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अध्याय 4 तुम्हें अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य की सच्चाईयों को अवश्य जानना चाहिए।

4. परमेश्वर के परीक्षणों और शुद्धिकरण के कार्य का महत्व।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

लोगों की कौन सी आंतरिक स्थिति पर यह सब परीक्षणों को लक्ष्य किया जाता है? ये लोगों के विद्रोही स्वभाव को लक्षित करती हैं जो परमेश्वर को संतुष्ट करने के अयोग्य है। लोगों के भीतर बहुत सी अशुद्ध बातें हैं, और बहुत सा पांखड भरा हुआ है, और इसलिए परमेश्वर उन्हें परीक्षाओं के आधीन करता है ताकि उन्हें शुद्ध बना सके। ...

... परमेश्वर का सच्चा प्रेम उसके सम्पूर्ण स्वभाव में निहित है, और जब परमेश्वर का सम्पूर्ण स्वभाव तेरे ऊपर प्रकट होता है, तो यह तेरे देह पर क्या लेकर आता है? जब परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव तुझे दिखाया जाता है, तेरा देह अनिवार्य रूप से अत्याधिक कष्ट सहेगा। यदि तू इस पीड़ा को नहीं सहेगा, तो तुझे परमेश्वर के द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है, न ही तू परमेश्वर को सच्चा प्रेम अर्पित कर पाएगा। यदि परमेश्वर तुझे पूर्ण बनाता है, तो वह तुझे निश्चय ही अपना सम्पूर्ण स्वभाव दिखाएगा। सृष्टि की रचना के बाद से आज तक, परमेश्वर ने अपने सम्पूर्ण स्वभाव को कभी भी नहीं दिखाया है—परन्तु अंतिम दिनों में वह इसे उस समूह के लोगों को प्रकट करता है जिन्हें उसने पूर्व निर्धारित किया है और चुना है, और मनुष्यों को पूर्ण बनाने के द्वारा वह अपने स्वभाव को खुला प्रकट करता है, जिसके माध्यम से वह एक समूह के लोगों को पूर्ण बनाता है। लोगों के लिए ऐसा है परमेश्वर का सच्चा प्रेम। उनको परमेश्वर के सच्चे प्रेम को अनुभव करने के लिए उन्हे अत्याधिक पीड़ा को सहना और एक अधिकतम मूल्य चुकाना आवश्यक है। केवल इसके बाद ही वे परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किए जाएंगे और परमेश्वर को अपना प्रेम वापस चुका पाएँगे और केवल इस के बाद ही परमेश्वर का हृदय संतुष्ट होगा। यदि लोग परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हैं और यदि वे उसकी इच्छा को पूरा करना चाहते हैं और पूरी तरह से परमेश्वर को प्रेम करने के लिए अपना हृदय दे देते हैं, तो उन्हें मृत्यु से भी भयंकर कष्ट सहने के लिए अत्याधिक कष्ट और कई परिस्थितियों की पीड़ाओं से होकर गुजरना होगा, अंततः उन्हें परमेश्वर को अपना वास्तविक हृदय देना ही पड़ेगा। कोई व्यक्ति परमेश्वर से वास्तव में प्रेम करता है या नहीं यह कठिनाई और शुद्धिकरण के समय प्रकट होता है। परमेश्वर लोगों के प्रेम को शुद्ध करता और यह केवल कठिनाई और शुद्धिकरण के मध्य ही प्राप्त किया जा सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है"से "केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है"से

मनुष्य की दशा और परमेश्वर के प्रति मनुष्य के व्यवहार को देखने पर परमेश्वर ने नया कार्य किया है, उसने मनुष्य को अनुमति दी है कि वह उसके विषय में ज्ञान और उसके प्रति आज्ञाकारिता रखे, और प्रेम और गवाही दोनों रखे। इस प्रकार, मनुष्य को परमेश्वर के शोधन, और साथ ही उसके दंड, उसके व्यवहार और काँट-छाँट का अनुभव करना चाहिए, जिसके बिना मनुष्य कभी परमेश्वर को नहीं जानेगा, और कभी सच्चाई के साथ परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी गवाही देने में समर्थ नहीं होगा। परमेश्वर द्वारा मनुष्य का शोधन केवल एकतरफा प्रभाव के लिए नहीं होता, बल्कि बहुतरफा प्रभाव के लिए होता है। केवल इसी रीति से परमेश्वर उनमें शोधन का कार्य करता है जो सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं, ताकि मनुष्य का दृढ़ निश्चय और प्रेम परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किया जाए। जो सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं, और जो परमेश्वर की लालसा करते हैं, उनके लिए ऐसे शोधन से अधिक अर्थपूर्ण, या अधिक सहयोगपूर्ण कुछ नहीं हैं। परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य के द्वारा सरलता से जाना या समझा नहीं जाता, क्योंकि परमेश्वर आखिरकार परमेश्वर है। अंततः, परमेश्वर के लिए मनुष्य जैसे स्वभाव को रखना असंभव है, और इस प्रकार मनुष्य के लिए परमेश्वर के स्वभाव को जानना सरल नहीं है। मनुष्य के द्वारा सहजता से सत्य को प्राप्त नहीं किया जाता, और यह सरलता से उनके द्वारा समझा नहीं जाता जो शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए गए हैं; मनुष्य सत्य से रहित है, और सत्य को अभ्यास में लाने के दृढ़ निश्चय से रहित है, और यदि वह दुःख नहीं उठाता, और उसका शोधन नहीं किया जाता या उसे दंड नहीं दिया जाता, तो उसका दृढ़ निश्चय कभी सिद्ध नहीं किया जाएगा। सब लोगों के लिए शोधन कष्टदायी होता है, और स्वीकार करने के लिए बहुत कठिन होता है - परंतु फिर भी, परमेश्वर शोधन के समय में ही मनुष्य के समक्ष अपने धर्मी स्वभाव को स्पष्ट करता है, और मनुष्य के लिए अपनी मांगों को सार्वजनिक करता है, तथा और अधिक प्रबुद्धता प्रदान करता है, और इसके साथ-साथ और अधिक वास्तविक कांट-छांट और व्यवहार को भी; तथ्यों और सत्यों के बीच की तुलना के द्वारा वह स्वयं के बारे में और सत्य के बारे में मनुष्य को और अधिक ज्ञान प्रदान करता है, और मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा के विषय में अधिक समझ प्रदान करता है, और इस प्रकार मनुष्य को परमेश्वर के सच्चे और शुद्ध प्रेम को प्राप्त करने की अनुमति देता है। शोधन का कार्य करने में परमेश्वर के लक्ष्य ये हैं। वह सारा कार्य जो परमेश्वर मनुष्य में करता है, उसके अपने लक्ष्य और उसका अपना महत्व होता है; परमेश्वर व्यर्थ कार्य नहीं करता है, और न ही वह ऐसा कार्य करता है जो मनुष्य के लिए लाभदायक न हो। शोधन का अर्थ परमेश्वर के सामने से लोगों को हटा देना नहीं है, और न ही इसका अर्थ उन्हें नरक में डालकर नाश कर देना है। इसका अर्थ शोधन के दौरान मनुष्य के स्वभाव को बदलना है, उसकी प्रेरणाओं, उसके पुराने दृष्टिकोणों को बदलना है, परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदलना है, और उसके पूरे जीवन को बदलना है। शोधन मनुष्य की वास्तविक परख है, और एक वास्तविक प्रशिक्षण का रूप है, और केवल शोधन के दौरान ही उसका प्रेम उसके अंतर्निहित कार्य को पूरा कर सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल शोधन का अनुभव करने के द्वारा ही मनुष्य सच्चाई के साथ परमेश्वर से प्रेम कर सकता है" से

परमेश्वर मनुष्य को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं में सिद्ध बना सकता है। यह इस पर निर्भर करता है, कि तुम अनुभव करने के योग्य हो और क्या तुम परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किए जाने की कोशिश करते हो। यदि तुम सचमुच परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किए जाने की कोशिश करते हो, तब नकारात्मक तुम्हारी हानि नहीं कर सकता, परन्तु तुम्हारे लिए वे बातें ला सकता है, जो अधिक वास्तविक हैं, और तुम्हें यह जानने के लिए और अधिक योग्य बना सकता है, कि तुम्हारे भीतर क्या कमी है, तुम अपनी वास्तविक परिस्थतियों को अधिक समझने में , और यह देखने योग्य बना सकता है कि मनुष्य के पास कुछ नहीं है; और मनुष्य कुछ नहीं है; यदि तुम परीक्षाओं को अनुभव नहीं करते, तुम नहीं जानते, और तुम सर्वदा महसूस करोगे कि तुम दूसरों से ऊपर हो और प्रत्येक व्यक्ति से उत्तम हो। इस सब के द्वारा तुम देखोगे कि जो कुछ पहले हुआ था वह परमेश्वर के द्वारा किया और सुरक्षित रखा गया था। परीक्षाओं में प्रवेश तुम्हें प्रेम या विश्वास रहित बना देता है, तुम्हें प्रार्थना की कमी होती है, और तुम भजन गाने में असमर्थ होते हो और अनजाने में ही तुम इन सब के मध्य में स्वयं को जान लेते हो। परमेश्वर के पास मनुष्य को सिद्ध बनाने के अनेक साधन हैं। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से निपटने के लिए वह समस्त प्रकार के वातावरण प्रयोग करता है, और मनुष्य को नग्न करने के लिए विभिन्न चीजों का प्रयोग करता है, एक और वह मनुष्य के साथ निपटता है और दूसरी ओर मनुष्य को नग्न करता है, और एक अन्य बात में वह मनुष्य के हृदय के गहन रहस्यों को खोदकर और ज़ाहिर करते हुए, और मनुष्य को उसकी अनेक अवस्थाएँ दिखा करके उसका स्वभाव दर्शाते हुए मनुष्य को प्रकट करता है। परमेश्वर अनेक विधियों—प्रकाशन, व्यवहार करने, शुद्धिकरण, और ताड़ना—के द्वारा मनुष्य को सिद्ध बनाता है, जिससे मनुष्य जान सके कि परमेश्वर व्यावहारिक है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "मात्र वे लोग जो अभ्यास करने पर केन्द्रित रहते हैं, उन्हें ही सिद्ध बनाया जा सकता है" से

इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह परमेश्वर के कार्य का कौन सा भाग है, मनुष्य के लिए सब कुछ अथाह है। यदि तुम इसे मापने के योग्य होते, तो परमेश्वर के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं रह जाता। परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य अथाह है, यह तुम्हारी अवधारणाओं से बहुत अधिक अनोखा भी है, और यह तुम्हारी अवधारणाओं से जितना ज़्यादा असंगत होता है, उतना ही ज़्यादा यह दर्शाता है कि परमेश्वर का कार्य अर्थपूर्ण है; यदि यह तुम्हारी अवधारणाओं के अनुरूप होता, तो यह अर्थहीन होता। आज, तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर का कार्य अत्यंत अद्भुत है, और यह जितना अधिक अद्भुत होता है, उतना ही अधिक तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर अथाह है, और तुम देखते हो कि परमेश्वर के कर्म कितने महान हैं। यदि उसने मनुष्य को जीतने के लिए केवल सतही और बेपरवाह कार्य किए होते, और तब इतना ही किया होता, तो मनुष्य परमेश्वर के कार्य के महत्व को देखने में असमर्थ होता। यद्यपि आज तुम आज थोड़ा सा शुद्धिकरण प्राप्त कर रहे हो, किन्तु यह तुम्हारे जीवन की प्रगति के लिए बहुत लाभदायक है—और इसलिए ऐसी कठिनाईयाँ तुम लोगों के लिए सर्वथा आवश्यक है। आज, तुम थोड़ा सा शुद्धिकरण प्राप्त कर रहे हो, किन्तु बाद में तुम सचमुच में परमेश्वर के कार्यों को देखने में सक्षम होगे, और अंततः तुम कहोगेः "परमेश्वर के कर्म बहुत ही अद्भुत हैं!" तुम्हारे हृदय में ये वचन होंगे। पल भर के लिए परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण (सेवा करने वालों की परीक्षा[ए] और ताड़ना के समय) का अनुभव करने के बाद, अंततः कुछ लोगों ने कहाः "परमेश्वर में विश्वास करना वास्तव में कठिन है!" यह "कठिन" दर्शाता है कि परमेश्वर के कर्म अथाह हैं, कि परमेश्वर का कार्य अत्यधिक महत्व और मूल्य से सम्पन्न है, और मनुष्य के द्वारा संजोकर रखे जाने के बहुत ही योग्य है। यदि, मेरे इतना अधिक काम करने के बाद, तुम्हें थोड़ा सा भी ज्ञान नहीं हुआ, तो क्या तब भी मेरे कार्य का कोई मूल्य हो सकता है? यह तुम से कहवाएगा: "परमेश्वर की सेवा करना वास्तव में कठिन है, परमेश्वर के कर्म बहुत अद्भुत हैं, परमेश्वर सचमुच में विवेकी है!" वह बहुत प्यारा है! यदि, अनुभव की एक अवधि से गुज़रन के बाद, तुम ऐसे वचनों को कहने में समर्थ हो, तो इससे साबित होता है कि तुमने अपने में परमेश्वर के कार्य को प्राप्त कर लिया है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "पूर्ण बनाए जाने वालों को शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए" से

जब परमेश्वर मनुष्य को शुद्ध करने के लिए कार्य करता है, तो मनुष्य को कष्ट होता है, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम अधिक विशाल हो जाता है, और परमेश्वर की अधिक शक्ति मनुष्य में प्रकट हो जाती है। मनुष्य का शुद्धिकरण जितना कम होता है, उतना ही कम परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम होता है, और परमेश्वर की उतनी ही कम शक्ति उस में प्रकट होती है। उसका शुद्धिकरण एवं दर्द जितना ज़्यादा होता है तथा उसकी यातना जितनी अधिक होगी, परमेश्वर के प्रति उसका सच्चा प्रेम एवं विश्वास उतना ही अधिक गहरा होगा, परमेश्वर में उसकी आस्था उतनी ही अधिक सच्ची होगी, और परमेश्वर के विषय में उसका ज्ञान भी उतना ही अधिक गहरा होगा। तुम अपने अनुभवों में देखोगे कि वे जो अत्यधिक शुद्धिकरण तथा दर्द, और अधिक व्यवहार तथा अनुशासन सहते हैं, उनका परमेश्वर के प्रति गहरा प्रेम होता है, और उनके पास परमेश्वर का अधिक गहन एवं मर्मज्ञ ज्ञान होता है। ऐसे लोग जिन्होंने व्यवहार किए जाने का अनुभव नहीं किया है, उनके पास केवल सतही ज्ञान होता है, और वे केवल यह कह सकते हैं: "परमेश्वर बहुत अच्छा है, वह लोगों को अनुग्रह प्रदान करता है ताकि वे परमेश्वर में आनन्दित हो सकें"। यदि लोगों ने व्यवहार और अनुशासित किए जाने का अनुभव किया है, तो वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान के बारे में बोलने में समर्थ हैं। अतः मनुष्य में परमेश्वर का कार्य जितना ज़्यादा अद्भुत होता है, उतना ही ज़्यादा यह मूल्यवान एव महत्वपूर्ण होता है। यह तुम्हारे लिए जितना अधिक अभेद्य होता है और यह तुम्हारी अवधारणाओं के साथ जितना अधिक असंगत होता है, परमेश्वर का कार्य उतना ही अधिक तुम्हें जीतने में समर्थ होता है, तुम तक पहुँचता है और तुम्हें परिपूर्ण बना पाता है। परमेश्वर के कार्य का महत्व बहुत अधिक है! यदि उसने मनुष्य को इस तरीके से शुद्ध नहीं किया, यदि उसने इस पद्धति के अनुसार से कार्य नहीं किया, तो परमेश्वर का कार्य अप्रभावी और महत्वहीन होगा। अंत के दिनों के दौरान उसके द्वारा लोगों के एक समूह के चयन के पीछे असाधारण महत्व का यही कारण है। पहले यह कहा गया था कि परमेश्वर इस समूह को चयनित और प्राप्त करेगा। वह तुम लोगों के भीतर जितना बड़ा काम करता है, उतना ही ज़्यादा तुम लोगों का प्रेम गहरा एवं शुद्ध होता है। परमेश्वर का काम जितना अधिक विशाल होता है, उतना ही अधिक उसकी बुद्धिमत्ता का स्वाद लेने में तुम लोग समर्थ होते हैं और उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान उतना ही अधिक गहरा होता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "पूर्ण बनाए जाने वालों को शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए" से

फुटनोट:

क. मूल पाठ "की परीक्षाएँ" को छोड़ता है।

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