12. भ्रष्ट मनुष्य के शैतानी स्वभाव और उसकी प्रकृति एवं सार को प्रकट करने पर अत्यावश्यक वचन

326. परमेश्वर के विरुद्ध मनुष्य के विरोध और उसकी विद्रोहशीलता का स्रोत शैतान के द्वारा उसकी भ्रष्टता है। क्योंकि वह शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, इसलिये मनुष्य की अंतरात्मा सुन्न हो गई है, वह अनैतिक हो गया है, उसके विचार पतित हो गए हैं, और उसका मानसिक दृष्टिकोण पिछड़ा हुआ है। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने से पहले, मनुष्य स्वाभाविक रूप से परमेश्वर का अनुसरण करता था और उसके वचनों को सुनने के बाद उनका पालन करता था। उसमें स्वाभाविक रूप से सही समझ और विवेक था, और उचित मानवता थी। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने के बाद, उसकी मूल समझ, विवेक, और मानवता मंद पड़ गई और शैतान के द्वारा दूषित हो गई। इस प्रकार, उसने परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता और प्रेम को खो दिया है। मनुष्य की समझ पथ से हट गई है, उसका स्वभाव एक जानवर के समान हो गया है, और परमेश्वर के प्रति उसकी विद्रोहशीलता और भी अधिक बढ़ गई है और गंभीर हो गई है। लेकिन फिर भी, मनुष्य इसे न तो जानता है और न ही पहचानता है, और केवल आँख बंद करके विरोध और विद्रोह करता है। मनुष्य के स्वभाव का प्रकाशन उसकी समझ, अंतर्दृष्टि, और अंत:करण का प्रकटीकरण है; और क्योंकि उसकी समझ और अंतर्दृष्टि सही नहीं हैं, और उसका अंत:करण अत्यंत मंद पड़ गया है, इसलिए उसका स्वभाव परमेश्वर के प्रति विद्रोही है। यदि मनुष्य की समझ और अंतर्दृष्टि बदल नहीं सकती, तो फिर उसके स्वभाव में ऐसा बदलाव होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, जो परमेश्वर के हृदय के अनुकूल हो। यदि मनुष्य की समझ सही नहीं है, तो वह परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकता और परमेश्वर के द्वारा उपयोग के लिए अयोग्य है। "उचित समझ" के मायने हैं परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना और उसके प्रति निष्ठावान बने रहना, परमेश्वर के लिए तड़पना, परमेश्वर के प्रति पूर्णतया शुद्ध होना, और परमेश्वर के प्रति अंत:करण रखना, यह परमेश्वर के साथ एक हृदय और मन होने को दर्शाता है, जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करने को नहीं। पथभ्रष्ट समझ का होना ऐसा नहीं है। चूँकि मनुष्य शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था इसलिये, उसने परमेश्वर के बारे में धारणाएँ बना लीं, और परमेश्वर के लिए उसके अंदर निष्ठा या तड़प नहीं रही है, परमेश्वर के प्रति अंतरात्मा की तो बात ही क्या। मनुष्य जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करता और उस पर दोष लगाता है, और इसके अलावा, उसकी पीठ पीछे उस पर अपशब्दों का प्रहार करता है। मनुष्य स्पष्ट रूप से जानता है कि वह परमेश्वर है, फिर भी उसकी पीठ पीछे उस पर दोष लगाता है, परमेश्वर की आज्ञापालन का उसका कोई भी इरादा नहीं होता, वह सिर्फ परमेश्वर से अंधाधुंध माँग और निवेदन करता रहता है। ऐसे लोग—जिनकी समझ पथभ्रष्ट होती है—वे अपने घृणित स्वभाव को जानने या अपनी विद्रोहशीलता पर पछतावा करने के अयोग्य होते हैं। यदि लोग अपने आप को जानने के योग्य हों, तो फिर वे अपनी समझ को थोड़ा-सा पुनः प्राप्त कर चुके हैं; परमेश्वर के प्रति अधिक विद्रोही लोग, जो अपने आप को अब तक नहीं जान पाये, उनमें समझ उतनी ही कम होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है' से उद्धृत

327. भ्रष्टाचार के हजारों सालों बाद, मनुष्य संवेदनहीन और मूर्ख बन गया है; वह एक दुष्ट आत्मा बन गया है जो परमेश्वर का विरोध करती है, इस हद तक कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य की विद्रोहशीलता इतिहास की पुस्तकों में दर्ज की गई है, यहाँ तक कि मनुष्य खुद भी अपने विद्रोही आचरण का पूरा लेखा-जोखा देने में असमर्थ है—क्योंकि मनुष्य शैतान के द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट किया जा चुका है, और शैतान के द्वारा रास्ते से भटका दिया गया है इसलिए वह नहीं जानता कि कहाँ जाना है। आज भी, मनुष्य परमेश्वर को धोखा देता है : जब मनुष्य परमेश्वर को देखता है, तो वह उसे धोखा देता है, और जब वह परमेश्वर को नहीं देख पाता, तब भी वह उसे धोखा देता है। कुछ ऐसे भी हैं, जो परमेश्वर के श्रापों और परमेश्वर के कोप का अनुभव करने के बाद भी उसे धोखा देते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य की समझ ने अपने मूल प्रकार्य को खो दिया है, और मनुष्य की अंतरात्मा ने भी, अपने मूल प्रकार्य को खो दिया है। मनुष्य जिसे मैं देखता हूँ, वह मानव रूप में एक जानवर है, वह एक जहरीला साँप है, मेरी आँखों के सामने वह कितना भी दयनीय बनने की कोशिश करे, मैं उसके प्रति कभी भी दयावान नहीं बनूँगा, क्योंकि मनुष्य को काले और सफेद के बीच, सत्य और असत्य के बीच अन्तर की समझ नहीं है, मनुष्य की समझ बहुत ही सुन्न हो गई है, फिर भी वह आशीषें पाने की कामना करता है; उसकी मानवता बहुत नीच है फिर भी वह एक राजा के प्रभुत्व को पाने की कामना करता है। ऐसी समझ के साथ, वह किसका राजा बन सकता है? ऐसी मानवता के साथ, कैसे वह सिंहासन पर बैठ सकता है? सचमुच में मनुष्य को कोई शर्म नहीं है! वह नीच ढोंगी है! तुम सब जो आशीषें पाने की कामना करते हो, मैं सुझाव देता हूँ कि पहले शीशे में अपना बदसूरत प्रतिबिंब देखो—क्या तू एक राजा बनने लायक है? क्या तेरे पास एक ऐसा चेहरा है जो आशीषें पा सकता है? तेरे स्वभाव में ज़रा-सा भी बदलाव नहीं आया है और तूने किसी भी सत्य का अभ्यास नहीं किया, फिर भी तू एक बेहतरीन कल की कामना करता है। तू अपने आप को भुलावे में रख रहा है! ऐसी गन्दी जगह में जन्म लेकर, मनुष्य समाज के द्वारा बुरी तरह संक्रमित किया गया है, वह सामंती नैतिकता से प्रभावित किया गया है, और उसे "उच्च शिक्षा के संस्थानों" में सिखाया गया है। पिछड़ी सोच, भ्रष्ट नैतिकता, जीवन पर मतलबी दृष्टिकोण, जीने के लिए तिरस्कार-योग्य दर्शन, बिल्कुल बेकार अस्तित्व, पतित जीवन शैली और रिवाज—इन सभी चीज़ों ने मनुष्य के हृदय में गंभीर रूप से घुसपैठ कर ली है, और उसकी अंतरात्मा को बुरी तरह खोखला कर दिया है और उस पर गंभीर प्रहार किया है। फलस्वरूप, मनुष्य परमेश्वर से और अधिक दूर हो गया है, और परमेश्वर का और अधिक विरोधी हो गया है। दिन-प्रतिदिन मनुष्य का स्वभाव और अधिक शातिर बन रहा है, और एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के लिए कुछ भी त्याग करे, एक भी व्यक्ति नहीं जो स्वेच्छा से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करे, इसके अलावा, न ही एक भी व्यक्ति ऐसा है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रकटन की खोज करे। इसकी बजाय, इंसान शैतान की प्रभुता में रहकर, कीचड़ की धरती पर बस सुख-सुविधा में लगा रहता है और खुद को देह के भ्रष्टाचार को सौंप देता है। सत्य को सुनने के बाद भी, जो लोग अन्धकार में जीते हैं, इसे अभ्यास में लाने का कोई विचार नहीं करते, यदि वे परमेश्वर के प्रकटन को देख लेते हैं तो इसके बावजूद उसे खोजने की ओर उन्मुख नहीं होते हैं। इतनी पथभ्रष्ट मानवजाति को उद्धार का मौका कैसे मिल सकता है? इतनी पतित मानवजाति प्रकाश में कैसे जी सकती है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है' से उद्धृत

328. मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के प्रकटीकरण का स्रोत उसका मंद अंत:करण, उसकी दुर्भावनापूर्ण प्रकृति और उसकी विकृत समझ से बढ़कर और किसी में भी नहीं है; यदि मनुष्य का अंत:करण और समझ फिर से उचित होने के योग्य हो पाएँ, तो फिर वह परमेश्वर के सामने उपयोग करने के योग्य बन जायेगा। सिर्फ इसलिए क्योंकि मनुष्य का अंत:करण हमेशा सुन्न रहा है, मनुष्य की समझ जो कभी भी सही नहीं रही, लगातार मंद होती जा रही है, इस कारण ही मनुष्य लगातार परमेश्वर के प्रति विद्रोही बना हुआ है, इस हद तक कि उसने यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया और अंतिम दिनों के देहधारी परमेश्वर को अपने घर में प्रवेश देने से इंकार कर रहा है, और परमेश्वर के देह पर दोष लगाता है, और परमेश्वर के देह को तुच्छ जानता है। यदि मनुष्य में थोड़ी-सी भी मानवता होती, तो वह परमेश्वर के देहधारी शरीर के साथ इतना निर्दयी व्यवहार न करता; यदि उसे थोड़ी-सी भी समझ होती, तो वह देहधारी परमेश्वर के शरीर के साथ अपने व्यवहार में इतना शातिर न होता; यदि उसमें थोड़ा-सा भी विवेक होता, तो वह देहधारी परमेश्वर को इस ढंग से "धन्यवाद" न देता। मनुष्य देहधारी परमेश्वर के युग में जीता है, फिर भी वह इतना अच्छा अवसर दिये जाने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद देने की बजाय परमेश्वर के आगमन को कोसता है, या परमेश्वर के देहधारण के तथ्य को पूरी तरह से अनदेखा कर देता है, और प्रकट रूप से इसके विरोध में होता है और इससे ऊबा हुआ है। मनुष्य परमेश्वर के आगमन के प्रति चाहे जैसा भी व्यवहार करे, संक्षेप में, परमेश्वर ने हमेशा धैर्यपूर्वक अपने कार्य को जारी रखा है—भले ही मनुष्य ने परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी स्वागत करने वाला रुख़ नहीं रखा है, और अंधाधुंध उससे निवेदन करता रहता है। मनुष्य का स्वभाव अत्यंत शातिर बन गया है, उसकी समझ अत्यंत मंद हो गई है, और उसका अंत:करण दुष्ट के द्वारा पूरी तरह से रौंद दिया गया है और मनुष्य के मौलिक अंत:करण का अस्तित्व बहुत पहले ही समाप्त हो गया था। मनुष्य, मानवजाति को बहुत अधिक जीवन और अनुग्रह प्रदान करने के लिए देहधारी परमेश्वर का न केवल एहसानमंद नहीं है, बल्कि परमेश्वर के द्वारा उसे सत्य दिए जाने पर वह आक्रोश में भी है; ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य को सत्य में थोड़ी-सी भी रूचि नहीं है, इसलिए वह परमेश्वर के प्रति आक्रोश में आ गया है। मनुष्य न सिर्फ देहधारी परमेश्वर के लिए अपनी जान देने के नाकाबिल है, बल्कि वह उससे उपकार हासिल करने की कोशिश भी करता रहता है, और परमेश्वर से ऐसे सूद की माँग करता है जो उससे दर्जनों गुना बड़ी हैं जो मनुष्य ने परमेश्वर को दिया है। ऐसे विवेक और समझ के लोग इसे कोई बड़ी बात नहीं मानते हैं, वे अब भी ऐसा मानते हैं कि उन्होंने परमेश्वर के लिए स्वयं को बहुत अधिक खर्च किया है, और परमेश्वर ने उन्हें बहुत थोड़ा दिया है। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने मुझे सिर्फ एक कटोरा पानी ही दिया है फिर भी अपने हाथ पसार कर माँग करते हैं कि मैं उन्हें दो कटोरे दूध की कीमत चुकाऊँ या मुझे एक रात के लिए कमरा दिया है परन्तु मुझ से कई रातों के किराए की माँग करते हैं। ऐसी मानवता, और ऐसे विवेक के साथ, कैसे तू अब भी जीवन पाने की कामना कर सकता है? तू कितना घृणित अभागा है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है' से उद्धृत

329. मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह केवल उन्हीं चीजों से प्यार करता है, जिन्हें वह देख या स्पर्श नहीं कर सकता, जो अत्यधिक रहस्यमयी और अद्भुत होती हैं, और जो मनुष्यों द्वारा अकल्पनीय और अप्राप्य हैं। जितनी अधिक अवास्तविक ये वस्तुएँ होती हैं, उतना ही अधिक लोगों द्वारा उनका विश्लेषण किया जाता है, और यहाँ तक कि लोग अन्य सभी से बेपरवाह होकर भी उनकी खोज करते हैं और उन्हें प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। जितना अधिक अवास्तविक ये चीज़ें होती हैं, उतना ही अधिक बारीकी से लोग उनकी जाँच और विश्लेषण करते हैं और, यहाँ तक कि इतनी दूर चले जाते हैं कि उनके बारे में अपने स्वयं के व्यापक विचार बना लेते हैं। इसके विपरीत, चीजें जितनी अधिक वास्तविक होती है, लोग उनके प्रति उतने ही अधिक उपेक्षापूर्ण होते हैं; वे केवल उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं और यहाँ तक कि उनके प्रति तिरस्कारपूर्ण भी हो जाते हैं। क्या यही प्रवृत्ति तुम लोगों की उस यथार्थपरक कार्य के प्रति नहीं है, जो मैं आज करता हूँ? ये चीज़ें जितनी अधिक वास्तविक होती हैं, उतना ही अधिक तुम लोग उनके विरुद्ध पूर्वाग्रही हो जाते हो। तुम उनकी जाँच करने के लिए ज़रा भी समय नहीं निकालते, बल्कि केवल उनकी उपेक्षा कर देते हो; तुम लोग इन यथार्थवादी, निम्नस्तरीय अपेक्षाओं को हेय दृष्टि से देखते हो, और यहाँ तक कि इस परमेश्वर के बारे में कई धारणाओं को प्रश्रय देते हो, जो कि सर्वाधिक वास्तविक है, और बस उसकी वास्तविकता और सामान्यता को स्वीकार करने में अक्षम हो। इस तरह, क्या तुम लोग एक अज्ञात विश्वास नहीं रखते? तुम लोगों का अतीत के अज्ञात परमेश्वर में अचल विश्वास है, और आज के वास्तविक परमेश्वर में कोई रुचि नहीं है। क्या ऐसा इसलिए नहीं है, क्योंकि कल का परमेश्वर और आज का परमेश्वर दो भिन्न-भिन्न युगों से हैं? क्या ऐसा इसलिए भी नहीं है, क्योंकि कल का परमेश्वर स्वर्ग का उच्च परमेश्वर है, जबकि आज का परमेश्वर धरती पर एक छोटा-सा मनुष्य है? इसके अलावा, क्या ऐसा इसलिए नहीं है, क्योंकि मनुष्यों द्वारा आराधना किया जाने वाला परमेश्वर उनकी अपनी धारणाओं से उत्पन्न हुआ है, जबकि आज का परमेश्वर धरती पर उत्पन्न, वास्तविक देह है? हर चीज पर विचार करने के बाद, क्या ऐसा इसलिए नहीं है, क्योंकि आज का परमेश्वर इतना अधिक वास्तविक है कि मनुष्य उसकी खोज नहीं करता? क्योंकि आज का परमेश्वर लोगों से जो कहता है, वह ठीक वही है, जिसे करने के लिए लोग सबसे अधिक अनिच्छुक हैं, और जो उन्हें लज्जित महसूस करवाता है। क्या यह लोगों के लिए चीज़ों को कठिन बनाना नहीं है? क्या यह उसके दागों को उघाड़ नहीं देता? इस प्रकार से, वास्तविकता की खोज न करने वालों में से कई लोग देहधारी परमेश्वर के शत्रु बन जाते हैं, मसीह-विरोधी बन जाते हैं। क्या यह एक स्पष्ट तथ्य नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं' से उद्धृत

330. कार्य के कई वर्षों के दौरान, तुम लोगों ने कई सत्यों को देखा है, किन्तु क्या तुम लोग जानते हो कि मेरे कानों ने क्या सुना है? तुम लोगों में से कितने सत्य को स्वीकार करने को तैयार हैं? तुम सब लोग विश्वास करते हो कि तुम सत्य के लिए कीमत चुकाने को तैयार हो, किन्तु कितनों ने वास्तव में सत्य के लिए दुःख झेला है? तुम लोगों के हृदयों में जो कुछ भी विद्यमान है वह अधर्म है, और इस कारण से तुम लोग विश्वास करते हो कि हर कोई, चाहे वह कोई भी हो, धोखेबाज और कुटिल है। तुम यहाँ तक कि यह विश्वास भी करते हो कि देहधारी परमेश्वर, ठीक एक सामान्य मनुष्य की तरह, बिना दयालु हृदय या कृपालु प्रेम के होगा। इससे भी अधिक, तुम लोग विश्वास करते हो कि एक कुलीन चरित्र और दयालु, कृपालु प्रकृति केवल स्वर्ग के परमेश्वर के भीतर ही विद्यमान होती है। और तुम लोग विश्वास करते हो कि इस प्रकार के संत का अस्तित्व नहीं होता है और केवल अंधकार एवं दुष्टता ही पृथ्वी पर राज्य करते हैं, जब कि परमेश्वर, जिस पर लोग अच्छे और सुंदर के लिए अपना मनोरथ रखते हैं, मनुष्य के द्वारा बनाया गया एक प्रसिद्ध काल्पनिक रूप है। तुम लोगों के मन में, स्वर्ग का परमेश्वर बहुत ही ईमानदार, धार्मिक और महान, आराधना और श्रद्धा के योग्य है, किन्तु पृथ्वी का यह परमेश्वर, स्वर्ग के परमेश्वर का सिर्फ़ एक प्रतिस्थानिक और साधन है। तुम विश्वास करते हो कि यह परमेश्वर स्वर्ग के परमेश्वर के समकक्ष नहीं हो सकता है, एक साथ उनका उल्लेख तो बिल्कुल नहीं किया जा सकता है। जब परमेश्वर की महानता और सम्मान की बात आती है, तो वे स्वर्ग के परमेश्वर की महिमा से संबंधित होते हैं, किन्तु जब मनुष्य की प्रकृति और भ्रष्टता की बात आती है, तो वे ऐसे गुण हैं जिनमें पृथ्वी के परमेश्वर का एक अंश है। स्वर्ग का परमेश्वर हमेशा उत्कृष्ट है, जबकि पृथ्वी का परमेश्वर हमेशा ही तुच्छ, कमज़ोर और अक्षम है। स्वर्ग के परमेश्वर में भावना की प्रवृत्ति नहीं है, केवल धार्मिकता होती है, जबकि धरती के परमेश्वर में केवल स्वार्थी नीयत है और वह बिना किसी निष्पक्षता और समझ वाला है। स्वर्ग के परमेश्वर में थोड़ी सी भी कुटिलता नहीं होती है और वह हमेशा विश्वासयोग्य है, जबकि पृथ्वी के परमेश्वर में हमेशा ही एक बेईमानी का पक्ष होता है। स्वर्ग का परमेश्वर मनुष्यों से बहुत अधिक प्रेम करता है, जबकि पृथ्वी का परमेश्वर मनुष्य की पर्याप्त रूप से परवाह नहीं करता है, यहाँ तक कि उसकी पूरी तरह से उपेक्षा करता है। यह त्रुटिपूर्ण ज्ञान तुम लोगों के हृदयों में काफी समय से है और भविष्य में आगे भी बना रह सकता है। तुम लोग अधार्मिकता के दृष्टिकोण से मसीह के सभी कर्मों पर विचार करते हो और उसके सभी कार्यों और साथ ही उसकी पहचान और सार का मूल्यांकन दुष्ट के परिप्रेक्ष्य से करते हो। तुम लोगों ने बहुत अधिक गम्भीर गलती की है और ऐसा किया है जो तुमसे पहले आने वाले लोगों द्वारा कभी नहीं किया गया है। अर्थात्, तुम लोग केवल अपने सिर पर मुकुट वाले स्वर्ग के उत्कृष्ट परमेश्वर की सेवा करते हो और उस परमेश्वर की सेवा कभी नहीं करते हो जिसे तुम इतना महत्वहीन समझते हो मानो कि तुम लोगों के लिए अदृश्य हो। क्या यह तुम लोगों का पाप नहीं है? क्या यह परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध तुम लोगों के अपराध का विशिष्ट उदाहरण नहीं है? तुम लोग स्वर्ग के परमेश्वर की आराधना करते हो। तुम अभिमानी छवियों को प्रेम करते हो और उन लोगों का सम्मान करते हो जो अपनी वाक्यपटुता के लिए प्रतिष्ठित हैं। तुम सहर्ष उस परमेश्वर द्वारा नियंत्रित हो जाते हो जो तुम लोगों के हाथों को संपत्ति से भर देता है, और उस परमेश्वर के लिए बहुत अधिक लालायित रहते हो जो तुम्हारी हर इच्छा को पूरा कर सकता है। केवल वह एक जिसकी आराधना तुम नहीं करते हो वह यह परमेश्वर है जो कि अभिमानी नहीं है; एकमात्र चीज़ जिससे तुम घृणा करते हो वह इस परमेश्वर के साथ सम्बद्धता ही है जिसे कोई भी मनुष्य उच्च सम्मान नहीं दे सकता है। एकमात्र चीज़ जिसे करने के तुम अनिच्छुक हो वह इस परमेश्वर की सेवा करना ही है, जिसने तुम्हें कभी भी एक पैसा भी नहीं दिया है, और एकमात्र वह जो तुम्हें उसके लिए लालायित करवाने में असमर्थ है वह यह अनाकर्षक परमेश्वर ही है। इस प्रकार का परमेश्वर तुम्हारे क्षितिज को विस्तृत करने में, तुम्हें खज़ाना मिल गया ऐसा महसूस करने में समर्थ नहीं बना सकता है, तुम्हारी इच्छा पूरी करने में समर्थ तो बिल्कुल नहीं बना सकता है। तो फिर क्यों, तुम उसका अनुसरण करते हो? क्या तुमने कभी इस तरह के प्रश्न पर विचार किया है? तुम जो करते हो वह केवल इस मसीह को अपमानित ही नहीं करता है, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, यह स्वर्ग के परमेश्वर का अपमान करता है। मैं सोचता हूँ कि परमेश्वर पर तुम लोगों के विश्वास का यह उद्देश्य नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

331. मसीह के सम्पर्क में आने से पहले, तुम्हें शायद विश्वास हो कि तुम्हारा स्वभाव पूरी तरह बदल चुका है, तुम मसीह के निष्ठावान अनुयायी हो, और तुम्हें शायद यह भी विश्वास हो कि तुम मसीह की आशीषों को प्राप्त करने के लिए सबसे ज़्यादा योग्य हो। क्योंकि तुम कई मार्गों पर यात्रा कर चुके हो, बहुत काम कर चुके हो, और बहुत अधिक फल ला चुके हो, अतः अंत में तुम्हीं मुकुट प्राप्त करोगे। फिर भी, एक सच्चाई है जिसे शायद तुम नहीं जानते हो: जब मनुष्य मसीह को देखता है तब उसका भ्रष्ट स्वभाव, विद्रोह और प्रतिरोध का खुलासा हो जाता है, और जिस विद्रोह और प्रतिरोध का खुलासा ऐसे अवसर पर होता है वह किसी अन्य समय की अपेक्षा कहीं ज़्यादा पूर्ण और निश्चित होता है। मसीह मनुष्य का पुत्र है और सामान्य मानवता रखता है जिस कारण मनुष्य न तो उसका सम्मान करता और न ही आदर करता है। चूँकि परमेश्वर देह में रहता है, इस कारण से मनुष्य का विद्रोह पूरी तरह और स्पष्ट रूप से प्रकाश में लाया जाता है। अतः मैं कहता हूँ कि मसीह के आगमन ने मानवजाति के सारे विद्रोह को खोज निकाला है और मानवजाति के स्वभाव को बहुत ही स्पष्ट रूप से दृश्यमान बना दिया है। इसे कहते हैं "लालच देकर एक बाघ को पहाड़ के नीचे ले आना" और "लालच देकर एक भेड़िए को गुफा से बाहर ले आना।" क्या तुम कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो? क्या तुम कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के प्रति सम्पूर्ण आज्ञाकारिता दिखाते हो? क्या तुम कह सकते हैं कि तुम विद्रोही नहीं हो? कुछ लोग कहेंगेः जब भी परमेश्वर मुझे नई परिस्थिति में डालता है, मैं हमेशा आज्ञापालन करता हूँ और कभी शिकायत नहीं करता। इसके अतिरिक्त, मैं परमेश्वर के बारे में कोई धारणा नहीं बनाता हूँ। कुछ कहेंगेः परमेश्वर जो भी काम मुझे सौंपता है, मैं उसे अपनी पूरी योग्यता के साथ करता हूँ और कभी भी लापरवाही नहीं करता। तब मैं तुम लोगों से यह पूछता हूँ: क्या तुम सब मसीह के साथ रहते हुए उसके अनुरूप हो सकते हो? और कितने समय तक तुम सब उसके अनुरूप रहोगे? एक दिन? दो दिन? एक घण्टा? दो घण्टे? हो सकता है तुम्हारा विश्वास उसके अनुरूप हो, परन्तु तुम लोगों के पास अधिक दृढ़ता नहीं है। जब तुम सचमुच में मसीह के साथ रहोगे, तो तुम्हारा दंभ और अहंकार धीरे-धीरे तुम्हारे शब्दों और कार्यों के द्वारा प्रकट होने लगेगा, और इस प्रकार तुम्हारी अत्यधिक इच्छा, अवज्ञाकारी मानसिकता और असंतुष्टि स्वतः ही प्रकट हो जायेगी। आखिरकार, तुम्हारा अहंकार बहुत ज़्यादा बड़ा हो जाएगा, और जब कि तुम मसीह के वैसे ही विरोधी नहीं बन जाते जैसे जल और आग, और तब तुम्हारे स्वभाव का पूरी तरह से खुलासा हो जायेगा। उस समय, तुम्हारी धारणाएँ पर्दे में नहीं रह सकेंगी। तुम्हारी शिकायतें भी, अनायास ही प्रकट हो जाएँगी, और तुम्हारी नीच मानवता का भी पूरी तरह से खुलासा हो जाएगा। फिर भी, तुम लगातार अपने विद्रोहीपन से मुकरते हो। और तुम विश्वास करते हो कि ऐसे मसीह को स्वीकार करना आसान नहीं है और वह मनुष्य के प्रति बहुत अधिक कठोर है, लेकिन अगर वह कोई अधिक दयालु मसीह होता तो तुम पूरी तरह से उसे समर्पित हो जाते। तुम लोग विश्वास करते हो कि तुम्हारे विद्रोह का एक जायज़ कारण है, कि तुम सबने केवल तभी मसीह के विरूद्ध विद्रोह किया जब उसने तुम लोगों को हद से ज़्यादा मजबूर कर दिया। तुम सबने कभी यह एहसास नहीं किया है कि तुम लोग मसीह को परमेश्वर नहीं मानते, न ही तुम्हारे पास उसकी आज्ञा मानने की मंशा है। बल्कि, तुम ढिठाई से आग्रह करते हो कि मसीह तुम्हारे मन के अनुसार काम करे, और यदि वह एक भी कार्य ऐसा करे जो तुम्हारे मन के अनुकूल न तो तुम लोग मान लेते हो कि वह परमेश्वर नहीं मनुष्य है। क्या तुम लोगों में से बहुत से लोग ऐसे नहीं हैं जो उसके साथ इस तरह विवाद करते हैं? आख़िरकार तुम लोग किसमें विश्वास करते हो? और तुम लोग किस तरह से खोजते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं' से उद्धृत

332. तुम सब हमेशा मसीह को देखने की कामना करते हो, लेकिन मैं तुम सबसे गुहार लगाता हूँ कि तुम अपने आपको इस तरह ऊँचा न उठाओ; हर कोई मसीह को देख सकता है, परन्तु मैं यह कहता हूँ कि कोई मसीह को देखने के लायक नहीं है। क्योंकि मनुष्य का स्वभाव बुराई, अहंकार और विद्रोह से भरा हुआ है, इस समय तुम मसीह को देखोगे तो, तुम्हारा स्वभाव तुम्हें बर्बाद कर देगा और बेहद तिरस्कृत करेगा। किसी भाई (या बहन) के साथ तुम्हारी संगति शायद तुम्हारे बारे में बहुत कुछ न दिखाए, परन्तु जब तुम मसीह के साथ संगति करते हो तो यह इतना आसान नहीं होता। किसी भी समय, तुम्हारी धारणा जड़ पकड़ सकती है, तुम्हारा अहंकार फूटना शुरू कर सकता है, और तुम्हारे विद्रोह में फल लग सकते हैं। ऐसी मानवता के साथ तुम कैसे मसीह के साथ संगति के काबिल हो सकते हो? क्या तुम वास्तव में उसके साथ प्रत्येक दिन के प्रत्येक पल में परमेश्वर जैसा बर्ताव कर सकते हो? क्या तुम में सचमुच परमेश्वर के प्रति समर्पण की वास्तविकता होगी? तुम सब अपने हृदय में यहोवा के रूप में एक ऊँचे परमेश्वर की आराधना करते हो लेकिन दृश्यमान मसीह को मनुष्य समझते हो। तुम लोगों की समझ बहुत ही हीन है और तुम्हारी मानवता बहुत नीची है! तुम सब सदैव के लिए मसीह को परमेश्वर के रूप में मानने में असमर्थ हो; कभी-कभार ही, जब तुम्हारा मन होता है, तुम परमेश्वर को पकड़ते हो और उसकी आराधना करने लगते हो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर के विश्वासी नहीं हो, बल्कि तुम सभी उनके सहअपराधी हो जो मसीह के विरूद्ध लड़ते हैं। यहाँ तक कि वे मनुष्य भी जो दूसरों के प्रति हमदर्दी दिखाते हैं उन्हें भी प्रतिफल दिया जाता है, फिर भी मसीह, जो तुम्हारे बीच में ऐसा कार्य करता है, उसे मनुष्य के द्वारा प्रेम नहीं किया जाता है, न प्रतिफल दिया जाता है, न ही उसे मनुष्य का समर्पण प्राप्त होता है। क्या यह दिल दुखाने वाली बात नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं' से उद्धृत

333. ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर में तुम्हारे इतने वर्षों के विश्वास में, तुमने कभी किसी को कोसा न हो और न ही कोई बुरा कार्य किया हो, फिर भी मसीह के साथ अपनी संगति में, तुम सच नहीं बोल सकते हो, सच्चाई से कार्य नहीं कर सकते, या मसीह के वचन का पालन नहीं कर सकते हो; तो मैं कहूँगा कि तुम संसार में सबसे अधिक कुटिल और कपटी हो। हो सकता है तुम अपने रिश्तेदारों, मित्रों, पत्नी (या पति), बेटों और बेटियों, और माता पिता के प्रति स्नेहपूर्ण और निष्ठावान हो, और कभी दूसरों का फायदा नहीं उठाया हो, लेकिन अगर तुम मसीह के अनुरूप नहीं हो और उसके साथ तुम्हारा सामंजस्य नहीं है, तो भले ही तुम अपने पड़ोसियों की सहायता के लिए अपना सब कुछ खपा दो या अपने पिता, माता और घरवालों की अच्छी देखभाल की हो, तब मैं कहूँगा कि तुम धूर्त हो, और साथ में चालाक भी हो। बस इसलिए कि तुम दूसरों के साथ अच्छा तालमेल बिठा लेते हो या कुछ अच्छे काम करते हो तो यह न सोचो कि तुम मसीह के अनुरूप हो। क्या तुम यह विश्वास करते हो कि तुम्हारी उदारता स्वर्ग की आशीषों को चुरा सकती है? क्या तुम सोचते हो कि थोड़े-से अच्छे काम कर लेना तुम्हारी आज्ञाकारिता का स्थान ले सकते हैं? तुम लोगों में से कोई भी निपटारा और छंटाई स्वीकार नहीं कर सकता, और सभी को मसीह की सरल मानवता को अंगीकार करने में कठिनाई होती है। फिर भी तुम सब परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का दावा करते हो। तुम सबका ऐसा विश्वास तुम्हारे ऊपर उचित प्रतिकार लेकर आएगा। काल्पनिक भ्रम में लिप्त होना और मसीह को देखने की चाहत करना बंद कर दो, क्योंकि तुम सभी कद में बहुत छोटे हो, इतने कि तुम लोग उसे देखने के योग्य भी नहीं हो। जब तुम पूरी तरह से अपने विद्रोह को मिटाकर मसीह के साथ साँमजस्य स्थापित कर पाते हो, तभी परमेश्वर स्वाभाविक रूप से तुम्हारे सामने प्रकट होगा। यदि तुम बिना छंटाई या न्याय से गुज़रे परमेश्वर को देखने जाते हो, तब तुम निश्चित तौर पर परमेश्वर के विरोधी बन जाओगे और विनाश तुम्हारी नियति बन जाएगा। मनुष्य का स्वभाव स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण है, क्योंकि सभी मनुष्यों को शैतान के द्वारा पूरी तरह भ्रष्ट कर दिया गया है। यदि कोई भ्रष्ट मनुष्य अपनी भ्रष्ट के मध्य परमेश्वर के साथ संगति करने का प्रयास करे, तो उससे कोई अच्छी चीज़ नहीं उत्पन्न हो सकती; मनुष्य के सारे कार्य और वचन निश्चित तौर पर उसकी भ्रष्टता का खुलासा करेंगे; और जब वह परमेश्वर के साथ जुड़ेगा, तो उसका विद्रोह सभी पहलुओं में प्रकट होगा। मनुष्य अनजाने में मसीह का विरोध करता है, मसीह को धोखा देता है, और मसीह को अस्वीकार करता है; तब मनुष्य और भी ज़्यादा खतरनाक स्थिति में होगा। यदि यह जारी रहता है, तो वह दण्ड का भागी होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं' से उद्धृत

334. कुछ लोग यह मान सकते हैं कि यदि परमेश्वर के साथ साहचर्य इतना खतरनाक है, तो बुद्धिमानी होगी कि परमेश्वर से दूर ही रहा जाए। तब, ऐसे लोगों को क्या हासिल होगा? क्या वे परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होंगे? वास्तव में, परमेश्वर के साथ संगति बहुत ही कठिन है, परन्तु यह पूरी तरह इसलिए है क्योंकि मनुष्य भ्रष्ट है, इसलिए नहीं कि परमेश्वर मनुष्य के साथ जुड़ नहीं सकता है। तुम लोगों के लिए यह सबसे अच्छा होगा कि तुम सब स्वयं को जानने की सच्चाई पर ज़्यादा प्रयास करो। तुम लोगों ने परमेश्वर की कृपा प्राप्त क्यों नहीं की है? तुम्हारा स्वभाव उसके लिए घिनौना क्यों है? तुम्हारे शब्द उसके अंदर जुगुप्ता क्यों उत्पन्न करते हैं? तुम लोग थोड़ी-सी निष्ठा दिखाते ही खुद ही अपनी तारीफ करने लगते हो और अपने छोटे से बलिदान के लिए प्रतिफल चाहते हो; जब तुम सब थोड़ी-सी आज्ञाकारिता दिखाते हो तो तुम लोग दूसरों को नीची दृष्टि से देखते हो, और कुछ छोटे छोटे-कार्यों को करके तुम लोग परमेश्वर का तिरस्कार करने लग जाते हो। तुम लोग परमेश्वर को स्वीकार करने के बदले धन-संपत्ति, भेंटों और प्रशंसा की अभिलाषा करते हो। एक या दो सिक्के देते हुए भी तुम्हारा हृदय दुखता है; जब तुम लोग दस सिक्के देते हो, तब तुम लोग आशीषों की और दूसरों से अलग दिखने की अभिलाषा करते हो। जैसी तुम्हारी मानवता है उसके बारे में तो बात करना और सुनना भी वास्तव में अपमानजनक है। तुम्हारे शब्दों और कार्यों के बारे में प्रशंसापूर्ण क्या है? वे जो अपने कर्तव्यों को निभाते हैं और वे जो नहीं निभाते; वे जो अगुवाई करते हैं और वे जो अनुसरण करते हैं; वे जो परमेश्वर को ग्रहण करते और वे जो नहीं करते हैं; वे जो दान देते हैं और वे जो नहीं देते; वे जो प्रचार करते हैं और वे जो वचन को ग्रहण करते हैं इत्यादि; इस प्रकार के सभी लोग अपनी ही तारीफ करते हैं। क्या तुम्हें यह हास्यास्पद नहीं लगता है? निश्चित रूप से तुम लोग जानते हो कि तुम सब परमेश्वर पर विश्वास करते हो, फिर भी तुम सभी परमेश्वर के अनुरूप नहीं हो सकते हो। अच्छी तरह से यह जानते हुए कि तुम सब बिल्कुल अयोग्य हो, फिर भी तुम लोग डींग मारते ही रहते हो। क्या तुम्हें महसूस नहीं होता है कि तुम्हारी समझ ऐसी हो गई है कि अब तुम्हारे पास और आत्म-संयम नहीं है? ऐसी समझ के साथ तुम लोग परमेश्वर के साथ संगति करने के काबिल कैसे हो सकते हो? अब क्या तुम लोग इस मकाम पर अपने लिए भयभीत नहीं हो? तुम्हारा स्वभाव पहले ही ऐसा हो गया है कि तुम लोग परमेश्वर के अनुरूप नहीं हो सकते हो। इस बात को देखते हुए, क्या तुम्हारा विश्वास हास्यास्पद नहीं है? क्या तुम्हारा विश्वास बेतुका नहीं है? तुम अपने भविष्य से कैसे निपटोगे? तुम उस मार्ग का चुनाव कैसे करोगे जिस पर तुम्हें चलना है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं' से उद्धृत

335. कुछ लोग सत्य में आनंदित नहीं होते, न्याय में तो बिल्कुल भी नहीं। बल्कि वे शक्ति और सम्पत्तियों में आनन्दित होते हैं; इस प्रकार के लोग शक्ति के खोजी कहे जाते हैं। वे केवल दुनिया के प्रभावशाली सम्प्रदायों तथा सेमिनरी से आने वाले पादरियों और शिक्षकों को खोजते हैं। हालंकि उन्होंने सत्य के मार्ग को स्वीकार कर लिया है, फिर भी वे आधा विश्वास करते हैं; और वे अपने दिलो-दिमाग को पूरी तरह से समर्पित करने में असमर्थ होते हैं, वे मुख से तो परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की बात करते हैं, किन्तु उनकी नज़रें बड़े पादरियों और शिक्षकों पर केन्द्रित रहती हैं, और वे मसीह की ओर दूसरी नजर भी नहीं डालते। उनके हृदय प्रसिद्धि, वैभव और महिमा पर ही टिक गए हैं। वे इसे असंभव समझते हैं कि ऐसा मामूली व्यक्ति इतने लोगों पर विजय प्राप्त कर सकता है कि एक इतना साधारण व्यक्ति लोगों को पूर्ण बनाबना सकता है। वे इसे असंभव समझते हैं कि ये धूल और घूरे में पड़े नाचीज़ लोग परमेश्वर के द्वारा चुने गए हैं। वे मानते हैं कि यदि ऐसे लोग परमेश्वर के उद्धार की योजना के लक्ष्य रहे होते, तो स्वर्ग और पृथ्वी उलट-पुलट हो जाते और सभी लोग ठहाके लगाकर हँसते। उनका मानना है कि यदि परमेश्वर ने ऐसे नाचीज़ों को पूर्ण बनाने के लिए चुना होता, तो वे सभी बड़े लोग स्वयं परमेश्वर बन जाते। उनके दृष्टिकोण अविश्वास से दूषित हैं; अविश्वास करने से अधिक, वे बेहूदे जानवर हैं। क्योंकि वे केवल पद, प्रतिष्ठा और सत्ता को महत्व देते है और केवल बड़े समूहों और सम्प्रदायों को सम्मान देते हैं। उनमें उनके लिए बिल्कुल भी सम्मान नहीं है जिनकी अगुवाई मसीह करता है; वे तो बस ऐसे गद्दार हैं जिन्होंने मसीह से, सत्य से और जीवन से अपना मुँह मोड़ लिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?' से उद्धृत

336. तुम मसीह की विनम्रता की प्रशंसा नहीं करते, बल्कि विशेष हैसियत वाले उन झूठे चरवाहों की प्रशंसा करते हो। तुम मसीह की मनोहरता या बुद्धि से प्रेम नहीं करते हो, बल्कि उन व्यभिचारियों से प्रेम करते हो जो संसार की कीचड़ में लोट लगाते हैं। तुम मसीह की पीड़ा पर हँसते हो, जिसके पास अपना सिर टिकाने तक की जगह नहीं है, किन्तु उन मुरदों की तारीफ़ करते हो जो चढ़ावों को हड़प लेते हैं और अय्याशी में जीते हैं। तुम मसीह के साथ कष्ट सहने को तैयार नहीं हो, परन्तु उन धृष्ट मसीह-विरोधियों की बाँहों में प्रसन्नता से जाते हो, हालाँकि वे तुम्हें सिर्फ देह, शब्द और नियंत्रण ही प्रदान करते हैं। अब भी तुम्हारा हृदय उनकी ओर, उनकी प्रतिष्ठा की ओर, उनकी हैसियत की ओर, उनके प्रभाव की ओर मुड़ता है। फिर भी तुम ऐसा रवैया बनाये रखते हो जहाँ तुम मसीह के कार्य को गले से उतारना कठिन पाते हो और उसे स्वीकारने के लिए तैयार नहीं होते। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुममें मसीह को स्वीकार करने का विश्वास नहीं है। तुमने आज तक उसका अनुसरण सिर्फ़ इसलिए किया, क्योंकि तुम्हारे पास कोई और चारा नहीं था। तुम्हारे हृदय में हमेशा बुलंद छवियों का स्थान रहा है; तुम न तो उनके हर वचन और कर्म को, और न ही उनके प्रभावशाली वचनों और हाथों को भूल सकते हो। तुम सबके हृदय में वे हमेशा सर्वोच्च और हमेशा नायक हैं। किन्तु आज के मसीह के लिए ऐसा नहीं है। तुम्हारे हृदय में वह हमेशा महत्वहीन और हमेशा आदर के अयोग्य है। क्योंकि वह बहुत ही साधारण है, उसका बहुत ही कम प्रभाव है और वह उत्कृष्ट तो बिल्कुल नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?' से उद्धृत

337. तुम सबकी अभिमानी और दंभी प्रकृति तुम सबको अपने अंतःकरण के साथ विश्वासघात करने, मसीह के खिलाफ विद्रोह करने और उसका विरोध करने और अपनी कुरूपता प्रकट करने के लिए प्रेरित करती है, और इस तरह तुम सबके इरादों, धारणाओं, असाधारण इच्छाओं और लालच से भरी नज़रों को प्रकाश में ले आती है। फिर भी तुम सब मसीह के कार्य के लिए अपने जीवन भर के जोश के बारे में बक-बक करते रहते हो और मसीह के द्वारा बहुत पहले कहे गए सत्यों को बार-बार दोहराते रहते हो। यही तुम सबका "विश्वास" है—यही तुम सबका "अशुद्धता रहित विश्वास" है। मैंने मनुष्य के लिए आरंभ से ही बहुत कठोर मानक रखा है। यदि तुम्हारी वफ़ादारी इरादों और शर्तों के साथ आती है, तो मैं तुम्हारी तथाकथित वफादारी के बिना रहूँगा, क्योंकि मैं उन लोगों से घृणा करता हूँ जो मुझे अपने इरादों से धोखा देते हैं और शर्तों के साथ मुझसे ज़बरन वसूली करते हैं। मैं मनुष्यों से सिर्फ़ यही चाहता हूँ कि वे मेरे प्रति पूरे वफादार हों और सब चीज़े एक शब्द : विश्वास के वास्ते—और उसे साबित करने के लिए करें। मैं तुम्हारे द्वारा मुझे प्रसन्न करने की कोशिश करने के लिए की जाने वाली खुशामद का तिरस्कार करता हूँ, क्योंकि मैंने हमेशा तुम सबके साथ ईमानदारी से व्यवहार किया है, और इसलिए मैं तुम सब से भी यही चाहता हूँ कि तुम भी मेरे प्रति एक सच्चे विश्वास के साथ कार्य करो। जब विश्वास की बात आती है, तो कई लोग यह सोच सकते हैं कि वे परमेश्वर का अनुसरण इसलिए करते हैं क्योंकि उनमें विश्वास है, अन्यथा वे इस प्रकार की पीड़ा नहीं सहते। तो मैं तुम से पूछता हूँ : यदि तुम परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो, तो उसका आदर क्यों नहीं करते? यदि तुम परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो तो तुम्हारे हृदय में उसका थोड़ा-सा भी भय क्यों नहीं है? तुम स्वीकार करते हो कि मसीह परमेश्वर का देहधारण है, तो तुम उसकी अवमानना क्यों करते हो? तुम उसके प्रति इतने अनादरपूर्वक कार्य क्यों करते हो? तुम उसकी खुलेआम आलोचना क्यों करते हो? तुम हमेशा उसकी गतिविधियों की जासूसी क्यों करते हो? तुम उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित क्यों नहीं होते? तुम उसके वचन के अनुसार कार्य क्यों नहीं करते? क्यों तुम उसकी भेंटों को जबरन छीनने और लूटने का प्रयास करते हो? क्यों तुम मसीह के स्थान से बोलते हो? क्यों तुम उसके कार्य और वचनों के सही या गलत होने का का आकलन करते हो? क्यों तुम पीठ पीछे उसकी निंदा करने का साहस करते हो? क्या यही और अन्य बातें हैं, जो तुम सबके विश्वास का निर्माण करती हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?' से उद्धृत

338. यदि तुम परमेश्वर के मापन और परिसीमन के लिए अपनी धारणाओं का उपयोग करते हो, मानो परमेश्वर कोई मिट्टी की अचल मूर्ति हो, और अगर तुम लोग परमेश्वर को बाइबल के मापदंडों के भीतर सीमांकित करते हो और उसे कार्य के एक सीमित दायरे में समाविष्ट करते हो, तो इससे यह प्रमाणित होता है कि तुम लोगों ने परमेश्वर की निंदा की है। चूँकि पुराने विधान के युग के यहूदियों ने परमेश्वर को एक अचल प्रतिमा के रूप में लिया था, जिसे वे अपने हृदयों में रखते थे, मानो परमेश्वर को मात्र मसीह ही कहा जा सकता था, और मात्र वही, जिसे मसीह कहा जाता था, परमेश्वर हो सकता हो, और चूँकि मानवजाति परमेश्वर की सेवा और आराधना इस तरह से करती थी, मानो वह मिट्टी की एक (निर्जीव) मूर्ति हो, इसलिए उन्होंने उस समय के यीशु को मौत की सजा देते हुए सलीब पर चढ़ा दिया—निर्दोष यीशु को इस तरह मौत की सजा दे दी गई। परमेश्वर ने कोई अपराध नहीं किया था, फिर भी मनुष्य ने उसे छोड़ने से इनकार कर दिया, और उसे मृत्युदंड देने पर जोर दिया, और इसलिए यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया। मनुष्य सदैव विश्वास करता है कि परमेश्वर स्थिर है, और वह उसे एक अकेली पुस्तक बाइबल के आधार पर परिभाषित करता है, मानो मनुष्य को परमेश्वर के प्रबंधन की पूर्ण समझ हो, मानो मनुष्य वह सब अपनी हथेली पर रखता हो, जो परमेश्वर करता है। लोग बेहद बेतुके, बेहद अहंकारी और स्वभाव से बड़बोले हैं। परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान कितना भी महान क्यों न हो, मैं फिर भी यही कहता हूँ कि तुम परमेश्वर को नहीं जानते, कि तुम वह व्यक्ति हो जो परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करता है, और कि तुमने परमेश्वर की निंदा की है, कि तुम परमेश्वर के कार्य का पालन करने और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर चलने में सर्वथा अक्षम हो। क्यों परमेश्वर मनुष्य के कार्यकलापों से कभी संतुष्ट नहीं होता? क्योंकि मनुष्य परमेश्वर को नहीं जानता, क्योंकि उसकी अनेक धारणाएँ है, क्योंकि उसका परमेश्वर का ज्ञान वास्तविकता से किसी भी तरह मेल नहीं खाता, इसके बजाय वह नीरस ढंग से एक ही विषय को बिना बदलाव के दोहराता रहता है और हर स्थिति के लिए एक ही दृष्टिकोण इस्तेमाल करता है। और इसलिए, आज पृथ्वी पर आने पर, परमेश्वर को एक बार फिर मनुष्य द्वारा सलीब पर चढ़ा दिया गया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दुष्टों को निश्चित ही दंड दिया जाएगा' से उद्धृत

339. क्या बहुत से लोग इसलिए परमेश्वर का विरोध नहीं करते और पवित्र आत्मा के कार्य में बाधा नहीं डालते हैं क्योंकि वे परमेश्वर के विभिन्न और विविधतापूर्ण कार्यों को नहीं जानते हैं, और इसके अलावा, क्योंकि वे केवल चुटकीभर ज्ञान और सिद्धांत से संपन्न होते हैं जिसके भीतर वे पवित्र आत्मा के कार्य को मापते हैं? यद्यपि इस प्रकार के लोगों का अनुभव केवल सतही होता है, किन्तु वे घमण्डी और आसक्त प्रकृति के होते हैं, और वे पवित्र आत्मा के कार्य को अवमानना से देखते हैं, पवित्र आत्मा के अनुशासन की उपेक्षा करते हैं और इसके अलावा, पवित्र आत्मा के कार्यों की "पुष्टि" करने के लिए अपने पुराने तुच्छ तर्कों का उपयोग करते हैं। वे एक नाटक भी करते हैं, और अपनी शिक्षा और पाण्डित्य पर पूरी तरह से आश्वस्त होते हैं, और यह कि वे संसार भर में यात्रा करने में सक्षम होते हैं। क्या ये ऐसे लोग नहीं हैं जो पवित्र आत्मा के द्वारा तिरस्कृत और अस्वीकार किए गए हैं और क्या ये नए युग के द्वारा हटा नहीं दिए जाएँगे? क्या ये वही अज्ञानी और अल्प-सूचित छोटे लोग नहीं हैं जो परमेश्वर के सामने आते हैं और खुले आम उसका विरोध करते हैं, जो केवल यह दिखावा करने का प्रयास कर रहे हैं कि वे कितने मेधावी हैं? बाइबिल के अल्प ज्ञान के साथ, वे संसार के "शैक्षणिक समुदाय" में पैर पसारने की कोशिश करते हैं, लोगों को सिखाने के लिए केवल सतही सिद्धांतों के साथ, वे पवित्र आत्मा के कार्य को पलटने का प्रयत्न करते हैं, और इसे अपने ही विचारों की प्रक्रिया के चारों ओर घूमाते रहने का प्रयास करते हैं, और अदूरदर्शी की तरह हैं, वे एक ही झलक में परमेश्वर के 6,000 सालों के कार्यों को देखने की कोशिश करते हैं। इन लोगों के पास कोई उल्लेखनीयकारण नहीं है! वास्तव में, परमेश्वर के बारे में लोगों को जितना अधिक ज्ञान होता है, वे उसके कार्य का आँकलन करने में उतने ही धीमे होते हैं। इसके अलावा, आज वे परमेश्वर के कार्य के बारे में अपने ज्ञान की बहुत ही कम बातचीत करते हैं, बल्कि वे अपने निर्णय में जल्दबाज़ी नहीं करते हैं। लोग परमेश्वर के बारे में जितना कम जानते हैं, उतना ही अधिक वे घमण्डी और अतिआत्मविश्वासी होते हैं और उतना ही अधिक बेहूदगी से परमेश्वर के अस्तित्व की घोषणा करते हैं—फिर भी वे केवल सिद्धांत की बात ही करते हैं और कोई भी वास्तविक प्रमाण प्रस्तुत नहीं करते। इस प्रकार के लोगों का कोई मूल्य नहीं होता है। जो पवित्र आत्मा के कार्य को एक खेल की तरह देखते हैं वे ओछे होते हैं! जो लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य का सामना करते समय सचेत नहीं होते हैं, जो अपना मुँह चलाते रहते हैं, वे आलोचनात्मक होते हैं, जो पवित्र आत्मा के धार्मिक कार्यों को नकारने की अपनी प्राकृतिक सहज प्रवृत्ति पर लगाम नहीं लगाते और उसका अपमान और ईशनिंदा करते हैं—क्या इस प्रकार के असभ्य लोग पवित्र आत्मा के कार्य के बारे में अनभिज्ञ नहीं रहते हैं? इसके अलावा, क्या वे अभिमानी, अंतर्निहित रूप से घमण्डी और अशासनीय नहीं हैं? भले ही ऐसा दिन आए जब ऐसे लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार करें, तब भी परमेश्वर उन्हें सहन नहीं करेगा। न केवल वे उन्हें तुच्छ समझते हैं जो परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं, बल्कि स्वयं भी परमेश्वर के विरुद्ध, ईशनिंदा करते हैं। इस प्रकार के उजड्ड लोग, न तो इस युग में और न ही आने वाले युग में, क्षमा किए जाएँगे, और वे हमेशा के लिए नरक में सड़ेंगे! इस प्रकार के असभ्य, आसक्त लोग परमेश्वर में भरोसा करने का दिखावा करते हैं और जितना अधिक वे ऐसा करते हैं, उतना ही अधिक उनकी परमेश्वर के प्रशासकीय आदेशों का उल्लंघन करने की संभावना होती है। क्या वे सभी घमण्डी ऐसे लोग नहीं हैं जो स्वाभाविक रूप से उच्छृंखल हैं, और जिन्होंने कभी भी किसी का भी आज्ञापालन नहीं किया है, जो सभी इसी मार्ग पर चलते हैं? क्या वे दिन प्रतिदिन परमेश्वर का विरोध नहीं करते हैं, वह जो हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है' से उद्धृत

340. ज्ञात हो कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य का विरोध करते हो, या आज कार्य को मापने के लिए अपनी धारणा का उपयोग करते हो, क्योंकि तुम लोग परमेश्वर के कार्य के सिद्धान्तों को नहीं जानते हो, और क्योंकि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को पर्याप्त गम्भीरता से नहीं लेते हो। तुम लोगों का परमेश्वर के प्रति विरोध और पवित्र आत्मा के कार्य में अवरोध तुम लोगों की धारणा और तुम लोगों के अंतर्निहित अहंकार के कारण है। ऐसा इसलिए नहीं कि परमेश्वर का कार्य ग़लत है, बल्कि इसलिए कि तुम लोग प्राकृतिक रूप से बहुत ही ज्यादा अवज्ञाकारी हो। परमेश्वर में विश्वास हो जाने के बाद भी, कुछ लोग यकीन से यह नहीं कह सकते हैं कि मनुष्य कहाँ से आया, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कार्यों के सही और गलत होने के बारे में बताते हुए सार्वजनिक भाषण देने का साहस करते हैं। और वे यहाँ तक कि प्रेरितों को भी व्याख्यान देते हैं जिनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य है, उन पर टिप्पणी करते हैं और बेसमय बोलते रहते हैं; उनकी मानवता बहुत ही कम होती है, और उनमें बिल्कुल भी समझ नहीं होती है। क्या वह दिन नहीं आएगा जब इस प्रकार के लोग पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाएँगे, और नरक की आग द्वारा जलाए जाएँगे? वे परमेश्वर के कार्यों को नहीं जानते हैं, फिर भी उसके कार्य की आलोचना करते हैं और परमेश्वर को यह निर्देश देने की कोशिश करते हैं कि कार्य किस प्रकार किया जाए। इस प्रकार के अविवेकी लोग परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं? मनुष्य परमेश्वर को खोजने और अनुभव करने की प्रक्रिया के दौरान परमेश्वर को जान जाता है; यह नहीं कि वह अपनी सनक में उसकी आलोचना करने से पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के माध्यम से परमेश्वर को जान जाएगा है। जितना अधिक परिशुद्ध परमेश्वर के बारे में लोगों का ज्ञान होता है, उतना ही कम वे उसका विरोध करते हैं। इसके विपरीत, लोग जितना कम परमेश्वर के बारे में जानते हैं, उतना ही ज्यादा परमात्मा का विरोध करने की उनकी संभावना होती है। तुम्हारी धारणाएँ, तुम्हारी पुरानी प्रकृति, और तुम्हारी मानवता, चरित्र और नैतिक दृष्टिकोण वह "पूँजी" है जिससे तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो, और तुम जितना अधिक भ्रष्ट, तुच्छ और निम्न होगे, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के शत्रु बन जाते हो। जो लोग गम्भीर धारणाएँ रखते हैं और आत्मतुष्ट स्वभाव के हैं वे और भी अधिक देहधारी परमेश्वर के साथ शत्रुता में हैं और इस प्रकार के लोग मसीह-विरोधी हैं। यदि तुम्हारी धारणाओं में सुधार नहीं आता है, तो वे सदैव परमेश्वर की विरोधी रहेंगी; तुम कभी भी परमेश्वर के अनुकूल नहीं होगे, और सदैव उससे दूर रहोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है' से उद्धृत

341. यह मत सोचो कि तुम सब कुछ समझते हो। मैं तुम्हें बता दूँ कि तुमने जो कुछ भी देखा और अनुभव किया है, वह मेरी प्रबन्धन योजना के एक हजारवें हिस्से को समझने के लिए भी अपर्याप्त है। तो फिर तुम क्यों इतनी ढिठाई से पेश आते हो? तुम्हारी मात्र जरा-सी प्रतिभा और अल्पतम ज्ञान यीशु के कार्य में एक पल के लिए भी उपयोग किए जाने के लिए अपर्याप्त है! तुम्हें वास्तव में कितना अनुभव है? तुमने अपने जीवन में जो कुछ देखा और जो कुछ सुना है और जिसकी तुमने कल्पना की है, वह मेरे एक क्षण के कार्य से भी कम है! तुम्हारे लिए यही अच्छा होगा कि तुम आलोचनात्मक न बनो और दोष मत ढूँढो। चाहे तुम कितने भी अभिमानी हो, फिर भी तुम चींटी से भी कम एक प्राणी हो! तुम्हारे पेट में जो कुछ भी है वह एक चींटी के पेट में जो है उससे भी कम है! यह मत सोचो कि क्योंकि तुमने बहुत अनुभव कर लिया है और वरिष्ठ हो गए हो, इसलिए तुम बेलगाम ढंग से हाथ नचाते हुए बड़ी-बड़ी बातें कर सकते हो। क्या तुम्हारे अनुभव और तुम्हारी वरिष्ठता उन वचनों के परिणामस्वरूप नहीं है जो मैंने कहे हैं? क्या तुम यह मानते हो कि वे तुम्हारे परिश्रम और कड़ी मेहनत के द्वारा अर्जित किए गए हैं? आज, तुम मेरे देहधारण को देखते हो, और परिणामस्वरूप तुम्हारी ऐसी समृद्ध धारणाएँ हो जाती हैं, जिनसे अनगिनत अवधारणाएँ आती हैं। यदि मेरा देहधारण न होता, तो तुम्हारे अंदर कितनी भी असाधारण प्रतिभाएँ होतीं हैं, तुम्हारे अंदर इतनी धारणाएँ नहीं होती। क्या तुम्हारी अवधारणाएँ इससे नहीं उभरी हैं? यदि यीशु पहली बार देहधारण नहीं करते, तो तुम देहधारण के बारे में क्या जानते? क्या यह पहले देहधारण के तुम्हारे ज्ञान के कारण नहीं है कि तुम ढिठाई से दूसरे देहधारण के बारे में राय बनाते हो? तुम्हें एक आज्ञाकारी अनुयायी बनने के बजाय क्यों इसकी जाँच करनी चाहिए? जब तुमने इस धारा में प्रवेश कर लिया है और देहधारी परमेश्वर के सामने आ गए हो, तो क्या वह तुम्हें अध्ययन करने की अनुमति देंगे? तुम्हारा अपने परिवार के इतिहास का अध्ययन करना ठीक है, परन्तु यदि तुम परमेश्वर के "परिवार के इतिहास" का अध्ययन करते हो, तो आज का परमेश्वर तुम्हें यह करने की अनुमति कैसे दे सकता है? क्या तुम अंधे नहीं हो? क्या तुम अपने ऊपर अवमानना को नहीं लाते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने' से उद्धृत

342. ऐसे लोग जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को नहीं समझते हैं वे लोग हैं जो परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होते हैं, और इससे भी अधिक वे लोग हैं जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य से अवगत हैं फिर भी परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करते हैं। वे जो बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में बाइबल पढ़ते हैं, वे हर दिन बाइबल पढ़ते हैं, फिर भी उनमें से एक भी परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को नहीं समझता है। एक भी इंसान परमेश्वर को नहीं जान पाता है; और यही नहीं, उनमें से एक भी परमेश्वर के हृदय के अनुरूप नहीं है। वे सबके सब व्यर्थ, अधम लोग हैं, जिनमें से प्रत्येक परमेश्वर को सिखाने के लिए ऊँचे पर खड़ा हैं। यद्यपि वे परमेश्वर के नाम पर धमकी देते हैं, किंतु वे जानबूझ कर उसका विरोध करते हैं। यद्यपि वे स्वयं को परमेश्वर का विश्वासी दर्शाते हैं, किंतु ये वे लोग हैं जो मनुष्यों का मांस खाते और रक्त पीते हैं। ऐसे सभी मनुष्य शैतान हैं जो मनुष्यों की आत्माओं को निगल जाते हैं, मुख्य राक्षस हैं जो जानबूझकर उन्हें विचलित करते हैं जो सही मार्ग पर कदम बढ़ाना चाहते हैं या सही मार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं, और वे बाधाएँ हैं जो परमेश्वर को खोजने वालों के मार्ग में रुकावट उत्पन्न करती हैं। यद्यपि वे "मज़बूत देह" वाले हैं, किंतु उसके अनुयायियों को कैसे पता चलेगा कि वे ईसा-विरोधी हैं जो लोगों को परमेश्वर के विरोध में ले जाते हैं? वे कैसे जानेंगे कि ये जीवित शैतान हैं जो निगलने के लिए विशेष रूप से आत्माओं को खोज रहे हैं? वे जो परमेश्वर के सामने अपने आप को आदर देते हैं, वे सबसे अधिक अधम लोग हैं, जबकि वे जो स्वयं को दीन और विनम्र बनाते हैं, वे सबसे अधिक आदरणीय है। और वे जो यह सोचते हैं कि वे परमेश्वर के कार्य को जानते हैं, और दूसरों को परमेश्वर के कार्य की धूमधाम से उद्घोषणा करते हैं, जबकि उनकी आँखें परमेश्वर पर लगी रहती हैं—अत्यंत अज्ञानी हैं। ऐसे व्यक्ति वे हैं जिनमें परमेश्वर की गवाही नहीं हैं, वे अभिमानी और दंभी हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे सभी लोग जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे वो लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं' से उद्धृत

343. परमेश्वर और मनुष्य को समान नहीं कहा जा सकता। परमेश्वर का सार और कार्य मनुष्य के लिए सर्वाधिक अथाह और समझ से परे है। यदि परमेश्वर मनुष्यों के संसार में व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य न करे और अपने वचन न कहे, तो मनुष्य कभी भी परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझ पाएगा। और इसलिए वे लोग भी, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन परमेश्वर को समर्पित कर दिया है, उसका अनुमोदन प्राप्त करने में सक्षम नहीं होंगे। यदि परमेश्वर कार्य कार्य करने के लिए तैयार न हो, तो मनुष्य चाहे कितना भी अच्छा क्यों न करे, वह सब शून्य होगा, क्योंकि परमेश्वर के विचार मनुष्य के विचारों से सदैव ऊँचे रहेंगे, और परमेश्वर की बुद्धि मनुष्य की समझ से परे है। और इसीलिए मैं कहता हूँ कि जो लोग परमेश्वर और उसके काम को "पूरी तरह से समझने" का दावा करते करते हैं, वे सब मूर्ख हैं, अभिमानी और अज्ञानी हैं। मनुष्य को परमेश्वर के कार्य को परिभाषित नहीं करना चाहिए; बल्कि मनुष्य परमेश्वर के कार्य को परिभाषित नहीं कर सकता। परमेश्वर की दृष्टि में मनुष्य इतना महत्त्वहीन है, जितनी कि चींटी; तो फिर वह परमेश्वर के कार्य की थाह कैसे पा सकता है? जो लोग गंभीरतापूर्वक यह कहना पसंद करते हैं, "परमेश्वर इस तरह से या उस तरह से कार्य नहीं करता," या "परमेश्वर ऐसा है या वैसा है"—क्या वे अहंकारपूर्वक नहीं बोलते? हम सबको जानना चाहिए कि मनुष्य, जो कि शरीरधारी है, शैतान द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है। मनुष्य की प्रकृति ही है परमेश्वर का विरोध करना। मनुष्य परमेश्वर के समान नहीं हो सकता, परमेश्वर के कार्य के लिए परामर्श देने की उम्मीद तो वह बिलकुल भी नहीं कर सकता। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि परमेश्वर मनुष्य का मार्गदर्शन कैसे करता है, तो यह स्वयं परमेश्वर का कार्य है। यह उचित है कि इस या उस विचार की डींग हाँकने के बजाय मनुष्य को समर्पण करना चाहिए, क्योंकि मनुष्य धूल मात्र है। चूँकि हमारा इरादा परमेश्वर की खोज करने का है, इसलिए हमें परमेश्वर के विचार के लिए उसके कार्य पर अपनी धारणाएँ नहीं थोपनी चाहिए, और जानबूझकर परमेश्वर के कार्य का विरोध करने के लिए अपने भ्रष्ट स्वभाव को उसके चरम रूप में नियोजित तो बिलकुल भी नहीं करना चाहिए। क्या ऐसा करना हमें मसीह-विरोधी नहीं बनाएगा? ऐसे लोग परमेश्वर में विश्वास कैसे कर सकते हैं? चूँकि हम विश्वास करते हैं कि परमेश्वर है, और चूँकि हम उसे संतुष्ट करना और उसे देखना चाहते हैं, इसलिए हमें सत्य के मार्ग की खोज करनी चाहिए, और परमेश्वर के अनुकूल रहने का मार्ग तलाशना चाहिए। हमें परमेश्वर के कड़े विरोध में खड़े नहीं होना चाहिए। ऐसे कार्यों से क्या भला हो सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना' से उद्धृत

344. जब तुम आज के मार्ग पर चलते हो, तो किस प्रकार का अनुगमन सबसे अच्छा होता है? अपने अनुगमन में तुम्हें खुद को किस तरह के व्यक्ति के रूप में देखना चाहिए? तुम्हें पता होना चाहिए कि आज जो कुछ भी तुम पर पड़ता है, उसके प्रति तुम्हारा नज़रिया क्या होना चाहिए, चाहे वह परीक्षण हों या कठिनाई, या फिर निर्मम ताड़ना और श्राप। तुम्हें इस पर सभी मामलों में सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए। मैं यह क्यों कहता हूँ? मैं इसे इसलिए कहता हूँ, क्योंकि आज जो कुछ भी तुम पर पड़ता है, आख़िरकार, वे छोटे-छोटे परीक्षण हैं जो बार-बार आते हैं; शायद तुम उन्हें मानसिक रूप से बहुत कष्टदायक नहीं समझते, और इसलिए तुम चीजों को बस बह जाने देते हो, और प्रगति की खोज में उन्हें मूल्यवान संपत्ति नहीं मानते। तुम कितने लापरवाह हो! यहाँ तक कि तुम इस मूल्यवान संपत्ति को अपनी आँखों के सामने उड़ते एक बादल जैसा समझते हो, और तुम बार-बार बरसने वाले इन कठोर आघातों को सँजोकर नहीं रखते—आघात, जो कि अल्पकालीन होते हैं और तुम्हें कम भारी लगते हैं—बल्कि उन्हें दिल पर न लेते हुए उन्हें ठंडी अनासक्ति से देखते हो, और उन्हें सिर्फ़ सांयोगिक आघात समझते हो। तुम इतने घमंडी हो! इन भयंकर हमलों के प्रति, हमले जो कि बार-बार आने वाले तूफानों की तरह हैं, तुम केवल क्षुद्र अनादर दिखाते हो; कभी-कभी तुम अपनी पूर्ण उदासीनता की अभिव्यक्ति प्रकट करते हुए एक ठंडी मुस्कान तक देने पर उतारू हो जाते हो—क्योंकि तुमने मन में कभी एक बार भी नहीं सोचा कि तुम इस तरह के "दुर्भाग्य" क्यों झेलते रहते हो। क्या मैं मनुष्य के साथ बहुत अन्याय करता हूँ? क्या मैं तुम्हारी गलतियाँ निकालता हूँ? हालाँकि तुम्हारी मानसिकता संबंधी समस्याएँ उतनी गंभीर नहीं भी हो सकती हैं, जितना मैंने वर्णित किया है, फिर भी तुमने अपने बाहरी आत्मसंयम के माध्यम से, लंबे समय से अपनी आंतरिक दुनिया की एक उत्तम छवि बनाई हुई है। मुझे यह बताने की कोई आवश्यकता नहीं है कि तुम्हारे दिल की गहराइयों में छिपी एकमात्र चीज़ है असभ्य कटूक्ति और उदासी के हलके निशान, जो दूसरों को मुश्किल से दिखाई पड़ते हैं। क्योंकि तुम्हें लगता है कि इस तरह के परीक्षण झेलना बहुत गलत है, तुम श्राप देते हो; परीक्षण तुम्हें दुनिया की वीरानी का एहसास कराते हैं और इस वजह से तुम उदासी से भर जाते हो। इन बार-बार के आघातों और अनुशासन को बहुत अच्छी सुरक्षा के रूप में देखने के बजाय तुम उन्हें स्वर्ग द्वारा निरर्थक परेशानी पैदा किए जाने के रूप में, या फिर स्वयं से लिए जाने वाले उपयुक्त प्रतिशोध के रूप में देखते हो। तुम कितने अज्ञानी हो! तुम निर्दयता से अच्छे समय को अँधेरे में कैद कर लेते हो; बार-बार तुम अद्भुत परीक्षणों और अनुशासन को अपने दुश्मनों द्वारा किए गए हमलों के रूप में देखते हो। तुम अपने वातावरण के अनुकूल होने में असमर्थ हो; और उसके लिए इच्छुक तो और भी कम हो, क्योंकि तुम इस बार-बार की—और अपनी दृष्टि में निर्मम—ताड़ना से कुछ भी हासिल करने के लिए तैयार नहीं हो। तुम न तो खोज करने का प्रयास करते हो और न ही अन्वेषण करने का, बस अपने भाग्य के आगे नतमस्तक हो जाते हो, चाहे वह तुम्हें जहाँ भी ले जाए। जो बातें तुम्हें बर्बर ताड़ना लगती हैं उन्होंने तुम्हारा दिल नहीं बदला, न ही उन्होंने तुम्हारे दिल पर कब्ज़ा किया है; इसके बजाय उन्होंने तुम्हारे दिल में छुरा घोंपा। तुम इस "क्रूर ताड़ना" को इस जीवन में अपने दुश्मन से ज्यादा नहीं देखते, और तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया है। तुम इतने दंभी हो! शायद ही कभी तुम मानते हो कि तुम इस तरह के परीक्षण इसलिए भुगतते हो, क्योंकि तुम बहुत घिनौने हो; इसके बजाय, तुम खुद को बहुत अभागा समझते हो, और कहते हो कि मैं हमेशा तुम्हारी गलतियाँ निकालता रहता हूँ। आज तक, जो मैं कहता और करता हूँ, तुम्हें वास्तव में उसका कितना ज्ञान है? ऐसा मत सोचो कि तुम एक अंतर्जात प्रतिभा हो, जो स्वर्ग से थोड़ी ही निम्न, किंतु पृथ्वी से बहुत अधिक ऊँची है। तुम किसी भी अन्य से ज्यादा होशियार नहीं हो—यहाँ तक कि यह भी कहा जा सकता है कि पृथ्वी पर जितने भी विवेकशील लोग हैं, तुम उनसे कहीं ज्यादा मूर्ख हो, क्योंकि तुम खुद को बहुत ऊँचा समझते हो, और तुममें कभी भी हीनता की भावना नहीं रही; ऐसा लगता है कि तुम मेरे कार्यों को बड़े विस्तार से अनुभव करते हो। वास्तव में, तुम ऐसे व्यक्ति हो, जिसके पास विवेक की मूलभूत रूप से कमी है, क्योंकि तुम्हें इस बात का कुछ पता नहीं है कि मैं क्या करूँगा, और उससे भी कम तुम्हें इस बात की जानकारी है कि मैं अभी क्या कर रहा हूँ। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुम जमीन पर कड़ी मेहनत करने वाले किसी बूढ़े किसान के बराबर भी नहीं हो, ऐसा किसान, जिसे मानव-जीवन की थोड़ी भी समझ नहीं है और फिर भी जो जमीन पर खेती करते हुए स्वर्ग के आशीषों पर निर्भर करता है। तुम अपने जीवन के संबंध में एक पल भी विचार नहीं करते, तुम्हें यश के बारे में कुछ नहीं पता, और तुम्हारे पास कोई आत्म-ज्ञान तो बिलकुल नहीं है। तुम इतने "उन्नत" हो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो लोग सीखते नहीं और अज्ञानी बने रहते हैं : क्या वे जानवर नहीं हैं?' से उद्धृत

345. अधिकांश लोग जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं वे केवल इस बात को ज्यादा महत्व देते हैं कि आशीषों को किस प्रकार प्राप्त किया जाए या आपदा से कैसे बचा जाए। परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन का उल्लेख करने पर वे चुप हो जाते हैं और उनकी रुचि समाप्त हो जाती है। उन्हें लगता है कि वे इस प्रकार के कुछ उबाऊ प्रश्नों को जानने से वे अपने जीवन में बढ़ नहीं सकते हैं या किसी भी प्रकार का लाभ प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और इसलिए हालांकि वे परमेश्वर के प्रबंधन के संदेश के बारे में सुन चुके होते हैं, वे उन्हें बहुत ही लापरवाही से लेते हैं। उन्हें वे इतने मूल्यवान नहीं लगते कि उन्हें स्वीकारा जाए और वे अपने जीवन का अंग तो उन्हें बिल्कुल नहीं लगते। ऐसे लोगों के पास परमेश्वर का अनुसरण करने का बहुत ही साधारण लक्ष्य होता है और वो लक्ष्य है आशीषें प्राप्त करना। ऐसे लोग इस तरह की किसी भी बात पर ध्यान नहीं देते जो इस लक्ष्य से मतलब नहीं रखती। उनके लिए, करने का अर्थ आशीषें प्राप्त करने के लिये परमेश्वर पर विश्वास करना सबसे तर्कसंगत लक्ष्य और उनके विश्वास का आधारभूत मूल्य है। और जो चीज़ें इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता प्रदान नहीं करतीं वे उनसे प्रभावित नहीं होते हैं। आज जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं उनके साथ ऐसी ही समस्या है। उनके लक्ष्य और प्रेरणा तर्कसंगत दिखाई देते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर पर विश्वास समय ही, परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते भी हैं, परमेश्वर के प्रति समर्पित भी होते हैं और अपने कर्तव्य को भी निभाते हैं। वे अपनी जवानी लगा देते हैं, परिवार और भविष्य को त्याग देते हैं, और यहां तक कि सालों अपने घर से दूर व्यस्त रहते हैं। अपने परम लक्ष्य के लिये, वे अपनी रूचियों को बदल डालते हैं, अपने जीवन के दृष्टिकोण को परिवर्तित कर देते हैं, और यहां तक कि अपनी खोज की दिशा तक को बदल देते हैं, फिर भी वे परमेश्वर पर अपने विश्वास के लक्ष्य को नहीं बदल सकते। वे अपने ही आदर्शों के लिये भाग-दौड़ करते हैं; चाहे मार्ग कितना ही दूर हो, और मार्ग में कितनी भी कठिनाइयां और अवरोध क्यों न आएं, वे डटे रहते हैं और मृत्यु के सामने निडर खड़े रहते हैं। इस प्रकार से अपने आप को समर्पित बनाए रखने के लिए उन्हें किस बात से शक्ति प्राप्त होती है? क्या यह उनका विवेक है? क्या यह उनका महान और कुलीन चरित्र है? क्या यह उनका अटल इरादा है जो उन्हें दुष्ट शक्तियों से अंत तक युद्ध करते रहने की प्रेरणा देता है? क्या यह उनका विश्वास है जिसमें वे बिना प्रतिफल के परमेश्वर की गवाही देते हैं? क्या यह उनकी वफादारी है जिसके लिए वे परमेश्वर की इच्छा को प्राप्त करने के लिए सब कुछ देने के लिए भी तैयार रहते हैं? या यह उनकी भक्ति है जिसमें वे हमेशा व्यक्तिगत असाधारण मांगों को त्याग देते हैं? उन लोगों के लिये जिन्होंने कभी भी परमेश्वर के प्रबंधन को जानने के लिए कभी भी इतना कुछ नहीं दिया, यह किसी आश्चर्य से कम नहीं! कुछ देर के लिये आओ इस पर चर्चा न करें कि इन लोगों ने कितना कुछ दिया है। फिर भी उनका व्यवहार इस योग्य है कि हम उसका विश्लेषण करें। उन लाभों के अतिरिक्त जो उनके साथ इतनी निकटता से जुड़े हैं, क्या इन लोगों के लिए जो कभी भी परमेश्वर को नहीं समझ पाते हैं, उसे इतना कुछ देने का क्या कोई अन्य कारण हो सकता है? इसमें, हम एक पहले से ही अज्ञात समस्या को देखते हैं: मनुष्य का परमेश्वर के साथ सम्बन्ध केवल एक नग्न स्वार्थ है। यह आशीष देने वाले और लेने वाले के मध्य का सम्बन्ध है। सीधे-सीधे, यह कर्मचारी और नियोक्ता के मध्य के सम्बन्ध के समान है। कर्मचारी नियोक्ता के द्वारा पुरस्कार प्राप्त करने के लिए ही कार्य करता है। इस प्रकार के सम्बन्ध में, कोई स्नेह नहीं होता है, केवल एक सौदा होता है; प्रेम करने और प्रेम पाने जैसी कोई बात नहीं होती, केवल दान और दया होता है; कोई आपसी समझ नहीं होती केवल दबा हुआ क्रोध और धोखा होता है; कोई अंतरंगता नहीं होती, केवल एक खाई जो कभी भी भरी नहीं जा सकती। जब चीज़ें इस बिन्दु तक आ जाती हैं, तो कौन इस प्रकार की प्रवृत्ति को बदलने में सक्षम है? और कितने लोग इसे वास्तव में समझने के योग्य हैं कि यह सम्बन्ध कितना निराशजनक बन चुका है? मैं मानता हूं कि जब लोग आशीषित होने के आनन्द में अपने आप को लगा देते हैं, तो कोई भी यह कल्पना नहीं कर सकता कि परमेश्वर के साथ इस प्रकार का सम्बन्ध कितना शर्मनाक और भद्दा होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है' से उद्धृत

346. परमेश्वर पर मानवजाति की आस्था का सबसे दुखद पहलू यह है कि मनुष्य परमेश्वर के कार्य के मध्य में अपना प्रबंधन चलाता है और परमेश्वर के प्रबंधन के प्रति बेपरवाह रहता है। मनुष्य की सबसे बड़ी असफलता इस बात में है कि किस प्रकार से एक ही समय में परमेश्वर के प्रति समर्पण को खोजते हुए और उसकी आराधना करते हुए, वह कैसे अपने आदर्श गंतव्य का निर्माण करता है और इस गणित में लगा रहता है कि किस प्रकार से बड़ी से बड़ी आशीष और उत्तम गंतव्य को प्राप्त कर सके। अगर लोग इस बात को समझ भी जायें कि वे कितने दयनीय, घृणित और शोचनीय स्थिति में हैं, तो भी ऐसे कितने लोग हैं जो अपने आदर्शों और आशाओं का परित्याग कर सकते हैं? और ऐसा कौन है जो अपने कदमों को थाम ले और केवल अपने ही बारे में सोचना बंद कर दे? परमेश्वर को अपना प्रबन्धन पूर्ण करने के लिए ऐसे लोग चाहिये जो उसके साथ निकटता से सहयोग करें। उसे ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो उसे समर्पित होने के लिये अपने दिमाग और देह को उसके प्रबंधकारणीय कार्य के लिये अर्पित कर दें; उसे ऐसे लोगों की ज़रूरत नहीं है जो अपने हाथ फैलाए खड़े रहें और उससे हर दिन मांगते ही रहें, उसे ऐसे लोग तो बिल्कुल नहीं चाहिए जो थोड़ा-सा कुछ करेंगे और फिर इस बात का इंतज़ार करेंगे कि अब परमेश्वर उनके लिये कुछ करे। परमेश्वर ऐसे लोगों से घृणा करता है जो ज़रा-सा कुछ करेंगे और फिर ऐसा दिखलाएंगे जैसे पता नहीं उन्होंने कितना बड़ा काम कर दिया। वह ऐसे नृशंस लोगों से भी घृणा करता है जो उसके प्रबंधकारणीय कार्य को तो पसंद नहीं करते लेकिन हमेशा स्वर्ग जाने और आशीष प्राप्त करने की बातें करते रहते हैं। वह उन लोगों से तो और भी अधिक नफ़रत करता है जो मनुष्य को बचाने के लिये उसके काम से पैदा हुए मौके का फायदा उठाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये लोग इस बात की चिंता कभी नहीं करते कि परमेश्वर अपने प्रबंधकारणीय कार्य के द्वारा क्या प्राप्त और अर्जित करना चाहता है वे केवल परमेश्वर के कार्य के द्वारा उपलब्ध अवसरों का उपयोग करके आशीषें प्राप्त करने के बारे में ही चिंता करते रहते हैं। वे परमेश्वर के हृदय की चिंता नहीं करते, वे पूरी तरह से स्वयं के भविष्य और नियति में व्यस्त रहते हैं। जो लोग परमेश्वर के प्रबंधकारणीय कार्य को पसंद नहीं करते और उसकी इच्छा और मानवजाति को बचाने के कार्य में ज़रा सा भी दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं, वे परमेश्वर के प्रबंधकारणीय कार्य से अलग जाकर केवल वही करते हैं जो उन्हें भाता है। परमेश्वर उनके व्यवहार का स्मरण नहीं करता है, न उसका अनुमोदन करता है और उनके प्रति अनुकूल भाव दिखाने की तो बात ही दूर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है' से उद्धृत

347. मेरे कर्मों की संख्या समुद्र-तटों की रेत के कणों से भी ज़्यादा है, और मेरी बुद्धि सुलेमान के सभी पुत्रों से बढ़कर है, फिर भी लोग मुझे मामूली हैसियत का मात्र एक चिकित्सक और मनुष्यों का कोई अज्ञात शिक्षक समझते हैं। बहुत-से लोग केवल इसलिए मुझ पर विश्वास करते हैं कि मैं उनको चंगा कर सकता हूँ। बहुत-से लोग सिर्फ इसलिए मुझ पर विश्वास करते हैं कि मैं उनके शरीर से अशुद्ध आत्माओं को निकालने के लिए अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करूँगा, और बहुत-से लोग मुझसे बस शांति और आनंद प्राप्त करने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग मुझसे सिर्फ और अधिक भौतिक संपदा माँगने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग मुझसे सिर्फ इस जीवन को शांति से गुज़ारने और आने वाले संसार में सुरक्षित और स्वस्थ रहने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग केवल नरक की पीड़ा से बचने के लिए और स्वर्ग के आशीष प्राप्त करने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग केवल अस्थायी आराम के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं और आने वाले संसार में कुछ हासिल करने की कोशिश नहीं करते। जब मैंने अपना क्रोध नीचे मनुष्यों पर उतारा और उसका सारा आनंद और शांति छीन ली, तो मनुष्य संदिग्ध हो गया। जब मैंने मनुष्य को नरक का कष्ट दिया और स्वर्ग के आशीष वापस ले लिए, तो मनुष्य की लज्जा क्रोध में बदल गई। जब मनुष्य ने मुझसे खुद को चंगा करने के लिए कहा, तो मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया और उसके प्रति घृणा महसूस की; तो मनुष्य मुझे छोड़कर चला गया और बुरी दवाइयों तथा जादू-टोने का मार्ग खोजने लगा। जब मैंने मनुष्य द्वारा मुझसे माँगा गया का सब-कुछ वापस ले लिया, तो हर कोई बिना कोई निशान छोड़े गायब हो गया। इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य मुझ पर इसलिए विश्वास करता है, क्योंकि मैं बहुत अनुग्रह देता हूँ, और प्राप्त करने के लिए और भी बहुत-कुछ है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम विश्वास के बारे में क्या जानते हो?' से उद्धृत

348. तुम आशा करते हो कि परमेश्वर पर विश्वास करने से तुम्‍हें चुनौतियाँ और क्लेश, या थोड़ी बहुत कठिनाई विरासत में नहीं मिलेगी। तुम हमेशा ऐसी चीज़ों का अनुसरण करते हो जो निकम्मी हैं, और तुम अपने जीवन में कोई मूल्य नहीं जोड़ते हो, उसके बजाय तुम अपने फिजूल के विचारों को सत्य से ज़्यादा महत्व देते हो। तुम कितने निकम्‍मे हो! तुम एक सूअर के समान जीते हो—तुममें, और सूअर और कुत्तों में क्या अन्तर है? क्या वे जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, और उसके बजाय शरीर से प्रेम करते हैं, सब के सब जानवर नहीं हैं? क्या वे मरे हुए लोग जिनमें आत्मा नहीं है, चलती फिरती हुई लाशें नहीं हैं? तुम लोगों के बीच में कितने सारे वचन बोले गए हैं? क्या तुम लोगों के बीच में केवल थोड़ा सा ही कार्य किया गया है? मैंने तुम लोगों के बीच में कितनी आपूर्ति की है? तो फिर तुमने इसे प्राप्त क्यों नहीं किया? तुम्‍हारे पास शिकायत करने के लिए क्या है? क्या मामला ऐसा नहीं है कि तुमने कुछ भी इसलिए प्राप्त नहीं किया है क्योंकि तुम देह से बहुत अधिक प्रेम करते हो? और क्या यह इसलिए नहीं है क्योंकि तुम्‍हारे विचार बहुत ज़्यादा फिजूल हैं? क्या यह इसलिए नहीं है क्योंकि तुम बहुत ही ज़्यादा मूर्ख हो? यदि तुम इन आशीषों को प्राप्त करने में असमर्थ हो, तो क्या तुम परमेश्वर को दोष दोगे कि उसने तुम्‍हें नहीं बचाया? तुम परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद शांति प्राप्त करने के योग्य होने के लिए अनुसरण करते हो—अपनी सन्तानों के लिए बीमारी से आज़ादी, अपने जीवनसाथी के लिए एक अच्छी नौकरी, अपने बेटे के लिए एक अच्छी पत्नी, अपनी बेटी के लिए एक सज्जन पति, अपने बैल और घोड़े के लिए अच्छे से जमीन की जुताई कर पाने की क्षमता, और अपनी फसलों के लिए साल भर अच्छे मौसम की कामना करते हो। तुम इन्हीं चीज़ों की खोज करते हो। तुम्‍हारा अनुसरण केवल सुकून के साथ जीवन बिताने के लिए है, इसलिए है कि तुम्‍हारे परिवार में कोई दुर्घटना न हो, कि आँधी तुम्‍हारे पास से होकर गुज़र जाये, धूल मिट्टी तुम्‍हारे चेहरे को छू न पाए, तुम्‍हारे परिवार की फसलें बाढ़ में बह न जायें, तुम किसी भी विपत्ति से प्रभावित न हो, कि तुम परमेश्वर की बांहों में रहो, कि तुम आरामदायक घोंसले में रहो। तुम्‍हारे जैसा डरपोक इंसान, जो हमेशा शरीर के पीछे पीछे चलता है—क्या तुम्‍हारे पास एक हृदय है, क्या तुम्‍हारे पास एक आत्मा है? क्या तुम एक पशु नहीं हो? बदले में बिना कुछ मांगते हुए मैं तुम्‍हें एक सच्चा मार्ग देता हूँ, फिर भी तुम अनुसरण नहीं करते हो। क्या तुम उनमें से एक हो जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं? मैं तुम्‍हें वास्तविक मानवीय जीवन देता हूँ, फिर भी तुम अनुसरण नहीं करते हो। क्या तुम कुत्ते और सूअर के समान नहीं हो? सूअर मनुष्य के जीवन का अनुसरण नहीं करते हैं, वे शुद्ध किए जाने का प्रयास नहीं करते हैं, और वे नहीं समझते हैं कि जीवन क्या है? प्रतिदिन, जी भरकर खाने के बाद, वे बस सो जाते हैं। मैंने तुम्‍हें सच्चा मार्ग दिया है, फिर भी तुमने उसे प्राप्त नहीं किया है: तुम्‍हारे हाथ खाली हैं। क्या तुम इस जीवन में, इस सूअर के जीवन में, निरन्तर बने रहना चाहते हो? ऐसे लोगों के ज़िन्दा रहने का क्या महत्व है? तुम्‍हारा जीवन घृणित और नीच है, तुम गन्दगी और व्यभिचार के मध्य रहते हो, और तुम किसी लक्ष्य को पाने का प्रयास नहीं करते हो; क्या तुम्‍हारा जीवन निम्नतम नहीं है? क्या तुम्‍हारे पास परमेश्वर की ओर देखने की धृष्टता है? यदि तुम लगातार इस तरह अनुभव करते रहो, तो क्या तुम्‍हें शून्यता प्राप्त नहीं होगी? सच्चा मार्ग तुझे दे दिया गया है, किन्तु अंततः तू उसे प्राप्त कर सकता है कि नहीं यह तेरे व्यक्तिगत अनुसरण पर निर्भर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

349. बहुत से लोग मुझ से सच में प्रेम करना चाहते हैं, किन्तु क्योंकि उनके हृदय उनके स्वयं के नहीं है, इसलिए उनका स्वयं पर कोई नियन्त्रण नहीं है; बहुत से लोग मेरे द्वारा दिए गए परीक्षणों के बीच सच में मुझसे प्रेम करते हैं, फिर भी वे यह समझने में अक्षम हैं कि मैं वास्तव में विद्यमान हूँ, और मात्र खालीपन के बीच ही मुझसे प्रेम करते हैं, ना कि मेरे वास्तविक अस्तित्व के कारण; बहुत से लोग मेरे सामने अपने हृदयों को रखने के बाद उन पर कोई ध्यान नहीं देते हैं, और इस प्रकार शैतान को जब भी अवसर मिलता है उनके हृदय उसके द्वारा छीन लिए जाते हैं, जिसके बाद वे मुझे छोड़ देते हैं; जब मैं अपने वचनों को प्रदान करता हूँ तो बहुत से लोग मुझसे सचमुच प्रेम करते हैं, मगर मेरे वचनों को अपनी आत्मा में सँजोते नहीं हैं; उसके बजाए, वे उसका सार्वजनिक सम्पति के समान यूँ ही उपयोग करते हैं और जब भी वे ऐसा महसूस करते हैं उन्हें वापस वहाँ उछाल देते हैं जहाँ से वे आए थे। मनुष्य दर्द के बीच मुझे खोजता है, और परीक्षणों के बीच मेरी ओर देखता है। शांति के समय के दौरान वह मेरा आनन्द उठाता है जब संकट में होता है तो वह मुझसे इनकार करता है, जब वह व्यस्त होता है तो मुझे भूल जाता है, और जब वह खाली होता है तब वह अन्यमनस्क तरीके से मेरे लिए कुछ करता है—फिर भी किसी ने भी अपने सम्पूर्ण जीवन में मुझसे प्रेम नहीं किया है। मैं चाहता हूँ कि मनुष्य मेरे सम्मुख ईमानदार हो जाएः मैं नहीं कहता कि वह मुझे कोई चीज दे, किन्तु केवल यही कहता हूँ कि सभी लोग मुझे गम्भीरता से लें, कि, मुझे फुसलाने के बजाए, वे मुझे मनुष्य की ईमानदारी को वापस लाने की अनुमति दें। मेरी प्रबुद्धता, मेरी रोशनी और मेरे प्रयासों की लागत सभी लोगों के बीच व्याप्त हो जाते हैं, लेकिन साथ ही मनुष्य के हर कार्य के वास्तविक तथ्य, मुझे दिए गए उनके धोखे भी, सभी लोगों के बीच व्याप्त हो जाते हैं। यह ऐसा है मानो कि मनुष्य के धोखे के अवयव उसके गर्भ में आने के समय से ही उसके साथ रहे हैं, मानो कि उसने चालबाजी के ये विशेष कौशल जन्म से ही धारण किए हुए है। इससे अधिक और क्या, उसने कभी भी इरादों को प्रकट नहीं किया है; किसी को भी कभी भी इन कपटपूर्ण कौशलों के स्रोत की सही प्रकृति का पता नहीं लगा है। परिणामस्वरूप, मनुष्य धोखे का एहसास किए बिना इसके बीच रहता है, और यह ऐसा है मानो वह अपने आपको क्षमा कर देता है, मानो कि यह उसके द्वारा मुझे जानबूझ कर दिए गए धोखे के बजाए परमेश्वर की व्यवस्था है। क्या यह मनुष्य का मुझसे धोखे का वास्तविक स्रोत नहीं है? क्या यह उसकी धूर्त योजना नहीं है? मैं कभी भी मनुष्य की चापलूसियों और झाँसापट्टी के द्वारा संभ्रमित नहीं हुआ हूँ, क्योंकि मैंने बहुत पहले ही उसके सार को जान लिया था। कौन जानता है कि उसके खून में कितनी अशुद्धता है, और शैतान का कितना ज़हर उसकी मज्जा में है? मनुष्य हर गुज़रते दिन के साथ उसका और अधिक अभ्यस्त होता जाता है, इतना कि वह शैतान द्वारा यंत्रणा के प्रति बेसुध हो जाता है, और इस प्रकार उसमें "स्वस्थ अस्तित्व की कला" को ढूँढ़ने में कोई रूचि नहीं होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 21' से उद्धृत

350. समस्त मनुष्य आत्मज्ञान से रहित प्राणी हैं, और वे स्वयं को जानने में असमर्थ हैं। फिर भी, वे अन्य सभी को बहुत करीब से जानते हैं, मानो दूसरों के द्वारा की और कही गई हर चीज़ का "निरीक्षण" पहले उन्होंने ही ठीक उन्हीं के सामने किया हो और करने से पहले उनका अनुमोदन प्राप्त किया गया हो। परिणामस्वरूप, ऐसा लगता है, मानो उन्होंने अन्य सभी की, उनकी मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं तक, पूरी नाप-तौल कर ली हो। सभी मनुष्य ऐसे ही हैं। भले ही उन्होंने राज्य के युग में प्रवेश कर लिया है, परंतु उनका स्वभाव अपरिवर्तित बना हुआ है। वे मेरे सामने अब भी वैसा ही करते हैं, जैसा मैं करता हूँ, परंतु मेरी पीठ पीछे वे अपने विशिष्ट "व्यापार" में संलग्न होना आरंभ कर देते हैं। लेकिन बाद में जब वे मेरे सम्मुख आते हैं, तो वे पूर्णत: भिन्न व्यक्तियों के समान होते हैं, प्रत्यक्षत: शांत और अविचलित, प्रकृतिस्थ चेहरे और संतुलित धड़कन के साथ। क्या वास्तव में यही चीज़ मनुष्यों को हेय नहीं बनाती? बहुत-से लोग दो पूर्णतः भिन्न चेहरे रखते हैं—एक जब वे मेरे सामने होते हैं, और दूसरा जब वे मेरी पीठ पीछे होते हैं। उनमें से कई लोग मेरे सामने नवजात मेमने के समान आचरण करते हैं, किंतु मेरी पीठ पीछे वे भयानक शेरों में बदल जाते हैं, और बाद में वे पहाड़ी पर आनंद से उड़ती छोटी चिड़ियों के समान व्यवहार करते हैं। बहुत-से लोग मेरे सामने उद्देश्य और संकल्प प्रदर्शित करते हैं। बहुत-से लोग प्यास और लालसा के साथ मेरे वचनों की तलाश करते हुए मेरे सामने आते हैं, किंतु मेरी पीठ पीछे वे उनसे उकता जाते हैं और उन्हें त्याग देते हैं, मानो मेरे कथन कोई बोझ हों। मैंने कई बार अपने शत्रु द्वारा भ्रष्ट की गई मनुष्यजाति को देखकर उससे आशा रखना छोड़ा है। कई बार मैंने उन्हें रो-रोकर क्षमा माँगते हुए अपने सामने आता देखकर, उनमें आत्मसम्मान के अभाव और उनकी अड़ियल असाध्यता के कारण, क्रोधवश उनके कार्यों के प्रति अपनी आँखें बंद कर ली हैं, यहाँ तक कि उस समय भी, जब उनका हृदय सच्चा और अभिप्राय ईमानदार होता है। कई बार मैंने लोगों को अपने साथ सहयोग करने के लिए पर्याप्त आत्मविश्वास से भरा देखा है, जो मेरे सामने, मेरे आगोश में, उसकी गर्माहट का स्वाद लेते प्रतीत होते हैं। कई बार, अपने चुने हुए लोगों का भोलापन, उनकी जीवंतता और मनोहरता देखकर क्यों नहीं मैं अपने हृदय में इन चीज़ों का खूब आनंद ले पाता। मनुष्य मेरे हाथों में अपने पूर्व-नियत आशीषों का आनंद लेना नहीं जानते, क्योंकि वे यह नहीं समझते कि "आशीषों" या "पीड़ाओं", दोनों का ठीक-ठीक क्या तात्पर्य है। इस कारण, मनुष्य मेरी खोज में ईमानदारी से दूर हैं। यदि आने वाला कल नहीं होता, तो मेरे सामने खड़े तुम लोगों में से कौन बहती बर्फ जैसा शुद्ध और हरिताश्म जैसा बेदाग़ होता? क्या ऐसा हो सकता है मेरे प्रति तुम लोगों का प्रेम स्वादिष्ट भोजन या कपड़े के उत्तम दर्ज़े के सूट या उत्तम परिलब्धियों वाले उच्च पद से बदला जा सकता है? क्या उसे उस प्रेम से बदला जा सकता है, जो दूसरे तुम्हारे लिए रखते हैं? क्या वास्तव में परीक्षणों से गुजरना लोगों को मेरे प्रति अपना प्रेम त्यागने के लिए प्रेरित कर देगा? क्या कष्ट और क्लेश उन्हें मेरी व्यवस्थाओं के विरुद्ध शिकायत करने का कारण बनेंगे? किसी ने भी कभी वास्तव में मेरे मुख की तलवार की प्रशंसा नहीं की है : वे इसका वास्तविक तात्पर्य समझे बिना केवल इसका सतही अर्थ जानते हैं। यदि मनुष्य वास्तव में मेरी तलवार की धार देखने में सक्षम होते, तो वे चूहों की तरह तेजी से दौड़कर अपने बिलों में घुस जाते। अपनी संवेदनहीनता के कारण मनुष्य मेरे वचनों का वास्तविक अर्थ नहीं जानते, और इसलिए उन्हें कोई भनक नहीं है कि मेरे कथन कितने विकट हैं या वे मनुष्य की प्रकृति को कितना उजागर करते हैं और उन वचनों द्वारा उनकी भ्रष्टता का कितना न्याय हुआ है। इस कारण, मैं जो कहता हूँ, उसके बारे में उनके अधपके विचारों के परिणामस्वरूप अधिकतर लोगों ने एक उदासीन रवैया अपना लिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 15' से उद्धृत

351. उनकी चाहे किसी भी प्रकार से परीक्षा क्यों न की जाती हो, उन लोगों की स्वामी भक्ति अपरिवर्तनीय बनी रहती है जिनके हृदय में परमेश्वर है; किन्तु जिनके हृदय में परमेश्वर नहीं है उनके लिए, जब एक बार परमेश्वर का कार्य उनकी देह के लिए फायदेमन्द नहीं होता है, तो वे परमेश्वर के बारे में अपने दृष्टिकोण को बदल देते हैं, और यहाँ तक कि परमेश्वर को छोड़कर चले जाते हैं। इस प्रकार के लोग ऐसे होते हैं जो अंत में डटे नहीं रहेंगे, जो केवल परमेश्वर के आशीषों को ही खोजते हैं और उनके पास परमेश्वर के लिए अपने आपको व्यय करने और उसके प्रति अपने आपका समर्पण करने की कोई इच्छा नहीं होती है। ऐसे सभी अधम लोगों को तब बहिष्कृत कर दिया जाएगा जब परमेश्वर का कार्य समाप्ति पर आ जाएगा, और वे किसी भी प्रकार की सहानुभूति के योग्य नहीं हैं। जो मानवता से रहित हैं वे सचमुच में परमेश्वर से प्रेम करने में अक्षम हैं। जब परिवेश सही सलामत और सुरक्षित होता है, या जब वे लाभ प्राप्त कर सकते हैं, तब वे परमेश्वर के प्रति पूरी तरह आज्ञाकारी रहते हैं, किन्तु जब एक बार जिस वस्तु की वे इच्छा करते हैं उससे समझौता किया जाता है या अंतत: उसका खंडन कर दिया जाता है, तो वे एकदम से बगावत कर देते हैं। यहाँ तक कि एक रात के अन्तराल में ही, वे अपने कल के उपकारियों के साथ अचानक बिना किसी तुक या तर्क के अपने घातक शत्रु के समान व्यवहार करते हुए, एक मुस्कुराते हुए, "उदार हृदय" वाले व्यक्ति से एक कुरूप और जघन्य हत्यारे में बदल जाते हैं। यदि इन दुष्ट आत्माओं को निकाला नहीं जाता है, ऐसी दुष्ट आत्माएँ जो बिना पलक झपके हत्या कर देंगी, तो क्या वे एक छुपा हुआ ख़तरा नहीं बन जाएँगी?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

352. लोगों के जीवन के अनुभवों में, वे प्रायः अपने लिए सोचते हैं, मैंने परमेश्वर के लिए अपने परिवार और जीविका को छोड़ दिया, और उसने मुझे क्या दिया है? मुझे तो इसमें अवश्य जोड़ना, और इसकी पुष्टि करनी चाहिए—क्या मैंने हाल ही में कोई आशीष प्राप्त किया है? मैंने इस दौरान बहुत कुछ दिया है, मैं दौड़ा-भागा हूँ, मैंने बहुत अधिक सहा है—क्या परमेश्वर ने बदले में मुझे कोई वचन दिए हैं? क्या उसने मेरे भले कर्मों को याद किया है? मेरा अन्त क्या होगा? क्या मैं परमेश्वर से आशीषों को प्राप्त कर सकता हूँ? ... प्रत्येक व्यक्ति लगातार, और प्रायः अपने हृदय में इस प्रकार का गुणा भाग करता है, और वे परमेश्वर से माँगें करते हैं जिनमें उनके कारण, और महत्वाकांक्षाएँ, तथा सौदे होते हैं। कहने का तात्पर्य है कि, मनुष्य अपने हृदय में लगातार परमेश्वर की परीक्षा लेता रहता है, परमेश्वर के बारे में लगातार योजनाओं को ईजाद करता रहता है, और लगातार परमेश्वर के साथ अपने अंत के बारे में बहस करता रहता है, और परमेश्वर से एक वक्तव्य निकलवाने की कोशिश करता है, यह देखने के लिए कि परमेश्वर उसे वह देता है या नहीं जो वह चाहता है। परमेश्वर की खोज करने के साथ-साथ, मनुष्य परमेश्वर से परमेश्वर के समान व्यवहार नहीं करता है। वह हमेशा परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश करता है, लगातार उससे माँग करता रहता है, और यहाँ तक कि हर कदम पर उस पर दबाव डालता है, और एक इंच दिए जाने के बाद एक मील हथियाने की कोशिश करता है। परमेश्वर के साथ सौदबाजी करने के साथ-साथ, मनुष्य उसके साथ बहस भी करता है, और ऐसे लोग भी हैं जो, जब परीक्षाएँ उन पर पड़ती हैं या जब वे अपने आप को किसी निश्चित परिस्थितियों में पाते हैं, तो प्रायः कमज़ोर, निष्क्रिय और अपने कार्य में सुस्त पड़ जाते हैं, और परमेश्वर के बारे में शिकायतों से भर जाते हैं। जब उसने पहली बार परमेश्वर पर विश्वास करना आरम्भ किया था तब से, मनुष्य ने परमेश्वर को एक अक्षय पात्र, स्विटज़रलैंड की सेना का एक चाकू माना है, और अपने आपको परमेश्वर का सबसे बड़ा लेनदार माना है, मानो कि परमेश्वर से आशीषों और प्रतिज्ञाओं को प्राप्त करने की कोशिश करना उसका जन्मजात अधिकार और कर्तव्य था, जबकि परमेश्वर की ज़िम्मेदारी मनुष्य की रक्षा और देखभाल करना और उसे भरण पोषण देना थी। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं उन सबकी "परमेश्वर में विश्वास करने" की मूल समझ, और परमेश्वर में विश्वास करने की अवधारणा की उनकी गहरी समझ ऐसी ही है। मनुष्य की प्रकृति के सार से लेकर उसकी व्यक्तिपरक खोज तक, ऐसा कुछ भी नहीं है जो परमेश्वर के भय से सम्बन्धित हो। परमेश्वर पर विश्वास करने में मनुष्य के लक्ष्य का परमेश्वर की आराधना के साथ सम्भवतः कोई लेना देना नहीं हो सकता है। कहने का तात्पर्य है कि, मनुष्य ने कभी यह विचार नहीं किया और न ही यह समझा है कि परमेश्वर में विश्वास करने में परमेश्वर का भय मानने, और परमेश्वर की आराधना करने की आवश्यकता होती है। ऐसी स्थितियों के आलोक में, मनुष्य का सार स्पष्ट है। और यह सार क्या है? ऐसा है कि मनुष्य का हृदय द्वेषी है, यह छल और कपट को आश्रय देता है, और यह न त निष्पक्षता और धार्मिकता, या न ही उससे प्रेम करता है जो सकारात्मक है, और यह घिनौना और लोभी है। मनुष्य का हृदय परमेश्वर के अधिक करीब नहीं आ सका है; उसने इसे बिलकुल भी परमेश्वर को नहीं दिया है। परमेश्वर ने मनुष्य के सच्चे हृदय को कभी नहीं देखा है, न ही मनुष्य के द्वारा कभी उसकी आराधना की गई है। भले ही परमेश्वर कितनी बड़ी कीमत क्यों न चुकाए, या कितना अधिक काम क्यों न करे, या मनुष्य को कितना ही अधिक प्रदान क्यों न करे, मनुष्य इसके प्रति अंधा, और सर्वथा उदासीन बना रहता है। मनुष्य ने कभी भी परमेश्वर को अपना हृदय नहीं दिया है, वह अपने हृदय का केवल अपने आप ही ध्यान रखना, अपने स्वयं के निर्णयों को ही लेना चाहता है—जिसका निहितार्थ है कि मनुष्य परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करना, या परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को मानना नहीं चाहता है, न ही वह परमेश्वर के रूप में परमेश्वर की आराधना करना चाहता है। आज मनुष्य की दशा ऐसी ही हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

353. मानवजाति की भावनाएँ स्वार्थी हैं और अँधकार के संसार से वास्ता रखती हैं। वे परमेश्वर की इच्छा के लिए अस्तित्व में नहीं हैं, परमेश्वर की योजना के लिए तो बिल्कुल नहीं हैं। इसलिए मनुष्य और परमेश्वर का उल्लेख एक साँस में नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर सर्वदा सर्वोच्च है और हमेशा आदरणीय है, जबकि मनुष्य सर्वदा तुच्छ और हमेशा निकम्मा है। यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर हमेशा मनुष्यों के लिए बलिदान करता रहता है और अपने आप को समर्पित करता है; जबकि, मनुष्य हमेशा लेता है और सिर्फ अपने आप के लिए ही परिश्रम करता है। परमेश्वर सदा मानवजाति के अस्तित्व के लिए परिश्रम करता रहता है, फिर भी मनुष्य ज्योति और धार्मिकता में कभी भी कोई योगदान नहीं देता है। भले ही मनुष्य कुछ समय के लिए परिश्रम करे, लेकिन वह इतना कमज़ोर होता है कि हल्के से झटके का भी सामना नहीं सकता है, क्योंकि मनुष्य का परिश्रम केवल अपने लिए होता है दूसरों के लिए नहीं। मनुष्य हमेशा स्वार्थी होता है, जबकि परमेश्वर सर्वदा स्वार्थविहीन होता है। परमेश्वर उन सब का स्रोत है जो धर्मी, अच्छा, और सुन्दर है, जबकि मनुष्य सब प्रकार की गन्दगी और बुराई का वाहक और प्रकट करने वाला है। परमेश्वर कभी भी अपनी धार्मिकता और सुन्दरता के सार-तत्व को नहीं बदलेगा, जबकि मनुष्य किसी भी समय, किसी भी परिस्थिति में, धार्मिकता से विश्वासघात कर सकता है और परमेश्वर से दूर जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

354. इन सब वर्षों में तुम लोगों ने मेरा अनुसरण किया है, फिर भी तुमने मुझे कभी वफादारी का एक कण भी नहीं दिया है। इसके बजाय, तुम उन लोगों का चक्कर काटते रहे हो, जिनसे तुम प्रेम करते हो और जो चीज़ें तुम्हें प्रसन्न करती हैं—इतना कि हर समय, और जगह जहाँ तुम जाते हो, उन्हें हृदय के करीब रखते हो और तुमने कभी उनका त्याग नहीं किया। जब भी तुम लोग किसी एक चीज़ के बारे में, जिसे तुम प्रेम करते हो, उत्सुकता और जुनून से भर जाते हो, तो यह तब होता है, जब तुम मेरा अनुसरण करते हो, यहाँ तक कि जब तुम मेरे वचनों को सुन रहे होते हो। इसलिए मैं कहता हूँ कि जिस वफादारी की माँग मैं तुमसे करता हूँ, उसे तुम अपने "पालतुओं" के प्रति वफादार होने और उन्हें प्रसन्न करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हो। हालाँकि तुम लोग मेरे लिए एक-दो चीज़ों का बलिदान करते हो, पर वह तुम्हारे सर्वस्व का प्रतिनिधित्व नहीं करता, और यह नहीं दर्शाता कि वह मैं हूँ, जिसके प्रति तुम सचमुच वफादार हो। तुम लोग खुद को उन उपक्रमों में संलग्न कर देते हो, जिनके प्रति तुम भावुक हो : कुछ लोग अपने बेटे-बेटियों के प्रति वफादार हैं, तो बाकी लोग अपने अपने पतियों, पत्नियों, धन-संपत्ति, व्यवसाय, वरिष्ठ अधिकारियों, हैसियत या स्त्रियों को लेकर वफादार हैं। जिन चीज़ों के प्रति तुम लोग वफादार होते हो, उनसे तुम कभी ऊबते या नाराज़ नहीं होते; उलटे तुम उन चीज़ों को बड़ी मात्रा और बेहतर गुणवत्ता में पाने के लिए और अधिक लालायित हो जाते हो, और तुम कभी उनके लिए इनकार नहीं करते। मैं और मेरे वचन हमेशा उन चीज़ों के पीछे धकेल दिए जाते हैं, जिनके प्रति तुम भावुक होते हो। और तुम्हारे पास उन्हें गिनती में आखिरी स्थान पर रखने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचता। यहाँ तक कि कुछ लोग इस आखिरी स्थान को भी अपनी वफादारी की उन चीज़ों के लिए छोड़ देते हैं, जिन्हें अभी खोजना भी बाकी है। उनके दिलों में मेरा मामूली-सा भी निशान नहीं मिलता। तुम लोग सोच सकते हो कि मैं तुमसे बहुत ज्यादा अपेक्षा रखता हूँ या तुम पर गलत तरीके से आरोप लगा रहा हूँ—लेकिन क्या तुमने कभी इस तथ्य पर ध्यान दिया है कि जब तुम खुशी-खुशी अपने परिवार के साथ समय बिता रहे होते हो, तो तुम कभी भी मेरे प्रति वफादार नहीं रहते? ऐसे समय में, क्या तुम्हें इससे तकलीफ नहीं होती? जब तुम्हारा दिल ख़ुशी से भर जाता है, और तुम अपनी मेहनत के लिए पुरस्कृत होते हो, तब क्या तुम खुद को पर्याप्त सत्य की आपूर्ति न करने पर निराश महसूस नहीं करते है? मेरा अनुमोदन प्राप्त न करने पर तुम लोग कब रोए हो? तुम लोग अपने बेटे-बेटियों के लिए अपने दिमाग को कष्ट देते हो और बहुत तकलीफ उठाते हो, फिर भी तुम संतुष्ट नहीं होते; फिर भी तुम मानते हो कि तुमने उनके लिए ज्यादा मेहनत नहीं की है, कि तुमने उनके लिए हर वह चीज़ नहीं की है, जो तुम कर सकते थे थे, जबकि मेरे लिए तुम हमेशा से असावधान और लापरवाह रहे हो; मैं केवल तुम्हारी यादों में रहता हूँ, तुम्हारे दिलों में नहीं। मेरा प्रेम और कोशिशें तुम लोगों के द्वारा कभी महसूस नहीं की जातीं और तुमने उनकी कभी कोई कद्र नहीं की। तुम सिर्फ मामूली सोच-विचार में ही लगे रहते हो, और समझते हो कि यह काफी होगा। यह वह वफादारी नहीं है, जिसकी मैंने लंबे समय से कामना की है, बल्कि वह है, जो लंबे समय से मेरे लिए घृणास्पद है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम किसके प्रति वफादार हो?' से उद्धृत

355. अगर मैं अभी तुम लोगों के सामने कुछ पैसे रखूँ और तुम्हें चुनने की आजादी दूँ—और अगर मैं तुम्हारी पसंद के लिए तुम्हारी निंदा न करूँ—तो तुममें से ज्यादातर लोग पैसे का चुनाव करेंगे और सत्य को छोड़ देंगे। तुममें से बेहतर वे होंगे, जो पैसे को छोड़ देंगे और अनिच्छा से सत्य को चुन लेंगे, जबकि इन दोनों के बीच वाले एक हाथ से पैसे को पकड़ लेंगे और दूसरे हाथ से सत्य को। इस तरह तुम्हारा असली रंग क्या स्वत: प्रकट नहीं हो जाता? सत्य और ऐसी किसी अन्य चीज़ के बीच, जिसके प्रति तुम वफादार हो, चुनाव करते समय तुम सभी ऐसा ही निर्णय लोगे, और तुम्हारा रवैया ऐसा ही रहेगा। क्या ऐसा नहीं है? क्या तुम लोगों में बहुतेरे ऐसे नहीं हैं, जो सही और ग़लत के बीच में झूलते हैं? सकारात्मक और नकारात्मक, काले और सफेद के बीच प्रतियोगिता में, तुम लोग निश्चित तौर पर अपने उन चुनावों से परिचित हो, जो तुमने परिवार और परमेश्वर, संतान और परमेश्वर, शांति और विघटन, अमीरी और ग़रीबी, हैसियत और मामूलियत, समर्थन दिए जाने और दरकिनार किए जाने इत्यादि के बीच किए हैं। शांतिपूर्ण परिवार और टूटे हुए परिवार के बीच, तुमने पहले को चुना, और ऐसा तुमने बिना किसी संकोच के किया; धन-संपत्ति और कर्तव्य के बीच, तुमने फिर से पहले को चुना, यहाँ तक कि तुममें किनारे पर वापस लौटने की इच्छा[क] भी नहीं रही; विलासिता और निर्धनता के बीच, तुमने पहले को चुना; अपने बेटों, बेटियों, पत्नियों और पतियों तथा मेरे बीच, तुमने पहले को चुना; और धारणा और सत्य के बीच, तुमने एक बार फिर पहले को चुना। तुम लोगों के दुष्कर्मों को देखते हुए मेरा विश्वास ही तुम पर से उठ गया है। मुझे बहुत आश्चर्य होता है कि तुम्हारा हृदय कोमल होने का इतना प्रतिरोध करता है। सालों के अथक प्रेम और प्रयास से मुझे स्पष्टत: केवल तुम्हारे परित्याग और निराशा से अधिक कुछ नहीं मिला, लेकिन तुम लोगों के प्रति मेरी आशाएँ हर गुज़रते दिन के साथ बढ़ती ही जाती हैं, क्योंकि मेरा दिन पूरी तरह से सबके सामने खुला रखा है। फिर भी तुम लोग लगातार अँधेरी और बुरी चीज़ों की तलाश में रहते हो, और उन पर से अपनी पकड़ ढीली छोड़ने से इनकार करते हो। तो फिर तुम्हारा परिणाम क्या होगा? क्या तुम लोगों ने कभी इस पर सावधानी से विचार किया है? अगर तुम लोगों को फिर से चुनाव करने को कहा जाए, तो तुम्हारा क्या रुख रहेगा? क्या अब भी तुम लोग पहले को ही चुनोगे? क्या अब भी तुम मुझे निराशा और भयंकर कष्ट ही पहुँचाओगे? क्या अभी भी तुम्हारे हृदयों में थोड़ा-सा भी उत्साह होगा? क्या तुम अब भी इस बात से अनभिज्ञ रहोगे कि मेरे हृदय को सुकून पहुँचाने के लिए तुम्हें क्या करना चाहिए?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम किसके प्रति वफादार हो?' से उद्धृत

356. जब भी गंतव्य का जिक्र होता है, तुम लोग उसे विशेष गंभीरता से लेते हो; इतना ही नहीं, यह एक ऐसी चीज़ है, जिसके बारे में तुम सभी विशेष रूप से संवेदनशील हो। कुछ लोग तो एक अच्छा गंतव्य पाने के लिए परमेश्वर के सामने दंडवत करते हुए अपने सिर जमीन से लगने का भी इंतज़ार नहीं करते। मैं तुम्हारी उत्सुकता समझता हूँ, जिसे शब्दों में व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है। यह इससे अधिक कुछ नहीं है कि तुम लोग अपनी देह विपत्ति में नहीं डालना चाहते, और भविष्य में चिरस्थायी सजा तो बिलकुल भी नहीं भुगतना चाहते। तुम लोग केवल स्वयं को थोड़ा और उन्मुक्त, थोड़ा और आसान जीवन जीने देने की आशा करते हो। इसलिए जब भी गंतव्य का जिक्र होता है, तुम लोग खास तौर से बेचैन महसूस करते हो और अत्यधिक डर जाते हो कि अगर तुम लोग पर्याप्त सतर्क नहीं रहे, तो तुम परमेश्वर को नाराज़ कर सकते हो और इस प्रकार उस दंड के भागी हो सकते हो, जिसके तुम पात्र हो। अपने गंतव्य की खातिर तुम लोग समझौते करने से भी नहीं हिचकते हो, यहाँ तक कि तुममें से कई लोग, जो कभी कुटिल और चंचल थे, अचानक विशेष रूप से विनम्र और ईमानदार बन गए हैं; तुम्हारी ईमानदारी का दिखावा लोगों की मज्जा तक को कँपा देता है। फिर भी, तुम सभी के पास "ईमानदार" दिल हैं, और तुम लोगों ने लगातार बिना कोई बात छिपाए अपने दिलों के राज़ मेरे सामने खोले हैं, चाहे वह शिकायत हो, धोखा हो या भक्ति हो। कुल मिलाकर तुम लोगों ने अपनी आंतरिक प्रकृति के गहनतम कोनों में पड़ी चीज़ें मेरे सामने खुलकर "कबूल" की हैं। बेशक, मैंने कभी इन चीज़ों पर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि वे सब मेरे लिए बहुत आम हो गई हैं। लेकिन अपने अंतिम गंतव्य के लिए तुम लोग परमेश्वर का अनुमोदन पाने के लिए अपने सिर के बाल का एक रेशा भी गँवाने के बजाय आग के दरिया में कूद जाओगे। ऐसा नहीं है कि मैं तुम लोगों के साथ बहुत कट्टर हो रहा हूँ; बात यह है कि मैं जो कुछ भी करता हूँ, उसके रूबरू आने के लिए तुम्हारे हृदय के भक्ति-भाव में बहुत कमी है। तुम लोग शायद न समझ पाओ कि मैंने अभी क्या कहा है, इसलिए मैं तुम्हें एक आसान स्पष्टीकरण देता हूँ : तुम लोगों को सत्य और जीवन की ज़रूरत नहीं है; न ही तुम्हें अपने आचरण के सिद्धांतों की ज़रूरत है, मेरे श्रमसाध्य कार्य की तो निश्चित रूप से ज़रुरत नहीं है। इसके बजाय तुम लोगों को उन चीज़ों की ज़रूरत है, जो तुम्हारी देह से जुड़ी हैं—धन-संपत्ति, हैसियत, परिवार, विवाह आदि। तुम लोग मेरे वचनों और कार्य को पूरी तरह से ख़ारिज करते हो, इसलिए मैं तुम्हारे विश्वास को एक शब्द में समेट सकता हूँ : उथला। जिन चीज़ों के प्रति तुम लोग पूर्णत: समर्पित हो, उन्हें हासिल करने के लिए तुम किसी भी हद तक जा सकते हो, लेकिन मैंने पाया है कि तुम लोग परमेश्वर में अपने विश्वास से संबंधित मामलों में ऐसा नहीं करते। इसके बजाय, तुम सापेक्ष रूप से समर्पित हो, सापेक्ष रूप से ईमानदार हो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि जिनके दिल में पूर्ण निष्ठा का अभाव है, वे परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में असफल हैं। ध्यान से सोचो—क्या तुम लोगों के बीच कई लोग असफल हैं?

तुम लोगों को ज्ञात होना चाहिए कि परमेश्वर पर विश्वास में सफलता लोगों के अपने कार्यों का परिणाम होती है; जब लोग सफल नहीं होते, बल्कि असफल होते हैं, तो वह भी उनके अपने कार्यों के कारण ही होता है, उसमें किसी अन्य कारक की कोई भूमिका नहीं होती। मेरा मानना है कि तुम लोग ऐसी चीज़ प्राप्त करने के लिए सब-कुछ करोगे, जो परमेश्वर में विश्वास करने से ज्यादा मुश्किल होती है और जिसे पाने के लिए उससे ज्यादा कष्ट उठाने पड़ते हैं, और उसे तुम बड़ी गंभीरता से लोगे, यहाँ तक कि तुम उसमें कोई गलती बरदाश्त करने के लिए भी तैयार नहीं होगे; इस तरह के प्रयास तुम लोग अपने जीवन में लगाते हो। यहाँ तक कि तुम लोग उन परिस्थितियों में भी मेरी देह को धोखा दे सकते हो, जिनमें तुम अपने परिवार के किसी सदस्य को धोखा नहीं दोगे। यही तुम लोगों का अटल व्यवहार और तुम लोगों के जीने का सिद्धांत है। क्या तुम लोग अभी भी अपने गंतव्य की खातिर मुझे धोखा देने के लिए एक झूठा मुखौटा नहीं लगा रहे हो, ताकि तुम्हारा गंतव्य पूरी तरह से खूबसूरत हो जाए और तुम जो चाहते हो, वह सब हो? मुझे ज्ञात है कि तुम लोगों की भक्ति वैसी ही अस्थायी है, जैसी अस्थायी तुम लोगों की ईमानदारी है। क्या तुम लोगों का संकल्प और वह कीमत जो तुम लोग चुकाते हो, भविष्य के बजाय वर्तमान क्षण के लिए नहीं हैं? तुम लोग केवल एक खूबसूरत गंतव्य सुरक्षित कर लेने के लिए एक अंतिम प्रयास करना चाहते हो, जिसका एकमात्र उद्देश्य सौदेबाज़ी है। तुम यह प्रयास सत्य के ऋणी होने से बचने के लिए नहीं करते, और मुझे उस कीमत का भुगतान करने के लिए तो बिलकुल भी नहीं, जो मैंने अदा की है। संक्षेप में, तुम केवल जो चाहते हो, उसे प्राप्त करने के लिए अपनी चतुर चालें चलने के इच्छुक हो, लेकिन उसके लिए खुला संघर्ष करने के लिए तैयार नहीं हो। क्या यही तुम लोगों की दिली ख्वाहिश नहीं है? तुम लोगों को अपने को छिपाना नहीं चाहिए, न ही अपने गंतव्य को लेकर इतनी माथापच्ची करनी चाहिए कि न तो तुम खा सको, न सो सको। क्या यह सच नहीं है कि अंत में तुम्हारा परिणाम पहले ही निर्धारित हो चुका होगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'गंतव्य के बारे में' से उद्धृत

357. प्रतिदिन प्रत्येक व्यक्ति के कर्म और विचार उस एक की आँखों के द्वारा देखे जाते हैं, और साथ ही, वे अपने कल की तैयारी कर रहे होते हैं। यही वह मार्ग है, जिस पर सभी प्राणियों को चलना चाहिए; यही वह मार्ग है, जिसे मैंने सभी के लिए पूर्वनिर्धारित कर दिया है, और कोई इससे बच या छूट नहीं सकता। मैंने अनगिनत वचन कहे हैं और साथ ही मैंने अनगिनत कार्य किए हैं। प्रतिदिन मैं प्रत्येक मनुष्य को स्वाभाविक रूप से वह सब करते हुए देखता हूँ, जो उसे अपने अंतर्निहित स्वभाव और अपनी प्रकृति की घटनाओं के अनुसार करना है। अनजाने में अनेक लोगों ने पहले ही "सही मार्ग" पर चलना आरंभ कर दिया है, जिसे मैंने विभिन्न प्रकार के लोगों के लिए निर्धारित किया है। इन विभिन्न प्रकार के लोगों को मैंने लंबे समय से विभिन्न वातावरणों में रखा है और अपने-अपने स्थान पर प्रत्येक ने अपनी अंतर्निहित विशेषताओं को व्यक्त किया है। उन्हें कोई बाँध नहीं सकता और कोई उन्हें बहका नहीं सकता। वे पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं और वे जो अभिव्यक्त करते हैं, वह स्वभाविक रूप से अभिव्यक्त होता है। केवल एक चीज़ उन्हें नियंत्रण में रखती है : मेरे वचन। इस तरह कुछ लोग मेरे वचन अनमने भाव से पढ़ते हैं, कभी उनका अभ्यास नहीं करते, केवल मृत्यु से बचने के लिए ऐसा करते हैं; जबकि कुछ लोगों के लिए मेरे वचनों के मार्गदर्शन और आपूर्ति के बिना दिन गुज़ारना कठिन होता है, और इसलिए वे स्वभाविक तौर पर मेरे वचनों को हर समय थामे रहते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता है, वे मनुष्य के जीवन के रहस्य, मानव-जाति के गंतव्य और मनुष्य होने के महत्त्व की खोज करते जाते हैं। मानव-जाति मेरे वचनों की उपस्थिति में इससे अलग कुछ नहीं है और मैं बस चीज़ों को उनके अपने हिसाब से होने देता हूँ। मैं ऐसा कुछ नहीं करता, जो लोगों को मेरे वचनों को अपने अस्तित्व का आधार बनाने के लिए बाध्य करे। तो जिन लोगों में कभी विवेक नहीं रहा और जिनके अस्तित्व का कभी कोई मूल्य नहीं रहा, वे बेधड़क मेरे वचनों को दरकिनार कर देते हैं और चुपचाप चीज़ों को घटित होते देखने के बाद जो चाहते हैं, करते हैं। वे सत्य से और उस सबसे जो मुझसे आता है, उकताने लगते हैं। इतना ही नहीं, वे मेरे घर में रहने से भी उकता जाते हैं। अपने गंतव्य की खातिर, और सजा से बचने के लिए ये लोग कुछ समय के लिए मेरे घर में रहते हैं, भले ही सेवा प्रदान कर रहे हों। परंतु उनके इरादे और कार्य कभी नहीं बदलते। इससे आशीष पाने की उनकी इच्छा और एक बार राज्य में प्रवेश करने और उसके बाद वहाँ हमेशा के लिए रहने—यहाँ तक कि अनंत स्वर्ग में प्रवेश करने की उनकी इच्छा बढ़ जाती है। जितना अधिक वे मेरे दिन के जल्दी आने की लालसा करते हैं, उतना ही अधिक वे महसूस करते हैं कि सत्य उनके मार्ग की बाधा और अड़चन बन गया है। वे हमेशा के लिए स्वर्ग के राज्य के आशीषों का आनंद उठाने हेतु राज्य में कदम रखने के लिए मुश्किल से इंतजार कर पाते हैं—सब-कुछ बिना सत्य की खोज करने या न्याय और ताड़ना स्वीकार करने, यहाँ तक कि मेरे घर में विनीत भाव से रहने और मेरी आज्ञा के अनुसार कार्य करने की जरूरत समझे बिना। ये लोग न तो सत्य की खोज करने की अपनी इच्छा पूरी करने के लिए मेरे घर में प्रवेश करते हैं, न ही मेरे प्रबंधन में सहयोग करने के लिए; उनका उद्देश्य महज उन लोगों में शामिल होने का होता है, जिन्हें आने वाले युग में नष्ट नहीं किया जाएगा। इसलिए उनके हृदय ने कभी नहीं जाना कि सत्य क्या है, या सत्य को कैसे ग्रहण किया जाए। यही कारण है कि ऐसे लोगों ने कभी सत्य का अभ्यास या अपनी भ्रष्टता की गहराई का एहसास नहीं किया, और फिर भी वे मेरे घर में हमेशा "सेवकों" के रूप में रहे हैं। वे "धैर्यपूर्वक" मेरे दिन के आने का इंतज़ार करते हैं और मेरे कार्य के तरीके से यहाँ-वहाँ उछाले जाकर भी थकते नहीं। लेकिन भले ही उनकी कोशिश कितनी भी बड़ी हो और उन्होंने उसकी कुछ भी कीमत चुकाई हो, किसी ने उन्हें सत्य के लिए कष्ट उठाते हुए या मेरी खातिर कुछ देते हुए नहीं देखा। अपने हृदय में वे उस दिन को देखने के लिए बेचैन हैं, जब मैं पुराने युग का अंत करूँगा, और इससे भी बढ़कर, वे यह जानने का इंतज़ार नहीं कर सकते कि मेरा सामर्थ्य और मेरा अधिकार कितने विशाल हैं। जिस चीज़ के लिए उन्होंने कभी शीघ्रता नहीं की, वह है खुद को बदलना और सत्य का अनुसरण करना। वे उससे प्रेम करते हैं, जिससे मैं उकता गया हूँ और उससे उकता गए हैं, जिससे मैं प्रेम करता हूँ। वे उसकी अभिलाषा करते हैं जिससे मैं नफरत करता हूँ, लेकिन उसे खोने से डरते हैं जिससे मैं घृणा करता हूँ। वे इस बुरे संसार में रहते हुए भी इससे कभी नफरत नहीं करते, फिर भी इस बात से बहुत डरते हैं कि मैं इसे नष्ट कर दूँगा। अपने परस्पर विरोधी इरादों के बीच वे इस संसार से प्यार करते हैं जिससे मैं घृणा करता हूँ, लेकिन इस बात के लिए लालायित भी रहते हैं कि मैं इस संसार को शीघ्र नष्ट कर दूँ, और इससे पहले कि वे सच्चे मार्ग से भटक जाएँ, उन्हें विनाश के कष्ट से बचा लिया जाए और अगले युग के स्वामियों के रूप में रूपांतरित कर दिया जाए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते और उस सबसे उकता गए हैं, जो मुझसे आता है। वे आशीष खोने के डर से थोड़े समय के लिए "आज्ञाकारी लोग" बन सकते हैं, लेकिन आशीष पाने के लिए उनकी उत्कंठा और नष्ट होने तथा जलती हुई आग की झील में प्रवेश करने का उनका भय कभी छिपाया नहीं जा। जैसे-जैसे मेरा दिन नज़दीक आता है, उनकी इच्छा लगातार उत्कट होती जाती है। और आपदा जितनी बड़ी होती है, उतना ही वह उन्हें असहाय बना देती है और वे यह नहीं जान पाते कि मुझे प्रसन्न करने के लिए एवं उन आशीषों को खोने से बचाने के लिए, जिनकी उन्होंने लंबे समय से लालसा की है, कहाँ से शुरुआत करें। जैसे ही मेरा हाथ अपना काम करना शुरू करता है, ये लोग एक अग्र-दल के रूप में कार्य करने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। इस डर से कि मैं उन्हें नहीं देखूँगा, वे बस सेना की सबसे आगे की टुकड़ी में आने की सोचते हैं। वे वही करते और कहते हैं, जिसे वे सही समझते हैं, और यह कभी नहीं जान पाते कि उनके क्रिया-कलाप कभी सत्य के अनुरूप नहीं रहे, और कि उनके कर्म मेरी योजनाओं में गड़बड़ी और हस्तक्षेप मात्र करते हैं। उन्होंने कड़ी मेहनत की हो सकती है, और वे कष्ट सहने के अपने इरादे और प्रयास में सच्चे हो सकते हैं, पर उनके कार्यों से मेरा कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि मैंने कभी नहीं देखा कि उनके कार्य अच्छे इरादे के साथ किए गए हैं, और उन्हें अपनी वेदी पर कुछ रखते हुए तो मैंने बहुत ही कम देखा है। इन अनेक वर्षों में मेरे सामने उन्होंने ऐसे ही कार्य किए हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम लोगों को अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए' से उद्धृत

358. मेरे कार्य के कई सालों के दौरान, मनुष्य ने काफी प्राप्त किया है और काफी त्याग किया है, मगर मैं तब भी कहता हूँ कि मनुष्य मुझ पर वास्तव में विश्वास नहीं करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य केवल अपने होठों से स्वीकार करता है कि मैं परमेश्वर हूँ जबकि मेरे द्वारा बोले गए सत्य से असहमत होता है, और उस सत्य का तो बहुत ही कम अभ्यास करता है जो मैं उससे अपेक्षा करता हूँ। कहने का अर्थ है कि मनुष्य केवल परमेश्वर के अस्तित्व को ही स्वीकार करता है, लेकिन सत्य के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता है; मनुष्य केवल परमेश्वर के अस्तित्व को ही स्वीकार करता है परन्तु जीवन के अस्तित्व को नहीं करता है, मनुष्य केवल परमेश्वर के नाम को स्वीकार करता है परन्तु उसके सार को स्वीकार नहीं करता है। अपने उत्साह के कारण, मनुष्य मेरे लिए घृणित बन गया है। क्योंकि मनुष्य मुझे धोखा देने के लिए बस कानों को अच्छे लगने वाले वचनों को कहता है, और कोई भी सच्चे हृदय से मेरी आराधना नहीं करता है। तुम लोगों की बोली में साँप का प्रलोभन है; इसके अलावा, यह चरम रूप से अहंकारी, असंदिग्ध रूप से प्रधान स्वर्गदूत की घोषणा है। इतना ही नहीं, तुम्हारे कर्म शर्मनाक स्तर तक तार-तार और फटे हुए हैं, तुम लोगों की असंयमित अभिलाषाएँ और लोलुप अभिप्राय सुनने में अपमानजनक हैं। तुम सब लोग मेरे घर में पतंगे, घृणा के साथ छोड़ी जाने वाली वस्तुएँ बन गए हो। क्योंकि तुम लोगों में से कोई भी सत्य का प्रेमी नहीं है, बल्कि ऐसे मनुष्य हो जो आशीषों के, स्वर्ग में आरोहण करने के, और मसीह के पृथ्वी पर अपनी सामर्थ्य का उपयोग करने के शानदार दर्शन को देखने के इच्छुक हैं। क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि कोई तुम लोगों के समान व्यक्ति, इतनी गहराई तक भ्रष्ट कोई मनुष्य, और जो बिल्कुल भी नहीं जानता है कि परमेश्वर क्या है, कैसे परमेश्वर का अनुसरण करने के योग्य हो सकता है? तुम लोग स्वर्ग में कैसे आरोहण कर सकते हो? तुम लोग कैसे महिमा को देखने के योग्य बन सकते हो, जो अपने वैभव में अभूतपूर्व है। तुम लोगों के मुँह छल और गंदगी, विश्वासघात और अहंकार के वचनों से भरे हैं। तुम लोगों ने मेरे प्रति कभी भी ईमानदारी के वचन नहीं कहे हैं, मेरे वचनों का अनुभव करने पर कोई पवित्र वचन, समर्पण करने के कोई वचन नहीं कहे हैं। अंततः तुम लोगों का यह विश्वास किसके जैसा है? तुम लोगों के हृदयों में अभिलाषाएँ और सम्पत्ति भरी हुई है; तुम्हारे दिमागों में भौतिक चीजें भरी हुई हैं। हर दिन, तुम लोग गणना करते हो कि मुझसे कोई चीज़ कैसे प्राप्त करो, तुमने मुझसे कितनी सम्पत्ति और कितनी भौतिक वस्तुएँ प्राप्त कर ली हैं। हर दिन, तुम लोग और भी अधिक आशीषें अपने ऊपर बरसने का इंतज़ार करते हो ताकि तुम लोग और भी अधिक तथा और भी बेहतर तरीके से उन चीज़ों का आनन्द ले सको जिनका आनंद लिया जा सकता है। प्रत्येक क्षण तुम लोगों के विचारों में जो रहता है वह मैं नहीं हूँ, न ही वह सत्य है जो मुझसे आता है, बल्कि तुम लोगों में पति (पत्नी), बेटे, बेटियाँ, या तुम क्या खाते या पहनते हो, और कैसे तुम लोगों का आनंद और भी अधिक बेहतर हो सकता है, यही विचार आता है। यहाँ तक कि जब तुम लोग अपने पेट को ऊपर तक भर लेते हो, तब क्या तुम लोग एक लाश से जरा सा ही अधिक नहीं हो? यहाँ तक कि जब तुम लोग अपने बाहरी स्वरूप को सजा लेते हो, क्या तुम लोग तब भी एक चलती-फिरती लाश नहीं हो जिसमें कोई जीवन नहीं है? तुम लोग तब तक अपने पेट के लिए कठिन परिश्रम करते हो जब तक कि तुम लोगों के सिर के बाल भूरे और सफेद नहीं हो जाते हैं, फिर भी तुममें से कोई भी मेरे कार्य के लिए एक बाल तक बलिदान नहीं करता है। तुम लोग अपनी देह के वास्ते, और अपने बेटे-बेटियों के लिए लगातार बहुत सक्रिय रहते हो, अपने शरीर पर भार डाल रहे हो और अपने मस्तिष्क को कष्ट दे रहे हो, फिर भी तुम में से कोई एक भी मेरी इच्छा के लिए चिंता या परवाह नहीं दिखाता है। वह क्या है जो तुम अब भी मुझ से प्राप्त करने की आशा रखते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'बुलाए गए लोग बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं' से उद्धृत

359. मैंने बहुत सारे वचन कहे हैं, और अपनी इच्छा और अपने स्वभाव को भी व्यक्त किया है, फिर भी लोग अभी भी मुझे जानने और मुझ पर विश्वास करने में अक्षम हैं। या यह कहा जा सकता है कि लोग अभी भी मेरी आज्ञा का पालन करने में अक्षम हैं। जो बाइबल में जीते हैं, जो व्यवस्था में जीते हैं, जो सलीब पर जीते हैं, जो सिद्धांत के अनुसार जीते हैं, जो उस कार्य के मध्य जीते हैं जिसे मैं आज करता हूँ—उनमें से कौन मेरे अनुकूल है? तुम लोग सिर्फ़ आशीष और पुरस्कार पाने के बारे में ही सोचते हो, पर कभी यह नहीं सोचा कि मेरे अनुकूल वास्तव में कैसे बनो, या अपने को मेरे विरुद्ध होने से कैसे रोको। मैं तुम लोगों से बहुत निराश हूँ, क्योंकि मैंने तुम लोगों को बहुत अधिक दिया है, जबकि मैंने तुम लोगों से बहुत कम हासिल किया है। तुम लोगों का छल, तुम लोगों का घमंड, तुम लोगों का लालच, तुम लोगों की फालतू इच्छाएँ, तुम लोगों का धोखा, तुम लोगों की अवज्ञा—इनमें से कौन-सी चीज़ मेरी नज़र से बच सकती है? तुम लोग मेरे प्रति असावधान हो, मुझे मूर्ख बनाते हो, मेरा अपमान करते हो, मुझे फुसलाते हो, मुझसे ज़बरन वसूली करते हो, बलिदानों के लिए मुझसे ज़बरदस्ती करते हो—ऐसे दुष्कर्म मेरी सज़ा से कैसे बचकर निकल सकते हैं? ये सब दुष्कर्म मेरे साथ तुम लोगों की शत्रुता का प्रमाण हैं, और तुम लोगों की मेरे साथ अनुकूलता न होने का प्रमाण हैं। तुम लोगों में से प्रत्येक अपने को मेरे साथ बहुत अनुकूल समझता है, परंतु यदि ऐसा होता, तो फिर यह अकाट्य प्रमाण किस पर लागू होगा? तुम लोगों को लगता है कि तुम्हारे अंदर मेरे प्रति बहुत ईमानदारी और निष्ठा है। तुम लोग सोचते हो कि तुम बहुत ही रहमदिल, बहुत ही करुणामय हो, और तुमने मेरे प्रति बहुत समर्पण किया है। तुम लोग सोचते हो कि तुम लोगों ने मेरे लिए पर्याप्त से अधिक किया है। लेकिन क्या तुम लोगों ने कभी इसे अपने कामों से मिलाकर देखा है? मैं कहता हूँ, तुम लोग बहुत ही घमंड़ी, बहुत ही लालची, बहुत ही लापरवाह हो; और जिन चालबाज़ियों से तुम मुझे मूर्ख बनाते हो, वे बहुत शातिर हैं, और तुम्हारे इरादे और तरीके बहुत घृणित हैं। तुम लोगों की वफ़ादारी बहुत ही थोड़ी है, तुम्हारी ईमानदारी बहुत ही कम है, और तुम्हारी अंतरात्मा तो और अधिक क्षुद्र है। तुम लोगों के हृदय में बहुत ही अधिक द्वेष है, और तुम्हारे द्वेष से कोई नहीं बचा है, यहाँ तक कि मैं भी नहीं। तुम लोग अपने बच्चों या अपने पति या आत्म-रक्षा के लिए मुझे बाहर निकाल देते हो। मेरी चिंता करने के बजाय तुम लोग अपने परिवार, अपने बच्चों, अपनी हैसियत, अपने भविष्य और अपनी संतुष्टि की चिंता करते हो। तुम लोगों ने बातचीत या कार्य करते समय कभी मेरे बारे में सोचा है? ठंड के दिनों में तुम लोगों के विचार अपने बच्चों, अपने पति, अपनी पत्नी या अपने माता-पिता की तरफ मुड़ जाते हैं। गर्मी के दिनों में भी तुम सबके विचारों में मेरे लिए कोई स्थान नहीं होता। जब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो, तब तुम अपने हितों, अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा, अपने परिवार के सदस्यों के बारे में ही सोच रहे होते हो। तुमने कब मेरे लिए क्या किया है? तुमने कब मेरे बारे में सोचा है? तुमने कब अपने आप को, हर कीमत पर, मेरे लिए और मेरे कार्य के लिए समर्पित किया है? मेरे साथ तुम्हारी अनुकूलता का प्रमाण कहाँ है? मेरे साथ तुम्हारी वफ़ादारी की वास्तविकता कहाँ है? मेरे साथ तुम्हारी आज्ञाकारिता की वास्तविकता कहाँ है? कब तुम्हारे इरादे केवल मेरे आशीष पाने के लिए नहीं रहे हैं? तुम लोग मुझे मूर्ख बनाते और धोखा देते हो, तुम लोग सत्य के साथ खेलते हो, तुम सत्य के अस्तित्व को छिपाते हो, और सत्य के सार को धोखा देते हो। इस तरह मेरे ख़िलाफ़ जाने से भविष्य में क्या चीज़ तुम लोगों की प्रतीक्षा कर रही है? तुम लोग केवल एक अज्ञात परमेश्वर के साथ अनुकूलता की खोज करते हो, और मात्र एक अज्ञात विश्वास की खोज करते हो, लेकिन तुम मसीह के साथ अनुकूल नहीं हो। क्या तुम्हारी दुष्टता के लिए भी वही प्रतिफल नहीं मिलेगा, जो दुष्ट को मिलता है? उस समय तुम लोगों को एहसास होगा कि जो कोई मसीह के अनुकूल नहीं होता, वह कोप के दिन से बच नहीं सकता, और तुम लोगों को पता चलेगा कि जो मसीह के शत्रु हैं, उन्हें कैसा प्रतिफल दिया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें मसीह के साथ अनुकूलता का तरीका खोजना चाहिए' से उद्धृत

360. तुम लोगों की खोज में, तुम लोगों की बहुत सी व्यक्तिगत अवधारणाएँ, आशाएँ और भविष्य होते हैं। वर्तमान कार्य तुम लोगों की हैसियत की अभिलाषा और तुम्हारी अनावश्यक अभिलाषाओं से निपटने के लिए है। आशाएँ, हैसियत, और अवधारणाएँ सभी शैतानी स्वभाव के उत्कृष्ट प्रतिनिधित्व हैं। लोगों के हृदयों में ये चीजें विद्यमान हैं इसका कारण पूरी तरह से यह है कि शैतान का विष हमेशा लोगों के विचारों को दूषित कर रहा है, और लोग शैतान के इन प्रलोभनों से पीछा छुड़ाने में हमेशा असमर्थ हैं। वे पाप के बीच में रह रहे हैं, मगर इसे पाप होना नहीं मानते हैं, और वे अभी भी सोचते हैं: "हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे अवश्य हमें आशीष प्रदान करने चाहिए और हमारे लिए सब कुछ उचित प्रकार से व्यवस्थित करना चाहिए। हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए हमें दूसरों से श्रेष्ठतर अवश्य होना चाहिए, और हमारे पास किसी और की तुलना में अधिक हैसियत और अधिक भविष्य अवश्य होना चाहिए। चूँकि हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे हमें असीम आशीषें अवश्य देनी चाहिए। अन्यथा, इसे परमेश्वर पर विश्वास नहीं कहा जाएगा।" कई सालों से, जिन विचारों पर लोगों ने अपने अस्तित्व के लिए भरोसा रखा था, वे उनके हृदयों को इस स्थिति तक दूषित कर रहे हैं कि वे विश्वासघाती, डरपोक और नीच हो गए हैं। न केवल उनमें इच्छा शक्ति और संकल्प का अभाव है, बल्कि वे लालची, अभिमानी और स्वेच्छाचारी भी बन गए हैं। उनमें ऐसे किसी भी संकल्प का सर्वथा अभाव है जो स्वयं को ऊँचा उठाता हो, और इससे भी ज्यादा, उनमें इन अंधेरे प्रभावों की बाध्यताओं से पीछा छुड़ाने की लेश मात्र भी हिम्मत नहीं है। लोगों के विचार और जीवन इतने सड़े हुए हैं कि परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में उनके दृष्टिकोण अभी भी असहनीय रूप से वीभत्स हैं, और यहाँ तक कि जब लोग परमेश्वर में विश्वास के बारे में अपने दृष्टिकोण की बात करते हैं तो इसे सुनना मात्र ही असहनीय है। सभी लोग कायर, अक्षम, नीच, और दुर्बल हैं। वे अंधेरे की शक्तियों के लिए गुस्सा महसूस नहीं करते हैं, और वे प्रकाश और सत्य के लिए प्यार महसूस नहीं करते हैं; इसके बजाय, वे उन्हें बाहर निकालने का अपना अधिकतम प्रयास करते हैं। क्या तुम लोगों के वर्तमान विचार और दृष्टिकोण ठीक इसी तरह के नहीं हैं? "चूँकि मैं परमेश्वर पर विश्वास करता हूँ कि मुझ पर केवल आशीषों की वर्षा होनी चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मेरी हैसियत कभी नहीं गिरती है और कि यह अविश्वासियों की तुलना में अधिक रहनी चाहिए।" तुम लोग केवल एक या दो वर्षों से ही इस तरह के दृष्टिकोण को अपने भीतर प्रश्रय नहीं दे रहे हो; बल्कि कई वर्षों से दे रहे हो। तुम लोगों की लेन-देन संबंधी मानसिकता अति विकसित है। यद्यपि आज तुम लोग इस चरण तक पहुँच गए हो, तब भी तुम लोगों ने हैसियत को जाने नहीं दिया है, बल्कि इसके बारे में पूछताछ करने के लिए लगातार संघर्ष करते हो, और इस पर रोज ध्यान देते हो, एक गहरे डर के साथ कि एक दिन तुम लोगों की हैसियत खो जाएगी और तुम लोगों का नाम बर्बाद हो जाएगा। लोगों ने सहुलियत की अपनी अभिलाषा की कभी भी उपेक्षा नहीं की है। ... जितना अधिक तू इस तरह से तलाश करेगी उतना ही कम तू पाएगी। हैसियत के लिए किसी व्यक्ति की अभिलाषा जितनी अधिक होगी, उतनी ही गंभीरता से उसके साथ निपटा जाना होगा उतने ही अधिक बड़े शुद्धिकरण से उसे अवश्य गुजरना होगा। इस तरह के लोग व्यर्थ हैं! उसके द्वारा इन चीज़ों को पूरे तरह से छोड़ दिए जाने के उद्देश से उसके साथ पर्याप्त रूप से निपटा और उसका ठीक से न्याय अवश्य किया जाना चाहिए। यदि तुम लोग अंत तक इस तरह से अनुकरण करते हो, तो तुम लोग कुछ भी नहीं पाओगे। जो लोग जीवन का अनुकरण नहीं करते हैं वे रूपान्तरित नहीं किए जा सकते हैं; जिन्हें सच्चाई की प्यास नहीं है वे सच्चाई को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। तू व्यक्तिगत रूपान्तरण का अनुकरण करने और प्रवेश पर ध्यान केन्द्रित नहीं करती है; बल्कि इसके बजाय तू हमेशा उन अनावश्यक अभिलाषाओं और उन चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करती है जो परमेश्वर के लिए तेरे प्रेम को बाधित करती हैं और तुझे उसके करीब आने से रोकती हैं। क्या वे चीजें तुझे रूपान्तरित कर सकती हैं? क्या वे तुझे राज्य में ला सकती हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम एक विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो?' से उद्धृत

361. मनुष्य प्रकाश के बीच जीता है, फिर भी वह प्रकाश की बहुमूल्यता से अनभिज्ञ है। वह प्रकाश के सार तथा प्रकाश के स्रोत से, और इसके अतिरिक्त, वह इस बात से अनजान है कि यह किस का है। जब मैंने मनुष्य के बीच प्रकाश प्रदान किया, तब मैंने तुरन्त ही मनुष्यों के बीच की स्थितियों का निरीक्षण किया कि प्रकाश के कारण सभी लोग बदल रहे हैं और पनप रहे हैं और उन्होंने अन्धकार को छोड़ दिया है। विश्व के हर कोनों पर मैं नज़र डालता हूँ और देखता हूँ कि पर्वत कोहरे में समा गए हैं, यह कि समुद्र शीत के बीच जम गए हैं, और यह कि, प्रकाश के आगमन की वजह से, लोग पूरब की ओर देखते हैं ताकि शायद उन्हें कुछ अधिक मूल्यवान मिल जाए—फिर भी मनुष्य कोहरे के बीच एक सही दिशा को समझने में अक्षम रहता है। क्योंकि सारा संसार कोहरे से आच्छादित है, इसलिए जब मैं बादलों के बीच में से देखता हूँ, तो मनुष्य के द्वारा मेरा अस्तित्व कभी नहीं खोजा जाता हैः मनुष्य पृथ्वी पर किसी चीज की तलाश कर रहा है, वह भोजन की तलाश में घूमता-फिरता हुआ प्रतीत होता है, ऐसा प्रतीत होता है कि वह मेरे आगमन का इन्तज़ार करता है—फिर भी वह मेरे दिन को नहीं जानता है और वह अक्सर पूर्व में केवल प्रकाश की झिलमिलाहट को ही देख सकता है। सभी लोगों के बीच, मैं उन लोगों को खोजता हूँ जो सचमुच में मेरे अपने हृदय के अनुकूल हैं। मैं सभी लोगों के बीच चलता-फिरता हूँ और सभी लोगों के बीच रहता हूँ, लेकिन मनुष्य पृथ्वी पर सुरक्षित और स्वस्थ है, और इसलिए ऐसा कोई नहीं जो मेरे हृदय के अनुसार हो। लोग नहीं जानते हैं कि मेरी इच्छा का ध्यान कैसे रखें, वे मेरे कार्यों को नहीं देख सकते हैं, और वे प्रकाश के बीच हरकत नहीं कर सकते हैं और उन्हें प्रकाश के द्वारा चमकाया नहीं जा सकता है। यद्यपि मनुष्य ने हमेशा से मेरे वचनों को सँजोकर रखा है, फिर भी वह शैतान धोखेबाज योजनाओं की सही प्रकृति का पता लगाने में असमर्थ है; क्योंकि मनुष्य का कद बहुत छोटा है, वह अपने हृदय की इच्छाओं के अनुसार कार्य करने में असमर्थ है। मनुष्य ने कभी भी मुझसे ईमानदारी से प्रेम नहीं किया है। जब मैं उसकी बड़ाई करता हूँ, तो वह अपने आपको अयोग्य महसूस करता है, किन्तु इससे वह मुझे संतुष्ट करने की कोशिश नहीं करता है। वह मात्र उस "स्थान" को पकड़े रहता है जो मैंने उसके हाथों में दिया है और वह उसकी बारीकी से जाँच करता है; मेरी मनोरमता के प्रति असंवेदनशील होते हुए, वह इसके बजाए अपने स्थान की आशीषों को ठूँसने में लगा रहता है। क्या यह मनुष्य की कमी नहीं है? जब पहाड़ सरकते हैं, तो क्या वे तुम्हारे स्थान के वास्ते एक चक्कर लगा सकते हैं? जब समुद्र बहते हैं, तो क्या वे मनुष्य के स्थान के सामने रूक सकते हैं? क्या मनुष्य के स्थान के द्वारा आकाश और पृथ्वी को पलटा जा सकता है? मैं किसी समय मनुष्य के प्रति दयावान था, और बार-बार दयावान था—फिर भी कोई भी इसे मन में नहीं लाता है या इसे सँजोकर नहीं रखता है, उन्होंने मात्र एक कहानी के रूप में इसे सुना, या एक उपन्यास के रूप में इसे पढ़ा है। क्या मेरे वचन वास्तव में मनुष्य के हृदय को स्पर्श नहीं करते हैं? क्या मेरे कथनों का वास्तव में कोई प्रभाव नहीं पड़ता है? क्या ऐसा हो सकता है कि कोई भी मेरे अस्तित्व में विश्वास नहीं करता है? मनुष्य अपने आप से प्रेम नहीं करता है; इसके बजाए, वह मुझ पर आक्रमण करने के लिए शैतान के साथ मिल जाता है और शैतान को एक "परिसम्पत्ति" के रूप में उपयोग करता है जिसके द्वारा मेरी सेवा की जाए। मैं शैतान की सभी धोखेबाज़ योजनाओं को भेद दूँगा और पृथ्वी से लोगों को शैतान के धोखों को स्वीकार करने से रोक दूँगा, ताकि वे शैतान के अस्तित्व की वजह से मेरा विरोध न करें।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 22' से उद्धृत

362. मेरी पीठ पीछे बहुत-से लोग हैसियत के आशीष की अभिलाषा करते हैं, वे ठूँस-ठूँसकर खाना खाते हैं, सोना पसंद करते हैं तथा देह की इच्छाओं पर पूरा ध्यान देते हैं, हमेशा भयभीत रहते हैं कि देह से बाहर कोई मार्ग नहीं है। वे कलीसिया में अपना उपयुक्त कार्य नहीं करते, पर मुफ़्त में कलीसिया से खाते हैं, या फिर मेरे वचनों से अपने भाई-बहनों की भर्त्सना करते हैं, और अधिकार के पदों से दूसरों के ऊपर आधिपत्य जताते हैं। ये लोग निरंतर कहते रहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा पूरी कर रहे हैं और हमेशा कहते हैं कि वे परमेश्वर के अंतरंग हैं—क्या यह बेतुका नहीं है? यदि तुम्हारे इरादे सही हैं, पर तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में असमर्थ हो, तो तुम मूर्ख हो; किंतु यदि तुम्हारे इरादे सही नहीं हैं, और फिर भी तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना चाहिए! ऐसे लोगों से मुझे कोई सहानुभूति नहीं है! परमेश्वर के घर में वे मुफ़्तखोरी करते हैं, हमेशा देह के आराम का लोभ करते हैं, और परमेश्वर की इच्छाओं का कोई विचार नहीं करते; वे हमेशा उसकी खोज करते हैं जो उनके लिए अच्छा है, और परमेश्वर की इच्छा पर कोई ध्यान नहीं देते। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें परमेश्वर के आत्मा की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं करते। वे अपने भाई-बहनों के साथ हमेशा छल करते हैं और उन्हें धोखा देते रहते हैं, और दो-मुँहे होकर वे, अंगूर के बाग़ में घुसी लोमड़ी के समान, हमेशा अंगूर चुराते हैं और अंगूर के बाग़ को रौंदते हैं। क्या ऐसे लोग परमेश्वर के अंतरंग हो सकते हैं? क्या तुम परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने लायक़ हो? तुम अपने जीवन एवं कलीसिया के लिए कोई उत्तरदायित्व नहीं लेते, क्या तुम परमेश्वर का आदेश लेने के लायक़ हो? तुम जैसे व्यक्ति पर कौन भरोसा करने की हिम्मत करेगा? जब तुम इस प्रकार से सेवा करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें कोई बड़ा काम सौंपने की जुर्रत कर सकता है? क्या इससे कार्य में विलंब नहीं होगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें' से उद्धृत

363. अधिकतर लोग परमेश्वर की सेवा करने के लिए शर्तों की बात भी करते हैं : वे परवाह नहीं करते कि वह परमेश्वर है या मनुष्य है, वे सिर्फ अपनी शर्तों की ही बात करते हैं, और सिर्फ अपनी ही इच्छाओं को पूरा करने की कोशिश करते हैं। जब तुम लोग मेरे लिए खाना पकाते हो, तो तुम सेवा शुल्क की माँग करते हो, जब तुम लोग मेरे लिए दौड़ते हो, तो तुम लोग मुझसे दौड़ने का शुल्क माँगते हो, जब तुम लोग मेरे लिए काम करते हो तो काम करने का शुल्क माँगते हो, जब तुम लोग मेरे कपड़े धोते हो तो कपड़े धोने का शुल्क माँगते हो, जब तुम कलीसिया के लिए कुछ करते हो तो स्वास्थ्यलाभ की लागत माँगते हो, जब तुम लोग बोलते हो तो तुम वक्ता का शुल्क माँगते हो, जब तुम लोग पुस्तकें बाँटते हो तो तुम लोग वितरण शुल्क माँगते हो, और जब लिखते हो तो लिखने का शुल्क माँगते हो। जिनके साथ मैं निपट चुका हूँ वे मुझ से मुआवजा तक माँगते हैं, जबकि वे जो घर भेजे जा चुके हैं अपने नाम के नुकसान के लिए क्षतिपूर्ति की माँग करते हैं; वे जो अविवाहित हैं दहेज की माँग करते हैं, या अपनी खोई हुई जवानी के लिए मुआवजे की माँग करते हैं, वे जो मुर्गे को काटते हैं वे कसाई के शुल्क की माँग करते हैं, वे जो खाने को तलते हैं, तलने का शुल्क माँगते हैं, और वे जो सूप बनाते हैं उसके लिए भी भुगतान माँगते हैं...। यह तुम लोगों की ऊँची और शक्तिशाली मानवता है और ये तुम सबके स्नेही विवेक के द्वारा निर्धारित कार्य हैं। तुम लोगों की समझ कहाँ है? तुम लोगों की मानवता कहाँ है? मैं तुम लोगों को बता दूँ! यदि तुम लोग ऐसे ही करते रहोगे, तो मैं तुम सबके मध्य में कार्य करना बंद कर दूँगा। मैं मनुष्य के रूप में जंगली जानवरों के झुंड में कार्य नहीं करूँगा, मैं ऐसे समूह के लोगों के लिए दुःख नहीं सहूँगा जिनका उजला चेहरा जंगली हृदय को छुपाये हुए है, मैं ऐसे जानवरों के झुंड के लिए कष्ट नहीं झेलूँगा जिनके उद्धार की थोड़ी-सी भी संभावना नहीं है। जिस दिन मैं तुम सबकी ओर पीठ कर लूँगा उसी दिन तुम सब मर जाओगे, उस दिन अंधकार तुम सब पर आ जायेगा, और उस दिन तुम सब प्रकाश के द्वारा त्याग दिए जाओगे। मैं तुम लोगों को बता दूँ! मैं कभी भी तुम लोगों जैसे समूह पर दयालु नहीं बनूँगा, एक ऐसा झुंड जो जानवरों से भी बदतर है! मेरे वचनों और कार्यकलापों की कुछ सीमायें हैं, और तुम सबकी मानवता और विवेक जैसे हैं उसके चलते, मैं और कार्य नहीं करूँगा, क्योंकि तुम सबमें विवेक की बहुत कमी है, तुम लोगों ने मुझे बहुत अधिक पीड़ा दी है, और तुम लोगों का घृणित व्यवहार मुझे बहुत अधिक घिन दिलाता है! तुम जैसे लोग जिनमें मानवता और विवेक की इतनी कमी है उन्हें उद्धार का अवसर कभी नहीं मिलेगा; मैं ऐसे बेरहम और एहसान-फरामोश लोगों को कभी भी नहीं बचाऊँगा। जब मेरा दिन आएगा, मैं अनंत काल के लिए अनाज्ञाकारिता की संतानों पर अपनी झुलसाने वाली आग की लपटों को बरसाऊँगा जिन्होंने एक बार मेरे प्रचण्ड कोप को उकसाया था, मैं ऐसे जानवरों पर अपने अनंत दंड को थोप दूंगा जिन्होंने कभी मुझे अपशब्द कहे थे और मुझे त्याग दिया था, मैं अनाज्ञाकारिता के पुत्रों को अपने क्रोध की आग में हमेशा के लिए जलाऊँगा जिन्होंने कभी मेरे साथ खाया था और जो मेरे साथ रहे थे, परन्तु मुझ में विश्वास नहीं रखा, और मेरा अपमान किया और मुझे धोखा दिया था। मैं उन सब को सज़ा दूँगा जिन्होंने मेरे क्रोध को भड़काया, मैं उन सभी जानवरों पर अपने कोप की सम्पूर्णता को बरसाऊँगा जिन्होंने कभी बराबरी में मेरे बगल में खड़े होने की कामना की थी, फिर भी मेरी आराधना या मेरा आज्ञापालन नहीं किया, मेरी छड़ी जिससे मैं मनुष्य को मारता हूँ, वह उन जानवरों पर टूट पड़ेगी जिन्होंने कभी मेरी देखभाल और जो रहस्य मैंने बोले उनका आनंद लिया था, और जिन्होंने कभी मुझसे भौतिक आनंद लेने की कोशिश की थी। मैं ऐसे किसी भी व्यक्ति को क्षमा नहीं करूँगा जो मेरा स्थान लेने की कोशिश करते हैं; मैं उन में से किसी को भी नहीं छोड़ूँगा जो मुझ से खाना और कपड़े हथियाने की कोशिश करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है' से उद्धृत

364. क्रूर मानवजाति! साँठ-गाँठ और साज़िश, एक-दूसरे से छीनना और हथियाना, प्रसिद्धि और संपत्ति के लिए हाथापाई, आपसी कत्लेआम—यह सब कब समाप्त होगा? परमेश्वर द्वारा बोले गए लाखों वचनों के बावजूद किसी को भी होश नहीं आया है। लोग अपने परिवार और बेटे-बेटियों के वास्ते, आजीविका, भावी संभावनाओं, हैसियत, महत्वाकांक्षा और पैसों के लिए, भोजन, कपड़ों और देह-सुख के वास्ते कार्य करते हैं। पर क्या कोई ऐसा है, जिसके कार्य वास्तव में परमेश्वर के वास्ते हैं? यहाँ तक कि जो परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं, उनमें से भी बहुत थोड़े ही हैं, जो परमेश्वर को जानते हैं। कितने लोग अपने स्वयं के हितों के लिए काम नहीं करते? कितने लोग अपनी हैसियत बचाए रखने के लिए दूसरों पर अत्याचार या उनका बहिष्कार नहीं करते? और इसलिए, परमेश्वर को असंख्य बार बलात् मृत्युदंड दिया गया है, और अनगिनत बर्बर न्यायाधीशों ने परमेश्वर की निंदा की है और एक बार फिर उसे सलीब पर चढ़ाया है। कितने लोगों को इसलिए धर्मी कहा जा सकता है, क्योंकि वे वास्तव में परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दुष्टों को निश्चित ही दंड दिया जाएगा' से उद्धृत

365. क्या तुम लोगों ने कभी भी उसका एहसास किया है जो तुम आज कर रहे हो—दुनिया भर में उपद्रव करना, एक दूसरे के खिलाफ षडयंत्र करना, एक दूसरे को धोखा देना, विश्वासघात, गोपनशीलता और बेशर्मी का व्यवहार करना, सच्चाई को न जानना, कुटिल और धोखेबाज बनना, चापलूसी करना, खुद को हमेशा सही और दूसरों से बेहतर मानना, घमंडी बनना, और पहाड़ों में जंगली जानवरों की तरह जंगलीपन करना और जानवरों के राजा की तरह कठोर बनना—क्या यही किसी मानव की सदृशता है? तुम लोग असभ्य और अनुचित हो। तुमने कभी मेरे वचन को कीमती नहीं माना है, बल्कि इसके बजाय तुम लोगों ने एक तिरस्कारपूर्ण रवैया अपनाया है। इस तरह कहाँ से उपलब्धि, एक सच्चा मानव-जीवन, और सुंदर आसरे आएंगे? क्या तुम्हारी असंयत कल्पना वास्तव में तुम्हें बाघ के मुँह से बचा पाएगी? क्या यह वास्तव में तुम्हें जलती हुई आग से बचा पाएगी? क्या तुम इतने गिर गए होते अगर तुमने वास्तव में मेरे कार्य को अमूल्य खजाने के रूप में माना होता? क्या ऐसा हो सकता है कि तुम्हारे नसीब को वास्तव में बदला नहीं जा सकता है? क्या तुम इस तरह के अफसोस के साथ मरने के लिए तैयार हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य का सार और उसकी पहचान' से उद्धृत

366. तुम लोगों में से हर एक अधिकता के शिखर तक उठ चुका है; तुम लोग बहुतायत के पितरों के रूप में आरोहण कर चुके हो। तुम लोग अत्यंत स्वेच्छाचारी हो, और आराम के स्थान की तलाश करते हुए और अपने से छोटे भुनगों को निगलने का प्रयास करते हुए उन सभी भुनगों के बीच पगलाकर दौड़ते हो। अपने हृदयों में तुम लोग द्वेषपूर्ण और कुटिल हो, और समुद्र-तल में डूबे हुए भूतों को भी पीछे छोड़ चुके हो। तुम गोबर की तली में रहते हो और ऊपर से नीचे तक भुनगों को तब तक परेशान करते हो, जब तक कि वे बिलकुल अशांत न हो जाएँ, और थोड़ी देर एक-दूसरे से लड़ने-झगड़ने के बाद शांत होते हो। तुम लोगों को अपनी जगह का पता नहीं है, फिर भी तुम लोग गोबर में एक-दूसरे के साथ लड़ाई करते हो। इस तरह की लड़ाई से तुम क्या हासिल कर सकते हो? यदि तुम लोगों के हृदय में वास्तव में मेरे लिए आदर होता, तो तुम लोग मेरी पीठ पीछे एक-दूसरे के साथ कैसे लड़ सकते थे? तुम्हारी हैसियत कितनी भी ऊँची क्यों न हो, क्या तुम फिर भी गोबर में एक बदबूदार छोटा-सा कीड़ा ही नहीं हो? क्या तुम पंख उगाकर आकाश में उड़ने वाला कबूतर बन पाओगे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जब झड़ते हुए पत्ते अपनी जड़ों की ओर लौटेंगे, तो तुम्हें अपनी की हुई सभी बुराइयों पर पछतावा होगा' से उद्धृत

367. आज जो तुम लोग देखते हो वह मात्र मेरे मुँह की तीखी तलवार है। तुम लोगों ने मेरे हाथ में छड़ी या उस ज्वाला को नहीं देखा है जिससे मैं मनुष्य को जलाता हूँ, और इसीलिए तुम लोग अभी भी मेरी उपस्थिति में अभिमानी और असंयमी हो। इसीलिए तुम लोग उस बात पर लोगों के साथ विवाद करते हुए, जो मैंने तुम लोगों से कही थी, अभी भी मेरे घर में मुझसे लड़ते हो। मनुष्य मुझसे नहीं डरता है, यद्यपि आज तक मेरे साथ शत्रुता जारी रख रहा है, उसे बिल्कुल भी कोई भय नहीं है। तुम लोगों के मुँह में अधर्मी जिह्वा और दाँत हैं। तुम लोगों के वचन और कार्य उस साँप के समान हैं जिसने हव्वा को पाप करने के लिए प्रलोभित किया था। तुम लोग एक दूसरे से आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत की माँग करते हो, और तुम लोग अपने लिए पद, प्रतिष्ठा और लाभ को झपटने के लिए मेरी उपस्थिति में संघर्ष करते हो, फिर भी तुम लोग नहीं जानते हो कि मैं गुप्त रूप से तुम लोगों के वचनों एवं कर्मों को देख रहा हूँ। यहाँ तक कि इससे पहले कि तुम लोग मेरी उपस्थिति में भी आओ, मैंने तुम लोगों के हृदयों की गहराइयों थाह ले ली है। मनुष्य हमेशा मेरे हाथ की पकड़ से बच निकलना और मेरी आँखों के निरीक्षण से बचना चाहता है, किन्तु मैं कभी भी उसके कथनों या कर्मों से कतराया नहीं हूँ। इसके बजाए, मैं उद्देश्यपूर्ण ढंग से उन कथनों और कर्मों को अपनी नज़रों में प्रवेश करने की अनुमति देता हूँ ताकि मैं उनकी अधार्मिकता को ताड़ना दे सकूँ, और उनके विद्रोह पर न्याय कर सकूँ। इस प्रकार, मनुष्य के गोपनीय कथन और कर्म हमेशा मेरे न्याय के आसन के सामने रहते हैं, और मेरे न्याय ने मनुष्य को कभी नहीं छोड़ा है, क्योंकि उसका विद्रोह बहुत ज़्यादा है। मेरा कार्य मनुष्य के उन सभी वचनों और कर्मों को जला कर शुद्ध करना है जो मेरी आत्मा की उपस्थिति में कहे और किए गए थे। इस तरह से,[ख] जब मैं पृथ्वी से चला जाऊँगा, तब भी मनुष्य मेरे प्रति वफादारी को बनाए रखने में समर्थ होगा, और पृथ्वी पर मेरे कार्य को उस दिन तक निरन्तर होने देते हुए, जब तक कि वह पूरा न हो जाए, तब भी मेरी सेवा उसी तरह से करेगा जैसे मेरे पवित्र सेवक मेरे कार्य में करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है' से उद्धृत

368. मैं उन लोगों की बहुत अधिक सराहना करता हूँ जो दूसरों के बारे में संदेह को आश्रय नहीं देते हैं और उन्हें भी बहुत पसंद करता हूँ जो सहजता से सत्य को स्वीकार करते हैं; इन दो तरह के मनुष्यों के लिए मैं बहुत अधिक परवाह दिखाता हूँ, क्योंकि मेरी दृष्टि में वे ईमानदार मनुष्य हैं। यदि तुम बहुत धोखेबाज हो, तो तुम्हारे पास एक संरक्षित हृदय होगा और सभी मामलों और सभी लोगों के बारे में संदेह के विचार होंगे। इसी कारण से, मुझ में तुम्हारा विश्वास संदेह कि नींव पर बना है। इस प्रकार के विश्वास को मैं कभी भी स्वीकार नहीं करूँगा। सच्चे विश्वास का अभाव होने पर, तुम सच्चे प्रेम से और भी अधिक दूर होगे। और यदि तुम परमेश्वर पर भी संदेह करने और अपनी इच्छानुसार उसके बारे में अनुमान लगाने में समर्थ हो, तो तुम संदेह से परे, मनुष्यों में सबसे अधिक धोखेबाज हो। तुम अनुमान लगाते हो कि क्या परमेश्वर मनुष्य के सदृश हो सकता हैः अक्षम्य रूप से पापमय, तुच्छ चरित्र का, निष्पक्षता और समझ से विहीन, न्याय की भावना के अभाव वाला, शातिर, कपटी, अक्सर धूर्त युक्तियों को आज़माने वाला, और साथ ही दुष्टता और अंधकार से खुश रहने वाला, इत्यादि। मनुष्य के ऐसे विचारों का होना इसी कारण से नहीं है क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर का थोड़ा सा भी ज्ञान नहीं है? इस ढंग का विश्वास पाप से कम नहीं है! इसके अलावा, यहाँ तक कि कुछ ऐसे भी हैं जो यह विश्वास करते हैं कि जो लोग मुझे प्रसन्न करते हैं वे चाटुकारों और चापलूसों के अलावा अन्य कोई नहीं हैं, और जिनमें इन कौशलों का अभाव है उन्हें नापसंद किया जाएगा और वे परमेश्वर के घर में अपना स्थान खो देंगे। क्या यही वह सब ज्ञान है जो तुम लोगों ने इन कई वर्षों में बटोरा है? क्या यही सब तुम लोगों ने प्राप्त किया है? मेरे बारे में तुम लोगों का ज्ञान इन गलतफ़हमियों पर रुकता नहीं है; इसके अलावा, परमेश्वर के आत्मा के विरूद्ध में तुम लोगों की ईशनिंदा और स्वर्ग का तिरस्कार तो और भी अधिक ख़राब है। इसलिए मैं कहता हूँ कि जिस ढंग का विश्वास तुम लोगों का है वह तुम लोगों को केवल मुझ से दूर भटकाने का तथा मेरे विरुद्ध और अधिक विरोधी बनाने का ही कारण बनेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

369. बल्कि बहुत से लोग ईमानदारी से बोलने और कार्य करने की अपेक्षा नरक के लिए दण्डित किए जाएँगे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जो बेईमान हैं उनके लिए मेरे भण्डार में अन्य उपचार है। वास्तव में, मैं उस बड़ी कठिनाई को समझता हूँ जिसका तुम लोग ईमानदार मनुष्य बनने का प्रयास करते समय सामना करते हो। तुम सभी लोग अपने स्वयं के क्षुद्र मानकों से किसी शिष्ट मनुष्य का विश्लेषण करने में बहुत चतुर और निपुण हो; अतः मेरा कार्य अधिक सरल हो जाता है। चूँकि तुम लोगों में से प्रत्येक अपने रहस्यों को अपने-अपने सीने से लगाए रहता है, तो ठीक है, मैं तुम लोगों को, एक-एक करके, आग द्वारा "सिखाये जाने" के लिए विपत्ति में भेजूँगा, ताकि उसके बाद तुम मेरे वचनों पर विश्वास करने के लिए सर्वथा समर्पित हो जाओगे। अंततः, मैं तुम लोगों के मुँह से "परमेश्वर निष्ठा का परमेश्वर है" शब्द खींच निकालूँगा, तब तुम लोग अपनी छाती को पीटोगे और विलाप करोगे, "कुटिल है मनुष्य का हृदय!" इस परिस्थिति में तुम लोगों की मनःस्थिति क्या होगी? मैं कल्पना करता हूँ कि तुम लोग अहंकार में नहीं बह जाओगे जैसे कि तुम लोग अभी हो। तुम लोग "थाह लेने के लिए अत्यंग गहन" तो बिल्कुल भी नहीं होगे जैसे कि तुम अभी हो। कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं और विशेष रूप से "शिष्ट" व्यवहार करते हैं, मगर पवित्रात्मा की उपस्थिति में वे अवज्ञाकारी हो जाते हैं और सभी संयम खो देते हैं। क्या तुम लोग ऐसे मनुष्य की गिनती ईमानदार लोगों की श्रेणी में करोगे? यदि तुम एक पाखंडी हो और ऐसे व्यक्ति हो जो लोगों से घुलने-मिलने में दक्ष है, तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को तुच्छ समझता है। यदि तुम्हारे वचन बहानों और अपने महत्वहीन तर्कों से भरे हुए हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने का अत्यधिक अनिच्छुक है। यदि तुममें ऐसे बहुत से आत्मविश्वास हैं जिन्हें साझा करने के लिए तुम अनिच्छुक हो, और यदि तुम अपने रहस्यों को—कहने का अर्थ है, अपनी कठिनाइयों को—दूसरों के सामने प्रकट करने के अत्यधिक अनिच्छुक हो ताकि प्रकाश का मार्ग खोजा जा सके, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और जो आसानी से अंधकार से नहीं निकलेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

370. हालाँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, फिर भी उसका हृदय परमेश्वर से रहित है, और वह इससेअनजान है कि परमेश्वर से कैसे प्रेम करे, न ही वह परमेश्वर से प्रेम करना चाहता है, क्योंकि उसका हृदय कभी भी परमेश्वर के नज़दीक नहीं आता है और वह हमेशा परमेश्वर से परहेज करता है। परिणामस्वरूप, मनुष्य का हृदय परमेश्वर से दूर है। तो उसका हृदय कहाँ है? वास्तव में, मनुष्य का हृदय कहीं नहीं गया हैः इसे परमेश्वर को देने के बजाय या इसे प्रकाशित करने के बजाय ताकि परमेश्वर उसे देखे, उसने इसे स्वयं के लिए रख लिया है। यह उस तथ्य के बावज़ूद है जो कुछ लोग प्रायः परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं और कहते हैं, "हे परमेश्वर, मेरे हृदय पर दृष्टि डाल—जो मैं सोचता हूँ तू वह सब कुछ जानता है," और कुछ लोग तो शपथ भी खाते हैं कि वे परमेश्वर को अपने ऊपर दृष्टि डालने देंगे, कि यदि वे अपनी शपथ को तोड़ें उन्हें दण्ड दिया जाए। यद्यपि मनुष्य परमेश्वर को अपने हृदय के भीतर झाँकने देता है, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि वह परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं को मानने में सक्षम है, न ही यह है कि उसने अपने भाग्य और भविष्य की सम्भावनाओं को तथा अपना सर्वस्व परमेश्वर के नियन्त्रण के अधीन छोड़ा है। इसलिए, ईश्वर के लिए तुम्हारी कसमों या उसके लिए तुम जो घोषणा करते हो उसके बावजूद, परमेश्वर की नज़रों में तुम्हारा हृदय अभी भी उसके प्रति बंद है, क्योंकि तुम परमेश्वर को अपने हृदय के भीतर केवल झाँकने देते हो किन्तु तुम उसे इसका नियन्त्रण नहीं करने देते हो। दूसरे शब्दों में, तुमने अपना हृदय परमेश्वर को बिल्कुल भी नहीं दिया है, और केवल परमेश्वर को सुनाने के लिए अच्छे लगने वाले वचन बोलते हो; इसी बीच, तुम अपने विभिन्न धूर्त इरादों को, अपनी साज़िश, षडयन्त्रों, और योजनाओं को परमेश्वर से छिपाते हो, और तुम अपने भविष्य की सम्भावनाओं और भाग्य को अपने हाथों में जकड़े रहते हो, इस बात से अत्यंत भयभीत रहते हुए कि उन्हें परमेश्वर के द्वारा ले लिए जाएगा। इस प्रकार, परमेश्वर स्वयं के प्रति मनुष्य की ईमानदारी को कभी नहीं देखता है। यद्यपि परमेश्वर मनुष्य के हृदय की गहराई का अवलोकन करता है, और वह देख सकता है कि मनुष्य अपने हृदय में क्या सोच रहा है और क्या करने की इच्छा करता है, और देख सकता है कि कौन सी चीजें उसके हृदय के भीतर रखी हुई हैं, फिर भी मनुष्य का हृदय परमेश्वर से सम्बन्धित नहीं होता है, उसने उसे परमेश्वर के नियन्त्रण में नहीं दिया है। कहने का तात्पर्य है कि, परमेश्वर के पास अवलोकन करने का अधिकार है, परन्तु उसके पास नियन्त्रण करने का अधिकार नहीं है। अपनी व्यक्तिपरक चेतना में, मनुष्य स्वयं को परमेश्वर के आयोजनों पर छोड़ने की इच्छा या इरादा नहीं करता है। मनुष्य ने न केवल स्वयं को परमेश्वर से बंद कर लिया है, बल्कि ऐसे लोग भी हैं जो एक मिथ्या धारणा बनाने और परमेश्वर का भरोसा प्राप्त करने तथा परमेश्वर की नज़रों से अपने असली चेहरे को छिपाने के लिए चिकनी-चुपड़ी बातों और चापलूसी का उपयोग करके अपने हृदयों को ढंकने के तरीकों के बारे सोचते हैं। परमेश्वर को देखने नहीं देने में उनका उद्देश्य परमेश्वर को यह समझने नहीं देना है कि वे वास्तव में कैसे हैं। वे परमेश्वर को अपना हृदय नहीं देना चाहते हैं, बल्कि उसे स्वयं के लिए रखना चाहते हैं। इसका निहितार्थ यह है कि जो कुछ मनुष्य करता है और जो कुछ वह चाहता है उन सब की योजना, गणना, और निर्णय स्वयं मनुष्य के द्वारा किए जाते हैं; उसे परमेश्वर की भागीदारी या हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं की आवश्यकता तो बिलकुल भी नहीं है। इसलिए, चाहे बात परमेश्वर की आज्ञाओं, उसके आदेश के संबंध में हो, या उन अपेक्षाओं के संबंध में हो जो परमेश्वर मनुष्य से करता है, मनुष्य के निर्णय उसके स्वयं के इरादों और रुचियों पर, उस समय की उसकी स्वयं की अवस्था और परिस्थितियों पर आधारित होते हैं। मनुष्य हमेशा उस मार्ग का आँकलन करने और उस राह को चुनने के लिए जो उसे लेना चाहिए, अपने चिर-परिचित ज्ञान तथा अंतर्दृष्टि का, और अपनी स्वयं कि मति का उपयोग करता है, और परमेश्वर को हस्तक्षेप और नियन्त्रण की अनुमति नहीं देता है। मनुष्य के इसी हृदय को परमेश्वर देखता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

371. युगों से, बहुत से लोग निराशा, और अनिच्छा के साथ इस संसार से चले गए हैं, और बहुत से लोग आशा और विश्वास के साथ इसमें आ गए हैं। मैंने बहुतों के आने का प्रबन्ध किया है, और बहुतों को दूर भेज दिया है। अनगिनत लोग मेरे हाथों से होकर गुज़रे हैं। बहुत सी आत्माओं को अधोलोक में फेंक दिया गया है, बहुतों ने देह में जीवन बिताया है, और बहुत से लोग मर चुके हैं और उन्होंने पृथ्वी पर दुबारा जन्म ले लिया है। परन्तु उनमें से किसी के पास राज्य के आशीषों का आनन्द उठाने का अवसर नहीं था। मैंने मानवजाति को इतना कुछ दिया, फिर भी उसने थोड़ा-सा ही प्राप्त किया है, क्योंकि शैतान के आक्रमणों ने उन्हें मेरी सारी समृद्धि का आनन्द उठाने में असमर्थ कर दिया है। उसके पास केवल देखने के लिए एक अच्छा भविष्य है, परन्तु उसने उसका कभी भरपूर आनन्द नहीं उठाया है। मनुष्य ने कभी भी स्वर्ग की धन-समृद्धि को पाने के लिए अपने शरीर में ख़ज़ाने से भरे घर की खोज नहीं की है, और इस प्रकार उसने उन आशीषों को खो दिया है जो मैंने उसे दिया था। क्या मनुष्य का आत्मा वह आन्तरिक शक्ति नहीं है जो उसे मेरे आत्मा से जोड़ता है? क्यों मनुष्य ने मुझे कभी भी अपनी आत्मा से नहीं जोड़ा है? वह देह में मेरे निकट क्यों आता है, वह आत्मा में ऐसा क्यों नहीं कर पाता है? क्या मेरा असली चेहरा हड्डी और माँस का है? मनुष्य मेरे सार-तत्व को क्यों नहीं जानता? क्या वास्तव में मनुष्य की आत्मा में मेरा कोई पदचिन्ह कभी नहीं रहा है? क्या मैं मनुष्य की आत्मा से पूरी तरह ग़ायब हो चुका हूँ? यदि मनुष्य आत्मिक क्षेत्र में प्रवेश नहीं करता, तो वह मेरी इच्छाओं का आभास कैसे कर पाएगा? क्या मनुष्य की आँखों में वह बात है जो सीधे आत्मिक क्षेत्र को भेद सकती है? कई बार ऐसा हुआ है जब मैंने अपने आत्मा के द्वारा मनुष्य को आवाज़ दी है, फिर भी मनुष्य ऐसा व्यवहार करता है मानो मैंने उसे छेद दिया है, और वह अति भय के साथ दूर से मेरे बारे में विचार करता है कि मैं उसे किसी और दुनिया में ले जाऊँगा। कई बार ऐसा हुआ जब मैंने मनुष्य की आत्मा से पूछताछ की, फिर भी वह भुलक्कड़ बना रहता है, और बहुत ज़्यादा डर जाता है कि मैं उसके घर में घुस जाऊँगा और उस अवसर का लाभ उठा कर उसकी सारी सम्पति को छीन लूँगा। अत:, वह मुझे बाहर निकाल देता है और मैं सर्द, कसकर बन्द किए दरवाज़े के सामने खड़ा रह जाता हूं। कई बार ऐसा हुआ जब मनुष्य गिर गया और मैंने उसे बचाया, फिर भी जागने के बाद वह तुरंत ही मुझे छोड़ देता है और, मेरे प्रेम का एहसास किए बगैर, मुझे चौकन्नी निगाहों से देखता है; मानो मैंने उसके हृदय को कभी उत्साहित नहीं किया है। मनुष्य भावना-शून्य है, और नृशंस पशु है। यद्यपि वह मेरे आलिंगन से उत्साहित होता है, फिर भी वह कभी इस से भाव-विभोर नहीं हुआ है। मनुष्य पहाड़ी जंगली जीव के समान है। उसने कभी भी मानवजाति के प्रति ताड़ना को संजो कर नहीं रखा है। वह मेरे पास आने से आनाकानी करता है, और पहाड़ों पर रहना पसंद करता है, जहाँ उसे जंगली जानवरों से खतरा रहता है फिर भी वह मेरे आश्रय में आना नहीं चाहता है। मैं किसी मनुष्य को बाध्य नहीं करता हूँ: मैं महज अपना कार्य करता हूँ। वह दिन आएगा जब मनुष्य सामर्थी महासागर के बीच में से तैर कर मेरे पास आ जाएगा, ताकि वह पृथ्वी पर सभी समृद्धि का आनन्द उठाए और समुद्र के द्वारा निगले जाने के भय को पीछे छोड़ दे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 20' से उद्धृत

372. मैं गहराई से उस धोखेबाजी को समझता हूँ, जो तुम लोगों के दिल में मौजूद है; तुममें से अधिकतर लोग केवल जिज्ञासावश मेरा अनुसरण करते हैं और अपने खालीपन के कारण मेरी खोज में आए हैं। जब तुम लोगों की तीसरी इच्छा—एक शांतिपूर्ण और सुखी जीवन जीने की इच्छा—टूट जाती है, तो तुम लोगों की जिज्ञासा भी बिखर जाती है। तुम लोगों में से प्रत्येक के दिल के भीतर मौजूद धोखाधड़ी तुम्हारे शब्दों और कर्मों के माध्यम से उजागर होती है। स्पष्ट कहूँ तो, तुम लोग मेरे बारे में केवल उत्सुक हो, मुझसे भयभीत नहीं हो; तुम लोग अपनी जीभ पर काबू नहीं रखते और अपने व्यवहार को तो और भी कम नियंत्रित करते हो। तो तुम लोगों का विश्वास आखिर कैसा है? क्या यह वास्तविक है? तुम लोग सिर्फ अपनी चिंताएँ दूर करने और अपनी ऊब मिटाने के लिए, अपने जीवन में मौजूद खालीपन को भरने के लिए मेरे वचनों का उपयोग करते हो। तुम लोगों में से किसने मेरे वचनों को अभ्यास में ढाला है? वास्तविक विश्वास किसे है? तुम लोग चिल्लाते रहते हो कि परमेश्वर ऐसा परमेश्वर है, जो लोगों के दिलों में गहराई से देखता है, परंतु जिस परमेश्वर के बारे में तुम अपने दिलों में चिल्लाते रहते हो, उसकी मेरे साथ क्या अनुरूपता है? जब तुम लोग इस तरह चिल्लाते हो, तो फिर वैसे कार्य क्यों करते हो? क्या यही वह प्रेम है, जो तुम लोग मुझे प्रतिफल में चुकाना चाहते हो? तुम्हारे होंठों पर समर्पण की कोई छोटी मात्रा नहीं है, लेकिन फिर तुम लोगों के बलिदान और अच्छे कर्म कहाँ हैं? अगर तुम्हारे शब्द मेरे कानों तक न पहुँचते, तो मैं तुम लोगों से इतनी नफरत कैसे कर पाता? यदि तुम लोग वास्तव में मुझ पर विश्वास करते, तो तुम इस तरह के संकट में कैसे पड़ सकते थे? तुम लोगों के चेहरों पर ऐसे उदासी छा रही है, मानो तुम अधोलोक में खड़े परीक्षण दे रहे हो। तुम लोगों के पास जीवन-शक्ति का एक कण भी नहीं है, और तुम अपनी आंतरिक आवाज़ के बारे में क्षीणता से बात कर रहे हो; यहाँ तक कि तुम शिकायत और धिक्कार से भी भरे हुए हो। मैं जो करता हूँ, उसमें तुम लोगों ने बहुत पहले ही अपना विश्वास खो दिया था, यहाँ तक कि तुम्हारा मूल विश्वास भी गायब हो गया है, इसलिए तुम अंत तक संभवतः कैसे अनुसरण कर सकते हो? ऐसी स्थिति में तुम लोगों को कैसे बचाया जा सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'युवा और वृद्ध लोगों के लिए वचन' से उद्धृत

373. तुम लोगों का विश्वास बहुत सुंदर है; तुम्हारा कहना है कि तुम अपना सारा जीवन-काल मेरे कार्य के लिए खपाने को तैयार हो, और तुम इसके लिए अपने प्राणों का बलिदान करने को तैयार हो, लेकिन तुम्हारे स्वभाव में अधिक बदलाव नहीं आया है। तुम लोग बस हेकड़ी से बोलते हो, बावजूद इस तथ्य के कि तुम्हारा वास्तविक व्यवहार बहुत घिनौना है। यह ऐसा है जैसे कि लोगों की जीभ और होंठ तो स्वर्ग में हों, लेकिन उनके पैर बहुत नीचे पृथ्वी पर हों, परिणामस्वरूप उनके वचन और कर्म तथा उनकी प्रतिष्ठा अभी भी चिथड़ा-चिथड़ा और विध्वस्त हैं। तुम लोगों की प्रतिष्ठा नष्ट हो गई है, तुम्हारा ढंग खराब है, तुम्हारे बोलने का तरीका निम्न कोटि का है, तुम्हारा जीवन घृणित है; यहाँ तक कि तुम्हारी सारी मनुष्यता डूबकर नीच अधमता में पहुँच गई है। तुम दूसरों के प्रति संकीर्ण सोच रखते हो और छोटी-छोटी बात पर बखेड़ा करते हो। तुम अपनी प्रतिष्ठा और हैसियत को लेकर इस हद तक झगड़ते हो कि नरक और आग की झील में उतरने तक को तैयार रहते हो। तुम लोगों के वर्तमान वचन और कर्म मेरे लिए यह तय करने के लिए काफी हैं कि तुम लोग पापी हो। मेरे कार्य के प्रति तुम लोगों का रवैया मेरे लिए यह तय करने के लिए काफी है कि तुम लोग अधर्मी हो, और तुम लोगों के समस्त स्वभाव यह इंगित करने के लिए पर्याप्त हैं कि तुम लोग घृणित आत्माएँ हो, जो गंदगी से भरी हैं। तुम लोगों की अभिव्यक्तियाँ और जो कुछ भी तुम प्रकट करते हो, वह यह कहने के लिए पर्याप्त हैं कि तुम वे लोग हो, जिन्होंने अशुद्ध आत्माओं का पेट भरकर रक्त पी लिया है। जब राज्य में प्रवेश करने का जिक्र होता है, तो तुम लोग अपनी भावनाएँ जाहिर नहीं करते। क्या तुम लोग मानते हो कि तुम्हारा मौजूदा ढंग तुम्हें मेरे स्वर्ग के राज्य के द्वार में प्रवेश कराने के लिए पर्याप्त है? क्या तुम लोग मानते हो कि तुम मेरे कार्य और वचनों की पवित्र भूमि में प्रवेश पा सकते हो, इससे पहले कि मैं तुम लोगों के वचनों और कर्मों का परीक्षण करूँ? कौन है, जो मेरी आँखों में धूल झोंक सकता है? तुम लोगों का घृणित, नीच व्यवहार और बातचीत मेरी दृष्टि से कैसे छिपे रह सकते हैं? तुम लोगों के जीवन मेरे द्वारा उन अशुद्ध आत्माओं का रक्त और मांस पीने और खाने वालों के जीवन के रूप में तय किए गए हैं, क्योंकि तुम लोग रोज़ाना मेरे सामने उनका अनुकरण करते हो। मेरे सामने तुम्हारा व्यवहार विशेष रूप से ख़राब रहा है, तो मैं तुम्हें घृणित कैसे न समझता? तुम्हारे शब्दों में अशुद्ध आत्माओं की अपवित्रताएँ है : तुम फुसलाते हो, भेद छिपाते हो चापलूसी करते हो, ठीक उन लोगों की तरह जो टोने-टोटकों में संलग्न रहते हैं और उनकी तरह भी जो विश्वासघाती हैं और अधर्मियों का खून पीते हैं। मनुष्य के समस्त भाव बेहद अधार्मिक हैं, तो फिर सभी लोगों को पवित्र भूमि में कैसे रखा जा सकता है, जहाँ धर्मी रहते हैं? क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा यह घिनौना व्यवहार तुम्हें उन अधर्मी लोगों की तुलना में पवित्र होने की पहचान दिला सकता है? तुम्हारी साँप जैसी जीभ अंततः तुम्हारी इस देह का नाश कर देगी, जो तबाही बरपाती है और घृणा ढोती है, और तुम्हारे वे हाथ भी, जो अशुद्ध आत्माओं के रक्त से सने हैं, अंततः तुम्हारी आत्मा को नरक में खींच लेंगे। तो फिर तुम मैल से सने अपने हाथों को साफ़ करने का यह मौका क्यों नहीं लपकते? और तुम अधर्मी शब्द बोलने वाली अपनी इस जीभ को काटकर फेंकने के लिए इस अवसर का लाभ क्यों नहीं उठाते? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम अपने हाथों, जीभ और होंठों के लिए नरक की आग में जलने के लिए तैयार हो? मैं अपनी दोनों आँखों से हरेक व्यक्ति के दिल पर नज़र रखता हूँ, क्योंकि मानव-जाति के निर्माण से बहुत पहले मैंने उनके दिलों को अपने हाथों में पकड़ा था। मैंने बहुत पहले लोगों के दिलों के भीतर झाँककर देख लिया था, इसलिए उनके विचार मेरी दृष्टि से कैसे बच सकते थे? मेरे आत्मा द्वारा जलाए जाने से बचने में उन्हें ज्यादा देर कैसे नहीं हो सकती थी?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!' से उद्धृत

374. तुम्हारे होंठ कबूतरों से अधिक दयालु हैं, लेकिन तुम्हारा दिल पुराने साँप से ज्यादा भयानक है। तुम्हारे होंठ लेबनानी महिलाओं जितने सुंदर हैं, लेकिन तुम्हारा दिल उनकी तरह दयालु नहीं है, और कनानी लोगों की सुंदरता से तुलना तो वह निश्चित रूप से नहीं कर सकता। तुम्हारा दिल बहुत धोखेबाज़ है! जिन चीज़ों से मुझे घृणा है, वे केवल अधर्मी के होंठ और उनके दिल हैं, और लोगों से मेरी अपेक्षाएँ, संतों से मेरी अपेक्षा से जरा भी अधिक नहीं हैं; बात बस इतनी है कि मुझे अधर्मियों के बुरे कर्मों से घृणा महसूस होती है, और मुझे उम्मीद है कि वे अपनी मलिनता दूर कर पाएँगे और अपनी मौजूदा दुर्दशा से बच सकेंगे, ताकि वे उन अधर्मी लोगों से अलग खड़े हो सकें और उन लोगों के साथ रह सकें और पवित्र हो सकें, जो धर्मी हैं। तुम लोग उन्हीं परिस्थितियों में हो जिनमें मैं हूँ, लेकिन तुम लोग मैल से ढके हो; तुम्हारे पास उन मनुष्यों की मूल समानता का छोटे से छोटा अंश भी नहीं है, जिन्हें शुरुआत में बनाया गया था। इतना ही नहीं, चूँकि तुम लोग रोज़ाना उन अशुद्ध आत्माओं की नकल करते हो, और वही करते हो जो वे करती हैं और वही कहते हो जो वे कहती हैं, इसलिए तुम लोगों के समस्त अंग—यहाँ तक कि तुम लोगों की जीभ और होंठ भी—उनके गंदे पानी से इस क़दर भीगे हुए हैं कि तुम लोग पूरी तरह से दाग़ों से ढँके हुए हो, और तुम्हारा एक भी अंग ऐसा नहीं है जिसका उपयोग मेरे कार्य के लिए किया जा सके। यह बहुत हृदय-विदारक है! तुम लोग घोड़ों और मवेशियों की ऐसी दुनिया में रहते हो, और फिर भी तुम लोगों को वास्तव में परेशानी नहीं होती; तुम लोग आनंद से भरे हुए हो और आज़ादी तथा आसानी से जीते हो। तुम लोग उस गंदे पानी में तैर रहे हो, फिर भी तुम्हें वास्तव में इस बात का एहसास नहीं है कि तुम इस तरह की दुर्दशा में गिर चुके हो। हर दिन तुम अशुद्ध आत्माओं के साहचर्य में रहते हो और "मल-मूत्र" के साथ व्यवहार करते हो। तुम्हारा जीवन बहुत भद्दा है, फिर भी तुम इस बात से अवगत नहीं हो कि तुम बिलकुल भी मनुष्यों की दुनिया में नहीं रहते और तुम अपने नियंत्रण में नहीं हो। क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारा जीवन बहुत पहले ही अशुद्ध आत्माओं द्वारा रौंद दिया गया था, या कि तुम्हारा चरित्र बहुत पहले ही गंदे पानी से मैला कर दिया गया था? क्या तुम्हें लगता है कि तुम एक सांसारिक स्वर्ग में रह रहे हो, और तुम खुशियों के बीच में हो? क्या तुम नहीं जानते कि तुमने अपना जीवन अशुद्ध आत्माओं के साथ बिताया है, और तुम हर उस चीज़ के साथ सह-अस्तित्व में रहे हो जो उन्होंने तुम्हारे लिए तैयार की है? तुम्हारे जीने के ढंग का कोई अर्थ कैसे हो सकता है? तुम्हारे जीवन का कोई मूल्य कैसे हो सकता है? तुम अपने माता-पिता के लिए, अशुद्ध आत्माओं के माता-पिता के लिए, दौड़-भाग करते रहे हो, फिर भी तुम्हें वास्तव में इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि तुम्हें फँसाने वाले वे अशुद्ध आत्माओं के माता-पिता हैं, जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया और पाल-पोसकर बड़ा किया। इसके अलावा, तुम नहीं जानते कि तुम्हारी सारी गंदगी वास्तव में उन्होंने ही तुम्हें दी है; तुम बस यही जानते हो कि वे तुम्हें "आनंद" दे सकते हैं, वे तुम्हें ताड़ना नहीं देते, न ही वे तुम्हारी आलोचना करते हैं, और विशेष रूप से वे तुम्हें शाप नहीं देते। वे कभी तुम पर गुस्से से भड़के नहीं, बल्कि तुम्हारे साथ स्नेह और दया का व्यवहार करते हैं। उनके शब्द तुम्हारे दिल को पोषण देते हैं और तुम्हें लुभाते हैं, ताकि तुम गुमराह हो जाओ, और बिना एहसास किए, तुम फँसालिए जाते हो और उनकी सेवा करने के इच्छुक हो जाते हो, उनके निकास और नौकर बन जाते हो। तुम्हें कोई शिकायत नहीं होती है, बल्कि तुम उनके लिए कुत्तों और घोड़ों की तरह कार्य करने के लिए तैयार रहते हो; वे तुम्हें धोखा देते हैं। यही कारण है कि मेरे कार्य के प्रति तुम्हारी कोई प्रतिक्रिया नहीं है। कोई आश्चर्य नहीं कि तुम हमेशा मेरे हाथों से चुपके से निकल जाना चाहते हो, और कोई आश्चर्य नहीं कि तुम हमेशा मीठे शब्दों का प्रयोग करके छल से मेरी सहायता चाहते हो। इससे पता चलता है कि तुम्हारे पास पहले से एक दूसरी योजना थी, एक दूसरी व्यवस्था थी। तुम मेरे कुछ कार्यों को सर्वशक्तिमान के कार्य के रूप में देख सकते हो, पर तुम्हें मेरे न्याय और ताड़ना की जरा-सी भी जानकारी नहीं है। तुम्हें कोई अंदाज़ा नहीं है कि मेरी ताड़ना कब शुरू हुई; तुम केवल मुझे धोखा देना जानते हो–लेकिन तुम यह नहीं जानते कि मैं मनुष्य का कोई उल्लंघन बरदाश्त नहीं करूँगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!' से उद्धृत

375. अतीत के बारे में सोचो: कब तुम लोगों के प्रति मेरी दृष्टि क्रोधित, और मेरी आवाज़ कठोर हुई है? मैंने कब तुम लोगों में बेवजह गलतियाँ निकालीं हैं? मैंने कब तुम लोगों को अनुचित रूप से प्रताड़ित किया है? मैंने कब तुम लोगों को तुम्हारे मुँह पर डाँटा है? क्या यह मेरे कार्य के वास्ते नहीं है कि मैं तुम लोगों को हर प्रलोभन से बचाने के लिए अपने परमपिता को पुकारता हूँ? तुम लोग मेरे साथ इस प्रकार का व्यवहार क्यों करते हो? क्या मैंने कभी भी अपने अधिकार का उपयोग तुम लोगों की देह को मार गिराने के लिए किया है? तुम लोग मुझे इस प्रकार का प्रतिफल क्यों दे रहे हो? मेरे प्रति कभी हाँ और कभी ना करने के बाद, तुम लोग न हाँ में हो और न ही ना में, और फिर तुम मुझे फुसलाने और मुझसे बातों को छिपाने का प्रयास करते हो, और तुम लोगों के मुँह अधार्मिकता की थूक से भरे हुए हैं? क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम लोगों की ज़ुबानें मेरे आत्मा को धोखा दे सकती हैं? क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम लोगों की ज़ुबानें मेरे कोप से बच सकती हैं? क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम लोगों की ज़ुबानें मुझ यहोवा के कार्यों की, जिस तरह से भी वे चाहें, आलोचना कर सकती हैं? क्या मैं ऐसा परमेश्वर हूँ जिसके बारे में मनुष्य आलोचना कर सकता है? क्या मैं छोटे से भुनगे को इस प्रकार से अपनी ईशनिंदा करने दे सकता हूँ? मैं कैसे ऐसे अवज्ञा के पुत्रों को अपने अनन्त आशीषों के बीच रख सकता हूँ? तुम लोगों के वचनों और कार्यों ने तुम लोगों को काफी समय तक उजागर और निन्दित किया है। जब मैंने स्वर्ग को फैलाया और सभी चीजों का सृजन किया, तो मैंने किसी भी प्राणी को उसके अनुसार भाग लेने की अनुमति नहीं दी, किसी भी चीज को, जैसा वह चाहे वैसे, मेरे कार्य और मेरे प्रबंधन में गड़बड़ करने की अनुमति तो बिल्कुल नहीं दी। मैंने किसी भी मनुष्य या वस्तु को सहन नहीं किया; मैं कैसे उन लोगों को छोड़ सकता हूँ जो मेरे प्रति निर्दयी और क्रूर और अमानवीय हैं? मैं कैसे उन लोगों को क्षमा कर सकता हूँ जो मेरे वचनों के विरोध में विद्रोह करते हैं? मैं कैसे उन्हें छोड़ सकता हूँ जो मेरी अवज्ञा करते हैं? क्या मनुष्य की नियति मुझ सर्वशक्तिामन के हाथों में नहीं है? मैं कैसे तुम्हारी अधार्मिकता और अवज्ञा को पवित्र मान सकता हूँ? तुम्हारे पाप मेरी पवित्रता को कैसे दूषित कर सकते हैं? मैं अधर्मी की अशुद्धता से दूषित नहीं होता हूँ, न ही मैं अधर्मियों के चढ़ावों का आनन्द लेता हूँ। यदि तुम मुझ यहोवा के प्रति वफादार होते, तो क्या तुम मेरी वेदी से बलिदानों को अपने लिए ले सकते थे? क्या तुम मेरे पवित्र नाम की ईशनिंदा करने के लिए अपनी विषैली ज़ुबान का उपयोग कर सकते थे? क्या तुम इस प्रकार से मेरे वचनों के विरुद्ध विद्रोह कर सकते थे? क्या तुम मेरी महिमा और पवित्र नाम को, एक दुष्ट, शैतान की सेवा करने के लिए एक उपकरण के रूप में उपयोग कर सकते थे? मेरा जीवन पवित्र लोगों के आनन्द के लिए प्रदान किया जाता है। मैं अपने जीवन के साथ कैसे तुम्हें, तुम्हारी इच्छानुसार, खेलने और खुद के बीच संघर्ष के एक उपकरण के रूप में उपयोग करने की अनुमति दे सकता हूँ? तुम लोग मेरे प्रति जैसे हो उसमें, अच्छाई के मार्ग में इतने निर्दयी और इतने अभावग्रस्त कैसे हो सकते हो? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि मैंने पहले ही तुम लोगों की बुरी करतूतों को जीवन के इन वचनों में लिख दिया है? जब मैं मिस्र को दण्ड देता हूँ तब तुम लोग कोप के दिन से कैसे बच कर निकल सकते हो? कैसे तुम लोगों को इस तरह बार-बार अपना विरोध और अनादर करने की अनुमति दे सकता हूँ? मैं तुम लोगों को स्पष्ट रूप से कहता हूँ, कि जब वह दिन आएगा, तो तुम लोगों की ताड़ना मिस्र की ताड़ना की अपेक्षा अधिक असहनीय होगी! तुम लोग कैसे मेरे कोप के दिन से बच कर निकल सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देह की चिन्ता करने वालों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है' से उद्धृत

376. मैं तुम लोगों के बीच में रहा हूँ, कई वसंत और पतझड़ तुम्हारे साथ जुड़ा रहा हूँ; मैं लंबे समय तक तुम लोगों के बीच जीया हूँ, और तुम लोगों के साथ जीया हूँ। तुम लोगों का कितना घृणित व्यवहार मेरी आँखों के सामने से फिसला है? तुम्हारे वे हृदयस्पर्शी शब्द लगातार मेरे कानों में गूँजते हैं; तुम लोगों की हज़ारों-करोड़ों आकांक्षाएँ मेरी वेदी पर रखी गई हैं—इतनी ज्यादा कि उन्हें गिना भी नहीं जा सकता। लेकिन तुम लोगों का जो समर्पण है और जितना तुम अपने आपको खपाते हो, वह रंचमात्र भी नहीं है। मेरी वेदी पर तुम लोग ईमानदारी की एक नन्ही बूँद भी नहीं रखते। मुझ पर तुम लोगों के विश्वास के फल कहाँ हैं? तुम लोगों ने मुझसे अनंत अनुग्रह प्राप्त किया है और तुमने स्वर्ग के अनंत रहस्य देखे हैं; यहाँ तक कि मैंने तुम लोगों को स्वर्ग की लपटें भी दिखाई हैं, लेकिन तुम लोगों को जला देने को मेरा दिल नहीं माना। फिर भी, बदले में तुम लोगों ने मुझे कितना दिया है? तुम लोग मुझे कितना देने के लिए तैयार हो? जो भोजन मैंने तुम्हारे हाथ में दिया है, पलटकर उसी को तुम मुझे पेश कर देते हो, बल्कि यह कहते हो कि वह तुम्हें अपनी कड़ी मेहनत के पसीने के बदले मिला है और तुम अपना सर्वस्व मुझे अर्पित कर रहे हो। तुम यह कैसे नहीं जानते कि मेरे लिए तुम्हारा "योगदान" बस वे सभी चीज़ें हैं, जो मेरी ही वेदी से चुराई गई हैं? इतना ही नहीं, अब तुम वे चीज़ें मुझे चढ़ा रहे हो, क्या तुम मुझे धोखा नहीं दे रहे? तुम यह कैसे नहीं जान पाते कि आज जिन भेंटों का आनंद मैं उठा रहा हूँ, वे मेरी वेदी पर चढ़ाई गई सभी भेंटें हैं, न कि जो तुमने अपनी कड़ी मेहनत से कमाई हैं और फिर मुझे प्रदान की हैं। तुम लोग वास्तव में मुझे इस तरह धोखा देने की हिम्मत करते हो, इसलिए मैं तुम लोगों को कैसे माफ़ कर सकता हूँ? तुम लोग मुझसे इसे और सहने की अपेक्षा कैसे कर सकते हो? मैंने तुम लोगों को सब-कुछ दे दिया है। मैंने तुम लोगों के लिए सब-कुछ खोलकर रख दिया है, तुम्हारी ज़रूरतें पूरी की हैं, और तुम लोगों की आँखें खोली हैं, फिर भी तुम लोग अपनी अंतरात्मा की अनदेखी कर इस तरह मुझे धोखा देते हो। मैंने नि:स्वार्थ भाव से अपना सब-कुछ तुम लोगों पर न्योछावर कर दिया है, ताकि तुम लोग अगर पीड़ित भी होते हो, तो भी तुम लोगों को मुझसे वह सब मिल जाए, जो मैं स्वर्ग से लाया हूँ। इसके बावजूद तुम लोगों में बिलकुल भी समर्पण नहीं है, और अगर तुमने कोई छोटा-मोटा योगदान किया भी हो, तो बाद में तुम मुझसे उसका "हिसाब बराबर" करने की कोशिश करते हो। क्या तुम्हारा योगदान शून्य नहीं माना जाएगा? तुमने मुझे मात्र रेत का एक कण दिया है, जबकि माँगा एक टन सोना है। क्या तुम सर्वथा विवेकहीन नहीं बन रहे हो? मैं तुम लोगों के बीच काम करता हूँ। बदले में जो कुछ मुझे मिलना चाहिए, उसके दस प्रतिशत का भी कोई नामोनिशान नहीं है, अतिरिक्त बलिदानों की तो बात ही छोड़ दो। इसके अलावा, धर्मपरायण लोगों द्वारा दिए जाने वाले उस दस प्रतिशत को भी दुष्टों द्वारा छीन लिया जाता है। क्या तुम लोग मुझसे तितर-बितर नहीं हो गए हो? क्या तुम सब मेरे विरोधी नहीं हो? क्या तुम सब मेरी वेदी को नष्ट नहीं कर रहे हो? ऐसे लोगों को मेरी आँखें एक खज़ाने के रूप में कैसे देख सकती हैं? क्या वे सुअर और कुत्ते नहीं हैं, जिनसे मैं घृणा करता हूँ? मैं तुम लोगों के दुष्कर्मों को खज़ाना कैसे कह सकता हूँ?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!' से उद्धृत

377. मनुष्य मूल्यहीन अभागे हैं क्योंकि वे स्वयं को नहीं सँजोए रखते हैं। यदि वे स्वयं से भी प्यार नहीं करते हैं, किन्तु स्वयं को ही रौंदते हैं, तो क्या यह इस बात को नहीं दर्शाता है कि वे मूल्यहीन हैं? मानवजाति एक अनैतिक स्त्री की तरह है जो स्वयं के साथ खेल खेलती है और जो दूषित किए जाने के लिए स्वेच्छा से स्वयं को दूसरों को देती है। किन्तु फिर भी, वे अब भी नहीं जानते हैं कि वे कितने अधम हैं। उन्हें दूसरों के लिए कार्य करने, या दूसरों के साथ बातचीत करने, स्वयं को दूसरों के नियंत्रण के अधीन करने में खुशी मिलती है; क्या यह वास्तव में मानवजाति की गंदगी नहीं है? यद्यपि मैं मानवजाति के बीच किसी जीवन से नहीं गुज़रा हूँ, मुझे वास्तव में मानव जीवन का अनुभव नहीं रहा है, फिर भी मुझे मनुष्य की हर हरकत, उसके हर क्रिया-कलाप, हर वचन और हर कर्म की बहुत स्पष्ट समझ है। मैं मानवजाति को उसकी गहरी शर्मिंदगी तक उजागर करने में भी सक्षम हूँ, इस हद तक कि वे अपनी चालाकियाँ दिखाने का और अपनी वासना को मार्ग देने का अब और साहस नहीं करते हैं। घोंघे की तरह, जो अपने खोल में शरण ले लेता है, वे अपनी स्वयं की बदसूरत स्थिति को उजागर करने का अब और साहस नहीं करते हैं। क्योंकि मानवजाति स्वयं को नहीं जानती है, इसलिए उनका सबसे बड़ा दोष अपने आकर्षण का दूसरों के सामने स्वेच्छा से जुलूस निकालना है, अपने कुरूप चेहरे का जूलूस निकालना है; यह कुछ ऐसा है जिससे परमेश्वर सबसे ज्यादा घृणा करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों के बीच संबंध असामान्य हैं, और लोगों के बीच सामान्य अंतर्वैयक्तिक संबंधों की कमी है, परमेश्वर और उनके बीच सामान्य संबंध की तो बात ही दूर है। परमेश्वर ने बहुत अधिक कहा है, और ऐसा करने में उसका मुख्य उद्देश्य मानवजाति के हृदय में एक स्थान को अधिकार में लेना है, लोगों को उनके हृदय की सभी मूर्तियों से छुटकारा दिलवाना है, ताकि परमेश्वर समस्त मानवजाति पर सामर्थ्य का उपयोग कर सके और पृथ्वी पर होने का अपना उद्देश्य प्राप्त कर सके।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 14' से उद्धृत

378. कुछ लोग खूबसूरती से सज-धज कर रहते हैं, लेकिन बस ऊपर-ऊपर से : बहनें अपने आपको फूलों की तरह सँवारती हैं और भाई राजकुमारों या छबीले नौजवानों की तरह कपड़े पहनते हैं। वे केवल बाहरी चीज़ों की परवाह करते हैं, जैसे कि अपने खाने-पहनने की; लेकिन अंदर से वे कंगाल होते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज़रा-सा भी ज्ञान नहीं होता। इसके क्या मायने हो सकते हैं? और कुछ तो ऐसे हैं जो भिखारियों की तरह कपड़े पहनते हैं—वे वाकई पूर्वी एशिया के गुलाम लगते हैं! क्या तुम लोगों को सचमुच नहीं पता कि मैं तुम लोगों से क्या अपेक्षा करता हूँ? आपस में सँवाद करो : तुम लोगों ने वास्तव में क्या पाया है? तुमने इतने सालों तक परमेश्वर में आस्था रखी है, फिर भी तुम लोगों ने इतना ही प्राप्त किया है—क्या तुम लोगों को शर्म नहीं आती? क्या तुम लज्जित महसूस नहीं करते? इतने सालों से तुम सत्य मार्ग पर चलने का प्रयास कर रहे हो, फिर भी तुम्हारा आध्यात्मिक कद नगण्य है! अपने मध्य तरुण महिलाओं को देखो, कपड़ों और मेकअप में तुम बहुत ही सुंदर दिखती हो, एक-दूसरे से अपनी तुलना करती हो—और तुलना क्या करती हो? अपनी मौज-मस्ती की? अपनी माँगों की? क्या तुम्हें यह लगता है कि मैं मॉडल भर्ती करने आया हूँ? तुम में ज़रा भी शर्म नहीं है! तुम लोगों का जीवन कहाँ है? जिन चीज़ों के पीछे तुम लोग भाग रही हो, क्या वे तुम्हारी फिज़ूल की इच्छाएँ नहीं हैं? तुम्हें लगता है कि तुम बहुत सुंदर हो, भले ही तुम्हें लगता हो कि तुम बहुत सजी-सँवरी हो, लेकिन क्या तुम सच में गोबर के ढेर में जन्मा कुलबुलाता कीड़ा नहीं हो? आज खुशकिस्मती से तुम जिस स्वर्गिक आशीष का आनंद ले रही हो, वो तुम्हारे सुंदर चेहरे के कारण नहीं है, बल्कि परमेश्वर अपवाद स्वरूप तुम्हें ऊपर उठा रहा है। क्या यह तुम्हें अब भी स्पष्ट नहीं हुआ कि तुम कहाँ से आई हो? जीवन का उल्लेख होने पर, तुम अपना मुँह बंद कर लेती हो और कुछ नहीं बोलती, बुत की तरह गूँगी बन जाती हो, फिर भी तुम सजने-सँवरने की जुर्रत करती हो! फिर भी तुम्हारा झुकाव अपने चेहरे पर लाली और पावडर पोतने की तरफ रहता है! और अपने बीच छबीले नौजवानों को देखो, ये अनुशासनहीन पुरुष जो दिनभर मटरगश्ती करते फिरते हैं, बेलगाम रहते हैं और अपने चेहरे पर लापरवाही के हाव-भाव लिए रहते हैं। क्या किसी व्यक्ति को ऐसा बर्ताव करना चाहिए? तुम लोगों में से हर एक आदमी और औरत का ध्यान दिनभर कहाँ रहता है? क्या तुम लोगों को पता है कि तुम लोग अपने भरण-पोषण के लिए किस पर निर्भर हो? अपने कपड़े देखो, देखो तुम्हारे हाथों ने क्या प्राप्त किया है, अपने पेट पर हाथ फेरो—इतने बरसों में तुमने अपनी आस्था में जो खून-पसीना बहाया है, उसकी कीमत के बदले तुमने क्या लाभ प्राप्त किया है? तुम अब भी पर्यटन-स्थल के बारे में सोचते हो, अपनी बदबूदार देह को सजाने-सँवारने की सोचते हो—निरर्थक काम! तुमसे सामान्यता का इंसान बनने के लिए कहा जाता है, फिर भी तुम असामान्य हो, यही नहीं तुम पथ-भ्रष्ट भी हो। ऐसा व्यक्ति मेरे सामने आने की धृष्टता कैसे कर सकता है? इस तरह की मानवीयता के साथ, तुम्हारा अपनी सुंदरता का प्रदर्शन करना, देह पर इतराना और हमेशा देह की वासनाओं में जीना—क्या तुम मलिन हैवानों और दुष्ट आत्माओं के वंशज नहीं हो? मैं ऐसे मलिन हैवानों को लंबे समय तक अस्तित्व में नहीं रहने दूँगा! ऐसा मानकर मत चलो कि मुझे पता ही नहीं कि तुम दिल में क्या सोचते हो। तुम अपनी वासना और देह को भले ही कठोर नियंत्रण में रख लो, लेकिन तुम्हारे दिल में जो विचार हैं, उन्हें मैं कैसे न जानूँगा? तुम्हारी आँखों की सारी ख्वाहिशों को मैं कैसे न जानूँगा? क्या तुम युवतियाँ अपनी देह का प्रदर्शन करने के लिए अपने आपको इतना सुंदर नहीं बनाती हो? पुरुषों से तुम्हें क्या लाभ होगा? क्या वे तुम लोगों को अथाह पी‌ड़ा से बचा सकते हैं? जहाँ तक तुम लोगों में छबीले नौजवानों की बात है, तुम सब अपने आपको सभ्य और विशिष्ट दिखाने के लिए सजते-सँवरते हो, लेकिन क्या यह तुम्हारी सुंदरता पर ध्यान ले जाने के लिए रचा गया फरेब नहीं है? तुम लोग यह किसलिए कर रहे हो? महिलाओं से तुम लोगों को क्या फायदा होगा? क्या वे तुम लोगों के पापों का मूल नहीं हैं? मैंने तुम स्त्री-पुरुषों से बहुत-सी बातें कही हैं, लेकिन तुम लोगों ने उनमें से कुछ का ही पालन किया है। तुम लोगों के कान बहरे हैं, तुम लोगों की आँखें कमज़ोर पड़ चुकी हैं, तुम्हारा दिल इस हद तक कठोर है कि तुम्हारे जिस्मों में वासना के अलावा कुछ नहीं है, और यह ऐसा है कि तुम इसके चँगुल में फँस गए हो और अब निकल नहीं सकते। गंदगी और मैल में छटपटाते तुम जैसे कीड़ों के इर्द-गिर्द कौन आना चाहता है? मत भूलो कि तुम्हारी औकात उनसे ज़्यादा कुछ नहीं है जिन्हें मैंने गोबर के ढेर से निकाला है, तुम्हें मूलत: सामान्य मानवीयता से संसाधित नहीं किया गया था। मैं तुम लोगों से उस सामान्य मानवीयता की अपेक्षा करता हूँ जो मूलत: तुम्हारे अंदर नहीं थी, इसकी नहीं कि तुम अपनी वासना की नुमाइश करो या अपनी दुर्गंध-युक्त देह को बेलगाम छोड़ दो, जिसे बरसों तक शैतान ने प्रशिक्षित किया है। जब तुम लोग सजते-सँवरते हो, तो क्या तुम्हें डर नहीं लगता कि तुम इसमें और गहरे फँस जाओगे? क्या तुम लोगों को पता नहीं कि तुम लोग मूलत: पाप के हो? क्या तुम लोग जानते नहीं कि तुम्हारी देह वासना से इतनी भरी हुई है कि यह तुम्हारे कपड़ों तक से रिसती है, तुम लोगों की असह्य रूप से बदसूरत और मलिन दुष्टों जैसी स्थितियों को प्रकट करती है? क्या बात ऐसी नहीं है कि तुम लोग इसे दूसरों से ज़्यादा बेहतर ढंग से जानते हो? क्या तुम्हारे दिलों को, तुम्हारी आँखों को, तुम्हारे होठों को मलिन दुष्टों ने बिगाड़ नहीं दिया है? क्या तुम्हारे ये अंग गंदे नहीं हैं? क्या तुम्हें लगता है कि जब तक तुम कोई क्रियाकलाप नहीं करते, तब तक तुम सर्वाधिक पवित्र हो? क्या तुम्हें लगता है कि सुदंर वस्त्रों में सजने-सँवरने से तुम्हारी नीच आत्माएँ छिप जाएँगी? ऐसा नहीं होगा! मेरी सलाह है कि अधिक यथार्थवादी बनो : कपटी और नकली मत बनो और अपनी नुमाइश मत करो। तुम लोग अपनी वासना को लेकर एक-दूसरे के सामने शान बघारते हो, लेकिन बदले में तुम लोगों को अनंत यातनाएँ और निर्मम ताड़ना ही मिलेगी! तुम लोगों को एक-दूसरे से आँखें लड़ाने और रोमाँस में लिप्त रहने की क्या आवश्यकता है? क्या यह तुम लोगों की सत्यनिष्ठा का पैमाना और ईमानदारी की हद है? मुझे तुम लोगों में से उनसे नफरत है जो बुरी औषधि और जादू-टोने में लिप्त रहते हैं; मुझे तुम लोगों में से उन नौजवान लड़के-लड़कियों से नफरत है जिन्हें अपने शरीर से लगाव है। बेहतर होगा अगर तुम लोग स्वयं पर नियंत्रण रखो, क्योंकि अब आवश्यक है कि तुम्हारे अंदर सामान्य मानवीयता हो, और तुम्हें अपनी वासना की नुमाइश करने की अनुमति नहीं है—लेकिन फिर भी तुम लोग हाथ से कोई मौका जाने नहीं देते हो, क्योंकि तुम्हारी देह बहुत उछाल मार रही है और तुम्हारी वासना बहुत प्रचंड है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

379. जब मैं काम करता हूँ, तो तुम लोग लगातार मेरे खिलाफ काम करते रहते हो; तुम लोग कभी मेरे वचनों का अनुपालन नहीं करते। मैं अपना कार्य करता हूँ, और तुम अपना "काम" करते हो, और अपना छोटा-सा राज्य बनाते हो। तुम लोग लोमड़ियों और कुत्तों से कम नहीं हो, सब-कुछ मेरे विरोध में कर रहे हो! तुम लगातार उन्हें अपने आगोश में लाने का प्रयास कर रहे हो जो तुम्हें अपना अविभक्त प्रेम समर्पित करते हैं—तुम लोगों की श्रद्धा कहाँ है? तुम्हारा हर काम कपट से भरा होता है! तुम्हारे अंदर न आज्ञाकारिता है, न श्रद्धा है, तुम्हारा हर काम कपटपूर्ण और ईश-निंदा करने वाला होता है! क्या ऐसे लोगों को बचाया जा सकता है? जो पुरुष यौन-संबंधों में अनैतिक और लम्पट होते हैं, वे हमेशा कामोत्तेजक वेश्याओं को आकर्षित करके उनके साथ मौज-मस्ती करना चाहते हैं। मैं ऐसे काम-वासना में लिप्त अनैतिक राक्षसों को कतई नहीं बचाऊंगा। मैं तुम मलिन राक्षसों से घृणा करता हूँ, तुम्हारा व्यभिचार और तुम्हारी कामोत्तेजना तुम लोगों को नरक में धकेल देगी। तुम लोगों को अपने बारे में क्या कहना है? मलिन राक्षसो और दुष्ट आत्माओ, तुम लोग घिनौने हो! तुम निकृष्ट हो! ऐसे कूड़े-करकट को कैसे बचाया जा सकता है? क्या ऐसे लोगों को जो पाप में फँसे हुए हैं, उन्हें अब भी बचाया जा सकता है? आज, यह सत्य, यह मार्ग और यह जीवन तुम लोगों को आकर्षित नहीं करता; बल्कि, तुम लोग पाप की ओर, धन की ओर, रुतबे की ओर, शोहरत और लाभ की ओर आकर्षित होते हो; देह-सुख की ओर आकर्षित होते हो; सुंदर स्त्री-पुरुषों की ओर आकर्षित होते हो। मेरे राज्य में प्रवेश करने की तुम लोगों की क्या पात्रता है? तुम लोगों की छवि परमेश्वर से भी बड़ी है, तुम लोगों का रुतबा परमेश्वर से भी ऊँचा है, लोगों में तुम्हारी प्रतिष्ठा का तो कहना ही क्या—तुम लोग ऐसे आदर्श बन गए हो जिन्हें लोग पूजते हैं। क्या तुम प्रधान स्वर्गदूत नहीं बन गए हो? जब लोगों के परिणाम उजागर होते हैं, जो वो समय भी है जब उद्धार का कार्य समाप्ति के करीब होने लगेगा, तो तुम लोगों में से बहुत-से ऐसी लाश होंगे जो उद्धार से परे होंगे और जिन्हें हटा दिया जाना होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

380. मैं तुम लोगों के जीवन में प्रकट होता हूँ, लेकिन तुम लोग इससे हमेशा अनजान रहते हो। यहाँ तक कि तुम लोग मुझे पहचानते भी नहीं। मेरे द्वारा कहे गए वचनों में से लगभग आधे वचन तुम लोगों का न्याय करते हैं, और वे उससे आधा प्रभाव ही हासिल कर पाते हैं, जितना कि उन्हें करना चाहिए, जो तुम्हारे भीतर गहरा भय पैदा करने के लिए है। शेष आधे वचन तुम लोगों को जीवन के बारे में सिखाने के लिए, और स्वयं को संचालित कैसे करें, इस बारे में बताने के लिए हैं। लेकिन जहाँ तक तुम्हारा संबंध है, ऐसा लगता है, जैसे वे तुम लोगों के लिए मौजूद ही नहीं हैं, या जैसे कि तुम लोग बच्चों की बातें सुन रहे थे, ऐसी बातें जिन्हें सुनकर तुम हमेशा दबे-ढके ढंग से मुसकरा देते हो, लेकिन उन पर कार्रवाई कुछ नहीं करते। तुम लोग इन चीज़ों के बारे में कभी चिंतित नहीं रहे हो; तुम लोगों ने हमेशा मेरे कार्यों को मुख्यत: जिज्ञासा के नाप पर ही देखा है, जिसका परिणाम यह हुआ है कि अब तुम लोग अँधेरों में गिर गए हो और प्रकाश को देख नहीं सकते, और इसलिए तुम लोग अँधेरे में दयनीय ढंग से रो रहे हो। मैं जो चाहता हूँ, वह तुम लोगों की आज्ञाकारिता है, तुम्हारी बेशर्त आज्ञाकारिता, और इससे भी बढ़कर, मेरी अपेक्षा है कि तुम लोग मेरी कही हर चीज़ के बारे में पूरी तरह से निश्चित रहो। तुम लोगों को उपेक्षा का रवैया नहीं अपनाना चाहिए और खास तौर से मेरी कही चीज़ों के बारे में चयनात्मक व्यवहार नहीं करना चाहिए, न ही मेरे वचनों और कार्य के प्रति उदासीन रहना चाहिए, जिसके कि तुम आदी हो। मेरा कार्य तुम लोगों के बीच किया जाता है और मैंने तुम लोगों के लिए बहुत सारे वचन प्रदान किए हैं, लेकिन यदि तुम लोग मेरे साथ ऐसा व्यवहार करोगे, तो जो कुछ तुमने न तो हासिल किया और न ही जिसे अभ्यास में लाए हो, उसे मैं केवल गैर-यहूदी परिवारों को दे सकता हूँ। समस्त सृजित प्राणियों में से कौन है, जिसे मैंने अपने हाथों में नहीं रखा हुआ है? तुम लोगों में से अधिकांश "पके बुढ़ापे" की उम्र के हो और तुम लोगों के पास इस तरह के कार्य को स्वीकार करने की ऊर्जा नहीं है, जो मेरे पास है। तुम लोग मुश्किल से गुज़ारा करने वाले हानहाओ पक्षी[ग] की तरह हो, और तुम ने कभी भी मेरे वचनों को गंभीरता से नहीं लिया है। युवा लोग अत्यंत व्यर्थ और अति-आसक्त हैं और मेरे कार्य पर और भी कम ध्यान देते हैं। वे मेरे भोज के व्यंजनों का आनंद लेने में कोई दिलचस्पी नहीं रखते; वे उस छोटे-से पक्षी की तरह हैं, जो अपने पिंजरे से बाहर निकलकर बहुत दूर जाने के लिए उड़ गया है। इस तरह के युवा और वृद्ध लोग मेरे लिए कैसे उपयोगी हो सकते हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'युवा और वृद्ध लोगों के लिए वचन' से उद्धृत

381. कई लोग परमेश्वर के वचन को प्रतिदिन पढ़ने के लिए ही उठाते हैं, यहां तक कि उसके उत्कृष्ट अंशों को सबसे बेशकीमती सम्पत्ति के तौर पर स्मृति में अंकित कर लेते हैं और इससे भी अधिक हर जगह परमेश्वर के वचनों का प्रचार करते हैं, दूसरों की उसके वचनों से, आपूर्ति करते हैं, सहायता करते हैं। वे यह सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर की गवाही देना हुआ, उसके वचन की गवाही देना हुआ; ऐसा करना परमेश्वर के मार्ग का पालन करना हुआ; वे यह सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीना हुआ, ऐसा करना उसके वचन को अपने जीवन में लागू करना हुआ, कि ऐसा करने से उन्हें परमेश्वर की सराहना प्राप्त होगी और वे बचाए जाएंगे और पूर्ण बनेंगे। परन्तु, परमेश्वर के वचन का प्रचार करते हुए भी, वे कभी परमेश्वर के वचन पर अमल नहीं करते या अपने आप को परमेश्वर के वचन में जो प्रकाशित किया गया है उसके अनुरूप नहीं ढालते। इसके बजाय, वे छल से दूसरों की प्रशंसा और भरोसे को प्राप्त करने, अपने आप ही प्रबंधन में प्रवेश करने, परमेश्वर की महिमा का गबन करने और उसे चुराने के लिए परमेश्वर के वचन को काम में लाते हैं। वे परमेश्‍वर के वचन के प्रसार से मिले अवसर को, परमेश्‍वर का कार्य और उसकी प्रशंसा पाने के रूप में उपयोग करने की व्‍यर्थ आशा करते हैं। कितने ही वर्ष गुज़र चुके हैं, परन्तु ये लोग परमेश्वर के वचन के प्रचार करने की प्रक्रिया में, न केवल परमेश्वर की प्रशंसा को प्राप्त करने में असमर्थ रहे हैं, परमेश्वर के वचनों की गवाही देने की प्रक्रिया में न केवल वे उस मार्ग को खोजने में असफल रहे हैं जिसका उन्हें अनुसरण करना चाहिये, दूसरों को परमेश्वर के वचनों के माध्यम से सहायता और आपूर्ति पहुंचाने की प्रक्रिया में न केवल उन्होंने अपने को उससे वंचित रखा है, और इन सभी बातों को करने की प्रक्रिया में वे न केवल परमेश्वर को जानने में या परमेश्वर के प्रति स्वयं में वास्तविक श्रद्धा की जगाने में असमर्थ रहे हैं; बल्कि, परमेश्वर के बारे में उनकी ग़लतफ़हमियां और भी गहरा रही हैं; उस पर भरोसा न करना और भी अधिक बढ़ रहा है और उसके बारे में उनकी कल्पनाएं और भी अधिक अतिशयोक्तिपूर्ण होती जा रही हैं। परमेश्वर के बारे में अपनी ही परिकल्पना से आपूर्ति और निर्देशन पाकर, वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे बिल्कुल मनोनुकूल परिस्थिति में हों, मानो वे अपने कौशल का सरलता से इस्तेमाल कर रहे हैं, मानो उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य, अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है, और मानो उन्होंने एक नया जीवन जीत लिया है और बचा लिए गए हैं, मानो परमेश्वर के वचनों को धाराप्रवाह बोलने से उन्‍होंने सत्य तक पहुँच बना ली है, परमेश्वर के अभिप्राय को समझ लिया है और परमेश्वर को जानने के मार्ग को खोज लिया है, मानो प्रचार करने की प्रक्रिया में, वे परमेश्वर से कई बार रू-ब-रू होते हैं। और अक्सर वे "द्रवित" होकर बार-बार रोते हैं और बहुधा परमेश्वर के वचनों में "परमेश्वर" द्वारा अगुवाई प्राप्त करते हुए, वे उसकी गांभीर्य भरी परवाह और उदार प्रयोजनों का निरंतर बोध करते प्रतीत होते हैं और साथ-ही-साथ मनुष्य के लिए परमेश्वर के उद्धार और उसके प्रबंधन को भी जानने वाले, उसके सार को जानने वाले और उसके धार्मिक स्वभाव को समझने वाले प्रतीत होते हैं। इस आधार पर, वे परमेश्वर के अस्तित्‍व पर और दृढ़ता से विश्वास करते, उसकी महानता की स्थिति से और भी अच्छे से परिचित होते और उसकी भव्यता एवं श्रेष्ठता को गहराई से महसूस करते प्रतीत होते हैं। परमेश्वर के वचन के ज्ञान की सतही जानकारी से ओत-प्रोत होने के बाद, ऐसा प्रतीत होता है कि उनके विश्वास में वृद्धि हुई है, कष्टों को सहने के उनके संकल्प को दृढ़ता मिली है और परमेश्वर के ज्ञान की उनकी गहराई और बढ़ी है। शायद ही वे यह जानते हैं कि जब तक वे परमेश्वर के वचन का वास्तविक अनुभव नहीं करेंगे, तब तक उनका परमेश्वर के बारे में सारा ज्ञान और उसके बारे में उनके विचार उनकी ही काल्पनिक इच्छाओं और अनुमान से निकला हुआ होगा। उनका विश्वास परमेश्वर की किसी भी जांच के सामने ठहर नहीं सकेगा, उनकी तथाकथित आध्‍यात्मिकता और उच्चता परमेश्वर के किसी भी परीक्षण या जांच-पड़ताल के तहत बिल्कुल भी नहीं ठहर सकेगी, उनका संकल्प रेत पर बने हुए महल से अधिक कुछ नहीं, और उनका तथाकथित परमेश्वर का ज्ञान भी उनकी कोरी-कल्पनाओं की उड़ान है। वास्तव में, ये लोग, जिन्होंने एक दृष्टि से, परमेश्वर के वचनों में काफी श्रम डाला है, उन्होंने कभी भी यह महसूस नहीं किया कि वास्तविक आस्‍था क्या है, वास्तविक आज्ञाकारिता क्या है, वास्तविक सरोकार क्या है, या परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान क्या है। वे सिद्धान्तों, कल्पनाओं, ज्ञान, भेंट, परम्परा, अंधविश्वास और यहाँ तक कि मानवता के नैतिक मूल्यों को लेकर उन्हें परमेश्वर पर विश्वास करने और उसके पीछे चलने के लिए "निवेश पूंजी" और "सैन्य हथियार" में बदल देते हैं, यहां तक कि उन्‍हें परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने का आधार बना लेते हैं। साथ ही, परमेश्वर के निरीक्षण, परीक्षण, ताड़ना करने और न्याय का सामना करने, उनसे संघर्ष करने के लिए और परमेश्वर को जानने के लिए, वे इस पूंजी और असलहे को लेकर उसे जादुई ताबीज़ में बदल देते हैं। अंत में, जो कुछ भी वे एकत्रित करते हैं उसमें परमेश्वर के बारे में, धार्मिक संकेतार्थों, सामंती अंधविश्वासों, और सभी प्रकार की प्रेम, वीभत्‍स और रहस्‍यमयी कथाओं से ओत-प्रोत निष्‍कर्षों से अधिक और कुछ नहीं होता, तथा उनका परमेश्वर को जानने और परिभाषित करने का तरीका केवल ऊपर स्वर्ग में या आसमान में किसी वृद्ध के होने में विश्वास करने वाले लोगों के सांचे में ही ढला होता है होती है—जबकि परमेश्वर की वास्तविकता, उसका सार, उसका स्वभाव, उसका स्‍वरूप और अस्तित्‍व, जिन बातों का वास्ता सच्चे परमेश्वर से है—ऐसी बातें हैं जो उनकी समझ में नहीं आईं हैं, जो पूरी तरह से असंगत और दो ध्रुवों की समान पूरी तरह विपरीत हैं। इस प्रकार से, हालांकि वे परमेश्वर के वचन के प्रावधान और पालन-पोषण में जी रहे हैं, सही मायनों में वे फिर भी परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलने में वाकई असमर्थ हैं। इसका वास्‍तविक कारण यह है कि वे कभी भी परमेश्वर से परिचित नहीं हुए हैं, न ही उन्होंने उसके साथ कभी सच्चा सम्बन्ध या संवाद रखा है अत: उनके लिए यह असम्भव है कि वे परमेश्वर के साथ पारस्परिक समझ स्‍थापित कर सकें या फिर वे स्‍वयं में परमेश्वर में सच्‍चा विश्‍वास, उसका अनुसरण या उसकी आराधना जागृत कर सकें। कि उन्हें इस प्रकार से परमेश्वर के वचनों देखना चाहिए, कि इस प्रकार उन्‍हें परमेश्वर देखना चाहिए—इस दृष्टिकोण और रवैये ने उन्हें उनके प्रयासों में खाली हाथ रहने और परमेश्वर का भय मानने तथा बुराई से दूर रहने के मार्ग पर बने न रह पाने के लिए अनन्तकाल तक अभिशापित कर दिया है। जिस लक्ष्य को वे साध रहे हैं और जिस ओर वे जा रहे हैं, वह इसको प्रदर्शित करता है कि अनन्त काल से वे परमेश्वर के शत्रु रहे हैं और अनन्त काल तक वे कभी भी उद्धार को प्राप्त नहीं कर सकेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

382. कई ऐसे मार्ग हैं जो तुम लोगों की समझ से परे हैं, कई ऐसी बातें हैं जिन्हें तुम लोग नहीं समझते हो। तुम लोग बहुत अज्ञानी हो। मैं तुम लोगों की हैसियत और तुम लोगों की कमियों को अच्छी तरह से जानता हूँ। इसलिए, भले ही कई ऐसे वचन हैं जिन्हें तुम लोग आत्मसात करने में समर्थ नहीं होगे, फिर भी मैं तुम सब लोगों को ये सत्य बताना चाहता हूँ जिन्हें तुमने पहले कभी नहीं समझा है—क्योंकि मुझे चिंता रहती है कि क्या, अपनी वर्तमान हैसियत के साथ, तुम लोग मेरी गवाही देने में समर्थ होगे। ऐसा नहीं है कि मैं तुम लोगों को छोटा बनाता हूँ। तुम सब जंगली जानवर हो जो मेरे औपचारिक प्रशिक्षण के माध्यम से नहीं गुज़रे हो, और यह सचमुच संदेहास्पद है कि तुममें कितनी महिमा है। हालाँकि तुम पर कार्य करते हुए मैंने जबरदस्त ऊर्जा खर्च की है, तब भी ऐसा लगता है कि तुममें सकारात्मक तत्व व्यवहारिक रूप से अस्तित्वहीन हैं, जबकि नकारात्मक तत्वों को अँगुलियों पर गिना जा सकता है और केवल शैतान को शर्मिंदा करने के लिए गवाहियों का ही काम कर सकते हैं। तुम लोगों के अंदर बाकी सब कुछ शैतान का ज़हर है। तुम लोग मुझे ऐसे दिखाई देते हो जैसे कि तुम लोग उद्धार से परे हो। जैसी परिस्थिति है, वैसे मैं तुम लोगों की विभिन्न अभिव्यक्तियों और व्यवहारों को देखता हूँ और अंततः मैं तुम लोगों की असली हैसियत को जानता हूँ। यही कारण है कि मैं तुम लोगों के लिए चिंता करता रहता हूँ: अपने दम पर जीवन जीने के लिए छोड़ दिया जाये तो क्या मनुष्य सचमुच में आज जो है उससे बेहतर या उसकी तुलना के योग्य हो पाएगा? क्या तुम लोग अपनी मामूली हैसियत पर व्याकुल नहीं हो? क्या तुम लोग सचमुच में इस्राएल के चुने हुए लोगों के जैसे, सभी परिस्थितियों में मेरे और केवल मेरे प्रति वफादार बन सकते हो? जिस आचरण का प्रदर्शन तुम लोग कर रहे हो वह माता-पिता के पास से भटके हुए बच्चों का शरारतीपन नहीं है, बल्कि वह पाशविकता है जो पशुओं में उनके स्वामियों के चाबुक की पहुँच के बाहर प्रस्फुटित होती है। तुम लोगों को अपने स्वभाव का पता होना चाहिए, जो कि ऐसी कमज़ोरी है जिसे तुम सभी लोगों में देखा जा सकता है, तुम लोगों की सामान्य बीमारी। तुम्हारे लिए आज मेरा यही प्रोत्साहन है कि तुम मेरे लिए गवाही दो। किसी भी परिस्थिति में पुरानी बीमारी को फिर से न भड़कने दो। सबसे महत्वपूर्ण बात गवाही देना है। यह मेरे कार्य का मर्म है। तुम लोगों को, विश्वास करते हुए और फिर आज्ञापालन करते हुए, मेरे वचनों को वैसे ही ग्रहण करना चाहिए जैसे मरियम ने यहोवा के प्रकाशन को स्वीकार किया था जो उस तक एक स्वप्न में आया था। केवल यही पवित्र होने के रूप में योग्य है। क्योंकि तुम लोग वह हो जो मेरे वचनों को सबसे अधिक सुनते हो, वह हो जो मेरे द्वारा सबसे अधिक धन्य किए गए हो। मैं तुम लोगों को अपनी समस्त मूल्यवान सम्पतियाँ दे रहा हूँ, तुम लोगों को पूर्णतः सब कुछ प्रदान कर रहा हूँ। हालांकि, तुम लोगों की और इस्राएल के लोगों की हैसियत बहुत अलग है, पूरी तरह से भिन्न है। फिर भी उनकी तुलना में, तुम लोग बहुत ज्यादा प्राप्त कर रहे हो। जबकि वे मेरे प्रकटन की हताशापूर्ण ढंग से प्रतीक्षा करते हैं, पर तुम लोग मेरे साथ, मेरी दौलत को साझा करते हुए, सुखद दिन बिताते हो। तुलनात्मक रूप से, मेरे ऊपर चीखने और मेरे साथ झगड़ने और मेरी सम्पत्ति में से हिस्सों की माँग करने का अधिकार तुम लोगों को कौन देता है? क्या तुम पर्याप्त नहीं पा रहे हो? मैं तुम्हें बहुत देता हूँ, परन्तु बदले में तुम लोग जो मुझे देते हो वह हृदयविदारक उदासी और व्यग्रता और अदम्य नाराज़गी और असंतोष है। तुम बहुत घृणास्पद हो, फिर भी तुम दया को जगाते हो। इसलिए मेरे पास क्रोध को निगलने और तुम्हारे बारे में अपनी आपत्ति जताने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं है। इन कई हज़ार वर्षों के कार्य में, मैंने मानव जाति पर पहले कभी भी कोई आपत्ति नहीं की थी क्योंकि मैंने पाया है कि मनुष्य के विकास के इतिहास में, तुम लोगों में से केवल धोखेबाज़ ही सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं। वे प्राचीन काल के प्रसिद्ध पूर्वज द्वारा तुम लोगों के लिए छोड़ी गई बहुमूल्य धरोहरों जैसे हैं। मैं कैसे उन मानव-से-निम्न सूअरों और कुत्तों से नफ़रत करूँ। तुम लोग बहुत बेशर्म हो! तुम लोगों का चरित्र बहुत अधम है! तुम लोगों के हृदय बहुत कठोर हैं! यदि मैं अपने इन वचनों और अपने इस कार्य को इस्राएलियों के बीच ले गया होता, तो मैं बहुत पहले ही महिमा को प्राप्त कर चुका होता। परन्तु तुम लोगों के बीच ऐसा नहीं है। तुम लोगों के बीच सिर्फ़ अतिशय अवहेलना, तुम लोगों की उदासीनता और तुम लोगों के बहाने हैं। तुम लोग बहुत संवेदनाशून्य और बहुत मूल्यहीन हो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है?' से उद्धृत

383. मेरे सामने तुम लोगों के कई वर्षों के व्यवहार ने मुझे बिना दृष्टांत के उत्तर दे दिया, और इस उत्तर का प्रश्न यह है कि : "सत्य और सच्चे परमेश्वर के सामने मनुष्य का रवैया क्या है?" मैंने मनुष्य के लिए जो प्रयास किए हैं, वे मनुष्य के लिए मेरे प्रेम के सार को प्रमाणित करते हैं, और मेरे सामने मनुष्य का हर कार्य सत्य से घृणा करने और मेरा विरोध करने के उसके सार को प्रमाणित करता है। मैं हर समय उन सबके लिए चिंतित रहता हूँ, जो मेरा अनुसरण करते हैं, लेकिन मेरा अनुसरण करने वाले कभी मेरे वचनों को ग्रहण करने में समर्थ नहीं होते; यहाँ तक कि वे मेरे सुझाव स्वीकार करने में भी सक्षम नहीं हैं। यह बात मुझे सबसे ज़्यादा उदास करती है। कोई भी मुझे कभी भी समझ नहीं पाया है, और इतना ही नहीं, कोई भी मुझे कभी भी स्वीकार नहीं कर पाया है, बावजूद इसके कि मेरा रवैया नेक और मेरे वचन सौम्य हैं। सभी लोग मेरे द्वारा उन्हें सौंपा गया कार्य अपने विचारों के अनुसार करने की कोशिश करते हैं; वे मेरे इरादे को जानने की कोशिश नहीं करते, मेरी अपेक्षाओं के बारे में पूछने की बात तो छोड़ ही दीजिए। वे अभी भी वफादारी के साथ मेरी सेवा करने का दावा करते हैं, जबकि वे मेरे खिलाफ विद्रोह करते हैं। बहुतों का यह मानना है कि जो सत्य उन्हें स्वीकार्य नहीं हैं या जिनका वे अभ्यास नहीं कर पाते, वे सत्य ही नहीं हैं। ऐसे लोगों में सत्य ऐसी चीज़ बन जाते हैं, जिन्हें नकार दिया जाता है और दरकिनार कर दिया जाता है। उसी समय, लोग मुझे वचन में परमेश्वर के रूप में पहचानते हैं, परंतु साथ ही मुझे एक ऐसा बाहरी व्यक्ति मानते हैं, जो सत्य, मार्ग या जीवन नहीं है। कोई इस सत्य को नहीं जानता : मेरे वचन सदा-सर्वदा अपरिवर्तनीय सत्‍य हैं। मैं मनुष्य के लिए जीवन की आपूर्ति और मानव-जाति के लिए एकमात्र मार्गदर्शक हूँ। मेरे वचनों का मूल्य और अर्थ इससे निर्धारित नहीं होता कि उन्हें मानव-जाति द्वारा पहचाना या स्वीकारा जाता है या नहीं, बल्कि स्वयं वचनों के सार द्वारा निर्धारित होता है। भले ही इस पृथ्वी पर एक भी व्यक्ति मेरे वचनों को ग्रहण न कर पाए, मेरे वचनों का मूल्य और मानव-जाति के लिए उनकी सहायता किसी भी मनुष्य के लिए अपरिमेय है। इसलिए ऐसे अनेक लोगों से सामना होने पर, जो मेरे वचनों के खिलाफ विद्रोह करते हैं, उनका खंडन करते हैं, या उनका पूरी तरह से तिरस्कार करते हैं, मेरा रुख केवल यह रहता है : समय और तथ्यों को मेरी गवाही देने दो और यह दिखाने दो कि मेरे वचन सत्य, मार्ग और जीवन हैं। उन्हें यह दिखाने दो कि जो कुछ मैंने कहा है, वह सही है, और वह ऐसा है जिसकी आपूर्ति लोगों को की जानी चाहिए, और इतना ही नहीं, जिसे मनुष्य को स्वीकार करना चाहिए। मैं उन सबको, जो मेरा अनुसरण करते हैं, यह तथ्य ज्ञात करवाऊँगा : जो लोग पूरी तरह से मेरे वचनों को स्वीकार नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों का अभ्यास नहीं कर सकते, जिन्हें मेरे वचनों में कोई लक्ष्य नहीं मिल पाता, और जो मेरे वचनों के कारण उद्धार प्राप्त नहीं कर पाते, वे लोग हैं जो मेरे वचनों के कारण निंदित हुए हैं और इतना ही नहीं, जिन्होंने मेरे उद्धार को खो दिया है, और मेरी लाठी उन पर से कभी नहीं हटेगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम लोगों को अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए' से उद्धृत

384. मनुष्य का स्वभाव मेरे सार से पूर्णतः भिन्न है; ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति पूरी तरह से शैतान से उत्पन्न होती है और मनुष्य की प्रकृति को शैतान द्वारा संसाधित और भ्रष्ट किया गया है। अर्थात्, मनुष्य अपनी बुराई और कुरूपता के प्रभाव के अधीन जीवित रहता है। मनुष्य सत्य के संसार या पवित्र वातावरण में बड़ा नहीं होता है, और प्रकाश में तो बिलकुल नहीं रहता है। इसलिए, जन्म से ही प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति के भीतर सत्य सहज रूप से निहित हो, यह संभव नहीं है, और इसके अलावा वे परमेश्वर के भय, परमेश्वर की आज्ञाकारिता के सार के साथ तो पैदा हो ही नहीं सकते हैं। इसके विपरीत, वे एक ऐसी प्रकृति से युक्त होते हैं जो परमेश्वर का विरोध करती है, परमेश्वर की अवज्ञा करती है, और उनमें सत्य के लिए कोई प्रेम नहीं होता है। यही प्रकृति वह समस्या है जिसके बारे में मैं बात करना चाहता हूँ—विश्वासघात।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (2)' से उद्धृत

385. ऐसा व्यवहार जो पूरी तरह से मेरी आज्ञा का पालन नहीं कर सकता है, विश्वासघात है। ऐसा व्यवहार जो मेरे प्रति निष्ठावान नहीं हो सकता है विश्वासघात है। मेरे साथ छल करना और मेरे साथ धोखा करने के लिए झूठ का उपयोग करना, विश्वासघात है। धारणाओं से भरा होना और हर जगह उन्हें फैलाना विश्वासघात है। मेरी गवाहियों और हितों की रक्षा नहीं कर पाना विश्वासघात है। दिल में मुझसे दूर होते हुए भी झूठमूठ मुस्कुराना विश्वासघात है। ये सभी विश्वासघात के काम हैं जिन्हें करने में तुम लोग हमेशा सक्षम रहे हो, और ये तुम लोगों के बीच आम बात है। तुम लोगों में से शायद कोई भी इसे समस्या न माने, लेकिन मैं ऐसा नहीं सोचता हूँ। मैं अपने साथ किसी व्‍यक्ति के विश्वासघात को एक तुच्छ बात नहीं मान सकता हूँ, और निश्‍चय ही, मैं इसे अनदेखा नहीं कर सकता हूँ। अब, जबकि मैं तुम लोगों के बीच कार्य कर रहा हूँ, तो तुम लोग इस तरह से व्‍यवहार कर रहे हो—यदि किसी दिन तुम लोगों की निगरानी करने के लिए कोई न हो, तो क्या तुम लोग ऐसे डाकू नहीं बन जाओगे जिन्होंने खुद को राजा घोषित कर दिया है? जब ऐसा होगा और तुम विनाश का कारण बनोगे, तब तुम्हारे पीछे उस गंदगी को कौन साफ करेगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (1)' से उद्धृत

386. इसे भाग्य पर मत छोड़ दो कि अगर तुम लोगों ने किसी के साथ गलत नहीं किया है तो तुम लोगों की विश्वासघात की प्रकृति नहीं है। यदि तुम ऐसा ही सोचते हो तो तुम घृणित हो। मेरे सभी वचन, हर बार जो मैं बोलता हूँ, वे सभी लोगों पर लक्षित होते हैं, न कि केवल एक व्यक्ति या एक प्रकार के व्यक्ति पर। सिर्फ इसलिए कि तुमने मेरे साथ एक मामले में विश्वासघात नहीं किया है, यह साबित नहीं करता कि तुम मेरे साथ किसी अन्य मामले में विश्वासघात नहीं कर सकते हो। कुछ लोग अपने विवाह में असफलताओं के दौरान सत्य की तलाश करने में अपना आत्मविश्वास खो देते हैं। कुछ लोग परिवार के टूटने के दौरान मेरे प्रति निष्ठावान होने के अपने दायित्व को त्याग देते हैं। कुछ लोग खुशी और उत्तेजना के एक पल की तलाश करने के लिए मेरा परित्याग कर देते हैं। कुछ लोग प्रकाश में रहने और पवित्र आत्मा के कार्य का आनंद प्राप्त करने के बजाय एक अंधेरी खोह में पड़े रहना पसंद करेंगे। कुछ लोग धन की अपनी लालसा को संतुष्ट करने के लिए दोस्तों की सलाह पर ध्यान नहीं देते हैं, और अब भी अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं कर सकते हैं और स्वयं में बदलाव नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग मेरा संरक्षण प्राप्त करने के लिए केवल अस्थायी रूप से मेरे नाम के अधीन रहते हैं, जबकि अन्य लोग केवल दबाव में मेरे प्रति थोड़ा-सा समर्पित होते हैं क्योंकि वे जीवन से चिपके रहते हैं और मृत्यु से डरते हैं। क्या ये और अन्य अनैतिक और, इससे भी बढ़कर, अशोभनीय कार्य ऐसे व्यवहार नहीं हैं जिनसे लोग लंबे समय पहले अपने दिलों की गहराई में मेरे साथ विश्वासघात करते आ रहे हैं? निस्संदेह, मुझे पता है कि लोग मुझसे विश्वासघात करने की पहले से योजना नहीं बनाते; उनका विश्‍वासघात उनकी प्रकृति का स्वाभाविक रूप से प्रकट होना है। कोई मेरे साथ विश्वासघात नहीं करना चाहता है, और कोई भी इस बात से खुश नहीं है कि उसने मेरे साथ विश्वासघात करने का कोई काम किया है। इसके विपरीत, वे डर से काँप रहे हैं, है ना? तो क्या तुम लोग इस बारे में सोच रहे हो कि तुम लोग इन विश्वासघातों से कैसे छुटकारा पा सकते हो, और कैसे तुम लोग वर्तमान परिस्थिति को बदल सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (1)' से उद्धृत

387. जो परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं वे परमेश्वर के विरोधी हैं, जो परमेश्वर की इच्छा को समझते हैं मगर उस सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जो परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, मगर परमेश्वर के वचनों के सार के विरुद्ध जाते हैं, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जिनमें देहधारी परमेश्वर की अवधारणाएँ हैं और जानबूझ कर विद्रोह करते हैं वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जो परमेश्वर के बारे में निर्णय लेते हैं वे परमेश्वर के विरोधी हैं; और जो कोई भी परमेश्वर को जानने में और उनकी गवाही देने में असमर्थ है, वह परमेश्वर का विरोधी है। इसलिये मेरे सत्योपदेश को सुनिए: यदि तुम लोगों को इस मार्ग पर चलने का वास्तव में विश्वास है, तो इस मार्ग पर चलते रहिए। यदि तुम लोग परमेश्वर के विरोध से परहेज नहीं कर सकते हो, तो इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, बेहतर है कि तुम लोग यह मार्ग छोड़कर चले जाओ। अन्यथा यह वास्तव में शुभ के बजाय अशुभ का शकुन है, क्योंकि तुम लोगों की प्रकृति अतिशय भ्रष्ट है। तुम लोगों में लेशमात्र भी स्वामिभक्ति या आज्ञाकारिता, या ऐसा हृदय नहीं है जिसमें धार्मिकता और सत्य की प्यास हो। और न ही तुम लोगों में परमेश्वर के प्रति लेशमात्र भी प्रेम है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के सामने तुम्हारी दशा अति विध्वस्त है। तुम लोगों को जो पालन करना चाहिए वह करने में और जो बोलना चाहिए वह बोलने में तुम लोग सक्षम नहीं हो। तुम लोग उन चीजों का अभ्यास करने में सक्षम नहीं हो जिनका तुम लोगों को अभ्यास करना चाहिए। तुम लोग उस कार्य को करने में सक्षम नहीं हो जो तुम लोगों को करना चाहिए। तुम लोगों में वह स्वामिभक्ति, विवेक, आज्ञाकारिता और संकल्पशक्ति नहीं है जो तुममें होनी चाहिए। तुम लोगों ने उस तकलीफ़ को नहीं झेला है, जो तुम लोगों को झेलनी चाहिए, तुम लोगों में वह विश्वास नहीं है, जो तुम लोगों में होना चाहिए। तुम लोग सभी गुणों से विहीन हो, क्या तुम लोगों के पास जीते रहने के लिए आत्म-सम्मान है? मेरा तुम लोगों से आग्रह है कि अनंत विश्राम के लिए अपनी आँखें बंद कर लेना तुम लोगों के लिए बेहतर है, जिससे तुम परमेश्वर को तुम लोगों के लिए चिंता करने और कष्ट झेलने से बचा सकते हो। तुम लोग परमेश्वर में विश्वास करते हो मगर तुम उसकी इच्छा को नहीं जानते हो; तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो, मगर परमेश्वर की माँगों को पूरा करने में सक्षम नहीं हो। तुम लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हो मगर परमेश्वर को जानते नहीं हो, और ऐसे जीते हो मानो प्रयत्न करने का कोई लक्ष्य नहीं है। तुम लोगों के कोई आदर्श और कोई उद्देश्य नहीं हैं। तुम लोग मनुष्य की तरह जीते हो मगर तुम लोगों के पास विवेक, सत्यनिष्ठा या लेशमात्र भी विश्वसनीयता नहीं है। तुम लोगों को मनुष्य कैसे समझा जा सकता है? तुम लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हो मगर उसे धोखा देते हो। ऊपर से, तुम लोग परमेश्वर का धन ले लेते हो और उसके चढ़ावों को खा जाते हो, मगर अंत में, परमेश्वर के लिए कोई आदर भाव अथवा परमेश्वर के प्रति विवेक का प्रदर्शन नहीं करते हो। यहाँ तक कि तुम लोग परमेश्वर की अत्यंत मामूली माँगों को भी पूरा नहीं कर सकते हो। तो तुम लोगों को मनुष्य कैसे माना जा सकता है? जो भोजन तुम लोग खाते हो और जो साँस तुम लोग लेते हो, वे परमेश्वर से आते हैं, तुम उसके अनुग्रह का आनंद लेते हो, मगर अंत में, तुम लोगों को परमेश्वर का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं होता है। इसके विपरीत, तुम लोग निकम्मे बन गए हो जो परमेश्वर का विरोध करते हो। क्या तब तुम लोग एक जंगली जानवर नहीं हो जो कुत्ते से भी बेहतर नहीं है? क्या जानवरों में कोई ऐसा है जो तुम लोगों की तुलना में अधिक द्वेषपूर्ण है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे सभी लोग जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे वो लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं' से उद्धृत

388. मानवजाति मेरी शत्रु के अलावा और कुछ नहीं है। मानवजाति ऐसी दुष्ट है जो मेरा विरोध और मेरी अवज्ञा करती है। मानवजाति मेरे द्वारा श्रापित दुष्ट की संतान के अतिरिक्त और कोई नहीं है। मानवजाति उस प्रधान दूत की वंशज ही है जिसने मेरे साथ विश्वासघात किया था। मानवजाति और कोई नहीं बल्कि उस शैतान की विरासत है जो बहुत पहले ही मेरे द्वारा ठुकराया गया था और हमेशा से मेरा कट्टर विरोधी शत्रु रहा है। चूँकि सारी मानवजाति के ऊपर का आसमान, बगैर स्पष्टता की ज़रा-सी झलक क, मलिन और अँधकारमय है, और मानव दुनिया स्याह अंधेरे में डूबी हुई है, कुछ इस तरह कि उसमें रहने वाला कोई व्यक्ति अपने चेहरे के सामने हाथ को या अपना सिर उठाने पर सूरज को नहीं देख सकता है। उसके पैरों के नीचे की कीचड़दार और गड्ढों से भरी सड़क, घुमावदार और टेढ़ी-मेढ़ी है; पूरी जमीन पर लाशें बिखरी हुई हैं। अँधेरे कोने मृतकों के अवशेषों से भरे पड़े हैं जबकि ठण्डे और छाया वाले कोनों में दुष्टात्माओं की भीड़ ने अपना निवास बना लिया है। मनुष्यों के संसार में हर कहीं, दुष्टात्माएँ जत्थों में आती-जाती रहती हैं। सभी तरह के जंगली जानवरों की गन्दगी से ढकी हुई संतानें घमासान युद्ध में उलझी हुई हैं, जिनकी आवाज़ दिल में दहशत पैदा करती है। ऐसे समयों में, इस तरह के संसार में, एक ऐसे "सांसारिक स्वर्गलोक" में, कोई व्यक्ति जीवन के आनंद की खोज करने कहाँ जा सकता है? अपने जीवन की मंजिल की खोज करने के लिए कोई कहाँ जाएगा? बहुत पहले से शैतान के पैरों के नीचे रौंदी हुई मानवजाति, शुरू से ही शैतान की छवि लिये एक अभिनेता—उससे भी अधिक, मानवजाति शैतान का मूर्त रूप है, जो उस साक्ष्य के रूप में काम करती है जो जोरदार तरीके से और स्पष्ट रूप से शैतान की गवाही देती है। ऐसी मानवजाति, ऐसे अधम लोगों का झुंड, इस भ्रष्ट मानव परिवार की ऐसी संतान, कैसे परमेश्वर की गवाही दे सकती है? मेरी महिमा किस स्थान से आएगी? कोई मेरी गवाही के बारे में बोलना कहाँ से शुरू कर सकता है? क्योंकि उस शत्रु ने, जो मानवजाति को भ्रष्ट करके मेरे विरोध में खड़ा है, पहले ही उस मानवजाति को जिसे मैंने बहुत पहले बनाया था, जो मेरी महिमा और मेरे जीवन से भरी थी, उसे दबोच कर दूषित कर दिया है। उसने मेरी महिमा को छीन लिया है और उसने मनुष्य को जिस चीज़ से भर दिया है, वह शैतान की कुरूपता की भारी मिलावट वाला ज़हर, और अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष के फल का रस है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक वास्तविक व्यक्ति होने का क्या अर्थ है' से उद्धृत

389. तुम लोग कीचड़ से अलग किये गए थे और हर हाल में, तुम सब उसी मैल से बने थे जिसे कीचड़ के बीच से उठाया गया था, गंदे और परमेश्वर द्वारा घृणित थे। तुम लोग शैतान के थे और कभी उसके द्वारा कुचले और दूषित किये गये थे। इसीलिए यह कहा जाता है कि तुम सब कीचड़ से निकाले गए थे और तुम लोग पवित्र से कहीं दूर, वे गैर-मानवीय वस्तुएँ हो जो काफी समय से शैतान के कपट के लक्ष्य थे। यह तुम सब का सबसे उपयुक्त आंकलन है। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम सब मछली और झींगे जैसी वांछनीय वस्तुओं के विपरीत मूल रूप से रुके हुए पानी और कीचड़ में पाई जाने वाली गन्दगी थे, क्योंकि तुम सब से आनंद देने वाली कोई चीज़ नहीं मिल सकती है। इसे साफ़-साफ़ कहें तो, तुम लोग हीन सामाजिक वर्ग के सबसे नीच जानवर हो, सूअरों और कुत्तों से भी बदतर जानवर हो। सच कहूँ तो, तुम सब को इस तरह से संबोधित करना अतिरेक या अतिशयोक्ति नहीं हैं; बल्कि यह मुद्दे को सरल बना देता है। तुम सभी को ऐसे शब्दों से संबोधित करना वास्तव में तुम्हें सम्मान देने का एक तरीका है। तुम लोगों की अंतर्दृष्टि, बोलचाल, मनुष्यों के रूप में आचरण और कीचड़ में तुम्हारी स्थिति सहित तुम्हारी ज़िंदगी के हर पहलू, यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि तुम लोगों की पहचान "असामान्य" है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य की अंतर्निहित पहचान और उसका मूल्य : उनका स्वरूप कैसा है?' से

390. मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करने का इच्छुक नहीं है, अपनी सम्पत्ति को परमेश्वर के लिए खर्च करने का इच्छुक नहीं है, और परमेश्वर के लिए जीवन-भर के प्रयास समर्पित करने के लिए तैयार नहीं है; इसके बजाय कहता है कि परमेश्वर बहुत दूर चला गया है, परमेश्वर के बारे में बहुत कुछ मनुष्य की धारणाओं के साथ मेल नहीं खाता। ऐसी मानवता के साथ, यद्यपि तुम सब अपने प्रयासों में उदार भी होते तो भी तुम लोग परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं कर पाओगे, इस तथ्य के बारे में तो क्या कहा जाए कि तुम परमेश्वर को नहीं खोजते हो। क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम सब मानवजाति के दोषपूर्ण उत्पाद हो? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोगों की मानवता से ज़्यादा नीच और कोई मानवता नहीं है? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोगों का आदर करने क लिए दूसरे तुम्हें क्या कहकर बुलाते हैं? जो लोग सच में परमेश्वर को प्रेम करते हैं वे तुम लोगों को भेड़िये का पिता, भेड़िये की माता, भेड़िये का पुत्र, और भेड़िये का पोता कह कर बुलाते हैं; तुम सब भेड़िये के वंशज हो, भेड़िये के लोग हो, और तुम लोगों को अपनी पहचान जाननी चाहिए और उसे कभी नहीं भूलना चाहिए। यह न सोचो कि तुम लोग कोई श्रेष्ठ हस्ती हो : तुम सब मानवजाति के मध्य गैर-मनुष्यों का सबसे अधिक क्रूर झुंड हो। क्या तुम्हें इसमें से कुछ नहीं पता? क्या तुम लोगों को पता है कि तुम सबके मध्य में कार्य करने के द्वारा मैंने कितना जोखिम उठाया है? यदि तुम सबकी समझ वापस उचित नहीं हो सकती, और तुम सबका विवेक सामान्य रूप से कार्य नहीं कर सकता, तो फिर तुम सब कभी भी "भेड़िये" की पदवी से मुक्त नहीं हो पाओगे, तुम सब कभी भी श्राप के दिन से बच नहीं पाओगे, अपनी सज़ा के दिन से कभी बच नहीं पाओगे। तुम सब हीन जन्मे थे, एक मूल्यरहित वस्तु। तुम सब प्रकृति से भूखे भेड़ियों का झुंड, मलबे और कचरे का एक ढेर हो, और, तुम सबकी तरह, मैं तुम लोगों के ऊपर एहसान पाने के लिए कार्य नहीं करता, बल्कि इसलिए करता हूँ क्योंकि कार्य की आवश्यकता है। यदि तुम सब इसी ढंग से विद्रोही बने रहोगे, तो मैं अपना कार्य रोक दूँगा, और फिर दोबारा तुम लोगों पर कभी कार्य नहीं करूँगा; बल्कि मैं अपना कार्य दूसरे झुंड पर स्थानांतरित कर दूँगा जो मुझे प्रसन्न करता है, और इस तरह से मैं तुम सबको हमेशा के लिए छोड़ दूँगा, क्योंकि मैं उन पर नजर डालने के लिए तैयार नहीं हूँ जो मेरे साथ शत्रुता रखते हैं। तो फिर, क्या तुम सब मेरे अनुरूप बनने की कामना करते हो, या मेरे विरुद्ध शत्रुता रखने की?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है' से उद्धृत

फुटनोट:

क. किनारे पर वापस लौटने की इच्छा : एक चीनी कहावत, जिसका मतलब है "अपने बुरे कामों से विमुख होना; अपने बुरे काम छोड़ना।"

ख. मूल पाठ में, "इस तरह से" यह वाक्यांश नहीं है।

ग. हानहाओ पक्षी की कहानी ईसप की चींटी और टिड्डी की नीति-कथा से काफ़ी मिलती-जुलती है। जब मौसम गर्म होता है, तब हानहाओ पक्षी अपने पड़ोसी नीलकंठ द्वारा बार-बार चेताए जाने के बावजूद घोंसला बनाने के बजाय सोना पसंद करता है। जब सर्दी आती है, तो हानहाओ ठिठुरकर मर जाता है।

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