मार्ग ... (8)

जब परमेश्वर मानवजाति से मेलजोल करने और लोगों के साथ रहने के लिए आया है तब से बस एक या दो दिन नहीं हुए हैं। शायद, इतने लंबे समय में, लोग कमोबेश परमेश्वर को जानने लगे हैं, और शायद उन्होंने परमेश्वर की सेवा करने के बारे में काफी अधिक अंतर्दृष्टियाँ प्राप्त कर ली हैं, और वे परमेश्वर में अपने विश्वास में परिपक्व हो गए हैं। मामला जो भी हो, लोग कमोबेश परमेश्वर के स्वभाव को समझने लगे हैं, और उन्होंने अपने स्वयं के स्वभावों को भी असंख्य तरीकों से व्यक्त किया है। जिस तरीके से मैं देखता हूँ, परमेश्वर द्वारा उदाहरण के रूप में उपयोग करने के लिए लोगों की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ पर्याप्त हैं, और संदर्भ के रूप में उपयोग करने के लिए उनकी मानसिक क्रियाएँ पर्याप्त हैं। यह मानवजाति और परमेश्वर के बीच सहयोग का एक पहलू हो सकता है, जिससे मनुष्य बेख़बर है, जिससे परमेश्वर द्वारा निर्देशित यह प्रस्तुति बेहद स्पष्ट और जीवंत बन जाती है। इस नाटक के सामान्य निर्देशक के रूप में मैं ये बातें अपने भाई-बहनों से कह रहा हूँ—इसमें अभिनय करने के बाद हम में से प्रत्येक व्यक्ति अपने विचारों और अपनी भावनाओं को बता सकता है, और इस बारे में चर्चा कर सकता है कि इस नाटक में हम में से प्रत्येक अपने जीवन को कैसे अनुभव करता है। अपने दिल को खोलकर अपनी मंचीय कला के बारे में बात करने के लिए, और यह देखने के लिए कि परमेश्वर कैसे प्रत्येक व्यक्ति का मार्गदर्शन करता है, हम भी एक बिल्कुल नए प्रकार की संगोष्ठी कर सकते हैं, ताकि अपनी अगली प्रस्तुति में हम अपनी कला के एक उच्च स्तर को अभिव्यक्त कर सकें और प्रत्येक व्यक्ति अपनी भूमिका को अधिकतम संभव हद तक निभा सके, और परमेश्वर को निराश न करे। मुझे उम्मीद है कि मेरे भाई-बहन इसे गंभीरता से लेंगे। किसी को भी इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि किसी भी भूमिका को एक या दो दिनों में अच्छी तरह से नहीं निभाया जा सकता है; इसके लिए आवश्यक है कि हम जीवन का अनुभव करें और लंबे समय तक अपने वास्तविक जीवन की गहराई तक जाएँ, और विभिन्न प्रकार के जीवन का व्यावहारिक अनुभव करें। केवल तभी हम मंच पर जा सकते हैं। मैं अपने भाई-बहनों के लिए आशा से भरा हुआ हूँ। मुझे विश्वास है कि तुम लोग निराश या हतोत्साहित नहीं होगे, परमेश्वर चाहे कुछ भी क्यों न करे, तुम लोग एक अग्निपात्र की तरह होगे : तुम लोगों का ताप कभी कम नहीं होगा, बल्कि तुम लोग अंत तक सहन करते रहोगे, जब तक कि परमेश्वर का कार्य पूरी तरह अभिव्यक्त न हो जाए, जब तक कि उस नाटक का अंतिम निष्कर्ष न निकल जाए जिसका निर्देशन परमेश्वर करता है। मैं तुम लोगों से कोई दूसरी माँग नहीं करता हूँ, मैं केवल यही आशा करता हूँ कि तुम लोग सहन करोगे, कि तुम लोग परिणामों के लिए अधीन नहीं होगे, कि तुम मेरे साथ सहयोग करो ताकि जो कार्य मुझे करना चाहिए वह अच्छी तरह से किया जाए, और कोई भी गड़बड़ियाँ या विघ्न पैदा न करे। जब कार्य का यह भाग पूरा हो जाएगा, तो परमेश्वर तुम लोगों के समक्ष सब कुछ अभिव्यक्त कर देगा। मेरा कार्य पूरा हो जाने के बाद, मैं परमेश्वर को ब्यौरा देने के लिए उसके समक्ष तुम लोगों की साख प्रस्तुत करूँगा। क्या यह बेहतर नहीं है? अपने लक्ष्य हासिल करने में हमारा एक दूसरे की सहायता करना—क्या यह हर एक के लिए परिपूर्ण समाधान नहीं है? अब कठिन समय है, ऐसा समय जिसके लिए तुम लोगों को मूल्य चुकाने की आवश्यकता है। क्योंकि अब मैं निर्देशक हूँ, इसलिए मुझे आशा है कि तुम लोगों में से कोई भी इससे वितृष्णा महसूस नहीं करेगा। मैं जिस कार्य को कर रहा हूँ वह ऐसा ही है। शायद एक दिन मैं एक अधिक उपयुक्त “कार्य इकाई” में चला जाऊँगा और तुम लोगों के लिए चीजों को और मुश्किल नहीं बनाऊँगा। तुम लोग जो कुछ भी देखना चाहते हो, मैं तुम लोगों को दिखाऊँगा, और तुम लोग जो कुछ भी सुनना चाहते हो, मैं तुम लोगों को प्रदान करूँगा। लेकिन अभी नहीं। आज के लिए यही कार्य है, और मैं तुम लोगों को खुली छूट नहीं दे सकता और तुम लोगों को मनमानी करने की अनुमति नहीं दे सकता हूँ। यह मेरे कार्य को कठिन बना देगा; सीधे शब्दों में कहूँ, तो इससे कोई फल प्राप्त नहीं होगा और यह तुम लोगों के लिए किसी लाभ का नहीं होगा। इसलिए आज, तुम लोगों को “अन्याय” सहना चाहिए। जब वह दिन आएगा, और मेरे कार्य का यह चरण पूरा हो जाएगा, तो मैं मुक्त हो जाऊँगा, मैं ऐसे भारी बोझ को वहन नहीं करूँगा, और तुम लोग मुझसे जो कुछ भी माँगोगे मैं उसे मान लूँगा; अगर तुम लोग जो कुछ माँगते हो वह तुम्हारे जीवन के लिए लाभकारी रहेगा, तो मैं उसे पूरा करूँगा। आज, मैंने अब एक भारी जिम्मेदारी उठा ली है। मैं परमपिता परमेश्वर के आदेशों के विरूद्ध नहीं जा सकता, और मैं अपने कार्य की योजनाओं में गड़बड़ी नहीं कर सकता। मैं अपने कारोबारी मामलों के माध्यम से अपने व्यक्तिगत मामलों को प्रबंधित नहीं कर सकता। मुझे आशा है कि तुम लोग सब समझ सकते हो और मुझे क्षमा कर सकते हो, क्योंकि मैं जो कुछ भी करता हूँ वह परमपिता परमेश्वर की इच्छाओं के अनुसार होता है; मैं वही करता हूँ जो वह मुझसे करवाता है, चाहे वह जो कुछ भी क्यों न चाहता हो, और मैं उसे अप्रसन्न या क्रोधित नहीं करूँगा—मैं केवल वही करता हूँ जो मुझे करना चाहिए। इसलिए, परमपिता परमेश्वर की ओर से, मैं तुम लोगों को सलाह देता हूँ कि थोड़ी और देर सहन कर लो। किसी को भी जरूरतअधीर होने की जरूरत नहीं है। जब मैं वह पूरा कर लूँगा जो मुझे करना चाहिए, उसके बाद तुम लोग जो चाहे कर सकते हो और जो चाहे देख सकते हो—लेकिन मुझे उस कार्य को पूरा करना होगा जिसे पूरा करने की जरूरतमुझे जरूरत है।

कार्य के इस चरण में हमसे परम आस्था और प्रेम की अपेक्षा की जाती है और रत्तीभर लापरवाही के कारण हम लड़खड़ा सकते हैं, क्योंकि कार्य का यह चरण पिछले सभी चरणों से अलग है : परमेश्वर जिस चीज को पूर्ण बना रहा है वह है लोगों की आस्था, जो अदृश्य भी है और अमूर्त भी। परमेश्वर जो करता है वह है वचनों को आस्था में, प्रेम में और जीवन में बदलना। लोगों को उस बिंदु पर पहुँचना है जहाँ वे सैकड़ों शोधन सह चुके हों और अय्यूब से भी अधिक आस्था रखते हों, जिसके लिए उनसे यह माँग की जाती है कि वे असाधारण पीड़ा और तमाम तरह की यातनाएँ सहें, फिर भी किसी भी समय परमेश्वर से मुँह न मोड़ें। जब वे मृत्यु तक समर्पणशील रहते हैं और परमेश्वर में अपार आस्था रखते हैं, तो परमेश्वर के कार्य का यह चरण पूरा हो जाता है। यही वह कार्य है जिसकी जिम्मेदारी मैंने उठाई है, इसलिए मुझे आशा है कि मेरे भाई-बहन मेरी कठिनाइयों को समझने में सक्षम होंगे और मुझसे किसी और चीज की याचना नहीं करेंगे। यह परमपिता परमेश्वर की मुझसे अपेक्षा है और मैं इस वास्तविकता से भाग नहीं सकता हूँ; मुझे वह कार्य करना ही होगा जो मुझे करना चाहिए। मुझे बस यही आशा है कि तुम लोग जबरदस्ती की बहस और विकृत तर्क नहीं करोगे, तुम अधिक अंतर्दृष्टि वाले होगे, और मुद्दों को बहुत सरल रूप में नहीं देखोगे। तुम लोगों की सोच बहुत बचकाना है, बहुत अनुभवहीन है। परमेश्वर का कार्य उतना सरल नहीं है जितना तुम लोग कल्पना करते हो, वह मनमर्जी से कुछ भी यूँ ही नहीं करता; अगर वह ऐसा करता, तो उसकी योजना तहस-नहस हो जाती। क्या तुम लोग ऐसा नहीं कहते हो? मैं परमेश्वर का कार्य कर रहा हूँ। मैं लोगों के लिए असंगत काम नहीं कर रहा हूँ, जो चाहा वह कर दिया और व्यक्तिगत तौर पर निर्णय ले लिया कि मैं कुछ करूँ या न करूँ। आज चीजें इतनी आसान नहीं है। मुझे निर्देशक के रूप में कार्य करने के लिए परमपिता द्वारा भेजा गया है—क्या तुम लोगों को लगता है कि मैंने स्वयं इसकी व्यवस्था की और इसे चुना है? मनुष्य के विचार हमेशा परमेश्वर के कार्य के साथ टकराते हैं, यही कारण है कि, जब मैंने कुछ समय तक कार्य किया है और लोगों के कई ऐसे अनुरोध होते हैं जिन्हें मैं पूरा करने में सक्षम नहीं होता, तो लोग मेरे बारे में अपना मन बदल लेते हैं। तुम सभी को अपने इन विचारों के बारे में स्पष्ट होना चाहिए; मुझे उन्हें एक-एक करके बताने की आवश्यकता नहीं है। मैं तुम लोगों को केवल वही कार्य समझा सकता हूँ जो मैं करता हूँ; मैं इस मामले से दुखी नहीं हूँ। एक बार तुम लोग इस बात को समझ लो, तो तुम लोग इसे जैसे चाहे देख सकते हो। मैं कोई भी आपत्ति नहीं करूँगा, क्योंकि परमेश्वर इसी तरह कार्य करता है; मैं समझाने और स्वयं को ठीक समझने के लिए बाध्य नहीं हूँ। मैं बस वचनों का कार्य करने के लिए आया हूँ, वचनों के निर्देशन के माध्यम से कार्य करने और इस नाटक को खेलने देने के लिए आया हूँ। मुझे अन्य कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है, और अगर तुम मुझसे कुछ और करने को कहते हो तो मैं सामर्थ्यहीन होऊँगा। मुझे जो कुछ भी कहना है वह सब कुछ मैं समझा चुका हूँ, तुम लोग क्या सोचते हो इसकी मुझे परवाह नहीं है, और इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन मैं फिर भी तुम लोगों को याद दिलाना चाहूँगा कि परमेश्वर का कार्य उतना सरल नहीं है जितना तुम लोग कल्पना करते हो। यह लोगों की धारणाओं के अनुरूप जितना कम होता है, इसकी सार्थकता उतनी ही गहरी होती है; और यह लोगों की धारणाओं के अनुरूप जितना अधिक होता है, इसमें मूल्य और वास्तविक सार्थकता का उतना ही अधिक अभाव होता है। इन वचनों पर ध्यान से विचार करो—मैं इसके बारे में केवल इतना ही कहूँगा। बाकी का विश्लेषण तुम लोग स्वयं कर सकते हो। मैं यह नहीं समझाऊँगा।

लोग कल्पना करते हैं कि परमेश्वर एक निश्चित तरीके से कार्य करता है, लेकिन पिछले लगभग एक वर्ष के दौरान हमने परमेश्वर के जिस कार्य को अनुभव किया और देखा है, क्या वह वास्तव में मानवीय धारणाओं के अनुरूप रहा है कि नहीं? दुनिया के सृजन से लेकर अब तक एक भी व्यक्ति परमेश्वर के कार्य के चरणों या नियमों को नहीं समझ पाया है। यदि कोई समझ पाता तो ऐसा क्यों है कि धार्मिक अगुआ यह नहीं समझते हैं कि परमेश्वर आज इसी तरह से कार्य करता है? ऐसा क्यों है कि बहुत थोड़े से लोग आज की वास्तविकता को समझते हैं? इससे हम देख सकते हैं कि कोई भी परमेश्वर के कार्य को नहीं समझता है। लोग केवल उसके आत्मा के मार्गदर्शन के अनुसार ही कार्य कर सकते हैं; उन्हें उसके कार्य पर नियमों को सख्ती से लागू नहीं करना चाहिए। यदि तुम यीशु की छवि और कार्य को लो और परमेश्वर के वर्तमान कार्य के साथ इसकी तुलना करो, तो यह ठीक ऐसा ही होगा जैसे कि यहूदी लोग यीशु की तुलना यहोवा से करने की कोशिश कर रहे हों। क्या ऐसा करके तुम नष्ट नहीं होते हो? यहाँ तक कि यीशु को भी नहीं पता था कि अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य क्या होगा; वह बस इतना जानता था कि उसे सलीब पर चढ़ने के कार्य को पूरा करना है। तो दूसरों को कैसे पता चल सकता था? उन्हें कैसे पता हो सकता था कि भविष्य में परमेश्वर क्या करने जा रहा है? परमेश्वर कैसे अपनी योजना मनुष्यों को बता सकता था जिन पर शैतान ने कब्जा किया हुआ है? क्या यह मूर्खतापूर्ण नहीं है? परमेश्वर अपेक्षा करता है कि तुम उसके इरादों को जानो और समझो। वह यह अपेक्षा नहीं करता है कि तुम उसके भविष्य के कार्य पर विचार करो। हमें बस परमेश्वर में आस्था रखने की, उसके मार्गदर्शन के अनुसार कार्य करने की, वास्तविक कठिनाइयों को सँभालने में व्यावहारिक होने की, और परमेश्वर के लिए चीजों को मुश्किल नहीं बनाने या उसके लिए परेशानी पैदा नहीं करने के बारे में चिंतित होने की जरूरत है। हमें वही करना चाहिए जो हमें करना है; अगर हम परमेश्वर के वर्तमान कार्य के भीतर उपस्थित रह सकते हैं, तो इतना पर्याप्त है! यही वह राह है जिस पर मैं तुम लोगों का मार्गदर्शन करता हूँ। यदि हम केवल आगे बढ़ना जारी रखने पर एकाग्र रहते हैं, तो परमेश्वर हम में से किसी के साथ भी बुरा बर्ताव नहीं करेगा। अपने पिछले वर्ष के असाधारण अनुभवों के दौरान, तुमने बहुत-सी चीजें प्राप्त की हैं; मुझे यकीन है कि तुम लोगों को यह इतना कठिन नहीं लगेगा। मैं तुम लोगों को अपने कार्य और अपने काम के मार्ग पर ले जा रहा हूँ, और इसे परमेश्वर द्वारा बहुत पहले ही इस तरह से नियत कर दिया गया था कि हमारा आज के दिन तक इतनी दूर तक आना नियत था। हम ऐसा करने में सक्षम रहे हैं यह हम पर महान आशीष है, यद्यपि यह एक निर्बाध राह नहीं रही है, किन्तु हमारी मित्रता शाश्वत है, और यह युग-युगांतर तक चलेगी। चाहे जयकार और हँसी रही हो या उदासी और आँसू रहे हों, इस सब को एक सुंदर याद बनने दो! तुम लोगों को शायद पता हो कि मेरा कार्य बहुत ज्यादा समय तक नहीं चलेगा। मेरे पास बहुत कार्य परियोजनाएँ हैं, और मैं अक्सर तुम लोगों का साथ नहीं दे सकता। मुझे आशा है कि तुम लोग मुझे समझ सकते हो—क्योंकि हमारी मूल दोस्ती बदली नहीं है। हो सकता है कि एक दिन मैं तुम लोगों के सामने एक बार फिर से प्रकट हो जाऊँ, और मुझे आशा है कि तुम लोग मेरे लिए चीजों को मुश्किल नहीं बनाओगे। आखिरकार, मैं तुम लोगों से भिन्न हूँ। मैं अपने कार्य के लिए चारों ओर यात्रा करता हूँ, और मैं अपने दिन होटलों में रुककर नहीं बिताता हूँ। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम लोग कैसे हो, मैं बस वही करता हूँ जो मुझे करना चाहिए। मुझे उम्मीद है कि अतीत में हमने जिन चीजों को साझा किया था वे हमारी दोस्ती का पुष्प बनेंगी।

ऐसा कहा जा सकता है कि यह राह मेरे द्वारा खोली गई थी, और चाहे यह कड़वी रही हो या मीठी, मैंने राह दिखाई है। अगर आज हम यहाँ तक पहुँच पाए हैं, तो यह केवल परमेश्वर के अनुग्रह के कारण है। कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं जो मुझे धन्यवाद दें, और कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं जो मेरे बारे में शिकायत करें—लेकिन इनमें से कुछ भी मायने नहीं रखता है। मैं बस यह देखना चाहता हूँ कि लोगों के इस समूह में जो हासिल किया जाना चाहिए उसे हासिल कर लिया गया है। इसी का उत्सव मनाया जाना चाहिए। इसलिए, जो मेरे खिलाफ शिकायत करते हैं, उनसे मुझे कोई द्वेष नहीं है; मैं बस उस कार्य को यथाशीघ्र पूरा कर रहा हूँ जो मुझे करना चाहिए, ताकि परमेश्वर के हृदय को जल्द ही विश्राम मिल सके। उस समय, मैं कोई भारी बोझ नहीं उठाऊँगा, और परमेश्वर के हृदय को लगातार चिंता नहीं करने दूँगा। क्या तुम लोग अपने सहयोग को बेहतर बनाने के इच्छुक हो? क्या परमेश्वर का कार्य अच्छी तरह से करना हमारे लिए प्रयास करने हेतु एक बेहतर लक्ष्य नहीं है? इस अवधि में, यह कहना उचित है कि हमने असंख्य कठिनाइयों को सहा है और हर तरह के सुखों और दुःखों का अनुभव किया है। कुल मिलाकर, तुम लोगों में से प्रत्येक के प्रदर्शन ने मूलतः दर्जा बना लिया है। शायद, भविष्य में तुम लोगों से बेहतर कार्य की अपेक्षा की जाएगी, परन्तु मेरे ही विचारों पर न ठहर जाना; बस वही करना जो तुम लोगों को करना चाहिए। मुझे जो करना है मैं लगभग वहाँ पहुँच चुका हूँ; मुझे आशा है कि तुम लोग हमेशा वफादार रहोगे, और तुम लोग मेरे कार्य को याद करके उदासीन नहीं होगे। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि मैं कार्य का केवल एक चरण पूरा करने के लिए आया हूँ, और निश्चित रूप से परमेश्वर का समस्त कार्य करने के लिए नहीं। तुम लोगों को इस बारे में स्पष्ट हो जाना चाहिए, और इसके बारे में कोई अन्य मत नहीं रखना चाहिए। परमेश्वर के कार्य को पूरा करने के लिए और भी साधन आवश्यक हैं; तुम लोग हमेशा मुझ पर निर्भर नहीं रह सकते। हो सकता है कि तुम लोगों ने बहुत पहले ही यह एहसास कर लिया हो कि मैं कार्य के केवल एक हिस्से को पूरा करने के लिए आया हूँ; वह जो यहोवा या यीशु का प्रतिनिधित्व नहीं करता; परमेश्वर का कार्य कई चरणों में विभाजित है, इसलिए तुम लोगों को अधिक कठोर नहीं होना चाहिए। जब मैं कार्य कर रहा हूँ तो तुम लोगों को मेरी बात सुननी चाहिए। प्रत्येक युग में, परमेश्वर का कार्य बदलता रहता है; यह एक समान नहीं रहता, और हर बार यह वही पुराना गीत नहीं होता। और प्रत्येक चरण में उसका कार्य युग के उपयुक्त होता है, और इसलिए बदल जाता है क्योंकि युग वही नहीं रहता है। और इसलिए, चूँकि तुम इस युग में पैदा हुए हो, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना चाहिए, और इन वचनों को पढ़ना चाहिए। एक दिन ऐसा आ सकता है जब मेरा कार्य बदल सकता है, ऐसे मामले में तुम लोगों को उसके अनुसार आगे जारी रखना चाहिए जो तुम लोगों को करना चाहिए; परमेश्वर का कार्य गलत नहीं हो सकता है। इस बात पर कोई ध्यान मत दो कि बाहरी दुनिया कैसे बदलती है; परमेश्वर गलत नहीं हो सकता और उसका कार्य गलत नहीं हो सकता। बात बस इतनी ही है कि कभी-कभी परमेश्वर का पुराना कार्य गायब हो जाता है और उसका नया कार्य शुरू हो जाता है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि क्योंकि नया कार्य आ गया है, इसलिए पुराना कार्य गलत है। यह एक भ्रम है! परमेश्वर के कार्य को सही या गलत नहीं कहा जा सकता, इसे बस पहले का या बाद का ही कहा जा सकता है। परमेश्वर में लोगों के विश्वास के लिए यही मार्गदर्शन है और इसे बिल्कुल भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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