14. राज्य के युग के संविधान, प्रशासनिक नियमों और धर्मादेशों पर वचन

401. जिस कार्य की मैंने योजना बनायी है वह एक पल भी रुके बिना आगे बढ़ता रहता है। राज्य के युग मेंले जाने के बाद, और तुम लोगों को मेरे लोगों के रूप में मेरे राज्य में ले जाने के बाद, मेरी तुम लोगों से अन्य माँगें होंगी; अर्थात्, मैं तुम लोगों के सामने उस संविधान को लागू करना आरंभ करूँगा जिससे मैं इस युग पर शासन करूँगा :

चूँकि तुम सभी मेरे लोग कहलाते हो, इसलिए तुम्हें मेरे नाम को महिमा देने में सक्षम होना चाहिए; अर्थात्, परीक्षण के बीच गवाही देनी चाहिए। यदि कोई मुझे फुसलाने की कोशिश करता है और मुझसे सत्य छुपाता है, या मेरी पीठ पीछे अपकीर्तिकर व्यवहारों में शामिल होता है, तो बिना किसी अपवाद के उसे मेरे घर से खदेड़ दिया जाएगा, बाहर निकाल दिया जाएगा ताकि वह मेरा इंतज़ार करे कि मैं उससे निपटूँ। जो लोग अतीत में मेरे प्रति विश्वासघाती रहे हैं और संतानोचित नहीं रहे हैं, और आज पुनः खुलेआम मेरी आलोचना करने के लिए उठे हैं, उन्हें भी मेरे घर से खदेड़ दिया जाएगा। जो मेरे लोग हैं उन्हें लगातार मेरी जिम्मेदारियों की चिंता करनी चाहिए और साथ ही मेरे वचनों को जानने की तलाश करनी चाहिए। केवल इस तरह के लोगों को ही मैं प्रबुद्ध करूँगा, और वे निश्चय ही, कभी भी ताड़ना को प्राप्त न करते हुए, मेरे मार्गदर्शन और प्रबुद्धता के अधीन रहेंगे। जो मेरी ज़िम्‍मेदारियों की चिंता करने में असफल रहते हुए अपने खुद के भविष्य की योजना बनाने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, अर्थात वे जो अपने कार्यों के द्वारा मेरे हृदय को संतुष्ट करने का लक्ष्य नहीं रखते हैं बल्कि इसके बजाय भीख की तलाश में रहते हैं, मैं इन भिखारी-जैसे प्राणियों का उपयोग करने से पूरी तरह इनकार करता हूँ, क्योंकि वे जब से पैदा हुए हैं, वे बिलकुल नहीं जानते कि मेरी जिम्मेदारियों के प्रति विचारशील होने का क्या अर्थ है। वे ऐसे लोग हैं जिनमें सामान्य समझ का अभाव है; ऐसे लोग मस्तिष्क के "कुपोषण" से पीड़ित हैं, और उन्हें कुछ "पोषण" के लिए घर जाने की आवश्यकता है। मेरे लिए ऐसे लोग किसी काम के नहीं हैं। मेरे लोगों के बीच, प्रत्येक के लिए मुझे अंत तक पूरे किए जाने वाले अनिवार्य कर्तव्य के रूप में मानना आवश्यक होगा, जैसे कि भोजन करना, पहनना, और सोना, कुछ ऐसा जिसे कोई एक पल के लिए भी कभी नहीं भूलता है, ताकि मुझे जानना अंत में एक ऐसा परिचित कौशल बन जाए जैसे कि भोजन करना, कुछ ऐसा जिसे तुम अभ्यस्त हाथ से सहज ही करते हो। जहाँ तक उन वचनों की बात है जो मैं बोलता हूँ, हर एक को अवश्य अत्यधिक निश्चितता और पूरी तरह से आत्मसात करते हुए ग्रहण करना चाहिए; इसमें कोई भी बेपरवाही भरे आधे-अधूरे-उपाय़ नहीं हो सकते हैं। जो कोई भी मेरे वचनों पर ध्यान नहीं देता है उसे सीधे मेरा विरोध करने वाला माना जाएगा; जो कोई भी मेरे वचनों को नहीं खाता, या उन्हें जानने की तलाश नहीं करता है, उसे मुझ पर ध्यान नहीं देने वाला माना जाएगा, और उसे मेरे घर के द्वार से सीधे बाहर कर दिया जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि, जैसा कि मैंने अतीत में कहा है, कि मैं जो चाहता हूँ, वह बड़ी संख्या में लोग नहीं, बल्कि उत्कृष्टता है। सौ लोगों में से, यदि कोई एक भी मेरे वचनों के द्वारा मुझे जानने में सक्षम है, तो मैं इस एक को प्रबुद्ध और रोशन करने पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए अन्य सभी को स्वेछा से ठुकरा दूँगा। इससे तुम देख सकते हो कि यह अनिवार्य रूप से सत्य नहीं है कि बड़ी संख्या ही मुझे व्यक्त कर सकती है, मुझे जी सकती है। मैं जो चाहता हूँ वह है गेहूँ (भले ही दाने पूरे भरे न हों) न कि जंगली दाने (भले ही दाने प्रशंसनीय रूप से भरे हुए हों)। उन लोगों के लिए जो तलाश करने की परवाह नहीं करते हैं बल्कि इसके बजाय एक शिथिल तरीके से व्यवहार करते हैं, उन्हें स्‍वेच्‍छा से चले जाना चाहिए; मैं उन्हें अब और देखना नहीं चाहता हूँ, अन्‍यथा वे मेरे नाम को अपमानित करते रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 5' से उद्धृत

402. अब मैं अपने राज्य की प्रशासनिक आज्ञाओं की घोषणा करता हूँ : सभी चीज़ें मेरे न्याय के अंतर्गत हैं, सभी चीज़ें मेरी धार्मिकता के अंतर्गत हैं, सभी चीज़ें मेरे प्रताप के अंतर्गत हैं, और मैं अपनी धार्मिकता सब पर लागू करता हूँ। जो यह कहते हैं कि वे मुझमें विश्वास रखते हैं परंतु गहराई में मेरा खंडन करते हैं, या जिनके हृदयों ने मेरा त्याग कर दिया है, वे निकाल बाहर किए जाएँगे—परंतु सब मेरे यथोचित समय पर। जो मेरे बारे में व्यंग्यात्मक ढंग से बात करते हैं, परंतु इस तरह से कि दूसरों के ध्यान में न आए, वे तुरंत मृत्यु को प्राप्त होंगे (वे आत्मा, देह और मन से नष्ट हो जाएँगे)। जो लोग मेरे प्रियजनों पर अत्याचार करते हैं अथवा उनसे रूखा व्यवहार करते हैं, मेरे कोप द्वारा उनका तत्काल न्याय किया जाएगा। इसका अर्थ है कि जो मेरे प्रियजनों के प्रति ईर्ष्यालु हैं, और जो मुझे अधार्मिक समझते हैं, उन्हें न्याय किए जाने के लिए मेरे प्रियजनों को सौंप दिया जाएगा। जो सभ्य, सरल और ईमानदार हैं (वे भी, जिनमें बुद्धिमत्ता की कमी है), और जो मेरे साथ एकचित्त होकर ईमानदारी से व्यवहार करते हैं, वे सभी मेरे राज्य में रहेंगे। जो लोग प्रशिक्षण से नहीं गुज़रे—यानी ऐसे ईमानदार लोग, जिनमें बुद्धिमत्ता और अंतर्दृष्टि का अभाव है—उन्हें मेरे राज्य में सामर्थ्य प्राप्त होगा। हालाँकि उन्हें भी निपटाया और तोड़ा गया है। वे प्रशिक्षण से नहीं गुज़रे, यह परम तथ्य नहीं है। बल्कि इन्हीं चीज़ों के माध्यम से मैं सभी को अपनी सर्वशक्तिमत्ता और अपनी बुद्धिमत्ता दिखाऊँगा। मैं उन सभी को निकाल बाहर करूँगा, जो अभी भी मुझ पर संदेह करते हैं; मैं उनमें से किसी एक को भी नहीं चाहता (मैं उन लोगों से घृणा करता हूँ, जो ऐसे समय में भी मुझ पर संदेह करते हैं)। उन कर्मों के माध्यम से, जो मैं पूरे ब्रह्मांड में करता हूँ, मैं ईमानदार लोगों को अपने कार्य की अद्भुतता दिखाऊँगा, जिससे उनकी बुद्धिमत्ता, अंतर्दृष्टि और विवेक में वृद्धि होगी। मैं अपने अद्भुत कर्मों के परिणामस्वरूप धोखेबाज लोगों को एक ही पल में नष्ट कर दूँगा। मेरा नाम सबसे पहले स्वीकार करने वाले सभी ज्येष्ठ पुत्र (यानी वे पवित्र और निष्कलंक, ईमानदार लोग) ही सबसे पहले राज्य में प्रवेश करेंगे और मेरे साथ सभी राष्ट्रों और सभी लोगों पर शासन करेंगे, और राज्य में राजाओं की तरह राज करेंगे तथा सभी राष्ट्रों और सभी लोगों का न्याय करेंगे (यह राज्य में सभी ज्येष्ठ पुत्रों को संदर्भित करता है, किसी और को नहीं)। सभी राष्ट्रों और सभी लोगों में से जिनका न्याय हो चुका है और जो पश्चात्ताप कर चुके हैं, वे मेरे राज्य में प्रवेश करेंगे और मेरे लोग बन जाएँगे, जबकि जो जिद्दी हैं और जिन्हें पछतावा नहीं है, वे अथाह गड्ढे में फेंक दिए जाएँगे (हमेशा के लिए नष्ट होने हेतु)। राज्य में न्याय अंतिम होगा, और यह दुनिया की मेरी ओर से पूरी सफ़ाई होगी। उसके पश्चात् कोई अन्याय, दुःख, आँसू या आहें नहीं होंगी, और यहाँ तक कि कोई दुनिया भी नहीं रहेगी। सब-कुछ मसीह की अभिव्यक्ति होगा, और सब मसीह का राज्य होंगे। ऐसी महिमा होगी! ऐसी महिमा होगी!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 79' से उद्धृत

403. अब मैं तुम लोगों के लिए अपने प्रशासनिक आदेशों की घोषणा करता हूँ (जो घोषणा के दिन से प्रभावी होंगे और भिन्न-भिन्न लोगों को भिन्न-भिन्न ताड़नाएँ देंगे) :

मैं अपने वादे पूरे करता हूँ, और सब-कुछ मेरे हाथों में है : जो कोई भी संदेह करेगा, वह निश्चित रूप से मारा जाएगा। किसी भी लिहाज के लिए कोई जगह नहीं है; वे तुरंत नष्ट कर दिए जाएँगे, जिससे मेरे हृदय को नफ़रत से छुटकारा मिलेगा। (अब से यह पुष्टि की जाती है कि जो कोई भी मारा जाता है, वह मेरे राज्य का सदस्य बिलकुल नहीं होगा, और वह अवश्य ही शैतान का वंशज होगा।)

ज्येष्ठ पुत्रों के रूप में तुम लोगों को अपनी खुद की स्थिति को बनाए रखना चाहिए और अपने कर्तव्य अच्छी तरह से पूरे करने चाहिए, और दखलंदाज नहीं बनना चाहिए। तुम लोगों को मेरी प्रबंधन योजना के लिए खुद को अर्पित कर देना चाहिए, हर जगह जहाँ भी तुम जाओ, तुम्हें मेरी अच्छी गवाही देनी चाहिए और मेरे नाम को महिमा-मंडित करना चाहिए। शर्मनाक कृत्य मत करो; मेरे सभी पुत्रों और मेरे लोगों के लिए उदाहरण बनो। एक पल के लिए भी पथभ्रष्ट मत होओ : तुम्हें सभी के सामने हमेशा मेरे ज्येष्ठ पुत्रों की पहचान के साथ दिखाई देना चाहिए, और गुलाम न बनो; बल्कि तुम्हें सिर ऊँचा करके आगे बढ़ना चाहिए। मैं तुम लोगों से अपने नाम को महिमा-मंडित करने के लिए कह रहा हूँ, उसे अपमानित करने के लिए नहीं। जो लोग मेरे ज्येष्ठ पुत्र हैं, उनमें से प्रत्येक का अपना व्यक्तिगत कार्य है, और वे हर चीज़ नहीं कर सकते। यह वह ज़िम्मेदारी है, जो मैंने तुम लोगों को दी है, और इससे जी नहीं चुराना है। तुम लोगों को स्वयं को अपने पूरे हृदय से, अपने पूरे मन से और अपनी पूरी शक्ति से उस काम को पूरा करने के लिए समर्पित करना चाहिए, जो मैंने तुम्हें सौंपा है।

इस दिन से आगे, समस्त ब्रह्मांडीय दुनिया में मेरे सभी पुत्रों और मेरे सभी लोगों की चरवाही करने का कर्तव्य पूरा करने के लिए मेरे ज्येष्ठ पुत्रों को सौंपा जाएगा, और जो कोई भी अपने पूरे हृदय और पूरे मन से उसे पूरा नहीं कर सकेगा, मैं उसे ताड़ना दूँगा। यह मेरी धार्मिकता है। मैं अपने ज्येष्ठ पुत्रों को क्षमा नहीं करूँगा, न ही उनके साथ नरमी बरतूँगा।

यदि मेरे पुत्रों या मेरे लोगों में से कोई मेरे ज्येष्ठ पुत्रों में से किसी का उपहास और अपमान करता है, तो मैं उसे कठोर दंड दूँगा, क्योंकि मेरे ज्येष्ठ पुत्र स्वयं मेरा प्रतिनिधित्व करते हैं; कोई उनके साथ जो करता है, वह मेरे साथ भी करता है। यह मेरे प्रशासनिक आदेशों में से सबसे गंभीर आदेश है। मेरे पुत्रों और मेरे लोगों में से जो कोई भी इस आदेश का उल्लंघन करेगा, उसके विरुद्ध मैं अपने ज्येष्ठ पुत्रों को उनकी इच्छाओं के अनुसार अपनी धार्मिकता लागू करने दूँगा।

मैं धीरे-धीरे उस व्यक्ति का परित्याग कर कर दूँगा, जो मेरे साथ ओछेपन से पेश आता है और केवल मेरे भोजन, कपड़े और नींद पर ध्यान केंद्रित करता है; केवल मेरे बाह्य मामलों पर ध्यान देता है और मेरे बोझ का विचार नहीं करता; और अपने स्वयं के कार्य सही ढंग से पूरे करने पर ध्यान नहीं देता। यह निर्देश उन सभी के लिए है, जिनके कान हैं।

जो कोई भी मेरे लिए सेवा करने का काम समाप्त कर लेता है, उसे बिना किसी उपद्रव के, आज्ञाकारी ढंग से अलग हो जाना चाहिए। सावधान रहो, मैं तुम्हें बाहर कर दूँगा। (यह एक पूरक आदेश है।)

अब से मेरे ज्येष्ठ पुत्र लोहे की छड़ी उठाएँगे और सभी राष्ट्रों और लोगों पर शासन करने के लिए, सभी राष्ट्रों और लोगों के बीच चलने के लिए, और सभी राष्ट्रों और लोगों के बीच मेरे न्याय, धार्मिकता और प्रताप को कार्यान्वित करने के लिए मेरे अधिकार को निष्पादित करना शुरू करेंगे। मेरे पुत्र और मेरे लोग मुझसे डरेंगे, बिना रुके मेरी स्तुति, मेरी जयजयकार और मेरा महिमा-मंडन करेंगे, क्योंकि मेरी प्रबंधन योजना पूरी हो गई है और मेरे ज्येष्ठ पुत्र मेरे साथ शासन कर सकते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 88' से उद्धृत

404. (परमेश्वर के वचनों का चुनिंदा अध्याय)

दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए

1) मनुष्य को स्वयं को बड़ा नहीं ठहराना चाहिए, और न ही अपने आपको ऊँचा ठहराना चाहिए। उसे परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और परमेश्वर को ऊँचा ठहराना चाहिए।

2) तुम्हें ऐसा कुछ भी करना चाहिए जो परमेश्वर के कार्य के लिए लाभदायक हो, और ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जो परमेश्वर के कार्य के लिए हानिकारक हो। तुम्हें परमेश्वर के नाम, परमेश्वर की गवाही, और परमेश्वर के कार्य का समर्थन करना चाहिए।

3) परमेश्वर के घर में धन, भौतिक पदार्थ, और समस्त सम्पत्ति ऐसी भेंटें हैं जो मनुष्य के द्वारा दी जानी चाहिए। इन भेंटो का आनन्द याजक और परमेश्वर के अलावा अन्य कोई नहीं ले सकता है, क्योंकि मनुष्य की भेंटें परमेश्वर के आनन्द के लिए हैं, परमेश्वर इन भेंटों को केवल याजकों के साथ ही साझा करता है, और उनके किसी भी अंश का आनन्द उठाने के लिए अन्य कोई भी योग्य और पात्र नहीं है। मनुष्य की समस्त भेंटें (धन और भौतिक चीजों सहित, जिनका आनन्द लिया जा सकता है) परमेश्वर को दी जाती हैं, मनुष्य को नहीं। इसलिए, इन चीज़ों का मनुष्य के द्वारा आनन्द नहीं लिया जाना चाहिए; यदि मनुष्य उनका आनन्द उठाता है, तो वह इन भेंटों को चुरा रहा होगा। जो कोई भी ऐसा करता है वह यहूदा है, क्योंकि, यहूदा एक ग़द्दार होने के अतिरिक्त, जो कुछ रुपयों की थैली में डाला जाता था, उससे स्वयं की भी सहायता करता था।

4) मनुष्य का स्वभाव भ्रष्ट है और इसके अतिरिक्त, उसमें भावनाएँ हैं। अपने आप में, परमेश्वर की सेवा करते समय विपरीत लिंग के दो सदस्यों को अकेले में एक साथ मिलकर काम करना निषिद्ध है। जो भी ऐसा करते हुए पाए जाते हैं, उन्हें बिना किसी अपवाद के निष्कासित कर दिया जाएगा—किसी को भी छूट नहीं है।

5) तुम परमेश्वर की आलोचना नहीं करोगे, और न ही परमेश्वर से संबंधित बातों पर यूँ ही विचार-विमर्श करोगे। तुम्हें वैसा ही करना चाहिए जैसा मनुष्य को करना चाहिए, और वैसे ही बोलना चाहिए जैसे मनुष्य को बोलना चाहिए, तुम्हें अपनी सीमाओं को बिल्कुल भी पार नहीं करना चाहिए और न ही अपनी सीमाओं का उल्लंघन करना चाहिए। अपनी स्वयं की ज़ुबान पर लगाम लगाओ और अपने स्वयं के पदचिह्नों के बारे में सतर्क रहो। यह सब तुम्हें ऐसा कुछ भी करने से रोकेगा जो परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करता है।

6) तुम्हें वही करना चाहिए जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए, और अपने दायित्वों का पालन करना चाहिए, अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करना चाहिए, और अपने कर्तव्य को धारण करना चाहिए। चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के कार्य में अपना योगदान देना चाहिए; यदि तुम नहीं देते हो, तो तुम परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के अयोग्य हो, और परमेश्वर के घर में रहने के अयोग्य हो।

7) कलीसिया के कार्यों और मामलों में, परमेश्वर की आज्ञा मानने के अलावा, हर चीज में तुम्हें उस व्यक्ति के निर्देशों का पालन करना चाहिए जो पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया जाता है। यहाँ तक कि जरा सा अतिक्रमण भी अस्वीकार्य है। तुम्हें अपनी आज्ञाकारिता में पूर्ण होना चाहिए, और सही या ग़लत का विश्लेषण बिल्कुल नहीं करना चाहिए; क्या सही या ग़लत है इससे तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं है। तुम्हें स्वयं केवल सम्पूर्ण आज्ञाकारिता की चिंता अवश्य करनी चाहिए।

8) जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें परमेश्वर की आज्ञा माननी चाहिए और उसकी आराधना करनी चाहिए। तुम्हें किसी व्यक्ति को ऊँचा नहीं ठहराना चाहिए या किसी व्यक्ति पर श्रद्धा नहीं रखनी चाहिए; तुम्हें पहला स्थान परमेश्वर को और दूसरा स्थान उन लोगों को देना चाहिए जिनकी तुम श्रद्धा करते हो, और तीसरा स्थान अपने आपको नहीं देना चाहिए। किसी भी व्यक्ति को तुम्हारे हृदय में कोई स्थान नहीं लेना चाहिए, और तुम्हें लोगों को—विशेष रूप से उन्हें जिनका तुम सम्मान करते हो—परमेश्वर के समतुल्य, उसके बराबर नहीं मानना चाहिए। यह परमेश्वर के लिए असहनीय है।

9) तुम्हारे विचार कलीसिया के कार्य के बारे में होने चाहिए। तुम्हें अपनी स्वयं की शारीरिक इच्छाओं की उपेक्षा कर देनी चाहिए, पारिवारिक मामलों के बारे में निर्णायक होना चाहिए, स्वयं को पूरे हृदय से परमेश्वर के काम के लिए समर्पित करना चाहिए, परमेश्वर के काम को पहले स्थान पर और अपने जीवन को दूसरे स्थान पर रखना चाहिए। यह एक सन्त की शालीनता है।

10) सगे-सम्बन्धी जो विश्वास नहीं रखते हैं (तुम्हारे बच्चे, तुम्हारा पति या तुम्हारी पत्नी, तुम्हारी बहनें या तुम्हारे माता-पिता, इत्यादि) उन्हें कलीसिया में आने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए। परमेश्वर के घर में सदस्यों की कमी नहीं है, और इसकी संख्या को ऐसे लोगों से पूरा करने की कोई आवश्यकता नहीं है जिनका कोई उपयोग नहीं है। वे सभी जो प्रसन्नतापूर्वक विश्वास नहीं करते हैं उन्हें कलीसिया के भीतर बिल्कुल भी नहीं ले जाना चाहिए। यह आज्ञा सब लोगों पर निर्देशित है। इस मामले में तुम लोगों को एक दूसरे की जाँच, निगरानी करनी चाहिए और एक दूसरे को स्मरण दिलाना चाहिए, और कोई भी इसका उल्लंघन नहीं कर सकता है। यहाँ तक कि जब ऐसे सगे-सम्बन्धी जो विश्वास नहीं करते हैं, अनिच्छा से कलीसिया में प्रवेश करते हैं, उन्हें अवश्य किताबें जारी नहीं की जानी चाहिए या नया नाम नहीं दिया जाना चाहिए; ऐसे लोग परमेश्वर के घर के नहीं हैं, और कलीसिया में उनके प्रवेश पर किसी भी आवश्यक तरीके से रोक अवश्य लगायी जानी चाहिए। यदि दुष्टात्माओं के आक्रमण के कारण कलीसिया में समस्या आती है, तो तुम स्वयं निर्वासित कर दिये जाओगे या तुम अपने ऊपर प्रतिबंध लगवा लोगे। संक्षेप में, इस मामले में हर किसी का एक उत्तरदायित्व है, किन्तु तुम्हें असावधान नहीं होना चाहिए, अथवा व्यक्तिगत बदला लेने के लिए इसका उपयोग नहीं करना चाहिए।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से

405. आज मनुष्य के लिए इन बातों का पालन करने से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है : तुम्हें उस परमेश्वर को फुसलाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, जो तुम्हारी आँखों के सामने खड़ा है, या उससे कुछ छिपाना नहीं चाहिए। तुम अपने सामने खड़े परमेश्वर के सम्मुख कोई गंदी या अहंकार से भरी बात नहीं कहोगे। तुम परमेश्वर के भरोसे को जीतने के लिए अपनी मीठी और साफ़-सुथरी बातों से अपनी आँखों के सामने परमेश्वर को धोखा नहीं दोगे। तुम परमेश्वर के सामने बेअदबी से काम नहीं करोगे। तुम परमेश्वर द्वारा अपने मुँह से बोले जाने वाले समस्त वचनों का पालन करोगे, और उनका प्रतिरोध, विरोध या उन पर विवाद नहीं करोगे। तुम परमेश्वर द्वारा अपने मुँह से बोले गए वचनों की जैसी तुम्हें ठीक लगे, वैसी व्याख्या नहीं करोगे। तुम्हें अपनी जिह्वा के प्रति सतर्क रहना चाहिए, ताकि उसके कारण तुम दुष्टों की कपटपूर्ण योजनाओं का शिकार न हो जाओ। तुम्हें अपने क़दमों के प्रति सतर्क रहना चाहिए, ताकि तुम अपने लिए परमेश्वर द्वारा निर्दिष्ट सीमा का अतिक्रमण करने से बच सको। अगर तुम अतिक्रमण करते हो, तो यह तुम्हारे परमेश्वर की स्थिति में खड़े होने और अहंकारी और आडंबरपूर्ण वचन कहने का कारण बनेगा, जिसके लिए परमेश्वर तुमसे घृणा करेगा। तुम परमेश्वर के मुँह से निकले वचनों को लापरवाही से प्रसारित नहीं करोगे, कहीं ऐसा न हो कि दूसरे तुम्हारी हँसी उड़ाएँ और हैवान तुम्हें मूर्ख बनाएँ। तुम आज के परमेश्वर के समस्त कार्य का पालन करोगे। यहाँ तक कि अगर तुम उसे समझ न पाओ, तो भी तुम उस पर निर्णय पारित नहीं करोगे; तुम केवल खोज और संगति कर सकते हो। कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के मूल स्थान का अतिक्रमण नहीं करेगा। मनुष्य की हैसियत से तुम आज के परमेश्वर की सेवा करने से अधिक कुछ नहीं कर सकते। मनुष्य की हैसियत से तुम आज के परमेश्वर को सिखा नहीं सकते—ऐसा करना मार्ग से भटकना है। कोई भी व्यक्ति परमेश्वर द्वारा गवाही दिए गए व्यक्ति के स्थान पर खड़ा नहीं हो सकता; अपने वचनों, कार्यों, और अंतर्तम विचारों में तुम मनुष्य की हैसियत में खड़े हो। इसका पालन किया जाना है, यह मनुष्य का उत्तरदायित्व है, और इसे कोई बदल नहीं सकता; ऐसा करना प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन होगा। यह सभी को स्मरण रखना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'नये युग की आज्ञाएँ' से उद्धृत

406. लोगों को उन कई कर्तव्यों का पालन करना होगा, जो उन्हें करने चाहिए। यह वही है, जिसका लोगों को पालन करना चाहिए, और यह वही है, जिसे उन्हें करना होगा। पवित्रात्मा को वह करने दो, जो पवित्रात्मा द्वारा किया जाना चाहिए; मनुष्य उसमें कोई भूमिका नहीं निभा सकता। मनुष्य को वह करना चाहिए, जो उसके द्वारा किया जाना आवश्यक है, जिसका पवित्रात्मा से कोई संबंध नहीं है। यह उसके अतिरिक्त कुछ नहीं है, जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए, और जिसका आज्ञा के रूप में पालन किया जाना चाहिए, ठीक उसी तरह, जैसे पुराने विधान की व्यवस्था का पालन किया जाता है। यद्यपि अब व्यवस्था का युग नहीं है, फिर भी ऐसे कई वचन हैं, जो व्यवस्था के युग में बोले गए वचनों जैसे हैं, जिनका पालन किया जाना चाहिए। इन वचनों का पालन केवल पवित्र आत्मा के स्पर्श पर भरोसा करके नहीं किया जाता, बल्कि वे ऐसी चीज़ हैं, जिनका मनुष्य द्वारा पालन किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए : तुम व्यावहारिक परमेश्वर के कार्य पर निर्णय पारित नहीं करोगे। तुम उस मनुष्य का विरोध नहीं करोगे, जिसकी परमेश्वर द्वारा गवाही दी गई है। परमेश्वर के सामने तुम लोग अपना स्थान बनाए रखोगे और स्वच्छंद नहीं होगे। तुम्हें वाणी में संयत होना चाहिए, और तुम्हारे वचन और कार्य उस व्यक्ति की व्यवस्थाओं के अनुसार होने चाहिए, जिसकी परमेश्वर द्वारा गवाही दी गई है। तुम्हें परमेश्वर की गवाही का आदर करना चाहिए। तुम परमेश्वर के कार्य और उसके मुँह से निकले वचनों की उपेक्षा नहीं करोगे। तुम परमेश्वर के कथनों के लहज़े और लक्ष्यों की नकल नहीं करोगे। बाह्य रूप से तुम लोग ऐसा कुछ नहीं करोगे, जो परमेश्वर द्वारा गवाही दिए गए व्यक्ति का स्पष्ट रूप से विरोध करता हो। आदि-आदि। ये वे चीज़ें हैं, जिनका प्रत्येक व्यक्ति को पालन करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'नये युग की आज्ञाएँ' से उद्धृत

407. हर एक वाक्य जो मैं कहता हूँ, उसमें अधिकार और न्याय होता है, और कोई मेरे वचनों को बदल नहीं सकता। एक बार जब मेरे वचन निर्गत हो जाते हैं, तो चीज़ें मेरे वचनों के अनुसार संपन्न होनी निश्चित हैं; यह मेरा स्वभाव है। मेरे वचन अधिकार हैं और जो कोई उन्हें संशोधित करता है, वह मेरी ताड़ना को अपमानित करता है, और मुझे उन्हें मार गिराना होगा। गंभीर मामलों में वे अपने जीवन पर बरबादी लाते हैं और वे अधोलोक में या अथाह गड्ढे में जाते हैं। यही एकमात्र तरीका है, जिससे मैं मानवजाति से निपटता हूँ, और मनुष्य के पास इसे बदलने का कोई तरीका नहीं है—यह मेरा प्रशासनिक आदेश है। इसे याद रखना! किसी को भी मेरे आदेश का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं है; चीज़ें मेरी इच्छा के अनुसार की जानी चाहिए! अतीत में, मैं तुम लोगों के प्रति बहुत नरम था और तुमने केवल मेरे वचनों का सामना किया था। लोगों को मार गिराने के बारे में मैंने जो वचन बोले थे, वे अभी तक घटित नहीं हुए हैं। किंतु आज से, उन सभी लोगों पर सभी आपदाएँ (मेरे प्रशासनिक आदेशों से संबंधित) एक-एक करके पड़ेंगी, जो मेरी इच्छा के अनुरूप नहीं हैं। तथ्यों का आगमन अवश्य होना चाहिए—अन्यथा लोग मेरे कोप को देखने में सक्षम नहीं होंगे, बल्कि बार-बार व्यभिचार में लिप्त होंगे। यह मेरी प्रबंधन योजना का एक चरण है, और यह वह तरीका है, जिससे मैं अपने कार्य का अगला चरण करता हूँ। मैं तुम लोगों से यह अग्रिम रूप से कहता हूँ, ताकि तुम लोग सदैव के लिए अपराध करने और नरक-यंत्रणा भुगतने से बच सको। अर्थात्, आज से मैं अपने ज्येष्ठ पुत्रों को छोड़कर सभी लोगों को मेरी इच्छा के अनुसार अपनी उचित जगह लेने के लिए मजबूर कर दूँगा, और मैं उन्हें एक-एक करके ताड़ना दूँगा। मैं उनमें से एक को भी दोषमुक्त नहीं करूँगा। तुम लोग ज़रा फिर से लंपट होने की हिम्मत तो करो! तुम लोग ज़रा फिर से विद्रोही होने की हिम्मत तो करो! मैं पहले कह चुका हूँ कि मैं सभी के लिए धार्मिक हूँ, कि मुझमें भावना का लेशमात्र भी नहीं है, जो यह दिखाता है कि मेरे स्वभाव को ठेस नहीं पहुँचाई जानी चाहिए। यह मेरा व्यक्तित्व है। इसे कोई नहीं बदल सकता। सभी लोग मेरे वचनों को सुनते हैं और सभी लोग मेरे गौरवशाली चेहरे को देखते हैं। सभी लोगों को पूर्णतया और सर्वथा मेरा आज्ञापालन करना चाहिए—यह मेरा प्रशासनिक आदेश है। पूरे ब्रह्मांड में और पृथ्वी के छोरों तक सभी लोगों को मेरी प्रशंसा करनी चाहिए और मुझे गौरवान्वित करना चाहिए, क्योंकि मैं स्वयं अद्वितीय परमेश्वर हूँ, क्योंकि मैं परमेश्वर का व्यक्तित्व हूँ। कोई मेरे वचनों और कथनों को, मेरे भाषण और तौर-तरीकों को नहीं बदल सकता, क्योंकि ये केवल मेरे अपने मामले हैं, और ये वे चीज़ें हैं, जो मुझमें प्राचीनतम काल से हैं और हमेशा रहेंगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 100' से उद्धृत

408. तुम लोगों में से प्रत्येक को मेरे प्रशासनिक नियमों के बारे में अंतर्दृष्टि होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं होगा, तो तुम लोगों को ज़रा भी भय न होगा और तुम सब मेरे सामने लापरवाह रहोगे, और तुम्हें पता नहीं होगा कि मैं क्या सिद्ध करना चाहता हूँ, मैं किसे पूर्ण करना चाहता हूँ, मैं क्या हासिल करना चाहता हूँ या किस तरह के व्यक्ति की मेरे राज्य को आवश्यकता है।

मेरे प्रशासनिक आदेश इस प्रकार हैं:

1) चाहे तुम कोई भी हो, यदि तुम अपने दिल में मेरा विरोध करते हो, तो तुम्हारा न्याय किया जाएगा।

2) जिन लोगों को मैंने चुना है, उन्हें किसी भी गलत विचार के लिए तुरंत अनुशासित किया जाएगा।

3) मैं उन लोगों को एक तरफ़ कर दूँगा जो मुझ पर विश्वास नहीं करते हैं। मैं उन्हें लापरवाही से बोलने और काम करने दूँगा और अंत में, मैं उन्हें पूरी तरह से दंडित करूँगा और उनसे निपटूंगा।

4) जो मुझ पर विश्वास करते हैं, मैं उनकी देखभाल करूँगा और हर समय उनकी रक्षा करूँगा। सदा के लिए मैं उद्धार के मार्ग का उपयोग करके उनके लिए जीवन की आपूर्ति करूँगा। इन लोगों के पास मेरा प्यार होगा और वे निश्चित रूप से न तो गिरेंगे, न ही अपनी राह से भटकेंगे। उनकी कोई भी कमज़ोरी अस्थायी होगी, और मैं निश्चित रूप से उसे याद नहीं रखूँगा।

5) वे लोग जो विश्वास करते हुए प्रतीत होते हैं लेकिन जो वास्तव में विश्वास नहीं करते हैं—अर्थात जो लोग विश्वास करते हैं कि एक परमेश्वर है, लेकिन जो मसीह की तलाश नहीं करते हैं, पर जो विरोध भी नहीं करते हैं—इस तरह के लोग सबसे दयनीय होते हैं, और अपने कार्यों के माध्यम से मैं उन्हें स्पष्ट रूप से दिखाऊंगा। अपने कार्यों के माध्यम से, मैं इस प्रकार के लोगों को बचाऊंगा और उन्हें वापस लाऊंगा।

6) ज्येष्ठ पुत्रों को, जो मेरे नाम को स्वीकार करने वाले पहले थे, आशीष मिलेगी! मैं निश्चित रूप से तुम सब को सबसे अच्छी आशीषें प्रदान करूँगा और तुम लोग जी भर कर आनंद लोगे; कोई भी इसमें बाधा डालने की हिम्मत नहीं करेगा। सब कुछ तुम्हारे लिए पूरी तरह से तैयार किया गया है, क्योंकि यह मेरा प्रशासनिक आदेश है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 56' से उद्धृत

409. मेरा न्याय हर एक के लिए आता है, मेरे प्रशासनिक आदेश हर एक को छूते हैं, और मेरे वचन और मेरा व्यक्तित्व हर किसी के लिए प्रकट होते हैं। यह मेरे आत्मा के महान कार्य का समय है (इस समय जिन लोगों को आशीष मिलेगा और जो दुर्भाग्य से पीड़ित होंगे उन्हें अलग किया जाता है)। मेरे वचनों के सामने आते ही, मैंने उन लोगों को अलग कर दिया है जिन्हें आशीष मिलेगा और जो दुर्भाग्य से पीड़ित होंगे। यह सब अत्यंत स्पष्ट है और मैं इसे एक नज़र में देख सकता हूँ। (यह मेरी मानवता के संबंध में बोला जाता है, इसलिए यह मेरे पूर्वनियतन और चयन के विपरीत नहीं है।) मैं पहाड़ों और नदियों और सभी चीजों पर, ब्रह्मांड के अन्तरिक्ष में घूमता हूँ, हर जगह को देखता हूँ और हर स्थान को शुद्ध करता हूँ, ताकि उन अशुद्ध स्थानों और असंयमी भूमियों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और मेरे वचनों के कारण जल कर शून्य हो जाएगा। मेरे लिए, सब कुछ आसान है। यदि अभी वह समय होता जो मैंने दुनिया को नष्ट करने के लिए पूर्वनियत किया था, तो मैं इसे एक वचन से निगल सकता था, लेकिन अभी वह समय नहीं है। इससे पहले कि मैं यह कार्य करूँगा, सभी को तैयार अवश्य रहना चाहिए, ताकि मेरी योजना अस्तव्यस्त और मेरा प्रबंधन बाधित न हो। मुझे पता है कि इसे उचित तरीके से कैसे करना है: मेरे पास मेरी बुद्धि है और मेरे पास मेरी अपनी व्यवस्था है। लोगों को अवश्य एक अँगुली भी नहीं हिलानी चाहिए—मेरे हाथ से नहीं मारे जाने के लिए सावधान रहो; यह पहले से ही मेरे प्रशासनिक आदेशों को स्पर्श करता है। इससे कोई व्यक्ति मेरे प्रशासनिक आदेशों की कठोरता को देख सकता है, और कोई मेरे प्रशासनिक आदेशों के सिद्धांतों को देख सकता है, जिसमें दो पहलू शामिल हैं: एक ओर तो मैं उन सभी को मारता हूँ जो मेरी इच्छा के अनुरूप नहीं हैं और जो मेरे प्रशासनिक आदेशों को अपमानित करते हैं; दूसरी ओर, अपने कोप में मैं उन सभी को शाप देता हूँ जो मेरे प्रशासनिक आदेशों को अपमानित करते हैं। ये दोनों पहलू अपरिहार्य हैं और मेरे प्रशासनिक आदेशों के कार्यकारी सिद्धांत हैं। चाहे लोग कितने ही वफादार क्यों न हों, सभी के साथ इन दोनों सिद्धांतों के अनुसार, बिना भावना के व्यवहार किया जाता है। यह मेरी धार्मिकता को दर्शाने के लिए पर्याप्त है और मेरे प्रताप और मेरे कोप को दर्शाने के लिए पर्याप्त है, जो सभी पार्थिव चीज़ों, सभी सांसारिक चीज़ों और उन सभी चीज़ों को भस्म कर देगा जो मेरी इच्छाओं के अनुरूप नहीं हैं। मेरे वचनों में रहस्य छुपे हैं, और मेरे वचनों में रहस्यों को भी प्रकट किया गया है, इसलिए मानव धारणा में, मानव मन में, मेरे वचन सदैव समझ से बाहर हैं और मेरा हृदय सदैव अथाह है। दूसरे शब्दों में, मुझे मनुष्यों को अवश्य उनकी धारणाओं और सोच से बाहर करना होगा। यह मेरी प्रबंधन योजना का सबसे महत्वपूर्ण अंश है। मुझे अपने ज्येष्ठ पुत्रों को पाने के लिए और उन चीजों को पूरा करने के लिए जो मैं करना चाहता हूँ इसे इसी तरह से अवश्य करना होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 103' से उद्धृत

410. जब तक पुराना संसार निरन्तर बना रहता है, मैं सारे विश्व में खुले तौर पर अपनी प्रशासनिक आज्ञाओं की घोषणा करते हुए, अपने प्रचण्ड प्रकोप को इनके राष्ट्रों के ऊपर तेजी से फेंकूँगा, और जो कोई उनका उल्लंघन करता है उनको ताड़ना दूँगा:

जैसे ही मैं बोलने के लिए विश्व की तरफ अपने चेहरे को घुमाता हूँ, सारी मानवजाति मेरी आवाज़ को सुनती है, और उसके बाद उन सभी कार्यों को देखती है जिसे मैंने समूचे ब्रह्माण्ड में गढ़ा है। वे जो मेरी इच्छा के विरूद्ध जाते हैं, अर्थात्, जो मनुष्य के कार्यों से मेरा विरोध करते हैं, वे मेरी ताड़ना के अधीन नीचे गिर जाएँगे। मैं स्वर्ग के असंख्य तारों को लूँगा और उन्हें फिर से नया कर दूँगा, और मेरे कारण सूर्य और चन्द्रमा को नया बना दिया जायेगा—आकाश अब और वैसा नहीं रहेगा जैसा वह था; पृथ्वी पर बेशुमार चीज़ों को फिर से नया बना दिया जाएगा। मेरे वचनों के माध्यम से सभी पूर्ण हो जाएँगे। विश्व के भीतर अनेक राष्ट्रों को नए सिरे से विभक्त कर दिया जाएगा और मेरे राज्य के द्वारा बदल दिया जाएगा, जिसकी वजह से पृथ्वी के राष्ट्र हमेशा हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएँगे और एक राज्य बन जाएँगे जो मेरी आराधना करते हों; पृथ्वी के सभी राष्ट्रों को नष्ट कर दिया जाएगा, और उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। विश्व के भीतर मनुष्यों में, वे सभी जो शैतान से संबंध रखते हैं उनका सर्वनाश कर दिया जाएगा; वे सभी जो शैतान की आराधना करते हैं उन्हें जलती हुई आग के द्वारा नीचा दिखाया जायेगा—अर्थात उनको छोड़कर जो अभी इस धारा के अन्तर्गत हैं, बाकियों को राख में बदल दिया जाएगा। जब मैं बहुत से लोगों को ताड़ना देता हूँ, तो वे जो, भिन्न-भिन्न अंशों में, धार्मिक संसार में हैं, मेरे कार्यों के द्वारा जीत लिए जा कर मेरे राज्य में लौट आएँगे, क्योंकि उन्होंने एक श्वेत बादल पर सवार पवित्र जन के आगमन को देख लिया होगा। समस्त मानवता अपने-अपने स्वभाव का अनुसरण करेगी, और जो कुछ उसने किया है उससे भिन्न-भिन्न ताड़नाएँ प्राप्त करेगी। वे जो मेरे विरूद्ध खड़े हुए हैं सभी नष्ट हो जाएँगे; जहाँ तक उनकी बात है जिन्होंने पृथ्वी पर अपने कार्यों में मुझे शामिल नहीं किया है, वे अपने आपको दोषमुक्त करने के ढंग के कारण, पृथ्वी पर मेरे पुत्रों और मेरे लोगों के शासन के अधीन निरन्तर बने रहेंगे। मैं अपने महान कार्य की समाप्ति की घोषणा करने के लिए पृथ्वी पर अपनी ध्वनि आगे करते हुए अपने आपको असंख्य लोगों और असंख्य राष्ट्रों के सामने प्रकट करूँगा, ताकि समस्त मानवजाति अपनी आँखों से देखे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 26' से उद्धृत

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