अक्सर परमेश्वर के सामने जीने से ही उसके साथ एक सामान्य संबंध बनाया जा सकता है

तुममें से ज्यादातर लोगों ने अनेक वर्षों से परमेश्वर में आस्था रखी है, और सच्चे मार्ग पर एक बुनियाद लगभग बना ली है। अब तुम लोग परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए परिवार और दीन-दुनिया के मायाजाल को छोड़ने में समर्थ हो। तुम परमेश्वर के घर में एक कर्तव्य निभाने का प्रशिक्षण ले रहे हो, परमेश्वर के लिए खपने और सत्य की ओर बढ़ने का प्रयास करने को तैयार हो। यानी तुम लोग चीजें समझने लगे हो, और तुममें थोड़ा जमीर और विवेक है। यह अच्छी बात है। कर्तव्य निभाने की महत्ता बहुत महान होती है! तुम अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभा सकते हो या नहीं, उसका सीधा संबंध तुम्हारे उद्धार और पूर्णता से है। कहा जा सकता है कि कर्तव्य निभाते हुए परमेश्वर के कार्य का अनुभव करके ही जीवन प्रवेश पाया जा सकता है, और अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाकर ही परमेश्वर की स्वीकृति पाई जा सकती है। इसलिए, कर्तव्यों के मामले में तुम लोगों से थोड़ी ज्यादा माँग करना, और तुम्हारी थोड़ी काट-छाँट करना, तुम्हारे लिए फायदेमंद होगा। कम-से-कम तुम जीवन में जल्द तरक्की करोगे। तुम लोगों से ज्यादा की अपेक्षा रखना कोई बुरी बात नहीं है, न ही तुम सबकी परीक्षा लेने के लिए कभी-कभी तुम्हें एक कठिन समस्या में डालना बुरी बात है। यह सब जीवन में आगे बढ़ने और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने में तुम लोगों की मदद करने के लिए है; साथ ही, यह इसलिए है ताकि तुम लोग पेशेवर ज्ञान की बेहतर समझ पा सको और अपने कर्तव्य में अधिक प्रभावी हो सको। अगर तुम सबसे ये अपेक्षाएँ न रखी जातीं, तो परिणाम क्या होता? तुम सब केवल धर्म-सिद्धांत का प्रचार करने और विनियमों का अनुसरण करने में समर्थ होते, और परमेश्वर में अनेक वर्षों तक विश्वास रखने के बाद भी नहीं बदलते। स्थिति ऐसी हो तो, तुम सब आगे कब बढ़ पाओगे? तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह कैसे निभा पाओगे? न सिर्फ तुम सत्य के बारे में कोई प्रगति नहीं करोगे, अपने कर्तव्य के लिए जरूरी व्यावसायिक ज्ञान भी ज्यादा हासिल नहीं कर पाओगे। तो क्या तुम अपना कर्तव्य इस तरह निभा सकते हो जो मानक स्तर का हो और परमेश्वर की गवाही दे सकते हो? जहाँ तक तुम्हारे मौजूदा आध्यात्मिक कद का सवाल है, सत्य की तुम्हारी समझ बहुत उथली है, और तुमने अपना कर्तव्य निभाने के सिद्धांत नहीं समझे हैं। तुम अपना कर्तव्य मानक-स्तरीय ढंग से निभाने के मापदंड तक पहुँचने से भी बहुत दूर हो। फिर भी तुम सब इससे अनभिज्ञ हो और तुम्हें लगता है मानो तुम अच्छा कर रहे हो और कभी-कभी तुम बहुत ज्यादा आत्मतुष्ट और ढीठ भी बन जाते हो। तुम्हारी कथनी और करनी कभी प्रकाश में नहीं आती, और ये सत्य सिद्धांतों के अनुरूप नहीं होतीं। जब कोई तुम्हारी कोई समस्या बताता है, तो तुम उसे स्वीकार नहीं कर पाते, न ही तुम सत्य खोजते हो, तुम अपने लिए बहाने भी बनाते हो। यहाँ समस्या क्या है? वह यह है कि तुममें सही ढंग से आचरण करने के लिए जरूरी बुनियादी विवेक भी नहीं है। तुम जो भी करो, जरूरी है कि कम-से-कम ज्यादातर लोग उसे उपयुक्त मानें। तुम्हें सबके सुझाव सुनने चाहिए—अगर उनका कहा सही हो, तो तुम्हें उसे स्वीकार कर अपनी गलती सुधारनी चाहिए। अगर हर कोई यह सोचता है कि तुम्हारे द्वारा प्राप्त नतीजे ठीक हैं और हर कोई उन्हें स्वीकृति देता है तो केवल तभी तुम्हारे क्रियाकलापों को मानक स्तर का माना जा सकता है। इस प्रकार, एक तरफ तुम सब अपना कर्तव्य निभाते समय सिद्धांतों के अनुसार कर्म कर पाओगे, और समस्याएँ सुलझाने में अधिक परिपक्व और अनुभवी हो जाओगे। दूसरी तरफ, तुम लोग ज्यादा सीख सकोगे, और साथ ही साथ तुम सत्य को समझ कर जीवन प्रवेश पा सकोगे। इसलिए जब तुम्हारे साथ कुछ घटित हो जाए, तो तुम्हें आत्मतुष्ट नहीं होना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के सामने खुद को शांत करना और सबक सीखना चाहिए। केवल खुद का त्याग करना सीखकर ही तुम ज्यादा सीखने में सक्षम होगे। अगर तुम सोचते हो, “मैं इस विषय में तुम सबसे बड़ा विशेषज्ञ हूँ, इसलिए मुझे ही अंतिम निर्णय लेना चाहिए और तुम सबको मेरी बात सुननी चाहिए!”—तो यह कैसा स्वभाव है? यह अहंकार और आत्मतुष्टता है। यह शैतानी, भ्रष्ट स्वभाव है और यह सामान्य मानवता के दायरे के बाहर है। तो आत्मतुष्ट न होने का क्या अर्थ है? (इसका अर्थ है सबके सुझाव सुनना और सभी से विचार-विमर्श करना।) तुम्हारे निजी विचार और राय जो भी हों, अगर तुम आँख बंद करके तय मान लोगे कि ये सही हैं और चीजें इसी ढंग से की जानी चाहिए, तो यह अहंकार और आत्मतुष्टता है। अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हारे कुछ विचार या राय सही हैं, मगर तुम्हें खुद पर पूरी आस्था नहीं है और खोज और संगति से तुम इनकी पुष्टि कर सकते हो, तो यही है आत्मतुष्ट न होना। यदि तुम कार्य करने से पहले सभी का समर्थन और स्वीकृति पाने की प्रतीक्षा करते हो, केवल तभी तुम्हारे पास विवेक है। अगर कोई तुमसे असहमत हो, तो तुम्हें कर्तव्यनिष्ठा से इस पर प्रतिक्रिया देनी चाहिए और अपने काम के पेशेवर पहलुओं पर बारीकी से ध्यान देना चाहिए। तुम्हें यह कहकर इससे नजर नहीं फेरनी चाहिए, “इसे तुम बेहतर समझते हो या मैं? काम के इस क्षेत्र से मैं इतने वर्षों से जुड़ा हुआ हूँ—क्या इसकी समझ मुझे तुमसे ज्यादा नहीं है? तुम्हें इस बारे में क्या मालूम? तुम इसे नहीं समझते!” यह अच्छा स्वभाव नहीं है, यह बहुत अहंकारी और आत्मतुष्ट होना है। संभव है तुमसे असहमत होने वाला व्यक्ति नौसिखिया हो, और उसे काम के इस क्षेत्र की अच्छी समझ न हो; तुम्हारे दृष्टिकोण में दम है और शायद तुम चीजें सही ढंग से कर रहे हो, मगर समस्या तुम्हारे स्वभाव की है। तो फिर व्यवहार और कर्म करने का सही तरीका क्या है? सत्य सिद्धांतों के अनुसार तुम व्यवहार और कर्म कैसे कर सकते हो? तुम्हें अपने विचार सामने रखने चाहिए और सभी को देखने देना चाहिए कि क्या उनमें कोई समस्या है। अगर कोई सुझाव दे, तो पहले तुम्हें उसे स्वीकार कर लेना चाहिए और तब सभी को अभ्यास का सही मार्ग तय करने देना चाहिए। अगर किसी को इससे कोई समस्या नहीं है, तो एक बार आगे बढ़ने का उचित तरीका अंततः तय हो जाने पर, उसी के अनुसार आगे बढ़ो। इसे लागू करने के दौरान, अगर कोई समस्या पाई जाती है, तो सभी की राय लेनी चाहिए और सभी को सत्य खोजना चाहिए और एक साथ सत्य पर संगति करनी चाहिए। इस तरह, हर कोई पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता प्राप्त कर सकता है। जब सभी के दिल रोशन हो जाते हैं और एक बेहतर मार्ग मिल जाता है, तो नतीजे पहले की तुलना में कहीं बेहतर होंगे। क्या यह परमेश्वर का मार्गदर्शन नहीं है? यह अद्भुत चीज है! अगर तुम आत्मतुष्ट होने से बच सको, अपनी कल्पनाएँ और विचार त्याग सको और दूसरों की सही राय सुन सको, तो तुम पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता पा सकोगे। तुम्हारे दिल में एक प्रकाश चमकेगा और तुम सही मार्ग पाने में सक्षम होगे और तुम्हें आगे का रास्ता मिलेगा। जब इस पर अभ्यास करोगे, तो यह यकीनन सत्य के अनुरूप होगा। ऐसे अभ्यास और अनुभव के जरिए तुम सीख सकोगे कि सत्य का अभ्यास कैसे करें, और साथ ही उस पेशे के बारे में तुम कुछ नया सीख सकोगे। क्या यह अच्छी बात नहीं है? इसके जरिए तुम्हें एहसास होगा कि अपने साथ कुछ घटने पर तुम्हें आत्मतुष्ट नहीं होना चाहिए और सत्य खोजना चाहिए और अगर तुम हमेशा आत्मतुष्ट होते हो और सत्य स्वीकार नहीं करते, तो हर कोई तुम्हें नापसंद करेगा और परमेश्वर यकीनन तुमसे बेइंतहा नफरत करेगा। क्या यह सबक सीखना नहीं है? अगर तुम हमेशा इस प्रकार अनुसरण करते हो और सत्य का अभ्यास करने पर ध्यान केंद्रित करते हो, तो तुम अपने कर्तव्य निर्वहन में पेशेवर कौशल को पैना बनाते जाओगे, अपने कर्तव्य में बेहतर-से-बेहतर नतीजे पाओगे, परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध कर आशीष देगा, और भी ज्यादा हासिल करने देगा। इसके अलावा, तुम्हारे पास सत्य का अभ्यास करने का मार्ग होगा, और जब तुम जान लोगे कि सत्य का अभ्यास कैसे करें, तो तुम सत्य सिद्धांतों को समझ लोगे। जब तुम जान लोगे कि किन कर्मों से परमेश्वर से प्रबुद्धता और मार्गदर्शन मिलेगा, किनसे वह बेहद घृणा करेगा और अनदेखा करेगा, किनसे उसकी स्वीकृति और आशीष मिलेंगे, तो तुम्हें आगे का रास्ता मिलेगा। जब लोगों को परमेश्वर के आशीष और प्रबुद्धता मिलेंगे, तो उनके जीवन की प्रगति तेजी से होगी। उन्हें हर दिन परमेश्वर की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन मिलेंगे, और उनके दिलों में शांति और खुशी होगी। क्या इससे उन्हें आनंद नहीं मिलेगा? जब तुम्हारे क्रियाकलापों को परमेश्वर के सामने पेश किया जा सकेगा और उन्हें परमेश्वर से हरी बत्ती मिलेगी, तो तुम्हें दिल में आनंद का अनुभव होगा, और भीतर से शांति और खुशी मिलेगी। शांति और खुशी की ये भावनाएँ परमेश्वर ने तुम्हें दी हैं, इस तरह पवित्र आत्मा तुम्हारे दिल को छू रहा है।

अहंकारी और आत्मतुष्ट होना इंसान का सबसे स्पष्ट शैतानी स्वभाव है और अगर लोग सत्य स्वीकार नहीं करते हैं, तो उनके इस शैतानी स्वभाव को शुद्ध करने का कोई मार्ग नहीं होगा। लोगों के भीतर अहंकारी और आत्मतुष्ट स्वभाव होता है और वे हमेशा दंभी होते हैं। वे जो भी सोचें या कहें, चीजों को कैसे भी देखें, वे हमेशा सोचते हैं कि उनका अपना दृष्टिकोण और उनका परिप्रेक्ष्य ही सही है, और दूसरों के दृष्टिकोण उनके जैसे अच्छे नहीं हैं। वे हमेशा अपनी ही राय से चिपके रहते हैं और बोलने वाला इंसान चाहे जो भी हो, वे उसकी बात नहीं सुनते। भले ही किसी और की बात सही और सत्य के अनुसार हो, तो भी वे इसे स्वीकार नहीं करेंगे; वे सिर्फ सुनते हुए लगेंगे, मगर वे उस विचार को सच में नहीं अपनाएँगे और कार्य करने का समय आने पर भी वे अपनी मर्जी से काम करेंगे, हमेशा यह सोचते हुए कि जो वे कहते हैं वही सही और वाजिब है। संभव है तुम जो कहो, वह सचमुच सही और उचित हो या तुम्हारा किया सही और त्रुटिहीन हो, मगर तुमने कैसा स्वभाव प्रदर्शित किया है? क्या यह अहंकारी और आत्मतुष्ट स्वभाव नहीं है? अगर तुम इस अहंकारी और आत्मतुष्ट स्वभाव को नहीं छोड़ते, तो क्या इससे तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन पर असर नहीं पड़ेगा? क्या इससे सत्य का तुम्हारा अभ्यास प्रभावित नहीं होगा? अगर तुम अपने अहंकारी और आत्मतुष्ट स्वभाव का समाधान नहीं करते हो, तो क्या इससे तुम भविष्य में बुरी तरह से ठोकर नहीं खाओगे? तुम निश्चित रूप से ठोकर खाओगे, यह होकर ही रहेगा। बोलो, क्या परमेश्वर इंसान की इन अभिव्यक्तियों को देख सकता है? परमेश्वर यह देखने में बहुत समर्थ है! परमेश्वर न सिर्फ लोगों के दिलों की गहराई की पड़ताल करता है, वह हर समय और हर जगह उनकी हर कथनी और करनी की जाँच-परख भी करता है। तुम्हारी इन अभिव्यक्तियों को देखकर परमेश्वर क्या कहेगा? परमेश्वर कहेगा : “तुम दुराग्रही हो! जब यह न पता हो कि तुम गलत हो, तो तुम्हारा अपने विचारों से चिपके रहना समझ में आता है। मगर जब तुम्हें साफ पता है कि तुम गलत हो और फिर भी तुम अपने विचारों से चिपके रहते हो और पश्चात्ताप करने से पहले मरना पसंद करोगे, तो तुम निरे जिद्दी बेवकूफ हो और मुसीबत में हो। सुझाव कोई भी दे, अगर तुम इसके प्रति हमेशा नकारात्मक, प्रतिरोधी रवैया अपनाकर सत्य को लेशमात्र भी स्वीकार नहीं करते, और तुम्हारा दिल पूरी तरह प्रतिरोधी, बंद और चीजों को नकारने के भाव से भरा है, तो तुम एकदम हास्यास्पद हो, तुम एक बेतुके इंसान हो! तुमसे निपटना बहुत मुश्किल है।” तुमसे निपटना मुश्किल क्यों है? तुमसे निपटना इसलिए मुश्किल है, क्योंकि तुम जो प्रदर्शित कर रहे हो वह एक त्रुटिपूर्ण रवैया या त्रुटिपूर्ण व्यवहार नहीं है, बल्कि तुम्हारे स्वभाव का खुलासा है। किस स्वभाव का खुलासा? उस स्वभाव का जिसमें तुम सत्य से विमुख हो, सत्य से घृणा करते हो। जब एक बार तुम्हें उस व्यक्ति के रूप में निरूपित कर दिया गया जो सत्य से घृणा करता है तो परमेश्वर की नजरों में तुम मुसीबत में हो, और वह तुम्हें ठुकरा देगा और अनदेखा करेगा। लोगों के नजरिए से देखें तो ज्यादा-से-ज्यादा वे कहेंगे : “इस व्यक्ति का स्वभाव बुरा है। यह बेहद जिद्दी, दुराग्रही और अहंकारी है! इसके साथ निभाना बहुत मुश्किल है, यह सत्य से प्रेम नहीं करता। इसने कभी भी सत्य को स्वीकार नहीं किया या सत्य का अभ्यास नहीं किया।” ज्यादा-से-ज्यादा, सब लोग तुम्हारा यही आकलन करेंगे, मगर क्या यह आकलन तुम्हारे भाग्य का फैसला कर सकता है? लोग तुम्हारा जो आकलन करते हैं, वह तुम्हारे भाग्य का फैसला नहीं कर सकता, मगर एक चीज है जो तुम्हें नहीं भूलनी चाहिए : परमेश्वर लोगों के दिलों की पड़ताल करता है, और साथ ही वह उनकी हर कथनी और करनी की जाँच-परख भी करता है। अगर परमेश्वर तुम्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है जो सत्य से नफ़रत करता है, बजाय इसके कि सिर्फ यह कहे कि तुममें थोड़ा भ्रष्ट स्वभाव है या यह कि तुम थोड़े अवज्ञाकारी हो, तो क्या यह एक गंभीर समस्या नहीं है? (यह गंभीर है।) इससे मुसीबत होगी, और यह मुसीबत इसमें नहीं है कि लोग तुम्हें किस नजर से देखते हैं, या तुम्हारा आकलन कैसे करते हैं, यह इस बात में है कि परमेश्वर सत्य से घृणा करने वाले तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव को कैसे देखता है। तो परमेश्वर इसे किस नजर से देखता है? क्या परमेश्वर ने सिर्फ यह तय कर दिया है कि तुम सत्य से घृणा करते हो, इससे प्रेम नहीं करते, और कुछ नहीं? क्या यह इतना सरल है? सत्य कहाँ से आता है? सत्य किसका प्रतिनिधित्व करता है? (यह परमेश्वर को दर्शाता है।) इस पर गहराई से विचार करो : अगर एक इंसान सत्य से घृणा करता है, तो परमेश्वर अपने नजरिए से उसे कैसे देखेगा? (अपने प्रति शत्रुतापूर्ण होने के रूप में।) क्या यह एक गंभीर समस्या नहीं है? जो लोग सत्य से घृणा करते हैं, वे अपने दिलों में परमेश्वर से घृणा करते हैं! मैं क्यों कहता हूँ कि वे परमेश्वर से घृणा करते हैं? क्या उन्होंने परमेश्वर को कोसा? क्या उन्होंने परमेश्वर के सामने उसका विरोध किया? क्या उन्होंने उसकी पीठ पीछे उसकी आलोचना या निंदा की? ऐसा जरूरी नहीं। तो मैं क्यों कहता हूँ कि सत्य से घृणा करने वाले स्वभाव का खुलासा करना परमेश्वर से घृणा करना है? यह राई का पहाड़ बनाना नहीं है, यह स्थिति की वास्तविकता है। यह पाखंडी फरीसियों जैसा होना है, जिन्होंने सत्य से अपनी घृणा के कारण प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया—बाद में हुए परिणाम भयावह थे। इसका यह अर्थ है कि अगर किसी व्यक्ति का स्वभाव सत्य से विमुख है और वह सत्य से घृणा करता है, तो वह कभी भी कहीं भी इसे प्रकट कर सकता है, और अगर वह इसी के सहारे जीता है, तो क्या वह परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं करेगा? जब उसका सामना किसी ऐसी चीज से होता है जो सत्य से या विकल्प चुनने से जुड़ी होती है, अगर वह सत्य को स्वीकार नहीं कर सकता और अपने भ्रष्ट स्वभाव के सहारे जीता है, तो स्वाभाविक रूप से वह परमेश्वर का प्रतिरोध करेगा और उससे विश्वासघात करेगा, क्योंकि उसका भ्रष्ट स्वभाव परमेश्वर और सत्य से घृणा करने वाला है। अगर तुम्हारा स्वभाव ऐसा है तो परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों को लेकर भी तुम सवाल उठाओगे, और उनका विश्लेषण और गहन-विश्लेषण करना चाहोगे। फिर तुम परमेश्वर के वचनों पर संदेह करोगे और कहोगे, “क्या ये सचमुच परमेश्वर के वचन हैं? ये मुझे सत्य जैसे नहीं लगते, ये सब मुझे अनिवार्यतः सही नहीं लगते!” इस प्रकार क्या सत्य से घृणा करने वाला तुम्हारा स्वभाव स्वतः प्रकट नहीं हो गया? इस प्रकार सोचने पर, क्या तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकोगे? यकीनन नहीं। अगर तुम परमेश्वर को समर्पित नहीं हो सकते, तो क्या वह अभी भी तुम्हारा परमेश्वर है? नहीं। फिर तुम्हारे लिए परमेश्वर क्या होगा? तुम उससे शोध के एक विषय के रूप में पेश आओगे, ऐसा जिस पर शक किया जाना चाहिए, जिसकी निंदा होनी चाहिए; तुम उससे एक साधारण और आम इंसान की तरह पेश आओगे और उसकी निंदा करोगे। ऐसा करके तुम ऐसे इंसान बन जाओगे जो परमेश्वर का प्रतिरोध और ईशनिंदा करता हो। किस प्रकार के स्वभाव के कारण ऐसा होता है? यह ऐसे अहंकारी स्वभाव के कारण होता है जो कुछ हद तक बढ़ चुका हो। यह न सिर्फ शैतानी स्वभाव का खुलासा होगा, बल्कि तुम्हारा शैतानी चेहरा भी पूरी तरह सामने आ जाएगा। परमेश्वर का प्रतिरोध करने के स्तर तक पहुँच चुके इंसान का और परमेश्वर के खिलाफ जिसका आंतरिक विद्रोहीपन एक विशेष सीमा तक पहुँच चुका हो, उसके और परमेश्वर के बीच के रिश्ते का क्या होता है? यह शत्रुता का रिश्ता बन जाता है, जिसमें व्यक्ति परमेश्वर के साथ अपने विरोधी जैसा व्यवहार करने लगता है। परमेश्वर में अपनी आस्था में, अगर तुम सत्य को स्वीकार कर उसके प्रति समर्पण नहीं कर सकते, तो परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर नहीं रह जाता। अगर तुम सत्य को मना करके उसे ठुकरा देते हो, तो तुम ऐसे इंसान बन चुके होगे, जो परमेश्वर का प्रतिरोध करता है। फिर भी क्या परमेश्वर तुम्हें बचा सकेगा? यकीनन नहीं। परमेश्वर तुम्हें बचाए जाने का अवसर देता है और तुम्हें शत्रु के रूप में नहीं देखता, लेकिन तुम सत्य को स्वीकार नहीं कर सकते और परमेश्वर के साथ अपने विरोधी जैसा व्यवहार करते हो। परमेश्वर को अपने सत्य और अपने मार्ग के रूप में स्वीकार करने में तुम्हारी अक्षमता का अर्थ है कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर का प्रतिरोध करता है। इस समस्या को कैसे सुलझाया जाना चाहिए? तुम्हें तुरंत पश्चात्ताप करना चाहिए और अपना मार्ग बदल लेना चाहिए। उदाहरण के लिए, अपना कर्तव्य निभाते समय जब तुम्हारे सामने कोई समस्या या कठिनाई आए और तुम उसे सुलझाना न जानो, तो तुम्हें आँख मूँदकर उस पर विचार नहीं करना चाहिए, तुम्हें पहले परमेश्वर के सामने खुद को शांत करना चाहिए, प्रार्थना करके उससे खोजना चाहिए और देखना चाहिए कि परमेश्वर के वचन इस बारे में क्या कहते हैं। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद भी अगर तुम न समझो, और न जान पाओ कि यह मसला किन सत्यों से संबंधित है, तो तुम्हें एक सिद्धांत को कसकर थामे रहना चाहिए—यानी पहले समर्पण करो, अपने विचारों या सोच को एक तरफ रख दो, शांतचित्त होकर प्रतीक्षा करो, और देखो कि परमेश्वर क्या कुछ करने की इच्छा और इरादा रखता है। जब तुम सत्य को न समझ सको, तो तुम्हें उसे खोजना चाहिए; तुम्हें आँख मूँदकर और अंधाधुंध काम करने के बजाय परमेश्वर की प्रतीक्षा करनी चाहिए। तुम्हारे सत्य न समझ पाने पर, कोई तुम्हें सुझाव दे, और सत्य के अनुसार कुछ करने का तरीका बताए, तो तुम्हें पहले उसे स्वीकार कर लेना चाहिए, सबको उस पर संगति करने देना चाहिए, और देखना चाहिए कि यह रास्ता सही है या नहीं और यह सत्य सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं। अगर तुम इस बात की पुष्टि कर लो कि यह सत्य के अनुरूप है, तो उस तरह से उसका अभ्यास करो; अगर तुम तय कर लो कि यह सत्य के अनुरूप नहीं है, तो उस तरह से उसका अभ्यास मत करो। यह इतना ही आसान है। सत्य की खोज करते समय, तुम्हें बहुत-से स्रोतों से खोजना चाहिए। अगर किसी के पास कुछ कहने को है, तो तुम्हें सुनना चाहिए और उसके शब्दों को गंभीरता से लेना चाहिए। उनकी अनदेखी मत करो या उनके साथ तिरस्कारपूर्ण व्यवहार मत करो। यह तुम्हारे कर्तव्य के दायरे के भीतर के मामलों से संबंधित है और इसलिए तुम्हें इसे गंभीरता से लेना चाहिए। यही सही रवैया और सही दशा है। जब तुम सही दशा में होते हो, जब तुम समस्याओं को हल करने के लिए सत्य खोज सकते हो और ऐसा स्वभाव प्रकट नहीं करते जो सत्य से विमुख है और सत्य से घृणा करता है और जब तुम सत्य को स्वीकार कर सकते हो, तब तुम सत्य का अभ्यास करने लग सकते हो। अगर तुम सत्य पर इस तरह अमल करोगे, तो इसका फल क्या होगा? (पवित्र आत्मा हमारा मार्गदर्शन करेगा।) पवित्र आत्मा का मार्गदर्शन पाना एक पहलू है। कभी-कभी मामले बहुत सरल होते हैं और उन्हें तुम्हारे अपने दिमाग का उपयोग करके हासिल किया जा सकता है। जब दूसरे तुम्हें अपने सुझाव दे चुके होते हैं और तुम्हारे समझ लेने के बाद, तुम्हें बस चीजों को सुधारना होता है और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना होता है। लोगों को लग सकता है कि यह बहुत छोटी बात है, मगर परमेश्वर के लिए यह बड़ी बात है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि जब तुम इस तरह से अभ्यास करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें सत्य का अभ्यास कर सकने वाले इंसान के रूप में देखता है, एक ऐसा इंसान जो सत्य से प्रेम करता है और एक ऐसा इंसान जो सत्य से विमुख नहीं है—जब परमेश्वर तुम्हारे दिल को देखता है, तो वह तुम्हारा स्वभाव भी देखता है और यह एक बहुत बड़ी बात है। दूसरे शब्दों में, जब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो और परमेश्वर की मौजूदगी में कार्य करते हो, तो तुम जो जीते और प्रकट करते हो वे सब ऐसी सत्य वास्तविकताएँ होती हैं जो लोगों में होनी चाहिए। तुम जो भी चीज करते हो उसमें जो रवैये, विचार और दशाएँ होती हैं, वे परमेश्वर के सामने सबसे महत्वपूर्ण होती हैं और यही वे चीजें हैं जिनकी परमेश्वर पड़ताल करता है।

क्या यह विकृत नहीं है कि कुछ लोग बाल की खाल निकालना पसंद करते हैं और जब भी उनके साथ कुछ घटित होता है तो ऐसे रास्ते पर चल पड़ते हैं जो अंततः कहीं नहीं पहुँचता? यह एक बड़ी समस्या है। साफ सोचवाले लोग ऐसी गलती नहीं करते, बेतुके लोग ही ऐसे होते हैं। वे हमेशा कल्पना करते हैं कि दूसरे लोग उनका जीना दूभर कर रहे हैं, जानबूझकर उन्हें मुश्किलों में डाल रहे हैं, इसलिए वे हमेशा दूसरों के लिए चीजें मुश्किल बनाते हैं। क्या यह भटकाव नहीं है? वे सत्य में प्रयास नहीं करते और खुद को जानने के लिए सत्य की तलाश नहीं करते; जब उनके साथ कुछ घटित होता है, तो वे हमेशा मामूली विवरणों में उलझ जाते हैं, स्पष्टीकरण माँगते हैं, अपनी इज्जत बचाने की कोशिश करते हैं और वे हमेशा इन मामलों से निपटने के लिए मानवीय समाधानों का उपयोग करना चाहते हैं। यह जीवन प्रवेश में सबसे बड़ी बाधा है। यदि तुम इस तरह से परमेश्वर में विश्वास करते हो या इस तरह से अभ्यास करते हो, तो तुम कभी भी सत्य प्राप्त नहीं करोगे क्योंकि तुम कभी भी परमेश्वर के सामने नहीं आते। तुम कभी भी वह सब कुछ स्वीकार करने के लिए परमेश्वर के सामने नहीं आते जिनका इंतजाम परमेश्वर ने तुम्हारे लिए किया है, न ही तुम इन सब से निपटने के लिए सत्य का उपयोग करते हो। इसके बजाय, तुम हमेशा चीजों से निपटने के लिए मानवीय समाधानों का उपयोग करते हो। तब परमेश्वर की नज़रों में तुम उससे बहुत दूर भटक गए हो। न केवल तुम्हारा दिल उससे भटक गया है, बल्कि तुम्हारा पूरा अस्तित्व उसकी उपस्थिति में नहीं रहता। परमेश्वर उन लोगों को इसी तरह देखता है जो विनियमों से चिपके रहते हैं और हमेशा मामूली विवरणों में उलझ जाते हैं। कुछ लोग वाक्पटु और हाजिरजवाब होते हैं, वे सोचते हैं, “मैं अच्छा बोलता हूँ। दूसरे सभी लोग वास्तव में मेरी प्रशंसा करते हैं और मुझे बहुत सम्मान देते हैं। लोग आमतौर पर मेरी बात मानते हैं।” क्या यह उपयोगी है? क्या यह दिखाता है कि तुममें सत्य वास्तविकता है? तुमने लोगों के बीच अपनी प्रतिष्ठा बना ली है, लेकिन परमेश्वर को वह तरीका स्वीकार्य नहीं लगता जिस तरह से तुम उसके सामने व्यवहार करते हो। परमेश्वर कहता है कि तुम एक छद्म-विश्वासी हो, सत्य के प्रति शत्रुभाव रखते हो। लोगों के बीच तुम उनसे निपटने में माहिर और सहज हो सकते हो, शायद तुम चीजें भी अच्छी तरह सँभाल लेते होगे, सभी के साथ मिलजुल कर रहते होगे; किसी भी स्थिति में चीजों से निपटने और उन्हें निपटाने का कोई उपाय हमेशा ढूँढ़ लेते होगे, मगर तुम समस्याएँ सुलझाने के लिए परमेश्वर के सामने नहीं आते और सत्य नहीं खोजते। ऐसे लोगों से निपटना बहुत मुश्किल होता है। उनका आकलन करने में परमेश्वर को सिर्फ एक ही बात कहनी है : “यह एक छद्म-विश्वासी है, यह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर में विश्वास रखने के बहाने आशीष पाने के इस मौके का लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है। यह ऐसा व्यक्ति नहीं है जो सत्य स्वीकार करता है।” इस प्रकार के आकलन के बारे में तुम्हारी क्या सोच है? क्या तुम लोग यही चाहते हो? यकीनन नहीं। संभव है कुछ लोग परवाह न करें और कहें, “परमेश्वर हमें किस नजर से देखता है, इससे हमें फर्क नहीं पड़ता, वैसे भी हम परमेश्वर को नहीं देख सकते। सबसे वास्तविक समस्या यह है कि हमें सबसे पहले अपने इर्द-गिर्द के लोगों के साथ अच्छे संबंध बनाने की जरूरत है। एक बार हमारे पाँव जम जाएँ, तो हम अगुआओं और कार्यकर्ताओं को जीत सकते हैं, ताकि सब हमारी प्रशंसा करें।” यह कैसा व्यक्ति है? क्या यह परमेश्वर में विश्वास रखने वाला व्यक्ति है? यकीनन नहीं; ऐसे लोग छद्म-विश्वासी हैं। परमेश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों को हमेशा परमेश्वर की मौजूदगी में रहना चाहिए; उनका सामना चाहे कैसे भी मसलों से हो, सत्य खोजने के लिए उन्हें परमेश्वर के सामने आना होगा ताकि अंत में परमेश्वर कहे, “तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य से प्रेम करता है, जो परमेश्वर को प्रसन्न करता है, और जो परमेश्वर को स्वीकार्य है। परमेश्वर ने तुम्हारा दिल देखा है और उसने तुम्हारा समर्पण भी देखा है।” ऐसे आकलन के बारे में तुम क्या सोचते हो? सिर्फ ऐसे लोगों को ही परमेश्वर की स्वीकृति मिलती है। क्या तुम लोग इसे पूरी तरह समझ सकते हो? मैं तुम लोगों को बताता हूँ कि परमेश्वर के विश्वासी चाहे कोई भी कर्तव्य निभाएँ—वे बाहरी मामले सँभालते हों या कोई ऐसा कर्तव्य निभाते हों जिनका संबंध परमेश्वर के घर में विभिन्न कार्यों या विशेषज्ञता के क्षेत्रों से हो—अगर वे अक्सर परमेश्वर के सामने नहीं आते, उसकी मौजूदगी में नहीं रहते, उसकी जाँच-पड़ताल को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं रखते और वे परमेश्वर से सत्य नहीं तलाशते, तो वे छद्म-विश्वासी हैं, और अविश्वासियों से अलग नहीं हैं। क्या तुम लोग यह बात समझ पा रहे हो? संभव है कुछ लोग फिलहाल माहौल उपयुक्त न होने के कारण कोई कर्तव्य नहीं निभा पाते; वे अविश्वासियों के माहौल में रहते हैं, फिर भी उन्हें अक्सर परमेश्वर का प्रबोधन और मार्गदर्शन मिलता है। ऐसा कैसे हो सकता है? सबसे अहम बातें ये हैं कि वे परमेश्वर से प्रार्थना करने, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने, सत्य को खोजकर उसका अभ्यास करने और परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध कायम रखने में समर्थ हैं। ये बातें हैं जो यह तय करने में अहम हैं कि कोई व्यक्ति हमेशा परमेश्वर की मौजूदगी में रह सकता है या नहीं। अगर तुम्हें अक्सर परमेश्वर की अनुभूति नहीं होती, तुम अक्सर कमजोर और नकारात्मक हो जाते हो, अक्सर स्वच्छंद रहते हो या अपना कर्तव्य करते समय कोई बोझ नहीं उठाते, हमेशा भ्रमित रहते हो, तो यह एक अच्छी दशा है या बुरी? क्या यह परमेश्वर के सामने जीने की दशा है, या परमेश्वर के सामने बिल्कुल न जीने की दशा है? (यह परमेश्वर के सामने न जीने की दशा है।) तो तुम लोगों को इसे मापना होगा—तुम लोग अक्सर परमेश्वर के सामने जीते हो या नहीं? अगर तुम ऐसा विरले ही करते हो, प्रार्थना भी नहीं करते, या परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ते, तो यह मुसीबत का संकेत है, इसका अर्थ है कि तुम अविश्वासी हो। कुछ लोग उचित मामलों में विरले ही ध्यान केंद्रित करते हैं, वे स्वच्छंद और संयमहीन होते हैं, और जब उनके साथ चीजें घटती हैं, तो वे हमेशा पशोपेश में रहते हैं और नहीं जान पाते कि सत्य को कैसे खोजें। वे यह भी नहीं जानते कि उन्हें अपने कर्तव्य निभाने के परिणाम मिले हैं या नहीं। वे नहीं जानते कि उनके कौन-से नित्य कर्म परमेश्वर को नाराज करते हैं, कौन-से परमेश्वर को स्वीकार्य हैं, और किनसे परमेश्वर को घृणा है। वे बस जैसे-तैसे दिन गुजारते हैं। इस दशा के बारे में तुम क्या सोचते हो? क्या ऐसी दशाओं में रहने वाले लोगों के पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होता है? क्या उनके कार्यों के कोई सिद्धांत हो सकते हैं? क्या वे समझदारी के काम कर सकते हैं? अपना कर्तव्य निभाते समय क्या वे कह सकते हैं, “मुझे संयम से रहना चाहिए, अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाना चाहिए, मुझे इसे पूरी लगन और शक्ति से निभाना चाहिए”? क्या वे समर्पित हो सकते हैं? (नहीं हो सकते।) तो फिर ऐसे लोग क्या कर रहे हैं? वे सिर्फ कड़ी मेहनत कर रहे हैं! क्या ऐसे लोगों ने सत्य प्राप्त कर लिया है? (नहीं।) यह एक बहुत बड़ी क्षति है। बेवकूफों की यह टोली सत्य का अनुसरण करना कैसे नहीं जानती? इन लोगों ने दस-बीस साल से परमेश्वर में विश्वास रखा है और बहुत-से धर्मोपदेश सुने हैं, फिर भी वे नहीं जानते कि परमेश्वर में विश्वास के जरिए क्या पाना है, सत्य का अनुसरण कैसे करें, सत्य का अभ्यास कैसे करें या अपना कर्तव्य कैसे निभाएँ। अगर उनके मन में इन अहम बातों के बारे में भी स्पष्टता नहीं है, तो क्या वे थोड़े बेवकूफ नहीं हैं? वे बहुत मंदबुद्धि और सुन्न हैं। सत्य पर वे कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाते, और यह खतरनाक है। परमेश्वर में विश्वास रखने के बारे में सबसे अहम बात क्या है? यह सत्य प्राप्त करना है। सत्य प्राप्त करके कोई व्यक्ति कौन-सी समस्याएँ सुलझा सकता है? मुख्य रूप से अपने पाप, अपना भ्रष्ट स्वभाव, परमेश्वर में विश्वास रखने में आने वाली सभी कठिनाइयाँ और अपना गलत नजरिया। ये सभी समस्याएँ सुलझाई जा सकेंगी। सत्य प्राप्त करके इंसान को उसका किस में उपयोग करना चाहिए? अपने कर्तव्य निर्वहन में, और परमेश्वर की गवाही देने में—ये सबसे अहम चीजें हैं। फिलहाल, शायद तुम लोगों को इसका सच्चा ज्ञान न हो, तुमने अब भी सत्य का मूल्य या महत्व नहीं पहचाना हो, मगर एक दिन जरूर जान जाओगे।

क्या तुम लोगों ने अय्यूब की किताब पढ़ी है? इसे पढ़ते समय क्या तुम भावनात्मक रूप से प्रभावित हुए? क्या तुम्हारे मन में भी ऐसी लालसा पैदा हुई कि तुमने अय्यूब जैसा व्यक्ति बनना चाहा हो? (हाँ।) ऐसी दशा और मनःस्थिति कितने समय तक बनी रह सकती है? एक-दो दिन, एक-दो महीने, या एक-दो साल? (दो-तीन दिन।) तो क्या ऐसी दशा और मनःस्थिति दो-तीन दिन में गायब हो जाएगी? प्रभावित महसूस होने पर तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए, परमेश्वर से कहना चाहिए कि तुम अय्यूब जैसा व्यक्ति बनना चाहते हो, तुम सत्य समझना चाहते हो, परमेश्वर का ज्ञान हासिल करना चाहते हो, और एक ऐसा व्यक्ति बनना चाहते हो जो परमेश्वर का भय मानता हो और बुराई से दूर रहता हो। तुम्हें परमेश्वर से विनती करनी चाहिए कि वह तुममें यह चीज लाए, तुम्हारा मार्गदर्शन करे, तुम्हारे लिए परिवेशों का इंतजाम करे, तुम्हें शक्ति दे और तुम्हारी रक्षा करे ताकि तुम अपने सामने आने वाली हर स्थिति में अडिग रह सको, परमेश्वर का प्रतिरोध न करो, बल्कि परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने वाले कर्म करो और उसके इरादों को संतुष्ट करो। इस लक्ष्य के लिए और तुम जो चीजें पाना चाहते हो उनके लिए तुम्हें हमेशा परमेश्वर से प्रार्थना और विनती करनी चाहिए और जब परमेश्वर तुम्हारा वास्तविक दिल देखेगा तो वह कार्य करेगा। परमेश्वर के कार्य करने पर डरना मत। परमेश्वर तुम्हारा शरीर फोड़ों से बिल्कुल भी नहीं भर सकता है और तुमसे तुम्हारी तमाम चीजें नहीं छीन सकता है, जैसा कि उसने तब किया था जब उसने अय्यूब का परीक्षण किया था। परमेश्वर ऐसा नहीं करेगा; वह तुम्हारे आध्यात्मिक कद के अनुसार धीरे-धीरे तुम्हारे ऊपर और अधिक रखेगा। तुम्हें परमेश्वर को ईमानदारी से पुकारना चाहिए—ऐसा मत करो कि अय्यूब की किताब पढ़ने के दो दिन बाद तक और उससे प्रभावित रहने तक ही उसे पुकारो, और किताब के न पढ़ने पर तीसरे दिन उसे भूल जाओ और उसे दिल में बसाना बंद कर दो। अगर तुम ऐसा करोगे, तो मुसीबत में पड़ जाओगे! अगर तुम अय्यूब जैसे लोगों की सराहना करते हो, और उस जैसा व्यक्ति बनना चाहते हो, तो तुम्हारे सामने वैसा व्यक्ति बनने का रास्ता होना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के सामने अपना दिल बिछाना होगा, इसके लिए अक्सर उससे प्रार्थना करनी होगी, इस पर अक्सर मनन करना होगा, और परमेश्वर द्वारा अय्यूब के लिए बोले गए वचनों को खाना और पीना होगा, बार-बार नियमितता से उन पर सोच-विचार करना होगा और इसके बाद उन लोगों के साथ संगति करनी होगी जिन्हें इस प्रकार का अनुभवजन्य ज्ञान है। तुम्हें इस लक्ष्य के प्रति कड़ी मेहनत करनी होगी। तुम्हें कड़ी मेहनत कैसे करनी चाहिए? अगर तुम सिर्फ बैठकर देखते और प्रतीक्षा करते रहे, तो यह कड़ी मेहनत करना नहीं है। तुम्हें इसे अभ्यास में लाना होगा, तुम्हें इसके लिए प्रयास करने होंगे, साथ ही साथ कष्ट सहने वाला और लालसा रखने वाला दिल रखने का संकल्प लेना होगा, और फिर इसके लिए परमेश्वर से कार्य करने की विनती करते हुए प्रार्थना करनी होगी। अगर परमेश्वर कार्य न करे, तो लोगों में चाहे कितना भी जोश क्यों न हो, उसका कोई लाभ नहीं। परमेश्वर कार्य कैसे करेगा? परमेश्वर तुम्हारे आध्यात्मिक कद के लायक परिवेशों का निर्माण और व्यवस्था करना शुरू कर देगा। तुम्हें परमेश्वर को बताना होगा कि तुम अपनी आस्था में कौन-से लक्ष्य पाना चाहते हो, तुम्हारे संकल्प किस प्रकार के हैं। क्या तुमने इसके लिए परमेश्वर से प्रार्थना और विनती की है? तुमने कितने समय तक इसके लिए प्रार्थना और विनती की? अगर तुम कभी-कभार एक-दो प्रार्थनाएँ करके देखते हो कि परमेश्वर ने कुछ नहीं किया है, और सोचने लगो कि “छोड़ो, जैसा है चलने दो। जो होगा, होने दो, मैं बस उस बहाव के साथ चलता जाऊँगा। मेरे साथ जो भी हो, मुझे परवाह नहीं,” तो यह ठीक नहीं, तुम ईमानदार नहीं हो। अगर तुम्हारा उत्साह सिर्फ दो मिनट का है, तो क्या परमेश्वर तुम्हारे लिए कार्य कर सकेगा और तुम्हारे लिए माहौल तैयार करने में मदद कर सकेगा? परमेश्वर ऐसा नहीं करेगा! परमेश्वर तुम्हारी ईमानदारी देखना चाहता है, और यह कि तुम्हारी ईमानदारी और दृढ़ता कब तक टिक पाती है, और क्या तुम्हारा दिल सच्चा है या झूठा। परमेश्वर प्रतीक्षा करेगा। वह तुम्हारी प्रार्थनाएँ और विनतियाँ सुनता है, तुम उसे विश्वास में लेकर जो संकल्प और आकांक्षाएँ बताते हो, वह सुनता है, मगर जब तक वह कष्ट सहने का तुम्हारा संकल्प देख नहीं लेता, कुछ नहीं करेगा। अगर परमेश्वर से प्रार्थना करने के बाद तुम बिना कुछ किए गायब हो जाते हो, तो क्या ऐसी स्थिति में परमेश्वर कुछ करेगा? बिल्कुल और यकीनन नहीं। तुम्हें परमेश्वर से और अधिक प्रार्थना और विनती करनी होगी, इसमें ज्यादा प्रयास करना होगा, इस पर मनन करना होगा और फिर परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए खड़े किए गए परिवेशों का विस्तार से आनंद लेना होगा; ये परिवेश थोड़ा-थोड़ा करके तुम्हारे सामने आएँगे और परमेश्वर कार्य करने लगेगा। अगर तुम्हारे पास वास्तविक दिल नहीं है तो यह कारगर नहीं होगा। तुम कह सकते हो, “मैं अय्यूब और पतरस की कितनी सराहना करता हूँ!” मगर तुम्हारी सराहना का क्या फायदा? तुम जितना चाहो उनकी सराहना कर सकते हो, मगर तुम वे नहीं हो, और तुम्हारी इस पूरी सराहना को देखकर परमेश्वर वैसा कार्य नहीं करेगा जो उसने उनके लिए किया, क्योंकि तुम उन्हीं के जैसे व्यक्ति नहीं हो। तुममें उन जैसा संकल्प नहीं है, न उन जैसी मानवता है, और न ही वह दिल है जिससे वे सत्य के लिए लालायित थे और जिससे उन्होंने सत्य का अनुसरण किया। ये चीजें हासिल कर लेने के बाद ही परमेश्वर तुम्हें और ज्यादा प्रदान करेगा।

क्या तुममें अब सत्य का अनुसरण करने, सत्य को हासिल करने और परमेश्वर से उद्धार पाकर पूर्ण होने का संकल्प है? (हाँ।) तुम्हारा संकल्प कितना बड़ा है? तुम इसे कब तक कायम रख सकते हो? (अच्छी दशा में होने पर मुझमें संकल्प होता है, मगर मेरी धारणाओं और देह के हितों के विपरीत कुछ घटित होने पर या जब मुझे शोधन से गुजरना होता है या कुछ कठिनाइयाँ आती हैं, तो मैं निराशा की दशा में फँस जाता हूँ और शुरू में जो आस्था और संकल्प मुझमें था वह धीरे-धीरे गायब होने लगता है।) ऐसे काम नहीं चलेगा। तुम बहुत कमजोर हो। तुम्हें ऐसे स्थान पर पहुँचना होगा जहाँ तुम्हारा सामना चाहे किसी भी परिस्थिति से हो, सत्य का अनुसरण करने और उसे प्राप्त करने का तुम्हारा संकल्प बदला न जा सके। तभी तुम ऐसे व्यक्ति बनोगे जो सचमुच सत्य से प्रेम करता है और सत्य का अनुसरण करता है। अगर अपने साथ कुछ घटित होने और थोड़ी-सी कठिनाई का सामना होने पर तुम पीछे हट जाते हो, नकारात्मक और खिन्न हो जाते हो और अपना संकल्प छोड़ देते हो तो यह नहीं चलेगा। तुममें ऐसी प्रेरणा होनी चाहिए कि तुम अपनी जान खतरे में डाल सको और यह कहो, “चाहे कुछ भी हो जाए—भले ही इसका मतलब यह हो कि मैं मर जाऊँगा तो भी सत्य का या सत्य के अनुसरण के अपने लक्ष्य का त्याग नहीं करूँगा।” फिर तुम्हें कोई भी कठिनाई रोक नहीं पाएगी। अगर सचमुच तुम्हारा कठिनाइयों से सामना होता है और तुम्हारे पास कोई रास्ता नहीं होता है, तो परमेश्वर अपना कार्य करेगा। इसके अलावा, तुम्हें यह समझ होनी चाहिए : “मेरा सामना चाहे किसी भी परिस्थिति से हो, इन सब की व्यवस्था परमेश्वर द्वारा की गई है और उनमें ऐसे सबक हैं जो मुझे सीखने चाहिए। मैं कमजोर हो सकता हूँ, मगर नकारात्मक नहीं हूँ और मैं सबक सीखने का मौका देने के लिए परमेश्वर का आभारी हूँ। मैं परमेश्वर का आभारी हूँ कि उसने मेरे लिए यह स्थिति बनाई है। मैं परमेश्वर का अनुसरण करने और सत्य प्राप्त करने का अपना संकल्प त्याग नहीं सकता। अगर मैं इसे त्याग देने का फैसला करूँ, तो यह शैतान से हार मानने, खुद को बर्बाद करने और परमेश्वर से विश्वासघात करने जैसा होगा।” तुम्हें ऐसा संकल्प रखना होगा। जिन भी मामलों से तुम्हारा सामना होता है, ये सब तुम्हारे जीवन की प्रगति में छोटी-मोटी घटनाएँ हैं। तुम्हें इन्हें उस दिशा को बदलने नहीं देना चाहिए जिसकी ओर तुम बढ़ रहे हो। कठिनाइयाँ आने पर तुम तलाश और प्रतीक्षा कर सकते हो, मगर तुम जिस ओर बढ़ रहे हो वह दिशा नहीं बदलनी चाहिए, क्या यह सही नहीं है? (सही है।) दूसरे जो भी कहें, या तुमसे जैसे भी पेश आएँ, और परमेश्वर तुमसे जैसे भी पेश आए, तुम्हारा संकल्प नहीं बदलना चाहिए। अगर परमेश्वर कहे, “तुम सत्य बिल्कुल स्वीकार नहीं करते, मैं तुमसे घृणा करता हूँ,” और तुम कहो, “परमेश्वर मुझसे बेहद घृणा करता है, तो मेरे जीवन का क्या अर्थ रह गया है? मैं मर जाऊँ और इन सबसे छूट जाऊँ, यही ठीक रहेगा!” तो तुम परमेश्वर को गलत समझ रहे होगे। यह सही है कि परमेश्वर तुमसे बेहद घृणा करता है, मगर तुम्हें लड़ते रहना चाहिए, सत्य को स्वीकार करना और उसका अभ्यास करना चाहिए। इस तरह से, तुम अपना कर्तव्य निभाओगे; तुम एक बेकार इंसान नहीं रहोगे और परमेश्वर तुम्हें तिरस्कृत नहीं करेगा। फिलहाल, तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है और तुमने अभी वे मापदंड हासिल नहीं किए हैं जो परमेश्वर द्वारा तुम्हारा परीक्षण करने के लिए जरूरी हैं। वह एकमात्र चीज क्या है जो तुम कर सकते हो? तुम्हें बार-बार प्रार्थना करनी चाहिए : “हे परमेश्वर, मुझे रास्ता दिखाओ, प्रबुद्ध करो, ताकि मैं तुम्हारे इरादे समझ सकूँ और ताकि मैं सत्य के अनुसरण के मार्ग पर चलने की आस्था और दृढ़ता पा सकूँ, परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रहूँ। हालाँकि मैं कमजोर हूँ, मेरा आध्यात्मिक कद अपरिपक्व है, फिर भी मैं तुमसे मुझे शक्ति देने और मेरी रक्षा करने की प्रार्थना करता हूँ, ताकि मैं अंत तक तुम्हारा अनुसरण कर सकूँ।” तुम्हें अक्सर परमेश्वर के सामने आकर प्रार्थना करनी चाहिए। दूसरे लोग सांसारिक चीजों की लालसा रख सकते हैं, देह-सुख में लिप्त रह सकते हैं, और सांसारिक प्रवृत्तियों के पीछे भाग सकते हैं, लेकिन तुम्हें उनका साथ नहीं देना चाहिए—बस अपना कर्तव्य करने पर ध्यान देना चाहिए। जब दूसरे लोग नकारात्मक महसूस कर रहे हों और वे अपना कर्तव्य नहीं करते हों, तो तुम्हें बाधित महसूस नहीं करना चाहिए; तुम्हें उनकी मदद करने के लिए सत्य खोजने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुममें कुछ नकारात्मकता या कमजोरी आ जाती है, तो तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करने और परमेश्वर के सामने जीते रहने में सक्षम होना चाहिए। जब दूसरे लोग प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे का अनुसरण करते हैं, तो तुम्हें परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत करने और इससे प्रभावित न होने में सक्षम होना चाहिए और साथ ही तुम्हें उनके लिए प्रार्थना करने और उनकी मदद करने में सक्षम होना चाहिए। तुम्हारे आस-पास चाहे जो भी हो, तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करने, सत्य खोजने और खुद पर संयम रखने, निरंतर परमेश्वर की मौजूदगी में जीने और परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध बनाए रखने में सक्षम होना चाहिए। परमेश्वर हर समय लोगों की पड़ताल करता है; यदि लोग सभी चीजों के संबंध में परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं और उसकी मौजूदगी में जी सकते हैं, तो पवित्र आत्मा उनके भीतर कार्य करेगा। परमेश्वर किसी व्यक्ति के दिल की पड़ताल कैसे करता है? वह केवल उनकी पड़ताल करके बात को वहीं नहीं छोड़ देता—वह तुम्हारे लिए परिवेशों का भी इंतजाम करता है और तुम्हारे दिल को छूता है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? इसलिए कि जब परमेश्वर तुम्हारे लिए किसी परिवेश का इंतजाम करता है, तो परमेश्वर देखता है कि क्या तुम उससे बेहद घृणा करते हो और उससे विमुख हो या उसे पसंद करते हो और उसके प्रति समर्पित हो जाते हो, क्या तुम निष्क्रियता से प्रतीक्षा करते हो या सक्रियता से सत्य खोजते हो। परमेश्वर देखता है कि तुम्हारा दिल और सोच कैसे बदलते हैं, और किस दिशा में विकसित हो रहे हैं। तुम्हारे दिल की दशा कभी-कभी सकारात्मक होती है, और कभी-कभी नकारात्मक। अगर तुम सत्य स्वीकार सकते हो, तो तुम उन लोगों, घटनाओं, चीजों और परिस्थितियों को परमेश्वर से आया मानकर स्वीकार कर सकोगे जिनका इंतजाम वह तुम्हारे लिए करता है और तुम उनसे सही ढंग से निपट सकोगे। परमेश्वर के वचन पढ़ने से और सोच-विचार और चिंतन-मनन से तुम्हारी सारी सोच और सारे विचार, सारी राय और तुम्हारी दशा परमेश्वर के वचनों के आधार पर बदल जाएँगी। तुम्हारे मन में इस बारे में स्पष्टता आएगी, और परमेश्वर इन सबकी भी पड़ताल करेगा। भले ही तुमने इस बारे में प्रार्थना नहीं की होगी और तुमने सिर्फ अपने दिल में ही सोचा होगा, मगर परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से यह पहले ही स्पष्ट हो चुका होगा—उसके लिए यह जाहिर होगा। लोग तुम्हें अपनी नजरों से देखते हैं, मगर परमेश्वर अपने दिल से तुम्हारे दिल को छूता है, वह तुम्हारे इतना करीब है। अगर तुम परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को महसूस कर सकते हो, तो तुम परमेश्वर की मौजूदगी में जी रहे हो। यदि तुम उसकी जाँच-पड़ताल को बिल्कुल भी महसूस नहीं कर सकते और इसके बजाय अपनी ही दुनिया में और अपनी भावनाओं और भ्रष्ट स्वभावों के सहारे जी रहे हो, तो तुम मुसीबत में हो : तुम परमेश्वर की मौजूदगी में नहीं जी रहे हो, तुम्हारे और परमेश्वर के बीच दूरी है—तुम उससे दूर हो। तुम परमेश्वर के इरादों के प्रति बिल्कुल भी विचारशीलता नहीं दिखाते और परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार नहीं करते। परमेश्वर यह सब जानता है; उसके लिए इसे भाँपना बहुत ही आसान है। इसलिए, जब तुममें संकल्प और एक लक्ष्य होगा—जब तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने और एक ऐसा व्यक्ति बनने को तैयार हो जाओगे जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलता है, उसका भय मानता है और बुराई से दूर रहता है—जब तुम्हारे मन में यह संकल्प होगा और जब तुम इन चीजों के लिए अक्सर प्रार्थना और विनती कर सकोगे, और अपने दिल को कभी भी परमेश्वर से दूर किए बिना या अपने दिल को उसे छोड़ने दिए बिना, परमेश्वर की मौजूदगी में रह सकोगे, तब तुम्हारे मन में इन चीजों के बारे में स्पष्टता होगी, और परमेश्वर भी ये सब जानता है। कुछ लोग कहते हैं, “मैं स्वयं इस बारे में स्पष्ट हूँ, लेकिन परमेश्वर को यह मालूम है या नहीं?” यह प्रश्न अवैध है। अगर तुम यह कहते हो, तो साबित होता है कि तुमने कभी भी परमेश्वर से संगति नहीं की है, और तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई भी संबंध नहीं है। मैं क्यों कहता हूँ कि तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई संबंध नहीं है? तुमने परमेश्वर के सामने जीवन नहीं जिया है, और इसलिए तुम भाँप नहीं सकते कि वह तुम्हारे साथ है या नहीं, वह तुम्हें रास्ता दिखाता है या नहीं, तुम्हारी रक्षा करता है या नहीं, और तुम्हारे कुछ गलत करने पर वह तुम्हें फटकारता है या नहीं। अगर तुम्हें इन तमाम चीजों का अंदाजा नहीं है, तो तुम परमेश्वर के सामने नहीं रहते, तुम बस इसकी कल्पना कर रहे हो और अपने आप में मगन हो—तुम अपनी ही दुनिया में जी रहे हो, परमेश्वर के सामने नहीं, और तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई भी संबंध नहीं है।

लोग परमेश्वर से सामान्य संबंध कैसे कायम रख सकते हैं? इसे कायम रखना किस पर निर्भर करता है? यह परमेश्वर से दिल से विनती और प्रार्थना करने और उससे संवाद करने पर निर्भर करता है। इस प्रकार के संबंध से लोग हमेशा परमेश्वर के सामने जी पाते हैं। इसलिए, परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करने के लिए लोगों को पहले शांत रहना चाहिए। कुछ लोग हमेशा बाहर कुछ-न-कुछ करते रहते हैं, और सिर्फ बाहरी मामलों में उलझे रहते हैं। वे अगर एक-दो दिन आध्यात्मिक जीवन न जिएँ, तो भी वे जान नहीं पाएँगे। तीन-चार दिन या एक-दो महीने बाद भी वे जान नहीं पाएँगे, क्योंकि उन्होंने प्रार्थना या विनती नहीं की है, परमेश्वर के साथ संगति नहीं की है। विनती तब की जाती है जब तुम्हारे साथ कुछ घट जाए, और तुम चाहो कि परमेश्वर तुम्हारी मदद करे, तुम्हें रास्ता दिखाए, तुम्हारे लिए प्रावधान करे, तुम्हें प्रबुद्ध करे, तुम्हें समझाए कि उसके इरादे क्या हैं, तुम्हें बताए कि सत्य क्या है, तुम्हें समझाए कि सत्य सिद्धांत क्या हैं, और तुम्हें यह बताए कि सत्य का अभ्यास कैसे करें—ऐसी विनती ही परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होती है। प्रार्थना का दायरा अपेक्षाकृत बड़ा होता है। कभी-कभी तुम अपने मन की बातें बता सकते हो—कठिनाइयों ने घेर लिया हो, या जब तुम निराशा और कमजोरी महसूस कर रहे हो, तुम परमेश्वर के साथ दिल से इनके बारे में बातें कर सकते हो; तुम परमेश्वर से उस वक्त भी प्रार्थना कर सकते हो जब तुम विद्रोही हो, या रोजमर्रा की अपनी उन समस्याओं के बारे में बात कर सकते हो, जिन्हें तुम समझ पा रहे हो और उनके बारे में भी जिन्हें तुम समझ नहीं पा रहे हो—इसे प्रार्थना कहते हैं। प्रार्थना परमेश्वर से अपने दिल की बात करना है, या परमेश्वर से सत्य तलाशना है। कभी-कभी यह एक नियत समय पर की जाती है, कभी-कभी इसका कोई नियत समय नहीं होता; तुम कभी भी कहीं भी प्रार्थना कर सकते हो। आत्मा से संगति का कोई आकार, कोई रूप नहीं होता : हो सकता है कि कोई बात तुम्हें परेशान कर रही हो या नहीं भी कर रही हो, हो सकता है कि तुम कुछ कहना चाहते हो या नहीं भी कहना चाहते हो। जब तुम्हें कोई बात परेशान कर रही हो, तो तुम्हें परमेश्वर से इस बारे में बात करके प्रार्थना करनी चाहिए। आम तौर पर तुम्हें ऐसे सवालों पर सोच-विचार करने की कोशिश करनी चाहिए जैसे कि परमेश्वर मनुष्य से प्रेम कैसे करता है, वह मनुष्य के बारे में कैसे चिंता करता है, वह मनुष्य की काट-छाँट क्यों करता है, परमेश्वर के समक्ष समर्पण करने का वास्तव में अर्थ क्या है, इत्यादि; हर समय हर जगह परमेश्वर से संवाद करने, परमेश्वर से प्रार्थना करने, और उससे कुछ जानने की कोशिश करनी चाहिए। यह आत्मा से संगति या संक्षेप में “आत्मिक संगति” है। कभी-कभी सड़क पर चलते हुए तुम्हें ऐसा कोई विचार आ सकता है जो तुम्हें बहुत परेशान कर देता है; तुम्हें झुकने या आँखें बंद करने की जरूरत नहीं है। तुम बस अपने मन में परमेश्वर से बात कर सकते हो, “हे परमेश्वर, मुझ पर यह मुसीबत आ पड़ी है और मुझे इससे निपटना नहीं आता, मुझे इस मामले में तुम्हारा मार्गदर्शन चाहिए।” जब तुम्हारे दिल के भीतर कोई हल्की-सी हलचल हो, और तुम इस बारे में परमेश्वर से कुछ दिल को छूने वाली बातें कहो, तो वह जान जाएगा। कभी-कभी तुम्हें घर की बहुत याद आ रही है, और तुम कहते हो, “हे परमेश्वर, मुझे घर की याद आ रही है।” तो तुम नहीं बताते कि विशेष रूप से तुम्हें किसकी याद सता रही है, बस इतना ही कि तुम दुखी हो, और परमेश्वर को इस बारे में बता रहे हो। तुम अपनी समस्याएँ तभी सुलझा सकते हो जब परमेश्वर से प्रार्थना करो और उसे बताओ कि तुम्हारे दिल में क्या है। क्या किसी दूसरे व्यक्ति से बात करके तुम अपनी समस्याएँ सुलझा सकते हो? सत्य समझने वाले किसी व्यक्ति से मिलना उतना बुरा नहीं होगा—न सिर्फ तुम अपनी समस्याएँ सुलझा पाओगे, बल्कि इससे तुम्हें लाभ भी होगा। लेकिन अगर तुम किसी ऐसे इंसान से मिलोगे जो सत्य नहीं समझता, तो तुम अपनी समस्याएँ नहीं सुलझा सकोगे, और इसका उस पर भी प्रभाव पड़ सकता है। अगर तुम परमेश्वर से बात करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें सुकून पहुँचाएगा और प्रभावित करेगा। अगर तुम परमेश्वर के सामने शांतचित्त बैठकर उसके वचन पढ़ सको, और फिर सोच-विचार कर प्रार्थना कर सको, तो तुम सत्य को समझ कर अपनी समस्याएँ सुलझा सकते हो। परमेश्वर के वचनों से तुम्हें अपनी कठिनाइयों से पार पाने का रास्ता ढूँढ़ने में मदद मिल सकती है, और जब तुम इस छोटी-सी बाधा को पार कर जाओगे, तो तुम लड़खड़ाओगे नहीं, बेबस नहीं होगे, न ही यह तुम्हारे कर्तव्य के निर्वाह को प्रभावित करेगा। कभी-कभी ऐसे पल आएँगे जब तुम अचानक महसूस करोगे कि तुम्हारी आत्मा डूब रही है और तुम थोड़े अंधकार में हो। ऐसा होने पर, तुम्हें फौरन परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए, और उसके करीब जाना चाहिए, यानी तुम्हारे दिल में क्या है यह उसे बताना चाहिए, और हर समय हर जगह उसे अपने मन की बात बतानी चाहिए। इस तरह तुम्हारी दशा ठीक हो सकती है। तुममें आस्था होनी चाहिए : “हर पल परमेश्वर मेरे साथ है, उसने मुझे कभी नहीं छोड़ा है, मैं महसूस कर सकता हूँ। मैं कहीं भी रहूँ, कुछ भी करूँ—चाहे मैं किसी सभा में शामिल होऊँ, या अपना कर्तव्य निभा रहा होऊँ—मैं दिल से जानता हूँ कि परमेश्वर मेरा हाथ थाम कर मेरी अगुआई कर रहा है, और उसने मुझे कभी नहीं छोड़ा।” कभी-कभी जब तुम याद करते हो कि इतने सालों से तुमने इस तरह हर दिन कैसे गुजारा है, तो तुम्हें महसूस होगा कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद ऊँचा हुआ है, परमेश्वर तुम्हारा मार्गदर्शन करता रहा है, और परमेश्वर का प्रेम हमेशा तुम्हारी रक्षा करता रहा है। ये बातें सोचते हुए तुम अपने मन में प्रार्थना करोगे, परमेश्वर को धन्यवाद कहोगे : “हे परमेश्वर, तुम्हारा धन्यवाद! मैं बहुत कमजोर, दब्बू, और बहुत ज्यादा भ्रष्ट हूँ। अगर मुझे तुम्हारा मार्गदर्शन नहीं मिला होता, तो मैं अपने-आप इस मुकाम पर नहीं पहुँच पाया होता।” क्या यह आत्मिक संगति नहीं है? अगर लोग इस प्रकार परमेश्वर के साथ अक्सर संगति कर सकें, तो क्या उनके पास परमेश्वर से कहने को बहुत कुछ नहीं होगा? ऐसे ज्यादा दिन नहीं जाएँगे जब वे परमेश्वर से एक भी बात न कह सकें। तुम्हारे पास परमेश्वर से कहने को कुछ भी नहीं है, तो परमेश्वर तुम्हारे दिल से अनुपस्थित है। अगर परमेश्वर तुम्हारे दिल में है, और तुम परमेश्वर में आस्था रखते हो, तो तुम अपने मन की सारी बातें उससे कह सकते हो, वो सब भी जो तुम अपने विश्वासपात्रों से कहोगे। दरअसल परमेश्वर तुम्हारा सबसे करीबी विश्वासपात्र है। अगर तुम परमेश्वर से एक करीबी विश्वासपात्र की तरह पेश आओ, सबसे भरोसेमंद, सबसे अधिक विश्वसनीय और सबसे घनिष्ठ परिवार के सदस्य की तरह जिस पर तुम सबसे ज्यादा निर्भर हो, तो परमेश्वर से कहने के लिए कुछ भी नहीं होना नामुमकिन है। अगर तुम्हारे पास परमेश्वर से कहने के लिए हमेशा कुछ है, तो क्या तुम हमेशा उसकी मौजूदगी में नहीं रहोगे? अगर तुम हमेशा परमेश्वर की मौजूदगी में रहोगे, तो तुम्हें हर पल यह एहसास होगा कि परमेश्वर कैसे तुम्हारा प्रबोधन और मार्गदर्शन करता है, कैसे तुम्हारी परवाह और रक्षा करता है, और तुम्हें शांति और खुशी देता है, कैसे वह तुम्हें आशीष देता है, और कैसे वह तुम्हें फटकारता है, अनुशासित करता है, संयत करता है, न्याय कर तुम्हें ताड़ना देता है। यह सब तुम्हें स्पष्ट और प्रत्यक्ष नजर आएगा। अगर तुम हर दिन जैसे-तैसे गुजारोगे, सिर्फ बातों से परमेश्वर में विश्वास रखोगे, परमेश्वर को दिल में नहीं बसाओगे, बाहर से ही अपना कर्तव्य निभाओगे और सभाओं में शामिल होओगे, हर दिन परमेश्वर के वचन पढ़ोगे और प्रार्थना करोगे, इन सबमें केवल औपचारिकता निभाओगे तो यह परमेश्वर में विश्वास नहीं है—तुम्हारे इन धार्मिक अनुष्ठानों में से एक का भी सत्य के साथ कोई संबंध नहीं है। परमेश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों को हर दिन परमेश्वर के वचनों का एक अंश पूरे ध्यान से पढ़ना चाहिए, और इन वचनों के दायरे में प्रार्थना कर संगति करनी चाहिए। हर दिन परमेश्वर के वचनों से थोड़ी रोशनी पानी चाहिए, और थोड़ा सत्य समझना चाहिए। विशेष रूप से उन्हें अपना कर्तव्य निभाते समय सत्य खोजने और मामलों को सिद्धांतों के अनुसार सँभालने में सक्षम होना चाहिए, और हर दिन जीवन अनुभव प्राप्त करने और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में समर्थ होना चाहिए। ऐसा ही व्यक्ति सच्चा विश्वासी और परमेश्वर का अनुसरण करने वाला होता है।

परमेश्वर की आस्था में सबसे अहम मसला कौन-सा है, जिसका समाधान सबसे ज्यादा जरूरी है? यह परमेश्वर के साथ तुम्हारे सामान्य संबंध का मसला है। अगर तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, मगर वह तुम्हारे दिल में बसा हुआ नहीं है, तुमने उसके साथ अपना संबंध तोड़ लिया है, और तुम परमेश्वर को अपना सबसे घनिष्ठ, सबसे भरोसेमंद और सबसे करीबी परिवार का सदस्य और विश्वासपात्र नहीं समझते, तो परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर नहीं है। मेरे कथनों के अनुसार कुछ समय तक अभ्यास करके देखो कि क्या तुम लोगों की आंतरिक दशा में बदलाव आया है। मेरे कथनों के अनुसार अभ्यास करके तुम सुनिश्चित कर सकते हो कि तुम परमेश्वर की मौजूदगी में जी रहे हो, तुम्हारी अवस्था और दशा सामान्य है। जब किसी व्यक्ति की दशा सामान्य होती है, और वह अपने जीवन अनुभव के सभी चरणों में सामने आने वाले किसी भी व्यक्ति, घटनाओं, चीजों या विभिन्न परिवेशों से प्रभावित न होता हो, और अपना कर्तव्य सामान्य रूप से निभाते रहने में समर्थ हो, तो उसका आध्यात्मिक कद सच्चा है, और वह ऐसा व्यक्ति है जो सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर चुका है।

13 जुलाई 2017

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