34. अपने मुखौटे को उतार कर मुझे सुकून मिला

परमेश्वर के वचन कहते है, "मनुष्य का सारा जीवन शैतान के प्रभुत्व के अधीन बीतता है, और ऐसा एक भी इंसान नहीं है जो अपने बलबूते पर अपने आपको शैतान के प्रभाव से आज़ाद कर सकता है। सभी लोग भ्रष्टता और खालीपन में, बिना किसी अर्थ या मूल्य के, एक गन्दे संसार में रहते हैं; वे शरीर के लिए, वासना के लिए और शैतान के लिए ऐसी लापरवाह ज़िन्दगियाँ बिताते हैं। उनके अस्तित्व का जरा सा भी मूल्य नहीं है। ... यदि मनुष्य को स्वच्छ नहीं किया जाता है, तो वह गंदगी से सम्बन्धित है; यदि परमेश्वर के द्वारा उसकी सुरक्षा और देखभाल नहीं की जाती है, तो वह अभी भी शैतान का बन्धुआ है; यदि उसका न्याय और उसकी ताड़ना नहीं की जाती है, तो उसके पास शैतान के बुरे प्रभाव के दमन से बचने का कोई उपाय नहीं होगा। वह भ्रष्ट स्वभाव जो तू दिखाता है और वह अनाज्ञाकारी व्यवहार जो तू करता है, वे इस बात को साबित करने के लिए काफी हैं कि तू अभी भी शैतान के शासन के अधीन जी रहा है। यदि तेरे मस्तिष्क और विचारों को शुद्ध नहीं किया गया है, और तेरे स्वभाव का न्याय और उसकी ताड़ना नहीं की गई है, तो तेरी पूरी हस्ती को अभी भी शैतान के प्रभुत्व के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है, तेरा मस्तिष्क शैतान के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है, तेरे विचार शैतान के द्वारा कुशलता से इस्तेमाल किए जाते हैं, और तेरी पूरी हस्ती शैतान के हाथों नियन्त्रित होती है। ... यदि तू शारीरिक शांति, और शारीरिक आनन्द का अनुसरण करता है, तो तेरे पास शुद्ध होने का कोई उपाय नहीं होगा, और अंत में तू वापस शैतान के पास लौट जाएगा, क्योंकि जिस प्रकार की ज़िन्दगी तू जीता है वह शैतानी, और शारीरिक है। आज जिस प्रकार की स्थितियाँ हैं, बहुत से लोग जीवन की खोज नहीं करते हैं, जिसका मतलब है कि वे शुद्ध होने, या जीवन सम्बन्धी अधिक गहरे अनुभव में प्रवेश करने की परवाह नहीं करते हैं। इस प्रकार कैसे उन्हें सिद्ध बनाया जा सकता है? वे जो जीवन का अनुसरण नहीं करते हैं उनके पास सिद्ध किए जाने का कोई अवसर नहीं होता है, और ऐसे लोग जो परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण नहीं करते हैं, और अपने स्वभाव में बदलाव का अनुसरण नहीं करते हैं, वे शैतान के बुरे प्रभाव से बच पाने में असमर्थ होते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान')। परमेश्‍वर के वचन से पता चलता है कि यदि कोई व्यक्ति अपने शैतानी स्वभाव में रहता है और परमेश्वर के वचनों के न्‍याय का अनुभव नहीं करता है, तो वह शैतान की भ्रष्टता से बच नहीं सकता, बल्कि केवल पीड़ा में रहता है।

सितंबर 2018 में, मुझे कलीसिया अगुआ चुना गया था। मैं उस समय बहुत खुश थी। मुझे लगा कि ज्यादातर भाई-बहनों से बेहतर होने के कारण मुझे चुना गया होगा, अब मुझे सत्‍य का अनुसरण और अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। मैं नहीं चाहती थी कि लोग मेरी अगुआई को केवल प्रतीकात्मक समझें। एक दिन मैं समूह की बैठक में गई। काम पर चर्चा के दौरान कुछ भाई-बहनों ने विशेषज्ञ कौशल के बारे में बात की। मैं थोड़ा हड़बड़ा गई थी। मुझे इसके बारे में लगभग कुछ भी मालूम नहीं था। अगर उन्‍होंने सवाल पूछे और मैं जवाब न दे पायी, तो क्या होगा? क्या वे मुझे तुच्छ समझेंगे और अगर मैं समझ न पायी तो उन्‍हें लगेगा कि मैं अगुआई कैसे करूंगी? मैं बस कुछ नहीं कह पायी, लेकिन इससे तो बेकार अगुआ साबित नहीं हो जाऊंगी? मैं क्या कर सकती थी? मैं बहुत घबराहट और चिंता में डूबी बैठी रही। कौन क्या बात कर रहा है, समझ नहीं पायी। जब उनकी बातें पूरी हो गई, तो मैंने जल्दी से कहा, "कोई और सवाल न हो, तो बैठक यहीं समाप्त करें।" बैठक से बाहर आने तक मैं सहज नहीं हो पायी। मैंने सोचा, "इस समूह को बहुत सारे पेशेवर ज्ञान की आवश्यकता है और मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानती, इसलिए मैं बैठकों में नहीं जाऊंगी। अगर दूसरों को पता चलेगा कि मुझे पेशेवर चीजों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, तो वे निश्चित ही मुझे तुच्‍छ समझेंगे। उसके बाद मुझे गंभीरता से कौन लेगा?"

अगले कुछ हफ़्ते, मैंने हर दिन अन्य समूहों से मुलाकात कर उनकी समस्याओं और कठिनाइयों को हल करने में मदद की। हमारे कलीसिया जीवन में सुधार आया। सभी ने मेरा समर्थन किया, और मैं इन समूहों के साथ मुलाकात करना चाहती थी। मगर जब मैंने उस समूह के बारे में सोचा, जिसे विशेष ज्ञान की आवश्यकता थी, तो मुझे परेशानी महसूस हुई। मुझे डर लगा कि मैं उनकी बातें नहीं समझ पा रही थी, इसलिए बहाना बना लेती और कभी-कभार वहाँ चली जाती। एक रात, मैं जिस बहन के साथ काम करती थी, उसने बताया कि समूह की कुछ समस्याएं हैं, इसलिए उसने मुझे बैठक में आने का आग्रह किया। मैं अनिच्छा से तैयार तो हुई, लेकिन चिंतित रही। मैंने सोचा, "अगर मैं समस्या हल नहीं कर पायी, क्या दूसरे लोग कहेंगे कि मैं अक्षम अगुआ हूं?" मैं परेशान हो गई। अगले दिन, जब हमने परमेश्वर के वचन पर संगति की, मुझे डर था कि अन्य लोग पेशेवर ज्ञान के बारे में सवाल पूछेंगे, और अगर मैं उन्हें जवाब न दे पायी तो बेवकूफ लगूंगी। इसलिए मैंने खुद की हिम्‍मत बंधाई और स्थिति को टालने के लिए बातचीत का क्रम जारी रखा लेकिन मुझे बेचैनी महसूस हुई। मैंने उनसे पूछा, "अभी तक कौन-कौन सी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ है? समूह के अगुआ ने उनकी समस्याओं और समाधानों के बारे में चर्चा की। जब उसने शब्दजाल फैलाना शुरू किया तो मैं भ्रमित हो गई। मुझे यकीन नहीं था कि समस्याएं पूरी तरह से हल हुई हैं या नहीं। यदि उन्हें हल नहीं मिला, तो उनकी प्रगति प्रभावित होगी। लेकिन अगर मैंने विस्तृत सवाल पूछे, तो वे अवश्‍य मेरी राय सुनना चाहेंगे। लेकिन मुझे कुछ भी समझ नहीं आया, और यह शर्मनाक बात थी। बहुत विचार करने के बाद, मैंने कुछ नहीं कहा। फिर, एक बहन ने अपनी कुछ कठिनाइयां सामने रखीं जिनका संबंध कुछ पेशेवर मुद्दों से था। मैं और भी उलझ गई। मेरी उससे यह पूछने की हिम्‍मत नहीं हुई कि उसका क्या मतलब है। मुझे डर था कि अगर मैं उसकी समस्या हल नहीं कर पायी, तो वह सोचेगी कि मैं अच्छी अगुआ नहीं हूं। मैंने बस थोड़ी-सी बात की और यह कहकर मुद्दे को टाल दिया, "मैं इस मुद्दे की बाद में जांच करूंगी।" बैठक के बाद, मैं पूरी तरह से थक चुकी थी। मुझे खाली-खाली महसूस हुआ। इस बैठक के दौरान कोई समस्‍या हल नहीं हुई। क्या मैं अपने कर्तव्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर रही थी? मुझे यह भी पता था कि इस समूह के भाई-बहनों को बहुत कुछ हासिल नहीं हुआ था। उनके काम में ज्यादा प्रगति नहीं हुई और मुझे यह जान कर बुरा लगा। मुझे डर था, वे कहेंगे कि मुझे यह काम समझ में नहीं आया और मुझे तुच्‍छ समझेंगे। मैंने हर मुलाकात के दौरान अपना रास्ता साफ किया। मुझे कार्य स्थिति कभी समझ ही नहीं आई और किसी भी वास्तविक समस्या का समाधान नहीं हुआ। मैं कोई सही काम नहीं कर रही थी। क्या मैं परमेश्‍वर को धोखा दे रही थी और अपने भाई-बहनों को बेवकूफ बना रही थी? मैंने असहज महसूस किया और खुद को दोषी ठहराया। मैंने आत्मचिंतन करने और स्‍वयं को जानने के प्रयास में सहायता के लिए परमेश्‍वर से प्रार्थना की।

एक दिन धार्मिक कार्यों के दौरान, मैंने परमेश्‍वर के वचनों का एक अंश पढ़ा: "सभी भ्रष्ट मनुष्यों में यह समस्या देखी जाती है : जब वे बिना किसी ओहदे के साधारण भाई-बहन होते हैं, तो वे किसी के साथ परस्पर संपर्क के समय या बातचीत करते समय शेखी नहीं बघारते, न ही वे अपनी बोल-चाल में किसी निश्चित शैली या लहजे को अपनाते हैं; वे बस साधारण और सामान्य होते हैं, और उन्हें खुद को आकर्षक ढंग से पेश करने की आवश्यकता नहीं होती है। वे किसी मनोवैज्ञानिक दबाव को महसूस नहीं करते, और वे खुलकर, दिल से सहभागिता कर सकते हैं। वे सुलभ होते हैं और उनके साथ बातचीत करना आसान होता है; दूसरों को यह महसूस होता है कि वे बहुत अच्छे लोग हैं। बहरहाल, जैसे ही वे कोई दर्जा या ओहदा प्राप्त कर लेते हैं, वे अभिमानी हो जाते हैं, और कोई भी उनके लिए काम का नहीं होता; उन्हें लगता है कि वे इज्ज़तदार हैं, कि वे और आम लोग अलग-अलग पदार्थ से बने हुए हैं—और वे दूसरों के साथ खुलकर सहभागिता करना बंद कर देते हैं। वे अब खुले तौर पर सहभागिता क्यों नहीं करते हैं? उन्हें लगता है कि अब उनके पास ओहदा है, और वे अगुआ हैं। उन्हें लगता है कि अगुआओं की एक निश्चित छवि होनी चाहिए, उन्हें आम लोगों की तुलना में थोड़ा ऊँचा होना चाहिए, उनका क़द बड़ा और उन्हें अधिक जिम्मेदारी संभालने के योग्य होना चाहिए; उनका यह मानना होता है कि आम लोगों की तुलना में, अगुआओं में अधिक धैर्य होना चाहिए, उन्हें अधिक कष्ट उठाने और खपने में समर्थ होना चाहिए, और किसी भी प्रलोभन का सामना करने में सक्षम होना चाहिए। वे सोचते हैं कि अगुआ रो नहीं सकते, भले ही उनके परिवार के सदस्यों में से कितनों की भी मृत्यु हो जाए, और अगर उन्हें रोना ही है, तो उन्हें अपने बिस्तर में मुँह छुपाकर रोना चाहिए, ताकि किसी को भी उनमें कोई कमी, दोष या कमज़ोरी न देख सके। उन्हें यहाँ तक लगता है कि अगुआ किसी को यह जानने नहीं दे सकते कि वे नकारात्मक हो गए हैं; इसके बजाय, उन्हें ऐसी सभी बातों को छिपाना चाहिए। उनका मानना है कि ओहदे वाले वाले व्यक्ति को ऐसा ही करना चाहिए" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने भ्रष्ट स्वभाव का समाधान करने के लिए होना ही चाहिए अभ्यास का सुनिश्चित मार्ग')। परमेश्वर के वचनों से मेरी वास्तविक स्थिति का पता चला। अगुआ बनने से पहले, अगर मुझे कुछ समझ नहीं आता था, तो मैं किसी से पूछती थी। अगर मेरी कोई समस्या या कठिनाई होती तो मैं दूसरों के साथ खुले तौर पर संवाद करती थी। अगुआ बनने के बाद, लगा कि मुझे दूसरों से बेहतर होना चाहिए। जब भाई-बहनों ने मुझे चुना है, तो मुझे अगुआ की तरह काम करना चाहिए। मुझे उनसे बेहतर बनने की ज़रूरत थी, मुझे किसी भी समस्या को समझकर उसे हल करने में सक्षम होना चाहिए। इसलिए, जब मैंने समूह की बैठकों में भाग लिया, तो मैंने खुद को अलग तरह से पेश किया। लेकिन क्योंकि कुछ चीजें ऐसी थीं जो मुझे समझ नहीं आईं, इसलिए मुझे डर था कि दूसरे मुझे तुच्‍छ समझेंगे। मैंने छद्म अभिनय और बहानेबाजी शुरू कर दी, और अपने काम से किनारा करने लगी। मैं सबसे आसान कार्यों वाले समूहों में जाती, जहां मुझे अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलता, मैंने उन समूहों से परहेज किया जिनके कार्य कठिन थे या ऐसे क्षेत्रों से जुड़े थे जिनकी मुझे समझ नहीं थी, इसलिए अगर मैंने खराब काम किया तो मेरी बेईज्‍जती हो जाएगी। अगर मैं गई भी, तो मैं सिर्फ कुछ व्यर्थ बातें करके अपना रास्ता निकाल लेती। मैं उन समूहों की असली समस्याओं का सामना नहीं कर पायी। मैं अपने अंहकार और अगुआ होने के नशे में चूर थी। परमेश्‍वर के घर में अगुआ को प्रत्येक कार्य में गहराई से उतरना होता है, सत्य का संचार करना और अपने भाई-बहनों की समस्याओं को हल करना होता है, ताकि वे सत्य के सिद्धांतों के अनुसार अपना कार्य कर सकें। इसका मतलब है असली काम करना और परमेश्वर की इच्छा का ध्‍यान रखना। मुझे पता था कि उस समूह के भाई-बहनों के सामने कठिनाइयां थीं, लेकिन मैं उनकी समस्याओं का सामना करके उनका हल निकालने के लिए सत्‍य की तलाश करने को तत्‍पर नहीं थी। मैं अपने ही घमंड में चूर, अपने कर्तव्य में लापरवाह, और केवल प्रतिष्ठा के लिए जी रही थी। मैं परमेश्‍वर के घर के काम के बारे में सब भूल गई थी। परिणाम स्वरूप, इस समूह की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ और प्रगति में विलंब हुआ। क्या मैं सिर्फ नकली अगुआ नहीं थी जिसने वास्तविक काम किए बिना अगुआई की प्रतिष्‍ठा का आनंद भोगा? प्रतिष्‍ठा के पीछे भागने से थकान और दिल में बेचैनी होती है। इससे परमेश्‍वर के घर के काम में व्यवधान भी आता है। अगर मैं पश्चाताप नहीं करती, तो मैं बुराई करती और परमेश्‍वर का विरोध करती, जिससे परमेश्‍वर मुझे त्याग देते। मैंने जल्दी से परमेश्‍वर से प्रार्थना की और अभ्यास की राह मांगी।

फिर, मैंने परमेश्वर के वचनों का दूसरा अंश पढ़ा। "जब तुम्हारे पास कोई ओहदा नहीं होता है, तो तुम अक्सर स्वयं का विश्लेषण कर सकते हो और स्वयं को जान सकते हो। दूसरे इससे लाभान्वित हो सकते हैं। जब तुम्हारे पास ओहदा हो, तो तुम फिर भी अक्सर स्वयं का विश्लेषण कर सकते हो और स्वयं को जान सकते हो, दूसरों को सत्य की वास्तविकता को समझने और तुम्हारे अनुभवों से परमेश्वर की इच्छा को समझने का अवसर दे सकते हो। लोग इससे भी लाभान्वित हो सकते हैं, क्या वे नहीं हो सकते? यदि तुम इसका अभ्यास करते हो, तो चाहे तुम्हारे पास ओहदा हो या न हो, दूसरों को इससे लाभ होगा ही। तो, ओहदे का तुम्हारे लिए क्या अर्थ है? यह वास्तव में, एक अधिक, अतिरिक्त चीज़ है, जैसे कपड़े का कोई टुकड़ा या टोपी; जब तक तुम इसे कोई बहुत बड़ी बात नहीं मानते, यह तुम्हें बाधित नहीं कर सकता। यदि तुम ओहदे का मोह रखते हो और इस पर विशेष ज़ोर देते हो, हमेशा इसे एक महत्व का मुद्दा मानते हो, तो यह तुम्हें अपने नियंत्रण में ले लेगा; उसके बाद, तुम अब स्वयं को जानना नहीं चाहोगे, और न ही तुम अपने आप को खुलकर प्रकट करने के लिए, या अपनी नेतृत्व की भूमिका को किनारे रखकर दूसरों के साथ बातचीत करने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए, तैयार होगे। यह किस तरह की समस्या है? क्या तुमने स्वयं के लिए यह दर्जा नहीं अपना लिया है? और क्या तुम तब, बस उसी पद पर कब्ज़ा करना जारी नहीं रखते और इसे छोड़ देने के लिए अनिच्छुक नहीं होते हो, और यहाँ तक कि दूसरों के साथ अपने ओहदे की रक्षा करने के लिए स्पर्धा भी नहीं करते हो? क्या तुम सिर्फ खुद को सता नहीं रहे हो? यदि तुम खुद को हद से ज़्यादा सताते हो, तो तुम किसे दोष दोगे? जब तुम्हारे पास ओहदा हो, तब अगर तुम दूसरों पर रौब जमाने से इन्कार कर देते हो, बजाय इसके यदि तुम अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से करने पर ध्यान केंद्रित करते हो, जो कुछ भी करना चाहिए उसे करते हो और अपने सभी कर्तव्यों को पूरा करते हो, और यदि तुम स्वयं को एक साधारण भाई या बहन के रूप में देखते हो, तब क्या तुमने ओहदे के बंधन से मुक्ति प्राप्त न कर ली होगी?" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने भ्रष्ट स्वभाव का समाधान करने के लिए होना ही चाहिए अभ्यास का सुनिश्चित मार्ग')। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, मुझे समझ आया कि जब परमेश्वर ने मुझे अपना कर्तव्य करने के लिए अगुआ के रूप में पदोन्नत किया, तो उन्‍होंने मुझे प्रतिष्‍ठा ही नहीं, बल्कि एक कार्यभार और एक जिम्मेदारी भी दी। समस्याएं कितनी भी मुश्किल क्‍यों न हों, मुझे उन्हें हल करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध होना चाहिए। भाई-बहनों के साथ बातचीत करते समय, मुझे अपनी अगुआई की प्रतिष्‍ठा पर ध्‍यान नहीं देना चाहिए। जब भी मैं भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करती हूं, या जब कठिनाइयां या कमियां सामने आती हैं, तो मुझे खुलकर संवाद करना चाहिए और ईमानदार रहना चाहिए, दूसरों को मेरी भ्रष्टता और कमियों के साथ-साथ मेरे असली स्‍वरूप को देखने का मौका मिलना चाहिए। कोई ढ़ोंग या दिखावा नहीं करना चाहिए। मुझे अपने असली स्‍वभाव में रहना चाहिए और अपनी समझ के मुताबिक संगति करनी चाहिए। जब मुझे समझ नहीं आता, तो मुझे सत्‍य का अनुसरण करते हुए सबसे अच्छा काम करने के लिए अपने भाई-बहनों के साथ संवाद करना चाहिए। बाद में मैं उस समूह की सभाओं में गई। जब मुझे इस विशेषज्ञता से संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ा, तो मैंने समझदारी से अपने अहंकार को त्याग दिया। मैं जिन चीजों को नहीं समझती थी उनके बारे में दूसरों से पूछा और उनसे समझाने का आग्रह किया। उन्‍होंने मुझे किसी भी तरह कम नहीं आंका। उन्होंने अपनी समस्याओं और अपने काम में आने वाली कठिनाइयों के बारे में भी खुलकर बात की। जब वे बात कर रहे थे, तो मैंने ध्यान से सुना और समझने की कोशिश की। तभी मैं उनकी समस्याओं को कुछ हद तक समाझ पायी और मैंने सत्य के सिद्धांतों का उपयोग करके उनके साथ संवाद किया। मैंने अपने समय में विशेषज्ञता के इस क्षेत्र का भी अध्ययन किया। कठिनाइयां आने पर, मैं उनके साथ जवाब तलाशती। एक साथ काम करके, हम एक दूसरे के पूरक बन गए। हमने अपने काम में आने वाली कई समस्याओं को हल करना शुरू किया और अपने काम में बेहतर परिणाम हासिल किए। इससे मुझे बहुत अधिक सुकून और सहजता महसूस हुई।

कुछ महीने बाद, कलीसिया ने मेरे काम का दायरा बढ़ा दिया। मुझे पता था कि मुझे बहुत कुछ सीखना पड़ेगा। जब कठिनाइयां आतीं, तो मैं अक्सर परमेश्‍वर से प्रार्थना करती, परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाती और कुछ व्यवहारिक समस्याओं को हल कर पाती। भाई-बहनों ने मेरी प्रशंसा करते हुए मुझे इज़्ज़त देना शुरू कर दिया, इस अनुभूति से बेखबर, मैंने फिर से प्रतिष्‍ठा पर ध्यान देना शुरू किया। एक दिन, सहकर्मियों की बैठक के दौरान, हमारे अगुआ ने कहा कि किसी खास कलीसिया की बैठकें बहुत प्रभावी नहीं हैं। मेरे सहकर्मियों ने सिफारिश की कि समस्या को हल करने के लिए मुझे उस कलीसिया में जाना चाहिए। मैंने मन में सोचा, "ऐसा लगता है जैसे मेरे पास सत्‍य की वास्तविकता है और मैं समस्याओं को हल करने में मदद कर सकती हूं। मुझे सहकर्मियों के बीच उत्‍कृष्‍ट होना चाहिए। मुझे कड़ी मेहनत करके उन्‍हें अपनी काबिलियत दिखानी होगी। मेरे गलत इरादों के कारण, परमेश्‍वर ने मुझसे निपटने के लिए एक परिस्थिति तैयार की। एक दिन, समूह की अगुआ, बहन ली को कुछ तकलीफ थीं और वह थोड़ी निराश महसूस कर रही थीं। मैंने जल्दी से परमेश्‍वर के वचनों के दो अंश ढूंढे और अपने अनुभव का उपयोग करके उसके साथ संगति की। इसमें तीस मिनट लगे, लेकिन उसके ऊपर इसका कोई असर नहीं हुआ। मुझे भी लगा कि मेरी संगति उबाऊ है और कोई भी समस्‍या हल नहीं हुई। तब, बहन ऐन परमेश्वर के वचनों का एक अंश लेकर आई, और बहन ली सिर हिलाकर मुस्कराने लगी। उस समय, मुझे थोड़ी शर्म आई। बहन ऐन ने जिस अंश का उल्लेख किया वह अधिक उपयुक्त था। मैंने सोचा कि बहन ली मेरे बारे में क्या सोचेंगी। क्या वह और बहन ऐन कहेंगी कि मैं अयोग्य अगुआ हूं, मैं परमेश्‍वर के वचनों के उपयुक्त अंशों को उद्धृत नहीं कर सकी या समस्याओं को हल नहीं कर सकी? मुझे निराशा हुई,अब और संगति करने की इच्‍छा नहीं थी। कुछ दिनों बाद, भाई झांग बुरे हालात में फंस गये। मुझे पहले से कुछ संबंधित अंश मिल गये थे और मैंने सोचा, "मुझे यह संगति अच्छी तरह से करनी होगी, ताकि बहन ऐन के सामने मेरी इज़्ज़त बच सके। अन्यथा, मैं यह काम कैसे कर सकती हूं?" भाई झांग को देखकर मुझे बहुत ऊर्जा और ताकत मिली। मैं जो कुछ भी जानती थी, उसे बताने की कोशिश की। अचानक, भाई झांग ने अधीर होकर मुझसे कहा, "बहन, मैं आपकी बातें समझता हूं, लेकिन मेरी स्थिति नहीं सुधार रही है। मुझे इसके बारे में कुछ और सोचना होगा।" उनकी बातों ने मुझे झकझोर दिया। मैं नि:शब्‍द होकर बैठी रही। इच्छा हुई किसी चट्टान की आड़ में छुप जाऊं। मैं बहुत परेशान थी, मैंने सोचा, "मेरे साथ क्या गड़बड़ है? अन्य भाई-बहनों के साथ बात करते समय तो ऐसा नहीं हुआ। मैं गलतियां क्‍यों कर रही हूं? वे मुझे तुच्‍छ समझेंगे। वे कहेंगे मैं केवल बातें करती हूं और वास्तविक समस्याएं हल नहीं कर सकती?" बैठक कैसे समाप्त हुई, याद नहीं।

उसके बाद, बहन ऐन के साथ रहते हुए मुझे बहुत संकोच हुआ। कभी-कभी उनका मुझे देखने या मुझसे बात करने का तरीका थोड़ा कठोर होता। मैंने सोचा, "क्या उसे मुझसे कोई परेशानी है? क्या वह मुझे स्‍वीकार नहीं करती?" मुझे लगा कि मुझे भविष्य में दूरी बनाकर रखनी चाहिए ताकि मेरी और कमियां उजागर न हों। अन्य भाई-बहनों के सामने, मैं भी दिखावा करती रही। मैंने जानबूझकर दूरी बना ली और उनसे कभी-कभार ही उनसे बात करती या उनकी समस्याओं में मदद करती। मैंने जिम्मेदारी से अपना काम करना बंद कर दिया। धीरे-धीरे मेरे दिल पर अंधेरा छाने लगा। मैं दूसरों की समस्याओं को समझ या हल नहीं कर पा रही थी। कभी-कभी मुझे उनसे मिलने से डर लगता था। मेरा हर दिन असमंजस में बीतता और मैंने महसूस किया कि परमेश्‍वर ने मुझे त्‍याग दिया है। तभी मैंने परमेश्‍वर से प्रार्थना की: "परमेश्‍वर, मैं हमेशा अपनी प्रतिष्ठा कायम रखने के चक्‍कर में पड़ी रहती हूं और हमेशा बहानेबाजी करती हूं। मैं अब अपने कर्तव्य के प्रति जिम्मेदार नहीं हूं। तुमने मुझे मुंह फेर लिया है और यह तुम्हारी धार्मिकता है, लेकिन मैं तुम्‍हारी सहायता से आत्मचिंतन करना चाहती हूं।" उसके बाद, मैंने परमेश्‍वर के वचन पढ़े: "लोग स्वयं सृष्टि की वस्तु हैं। क्या सृष्टि की वस्तुएं सर्वशक्तिमान हो सकती हैं? क्या वे पूर्णता और निष्कलंकता हासिल कर सकती हैं? क्या वे हर चीज़ में दक्षता हासिल कर सकती हैं, हर चीज़ को समझ सकती हैं, और हर चीज़ को पूरा कर सकती हैं? वे ऐसा नहीं कर सकतीं। हालांकि, मनुष्यों में एक कमजोरी है। जैसे ही लोग किसी कौशल या पेशे को सीख लेते हैं, वे यह महसूस करने लगते हैं कि वे सक्षम हो गये हैं, वे रुतबे और हैसियत वाले लोग हैं, और वे पेशेवर हैं। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वे खुद को कितना 'सक्षम' समझते हैं, वे सभी अपने आपको एक आकर्षक रूप में पेश करना चाहते हैं, अपने आपको बड़े व्यक्तित्वों के छद्म वेश में छिपा लेते हैं, दिखने में पूर्ण और निष्कलंक लगते हैं, जिसमें एक भी दोष नहीं है; दूसरों की नज़रों में, वे महान, शक्तिशाली, पूरी तरह से सक्षम, और कुछ भी कर सकने वाला समझा जाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे किसी मामले में दूसरों की मदद माँगते हैं, तो वे असमर्थ, कमज़ोर और हीन दिखाई देंगे और लोग उन्हें नीची नज़रों से देखेंगे। इस कारण से, वे हमेशा एक झूठा चेहरा बनाए रखना चाहते हैं। ... ऐसे लोग बहुत घमंडी होते हैं, उन्होंने अपना सारा विवेक खो दिया है!" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी आस्था में सही पथ पर होने के लिए आवश्यक पाँच अवस्थाएँ')। "कुछ लोग विशेष रूप से पौलुस को आदर्श मानते हैं। उन्हें बाहर जा कर भाषण देना और कार्य करना पसंद होता है, उन्हें सभाओं में भाग लेना और प्रचार करना पसंद होता है; उन्हें अच्छा लगता है जब लोग उन्हें सुनते हैं, उनकी आराधना करते हैं और उन्हें चारों ओर घूमते हैं। उन्हें पसंद होता है कि दूसरों के मन में उनकी एक हैसियत हो, और जब दूसरे उनके द्वारा प्रदर्शित छवि को महत्व देते हैं, तो वे उसकी सराहना करते हैं। आओ हम इन व्यवहारों से उनकी प्रकृति का विश्लेषण करें: उनकी प्रकृति कैसी है? यदि वे वास्तव में इस तरह से व्यवहार करते हैं, तो यह इस बात को दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि वे अहंकारी और दंभी हैं। वे परमेश्वर की आराधना तो बिल्कुल नहीं करते हैं; वे ऊँची हैसियत की तलाश में रहते हैं और दूसरों पर अधिकार रखना चाहते हैं, उन पर अपना कब्ज़ा रखना चाहते हैं, उनके दिमाग में एक हैसियत प्राप्त करना चाहते हैं। यह शैतान की विशेष छवि है। उनकी प्रकृति के पहलू जो अलग से दिखाई देते हैं, वे हैं उनका अहंकार और दंभ, परेमश्वर की आराधना करने की अनिच्छा, और दूसरों के द्वारा आराधना किए जाने की इच्छा। ऐसे व्यवहारों से तुम उनकी प्रकृति को स्पष्ट रूप से देख सकते हो" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें')। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, मुझे समझ आया कि मैं परमेश्‍वर की एक प्राणी मात्र हूं। मेरे लिए हर चीज को समझना और उसमें महारथ हासिल करना असंभव है। चाहे वह सत्‍य या विशिष्ट ज्ञान की बात हो, ऐसी चीजें बहुत सीमित हैं जिनको समझकर मैं ग्रहण सकूं। चीजों को नजरअंदाज करना और गलतियां करना सामान्य बात है, लेकिन मैं खुद को नहीं जानती थी, अपनी कमियों को स्वीकार नहीं करना चाहती थी। मैं पूर्ण, उच्च और शक्तिशाली बनना चाहती थी, मैं कोई और होने का ढ़ोंग कर रही थी, और बहुत ध्यान इस बात पर दिया कि दुनिया मेरे बारे में क्या सोचती है। जब मेरे सहकर्मियों ने उस कलीसिया में जाकर उनकी समस्याएं हल करने के लिए मेरी सिफ़ारिश की, तो मुझे लगा कि मेरे पास सच्चाई की ताकत है और मैं उनसे बेहतर हूं, इसलिए मैं अपनी प्रतिभा दिखाना और खुद को साबित करना चाहती थी। बहन ऐन के साथ काम करके, मुझे लगा जैसे मैं अगुआ हूं और समस्याओं को हल करना मेरा काम है, इसलिए मुझे हर चीज में उससे बेहतर होना चाहिए। जब मैंने देखा कि कैसे बहन ऐन दूसरों की समस्याओं को हल करती है और मैं लगातार गलतियां कर रही हूं, मुझे महसूस हुआ कि मेरी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई है और मैं दूर भाग जाना चाहती हूं, इसलिए मैंने जान-बूझकर खुद को दूसरों से दूर करके अपने कर्तव्य से भागना शुरू कर दिया। कलीसिया जीवन में समस्याएं अभी भी बनी हुई थीं, जो भाई-बहनों को जीवन में प्रवेश पाने से रोक रही थीं। मेरे नकली व्‍यवहार का कारण मुझे समझ में आ गया था। मैं शैतान के इन विषों से भ्रष्ट हो चुकी थी जैसे "पुरुषों को हमेशा अपने समकालीनों से बेहतर होने का प्रयत्‍न करना चाहिए," "जैसे पेड़ अपनी छाल के लिए जीता है, उसी तरह मनुष्‍य अपने चेहरे के लिए जीता है," और "व्‍यक्‍ति जहां भी रहता है अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि हंस जहां भी उड़ता है आवाज़ करता जाता है।" मैं चाहे जिस समूह में भी रही, पूरे समय झूठा दिखावा करने और अपनी कमियों को छिपाने की कोशिश में लगी रहती। मेरी इच्‍छा थी कि लोग मेरा केवल अच्छा पक्ष देखें और उन पर अच्छी छाप छोड़ूं। मुझे लगा कि इससे मेरे जीवन में मूल्य और गरिमा आती है, लेकिन जब वह भावना दूर हुई, तो मुझे दर्द और पीड़ा महसूस हुई। मैंने सावधानी बरती और दूसरों को संदेह की नज़र से देखा। यह बहुत ही उबाऊ था। परमेश्‍वर ने मुझे एक अगुआ के रूप में अपना कर्तव्य निभाने, उसका उत्कर्ष करने और उसकी गवाही देने, व्यावहारिक समस्याओं को हल करने के लिए संगति करने और भाई-बहनों को परमेश्‍वर के करीब लाने के लिए पदोन्‍नत किया था। लेकिन मैंने परमेश्वर के घर के काम को बनाए रखने की पूरी कोशिश नहीं की। इसके बजाय, मैंने इसे दिखावा करने और प्रशंसा प्राप्‍त करने का अवसर माना। जब मेरी मनोकामना पूरी नहीं हुई, तो मैंने अपने कर्तव्य की उपेक्षा की। मैंने केवल अपनी प्रतिष्‍ठा और नाम के बेहतर और खराब होने के बारे में सोचा, मैंने सत्‍य का अनुसरण नहीं किया या अपनी जिम्मेदारियों को पूरा नहीं किया। परिणाम स्वरूप, परमेश्‍वर ने मेरा तिरस्कार किया, और मेरी आत्मा अंधेरे में भटक गई। मैं किसी भी वास्तविक समस्या को हल नहीं कर सकी, मैं जिन चीजों को करने में मूलत: सक्षम थी, उन्‍हें भी नहीं कर पायी। मैंने परमेश्वर की धार्मिकता और पवित्रता को देखा। पौलुस की प्रकृति घमंडी और प्रतिस्पर्धी थी। वह आंखें मूंद कर रुतबे के पीछे भागा और दूसरे से प्रशंसा पानी चाही। उसने लोगों को खुद के सामने लाकर परमेश्‍वर का विरोध करने का मार्ग अपनाया। मैंने सत्‍य का अनुसरण नहीं किया, बल्कि आँख बंद करके प्रतिष्‍ठा के पीछे भागती रही। मुझे इस बात की बहुत परवाह रहती थी कि दूसरे मेरे बारे में क्या सोचते हैं, मैं उनका दिल जीतकर उन्हें धोखा देना चाहती थी। पौलुस की तरह, मैंने परमेश्‍वर का विरोध करने का रास्ता अपनाया! जब मुझे इस बात का एहसास हुआ, तो मैंने जल्दी से परमेश्‍वर से प्रार्थना की और पश्चाताप किया। मैं अब और बहाने बनाना या अपनी प्रतिष्‍ठा की रक्षा करना नहीं चाहती थी। मैं सत्‍य का अभ्यास करके ईमानदार इंसान बनना चाहती थी।

जब मैं अगली बार भाई-बहनों से मिली, तो मैं उन्हें अपना अनुभव बताना और अपनी भ्रष्टता को उजागर करना चाहती थी, लेकिन मेरे मुँह से शब्द नहीं निकल सके। मैं कलीसिया अगुआ थी और मेरा कर्तव्य उनके काम पर नज़र रखना था। अगर मैंने उन्हें अपनी सब कमी और कमजोरियां बतायी, तो क्या वे सोचेंगे कि मैं सत्‍य का अनुसरण करने वाली इंसान नहीं हूं, मैं अगुआ बनने लायक नहीं हूं? मेरे दिमाग में रस्साकशी होने लगी। तभी मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से बहानेबाजी करने लगी हूँ और अपनी प्रतिष्ठा को कायम रखने की कोशिश कर रही हूं। मुझे बार-बार अपनी प्रतिष्‍ठा को महत्‍व देने का विचार आता रहा, जिसने परमेश्वर के घर के काम को बाधित किया और मुझे गलत रास्ते पर डाल दिया। मेरा दिल में डर बैठ गया। मैंने परमेश्‍वर के वचनों का ध्‍यान किया: "तुम्हें अपनी निजी प्रतिष्ठा, अपने मान-सम्मान और ओहदे की खातिर, कुछ भी ढँकने की, कोई संशोधन करने की, या कोई भी चालाकी करने की आवश्यकता नहीं है, और यह बात तुम्हारे द्वारा की गई किसी भूल पर भी लागू होती है; ऐसा व्यर्थ कार्य अनावश्यक है। यदि तुम ये सारी चीज़ें नहीं करते हो, तो तुम आसानी से और बिना थकान के, पूरी तरह से प्रकाश में, जियोगे। केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर की प्रशंसा पा सकते हैं" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो सत्य का अभ्यास करते हैं केवल वही परमेश्वर का भय मानने वाले होते हैं')। परमेश्‍वर के वचनों ने मेरे दिल को रोशन किया और मुझे प्रेरणा दी। मुझे एहसास हुआ कि इस माहौल में रहना सत्‍य का अभ्यास करने का एक अवसर है। मैं अब अपने असली स्‍वरूप को छिपाने और अपनी प्रतिष्‍ठा की रक्षा करने में असमर्थ थी, इसलिए मैंने अपनी सारी भ्रष्टता और सीखे गए सबक अपने भाई-बहनों के साथ साझा किए। हम सभी को इस संगति से कुछ न कुछ हासिल हुआ और एक दूसरे के करीब आते गए। हमने काम के मुद्दों के बारे में भी बात की, और एक-दूसरे की खूबियों का लाभ उठाकर, हम अपने कर्तव्य में हुई गलतियों को सुधार पाये। कुछ समय बाद, इस कलीसिया की समस्याओं का समाधान हो गया। भाई-बहनों के हालात भी सुधर गये और वे सक्रिय रूप से अपना कर्तव्य करने लगे। उसके बाद, अपना कर्तव्य निभाते हुए, भले ही मैं कभी-कभी प्रतिष्‍ठा के विचारों से विवश महसूस करती थी, मैं सचेत होकर परमेश्वर से प्रार्थना करने, सत्य का अभ्यास करने और ईमानदार बनने में कामयाब रही, और मैं अपनी भ्रष्टता को भी खुलकर स्‍वीकार किया। धीरे-धीरे मैंने अपनी प्रतिष्‍ठा पर अधिक ध्यान देना बंद कर दिया। तब से, मैं अपने भाई-बहनों के साथ बहानेबाजी छोड़कर उनके साथ मिलजुल कर काम करने लगी। अब सभी बुराइयां छोड़कर, मैं सत्‍य का अनुसरण कर पा रही हूं और अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभा रही हूं। यह परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना का परिणाम है! परमेश्‍वर का धन्यवाद!

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