9.4. सभी चीज़ों के लिए जीवन के स्रोत के रूप में परमेश्वर पर

280. जीवन का मार्ग कोई ऐसी चीज़ ऐसी नहीं जिसे कोई भी धारण कर ले, न ही इसे हर कोई आसानी से प्राप्त कर सकता है। ऐसा इसलिए है कि जीवन केवल परमेश्वर से ही आ सकता है, कहने का अर्थ है कि केवल स्वयं परमेश्वर ही जीवन के सार को धारण करता है, केवल स्वयं परमेश्वर के पास ही जीवन का मार्ग है। और इसलिए केवल परमेश्वर ही जीवन का स्रोत है, और जीवन के जल का सदा बहने वाला सोता है। जब से उसने संसार को रचा है, परमेश्वर ने जीवन की प्राणशक्ति से जुड़े बहुत से कार्य किये हैं, बहुत सारा कार्य मनुष्य को जीवन प्रदान करने के लिए किया है और बहुत अधिक मूल्य चुकाया है ताकि मनुष्य जीवन प्राप्त करे। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर स्वयं ही अनंत जीवन है, और वह स्वयं ही वह मार्ग है जिससे मनुष्य पुनर्जीवित होता है। परमेश्वर मनुष्य के हृदय में हमेशा मौजूद है और हर समय उनके मध्य में रहता है। वह मनुष्यों के जीवन यापन की प्रेरक शक्ति है, मनुष्य के अस्तित्व का आधार है, जन्म के बाद मनुष्य के अस्तित्व के लिए उर्वर संचय है। वह मनुष्य को नया जन्म लेने देता है, और प्रत्येक भूमिका में दृढ़तापूर्वक जीने के लिये सक्षम बनाता है। उसकी सामर्थ्य और उसकी कभी न बुझने वाली जीवन की शक्ति के कारण, मनुष्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहता है, जिसके दौरान परमेश्वर के जीवन की सामर्थ्य मनुष्य के अस्तित्व के लिए मुख्य आधार रही है और जिसके लिए परमेश्वर ने ऐसी कीमत चुकाई है जैसी किसी साधारण मनुष्य ने कभी भी नहीं चुकाई। परमेश्वर की जीवन शक्ति किसी भी शक्ति पर प्रभुत्व कर सकती है; इसके अलावा, वह किसी भी शक्ति से बढ़कर है। उसका जीवन शाश्वत है, उसकी सामर्थ्य असाधारण है, और उसकी जीवन शक्ति को किसी भी सृजित प्राणी या शत्रु शक्ति द्वारा पराजित नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर की जीवन-शक्ति का अस्तित्व है, और चाहे कोई भी समय या स्थान क्यों न हो, वह अपने शानदार तेज से चमकती है। स्वर्ग और पृथ्वी बहुत बड़े बदलावों से गुज़र सकते हैं, लेकिन परमेश्वर का जीवन हमेशा समान ही रहता है। हर चीज़ का अस्तित्व समाप्त हो सकता है, परन्तु परमेश्वर का जीवन फिर भी अस्तित्व में रहेगा, क्योंकि परमेश्वर ही सभी चीजों के अस्तित्व का स्रोत है और उनके अस्तित्व का मूल है। मनुष्य का जीवन परमेश्वर से उत्पन्न होता है, स्वर्ग का अस्तित्व परमेश्वर के कारण है, और पृथ्वी का अस्तित्व भी परमेश्वर की जीवन शक्ति से ही उत्पन्न होता है। जीवन शक्ति युक्त कोई भी वस्तु परमेश्वर के प्रभुत्व से श्रेष्ठ नहीं हो सकती, और प्रबलता से युक्त कोई भी वस्तु परमेश्वर के अधिकार के क्षेत्र से बचकर नहीं निकल सकती है। इस प्रकार से, चाहे वे कोई भी क्यों न हों, सभी को परमेश्वर के अधिकार के अधीन ही समर्पित होना होगा, प्रत्येक को परमेश्वर की आज्ञा के अधीन रहना होगा, और कोई भी उसके हाथों से बच कर नहीं जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है' से उद्धृत

281. जब से परमेश्वर ने उन चीज़ों को बनाया है, सभी चीज़ें नियमित रूप से उसके बनाए नियमों के आधार पर संचालित और निरन्तर विकसित हो रही हैं। उसकी सतर्क निगाहों और शासन के अधीन, सभी चीज़ें इंसान के जीवन के साथ-साथ नियमित रूप से विकसित हो रही हैं। कोई भी चीज़ इन विधियों को बदलने में सक्षम नहीं है, और न ही कोई भी चीज़ इन विधियों को नष्ट कर सकती है। यह परमेश्वर के शासन के कारण है कि सभी प्राणी बहुगुणित हो सकते हैं, और उसके शासन और प्रबंधन के कारण सभी प्राणी जीवित रह सकते हैं। कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर के शासन के अधीन, सभी प्राणियों का अस्तित्व बना हुआ है, वे पनपते हैं, लुप्त हो जाते हैं, और एक सुव्यवस्थित विधि से फिर से शरीर में आते हैं। जब बसंत का आगमन होता है, हल्की-हल्की बारिश बसंत के उस एहसास को लेकर आती है और पृथ्वी को नम करती है। ज़मीन नर्म पड़ने लगती है, घास मिट्टी में से ऊपर की ओर बढ़ते हुए अंकुरित होना शुरू करती है, जबकि वृक्ष धीरे-धीरे हरे हो जाते हैं। ये सभी जीवित चीज़ें पृथ्वी पर नई जीवन शक्ति लेकर आती हैं। यह सभी प्राणियों के अस्तित्व में आने और फलने-फूलने का दृश्य है। सभी प्रकार के पशु भी बसंत की गर्माहट को महसूस करने के लिए अपनी मांदों से बाहर आ जाते हैं और एक नए वर्ष की शुरूआत करते हैं। सभी प्राणी ग्रीष्म ऋतु की गर्माहट के दौरान धूप सेंकते हैं और मौसम के द्वारा लाई गई तपन का मज़ा लेते हैं। वे तीव्रता से बढ़ते हैं; पेड़, घास, और सभी प्रकार के पौधे बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं, फिर वे खिलते और फल उत्पन्न करते हैं। ग्रीष्म ऋतु के दौरान सभी प्राणी बहुत व्यस्त रहते हैं, जिनमें मनुष्य भी शामिल हैं। पतझड़ में, बारिश शरद ऋतु की ठंडक लेकर लाती है, और सब प्रकार के जीवित प्राणी फसलों की कटाई के मौसम के आगमन की अनुभूति लेना शुरू कर देते हैं। सभी प्राणी फल उत्पन्न करते हैं, और मनुष्य शीत ऋतु की तैयारी में भोजन रखने हेतु भिन्न प्रकार फल इकट्ठा करना शुरू कर देते हैं। शीत ऋतु में सभी प्राणी धीरे-धीरे ठंडक में आराम करना, एवं शांत होना प्रारम्भ कर देते हैं, और साथ ही लोग भी इस मौसम के दौरान विराम लेते हैं। बसंत से ग्रीष्म से शरद से शीत ऋतुओं के ये परिवर्तनकाल—ये सभी परिवर्तन परमेश्वर द्वारा स्थापित नियमों के अनुसार घटित होते हैं। वह इन नियमों का उपयोग करके सभी चीज़ों और मनुष्यों की अगुवाई करता है और उसने मानवजाति के लिए एक समृद्ध और जीवन का रंग-बिरंगा मार्ग स्थापित किया है, जीवित रहने के लिए एक ऐसा वातावरण तैयार किया है जिसमें अलग अलग तापमान और अलग ऋतुएं होती हैं। जीवित रहने हेतु इन सुव्यवस्थित वातावरण के अंतर्गत, मनुष्य भी सुव्यवस्थित तरीके से जीवित रह सकता है और बहुगुणित हो सकता है। मनुष्य इन नियमों को नहीं बदल सकता है और न ही कोई व्यक्ति या प्राणी इन्हें तोड़ सकता है। यद्यपि असंख्य परिवर्तन हो चुके हैं—समुद्र खेत बन गए हैं, जबकि खेत समुद्र बन गए हैं—फिर भी ये नियम लगातार अस्तित्व में बने रहते हैं और ये अस्तित्व में हैं क्योंकि परमेश्वर अस्तित्व में है। यह परमेश्वर के शासन और उसके प्रबंधन की वजह से है। इस प्रकार के सुव्यवस्थित, एवं कहीं बड़े वातावरण के साथ, इन नियमों और विधियों के अंतर्गत लोगों की ज़िन्दगी आगे बढ़ती है। इन नियमों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों को विकसित किया है, और लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन नियमों के भीतर रहकर जीवित रहे हैं। लोगों ने जीवित बचे रहने के लिए इस सुव्यवस्थित वातावरण का और साथ ही परमेश्वर के द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी सृजित बहुत सी चीज़ों को आनन्द लिया है। हालांकि लोगों को महसूस होता है कि इस प्रकार के नियम स्वाभाविक हैं, यद्यपि वे उन्हें पूरी तरह से नकार देते हैं, और भले ही उन्हें न लगे कि परमेश्वर इन नियमों का आयोजन कर रहा है, कि परमेश्वर इन नियमों पर शासन कर रहा है, चाहे कुछ हो, परमेश्वर इस अपरिवर्तनीय कार्य में हमेशा से लगा हुआ है। इस अपरिवर्तनीय कार्य में उसका उद्देश्य मानवता को जीवित रखना है, ताकि मनुष्‍यगण निरन्तर बने रहें।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX' से उद्धृत

282. परमेश्वर उन नियमों का स्वामी है, जो सभी चीज़ों के संचालन को नियंत्रित करते हैं; वह उन नियमों का स्वामी है, जो सभी प्राणियों के अस्तित्व को नियंत्रित करते हैं; वह सभी चीज़ों को नियंत्रित करता है और उन्हें इस तरह रखता है कि वे एक-दूसरे को मजबूत और परस्पर निर्भर दोनों बनाएँ, ताकि वे नष्ट या विलुप्त न हों। केवल इसी तरह मनुष्य जीवित रह सकते हैं; केवल इसी तरह वे परमेश्वर के मार्गदर्शन में ऐसे वातावरण में रह सकते हैं। परमेश्वर संचालन के इन नियमों का स्वामी है, और कोई भी इनमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता, न कोई इन्हें बदल ही सकता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही इन नियमों को जानता है और केवल वही इनका प्रबंध करता है। पेड़ कब अंकुरित होंगे; बारिश कब होगी; धरती कितना जल एवं कितने पोषक तत्त्व पौधों को देगी; किस मौसम में पत्ते गिरेंगे; किस मौसम में पेड़ों पर फल लगेंगे; कितने पोषक तत्त्व सूर्य का प्रकाश पेड़ों को देगा; सूर्य के प्रकाश द्वारा पोषित किए जाने के बाद पेड़ उच्छ्वास के रूप में क्या छोड़ेंगे—इन सभी चीज़ों को परमेश्वर ने पहले ही तब निश्चित कर दिया था, जब उसने सभी चीज़ों को बनाया था, उन नियमों के रूप में जिन्हें कोई नहीं तोड़ सकता। परमेश्वर द्वारा बनाई हुई चीज़ें—चाहे वे जीवित हों या मनुष्य की दृष्टि में निर्जीव, उसके हाथ में रहती हैं, जहाँ वह उन्हें नियंत्रित करता है और उन पर शासन करता है। इन नियमों को कोई बदल या तोड़ नहीं सकता। दूसरे वचनों में, जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों का निर्माण किया था, तब उसने पूर्वनिर्धारित किया कि धरती के बिना पेड़ अपनी जड़ें नीचे नहीं फैला सकता, अंकुरित नहीं हो सकता और बढ़ नहीं सकता; कि यदि धरती पर कोई पेड़ न होता, तो वह सूख जाती; कि पेड़ को चिड़ियों का आशियाना भी होना चाहिए, और एक ऐसी जगह, जहाँ वे हवाओं से बचने के लिए आश्रय ले सकें। क्या कोई पेड़ सूरज की रोशनी के बिना जी सकता है? (नहीं।) न ही वह केवल धरती के साथ रह सकता है। ये सब चीज़ें मानव-जाति के लिए, उसके अस्तित्व के लिए हैं। पेड़ से मनुष्य ताजी हवा प्राप्त करता है, और वह धरती पर रहता है, जिसकी पेड़ों द्वारा रक्षा की जाती है। मनुष्य सूर्य की रोशनी और विभिन्न प्राणियों के बिना नहीं रह सकता। हालाँकि ये संबंध जटिल हैं, फिर भी तुम्हें यह याद रखना चाहिए कि परमेश्वर ने उन नियमों को बनाया है, जो सभी चीज़ों का नियंत्रण करते हैं, ताकि वे एक-दूसरे को मजबूत करें, एक-दूसरे पर निर्भर रहें, और एक-साथ मौजूद रहें। दूसरे वचनों में, उसके द्वारा बनाई गई हर-एक चीज़ का मूल्य और महत्व है। यदि परमेश्वर ने कोई चीज़ बिना किसी महत्व के बनाई होती, तो परमेश्वर उसे लुप्त होने देता। यह उन तरीकों में से एक है, जिसे परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए आपूर्ति करने में इस्तेमाल करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII' से उद्धृत

283. "परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए आपूर्ति करता है" बहुत व्यापक महत्व और विस्तार वाली उक्ति है। परमेश्वर सिर्फ लोगों को उनके दैनिक भोजन एवं पेय की ही आपूर्ति नहीं करता, बल्कि वह मनुष्यों को उनकी ज़रूरत की हर चीज़ की आपूर्ति करता है, जिनमें हर वह चीज़ तो शामिल है ही, जिसे लोग देख सकते हैं, साथ ही वे चीज़ें भी शामिल हैं, जिन्हें देखा नहीं जा सकता। परमेश्वर मानव-जाति के लिए अनिवार्य इस वातावरण को कायम रखता है, इसका प्रबंध करता है और इस पर शासन करता है। दूसरे वचनों में, मानव-जाति को हर मौसम में जिस भी वातावरण की ज़रूरत होती है, परमेश्वर ने उसे तैयार किया है। परमेश्वर हवा और तापमान के प्रकार का भी प्रबंध करता है, ताकि वे मनुष्य के अस्तित्व के लिए उपयुक्त हो सकें। इन चीजों को नियंत्रित करने वाले नियम अपने आप या यों ही बिना सोचे-विचारे घटित नहीं होते; वे परमेश्वर की संप्रभुता एवं उसके कर्मों का परिणाम हैं। स्वयं परमेश्वर इन सभी नियमों का स्रोत है और सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है। भले ही तुम इस पर विश्वास करो या न करो, भले ही तुम इसे देख पाओ या न देख पाओ, या भले ही तुम इसे समझ पाओ या न समझ पाओ, यह एक स्थापित और अकाट्य सत्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII' से उद्धृत

284. जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की, तब उसने उन्हें सन्तुलित करने के लिए, पहाड़ों और झीलों के वास की स्थितियों को सन्तुलित करने के लिए, पौधों और सभी प्रकार के पशुओं, पक्षियों, कीड़ों-मकोड़ों के वास की स्थितियों को सन्तुलित करने के लिए सभी प्रकार की पद्धतियों और तरीकों का उपयोग किया—उसका लक्ष्य था कि सभी प्रकार के प्राणियों को उन नियमों के अंतर्गत जीने और बहुगुणित होने की अनुमति दे जिन्हें उसने स्थापित किया था। सृष्टि की कोई भी चीज़ इन नियमों के बाहर नहीं जा सकती है, और उन्हें तोड़ा नहीं जा सकता है। केवल इस प्रकार के मूल वातावरण के अंतर्गत ही मनुष्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी सकुशल जीवित रह सकते हैं और बहुगुणित हो सकते हैं। यदि कोई प्राणी परमेश्वर के द्वारा स्थापित मात्रा या दायरे से बाहर चला जाता है, या वह उसके शासन के अधीन उस वृद्धि दर, आवृत्ति, या संख्या से अधिक बढ़ जाता है, तो जीवित रहने के लिए मानवजाति का वातावरण विनाश की भिन्न-भिन्न मात्राओं को सहेगा। और साथ ही, मानवजाति का जीवित रहना खतरे में पड़ जाएगा। यदि एक प्रकार का प्राणी संख्या में बहुत अधिक है, तो यह लोगों के भोजन को छीन लेगा, लोगों के जल के स्रोत को नष्ट कर देगा, और उनके निवास स्थान को बर्बाद कर देगा। उस तरह से, मनुष्य का प्रजनन या जीवन तुरन्त प्रभावित होगा। ... यदि एक प्रकार के या अनेक प्रकार के प्राणी अपनी उपयुक्त संख्या से आगे बढ़ जाते हैं, तो हवा, तापमान, आर्द्रता, और यहाँ तक कि जीवित रहने के मानवजाति के आकाश के अंतर्गत हवा के तत्व भी भिन्न-भिन्न मात्रा में ज़हरीले और नष्ट हो जाएंगे। उसी प्रकार, इन परिस्थितियों के अधीन, मनुष्य का जीवित रहना और उसकी नियति तब भी उस प्रकार के वातावरण के खतरे के वश में होगी। अतः, यदि लोग इन सन्तुलनों को खो देते हैं, तो वह हवा जिसमें वे सांस लेते हैं ख़राब हो जाएगी, वह जल जो वे पीते हैं दूषित हो जाएगा, और वह तापमान जिसकी उन्हें ज़रुरत है वह भी बदल जाएगा, और भिन्न-भिन्न मात्रा से प्रभावित होगा। यदि ऐसा होता है, तो जीवित बचे रहने के लिए वातावरण जो सहज रूप से मनुष्यजाति के हैं बहुत बड़े प्रभावों और चुनौतियों के अधीन हो जाएँगे। इस परिस्थिति के अधीन जहाँ जीवित रहने के लिए मनुष्यों के मूल वातावरण को नष्ट कर दिया गया है, तो मानवजाति की नियति और भविष्य की सम्भावनाएं क्या होंगी? यह एक बहुत गम्भीर समस्या है! क्योंकि परमेश्वर जानता है कि किस कारण से सृष्टि की प्रत्येक चीज़ मनुष्यजाति के वास्ते मौज़ूद है, हर एक प्रकार की चीज़ जिसे उसने बनाया है की भूमिका क्या है, इसका लोगों पर कैसा प्रभाव है, और यह मानवजाति के लिए कितना बड़ा लाभ लेकर आता है—परमेश्वर के हृदय में इन सब के लिए एक योजना है और वह सभी चीज़ों के हर एक पहलू का प्रबन्ध करता है जिसका उसने सृजन किया है, अतः मनुष्यों के लिए, हर एक कार्य जो वह करता है वह बहुत ही महत्वपूर्ण है—व‍ह सब ज़रुरी है। तो जब तुम सभी चीज़ों के मध्य किसी पारिस्थितिक घटना को या सभी चीज़ों के मध्य कुछ प्राकृतिक नियमों को देखते हो, तो तुम हर एक चीज़, जिसे परमेश्‍वर द्वारा सृजन किया गया है, उसकी अपरिहार्यता के विषय में फ़िर कभी शंकालु नहीं रहोगे। तुम सभी चीज़ों के विषय में परमेश्वर के इन्तज़ामों पर और मानवजाति के लिए आपूर्ति करने हेतु उसके विभिन्न तरीकों पर मनमाने ढंग से फैसले लेने के लिए आगे से अज्ञानता के शब्दों का उपयोग नहीं करोगे। साथ ही तुम सभी चीज़ों के लिए परमेश्वर के नियमों पर मनमाने ढंग से निष्कर्ष नहीं निकालोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX' से उद्धृत

285. यदि सभी सृष्टि की सभी चीज़ें अपने नियमों को गँवा दें, तो उनका अस्तित्व न रहे; यदि सभी चीज़ों के नियम लुप्त हो जाएँ, तो सभी चीज़ों के बीच जीवित प्राणी क़ायम नहीं रह पाएँगे। मनुष्यजाति जीवित रहने के लिए अपने वातावरण को भी गँवा देता जिस पर वह जीवित रहने के लिए निर्भर है। यदि मनुष्य वह सब कुछ गँवा देता, तो वह लगातार जीवित नहीं रह पाएगा और पीढ़ी-दर-पीढ़ी बहुगुणित नहीं हो पाएगा। मनुष्य आज तक ज़िन्दा बचा हुआ है तो उसका कारण है क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्यजाति को उसका पोषण करने के लिये सृष्टि की सभी चीज़ें प्रदान की हैं, ताकि विभिन्न तरीकों से वे जीव मानवजाति का पोषण करें। चूँकि परमेश्वर विभिन्न तरीकों से मानवजाति का पालन-पोषण करता है, इसीलिये वह आज तक जीवित बची हुई है, कि वे आज तक ज़िन्दा बचे हुए हैं। जीवित रहने के लिए उस प्रकार के स्थायी वातावरण के साथ जो अनुकूल और सुव्यवस्थित है, पृथ्वी पर सभी प्रकार के लोग, और सभी प्रकार की जातियां अपने निर्दिष्ट दायरों के भीतर जीवित रह सकती हैं। कोई भी इन दायरों या इन सीमाओं से बाहर नहीं जा सकता है क्योंकि परमेश्वर ने सब की सीमा रेखाएँ खींच दी हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX' से उद्धृत

286. सभी चीज़ों को परमेश्वर के शासन से अलग नहीं किया जा सकता है, और न ही एक अकेला व्यक्ति स्वयं को उसके शासन से अलग कर सकता है। उसके नियम को खोने और उसके प्रयोजनों को खोने का अर्थ होगा कि लोगों का जीवन, अर्थात् देह में लोगों का जीवन लुप्त हो जाएगा। यह मानवजाति के लिए जीवित रहने हेतु परमेश्वर द्वारा स्थापित विभिन्न वातावरण का महत्व है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम किस जाति के हो या तुम भूमि के किस हिस्से पर रहते हो, चाहे पश्चिम में हो या पूर्व में—तुम जीवित रहने के लिए उस वातावरण से अपने आपको अलग नहीं कर सकते हो जिसे परमेश्वर ने मानवजाति के लिए स्थापित किया है, और तुम जीवित रहने के लिए उस वातावरण के पोषण और प्रयोजनों से अपने आपको अलग नहीं कर सकते हो जिसे उसने मनुष्यों के लिए स्थापित किया है। चाहे तुम्हारी आजीविका कुछ भी हो, तुम जीने के लिए किसी पर भी आश्रित हो, और देह में अपने जीवन को बनाए रखने के लिए तुम किस पर निर्भर हो, तुम स्वयं को परमेश्वर के शासन और प्रबंधन से अलग नहीं कर सकते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX' से उद्धृत

287. परमेश्वर ने इस संसार की रचना की और वह इसमें एक जीवित प्राणी, मनुष्य को लेकर आया जिसे उसने जीवन प्रदान किया। इसके बाद, मनुष्य के माता-पिता और परिजन हुए तथा अब वह अकेला नहीं था। जब से मनुष्य ने पहली बार इस भौतिक दुनिया पर नजरें डालीं, तब से वह परमेश्वर के विधान के भीतर विद्यमान रहने के लिए नियत था। यह परमेश्वर की दी हुई जीवन की साँस है जो हर एक प्राणी को उसकी वयस्कता के विकास में सहयोग देती है। इस प्रक्रिया के दौरान, किसी को भी ऐसा महसूस नहीं होता है कि मनुष्य परमेश्वर की देखरेख में बड़ा हो रहा है, बल्कि वे यह मानते हैं कि मनुष्य अपने माता-पिता की प्रेमपूर्ण देखभाल के तहत ऐसा कर रहा है, और यह कि यह जीवन की उसकी अपनी नैसर्गिक प्रवृत्ति है जो इस बढ़ने की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य नहीं जानता कि जीवन किसने प्रदान किया है या यह कहाँ से आया है, जिस तरह से जीवन की नैसर्गिक प्रवृत्ति चमत्कार करती है उसे तो इंसान बिल्कुल नहीं जानता है। वह केवल इतना ही जानता है कि भोजन ही वह आधार है जिस पर उसका जीवन चलता रहता है, अध्यवसाय ही उसके अस्तित्व का स्रोत है, और यह कि उसके मन के विश्वास वे पूँजी हैं जिस पर उसका अस्तित्व निर्भर करता है। परमेश्वर की ओर से आने वाले अनुग्रह और भरण-पोषण के बारे में, मनुष्य पूरी तरह से बेखबर है, और इस तरह वह परमेश्वर द्वारा उसे प्रदान किये गए जीवन को निरुद्देश्य बर्बाद कर देता है...। इस मानवजाति का एक भी व्यक्ति पर परमेश्वर दिन-रात निगाह रखता है, उसकी आराधना करने की पहल नहीं करता है। परमेश्वर ही अपनी बनायी योजना के अनुसार, उस मनुष्य पर कार्य करता रहता है, जिससे वह कोई अपेक्षाएँ नहीं करता है। वह इस आशा में ऐसा करता है कि एक दिन, मनुष्य अपने सपने से जागेगा और अचानक जीवन के मूल्य और अर्थ को समझेगा, परमेश्वर ने उसे जो कुछ दिया है उसके लिए जो कीमत परमेश्वर ने चुकाई है उसे, और उस उत्सुक व्यग्रता को जिसके साथ परमेश्वर मनुष्य के उसकी ओर मुड़ने की प्रतीक्षा करता है, को समझेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है' से उद्धृत

288. परमेश्वर के द्वारा सभी चीज़ों की आपूर्ति यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि वह सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है, क्योंकि वह उस आपूर्ति का स्रोत है, जिसने सभी चीज़ों को अस्तित्व में बने रहने, जीवित रहने, प्रजनन करने और जारी रहने में सक्षम किया है, और स्वयं परमेश्वर के अलावा और कोई स्रोत नहीं है। परमेश्वर सभी चीज़ों की सभी आवश्यकताओं की और मनुष्यजाति की भी सभी आवश्यकताओं की आपूर्ति करता है, चाहे वे लोगों की सर्वाधिक बुनियादी पर्यावरणीय आवश्यकताएँ हों, उनके दैनिक जीवन की आवश्यकताएँ हों, या सत्य संबंधी आवश्यकताएँ हों, जिसकी वह लोगों की आत्माओं के लिए आपूर्ति करता है। सभी दृष्टिकोणों से, जब परमेश्वर की पहचान और मनुष्यजाति के लिए उसकी हैसियत की बात आती है, तो केवल स्वयं परमेश्वर ही सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है। क्या यह सही है? (हाँ।) अर्थात, परमेश्वर इस भौतिक संसार का शासक, स्वामी और आपूर्तिकर्ता है जिसे लोग अपनी आँखों से देख सकते हैं और महसूस कर सकते हैं। मनुष्यजाति के लिए, क्या यह परमेश्वर की पहचान नहीं है? यह पूरी तरह सत्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII' से उद्धृत

289. आध्यात्मिक दुनिया एक महत्वपूर्ण स्थान है, एक ऐसा स्थान जो भौतिक संसार से भिन्न है। और मैं क्यों कहता हूँ कि यह महत्वपूर्ण है? हम इसके बारे में विस्तार से बात करने जा रहे हैं। आध्यात्मिक दुनिया का अस्तित्व मनुष्यजाति के भौतिक संसार से अभिन्‍न रूप से जुड़ा है। सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के प्रभुत्व में वह मानव जीवन और मृत्यु के चक्र में एक बड़ी भूमिका निभाता है; यह इसकी भूमिका है, और उन कारणों में से एक है कि क्यों इसका अस्तित्व महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह एक ऐसा स्थान है जो पाँच इंद्रियों के लिये अगोचर है, इसलिए कोई भी इस बात का अनुमान नहीं लगा सकता कि इसका अस्तित्व है अथवा नहीं। आध्यात्मिक दुनिया की असामान्य घटनाएँ मनुष्यजाति के अस्तित्व के साथ गहराई से जुड़ी हुई हैं, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्यजाति के जीवन की व्यवस्था भी आध्यात्मिक दुनिया से बेहद प्रभावित होता है। क्या यह परमेश्वर की संप्रभुता से संबंधित है? यह संबंधित है। जब मैं ऐसा कहता हूँ, तो तुम लोग समझ जाओ कि क्यों मैं इस विषय पर चर्चा कर रहा हूँ: क्योंकि यह परमेश्वर की संप्रभुता से, और उसके प्रशासन से संबंधित है। इस तरह के एक संसार में—जो लोगों के लिए अदृश्य है—इसकी हर स्वर्गिक आज्ञा, आदेश और प्रशासनिक प्रणाली भौतिक संसार के किसी भी देश की व्यवस्थाओं और प्रणालियों से बहुत उच्च है, और संसार में रहने वाला कोई भी प्राणी उनकी अवहेलना करने या उन्हें हथियाने का साहस नहीं करेगा। क्या यह परमेश्वर की संप्रभुता और प्रशासन से संबंधित है? इस संसार में, स्पष्ट प्रशासनिक आदेश, स्पष्ट स्वर्गिक आज्ञाएँ और स्पष्ट विधान हैं। विभिन्न स्तरों पर और विभिन्न क्षेत्रों में, न्यायालय अधिकारी पूर्णरुप से अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं, और नियमों और विनियमों का पालन करते है, क्योंकि वे जानते हैं कि स्वर्गिक आज्ञा के उल्लंघन का परिणाम क्या होता है, वे स्पष्ट रूप से अवगत हैं कि किस प्रकार परमेश्वर दुष्टों को दण्ड और भले लोगों को इनाम देता है, और वह किस प्रकार सभी चीज़ों को चलाता है, वह किस प्रकार हर चीज़ पर शासन करता है, और, इसके अतिरिक्त, वे स्पष्ट रुप से देखते हैं कि किस प्रकार परमेश्वर अपने स्वर्गिक आदेशों और विधानों को कार्यान्वित करता है। क्या ये उस भौतिक संसार से भिन्न हैं, जिसमें मनुष्यजाति रहती है? वे व्यापक रुप से भिन्न हैं। यह एक ऐसा संसार है जो भौतिक संसार से पूर्णतया भिन्न है। चूँकि यहाँ स्वर्गिक आदेश और विधान हैं, इसलिए यह परमेश्वर की संप्रभुता, प्रशासन, और इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के स्वभाव तथा स्वरूप से संबंधित है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X' से उद्धृत

290. परमेश्वर ने आध्यात्मिक राज्य में विभिन्न स्वर्गिक आज्ञाएँ, आदेश और प्रणालियाँ स्थापित की हैं, इन स्वर्गिक आज्ञाओं, आदेशों और प्रणालियों की घोषणा के पश्चात्, आध्यात्मिक दुनिया के विभिन्न आधिकारिक पदों के प्राणियों के द्वारा, परमेश्वर के द्वारा निर्धारित किए गए अनुसार, उन्हें कड़ाई से कार्यान्वित किया जाता है, और कोई भी उनका उल्लंघन करने का साहस नहीं करता है। और इसलिए, मनुष्य के संसार में मनुष्यजाति के जीवन और मृत्यु के चक्र में, चाहे कोई पशु के रूप में पुनर्जन्म ले या इंसान के रूप में, दोनों के लिए नियम हैं। क्योंकि ये नियम परमेश्वर की ओर से आते हैं, इसलिए उन्हें तोड़ने का कोई साहस नहीं करता है, न ही कोई उन्हें तोडने में समर्थ है। यह केवल परमेश्वर की ऐसी संप्रभुता की वजह से है, और ऐसी व्यवस्थाओं की वजह से है, कि यह भौतिक संसार जिसे लोग देखते हैं नियमित और व्यवस्थित है; यह केवल परमेश्वर की ऐसी संप्रभुता के कारण ही है कि मनुष्य उस दूसरे संसार के साथ शान्ति से रहने में समर्थ है जो मनुष्यजाति के लिए पूर्णरुप से अदृश्य है, इसके साथ समरसता में सह-अस्तित्व में रहता है—जो पूर्ण रूप से परमेश्वर की संप्रभुता से अभिन्‍न है। व्यक्ति के दैहिक जीवन की मृत्यु के पश्चात्, आत्मा में अभी भी जीवन रहता है, और इसलिए यदि वह परमेश्वर के प्रशासन से रहित होती तो क्या होता? आत्मा हर स्थान पर भटकती रहती, हर स्थान में हस्तक्षेप करती, और यहाँ तक कि मनुष्यजाति के संसार में जीवित प्राणियों को भी हानि पहुँचाती। ऐसी हानि न केवल मनुष्यजाति के प्रति ही नहीं होती, बल्कि वनस्पति और पशुओं की ओर भी हो सकती थी—लेकिन सबसे पहले हानि लोगों की होती। यदि ऐसा होता—यदि ऐसी आत्मा प्रशासनरहित होती, और वाकई लोगों को हानि पहुँचाती, वाकई दुष्टता के कार्य करती—तो ऐसी आत्मा को आध्यात्मिक दुनिया में ठीक से सँभाला जाता: यदि चीज़ें गंभीर होंगी तो शीघ्र ही आत्मा का अस्तित्व समाप्त हो जाएगी, वह नष्ट हो जाएगी; यदि संभव हुआ तो, उसे कहीं रख दिया जाएगा और फिर उसका पुनर्जन्म होगा। कहने का आशय है कि, आध्यात्मिक दुनिया में विभिन्न आत्माओं का प्रशासन व्यवस्थित होता है, और चरणबद्ध तथा नियमों के अनुसार किया जाता है। यह केवल ऐसे प्रशासन के कारण ही है कि मनुष्य का भौतिक संसार अराजकता में नहीं पड़ा है, कि भौतिक संसार की मनुष्यजाति एक सामान्य मानसिकता, साधारण तर्कशक्ति और एक व्यवस्थित दैहिक जीवन धारण करती है। मनुष्यजाति के केवल ऐसे सामान्य जीवन के बाद ही वे जो देह में रहते हैं, वे पनपते रहना और पीढ़ी-दर-पीढ़ी संतान उत्पन्न करना जारी रख सकते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X' से उद्धृत

291. एक जीवित प्राणी की मृत्यु—भौतिक जीवन का अंत—यह दर्शाता है कि एक जीवित प्राणी भौतिक संसार से आध्यात्मिक दुनिया में चला गया है, जबकि एक नए भौतिक जीवन का जन्म यह दर्शाता है कि एक जीवित प्राणी आध्यात्मिक दुनिया से भौतिक संसार में आया है और उसने अपनी भूमिका ग्रहण करना और उसे निभाना आरम्भ कर दिया है। चाहे एक जीवित प्राणी का प्रस्थान हो या आगमन, दोनों आध्यात्मिक दुनिया के कार्य से अवियोज्य हैं। जब कोई व्यक्ति भौतिक संसार में आता है, तो परमेश्वर द्वारा आध्यात्मिक दुनिया में उस परिवार, जिसमें वह जाता है, उस युग में जिसमें उसे आना है, उस समय जब उसे आना है, और उस भूमिका की, जो उसे निभानी है, की उचित व्यवस्थाएँ और विशेषताएँ पहले ही तैयार की जा चुकी होती हैं। और इसलिए इस व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन—जो काम वह करता है, और जो मार्ग वह चुनता है—जरा सी भी त्रुटि के बिना, आध्यात्मिक दुनिया की व्यवस्थाओं के अनुसार चलता है। जिस समय भौतिक जीवन समाप्त होता है, इस बीच, और जिस तरह और जिस स्थान पर यह समाप्त होता है, आध्यात्मिक दुनिया के सामने वह स्पष्ट और प्रत्यक्ष होता है। परमेश्वर भौतिक संसार पर शासन करता है, और वह आध्यात्मिक दुनिया पर शासन करता है, और वह किसी आत्मा के जीवन और मृत्यु के साधारण चक्र को विलंबित नहीं करेगा, न ही वह किसी आत्मा के जीवन और मृत्यु के चक्र के प्रबंधन में कोई त्रुटि कर सकता है। आध्यात्मिक दुनिया के आधिकारिक पदों के सभी न्यायालय अधिकारी अपने कार्यों को कार्यान्वित करते हैं, और परमेश्वर के निर्देशों और नियमों के अनुसार वह करते हैं जो उन्हें करना चाहिए। और इसलिए, मनुष्यजाति के संसार में, मनुष्य द्वारा देखी गई कोई भी भौतिक घटना व्यवस्थित होती है, और उसमें कोई अराजकता नहीं होती है। यह सब कुछ सभी चीज़ों पर परमेश्वर के व्यवस्थित शासन की वजह से है, और साथ ही इस वजह से है क्योंकि परमेश्वर का अधिकार प्रत्येक वस्तु पर शासन करता है, और जिन चीज़ों पर वह शासन करता है उस सब में वह भौतिक संसार जिसमें मनुष्य रहता है, और, इसके अलावा, मनुष्य के पीछे का वह अदृश्य आध्यात्मिक दुनिया शामिल है। और इसलिए, यदि मनुष्यजाति एक अच्छा जीवन चाहती है, और एक अच्छे परिवेश में रहना चाहती है, तो सम्पूर्ण दृश्य भौतिक जगत प्रदान किए जाने के अलावा, मनुष्य को वह आध्यात्मिक दुनिया भी अवश्य प्रदान की जानी चाहिए, जिसे कोई देख नहीं सकता है, जो मनुष्यों की ओर से प्रत्येक जीवित प्राणी को संचालित करती है और जो व्यवस्थित है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X' से उद्धृत

292. इस दुनिया में आने वाले सभी लोगों को जीवन और मृत्यु से गुजरना होगा, और उनमें से बहुसंख्यक मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र से गुजरते हैं। जो जीवित हैं वे शीघ्र ही मर जाएँगे और मृत शीघ्र ही लौट आएँगे। यह सब परमेश्वर द्वारा प्रत्येक जीवित प्राणी के लिए व्यवस्थित जीवन का मार्ग है। यद्यपि यह मार्ग और यह चक्र ठीक वह सत्य है जो परमेश्वर चाहता है कि मनुष्य देखे: कि परमेश्वर द्वारा मनुष्य को प्रदान किया गया जीवन असीम है, भौतिकता, समय या स्थान से मुक्त है। यह परमेश्वर द्वारा मनुष्य को प्रदान किया गया जीवन का रहस्य है, और प्रमाण है कि जीवन उसी से आया है। यद्यपि हो सकता है कि बहुत से लोग यह न मानें कि जीवन परमेश्वर से आया है, फिर भी मनुष्य अनिवार्य रूप से उस सभी का आनंद लेता है जो परमेश्वर से आता है, चाहे वह उसके अस्तित्व को मानता हो या उसे नकारता हो। यदि किसी दिन परमेश्वर का अचानक हृदय परिवर्तन हो जाए और दुनिया में जो कुछ भी विद्यमान है वह उस सब को पुनः प्राप्त करने और जो जीवन उसने दिया है उसे वापस लेने की इच्छा करे, तो कुछ भी नहीं रहेगा। परमेश्वर अपने जीवन का उपयोग सभी जीवित और निर्जीव दोनों चीजों के भरण-पोषण के लिए करता है, अपनी शक्ति और अधिकार के कारण सभी को सुव्यवस्थित करता है। यह एक ऐसा सत्य है जिसकी किसी के द्वारा कल्पना नहीं की जा सकती है जिसे किसी के द्वारा समझा नहीं जा सकता है, और ये अबूझ सत्य परमेश्वर की जीवन शक्ति की मूल अभिव्यक्ति और प्रमाण हैं। अब मैं तुम्हें एक रहस्य बताता हूँ: परमेश्वर के जीवन की महानता और उसके जीवन की सामर्थ्य की थाह को कोई भी प्राणी नहीं पा सकता। यह अभी वैसा ही है, जैसा अतीत में था, और आने वाले समय में भी यह ऐसा ही रहेगा। दूसरा रहस्य जो मैं बताऊँगा वह यह है: जीवन का स्रोत, सभी सृजित प्राणियों के लिए, चाहे वे रूप या संरचना में कितने ही भिन्न हों, परमेश्वर से आता है। चाहे तुम किसी भी प्रकार के जीवित प्राणी हो, तुम उस जीवन के पथ के विपरीत नहीं चल सकते जिसे परमेश्वर ने निर्धारित किया है। बहर हाल, मेरी इच्छा है कि मनुष्य इसे समझे: परमेश्वर की देखभाल, रख-रखाव और भरण-पोषण के बिना, मनुष्य वह सब प्राप्त नहीं कर सकता जो उसे प्राप्त करना था, चाहे वह कितनी ही मेहनत या कठिन संघर्ष क्यों न करे। परमेश्वर से जीवन की आपूर्ति के बिना, मनुष्य जीवन के मूल्य और उसकी सार्थकता के भाव को गँवा देता है। परमेश्‍वर मनुष्य को इतना लापरवाह कैसे होने दे सकता है, जो मूर्खतापूर्ण ढंग से अपने जीवन‌ की सार्थकता कोगँवा देता है? जैसा कि मैंने पहले कहा है: मत भूलो कि परमेश्वर तुम्हारे जीवन का स्रोत है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है' से उद्धृत

293. परमेश्वर ही एकमात्र है जो सभी चीज़ों पर शासन करता है, और सभी चीज़ों को चलाता है। जो कुछ है वह उसी ने रचा है, जो कुछ है वही उसे चलाता है और जो कुछ है उस सब पर वही शासन करता है और जो कुछ है उस सब का वही भरण-पोषण करता है। यह परमेश्वर की हैसियत और परमेश्वर की पहचान है। सभी चीजों के लिए और जो कुछ भी है उस सब के लिए, परमेश्वर की असली पहचान, सृजनकर्ता, और सभी चीज़ों के शासक की है। परमेश्वर उसी प्रकार की पहचान धारण करता है और वह सभी चीज़ों में अद्वितीय है। परमेश्वर की कोई भी रचना—चाहे वह मनुष्य के बीच हो या आध्यात्मिक दुनिया में हो—परमेश्वर की पहचान और हैसियत का वेष धारण करने या उसका स्थान लेने के लिए किसी भी साधन या बहाने का उपयोग नहीं कर सकती है, क्योंकि सभी चीज़ों में एकमात्र वही है जो इस पहचान, सामर्थ्य, अधिकार, और सभी बातों पर शासन करने की क्षमता से सम्पन्न है: हमारा अद्वितीय परमेश्वर स्वयं। वह सभी चीज़ों के बीच रहता और चलता है; वह सभी चीज़ों से ऊपर, सर्वोच्च स्थान तक उठ सकता है; वह मनुष्य बनकर, जो मांस और लहू के हैं उनमें से एक बन कर, लोगों के साथ आमने-सामने होकर और उनके सुख—दुःख बाँट कर, अपने आप को विनम्र बना सकता है; साथ ही, जो कुछ भी है वह सब को नियंत्रित करता है, और जो कुछ भी है उस का भाग्य और किस दिशा में इसे जाना है यह तय करता है, इसके अलावा, वह संपूर्ण मनुष्यजाति के भाग्य, और मनुष्यजाति की दिशा का पथप्रदर्शन करता है। इस तरह के परमेश्वर की सभी जीवित प्राणियों के द्वारा आराधना की जानी चाहिए, उसका आज्ञापालन किया जाना चाहिए और उसे जानना चाहिए। और इसलिए, इस बात की परवाह किए बिना कि तुम मनुष्यजाति में से किस समूह और किस प्रकार सम्बन्धित हो, परमेश्वर में विश्वास करना, परमेश्वर का अनुसरण करना, परमेश्वर का आदर करना, परमेश्वर के शासन को स्वीकार करना, और अपने भाग्य के लिए परमेश्वर की व्यवस्थाओं को स्वीकार करना ही किसी भी व्यक्ति के लिए, किसी जीवित प्राणी के लिए एकमात्र विकल्प और आवश्यक विकल्प है। परमेश्वर की अद्वितीयता में, लोग देखते हैं कि उसका अधिकार, उसका धार्मिक स्वभाव, उसका सार, और वे साधन जिनके द्वारा वह सभी चीज़ों का भरण-पोषण करता है, सभी अद्वितीय हैं; उसकी अद्वितीयता, स्वयं परमेश्वर की असली पहचान को निर्धारित करती है, और यह उसकी हैसियत को निर्धारित करती है। और इसलिए, सभी प्राणियों के बीच, यदि आध्यात्मिक दुनिया में या मनुष्यों के बीच कोई जीवित प्राणी परमेश्वर की जगह खड़ा होने की इच्छा करता है, तो यह असंभव होगा, जैसे कि परमेश्वर का रूप धरने का प्रयास कर रहा हो। यह तथ्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X' से उद्धृत

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