अंतिम दिनों के मसीह के कथन- संकलन

विषय-वस्तु
  • पहला भाग सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिए परमेश्वर का कथन(आरम्भ में मसीह के कथन) (चुने हुए भाग)
    • दूसरा भाग मसीह के वचन जैसे वह कलीसियाओं में चला (चुने हुए भाग)
      • तीसरा भाग अंत में मसीह के कथन

        जब आप यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होंगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा

        क्या आप यीशु को देखना चाहते हैं? क्या आप यीशु के साथ रहना चाहते हैं? क्या आप यीशु के द्धारा कहे गए वचनों को सुनना चाहते हैं? यदि ऐसा है, तो आप यीशु के लौटने का कैसे स्वागत करेंगे? क्या आप पूरी तरह से तैयार हैं? किस ढंग से आप यीशु के लौटने का स्वागत करेंगे? मुझे लगता है कि प्रत्येक भाई और बहन जो यीशु का अनुसरण करतें हैं यीशु का अच्छी तरह से स्वागत करना चाहेंगे। परन्तु क्या आप लोगों ने विचार किया है कि जब यीशु वापस आएगा तो क्या आप सचमुच में उसे पहचान लेंगे? क्या आप लोग सचमुच में वह सब कुछ समझ जाएँगे जो वह कहेगा? क्या आप लोग वे सब कार्य जो यीशु करेगा, उन्हें, बिना किसी शर्त के, सचमुच में स्वीकार कर लेंगे? वे सब जिन्होंने बाइबल पढ़ी है, यीशु के लौटने के बारे में जानते हैं, और वे सब जिन्होंने बाइबल को अभिप्राय से पढ़ी है, उसके आगमन की प्रतीक्षा करते हैं। आप सब लोग उस क्षण के आने के ऊपर ग्रस्त हो गए हैं, और आप लोगों की ईमानदारी प्रशंसनीय है, आप लोगों का विश्वास वास्तव में स्पृहणीय है, परन्तु क्या आप लोग यह एहसास करते हैं कि आप लोगों ने एक गंभीर त्रुटी की है? यीशु किस ढंग से वापस आएगा? आप लोग विश्वास करते हैं कि यीशु श्वेत बादल पर वापस आएगा, परन्तु मैं आप लोगों से पूछता हूँ: यह श्वेत बादल किस चीज का संकेत करता है? यीशु के कई अनुयायी उसके आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं, उनमें से किन लोगों के बीच वह उतरेगा? यदि आप लोग उन प्रथम में से हैं जिनके मध्य में यीशु उतरेगा, तो क्या अन्य लोग इसे बुरी तरह से अनुचित नहीं समझेंगे? मैं जानता हूँ कि आप लोगों की यीशु के प्रति बड़ी ईमानदारी और सत्यनिष्ठा है, परन्तु क्या आप लोग कभी यीशु से मिले हैं? क्या आप लोग उसके स्वभाव को जानते हैं? क्या आप लोग कभी उसके साथ रहे हैं? आप लोग उसके बारे में वास्तव में कितना समझते हैं? कुछ कहेंगे कि ये वचन उन्हें एक फूहड़ अवस्था में डाल देते हैं। वे कहेंगे, “मैंने बाइबल को शुरू से लेकर अंत तक बहुत बार पढ़ा है। मैं यीशु को कैसे समझ नहीं सकता हूँ? यीशु के स्वभाव की तो बात ही छोड़ो – मैं तो उसके कपड़ों का रंग भी जानता हूँ जिन्हें वह पहनना पसंद करता है। जब आप यह कहते हैं कि मैं उसे नहीं समझता हूँ तो क्या आप मेरा अपमान नहीं कर रहे हैं?” मैं सुझाव देता हूँ कि आप इन मुददों पर विवाद न करें; एवं यह बेहतर रहेगा कि शांत हो जाएँ और निम्नलिखित प्रश्नों के बारे में संगति करें: सबसे पहले, क्या आप जानते हैं कि वास्तविकता क्या है और सिद्धांत क्या है? दूसरा, क्या आप जानते हैं कि अवधारणा क्या है, और सत्य क्या है? तीसरा, क्या आप जानते हो कि कल्पित क्या है और वास्तविक क्या है?

        कुछ लोग इस तथ्य से इनकार करते हैं कि वे यीशु को नहीं समझते हैं। और फिर भी मैं कहता हूँ कि आप लोग यीशु के बारे में थोड़ा भी नहीं जानते हैं, और यीशु के एक वचन को भी नहीं समझते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि आप लोगों में से हर एक बाइबल के विवरणों के कारण, दूसरों के द्धारा जो कहा गया है उसकी वजह से, उसका अनुसरण करता है। उसके साथ रहना तो दूर, आप लोगों ने यीशु को कभी देखा भी नहीं है, और यहाँ तक कि थोड़े से समय के लिए भी उसके साथ नहीं रहे हैं। वैसे तो, क्या यीशु के बारे में आप लोगों की समझ सिद्धान्त के अलावा और कुछ नहीं है? क्या यह वास्तविकता से विहीन नहीं है? शायद कुछ लोगों ने यीशु का चित्र देखा होगा, या कुछ ने व्यक्तिगत रूप से यीशु के घर को देखा होगा। हो सकता है कि कुछ ने यीशु के कपड़ों को छुआ होगा। फिर भी उसके बारे में आपकी समझ सैद्धांतिक है और व्यवहारिक नहीं है, भले ही आपने यीशु द्वारा खाए गए भोजन को व्यक्तिगत रूप से चखा हो। चाहे जो भी मामला हो, आपने यीशु को कभी भी नहीं देखा है, और दैहिक रूप में कभी भी उसके साथी नहीं रहे हो, इसलिए यीशु के बारे में आपकी समझ हमेशा खोखला सिद्धांत ही होगी जो सच्चाई से विहीन है। शायद मेरे वचन आपके लिए थोड़ी रूचि के हों, परन्तु मैं आपसे यह पूछता हूँ: यद्यपि आपने अपने पसंदीदा लेखक की कई पुस्तकों को पढ़ा होगा, फिर भी क्या आप कभी उसके साथ समय बिताये बिना उसे पूरी तरह समझ सकते हैं? क्या आप जानते हैं कि उसका व्यक्तित्व कैसा है? क्या आप जानते हैं कि वह किस प्रकार का जीवन जीता है? क्या आप उसकी भावनात्मक स्थिति के बारे में कुछ भी जानते हैं? आप तो उस व्यक्ति को भी पूरी तरह से नहीं समझ सकते हैं जिसका आप आदर करते हैं, तो आप यीशु मसीह को संभवतः कैसे समझ सकते हैं? प्रत्येक चीज जो आप यीशु के बारे में समझते हैं कल्पना और अवधारणा से भरपूर होती है, और इसमें सत्य या वास्तविकता नहीं होती है। इससे दुर्गंध आती है, यह मांस से भरा हुआ है। कैसे इस तरह की कोई समझ आपको यीशु के लौटने का स्वागत करने के योग्य बनाती है? यीशु उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे जो देह की कल्पनाओं और अवधारणाओं से भरे हुए हैं। वे जो यीशु को नहीं समझ पाते हैं कैसे उसका विश्वासी होने के योग्य हैं?

        फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया, क्या आप लोग उसका कारण जानना चाहते हैं? क्या आप फरीसियों के सार को जानना चाहते हैं? वे मसीह के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे ज्यादा और क्या, उन्होंने केवल इस बात पर विश्वास किया कि मसीह आएगा, मगर जीवन के इस सत्य की खोज नहीं की। और इसलिए, वे आज भी मसीह की प्रतीक्षा करते हैं, क्यों उन्हें जीवन के मार्ग के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है, और नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है? आप लोग कैसे कहते हैं, कि ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर के आशीष प्राप्त करेंगे? वे मसीह को कैसे देख सकते हैं? उन्होंने यीशु का विरोध किया क्योंकि वे पवित्र आत्मा के निर्देश के कार्य को नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु के द्धारा कहे गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे, और, ऊपर से, क्योंकि उन्होंने मसीह को नहीं समझा था। और क्योंकि उन्होंने मसीह को कभी नहीं देखा था, और कभी भी मसीह के साथ नहीं रहे थे, उन्होंने सिर्फ़ मसीह के नाम को खोखली श्रद्धांजलि देने की गलती की जबकि किसी न किसी ढंग से मसीह के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का पालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत है: इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आपका उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आपका अधिकार कितना ऊँचा है, आप ईसा नहीं हैं जब तक आपको मसीह नहीं कहा जाता। क्या ये दृष्टिकोण हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण नहीं हैं? मैं आप लोगों से पुनः पूछता हूँ: मान लीजिए कि आप लोगों में यीशु के बारे में थोड़ी सी भी समझ नहीं है, तो क्या आप लोगों के लिए उन गलतियों को करना अत्यंत आसान नहीं है जो बिल्कुल आरंभ के फरीसियों ने की थी? क्या आप सत्य के मार्ग को जानने के योग्य हैं? क्या आप सचमुच में यह विश्वास दिला सकते हैं कि आप ईसा का विरोध नहीं करेंगे? क्या आप पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने के योग्य हैं? यदि आप नहीं जानते हैं कि क्या आप ईसा का विरोध करेंगे, तो मेरा कहना है कि आप पहले से ही मौत के कगार पर जी रहे हैं। जो लोग मसीह को नहीं जानते थे वे सभी यीशु का विरोध करने में, यीशु को अस्वीकार करने में, उन्हें बदनाम करने में सक्षम थे। जो लोग यीशु को नहीं समझते हैं वे सब उन्हें अस्वीकार करने एवं उन्हें बुरा भला कहने में सक्षम हैं। इसके अलावा, वे यीशु के लौटने को शैतान के द्वारा दिए जाने वाले धोखे के समान देखने में सक्षम हैं और अधिकांश लोग देह में लौटने की यीशु की निंदा करेंगे। क्या इस सबसे आप लोगों को डर नहीं लगता है? जिसका आप लोग सामना करते हैं वह पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा है, कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचनों का विनाश है और यीशु के द्वारा व्यक्त किए गए समस्त को ठुकराना है। यदि आप लोग इतने संभ्रमित हैं तो यीशु से क्या प्राप्त कर सकते हैं? यदि आप लोग हठधर्मिता से अपनी गलतियों को मानने से इनकार करते हैं, तो श्वेत बादल पर यीशु के देह में लौटने पर आप लोग यीशु के कार्य को कैसे समझ सकते हैं? यह मैं आप लोगों को बताता हूँ: जो लोग सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं, मगर अंधों की तरह यीशु के श्वेत बादलों पर आगमन का इंतज़ार करते हैं, निश्चित रूप से पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा करेंगे, और ये वे प्रजाति हैं जो नष्ट कर दी जाएगी। आप लोग सिर्फ़ यीशु के अनुग्रह की कामना करते हैं, और सिर्फ़ स्वर्ग के सुखद राज्य का आनंद लेना चाहता हैं, मगर जब यीशु देह में लौटा, तो आपने यीशु के द्वारा कहे गए वचनों का कभी भी पालन नहीं किया, और यीशु के द्वारा व्यक्त किये गए सत्य को कभी भी ग्रहण नहीं किया है। यीशु के एक श्वेत बादल पर वापस आने के तथ्य के बदले में आप लोग क्या थामें रहना चाहेंगे? क्या वही ईमानदारी है जिसमें आप लोग बार-बार पाप करते रहते हैं, और फिर बार-बार उनकी स्वीकारोक्ति करते हैं? एक श्वेत बादल पर वापस आने वाले यीशु के लिए आप बलिदान में क्या अर्पण करेंगे? क्या कार्य के वे वर्ष जिनकी आप लोग स्वयं सराहना करते हैं? लौट कर आये यीशु को आप लोगों पर विश्वास कराने के लिए आप लोग किस चीज को थाम कर रखेंगे? क्या अपने अभिमानी स्वभाव को, जो किसी भी सत्य का पालन नहीं करता है?

        आप लोगों की सत्यनिष्ठा सिर्फ़ वचनों में है, आप लोगों का ज्ञान सिर्फ़ बौद्धिक और वैचारिक है, आप लोगों की मेहनत सिर्फ स्वर्ग की आशीषें पाने के लिए है, और इसलिए आप लोगों का विश्वास अवश्य ही किस प्रकार का हो सकता है? आज भी, आप लोग सत्य के प्रत्येक वचन को एक बहरे कान से ही सुनते हैं। आप लोग नहीं जानते कि परमेश्वर क्या हैं, आप लोग नहीं जानते कि ईसा क्या हैं, आप लोग नहीं जानते हैं कि यहोवा का आदर कैसे करें, आप लोग नहीं जानते कि कैसे पवित्र आत्मा के कार्य में प्रवेश किया जाए, और आप लोग नहीं जानते हैं कि परमेश्वर के स्वंय के कार्य और मनुष्य के धोखे के बीच कैसे भेद करें। आप सिर्फ़ परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किये गए किसी सत्य के वचन की निंदा करना ही जानते हैं जो आपके विचार के अनुरूप नहीं होता है। आपकी विनम्रता कहाँ है? आपकी आज्ञाकारिता कहाँ है? आपकी सत्यनिष्ठा कहाँ है? सत्य को खोजने की आपकी इच्छा कहाँ है? परमेश्वर के बारे में आपका आदर कहाँ है? मैं आपको बता दूँ, कि जो परमेश्वर में संकेतों की वजह से विश्वास करते हैं वे निश्चित रूप से उस श्रेणी के होंगे जो विनाश को झेलेगी। वे जो देह में लौटे यीशु के वचनों को स्वीकार करने में अक्षम हैं वे निश्चित रूप से नरक के वंशज, महान फरिश्ते के वंशज हैं, उस श्रेणी के हैं जो अनंत विनाश के अधीन की जाएगी। कई लोग मैं क्या कहता हूँ इसकी परवाह नहीं करते हैं, किंतु मैं ऐसे हर तथाकथित संत को बताना चाहता हूँ जो यीशु का अनुसरण करते हैं, कि जब आप यीशु को एक श्वेत बादल पर स्वर्ग से उतरते हुए अपनी आँखों से देखें, तो यह धार्मिकता के सूर्य का सार्वजनिक प्रकटन होगा। शायद वह आपके लिए एक बड़ी उत्तेजना का समय होगा, मगर आपको पता होना चाहिए कि जिस समय आप यीशु को स्वर्ग से उतरते देखेंगे तो यही वह समय भी होगा जब आप दण्ड दिए जाने के लिए नीचे नरक चले जाएँगे। यह परमेश्वर की प्रबंधन योजना की समाप्ति की घोषणा होगी, और यह तब होगा जब परमेश्वर अच्छे को पुरस्कार और दुष्ट को दण्ड देगा। क्योंकि परमेश्वर का न्याय मनुष्य के संकेतों को देखने से पहले ही समाप्त हो चुका होगा, जब वहाँ सिर्फ़ सत्य की अभिव्यक्ति ही होगी। वे जो सत्य को स्वीकार करते हैं तथा संकेतों की खोज नहीं करते हैं और इस प्रकार शुद्ध कर दिए जाते हैं, वे परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट चुके होंगे और सृष्टिकर्ता के आलिंगन में प्रवेश कर चुके होंगे। सिर्फ़ वे ही जो इस विश्वास में बने रहते हैं कि “यीशु जो श्वेत बादल पर सवारी नहीं करता है एक झूठा मसीह है” अनंत दण्ड के अधीन कर दिए जाएँगे, क्योंकि वे सिर्फ़ उस यीशु में विश्वास करते हैं जो संकेतों को प्रदर्शित करता है, परन्तु उस यीशु को स्वीकार नहीं करते हैं जो गंभीर न्याय की घोषणा करता है और जीवन में सच्चे मार्ग को बताता है। और इसलिए केवल यही हो सकता है कि जब यीशु खुलेआम श्वेत बादल पर वापस लौटें तो वे उसके साथ व्यवहार करें। वे बहुत हठधर्मी, अपने आप में बहुत आश्वस्त, बहुत अभिमानी हैं। ऐसे अधम लोग यीशु द्वारा कैसे पुरस्कृत किए जा सकते हैं? यीशु का लौटना उन लोगों के लिए एक महान उद्धार है जो सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, परन्तु उनके लिए जो सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं यह निंदा का एक संकेत है। आप लोगों को अपना स्वयं का रास्ता चुनना चाहिए, और पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा नहीं करनी चाहिए और सत्य को अस्वीकार नहीं करना चाहिए। आप लोगों को अज्ञानी और अभिमानी व्यक्ति नहीं बनना चाहिए, बल्कि ऐसा बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करता हो और सत्य की खोज करने के लिए लालायित हो; सिर्फ़ इसी तरीके से आप लोग लाभान्वित होंगे। मैं आप लोगों को परमेश्वर में विश्वास के रास्ते पर सावधानी से चलने की सलाह देता हूँ। निष्कर्ष तक न पहुँचें; इससे ज्यादा और क्या, परमेश्वर में अपने विश्वास में लापरवाह और निश्चिन्त न बनें। आप लोगों को जानना चाहिए, कि कम से कम, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं उन्हें विनम्र और श्रद्धावान होना चाहिए। जिन्होंने सत्य को सुन लिया है और फिर भी इस पर अपनी नाक भौं सिकोड़ते हैं वे मूर्ख और अज्ञानी हैं। जिन्होंने सत्य को सुन लिया है और फिर भी लापरवाही के साथ निष्कर्षों तक पहुँचते हैं या सकी निंदा करते हैं ऐसे लोग अभिमान से घिरे हुए हैं। जो कोई भी यीशु पर विश्वास करता है वह दूसरों को श्राप देने या दूसरों की निंदा करने के योग्य नहीं है। आप सब लोगों को एक ऐसा होना चाहिए जो तर्कसंगत हो और सत्य को स्वीकार करता हो। शायद, सत्य के मार्ग को सुन कर और जीवन के वचन को पढ़ कर, आप विश्वास करते हैं कि इन 10,000 वचनों में से सिर्फ़ एक ही वचन है जो आपके दृढ़ विश्वास के अनुसार और बाइबल के समान है, और फिर आपको उसमे इन वचनों में से 10,000वें वचन की खोज करते रहना चाहिए। मैं अब भी आपको सुझाव देता हूँ कि विनम्र बनो, अति-आत्मविश्वासी न बनो, और अपने आप को बहुत ऊँचा न उठाओ। परमेश्वर के लिए अपने हृदय में इतना थोड़ा सा आदर रखकर, आप बड़े प्रकाश को प्राप्त करेंगे। यदि आप इन वचनों की सावधानी से जाँच करें और इन पर बार-बार मनन करें, तब आप समझेंगे कि वे सत्य हैं या नहीं, वे जीवन हैं या नहीं। शायद, केवल कुछ वाक्यों को पढ़ कर, कुछ लोग इन वचनों की बिना देखे ही यह कहते हुए निंदा करेंगे, “यह पवित्र आत्मा की कुछ प्रबुद्धता से अधिक कुछ नहीं है,” अथवा “यह एक झूठा मसीह है जो लोगों को धोखा देने के लिए आया है।” जो लोग ऐसी बातें कहते हैं वे अज्ञानता से अंधे हो गए हैं! आप परमेश्वर के कार्य और बुद्धि को बहुत कम समझते हैं और मैं आपको पुनः आरंभ से शुरू करने की सलाह देता हूँ! अंतिम दिनों में झूठे मसीहों के प्रकट होने की वजह से परमेश्वर द्वारा व्यक्त किये गए वचनों की आप लोगों को निंदा अवश्य नहीं करनी चाहिए, और क्योंकि आप लोग धोखे से डरते हैं इसलिए आप लोगों को ऐसा अवश्य नहीं बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा करे। क्या यह एक बड़ी दया नहीं होगी? यदि, बहुत जाँच के बाद, अब भी आपको लगता है कि ये वचन सत्य नहीं हैं, मार्ग नहीं हैं, और परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं हैं, तो फिर अंततः आप दण्डित किए जाएँगे, और आशीषों के बिना होंगे। यदि आप ऐसे सत्य को जो साफ़-साफ़ और स्पष्ट रूप से कहा गया है स्वीकार नहीं कर सकते हैं, तो क्या आप परमेश्वर के उद्धार के अयोग्य नहीं हैं? क्या आप कोई ऐसे नहीं हैं जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौटने के लिए पर्याप्त सौभाग्यशाली नहीं है? इस बारे में विचार करें! उतावले और अविवेकी न बनें, और परमेश्वर में विश्वास को एक खेल की तरह न समझें। अपनी मंजिल के लिए, अपनी संभावनाओं के लिए, अपने जीवन के लिए विचार करें, और अपने स्वंय के साथ ऊपरी तौर से दिलचस्पी न लें। क्या आप इन वचनों को स्वीकार कर सकते हैं?