वे परमेश्वर के इस्तेमाल के योग्य नहीं हैं और वे उसके इरादे तो और भी कम पूरे कर पाते हैं। “परमेश्वर में विश्वास” का अर्थ यह मानना है कि परमेश्वर है; यह परमेश्वर में विश्वास करने के संबंध में सरलतम अवधारणा है। इस अवधारणा को जरा-सा आगे ले जाएँ तो यह मानना कि परमेश्वर है, परमेश्वर में सचमुच विश्वास करने जैसा नहीं है; बल्कि यह मजबूत धार्मिक संकेतार्थों युक्त एक प्रकार की साधारण आस्था है। परमेश्वर में सच्चे विश्वास का अर्थ यह है : इस विश्वास के आधार पर कि सभी वस्तुओं पर परमेश्वर की संप्रभुता है, व्यक्ति परमेश्वर के वचनों और कार्य का अनुभव करता है और इस प्रकार से अपने भ्रष्ट स्वभाव त्याग देता है, परमेश्वर के इरादे पूरे करता है और परमेश्वर को जान पाता है। केवल इस प्रकार की यात्रा को ही “परमेश्वर में विश्वास” कहा जा सकता है। फिर भी लोग परमेश्वर में विश्वास को अक्सर बहुत सरल और हल्के मामले के रूप में लेते हैं। जब लोग परमेश्वर में इस तरह विश्वास करते हैं तो यह अपना अर्थ खो देता है और भले ही वे बिल्कुल अंत तक विश्वास करते रहें, वे कभी परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं करेंगे, क्योंकि वे गलत मार्ग पर चलते हैं। वे लोग जो आज तक शब्दों और खोखले धर्म-सिद्धांत के अनुसार परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे अभी भी यह नहीं जानते कि परमेश्वर में विश्वास के सार का उनमें अभाव है और वे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं कर सकते हैं। फिर भी वे परमेश्वर से शांति और पर्याप्त अनुग्रह के आशीष के लिए प्रार्थना करते हैं। आओ अपने हृदय शांत करें और गहन विचार करें : क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर में विश्वास करना पृथ्वी पर सबसे आसान बात हो? क्या परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ परमेश्वर से अधिक अनुग्रह पाने से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता है? क्या परमेश्वर को जाने बिना उसमें विश्वास करने वाले या उसमें विश्वास करने के बावजूद उसका विरोध करने वाले लोग सचमुच उसके इरादे पूरे कर पाते हैं?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना
कुछ लोग परमेश्वर में विश्वास करने के मामले को बहुत ही सरल तरीके से देखते हैं। वे सोचते हैं, “परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ है सभाओं में भाग लेना, प्रार्थना करना, उपदेश सुनना, संगति करना, भजन गाना और परमेश्वर की स्तुति करना और कुछ कर्तव्य निभा देना। क्या परमेश्वर पर विश्वास करना यही सब नहीं है?” चाहे तुम कितने ही वर्षों से परमेश्वर में विश्वास कर रहे हो, फिर भी तुम लोग अभी तक परमेश्वर में आस्था की सार्थकता को पूरी तरह नहीं समझ पाए हो। दरअसल, परमेश्वर में आस्था का अर्थ इतना गहन है कि अगर किसी व्यक्ति के अनुभव बहुत उथले हों तो वह इसे समझ ही नहीं पाएगा। जब वह बिल्कुल अंत तक अनुभव करता है तो शैतान का स्वभाव और उसके भीतर के शैतानी जहर अवश्य ही शुद्ध कर दिए और पूरी तरह बदल दिए जाने चाहिए। लोगों को स्वयं को कई सत्यों से सुसज्जित करना होगा, उन मानकों को पूरा करना होगा जिनकी अपेक्षा परमेश्वर मनुष्य से करता है, और वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण कर उसकी आराधना करने में सक्षम होना होगा। केवल तभी वास्तव में उनका उद्धार होता है। यदि तुम अब भी वैसे ही हो जैसे पहले किसी धर्म का हिस्सा होने के समय थे, बस कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत सुनाना और कुछ नारे लगाना, कुछ अच्छे व्यवहार और कार्य करना और कुछ पापपूर्ण चीजों से बचना—कम-से-कम स्पष्ट चीजें—यह इस बात की निशानी नहीं है कि तुमने परमेश्वर में अपने विश्वास में सही राह में प्रवेश कर लिया है। क्या विनियमों का पालन करने का मतलब यह है कि तुम सही रास्ते पर हो? क्या इसका मतलब यह है कि तुमने सही चुनाव किया है? यदि तुम्हारी प्रकृति के भीतर की चीजें नहीं बदलती हैं तो भी तुम अभी भी परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकते हो और अंत में उसे नाराज कर सकते हो। यही सबसे बड़ी समस्या है। यदि तुम परमेश्वर में अपने विश्वास में इस समस्या का समाधान नहीं करते, तो क्या यह कहा जा सकता है कि तुमने वास्तव में उद्धार प्राप्त कर लिया है?
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सही मार्ग चुनना परमेश्वर में विश्वास का सबसे महत्वपूर्ण भाग है
महज व्यावहारिक बदलाव देर तक नहीं टिकते हैं; अगर लोगों के जीवन-स्वभाव में कोई बदलाव नहीं होता है, तो देर-सबेर वे अपना असली चेहरा दिखाएँगे। क्योंकि व्यवहार में परिवर्तन का स्रोत उत्साह है, और पवित्र आत्मा द्वारा उस समय किए गए कुछ कार्य का साथ पाकर, उनके लिए उत्साही बनना या कुछ समय के लिए अच्छे इरादे रखना बहुत आसान होता है। जैसा कि अविश्वासी लोग कहते हैं, “एक अच्छी चीज करना आसान है; मुश्किल तो जीवन भर अच्छी चीजें करने में है।” लोग आजीवन अच्छी चीजें करने में असमर्थ क्यों होते हैं? क्योंकि प्रकृति से लोग दुष्ट, स्वार्थी और भ्रष्ट होते हैं। किसी व्यक्ति का व्यवहार उसकी प्रकृति से निर्देशित होता है; जैसी भी उसकी प्रकृति होती है, वह वैसा ही व्यवहार करता है, और केवल जो स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है वही व्यक्ति की प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है। जो चीजें नकली हैं, वे टिक नहीं सकतीं। जब परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए कार्य करता है, यह मनुष्य को केवल अच्छे व्यवहार की सजावट से सँवारने के लिए नहीं होता—परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य लोगों के स्वभाव को रूपांतरित करना, उन्हें नए लोगों के रूप में पुनर्जीवित करना है। परमेश्वर का न्याय, ताड़ना, परीक्षण और मनुष्य का शोधन, ये सभी उसके स्वभाव को बदलने के वास्ते हैं, ताकि वह परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और वफादारी पा सके और उसकी सामान्य ढंग से आराधना कर सके। यही परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य है। अच्छी तरह से व्यवहार करना परमेश्वर के प्रति समर्पित होने के समान नहीं है, और यह मसीह के अनुरूप होने के बराबर तो और भी नहीं है। व्यवहार में परिवर्तन सिद्धांत पर आधारित होते हैं, और उत्साह से पैदा होते हैं; वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान पर या सत्य पर आधारित नहीं होते हैं, पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन पर आश्रित होना तो दूर की बात है। यद्यपि ऐसे मौके होते हैं जब लोग जो भी करते हैं, उसमें से कुछ को पवित्र आत्मा का प्रबोधन और मार्गदर्शन मिला होता है, यह उनके जीवन का खुलासा नहीं है। उन्होंने अभी तक सत्य वास्तविकताओं में प्रवेश नहीं किया है और उनके जीवन स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आया है। चाहे किसी व्यक्ति का व्यवहार कितना भी अच्छा हो, इससे यह साबित नहीं होता कि वह परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है या वह सत्य का अभ्यास करता है। व्यवहार संबंधी बदलावों का मतलब यह नहीं है कि जीवन स्वभाव में परिवर्तन आ गया और इन्हें जीवन के खुलासे नहीं माना जा सकता है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन
संसार में कई प्रमुख धर्म हैं, प्रत्येक का अपना प्रमुख, या अगुआ है, और उनके अनुयायी संसार भर के देशों और सम्प्रदायों में सभी ओर फैले हुए हैं; लगभग प्रत्येक देश में, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, भिन्न-भिन्न धर्म हैं। फिर भी, संसार भर में चाहे कितने ही धर्म क्यों न हों, ब्रह्मांड के सभी लोग अंततः एक ही परमेश्वर के मार्गदर्शन के अधीन अस्तित्व में हैं, धर्म के प्रमुखों या अगुवाओं के मार्गदर्शन के अधीन नहीं है। कहने का अर्थ है कि मानवजाति किसी विशेष धर्म-प्रमुख या अगुवा द्वारा मार्गदर्शित नहीं है; बल्कि संपूर्ण मानवजाति को एक ही रचयिता के द्वारा मार्गदर्शित किया जाता है, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी का और सभी चीजों का और मानवजाति का भी सृजन किया है—यह एक तथ्य है। यद्यपि संसार में कई प्रमुख धर्म हैं, किंतु वे कितने ही महान क्यों न हों, वे सभी सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन अस्तित्व में हैं और उनमें से कोई भी इस प्रभुत्व के दायरे से बाहर नहीं जा सकता है। मानवजाति का विकास, समाज का आगे बढ़ना, प्राकृतिक विज्ञानों का विकास—प्रत्येक सृष्टिकर्ता की व्यवस्थाओं से अविभाज्य है और यह कार्य ऐसा नहीं है जो किसी धर्म-प्रमुख द्वारा किया जा सके। धर्म-प्रमुख मात्र किसी धर्म विशेष के अगुआ हैं, और वे परमेश्वर का, या उसका जिसने स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों को रचा है, प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं। धर्म-प्रमुख पूरे धर्म के भीतर सभी का नेतृत्व कर सकते हैं, परंतु वे स्वर्ग के नीचे के सभी सृजित प्राणियों को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं—यह सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत तथ्य है। एक धर्म-प्रमुख मात्र अगुआ है, और वह परमेश्वर (सृष्टिकर्ता) के समकक्ष खड़ा नहीं हो सकता। सभी चीजें रचयिता के हाथों में हैं, और अंत में वे सभी रचयिता के हाथों में लौट जाएँगी। मानवजाति परमेश्वर द्वारा बनाई गई थी, और किसी का धर्म चाहे कुछ भी हो, प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन लौट जाएगा—यह अपरिहार्य है। केवल परमेश्वर ही सभी चीज़ों में सर्वोच्च है, और सभी सृजित प्राणियों में उच्चतम शासक को भी उसके प्रभुत्व के अधीन लौटना होगा। मनुष्य की हैसियत चाहे कितनी भी ऊँची क्यों न हो, लेकिन वह मनुष्य मानवजाति को किसी उपयुक्त गंतव्य तक नहीं ले जा सकता, और कोई भी सभी चीजों को उनके प्रकार के आधार पर छाँटने में सक्षम नहीं है। स्वयं यहोवा ने मानवजाति की रचना की और प्रत्येक को उसके प्रकार के आधार पर छाँटा, और जब अंत का समय आएगा तो वह तब भी, सभी चीजों को उनकी प्रकृति के आधार पर छाँटते हुए, अपना कार्य स्वयं ही करेगा—यह कार्य परमेश्वर के अलावा और किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता है। आरंभ से आज तक किए गए कार्य के सभी तीन चरण स्वयं परमेश्वर के द्वारा किए गए थे और एक ही परमेश्वर के द्वारा किए गए थे। कार्य के तीन चरणों का तथ्य परमेश्वर की समस्त मानवजाति की अगुआई का तथ्य है, एक ऐसा तथ्य जिसे कोई नकार नहीं सकता। कार्य के तीन चरणों के अंत में, सभी चीजें उनके प्रकारों के आधार पर वर्गीकृत की जाएँगी और परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन लौट जाएँगी, क्योंकि संपूर्ण ब्रह्मांड में केवल इसी एक परमेश्वर का अस्तित्व है, और कोई दूसरे धर्म नहीं हैं। जो संसार का निर्माण करने में अक्षम है वह उसका अंत करने में भी अक्षम होगा, जबकि जिसने संसार की रचना की है वह उसका अंत करने में भी निश्चित रूप से समर्थ होगा। इसलिए, यदि कोई युग का अंत करने में असमर्थ है और बस मानव की स्वयं को विकसित करने और अपने चरित्र को परिष्कृत करने में सहायता करने में सक्षम है, तो वह निश्चित रूप से परमेश्वर नहीं होगा, और निश्चित रूप से मानवजाति का प्रभु नहीं होगा। वह इस तरह के महान कार्य को करने में असमर्थ होगा; केवल एक ही है जो इस प्रकार का कार्य कर सकता है, और वे सभी जो यह कार्य करने में असमर्थ हैं, निश्चित रूप से शत्रु हैं, न कि परमेश्वर। जब तक वह एक धर्म है तब तक वह परमेश्वर के साथ असंगत है, और जो परमेश्वर के साथ असंगत है, वह परमेश्वर का शत्रु है। समस्त कार्य केवल इसी एक सच्चे परमेश्वर द्वारा किया जाता है, और संपूर्ण ब्रह्मांड केवल इसी एक परमेश्वर द्वारा आदेशित किया जाता है। चाहे उसका इस्राएल का काम हो या चीन का, चाहे यह कार्य पवित्रात्मा द्वारा किया जाए या देह के द्वारा, किया सब कुछ परमेश्वर के द्वारा ही जाता है, किसी अन्य के द्वारा नहीं। बिल्कुल इसीलिए क्योंकि वह समस्त मानवजाति का परमेश्वर है और किसी भी परिस्थिति से बाधित हुए बिना, स्वतंत्र रूप से कार्य करता है। यह सभी दर्शनों में सबसे महान है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है