9.2. परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव पर

259. धार्मिकता ही पवित्रता है, और वह एक ऐसा स्वभाव है जो मनुष्य के अपराध को सहन नहीं कर सकता है, और वह सब कुछ जो अशुद्ध है और जो परिवर्तित नहीं हुआ है वह परमेश्वर की घृणा का पात्र है। परमेश्वर का धर्मी स्वभाव व्यवस्था नहीं, प्रशासनिक आज्ञा है: यह राज्य के भीतर एक प्रशासनिक आज्ञा है, और यह प्रशासनिक आज्ञा उस व्यक्ति के लिए धर्मी दण्ड है जिसके पास सत्य नहीं है और जो परिवर्तित नहीं हुआ है, और उसके उद्धार की कोई गंजाइश नहीं है। क्योंकि जब प्रत्येक मनुष्य को प्रकृति के अनुसार वर्गीकृत किया जायेगा, तो अच्छे मनुष्य को पुरस्कार दिया जाएगा और बुरे मनुष्य को दण्ड दिया जाएगा। इसी समय मनुष्य की नियति को स्पष्ट किया जाएगा, यह वह समय है जब उद्धार का कार्य समाप्त हो जाएगा, जिसके बाद मनुष्य के उद्धार का कार्य और नहीं किया जाएगा, और उनमें से हर एक को कठोर दंड दिया जाएगा जो बुराई करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

260. अपमान के प्रति परमेश्वर की असहिष्णुता उसका विशिष्ट सार है; परमेश्वर का क्रोध उसका विशिष्ट स्वभाव है; परमेश्वर का प्रताप उसका विशिष्ट सार है। परमेश्वर के क्रोध के पीछे का सिद्धान्त उस पहचान और स्थिति को दर्शाता है जिसे सिर्फ उसने धारण किया है। यह जिक्र करने की आवश्यकता नहीं है कि यह स्वयं अद्वितीय परमेश्वर के सार का एक प्रतीक भी है। परमेश्वर का स्वभाव उसका स्वयं का अंतर्निहित सार है। यह समय के गुज़रने के साथ बिल्कुल भी नहीं बदलता है, और जब कभी स्थान परिवर्तित होता है तब भी यह नहीं बदलता है। उसका अंतर्निहित स्वभाव उसका स्वाभाविक सार है। वह चाहे जिस किसी पर भी अपना कार्य क्‍यों न करे, न तो उसका सार बदलता है और न ही उसका धर्मी स्वभाव। जब कोई परमेश्‍वर को क्रोधित करता है, तो जिसे वह आगे भेजता है वह उसका अंतर्निहित स्वभाव है; इस समय उसके क्रोध के पीछे का सिद्धान्त नहीं बदलता है, और न ही उसकी अद्वितीय पहचान और हैसियत बदलती है। अपने सार में परिवर्तन के कारण या स्वभाव के अलग-अलग सारों को उत्पन्न करने के कारण वह क्रोधित नहीं होता है, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि उसके विरुद्ध मनुष्य का विरोध उसके स्वभाव को ठेस पहुंचाता है। मनुष्य का परमेश्वर को स्पष्ट रूप से ललकारना परमेश्वर की अपनी पहचान और हैसियत के लिए एक गम्भीर चुनौती है। परमेश्वर की नज़र में, जब मनुष्य उसे चुनौती देता है, तब मनुष्य उससे मुकाबला कर रहा है और उसके क्रोध की परीक्षा ले रहा है। जब मुनष्य परमेश्वर का विरोध करता है, जब मनुष्य परमेश्वर से मुकाबला करता है, जब मनुष्य लगातार उसके क्रोध की परीक्षा लेता है—यह वही समय है जब उसका पाप अनियंत्रित हो जाता है—तब परमेश्वर का क्रोध स्वाभाविक रूप से अपने आपको प्रकट एवं प्रस्तुत करेगा। इसलिए, परमेश्वर के क्रोध का प्रकटीकरण संकेत करता है कि समस्त बुरी ताकतें अस्तित्व में नहीं रहेंगी; यह संकेत करता है कि सभी उपद्रवी शक्तियों को नष्ट किया जाएगा। यह परमेश्वर के धर्मी स्वभाव की अद्वितीयता है, और यह परमेश्वर के क्रोध की अद्वितीयता है। जब परमेश्वर की गरिमा और पवित्रता को चुनौती दी जाती है, जब मनुष्य के द्वारा धर्मी ताकतों को रोका जाता है और मनुष्य द्वारा इसकी अनदेखी की जाती है, तब परमेश्वर अपने क्रोध को भेजेगा। परमेश्वर के सार के कारण, पृथ्वी की वे सारी ताकतें जो परमेश्वर का मुकाबला करती हैं, उसका विरोध करती हैं और उसके साथ संघर्ष करती हैं वे बुरी, भ्रष्ट और अधर्मी हैं; वे शैतान की ओर से आती हैं और उसी की हैं। क्योंकि परमेश्वर धर्मी है, प्रकाश और दोषरहित पवित्रता से संबंधित है, इसलिए समस्त चीज़ें जो बुरी, भ्रष्ट और शैतान की हैं वे परमेश्वर के क्रोध के प्रकट होने के साथ ही विलुप्त हो जाएंगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

261. हालाँकि परमेश्वर का क्रोध मनुष्य से छिपा हुआ और अज्ञात है, फ़िर भी यह किसी अपराध को नहीं सहता है

सभी मूर्ख और अबोध मनुष्यों के प्रति परमेश्वर का व्यवहार मुख्य रूप से दया और सहनशीलता पर आधारित है। दूसरी ओर, उसका क्रोध समय और चीज़ों के अति विशाल पैमाने में छिपा हुआ है; मनुष्य इससे अनजान है। परिणामस्वरूप, यह मनुष्य के लिए कठिन है कि वह परमेश्वर को उसका स्वयं का क्रोध प्रदर्शित करते हुए देखे, और साथ ही उसके क्रोध को समझना भी कठिन है। इसलिए, मनुष्य परमेश्वर के क्रोध को हल्के में लेता है। जब मनुष्य परमेश्वर के अंतिम कार्य और मनुष्य की क्षमा और उसके प्रति सहिष्णु होने के चरण को सामने पाते हैं—अर्थात्, जब परमेश्वर की दया और चेतावनी की अंतिम घटना उनके पास पहुँचती है—यदि वे तब भी परमेश्वर का विरोध करने के लिए उन्हीं तरीकों का इस्तेमाल करते हैं और पश्चाताप करने, अपने मार्गों को सुधारने या उसकी दया को स्वीकार करने का कोई प्रयास नहीं करते हैं, तो परमेश्वर आगे से उन्‍हें अपनी सहनशीलता और धैर्य प्रदान नहीं करेगा। इसके विपरीत, यह वह समय है जब परमेश्वर अपनी दया को वापस ले लेगा। इसके पश्चात्, वह बस अपने क्रोध को व्‍यक्‍त करेगा। वह अलग-अलग तरीकों से अपने क्रोध को प्रकट कर सकता है, बिल्कुल वैसे ही जैसे वह लोगों को दण्ड देने और नष्ट करने के लिए अलग अलग पद्धतियों का इस्तेमाल करता है।

सदोम नगर का विनाश करने के लिए परमेश्वर के द्वारा आग का इस्तेमाल करना मानवता और किसी जीव को सम्पूर्ण रीति से विनाश करने के लिए उसकी तीव्रतम पद्धति है। सदोम के लोगों को जलाना उनकी शारीरिक देहों को नष्ट करने से कहीं अधिक था; इसने पूरी तरह से उनकी आत्माओं, उनके प्राणों और उनके शरीरों को नष्ट कर दिया, यह भी सुनिश्चित किया कि इस नगर के भीतर के लोग, न तो भौतिक संसार में अस्तित्व में रहेंगे न ही उस संसार में रहेंगे जो मनुष्य के लिए अदृश्य है। यह एक तरीका है जिसके अंतर्गत परमेश्वर अपने क्रोध को दर्शाता और प्रकट करता है। इस तरह का प्रकाशन और प्रदर्शन परमेश्वर के क्रोध के आवश्यक सार का एक पहलू है, बिल्कुल वैसे ही जैसे यह स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के धर्मी स्वभाव का आवश्यक सार भी है। जब परमेश्वर अपने क्रोध को भेजता है, तो वह दया या करुणा प्रकट करना बन्द कर देता है, वह कोई सहनशीलता या धैर्य प्रदर्शित नहीं करता है; तब कोई ऐसा व्यक्ति, वस्तु या कारण नहीं है जो उसे निरन्तर धीरज धरने, फ़िर से दया करने, और एक बार फ़िर से अपनी सहनशीलता को प्रकट करने के लिए रज़ामंद कर सके। इन चीज़ों के बदले में, निसंकोच, परमेश्वर अपने क्रोध और प्रताप को व्‍यक्‍त करेगा, जो कुछ वह चाहता है उसे करेगा, और वह इन चीज़ों को अपनी स्वयं की इच्छाओं के अनुरूप शीघ्रता से और साफ़-सुथरे तरीके से करेगा। यह वह तरीका है जिसके अंतर्गत परमेश्वर अपने क्रोध और प्रताप को प्रकट करता है, जिसे मनुष्य को ठेस नहीं पहुंचाना चाहिए, और साथ ही यह उसके धर्मी स्वभाव के एक पहलू की अभिव्यक्ति भी है। जब लोग परमेश्वर को मनुष्य के प्रति चिंता करते और प्रेम दिखाते हुए देखते हैं, तो वे उसके क्रोध को भाँपने में, उसके प्रताप को देखने में या गुनाह के प्रति उसकी असहनशीलता को अनुभव करने में असमर्थ होते हैं। इन चीज़ों ने हमेशा से यह विश्वास करने में लोगों की अगुवाई की है कि परमेश्वर का धर्मी स्वभाव केवल दया, सहनशीलता और प्रेम है। फिर भी, जब कोई परमेश्वर को किसी नगर का विनाश करते हुए या मनुष्य से घृणा करते हुए देखता है, तो मनुष्य के विनाश में उसका क्रोध और प्रताप लोगों को उसके धर्मी स्वभाव के अन्य पक्ष की झलक देखने देता है। यह गुनाह के प्रति परमेश्वर की असहिष्णुता है। परमेश्वर का स्वभाव जो किसी गुनाह को सहन नहीं करता वह किसी भी सृजित या असृजित प्राणी की कल्पना से परे है, कोई भी उसके साथ दखलंदाज़ी करने या उसको प्रभावित करने में सक्षम नहीं है; उससे भी बढ़कर, इसका भेष धारण या अनुकरण नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार, परमेश्वर के स्वभाव का यह पहलू ऐसा है जिसे मनुष्य को बहुत अच्छे से जानना चाहिए। केवल स्वयं परमेश्वर के पास ही इस प्रकार का स्वभाव है, और केवल स्वयं परमेश्वर ही इस प्रकार के स्वभाव को धारण करता है। परमेश्वर इस प्रकार के धर्मी स्वभाव को धारण करता है क्योंकि वह दुष्टता, अंधकार, विद्रोहीपन और शैतान के बुरे कार्यों जैसे कि—मानवजाति को भ्रष्ट करना और निगल जाना—से घृणा करता है क्योंकि वह अपने पवित्र और बेदाग सार के कारण अपने विरुद्ध पाप के सारे कार्यों से घृणा करता है। यह इसलिए है क्योंकि वह किसी भी सृजित या असृजित प्राणी द्वारा खुला विरोध या स्वयं से मुकाबला सहन नहीं करेगा। यहाँ तक कि कोई ऐसा व्यक्ति जिसके प्रति उसने किसी समय दया दिखाई थी या जिसका चुनाव किया था, वह व्‍यक्ति भी उसके स्वभाव को ललकार या उसके धीरज और सहनशीलता के सिद्धान्त का उल्‍लंघन भर कर दे तो वह थोड़ी सी भी दया या संकोच के बिना अपने धर्मी स्वभाव को जारी और प्रकट करेगा—ऐसा धर्मी स्वभाव जो अपमान बर्दाश्त नहीं करता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

262. यद्यपि परमेश्वर के क्रोध का उंडेला जाना उसके धर्मी स्वभाव के प्रदर्शन का एक पहलू है, फ़िर भी अपने लक्ष्य के प्रति परमेश्वर का क्रोध बिल्कुल भी विवेकशून्य या सिद्धान्तविहीन नहीं है। इसके विपरीत, परमेश्वर क्रोध करने में बिल्कुल भी उतावलापन नहीं दिखाता है, न ही वह अपने क्रोध और प्रताप को अविवेकपूर्ण रूप से प्रकट करता है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर का क्रोध विशेष रूप से नियन्त्रित और नपा-तुला होता है; इसकी तुलना मनुष्य के क्रोध से आग बबूला होने या अपने गुस्से को प्रकट करने से बिल्कुल भी नहीं की जा सकती है। परमेश्वर और मनुष्य के बीच हुई अनेक बातचीत बाइबल में दर्ज हैं। इनमें से कुछ लोगों के कथन सतही, अज्ञानी और बचकाने थे, किन्तु परमेश्वर ने उन्हें मारकर नीचे नहीं गिराया, और न ही उनकी भर्त्सना की। विशेष रूप से, अय्यूब की परीक्षा के दौरान, यहोवा परमेश्वर ने अय्यूब के तीन मित्रों और दूसरों की अय्यूब से कही बातों को सुनने के पश्चात, उनसे कैसा बर्ताव किया था? क्या उसने उन्हें दोषी ठहराया था? क्या वह उन पर आग बबूला हो गया था? उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया था! उसके बजाए उसने अय्यूब को उनके लिए विनती करने, और उनके लिए प्रार्थना करने के लिए कहा; दूसरी ओर परमेश्वर ने उनकी ग़लतियों को मन में नहीं रखा। ये सभी उदाहरण उस मुख्य रवैये को दर्शाते हैं जिसके तहत परमेश्वर भ्रष्ट एवं अबोध मनुष्य से बर्ताव करता है। इसलिए, परमेश्वर के क्रोध का जारी होना उसके मिजाज़ का प्रदर्शन या उसे प्रकट करना बिल्कुल भी नहीं है। परमेश्वर का क्रोध गुस्से का बहुत बड़ा विस्फोट नहीं है जैसा मनुष्य इसे समझता है। परमेश्वर अपने क्रोध को इसलिए नहीं प्रकट करता है क्योंकि वह अपने मिज़ाज पर काबू करने में समर्थ नहीं है या इसलिए कि उसका क्रोध उबलने पर आ पहुंचा है और उसे बाहर निकालना ही होगा। इसके विपरीत, उसका क्रोध उसके धर्मी स्वभाव का एक प्रदर्शन है और उसके धर्मी स्वभाव की एक विशुद्ध अभिव्यक्ति है; यह उसके पवित्र सार का एक सांकेतिक प्रकाशन है। परमेश्वर क्रोध है, और किसी भी गुनाह के प्रति सहनशील नहीं है—कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि परमेश्वर का क्रोध विभिन्न कारणों के बीच अन्तर नहीं करता है या यह सिद्धान्तविहीन है; यह भ्रष्ट मनुष्य ही है जिसके पास सिद्धान्तविहीनता, और बिना सोचे समझे, विभिन्न कारणों के बीच अन्तर न करने वाले क्रोध को ज़ाहिर करने पर एक व्यापक एकाधिकार है। जब एक बार किसी व्यक्ति को आध्यात्मिक कद मिल जाता है, तो उसे अक्सर अपने मिजाज़ पर नियन्त्रण पाने में कठिनाई महसूस होगी, और इस प्रकार वह अपने असंतोष को अभिव्यक्त करने और अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए घटनाओं का इस्तेमाल करने में आनन्द लेगा; वह अक्सर बिना किसी स्पष्ट कारण के क्रोध से आगबबूला होगा, जिससे अपनी योग्यता को प्रकट कर सके और दूसरे जान सकें कि उसकी हैसियत और पहचान अन्य सामान्य लोगों से अलग है। नि:संदेह, भ्रष्ट लोग बिना किसी हैसियत के भी बार-बार नियन्त्रण खो देते हैं। उनके व्यक्तिगत हितों के नुकसान होने पर उनका क्रोध बार-बार प्रकट होता है। अपनी स्वयं की हैसियत और गरिमा की सुरक्षा करने के लिए, भ्रष्ट मानवजाति बार-बार अपनी भावनाओं को व्यक्त करेगी और अपने अहंकारी स्वभाव को प्रकट करेगी। पाप के अस्तित्व का समर्थन करने के लिए मनुष्य क्रोध में आगबबूला होगा और अपनी भावनाओं को व्यक्त करेगा, ये कार्य वे तरीके हैं जिसके तहत मनुष्य अपने असंतोष को प्रकट करता है; ये अशुद्धताओं से, छल कपट और साजिशों से लबालब भरे हुए हैं; वे मनुष्य की भ्रष्टता और बुराई से लबालब भरे हुए हैं; उससे कहीं बढ़कर, वे मनुष्य की निरंकुश महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं से लबालब भरे हुए हैं। जब न्याय दुष्टता से मुकाबला करता है, तो मनुष्य न्याय के अस्तित्व का समर्थन करने के लिए क्रोध से आगबबूला नहीं होता है; उसके विपरीत, जब न्याय की शक्तियों को धमकाया, सताया और उन पर आक्रमण किया जाता है, तब मनुष्य का स्वभाव नज़रअंदाज़ करने, टालने या मुंह फेरने वाला होता है। फ़िर भी, दुष्ट शक्तियों से मुकाबला करते समय, मनुष्य का रवैया सेवा करने और मक्खन लगाने वाला होता है। इसलिए, मनुष्य का क्रोध निकालना दुष्ट शक्तियों के लिए बच निकलने का मार्ग है, और देहयुक्त मनुष्य के बुरे आचरण का प्रदर्शन है जो अनियंत्रित एवं रोका न जा सकनेवाला है। फ़िर भी, जब परमेश्वर अपने क्रोध को भेजता है, तब सारी बुरी शक्तियों को रोका जाएगा; मनुष्य को हानि पहुंचाने वाले सारे पापों को रोका जाएगा; वे सभी बैरी शक्तियां जो परमेश्वर के कार्य में बाधा डालती हैं उन्हें प्रकट, अलग और शापित किया जाएगा; शैतान के सभी सह अपराधियों को जो परमेश्वर का विरोध करते हैं उन्हें दण्डित किया जाएगा, और जड़ से उखाड़ दिया जाएगा। उनके स्थान पर, परमेश्वर का कार्य रुकावटों से मुक्त होकर आगे बढ़ेगा; परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना निर्धारित समय के अनुसार लगातार कदम दर कदम विकसित होगी; परमेश्वर के चुने हुए लोग शैतान की बाधा और धूर्तता से मुक्त होंगे; ऐसे लोग जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं वे खामोश और शांतिप्रिय माहौल के बीच परमेश्वर की अगुवाई और आपूर्ति का आनन्द लेंगे। परमेश्वर का क्रोध एक सुरक्षा कवच है जो दुष्ट की सारी शक्तियों को बहुगुणित होने और अनियंत्रित होकर बढ़ने से रोकता है, और यह एक ऐसा सुरक्षा कवच भी है जो समस्त धर्मी और सकारात्मक चीज़ों के अस्तित्व और फैलाव को सुरक्षा प्रदान करता है और दमन और विनाश से सदा उनकी रक्षा करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

263. जब परमेश्वर अपना क्रोध प्रकट करता है, दुष्ट शक्तियों को रोका जाता है, बुरी चीज़ों को नष्ट किया जाता है, जबकि धर्मी और सकारात्मक चीज़ें परमेश्वर की देखरेख एवं सुरक्षा का आनन्द लेती हैं, और उन्हें निरन्तर बढ़ने की अनुमति दी जाती है। परमेश्वर अपने क्रोध को प्रकट करता है क्योंकि अधर्मी, नकारात्मक और बुरी चीज़ें सामान्य गतिविधि और धर्मी एवं सकारात्मक चीज़ों के विकास को बाधित, परेशान या नष्ट करती हैं। परमेश्वर के क्रोध का लक्ष्य उसके स्वयं के सार और पहचान के बचाव के लिए नहीं है, किन्तु धर्मी, सकारात्मक, सुन्दर और अच्छी चीज़ों के अस्तित्व के बचाव के लिए, और मनुष्य के सामान्य रूप से जीवित रहने के नियमों और विधियों के बचाव के लिए है। यह परमेश्वर के क्रोध का मूल कारण है। परमेश्वर का कोप बिल्कुल उचित, स्वाभाविक और उसके स्वभाव का असली प्रकाशन है। उसके क्रोध के पीछे कोई इरादे नहीं हैं, न ही धूर्तता या षडयंत्र हैं; उससे भी बढ़कर, उसके कोप में कोई कामना, चतुराई, द्वेष, हिंसा, बुराई या कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो सारी भ्रष्ट मानवजाति में पायी जाती हैं। परमेश्वर द्वारा अपने क्रोध को प्रकट करने से पहले, उसने बिल्कुल स्पष्ट रीति से और पूरी तरह से हर एक मामले के सार को पहले से ही जान लिया है, और उसने पहले से ही सटीक एवं स्पष्ट परिभाषाओं और परिणामों का वर्णन कर दिया है। इस प्रकार, हर कार्य में जिसे वह करता है, परमेश्वर का उद्देश्य अत्यंत स्पष्ट है, जैसे उसका रवैया स्पष्ट है। उसका दिमाग उलझन में नहीं है; वह अन्धा नहीं है; वह आवेगशील नहीं है; वह लापरवाह नहीं है; उससे बढ़कर, वह सिद्धान्तविहीन नहीं है। यह परमेश्वर के क्रोध का व्यावहारिक पहलू है, और यह परमेश्वर के क्रोध के इस व्यावहारिक पहलू के कारण ही है कि मनुष्य ने अपना सामान्य अस्तित्व हासिल किया है। परमेश्वर के क्रोध के बिना, मनुष्य जीवन जीने की असामान्य दशाओं में पतित हो जाता; सभी चीज़ें जो धर्मी, सुन्दर और अच्छी हैं उन्हें नष्ट कर दिया जाता और वे अस्तित्व में नहीं रहतीं। परमेश्वर के क्रोध के बिना, वे नियम और विधि जो सृष्टि को संचालित करती हैं, उन्हें तोड़ दिया जाता या उन्हें पूरी तरह से पलट दिया जाता। मनुष्य की उत्पत्ति के समय से, परमेश्वर ने मनुष्य के सामान्य अस्तित्व को बचाने और कायम रखने के लिए अपने धर्मी स्वभाव का निरन्तर इस्तेमाल किया है। चूँकि उसके धर्मी स्वभाव में क्रोध और प्रताप का समावेश है, सभी बुरे लोग, चीज़ें, पदार्थ और समस्त चीज़ें जो मनुष्य के सामान्य अस्तित्व को परेशान करती हैं और क्षति पहुंचाती हैं, उन्हें उसके क्रोध के कारण दण्डित, नियन्त्रित और नष्ट कर दिया जाता है। पिछली अनेक शताब्दियों से, परमेश्वर ने सब प्रकार की अशुद्ध आत्माओं और बुरी आत्माओं को, जो परमेश्वर का विरोध करती हैं और मनुष्य का प्रबंधन करने के परमेश्वर के कार्य में शैतान के सहअपराधियों और अनुचरों के समान कार्य करती हैं, मार गिराने और नष्ट करने के लिए अपने धर्मी स्वभाव का लगातार इस्तेमाल किया है। इस प्रकार, मुनष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर का कार्य उसकी योजना के अनुसार सदैव प्रगति करता गया है। कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर के क्रोध के अस्तित्व के कारण, मनुष्यों के बीच के सर्वाधिक नेक कारण को कभी भी नष्ट नहीं किया गया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

264. परमेश्वर नीनवे के लोगों से बहुत क्रोधित था, उसके बावजूद भी, ज्यों ही उन्होंने उपवास की घोषणा की और टाट ओढ़कर राख पर बैठ गए, त्यों ही उसका हृदय धीरे-धीरे कोमल होता गया, और उसने अपना मन बदलना शुरू कर दिया। जब उसने उनके लिए घोषणा की कि वह उनके नगर को नष्ट कर देगा—अपने पापों के निमित्त उनके अंगीकार और पश्चाताप के कुछ समय पहले—परमेश्वर तब भी उन से क्रोधित था। जब एक बार उन्होंने पश्चाताप के कई कार्य किये, तो नीनवे के लोगों के निमित्त परमेश्वर का क्रोध धीरे-धीरे उनके लिए दया और सहनशीलता में रूपान्तरित हो गया। एक ही घटना में परमेश्वर के स्वभाव के इन दोनों पहलुओं के प्रकाशन का एक साथ मिलने के विषय में कोई विरोधाभास नहीं है। किसी व्यक्ति को विरोधाभास की इस कमी को कैसे समझना और जानना चाहिए? नीनवे के लोगों के पश्चाताप के साथ परमेश्वर ने एक के बाद एक इन दोनों एकदम विपरीत सारों को प्रकट और प्रकाशित किया, जिसने लोगों को परमेश्वर के सार की यथार्थता और उसके उल्लंघन न किए जा सकने वाले गुण को देखने दिया। परमेश्वर ने लोगों को निम्नलिखित बातें बताने के लिए अपने रवैये का उपयोग किया: ऐसा नहीं है कि परमेश्वर लोगों को बर्दाश्त नहीं करता है, या वह उन पर दया करना नहीं चाहता है; यह ऐसा है कि वे कभी कभार ही परमेश्वर के प्रति सच्चा पश्चाताप करते हैं, और ऐसा कभी कभार ही होता है कि लोग सचमुच में अपने कुमार्ग से फिरते हैं और अपने हाथों के उपद्रव को त्यागते हैं। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर मनुष्य से क्रोधित हो जाता है, तो वह आशा करता है कि मनुष्य सचमुच में पश्चाताप करने में समर्थ होगा, और वह मनुष्य के सच्चे पश्चाताप को देखना चाहता है, इस दशा में वह उदारता से मनुष्य पर अपनी दया और सहनशीलता बरसाता रहेगा। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य का बुरा चालचलन परमेश्वर के क्रोध को उनके ऊपर लाता है, जबकि परमेश्वर की दया और करुणा को उनके ऊपर उण्डेला जाता है जो परमेश्वर को ध्यान से सुनते हैं और सचमुच में उसके सम्मुख सच्चा पश्चाताप करते हैं, और इसे उनके ऊपर उण्डेला जाता है जो अपने कुमार्ग से फिर जाते हैं और अपने हाथों के उपद्रव का त्याग कर देते हैं। नीनवे के लोगों प्रति अपने व्यवहार में परमेश्वर के रवैये को बिल्कुल साफ़-साफ़ प्रकाशित किया गया है: परमेश्वर की दया और सहनशीलता को प्राप्त करना बिल्कुल भी कठिन नहीं है; वह एक व्यक्ति से सच्चे पश्चाताप की अपेक्षा करता है। जब तक लोग अपने कुमार्गों से दूर रहते हैं और अपने हाथों के उपद्रव को त्याग देते हैं, तब तक परमेश्वर उनके प्रति अपने हृदय और अपने रवैये को बदलेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

265. यद्यपि नीनवे का नगर ऐसे लोगों से भरा हुआ था जो सदोम के लोगों के समान ही भ्रष्ट, बुरे और उपद्रवी थे, उनके पश्चाताप ने परमेश्वर को बाध्य किया कि वो अपना मन बदल दे और उन्हें नाश न करने का निर्णय ले। क्योंकि परमेश्वर के वचनों और निर्देशों के प्रति उनकी प्रतिक्रिया ने एक ऐसे रवैये का प्रदर्शन किया जो सदोम के नागरिकों के रवैये के ठीक विपरीत था, और परमेश्वर के प्रति उनके सच्चे समर्पण और अपने पापों के लिए उनके सच्चे पश्चाताप, साथ ही साथ हर लिहाज से उनके सच्चे और हार्दिक आचरण के कारण, परमेश्वर ने एक बार फ़िर से उनके ऊपर अपनी हार्दिक दया दिखाई और उन्हें इसे प्रदान किया। मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रतिफल और उसकी दया की नकल कर पाना किसी के लिए भी संभव नहीं है; कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की दया या सहनशीलता को धारण नहीं कर सकता है, न ही मनुष्य के प्रति उसके सच्चे एहसासों को धारण कर सकता है। क्या कोई है जिसे तुम महान पुरुष या स्त्री मानते हो, या कोई अलौकिक मानव भी, जो श्रेष्ठ नज़रिए से, एक महान पुरुष या स्त्री के रूप में, या उच्चतम बिन्दु पर बोलते हुए, मानवजाति या सृष्टि के लिए इस प्रकार का कथन कहेगा? मानवजाति के मध्य ऐसा कौन है जो मनुष्य के जीवन की स्थितियों को अपनी हथेली के समान जान सकता है? मनुष्य के अस्तित्व के लिए बोझ और ज़िम्मेदारी कौन उठा सकता है? किसी नगर के विनाश की घोषणा करने के लिए कौन योग्य है? और किसी नगर को क्षमा करने के लिए कौन योग्य है? कौन कह सकता है कि वह अपनी स्वयं की सृष्टि को संजोता है? केवल सृष्टिकर्ता! केवल सृष्टिकर्ता ही इस मानवजाति के ऊपर दया करता है। केवल सृष्टिकर्ता ही इस मानवजाति को कोमलता और स्नेह दिखाता है। केवल सृष्टिकर्ता ही इस मानवजाति के लिए सच्चा और अटूट प्रेम रखता है। उसी प्रकार, केवल सृष्टिकर्ता ही इस मानवजाति पर दया कर सकता है और अपनी सम्पूर्ण सृष्टि को संजो सकता है। उसका हृदय मनुष्य के हर एक कार्यों से खुशी से उछलता और दुखित होता है: वह मनुष्य की दुष्टता और भ्रष्टता के ऊपर क्रोधित, परेशान और दुखित होता है; वह मनुष्य के पश्चाताप और विश्वास के लिए प्रसन्न, आनंदित, क्षमाशील और प्रफुल्लित होता है; उसका हर एक विचार और अभिप्राय मानवजाति के लिए अस्तित्व के लिए है और उसके चारों ओर परिक्रमा करता है; उसका स्वरूप पूरी तरह से मानवजाति के वास्ते प्रकट किया जाता है; उसकी भावनाओं की सम्पूर्णता मानवजाति के अस्तित्व के साथ आपस में गुथी हुई है। मनुष्य के वास्ते, वह भ्रमण करता है और यहां वहां भागता है, वह खामोशी से अपने जीवन का हर अंश दे देता है; वह अपने जीवन का हर मिनट और क्षण समर्पित कर देता है...। उसने कभी नहीं जाना कि स्वयं अपने जीवन पर किस प्रकार दया करनी है, फ़िर भी उसने हमेशा से उस मानवजाति पर दया की है और उसे संजोया है जिसे उसने स्वयं सृजा था...। वह सब कुछ देता है जिसे उसे इस मानवजाति को देना है...। वह बिना किसी शर्त के और बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के अपनी दया और सहनशीलता प्रदान करता है। वह ऐसा सिर्फ इसलिए करता है कि मानवजाति उसकी नज़रों के सामने निरन्तर जीवित रहे, और जीवन के उसके प्रावधान प्राप्त करती रहे; वह ऐसा सिर्फ इसलिए करता है कि मानवजाति एक दिन उसके सम्मुख समर्पित हो जाए और यह पहचान जाए कि यह वही परमेश्वर है जो मुनष्य के अस्तित्व का पालन पोषण करता है और समूची सृष्टि के जीवन की आपूर्ति करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

266. परमेश्वर की करुणा और सहिष्णुता तो वास्तव में विद्यमान है, किन्तु जब वह अपने कोप को उन्मुक्त करता है तो परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता मनुष्य को परमेश्वर का वह पहलू भी दिखाती है जो किसी अपमान को नहीं सहती है। जब मनुष्य परमेश्वर की आज्ञाओं को पूरी तरह से मानने में सक्षम होता है और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करता है, तो परमेश्वर मनुष्य के प्रति अपनी करुणा से भरपूर होता है; जब मनुष्य भ्रष्टता, उसके प्रति घृणा और शत्रुता से भर जाता है, तो परमेश्वर बहुत अधिक क्रोधित होता है। और वह किस हद तक अत्यंत क्रोधित होता है? उसका कोप तब तक बना रहेगा जब तक कि वह मनुष्य के प्रतिरोध और दुष्ट कर्मों को फिर कभी नहीं देखता है, जब तक वे उसकी नज़रों के सामने से दूर नहीं हो जाते हैं। केवल तभी परमेश्वर का क्रोध गायब होगा। दूसरे शब्दों में, भले ही वह व्यक्ति कोई भी क्यों न हो, यदि उसका हृदय परमेश्वर से दूर हो गया है, और कभी वापस नहीं लौटने के लिए, परमेश्वर से फिर गया है, तो फिर इसकी परवाह किए बिना कि किस प्रकार, सभी प्रकटनों के लिए या अपनी व्यक्तिपरक इच्छाओं के संदर्भ में, वो अपने शरीर में या अपनी सोच में परमेश्वर की आराधना करने, उसका अनुसरण करने और उसकी आज्ञा मानने की इच्छा करता है, जैसे ही उसका हृदय परमेश्वर से फिरेगा, परमेश्वर का कोप बिना रूके उन्मुक्त हो जाएगा। यह ऐसे होगा कि जब मनुष्य को पर्याप्त अवसर देने के बाद, परमेश्वर अपने कोप को गंभीरता से उन्मुक्त कर देगा, तो एक बार उसके उन्मुक्त हो जाने के बाद इसे वापस लेने का कोई मार्ग नहीं होगा, और वह ऐसे मनुष्य के प्रति फिर कभी भी करुणाशील और सहिष्णु नहीं होगा। यह परमेश्वर के स्वभाव का एक पक्ष है जो किसी अपमान को सहन नहीं करता है। ... वह उन चीज़ों के प्रति सहिष्णु और करुणाशील है जो उदार, सुन्दर और भली हैं; जो चीज़ें बुरी, पापमय और दुष्ट हैं, उनके प्रति वह गहनता से कुपित होता है, कुछ इस तरह कि उसका कोप रुकता नहीं है। ये परमेश्वर के स्वभाव के दो प्रमुख और अति महत्वपूर्ण पहलू: अतिशय करुणा और अत्यंत कोप हैं और, इसके अतिरिक्त, इन्हें आरम्भ से लेकर अंत तक परमेश्वर के द्वारा प्रकट किया गया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

267. नीनवे के लोगों के प्रति परमेश्वर के द्वारा अपने इरादों को बदलने में कोई संकोच या अस्पष्टता शामिल नहीं है। इसके बजाए, यह शुद्ध-क्रोध से शुद्ध-सहनशीलता में हुआ एक रूपान्तरण था। यह परमेश्वर के सार का एक सच्चा प्रकाशन है। परमेश्वर अपने कार्यों में कभी अस्थिर या संकोची नहीं होता है; उसके कार्यों के पीछे के सिद्धान्त और उद्देश्य स्पष्ट, पारदर्शी, शुद्ध और दोषरहित होते हैं, जिसमें कोई धोखा या षड्यंत्र बिल्कुल भी नहीं होता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के सार में कोई अंधकार या बुराई शामिल नहीं होती है। परमेश्वर नीनवे के नागरिकों से इसलिए क्रोधित हो गया था क्योंकि उनकी दुष्टता के कार्य उसकी नज़रों में आ गए थे; उस वक्त उसका क्रोध उसके सार से निकला था। फ़िर भी, जब परमेश्वर का क्रोध जाता रहा और उसने नीनवे के लोगों पर एक बार फ़िर से सहनशीलता दिखाई, तो वह सब कुछ जो उसने प्रकट किया था वह भी उसका स्वयं का सार था। यह सम्पूर्ण परिवर्तन परमेश्वर के प्रति मनुष्य के रवैये में हुए बदलाव के कारण है। इस सम्पूर्ण अवधि के दौरान, उल्लंघन न किया जा सकने वाला परमेश्वर का स्वभाव नहीं बदला; परमेश्वर का सहनशील सार नहीं बदला; परमेश्वर का प्रेमी और करुणामय सार नहीं बदला। जब लोग दुष्टता के काम करते हैं और परमेश्वर को ठेस पहुंचाते हैं, तो वह अपना क्रोध उन पर लाता है। जब लोग सचमुच में पश्चाताप करते हैं, तो परमेश्वर का हृदय बदलेगा, और उसका क्रोध थम जाएगा। जब लोग हठी होकर निरन्तर परमेश्वर का विरोध करते हैं, तो उसका क्रोध निरन्तर जारी रहेगा; उसका क्रोध थोड़ा-थोड़ा करके उन पर तब तक दबाव बनाता जाएगा जब तक वे नष्ट नहीं हो जाते हैं। यह परमेश्वर के स्वभाव का सार है। परमेश्वर चाहे क्रोध प्रकट कर रहा हो या दया एवं करुणा, यह मनुष्य के हृदय की गहराइयों में परमेश्वर के प्रति उसका आचरण, व्यवहार और रवैया ही है जो यह तय करता है कि परमेश्वर के स्वभाव के प्रकाशन के माध्यम से क्या व्यक्त होगा। यदि परमेश्वर किसी व्यक्ति को निरन्तर अपने क्रोध के अधीन रखता है, तो निःसन्देह इस व्यक्ति का हृदय परमेश्वर का विरोध करेगा। क्योंकि उसने कभी भी परमेश्वर के सम्मुख सचमुच में पश्चाताप नहीं किया है, अपना सिर नहीं झुकाया या परमेश्वर में सच्चा विश्वास धारण नहीं किया है, और उसने कभी भी परमेश्वर की दया और सहनशीलता को हासिल नहीं किया है। यदि कोई व्यक्ति अक्सर परमेश्वर की देखरेख को प्राप्त करता है, और अक्सर उसकी करुणा और सहनशीलता को हासिल करता है, तो निःसन्देह इस व्यक्ति के पास अपने हृदय में परमेश्वर के लिए सच्चा विश्वास है, और उसका हृदय परमेश्वर के विरुद्ध नहीं है। वह प्रायः परमेश्वर के सम्मुख पश्चाताप करता है; इसलिए, भले ही परमेश्वर का अनुशासन अक्सर इस व्यक्ति के ऊपर आए, फ़िर भी उसका क्रोध नहीं आएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

268. सृष्टिकर्ता का धर्मी स्वभाव सच्चा और स्पष्ट है

जब परमेश्वर ने नीनवे के लोगों के वास्ते अपने मन को बदल लिया, तो क्या उसकी करुणा और सहनशीलता एक दिखावा थी? नहीं, बिल्कुल भी नहीं! फ़िर एक ही मुद्दे के दौरान परमेश्वर के स्वभाव के दोनों पहलुओं के बीच का रूपान्तरण तुम्हें क्या देखने देता है? परमेश्वर का स्वभाव पूरी तरह से सम्पूर्ण है; यह बिल्कुल भी खण्डित नहीं है। चाहे वह लोगों के प्रति क्रोध प्रकट कर रहा हो या दया एवं सहनशीलता, यह सब उसके धर्मी स्वभाव की अभिव्यक्तियाँ हैं। परमेश्वर का स्वभाव सच्चा एवं सुस्पष्ट है। वह अपने विचारों और रवैयों को चीज़ों के विकास अनुसार बदलता है। नीनवे के निवासियों के प्रति उसके रवैये का रूपान्तरण मनुष्यों को बताता है कि उसके पास अपने स्वयं के विचार और युक्तियां हैं; वह रोबोट या मिट्टी का कोई पुतला नहीं है, परन्तु स्वयं जीवित परमेश्वर है। वह नीनवे के लोगों से क्रोधित हो सकता था, ठीक उसी तरह जैसे वह उनके रवैये के अनुसार उनके अतीत को क्षमा कर सकता था; वह नीनवे के लोगों के ऊपर दुर्भाग्य लाने का निर्णय ले सकता था, और वह उनके पश्चाताप के कारण अपना निर्णय बदल सकता था। लोग यांत्रिक रूप से नियमों को लागू करना, और ऐसे नियमों का सीमांकन करने तथा परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए ठीक उसी तरह नियमों का उपयोग करना पसंद करते हैं, जैसे वे परमेश्वर के स्वभाव को जानने के लिए सूत्रों का उपयोग करना अधिक पसंद करते हैं। इसलिए, मानवीय विचारों के आयाम के अनुसार, परमेश्वर विचार नहीं करता, और न ही उसके पास कोई स्वतन्त्र योजनाएँ हैं। असलियत में, परमेश्वर के विचार चीज़ों और वातावरण में परिवर्तन के अनुसार निरन्तर रूपान्तरित हो रहे हैं; जब तक ये विचार रूपान्तरित हो रहे हैं, परमेश्वर के अस्तित्व के विभिन्न पहलू प्रकट होंगे। रूपान्तरण की इस प्रक्रिया के दौरान, उस घड़ी जब परमेश्वर अपना मन बदलता है, तब वह मानवजाति पर अपने जीवन के अस्तित्व की सच्चाई को प्रकट करता है, और वह यह प्रकट करता है कि उसका धर्मी स्वभाव सच्चा और सुस्पष्ट है। इससे बढ़कर, परमेश्वर मानवजाति के प्रति अपने क्रोध, अपनी दया, करुणा और सहनशीलता के अस्तित्व के सत्य को प्रमाणित करने के लिए अपने सच्चे प्रकटीकरणों का उपयोग करता है। उसके सार को चीज़ों के विकास के अनुसार किसी भी समय पर और किसी भी स्थान में प्रकट किया जाएगा। वह एक सिंह का क्रोध भी धारण करता है और माता की ममता एवं सहनशीलता भी। किसी मनुष्य को उसके धर्मी स्वभाव पर प्रश्न करने, उसका उल्लंघन करने, उसे बदलने या तोड़ने मरोड़ने की अनुमति नहीं है। समस्त मुद्दों और सभी चीज़ों के मध्य, परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को, अर्थात्, परमेश्वर का क्रोध एवं उसकी करुणा को, किसी भी समय पर और किसी भी स्थान में प्रकट किया जा सकता है। परमेश्वर प्रकृति के हर एक कोने एवं छिद्र में इन पहलुओं को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है और हर पल स्पष्ट रूप से उन्हें अंजाम देता है। परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को समय या अन्तराल के द्वारा सीमित नहीं है, या दूसरे शब्दों में, समय या अन्तराल की सीमाओं के द्वारा तय तरीके से परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को यांत्रिक रूप से प्रकट या प्रकाशित नहीं किया जाता है। उसके बजाए, परमेश्वर का धर्मी स्वभाव किसी भी समय और स्थान में स्वतन्त्र रूप से प्रकट और प्रकाशित होता है। जब तुम परमेश्वर को अपना मन बदलते और अपने क्रोध को थामते और नीनवे के लोगों का नाश करने से पीछे हटते हुए देखते हो, तो क्या तुम कह सकते हो कि परमेश्वर केवल दयालु और प्रेमी है? क्या तुम कह सकते हो कि परमेश्वर का क्रोध खोखले वचनों से बना है? जब परमेश्वर प्रचण्ड क्रोध प्रकट करता है और अपनी दया को वापस ले लेता है, तो क्या तुम कह सकते हो कि वह मनुष्यों के प्रति किसी सच्चे प्रेम का एहसास नहीं करता है? परमेश्वर लोगों के बुरे कार्यों के प्रत्युतर में प्रचण्ड क्रोध प्रकट करता है; उसका क्रोध दोषपूर्ण नहीं है। परमेश्वर का हृदय लोगों के पश्चाताप के द्वारा द्रवित हो जाता है, और यह वही पश्चाताप है जो इस तरह उसके हृदय को बदल देता है। उसका द्रवित होना, मनुष्य के प्रति उसके हृदय का बदलाव साथ ही साथ उसकी दया और सहनशीलता पूर्ण रूप से दोषमुक्त है; वह साफ, स्वच्छ, निष्कलंक और अमिश्रित है। परमेश्वर की सहनशीलता विशुद्ध रूप से सहनशीलता है; उसकी दया विशुद्ध रूप से दया है। उसका स्वभाव मनुष्य के पश्चाताप और उसके विभिन्न चाल-चलन के अनुसार क्रोध प्रकट करेगा, साथ ही साथ दया एवं सहनशीलता को प्रकट करेगा। चाहे वह जो भी प्रकट या प्रकाशित करता हो, सब कुछ पूरी तरह पवित्र है; यह पूरी तरह प्रत्यक्ष है; उसका सार सृष्टि की किसी भी चीज़ से विशिष्ट है। कार्यों के वे सिद्धान्त जिन्हें परमेश्वर प्रकट करता है, उसके विचार एवं योजनाएँ या कोई विशेष निर्णय, साथ ही साथ हर एक कार्य, किसी भी प्रकार की त्रुटियों या दागों से स्वतन्त्र है। जैसा परमेश्वर निर्णय लेता है, वह वैसा ही करता है, और इस रीति से वह अपने उद्यमों को पूरा करता है। इस प्रकार के परिणाम ठीक और दोषरहित हैं क्योंकि उनका स्रोत दोषरहित और निष्कलंक है। परमेश्वर का क्रोध दोषमुक्त है। इसी प्रकार, परमेश्वर की दया और सहनशीलता, जिसे किसी सृजन के द्वारा धारण नहीं किया जाता है, वे पवित्र एवं निर्दोष हैं, और वे सोच विचार और अनुभव किए जाने पर खरे उतरने में समर्थ हैं।

नीनवे की कहानी को समझने के पश्चात्, क्या तुम सब परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के सार के अन्य पक्ष को देख पाते हो? क्या तुम सब परमेश्वर के अद्वितीय धर्मी स्वभाव के अन्य पक्ष को देख पाते हो? क्या मनुष्यों के मध्य कोई इस प्रकार का स्वभाव धारण करता है? क्या कोई परमेश्वर के समान इस प्रकार का क्रोध धारण करता है? क्या कोई परमेश्वर के समान दया और सहनशीलता धारण करता है? सृष्टि के मध्य ऐसा कौन है जो इतना अधिक क्रोध कर सकता है और मानवजाति को नष्ट करने या उसके ऊपर विपत्ति लाने का निर्णय ले सकता है? और करुणा प्रदान करने, मनुष्यों को सहने और क्षमा करने, और मनुष्य को नष्ट करने के निर्णय को बदलने के योग्य कौन है? सृष्टिकर्ता अपनी स्वयं की अनोखी पद्धतियों और सिद्धान्तों के माध्यम से अपने धर्मी स्वभाव को प्रकट करता है; वह लोगों, घटनाओं या चीज़ों के नियन्त्रण या प्रतिबन्ध के अधीन नहीं है। उसके अद्वितीय स्वभाव के साथ, कोई भी उसके विचारों और उपायों को बदलने में समर्थ नहीं है, न ही कोई उसे मनाने में और उसके निर्णयों को बदलने में समर्थ है। सृष्टि के व्यवहार और विचारों की सम्पूर्णता उसके धर्मी स्वभाव के न्याय के अधीन अस्तित्व में रहती है। वह क्रोध करेगा या दया, इसे कोई भी नियन्त्रित नहीं कर सकता है; केवल सृष्टिकर्ता का सार—या दूसरे शब्दों में, सृष्टिकर्ता का धर्मी स्वभाव—ही इसका निर्णय ले सकता है। सृष्टिकर्ता के धर्मी स्वभाव की अद्वितीय प्रकृति यही है!

जब हम ने एक बार नीनवे के लोगों के प्रति परमेश्वर के रवैये में रूपान्तरण का विश्लेषण कर लिया है और समझ लिया है, तो क्या तुम सब परमेश्वर के धर्मी स्वभाव में पाई जानेवाली दया का वर्णन करने के लिए "अद्वितीय" शब्द का उपयोग करने में समर्थ हो? हम ने पहले कहा था कि परमेश्वर का क्रोध उसके अद्वितीय धर्मी स्वभाव के सार का एक पहलू है। अब मैं दो पहलुओं, परमेश्वर के क्रोध और परमेश्वर की दया, को उसके धर्मी स्वभाव के रूप में परिभाषित करूंगा। परमेश्वर का धर्मी स्वभाव पवित्र है; यह अनुल्लंघनीय साथ ही साथ निर्विवादित भी है; यह कुछ ऐसा है जिसे सृजित या असृजित वस्तुओं के मध्य कोई भी धारण नहीं कर सकता है। यह परमेश्वर के लिए अद्वितीय और अतिविशेष दोनों है। कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर का क्रोध पवित्र और अनुल्लंघनीय है। उसी भाँति, परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का अन्य पहलू—परमेश्वर की दया—पवित्र है और उसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। सृजित या असृजित वस्तुओं में से कोई भी परमेश्वर के कार्यों में उसका स्थान नहीं ले सकता है या उसका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है, और न ही कोई सदोम के विनाश या नीनवे के उद्धार में परमेश्वर का स्थान ले सकता है या उसका प्रतिनिधित्व कर सकता है। यह परमेश्वर के अद्वितीय धर्मी स्वभाव की सच्ची अभिव्यक्ति है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

269. परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को समझने के लिए व्यक्ति को पहले परमेश्वर की भावनाओं को समझना होगा : वह किससे घृणा करता है, किसे नापसंद करता है और किससे प्यार करता है; वह किसको बरदाश्त करता है, किसके प्रति दयालु है, और किस प्रकार के व्यक्ति पर वह दया करता है। यह एक महत्त्वपूर्ण बिंदु है। व्यक्ति को यह भी समझना होगा कि परमेश्वर कितना भी स्नेही क्यों न हो, उसमें लोगों के लिए कितनी भी दया एवं प्रेम क्यों न हो, परमेश्वर अपनी हैसियत और स्थिति को ठेस पहुँचाने वाले किसी भी व्यक्ति को बरदाश्त नहीं करता, न ही वह यह बरदाश्त करता है कि कोई उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाए। यद्यपि परमेश्वर लोगों से प्यार करता है, फिर भी वह उन्हें लाड़-प्यार से बिगाड़ता नहीं। वह लोगों को अपना प्यार, अपनी दया एवं अपनी सहनशीलता देता है, लेकिन व‍ह कभी उनसे लाड़ नहीं करता; परमेश्वर के अपने सिद्धांत और सीमाएँ हैं। भले ही तुमने परमेश्वर के प्रेम को कितना भी महसूस किया हो, वह प्रेम कितना भी गहरा क्यों न हो, तुम्हें कभी भी परमेश्वर से ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए, जैसा तुम किसी अन्य व्यक्ति से करते हो। यह सच है कि परमेश्वर लोगों से बहुत आत्मीयतापूर्ण व्यवहार करता है, फिर भी यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को मात्र किसी अन्य व्यक्ति के रूप में देखता है, मानो वह मात्र कोई अन्य सृजित प्राणी हो, जैसे कोई मित्र या आराधना की कोई वस्तु, तो परमेश्वर उससे अपना चेहरा छिपा लेगा और उसे त्याग देगा। यह उसका स्वभाव है और लोगों को इस मुद्दे को बिना सोचे-समझे नहीं लेना चाहिए। अतः, हम अकसर परमेश्वर द्वारा अपने स्वभाव के बारे में कहे गए ऐसे वचन देखते हैं : चाहे तुमने कितने भी मार्गों पर यात्रा की हो, तुमने कितना भी अधिक काम किया हो या तुमने कितना भी अधिक कष्ट सहन किया हो, जैसे ही तुम परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को ठेस पहुँचाते हो, वह तुम्हारे कृत्य के आधार पर तुममें से प्रत्येक को उसका प्रतिफल देगा। इसका अर्थ यह है कि हालाँकि परमेश्वर लोगों के साथ बहुत आत्मीयतापूर्ण व्यवहार करता है, फिर भी लोगों को परमेश्वर से किसी मित्र या रिश्तेदार की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए। परमेश्वर को अपना "यार" मत कहो। चाहे तुमने उससे कितना ही प्रेम क्यों न प्राप्त किया हो, चाहे उसने तुम्हें कितनी ही सहनशीलता क्यों न दी हो, तुम्हें कभी भी परमेश्वर से अपने मित्र के रूप में व्यवहार नहीं करना चाहिए। यह परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII' से उद्धृत

270. लोग कहते हैं कि परमेश्वर एक धर्मी परमेश्वर है, और यह कि जब तक मनुष्य अंत तक उसके पीछे पीछे चलता रहेगा, वह निश्चित रूप से मनुष्य के प्रति निष्पक्ष होगा, क्योंकि वह सबसे अधिक धर्मी है। यदि मनुष्य बिलकुल अंत तक उसके पीछे पीछे चलता है, तो क्या वह मनुष्य को दरकिनार कर सकता है? मैं सभी मनुष्यों के प्रति निष्पक्ष हूँ, और अपने धर्मी स्वभाव से सभी मनुष्यों का न्याय करता हूँ, फिर भी जो अपेक्षाएं मैं मनुष्य से करता हूँ उसके लिए कुछ यथोचित स्थितियाँ होती हैं, और जिसकी अपेक्षा मैं करता हूँ उसे सभी मनुष्यों के द्वारा, चाहे वे जो कोई भी हों, अवश्य ही पूरा किया जाना चाहिए। मैं इसकी परवाह नहीं करता हूँ कि तेरी योग्यताएँ कितनी व्यापक और आदरणीय हैं; मैं सिर्फ इसकी परवाह करता हूँ कि तू मेरे मार्ग में चलता है कि नहीं, और सत्य के लिए तुझमें प्रेम और प्यास है कि नहीं। यदि तुझमें सत्य की कमी है, और उसके बजाय तू मेरे नाम को लज्जित करता है, और मेरे मार्ग के अनुसार कार्य नहीं करता है, और किसी बात की परवाह या चिंता किए बगैर बस नाम के लिए अनुसरण करता है, तो उस समय मैं तुझे मार कर नीचे गिरा दूँगा और तेरी बुराई के लिए तुझे दण्ड दूँगा, तब तेरे पास कहने के लिए क्या होगा? क्या तू ऐसा कह सकता है कि परमेश्वर धर्मी नहीं है? आज, यदि तूने उन वचनों का पालन किया है जिन्हें मैंने कहा है, तो तू ऐसा इंसान है जिसे मैं स्वीकार करता हूँ। तू कहता है कि तूने हमेशा परमेश्वर का अनुसरण करते हुए दुख उठाया है, कि तूने हमेशा हर परिस्थितियों में उसका अनुसरण किया है, और तूने उसके साथ अपना अच्छा और खराब समय बिताया है, किन्तु तूने परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के अनुसार जीवन नहीं बिताया है; तू सिर्फ हर दिन परमेश्वर के पीछे पीछे भागना और उसके लिए स्वयं को व्यय करना चाहता है, और तूने कभी भी एक अर्थपूर्ण जीवन बिताने के बारे में नहीं सोचा है। तू यह भी कहता है, "किसी भी सूरत में, मैं विश्वास करता हूँ कि परमेश्वर धर्मी है। मैंने उसके लिए दुख उठाया है, मैं उसके लिए यहाँ वहाँ भागते रहता हूँ, और मैंने उसके लिए अपने आपको समर्पित किया है, और मैंने कड़ी मेहनत की है इसके बावजूद मेरी कद्र नहीं हुई है; वह निश्चय ही मुझे स्मरण रखता है।" यह सच है कि परमेश्वर धर्मी है, फिर भी इस धार्मिकता पर किसी अशुद्धता का दाग नहीं है: इसमें कोई मानवीय इच्छा नहीं है, और इसे शरीर, या मानवीय सौदों के द्वारा कलंकित नहीं किया जा सकता है। वे सभी जो विद्रोही हैं और विरोध में हैं, और जो उसके मार्ग की सम्मति में नहीं हैं, उन्हें दण्डित किया जाएगा; किसी को भी क्षमा नहीं किया गया है, और किसी को भी बख्शा नहीं गया है! कुछ लोग कहते हैं, "आज मैं तुम्हारे लिए यहाँ वहाँ भागता हूँ; जब अंत आता है, तो क्या तू मुझे थोड़ी सी आशीष दे सकता है?" अतः मैं तुझसे पूछता हूँ, "क्या तूने मेरे वचनों का पालन किया है?" वह धार्मिकता जिसकी तू बात करता है वह एक सौदे पर आधारित है। तू केवल यह सोचता है कि मैं धर्मी हूँ, और सभी मनुष्यों के प्रति निष्पक्ष हूँ, और वे सब जो बिलकुल अंत तक मेरा अनुसरण करेंगे उन्हें निश्चित रूप से बचा लिया जाएगा और वे मेरी आशीषों को प्राप्त करेंगे। "वे सब जो बिलकुल अंत तक मेरा अनुसरण करते हैं निश्चित है कि उन्हें बचा लिया जाएगा" मेरे इन वचनों में एक भीतरी अर्थ है: वे जो बिलकुल अंत तक मेरा अनुसरण करते हैं वे ऐसे लोग हैं जिन्हें मेरे द्वारा पूरी तरह ग्रहण कर लिया जाएगा, वे ऐसे लोग हैं जो, मेरे द्वारा विजय पा लिए जाने के बाद, सत्य को खोजते हैं और उन्हें सिद्ध बनाया जाता है। तूने कैसी स्थितियाँ हासिल की हैं? तू बिलकुल अंत तक सिर्फ मेरा अनुसरण करने में कामयाब हुआ है, किन्तु तूने और क्या किया है? क्या तूने मेरे वचनों का पालन किया है? तूने मेरी पाँच अपेक्षाओं में से एक को पूरा किया है, लेकिन बाकी चार को पूरा करने का तेरा कोई इरादा नहीं है। तूने बस सबसे सरल और आसान पथ को ढूँढ़ लिया, और अपने आपको सौभाग्यशाली मानकर उसका अनुसरण किया है। तेरे जैसे इंसान के लिए मेरा धर्मी स्वभाव ताड़ना और न्याय का है, यह एक प्रकार से सच्चा प्रतिफल है, और यह बुरा काम करनेवालों के लिए उचित दण्ड है; वे सभी जो मेरे मार्ग पर नहीं चलते हैं उन्हें निश्चय ही दण्ड दिया जाएगा, भले ही वे अंत तक अनुसरण करते रहें। यह परमेश्वर की धार्मिकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

271. परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को जानने के लिए किसी को अनुभव और कल्पना पर भरोसा नहीं करना चाहिए

जब तुम स्वयं को परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना का सामना करते हुए पाते हो, तो क्या तुम कहोगे कि परमेश्वर के वचन में मिलावट है? क्या तुम कहोगे कि परमेश्वर के क्रोध के पीछे एक कहानी है, और उसके क्रोध में मिलावट है? क्या तुम परमेश्वर पर कलंक लगाओगे, यह कहते हुए कि उसका स्वभाव आवश्यक रूप से पूर्णत: धर्मी नहीं है? परमेश्वर के प्रत्येक कार्य के साथ व्यवहार करते समय, तुम्हें पहले निश्चित होना होगा कि परमेश्वर का धर्मी स्वभाव अन्य तत्वों से मुक्त है; कि यह पवित्र और त्रुटिहीन है; इन कार्यों में परमेश्वर द्वारा मनुष्य को मारकर नीचे गिराना, दण्ड देना और नष्ट करना शामिल है। बिना किसी अपवाद के, परमेश्वर के हर एक कार्य को उसके अंतर्निहित स्वभाव और उसकी योजना के अनुसार सख्ती से बनाया गया है—इसमें मनुष्य का ज्ञान, परम्परा और दर्शनशास्त्र शामिल नहीं है—परमेश्वर का हर एक कार्य उसके स्वभाव और सार का एक प्रकटीकरण है, और किसी भी ऐसी चीज़ से असम्बद्ध है जो भ्रष्ट मनुष्य से सम्बन्धित है। मनुष्य की अवधारणाओं में, मानवजाति के प्रति केवल परमेश्वर का प्रेम, करुणा और सहनशीलता ही दोषरहित, अमिश्रित और पवित्र है। लेकिन, कोई नहीं जानता है कि परमेश्वर का कोप और उसका क्रोध इसी तरह अमिश्रित हैं; इसके अतिरिक्त, परमेश्वर किसी गुनाह को क्यों नहीं सहता है या उसका कोप इतना भयंकर क्यों है, ऐसे प्रश्नों पर किसी ने भी विचार नहीं किया है? इसके विपरीत, कुछ लोग परमेश्वर के क्रोध को भ्रष्ट मनुष्य का गुस्सा जान कर ग़लती करते हैं; वे परमेश्वर के क्रोध को भ्रष्ट मनुष्य का कोप समझते हैं; यहाँ तक कि वे भूलवश अनुमान लगाते हैं कि परमेश्वर का कोप मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के स्वाभाविक प्रकाशन के समान ही है। वे भूलवश विश्वास करते हैं कि परमेश्वर के क्रोध का प्रकट होना भ्रष्ट मनुष्य के क्रोध के समान ही है; जो नाराज़गी से उत्पन्न होता है; वे यहाँ तक विश्वास करते हैं कि परमेश्वर के क्रोध का जारी होना उसके मिजाज़ का एक प्रदर्शन है। इस सहभागिता के पश्चात्, मैं आशा करता हूँ कि अब से तुम लोगों में से कोई भी परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को लेकर किसी भी प्रकार की ग़लत अवधारणा, कल्पना या अनुमान नहीं रखेगा, और मैं आशा करता हूँ कि मेरे वचनों को सुनने के पश्चात् तुम लोगों के हृदय में परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के क्रोध की सच्ची पहचान हो सकती है, तुम लोग परमेश्वर के क्रोध के विषय में पिछले समय की किसी भी ग़लत समझ को किनारे कर सकते हो, तुम लोग अपने ग़लत विश्वास और परमेश्वर के क्रोध के सार के प्रति दृष्टिकोण को बदल सकते हो। इससे बढ़कर, मैं आशा करता हूँ कि तुम सब अपने हृदयों में परमेश्वर के स्वभाव की एक सटीक परिभाषा पा सकते हो, तुम लोगों के मन में अब से परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को लेकर कोई सन्देह नहीं होगा, तुम लोग परमेश्वर के सच्चे स्वभाव के ऊपर कोई मानवीय तर्क या अनुमान नहीं थोपोगे। परमेश्वर का धर्मी स्वभाव परमेश्वर का स्वयं का सच्चा सार है। यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे मनुष्य के द्वारा कुशलता से आकार दिया गया है या लिखा गया है। उसका धर्मी स्वभाव उसका अपना धर्मी स्वभाव है और इसका सृष्टि की किसी भी चीज़ के साथ कोई सम्बन्ध या नाता नहीं है। परमेश्वर स्वयं ही स्वयं परमेश्वर है। वह कभी भी सृष्टि का एक भाग नहीं बन सकता है, और भले ही वह सृजे गए प्राणियों के बीच एक सदस्य बन जाए, फ़िर भी उसका अंतर्निहित स्वभाव और सार नहीं बदलेगा। इसलिए, परमेश्वर को जानना किसी वस्तु को जानना नहीं है; यह किसी चीज़ की चीर-फाड़ करना नहीं है, न ही यह किसी व्यक्ति को समझना है। यदि परमेश्वर को जानने के लिए मनुष्य किसी वस्तु को जानने या किसी व्यक्ति को समझने की अपनी धारणा या पद्धति का इस्तेमाल करता है, तो वह परमेश्वर के ज्ञान को हासिल करने में कभी भी सक्षम नहीं होगे। परमेश्वर को जानना, अनुभव या कल्पना पर भरोसा करना नहीं है, और इसलिए तुम्हें अपने अनुभव या कल्पना को परमेश्वर पर नहीं थोपना चाहिए। भले ही तुम्हारे अनुभव और कल्पना कितने ही समृद्ध क्यों न हों, फिर भी वे सीमित ही रहेंगे; और तो और, तुम्हारी कल्पना तथ्यों से मेल नहीं खाती है, और सच्चाई से तो बिल्कुल भी मेल नहीं खाती है, यह परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और उसके सार से असंगत है। यदि तुम परमेश्वर के सार को समझने के लिए अपनी कल्पना पर भरोसा करते हो तो तुम कभी भी सफल नहीं होगे। एकमात्र रास्ता इस प्रकार है: वह सब ग्रहण करो जो परमेश्वर से आता है, फ़िर धीरे-धीरे उसका अनुभव करो और समझो। एक ऐसा दिन आएगा जब परमेश्वर तुम्हारे सहयोग के कारण, सत्य के लिए तुम्हारी भूख और प्यास के कारण तुम्हें प्रबुद्ध करेगा ताकि तुम सचमुच में उसे समझो और जानो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

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