9.3. परमेश्वर की पवित्रता पर

272. "परमेश्वर की पवित्रता" का अर्थ है कि परमेश्वर का सार दोषरहित है और परमेश्वर का प्रेम निःस्वार्थ है, जो कुछ परमेश्वर मनुष्य को प्रदान करता है वह निःस्वार्थ है: और परमेश्वर की पवित्रता निष्कलंक और दोषरहित है। परमेश्वर के ये सार के ये पहलू मात्र ऐसे शब्द नहीं हैं जिसे वह अपनी हैसियत का दिखावा करने के लिए उपयोग करता है, बल्कि इसके बजाए परमेश्वर हर एक व्यक्ति के साथ खामोश ईमानदारी से व्यवहार करने के लिए अपने सार का उपयोग करता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का सार खोखला नहीं है, न ही यह सैद्धान्तिक या मत-संबंधी है और यह निश्चित रूप से एक प्रकार का ज्ञान नहीं है। यह मनुष्य के लिए एक प्रकार की शिक्षा नहीं है; बल्कि इसके बजाए यह परमेश्वर के स्वयं के कार्यकलापों का सच्चा प्रकाशन है और परमेश्वर के स्वरूप का प्रकटित सार है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

273. परमेश्वर की पवित्रता जिसके बारे में मैं बोलता हूँ वह किसे संदर्भित करता है? एक पल के लिए इस बारे में सोचो। क्या परमेश्वर की पवित्रता उसकी सत्यता है? क्या परमेश्वर की पवित्रता उसकी विश्वसनीयता है? क्या परमेश्वर की पवित्रता उसकी निःस्वार्थता है? क्या यह उसकी विनम्रता है? क्या यह मनुष्य के लिए उसका प्रेम है? परमेश्वर मनुष्य को मुक्त रूप से सत्य और जीवन प्रदान करता है—क्या यही उसकी पवित्रता है? (हाँ।) यह सब कुछ जिसे परमेश्वर प्रकट करता है वह अद्वितीय है और यह भ्रष्ट मानवजाति के भीतर मौजूद नहीं होता है, न ही इसे मानवजाति में देखा जा सकता है। इसका ज़रा-सा भी नामोनिशान शैतान द्वारा मनुष्य की भ्रष्टता की प्रक्रिया के दौरान देखा नहीं जा सकता है, न ही शैतान के भ्रष्ट स्वभाव में और न ही शैतान के सार या उसकी प्रकृति में देखा जा सकता है। परमेश्वर का स्वरूप अद्वितीय है; केवल स्वयं परमेश्वर का स्वरूप ही इस प्रकार का सार है धारण करता है। ... पवित्रता का सार सच्चा प्रेम है, परन्तु इससे भी अधिक यह सत्य, धार्मिकता और प्रकाश का सार है। "पवित्र" शब्द केवल तभी उपयुक्त है जब इसे परमेश्वर के लिए लागू किया जाता है; सृष्टि में कुछ भी "पवित्र" कहलाने के योग्य नहीं है। मनुष्य को यह अवश्य समझना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

274. "और यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी, 'तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।'" इस अंश में मनुष्य को दी गई परमेश्वर की आज्ञा का क्या तात्पर्य है? पहला, परमेश्वर मनुष्य को बताता है कि वह क्या खा सकता है, अर्थात् अनेक प्रकार के पेड़ों के फल। इसमें कोई खतरा या ज़हर नहीं है, सब-कुछ खाया जा सकता है और बिना किसी संदेह के मनुष्य की इच्छा के अनुसार स्वतंत्रतापूर्वक खाया जा सकता है। यह परमेश्वर की आज्ञा का एक भाग है। दूसरा भाग एक चेतावनी है। इस चेतावनी में परमेश्वर मनुष्य को बताता है कि उसे भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल नहीं खाना चाहिए। इस वृक्ष का फल खाने पर क्या होगा? परमेश्वर ने मनुष्य से कहा : यदि तुम इस वृक्ष का फल खाओगे, तो तुम निश्चित ही मर जाओगे। क्या ये वचन सीधे-स्पष्ट नहीं हैं? यदि परमेश्वर ने तुमसे यह कहा होता, पर तुम लोग यह न समझ पाते कि ऐसा क्यों कहा, तो क्या तुम उसके वचनों को एक नियम या आज्ञा के रूप में मानते, जिसका पालन किया जाना चाहिए? ऐसे वचनों का पालन किया जाना चाहिए, है न? परंतु मनुष्य इनका पालन करने योग्य हो या नहीं, परमेश्वर के वचन पूरी तरह से स्पष्ट हैं। परमेश्वर ने मनुष्य से बिलकुल साफ़-साफ़ कहा कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता, और अगर वह उसे खा लेता है, जिसे नहीं खाना चाहिए, तो क्या होगा। क्या तुम परमेश्वर द्वारा कहे गए इन संक्षिप्त वचनों में परमेश्वर के स्वभाव की कोई चीज़ देख सकते हो? क्या परमेश्वर के ये वचन सत्य हैं? क्या इनमें कोई छलावा है? क्या इनमें कोई झूठ है? क्या इनमें कोई धमकी है? (नहीं।) परमेश्वर ने ईमानदारी से, सच्चाई से और निष्कपटता से मनुष्य को बताया कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता। परमेश्वर ने स्पष्टता से और सीधे-सीधे कहा। क्या इन वचनों में कोई छिपा हुआ अर्थ है? क्या ये वचन सीधे-स्पष्ट नहीं हैं? क्या किसी अटकलबाज़ी की ज़रूरत है? (नहीं।) अटकलबाज़ी की कोई ज़रूरत नहीं है। एक नज़र में उनका अर्थ स्पष्ट है। इन्हें पढ़ने पर आदमी इनके अर्थ के बारे में बिलकुल स्पष्ट महसूस करता है। यानी परमेश्वर जो कुछ कहना चाहता है और जो कुछ वह व्यक्त करना चाहता है, वह उसके हृदय से आता है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त चीज़ें स्वच्छ, सीधी और स्पष्ट हैं। उनमें कोई गुप्त उद्देश्य या कोई छिपा हुआ अर्थ नहीं है। उसने सीधे मनुष्य से बात की और बताया कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के इन वचनों से मनुष्य देख सकता है कि परमेश्वर का हृदय पारदर्शी और सच्चा है। उसमें ज़रा भी झूठ नहीं है; यह ऐसा मामला नहीं है, जिसमें तुमसे कहा जाए कि तुम उसे नहीं खा सकते जो खाने योग्य है, या न खा सकने योग्य चीज़ों के बारे में तुमसे कहा जाए कि "खाकर देखो, क्या होता है"। परमेश्वर के कहने का यह अभिप्राय नहीं है। परमेश्वर जो कुछ अपने हृदय में सोचता है, वही कहता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV' से उद्धृत

275. परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की और तब से उसने हमेशा मानव-जाति के जीवन का मार्गदर्शन किया है। चाहे मानव-जाति को आशीष देना हो, मनुष्य के लिए व्यवस्थाएँ और आज्ञाएँ जारी करना हो, या जीवन के लिए विभिन्न नियम निर्धारित करना हो, क्या तुम लोग जानते हो कि इन चीज़ों को करने में परमेश्वर का अभिप्रेत उद्देश्य क्या है? पहला, क्या तुम निश्चित रूप से कह सकते हो कि परमेश्वर जो कुछ करता है, वह सब मानव-जाति की भलाई के लिए है? तुम लोगों को ये भव्य, खोखले शब्दों की तरह लग सकते हैं, किंतु भीतर के विवरण की जाँच करने पर क्या वह सब जो परमेश्वर करता है, एक सामान्य जीवन जीने की दिशा में मनुष्य की अगुआई और मार्गदर्शन करने के लिए नहीं है? चाहे वह मनुष्य से अपने नियमों का पालन करवाना हो या अपनी व्यवस्थाओं का पालन करवाना, परमेश्वर का उद्देश्य है कि मनुष्य शैतान की आराधना न करने लगे और उसके कारण हानि न उठाए; यह सबसे मूलभूत बात है, और यही वह काम है जिसे बिलकुल शुरुआत में किया गया था। बिलकुल शुरुआत में, जब मनुष्य परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझता था, तब उसने कुछ सरल व्यवस्थाएँ और नियम बनाए और ऐसे विनियम बनाए, जिनमें हर ऐसे पहलू का समावेश था, जिसकी कल्पना की जा सकती थी। ये विनियम सरल हैं, फिर भी उनमें परमेश्वर की इच्छा शामिल है। परमेश्वर मानव-जाति को सँजोता है, उसका पोषण करता है और उससे बहुत प्रेम करता है। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।) तो क्या हम कह सकते हैं कि उसका हृदय पवित्र है? क्या हम कह सकते हैं कि उसका हृदय साफ है? (हाँ।) क्या परमेश्वर के कोई अतिरिक्त इरादे हैं? (नहीं।) तो क्या उसका यह उद्देश्य सही और सकारात्मक है? (हाँ।) अपने कार्य के दौरान परमेश्वर ने जो भी विनियम बनाए हैं, उन सबका प्रभाव मनुष्य के लिए सकारात्मक है, और वे उसका मार्ग प्रशस्त करते हैं। तो क्या परमेश्वर के मन में कोई स्वार्थपूर्ण विचार हैं? जहाँ तक मनुष्य का संबंध है, क्या परमेश्वर के कोई अतिरिक्त उद्देश्य हैं? क्या परमेश्वर किसी तरह से मनुष्य का उपयोग करना चाहता है? (नहीं।) जरा भी नहीं। परमेश्वर वही करता है, जो वह कहता है और उसके वचन और कार्य उसके हृदय के विचारों से मेल खाते हैं। इसमें कोई दूषित उद्देश्य नहीं है, कोई स्वार्थपूर्ण विचार नहीं हैं। वह अपने लिए कुछ नहीं करता, जो कुछ भी वह करता है, मनुष्य के लिए करता है, बिना किसी व्यक्तिगत उद्देश्य के। हालाँकि उसकी अपनी योजनाएँ और इरादे हैं, जिन्हें वह मनुष्य पर लागू करता है, पर उनमें से कुछ भी उसके अपने लिए नहीं है। वह जो कुछ भी करता है, विशुद्ध रूप से मानव-जाति के लिए करता है, मानव-जाति को बचाने के लिए, उसे गुमराह न होने देने के लिए करता है। तो क्या उसका यह हृदय बहुमूल्य नहीं है? क्या तुम इस बहुमूल्य हृदय का लेशमात्र संकेत भी शैतान में देख सकते हो? तुम इसका लेशमात्र संकेत भी शैतान में नहीं देख सकते। परमेश्वर जो कुछ करता है, वह सहज रूप से प्रकट होता है। आओ, अब परमेश्वर के कार्य करने के तरीके को देखें; वह अपना काम कैसे करता है? क्या परमेश्वर इन व्यवस्थाओं और अपने वचनों को लेकर वशीकरण मंत्र[क] की तरह हर आदमी के सिर पर कसकर बाँध देता है और इस प्रकार उन्हें प्रत्येक मनुष्य पर थोपता है? क्या वह इस तरह से कार्य करता है? (नहीं।) तो फिर परमेश्वर किस तरह से अपना कार्य करता है? (वह हमारा मार्गदर्शन करता है। वह हमें सलाह और प्रोत्साहन देता है।) क्या वह धमकाता है? क्या वह तुमसे गोल-मोल बात करता है? (नहीं।) जब तुम सत्य को नहीं समझते, तो परमेश्वर तुम्हारा मार्गदर्शन कैसे करता है? (वह ज्योति चमकाता है।) वह तुम पर एक ज्योति चमकाकर तुम्हें स्पष्ट रूप से बताता है कि यह चीज़ सत्य के अनुरूप नहीं है, और फिर वह तुम्हें बताता है कि तुम्हें क्या करना चाहिए। परमेश्वर के कार्य करने के इन तरीकों से तुम्हें क्या लगता है, परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता कैसा है? क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर तुम्हारी समझ से परे है? (नहीं।) तो परमेश्वर के कार्य करने के इन तरीकों को देखकर तुम्हें कैसा महसूस होता है? परमेश्वर विशेष रूप से तुम्हारे बहुत करीब है; तुम्हारे और परमेश्वर के बीच में कोई दूरी नहीं है। जब परमेश्वर तुम्हारा मार्गदर्शन करता है, जब वह तुम्हारी ज़रूरतें पूरी करता है, तुम्हारी सहायता करता है और तुम्हें सहारा देता है, तो तुम्हें महसूस होता है कि परमेश्वर कितना सौम्य है, तुम्हारे मन में उसके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है, तुम महसूस करते हो कि वह कितना प्यारा है, तुम उसकी गर्मजोशी महसूस करते हो। लेकिन जब परमेश्वर तुम्हारी भ्रष्टता के लिए तुम्हारी भर्त्सना करता है, या जब वह अपने विरुद्ध विद्रोह करने के लिए तुम्हारा न्याय करता है और तुम्हें अनुशासित करता है, तो परमेश्वर किन तरीकों का इस्तेमाल करता है? क्या वह वचनों से तुम्हारी भर्त्सना करता है? क्या वह तुम्हारे वातावरण और लोगों, मामलों और चीज़ों के माध्यम से तुम्हें अनुशासित करता है? (हाँ।) परमेश्वर किस सीमा तक तुम्हें अनुशासन करता है? क्या परमेश्वर मनुष्य को उतनी ही मात्रा में अनुशासित करता है, जितनी मात्रा में शैतान मनुष्य को नुकसान पहुँचाता है? (नहीं, परमेश्वर मनुष्य को केवल उसी सीमा तक अनुशासित करता है, जिस सीमा तक वह सह सकता है।) परमेश्वर सौम्य, कोमल, प्यारे और परवाह करने के तरीके से कार्य करता है, जो असाधारण रूप से नपा-तुला और उचित होता है। उसका तरीका तुम्हारे भीतर तीव्र भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न नहीं करता, जैसे कि : "परमेश्वर को मुझे यह करने देना चाहिए" या "परमेश्वर को मुझे वह करने देना चाहिए चाहिए।" परमेश्वर कभी तुम्हें उस किस्म की मानसिक या भावनात्मक तीव्रता नहीं देता, जो चीज़ों को असहनीय बना देती है। क्या ऐसा नहीं है? यहाँ तक कि जब तुम परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के वचनों को स्वीकार करते हो, तब तुम कैसा महसूस करते हो? जब तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य को समझते हो, तब तुम कैसा महसूस करते हो? क्या तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर दिव्य और अलंघनीय है? (हाँ।) क्या उस समय तुम अपने और परमेश्वर के बीच दूरी महसूस करते हो? क्या तुम्हें परमेश्वर से डर लगता है? नहीं—बल्कि तुम परमेश्वर के लिए भयपूर्ण श्रद्धा महसूस करते हो। क्या लोग ये चीज़ें परमेश्वर के कार्य के कारण महसूस नहीं करते? यदि शैतान मनुष्य पर काम करता, तो क्या तब भी उनमें ये भावनाएँ होतीं? (नहीं।) परमेश्वर अपने वचनों, अपने सत्य और अपने जीवन का प्रयोग मनुष्य की निरंतर आपूर्ति के लिए और उसे सहारा देने के लिए करता है। जब मनुष्य कमज़ोर होता है, जब मनुष्य मायूसी महसूस करता है, तब निश्चित रूप से परमेश्वर यह कहते हुए कठोरता से बात नहीं करता कि, "मायूस मत हो! इसमें मायूस होने की क्या बात है? तुम कमज़ोर क्यों हो? इसमें कमज़ोर होने का क्या कारण है? तुम हमेशा कितने कमज़ोर हो, और तुम हमेशा कितने नकारात्मक रहते हो! तुम्हारे जिंदा रहने का क्या फायदा है? मर जाओ और किस्सा खत्म करो!" क्या परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है? (नहीं।) क्या परमेश्वर के पास इस तरह से कार्य करने का अधिकार है? (हाँ।) फिर भी परमेश्वर इस तरह से कार्य नहीं करता। परमेश्वर के इस तरह से कार्य नहीं करने की वजह है उसका सार, परमेश्वर की पवित्रता का सार। मनुष्य के लिए उसके प्रेम को, उसके द्वारा मनुष्य को सँजोकर रखने और उसका पोषण करने को, स्पष्ट रूप से एक-दो वाक्यों में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जो मनुष्य की डींगों में घटित होती हो, बल्कि परमेश्वर इसे वास्तविक रूप से अमल में लाता है; यह परमेश्वर के सार का प्रकटीकरण है। क्या ये सभी तरीके, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है, मनुष्य को परमेश्वर की पवित्रता दिखा सकते हैं? इन सभी तरीकों से, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है, जिनमें परमेश्वर के अच्छे इरादे शामिल हैं, जिनमें वे प्रभाव शामिल हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य पर लागू करना चाहता है, जिनमें वे विभिन्न तरीके शामिल हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करने के लिए अपनाता है, जिनमें उस प्रकार का कार्य शामिल है जिसे वह करता है, वह मनुष्य को क्या समझाना चाहता है—क्या तुमने परमेश्वर के अच्छे इरादों में कोई बुराई या धोखा देखा है? (नहीं।) तो जो कुछ परमेश्वर करता है, जो कुछ परमेश्वर कहता है, जो कुछ वह अपने हृदय में सोचता है, उसमें और साथ ही परमेश्वर के समस्त सार में, जिसे वह प्रकट करता है—क्या हम परमेश्वर को पवित्र कह सकते हैं? (हाँ।) क्या किसी मनुष्य ने संसार में, या अपने अंदर कभी ऐसी पवित्रता देखी है? परमेश्वर को छोड़कर, क्या तुमने इसे कभी किसी मनुष्य या शैतान में देखा है? (नहीं।) अपनी अब तक की चर्चा के आधार पर, क्या हम परमेश्वर को अद्वितीय, स्वयं पवित्र परमेश्वर कह सकते है? (हाँ।) परमेश्वर के वचनों सहित वह सब-कुछ, जो परमेश्वर मनुष्य को देता है, वे विभिन्न तरीके जिनके द्वारा परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करता है, जो परमेश्वर मनुष्य से कहता है, जिसकी परमेश्वर मनुष्य को याद दिलाता है, वह जो सलाह और प्रोत्साहन देता है—यह सब एक सार से उत्पन्न होता है : परमेश्वर की पवित्रता से। यदि कोई ऐसा पवित्र परमेश्वर न होता, तो कोई मनुष्य उसके कार्य को करने के लिए उसका स्थान न ले पाता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV' से उद्धृत

276. अंत के दिनों में, इन दिनों में परमेश्वर के कार्य के वर्तमान चरण में, वह मनुष्य को पहले की तरह अनुग्रह एवं आशीषें प्रदान नहीं करता है, न ही वह लोगों को आगे बढ़ने के लिए फुसलाता है। कार्य के इस चरण के दौरान, परमेश्वर के कार्य के सभी पहलुओं से मनुष्य ने क्या देखा जिसका उसने अनुभव किया है? मनुष्य ने परमेश्वर के प्रेम को, परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को देखा है। इस समयावधि के दौरान, परमेश्वर मनुष्य का भरण पोषण करता है, उसे सहारा देता है, प्रबुद्ध करता है और उसका मार्गदर्शन करता है, ताकि मनुष्य उसके बोले वचनों को और उसके द्वारा मनुष्य को प्रदत्त सत्य को जानने के लिए धीरे-धीरे उसके इरादों को जानने लगे। जब मनुष्य कमज़ोर होता है, जब वो हतोत्साहित होता है, जब उसके पास कहीं और जाने के लिए कोई स्थान नहीं होता, तब परमेश्वर मनुष्य को सान्त्वना, सलाह, एवं प्रोत्साहन देने के लिए अपने वचनों का उपयोग करेगा, ताकि मनुष्य की छोटी कद-काठी धीरे-धीरे मजबूत हो सके, सकारात्मकता में उठ सके और परमेश्वर के साथ सहयोग करने के लिए तैयार हो सके। परन्तु जब मनुष्य परमेश्वर की अवज्ञा करता है या उसका विरोध करता है, या अपनी भ्रष्टता को प्रकट करता है, तो परमेश्वर मनुष्य को ताड़ना देने में और उसे अनुशासित करने में कोई दया नहीं दिखाएगा। हालाँकि, मनुष्य की मूर्खता, अज्ञानता, दुर्बलता, एवं अपरिपक्वता के प्रति, परमेश्वर सहिष्णुता एवं धैर्य दिखाएगा। इस तरीके से, उस समस्त कार्य के माध्यम से जिसे परमेश्वर मनुष्य के लिए करता है, मनुष्य धीरे-धीरे परिपक्व होता है, बड़ा होता है, और परमेश्वर के इरादों को जानने लगता है, कुछ निश्चित सत्‍यों को जानने लगता है, कौन सी चीज़ें सकारात्मक हैं और कौन सी नकारात्मक हैं, यह जानने लगता है, यह जानने लगता है कि बुराई और अंधकार क्या हैं। परमेश्वर सदैव मनुष्य को ताड़ित एवं अनुशासित करने का ही एकमात्र दृष्टिकोण नहीं रखता है, लेकिन वह हमेशा सहिष्णुता एवं धैर्य भी नहीं दिखाता है। बल्कि वह प्रत्येक व्यक्ति का, भिन्न-भिन्न तरीकों से, उनके विभिन्न चरणों में और उनके भिन्न-भिन्न स्‍तरों और क्षमता के अनुसार, भरण-पोषण करता है। वह मनुष्य के लिए अनेक चीज़ें करता है और बड़ी क़ीमत पर करता है; मनुष्य इस कीमत या इन चीज़ों के बारे में कुछ भी महसूस नहीं करता है, फिर भी व्यवहार में, वह जो कुछ करता है उसे सच में हर एक व्यक्ति पर कार्यान्वित किया जाता है। परमेश्वर का प्रेम व्यवहारिक है : परमेश्वर के अनुग्रह के माध्यम से मनुष्य एक के बाद एक आपदा से बचता है, और इस पूरे समय मनुष्य की दुर्बलता के प्रति, परमेश्वर बार-बार अपनी सहिष्णुता दिखाता है। परमेश्वर का न्याय और उसकी ताड़ना लोगों को मानवजाति की भ्रष्टता और भ्रष्ट शैतानी सार को धीरे-धीरे जानने देते हैं। जो कुछ परमेश्वर प्रदान करता है, परमेश्वर का मनुष्य को प्रबुद्ध करना एवं उसका मार्गदर्शन, ये सब मानवजाति को सत्य के सार को और भी अधिक जानने देते हैं, और उत्तरोत्तर यह जानने देते हैं कि लोगों को किस चीज़ की आवश्यकता है, उन्हें कौन-सा मार्ग लेना चाहिए, वे किसके लिए जीते हैं, उनकी ज़िंदगी का मूल्य एवं अर्थ क्‍या है, और कैसे आगे के मार्ग पर चलना है। ये सभी कार्य जो परमेश्वर करता है, वे उसके एकमात्र मूल उद्देश्य से अभिन्न हैं। तो, यह उद्देश्य क्या है? क्यों परमेश्वर मनुष्य पर अपने कार्य को क्रियान्वित करने के लिए इन विधियों का उपयोग करता है? वह क्या परिणाम प्राप्त करना चाहता है? दूसरे शब्दों में, वह मनुष्य में क्या देखना चाहता है? वह उनसे क्या प्राप्त करना चाहता है? परमेश्वर जो देखना चाहता है वह है कि मनुष्य के हृदय को पुनर्जीवित किया जा सके। ये विधियाँ जिन्हें वह मनुष्य पर कार्य करने के लिए उपयोग करता है, निरंतर प्रयास हैं, मनुष्य के हृदय को जागृत करने के लिए, मनुष्य की आत्मा को जागृत करने के लिए, मनुष्य को यह जानने में समर्थ बनाने के लिए कि वह कहाँ से आया है, कौन उसका मार्गदर्शन, उसकी सहायता, उसका भरण-पोषण कर रहा है, और किसने मनुष्य को वर्तमान दिन तक जीवित रहने दिया है; वे मनुष्य को यह जानने देने का साधन है कि सृष्टिकर्ता कौन है, उसे किसकी आराधना करनी चाहिए, उसे किस प्रकार के मार्ग पर चलना चाहिए, और मनुष्य को किस तरह से परमेश्वर के सामने आना चाहिए; वे मनुष्य के हृदय को धीरे-धीरे पुनर्जीवित करने का साधन है, ताकि मनुष्य परमेश्वर के हृदय को जान ले, परमेश्वर के हृदय को समझ ले, और मनुष्य को बचाने के उसके कार्य के पीछे की बड़ी देखभाल एवं विचार को समझ ले। जब मनुष्य के हृदय को पुनर्जीवित किया जाता है, तब मनुष्य एक पतित एवं भ्रष्ट स्वभाव के साथऔर जीने की इच्छा नहीं करता, बल्कि इसके बजाय परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सत्य का अनुसरण करने की इच्छा करता है। जब मनुष्य के हृदय को जागृत कर दिया जाता है, तो मनुष्य खुद को शैतान से पूरी तरह अलग करने में सक्षम हो जाता है। अब उसे शैतान के द्वारा हानि नहीं पहुँचेगी, उसके द्वारा वो अब और नियंत्रित या मूर्ख नहीं बनेगा। इसके बजाय, मनुष्य परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए, परमेश्वर के कार्य और उसके वचनों में सक्रियात्मक रूप से सहयोग कर सकता है, इस प्रकार परमेश्वर के भय और बुराई को त्यागने को प्राप्त करता है। यह परमेश्वर के कार्य का मूल उद्देश्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

277. अपने लम्बे मानवीय जीवन में, लगभग प्रत्येक व्यक्ति ने अनेक ख़तरनाक परिस्थितियों और वह अनेक प्रलोभनों का सामना किया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शैतान तुम्हारे बगल में खड़ा है, उसकी आँखें लगातार तुम्हारे ऊपर जमी हैं। जब तुम पर आपदा आती है, शैतान इसमें आनंद मनाता है; जब तुम पर विपदाएँ पड़ती हैं, जब तुम्हारे लिए कुछ भी सही नहीं होता है, जब तुम शैतान के जाल में फँस जाते हो, इन बातों से शैतान को बड़ा मज़ा आता है। जहाँ तक परमेश्वर क्या कर रहा है इसकी बात है, वह हर बीतते क्षण के साथ तुम्हारी सुरक्षा कर रहा है, एक के बाद एक दुर्भाग्य से और एक के बाद एक आपदा से तुम्हें बचा रहा है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि जो कुछ मनुष्य के पास है—शान्ति और आनन्द, आशीषें एवं व्यक्तिगत सुरक्षा—सब-कुछ वास्तव में परमेश्वर के नियंत्रण के अधीन है; वह हर प्राणी के भाग्य का मार्गदर्शन एवं निर्धारण करता है। परन्तु क्या परमेश्वर के पास अपने पद की कोई बढ़ी हुई अवधारणा है, जैसा कि कुछ लोग कहते हैं? क्या परमेश्वर तुम्हारे सामने घोषणा करता है, "मैं सबसे महान हूँ। वह मैं हूँ जो तुम लोगों की ज़िम्मेदारी लेता है। तुम लोगों को मुझ से अवश्य दया की भीख माँगनी चाहिए और अवज्ञा के लिए मृत्युदंड दिया जाएगा"? क्या परमेश्वर ने कभी मानवजाति को इस प्रकार से धमकी दी है? (नहीं।) क्या उसने कभी कहा है, "मानवजाति भ्रष्ट है इसलिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मैं उससे कैसा व्यवहार करता हूँ, उनके साथ कसे भी व्यवहार किया जा सकता है; मुझे उनके लिए बहुत अच्छे ढंग से व्यवस्था करने की आवश्यकता नहीं है"? क्या परमेश्वर इस तरह से सोचता है? क्या परमेश्वर ने इस तरीके से कार्य किया है? (नहीं।) इसके विपरीत, प्रत्येक व्यक्ति के साथ परमेश्वर का बर्ताव सच्चा एवं ज़िम्मेदारीपूर्ण है। यहाँ तक कि वह तुमसे उससे भी अधिक ज़िम्मेदारी से व्यवहार करता है जितना तुम स्वयं के प्रति करते हो। क्या ऐसा नहीं है? परमेश्वर व्यर्थ में नहीं बोलता है, न ही वह ऊँचे पद का दिखावा करता है और न ही ढिठाई से लोगों को धोखा देता है। इसके बजाय वह ईमानदारी एवं खामोशी से उन चीज़ों को करता है जो उसे स्वयं करने की आवश्यकता है। ये चीज़ें मनुष्य के लिए आशीषें, शान्ति एवं आनन्द लाती हैं। ये मनुष्य को शांति एवं प्रसन्नता से परमेश्वर की दृष्टि के सामने और उसके परिवार में लाती हैं; और सामान्य विवेक और विचार के साथ वे परमेश्वर के सामने रहते हैं और परमेश्वर के उद्धार को स्वीकारते हैं। तो क्या परमेश्वर अपने कार्य में कभी भी मनुष्य के साथ धोखेबाज़ रहा है? क्या उसने कभी उदारता का झूठा प्रदर्शन किया है, पहले कुछ हँसी-मजाक के साथ मनुष्य को मूर्ख बनाया, फिर मनुष्य की ओर पीठ कर ली है? (नहीं।) क्या परमेश्वर ने कभी कहा कुछ है और फिर किया कुछ और है? क्या परमेश्वर ने लोगों से यह कहते हुए कभी खोखले वादे किए हैं और शेखी बघारी है कि वह उनके लिए ऐसा कर सकता है या वैसा करने के लिए उनकी सहायता कर सकता है, लेकिन फिर गायब हो गया है? (नहीं।) परमेश्वर में कोई छल नहीं है, और कोई झूठ नहीं है। परमेश्वर विश्वासयोग्य है और जो कुछ वह करता है उसमें सच्चा है। वही एकमात्र है जिस पर लोग भरोसा कर सकते हैं; एकमात्र परमेश्वर है जिसे लोग अपना जीवन एवं उनके पास जो है वो सबकुछ सौंप सकते हैं। चूँकि परमेश्वर में कोई छल नहीं है, तो क्या हम ऐसा कह सकते हैं कि परमेश्वर ही सबसे अधिक ईमानदार है? (हाँ।) निश्चित रूप से हम कह सकते हैं! यद्यपि, "ईमानदार" शब्द जब परमेश्वर पर लागू किया जाता है तो यह अत्यंत कमज़ोर, बहुत मानवीय है, हमारे लिए और क्या शब्द हैं जिन्हें हम इस्तेमाल कर सकते हैं? मानवीय भाषा की सीमाएँ ऐसी ही हैं। भले ही परमेश्वर को "ईमानदार" कहना थोड़ा अनुचित है, परन्तु फिर भी फिलहाल हम इसी शब्द का उपयोग करेंगे। परमेश्वर विश्वासयोग्य एवं ईमानदार है। तो जब हम इन पहलुओं के बारे में बात करते हैं तो हमारा आशय क्या है, हम किसे संदर्भित कर रहे हैं? क्या हमारा संदर्भ परमेश्वर और मनुष्य के बीच भिन्नताओं और परमेश्वर और शैतान के बीच भिन्नताओं से है? हाँ, हम ऐसा कह सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य परमेश्वर में शैतान के भ्रष्ट स्वभाव का एक भी नामोनिशान नहीं देख सकता है। क्या ऐसा कहने में मैं सही हूँ? आमीन? (आमीन!) हम शैतान की किसी भी बुराई को परमेश्वर में प्रकट होते हुए नहीं देखते हैं। वह सब जो परमेश्वर करता है और प्रकट करता है वह पूरी तरह से मनुष्य के लिए लाभप्रद एवं मनुष्य की सहायता करता है, वह पूरी तरह से मनुष्य का भरण-पोषण करने के लिए किया जाता है, वह जीवन से भरपूर है और मनुष्य को अनुसरण करने के लिए एक मार्ग और चलने के लिए एक दिशा देता है। परमेश्वर भ्रष्ट नहीं है और इसके अलावा, इस वक्त हर एक चीज़ जिसे परमेश्वर करता है उसे देखते हुए, क्या हम कह सकते हैं कि परमेश्वर पवित्र है? (हाँ।) चूँकि परमेश्वर में मानवजाति की कोई भ्रष्टता नहीं है और न ही मानवजाति के जैसा कोई भ्रष्ट स्वभाव या शैतान का सार है, और परमेश्वर के वारे में कुछ भी ऐसा नहीं है जो इन चीज़ों से समानता रखता हो, तो इस दृष्टिकोण से हम कह सकते हैं कि परमेश्वर पवित्र है। परमेश्वर किसी भ्रष्टता का प्रदर्शन नहीं करता है, और उसके कार्य में उसके स्वयं के सार का प्रकाशन ही इस बात की पूरी पुष्टि है कि स्वयं परमेश्वर पवित्र है। क्या तुम लोग इसे देखते हो? परमेश्वर के पवित्र सार को जानने के लिए, फिलहाल आओ हम इन दो पहलुओं पर नज़र डालें: 1) परमेश्वर में भ्रष्ट स्वभाव की झलक भी नहीं है; 2) मनुष्य पर परमेश्वर के कार्य का सार मनुष्य को स्‍वयं परमेश्वर के सार को देखने देता है और यह सार पूरी तरह से सकारात्मक है। क्योंकि वे चीज़ें जिन्हें परमेश्वर के कार्य का हर हिस्सा मनुष्य के लिए लाता है सभी सकारात्मक हैं। सबसे पहले, परमेश्वर अपेक्षा करता है कि मनुष्य ईमानदार हो—क्या यह सकारात्मक चीज़ नहीं है? परमेश्वर मनुष्य को बुद्धि देता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? परमेश्वर मनुष्य को भले एवं बुरे के बीच पहचान करने में सक्षम बनाता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? वह मनुष्य को मानवीय जीवन का अर्थ एवं मूल्य समझने देता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? वह मनुष्य को सत्य के अनुसार लोगों, घटनाओं, एवं चीज़ों के सार के भीतर देखने देता है—क्या यह सकारात्मक नहीं है? (हाँ, यह है।) और इन सब का परिणाम यह है कि मनुष्य शैतान के द्वारा अब और धोखा नहीं खाता है, शैतान के द्वारा अब और उसे नुकसान नहीं पहुँचाया जायेगा या शैतान के द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जायेगा। दूसरे शब्दों में, ये चीज़ें लोगों को शैतान की भ्रष्टता से अपने आप को पूरी तरह से स्वतन्त्र होने देती हैं, और इस तरह वे धीरे-धीरे परमेश्वर का भय मानने एवं बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

278. तुम परमेश्वर को चीज़ों के संबंध में मनुष्यों जैसे विचार रखते नहीं देखोगे, और इतना ही नहीं, उसे तुम चीज़ों को सँभालने के लिए मनुष्य के दृष्टिकोणों, ज्ञान, विज्ञान, दर्शन या कल्पना का उपयोग करते हुए नहीं देखोगे। इसके बजाय, परमेश्वर जो कुछ भी करता है और जो कुछ भी वह प्रकट करता है, वह सत्य से जुड़ा है। अर्थात्, उसका कहा हर वचन और उसका किया हर कार्य सच से संबंधित है। यह सत्य किसी आधारहीन कल्पना की उपज नहीं है; यह सत्य और ये वचन परमेश्वर द्वारा अपने सार और अपने जीवन के आधार पर व्यक्त किए जाते हैं। चूँकि ये वचन और परमेश्वर द्वारा की गई हर चीज़ का सार सत्य हैं, इसलिए हम कह सकते हैं कि परमेश्वर का सार पवित्र है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक बात जो परमेश्वर कहता और करता है, वह लोगों के लिए जीवन-शक्ति और प्रकाश लाती है; वह लोगों को सकारात्मक चीजें और उन सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता देखने में सक्षम बनाती है, और मनुष्यों को राह दिखाती है, ताकि वे सही मार्ग पर चलें। ये सब चीज़ें परमेश्वर के सार और उसकी पवित्रता के सार द्वारा निर्धारित की जाती हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V' से उद्धृत

279. जब तुम परमेश्वर की पवित्रता को समझने लगते हो, तब तुम वास्तव में परमेश्वर में विश्वास कर सकते हो; जब तुम परमेश्वर की पवित्रता को समझने लगते हो, तब तुम वास्तव में इन शब्दों "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है" के सच्चे अर्थ को समझ सकते हो। तुम अब यह सोचते हुए कोरी कल्पना नहीं करोगे कि चलने के लिए इसके अलावा भी मार्ग हैं जिन्हें तुम चुन सकते हो, और तुम उस हर एक चीज़ के साथ विश्वासघात करने की इच्छा नहीं करोगे जिसे परमेश्वर ने तुम्हारे लिए व्यवस्थित किया है। क्योंकि परमेश्वर का सार पवित्र है; इसका अर्थ है कि केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम जीवन के माध्यम से प्रकाश के धर्मी मार्ग पर चल सकते हो; केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम जीवन के अर्थ को जान सकते हो; केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम वास्तविक मानवता को जी सकते हो और सत्य को धारण भी कर सकते हो और उसे जान भी सकते हो। केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम सत्य से जीवन को प्राप्त कर सकते हो। केवल स्वयं परमेश्वर ही तुम्हें बुराई से दूर रहने में सहायता कर सकता है और तुम्हें शैतान की क्षति और नियन्त्रण से मुक्त कर सकता है। परमेश्वर के अलावा, कोई भी व्यक्ति और कोई भी चीज़ तुम्हें कष्ट के सागर से नहीं बचा सकती है ताकि तुम और कष्ट न सहो। यह परमेश्वर के सार के द्वारा निर्धारित किया जाता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही इतने निःस्वार्थ रूप से तुम्हें बचाता है; केवल परमेश्वर ही अंततः तुम्हारे भविष्य के लिए, तुम्हारी नियति के लिए और तुम्हारे जीवन के लिए ज़िम्मेदार है, और वही तुम्हारे लिए सभी चीज़ों को व्यवस्थित करता है। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई सृजित या अनसृजित प्राणी प्राप्त नहीं कर सकता है। क्योंकि कोई भी सृजित या अनसृजित प्राणी परमेश्वर के सार के समान सार को धारण नहीं कर सकता है, किसी भी व्यक्ति या प्राणी में तुम्हें बचाने या तुम्हारी अगुवाई करने की क्षमता नहीं है। मनुष्य के लिए परमेश्वर के सार का यही महत्व है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI' से उद्धृत

फुटनोट:

क. "वशीकरण मंत्र" एक मंत्र है, जिसे भिक्षु तांग सानज़ैंग ने चीनी उपन्यास 'जर्नी टु द वेस्ट' (पश्चिम की यात्रा) में इस्तेमाल किया है। वह इस मंत्र का उपयोग सन वूकोंग (वानर राजा) को नियंत्रित करने के लिए उसके सिर के चारों ओर एक धातु का छल्ला कसकर करता है, जिससे उसे तेज सिरदर्द हो जाता है और वह काबू में आ जाता है। यह व्यक्ति को बाँधने वाली किसी चीज़ का वर्णन करने के लिए एक रूपक बन गया है।

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