11.1. परमेश्वर के अधिकार पर

529. ब्रह्मांड और आकाश की विशालता में अनगिनत जीव रहते और प्रजनन करते हैं, एक अंतहीन चक्र में जीवन के नियम का पालन करते हैं, और एक अटल नियम का अनुसरण करते हैं। जो मर जाते हैं, वे अपने साथ जीवित लोगों की कहानियाँ लेकर चले जाते हैं, और जो लोग जी रहे हैं, वे खत्म हो चुके लोगों के त्रासद इतिहास को ही दोहराते हैं। और इसलिए, मानवजाति खुद से पूछे बिना नहीं रह पाती : हम क्यों जीते हैं? और हमें मरना क्यों पड़ता है? इस संसार पर कौन शासन करता है? और इस मानवजाति को किसने बनाया? क्या मानवजाति को वास्तव में प्रकृति ने बनाया? क्या मानवजाति वास्तव में अपने भाग्य की नियंत्रक है? ... ये वे सवाल हैं, जो मानवजाति ने हजारों वर्षों से निरंतर पूछे हैं। दुर्भाग्य से, जितना अधिक मनुष्य इन सवालों से ग्रस्त हुआ है, उसमें उतनी ही अधिक प्यास विज्ञान के लिए विकसित हुई है। विज्ञान देह की संक्षिप्त तृप्ति और अस्थायी आनंद प्रदान करता है, लेकिन वह मनुष्य को उसकी आत्मा के भीतर की तन्हाई, अकेलेपन, बमुश्किल छिपाए जा सकने वाले आतंक और लाचारी से मुक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है। मानवजाति केवल उसी वैज्ञानिक ज्ञान का उपयोग करती है, जिसे वह अपनी खुली आँखों से देख सकती है और अपने मस्तिष्क से समझ सकती है, ताकि अपने हृदय को चेतनाशून्य कर सके। फिर भी यह वैज्ञानिक ज्ञान मानवजाति को रहस्यों की खोज करने से रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। मानवजाति यह नहीं जानती कि ब्रह्मांड और सभी चीज़ों का संप्रभु कौन है, और मानवजाति के प्रारंभ और भविष्य के बारे में तो वह बिल्कुल भी नहीं जानती। मानवजाति केवल इस व्यवस्था के बीच विवशतापूर्वक जीती है। इससे कोई बच नहीं सकता और इसे कोई बदल नहीं सकता, क्योंकि सभी चीज़ों के बीच और स्वर्ग में अनंतकाल से लेकर अनंतकाल तक वह एक ही है, जो सभी चीज़ों पर अपनी संप्रभुता रखता है। वह एक ही है, जिसे मनुष्य द्वारा कभी देखा नहीं गया है, वह जिसे मनुष्य ने कभी नहीं जाना है, जिसके अस्तित्व पर मनुष्य ने कभी विश्वास नहीं किया है—फिर भी वह एक ही है, जिसने मनुष्य के पूर्वजों में साँस फूँकी और मानवजाति को जीवन प्रदान किया। वह एक ही है, जो मानवजाति का भरण-पोषण करता है और उसका अस्तित्व बनाए रखता है; और वह एक ही है, जिसने आज तक मानवजाति का मार्गदर्शन किया है। इतना ही नहीं, वह और केवल वह एक ही है, जिस पर मानवजाति अपने अस्तित्व के लिए निर्भर करती है। वह सभी चीजों पर और ब्रह्मांड के सभी जीवित प्राणियों पर संप्रभुता रखता है। वह चारों मौसमों को शासित करता है, और वही है जो हवा, ठंड, हिमपात और बारिश लाता है। वह मानवजाति के लिए सूर्य का प्रकाश लाता है और रात्रि का सूत्रपात करता है। यह वही था, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी की व्यवस्था की, और मनुष्य को पहाड़, झीलें और नदियाँ और उनके भीतर के सभी जीव प्रदान किए। उसके कर्म सर्वव्यापी हैं, उसकी सामर्थ्य सर्वव्यापी है, उसकी बुद्धि सर्वव्यापी है, और उसका अधिकार सर्वव्यापी है। इन व्यवस्थाओं और नियमों में से प्रत्येक उसके कर्मों का मूर्त रूप है, प्रत्येक उसकी बुद्धिमत्ता और अधिकार का प्रकाशन है। कौन खुद को उसके प्रभुत्व से मुक्त कर सकता है? और कौन उसकी अभिकल्पनाओं से खुद को छुड़ा सकता है? सभी चीज़ें उसकी निगाह के नीचे मौजूद हैं, और इतना ही नहीं, सभी चीजें उसकी संप्रभुता के अधीन रहती हैं। उसके कर्म और उसकी सामर्थ्य मानवजाति के लिए इस तथ्य को स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं छोड़ती कि वह वास्तव में मौजूद है और सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है। उसके अतिरिक्त कुछ भी ब्रह्मांड पर शासन नहीं कर सकता और मानवजाति का निरंतर भरण-पोषण तो बिल्कुल नहीं कर सकता। चाहे तुम परमेश्वर के कर्मों को पहचानने में सक्षम हो या न हो, और चाहे तुम परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो या न करते हो, इसमें कोई शक नहीं कि तुम्हारा भाग्य परमेश्वर द्वारा नियत किया जाता है, और इसमें भी कोई शक नहीं कि परमेश्वर हमेशा सभी चीज़ों पर अपनी संप्रभुता रखेगा। उसका अस्तित्व और अधिकार इस बात से निर्धारित नहीं होता कि वे मनुष्य द्वारा पहचाने और समझे जाते हैं या नहीं। केवल वही मनुष्य के अतीत, वर्तमान और भविष्य को जानता है, और केवल वही मानवजाति के भाग्य का निर्धारण कर सकता है। चाहे तुम इस तथ्य को स्वीकार करने में सक्षम हो या न हो, इसमें ज्यादा समय नहीं लगेगा, जब मानवजाति अपनी आँखों से यह सब देखेगी, और परमेश्वर जल्दी ही इस तथ्य को साकार करेगा। मनुष्य परमेश्वर की आँखों के सामने जीता है और मर जाता है। मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के लिए जीता है, और जब उसकी आँखें आखिरी बार बंद होती हैं, तो इस प्रबंधन के लिए ही बंद होती हैं। मनुष्य बार-बार, आगे-पीछे, आता और जाता रहता है। बिना किसी अपवाद के, यह परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी अभिकल्पना का हिस्सा है। परमेश्वर का प्रबंधन कभी रुका नहीं है; वह निरंतर अग्रसर है। वह मानवजाति को अपने अस्तित्व से अवगत कराएगा, अपनी संप्रभुता में विश्वास करवाएगा, अपने कर्मों का अवलोकन करवाएगा, और अपने राज्य में वापस लौट जाएगा। यही उसकी योजना और कार्य है, जिनका वह हजारों वर्षों से प्रबंधन कर रहा है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है

530. जब से परमेश्वर ने सभी चीजों का सृजन शुरू किया, तब से उसका सामर्थ्य व्यक्त और प्रकट होना शुरू हो गया, क्योंकि परमेश्वर ने सभी चीजें सृजित करने के लिए वचनों का इस्तेमाल किया। उसने उन्हें जिस भी तरीके से बनाया हो, उसने उन्हें जिस भी वजह से बनाया हो, परमेश्वर के वचनों के कारण सभी चीजें अस्तित्व में आ गईं, डटी और मौजूद रहीं; यह सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार है। मानव-जाति के दुनिया में प्रकट होने से पहले के समय में सृष्टिकर्ता ने मानव-जाति के लिए सभी चीजें बनाने के लिए अपने सामर्थ्य और अधिकार का उपयोग किया, और मानव-जाति के रहने के लिए एक उपयुक्त परिवेश तैयार करने के लिए अपनी अनूठी विधियाँ नियोजित कीं। उसने जो कुछ किया, वह मानव-जाति की तैयारी में था, जो शीघ्र ही परमेश्वर की श्वास पाने वाली थी। अर्थात मानव-जाति के सृजन से पहले के समय में परमेश्वर का अधिकार मानव-जाति से भिन्न सभी सृजन में, आकाश, ज्योतियों, समुद्र और भूमि जैसी बड़ी चीजों में, और जानवरों और पक्षियों के साथ-साथ सभी प्रकार के कीड़ों और सूक्ष्मजीवियों में, जिनमें आँखों के लिए अदृश्य विभिन्न बैक्टीरिया शामिल हैं, दिखाया गया था। उनमें से प्रत्येक को सृष्टिकर्ता के वचनों द्वारा जीवन दिया गया, प्रत्येक ने सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण वंश-वृद्धि की, और प्रत्येक सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण उसकी संप्रभुता के तहत रहा। हालाँकि उन्हें सृष्टिकर्ता की साँस नहीं मिली, फिर भी उन्होंने सृष्टिकर्ता द्वारा प्रदान की गई जीवन-शक्ति को अपने विभिन्न रूपों और संरचनाओं के माध्यम से प्रदर्शित किया; हालाँकि उन्हें सृष्टिकर्ता द्वारा मानव-जाति को दी गई बोलने की क्षमता प्राप्त नहीं हुई, फिर भी उनमें से प्रत्येक ने अपने जीवन को व्यक्त करने का एक तरीका प्राप्त किया, जो उन्हें सृष्टिकर्ता द्वारा प्रदान किया गया था और जो मनुष्य की भाषा से भिन्न था। सृष्टिकर्ता का अधिकार न केवल गतिहीन प्रतीत होने वाली भौतिक चीजों को जीवन-शक्ति देता है, ताकि वे कभी गायब न हों, बल्कि वह प्रत्येक जीवित प्राणी को प्रजनन द्वारा वंश-वृद्धि करने की प्रवृत्ति भी देता है, ताकि वे कभी नष्ट न हों, जिससे कि वे सृष्टिकर्ता द्वारा उन्हें दी गई अस्तित्व में रहने की व्यवस्थाएँ और सिद्धांत पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करें। जिस तरह से सृष्टिकर्ता अपने अधिकार का प्रयोग करता है, वह किसी स्थूल या सूक्ष्म दृष्टिकोण का कठोरता से पालन नहीं करता और किसी भी रूप तक सीमित नहीं रहता; वह ब्रह्मांड के कार्यों को नियंत्रित करने और सभी चीजों के जीवन और मृत्यु पर संप्रभुता रखने में सक्षम है, और इसके अलावा, वह सभी चीजें इस तरह संचालित करने में सक्षम है कि वे उसकी सेवा करें; वह पहाड़ों, नदियों और झीलों के सभी कार्यों का प्रबंधन कर सकता है, और उनके भीतर की सभी चीजों पर शासन कर सकता है, और इससे भी बढ़कर, वह वो चीज प्रदान करने में सक्षम है जो सभी चीजों के लिए आवश्यक है। यह मानव-जाति के अलावा सभी चीजों के बीच सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार की अभिव्यक्ति है। ऐसी अभिव्यक्ति केवल जीवन भर के लिए नहीं है; यह कभी खत्म नहीं होगी, न ही रुकेगी, और इसे किसी व्यक्ति या वस्तु द्वारा बदला या क्षतिग्रस्त नहीं किया जा सकता, न ही इसे किसी व्यक्ति या वस्तु द्वारा बढ़ाया-घटाया जा सकता है—क्योंकि कोई भी सृष्टिकर्ता की पहचान को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता, और इसलिए, सृष्टिकर्ता के अधिकार को किसी भी सृजित प्राणी द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता; यह किसी भी गैर-सृजित प्राणी द्वारा अप्राप्य है। उदाहरण के लिए परमेश्वर के दूतों और स्वर्गदूतों को लो। उनके पास परमेश्वर का सामर्थ्य नहीं है, सृष्टिकर्ता का अधिकार तो उनके पास बिल्कुल भी नहीं है, और उनके पास परमेश्वर का सामर्थ्य और अधिकार न होने का कारण यह है कि उनमें सृष्टिकर्ता का सार नहीं है। गैर-सृजित प्राणी, जैसे कि परमेश्वर के दूत और स्वर्गदूत, परमेश्वर की ओर से कुछ चीजें कर सकने के बावजूद, परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। हालाँकि उनके पास कुछ ऐसा सामर्थ्य है जो मनुष्य के पास नहीं है, फिर भी उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं हैं, उनके पास सभी चीजें सृजित करने, सभी चीजें नियंत्रित करने और सभी चीजों पर प्रभुता रखने का अधिकार नहीं है। इसलिए, परमेश्वर की अद्वितीयता किसी भी गैर-सृजित प्राणी द्वारा प्रतिस्थापित नहीं की जा सकती, और इसी तरह, परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य किसी भी गैर-सृजित प्राणी द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किए जा सकते। क्या तुमने बाइबल में परमेश्वर के किसी दूत के बारे में पढ़ा है, जिसने सभी चीजें सृजित की हों? परमेश्वर ने अपने किसी दूत या स्वर्गदूत को सभी चीजें सृजित करने के लिए क्यों नहीं भेजा? चूँकि उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं था, इसलिए उनके पास परमेश्वर के अधिकार का प्रयोग करने की क्षमता नहीं थी। सभी सृजित प्राणियों की तरह, वे सभी सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन हैं, सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन हैं, और इसी तरह, सृष्टिकर्ता उनका परमेश्वर और उनका संप्रभु है। उनमें से हर एक के बीच—चाहे वे महान हों या नीच, महान सामर्थ्य के हों या अल्प सामर्थ्य के—कोई भी ऐसा नहीं है, जो सृष्टिकर्ता का अधिकार लाँघ सकता हो, और इसलिए उनमें से कोई भी ऐसा नहीं है, जो सृष्टिकर्ता की पहचान को प्रतिस्थापित कर सके। उन्हें कभी परमेश्वर नहीं कहा जाएगा, और वे कभी सृष्टिकर्ता नहीं बन पाएँगे। ये अटल सत्य और तथ्य हैं!

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

531. परमेश्वर ने स्वयं द्वारा सृजित सभी चीजों को अपने वचनों के कारण अस्तित्व में आते और डटे रहते देखा, जो धीरे-धीरे बदलने लगीं। इस समय, क्या परमेश्वर उन विभिन्न चीजों से संतुष्ट था जिन्हें उसने अपने वचनों से बनाया था, और उन विभिन्न कार्यों से संतुष्ट था जो उसने पूरे किए थे? इसका उत्तर है कि “परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।” तुम लोग यहाँ क्या देखते हो? “परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है” क्या दर्शाता है? यह किसका प्रतीक है? इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर ने जिस चीज की योजना बनाई और निर्धारित की थी, जो लक्ष्य उसने पूरे करने तय किए थे, उन्हें पूरा करने का सामर्थ्य और बुद्धि उसके पास थी। जब परमेश्वर ने हर काम पूरा कर लिया, तो क्या उसे खेद हुआ? जवाब अभी भी यही है कि “परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।” दूसरे शब्दों में, उसे न केवल कोई पछतावा महसूस नहीं हुआ, बल्कि वह संतुष्ट भी हुआ। इसका क्या मतलब है कि उसे कोई पछतावा महसूस नहीं हुआ? इसका मतलब है कि परमेश्वर की योजना पूर्ण है, उसका सामर्थ्य और बुद्धि पूर्ण है, और केवल उसके अधिकार से ही ऐसी पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। जब मनुष्य कोई कार्य करता है, तो क्या वह, परमेश्वर की तरह, देख सकता है कि यह अच्छा है? क्या मनुष्य जो कुछ भी करता है, वह पूर्णता प्राप्त कर सकता है? क्या मनुष्य कोई चीज हमेशा-हमेशा के लिए पूरा कर सकता है? ठीक जैसे मनुष्य कहता है, “कुछ भी पूर्ण नहीं है, केवल बेहतर है,” मनुष्य जो कुछ भी करता है, वह पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता। जब परमेश्वर ने देखा कि उसने जो कुछ किया और हासिल किया वह सब अच्छा है, परमेश्वर ने जो कुछ भी बनाया वह उसके वचनों द्वारा निर्धारित किया गया था, अर्थात, जब “परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है,” तो उसने जो कुछ भी बनाया था उसने एक स्थायी रूप ग्रहण कर लिया, किस्म के अनुसार वर्गीकृत कर दिया गया, और उसे अनंत काल के लिए एक निश्चित स्थान, उद्देश्य और कार्य दे दिया गया। इसके अलावा, सभी चीजों के बीच उसकी भूमिका, और वह यात्रा जो उसे परमेश्वर के सभी चीजों के प्रबंधन के दौरान करनी चाहिए, पहले से ही परमेश्वर द्वारा निर्धारित कर दी गई थी, और वह अपरिवर्तनीय थीं। यह सृष्टिकर्ता द्वारा सभी चीजों को दी गई स्वर्गिक व्यवस्था थी।

“परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है,” ये सरल, कम समझे गए वचन, जिन्हें अक्सर अनदेखा किया जाता है, परमेश्वर द्वारा सभी प्राणियों को दी गई स्वर्गिक व्यवस्था और स्वर्गिक आदेश के वचन हैं। ये सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक और मूर्त रूप हैं, जो ज्यादा व्यावहारिक और ज्यादा गहरा है। अपने वचनों के माध्यम से सृष्टिकर्ता न केवल वह सब प्राप्त करने में सक्षम रहा जिसे उसने प्राप्त करना निर्धारित किया था, और वह सब हासिल करने में सक्षम रहा जिसे उसने हासिल करना निर्धारित किया था, बल्कि वह अपने हाथों में वह सब-कुछ नियंत्रित कर सका जिसे उसने सृजित किया था, और उन सभी चीजों पर शासन कर सका जिन्हें उसने अपने अधिकार के तहत बनाया था, और, इसके अलावा, सब-कुछ व्यवस्थित और नियमित था। उसके वचन के द्वारा सभी चीजें बढ़ीं भी, अस्तित्व में रहीं, और नष्ट भी हो गईं और, इसके अलावा, उसके अधिकार से वे उस व्यवस्था के बीच मौजूद रहीं जिसे उसने निर्धारित किया था, और कोई भी इससे मुक्त नहीं था! यह व्यवस्था उसी क्षण शुरू हो गई, जब “परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है,” और यह परमेश्वर की प्रबंधन-योजना के लिए ठीक उस दिन तक मौजूद, जारी और कार्यरत रहेगी, जब तक इसे सृष्टिकर्ता द्वारा निरस्त न कर दिया जाए! सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार न केवल सभी चीजें सृजित कर उन्हें अस्तित्व में आने की आज्ञा देने की उसकी क्षमता में प्रकट हुआ, बल्कि सभी चीजों पर शासन करने और उन पर संप्रभुता रखने, और सभी चीजों को जीवन और जीवन-शक्ति प्रदान करने की उसकी क्षमता में प्रकट हुआ, इसके अलावा यह उसकी इस क्षमता में प्रकट हुआ कि अपनी योजना में उसने जिन चीजों को रचा, वे अनंत काल तक के लिए उसके द्वारा बनाई गई दुनिया में एक पूर्ण आकार, पूर्ण जीवन-संरचना और एक पूर्ण भूमिका में प्रकट होकर अस्तित्व में रहें। इसी तरह वह इस रूप में भी प्रकट हुआ कि सृष्टिकर्ता के विचार किसी बंधन के अधीन नहीं थे, समय, स्थान या भूगोल द्वारा सीमित नहीं थे। सृष्टिकर्ता के अधिकार की तरह उसकी अद्वितीय पहचान अनंत काल से अनंत काल तक अपरिवर्तित रहेगी। उसका अधिकार हमेशा उसकी विशिष्ट पहचान का प्रतिरूप और प्रतीक होगा, और उसका अधिकार हमेशा उसकी पहचान के साथ-साथ मौजूद रहेगा!

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

532. परमेश्वर ने सभी चीजों की सृष्टि की थी, और इसलिए वह समूची सृष्टि को अपने प्रभुत्व के अधीन लाता और अपने प्रभुत्व के प्रति समर्पण करवाता है; वह सभी चीजों पर अधिकार रखेगा, ताकि सभी चीजें उसके हाथों में हों। परमेश्वर की सारी सृष्टि, पशुओं, पेड़-पौधों, मानवजाति, पहाड़ तथा नदियों, और झीलों सहित—सभी को उसके प्रभुत्व के अधीन आना ही होगा। आकाश में और धरती पर सभी चीजों को उसके प्रभुत्व के अधीन आना ही होगा। उनके पास कोई विकल्प नहीं हो सकता है और सभी को उसके आयोजनों के समक्ष समर्पण करना ही होगा। इसकी आज्ञा परमेश्वर द्वारा दी गई थी, और यह परमेश्वर का अधिकार है। परमेश्वर सभी चीजों पर नियंत्रण रखता है, और सभी चीजों को व्यवस्थित और श्रेणीबद्ध करता है, जिसमें प्रत्येक को परमेश्वर की इच्छाओं के अनुसार उनके प्रकार के आधार पर छाँटा जाता है और उससे संबंधित स्थान प्रदान किया जाता है। चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो, कोई भी चीज़ परमेश्वर से बढ़कर नहीं हो सकती है, और सभी चीजें परमेश्वर द्वारा सृजित मानवजाति की सेवा करती हैं, और कोई भी चीज परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करने या परमेश्वर से कोई भी माँग करने की हिम्मत नहीं करती है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है

533. मानवजाति के अस्तित्व में आने से पहले, ब्रह्माण्ड—आकाश के समस्त ग्रह, सभी सितारे—पहले से ही अस्तित्व में थे। बृहद स्तर पर, ये खगोलीय पिंड, अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के लिए, परमेश्वर के नियन्त्रण में नियमित रूप से अपने कक्ष में परिक्रमा करते रहे हैं, चाहे ऐसा करने में कितने ही वर्ष लगते हों। कौन-सा ग्रह किस समय में कहाँ जाता है; कौन-सा ग्रह कौन-सा कार्य करता है, और कब करता है; कौन-सा ग्रह किस कक्ष में चक्कर लगाता है, और वह कब अदृश्य हो जाता है या बदल दिया जाता है—ये सभी चीज़ें बिना कोई त्रुटि के होती रहती हैं। ग्रहों की स्थितियाँ और उनके बीच की दूरियाँ सभी कठोर प्रतिमानों का पालन करती हैं, उन सभी को सटीक आँकड़ों द्वारा वर्णित किया जा सकता है; वे जिस ग्रहपथ पर घूमते हैं, उनके कक्षों की गति और स्वरूप, वह समय जब वे विभिन्न स्थितियों में होते हैं, इन सभी को सटीक ढंग से निर्धारित व विशेष नियमों द्वारा परिमाणित किया जा सकता है। बिना चूके युगों से ग्रह इन नियमों का पालन कर रहे हैं। कोई भी शक्ति उनके कक्षों या तरीकों को, जिनका वे पालन करते हैं, नहीं बदल सकती, न ही कोई रुकावट पैदा कर सकती है। क्योंकि वे विशेष नियम जो उनकी गति को संचालित करते हैं और वे सटीक आँकड़े जो उनका वर्णन करते हैं, सृजनकर्त्ता के अधिकार द्वारा पूर्वनियत हैं, वे सृजनकर्त्ता की संप्रभुता और नियन्त्रण के अधीन इन नियमों का पालन अपनी इच्छा से करते हैं। बृहत स्तर पर, कुछ प्रतिमानों, कुछ आँकड़ों, और कुछ अजीब और समझाए न जा सकने वाले नियमों या घटनाओं के बारे में जानना मनुष्य के लिए कठिन नहीं है। यद्यपि मानवजाति यह नहीं स्वीकारती कि परमेश्वर है, न ही इस तथ्य को स्वीकार करती है कि सृजनकर्त्ता ने ही हर चीज़ को बनाया है और हर चीज़ पर संप्रभु है, और यही नहीं सृजनकर्त्ता के अधिकार के अस्तित्व को भी नहीं स्वीकारती, फिर भी मानव-विज्ञानियों, खगोलशास्त्रियों और भौतिक-विज्ञानियों को लगातार पता चल रहा है कि सभी चीजों के अस्तित्व और गतियों को निर्देशित करने वाले सिद्धांत और आवर्ती कार्यप्रणालियां (पैटर्न) एक विशाल और गुप्त श्याम ऊर्जा द्वारा शासित और नियन्त्रित होती हैं। यह तथ्य मनुष्य को बाध्य करता है कि वह इस बात का सामना करे और स्वीकार करे कि इन गतियों के स्वरूपों के बीच एक शक्तिशाली जन है, जो हर एक चीज़ का आयोजन करता है। उसका सामर्थ्य असाधारण है, और यद्यपि कोई भी उसके असली स्वरूप को नहीं देख पाता, फिर भी वह हर क्षण हर एक चीज पर संप्रभुता रखता हैऔर नियन्त्रित करता है। कोई भी व्यक्ति या ताकत उसकी संप्रभुता से परे नहीं जा सकती। इस सत्य का सामना करते हुए, मनुष्य को यह अवश्य पहचानना चाहिए कि वे नियम जो सभी चीज़ों के अस्तित्व को संचालित करते हैं उन्हें मनुष्यों द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जा सकता, किसी के भी द्वारा बदला नहीं जा सकता; साथ ही उसे यह भी स्वीकार करना चाहिए कि मानवजाति इन नियमों को पूरी तरह से नहीं समझ सकती, और वे प्राकृतिक रूप से घटित नहीं हो रही हैं, बल्कि एक परम सत्ता उनका निर्धारण कर रही है। ये सब परमेश्वर के अधिकार की अभिव्यक्तियाँ हैं जिन्हें मनुष्य जाति बृहत स्तर पर समझ व महसूस कर सकती है।

सूक्ष्म स्तर पर, सभी पहाड़, नदियाँ, झीलें, समुद्र और भू-भाग जिन्हें मनुष्य पृथ्वी पर देखता है, सारे मौसम जिनका वह अनुभव करता है, पेड़-पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव और मनुष्य सहित, सारी चीज़ें जो पृथ्वी पर निवास करती हैं, सभी परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं, और परमेश्वर द्वारा नियन्त्रित की जाती हैं। परमेश्वर की संप्रभुता और नियन्त्रण के अंतर्गत, सभी चीज़ें उसके विचारों के अनुरूप अस्तित्व में आती हैं या अदृश्य हो जाती हैं; नियम बनते हैं जो उनके जीवन को संचालित करते हैं, और वे उनके अनुसार चलते हुए विकास करते हैं और निरंतर अपनी संख्या बढ़ाते हैं। कोई भी मनुष्य या चीज़ इन नियमों के ऊपर नहीं है। ऐसा क्यों है? इसका एकमात्र उत्तर है : ऐसा परमेश्वर के अधिकार की वजह से है। दूसरे शब्दों में कहें तो, परमेश्वर के विचारों और परमेश्वर के वचनों के कारण है; स्वयं परमेश्वर के कार्यों की वजह से है। अर्थात्, यह परमेश्वर का अधिकार और परमेश्वर की इच्छा है जो इन नियमों को बनाती है; जो उसके विचार के अनुसार परिवर्तित होंगे एवं बदलेंगे, ये सभी परिवर्तन और बदलाव उसकी योजना की खातिर घटित होंगे या मिट जाएंगे।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III

534. जब परमेश्वर के वचन बोले जाते हैं, तो परमेश्वर का अधिकार इस कार्य की कमान अपने हाथ में ले लेता है, और परमेश्वर के मुख से किए गए वादे का तथ्य धीरे-धीरे एक वास्तविकता बनने लगता है। नतीजतन, सभी चीजों के बीच परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं, ठीक उसी तरह जैसे बसंत के आगमन पर घास हरी हो जाती है, फूल खिल जाते हैं, पेड़ों से कलियाँ फूट जाती हैं, पक्षी गाने लगते हैं, हंस लौट आते हैं और खेत लोगों से भर जाते हैं...। बसंत के आगमन के साथ सभी चीजों का कायाकल्प हो जाता है, और यह सृष्टिकर्ता का चमत्कारपूर्ण कार्य है। जब परमेश्वर अपने वादे पूरे करता है, तो आकाश और पृथ्वी की सभी चीजें परमेश्वर के विचारों के अनुसार फिर से नई होकर बदल जाती हैं—कुछ भी नहीं छूटता। जब कोई प्रतिज्ञा या वादा परमेश्वर के मुख से उच्चरित होती है, तो सभी चीजें उसे पूरा करती और उसे पूरा करने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं; सभी प्राणी अपनी-अपनी भूमिका निभाते हुए और अपना-अपना कार्य करते हुए सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के तहत आयोजित और व्यवस्थित किए जाते हैं। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार की अभिव्यक्ति है। तुम इसमें क्या देखते हो? तुम परमेश्वर के अधिकार को कैसे जानते हो? क्या परमेश्वर के अधिकार की कोई सीमा है? क्या उसकी कोई समय-सीमा है? क्या उसे किसी निश्चित ऊँचाई या किसी निश्चित लंबाई का कहा जा सकता है? क्या उसे किसी निश्चित आकार या ताकत का कहा जा सकता है? क्या उसे मनुष्य के आयामों से मापा जा सकता है? परमेश्वर का अधिकार प्रकट-अप्रकट होता नहीं, आता-जाता नहीं, और ऐसा कोई नहीं जो यह नाप सके कि उसका अधिकार कितना महान है। चाहे परमेश्वर द्वारा किसी व्यक्ति को आशीष दिए कितना भी समय बीत जाए, वह आशीष जारी रहेगा, और उसकी निरंतरता परमेश्वर के अपरिमेय अधिकार की गवाही देगी, और मानव-जाति को बार-बार सृष्टिकर्ता की कभी न बुझने वाली जीवन-शक्ति का पुनः प्रकटन देखने देगी। उसके अधिकार का प्रत्येक प्रदर्शन उसके मुँह से निकले वचनों का पूर्ण प्रदर्शन है, जो सभी चीजों और मानव-जाति को दिखाया जाता है। इसके अलावा, उसके अधिकार द्वारा पूरी की गई हर चीज अतुलनीय रूप से उत्तम और पूरी तरह से निर्दोष होती है। कहा जा सकता है कि उसके विचार, उसके वचन, उसका अधिकार, और वह समस्त कार्य जो वह पूरा करता है, सब एक अतुलनीय रूप से सुंदर चित्र हैं, और प्राणियों के लिए, मानव-जाति की भाषा, प्राणियों के लिए उसका महत्व और मूल्य व्यक्त करने में असमर्थ है। जब परमेश्वर किसी व्यक्ति से कोई वादा करता है, तो उसके बारे में हर चीज से परमेश्वर पूरी तरह से परिचित होता है, चाहे वह यह हो कि वह व्यक्ति कहाँ रहता है, क्या करता है, वादा किए जाने से पहले या बाद की उसकी पृष्ठभूमि, या उसके जीवन-परिवेश में कितनी बड़ी उथल-पुथल रही है। परमेश्वर के वचन बोले जाने के बाद चाहे कितना भी समय बीत जाए, उसके लिए यह ऐसा होता है मानो वे अभी-अभी बोले गए हों। कहने का तात्पर्य यह है कि परमेश्वर के पास सामर्थ्य और ऐसा अधिकार है कि वह मानव-जाति से किए गए प्रत्येक वादे पर नजर रख सकता है, उसे नियंत्रित कर सकता है और उसे पूरा कर सकता है, और चाहे वादा कुछ भी हो, उसे पूरी तरह से पूरा होने में कितना भी समय लगे, और, इसके अलावा, उसका पूरा होना कितने भी व्यापक दायरे को स्पर्श करता हो—उदाहरण के लिए, समय, भूगोल, नस्ल आदि—यह वादा मुकम्मल और पूरा किया जाएगा, और, इसके अलावा, इसे मुकम्मल और पूरा करने के लिए उसे थोड़ा-सा भी प्रयास करने की आवश्यकता नहीं होगी। यह क्या साबित करता है? यह साबित करता है कि परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य का विस्तार पूरे ब्रह्मांड और पूरी मानव-जाति को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

535. मानव-जाति के विकास में आज उसके विज्ञान को फलता-फूलता कहा जा सकता है, और मनुष्य की वैज्ञानिक खोज की उपलब्धियाँ प्रभावशाली कही जा सकती हैं। कहना होगा कि मनुष्य की क्षमता लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन एक वैज्ञानिक खोज ऐसी है जिसे करने में मनुष्य असमर्थ रहा है : मनुष्य ने हवाई जहाज, विमान-वाहक और परमाणु बम बना लिए हैं, वह अंतरिक्ष में पहुँच गया है, चंद्रमा पर चला है, उसने इंटरनेट का आविष्कार किया, और एक हाई-टेक जीवन-शैली जीने लगा है, फिर भी वह एक जीवित, साँस लेने वाली चीज बनाने में असमर्थ है। हर जीवित प्राणी की सहज प्रवृत्ति और वे व्यवस्थाएँ जिनके द्वारा वे जीते हैं, और हर किस्म के जीवित प्राणियों के जीवन और मृत्यु का चक्र—ये सब मनुष्य के विज्ञान के सामर्थ्य से परे हैं और उसके द्वारा नियंत्रित नहीं किए जा सकते। इस जगह, कहना होगा कि मनुष्य के विज्ञान ने चाहे जितनी भी महान ऊँचाइयाँ प्राप्त कर ली हों, उनकी तुलना सृष्टिकर्ता के किसी भी विचार के साथ नहीं की जा सकती और वह सृष्टिकर्ता के सृजन की चमत्कारिकता और उसके अधिकार की शक्ति को समझने में असमर्थ है। पृथ्वी पर इतने सारे महासागर हैं, लेकिन उन्होंने कभी अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया और अपनी इच्छा से भूमि पर नहीं आए, और ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने उनमें से प्रत्येक के लिए सीमाएँ निर्धारित की हैं; वे वहीं ठहर गए, जहाँ ठहरने की उसने उन्हें आज्ञा दी, और परमेश्वर की अनुमति के बिना वे आजादी से यहाँ-वहाँ नहीं जा सकते। परमेश्वर की अनुमति के बिना वे एक-दूसरे का अतिक्रमण नहीं कर सकते, और केवल तभी हिल सकते हैं जब परमेश्वर हिलने को कहता है, और वे कहाँ जाएँगे और ठहरेंगे, यह परमेश्वर के अधिकार द्वारा निर्धारित किया जाता है।

साफ कहें तो, “परमेश्वर के अधिकार” का अर्थ है कि यह परमेश्वर पर निर्भर है। परमेश्वर को यह तय करने का अधिकार है कि कोई चीज कैसे करनी है, और उसे उस तरह किया जाता है, जिस तरह से वह चाहता है। सब चीजों की व्यवस्था परमेश्वर पर निर्भर है, मनुष्य पर नहीं; न ही उसे मनुष्य द्वारा बदला जा सकता है। उसे मनुष्य की इच्छा से नहीं हिलाया जा सकता, बल्कि परमेश्वर के विचारों, परमेश्वर की बुद्धि और परमेश्वर के प्रारब्ध द्वारा बदला जाता है; यह एक ऐसा तथ्य है जिससे कोई भी व्यक्ति इनकार नहीं कर सकता। स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजें, ब्रह्मांड, तारों भरा आकाश, वर्ष के चार मौसम, जो भी मनुष्य के लिए दृश्यमान और अदृश्य हैं—वे सभी थोड़ी-सी भी त्रुटि के बिना, परमेश्वर के अधिकार के तहत, परमेश्वर के प्रारब्ध के अनुसार, परमेश्वर की आज्ञाओं के मुताबिक, और सृष्टि की शुरुआत की व्यवस्थाओं के अनुसार अस्तित्व में हैं, कार्यरत हैं, और बदलते हैं। कोई भी व्यक्ति या चीज उनकी व्यवस्थाएँ नहीं बदल सकती, या वह अंतर्निहित क्रम नहीं बदल सकती जिसके द्वारा वे कार्य करते हैं; वे परमेश्वर के अधिकार के कारण अस्तित्व में आए, और परमेश्वर के अधिकार के कारण नष्ट होते हैं। यही परमेश्वर का अधिकार है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

536. अधिकार को अपने आप में परमेश्वर के सामर्थ्य के रूप में समझाया जा सकता है। पहले, यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि अधिकार और सामर्थ्य दोनों सकारात्मक हैं। उनका किसी भी नकारात्मक चीज से कोई संबंध नहीं, और वे किसी भी सृजित या गैर-सृजित प्राणियों से संबंधित नहीं हैं। परमेश्वर का सामर्थ्य जीवन और जीवन-शक्ति रखने वाले किसी भी रूप की चीजें बनाने में सक्षम है, और यह परमेश्वर के जीवन द्वारा निर्धारित किया जाता है। परमेश्वर जीवन है, इसलिए वह सभी जीवों का स्रोत है। इसके अलावा, परमेश्वर का अधिकार सभी जीवित प्राणियों से परमेश्वर के प्रत्येक वचन को समर्पण करवा सकता है, अर्थात्, उन्हें परमेश्वर के मुँह से निकले वचनों के अनुसार अस्तित्व में ला सकता है, और परमेश्वर की आज्ञा से जीने और प्रजनन करने दे सकता है, जिसके बाद परमेश्वर सभी जीवित प्राणियों पर शासन और नियंत्रण करता है, और इसमें कभी विचलन नहीं होगा, न अभी, न भविष्य में कभी। किसी व्यक्ति या वस्तु के पास ये चीजें नहीं हैं; केवल सृष्टिकर्ता के पास ही ऐसा सामर्थ्य है और वही इसे धारण करता है, इसलिए इसे अधिकार कहा जाता है। यह सृष्टिकर्ता की अद्वितीयता है। इसलिए, चाहे वह “अधिकार” शब्द हो या उस अधिकार का सार, दोनों केवल सृष्टिकर्ता के साथ जोड़े जा सकते हैं, क्योंकि ये सृष्टिकर्ता की अद्वितीय पहचान और सार के प्रतीक हैं, और सृष्टिकर्ता की पहचान और हैसियत दर्शाते हैं; सृष्टिकर्ता के अलावा, किसी व्यक्ति या चीज को “अधिकार” शब्द के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। यह सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार की व्याख्या है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

537. “मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।” ये सृष्टिकर्ता द्वारा मानव-जाति से बोले गए मूल वचन हैं। जैसे ही उसने ये वचन कहे, मनुष्य की आँखों के सामने एक इंद्रधनुष प्रकट हो गया, और वह आज तक वहीं बना हुआ है। वह इंद्रधनुष हर किसी ने देखा है, और जब तुम इसे देखते हो, तो क्या तुम जानते हो कि यह कैसा दिखता है? विज्ञान इसे साबित करने या इसके स्रोत का पता लगाने या इसका अता-पता बताने में असमर्थ है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इंद्रधनुष सृष्टिकर्ता और मनुष्य के बीच बाँधी गई वाचा का चिह्न है; इसके लिए किसी वैज्ञानिक आधार की आवश्यकता नहीं है, इसे मनुष्य ने नहीं बनाया, न ही मनुष्य इसे बदलने में सक्षम है। यह सृष्टिकर्ता द्वारा अपने वचन बोलने के बाद उसके अधिकार की निरंतरता है। सृष्टिकर्ता ने मनुष्य के साथ अपनी वाचा और अपने वादे का पालन करने के लिए अपने विशेष तरीके का उपयोग किया, और इसलिए उसके द्वारा बाँधी गई उस वाचा के चिह्न के रूप में इंद्रधनुष का उपयोग एक स्वर्गिक आदेश और व्यवस्था है, जो हमेशा अपरिवर्तित रहेगी, चाहे सृष्टिकर्ता के संबंध में हो या सृजित मानव-जाति के संबंध में। कहना होगा कि यह अपरिवर्तनीय व्यवस्था सभी चीजों के सृजन के बाद सृष्टिकर्ता के अधिकार की एक और सच्ची अभिव्यक्ति है, और यह भी कहना होगा कि सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ्य असीमित हैं; उसके द्वारा एक चिह्न के रूप में इंद्रधनुष का उपयोग सृष्टिकर्ता के अधिकार की निरंतरता और उसका विस्तार है। यह परमेश्वर द्वारा अपने वचनों का उपयोग करके किया गया एक और कार्य था, और यह उस वाचा का चिह्न था जिसे परमेश्वर ने वचनों का उपयोग करके मनुष्य के साथ बाँधा था। उसने मनुष्य को उस बारे में बताया, जिसे करने का उसने संकल्प किया था, और यह भी कि उसे किस तरीके से पूरा और हासिल किया जाएगा। इस प्रकार परमेश्वर के मुख से निकले वचनों के अनुसार मामला पूरा हुआ। केवल परमेश्वर के पास ही ऐसा सामर्थ्य है, और आज, उसके ये वचन कहे जाने के हजारों वर्ष बाद भी, मनुष्य परमेश्वर के मुख से उच्चरित इंद्रधनुष देख सकता है। परमेश्वर द्वारा कहे गए उन वचनों के कारण यह चीज आज तक अचल और अपरिवर्तित बनी हुई है। कोई इस इंद्रधनुष को हटा नहीं सकता, कोई इसकी व्यवस्थाएँ नहीं बदल सकता, और यह केवल परमेश्वर के वचनों के कारण मौजूद है। यही परमेश्वर का अधिकार है। “परमेश्वर जो कहता है उसके मायने हैं, वह जो कहता है उसे पूरा करेगा, और जो वह करता है वह हमेशा के लिए बना रहेगा।” ये वचन यहाँ स्पष्ट रूप से प्रकट होते हैं, और यह परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य का एक स्पष्ट चिह्न और विशेषता है। ऐसा चिह्न या विशेषता किसी भी सृजित प्राणी में मौजूद नहीं है या उसमें नजर नहीं आती और न ही किसी गैर-सृजित प्राणी में देखी जाती है। यह केवल अद्वितीय परमेश्वर में है, और केवल सृष्टिकर्ता में मौजूद पहचान और सार को सृजित प्राणियों की पहचान और सार से अलग करता है। साथ ही, यह एक चिह्न और विशेषता भी है जिसे स्वयं परमेश्वर के अलावा किसी भी सृजित या गैर-सृजित प्राणी द्वारा कभी लाँघा नहीं जा सकता।

परमेश्वर द्वारा मनुष्य के साथ अपनी वाचा बाँधना एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य था, ऐसा कार्य जिसका उपयोग वह मनुष्य को एक तथ्य संप्रेषित करने और उसे अपना इरादा बताने के लिए करना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने मनुष्य के साथ एक वाचा बाँधने के लिए एक विशेष चिह्न का उपयोग करते हुए एक अनोखी विधि इस्तेमाल की, एक चिह्न जो उस वाचा का वादा था जिसे उसने मनुष्य के साथ बाँधा था। तो क्या यह वाचा बाँधना एक महान घटना थी? यह कितनी महान थी? इस वाचा की खास बात यह है : यह दो आदमियों, दो समूहों या दो देशों के बीच बाँधी गई वाचा नहीं है, बल्कि सृष्टिकर्ता और पूरी मानव-जाति के बीच बाँधी गई वाचा है, और यह उस दिन तक वैध रहेगी, जब तक कि सृष्टिकर्ता सभी चीजें समाप्त नहीं कर देता। इस वाचा को बाँधने वाला सृष्टिकर्ता है, और इसे कायम रखने वाला भी सृष्टिकर्ता ही है। संक्षेप में, मानव-जाति के साथ बाँधी गई इंद्रधनुष रूपी वाचा संपूर्ण रूप से सृष्टिकर्ता और मानव-जाति के बीच हुए संवाद के अनुसार पूरी और हासिल की गई थी, जो आज तक बरकरार है। सृष्टिकर्ता के प्रति समर्पित होने, उसकी आज्ञा मानने, उस पर विश्वास करने, उसे सराहने, उसकी गवाही देने और उसकी स्तुति करने के अलावा सृजित प्राणी और क्या कर सकते हैं? क्योंकि अद्वितीय परमेश्वर के अलावा किसी और में ऐसी वाचा बाँधने का सामर्थ्य नहीं है। इंद्रधनुष का बार-बार प्रकट होना मानव-जाति के लिए एक घोषणा है और वह उसका ध्यान सृष्टिकर्ता और मानव-जाति के बीच की वाचा की ओर आकर्षित करता है। सृष्टिकर्ता और मानव-जाति के बीच की वाचा के निरंतर प्रकट होने से जो कुछ मानव-जाति को प्रदर्शित किया जाता है, वह स्वयं इंद्रधनुष या वाचा नहीं, बल्कि सृष्टिकर्ता का अपरिवर्तनीय अधिकार है। इंद्रधनुष का बार-बार प्रकट होना, छिपे हुए स्थानों में सृष्टिकर्ता के जबरदस्त और चमत्कारपूर्ण कर्म प्रदर्शित करता है, और साथ ही, यह सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक महत्वपूर्ण प्रतिबिंब है जो कभी मिटेगा नहीं, और न कभी बदलेगा। क्या यह सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार के एक दूसरे पहलू का प्रदर्शन नहीं है?

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

538. उत्पत्ति 18:18 में “अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी” पढ़ने के बाद क्या तुम लोग परमेश्वर का अधिकार महसूस कर सकते हो? क्या तुम सृष्टिकर्ता की असाधारणता अनुभव कर सकते हो? क्या तुम सृष्टिकर्ता की सर्वोच्चता अनुभव कर सकते हो? परमेश्वर के वचन पक्के हैं। परमेश्वर ऐसे वचन सफलता में विश्वास होने के कारण या उसे दर्शाने के लिए नहीं कहता; बल्कि वे परमेश्वर के कथनों के अधिकार के प्रमाण हैं, और एक आज्ञा हैं जो परमेश्वर के कथन पूरे करती है। यहाँ दो अभिव्यक्तियाँ हैं, जिन पर तुम लोगों को ध्यान देना चाहिए। जब परमेश्वर कहता है, “अब्राहम से तो निश्‍चय एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, और पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी,” तो क्या इन वचनों में अस्पष्टता का कोई तत्त्व है? क्या चिंता का कोई तत्त्व है? क्या डर का कोई तत्त्व है? परमेश्वर के कथनों में “निश्चय उपजेगी” और “आशीष पाएँगी” शब्दों के कारण ये तत्त्व, जो मनुष्य में विशेष रूप से होते हैं और अक्सर उसमें प्रदर्शित होते हैं, इनका सृष्टिकर्ता से कभी कोई संबंध नहीं रहा है। दूसरों के लिए शुभ कामना करते हुए कोई भी ऐसे शब्दों का उपयोग करने की हिम्मत नहीं करेगा, कोई भी दूसरे को ऐसी निश्चितता के साथ आशीष देने की हिम्मत नहीं करेगा कि उससे एक बड़ी और सामर्थी जाति उपजेगी, या यह वादा नहीं करेगा कि पृथ्वी की सारी जातियाँ उसके द्वारा आशीष पाएँगी। परमेश्वर के वचन जितने ज्यादा निश्चित होते हैं, उतना ही ज्यादा वे कुछ साबित करते हैं—और वह कुछ क्या है? वे साबित करते हैं कि परमेश्वर के पास ऐसा अधिकार है कि उसका अधिकार ये चीजें पूरी कर सकता है, और कि उनका पूरा होना अपरिहार्य है। परमेश्वर ने अब्राहम को जो आशीष दिए थे, उन सबके बारे में वह अपने हृदय में, बिना किसी झिझक के निश्चित था। इसके अलावा, यह उसके वचनों के अनुसार समग्र रूप से पूरा किया जाएगा, और कोई भी ताकत इसके पूरा होने को बदलने, बाधित करने, बिगाड़ने या अवरुद्ध करने में सक्षम नहीं होगी। चाहे और कुछ भी हो जाए, कुछ भी परमेश्वर के वचनों के पूरा और साकार होने को निरस्त या प्रभावित नहीं कर सकता। यह सृष्टिकर्ता के मुख से निकले वचनों का ही सामर्थ्य और सृष्टिकर्ता का अधिकार है, जो मनुष्य का इनकार सहन नहीं करता! इन वचनों को पढ़ने के बाद, क्या तुम्हें अभी भी संदेह है? ये वचन परमेश्वर के मुख से निकले थे, और परमेश्वर के वचनों में सामर्थ्य, प्रताप और अधिकार है। ऐसी शक्ति और अधिकार, और तथ्य के पूरा होने की अनिवार्यता, किसी सृजित या गैर-सृजित प्राणी द्वारा अप्राप्य है, और कोई सृजित या गैर-सृजित प्राणी इससे आगे नहीं निकल सकता। केवल सृष्टिकर्ता ही मानव-जाति के साथ ऐसे लहजे और स्वर में बात कर सकता है, और तथ्यों ने यह साबित कर दिया है कि उसके वादे खोखले वचन या बेकार की डींग नहीं होते, बल्कि अद्वितीय अधिकार की अभिव्यक्ति होते हैं, जिससे श्रेष्ठ कोई भी व्यक्ति, घटना या चीज नहीं हो सकती।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

539. जब परमेश्वर ने कहा, “मैं तेरे वंश को अनगिनत करूँगा,” तो यह एक वाचा थी, जिसे परमेश्वर ने अब्राहम के साथ बाँधा था, और इंद्रधनुष की वाचा की तरह, यह अनंत काल तक पूरी की जाएगी, और यह परमेश्वर द्वारा अब्राहम से किया गया एक वादा भी था। केवल परमेश्वर ही इस वादे को पूरा करने के काबिल और सक्षम है। मनुष्य इस पर विश्वास करे या न करे, मनुष्य इसे स्वीकार करे या न करे, और मनुष्य इसे जैसे चाहे देखे और समझे, यह सब परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों के अनुसार हूबहू पूरा किया जाएगा। परमेश्वर के वचन मनुष्य की इच्छा या धारणाओं में परिवर्तन के कारण बदले नहीं जाएँगे, और वे किसी व्यक्ति, घटना या चीज में परिवर्तन के कारण भी नहीं बदले जाएँगे। सभी चीजें गायब हो सकती हैं, लेकिन परमेश्वर के वचन हमेशा रहेंगे। वास्तव में, जिस दिन सभी चीजें गायब होती हैं, ठीक वही दिन परमेश्वर के वचनों के पूरी तरह से साकार होने का दिन होता है, क्योंकि वह सृष्टिकर्ता है, उसके पास सृष्टिकर्ता का अधिकार, सृष्टिकर्ता का सामर्थ्य है, और वह सभी चीजों और समस्त जीवन-शक्ति को नियंत्रित करता है; वह शून्य में से कोई चीज प्रकट करवा सकता है या किसी चीज को शून्य बना सकता है, और वह सभी चीजों के जीवित से मृत में रूपांतरण को नियंत्रित करता है; परमेश्वर के लिए वंशजों की वृद्धि करने से आसान कुछ भी नहीं हो सकता। यह मनुष्य को किसी परी-कथा की तरह काल्पनिक लगता है, लेकिन परमेश्वर के लिए, जो वह तय करता है और जो करने का वादा करता है, वह काल्पनिक नहीं है, न ही वह कोई परी-कथा है। बल्कि, वह एक तथ्य है जिसे परमेश्वर पहले ही देख चुका है, और जो निश्चित रूप से पूरा होगा। क्या तुम लोग इसे समझते हो? क्या तथ्य साबित करते हैं कि अब्राहम के वंशज असंख्य थे? वे कितने असंख्य थे? क्या वे “आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान” असंख्य थे, जैसा परमेश्वर ने कहा था? क्या वे सभी जाति-समूहों और क्षेत्रों में, दुनिया के हर स्थान पर फैल गए थे? यह तथ्य किसके माध्यम से पूरा हुआ? क्या यह परमेश्वर के वचनों के अधिकार द्वारा पूरा हुआ? परमेश्वर के वचनों के बोले जाने के बाद सैकड़ों-हजारों वर्षों तक परमेश्वर के वचन पूरे होते रहे और लगातार तथ्य बनते रहे; यह परमेश्वर के वचनों की शक्ति है, और परमेश्वर के अधिकार का प्रमाण है। जब परमेश्वर ने शुरुआत में सभी चीजें बनाईं, तो परमेश्वर ने कहा “उजियाला हो,” और उजियाला हो गया। यह बहुत जल्दी हो गया, बहुत कम समय में पूरा हो गया, और इसकी प्राप्ति और पूर्ति में कोई देरी नहीं हुई; परमेश्वर के वचनों का प्रभाव तत्काल हुआ। दोनों ही परमेश्वर के अधिकार का प्रदर्शन थे, लेकिन जब परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दिया, तो उसने मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार के सार का दूसरा पक्ष दिखाया, और यह तथ्य भी कि सृष्टिकर्ता का अधिकार गणना से परे है, और इसके अलावा, उसने मनुष्य को सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक ज्यादा व्यावहारिक, ज्यादा उत्तम पक्ष दिखाया।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

540. अब्राहम और अय्यूब को आशीष देने के बाद परमेश्वर वहीं नहीं रहा जहाँ वह था, न ही उसने अपने दूतों को काम पर लगाकर यह देखने का इंतजार किया कि परिणाम क्या होगा। इसके विपरीत, जैसे ही परमेश्वर ने अपने वचनों का उच्चारण किया, परमेश्वर के अधिकार के मार्गदर्शन में सभी चीजें उस कार्य का अनुपालन करने लगीं जिसे परमेश्वर करना चाहता था, और वे लोग, चीजें और पदार्थ तैयार हो गए, जिनकी परमेश्वर को आवश्यकता थी। कहने का तात्पर्य यह है कि, जैसे ही परमेश्वर के मुख से वचन निकले, परमेश्वर का अधिकार पूरी पृथ्वी पर लागू होना शुरू हो गया, और उसने अब्राहम और अय्यूब से किए गए वादे पूरे करने के लिए एक क्रम निर्धारित कर दिया, और हर कदम और प्रत्येक महत्वपूर्ण चरण, जिन्हें पूरा करने की उसने योजना बनाई थी, उनके लिए जो कुछ आवश्यक था, उस सबके लिए सभी उचित योजनाएँ भी बनाईं और तैयारियाँ भी कीं। इस दौरान परमेश्वर ने न केवल अपने दूतों का, बल्कि उन सभी चीजों का भी इस्तेमाल किया, जो उसके द्वारा बनाई गई थीं। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस दायरे में परमेश्वर के अधिकार का उपयोग किया गया था, उसमें न केवल दूत शामिल थे, बल्कि सृष्टि की सभी चीजें शामिल थीं, जिन्हें वह कार्य पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया गया था, जिसे वह पूरा करना चाहता था; ये वे विशिष्ट तरीके थे, जिनसे परमेश्वर के अधिकार का प्रयोग किया गया था। अपनी कल्पनाओं में कुछ लोगों की परमेश्वर के अधिकार की निम्नलिखित समझ हो सकती है : परमेश्वर के पास अधिकार है, और परमेश्वर के पास सामर्थ्य है, इसलिए परमेश्वर को केवल तीसरे स्वर्ग में या किसी निश्चित स्थान पर रहने की आवश्यकता है, और उसे कोई विशेष कार्य करने की आवश्यकता नहीं है, और परमेश्वर का संपूर्ण कार्य उसके विचारों में पूरा होता है। कुछ लोग यह भी मान सकते हैं कि, हालाँकि परमेश्वर ने अब्राहम को आशीष दिया, लेकिन परमेश्वर को कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं थी, और उसके लिए केवल अपने वचन बोलना ही पर्याप्त था। क्या सच में ऐसा ही हुआ? स्पष्ट रूप से नहीं! हालाँकि परमेश्वर के पास अधिकार और सामर्थ्य है, लेकिन उसका अधिकार सच्चा और वास्तविक है, खोखला नहीं। परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य की प्रामाणिकता और वास्तविकता धीरे-धीरे उसके द्वारा सभी चीजों के सृजन में, सभी चीजों पर उसके नियंत्रण में, और उस प्रक्रिया में जिसके द्वारा वह मानव-जाति का नेतृत्व और प्रबंधन करता है, प्रकट और मूर्त होती हैं। मानव-जाति और सभी चीजों पर परमेश्वर की संप्रभुता का हर तरीका, हर दृष्टिकोण और हर विवरण, और वह सब कार्य जो उसने पूरा किया है, साथ ही सभी चीजों के बारे में उसकी समझ—ये सभी अक्षरशः साबित करते हैं कि परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य खोखले शब्द नहीं हैं। उसका अधिकार और सामर्थ्य लगातार और सभी चीजों में प्रदर्शित और प्रकट होता है। ये अभिव्यक्तियाँ और प्रकटन परमेश्वर के अधिकार के वास्तविक अस्तित्व के बारे में बताते हैं, क्योंकि वह अपने अधिकार और सामर्थ्य का उपयोग अपना कार्य जारी रखने, सभी चीजों को नियंत्रित करने और हर क्षण सभी चीजों पर शासन करने के लिए कर रहा है; उसका सामर्थ्य और अधिकार न तो स्वर्गदूतों द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सकता है, न ही परमेश्वर के दूतों द्वारा। परमेश्वर ने तय किया कि वह अब्राहम और अय्यूब को क्या आशीष देगा—यह परमेश्वर का निर्णय था। भले ही परमेश्वर के दूत व्यक्तिगत रूप से अब्राहम और अय्यूब के पास गए थे, लेकिन उनके कार्य परमेश्वर की आज्ञाओं पर आधारित थे, और उनके कार्य परमेश्वर के अधिकार के तहत किए गए थे और इस तरह, दूत परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन थे। हालाँकि मनुष्य परमेश्वर के दूतों को अब्राहम के पास जाते देखता है, और बाइबल के अभिलेखों में यहोवा परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से कुछ भी करते नहीं देखता, किंतु असल में, वह केवल स्वयं परमेश्वर ही है, जो वास्तव में सामर्थ्य और अधिकार का उपयोग करता है, और वह किसी व्यक्ति की ओर से कोई संदेह बरदाश्त नहीं करता! हालाँकि तुमने देखा है कि स्वर्गदूतों और दूतों में बहुत सामर्थ्य है और उन्होंने चमत्कार किए हैं, या उन्होंने परमेश्वर द्वारा आदेशित कुछ काम किए हैं, लेकिन उनके कार्य केवल परमेश्वर का आदेश पूरा करने के लिए हैं, और वे किसी भी तरह से परमेश्वर के अधिकार का प्रदर्शन नहीं हैं—क्योंकि किसी भी मनुष्य या चीज के पास सभी चीजों की रचना करने और सभी चीजों पर शासन करने का सृष्टिकर्ता का अधिकार नहीं है। इसलिए, कोई भी मनुष्य या चीज सृष्टिकर्ता के अधिकार का प्रयोग या प्रदर्शन नहीं कर सकता।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

541. क्या अपनी पहचान साबित करने के लिए परमेश्वर कुछ कर सकता था? परमेश्वर के लिए यह एक आसान बात थी—बच्चों का खेल था। वह अपनी पहचान और सार साबित करने के लिए कहीं भी, किसी भी समय कुछ कर सकता था, परंतु चीज़ों को करने का परमेश्वर का अपना तरीका था—वह हर चीज़ एक योजना के साथ और चरणों में करता था। उसने चीज़ों को विवेकहीनता से नहीं किया; मनुष्य को दिखाने हेतु कुछ करने के लिए सही समय और सही अवसर का इंतज़ार किया, कुछ ऐसा जो अर्थपूर्ण हो। इस तरह उसने अपना अधिकार और अपनी पहचान प्रमाणित की। तो क्या तब लाज़र का फिर से जी उठना प्रभु यीशु की पहचान प्रमाणित कर पाया? आओ, पवित्रशास्त्र के इस अंश को देखें : “और यह कहकर, उसने बड़े शब्द से पुकारा, हे लाज़र, निकल आ! जो मर गया था निकल आया...।” जब प्रभु यीशु ने ऐसा किया, तो उसने बस एक बात कही : “हे लाज़र, निकल आ!” तब लाजर अपनी क़ब्र से बाहर निकल आया—यह प्रभु द्वारा बोले गए कुछ वचनों के कारण संपन्न हुआ था। इस दौरान प्रभु यीशु ने न तो कोई वेदी स्थापित की, न ही उसने कोई अन्य गतिविधि की। उसने बस यह एक बात कही। इसे कोई चमत्कार कहा जाना चाहिए या आज्ञा? या यह किसी प्रकार की जादूगरी थी? सतही तौर पर, ऐसा प्रतीत होता है कि इसे एक चमत्कार कहा जा सकता है, और यदि तुम इसे आधुनिक परिप्रेक्ष्य से देखो, तो निस्संदेह तुम तब भी इसे एक चमत्कार ही कह सकते हो। किंतु इसे किसी मृत आत्मा को वापस बुलाने का जादू निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता, और यह किसी तरह की जादूगरी तो बिल्कुल भी नहीं थी। यह कहना सही है कि यह चमत्कार सृजनकर्ता के अधिकार का अत्यधिक सामान्य, छोटा-सा प्रदर्शन था। यह परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य है। परमेश्वर के पास किसी व्यक्ति को मारने, उसकी आत्मा उसके शरीर से निकालने और अधोलोक में या जहाँ भी उसे जाना चाहिए, भेजने का अधिकार है। कोई कब मरता है और मृत्यु के बाद कहाँ जाता है—यह परमेश्वर द्वारा निर्धारित किया जाता है। वह ये निर्णय किसी भी समय और कहीं भी कर सकता है, वह मनुष्यों, घटनाओं, वस्तुओं, स्थान या भूगोल द्वारा विवश नहीं होता। यदि वह इसे करना चाहता है, तो वह इसे कर सकता है, क्योंकि सभी चीज़ें और जीवित प्राणी उसके शासन के अधीन हैं, और सभी चीज़ें उसके वचन और अधिकार द्वारा जन्म लेती हैं, जीती हैं और नष्ट हो जाती हैं। वह किसी मृत व्यक्ति को पुनर्जीवित कर सकता है, और यह भी वह किसी भी समय, कहीं भी कर सकता है। यह वह अधिकार है, जो केवल सृजनकर्ता के पास है।

प्रभु यीशु ने लाजरस को पुनर्जीवित करने का कार्य किया और उसका उद्देश्य मनुष्यों और शैतान के देखने के लिए प्रमाण देना और मनुष्य और शैतान को यह ज्ञात करवाना था कि मानवजाति से संबंधित सभी चीजेंचीजें, मानवजाति का जीवन और उसकी मृत्यु परमेश्वर द्वारा निर्धारित की जाती हैं और भले ही परमेश्वर देहधारी हो गया था, फिर भी इस भौतिक दुनिया का, जिसे देखा जा सकता है, और साथ ही आध्यात्मिक लोक का भी, जिसे मनुष्य नहीं देख सकते, वही नियंत्रक था। यह इसलिए था ताकि मनुष्य और शैतान जान लें कि मानवजाति से संबंधित कुछ भी शैतान के नियंत्रण में नहीं है। यह परमेश्वर के अधिकार का प्रकाशन और प्रदर्शन था, और यह सभी चीजों को यह संदेश देने का परमेश्वर का एक तरीका भी था कि मानवजाति का जीवन और मृत्यु परमेश्वर के हाथों में है। प्रभु यीशु द्वारा लाजरस को पुनर्जीवित किया जाना मानवजाति को शिक्षा और निर्देश देने का सृष्टिकर्ता का एक तरीका था। यह एक ठोस कार्य था, जिसमें उसने मानवजाति को निर्देश और पोषण प्रदान करने के लिए अपने सामर्थ्य और अधिकार का उपयोग किया था। यह सृष्टिकर्ता द्वारा बिना वचनों का इस्तेमाल किए मानवजाति को यह सच्चाई दिखाने का एक तरीका था कि वह सभी चीजों का नियंत्रक है। यह उसके द्वारा व्यावहारिक कार्यों के माध्यम से मानवजाति को यह बताने का एक तरीका था कि उसके माध्यम से मिलने वाले उद्धार के अलावा कोई उद्धार नहीं है। मानवजाति को निर्देश देने के लिए उसके द्वारा प्रयुक्त यह मूक उपाय चिरस्थायी, अमिट और मनुष्य के हृदय को एक ऐसा आघात और प्रबुद्धता देने वाला है, जो कभी फीके नहीं पड़ सकते। लाजरस को पुनर्जीवित करने के कार्य ने परमेश्वर को महिमामंडित किया—इसका परमेश्वर के प्रत्येक अनुयायी पर एक गहरा प्रभाव पड़ा है। यह हर उस व्यक्ति में, जो इस घटना को गहराई से समझता है, यह समझ और दर्शन मज़बूती से जमा देता है कि केवल परमेश्वर ही मानवजाति के जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण कर सकता है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III

542. जिस क्षण तुम रोते हुए इस दुनिया में आते हो उसी पल से तुम अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना शुरू कर देते हो। परमेश्वर की योजना और उसके विधान की खातिर तुम अपनी भूमिका निभाते हो और अपनी जीवन यात्रा शुरू करते हो। तुम्हारी पृष्ठभूमि जो भी हो और तुम्हारी आगे की यात्रा जैसी भी हो, किसी भी स्थिति में कोई भी स्वर्ग के आयोजनों और व्यवस्थाओं से बच नहीं सकता और कोई भी अपनी नियति को नियंत्रित नहीं कर सकता, क्योंकि जो सभी चीजों का संप्रभु है सिर्फ वही ऐसा करने में सक्षम है। मनुष्य के अस्तित्व में आने की शुरुआत से ही परमेश्वर अपने कार्य को हमेशा से इसी ढंग से करता आ रहा है, ब्रह्मांड को सँभाल रहा है और सभी चीजों के लिए परिवर्तन के नियमों और उनकी गतिविधियों के पथ को संचालित कर रहा है। सभी चीजों की तरह मनुष्य भी चुपचाप और अनजाने में परमेश्वर से मिठास और बारिश और ओस से पोषित हो रहा है; सभी चीजों की तरह मनुष्य भी अनजाने में परमेश्वर के हाथ के आयोजन के अधीन रहता है। मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर की मुट्ठी में होते हैं और उसके जीवन की हर चीज परमेश्वर की दृष्टि में रहती है। चाहे तुम यह सब मानो या न मानो, एक-एक चीज चाहे वह सजीव हो या मृत, वह परमेश्वर के विचारों के अनुसार ही हटेगी, बदलेगी, नई बनेगी और अलोप होगी। परमेश्वर इसी तरह सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है

543. यदि किसी व्यक्ति का जन्म उसके पिछले जीवन से नियत था, तो उसकी मृत्यु उस नियति के अंत को चिह्नित करती है। यदि किसी का जन्म इस जीवन में उसके मिशन की शुरुआत है, तो उसकी मृत्यु उसके उस मिशन के अंत को चिह्नित करती है। चूँकि सृष्टिकर्ता ने प्रत्येक व्यक्ति के जन्म के लिए परिस्थितियों का एक निश्चित समुच्चय तय किया है, तो यह तय है कि उसने उसकी मृत्यु के लिए भी परिस्थितियों के एक निश्चित समुच्चय की व्यवस्था की है। दूसरे शब्दों में, कोई भी व्यक्ति संयोग से पैदा नहीं होता है, किसी भी व्यक्ति की मृत्यु अकस्मात नहीं होती है और जन्म-मरण दोनों ही अनिवार्य रूप से उसके पिछले और वर्तमान जीवन से जुड़े हैं। किसी व्यक्ति के जन्म की परिस्थितियाँ कैसी हैं और उसकी मृत्यु की परिस्थितियाँ कैसी हैं, इनका संबंध सृष्टिकर्ता के पूर्वनिर्धारणों से है; यह व्यक्ति की नियति है, व्यक्ति का भाग्य है। चूँकि किसी व्यक्ति के जन्म के बारे में बहुत सारी व्याख्याएँ होती हैं, इसलिए उसकी मृत्यु के लिए भी अनिवार्य रूप से विभिन्न विशेष परिस्थितियाँ होनी चाहिए। इस तरह मानवजाति में लोगों के अलग-अलग जीवनकाल और मृत्यु के अलग-अलग तरीके और समय होते हैं। कुछ लोग ताकतवर और स्वस्थ होते हैं, फिर भी जल्दी मर जाते हैं; कुछ लोग कमजोर और बीमार होते हैं, फिर भी बूढ़े होने तक जीते रहते हैं और बिना कोई कष्ट पाए मर जाते हैं। कुछ की मृत्यु अस्वाभाविक कारणों से होती है और कुछ की मृत्यु स्वाभाविक कारणों से होती है। कुछ की मृत्यु अपने घर से दूर होती है, कुछ अपने प्रियजनों के साथ उनके सान्निध्य में आखिरी साँस लेते हैं। कुछ आसमान में मरते हैं, कुछ धरती के नीचे। कुछ पानी में डूब जाते हैं, कुछ आपदाओं में नष्ट हो जाते हैं। कुछ सुबह मरते हैं, कुछ रात्रि में। ... हर कोई एक शानदार जन्म, एक बहुत बढ़िया जीवन और एक गौरवशाली मृत्यु की कामना करता है, परन्तु कोई भी व्यक्ति अपनी नियति से परे नहीं जा सकता है, कोई भी सृष्टिकर्ता की संप्रभुता से बचकर नहीं निकल सकता है। यह मनुष्य का भाग्य है। लोगअपने भविष्य के लिए तमाम तरह की योजनाएँ बना सकते हैं, लेकिन कोई भी यह योजना नहीं बना सकता कि वह कैसे पैदा होगा या संसार से उसके जाने का तरीका और समय क्या होगा। यूँ तो सभी लोग मृत्यु को आने से टालने और रोकने की भरसक कोशिश करते हैं, फिर भी उन्हें भनक लगे बिना मृत्यु चुपचाप पास आ जाती है। कोई नहीं जानता है कि वह कब या कैसे मरेगा और यह तो बिल्कुल भी नहीं जानता कि वह कहाँ मरेगा। जाहिर है, जीवन-मृत्यु को लेकर सर्वोच्च शक्ति न तो मनुष्य के हाथ में है, न ही प्राकृतिक संसार में किसी जीवित प्राणी के हाथ में, बल्कि यह सृष्टिकर्ता के हाथ में है जो अद्वितीय अधिकार संपन्न है। मनुष्य का जीवन-मरण प्राकृतिक संसार के किन्हीं नियमों का परिणाम नहीं है, बल्कि सृष्टिकर्ता के अधिकार की संप्रभुता का परिणाम है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III

544. परमेश्वर के अधिकार के अधीन, प्रत्येक व्यक्ति सक्रिय या निष्क्रिय रूप से उसकी संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को स्वीकार करता है, और चाहे कोई व्यक्ति अपने जीवन के दौरान कैसे भी संघर्ष क्यों न करता हो, भले ही वह कितने ही टेढ़े-मेढ़े पथों पर क्यों न चलता हो, अंत में वह सृजनकर्ता के द्वारा उसके लिए निर्धारित भाग्य के परिक्रमा-पथ पर वापस लौट आएगा। यह सृजनकर्ता के अधिकार की अजेयता है, और इसी तरह उसका अधिकार ब्रह्मांड पर नियंत्रण करता और उसे संचालित करता है। यही अजेयता, इस तरह का नियंत्रण और संचालन उन नियमों के लिए उत्तरदायी है जो सभी चीज़ों के जीवन का निर्धारण करते हैं, जो मनुष्यों को बिना किसी हस्तक्षेप के बार-बार पुनर्जन्म लेने देते हैं, जो इस संसार को नियमित रूप से चलाते और दिन प्रतिदिन, साल दर साल, आगे बढ़ाते रहते हैं। तुम लोगों ने इन सभी तथ्यों को देखा है और, चाहे सतही तौर पर समझो या गहराई से, तुम लोग उन्हें समझते हो; तुम लोगों की समझ की गहराई सत्य के बारे में तुम लोगों के अनुभव और ज्ञान पर, और परमेश्वर के बारे में तुम लोगों के ज्ञान पर निर्भर करती है। तुम सत्य वास्तविकता को कितनी अच्छी तरह से जानते हो, तुम्हारे पास परमेश्वर के वचनों का कितना अनुभव है, तुम परमेश्वर के सार और उसके स्वभाव को कितनी अच्छी तरह से जानते हो—ये सब चीजें परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं के बारे में तुम्हारी समझ की गहराई को प्रदर्शित करती हैं। क्या परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाएँ इस बात पर निर्भर करती हैं कि मनुष्य उसके प्रति समर्पण करता है या नहीं? क्या यह तथ्य कि परमेश्वर इस अधिकार को धारण करता है, इस बात के द्वारा निर्धारित होता है कि मानवजाति उसके प्रति समर्पण करती है या नहीं? परिस्थितियाँ चाहे जो भी हों परमेश्वर का अधिकार अस्तित्व में रहता है। समस्त परिस्थितियों में परमेश्वर अपने विचारों, और अपनी इच्छाओं के अनुरूप प्रत्येक मनुष्य के भाग्य और सभी चीज़ों पर नियंत्रण और उनकी व्यवस्था करता है। यह मनुष्यों के बदलने की वजह से नहीं बदलेगा; और यह मनुष्य की इच्छा से स्वतंत्र है, और समय, स्थान, और भूगोल में होने वाले किन्ही भी परिवर्तनों द्वारा इसे नहीं बदला जा सकता है, क्योंकि परमेश्वर का अधिकार उसका सार ही है। चाहे मनुष्य परमेश्वर की संप्रभुता को जानने और स्वीकार करने में समर्थ हो या न हो, और चाहे मनुष्य इसके प्रति समर्पण करने में समर्थ हो या न हो, यह मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता के सच को जरा-सा भी नहीं बदलता है। अर्थात्, परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति मनुष्य भले ही कोई भी दृष्टिकोण क्यों न रखे, यह इस सच को नहीं बदल सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के भाग्य और सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है। चाहे तुम परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पण न भी करो, तब भी वह तुम्हारे भाग्य को नियंत्रित करता है; चाहे तुम उसकी संप्रभुता को न भी जान सको, फिर भी उसका अधिकार अस्तित्व में रहता है। परमेश्वर का अधिकार और मनुष्य के भाग्य पर उसकी संप्रभुता मनुष्य की इच्छा से स्वतंत्र हैं, और मनुष्य की प्राथमिकताओं और पसंद के अनुसार बदलते नहीं हैं। परमेश्वर का अधिकार हर घण्टे, और हर एक क्षण पर हर जगह है। स्वर्ग और पृथ्वी समाप्त हो जाएँगे, पर उसका अधिकार कभी समाप्त नहीं होगा, क्योंकि वह स्वयं परमेश्वर है, उसके पास अद्वितीय अधिकार है, और उसका अधिकार लोगों, घटनाओं या चीजों के द्वारा, समय या भूगोल के द्वारा प्रतिबन्धित या सीमित नहीं होता है। परमेश्वर हमेशा अपने अधिकार को काम में लाता है, अपनी ताक़त दिखाता है, हमेशा की तरह अपने प्रबंधन-कार्य को करता रहता है; वह हमेशा सभी चीजों पर शासन करता है, सभी चीजों का भरण-पोषण करता है, और सभी चीजों का आयोजन करता है—ठीक वैसे ही जैसे उसने हमेशा से किया है। इसे कोई नहीं बदल सकता है। यह एक सच्चाई है; यह चिरकाल से अपरिवर्तनीय सत्य है!

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III

545. परमेश्वर के अधिकार से संबंधित सत्य ऐसे सत्य हैं जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति को गंभीरता से लेना चाहिए, अपने हृदय से अनुभव करना और समझना चाहिए; क्योंकि ये सत्य प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करते हैं; प्रत्येक व्यक्ति के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर इनका प्रभाव पड़ता है, उन महत्वपूर्ण मोड़ों को प्रभावित करते हैं जिनसे प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में अवश्य गुज़रना है, परमेश्वर की संप्रभुता के मनुष्य के ज्ञान पर और उस दृष्टिकोण पर प्रभाव पड़ता है, जिसके साथ उसे परमेश्वर के अधिकार का सामना करना चाहिए, और स्वाभाविक ही है कि प्रत्येक व्यक्ति के अंतिम गंतव्य पर प्रभाव पड़ता है। इसलिए उन्हें जानने और समझने के लिए जीवन भर की ऊर्जा लगती है। जब तुम परमेश्वर के अधिकार को पूरे विश्वास से देखोगे, जब तुम परमेश्वर की संप्रभुता को स्वीकार करोगे, तब तुम परमेश्वर के अधिकार के अस्तित्व के सत्य को धीरे-धीरे जानने और समझने लगोगे। किन्तु यदि तुम परमेश्वर के अधिकार को कभी नहीं पहचान पाते हो, और कभी भी उसकी संप्रभुता को स्वीकार नहीं करते हो, तब चाहे तुम कितने ही वर्ष क्यों न जीवित रहो, तुम परमेश्वर की संप्रभुता का थोड़ा-सा भी ज्ञान प्राप्त नहीं करोगे। यदि तुम सचमुच परमेश्वर के अधिकार को जानते और समझते नहीं हो, तो जब तुम मार्ग के अंत में पहुँचोगे, तो भले ही तुमने वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास किया हो, तुम्हारे पास अपने जीवन में दिखाने के लिए कुछ नहीं होगा, और स्वाभाविक रूप से मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता के बारे में तुम्हारे पास थोड़ा-भी ज्ञान नहीं होगा। क्या यह बहुत ही दुःखदायी बात नहीं है? इसलिए, तुम जीवन में चाहे कितनी ही दूर तक क्यों न चले हो, तुम अब चाहे कितने ही वृद्ध क्यों न हो गए हो, तुम्हारी शेष यात्रा चाहे कितनी ही लंबी क्यों न हो, पहले तुम्हें परमेश्वर के अधिकार को पहचानना होगा और उसे गंभीरतापूर्वक लेना होगा, और इस सच को स्वीकार करना होगा कि परमेश्वर तुम्हारा अद्वितीय संप्रभु है। मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता से संबंधित इन सत्यों का स्पष्ट और सटीक ज्ञान और समझ प्राप्त करना सभी के लिए एक अनिवार्य सबक है; मानव जीवन को जानने और सत्य को प्राप्त करने की एक कुंजी है। यह परमेश्वर को जानने का जीवन और बुनियादी सबक भी है जिसका सभी को हर दिन सामना करना होगा, और इससे कोई बच नहीं सकता है। यदि तुममें से कोई इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए छोटा मार्ग लेना चाहता है, तो मैं अब तुमसे कहता हूँ, कि यह असंभव है! यदि तुम परमेश्वर की संप्रभुता से बच निकलना चाहते हो, तो यह और भी अधिक असंभव है! परमेश्वर ही मनुष्य का एकमात्र प्रभु है, परमेश्वर ही मनुष्य के भाग्य का एकमात्र संप्रभु है, और इसलिए मनुष्य के लिए अपनी नियति पर संप्रभु होना असंभव है, और उससे बाहर निकलना असंभव है। किसी व्यक्ति की योग्यताएँ चाहे कितनी ही असाधारण क्यों न हों, वह दूसरों के भाग्य को प्रभावित नहीं कर सकता है, दूसरों के भाग्य को आयोजित, व्यवस्थित, नियंत्रित, या परिवर्तित तो बिल्कुल नहीं कर सकता है। केवल खुद अद्वितीय परमेश्वर ही मनुष्य के बारे में सभी चीजों पर संप्रभु है। क्योंकि केवल खुद अद्वितीय परमेश्वर ही वह अद्वितीय अधिकार धारण करता है जो मनुष्य के भाग्य पर संप्रभुता रखता है, केवल सृजनकर्ता ही मनुष्य का अद्वितीय संप्रभु है। परमेश्वर का अधिकार न केवल सृजित की गई मानवजाति के ऊपर, बल्कि मनुष्यों को दिखाई न देने वाले अनसृजे प्राणियों, के ऊपर तारों के ऊपर, और ब्रह्माण्ड के ऊपर संप्रभुता रखता है। यह एक निर्विवाद सच है, ऐसा सच जो वास्तव में विद्यमान है, जिसे कोई मनुष्य या चीज़ बदल नहीं सकती है। यह मानते हुए कि तुम्हारे पास कुछ विशेष कौशल या योग्यता है, और अभी भी यह सोचते हुए कि आकस्मिक भाग्योदय से तुम अपनी वर्तमान परिस्थितियों को बदल सकते हो या उनसे बच निकल सकते हो; चीज़ें जैसी हैं, उनसे तुममें से कोई अभी भी असंतुष्ट है; यदि तुम मानवीय प्रयासों के माध्यम से अपने भाग्य को बदलने का, और उसके द्वारा दूसरों से विशिष्ट दिखाई देने, और परिणामस्वरूप प्रसिद्धि और सौभाग्य अर्जित करने का प्रयास करते हो; तो मैं तुमसे कहता हूँ, कि तुम अपने लिए चीज़ों को कठिन बना रहे हो, तुम केवल समस्याओं को आमंत्रित कर रहे हो, तुम अपनी ही कब्र खोद रहे हो! देर-सवेर, एक दिन, तुम यह जान जाओगे कि तुमने ग़लत चुनाव किया है, और तुम्हारे प्रयास व्यर्थ हो गए हैं। तुम्हारी महत्वाकांक्षाएँ, भाग्य के विरुद्ध लड़ने की तुम्हारी इच्छाएँ, और तुम्हारा स्वयं का बेहद खराब आचरण, तुम्हें ऐसे मार्ग में ले जाएगा जहाँ से कोई वापसी नहीं है, और इसके लिए तुम्हें एक भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। हालाँकि, इस समय तुम्हें परिणाम की गंभीरता दिखाई नहीं देती, किन्तु जैसे-जैसे तुम और भी अधिक गहराई से उस सत्य का अनुभव और सराहना करोगे कि परमेश्वर मनुष्य के भाग्य का संप्रभु है, तो जिसके बारे में आज मैं बात कर रहा हूँ उसके बारे में और उसके वास्तविक निहितार्थों को तुम धीरे-धीरे समझने लगोगे। तुम्हारे पास सचमुच में हृदय और आत्मा है या नहीं, तुम सत्य से प्रेम करने वाले व्यक्ति हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति और सत्य के प्रति किस प्रकार का दृष्टिकोण अपनाते हो। स्वाभाविक रूप से, यह निर्धारित करता है कि तुम वास्तव में परमेश्वर के अधिकार को जान और समझ सकते हो या नहीं। यदि तुमने अपने जीवन में परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को कभी-भी महसूस नहीं किया है, और परमेश्वर के अधिकार को तो बिल्कुल नहीं पहचानते और स्वीकार करते हो, तो उस मार्ग के कारण जिसे तुमने अपनाया है और अपने चुनावों के कारण, तुम बिल्कुल बेकार हो जाओगे, और बिना किसी संशय के तुम परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिए जाओगे। परन्तु वे लोग जो, परमेश्वर के कार्य में, उसके परीक्षणों को स्वीकार कर सकते हैं, उसकी संप्रभुता को स्वीकार कर सकते हैं, उसके अधिकार के प्रति समर्पण कर सकते हैं, और धीरे-धीरे उसके वचनों का वास्तविक अनुभव प्राप्त कर सकते हैं, वे परमेश्वर के अधिकार के वास्तविक ज्ञान को, उसकी संप्रभुता की वास्तविक सराहना को प्राप्त कर चुके होंगे, और वे सचमुच में सृजनकर्ता के आगे आत्मसमर्पण कर चुके होंगे। केवल ऐसे लोगों को ही सचमुच में बचाया गया होगा।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III

546. परमेश्वर ने इस संसार की सृष्टि की, उसने इस मानवजाति को बनाया, और इतना ही नहीं, वह प्राचीन यूनानी संस्कृति और मानव-सभ्यता का वास्तुकार भी था। केवल परमेश्वर ही इस मानवजाति को सांत्वना देता है, और केवल परमेश्वर ही रात-दिन इस मानवजाति का ध्यान रखता है। मानव का विकास और प्रगति परमेश्वर की संप्रभुता से अविभाज्य हैं, और मानवजाति का इतिहास और भविष्य परमेश्वर के हाथों द्वारा की गई व्यवस्थाओं से बच नहीं सकता। यदि तुम एक सच्चे ईसाई हो, तो तुम निश्चित ही इस बात पर विश्वास करोगे कि किसी भी देश या राष्ट्र का उत्थान या पतन परमेश्वर की व्यवस्थाओं के अनुसार होता है। केवल परमेश्वर ही किसी देश या राष्ट्र के भाग्य को जानता है और केवल परमेश्वर ही इस मानवजाति की दिशा नियंत्रित करता है। यदि मानवजाति अच्छा भाग्य पाना चाहती है, यदि कोई देश अच्छा भाग्य पाना चाहता है, तो मनुष्य को परमेश्वर की आराधना में झुकना होगा, और परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप करने और उसके सामने पाप कबूलने के लिए आना होगा, अन्यथा मनुष्य का भाग्य और गंतव्य एक अपरिहार्य विनाश बन जाएँगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है

547. मानवजाति और सभी चीजों के भाग्य सृजनकर्ता की संप्रभुता के साथ घनिष्ठता से गुँथे हुए हैं, और सृजनकर्ता के आयोजनों के साथ अविभाज्य रूप से बँधे हुए हैं; अंत में, वे सृजनकर्ता के अधिकार से अलग नहीं हो सकते। सभी चीज़ों के नियमों के माध्यम से मनुष्य सृजनकर्ता के आयोजन और उसकी संप्रभुता को समझ जाता है; सभी चीज़ों के जीने के नियमों के माध्यम से वह सृजनकर्ता के संचालन को समझ जाता है, सभी चीज़ों की नियति से वह उन तरीकों के बारे में अनुमान लगा लेता है जिनके द्वारा सृजनकर्ता अपनी संप्रभुता का उपयोग करता है और उन पर नियन्त्रण करता है; मानवजाति के जीवन चक्रों और सभी चीज़ों में, मनुष्य वास्तव में सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों के लिए सृजनकर्ता के आयोजनों और व्यवस्थाओं का अनुभव करता है, वह देखता है कि किस प्रकार वे आयोजन और व्यवस्थाएँ सभी सांसारिक कानूनों, नियमों, संस्थानों और अन्य सभी शक्तियों और ताक़तों की जगह ले लेती हैं। ऐसा होने पर, मानवजाति यह मानने को बाध्य हो जाती है कि कोई भी सृजित प्राणी सृजनकर्ता की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं कर सकता, सृजनकर्ता द्वारा पूर्वनिर्धारित घटनाओं और चीज़ों को कोई भी शक्ति बाधा नहीं डाल सकती। मनुष्य इन अलौकिक कानूनों और नियमों के अधीन जीता है, सभी चीज़ें कायम रहती हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी वंश बढ़ाती हैं और फैलती हैं। क्या यह सृजनकर्ता के अधिकार का असली मूर्तरूप नहीं है?

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III

548. हालाँकि परमेश्वर के पास अधिकार और सामर्थ्य है, लेकिन वह अपने कार्यों में बहुत कठोर और सिद्धांतनिष्ठ है और अपने वचन पर अडिग रहता है। उसकी कठोरता और उसके कार्यों के सिद्धांत यह दर्शाते हैं कि सृष्टिकर्ता का अपमान नहीं किया जा सकता और सृष्टिकर्ता का अधिकार अनुलंघनीय है। यूँ तो उसके पास सर्वोच्च अधिकार है और सभी चीजें उसके प्रभुत्व में हैं और यूँ तो उसके पास सभी चीजों पर संप्रभुता रखने का सामर्थ्य है, फिर भी परमेश्वर ने कभी भी अपनी योजना को क्षति नहीं पहुँचाई या इसमें गड़बड़ी पैदा नहीं की है और जब भी वह अपने अधिकार का प्रयोग करता है तो यह कड़ाई से उसके सिद्धांतों के अनुसार ही होता है और ठीक उसी का अनुसरण करता है जो उसके मुँह से बोला गया था और उसकी योजना के चरणों और उद्देश्यों का पालन करता है। बेशक परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन सारी चीजें उन सिद्धांतों का भी पालन करती हैं जिनसे परमेश्वर के अधिकार का प्रयोग होता है और कोई भी व्यक्ति या वस्तु उसके अधिकार के आयोजनों से बच नहीं सकती है, न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसका अधिकार प्रयुक्त किया जाता है। परमेश्वर की दृष्टि में, जो धन्य हैं, वे उसके अधिकार के कारण आशीष प्राप्त करते हैं और जिन्हें शाप दिया जाता है उन्हें परमेश्वर के अधिकार के कारण दंड मिलता है। परमेश्वर के अधिकार की संप्रभुता के तहत कोई भी व्यक्ति या वस्तु उसके अधिकार के प्रयोग से बच नहीं सकती है, न ही वे उन सिद्धांतों को बदल सकते हैं जिनके द्वारा उसका अधिकार प्रयुक्त किया जाता है। सृष्टिकर्ता का अधिकार किसी भी कारक में होने वाले परिवर्तन से नहीं बदलता और इसी तरह, वे सिद्धांत, जिनके द्वारा उसका अधिकार प्रयुक्त किया जाता है, किसी भी कारण से नहीं बदलते। आसमान और धरती भारी उथल-पुथल से गुजर सकते हैं, लेकिन सृष्टिकर्ता का अधिकार नहीं बदलेगा; सारी चीजें नष्ट हो सकती हैं, लेकिन सृष्टिकर्ता का अधिकार कभी नष्ट नहीं होगा। यह सृष्टिकर्ता के अपरिवर्तनीय और अपमान न किए जा सकने योग्य अधिकार का सार है और यही सृष्टिकर्ता की अद्वितीयता है!

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

549. शैतान ने कभी परमेश्वर के अधिकार को लांघने का साहस नहीं किया है, और, इसके अलावा, उसने हमेशा परमेश्वर के आदेश और विशिष्ट आज्ञाएँ ध्यान से सुनी हैं और उनका पालन किया है, कभी उनका उल्लंघन करने का साहस नहीं किया है, और निश्चित रूप से, परमेश्वर के किसी भी आदेश को मुक्त रूप से बदलने की हिम्मत नहीं की है। ऐसी हैं वे सीमाएँ, जो परमेश्वर ने शैतान के लिए निर्धारित की हैं, और इसलिए शैतान ने कभी इन सीमाओं को लाँघने का साहस नहीं किया है। क्या यह परमेश्वर के अधिकार का सामर्थ्य नहीं है? क्या यह परमेश्वर के अधिकार की गवाही नहीं है? मानव-जाति की तुलना में शैतान को इस बात की ज्यादा स्पष्ट समझ है कि परमेश्वर के प्रति कैसे व्यवहार करना है, और परमेश्वर को कैसे देखना है, और इसलिए, आध्यात्मिक क्षेत्र में, शैतान परमेश्वर की हैसियत और अधिकार को बहुत स्पष्ट रूप से देखता है, और वह परमेश्वर के अधिकार की शक्ति और उसके अधिकार प्रयोग के पीछे के सिद्धांतों की गहरी समझ रखता है। वह उन्हें नजरअंदाज करने की बिल्कुल भी हिम्मत नहीं करता, न ही वह किसी भी तरह से उनका उल्लंघन करने की या ऐसा कुछ करने की हिम्मत करता है, जो परमेश्वर के अधिकार को लांघता हो, और वह किसी भी तरह से परमेश्वर के कोप को चुनौती देने का साहस नहीं करता। हालाँकि शैतान दुष्ट और अहंकारी प्रकृति का है, लेकिन उसने कभी परमेश्वर द्वारा उसके लिए निर्धारित हद और सीमाएँ लाँघने का साहस नहीं किया है। लाखों वर्षों से उसने इन सीमाओं का कड़ाई से पालन किया है, परमेश्वर द्वारा दी गई हर आज्ञा और आदेश का पालन किया है, और कभी भी हद पार करने की हिम्मत नहीं की है। हालाँकि शैतान दुर्भावना से भरा है, लेकिन वह भ्रष्ट मानव-जाति से कहीं ज्यादा बुद्धिमान है; वह सृष्टिकर्ता की पहचान जानता है, और अपनी सीमाएँ भी जानता है। शैतान के “विनम्र” कार्यों से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य स्वर्गिक आदेश हैं, जिन्हें शैतान लांघ नहीं सकता, और यह ठीक परमेश्वर की अद्वितीयता और उसके अधिकार के कारण है कि सभी चीजें एक व्यवस्थित तरीके से बदलती और बढ़ती हैं, ताकि मानव-जाति परमेश्वर द्वारा स्थापित क्रम के भीतर रह सके और वंश-वृद्धि कर सके, कोई भी व्यक्ति या वस्तु इस आदेश को भंग करने में सक्षम नहीं है, और कोई भी व्यक्ति या वस्तु इस व्यवस्था को बदलने में सक्षम नहीं है—क्योंकि ये सभी सृष्टिकर्ता के हाथों से और सृष्टिकर्ता के विधान और अधिकार से आते हैं।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

550. शैतान की विशेष पहचान के कारण कई लोग उसके विभिन्न पहलुओं की अभिव्यक्तियों में गहन रुचि प्रदर्शित करते हैं। यहाँ तक कि बहुत-से ऐसे मूर्ख लोग भी हैं, जो यह मानते हैं कि परमेश्वर के साथ-साथ शैतान के पास भी अधिकार है, क्योंकि शैतान चमत्कार दिखाने में सक्षम है, और वे चीजें करने में सक्षम है जो मानव-जाति के लिए असंभव हैं। इस तरह, परमेश्वर की आराधना करने के अतिरिक्त मानव-जाति अपने हृदय में शैतान के लिए भी स्थान सुरक्षित रखती है, यहाँ तक कि शैतान की परमेश्वर की तरह आराधना भी करती है। ये लोग दयनीय और घृणास्पद दोनों हैं। वे दयनीय अपनी अज्ञानता के कारण हैं और घृणास्पद अपने पाखंड और अंतर्निहित रूप से बुरे सार के कारण। इस मुकाम पर, मुझे तुम लोगों को यह सूचित करना आवश्यक लगता है कि अधिकार क्या है, किसका प्रतीक है, और क्या दर्शाता है। मोटे तौर पर, स्वयं परमेश्वर अधिकार है, उसका अधिकार परमेश्वर की सर्वोच्चता और सार का प्रतीक है, और स्वयं परमेश्वर का अधिकार परमेश्वर की हैसियत और पहचान दर्शाता है। ऐसी स्थिति में, क्या शैतान यह कहने की हिम्मत करता है कि वह खुद परमेश्वर है? क्या शैतान यह कहने की हिम्मत करता है कि उसने सभी चीजों का सृजन किया, और वह सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है? बेशक, नहीं! क्योंकि वह सभी चीजों का सृजन करने में असमर्थ है; आज तक उसने कभी परमेश्वर द्वारा निर्मित कोई चीज नहीं बनाई, और कभी ऐसी किसी चीज का सृजन नहीं किया जिसमें जीवन हो। चूँकि उसके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है, इसलिए उसके पास कभी परमेश्वर की हैसियत और पहचान नहीं हो सकती, और यह उसके सार से निर्धारित होता है। क्या उसमें परमेश्वर के समान सामर्थ्य है? बेशक, नहीं है! हम शैतान के कार्यों और शैतान द्वारा प्रदर्शित चमत्कारों को क्या कहते हैं? क्या वह सामर्थ्य है? क्या उसे अधिकार कहा जा सकता है? बिल्कुल नहीं! शैतान बुराई के ज्वार को निर्देशित करता है, और परमेश्वर के कार्य के हर पहलू में विघ्न डालता, बिगाड़ता और गड़बड़ करता है। पिछले हजारों साल से, मनुष्य को मौत की छाया की घाटी की ओर चलवाने के लिए मानव-जाति को भ्रष्ट करने और उसका दुरुपयोग करने, मनुष्य को लालच देकर और गुमराह कर भ्रष्टता की ओर धकेलने और परमेश्वर को नकारने के अलावा, क्या शैतान ने कुछ भी ऐसा किया है, जो मनुष्य के थोड़े-से भी याद रखने, प्रशंसा करने या उसके द्वारा सँजोए जाने के लायक है? अगर शैतान के पास अधिकार और सामर्थ्य होते, तो क्या उसके द्वारा मानव-जाति भ्रष्ट की जाती? अगर शैतान के पास अधिकार और सामर्थ्य होते, तो क्या उसके द्वारा मानव-जाति को नुकसान पहुँचाया जाता? अगर शैतान के पास सामर्थ्य और अधिकार होते, तो क्या मानव-जाति परमेश्वर को छोड़कर मृत्यु की ओर मुड़ती? चूँकि शैतान के पास कोई अधिकार या सामर्थ्य नहीं है, इसलिए जो कुछ वह करता है, उसके सार के बारे में हमें क्या निष्कर्ष निकालना चाहिए? कुछ लोग हैं, जो शैतान के सभी कार्यों को मात्र चालबाजी के रूप में परिभाषित करते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि ऐसी परिभाषा ज्यादा उपयुक्त नहीं है। क्या उसके द्वारा मानव-जाति को भ्रष्ट करने के लिए किए जाने वाले दुष्कर्म केवल चालबाजी हैं? शैतान ने जिस बुरी ताकत से अय्यूब के साथ दुर्व्यवहार किया था, और उसके साथ दुर्व्यवहार कर उसे निगल जाने की उसकी तीव्र इच्छा शायद केवल चालबाजी से पूरी नहीं हो सकती थी। बीती बातों पर सोचें तो, अय्यूब के भेड़-बकरियों और गाय-बैलों के झुंड, जो दूर-दूर तक पहाड़ियों और पहाड़ों पर बिखरे हुए थे, एक ही क्षण में चले गए; अय्यूब की विशाल संपत्ति एक ही पल में गायब हो गई। क्या यह केवल चालबाजी से हासिल किया जा सकता था? शैतान जो कुछ भी करता है उसकी प्रकृति बिगाड़ना, गड़बड़ करना, नष्ट करना, गंभीर नुकसान पहुँचाना, बुराई, दुर्भावना और अंधकार जैसे नकारात्मक शब्दों के साथ मेल खाती और सही बैठती है, इसलिए जो कुछ भी अनुचित और बुरा है, उसका होना शैतान के कार्यों के साथ अटूट रूप से जुड़ा है और शैतान के घृणित सार से अविभाज्य है। शैतान चाहे जितना भी “प्रचंड ताकतवर” हो, चाहे वह जितना भी दुस्साहसी और महत्वाकांक्षी हो, चाहे नुकसान पहुँचाने की उसकी क्षमता जितनी भी बड़ी हो, चाहे मनुष्य को भ्रष्ट करने और लुभाने की उसकी क्षमताएँ जितनी भी व्यापक हों, चाहे मनुष्य को डराने की उसकी तरकीबें और साजिशें जितनी भी चतुराई से भरी हों, चाहे उसके अस्तित्व का स्वरूप जितना भी परिवर्तनशील हो, वह कभी एक भी जीवित चीज सृजित करने में सक्षम नहीं हुआ, कभी सभी चीजों के अस्तित्व के लिए व्यवस्थाएँ या नियम निर्धारित करने में सक्षम नहीं हुआ और वह कभी किसी सजीव या निर्जीव चीज को नियंत्रित करने या उस पर शासन करने में सक्षम नहीं हुआ। ब्रह्मांड और आकाश के भीतर एक भी व्यक्ति या चीज नहीं है जो उससे पैदा हुई हो, या उसके कारण अस्तित्व में हो; एक भी व्यक्ति या चीज नहीं है जो उसके द्वारा शासित हो, या उसके द्वारा नियंत्रित हो। इसके विपरीत, उसे न केवल परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन रहना है, बल्कि, परमेश्वर के सभी आदेशों और आज्ञाओं के प्रति समर्पण करना है। परमेश्वर की अनुमति के बिना शैतान जमीन पर पानी की एक भी बूँद या रेत के एक भी कण को आसानी से छू नहीं सकता है; परमेश्वर की अनुमति के बिना शैतान धरती पर चींटियों का स्थान बदलने के लिए भी स्वतंत्र नहीं है, परमेश्वर द्वारा सृजित मानवजाति की तो बात ही छोड़ दो। परमेश्वर की दृष्टि में, शैतान पहाड़ पर उगने वाली कुमुदिनियों से, हवा में उड़ने वाले पक्षियों से, समुद्र में रहने वाली मछलियों से, और पृथ्वी पर रहने वाले कीड़ों से भी तुच्छ है। सभी चीजों के बीच उसकी भूमिका सभी चीजों की सेवा करना, मानवजाति की सेवा करना और परमेश्वर के कार्य और उसकी प्रबंधन-योजना की सेवा करना है। चाहे उसकी प्रकृति कितनी भी दुर्भावनापूर्ण क्यों न हो और उसका सार कितना भी बुरा क्यों न हो, वह केवल एक ही चीज कर सकता है और वह है अपने कार्य का कर्तव्यनिष्ठा से पालन—परमेश्वर के लिए सेवा प्रदान करना—और एक विषमता के रूप में सेवा प्रदान करना। ऐसा है शैतान का सार और उसकी स्थिति। उसका सार जीवन से असंबद्ध है, सामर्थ्य से असंबद्ध है, अधिकार से असंबद्ध है; वह परमेश्वर के हाथ में केवल एक खिलौना है, बस एक मशीन है जिसे परमेश्वर सेवा के लिए इस्तेमाल करता है!

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

551. हालाँकि शैतान ने अय्यूब को ललचाई आँखों से देखा, लेकिन परमेश्वर की अनुमति के बिना उसने अय्यूब के शरीर का एक बाल भी छूने की हिम्मत नहीं की। हालाँकि शैतान अंतर्निहित रूप से दुष्ट और क्रूर है, लेकिन परमेश्वर द्वारा उसे आदेश दिए जाने के बाद, उसके पास परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। इस प्रकार, भले ही शैतान जब वह अय्यूब के पास आया, तो वह भेड़ों के बीच भेड़िये की तरह उन्मत्त था, लेकिन उसने परमेश्वर द्वारा उसके लिए निर्धारित सीमाएँ भूलने की हिम्मत नहीं की, परमेश्वर के आदेशों का उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं की, और जो कुछ भी उसने किया, उसमें शैतान ने परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों और सीमाओं से भटकने की हिम्मत नहीं की—क्या यह एक तथ्य नहीं है? इससे यह देखा जा सकता है कि शैतान यहोवा परमेश्वर के किसी भी वचन का उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं करता। शैतान के लिए परमेश्वर के मुख से निकला प्रत्येक वचन एक आदेश और एक स्वर्गिक व्यवस्था है, परमेश्वर के अधिकार की अभिव्यक्ति है—क्योंकि परमेश्वर के प्रत्येक वचन के पीछे परमेश्वर के आदेशों का उल्लंघन करने वालों और स्वर्गिक व्यवस्थाओं की अवज्ञा और विरोध करने वालों के लिए परमेश्वर की सजा निहित है। शैतान स्पष्ट रूप से जानता है कि अगर वह परमेश्वर के आदेशों का उल्लंघन करेगा, तो उसे परमेश्वर के अधिकार का उल्लंघन करने और स्वर्गिक व्यवस्थाओं का विरोध करने के परिणाम स्वीकारने होंगे। आखिर वे परिणाम क्या हैं? कहने की जरूरत नहीं कि वे परमेश्वर द्वारा उसे दी जाने वाली सजा हैं। अय्यूब के प्रति शैतान के कार्य उसके द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट किए जाने का केवल एक सूक्ष्म रूप थे, और जब शैतान ये कार्य कर रहा था, तो परमेश्वर ने जो सीमाएँ निर्धारित कीं और जो आदेश उसने शैतान को दिए, वे सब उसके द्वारा की जाने वाली हर चीज के पीछे के सिद्धांतों का एक सूक्ष्म रूप मात्र थे। इसके अलावा, इस मामले में शैतान की भूमिका और स्थिति, परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य में उसकी भूमिका और स्थिति का एक सूक्ष्म रूप मात्र थी, और शैतान द्वारा अय्यूब की परीक्षा में परमेश्वर के प्रति उसकी पूर्ण आज्ञाकारिता केवल इस बात का एक सूक्ष्म रूप थी कि कैसे शैतान ने परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य में परमेश्वर का थोड़ा-सा भी विरोध करने की हिम्मत नहीं की। ये सूक्ष्म रूप तुम लोगों को क्या चेतावनी देते हैं? शैतान समेत सभी चीजों में, कोई भी व्यक्ति या चीज ऐसी नहीं है, जो सृष्टिकर्ता द्वारा निर्धारित स्वर्गिक व्यवस्थाओं और आदेशों का उल्लंघन कर सकती हो, और कोई भी व्यक्ति या चीज ऐसी नहीं है जो इन स्वर्गिक नियमों और आदेशों का उल्लंघन करने की हिम्मत करती हो, क्योंकि कोई भी व्यक्ति या चीज उस सजा को बदल या उससे बच नहीं सकती, जो सृष्टिकर्ता उनकी अवज्ञा करने वालों को देता है। केवल सृष्टिकर्ता ही स्वर्गिक व्यवस्थाएँ और आदेश स्थापित कर सकता है, केवल सृष्टिकर्ता के पास ही उन्हें लागू करने का सामर्थ्य है, और केवल सृष्टिकर्ता के सामर्थ्य का ही किसी भी व्यक्ति या चीज द्वारा उल्लंघन नहीं किया जा सकता। यह सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार है, और यह अधिकार सभी चीजों में सर्वोच्च है, और इसलिए, यह कहना असंभव है कि “परमेश्वर महानतम है और शैतान दूसरे नंबर पर है।” अद्वितीय अधिकार से संपन्न सृष्टिकर्ता के अलावा कोई दूसरा परमेश्वर नहीं है!

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

552. शैतान हजारों वर्षों से मनुष्य को भ्रष्ट कर रहा है। उसने मनुष्य में बेहिसाब बुराई गढ़ी है, पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसे गुमराह किया है, और मानवीय दुनिया में जघन्य अपराध किए हैं। उसने मनुष्य के साथ दुर्व्यवहार किया है, मनुष्य को गुमराह किया है, मनुष्य को परमेश्वर का विरोध करने के लिए बहकाया है, और ऐसे अनगिनत बुरे कार्य किए हैं जो परमेश्वर की प्रबंधन-योजना में बार-बार विघ्न डालते और उसे बाधित करते हैं। फिर भी, परमेश्वर के अधिकार के तहत, सभी चीजें और जीवित प्राणी परमेश्वर द्वारा निर्धारित नियमों और व्यवस्थाओं का पालन करते रहते हैं, जैसा कि उन्होंने हमेशा किया है। परमेश्वर के अधिकार की तुलना में, शैतान की दुष्ट प्रकृति और निरंकुशता बहुत कुरूप, बहुत घिनौना और घृणास्पद, और बहुत सूक्ष्म और कमजोर है। भले ही शैतान परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों के बीच विचरता है, लेकिन वह परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित लोगों, घटनाओं और चीजों में थोड़ा-सा भी बदलाव करने में सक्षम नहीं है। हजारों वर्ष बीत चुके हैं, और मानवजाति अभी भी परमेश्वर द्वारा प्रदत्त प्रकाश और हवा का आनंद लेती है, अभी भी स्वयं परमेश्वर द्वारा छोड़ी गई साँस से साँस लेती है, अभी भी परमेश्वर द्वारा सृजित फूलों, पक्षियों, मछलियों और कीटों का आनंद लेती है, और परमेश्वर द्वारा प्रदान की गई सभी चीजों का आनंद लेती है; दिन और रात अभी भी लगातार एक-दूसरे की जगह लेते हैं; चार मौसम हमेशा की तरह बारी-बारी से आते हैं; आकाश में उड़ने वाले हंस सर्दियों में चले जाते हैं और अगले बसंत में फिर लौट आते हैं; पानी में रहने वाली मछलियाँ कभी नदी-झीलें—अपना घर नहीं छोड़तीं; गर्मी के दिनों में शलभ पृथ्वी पर दिल खोलकर गाते हैं; पतझड़ के दौरान हवा के साथ घास में झींगुर मृदुता से गुनगुनाते हैं; हंस झुंड में एकत्र होते हैं, जबकि बाज अकेले रहते हैं; सिंहों के समूह शिकार करके अपना भरण-पोषण करते हैं; बारहसिंगे घास और फूलों से अलग नहीं हो सकते...। सभी चीजों के बीच हर तरह का जीवित प्राणी जाता और लौटता है और फिर चला जाता है, पलक झपकते ही लाखों परिवर्तन हो जाते हैं—लेकिन जो नहीं बदलता, वह है उनकी सहज प्रवृत्ति और अस्तित्व की व्यवस्थाएँ। वे परमेश्वर के प्रावधान और पोषण के तहत रहते हैं, और कोई उनकी सहज प्रवृत्ति नहीं बदल सकता, और न ही कोई उनके अस्तित्व की व्यवस्थाओं के नियम भंग कर सकता है। हालाँकि मानवजाति, जो सभी चीजों के बीच रहती है, शैतान द्वारा भ्रष्ट की गई और गुमराह की गई है, फिर भी मनुष्य परमेश्वर द्वारा बनाए गए पानी, और परमेश्वर द्वारा बनाई गई हवा, और परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजें नहीं छोड़ सकता, और मनुष्य अभी भी परमेश्वर द्वारा सृजित स्थान में रहता और वंश-वृद्धि करता है। मानवजाति की सहज प्रवृत्तियाँ नहीं बदली हैं। मनुष्य अभी भी देखने के लिए अपनी आँखों पर, सुनने के लिए अपने कानों पर, सोचने के लिए अपने मस्तिष्क पर, बूझने के लिए अपने दिल पर, चलने के लिए अपने पैरों पर, काम करने के लिए अपने हाथों पर, इत्यादि, निर्भर करता है; वे सभी सहज प्रवृत्तियाँ जो परमेश्वर ने मनुष्य को दीं, ताकि वह परमेश्वर का प्रावधान स्वीकार कर सके, अपरिवर्तित रहती हैं, जिन क्षमताओं के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर के साथ सहयोग करता है, उनमें कोई बदलाव नहीं आया है, एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करने के लिए मानवजाति की क्षमता नहीं बदली है, मानवजाति के दिल की जरूरतें नहीं बदली हैं, मानवजाति की अपने मूल को खोजने की इच्छा नहीं बदली है, सृष्टिकर्ता द्वारा बचाए जाने की मानवजाति की इच्छा नहीं बदली है। ऐसी हैं इस मानवजाति की वर्तमान परिस्थितियाँ, जो परमेश्वर के अधिकार के अधीन रहती है और जिसने शैतान द्वारा की गई खूनी लूट को सहन किया है। यूँ तो मानवजाति को शैतान काफी नष्ट-भ्रष्ट कर चुका है और इंसान अब शुरुआत में सृजित आदम और हव्वा नहीं रहे, बल्कि वे ज्ञान, कल्पनाओं, धारणाओं जैसी अनेक परमेश्वर-विरोधी चीजों से भरे हुए हैं और शैतानी भ्रष्ट स्वभाव से पूर्ण हैं, फिर भी परमेश्वर की दृष्टि में यह अभी भी वही मानवजाति है जिसे उसने बनाया था। मानवजाति अभी भी परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजनों के अधीन है, और अभी भी परमेश्वर द्वारा निर्धारित क्रम के भीतर रहती है, और इसलिए परमेश्वर की दृष्टि में मानवजाति, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, सिर्फ गर्द से ढकी हुई है, उसका पेट गड़गड़ाता है, वह थोड़ी धीमी प्रतिक्रिया देती है, उसकी स्मृति कुछ बिगड़ चुकी है और थोड़ी पुरानी पड़ गई है, बस—जबकि मनुष्य के सभी कार्य और सहज प्रवृत्तियाँ पूरी तरह से अक्षुण्ण हैं। यही वह मनुष्य है, जिसे परमेश्वर बचाने का इरादा रखता है। इस मनुष्य को बस सृष्टिकर्ता की पुकार सुननी होगी, बस सृष्टिकर्ता की वाणी सुननी होगी, फिर वह उठ खड़ा हो सकेगा और उस वाणी के स्रोत का पता लगाने के लिए दौड़ेगा। इस मनुष्य को बस सृष्टिकर्ता की आकृति देखनी होगी, फिर वह किसी और चीज पर ध्यान नहीं देगा और खुद को परमेश्वर के लिए खपाने के लिए सब-कुछ त्याग देगा, यहाँ तक कि उसके लिए अपना जीवन भी कुर्बान कर देगा। जब मनुष्य अपने हृदय से सृष्टिकर्ता के दिल की वाणी को समझेगा तो वह शैतान को त्याग देगा और सृष्टिकर्ता के साथ आ जाएगा; जब मनुष्य अपने शरीर से गंदगी पूरी तरह से धो देगा, और एक बार फिर से सृष्टिकर्ता से पोषण और प्रावधान प्राप्त कर लेगा तो मनुष्य की स्मृति बहाल हो जाएगी और उस समय वह वास्तव में सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व में लौट आएगा।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

553. मनुष्य द्वारा परमेश्वर के अधिकार की नकल नहीं की जा सकती, और मनुष्य परमेश्वर की पहचान और हैसियत का रूप नहीं धर सकता। भले ही तुम परमेश्वर के स्वर की नकल करने में सक्षम हो, लेकिन तुम परमेश्वर के सार की नकल नहीं कर सकते। भले ही तुम परमेश्वर के स्थान पर खड़े होने और परमेश्वर का रूप धरने में सक्षम हो, लेकिन तुम कभी वह करने में सक्षम नहीं होगे जो करने का परमेश्वर इरादा रखता है, और कभी भी सभी चीजों पर संप्रभु होने और शासन करने में सक्षम नहीं होगे। परमेश्वर की नजर में तुम हमेशा एक छोटे-से सृजित प्राणी रहोगे, और तुम्हारे कौशल और क्षमता कितनी भी महान हों, चाहे तुममें कितने भी गुण हों, तुम संपूर्ण रूप से सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन हो। भले ही तुम कुछ ढिठाई भरे वचन कहने में सक्षम हो, लेकिन यह न तो यह दिखा सकता है कि तुममें सृष्टिकर्ता का सार है, और न ही यह दर्शाता है कि तुम्हारे पास सृष्टिकर्ता का अधिकार है। परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य स्वयं परमेश्वर के सार हैं। वे बाहर से सीखे या जोड़े नहीं गए, बल्कि स्वयं परमेश्वर के निहित सार हैं। और इसलिए सृष्टिकर्ता और सृजित प्राणियों के बीच का संबंध कभी नहीं बदला जा सकता। सृजित मानवता के एक सदस्य के रूप में, तुम्हें अपनी उचित स्थिति बनाए रखनी चाहिए और अनुशासित आचरण करना चाहिए। सृष्टिकर्ता द्वारा तुम्हें जो सौंपा गया है उस पर कर्तव्यपरायणता से टिके रहो। अनुचित कार्य मत करो, न ही ऐसे कार्य करो जो तुम्हारी क्षमता के दायरे से बाहर हों या जो परमेश्वर के लिए घृणित हों। एक महान व्यक्ति, अतिमानव या एक भव्य व्यक्ति बनने का अनुसरण मत करो और परमेश्वर बनने का अनुसरण मत करो। ये सब ऐसी इच्छाएँ हैं जो लोगों में नहीं होनी चाहिए। महान व्यक्ति या अतिमानव बनने का अनुसरण करना बेतुका है। परमेश्वर बनने का अनुसरण करना तो और भी ज्यादा शर्मनाक है; यह घृणित और निंदनीय है। जो सचमुच मूल्यवान है और जिस पर सृजित प्राणियों को किसी भी चीज से ज्यादा कायम रहना चाहिए, वह है एक सच्चा सृजित प्राणी बनना; यही एकमात्र लक्ष्य है जिसका सभी लोगों को अनुसरण करना चाहिए।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

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परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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