अध्याय 4 अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य के सत्य

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

सारांश में, अपने विश्वास में पतरस के मार्ग को अपनाने का अर्थ है, सत्य को खोजने के मार्ग पर चलना, जो वास्तव में स्वयं को जानने और अपने स्वभाव को बदलने का मार्ग भी है। केवल पतरस के मार्ग पर चलने के द्वारा ही कोई परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाए जाने के मार्ग पर होगा। किसी को भी इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि वास्तव में कैसे पतरस के मार्ग पर चलना है साथ ही कैसे इसे अभ्यास में लाना है। सबसे पहले, किसी को भी अपने स्वयं के इरादों, अनुचित कार्यों, और यहाँ तक कि अपने परिवार और अपनी स्वयं की देह की सभी चीज़ों को एक ओर रखना होगा। एक व्यक्ति को पूर्ण हृदय से समर्पित अवश्य होना चाहिए, अर्थात्, स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, सत्य की खोज पर ध्यान लगाना, और परमेश्वर के वचनों में उसके इरादों की खोज पर अवश्य ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, और हर चीज़ में परमेश्वर की इच्छा को समझने का प्रयास करना चाहिए। यह अभ्यास की सबसे बुनियादी और प्राणाधार पद्धति है। यह वही था जो पतरस ने यीशु को देखने के बाद किया था, और केवल इस तरह से अभ्यास करने से ही कोई सबसे अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर के वचनों के प्रति हार्दिक समर्पण में मुख्यत: सत्य की खोज करना, परमेश्वर के वचनों में उसके इरादों की खोज करना, परमेश्वर की इच्छा को समझने पर ध्यान केन्द्रित करना, और परमेश्वर के वचनों से सत्य को समझना तथा और अधिक प्राप्त करना शामिल है। उसके वचनों को पढ़ते समय, पतरस ने सिद्धांतों को समझने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था और धार्मिक ज्ञान प्राप्त करने पर तो उसका ध्यान और भी केंद्रित नहीं था; इसके बजाय, उसने सत्य को समझने और परमेश्वर की इच्छा को समझने पर, साथ ही उसके स्वभाव और उसकी सुंदरता की समझ को प्राप्त करने पर ध्यान लगाया था। पतरस ने परमेश्वर के वचनों से मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट अवस्थाओं के साथ ही मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति को तथा मनुष्य की वास्तविक कमियों को समझने का भी प्रयास किया, और इस प्रकार परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए, उसकी इंसान से अपेक्षाओं के सभी पहलुओं को प्राप्त किया। पतरस के पास ऐसे बहुत से अभ्यास थे जो परमेश्वर के वचनों के अनुरूप थे; यह परमेश्वर की इच्छा के सर्वाधिक अनुकूल था, और यह वो सर्वोत्त्म तरीका था जिससे कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए सहयोग कर सकता है। परमेश्वर से सैकड़ों परीक्षणों का अनुभव करते समय, पतरस ने मनुष्य के लिए परमेश्वर के न्याय के प्रत्येक वचन, मनुष्य के प्रकाशन के परमेश्वर के प्रत्येक वचन और मनुष्य की उसकी माँगों के प्रत्येक वचन के विरुद्ध सख्ती से स्वयं की जाँच की, और उन वचनों के अर्थ को जाने का पूरा प्रयास किया। उसने उस हर वचन पर विचार करने और याद करने की ईमानदार कोशिश की जो यीशु ने उससे कहे थे, और बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त किए। अभ्यास करने के इस तरीके के माध्यम से, वह परमेश्वर के वचनों से स्वयं की समझ प्राप्त करने में सक्षम हो गया था, और वह न केवल मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट स्थितियों को समझने लगा, बल्कि मनुष्य के सार, प्रकृति और विभिन्न कमियों को समझने लगा—स्वयं को वास्तव में समझने का यही अर्थ है। परमेश्वर के वचनों से, पतरस ने न केवल स्वयं की सच्ची समझ प्राप्त की, बल्कि परमेश्वर के वचनों में व्यक्त की गई बातों—परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव, उसके स्वरूप, परमेश्वर की अपने कार्य के लिए इच्छा, मनुष्यजाति से उसकी माँगें—से इन वचनों से उसे परमेश्वर के बारे में पूरी तरह से पता चला। उसे परमेश्वर का स्वभाव, और उसका सार पता चला; उसे परमेश्वर के स्वरूप का ज्ञान और समझ मिली, साथ ही परमेश्वर की प्रेममयता और मनुष्य से परमेश्वर की माँगें पता चलीं। भले ही परमेश्वर ने उस समय उतना नहीं बोला, जितना आज वह बोलता है, किन्तु पतरस में इन पहलुओं में परिणाम उत्पन्न हुआ था। यह एक दुर्लभ और बहुमूल्य चीज़ थी। पतरस सैकड़ों परीक्षाओं से गुज़रा लेकिन उसका कष्‍ट सहना व्‍यर्थ नहीं हुआ। न केवल उसने परमेश्‍वर के वचनों और कार्यों से स्‍वयं को समझ लिया बल्कि उसने परमेश्‍वर को भी जान लिया। इसके साथ ही, उसने परमेश्‍वर के वचनों में इंसानियत से उसकी सभी अपेक्षाओं पर विशेष ध्‍यान दिया। परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुरूप होने के लिए मनुष्‍य को जिस भी पहलू से परमेश्‍वर को संतुष्ट करना चाहिए, पतरस उन पहलुओं में पूरा प्रयास करने में और पूर्ण स्‍पष्‍टता प्राप्‍त करने में समर्थ रहा; ख़ुद उसके प्रवेश के लिए यह अत्‍यंत लाभकारी था। परमेश्‍वर ने चाहे जिस भी विषय में कहा, जब तक वे वचन पतरस का जीवन बन सकते थे और सत्य से संबंधित थे, तब तक उसने उन्‍हें अपने हृदय में रचा-बसा लिया ताकि अक्‍सर उन पर विचार कर सके और उनकी सराहना कर सके। यीशु के वचनों को सुनने के बाद, वह उन्‍हें अपने हृदय में उतार सका, जिससे पता चलता है कि उसका ध्‍यान विशेष रूप से परमेश्‍वर के वचनों पर था, और अंत में उसने वास्‍तव में परिणाम प्राप्‍त कर लिये। अर्थात्, वह परमेश्‍वर के वचनों पर खुलकर व्‍यवहार कर सका, सत्‍य पर सही ढंग से अमल कर सका और परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुरूप हो सका, पूरी तरह परमेश्‍वर की मर्ज़ी के अनुसार कार्य कर सका, और अपने निजी मतों और कल्‍पनाओं का त्‍याग कर सका। इस तरह, पतरस परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर सका। पतरस की सेवा परमेश्‍वर की इच्‍छा के अनुसार मुख्‍य रूप से इसीलिए हो सकी क्‍योंकि उसने ऐसा किया था।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की कोशिश करने के लिए, व्यक्ति को पहले यह समझना होगा कि परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाने का अर्थ क्या होता है, साथ ही, परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए किन शर्तों को पूरा करना होता है। एक बार जब इंसान ऐसे मामलों को समझ लेता है, तब उसे अभ्यास के पथ को खोजना चाहिए। परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए व्यक्ति को एक विशेष गुणवत्ता वाला होना चाहिए। बहुत से लोग स्वाभाविक रूप से उच्च गुणवत्ता वाले नहीं होते, ऐसी स्थिति में तुम्हें कीमत चुकानी चाहिए और अपने स्तर पर मेहनत करनी चाहिए। तुम्हारी गुणवत्ता जितनी कम होगी, तुम्हें उतना ही अधिक प्रयास करना पड़ेगा। परमेश्वर के वचनों की तुम्हारी समझ जितनी अधिक होगी और जितना अधिक तुम उन्हें अभ्यास में लाओगे, उतनी ही जल्दी तुम पूर्ण बनाए जाने के पथ में प्रवेश कर सकते हो। प्रार्थना करने से, तुम प्रार्थना के क्षेत्र में पूर्ण बनाए जा सकते हो; परमेश्वर के वचनों को खाने एवं पीने से, उनके सार को समझने और उनकी वास्तविकता को जीने से भी तुम्हें पूर्ण बनाया जा सकता है। दैनिक आधार पर परमेश्वर के वचनों का अनुभव करके, तुम्हें यह जान लेना चाहिए कि तुममें किस बात की कमी है, इसके अतिरिक्त, तुम्हें अपने घातक दोष एवं कमज़ोरियों को पहचान लेना चाहिए और परमेश्वर से प्रार्थना और विनती करनी चाहिए। ऐसा करके, तुम्हें धीरे-धीरे पूर्ण बनाया जाएगा। पूर्ण बनाए जाने का रास्ता है : प्रार्थना करना, परमेश्वर के वचनों को खाना एवं पीना, परमेश्वर के वचनों के सार को समझना; परमेश्वर के वचनों के अनुभव में प्रवेश करना; तुममें जिस बात की कमी है उसे जानना; परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित होना; परमेश्वर के बोझ को ध्यान में रखना एवं परमेश्वर के लिए अपने प्रेम के द्वारा देह की इच्छाओं का त्याग करना; और अपने भाई-बहनों के साथ निरन्तर सहभागिता में शामिल होना, जो तुम्हारे अनुभवों को समृद्ध करता है। चाहे तुम्हारा सामुदायिक जीवन हो या व्यक्तिगत जीवन, और चाहे बड़ी सभाएँ हों या छोटी हों, तुम सभी से अनुभव एवं प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हो, ताकि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के सामने शांत रहे और परमेश्वर के पास वापस आ जाए। यह सब कुछ पूर्ण बनाए जाने की प्रक्रिया का हिस्सा है। जैसा कि पहले कहा गया है, परमेश्वर के बोले गए वचनों का अनुभव करने का अर्थ वास्तव में उनका स्वाद ले पाना है और तुम्हें उनके अनुसार जीने देना है ताकि तुम परमेश्वर के प्रति कहीं अधिक बड़ा विश्वास एवं प्रेम पा सकोगे। इस तरीके से, तुम धीरे-धीरे अपना भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव त्याग दोगे; तुम स्वयं को अनुचित इरादों से मुक्त कर लोगे; और एक सामान्य मनुष्य के समान जीवन जियोगे। तुम्हारे भीतर परमेश्वर का प्रेम जितना ज़्यादा होता है—अर्थात, परमेश्वर के द्वारा तुम्हें जितना अधिक पूर्ण बनाया गया है—तुम शैतान के द्वारा उतने ही कम भ्रष्ट किए जाओगे। अपने व्यवहारिक अनुभवों के द्वारा, तुम धीरे धीरे पूर्ण बनाए जाने के पथ में प्रवेश करोगे। इसलिए, यदि तुम पूर्ण बनाए जाना चाहते हो, तो परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखना एवं उसके वचनों का अनुभव करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखो' से उद्धृत

यदि तू परमेश्वर के शासन में विश्वास करता है, तो तुझे यह विश्वास करना होगा कि जो चीजें हर दिन होती हैं, वे अच्छी हों या बुरी, यूँ ही हुई घटनाएँ नहीं होती हैं। ऐसा नहीं है कि कोई व्यक्ति जानबूझकर तुझ पर सख़्त है या तुझ पर निशाना साध रहा है; वास्तव में यह सब परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित है। परमेश्वर इन चीज़ों को किस लिए आयोजित करता है? यह तेरी कमियों को प्रकट करने के लिए या तुझे उजागर करने के लिए नहीं है; तुझे उजागर करना अंतिम लक्ष्य नहीं है। अंतिम लक्ष्य तुझे सिद्ध बनाना और तुझे बचाना है। परमेश्वर ऐसा कैसे करता है? सबसे पहले, वह तुझे तेरे स्वयं के भ्रष्ट स्वभाव, तेरी प्रकृति और सार, तेरे दोषों और तेरी कमी के बारे में अवगत कराता है। केवल अपने हृदय में उन्हें समझ कर और जान कर ही तू सत्य की खोज कर सकता है और धीरे-धीरे अपने भ्रष्ट स्वभाव को दूर कर सकता है। यह परमेश्वर का तुझे एक अवसर प्रदान करना है। तुझे यह जानना होगा कि इस अवसर को कैसे हाथ में लिया जाए, और परमेश्वर के साथ लड़ाई में कैसे न उलझा जाए। विशेष रूप से उन लोगों, घटनाओं और चीज़ों का सामना करते समय, जिनकी परमेश्वर तेरे आस-पास व्यवस्था करता है, हमेशा बचकर निकलना चाहते हुए, हमेशा परमेश्वर को दोष देते और ग़लत समझते हुए, यह मत सोच कि चीजें तेरे मन के हिसाब से नहीं हैं। यह परमेश्वर के कार्य से गुज़रना नहीं है, और इससे सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करना तेरे लिए बहुत मुश्किल बन जाएगा। जो भी बात तू पूरी तरह से नहीं समझ पाता है, या जब तुझ पर कठिनाइयाँ आती हैं, तो तुझे समर्पण करना अवश्य सीखना चाहिए। तुझे सबसे पहले परमेश्वर के सामने आना चाहिए तथा और अधिक प्रार्थना करनी चाहिए। इस तरह, इससे पहले कि तू इसे जाने तेरी आंतरिक स्थिति में एक बदलाव होगा और तू अपनी समस्या को हल करने के लिए सत्य की तलाश कर पाएगा—तू परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में सक्षम होगा। इस अवधि के दौरान, तेरे भीतर सत्य की वास्तविकता को गढ़ा जा रहा है, और इसी तरह से तू प्रगति करेगा और तेरे जीवन की स्थिति में बदलाव आएगा। एक बार जब तू इस बदलाव से गुज़र जाएगा और तेरे पास सत्य की इस तरह की वास्तविकता होगी, तो तेरे पास कद-काठी होगी, और कद-काठी के साथ जीवन आता है। यदि कोई हमेशा भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के आधार पर रहता है, तो फिर चाहे उसमें कितना ही उत्साह या ऊर्जा क्यों न हो, उसे कद-काठी, या जीवन धारण करने वाला नहीं माना जा सकता है। परमेश्वर हर एक व्यक्ति में कार्य करता है, और इससे फर्क नहीं पड़ता है कि उसकी विधि क्या है, सेवा करने के लिए वो किस प्रकार के लोगों, चीज़ों या मामलों का प्रयोग करता है, या उसके वचनों के लहजे किस तरह के हो, उसका केवल एक ही अंतिम लक्ष्य होता है: तुझे बचाना। तुझे बचाने के पहले, उसे तुझे रूपांतरित करने की आवश्यकता है, तो तू थोड़ी-सी पीड़ा कैसे सहन नहीं कर सकता है? तुझे पीड़ा सहनी होगी। इस पीड़ा में कई चीजें शामिल हो सकती हो। परमेश्वर तेरे आसपास के लोगों, मामलों, और चीज़ों को उठाता है, ताकि तू खुद को जान सके या फिर सीधे तेरे साथ निपटा जा सके, तेरी काट-छाँट और तुझे उजागर किया जा सके। ऑपरेशन की मेज़ पर पड़े किसी व्यक्ति की तरह—तुझे अच्छे परिणाम के लिए कुछ दर्द सहना होगा। यदि हर बार जब तेरी काट-छाँट होती है और तुझसे निपटा जाता है और हर बार जब वह लोगों, मामलों, और चीज़ों को उठाता है, इससे तेरी भावनाओं में हलचल पैदा होती है और तुझे प्रोत्साहन मिलता है, तो यह सही है, और तेरे पास कद-काठी होगी और तू सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करेगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य को प्राप्त करने के लिए, तुझे लोगों, मामलों और अपने आसपास की चीज़ों से अवश्य सीखना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर पर अपने विश्वास में, पतरस ने हर एक बात में परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास किया था और उन सब में जो परमेश्वर से आया था, उसमें उसने आज्ञा मानने का प्रयास किया। बिना ज़रा सी भी शिकायत के, वह ताड़ना एवं न्याय, साथ ही साथ शुद्धिकरण, क्लेश एवं अपने जीवन में मौजूद कमी को स्वीकार कर सकता था, उसमें से कुछ भी परमेश्वर के लिए उसके प्रेम को पलट नहीं सकता था। क्या यह परमेश्वर के लिए चरम प्रेम नहीं है? क्या यह परमेश्वर के एक प्राणी के कर्तव्य की परिपूर्णता नहीं है? चाहे ताड़ना हो, न्याय हो, या क्लेश—तू मृत्यु तक आज्ञाकारिता हासिल करने में सदैव सक्षम हो, यह वह चीज़ है जिसे परमेश्वर के एक प्राणी के द्वारा हासिल किया जाना चाहिए, यह परमेश्वर के लिए प्रेम की शुद्धता है। यदि मनुष्य इतना कुछ हासिल कर सकता है, तो वह परमेश्वर का एक योग्य प्राणी है, तथा ऐसा और कुछ नहीं है जो सृष्टिकर्ता की इच्छा को बेहतर ढंग से संतुष्ट कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

अगर लोग जीवित प्राणी बनना चाहते हैं, परमेश्वर के गवाह बनना चाहते हैं, परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करना होगा; उन्हें आनंदपूर्वक उसके न्याय व ताड़ना के प्रति समर्पित होना होगा, आनंदपूर्वक परमेश्वर की काट-छांट और निपटारे को स्वीकार करना होगा। केवल तब ही वे परमेश्वर द्वारा अपेक्षित तमाम सत्य को अपने आचरण में ला सकेंगे, तब ही वे परमेश्वर के उद्धार को पा सकेंगे और सचमुच जीवित प्राणी बन सकेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो जीवित हो उठा है?' से उद्धृत

वे लोग जिनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ी-सी भी आज्ञाकारिता नहीं है, जो केवल उसका नाम स्वीकारते हैं, जिन्हें परमेश्वर की दयालुता और मनोरमता की थोड़ी-सी भी समझ है, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कदमों के साथ तालमेल बनाकर नहीं चलते, और पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य एवं वचनों का पालन नहीं करते—ऐसे लोग परमेश्वर के अनुग्रह में रहते हैं, लेकिन उसके द्वारा प्राप्त नहीं किए या पूर्ण नहीं बनाए जाएँगे। परमेश्वर लोगों को उनकी आज्ञाकारिता, परमेश्वर के वचनों को उनके खाने-पीने, उनका आनन्द उठाने और उनके जीवन में कष्ट एवं शुद्धिकरण के माध्यम से पूर्ण बनाता है। ऐसे विश्वास से ही लोगों का स्वभाव परिवर्तित हो सकता है और तभी उन्हें परमेश्वर का सच्चा ज्ञान हो सकता है। परमेश्वर के अनुग्रह के बीच रहकर सन्तुष्ट न होना, सत्य के लिए सक्रियता से लालायित होना और उसे खोजना और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने का प्रयास करना—यही जागृत रहकर परमेश्वर की आज्ञा मानने का अर्थ है; और परमेश्वर ऐसा ही विश्वास चाहता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए' से उद्धृत

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