33. शोहरत और लाभ की बेड़ियाँ

जिएली, स्पेन

2015 में मुझे वार्षिक चुनावों में कलीसिया का अगुआ चुना गया। मैं वास्तव में रोमांचित हो गया, और मैंने सोचा कि चूँकि मुझे दर्जनों भाई-बहनों में से अगुआ चुना गया है, इसलिए इसका यह मतलब है कि मैं दूसरों से बेहतर हूँ। तब से, मेरे काम के दौरान, जब भाई-बहनों को जीवन-प्रवेश में मुश्किलें आतीं तो वे मेरे पास सहभागिता करने आते, और समूहों के अगुआ कलीसिया के काम में आने वाली समस्याओं की चर्चा मुझसे करते। मेरे अंदर श्रेष्ठता की भावना घर कर गई। मैं अहंकार से अपना सीना फुलाकर घूमता-फिरता था और सभाओं में सहभागिता के दौरान मुझमें आत्मविश्वास का विस्फोट होता रहता था। कुछ समय बाद मैंने देखा कि एक सहकर्मी, बहन लियू, काफी योग्य थी, सत्य पर उसकी सहभागिता बहुत स्पष्ट होती थी, और वह लोगों की समस्याएँ हल करने के लिए उनकी जड़ तक पहुँच जाती थी। वह अभ्यास के मार्ग भी दिखाती थी, और हर कोई उसकी सहभागिता सुनना चाहता था। मैं उसकी सराहना भी करता था और उससे ईर्ष्या भी करता था। लेकिन मैं नहीं चाहता था कि कोई मुझसे आगे निकल जाए, इसलिए मैं हर सभा से पहले ध्यान से तैयारी करता, और अपने दिमाग पर जोर देकर सोचता कि मैं ज्यादा विस्तार और रोशनी के साथ कैसे सहभागिता कर सकता हूँ, ताकि मैं उससे बेहतर दिखूँ। जब मैं अपनी सहभागिता खत्म होने पर भाई-बहनों को सहमति में सिर हिलाते देखता, तो बहुत खुश होता और उपलब्धि की भावना से भर जाता। बाद में मुझे पता चला कि मेरे सहकर्मी भाई झांग को फिल्में बनाने का काफी अच्छा पेशेवर ज्ञान है, और वह कंप्यूटर के मामले में भी अच्छा है। फिल्में बनाने का काम करने वाले भाई-बहन अकसर संबंधित मुद्दों पर उसके साथ चर्चा किया करते थे, और एक कलीसिया-अगुआ के रूप में मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं होता था। मैं स्वयं को चौपहिया गाड़ी में पाँचवें पहिए जैसा फालतू महसूस करता, और इससे बहुत असंतुष्ट रहता। मुझे लगता कि कोई भी परेशानी आने पर अगर वे भाई झांग के पास जाते हैं, तो वे जरूर यह सोचते होंगे कि मैं उसके जितना योग्य नहीं हूँ। मैंने सोचा कि अगर मुझे फिल्में बनाने के बारे में भी कुछ जानकारी हो, तो भाई-बहन अपनी परेशानियाँ लेकर मेरे ही पास आएँगे। मैं सुबह जल्दी उठने और रात को देर से सोने लगा, ताकि थोड़ा शोध कर फिल्में बनाने के बारे में सीख सकूँ और मुझे ज्यादा जानकारी हो जाए। मैंने कलीसिया की सभी समस्याओं और भाई-बहनों के हालात बिलकुल नजरअंदाज कर दिए। कुछ समय बाद विभिन्न समूहों के कामों में समस्याएँ पैदा होने लगीं, जिन्हें मैं जितनी चाहे सहभागिता या सभाएँ करने के बावजूद हल न कर पाता। चूँकि भाई-बहनों की परेशानियाँ हल नहीं हो पा रही थीं, इसलिए फिल्म-निर्माण की प्रगति बाधित हो गई और एक के बाद एक समस्या खड़ी होने लगी। मैं इतना ज्यादा तनावग्रस्त हो गया कि मेरे लिए साँस लेना भी दूभर होने लगा। मैं बहुत संतप्त रहने लगा। मुझे फिक्र हो रही थी कि दूसरे लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे, कहीं वे यह न सोच लें कि मुझमें अगुआ बनने की काबिलियत नहीं है और मैं इस काम के योग्य नहीं हूँ। ऐसा लगने लगा कि मैं अगुआ का अपना पद बरकरार नहीं रख पाऊँगा। इस बारे में सोच-सोचकर मैं और ज्यादा निराश हो गया। मैं एक पिचके हुए गुब्बारे की तरह महसूस करने लगा और मुझमें पहले जैसी ऊर्जा नहीं रही। निराशा में जीते हुए और अपने कर्तव्य में कोताही करके आखिरकार मैंने पवित्र आत्मा का काम गँवा दिया। चूँकि मैं अपने काम में कुछ हासिल नहीं कर पा रहा था, इसलिए मुझे हटा दिया गया। उस पल मुझे ऐसा लगा, जैसे मैं किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहा, और मैं चाहने लगा कि धरती फट जाए और मैं उसमें समा जाऊँ। मुझे यह भी खयाल आया, "क्या भाई-बहन यह कहेंगे कि मैं एक नकली अगुआ था, जिसने व्यवहारिक काम नहीं किया?" जितना मैंने इस बारे में सोचा, मैं उतना ही ज्यादा परेशान हो गया।

उस रात मैं सो नहीं पाया और करवटें बदलता रहा। बार-बार परमेश्वर से प्रार्थना कर गुहार लगाता रहा कि वह मुझे मेरी स्थिति जानने में मेरा मार्गदर्शन करे। फिर मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "तुम लोगों की खोज में, तुम्हारी बहुत सी व्यक्तिगत अवधारणाएँ, आशाएँ और भविष्य होते हैं। वर्तमान कार्य तुम लोगों की हैसियत पाने की अभिलाषा और तुम्हारी अनावश्यक अभिलाषाओं से निपटने के लिए है। आशाएँ, हैसियत और अवधारणाएँ सभी शैतानी स्वभाव के विशिष्ट प्रतिनिधित्व हैं। लोगों के हृदय में इन चीज़ों के होने का कारण पूरी तरह से यह है कि शैतान का विष हमेशा लोगों के विचारों को दूषित कर रहा है, और लोग शैतान के इन प्रलोभनों से पीछा छुड़ाने में हमेशा असमर्थ रहे हैं। वे पाप के बीच रह रहे हैं, मगर इसे पाप नहीं मानते, और अभी भी सोचते हैं: 'हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे हमें आशीष प्रदान करना चाहिए और हमारे लिए सब कुछ सही ढंग से व्यवस्थित करना चाहिए। हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए हमें दूसरों से श्रेष्ठतर होना चाहिए, और हमारे पास दूसरों की तुलना में बेहतर हैसियत और बेहतर भविष्य होना चाहिए। चूँकि हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे हमें असीम आशीष देनी चाहिए। अन्यथा, इसे परमेश्वर पर विश्वास करना नहीं कहा जाएगा।' ... जितना अधिक तू इस तरह से तलाश करेगी उतना ही कम तू पाएगी। हैसियत के लिए किसी व्यक्ति की अभिलाषा जितनी अधिक होगी, उतनी ही गंभीरता से उसके साथ निपटा जाएगा और उसे उतने ही बड़े शुद्धिकरण से गुजरना होगा। इस तरह के लोग निकम्मे होते हैं! उनके साथ अच्छी तरह से निपटने और उनका न्याय करने की ज़रूरत है ताकि वे इन चीज़ों को पूरी तरह से छोड़ दें। यदि तुम लोग अंत तक इसी तरह से अनुसरण करोगे, तो तुम लोग कुछ भी नहीं पाओगे। जो लोग जीवन का अनुसरण नहीं करते वे रूपान्तरित नहीं किए जा सकते; जिनमें सत्य की प्यास नहीं है वे सत्य प्राप्त नहीं कर सकते। तू व्यक्तिगत रूपान्तरण का अनुसरण करने और प्रवेश करने पर ध्यान नहीं देती; बल्कि तू हमेशा उन अनावश्यक अभिलाषाओं और उन चीज़ों पर ध्यान देती है जो परमेश्वर के लिए तेरे प्रेम को बाधित करती हैं और तुझे उसके करीब आने से रोकती हैं। क्या ये चीजें तुझे रूपान्तरित कर सकती हैं? क्या ये तुझे राज्य में ला सकती हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो?')। इसे पढ़ने के बाद मैंने अपनी हाल की स्थिति पर विचार किया। अगुआ का काम सँभालने के बाद से मैंने शोहरत और हैसियत के पीछे भागने और दूसरों से बेहतर दिखना चाहने के सिवाय कुछ नहीं किया। जब मैंने देखा कि सत्य पर बहन लियू की सहभागिता मुझसे अच्छी है, तो मुझे डर लगा कि वह मुझसे आगे निकल जाएगी। मैंने सोचा कि मैं कैसे उससे बेहतर सहभागिता करूँ, ताकि लोग मुझे सराहें और मेरी तारीफ करें। जब मैंने देखा कि भाई झांग में पेशेवर कौशल है और बहुत सारे भाई-बहन अपने काम में आने वाली परेशानियों के बारे में उससे बात करते हैं, तो मुझे जलन हुई और मैंने उसे नकार दिया। उससे आगे निकलने के लिए मैंने जानकारी से लैस होने के लिए कड़ी मेहनत की और समूह की समस्याओं तक को नजरअंदाज कर दिया। जब मैं भाई-बहनों की परेशानियाँ दूर नहीं कर पाया, तो मैं परमेश्वर की शरण में नहीं गया, न ही सहभागिता के माध्यम से हल तलाशने के लिए भाई-बहनों के साथ सत्य जानने की कोशिश की। मुझे बस रुतबा खोने की चिंता रही, और मैं इस बात से डरता रहा कि अगर मैंने अपना काम ठीक से नहीं किया, तो मैं अगुआ का पद बरकरार नहीं रख पाऊँगा। आखिरकार मुझे एहसास हुआ कि मैं अपना काम परमेश्वर की इच्छा ध्यान में रखकर बिलकुल नहीं कर रहा था, बल्कि दूसरों से बेहतर होने की अपनी जंगली महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए कर रहा था, ताकि उन पर आधिपत्य जमा सकूँ। भाई-बहनों ने मुझ पर भरोसा किया और मुझे कलीसिया का अगुआ चुना, लेकिन मैंने कलीसिया के काम या उनके जीवन-प्रवेश के बारे में बिलकुल नहीं सोचा। मैं वास्तव में अपना काम नहीं कर रहा था, न ही मैं जिम्मेदार था, जिससे कलीसिया के काम का नुकसान हुआ। मैं बहुत स्वार्थी और नीच था। मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा रहा था—मैं बुराई कर रहा था और परमेश्वर का विरोध कर रहा था! मुझे अपनी आस्था में सही रास्ते पर न चलने और हमेशा शोहरत और लाभ के लिए लड़ते रहकर परमेश्वर को नाराज करने पर पछतावा हुआ। अपने काम से हटाया जाना मेरे लिए परमेश्वर का धार्मिक न्याय और ताड़ना थी। वह मुझे मिटा नहीं रहा था, बल्कि उसने मुझे काम से निकाला था, ताकि मैं अपने व्यवहार पर विचार कर सकूँ। यह परमेश्वर द्वारा मेरी रक्षा करना और मुझे बचाना था! कुछ दिनों तक आराधना और चिंतन करने से मेरी हालत धीरे-धीरे सुधर गई, इसलिए कलीसिया के अगुआ ने मुझे रोजमर्रा के काम सौंप दिए। यह अवसर दिए जाने पर मैं परमेश्वर का वास्तव में आभारी हुआ, और मैंने मन ही मन संकल्प लिया कि मैं इस कर्तव्य को निश्चित रूप से सँजोऊँगा, और परमेश्वर के विरोध के रास्ते पर चलकर शोहरत और हैसियत के पीछे भागना बंद कर दूँगा।

इस अनुभव के बाद मैंने सोचा कि अब मैं शोहरत और हैसियत की अपनी इच्छा कुछ त्याग सकूँगा, लेकिन शैतान ने मुझे गहराई तक भ्रष्ट कर दिया था। शैतानी स्वभाव थोड़ी-सी समझ और आत्मचिंतन मात्र से नहीं सुधारा जा सकता, इसलिए परमेश्वर ने मुझे उजागर करने और बचाने के लिए दोबारा एक परिस्थिति तैयार की।

कुछ महीनों बाद, एक दिन कलीसिया के अगुआ ने हमसे कहा कि हम एक समूह-अगुआ चुनें। जैसे ही मैंने यह सुना, तो मैंने यह सोचना शुरू कर दिया : "क्या मुझे समूह-अगुआ चुने जाने का अवसर मिल सकता है? मैं काफी काबिल कार्यकर्ता हूँ, लेकिन मेरे पास कोई पेशेवर हुनर नहीं है, इसलिए शायद मेरी संभावनाएँ उतनी अच्छी नहीं हैं।" फिर मैंने समूह के कुछ और भाई-बहनों के बारे में सोचा। भाई झांग का पेशेवर कौशल उत्कृष्ट था और सत्य पर उसकी सहभागिता व्यावहारिक होती थी, साथ ही उसमें न्याय की भावना थी और वह कलीसिया के काम को कायम रखने में सक्षम था। कुल मिलाकर, ऐसा लग रहा था कि उसे ही चुना जाएगा। मैंने सोचा, जब मैं कलीसिया का अगुआ था, तो किस तरह भाई झांग को काम सौंपा करता था, लेकिन अगर वह समूह का अगुआ चुना गया, तो वह मुझे बताएगा कि मुझे क्या करना है। क्या यह मुझे उससे हीन नहीं बना देगा? इस खयाल ने मुझे वाकई असहज कर दिया। जब चुनाव का दिन आया, तो मैं घबराए बिना नहीं रह सका, और मेरे अंदर एक जंग छिड़ गई : "मुझे किसे वोट देना चाहिए? क्या मुझे भाई झांग को वोट देना चाहिए?" मैं सोचने लगा कि किस तरह ज्यादातर भाई-बहन अपने काम में आने वाली समस्याओं के बारे में उसके साथ चर्चा करते हैं, और दूसरे समूहों के लोग भी अपने काम के बारे में हर समय उससे सलाह लेते रहते हैं—इससे वह सच में मजबूत उम्मीदवार लग रहा था। अगर वह टीम का अगुआ बन गया, तो क्या वह मुझसे ऊँचे पायदान पर नहीं हो जाएगा? इस खयाल से मुझे उसे वोट देने की इच्छा नहीं हुई, लेकिन मुझमें पेशेवर ज्ञान की कमी थी और मैं टीम का अगुआ बनने के योग्य नहीं था। मैं बहुत उदास और दुखी महसूस करने लगा, और मुझे इस बात से नफरत हुई कि मैं काम के बारे में ज्यादा नहीं जानता। तभी मेरे दिमाग में एक भयानक विचार आया : "अगर मैं समूह का अगुआ नहीं बन सकता, तो मैं सुनिश्चित करूँगा कि तुम भी न बन पाओ।" और इसलिए, मैंने भाई वू को वोट दिया, जिसके पास भी उतना पेशेवर ज्ञान नहीं था। लेकिन यह देखकर मैं हैरान रह गया कि भाई झांग फिर भी चुन लिया गया। चीजों के इस रूप में सामने आने पर मुझे खुशी नहीं हुई, बल्कि मुझे एक अजीब-सी बेचैनी महसूस होने लगी, मानो मैंने कोई शर्मनाक हरकत कर दी हो। बाद में मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "अगर कुछ लोग किसी व्यक्ति को अपने से बेहतर पाते हैं, तो वे उस व्यक्ति को दबाते हैं, उसके बारे में अफ़वाह फैलाना शुरू कर देते हैं, या किसी तरह के अनैतिक साधनों का प्रयोग करते हैं जिससे कि दूसरे व्यक्ति उसे अधिक महत्व न दे सकें, और यह कि कोई भी किसी दूसरे व्यक्ति से बेहतर नहीं है, तो यह अभिमान और दंभ के साथ-साथ धूर्तता, धोखेबाज़ी और कपट का भ्रष्ट स्वभाव है, और इस तरह के लोग अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। वे इसी तरह का जीवन जीते हैं और फिर भी यह सोचते हैं कि वे महान हैं और वे नेक हैं। लेकिन, क्या उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय है? सबसे पहले, इन बातों की प्रकृति के परिप्रेक्ष्य से बोला जाये, तो क्या इस तरीके से काम करने वाले लोग बस अपनी मनमर्ज़ी से काम नहीं कर रहे हैं? क्या वे परमेश्वर के परिवार के हितों पर विचार करते हैं? वे परमेश्वर के परिवार के कार्य को होने वाले नुकसान की परवाह किये बिना, सिर्फ़ अपनी खुद की भावनाओं के बारे में सोचते हैं और वे सिर्फ़ अपने लक्ष्यों को हासिल करने की बात सोचते हैं। इस तरह के लोग न केवल अभिमानी और आत्मतुष्ट हैं, बल्कि वे स्वार्थी और घिनौने भी हैं; वे परमेश्वर के इरादों की बिलकुल भी परवाह नहीं करते, और निस्संदेह, इस तरह के लोगों के पास परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं होता। यही कारण है कि वे वही करते हैं जो करना चाहते हैं और बेतुके ढंग से आचरण करते हैं, उनमें दोष का कोई बोध नहीं होता, कोई घबराहट नहीं होती, कोई भी भय या चिंता नहीं होती, और वे परिणामों पर भी विचार नहीं करते। यही वे अकसर करते हैं, और इसी तरह उन्‍होंने हमेशा आचरण किया होता है। इस तरह के लोग कैसे परिणाम भुगतते हैं? वे मुसीबत में पड़ जाएँगे, ठीक है? हल्‍के-फुल्‍के ढंग से कहें, तो इस तरह के लोग बहुत अधिक ईर्ष्‍यालु होते हैं और उनमें निजी प्रसिद्धि और हैसियत की बहुत प्रबल आकांक्षा होती है; वे बहुत धोखेबाज और धूर्त होते हैं। और अधिक कठोर ढंग से कहें, तो मूल समस्‍या यह है कि इस तरह के लोगों के दिलों में परमेश्‍वर का तनिक भी डर नहीं होता। वे परमेश्वर का भय नहीं मानते, वे अपने आपको सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते हैं, और वे अपने हर पहलु को परमेश्वर से ऊंचा और सत्य से बड़ा मानते हैं। उनके दिलों में, परमेश्वर जिक्र करने के योग्य नहीं है और बिलकुल महत्वहीन है, उनके दिलों में परमेश्वर का बिलकुल भी कोई महत्व नहीं होता। क्‍या उन लोगों ने सत्‍य में प्रवेश पा लिया है जिनके हृदयों में परमेश्‍वर के लिए कोई जगह नहीं है, और जो परमेश्‍वर में श्रद्धा नहीं रखते? (नहीं।) इसलिए, जब वे सामान्‍यत: मुदित मन से और ढेर सारी ऊर्जा खर्च करते हुए खुद को व्‍यस्‍त बनाये रखते हैं, तब वे क्‍या कर रहे होते हैं? ऐसे लोग यह तक दावा करते हैं कि उन्‍होंने परमेश्‍वर के लिए खपाने की ख़ातिर सब कुछ त्‍याग दिया है और बहुत अधिक दुख झेला है, लेकिन वास्‍तव में उनके सारे कृत्‍यों के पीछे निहित प्रयोजन, सिद्धान्‍त और लक्ष्‍य, सभी खुद को लाभान्वित करने के लिए हैं; वे केवल अपने सारे निजी हितों की रक्षा करने का प्रयास कर रहे हैं। तुम लोग ऐसे व्यक्ति को बहुत ही बेकार कहोगे या नहीं कहोगे? जो व्‍यक्ति परमेश्‍वर में श्रद्धा नहीं रखता वह किस तरह का व्‍यक्ति है? क्‍या वह अहंकारी नहीं है? क्‍या ऐसा व्‍यक्ति शैतान नहीं है? वे किस तरह के प्राणी होते हैं जो परमेश्‍वर में श्रद्धा नहीं रखते? पशुओं की बात छोड़ दें, तो परमेश्‍वर में श्रद्धा न रखने वाले प्राणियों में, दैत्‍य, शैतान, प्रधान स्वर्गदूत, और परमेश्‍वर के साथ विवाद करने वाले, सभी शामिल हैं" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी आस्था में सही पथ पर होने के लिए आवश्यक पाँच अवस्थाएँ')। इन वचनों ने मुझे छलनी करके रख दिया। चुनाव की प्रक्रिया के दौरान अपने विचारों और हरकतों के बारे में सोचने पर मुझे लगा कि मैं अपना चेहरा दिखाने लायक नहीं रहा। मैंने परमेश्वर की जाँच स्वीकार किए बिना और परमेश्वर के प्रति बिलकुल भी श्रद्धा रखे बिना अपने व्यक्तिगत उद्देश्यों के अनुसार, अपनी स्थिति और प्रतिष्ठा बचाने के लिए मतदान किया था। मुझे पता था कि भाई झांग कुशल है, सत्य पर उसकी सहभागिता व्यावहारिक होती है, और उसके समूह-अगुआ बनने से हर किसी को अपने जीवन-प्रवेश में लाभ होगा और कलीसिया के काम में भी फायदा होगा। लेकिन मुझे जलन हो रही थी, और मैं डरता था कि समूह का अगुआ बनकर वह मुझसे ऊपर हो जाएगा, इसलिए मैंने जानबूझकर उसे वोट नहीं दिया। मैं बड़े लाल अजगर के इस सिद्धांत पर चल रहा था, "अगर एकतंत्र नाकाम होता है, तो पक्का करो कि लोकतंत्र कामयाब न हो।" बड़े लाल अजगर की कार्य-प्रणाली यही है कि अगर वह सत्ता में नहीं आ सकता, तो कोई और भी सत्ता में नहीं आना चाहिए। अगर जरूरी हुआ, तो वह दोनों पक्षों को खत्म करने के लिए एक कटु संघर्ष करेगा। क्या मैं भी ऐसा ही नहीं था? अगर वह पद मुझे नहीं मिल सकता था, तो मैं नहीं चाहता था कि वह भाई झांग को भी मिले। बल्कि अपनी प्रतिष्ठा और हैसियत बचाने के लिए मैं गलत आदमी को इस भूमिका में चुने जाने और कलीसिया के काम का नुकसान होते देखने के लिए भी तैयार था। मैं बेहद स्वार्थी, नीच, चालाक और शातिर था, और मेरे मन में परमेश्वर के लिए थोड़ी-सी भी श्रद्धा नहीं थी। मैंने परमेश्वर द्वारा व्यक्त बहुत सारे सत्यों का आनंद लिया था, और मुझे अपना कर्तव्य निभाने का अवसर देकर परमेश्वर मुझ पर दया दिखा रहा था। लेकिन यह सोचने के बजाय कि मैं परमेश्वर के प्रेम का मूल्य कैसे चुकाऊँ, मुझे जलन हो रही थी और मैं नाम और लाभ के लिए प्रयासरत था। मैं शैतान का नौकर बनकर सेवा कर रहा था और परमेश्वर के घर के काम में रुकावट डाल रहा था। क्या मैं धोखेबाज और गिरा हुआ इंसान नहीं था? मैं सोचने लगा कि कैसे एक साल पहले मुझे अपने पद से हटा दिया गया था, क्योंकि मैं शोहरत और लाभ के लिए लड़ रहा था, अपना कर्तव्य ठीक से पूरा नहीं कर रहा था, और व्यावहारिक काम नहीं कर पा रहा था। और अब मैं फिर उसी तरह की परिस्थिति में था, लेकिन मैं अभी भी शोहरत और हैसियत के पीछे भाग रहा था, सत्य का अनुसरण नहीं कर रहा था। अगर मैं ऐसा ही करता रहा, तो परमेश्वर मुझे दुत्कारकर हटा देगा।

बाद में मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "तुम लोगों को अपनी जगह का पता नहीं है, फिर भी तुम लोग गोबर में एक-दूसरे के साथ लड़ाई करते हो। इस तरह की लड़ाई से तुम क्या हासिल कर सकते हो? यदि तुम लोगों के हृदय में वास्तव में मेरे लिए आदर होता, तो तुम लोग मेरी पीठ पीछे एक-दूसरे के साथ कैसे लड़ सकते थे? तुम्हारी हैसियत कितनी भी ऊँची क्यों न हो, क्या तुम फिर भी गोबर में एक बदबूदार छोटा-सा कीड़ा ही नहीं हो? क्या तुम पंख उगाकर आकाश में उड़ने वाला कबूतर बन पाओगे?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जब झड़ते हुए पत्ते अपनी जड़ों की ओर लौटेंगे, तो तुम्हें अपनी की हुई सभी बुराइयों पर पछतावा होगा')। "परमेश्वर क्यों कहता है कि लोग 'कीड़े' हैं? उसकी दृष्टि में, ये भ्रष्ट मनुष्य साफ तौर पर सृजित प्राणी हैं—लेकिन क्या वे सृजित प्राणियों के उत्तरदायित्व और कर्तव्य निभाते हैं? भले ही बहुत-से लोग अपने कर्तव्य निभाते हैं, लेकिन उनका कार्य कितना अच्छे ढंग से व्यक्त होता है? वे अपना कर्तव्य निभाने में बिल्कुल भी सक्रिय नहीं हैं; वे मुश्किल से ही कभी आगे आकर ऐसा करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हैं। अगर उन्हें काटा-छाँटा न जाए, उनके साथ निपटा, या उन्हें अनुशासित नहीं किया जाये, तो वे कुछ नहीं करते हैं। इसलिए भी, उन्हें एक साथ लाना, सहभागिता करना और पोषण देना हमेशा आवश्यक होता है, ताकि उनमें थोड़ी तो आस्था हो, थोड़े तो आगे बढ़कर सक्रिय हों। क्या यह मनुष्य की भ्रष्टता नहीं है? ... वे दिन भर जो कुछ सोचते हैं, उसका सत्य या परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने के साथ कोई संबंध नहीं होता है; वे सारा दिन ठूंस कर खाते रहते हैं और किसी भी चीज़ पर विचार नहीं करते। अगर वे किसी चीज़ के बारे में सोचते भी हैं, तो वह सत्य-सिद्धांतों के अनुरूप नहीं होता। यह उसके अनुरूप तो बिल्कुल नहीं होता जिसकी अपेक्षा परमेश्वर इंसान से करता है। उनका हर काम बाधा डालने और गड़बड़ी फैलाने वाला होता है और वे दूर-दूर तक भी परमेश्वर की गवाही नहीं देते। उनका मन ऐसे विचारों से भरा होता है कि कैसे वो सब पाएँ जो देह-सुख के लिए जो कुछ अच्छा है, किस तरह से रुतबे और शोहरत के लिए संघर्ष करें, किस तरह से लोगों के विशेष समूहों में शामिल हो सकें, और किस तरह से ऊंचे पद पर पहुँच कर अच्छी शोहरत हासिल कर सकें। ये लोग परमेश्वर का दिया हुआ भोजन खाते हैं, उसकी दी हुई हर चीज़ का आनंद लेते हैं, लेकिन वे ऐसा कुछ नहीं करते जो इंसान को करना चाहिए। क्या परमेश्वर ऐसे लोगों को पसंद कर सकता है? ... सबसे बड़ी बात यह है कि जो कीड़े हैं वे निकम्मे और बेशर्म होते हैं, परमेश्वर की दृष्टि में उनका कोई मूल्य नहीं होता! मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि ऐसे लोगों का मूल्य नहीं होता? परमेश्वर ने तुम्हें बनाया, तुम्हें जीवन दिया, फिर भी तुम अपना कर्तव्य नहीं निभा सकते, यह वो है जो कम-से-कम तुम्हें करना ही चाहिए; तुम सिर्फ मुफ़्त की रोटी सेंकते हो। उसकी दृष्टि में, तुम किसी काम के नहीं हो, और तुम्हारे जीवित रहने का कोई अर्थ नहीं है। क्या ऐसे लोग कीड़े नहीं हैं? फिर, लोग यदि कीड़े नहीं बनना चाहते, तो उन्हें क्या करना चाहिए? अव्वल तो यह कि अपनी जगह ढूँढ़ो और अपना कर्तव्य निभाने की भरसक कोशिश करो, इससे तुम सृजनकर्ता से जुड़ जाओगे; तुम उसे अपना हिसाब दे सकोगे। उसके बाद, विचार करो कि अपना कर्तव्य निभाने में निष्ठावान कैसे बन सकते हो। तुम्हें महज़ लापरवाही से काम नहीं करना चाहिए, या जैसे-तैसे काम नहीं करना चाहिए; बजाय इसके, तुम्हें इसमें अपना पूरा दिल लगा देना चाहिए। तुम्हें सृजनकर्ता को बेवकूफ़ बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, तुम्हें वही करना चाहिए जो परमेश्वर तुमसे करने के लिए कहता है, और तुम्हें उसकी बातों पर ध्यान देना और समर्पण करना चाहिए" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन संवृद्धि के छह संकेतक')।

परमेश्वर के वचनों पर विचार करने पर मुझे बहुत दुख हुआ। मैंने महसूस किया कि शोहरत और लाभ के लिए मेरी लड़ाई को परमेश्वर बहुत गंदा और घिनौना मानता है। परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य निभाने का सौभाग्य पाना परमेश्वर की तरफ से विशेष उत्कर्ष था, लेकिन मैं अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कर रहा था। इसके बजाय, मैंने सिर्फ अपने नाम और हैसियत के बारे में सोचा, यहाँ तक कि इन चीजों के लिए परमेश्वर के घर के काम में भी रुकावट डाली। मैं शैतान का किरदार निभा रहा था। यह परमेश्वर के लिए बहुत घिनौना और कुत्सित था! परमेश्वर कहता है, "तुम्हारी हैसियत कितनी भी ऊँची क्यों न हो, क्या तुम फिर भी गोबर में एक बदबूदार छोटा-सा कीड़ा ही नहीं हो?" मैं समझ गया कि मैं एक सृजित प्राणी हूँ, एक गंदा, भ्रष्ट इंसान, जो किसी लायक नहीं, जिसमें कोई उल्लेखनीय गरिमा नहीं, इसलिए अगर मुझे कोई पद मिल भी जाता, तो भी मैं बदल न पाता। मैं तो अपना कर्तव्य भी ठीक से नहीं निभा पाता था, बस लगातार नाम और लाभ के लिए होड़ करता था, और चाहता था कि दूसरे मेरी इज्जत करें। मेरी अंतरात्मा और समझ कहाँ थी? मेरे जीवन का क्या मूल्य था? क्या मैं एक पूरी तरह से घृणित कीड़ा नहीं था? परमेश्वर के वचनों द्वारा किए गए खुलासे से अपनी प्रकृति और सार की कुछ समझ हासिल करने के बाद मैं खुद से नफरत करने लगा और देह-सुख का त्याग और सत्य का अभ्यास करने के लिए तैयार हो गया।

बाद में मैं भाई झांग के पास गया और चुनाव में अपने घिनौने इरादों और हरकतों का खुलासा करते हुए उसे अपनी भ्रष्टता के बारे में बताया। उसने न केवल मेरा तिरस्कार नहीं किया, बल्कि मेरी मदद करने के लिए अपने अनुभव पर सहभागिता भी की। इस सहभागिता के बाद हमारे बीच की दीवार ढह गई और मैंने वास्तव में मुक्त और सहज महसूस किया। तब से जब भी अपने काम में मुझे कोई मुश्किल आती या कोई मुद्दा समझ में न आता, तो मैं भाई झांग के पास चला जाता, और वह हमेशा धैर्य के साथ सहभागिता के जरिए मेरे सवालों का जवाब देता। मेरे अपने पेशेवर कौशल भी कुछ समय के बाद सुधर गए। जब मैंने नाम और हैसियत की चाह छोड़कर सत्य का अभ्यास किया, तो मैंने इस तरह अपना कर्तव्य निभाने से मिलने वाले चैन और शांति का अनुभव किया, और मैं परमेश्वर के करीब होता गया। मैं एक बार फिर शोहरत और हैसियत की बेड़ियों से मुक्त हो गया और अपने लिए परमेश्वर के व्यावहारिक उद्धार का स्वाद चख पाया।

अक्तूबर 2017 में कलीसिया के वार्षिक चुनाव शुरू हुए, और भाई-बहनों ने उम्मीदवार के रूप में मेरी सिफारिश की। मैंने अपने भीतर थोड़ी बचैनी महसूस की और सोचा, "मुझे अपने अगुआ के पद से हटे हुए दो साल से ज्यादा हो गए हैं, और मैंने सुना है कि कुछ भाई-बहनों की मेरे बारे में अच्छी राय है। वे कहते हैं कि मेरी सहभागिता ज्यादा व्यावहारिक हो गई है और मुझमें कुछ बदलाव आए हैं। मेरे खयाल से इस बार मुझे अगुआ का पद मिल सकता है।" मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर प्रतिष्ठा और हैसियत के पीछे जा रहा हूँ और मुझे याद आया कि पहले जब मैं इन बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तो वह कितना तकलीफदेह था। मैं जानता था कि मैं यह दौड़ जारी नहीं रख सकता, और मुझे देह-सुख त्याग देना चाहिए और सत्य का अभ्यास करना चाहिए। फिर मैंने परमेश्वर के वचनों के इस अंश पर विचार किया : "एक बार जब तुम शैतान से आयी प्रतिष्ठा और रुतबे को त्याग दोगे, तब तुम शैतानी विचारों और ख़यालों से लाचार होकर धोखा नहीं खाओगे। तुम्हें छुटकारा मिल जाएगा, और तुम्हें ज्यादा-से-ज्यादा सुकून महसूस होगा; तुम स्वतंत्र और मुक्त हो जाओगे। जब तुम्हारे स्वतंत्र और मुक्त होने का दिन आयेगा, तब तुम महसूस करोगे कि जिन चीज़ों को तुमने त्याग दिया है वे महज़ उलझाने वाले जाल थे, और जो चीज़ें तुमने सच में हासिल की हैं वहतुम्हारे लिए सबसे अधिक अनमोल हैं। तुम्हें एहसास होगा कि वहचीज़ें सबसे मूल्यवान हैं, और सबसे ज्यादा संजोने योग्य हैं। जो चीज़ें तुम्हें पसंद थीं—भौतिक सुख, शोहरत और दौलत, रुतबा, धन, प्रसिद्धि और दूसरों से सम्मान, वे सब बेकार लगेंगी; इन चीज़ों ने तुम्हें बहुत दुख दिए हैं, और अब तुम उन्हें नहीं चाहोगे। भले ही तुम्हें और भी ऊंची प्रतिष्ठा और रुतबा दिया जाए फिर भी अब तुम्हें इन चीज़ों की चाहत नहीं होगी; इसके बजाय तुम दिल की गहराई से उनसे घृणा कर उन्हें ठुकरा दोगे!" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो')। मेरा दिल रोशन हो गया, और मैं जान गया कि शोहरत और हैसियत के पीछे भागने का कोई महत्त्व नहीं है, और सत्य को समझना और उसका अभ्यास करना तथा एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करना सबसे अनमोल चीजें हैं। वास्तव में, चुनाव में हिस्सा लेना अगुआ के पद के लिए लड़ना नहीं था, बल्कि इस प्रक्रिया में भाग लेकर अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करना था। मुझे शोहरत और हैसियत की अपनी जंगली इच्छाएँ त्यागकर सत्य के सिद्धांतों के अनुसार एक सही अगुआ के लिए मतदान करना था। परमेश्वर के घर के काम के लिए यही फायदेमंद होगा। अगर मुझे अगुआ चुना जाता है, तो मुझे अपना काम अच्छी तरह करना होगा। अगर नहीं चुना जाता, तो मुझे परमेश्वर को दोष नहीं देना है, बल्कि अपनी काबिलियत के मुताबिक अपना कर्तव्य पूरा करना है। जब चुनाव के बारे में मैंने अपने इरादे सही कर लिए, तो हैरानी की बात यह रही कि मुझे अगुआ चुन लिया गया। यह नतीजा देखकर, मैंने अतीत की तरह यह सोचकर जश्न नहीं मनाया कि मैं दूसरों से बेहतर हूँ, बल्कि यह महसूस किया कि यह मेरा काम और मेरी जिम्मेदारी है, और मुझे सत्य पर चलने और अपना कर्तव्य अच्छी तरह पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए, ताकि मैं परमेश्वर के प्यार और उद्धार के लायक बन सकूँ।

लगभग तीन सालों के उस समय के दौरान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना ने मुझे साफ तौर पर दिखाया कि शोहरत और हैसियत मुझे क्या नुकसान पहुँचा रहे हैं, और मैं सत्य पर चलने के लिए कृत-संकल्प हो गया हूँ। हालाँकि अभी भी मैं कभी-कभी शोहरत और लाभ के लिए लड़ना चाहता हूँ, फिर भी मैं सचेत रूप से परमेश्वर से प्रार्थना करने, सत्य के अभ्यास पर ध्यान केंद्रित करने और अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाने में सक्षम हूँ। अब मैं अपने शैतानी, भ्रष्ट स्वभाव से लाचार नहीं रहा। शोहरत और हैसियत छोड़ने के बाद मैंने महसूस किया कि मैंने बस इन्हें ही नहीं छोड़ा है, बल्कि मैंने वे भारी बेड़ियाँ भी तोड़ दी हैं, जिनसे शैतान ने मुझे बाँधा हुआ था। मैं बहुत शांत और आजाद महसूस करता हूँ।

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