वचन देह में प्रकट होता है

विषय-वस्तु

गंतव्य पर

जब भी गंतव्य की बात आती है, तुम उसे पूरी गंभीरता से लेते हो; तुम सभी लोग इस मामले में बहुत ही संवेदनशील हो। कुछ लोग तो एक अच्छा गंतव्य पाने के लिये परमेश्वर के सामने दंडवत करने से भी नहीं चूकते। मैं तुम्हारी उत्सुकता समझता हूं, उसे शब्दों में व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है। तुम बिल्कुल नहीं चाहोगे कि तुम्हारी देह किसी विपत्ति में फंस जाये, और न ही तुम यह चाहोगे कि भविष्य में तुम्हें कोई दीर्घकालिक दंड भुगतना पड़े। तुम केवल सरल और उन्मुक्त जीवन जीना चाहते हो। इसलिए जब भी गंतव्य की चर्चा आती है, तुम सब एकदम बेचैन हो जाते हो और डरने लगते हो कि यदि तुम लोग पूरी तरह से सतर्क नहीं रहे तो कहीं परमेश्वर तुमसे नाराज न हो जाये और कहीं तुम्हें दंड का भागी न बनना पड़े। अपने गंतव्य की खातिर तुम लोग समझौते करने से भी नहीं हिचके, और तुम में से बहुत से लोग जो भटकाव और चंचलता में फंसे हुए थे, वे अचानक विनम्र और ईमानदार हो गये; तुम्हारी ईमानदारी तो बल्कि घबराहट पैदा करती है। खैर, तुम लोगों के दिल में ईमानदारी है। शुरु से अंत तक तुम लोगों ने मेरे साथ खुलापन रखा है। तुम्हारे मन की ऐसी कोई बात नहीं है जो तुम लोगों ने मुझसे छुपाई हो। फिर वह चाहे निंदा हो, कपट हो या समर्पण। यहां तक कि तुमने अपने मन के तहखाने में दबी बेहद अहम चीज़ें भी मेरे समक्ष बड़ी स्पष्टता से "स्वीकार" कर ली हैं। यह भी ठीक है कि मैंने भी कभी इन चीज़ों से बचने की कोशिश नहीं की, क्योंकि मेरे लिये ये आम बातें हो गई हैं। परमेश्वर के अनुमोदन के लिए अपने सर का एक भी बाल गंवाने से बेहतर तुम लोग अपनी अंतिम मंज़िल के लिए आग के दरिया में कूदना ज़्यादा पसंद करोगे। ऐसा नहीं है कि मैं तुम लोगों के साथ कुछ ज़्यादा ही हठधर्मी हो रहा हूं; बात यह है कि मैं जो कुछ भी करता हूं, उसका सामना करने के लिये तुम्हारे हृदय का भाव अभी अपर्याप्त है। शायद मेरे कहने का तात्पर्य तुम लोग समझ न पाओ, तो मैं तुम्हें एक सरल व्याख्या करके बताता हूं: तुम सबको जिसकी ज़रूरत है वो सत्य और जीवन नहीं है; तुम्हारे आचरण का सिद्धांत नहीं है, और विशेषकर न मेरा श्रमसाध्य का कार्य है। तुम लोगों कोआवश्यकता उन चीज़ों की है जो तुम्हारी देह से जुड़ी हैं – सम्पत्ति, हैसियत, परिवार, विवाह आदि। तुम लोग मेरे वचनों और कार्य की उपेक्षा करते हो, तो मैं तुम्हारी निष्ठा को एक शब्द में समेट सकता हूं: अधूरे मन से। जिन चीज़ों के प्रति तुम सभी समर्पित हो, उन्हें हासिल करने के लिये तुम किसी भी हद तक जा सकते हो, लेकिन मैंने देखा है कि तुम लोग परमेश्वर में अपने विश्वास को लेकर हर चीज़ की उपेक्षा कर दो, ऐसा नहीं है। बल्कि तुम सब सापेक्ष रूप से निष्ठावान हो, सापेक्ष रूप से गंभीर हो। इसीलिये मेरा कहना है कि जिनके मन में पूर्ण निष्ठा का अभाव है, वे परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में सफल नहीं हो पाते। ज़रा इस पर गंभीरता से विचार करो – क्या तुम लोगों में असफल लोगों की संख्या अधिक है?

तुम लोगों को ज्ञात होना चाहिये कि सफलता लोगों को उनके अपने कार्यों से मिलती है; जब लोग असफल हो जाते हैं, तो वह भी उनके अपने कार्यों के कारण ही होता है, किन्हीं अन्य वजहों से नहीं। मुझे लगता है कि परमेश्वर में विश्वास करने की अपेक्षा, जो काम अधिक मुश्किल हैं और जिनमें अधिक कष्ट हैं, उन्हें करने के लिये तुम सब कुछ भी कर सकते हो, और उसे तुम बड़ी गंभीरता से लेते हो। उन कार्यों में तुम कोई गलती करना भी पसंद नहीं करते; तुम सभी ने अपना पूरा जीवन इसी प्रकार के निरंतर प्रयासों में लगा दिया है। तुम लोग स्थिति विशेष में मुझे देह में तो धोखा दे सकते हो, लेकिन तुम अपने परिजनों को धोखा नहीं दोगे। यही तुम्हारा व्यवहार बन चुका है और इसी सिद्धांत को तुम लोग अपने जीवन में अपनाते हो। क्या तुम अपने गंतव्य की खातिर, सुंदर और सुखद गंतव्य हेतु मुझे धोखा देने के लिये एक मिथ्या छवि का निर्माण नहीं कर रहे हो? मुझे ज्ञात है कि भक्ति और ईमानदारी मात्र अस्थायी है; तुम्हारी आकांक्षाएं और जो कीमत तुम लोग चुकाते हो, क्या वे तब की अपेक्षा अब के लिये नहीं हैं? एक खूबसूरत गंतव्य को सुरक्षित कर लेने के लिये तुम सब केवल अंतिम प्रयास करना चाहते हो। तुम्हारा उद्देश्य महज़ सौदेबाज़ी है; इसलिये नहीं कि तुम सत्य के प्रति कृतज्ञ नहीं हो, और विशेषकर यह उस कीमत को चुकाने के लिये नहीं है जो मैंने अदा की है। संक्षेप में यह कि तुम लोग अपनी चतुराई का प्रयोग करने के इच्छुक हो, लेकिन तुम इसके लिये संघर्ष करने को तैयार नहीं हो। क्या यही तुमतुम्हारी दिली ख्वाहिश नहीं है? तुम सब अपने को छिपाने का प्रयास न करो, और न ही इस हद तक अपने गंतव्य को लेकर माथापच्ची करो कि न तो तुम खा सको, न सो सको। क्या यह सच नहीं है कि अंत में तुम्हारा गंतव्य निर्धारित हो चुका होता? तुम्हें अपना दायित्व पूरी क्षमता से और खुले तथा निर्मल हृदय से पूरा करना चाहिये, एवं हर स्थिति में पूर्ण करना चाहिये। जैसा कि तुम सबने कहा है, जब दिन आयेगा, तो जिसने भी परमेश्वर के लिये कष्ट उठाए हैं, परमेश्वर उसके साथ दुर्व्यवहार नहीं करेगा। इस प्रकार का दृढ़निश्चय बनाये रखना चाहिये और इसे कभी भूलना नहीं चाहिये। केवल इसी प्रकार से मैं तुम लोगों के बारे में निश्चिंत हो सकता हूं। वरना मैं कभी भी तुम लोगों के विषय में बेफिक्र नहीं हो पाऊंगा, और तुम सदैव मेरी घृणा के पात्र रहोगे। यदि तुम सभी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुन सको और अपना सर्वस्व मुझे अर्पित कर सको, मेरे कार्य के लिये कोई कोर-कसर न छोड़ो, और मेरे सुसमाचार के कार्य के लिये अपने आजीवन किये गये प्रयास अर्पित कर सको, तो क्या फिर मेरा हृदय तुम्हारे लिये हर्षित नहीं होगा? क्या मैं तुम्हारी ओर से पूर्णत: निश्चिंत नहीं हो जाऊंगा? यह अत्यंत ही लज्जा का विषय है कि तुम लोग जो कर सकते हो, वह मेरी अपेक्षाओं का बहुत ही दयनीय और तुच्छ भाग है; ऐसे में, तुम मुझसे अपनी आशाएं पूर्ण कराने की जुर्रत कैसे कर सकते हो?

तुम्हारा गंतव्य और तुम्हारी नियति तुम लोगों के लिए बहुत अहम हैं – वे बेहद गंभीर विषय हैं। तुम मानते हो कि यदि कार्यों को अत्यंत सावधानी से नहीं करते हो, तो यह गंतव्य न होने के समान है, और तुम्हारी नियति का विनाश है। लेकिन क्या तुम सबने कभी सोचा है कि यदि कोई मात्र अपने गंतव्य के लिये प्रयास करता है तो , वे मात्र निष्फल परिश्रम हैं? ऐसे प्रयास सच्चे नहीं हैं – वे कपटपूर्ण और मिथ्या हैं। यदि ऐसा है, तो जो अपने गंतव्य के लिये कार्य कर रहे हैं, उनकी अंतत: पराजय होगी, क्योंकि परमेश्वर में विश्वास की विफलता का कारण धोखा है। मैं पहले कह चुका हूं कि मुझे चाटुकारिता या खुशामद या उत्साह से पेश आना पसंद नहीं है। मुझे ऐसे ईमानदार लोग पसंद हैं जो मेरे सत्य और अपेक्षाओं के समक्ष टिक सकें। और तो और, जब लोग मेरे हृदय के प्रति चिंता या आदर का भाव दिखाते हैं तो मुझे अच्छा लगता है, और तब मुझे और भी अच्छा लगता है जब लोग मेरी खातिर सब कुछ छोड़ सकें। केवल इसी तरह से मेरे हृदय को सुखद अनुभूति हो सकती है। इस समय, तुम लोगों के विषय में ऐसी कितनी चीज़ें हैं जो मुझे अप्रिय हैं? तुम लोगों के विषय में ऐसी कितनी चीज़ें हैं जो मुझे प्रिय हैं? क्या तुम लोगों में से किसी को भी उस कुरूपता का अहसास नहीं है जो तुमने गंतव्य की खातिर प्रदर्शित की है?

अपने मन में, मैं ऐसे किसी भी मन के प्रति हानि पहुंचाने का भाव नहीं रखता हूं जो सकारात्मक और प्रेरित है, और जो पूरी निष्ठा से अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा है, मुझे उसकी ऊर्जा को कम करने की कोई चाह नहीं है; उसके बावजूद, मैं तुम सभी को यह ज़रूर याद दिलाऊंगा कि तुम्हारे अंतर्मन में कमियां और मलिन आत्मा है। ऐसा करने का उद्देश्य है कि मैं चाहता हूं कि तुम लोग मेरे वचनों का सामना अपने सच्चे हृदय से करो, क्योंकि मुझे अपने प्रति लोगों के कपटपूर्ण रवैये से घृणा है। मुझे आशा है कि मेरे कार्य के अंतिम चरण में, तुम्हारी कार्यशीलता उल्लेखनीय हो, तुम सब पूर्ण समर्पित हो, और अधूरे मन से कार्य न करो। मैं यह भी आशा करता हूं कि तुम सभी को अच्छा गंतव्य प्राप्त हो। उसके बावजूद, अभी भी मेरी अपनी आवश्यकताएं हैं, और वो ये कि तुम्हें सर्वोत्तम निर्णय करना है कि तुम लोग अपनी एकमात्र और अंतिम भक्ति मुझे प्रदान करो। यदि किसी की एकनिष्ठ भक्ति नहीं है, तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से शैतान की पूंजी बन जायेगा, और मैं उसका इस्तेमाल करना जारी नहीं रखूंगा। मैं उसे उसके माता-पिता के पास देखभाल के लिये घर भेज दूंगा। मेरा कार्य तुम्हारे लिये बहुत मददगार रहा है; मैं तुम लोगों से केवल एक ईमानदार और सकारात्मक हृदय की आशा करता हूं, लेकिन मेरे हाथ अभी भी खाली हैं। इस विषय में सोचो: जब किसी दिन मेरे अंदर इसी प्रकार की बेपनाह कटुता भरी होगी, तो तुम्हारे प्रति मेरा रवैया क्या होगा? क्या मेरा व्यवहार मैत्रीपूर्ण होगा? क्या मेरा हृदय शांत होगा? क्या तुम लोग उस व्यक्ति की भावना समझ सकते हो जिसने बड़े कष्टों से खेती की हो और उसे फसल कटाई में अन्न का एक दाना भी नसीब न हुआ हो? क्या तुम सब उस व्यक्ति के गंभीर घावों का अहसास कर सकते हो जिस पर प्रहार हुए हों? क्या तुम आशान्वित व्यक्ति की कड़ुवाहट का अनुमान कर सकते हो जिसे किसी से बुरी परिस्थिति में अलग होना पड़ा हो? क्या तुम लोगों ने उस व्यक्ति का क्रोध देखा है जिसे उत्तेजित किया गया हो? क्या तुम सब उस व्यक्ति के प्रतिशोध के लिये तड़पती भावनाओं को जान सकते हो जिसके साथ विद्वेष और कपटपूर्ण व्यवहार किया गया हो? यदि तुम इन लोगों की मानसिकता समझ सकते हो, तो तुम्हारे लिये यह समझना कठिन नहीं होना चाहिये कि अपने दंड के समय परमेश्वर का रवैया क्या होगा! अंत में, मुझे उम्मीद है कि तुम लोग अपने गंतव्य के लिये गंभीर प्रयास करोगे; उसके बावजूद, तुम अपने प्रयासों के लिये कपटपूर्ण साधन न अपनाओ, अन्यथा मेरा मन तुम्हारे प्रति मायूसी से भर जायेगा। इस मायूसी का नतीजा क्या होगा? क्या तुम लोग स्वयं को ही बेवकूफ नहीं बना रहे हो? जो अपने गंतव्य के विषय में सोचते हैं, मगर फिर भी उसे बर्बाद कर देते हैं, उन्हें बचा पाना बेहद कठिन होगा। यदि ऐसे लोग उत्तेजित भी हो जायें तो उनके साथ कौन हमदर्दी दिखायेगा? कुल मिलाकर, मैं अभी भी इच्छुक हूं और चाहता हूं कि सभी को उपयुक्त और अच्छा गंतव्य मिले। बल्कि मैं तो चाहता हूं कि तुम लोगों में से कोई भी विपत्ति में न फंसे।