37. शोहरत और मुनाफ़े की बेड़ियां

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "शैतान मनुष्य के विचारों को नियन्त्रित करने के लिए प्रसिद्धि एवं लाभ का तब तक उपयोग करता है जब तक लोग केवल और केवल प्रसिद्धि एवं लाभ के बारे में सोचने नहीं लगते। वे प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए संघर्ष करते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए कठिनाइयों को सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए अपमान सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए जो कुछ उनके पास है उसका बलिदान करते हैं, और प्रसिद्धि एवं लाभ के वास्ते वे किसी भी प्रकार की धारणा बना लेंगे या निर्णय ले लेंगे। इस तरह से, शैतान लोगों को अदृश्य बेड़ियों से बाँध देता है और उनके पास इन्हें उतार फेंकने की न तो सामर्थ्‍य होती है न ही साहस होता है। वे अनजाने में इन बेड़ियों को ढोते हैं और बड़ी कठिनाई से पाँव घसीटते हुए आगे बढ़ते हैं। इस प्रसिद्धि एवं लाभ के वास्ते, मनुष्यजाति परमेश्वर को दूर कर देती है और उसके साथ विश्वासघात करती है, तथा निरंतर और दुष्ट बनती जाती है। इसलिए, इस प्रकार से एक के बाद दूसरी पीढ़ी शैतान के प्रसिद्धि एवं लाभ के बीच नष्ट हो जाती है। अब शैतान की करतूतों को देखने पर, क्या उसकी भयानक मंशाएँ बिलकुल ही घिनौनी नहीं हैं? हो सकता है कि आज तुम लोग अब तक शैतान की भयानक मंशाओं की वास्तविक प्रकृति को नहीं देख पा रहे हो क्योंकि तुम लोग सोचते हो कि प्रसिद्धि एवं लाभ के बिना कोई जी नहीं सकता है। तुम सोचते हो कि यदि लोग प्रसिद्धि एवं लाभ को पीछे छोड़ देते हैं, तो वे आगे के मार्ग को देखने में समर्थ नहीं रहेंगे, अपने लक्ष्यों को देखने में समर्थ नहीं रह जायेँगे, उनका भविष्य अंधकारमय, मद्धिम एवं विषादपूर्ण हो जाएगा। परन्तु, धीरे-धीरे तुम सभी लोग यह समझ जाओगे कि प्रसिद्धि एवं लाभ ऐसी भयानक बेड़ियाँ हैं जिनका उपयोग शैतान मनुष्य को बाँधने के लिए करता है। जब वो दिन आएगा, तुम पूरी तरह से शैतान के नियन्त्रण का विरोध करोगे और उन बेड़ियों का पूरी तरह से विरोध करोगे जिनका उपयोग शैतान तुम्हें बाँधने के लिए करता है। जब वह समय आएगा कि तुम उन सभी चीज़ों को फेंकने की इच्छा करोगे जिन्हें शैतान ने तुम्हारे भीतर डाला है, तब तुम शैतान से अपने आपको पूरी तरह से अलग कर लोगे और तुम सच में उन सब से घृणा करोगे जिन्हें शैतान तुम तक लाया है। केवल तभी मानवजाति के पास परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम और लालसा होगी" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI')। परमेश्वर के वचनों से संबंधित मैं अपने अनुभव और समझ के बारे में कुछ बात करना चाहूँगा।

2015 में, मुझे वार्षिक चुनावों में कलीसिया का अगुआ चुना गया। मैं बहुत ही उत्साहित था, और सोच रहा था कि दर्जनों भाई-बहनों के बीच से मुझे अगर अगुआ चुना गया है, तो इसका मतलब है कि मैं दूसरों से बेहतर हूँ। इसके बाद से, मेरे काम के दौरान, जब भाई-बहनों को जीवन प्रवेश में मुश्किलें आतीं, तो वो मेरे पास सहभागिता करने आते थे, और टीम के अगुआओं को जब भी कलीसिया का काम करते समय कोई परेशानी आती, तो वो मुझसे चर्चा करते थे। मेरे अंदर अपने आप को सबसे बेहतर समझने की भावना घर कर गयी। मैं अहंकार से अपना सीना फूलाकर घूमता-फिरता था, और सभाओं में सहभागिता के दौरान आत्मविश्वास से भरपूर रहता था। कुछ समय बाद, मैंने देखा कि एक सहकर्मी, बहन लियू, काफ़ी योग्य थीं, और सत्य पर उनकी सहभागिता बहुत ही स्पष्ट होती थी, वो लोगों की समस्याओं को हल करने के लिए समस्या की जड़ तक पहुँच पाती थीं। वो सही रास्ता भी दिखातीं, और हर कोई उनकी सहभागिता सुनना चाहता था। मैं उनकी सराहना भी करता और मुझे उनसे जलन भी होती थी। लेकिन मैं नहीं चाहता था कि कोई मुझसे आगे निकल जाए, तो मैं हर सभा से पहले ध्यान से तैयारी करने लगा, अपने दिमाग़ पर ज़ोर देकर सोचने लगा कि मैं ज़्यादा विस्तार और रोशनी के साथ कैसे सहभागिता कर सकता हूँ ताकि मैं उनसे बेहतर लगूँ। जब मैंने देखा कि मेरी सहभागिता ख़त्म होने के बाद मेरे भाई-बहन सहमति में हामी भरते हुए अपना सिर हिला रहे हैं, तो मैं अपने आप से बहुत ख़ुश हुआ और मुझे लगा कि मैंने कुछ हासिल किया है। बाद में, मुझे पता चला कि मेरे सहकर्मी, भाई झेंग को फ़िल्में बनाने के बारे में बहुत अच्छा पेशेवर ज्ञान है, और वो कंप्यूटर के मामले भी अच्छे हैं। फ़िल्म बनाने का काम करने वाले भाई-बहन कोई समस्या आने पर अक्सर उनके साथ चर्चा किया करते थे, और एक कलीसिया अगुआ के नाते मेरे पास जोड़ने के लिए कुछ नहीं रहता था। मैं बेकार-सा महसूस करता, और इससे मुझे बहुत बुरा लगता था। मुझे लगता था कि कोई भी परेशानी आने पर अगर वो भाई झेंग के पास जाते हैं, तो वो लोग ज़रूर यह सोचते होंगे कि मैं उनकी बराबरी नहीं कर सकता। मुझे लगने लगा कि अगर मुझे भी फ़िल्में बनाने के बारे में कुछ पता होगा, तो भाई-बहन अपनी परेशानियाँ लेकर मेरे पास आएंगे। मैं सुबह जल्दी उठने और रात को देर से सोने लगा, ताकि मैं फ़िल्में बनाने के बारे में थोड़ी रिसर्च कर कुछ सीख सकूँ और मुझे थोड़ी ज़्यादा जानकारी हो जाए। मैंने कलीसिया की सभी समस्याओं और भाई-बहनों के हालात को बिल्कुल नज़रअंदाज़ कर दिया। कुछ समय बाद, कई टीमों के कामों में समस्याएं पैदा होने लगीं, मैं चाहे जितनी भी सहभागिता या सभाएं करता, उनकी समस्याओं को हल नहीं कर पा रहा था। चूंकि भाई-बहनों की परेशानियों का कोई हल नहीं निकल पा रहा था, फ़िल्में बनाने के काम में भी रुकावट आई और एक के बाद एक परेशानियाँ सामने आने लगीं। मैं इतने तनाव में था कि मेरे लिए सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था। मैं बहुत परेशान था। मुझे फ़िक्र हो रही थी कि दूसरे लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे, कहीं वो ये तो नहीं सोचेंगे कि मुझ में अगुआ बनने की काबिलियत नहीं है और मैं इस काम के योग्य नहीं हूँ। ऐसा लग रहा था कि मेरा अगुआ का पद मुझसे छिनने वाला है। सोच-सोचकर मैं और निराश हो गया। मैं एक ऐसे गुब्बारे की तरह महसूस कर रहा था जिसकी हवा निकल गई हो, अब मुझमें पहले जैसा जोश रहा नहीं था। निराशा में जी कर और अपने कर्तव्य में कोताही करके, आख़िर मैंने पवित्र आत्मा का काम गँवा दिया। मैं अपने काम में कुछ भी हासिल नहीं कर पा रहा था, इसलिए मुझे बर्ख़ास्त कर दिया गया। उस पल, मुझे ऐसा लगा जैसे मैं कहीं मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहा और मैं चाहता था कि यह धरती मुझे निगल जाए। मैं यह भी सोच रहा था, "क्या भाई-बहन ये कहेंगे कि मैं एक नकली अगुआ था जिसने व्यवहारिक काम नहीं किया?" मैं सोच-सोचकर और परेशान हो गया।

रात भर करवटें बदलता रहा और सो नहीं पाया। बार-बार, प्रार्थना कर परमेश्वर से गुहार लगाता और कहता कि वह मेरी हालत पर तरस खाए और मुझे रास्ता दिखाए। फिर, मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े: "तुम लोगों की खोज में, तुम लोगों की बहुत सी व्यक्तिगत अवधारणाएँ, आशाएँ और भविष्य होते हैं। वर्तमान कार्य तुम लोगों की हैसियत की अभिलाषा और तुम्हारी अनावश्यक अभिलाषाओं से निपटने के लिए है। आशाएँ, हैसियत, और अवधारणाएँ सभी शैतानी स्वभाव के उत्कृष्ट प्रतिनिधित्व हैं। लोगों के हृदयों में ये चीजें विद्यमान हैं इसका कारण पूरी तरह से यह है कि शैतान का विष हमेशा लोगों के विचारों को दूषित कर रहा है, और लोग शैतान के इन प्रलोभनों से पीछा छुड़ाने में हमेशा असमर्थ हैं। वे पाप के बीच में रह रहे हैं, मगर इसे पाप होना नहीं मानते हैं, और वे अभी भी सोचते हैं: 'हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे अवश्य हमें आशीष प्रदान करने चाहिए और हमारे लिए सब कुछ उचित प्रकार से व्यवस्थित करना चाहिए। हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए हमें दूसरों से श्रेष्ठतर अवश्य होना चाहिए, और हमारे पास किसी और की तुलना में अधिक हैसियत और अधिक भविष्य अवश्य होना चाहिए। चूँकि हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे हमें असीम आशीषें अवश्य देनी चाहिए। अन्यथा, इसे परमेश्वर पर विश्वास नहीं कहा जाएगा।' ... जितना अधिक तू इस तरह से तलाश करेगी उतना ही कम तू पाएगी। हैसियत के लिए किसी व्यक्ति की अभिलाषा जितनी अधिक होगी, उतनी ही गंभीरता से उसके साथ निपटा जाना होगा उतने ही अधिक बड़े शुद्धिकरण से उसे अवश्य गुजरना होगा। इस तरह के लोग व्यर्थ हैं! उसके द्वारा इन चीज़ों को पूरे तरह से छोड़ दिए जाने के उद्देश से उसके साथ पर्याप्त रूप से निपटा और उसका ठीक से न्याय अवश्य किया जाना चाहिए। यदि तुम लोग अंत तक इस तरह से अनुकरण करते हो, तो तुम लोग कुछ भी नहीं पाओगे। जो लोग जीवन का अनुकरण नहीं करते हैं वे रूपान्तरित नहीं किए जा सकते हैं; जिन्हें सच्चाई की प्यास नहीं है वे सच्चाई को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। तू व्यक्तिगत रूपान्तरण का अनुकरण करने और प्रवेश पर ध्यान केन्द्रित नहीं करती है; बल्कि इसके बजाय तू हमेशा उन अनावश्यक अभिलाषाओं और उन चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करती है जो परमेश्वर के लिए तेरे प्रेम को बाधित करती हैं और तुझे उसके करीब आने से रोकती हैं। क्या वे चीजें तुझे रूपान्तरित कर सकती हैं? क्या वे तुझे राज्य में ला सकती हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम एक विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो?')। इसे पढ़ने के बाद, मैंने अपनी हाल की स्थिति पर विचार किया। अगुआ की ज़िम्मेदारी लेने के बाद से मैं सिर्फ़ शोहरत और हैसियत की तलाश में था और दूसरों से बेहतर दिखना चाहता था। जब मैंने देखा कि सत्य पर बहन लियू की सहभागिता मुझसे अच्छी है, तो मुझे लगा कि वे मुझसे आगे निकल जाएंगी। मैं सोचने लगा कि मैं कैसे उनसे बेहतर सहभागिता करूँ ताकि लोग मुझे सराहें और मेरी तारीफ़ करें। जब मैंने देखा कि भाई झेंग में पेशेवर कौशल है और कई भाई-बहन अपने काम की परेशानियों के बारे में उनसे बात करते हैं, तो मुझे जलन होने लगी और मैंने उन्हें नकार दिया। उनसे आगे निकलने के लिए मैंने अपना ज्ञान बढ़ाने पर कड़ी मेहनत की, और टीम की परेशानियों तक को नज़रअंदाज़ कर दिया। जब मैं भाई-बहनों की परेशानियों को दूर नहीं कर पाता, तो परमेश्वर के सामने नहीं झुकता था, या भाई-बहनों के साथ सहभागिता कर सत्य की तलाश करने की कोशिश नहीं करता था। रुतबा पाने और खोने के जुनून ने मेरे दिल में घर कर लिया था, मैं डरता था कि अगर मैंने अपना काम ठीक से नहीं किया तो मैं अपने अगुआ के पद को बरक़रार नहीं रख पाऊँगा। आखिर में मुझे अहसास हुआ कि मैं अपना काम परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखकर नहीं कर रहा था, बल्कि दूसरों पर राज करने की अपनी बड़ी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए कर रहा था। भाई-बहनों ने मुझ पर भरोसा किया और मुझे कलीसिया का अगुआ चुना, लेकिन मैंने कलीसिया के काम या उनके जीवन प्रवेश के बारे में बिल्कुल नहीं सोचा। मैं अपना काम नहीं कर रहा था, ज़िम्मेदारी नहीं निभा रहा था, और इससे कलीसिया के काम को नुकसान हुआ। मैं बहुत स्वार्थी और नफ़रत के लायक था। मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा रहा था—मैं बुराई कर रहा था और परमेश्वर का विरोध कर रहा था! मुझे पछतावा हुआ कि मैं अपनी आस्था में सही रास्ते पर नहीं चल रहा था, बल्कि हमेशा शोहरत और मुनाफ़े के लिए लड़ता रहा, और परमेश्वर की नफ़रत की वजह बना। अपने काम से निकाला जाना मेरे लिए परमेश्वर का धार्मिक न्याय और ताड़ना थी। वो मुझे हटा नहीं रहा था, बल्कि मुझे बर्ख़ास्त कर रहा था ताकि मैं अपने बर्ताव पर विचार कर सकूँ। परमेश्वर मेरी रक्षा कर रहा था, मुझे बचा रहा था! कुछ समय तक स्तुति गान और विचार करने के बाद, मेरी हालत धीरे-धीरे बेहतर हो गई, तब कलीसिया के अगुआ ने मुझे रोज़मर्रा के काम सौंप दिए। मैं परमेश्वर का बहुत आभारी था कि उसने मुझे यह मौक़ा दिया, और मैंने दिल में संकल्प लिया कि मैं ज़रूर इस कर्तव्य को तहेदिल से निभाऊँगा, शोहरत और हैसियत के पीछे भागकर परमेश्वर के विरोध के रास्ते पर नहीं चलूँगा।

उस अनुभव के बाद, मैंने सोचा कि अब मैं शोहरत और हैसियत की अपनी इच्छा को छोड़ सकूँगा, लेकिन शैतान ने मुझे गहराई तक भ्रष्ट कर दिया था। सिर्फ़ थोड़े-से आत्म-मंथन और समझ के साथ इस तरह के शैतानी स्वभाव को खत्म नहीं किया जा सकता, इसलिए परमेश्वर ने मुझे उजागर करने और बचाने के लिए दोबारा एक परिस्थिति तैयार की।

कुछ महीनों बाद, एक दिन, कलीसिया के अगुआ ने हमसे कहा कि हम एक टीम का अगुआ चुनें। जैसे ही मैंने ये सुना, तो मेरे दिमाग़ में ये सोच-विचार चलने लगा: "क्या मैं टीम का अगुआ चुना जा सकता हूँ? मैं एक काबिल सेवाकर्ता हूँ, लेकिन मेरे पास कोई पेशेवर हुनर नहीं है, तो शायद मेरी संभावनाएं उतनी अच्छी नहीं हैं।" फिर मैंने टीम के कुछ और भाई-बहनों के बारे में सोचा। भाई झेंग का पेशेवर कौशल बहुत अच्छा था और सत्य पर उनकी सहभागिता व्यवहारिक होती थी। इसके अलावा, उनमें न्याय की भावना थी और कलीसिया के काम को क़ायम रखने की काबिलियत थी। कुल मिलाकर, ऐसा लग रहा था कि उन्हें ही चुना जाएगा। मैं उस वक्त के बारे में सोचने लगा जब कलीसिया का अगुआ होने के नाते मैं भाई झेंग को काम सौंपा करता था, लेकिन अगर वो टीम के अगुआ चुने जाते हैं, तो वो मुझे बताएंगे कि मुझे क्या करना है। क्या इससे मैं उनसे कम नहीं दिखूँगा? यह ख़्याल मुझे बहुत बेचैन करने लगा। जब चुनाव का दिन आया, तो मुझे बहुत घबराहट होने लगी, और मेरे अंदर एक जंग छिड़ गई: "मैं किसे वोट दूँ? क्या मुझे भाई झेंग के लिए वोट करना चाहिए?" मैं सोचने लगा कि कैसे ज़्यादातर भाई-बहन अपने काम की परेशानियों के बारे में उनके साथ चर्चा करते थे, और दूसरी टीमों के लोग भी अपने काम पर अक्सर उनसे बात करते थे—वो सच में मज़बूत उम्मीदवार लग रहे थे। अगर वो टीम के अगुआ बन गए, तो क्या उनका पद मुझसे ऊँचा नहीं हो जाएगा? यह सोचना था कि मैंने फ़ैसला कर लिया मैं उनके लिए वोट नहीं करूँगा, लेकिन मुझ में पेशेवर ज्ञान की कमी थी और मैं टीम का अगुआ बनने के योग्य नहीं था। मैं बहुत उदास और दुखी महसूस करने लगा, मुझे ये बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था कि मैं काम के बारे में ज़्यादा नहीं जानता। तभी मेरे दिमाग में एक भयानक विचार आया: "अगर मैं टीम का अगुआ नहीं बन सकता, तो मैं तुम्हें भी नहीं बनने दूँगा।" इसलिए, मैंने भाई वु को वोट दिया, जिनका पेशेवर ज्ञान उतना अच्छा नहीं था। मुझे हैरानी हुई यह देखकर कि भाई झेंग को फिर भी चुन लिया गया। यह नतीजा देखकर मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा, लेकिन मुझे एक अजीब-सी बेचैनी होने लगी, जैसे मैंने कोई शर्मनाक हरकत कर दी हो। फिर, मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा: "अगर कुछ व्यक्ति किसी व्यक्ति को अपने से बेहतर पाते हैं, तो वे उस व्यक्ति को दबाते हैं, उसके बारे में अफ़वाह फैलाना शुरू कर देते हैं, या किसी तरह के अनैतिक साधनों का प्रयोग करते हैं जिससे कि दूसरे व्यक्ति उसे अधिक महत्व न दे सकें, और यह कि कोई भी किसी दूसरे व्यक्ति से बेहतर नहीं है, तो यह अभिमान और दंभ के साथ-साथ धूर्तता, धोखेबाज़ी और कपट का भ्रष्ट स्वभाव है, और इस तरह के लोग अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। वे इसी तरह का जीवन जीते हैं और फिर भी यह सोचते हैं कि वे महान हैं और वे नेक हैं। लेकिन, क्या उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय है? सबसे पहले, इन बातों की प्रकृति के परिप्रेक्ष्य से बोला जाये, तो क्या इस तरीके से काम करने वाले लोग बस अपनी मनमर्ज़ी से काम नहीं कर रहे हैं? क्या वे परमेश्वर के परिवार के हितों पर विचार करते हैं? वे परमेश्वर के परिवार के कार्य को होने वाले नुकसान की परवाह किये बिना, सिर्फ़ अपनी खुद की भावनाओं के बारे में सोचते हैं और वे सिर्फ़ अपने लक्ष्यों को हासिल करने की बात सोचते हैं। इस तरह के लोग न केवल अभिमानी और आत्मतुष्ट हैं, बल्कि वे स्वार्थी और घिनौने भी हैं; वे परमेश्वर के इरादों की बिल्कुल भी परवाह नहीं करते, और निस्संदेह, इस तरह के लोगों के पास परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं होता। यही कारण है कि वे वही करते हैं जो करना चाहते हैं और बेतुके ढंग से आचरण करते हैं, उनमें दोष का कोई बोध नहीं होता, कोई घबराहट नहीं होती, कोई भी भय या चिंता नहीं होती, और वे परिणामों पर भी विचार नहीं करते। वे परमेश्वर का भय नहीं मानते, वे अपने आपको सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते हैं, और वे अपने हर पहलु को परमेश्वर से ऊंचा और सत्य से बड़ा मानते हैं। उनके दिलों में, परमेश्वर जिक्र करने के योग्य नहीं है और बिल्कुल महत्वहीन है, उनके दिलों में परमेश्वर का बिल्कुल भी कोई महत्व नहीं होता। क्‍या उन लोगों ने सत्‍य में प्रवेश पा लिया है जिनके हृदयों में परमेश्‍वर के लिए कोई जगह नहीं है, और जो परमेश्‍वर में श्रद्धा नहीं रखते? (नहीं।) इसलिए, जब वे सामान्‍यत: मुदित मन से और ढेर सारी ऊर्जा ख़र्च करते हुए खुद को व्‍यस्‍त बनाये रखते हैं, तब वे क्‍या कर रहे होते हैं? ऐसे लोग यह तक दावा करते हैं कि उन्‍होंने परमेश्‍वर के लिए खपाने की ख़ातिर सब कुछ त्‍याग दिया है और बहुत अधिक दुख झेला है, लेकिन वास्‍तव में उनके सारे कृत्‍यों के पीछे निहित प्रयोजन, सिद्धान्‍त और लक्ष्‍य, सभी खुद को लाभान्वित करने के लिए हैं; वे केवल अपने सारे निजी हितों की रक्षा करने का प्रयास कर रहे हैं। तुम लोग ऐसे व्यक्ति को बहुत ही बेकार कहोगे या नहीं कहोगे? जो व्‍यक्ति परमेश्‍वर में श्रद्धा नहीं रखता उसको तुम किस तरह का व्‍यक्ति कहोगे? क्‍या वह अहंकारी है? क्‍या ऐसा व्‍यक्ति शैतान है? वे किस तरह के प्राणी होते हैं जो परमेश्‍वर में श्रद्धा नहीं रखते? परमेश्‍वर में श्रद्धा न रखने वाले प्राणियों में, पशुओं के अलावा, दैत्‍य, शैतान, प्रधान स्वर्गदूत, और परमेश्‍वर के साथ विवादकरने वाले, सभी शामिल हैं" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'ऐसी पाँच स्थितियाँ जो परमेश्‍वर में विश्‍वास के सही मार्ग पर पँहुचने के पहले लोगों के पास होती हैं')। ये पढ़कर मुझे बहुत निराशा हुई। जब मैंने चुनाव की प्रक्रिया के दौरान अपनी सोच और हरकतों के बारे में सोचा, तो मुझे लगा मैं अपना चेहरा दिखाने लायक नहीं रहा। मैंने परमेश्वर की जांच और उसके प्रति किसी भी तरह की श्रद्धा के बिना अपने निजी मक़सद के मुताबिक, अपनी हैसियत और प्रतिष्ठा को बचाने के लिए वोट किया। मुझे मालूम था कि भाई झेंग कुशल हैं, सत्य पर उनकी सहभागिता व्यावहारिक होती है, और अगर वो टीम के अगुआ बन गए तो हर किसी को अपने जीवन प्रवेश में फ़ायदा मिलेगा और कलीसिया के काम को फ़ायदा होगा। लेकिन मुझे जलन हो रही थी, मुझे डर था कि टीम के अगुआ बनकर वो मुझसे ऊपर हो जाएंगे, इसलिए मैंने जानबूझकर उन्हें वोट नहीं दिया। मैं बड़े लाल अजगर के इस सिद्धांत पर चल रहा था, "अगर एकतंत्र नाकाम होता है, तो पक्का करो कि लोकतंत्र कामयाब न हो।" बड़े लाल अजगर की कार्य-प्रणाली यही है कि अगर वो सत्ता में नहीं हो सकता, तो कोई और भी सत्ता में नहीं होना चाहिए। अगर ज़रूरी हुआ, तो वो दोनों पक्षों को खत्म करने के लिए एक द्वेषपूर्ण संघर्ष करेगा। क्या मैं भी ऐसा नहीं कर रहा था? मैं चाहता था अगर मुझे वो पद नहीं मिल सका, तो भाई झेंग को भी न मिले। अपनी इज़्ज़त और हैसियत को बचाने के लिए मैं गलत इंसान को इस भूमिका में चुनने और कलीसिया के काम को नुकसान होते हुए देखने के लिए भी तैयार था। मैं बेहद स्वार्थी, नीच, चालाक और शातिर था, मेरे मन में परमेश्वर के लिए थोड़ी सी भी श्रद्धा नहीं थी। मैंने परमेश्वर द्वारा व्यक्त बहुत सारे सत्यों का आनंद लिया, मुझे अपना कर्तव्य निभाने का अवसर देकर परमेश्वर मुझ पर दया दिखा रहा था। लेकिन यह सोचने के बजाय कि मुझे परमेश्वर के प्रेम का मूल्य कैसे चुकाना चाहिए, मुझे जलन हो रही थी, मैं नाम और फ़ायदे की तलाश में था। मैं शैतान का चेला बनकर सेवा कर रहा था, परमेश्वर के घर के काम में रुकावट डाल रहा था। क्या मैं धोखेबाज़ और गिरा हुआ इंसान नहीं था? मैं सोचने लगा कि कैसे एक साल पहले मुझे अपने पद से हटा दिया गया था क्योंकि मैं शोहरत और फ़ायदे के पीछे भाग रहा था, अपना कर्तव्य ठीक से पूरा नहीं कर रहा था, और व्यवहारिक काम नहीं कर सकता था। और अब, मैं उसी तरह की परिस्थिति में था, लेकिन मैं अभी भी शोहरत और हैसियत की तलाश में था, सत्य की नहीं। अगर मैं ऐसे ही चलता रहा, तो परमेश्वर मुझे दुत्कार कर हटा देगा।

फिर, मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा: "तुम लोगों को अपनी जगह का पता नहीं है, फिर भी तुम लोग गोबर में एक-दूसरे के साथ लड़ाई करते हो। इस तरह की लड़ाई से तुम क्या हासिल कर सकते हो? यदि तुम लोगों के हृदय में वास्तव में मेरे लिए आदर होता, तो तुम लोग मेरी पीठ पीछे एक-दूसरे के साथ कैसे लड़ सकते थे? तुम्हारी हैसियत कितनी भी ऊँची क्यों न हो, क्या तुम फिर भी गोबर में एक बदबूदार छोटा-सा कीड़ा ही नहीं हो? क्या तुम पंख उगाकर आकाश में उड़ने वाला कबूतर बन पाओगे?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जब झड़ते हुए पत्ते अपनी जड़ों की ओर लौटेंगे, तो तुम्हें अपनी की हुई सभी बुराइयों पर पछतावा होगा')। "परमेश्वर क्यों कहता है कि लोग 'कीड़े' हैं? उसकी दृष्टि में, ये भ्रष्ट मनुष्य साफ तौर पर सृजित प्राणी हैं— लेकिन क्या वे सृजित प्राणियों के उत्तरदायित्व और कर्तव्य निभाते हैं? भले ही बहुत-से लोग अपने कर्तव्य निभाते हैं, लेकिन उनका कार्य कितना अच्छे ढंग से व्यक्त होता है? ... वे दिन भर जो कुछ सोचते हैं, उसका सत्य या परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने के साथ कोई संबंध नहीं होता है; वे सारा दिन ठूंस कर खाते रहते हैं और किसी भी चीज़ पर विचार नहीं करते। हालांकि उन्हें कुछ करने का मन हो सकता है, लेकिन उनके कर्म तब भी व्यवधान और बाधाएं खड़ी करते ही रहते हैं। वे कुछ भी ऐसा किये बिना जिससे दूसरों या परमेश्वर के घर को लाभ हो, स्वयं को उन्नत करते हैं। उनका मन ऐसे विचारों से भरा होता है कि कैसे वो सब पाएँ जो देह-सुख के लिए जो कुछ अच्छा है, किस तरह से रुतबे और शोहरत के लिए संघर्ष करें, किस तरह से लोगों के विशेष समूहों में शामिल हो सकें, और किस तरह से ऊंचे पद पर पहुँच कर अच्छी शोहरत हासिल कर सकें। ये लोग परमेश्वर का दिया हुआ भोजन खाते हैं, उसकी दी हुई हर चीज़ का आनंद लेते हैं, लेकिन वे ऐसा कुछ नहीं करते जो इंसान को करना चाहिए। क्या परमेश्वर ऐसे लोगों को पसंद कर सकता है? ... सबसे बड़ी बात यह है कि जो कीड़े हैं वे निकम्मे और बेशर्म होते हैं, परमेश्वर की दृष्टि में उनका कोई मूल्य नहीं होता! मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि ऐसे लोगों का मूल्य नहीं होता? परमेश्वर ने तुम्हें बनाया, तुम्हें जीवन दिया, फिर भी तुम अपना कर्तव्य नहीं निभा सकते, यह वो है जो कम-से-कम तुम्हें करना ही चाहिए; तुम सिर्फ मुफ़्त की रोटी सेंकते हो। उसकी दृष्टि में, तुम किसी काम के नहीं हो, और तुम्हारे जीवित रहने का कोई अर्थ नहीं है। क्या ऐसे लोग कीड़े नहीं हैं? फिर, लोग यदि कीड़े नहीं बनना चाहते, तो उन्हें क्या करना चाहिए? अव्वल तो यह कि अपनी जगह ढूँढ़ो और अपना कर्तव्य निभाने की भरसक कोशिश करो, इससे तुम सृजनकर्ता से जुड़ जाओगे; तुम उसे अपना हिसाब दे सकोगे। उसके बाद, विचार करो कि अपना कर्तव्य निभाने में निष्ठावान कैसे बन सकते हो। तुम्हें महज़ लापरवाही से काम नहीं करना चाहिए, या जैसे-तैसे काम नहीं करना चाहिए; बजाय इसके, तुम्हें इसमें अपना पूरा दिल लगा देना चाहिए। तुम्हें सृजनकर्ता के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए, बल्कि पालन और समर्पण करने में समर्थ होकर परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप कर्म करने चाहिए" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन में प्रगति के छह संकेतक')।

परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए, मुझे बहुत दुख हुआ। मुझे अहसास हुआ कि शोहरत और मुनाफ़े के लिए लड़ने के मेरे शैतानी स्वभाव को परमेश्वर गंदा और बुरा मानता है। परमेश्‍वर के घर में अपना कर्तव्य निभाने का सौभाग्य पाना, परमेश्वर की तरफ़ से विशेष उत्कर्ष है, लेकिन मैं अपनी ज़िम्मेदारियां पूरी नहीं कर रहा था। इसके बजाय, मैंने सिर्फ़ अपने नाम और हैसियत के बारे में सोचा, और यहां तक कि इन चीज़ों के लिए परमेश्वर के घर के काम में भी रुकावट डाली। मैं शैतान का किरदार निभा रहा था। ये परमेश्वर के लिए कितना घिनौना और नफ़रत के लायक था! परमेश्वर कहते हैं, "तुम्हारी हैसियत कितनी भी ऊँची क्यों न हो, क्या तुम फिर भी गोबर में एक बदबूदार छोटा-सा कीड़ा ही नहीं हो?" बस यही बात है। मैं एक सृजित प्राणी हूँ, एक गंदा, भ्रष्ट इंसान हूं, जो किसी लायक नहीं, जिसमे कोई गरिमा नहीं, इसलिए अगर मुझे कोई पद मिल भी जाता, तो भी मैं बदल नहीं पाता। मैं तो अपना कर्तव्य भी ठीक से नहीं निभा पाता था, बस लगातार नाम और फ़ायदे के पीछे भागता था, चाहता था कि दूसरे मेरी इज़्ज़त करें। मेरी अंतरात्मा और समझ कहाँ थी? मेरे जीवन का क्या मूल्य था? क्या मैं पूरी तरह से घृणित कीड़ा नहीं था? परमेश्वर के वचनों ने मेरी प्रकृति और सार के बारे में जो खुलासा किया था, उसे समझने के बाद, मैं ख़ुद से नफ़रत करने लगा और देह की इच्छाओं का त्याग करने और सत्य का अभ्यास करने के लिए तैयार हो गया।

बाद में, मैं भाई झेंग के पास गया और अपनी भ्रष्टता के बारे में उनसे बात की, चुनाव में अपने घिनौने इरादों और हरकतों का खुलासा किया। उन्होंने बिल्कुल भी मुझे नीचा दिखाने की कोशिश नहीं की, बल्कि मेरी मदद करने के लिए उन्होंने अपने अनुभव पर सहभागिता की। इस सहभागिता के बाद, हमारे बीच की दीवार ढह गई और मैं आज़ाद और शांत महसूस करने लगा। उसके बाद जब भी मेरे काम में मुझे कोई मुश्किल आती या कोई मुद्दा समझ नहीं आता, तो मैं भाई झेंग के पास चला जाता, और वे हमेशा धैर्य के साथ सहभागिता के ज़रिए मेरे सवालों का जवाब देते। मेरे अपने पेशेवर कौशल में भी कुछ समय के बाद सुधार हुआ। जब मैंने नाम और हैसियत की चाह छोड़कर सत्य का अभ्यास किया, तो मुझे अहसास हुआ कि इस तरह से अपना कर्तव्य निभाने से कितना चैन और शांति मिलती है, और मैं परमेश्वर के करीब होता गया। इस परिस्थिति के ज़रिए एक बार फिर मैं शोहरत और हैसियत की ज़ंजीरों से निकल पाया और अपने लिए परमेश्वर के व्यवहारिक उद्धार का स्वाद चख पाने में कामयाब हुआ।

अक्टूबर 2017 में कलीसिया के वार्षिक चुनाव शुरू हुए, और मुझे भाई-बहनों ने उम्मीदवार चुना। मैं थोड़ा भावनात्मक रूप से डगमगा रहा था, यह सोचकर, "मुझे अपने अगुआ के पद को खोए हुए दो साल से ज़्यादा हो गए हैं, और मैंने सुना है कि मेरे बारे में कुछ भाई-बहनों की राय अच्छी है। वे कहते हैं कि मेरी सहभागिता ज़्यादा व्यावहारिक हो गई है और मैं कुछ बदलावों से गुज़रा हूँ। क्या मुझे इस बार अगुआ का पद मिल सकता है। मुझे अहसास हुआ कि मैं फिर इज़्ज़त और हैसियत के पीछे जा रहा हूँ और मुझे याद आया कि पहले जब मैं इन बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तो मुझे कितनी तकलीफ़ से गुज़रना पड़ा। मैं जानता था मैं फिर से इनके पीछे नहीं भाग सकता, मुझे देह की इच्छाओं को त्याग देना होगा और सत्य का अभ्यास करना होगा। फिर मैंने परमेश्वर के वचनों से इस अंश के बारे में विचार किया: "एक बार जब तुम शैतान से आयी प्रतिष्ठा और रुतबे को त्याग दोगे, तब तुम शैतानी विचारों और ख़यालों से लाचार होकर धोखा नहीं खाओगे। तुम्हें छुटकारा मिल जाएगा, और तुम्हें ज़्यादा-से-ज़्यादा सुकून महसूस होगा; तुम स्वतंत्र और मुक्त हो जाओगे। जब तुम्हारे स्वतंत्र और मुक्त होने का दिन आयेगा, तब तुम महसूस करोगे कि जिन चीज़ों को तुमने त्याग दिया है वे महज़ उलझाने वाले जाल थे, और जो चीज़ें तुमने सच में हासिल की हैं वो तुम्हारे लिए सबसे अधिक अनमोल हैं। तुम्हें एहसास होगा कि वो चीज़ें सबसे मूल्यवान हैं, और सबसे ज़्यादा संजोने योग्य हैं। जो चीज़ें तुम्हें पसंद थीं—भौतिक सुख, शोहरत और दौलत, रुतबा, धन, प्रसिद्धि और दूसरों से सम्मान, वे सब बेकार लगेंगी; इन चीज़ों ने तुम्हें बहुत दुख दिए हैं, और अब तुम उन्हें नहीं चाहोगे। भले ही तुम्हें और भी ऊंची प्रतिष्ठा और रुतबा दिया जाए फिर भी अब तुम्हें इन चीज़ों की चाहत नहीं होगी; इसके बजाय तुम दिल की गहराई से उनसे घृणा कर उन्हें ठुकरा दोगे!" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो')। मेरा दिल रोशन हो गया, और मुझे समझ आ गया कि शोहरत और हैसियत के पीछे भागने की कोई कीमत नहीं है, और सत्य को समझना, उसका अभ्यास करना और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करना ही सबसे कीमती चीज़ें होती हैं। सच तो यह है कि चुनाव में हिस्सा लेने का मक़सद अगुआ के पद के लिए लड़ना नहीं था, बल्कि इस प्रक्रिया में भाग लेकर मैं अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करना चाहता था। मुझे शोहरत और हैसियत की अपनी अनियंत्रित इच्छाओं को छोड़ना था, और सत्य के सिद्धांतों के मुताबिक एक सही अगुआ के लिए वोट करना था। परमेश्वर के घर के काम के लिए यही फ़ायदेमंद होगा। अगर मुझे अगुआ चुना जाता है, तो मुझे अपना काम अच्छी तरह करना होगा। अगर नहीं चुना जाता है, तो मैं परमेश्वर को दोष नहीं दूँगा, बल्कि अपनी काबिलियत के मुताबिक अपने कर्तव्य को पूरा करूँगा। एक बार जब चुनाव के बारे में मैंने अपने इरादे सही कर लिए, तो हैरानी की बात ये रही कि मुझे अगुआ चुन लिया गया। यह नतीजा देखकर, मैंने अतीत की तरह यह सोचकर जश्न नहीं मनाया कि मैं दूसरों से बेहतर हूँ, बल्कि यह महसूस किया कि ये मेरा काम और मेरी ज़िम्मेदारी है, और मुझे सत्य पर चलने और अपना कर्तव्य अच्छी तरह पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए, ताकि मैं परमेश्वर के प्यार और उद्धार के लायक बन सकूँ।

उस वक्त, तकरीबन तीन सालों के दौरान, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना ने साफ़ तौर पर मुझे दिखाया कि शोहरत और हैसियत मुझे क्या नुकसान पहुँचा रहे हैं, और मैंने सत्य पर चलने का फ़ैसला कर लिया। हालांकि अभी भी कभी-कभी मेरा भ्रष्ट स्वभाव उभरकर आ जाता है, मैं अपने होशोहवास में परमेश्वर के सामने प्रार्थना कर पाता हूँ, सत्य के अभ्यास पर ध्यान दे पाता हूँ, और अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभा पाता हूँ। अब, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव ने मुझे बांधकर नहीं रखा है। जब मैंने शोहरत और हैसियत को छोड़ दिया, तो मुझे लगा कि मैंने बस इन्हें ही नहीं छोड़ा है, बल्कि मैंने वो सारी भारी ज़ंजीरें भी तोड़ दी हैं जिनसे शैतान ने मुझे बांधकर रखा था। मैं बहुत शांत और आज़ाद महसूस कर रहा हूँ।

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