2.1. शैतान कैसे मानवजाति को भ्रष्ट करता है यह प्रकट करने के बारे में वचन

65. परमेश्वर के बनाए हुए आदम और हव्वा शुरू में शुद्ध लोग थे, यानी अदन की वाटिका में रहते हुए वे शुद्ध थे और उनमें कोई अशुद्धता नहीं थी। वे यहोवा के प्रति भी निष्ठावान थे, और यहोवा को धोखा देने के विषय में कुछ नहीं जानते थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि उनमें शैतान के प्रभाव ने खलबली नहीं मचाई थी, उनमें शैतान का जहर नहीं था, और वे इंसानों में सबसे शु़द्ध थे। वे अदन की वाटिका में रहकर हर प्रकार की मलिनता से दूर थे, वे देह के कब्जे में नहीं थे, और यहोवा का भय मानते थे। लेकिन जब शैतान ने उन्हें प्रलोभन दिया, तो उनके अंदर साँप का जहर आ गया और उनमें यहोवा को धोखा देने की इच्छा पैदा हुई, और वे शैतान के प्रभाव में जीने लगे। शुरू में, वे शुद्ध थे और यहोवा का भय मानते थे; सिर्फ इस अवस्था में वे मानव थे। बाद में, जब शैतान ने उन्हें प्रलोभन दिया, तो उन्होंने भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खा लिया, और शैतान के प्रभाव में आ गए। धीरे-धीरे शैतान ने उन्हें भ्रष्ट कर दिया, और उन्होंने मनुष्य का मूल स्वरूप गँवा दिया। शुरू में, मनुष्य के अंदर यहोवा की श्वास थी, वह थोड़ा भी विद्रोही नहीं था, उसके हृदय में कोई बुराई नहीं थी। उस समय, मनुष्य सचमुच मानवीय था। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद, मनुष्य पशु बन गया। उसके विचार बुराई और मलिनता से भर गए, और उसमें कोई अच्छाई और पवित्रता नहीं रही। क्या यह शैतान नहीं है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान

66. मानवजाति द्वारा सामाजिक विज्ञानों के आविष्कार के बाद से मनुष्य का मन विज्ञान और ज्ञान से भर गया है। तब से विज्ञान और ज्ञान मानवजाति के शासन के लिए उपकरण बन गए हैं, और अब मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश और अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं रही हैं। मनुष्य के हृदय में परमेश्वर की स्थिति सबसे नीचे हो गई है। हृदय में परमेश्वर का स्थान न होने पर मनुष्य की आंतरिक दुनिया अंधकारमय, निराश और खाली हो जाती है। बाद में मनुष्य के हृदय और मन को भरने के लिए कई समाज-वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और राजनीतिज्ञों ने सामने आकर सामाजिक विज्ञान के सिद्धांत, मानव-विकास के सिद्धांत और अन्य कई सिद्धांत व्यक्त किए, जो इस सच्चाई का खंडन करते हैं कि परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की है, और इस तरह, यह विश्वास करने वाले बहुत कम रह गए हैं कि परमेश्वर ने सब-कुछ बनाया है, और विकास के सिद्धांत पर विश्वास करने वालों की संख्या और अधिक बढ़ गई है। अधिकाधिक लोग पुराने विधान के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के अभिलेखों और उसके वचनों को मिथक और किंवदंतियाँ समझते हैं। अपने हृदयों में लोग परमेश्वर की गरिमा और महानता, परमेश्वर के अस्तित्व और इस सिद्धांत के प्रति कि परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है, उदासीन हो जाते हैं। मानवजाति का अस्तित्व और देशों एवं राष्ट्रों का भाग्य उनके लिए अब और महत्वपूर्ण नहीं रहे, और मनुष्य केवल खाने-पीने और भोग-विलासिता की खोज में चिंतित, एक खोखले संसार में रहता है। ... बहुत थोड़े लोग स्वयं इस बात की खोज करने का उत्तरदायित्व लेते हैं कि आज परमेश्वर अपना कार्य कहाँ करता है, या यह तलाशने का उत्तरदायित्व कि वह किस प्रकार मनुष्य के गंतव्य पर संप्रभु है और उसकी व्यवस्था करता है। और इस तरह, मनुष्य के बिना जाने ही मानव-सभ्यता मनुष्य की इच्छाओं के अनुसार चलने में और भी अधिक अक्षम हो गई है, और कई ऐसे लोग भी हैं, जो यह महसूस करते हैं कि इस प्रकार के संसार में रहकर वे, उन लोगों के बजाय जो चले गए हैं, कम खुश हैं। यहाँ तक कि उन देशों के लोग भी, जो अत्यधिक सभ्य हुआ करते थे, इस तरह की शिकायतें व्यक्त करते हैं। क्योंकि परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना अगर शासक और समाजशास्त्री मानव सभ्यता को सुरक्षित रखने के लिए अपना दिमाग खपा भी लें तो भी कोई फायदा नहीं होगा। मनुष्य के हृदय का खालीपन कोई व्यक्ति नहीं भर सकता, क्योंकि कोई भी व्यक्ति मनुष्य का जीवन नहीं हो सकता और कोई भी सामाजिक सिद्धांत मनुष्य को खालीपन की परेशानियों से मुक्ति नहीं दिला सकता। ज्ञान, विज्ञान, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, आनंद और आराम मनुष्य को केवल अस्थायी सांत्वना देते हैं। यहाँ तक कि इन चीजों के होने के बावजूद मनुष्य अभी भी अनिवार्यतः पाप करता है और समाज में फैले अन्याय की शिकायत करता है। ये चीजें होना मनुष्य की खोजी अभिलाषा और इच्छा को बाधित नहीं कर सकतीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर द्वारा बनाया गया था और मनुष्यों के बेतुके त्याग और अन्वेषण उनके लिए और अधिक कष्ट ही ला सकते हैं और मनुष्य को एक निरंतर व्याकुलता की स्थिति में रख सकते हैं, और वह यह नहीं जान सकता कि मानवजाति के भविष्य या आगे आने वाले मार्ग का सामना किस प्रकार किया जाए, इस हद तक कि मनुष्य ज्ञान-विज्ञान से भी डरने लगता है और खालीपन के एहसास से तो और भी घबराने लगता है। इस संसार में, चाहे तुम किसी स्वतंत्र देश में रहते हो या बिना मानवाधिकारों वाले देश में, तुम मानवजाति के भाग्य से बचकर भागने में सर्वथा असमर्थ हो। तुम चाहे शासक हो या शासित, तुम भाग्य, रहस्यों और मानवजाति के गंतव्य की खोज करने की इच्छा से बचकर भागने में सर्वथा असमर्थ हो, और उस अकथनीय खालीपन की भावना से बचकर निकलने में तो तुम और भी असमर्थ हो। इस प्रकार की घटनाएँ, जो समस्त मानवजाति के लिए आम हैं, समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक घटनाएँ कही जाती हैं, फिर भी कोई महान व्यक्ति इस समस्या का समाधान करने के लिए सामने नहीं आ सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है

67. हजारों सालों से यह मलिनता की भूमि रही है। यह असहनीय रूप से गंदी और असीम दुःखों से भरी हुई है, चालें चलते और धोखा देते हुए, निराधार आरोप लगाते हुए,[1] निर्दयी और क्रूर बनकर इस भुतहा शहर को कुचलते हुए और लाशों से पाटते हुए प्रेत यहाँ हर जगह बेकाबू दौड़ते हैं; सड़ांध जमीन पर छाकर हवा में व्याप्त हो गई है, और इस पर जबर्दस्त पहरेदारी[2] है। आसमान से परे की दुनिया कौन देख सकता है? शैतान मनुष्य के पूरे शरीर को कसकर बांध देता है, अपनी दोनों आँखों पर पर्दा डालकर, अपने होंठ मजबूती से बंद कर देता है। शैतानों के राजा ने हजारों वर्षों तक उपद्रव किया है, और आज भी वह उपद्रव कर रहा है और इस भुतहा शहर पर बारीकी से नज़र रखे हुए है, मानो यह राक्षसों का एक अभेद्य महल हो; इस बीच रक्षक कुत्ते चमकती हुई आँखों से घूरते हैं, वे इस बात से अत्यंत भयभीत रहते हैं कि कहीं परमेश्वर अचानक उन्हें पकड़कर समाप्त न कर दे, उन्हें सुख-शांति के स्थान से वंचित न कर दे। ऐसे भुतहा शहर के लोग परमेश्वर को कैसे देख सके होंगे? क्या उन्होंने कभी परमेश्वर की प्रियता और मनोहरता का आनंद लिया है? वे मानव-जगत के मामलों को कैसे समझ सकते हैं? उनमें से कौन परमेश्वर के उत्कट इरादों को समझ सकता है? फिर, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि देहधारी परमेश्वर पूरी तरह से छिपा रहता है : इस तरह के अंधकारपूर्ण समाज में, जहाँ राक्षस बेरहम और अमानवीय हैं, पलक झपकते ही लोगों को मार डालने वाला शैतानों का सरदार, ऐसे मनोहर, दयालु और पवित्र परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे सहन कर सकता है? वह परमेश्वर के आगमन की सराहना और जय-जयकार कैसे कर सकता है? ये अनुचर! ये दया के बदले घृणा देते हैं, लंबे समय पहले ही ये परमेश्वर से शत्रु की तरह पेश आने लगे थे, ये परमेश्वर को अपशब्द बोलते हैं, ये बेहद बर्बर हैं, इनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी सम्मान नहीं है, ये हमला करते हैं और लूटते हैं, इनका विवेक मर चुका है, ये अंतश्चेतना के विरुद्ध कार्य करते हैं, और लालच देकर निर्दोषों को गहन अचेतावस्था में पहुँचा देते हैं। प्राचीन पूर्वज? प्रिय अगुआ? वे सभी परमेश्वर का विरोध करते हैं! उनके हस्तक्षेप ने स्वर्ग के नीचे की हर चीज को अँधेरे और अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया है! धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के वैध अधिकार और हित? ये सब बुराई को छिपाने की चालें हैं! किसने परमेश्वर के कार्य को स्वीकार किया है? किसने परमेश्वर के कार्य के लिए अपना जीवन अर्पित किया है या रक्त बहाया है? मनुष्य जो पीढ़ियों से माता-पिता से लेकर बच्चों तक एक अखंड क्रम में गुलाम रहे हैं, उन्होंने परमेश्वर को अनौपचारिक रूप से गुलाम बना लिया है—ऐसा कैसे हो सकता है कि यह रोष न भड़काए? दिल में हजारों वर्ष की घृणा भरी हुई है, हजारों साल का पाप दिल पर अंकित है—इससे कैसे न घृणा पैदा होगी? परमेश्वर का बदला लो, उसके शत्रु को पूरी तरह से समाप्त कर दो, उसे अब और बेकाबू न दौड़ने दो, और उसे अत्याचारी के रूप में शासन मत करने दो! यही समय है : मनुष्य अपनी सभी शक्तियाँ लंबे समय से इकट्ठा करता आ रहा है, उसने इसके लिए सभी प्रयास किए हैं, हर कीमत चुकाई है, ताकि वह इस दुष्ट के घृणित चेहरे से नकाब उतार सके और जो लोग अंधे हो गए हैं, जिन्होंने हर प्रकार की पीड़ा और कठिनाई सही है, उन्हें अपने दर्द से उबरने और इस दुष्ट बूढ़े शैतान से विद्रोह करने दे। परमेश्वर के कार्य में ऐसी अभेद्य बाधा क्यों खड़ी की जाए? परमेश्वर के लोगों को धोखा देने के लिए विभिन्न चालें क्यों चली जाएँ? वास्तविक स्वतंत्रता और वैध अधिकार एवं हित कहाँ हैं? निष्पक्षता कहाँ है? आराम कहाँ है? गर्मजोशी कहाँ है? परमेश्वर के जनों को छलने के लिए धोखे भरी चालों का उपयोग क्यों किया जाए? परमेश्वर के आगमन को दबाने के लिए बल का उपयोग क्यों किया जाए? क्यों नहीं परमेश्वर को उस धरती पर स्वतंत्रता से घूमने दिया जाए जिसे उसने बनाया? क्यों परमेश्वर को इस हद तक खदेड़ा जाए कि उसके पास आराम से सिर रखने के लिए जगह भी न रहे? मनुष्यों की गर्मजोशी कहाँ है? लोगों के बीच उसका स्वागत कहाँ है? परमेश्वर में ऐसी तड़प क्यों पैदा की जाए? परमेश्वर को बार-बार पुकारने पर मजबूर क्यों किया जाए? परमेश्वर को उस बिंदु तक क्यों धकेल दिया जाए कि उसे अपने प्रिय पुत्र के लिए चिंता करनी पड़े? यह समाज इतना अंधकारपूर्ण है—इसके घिनौने रक्षक कुत्ते परमेश्वर को उस दुनिया में स्वतंत्रतापूर्वक आने-जाने क्यों नहीं देते जो उसने बनाई है? दुख-दर्द में रहने वाला इंसान यह सब क्यों नहीं समझता? तुम लोगों के लिए परमेश्वर ने बहुत यातना सही है, और अत्यंत पीड़ा के साथ अपना प्यारा पुत्र, अपना देह और रक्त तुम लोगों को सौंपा है—तो फिर तुम लोग अभी भी उससे नजरें क्यों फेर लेते हो? हर किसी के सामने तुम लोग परमेश्वर के आगमन को अस्वीकार कर देते हो, और परमेश्वर की दोस्ती को नकार देते हो। तुम लोग इतने निर्लज्ज क्यों हो? क्या तुम लोग ऐसे अंधकारपूर्ण समाज में अन्याय सहन करना चाहते हो? तुम अपने आपको हजारों साल की शत्रुता से भरने के बजाय शैतानों के सरदार के “मल” से भर लेते हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (8)

फुटनोट :

1. “निराधार आरोप लगाते हुए” उन तरीकों को संदर्भित करता है, जिनके द्वारा शैतान लोगों को नुकसान पहुँचाता है।

2. “जबर्दस्त पहरेदारी” दर्शाता है कि वे तरीके, जिनके द्वारा शैतान लोगों को यातना पहुँचाता है, बहुत ही शातिर होते हैं, और लोगों को इतना नियंत्रित करते हैं कि उन्हें हिलने-डुलने की भी जगह नहीं मिलती।


68. ऊपर से नीचे तक और शुरू से अंत तक शैतान परमेश्वर के कार्य को बाधित करता रहा है और उसके विरोध में काम करता रहा है। “प्राचीन सांस्कृतिक विरासत,” मूल्यवान “प्राचीन संस्कृति के ज्ञान,” “ताओवाद और कन्फ्यूशीवाद की शिक्षाओं” और “कन्फ्यूशियन क्लासिक्स और सामंती संस्कारों” की इस सारी चर्चा ने मनुष्य को नरक में पहुँचा दिया है। उन्नत आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ-साथ अत्यधिक विकसित उद्योग, कृषि और व्यवसाय कहीं नजर नहीं आते। इसके बजाय, यह सिर्फ़ प्राचीन काल के “वानरों” द्वारा प्रचारित सामंती संस्कारों पर जोर देता है, ताकि परमेश्वर के कार्य को जानबूझकर गड़बड़ कर सके, उसका विरोध कर सके और उसे नष्ट कर सके। न केवल इसने आज तक मनुष्य को सताना जारी रखा है, बल्कि वह उसे पूरे का पूरा निगल[1] भी जाना चाहता है। सामंतवाद की नैतिक और आचार-विचार विषयक शिक्षाओं के प्रसारण और प्राचीन संस्कृति के ज्ञान की विरासत ने लंबे समय से मनुष्य को संक्रमित किया है और उन्हें छोटे-बड़े शैतानों में बदल दिया है। कुछ ही लोग हैं, जो ख़ुशी से परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, और कुछ ही लोग हैं, जो उसके आगमन का उल्लासपूर्वक स्वागत करते हैं। समस्त मानवजाति का चेहरा हत्या के इरादे से भर गया है, और हर जगह हत्यारी साँस हवा में व्याप्त है। वे परमेश्वर को इस भूमि से निष्कासित करना चाहते हैं; हाथों में चाकू और तलवारें लिए वे परमेश्वर का “विनाश” करने के लिए खुद को युद्ध के विन्यास में व्यवस्थित करते हैं। दुष्टों की इस सारी भूमि पर, जहाँ मनुष्य को लगातार सिखाया जाता है कि कहीं कोई परमेश्वर नहीं है, मूर्तियाँ फैली हुई हैं, और ऊपर हवा जलते हुए कागज और धूप की वमनकारी गंध से तर है, इतनी घनी कि दम घुटता है। यह उस कीचड़ की बदबू की तरह है, जो जहरीले सर्प के कुलबुलाते समय ऊपर उठती है, जिससे व्यक्ति उलटी किए बिना नहीं रह सकता। इसके अलावा, वहाँ अस्पष्ट रूप से दुष्ट दानवों के मंत्रोच्चार की ध्वनि सुनी जा सकती है, जो दूर नरक से आती हुई प्रतीत होती है, जिसे सुनकर आदमी काँपे बिना नहीं रह सकता। इस देश में हर जगह इंद्रधनुष के सभी रंगों वाली मूर्तियाँ रखी हैं, जिन्होंने इस देश को कामुक आनंद की दुनिया में बदल दिया है, और शैतानों का राजा दुष्टतापूर्वक हँसता रहता है, मानो उसका नीचतापूर्ण षड्यंत्र सफल हो गया हो। इस बीच, मनुष्य पूरी तरह से बेखबर रहता है, और उसे यह भी पता नहीं कि शैतान ने उसे पहले ही इस हद तक भ्रष्ट कर दिया है कि वह बेसुध हो गया है और उसने हार में अपना सिर लटका दिया है। शैतान चाहता है कि एक ही झपट्टे में परमेश्वर से संबंधित सब-कुछ साफ कर दे, और एक बार फिर उसे अपवित्र कर उसका हनन कर दे; वह उसके कार्य को टुकड़े-टुकड़े करने और उसमें विघ्न डालने का इरादा रखता है। वह कैसे परमेश्वर को समान दर्जा दे सकता है? कैसे वह पृथ्वी पर मनुष्यों के बीच अपने काम में परमेश्वर का “हस्तक्षेप” बरदाश्त कर सकता है? कैसे वह परमेश्वर को उसके घिनौने चेहरे को उजागर करने दे सकता है? शैतान कैसे परमेश्वर को अपने काम को अव्यवस्थित करने की अनुमति दे सकता है? क्रोध के साथ भभकता यह शैतान कैसे परमेश्वर को पृथ्वी पर अपने शाही दरबार पर नियंत्रण करने दे सकता है? कैसे वह स्वेच्छा से परमेश्वर के श्रेष्ठतर सामर्थ्य के आगे झुक सकता है? इसके कुत्सित चेहरे की असलियत उजागर की जा चुकी है, इसलिए किसी को पता नहीं है कि वह हँसे या रोए, और यह बताना वास्तव में कठिन है। क्या यही इसका सार नहीं है? अपनी कुरूप आत्मा के बावजूद वह यह मानता है कि वह अविश्वसनीय रूप से सुंदर है। यह सह-अपराधियों का गिरोह![2] वे भोग में लिप्त होने के लिए मनुष्यों के देश में उतरते हैं और हंगामा करते हैं, और चीजों में इतनी हलचल पैदा कर देते हैं कि दुनिया एक चंचल और अस्थिर जगह बन जाती है और मनुष्य का दिल घबराहट और बेचैनी से भर जाता है, और उन्होंने मनुष्य के साथ इतना खिलवाड़ किया है कि उसका रूप उस क्षेत्र के एक अमानवीय जानवर जैसा अत्यंत कुरूप हो गया है, जिससे मूल पवित्र मनुष्य का आखिरी निशान भी खो गया है। इतना ही नहीं, वे धरती पर संप्रभु सत्ता ग्रहण करना चाहते हैं। वे परमेश्वर के कार्य को इतना बाधित करते हैं कि वह मुश्किल से बहुत धीरे आगे बढ़ पाता है, और वे मनुष्य को इतना कसकर बंद कर देते हैं, जैसे कि तांबे और इस्पात की दीवारें हों। इतने सारे गंभीर पाप करने और इतनी आपदाओं का कारण बनने के बाद भी क्या वे ताड़ना के अलावा किसी अन्य चीज की उम्मीद कर रहे हैं? राक्षस और बुरी आत्माएँ काफी समय से पृथ्वी पर अंधाधुंध विचरण कर रही हैं, और उन्होंने परमेश्वर के इरादों और कष्टसाध्य प्रयास दोनों को इतना कसकर बंद कर दिया है कि वे अभेद्य बन गए हैं। सचमुच, यह एक घातक पाप है! ऐसा कैसे हो सकता है कि परमेश्वर चिंतित महसूस न करे? परमेश्वर कैसे क्रोधित महसूस न करे? उन्होंने परमेश्वर के कार्य में गंभीर बाधा पहुँचाई है और उसका घोर विरोध किया है : कितने विद्रोही हैं वे!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (7)

फुटनोट :

1. “निगल” जाना शैतानों के राजा के शातिर व्यवहार के बारे में बताता है, जो लोगों को पूरी तरह से मोह लेता है।

2. “सहअपराधियों का गिरोह” का वही अर्थ है, जो “गुंडों के गिरोह” का है।


69. कई हजार वर्षों की प्राचीन संस्कृति और इतिहास के ज्ञान ने मनुष्य की सोच और धारणाओं तथा उसके मानसिक दृष्टिकोण को इतना कसकर बंद कर दिया है कि वे अभेद्य और प्राकृतिक रूप से नष्ट न होने वाले[1] बन गए हैं। लोग नरक के अठारहवें घेरे में रहते हैं, मानो उन्हें परमेश्वर द्वारा काल-कोठरियों में निर्वासित कर दिया गया हो, जहाँ प्रकाश कभी दिखाई नहीं दे सकता। सामंती सोच ने लोगों का इस तरह उत्पीड़न किया है कि वे मुश्किल से साँस ले पाते हैं और उनका दम घुट रहा है। उनमें प्रतिरोध करने की थोड़ी-सी भी ताकत नहीं है; वे बस सहते हैं और चुपचाप सहते हैं...। कभी किसी ने न्याय और निष्पक्षता के लिए संघर्ष करने या खड़े होने का साहस नहीं किया; लोग बस दिन-ब-दिन और साल-दर-साल सामंती नीति-शास्त्र के प्रहारों और दुर्व्यवहारों तले जानवर से भी बदतर जीवन जीते हैं। उन्होंने कभी मानव-जगत में खुशी पाने के लिए परमेश्वर की तलाश करने के बारे में नहीं सोचा। ऐसा लगता है, मानो लोगों को पीट-पीटकर इस हद तक तोड़ डाला गया है कि वे पतझड़ में गिरे पत्तों की तरह हो गए हैं, मुरझाए हुए, सूखे और पीले-भूरे रंग के। लोग लंबे समय से अपनी याददाश्त खो चुके हैं; वे असहाय-से उस नरक में रहते हैं, जिसका नाम है मानव-जगत, अंत के दिन आने का इंतज़ार करते हुए, ताकि वे इस नरक के साथ ही नष्ट हो जाएँ, मानो वह अंत का दिन, जिसके लिए वे लालायित रहते हैं, वह दिन हो, जब मनुष्य आरामदायक शांति का आनंद लेगा। सामंती नैतिकता ने मनुष्य का जीवन “रसातल” में पहुँचा दिया है, जिससे उसकी प्रतिरोध करने की शक्ति और भी कम हो गई है। सभी प्रकार के उत्पीड़न मनुष्य को धीरे-धीरे रसातल में धकेल रहे हैं, जिससे वह रसातल की और अधिक गहराई में पहुँच रहा है और परमेश्वर से अधिकाधिक दूर होता गया है, आज तो परमेश्वर उसके लिए पूर्णतः अजनबी बन गया है, और जब वे मिलते हैं, तो वह उससे बचने के लिए जल्दी से निकल जाता है। मनुष्य उस पर ध्यान नहीं देता और उसे एक तरफ अकेला खड़ा छोड़ देता है, जैसे कि उसने उसे कभी जाना ही न हो या उसने उसे पहले कभी देखा ही न हो। फिर भी परमेश्वर अपना अदम्य रोष उस पर प्रकट न करते हुए मानव-जीवन की लंबी यात्रा के दौरान लगातार मनुष्य की प्रतीक्षा करता रहा है और इस दौरान बिना एक भी शब्द बोले, केवल मनुष्य के पश्चात्ताप करने और नए सिरे से शुरुआत करने की मौन प्रतीक्षा करता रहा है। मनुष्य के साथ मानव-जगत की पीड़ाएँ साझा करने के लिए परमेश्वर बहुत पहले मानव-जगत में आया था। मनुष्य के साथ गुज़ारे इन तमाम वर्षों में कोई भी उसके अस्तित्व को खोज नहीं पाया है। परमेश्वर स्वयं द्वारा लाया गया कार्य पूरा करते हुए मानव-जगत की दुर्दशा का कष्ट चुपचाप सहन करता रहता है। ऐसे कष्टों से गुजरते हुए, जिनका अनुभव मनुष्य ने पहले कभी नहीं किया, वह पिता परमेश्वर की इच्छा और मानवजाति की जरूरतों की खातिर कष्ट सहना जारी रखता है। पिता परमेश्वर की इच्छा की खातिर, और मानवजाति की जरूरतों की खातिर भी, मनुष्य की उपस्थिति में वह चुपचाप उसकी सेवा में खड़ा रहा है, और मनुष्य की उपस्थिति में उसने खुद को नम्र किया है। प्राचीन संस्कृति के ज्ञान ने मनुष्य को चुपके से परमेश्वर की उपस्थिति से चुरा लिया है और मनुष्य को शैतानों के राजा और उसकी संतानों को सौंप दिया है। चार पुस्तकों और पाँच क्लासिक्स[क] ने मनुष्य की सोच और धारणाओं को विद्रोह के एक अलग युग में पहुँचा दिया है, जिससे वह उन पुस्तकों और क्लासिक्स के संकलनकर्ताओं की पहले से भी ज्यादा खुशामदी करने लगा है, और परिणामस्वरूप परमेश्वर के बारे में उसकी धारणाएँ और ज्यादा खराब हो गई हैं। शैतानों के राजा ने बिना मनुष्य के जाने ही उसके दृदय से निर्दयतापूर्वक परमेश्वर को बाहर निकाल दिया और फिर विजयी उल्लास के साथ खुद उस पर कब्ज़ा जमा लिया। तब से मनुष्य एक कुरूप आत्मा और शैतानों के राजा के चेहरे के अधीन हो गया। उसके सीने में परमेश्वर के प्रति घृणा भर गई, और शैतानों के राजा की द्रोहपूर्ण दुर्भावना दिन-ब-दिन तब तक मनुष्य के भीतर फैलती गई, जब तक कि वह पूरी तरह से बरबाद नहीं हो गया। उसके पास जरा-भी स्वतंत्रता नहीं रह गयी और उसके पास शैतानों के राजा के चंगुल से छूटने का कोई उपाय नहीं था। उसके पास वहीं के वहीं उसकी उपस्थिति में बंदी बनने, आत्मसमर्पण करने और उसकी अधीनता में घुटने टेक देने के सिवा कोई चारा नहीं था। बहुत पहले जब मनुष्य का हृदय और आत्मा अभी शैशवावस्था में ही थे, शैतानों के राजा ने उनमें नास्तिकता के फोड़े का बीज बो दिया था, और उसे इस तरह की भ्रांतियाँ सिखा दीं, जैसे कि “विज्ञान और प्रौद्योगिकी को पढ़ो; चार आधुनिकीकरणों को समझो; और दुनिया में परमेश्वर जैसी कोई चीज नहीं है।” यही नहीं, वह हर अवसर पर चिल्लाता है, “आओ, हम एक सुंदर मातृभूमि का निर्माण करने के लिए अपने कठोर श्रम पर भरोसा करें,” और बचपन से ही हर व्यक्ति को अपने देश की सेवा करने के लिए तैयार रहने के लिए कहता है। बेखबर मनुष्य, इसके सामने लाया गया, और इसने बेझिझक सारा श्रेय (अर्थात् समस्त मनुष्यों को अपने हाथों में रखने का परमेश्वर का श्रेय) हथिया लिया। कभी भी इसे शर्म का बोध नहीं हुआ। इतना ही नहीं, इसने निर्लज्जतापूर्वक परमेश्वर के लोगों को पकड़ लिया और उन्हें अपने घर में खींच लिया, जहाँ वह मेज पर एक चूहे की तरह उछलकर चढ़ गया और मनुष्यों से परमेश्वर के रूप में अपनी आराधना करवाई। कैसा आततायी है! वह चीख-चीखकर ऐसी शर्मनाक और घिनौनी बातें कहता है : “दुनिया में परमेश्वर जैसी कोई चीज नहीं है। हवा प्राकृतिक नियमों के कारण होने वाले रूपांतरणों से चलती है; बारिश तब होती है, जब पानी भाप बनकर ठंडे तापमानों से मिलता है और बूँदों के रूप में संघनित होकर पृथ्वी पर गिरता है; भूकंप भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण पृथ्वी की सतह का हिलना है; सूखा सूरज की सतह पर नाभिकीय विघटन के कारण हवा के शुष्क हो जाने से पड़ता है। ये प्राकृतिक घटनाएँ हैं। इस सबमें परमेश्वर का किया कौन-सा काम है?” ऐसे लोग भी हैं, जो कुछ ऐसे बयान भी देते हैं, जिन्हें स्वर नहीं दिया जाना चाहिए, जैसे कि : “मनुष्य प्राचीन काल में वानरों से विकसित हुआ था, और आज की दुनिया लगभग एक युग पहले शुरू हुए आदिम समाजों के अनुक्रमण से विकसित हुई है। किसी देश का उत्थान या पतन पूरी तरह से उसके लोगों के हाथों में है।” पृष्ठभूमि में, शैतान लोगों को उसे दीवार पर लटकाकर या मेज पर रखकर श्रद्धांजलि अर्पित करने और भेंट चढ़ाने के लिए बाध्य करता है। जब वह चिल्लाता है कि “कोई परमेश्वर नहीं है,” उसी समय वह खुद को परमेश्वर के रूप में स्थापित भी करता है और परमेश्वर के स्थान पर खड़ा होकर तथा शैतानों के राजा की भूमिका ग्रहण कर अशिष्टता के साथ परमेश्वर को धरती की सीमाओं से बाहर धकेल देता है। कितनी बेहूदा बात है! यह आदमी को उससे गहरी घृणा करने के लिए बाध्य कर देता है। ऐसा लगता है कि परमेश्वर और वह कट्टर दुश्मन हैं, और दोनों सह-अस्तित्व में नहीं रह सकते। वह व्यवस्था की पहुँच से बाहर आज़ाद घूमता है[2] और परमेश्वर को दूर भगाने की योजना बनाता है। ऐसा है यह शैतानों का राजा! इसके अस्तित्व को कैसे बरदाश्त किया जा सकता है? यह तब तक चैन से नहीं बैठेगा, जब तक परमेश्वर के काम को खराब नहीं कर देता और उसे पूरा खंडहर[3] नहीं बना देता, मानो वह अंत तक परमेश्वर का विरोध करना चाहता हो, जब तक कि या तो मछली न मर जाए या जाल न टूट जाए। वह जानबूझकर खुद को परमेश्वर के ख़िलाफ खड़ा कर लेता है और उसके करीब आता जाता है। इसका घिनौना चेहरा बहुत पहले से पूरी तरह से बेनक़ाब हो गया है, जो अब आहत और क्षत-विक्षत[4] है और एक खेदजनक स्थिति में है, फिर भी वह परमेश्वर से नफरत करने से बाज नहीं आएगा, मानो परमेश्वर को एक कौर में निगलकर ही वह अपने दिल में बसी घृणा से मुक्ति पा सकेगा। परमेश्वर के इस शत्रु को हम कैसे बरदाश्त कर सकते हैं! केवल इसके उन्मूलन और पूर्ण विनाश से ही हमारे जीवन की इच्छा फलित होगी। इसे उच्छृंखल रूप से कैसे दौड़ते फिरने दिया जा सकता है? यह मनुष्य को इस हद तक भ्रष्ट कर चुका है कि मनुष्य स्वर्ग सूर्य को नहीं जानता, और वह अचेत और भावनाशून्य हो गया है। मनुष्य ने सामान्य मानवीय विवेक खो दिया है। शैतान को नष्ट और भस्म करने के लिए क्यों नहीं हम अपनी पूरी हस्ती का बलिदान कर दें, ताकि भविष्य की सारी चिंताएँ दूर कर सकें और परमेश्वर के कार्य को जल्दी से अभूतपूर्व भव्यता तक पहुँचने दें? बदमाशों का यह गिरोह मनुष्यों की दुनिया में आ गया है और यहाँ उथल-पुथल मचा दी है। वे सभी मनुष्यों को एक खड़ी चट्टान की कगार पर ले आए हैं और गुप्त रूप से उन्हें वहाँ से धकेलकर टुकड़े-टुकड़े करने की योजना बना रहे हैं, ताकि फिर वे उनके शवों को निगल सकें। वे व्यर्थ ही परमेश्वर की योजना को खंडित करने और उसके साथ जुआ खेलकर पासे की एक ही चाल में सब-कुछ दाँव पर लगाने[5] की आशा करते हैं। यह किसी भी तरह से आसान नहीं है! अंततः शैतानों के राजा के लिए सलीब तैयार कर दिया गया है, जो सबसे घृणित अपराधों का दोषी है। परमेश्वर सलीब का नहीं है। वह पहले ही शैतान के लिए उसे किनारे रख चुका है। परमेश्वर अब से बहुत पहले ही विजयी होकर उभर चुका है और अब मानवजाति के पापों पर दुख महसूस नहीं करता, लेकिन वह समस्त मानवजाति के लिए उद्धार लाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (7)

फुटनोट :

1. “प्राकृतिक रूप से नष्ट न होने वाले” का प्रयोग यहाँ व्यंग्य के रूप में किया गया है, जिसका अर्थ है कि लोग अपने ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिक दृष्टिकोण में कठोर हैं।

2. “व्यवस्था की पहुँच से बाहर आज़ाद घूमता है” इंगित करता है कि शैतान उन्मत्त होकर आपे से बाहर हो जाता है।

3. “पूरा खंडहर” बताता है कि कैसे उस शैतान का हिंसक व्यवहार देखने में असहनीय है।

4. “आहत और क्षत-विक्षत” शैतानों के राजा के बदसूरत चेहरे के बारे में बताता है।

5. “पासे की एक ही चाल में सब-कुछ दाँव पर लगाने” का अर्थ है अंत में जीतने की उम्मीद में अपना सारा धन एक ही दाँव पर लगा देना। यह शैतान की भयावह और कुटिल योजनाओं के लिए एक रूपक है। इस अभिव्यक्ति का प्रयोग उपहास में किया जाता है।

क. चार पुस्तकें और पाँच क्लासिक्स चीन में कन्फ्यूशीवाद की प्रामाणिक किताबें हैं।


70. मनुष्य के तथाकथित ज्ञान में शैतान ने सांसारिक आचरण का अपना फ़लसफ़ा और अपनी सोच काफी कुछ भर दी है। और जब शैतान ऐसा करता है, तो वह मनुष्य को अपनी सोच, अपना फ़लसफ़ा और दृष्टिकोण अपनाने देता है, ताकि मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व को नकार सके, सभी चीज़ों और मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर के प्रभुत्व को नकार सके। तो जब मनुष्य का अध्ययन आगे बढ़ता है और वह अधिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह परमेश्वर के अस्तित्व को धुँधला होता महसूस करता है, और फिर वह यह भी महसूस कर सकता है कि परमेश्वर का अस्तित्व ही नहीं है। चूँकि शैतान ने मनुष्य में कुछ विचार, मत और धारणाएँ भर दी हैं, जब शैतान मनुष्य के अंदर यह जहर भर देता है, तो क्या मनुष्य शैतान द्वारा गुमराह और भ्रष्ट नहीं किया जाता? तो तुम लोग क्या कहोगे कि आज के लोग किस चीज के अनुसार जीते हैं? क्या वे शैतान द्वारा भरे गए ज्ञान और विचारों से नहीं जीते? और जो चीजें इस ज्ञान और इन विचारों में छिपी हैं—क्या वे शैतान के दर्शन और विष नहीं हैं? मनुष्य शैतान के दर्शनों और विष से जीता है। और शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट किए जाने के मूल में क्या है? शैतान मनुष्य से परमेश्वर का खंडन करवाना, उसका विरोध करवाना, और अपनी तरह उसे उसके विरुद्ध खड़ा करवाना चाहता है; मनुष्य को भ्रष्ट करने के पीछे यही शैतान का लक्ष्य है, और वह साधन भी, जिसके द्वारा शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V

71. मनुष्य के ज्ञान अर्जित करने की प्रक्रिया के दौरान शैतान सभी प्रकार के तरीके इस्तेमाल कर सकता है, चाहे वह कहानियाँ सुनाना हो, उसे अलग से कोई ज्ञान देना हो या अपनी इच्छाएँ या महत्वाकांक्षाएँ पूरी करने देना हो। शैतान उसे किस मार्ग पर ले जाना चाहता है? लोगों को लगता है कि ज्ञान अर्जित करने में कुछ भी गलत नहीं है, यह पूरी तरह स्वाभाविक है। इसे आकर्षक ढंग से प्रस्‍तुत करें तो ऊँची आकांक्षाएँ रखने या महत्वाकांक्षाएँ होने का मतलब दृढ-संकल्प होना है और यही जीवन में सही मार्ग होना चाहिए। अगर लोग अपनी आकांक्षाएँ पूरी कर सकें या सफलतापूर्वक करियर बना सकें, तो क्या यह जीने का और भी अधिक गौरवशाली तरीका नहीं है? ये चीजें करने से व्यक्ति न केवल अपने पूर्वजों का सम्मान कर सकता है, बल्कि इतिहास पर अपनी छाप छोड़ने का मौका भी पा सकता है—क्या यह अच्छी बात नहीं है? सांसारिक लोगों की दृष्टि में यह एक अच्छी बात है, और उनकी निगाह में यह उचित और सकारात्मक होनी चाहिए। लेकिन क्या शैतान, अपने भयानक इरादों के साथ, लोगों को इस प्रकार के मार्ग पर ले जाता है, और बस इतना ही होता है? बिल्कुल नहीं। वास्तव में, मनुष्य की आकांक्षाएँ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, उसकी इच्छाएँ चाहे कितनी भी यथार्थपरक क्यों न हों या वे कितनी भी उचित क्यों न हों, वह सब जो मनुष्य हासिल करना चाहता है और वह सब जो मनुष्य खोजता है, वह अटूट रूप से दो शब्दों से जुड़ा है। ये दो शब्द हर व्यक्ति के लिए उसके संपूर्ण जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर बैठाना चाहता है। वे दो शब्द कौन-से हैं? वे हैं “प्रसिद्धि” और “लाभ।” शैतान एक बहुत ही सौम्य तरीका चुनता है, एक ऐसा तरीका जो मनुष्य की धारणाओं के बहुत ही अनुरूप है और जो बहुत आक्रामक नहीं है, ताकि वह लोगों से अनजाने में ही जीवित रहने के अपने साधन और नियम स्वीकार करवा ले, जीवन लक्ष्य और जीवन की दिशाएँ विकसित करवा ले और जीवन की आकांक्षाएँ रखवाने लगे। अपने जीवन की आकांक्षाओं के बारे में लोगों के वर्णन कितने ही आडंबरपूर्ण क्यों न लगते हों, ये आकांक्षाएँ हमेशा “प्रसिद्धि” और “लाभ” के इर्द-गिर्द घूमती हैं। कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति—या वास्तव में कोई भी व्यक्ति—जीवन भर जिन सारी चीजों का पीछा करता है वे केवल इन दो शब्दों से जुड़ी होती हैं : “प्रसिद्धि” और “लाभ”। लोग सोचते हैं कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके ऊँचे रुतबे और अपार धन-संपत्ति का आनंद लेने और जीवन का आनंद लेने के लिए पूँजी होती है। उन्हें लगता है कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके पास वह पूँजी होती है जिसका इस्तेमाल वे सुख खोजने और देह के उच्छृंखल आनंद में लिप्त रहने के लिए कर सकते हैं। लोग जिस प्रसिद्धि और लाभ की कामना करते हैं उनकी खातिर वे खुशी से और अनजाने में, अपने शरीर, दिल और यहाँ तक कि अपनी संभावनाओं और नियतियों समेत वह सब जो उनके पास है, शैतान को सौंप देते हैं। वे ऐसा बिना किसी हिचकिचाहट के, बिना एक पल के संदेह के करते हैं और बिना कभी यह जाने करते हैं कि वे वह सब कुछ वापस पा सकते हैं जो कभी उनके पास था। लोग जब इस प्रकार खुद को शैतान को सौंप देते हैं और उसके प्रति वफादार हो जाते हैं तो क्या वे खुद पर कोई नियंत्रण बनाए रख सकते हैं? कदापि नहीं। वे पूरी तरह से और बुरी तरह शैतान से नियंत्रित होते हैं। वे पूरी तरह से और सर्वथा इस दलदल में धँस जाते हैं और अपने आप को मुक्त कराने में असमर्थ रहते हैं। जब कोई प्रसिद्धि और लाभ की दलदल में फँस जाता है तो फिर वह कभी उसे नहीं खोजता जो उजला है, जो न्यायोचित है या वे चीजें नहीं खोजता जो खूबसूरत और अच्छी हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि लोगों के लिए प्रसिद्धि और लाभ का प्रलोभन बहुत बड़ा होता है; ये ऐसी चीजें हैं जिनका अनुसरण लोग अंतहीन ढंग से अपने पूरे जीवन भर और यहाँ तक कि अनंत काल तक कर सकते हैं। क्या यह असली स्थिति नहीं है? कुछ लोग कहेंगे कि ज्ञान अर्जित करना पुस्तकें पढ़ने या कुछ ऐसी चीजें सीखने से अधिक कुछ नहीं है, जिन्हें वे पहले से नहीं जानते, ताकि समय से पीछे न रह जाएँ या संसार द्वारा पीछे न छोड़ दिए जाएँ। ज्ञान केवल इसलिए अर्जित किया जाता है, ताकि वे भोजन जुटा सकें, अपना भविष्य बना सकें या बुनियादी आवश्यकताएँ पूरी कर सकें। क्या कोई ऐसा व्यक्ति है, जो मात्र मूलभूत आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए, और मात्र भोजन की समस्या हल करने के लिए एक दशक तक कठिन परिश्रम से अध्ययन करेगा? नहीं, ऐसा कोई नहीं है। तो फिर व्‍यक्ति इतने वर्षों तक ये कठिनाइयाँ क्‍यों सहन करता है? प्रसिद्धि और लाभ के लिए। प्रसिद्धि और लाभ आगे उसका इंतजार कर रहे हैं, उसे इशारे से बुला रहे हैं, और वह मानता है कि केवल अपने परिश्रम, कठिनाइयों और संघर्ष के माध्यम से ही वह उस मार्ग का अनुसरण कर सकता है, जो उसे प्रसिद्धि और लाभ प्राप्त करने की ओर ले जाएगा। ऐसे व्यक्ति को अपने भविष्य के पथ के लिए, अपने भविष्य के आनंद के लिए और एक बेहतर जिंदगी प्राप्त करने के लिए ये कठिनाइयाँ सहनी ही होंगी। भला यह ज्ञान क्या है—क्या तुम लोग मुझे बता सकते हो? क्या यह जीवन जीने के वे नियम और फलसफे नहीं है जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर डालता है, जैसे “पार्टी से प्यार करो, देश से प्यार करो, और अपने धर्म से प्यार करो” और “बुद्धिमान व्यक्ति परिस्थितियों के अधीन हो जाता है”? क्या ये जीवन की “ऊँची आकांक्षाएँ” नहीं हैं, जिन्हें शैतान द्वारा मनुष्य के भीतर डाला गया है? जैसे, महान लोगों के विचार, प्रसिद्ध लोगों की ईमानदारी या वीर शख्सियतों की बहादुरी की भावना, या सामरिक उपन्यासों में नायकों और तलवारबाजों का शौर्य और उदारता। ये विचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी पर अपना प्रभाव डालते हैं, और प्रत्येक पीढ़ी के लोगों को ये विचार स्वीकार करने के लिए तैयार किया जाता है। वे उन “ऊँची आकांक्षाओं” के पीछे भागने में लगातार संघर्ष करते हैं, जिनके लिए वे अपना जीवन भी बलिदान कर देंगे। यही वह साधन और नजरिया है, जिसके द्वारा शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है। तो जब शैतान लोगों को इस रास्ते पर ले जाता है, तो क्या वे परमेश्वर को समर्पित होने और उसकी आराधना करने में सक्षम होते हैं? और क्या वे परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने और सत्य का अनुसरण करने में सक्षम होते हैं? बिल्कुल नहीं—क्योंकि वे शैतान द्वारा गुमराह किए जा चुके होते हैं। हम फिर से शैतान द्वारा लोगों में डाले गए ज्ञान, विचार और मत देखें : क्या इन चीजों में परमेश्वर के प्रति समर्पण और उसकी आराधना के सत्य हैं? क्या परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के सत्य हैं? क्या परमेश्वर का कोई वचन है? क्या उनमें कुछ ऐसा है, जो सत्य से संबंधित है? बिल्कुल नहीं—ये चीजें पूरी तरह से अनुपस्थित हैं।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI

72. शैतान मनुष्य के विचारों को नियंत्रित करने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का उपयोग करता है ताकि लोग और कुछ नहीं बस इन दो ही चीजों के बारे में सोचें। वे प्रसिद्धि और लाभ के लिए संघर्ष करते हैं, प्रसिद्धि और लाभ के लिए कष्ट उठाते हैं, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपमान सहते और भारी बोझ उठाते हैं, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर देते हैं, और प्रसिद्धि और लाभ के लिए कोई भी फैसला या निर्णय ले लेते हैं। इस तरह शैतान लोगों पर अदृश्य बेड़ियाँ डाल देता है और इन बेड़ियों में बंधे रहकर, उनमें उन्हें तोड़ देने की न तो ताकत होती है, न साहस। वे अनजाने ही ये बेड़ियाँ ढोते रहते हैं और बड़ी ही कठिनाई से घिसटते हुए आगे बढ़ते हैं। इस प्रसिद्धि और लाभ की खातिर मानवजाति भटककर परमेश्वर से दूर हो जाती है, उसके साथ विश्वासघात करती है और अधिकाधिक दुष्ट होती जाती है। इस तरह, एक के बाद एक पीढ़ी शैतान की प्रसिद्धि और लाभ के बीच नष्ट होती जाती है। अब, शैतान की करतूतें देखते हुए, क्या उसके भयानक इरादे एकदम घिनौने नहीं हैं? शायद आज भी तुम शैतान की कुटिल मंशाओं की असलियत नहीं देख पाते, क्योंकि तुम्हें लगता है कि प्रसिद्धि और लाभ के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं होगा। और तुम लोगों को लगता है कि अगर लोग प्रसिद्धि और लाभ ही त्याग देंगे, तो वे आगे का मार्ग नहीं देख पाएँगे, अपना लक्ष्य देखने में समर्थ नहीं हो पाएँगे, और उनका भविष्य अंधकारमय, धुँधला और प्रकाशरहित हो जाएगा। परंतु धीरे-धीरे तुम सब लोग एक दिन समझ जाओगे कि प्रसिद्धि और लाभ ऐसी भार-भरकम बेड़ियाँ हैं, जिन्हें शैतान मनुष्य पर डाल देता है। जब वह दिन आएगा, तुम पूरी तरह से शैतान के नियंत्रण का विरोध करोगे और उन बेड़ियों का प्रतिरोध करोगे, जिन्हें शैतान तुम्हारे लिए लाता है। जब वह समय आएगा कि तुम उन सभी चीजों से खुद को मुक्त करना चाहोगे जिन्हें शैतान ने तुम्हारे मन में बैठा दिया है, तब तुम शैतान से अपने आपको पूरी तरह से अलग कर लोगे और उस सबसे सच में नफरत करोगे जो शैतान तुम्हारे लिए लाया है। तभी तुम्हारे अंदर परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम और तड़प पैदा होगी।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI

73. विज्ञान केवल इतना करता है कि लोगों को भौतिक जगत में चीज़ों को देखने देता है और मनुष्य की जिज्ञासा शांत करता है, पर यह मनुष्य को उन नियमों को देखने में सक्षम नहीं बनाता, जिनके द्वारा परमेश्वर सब चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है। मनुष्य विज्ञान में उत्तर पाता प्रतीत होता है, किंतु वे उत्तर उलझन में डालने वाले होते हैं और केवल अस्थायी संतुष्टि लाते हैं, ऐसी संतुष्टि, जो मनुष्य के मन को केवल भौतिक संसार तक सीमित रखने का काम करती है। मनुष्यों को महसूस होता है कि उन्हें विज्ञान से उत्तर मिले हैं, इसलिए जो कोई भी मामला उठता है, वे उस मामले को साबित या स्वीकृत करने के लिए आधार के रूप में अपने वैज्ञानिक विचारों का ही इस्तेमाल करते हैं। मनुष्य का मन विज्ञान द्वारा बहकाया जाता है और इस हद तक उसके वश में हो जाता है कि वह परमेश्वर को जानने, परमेश्वर की उपासना करने और यह मानने को तैयार नहीं होता कि सभी चीज़ें परमेश्वर से आती हैं, और उत्तर पाने के लिए मनुष्य को उसकी ओर देखना चाहिए। क्या यह सच नहीं है? लोग जितना अधिक विज्ञान में विश्वास करते हैं, उतने ही अधिक बेतुके हो जाते हैं और यह मानने लगते हैं कि हर चीज़ का एक वैज्ञानिक समाधान होता है, कि शोध किसी भी चीज़ का समाधान कर सकता है। वे परमेश्वर को नहीं खोजते और वे यह विश्वास नहीं करते कि उसका अस्तित्व है। परमेश्वर में लंबे समय से विश्वास करने वाले कई लोग हैं, जो कोई समस्या सामने आने पर चीजों के बारे में जानने और उत्तर खोजने के लिए कंप्यूटर का उपयोग करते हैं; वे केवल वैज्ञानिक ज्ञान में विश्वास करते हैं। वे यह नहीं मानते कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, वे यह नहीं मानते कि परमेश्वर के वचन मानवजाति की सभी समस्याएँ हल कर सकते हैं, वे मानवजाति की प्रत्येक समस्याओं को सत्य के दृष्टिकोण से नहीं देखते। चाहे उनके सामने कोई भी समस्या आए, वे कभी परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करते, न ही परमेश्वर के वचनों में सत्य खोजकर समाधान ढूँढ़ते हैं। अनेक मामलों में वे यह विश्वास करना पसंद करते हैं कि ज्ञान समस्या का समाधान कर सकता है; उनके लिए विज्ञान ही अंतिम उत्तर है। परमेश्वर ऐसे लोगों के दिलों से बिल्कुल नदारद रहता है। वे छद्म-विश्वासी हैं, और परमेश्वर पर विश्वास के बारे में उनके विचार कई प्रतिष्ठित शिक्षाविदों और वैज्ञानिकों के विचारों से अलग नहीं हैं, जो हमेशा वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करके परमेश्वर की जाँच करने की कोशिश करते रहते हैं। उदाहरण के लिए, कई धर्म-विशेषज्ञ हैं, जो उस स्थान पर गए हैं, जहाँ महान जल-प्रलय के बाद जहाज़ रुका था, और इस प्रकार उन्होंने जहाज़ के अस्तित्व को प्रमाणित कर दिया है। किंतु जहाज के प्रकटन में वे परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं देखते। वे केवल कहानियों और इतिहास पर विश्वास करते हैं; यह उनके वैज्ञानिक शोध और भौतिक संसार के अध्ययन का परिणाम है। अगर तुम भौतिक चीजों पर शोध करोगे, चाहे वह सूक्ष्म जीवविज्ञान हो, खगोलशास्त्र हो या भूगोल हो, तो तुम कभी ऐसा परिणाम नहीं पाओगे, जो यह निर्धारित करता हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है या यह कि वह सभी चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है। तो विज्ञान मनुष्य के लिए क्या करता है? क्या वह मनुष्य को परमेश्वर से दूर नहीं करता? क्या वह लोगों को परमेश्वर को अध्ययन के अधीन करने के लिए प्रेरित नहीं करता? क्या वह लोगों को परमेश्वर के अस्तित्व और संप्रभुता के बारे में अधिक संशयात्मक नहीं बनाता, और इस प्रकार उनसे परमेश्वर का खंडन नहीं करवाता और उसे धोखा नहीं दिलवाता? यही परिणाम होता है। तो जब शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग करता है, तो वह कौन-सा उद्देश्य हासिल करने की कोशिश कर रहा होता है? वह लोगों को गुमराह देने और संज्ञाहीन करने के लिए वैज्ञानिक निष्कर्षों का उपयोग करना चाहता है, और उनके हृदयों पर पकड़ बनाने के लिए अस्पष्ट उत्तरों का उपयोग करना चाहता है, ताकि वे परमेश्वर के अस्तित्व की खोज या उस पर विश्वास न करें। इसीलिए मैं कहता हूँ कि विज्ञान उन तरीकों में से एक है, जिनसे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V

74. शैतान ने कई लोक-कथाएँ और इतिहास की पुस्तकों में मिलने वाली कहानियाँ गढ़ी हैं, जिनसे लोगों पर पारंपरिक संस्कृति या अंधविश्वासी शख्सियतों की गहरी छाप छोड़ी जाती है। उदाहरण के लिए, चीन में “समुद्र पार करने वाली आठ अमर हस्तियाँ,” “पश्चिम की यात्रा,” जेड सम्राट, “नेझा की अजगर राजा पर विजय,” और “देवताओं का अधिष्ठापन।” क्या इन्होंने मनुष्य के मन में गहराई से जड़ें नहीं जमा ली हैं? भले ही तुम में से कुछ लोग पूरा विवरण न जानते हों, फिर भी तुम आम कहानियाँ जानते हो, और यह सामान्य विषयवस्तु ही है जो तुम्हारे हृदय और मस्तिष्क में बैठ जाती है, ताकि तुम उन्हें भुला न सको। ये ही वे विभिन्न विचार या किंवदंतियाँ हैं, जिन्हें शैतान ने बहुत समय पहले मनुष्य के लिए तैयार किया था और जिन्हें विभिन्न समय पर फैलाया गया है। ये चीजें सीधे लोगों की आत्माओं को हानि पहुँचाती और नष्ट करती हैं और लोगों को एक के बाद दूसरे सम्मोहन में डालती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब तुम ऐसी पारंपरिक संस्कृति, कथाओं या अंधविश्वास भरी चीजों को स्वीकार कर लेते हो, जब वे तुम्हारे मन में बैठ जाती हैं, और जब वे तुम्हारे हृदय में अटक जाती हैं, तो तुम सम्मोहित-से हो जाते हो—तुम इन सांस्कृतिक जालों में, इन विचारों और पारंपरिक कथाओं में उलझ जाते हो और उनसे प्रभावित हो जाते हो। वे तुम्हारे जीवन को, जीवन के प्रति तुम्हारे नजरिये को और चीजों के बारे में तुम्हारे निर्णय को प्रभावित करती हैं। इससे भी बढ़कर, वे जीवन के सच्चे मार्ग के तुम्हारे अनुसरण को भी प्रभावित करती हैं : यह वास्तव में एक दुष्टतापूर्ण सम्मोहन है। तुम जितनी भी कोशिश कर लो, लेकिन उन्हें झटककर दूर नहीं कर सकते; तुम उन पर चोट तो करते हो, लेकिन उन्हें काटकर नीचे नहीं गिरा सकते; तुम उन पर प्रहार तो करते हो, लेकिन उन पर प्रहार करके उन्हें दूर नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त, जब लोगों पर अनजाने ही इस प्रकार का सम्मोहन डाला जाता है, तो वे अनजाने ही शैतान की आराधना करना आरंभ कर देते हैं, जिससे उनके अपने दिलों में शैतान की छवि को बढ़ावा मिलता है। दूसरे शब्दों में, वे शैतान को अपने आदर्श के रूप में, अपनी आराधना और आदर के पात्र के रूप में स्थापित कर लेते हैं, यहाँ तक कि वे उसे परमेश्वर मानने की हद तक भी चले जाते हैं। अनजाने ही ये चीजें लोगों के हृदय में हैं और उनके शब्दों और कर्मों को नियंत्रित कर रही हैं। इतना ही नहीं, तुम पहले तो इन कहानियों और किंवदंतियों को झूठा मानते हो, लेकिन फिर अनजाने ही उनका अस्तित्व स्वीकार कर लेते हो, उन्हें वास्तविक चीजें बना देते हो, और उन्हें वास्तविक, विद्यमान चीजों में बदल लेते हो। अपनी अनभिज्ञता में तुम अवचेतन रूप से इन विचारों को और इन चीजों के अस्तित्व को ग्रहण कर लेते हो। अवचेतन रूप में तुम दुष्टात्माओं, शैतान और मूर्तियों को भी अपने घर और हृदय में ग्रहण कर लेते हो—यह वास्तव में एक सम्मोहन है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI

75. जिन अंधविश्वासी गतिविधियों में लोग संलग्न रहते हैं, परमेश्वर उनसे सबसे ज्यादा घृणा करता है, परंतु बहुत-से लोग अभी भी यह सोचकर उन्हें त्यागने में असमर्थ हैं कि अंधविश्वास की इन गतिविधियों की आज्ञा परमेश्वर द्वारा दी गई है, और आज भी उन्हें पूरी तरह से त्यागा जाना बाकी है। ऐसी चीज़ें, जैसे कि युवा लोगों द्वारा विवाह के भोज और दुल्हन के साज-सामान का प्रबंध; नकद उपहार, प्रीतिभोज, और ऐसे ही अन्य तरीके, जिनसे आनंद के अवसर मनाए जाते हैं; प्राचीन फार्मूले, जो पूर्वजों से मिले हैं; अंधविश्वास की वे सारी गतिविधियाँ, जो मृतकों तथा उनके अंतिम संस्कार के लिए की जाती हैं : ये परमेश्वर के लिए और भी ज्यादा घृणास्पद हैं। यहाँ तक कि आराधना का दिन (धार्मिक जगत द्वारा मनाए जाने वाले सब्त समेत) भी उसके लिए घृणास्पद है; और मनुष्यों के बीच के सामाजिक संबंधों और सांसारिक मेलजोल का परमेश्वर और भी अधिक तिरस्कार करता है। यहाँ तक कि वसंतोत्सव और क्रिसमस भी, जिनके बारे में सब जानते हैं, परमेश्वर की आज्ञा से नहीं मनाए जाते, इन त्योहारों की छुट्टियों के लिए खिलौनों और सजावट, जैसे कि गीत, पटाखे, लालटेनें, पवित्र समागम, क्रिसमस के उपहार और क्रिसमस के उत्सव, और परम समागम की तो बात ही छोड़ो—क्या वे मनुष्यों के मन की मूर्तियाँ नहीं हैं? सब्त के दिन रोटी तोड़ना, शराब और बढ़िया लिनन और भी अधिक प्रभावी मूर्तियाँ हैं। चीन में लोकप्रिय सभी पारंपरिक पर्व-दिवस, जैसे ड्रैगन के सिर उठाने का दिन, ड्रैगन नौका महोत्सव, मध्य-शरद महोत्सव, लाबा महोत्सव और नव वर्ष उत्सव, और धार्मिक जगत के त्योहार जैसे ईस्टर, बपतिस्मा दिवस और क्रिसमस, ये सभी अनुचित त्योहार प्राचीन काल से बहुत लोगों द्वारा मनाए जा रहे हैं और आगे सौंपे जाते रहे हैं। यह मनुष्यजाति की समृद्ध कल्पना और प्रवीण धारणा ही है, जिसने उन्हें तब से लेकर आज तक आगे बढ़ाया है। ये निर्दोष प्रतीत होते हैं, परंतु वास्तव में ये शैतान द्वारा मनुष्यजाति के साथ खेली जाने वाली चालें हैं। जो स्थान शैतानों से जितना ज्यादा भरा होगा, और जितना वह पुराने ढंग का और पिछड़ा हुआ होगा, उतनी ही गहराई से वह सामंती रीति-रिवाजों से घिरा होगा। ये चीज़ें लोगों को कसकर बाँध देती हैं और उनके हिलने-डुलने की भी गुंजाइश नहीं छोड़तीं। धार्मिक जगत के कई त्योहार बड़ी मौलिकता प्रदर्शित करते हैं और परमेश्वर के कार्य के लिए एक सेतु का निर्माण करते प्रतीत होते हैं; किंतु वास्तव में वे शैतान के अदृश्य बंधन हैं, जिनसे वह लोगों को बाँध देता है और परमेश्वर को जानने से रोक देता है—वे सब शैतान की धूर्त चालें हैं। वास्तव में, जब परमेश्वर के कार्य का एक चरण समाप्त हो जाता है, तो वह उस समय के साधन और शैली नष्ट कर चुका होता है और उनका कोई निशान नहीं छोड़ता। परंतु “सच्चे विश्वासी” उन मूर्त भौतिक वस्तुओं की आराधना करना जारी रखते हैं; इस बीच वे परमेश्वर की सत्ता को अपने मस्तिष्क के पिछले हिस्से में खिसका देते हैं और उसके बारे में आगे कोई अध्ययन नहीं करते, और यह समझते हैं कि वे परमेश्वर के प्रति प्रेम से भरे हुए हैं, जबकि वास्तव में वे उसे बहुत पहले ही घर के बाहर धकेल चुके होते हैं और शैतान को आराधना के लिए मेज पर रख चुके होते हैं। यीशु, क्रूस, मरियम, यीशु का बपतिस्मा, अंतिम भोज के चित्र—लोग इन्हें स्वर्ग के प्रभु के रूप में आदर देते हैं, जबकि पूरे समय बार-बार “प्रभु, स्वर्गिक पिता” पुकारते हैं। क्या यह सब मज़ाक नहीं है? आज तक पूर्वजों द्वारा मनुष्यजाति को सौंपी गई ऐसी कई बातों और प्रथाओं से परमेश्वर को घृणा है; वे गंभीरता से परमेश्वर के लिए आगे के मार्ग में बाधा डालती हैं और, इतना ही नहीं, वे मनुष्यजाति के प्रवेश में भारी अड़चन पैदा करती हैं। यह बात तो रही एक तरफ कि शैतान ने मनुष्यजाति को किस सीमा तक भ्रष्ट किया है, लोगों के अंतर्मन विटनेस ली के नियम, लॉरेंस के अनुभवों, वॉचमैन नी के सर्वेक्षणों और पौलुस के कार्य जैसी चीज़ों से पूर्णतः भरे हुए हैं। परमेश्वर के पास मनुष्यों पर कार्य करने के लिए कोई मार्ग ही नहीं है, क्योंकि उनके भीतर व्यक्तिवाद, विधियाँ, नियम, विनियम, प्रणालियाँ और ऐसी ही अनेक चीज़ें बहुत ज्यादा भरी पड़ी हैं; लोगों के सामंती अंधविश्वास की प्रवृत्तियों के अतिरिक्त इन चीज़ों ने मनुष्यजाति को बंदी बनाकर उसे निगल लिया है। यह ऐसा है, मानो लोगों के विचार एक रोचक चलचित्र हों, जो बादलों की सवारी करने वाले विलक्षण प्राणियों के साथ पूरे रंग में एक परि-कथा का वर्णन कर रहा है, जो इतना कल्पनाशील है कि लोगों को विस्मित कर देता है और उन्हें चकित और अवाक छोड़ देता है। सच कहा जाए, तो आज परमेश्वर जो काम करने के लिए आया है, वह मुख्यतः मनुष्यों के अंधविश्वासी लक्षणों की काट-छाँट और उन्हें दूर करना तथा उनके मानसिक दृष्टिकोण पूर्ण रूप से रूपांतरित करना है। परमेश्वर का कार्य उस विरासत के कारण आज तक पूरा नहीं हुआ है, जो मनुष्यजाति द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे सौंपी गई है; यह वह कार्य है, जो किसी महान आध्यात्मिक व्यक्ति की धरोहर को आगे बढ़ाने, या परमेश्वर द्वारा किसी अन्य युग में किए गए किसी प्रतिनिधि प्रकृति के कार्य को विरासत में प्राप्त करने की आवश्यकता के बिना उसके द्वारा व्यक्तिगत रूप से आरंभ और पूर्ण किया गया है। मनुष्यों को इनमें से किसी चीज़ की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। आज परमेश्वर के बोलने और कार्य करने की भिन्न शैली है, फिर मनुष्यों को कष्ट उठाने की क्या आवश्यकता है? यदि मनुष्य अपने “पूर्वजों” की विरासत को जारी रखते हुए वर्तमान धारा के अंतर्गत आज के मार्ग पर चलते हैं, तो वे अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाएँगे। परमेश्वर मानव-व्यवहार के इस विशेष ढंग से बहुत घृणा करता है, वैसे ही जैसे वह मानव-जगत के वर्षों, महीनों और दिनों से घृणा करता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (3)

76. शैतान सामाजिक प्रवृत्तियों के जरिए मनुष्य को भ्रष्ट और नियंत्रित करता है। सामाजिक प्रवृत्तियों में विभिन्न क्षेत्रों सहित कई पहलू शामिल हैं, जैसे प्रसिद्ध और महान हस्तियों और साथ ही फिल्म और संगीत के नायकों की आराधना, सेलिब्रिटी की आराधना, ऑनलाइन गेम आदि—ये सभी सामाजिक प्रवृत्तियों का हिस्सा हैं, और यहाँ विवरण में जाने की कोई आवश्यकता नहीं। हम बस उन विचारों के बारे में, जिन्हें सामाजिक प्रवृत्तियाँ लोगों में लाती हैं, उस तरीके के बारे में, जिस तरह से वे लोगों को संसार से निपटने को मजबूर करती हैं, और उस जीवन-लक्ष्य और नजरिये के बारे में, जिन्हें वे लोगों में लाती हैं, बात करेंगे। ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं; ये लोगों के विचार और मत नियंत्रित और प्रभावित कर सकते हैं। ये प्रवृत्तियाँ एक के बाद एक उत्पन्न होती हैं, और ये सभी वह दुष्प्रभाव छोड़ती हैं जो निरंतर मनुष्य को पतित करता रहता है, जिसके कारण लोग अंतःकरण, मानवता और विवेक खो देते हैं, और जो उनके नैतिक मूल्यों और उनकी सत्यनिष्ठा को और अधिक कमजोर कर देता है, इस हद तक कि हम यह कह सकते हैं कि अब अधिकतर लोगों में कोई ईमानदारी नहीं है, कोई मानवता नहीं है, न ही उनमें कोई अंतःकरण है, और विवेक तो बिल्कुल भी नहीं है। तो ये सामाजिक प्रवृत्तियाँ क्या हैं? ये वे प्रवृत्तियाँ हैं, जिन्हें तुम आँखों से नहीं देख सकते। जब कोई नई प्रवृत्ति दुनिया में फैलती है, तो शायद थोड़े लोग ही अग्रणी स्थान पर होते हैं, जो प्रवृत्ति शुरू करने वालों के तौर पर काम करते हैं। वे कुछ नया करना शुरू करते हैं, फिर किसी तरह का विचार या किसी तरह का दृष्टिकोण स्वीकार करते हैं। लेकिन अनभिज्ञता की स्थिति में अधिकतर लोग इस किस्म की प्रवृत्ति से लगातार तब तक संक्रमित, आकर्षित और आत्मसात होते रहते हैं, जब तक वे सब अनजाने ही और अनिच्छा से इसे स्वीकार नहीं कर लेते और इसमें डूब नहीं जाते और इससे नियंत्रित नहीं हो जाते। एक के बाद एक, ऐसी प्रवृत्तियाँ उन लोगों से, जो स्वस्थ शरीर और मन के नहीं होते; जो नहीं जानते कि सत्य क्या है, और जो सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बीच अंतर नहीं कर सकते, इन्हें और साथ ही शैतान से आने वाले जीवन के दृष्टिकोण और मूल्य को खुशी से स्वीकार करवाती हैं। शैतान उन्हें जीवन के प्रति नजरिया रखने के बारे में जो कुछ भी बताता है, वे उसे और जीवन जीने के उस तरीके को स्वीकार कर लेते हैं, जो शैतान उन्हें “प्रदान” करता है, और उनके पास न तो प्रतिरोध करने का सामर्थ्य होता है, न ही योग्यता, और जागरूकता तो बिल्कुल भी नहीं होती। ...

... शैतान इन सामाजिक प्रवृत्तियों का उपयोग कदम दर कदम लोगों को लुभाकर दानवों के घोंसले में लाने के लिए करता है, ताकि लोग सामाजिक प्रवृत्तियों में अनजाने ही धन, भौतिक इच्छाओं, बुराई और हिंसा पर श्रद्धा रखें। जब ये चीजें मनुष्य के हृदय में प्रवेश कर जाती हैं, तो मनुष्य क्या बन जाता है? मनुष्य एक दानव और शैतान बन जाता है! क्यों? क्योंकि मनुष्य के हृदय में कौन-सा मनोवैज्ञानिक झुकाव होता है? मनुष्य किसका सम्मान करता है? मनुष्य बुराई और हिंसा में आनंद लेना शुरू कर देता है, खूबसूरती या अच्छाई के प्रति प्रेम नहीं दिखाता, शांति के प्रति तो बिल्कुल भी नहीं। लोग सामान्य मानवता में सादा जीवन जीने की इच्छा नहीं करते बल्कि ऊँचा रुतबा और अपार धन-समृद्धि का आनंद उठाना, दैहिक सुखों का आनंद लेना चाहते हैं और बिना किसी प्रतिबंध या बंधनों के अपनी देह को संतुष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ते; दूसरे शब्दों में, वे जो चाहते हैं, करते हैं। तो जब मनुष्य इस किस्म की प्रवृत्तियों में डूब जाता है, तो क्या वह ज्ञान जो तुमने सीखा है, तुम्हें छुड़ाने में तुम्हारी सहायता कर सकता है? क्या पारंपरिक संस्कृति और अंधविश्वास की तुम्हारी समझ इस भयानक दुर्दशा से बचने में तुम्हारी सहायता कर सकती है? क्या मनुष्य को ज्ञात पारंपरिक नैतिक मूल्य और अनुष्ठान संयम बरतने में लोगों की सहायता कर सकते हैं? उदाहरण के लिए, “ऐनालेक्ट्स” और “ताओ ते चिंग” को लो। क्या ये इन दुष्प्रवृत्तियों के दलदल से पैर बाहर निकालने में लोगों की सहायता कर सकते हैं? बिल्कुल नहीं। इस तरह, मनुष्य अधिकाधिक दुष्ट, अभिमानी, दूसरों को नीचा दिखाने वाला, स्वार्थी और दुर्भावनापूर्ण बन जाता है। लोगों के बीच कोई स्नेह नहीं रह जाता, परिवार के सदस्यों के बीच कोई प्रेम नहीं रह जाता, रिश्तेदारों और मित्रों के बीच कोई तालमेल नहीं रह जाता; हिंसा इंसानी रिश्तों की विशेषता बन जाती है। सभी लोग अपने साथी मनुष्यों के बीच रहने के लिए हिंसक तरीके इस्तेमाल करना चाहते हैं; वे अपनी रोजी-रोटी हिंसा का उपयोग करके कमाते हैं; अपनी स्थिति और लाभ हिंसा का उपयोग करके प्राप्त करते हैं, और जो चाहे वह करने के लिए हिंसक और दुष्ट तरीके इस्तेमाल करते हैं। क्या यह मानवता भयानक नहीं है? यह बहुत हद तक ऐसा ही है : उन्होंने न केवल परमेश्वर को क्रूस पर चढ़ाया, बल्कि उन सबका वध भी कर देंगे, जो उसका अनुसरण करते हैं—क्योंकि मनुष्य बहुत दुष्ट है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI

77. “दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है” यह शैतान का एक फ़लसफ़ा है। यह संपूर्ण मानवजाति में, हर मानव-समाज में प्रचलित है; तुम कह सकते हो, यह एक रुझान है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह हर एक व्यक्ति के हृदय में बैठा दिया गया है, जिन्होंने पहले तो इस कहावत को स्वीकार नहीं किया, किंतु फिर जब वे जीवन की वास्तविकताओं के संपर्क में आए, तो इसे मूक सहमति दे दी, और महसूस करना शुरू किया कि ये वचन वास्तव में सत्य हैं। क्या यह शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने की प्रक्रिया नहीं है? शायद लोगों के पास इस कहावत को लेकर समान मात्रा में अनुभवजन्य ज्ञान नहीं होता, बल्कि हर एक आदमी अपने आसपास घटित घटनाओं और अपने निजी अनुभवों के आधार पर इस कहावत की अलग-अलग रूप में व्याख्या करता है और इसे अलग-अलग मात्रा में स्वीकार करता है। क्या ऐसा नहीं है? चाहे इस कहावत के संबंध में किसी के पास कितना भी अनुभव हो, इसका किसी के हृदय पर कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है? तुम लोगों में से प्रत्येक को शामिल करते हुए, दुनिया के लोगों के स्वभाव के माध्यम से कोई चीज प्रकट होती है। यह क्या है? यह पैसे की उपासना है। क्या इसे किसी के हृदय में से निकालना कठिन है? यह बहुत कठिन है! ऐसा प्रतीत होता है कि शैतान का मनुष्य को भ्रष्ट करना सचमुच गहन है! शैतान लोगों को प्रलोभन देने के लिए धन का उपयोग करता है, और उन्हें भ्रष्ट करके उनसे धन की आराधना करवाता है और भौतिक चीजों की पूजा करवाता है। और लोगों में धन की इस आराधना की अभिव्यक्ति कैसे होती है? क्या तुम लोगों को लगता है कि बिना पैसे के तुम लोग इस दुनिया में जीवित नहीं रह सकते, कि पैसे के बिना एक दिन जीना भी असंभव होगा? लोगों की हैसियत इस बात पर निर्भर करती है कि उनके पास कितना पैसा है, और वे उतना ही सम्मान पाते हैं। गरीबों की कमर शर्म से झुक जाती है, जबकि धनी अपनी ऊँची हैसियत का मज़ा लेते हैं। वे ऊँचे और गर्व से खड़े होते हैं, जोर से बोलते हैं और अहंकार से जीते हैं। यह कहावत और रुझान लोगों के लिए क्या लाता है? क्या यह सच नहीं है कि पैसे पाने के लिए लोग कुछ भी बलिदान कर सकते हैं? क्या अधिक पैसे की खोज में कई लोग अपनी गरिमा और ईमान का बलिदान नहीं कर देते? क्या कई लोग पैसे की खातिर अपना कर्तव्य निभाने और परमेश्वर का अनुसरण करने का अवसर नहीं गँवा देते? क्या सत्य प्राप्त करने और बचाए जाने का अवसर खोना लोगों का सबसे बड़ा नुकसान नहीं है? क्या मनुष्य को इस हद तक भ्रष्ट करने के लिए इस विधि और इस कहावत का उपयोग करने के कारण शैतान कुटिल नहीं है? क्या यह दुर्भावनापूर्ण चाल नहीं है? जैसे-जैसे तुम इस लोकप्रिय कहावत का विरोध करने से लेकर अंततः इसे सत्य के रूप में स्वीकार करने तक की प्रगति करते हो, तुम्हारा हृदय पूरी तरह से शैतान के चंगुल में फँस जाता है, और इस तरह तुम अनजाने में इस कहावत के अनुसार जीने लगते हो। इस कहावत ने तुम्हें किस हद तक प्रभावित किया है? हो सकता है कि तुम सच्चे मार्ग को जानते हो, और हो सकता है कि तुम सत्य को जानते हो, किंतु उसकी खोज करने में तुम असमर्थ हो। हो सकता है कि तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, किंतु तुम सत्य को पाने के लिए क़ीमत चुकाने का कष्ट उठाने को तैयार नहीं हो। इसके बजाय, तुम बिल्कुल अंत तक परमेश्वर का विरोध करने में अपने भविष्य और नियति को त्याग दोगे। चाहे परमेश्वर कुछ भी क्यों न कहे, चाहे परमेश्वर कुछ भी क्यों न करे, चाहे वह प्रेम कितना गहरा और कितना महान क्यों न हो जो परमेश्वर को तुम्हारे प्रति है, जहाँ तक तुम समझने में समर्थ हो, तुम फिर भी हठपूर्वक अपने रास्ते पर ही चलते रहने का आग्रह करोगे और इस कहावत की कीमत चुकाओगे। कहने का तात्पर्य यह है कि यह कहावत पहले ही तुम्हारे विचारों को गुमराह और नियंत्रित कर चुकी है, यह पहले ही तुम्हारे व्यवहार को नियंत्रित कर चुकी है, और तुम धन की खोज छोड़ने के बजाय इसे अपने भाग्य पर शासन करने दोगे। लोग इस प्रकार कार्य कर सकते हैं कि उन्हें शैतान के शब्दों द्वारा नियंत्रित और प्रभावित किया जा सकता है—क्या इसका यह अर्थ नहीं कि उन्हें शैतान द्वारा गुमराह और भ्रष्ट किया गया है? क्या शैतान के दर्शन, उसकी मानसिकता और उसके स्वभाव ने तुम्हारे दिलों में जड़ें नहीं जमा ली हैं? जब तुम आँख मूँदकर धन के पीछे दौड़ते हो, और सत्य की खोज छोड़ देते हो, तो क्या शैतान ने तुम्हें गुमराह करने का अपना उद्देश्य प्राप्त नहीं कर लिया है? ठीक यही मामला है। तो क्या जब शैतान द्वारा तुम्हें गुमराह और भ्रष्ट किया जाता है, तो तुम इसे महसूस कर पाते हो? तुम नहीं कर पाते। अगर तुम शैतान को अपने सामने खड़ा नहीं देख सकते, या यह महसूस नहीं कर सकते कि यह शैतान है जो छिपकर कार्य कर रहा है, तो क्या तुम शैतान की दुष्टता देख पाओगे? क्या तुम जान पाओगे कि शैतान मानवजाति को कैसे भ्रष्ट करता है? शैतान हर समय और हर जगह मनुष्य को भ्रष्ट करता है। शैतान मनुष्य के लिए इस भ्रष्टता से बचना असंभव बना देता है और वह इसके सामने मनुष्य को असहाय बना देता है। शैतान अपने विचारों, अपने दृष्टिकोणों और उससे आने वाली दुष्ट चीज़ों को तुमसे ऐसी परिस्थितियों में स्वीकार करवाता है, जहाँ तुम अज्ञानता में होते हो, और जब तुम्हें इस बात का पता नहीं चलता कि तुम्हारे साथ क्या हो रहा है। लोग इन चीज़ों को स्वीकार कर लेते हैं और इन पर कोई आपत्ति नहीं करते। वे इन चीज़ों को सँजोते हैं और एक खजाने की तरह सँभाले रखते हैं, वे इन चीज़ों को अपने साथ जोड़-तोड़ करने देते हैं और उन्हें अपने साथ खिलवाड़ करने देते हैं; और इस तरह लोग शैतान के सामर्थ्य के अधीन जीते हैं और अनजाने ही शैतान की आज्ञा का पालन करते हैं, और शैतान का मनुष्य को भ्रष्ट करना और अधिक गहरा होता जाता है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V

78. छह प्राथमिक चालें हैं, जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल करता है

पहला है नियंत्रण और जोर-जबरदस्ती। अर्थात्, तुम्हारे हृदय को नियंत्रित करने के लिए शैतान हर संभव कार्य करता है। “जोर-जबरदस्ती” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है अपनी बात मनवाने के लिए धमकी और बल की युक्तियों का इस्तेमाल करना, और बात न मानने के परिणामों के बारे में विचार करने पर मजबूर करना। तुम डर जाते हो और उसकी अवहेलना करने की हिम्मत नहीं करते, इसलिए तुम हार मान लेते हो।

दूसरा है धोखाधड़ी और छल-कपट। “धोखाधड़ी और छल-कपट” में क्‍या होता है? शैतान कुछ कहानियाँ और झूठ गढ़ता है, और छल-कपट करके तुमसे उन पर विश्वास करवाता है। वह तुम्हें कभी नहीं बताता कि मनुष्य को परमेश्वर द्वारा सृजित किया गया था, लेकिन वह प्रत्यक्ष रूप से यह भी नहीं कहता कि तुम्हें परमेश्वर ने नहीं बनाया था। वह “परमेश्वर” शब्द का उपयोग बिल्कुल नहीं करता, बल्कि उसके बदले किसी और चीज का उपयोग करता है, और इस चीज का उपयोग वह तुम्हें गुमराह करने के लिए करता है, ताकि तुम्हें परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में मूल रूप से कुछ पता न चले। बेशक, इस “छल-कपट” में यह अकेला पहलू नहीं, बल्कि कई पहलू शामिल हैं।

तीसरा है जबरदस्ती कोई चीज दिमाग में भरना। लोगों के दिमाग में कौन-सी चीज जबरदस्ती भरी जाती है? क्या जबरदस्ती दिमाग में कोई चीज भरने का काम मनुष्य की अपनी पसंद से किया जाता है? क्या इसे मनुष्य की सहमति से किया जाता है? निश्चित रूप से नहीं। तुम उससे सहमत न भी हो, तो भी तुम इस बारे में कुछ नहीं कर सकते। तुम्हारे जाने बिना ही शैतान तुम्हारे दिमाग में जबरदस्ती चीजें भरता है, अपनी सोच, जीवन के अपने नियम और अपना सार तुम्हारे भीतर डालता है।

चौथा है धमकाना और भुलावा देना। अर्थात्, शैतान तुमसे खुद को स्वीकार करवाने, अपना अनुसरण करवाने और अपनी सेवा करवाने के लिए विभिन्न चालें चलता है। अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए वह कुछ भी करता है। कभी वह तुम पर छोटे-छोटे अनुग्रह करता है, और इस पूरे समय तुम्हें पाप करने के लिए फुसलाता है। अगर तुम उसका अनुसरण नहीं करते, तो वह तुम्हें पीड़ित और दंडित करेगा और तुम पर आक्रमण करने और तुम्हारे खिलाफ साजिश करने के लिए विभिन्न तरीके इस्तेमाल करेगा।

पाँचवा है गुमराह करना और पंगु बनाना। “गुमराह करना और पंगु बनाना” तब होता है, जब शैतान लोगों में कुछ ऐसे कर्णप्रिय शब्द और विचार डालता है, जो उनकी धारणाओं से मेल खाते हैं और उन्हें उचित लगते हैं, ताकि ऐसा लगे मानो वह लोगों की दैहिक स्थिति, उनके जीवन और भविष्य के प्रति विचारशील हो रहा है, जबकि वास्तव में उसका एकमात्र लक्ष्य तुम्हें मूर्ख बनाना होता है। तब वह तुम्हें पंगु बना देता है, ताकि तुम यह न जान पाओ कि क्या सही है और क्या गलत, और तुम अनजाने ही छले जाओ और फलस्वरूप उसके नियंत्रण के अधीन आ जाओ।

छठा है तन और मन का विनाश। शैतान मनुष्य के किस हिस्से को नष्ट करता है? शैतान तुम्हारे मन को नष्ट करता है, और वैसा करके तुम्हें विरोध करने में असमर्थ बना देता है, जिसका अर्थ है कि तुम्हारे न चाहने के बावजूद धीरे-धीरे तुम्हारा हृदय शैतान की ओर मुड़ने लगता है। ये चीजें वह हर दिन तुम्हारे भीतर डालता है, तुम्हें प्रतिदिन प्रभावित करने और तैयार करने के लिए ये विचार और संस्कृतियाँ इस्तेमाल करता है, धीरे-धीरे तुम्हारी इच्छाशक्ति को तोड़ता है, जिसके कारण अंततः तुम एक अच्छा इंसान नहीं बने रहना चाहते, जिसके कारण तुम अब उस चीज के पक्ष में डटे नहीं रहना चाहते, जिसे तुम “न्याय” कहते हो। अनजाने ही तुम्हारे भीतर धारा के विरुद्ध तैरने की इच्छा-शक्ति नहीं रह जाती, बल्कि तुम धारा के साथ बहने लगते हो। “विनाश” का अर्थ है शैतान द्वारा लोगों को इतना अधिक कष्ट देना कि वे अपनी छायामात्र बन जाते हैं, मनुष्य नहीं रह जाते। इसी वक्त शैतान उन्हें निगलने का मौका लपक लेता है।

शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली इन चालों में से प्रत्येक चाल मनुष्य को विरोध करने में असमर्थ बना देती है; इनमें से कोई भी चाल मनुष्य के लिए घातक हो सकती है। दूसरे शब्दों में, शैतान जो कुछ भी करता है और वह जो भी चाल चलता है, वह तुम्हें पतित कर सकती है, तुम्हें शैतान के नियंत्रण के अधीन ला सकती है और तुम्हें बुराई और पाप के दलदल में धँसा सकती है। ऐसी हैं वे चालें, जिन्हें शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस्तेमाल करता है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI

79. मनुष्य, जो ऐसी गंदी भूमि में जन्मा, समाज द्वारा गंभीर हद तक संक्रमित हो गया है, वह सामंती नैतिकता से अनुकूलित कर दिया गया है और उसने “उच्चतर शिक्षा संस्थानों” की शिक्षा प्राप्त की है। पिछड़ी सोच, भ्रष्ट नैतिकता, अवमूल्यित जीवन दृष्टिकोण, सांसारिक आचरण के घृणित फलसफे, बिल्कुल मूल्यहीन अस्तित्व, नीच रिवाज और दैनिक जीवन—ये सभी चीजें मनुष्य के हृदय में गंभीर घुसपैठ करती रही हैं, उसकी अंतरात्मा को गंभीरता से नष्ट और उसकी अंतरात्मा पर गंभीर प्रहार करती रही हैं। फलस्वरूप, मनुष्य परमेश्वर से अधिक से अधिक दूर हो रहा है और परमेश्वर का अधिक से अधिक विरोधी हो गया है। दिन-प्रतिदिन मनुष्य का स्वभाव और अधिक निर्दयी हो रहा है और एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के लिए कुछ भी त्याग करे, एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रति समर्पण करे और एक भी ऐसा व्यक्ति तो और भी नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रकटन की खोज करे। इसके बजाय, इंसान शैतान की सत्ता में अपने दिल के तृप्त होने तक सुख का अनुसरण करता है और कीचड़ में अपनी देह को बेहिचक भ्रष्ट करता है। सत्य सुनने के बाद भी जो लोग अंधकार में जीते हैं उनमें इसका अभ्यास करने की कोई इच्छा नहीं होती है और यह देखने के बावजूद कि परमेश्वर पहले ही प्रकट हो चुका है वे खोजने की ओर उन्मुख नहीं होते हैं। ऐसी भ्रष्ट मानवजाति के पास उद्धार की गुंजाइश कैसे हो सकती है? ऐसी पतित मानवजाति रोशनी में कैसे जी सकती है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपरिवर्तित स्वभाव होना परमेश्वर के साथ शत्रुता रखना है

80. यद्यपि शैतान दयालु, न्यासंगत और सदाचारी प्रतीत होता है, फिर भी शैतान का सार निर्दयी और दुष्टतापूर्ण है

शैतान लोगों को धोखा देकर अपनी प्रतिष्ठा बनाता है और अक्सर खुद को न्याय के अगुआ और आदर्श के रूप में स्थापित करता है। न्याय की रक्षा की आड़ में वह लोगों को हानि पहुँचाता है, उनकी आत्माओं को निगल जाता है, और मनुष्य को स्तब्ध करने, गुमराह करने और भड़काने के लिए हर प्रकार के साधनों का उपयोग करता है। उसका लक्ष्य मनुष्य से अपने दुष्ट आचरण का अनुमोदन और अनुसरण करवाना और उसे परमेश्वर के अधिकार और संप्रभुता का विरोध करने में अपने साथ मिलाना है। किंतु जब कोई उसकी चालों, षड्यंत्रों और उसके भद्दे चेहरे को समझ जाता है और नहीं चाहता कि शैतान द्वारा उसे लगातार कुचला और मूर्ख बनाया जाए या वह निरंतर शैतान की गुलामी करे या उसके साथ दंडित और नष्ट किया जाए, तो शैतान अपना पिछला संतनुमा चेहरा बदल लेता है, अपना झूठा नकाब फाड़ देता और अपना असली व्यक्तित्व प्रकट कर देता है, जो दुष्ट, शातिर, भद्दा और वहशी है। वह उन सभी का विनाश करने से ज्यादा कुछ पसंद नहीं करता, जो उसका अनुसरण करने से इनकार करते हैं और उसकी दुष्ट शक्तियों का विरोध करते हैं। इस बिंदु पर शैतान अब और भरोसेमंद और सज्जन व्यक्ति का रूप धारण किए नहीं रह सकता; इसके बजाय, भेड़ की खाल में भेड़िए की तरह के उसका असली कुरूप और शैतानी व्यक्तित्व प्रकट हो जाता है। एक बार जब शैतान के षड्यंत्र प्रकट हो जाते हैं और उसके असली व्यक्तित्व का खुलासा हो जाता है, तो वह क्रोध से आगबबूला हो जाता है और अपनी बर्बरता जाहिर कर देता है। इसके बाद तो लोगों को नुकसान पहुँचाने और निगल जाने की उसकी इच्छा और भी तीव्र हो जाती है। क्योंकि वह मनुष्य के सत्य के प्रति जाग्रत होने से क्रोधित है, और उसकी स्वतंत्रता और प्रकाश की लालसा और अपनी कैद तोड़कर आज़ाद होने की आकांक्षा के कारण उसके अंदर मनुष्य के प्रति नफरत और बदले की एक प्रबल भावना पैदा हो जाती है। उसके क्रोध का प्रयोजन अपनी दुष्टता का बचाव करना और उसे बनाए रखना है, और यह उसकी जंगली प्रकृति का असली प्रकाशन भी है।

हर मामले में शैतान का व्यवहार उसकी दुष्ट प्रकृति को उजागर करता है। शैतान द्वारा मनुष्य पर किए गए सभी दुष्ट कार्यों—अपना अनुसरण करने के लिए मनुष्य को गुमराह करने के उसके आरंभिक प्रयासों से लेकर उसके द्वारा मनुष्य के शोषण तक, जिसके अंतर्गत वह मनुष्य को अपने दुष्ट कार्यों में खींचता है, और उसके असली लक्षणों का खुलासा हो जाने और मनुष्य द्वारा उसे पहचानने और छोड़ देने के बाद मनुष्य के प्रति उसकी बदले की भावना तक—इनमें से कोई भी कार्य शैतान के दुष्ट सार को उजागर करने से नहीं चूकता, न ही इस तथ्य को प्रमाणित करने से कि शैतान का सकारात्मक चीज़ों से कोई नाता नहीं है और शैतान समस्त दुष्ट चीज़ों का स्रोत है। उसका हर एक कार्य उसकी दुष्टता का बचाव करता है, उसके दुष्ट कार्यों की निरंतरता बनाए रखता है, न्यायोचित और सकारात्मक चीज़ों के विरुद्ध जाता है, और मनुष्य के सामान्य अस्तित्व के कानूनों और नियमों को बरबाद कर देता है। शैतान के ये कार्य परमेश्वर के विरोधी हैं, और वे परमेश्वर के कोप द्वारा नष्ट कर दिए जाएँगे। हालाँकि शैतान के पास उसका अपना कोप है, किंतु उसका कोप उसकी दुष्ट प्रकृति को प्रकट करने का एक माध्यम भर है। शैतान के भड़कने और उग्र होने का कारण यह है : उसके अकथनीय षड्यंत्र उजागर कर दिए गए हैं; उसके कुचक्र आसानी से छिपाए नहीं छिपते; परमेश्वर का स्थान लेने और परमेश्वर के समान कार्य करने की उसकी वहशी महत्वाकांक्षा और इच्छा नष्ट और अवरुद्ध कर दी गई है; और समूची मानवजाति को नियंत्रित करने का उसका उद्देश्य अब शून्य हो गया है और उसे कभी हासिल नहीं किया जा सकता। यह परमेश्वर द्वारा बार-बार बुलाया जाने वाला उसका कोप है, जिसने शैतान के षड्यंत्र सफल होने से रोक दिए हैं और उसकी दुष्टता के फैलाव और निरंकुशता का समय से पहले ही अंत कर दिया है। इसीलिए शैतान परमेश्वर के कोप से घृणा भी करता है और उससे डरता भी है। जब भी परमेश्वर का कोप उतरता है, तो वह न केवल शैतान के असली बुरे रूप को बेनकाब करता है, बल्कि शैतान की दुष्ट इच्छाओं को उजागर भी करता है, और इस प्रक्रिया में मनुष्य के प्रति शैतान के कोप के कारणों का पर्दाफाश हो जाता है। शैतान के कोप का विस्फोट उसकी दुष्ट प्रकृति का असली प्रकाशन और उसके षड्यंत्रों का खुलासा है। निस्संदेह, शैतान जब भी क्रोधित होता है, तो यह दुष्ट चीज़ों के विनाश और सकारात्मक चीज़ों की सुरक्षा और निरंतरता की घोषणा करता है; यह इस तथ्य की घोषणा करता है कि परमेश्वर के कोप को ठेस नहीं पहुँचाई जा सकती।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II

पिछला: 2. अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य पर वचन

अगला: 2.2. भ्रष्ट मानवजाति के शैतानी स्वभाव और उसके प्रकृति सार को प्रकट करने पर वचन

परमेश्वर का आशीष आपके पास आएगा! हमसे संपर्क करने के लिए बटन पर क्लिक करके, आपको प्रभु की वापसी का शुभ समाचार मिलेगा, और 2025 में उनका स्वागत करने का अवसर मिलेगा।

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें