35. स्वार्थ छोड़कर मिली है मुक्ति मुझे

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "सामान्य लोगों के व्यवहारों में कोई कुटिलता या धोखेबाज़ी नहीं होती है, लोगों का एक-दूसरे के साथ एक सामान्य संबंध होता है, वे अकेले नहीं खड़े होते हैं, और उनका जीवन न तो मामूली और न ही पतनोन्मुख होता है। इसलिए भी, परमेश्वर सभी के बीच ऊँचा है, उसके वचन मनुष्यों के बीच व्याप्त हैं, लोग एक-दूसरे के साथ शांति से और परमेश्वर की देखभाल और संरक्षण में रहते हैं, पृथ्वी, शैतान के हस्तक्षेप के बिना, सद्भाव से भरी है, और परमेश्वर की महिमा मनुष्यों के बीच अत्यंत महत्व रखती है। ऐसे लोग स्वर्गदूतों की तरह हैं: शुद्ध, जोशपूर्ण, परमेश्वर के बारे में कभी भी शिकायत नहीं करने वाले, और पृथ्वी पर पूरी तरह से परमेश्वर की महिमा के लिए अपने सभी प्रयासों को समर्पित करने वाले" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 16')। परमेश्वर के वचन हमें बताते हैं कि किसी सामान्य मनुष्य के स्वभाव में लेशमात्र भी कुटिलता, बेईमानी, स्वार्थ, और नीचता नहीं होती। परमेश्वर की आज्ञा का ईमानदारी से पालन करना, भाई-बहनों के साथ मिल-जुल कर काम करना, और अपने कर्तव्य को पूरी लगन से निभाना ही वे सबसे बुनियादी चीजें हैं जिन्हें एक व्यक्ति को करने में सक्षम होना चाहिए। मैं पहले इन शैतानी फलसफों के साथ जीता था : "हर कोई बस अपना सोचे, और बाकियों को शैतान ले जाए" और "जब कोई छात्र हर वो चीज़ सीख जाएगा जो उसका गुरु जानता है, तो गुरु के हाथ से उसकी आजीविका चली जाएगी।" मैं स्वार्थी, नीच, कुटिल और चालाक था, मुझमें इंसानियत नाम की कोई चीज़ नहीं थी। परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को अनुभव करने के बाद ही मेरे इन शैतानी स्वभावों में बदलाव आने शुरू हुए।

जून 2018 की बात है जब भाई झांग मेरे कर्तव्य में मेरा भागीदार बनने के लिए हमारी टीम में शामिल हुआ। तब मैंने सोचा, "मैं काफ़ी समय से यह काम कर रहा हूँ, इसलिए मुझे सिद्धांतों की समझ हो गयी है और मैंने कुछ परिणाम भी देखे हैं। हो सकता है किसी समय, मैं एक बड़ी जिम्मेदारी लेने के लिए इस टीम को छोड़ दूँ। मुझे भाई झांग को जितनी जल्दी हो सके सारा काम सिखा देना होगा, ताकि वह हमारी टीम के काम को संभाल सके।" मैंने उसे वो सभी बुनियादी कौशल सिखाने शुरू कर दिये, जिन्हें मैंने अपने काम के दौरान सीखा था। तीन महीने बाद मैंने देखा कि भाई झांग को लगभग हर चीज़ की बुनियादी समझ हो गयी थी और वह काफ़ी तेज़ी से आगे बढ़ रहा था। उस समय मुझे खतरा महसूस होने लगा, मैंने सोचा, "भाई झांग अपने कर्तव्य में इतनी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। अगर ऐसे ही चलता रहा, तो क्या वह जल्दी ही मुझसे आगे नहीं निकल जाएगा? अगर अगुआ को उसकी तरक्की का पता चल गया, तो क्या वह उसे कोई महत्वपूर्ण पद नहीं दे देगा?" जब मुझे ऐसे ख़याल आने लगे, तो मैंने मन ही मन सोचा, "नहीं, मुझे संयम रखना होगा। अब मैं अपना सारा ज्ञान उसके साथ साझा नहीं कर सकता।" तब से हमारे काम में, जब भी मुझे भाई झांग की योग्यताओं में थोड़ी कमी दिखती, तो मैं उससे अपना सारा ज्ञान साझा करने के बजाय केवल कुछ सतही बातें ही बताता था। मैं जानता था कि ऐसा करना सही नहीं था, लेकिन फ़िर मुझे ये पुरानी कहावत याद आयी, "जब कोई छात्र हर वो चीज़ सीख जाएगा जो उसका गुरु जानता है, तो गुरु के हाथ से उसकी आजीविका चली जाएगी।" अगर उसका नाम होगा तो मैं खुद का दिखावा कैसे कर पाऊंगा? मैं उसे मुझसे आगे निकलने नहीं दे सकता था। साथ काम करते हुए, जब भाई झांग मुझसे कुछ भी पूछा करता, तो मैं उसे केवल आधी बात ही बताता था और आधी बात छुपा लेता था।

कुछ ही समय बाद, अगुआ ने एक महत्वपूर्ण काम पर चर्चा करने के लिए भाई झांग को बुलाया। ये सुनते ही मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। मैंने सोचा, "मैं भाई झांग की तुलना में ज़्यादा समय से टीम में रहा हूँ। अगुआ मुझसे बात क्यों नहीं करना चाहेगा? क्या मैं उनके जितना अच्छा नहीं हूँ? मैं ही तो उसे सब कुछ सिखा रहा था, लेकिन अब वह अगुआ की आँखों का तारा है और मुझे एक तरफ धकेल दिया गया है। वह सुर्खियों में है और मुझे कोई याद नहीं करता। अगर मैंने उसे सिखाना जारी रखा, तो क्या वह और भी ज़्यादा जल्दी नहीं सीखेगा? अगर उसे कोई महत्वपूर्ण पद मिल गया, तो मेरा आदर कौन करेगा?" इसलिए तब से हमारे काम में, जब भी मैं भाई झांग को मुश्किलों में पड़ता देखता, तो मैं उसकी मदद नहीं करना चाहता था। इन सभी चीज़ों को समय रहते हल न करने के कारण हमारी प्रगति धीमी पड़ गयी, और कलीसिया का काम भी रुक गया। मैं खुद को कसूरवार समझ असहज महसूस करने लगा, लेकिन इसके बावजूद मैंने खुद पर विचार नहीं किया। एक दिन मेरे बगल में अचानक खुजली होने लगी, मैं इसे रोक नहीं पा रहा था। मरहम लगाने से भी आराम नहीं मिला। अगले दिन, मेरे हाथ में इतना दर्द होने लगा कि मैं उसे हिला भी नहीं पा रहा था। मुझे एहसास हुआ कि यह कोई संयोग नहीं था, इसलिए मैं प्रार्थना और तलाश करने के लिये परमेश्वर के सामने आया। मैंने कहा, "हे परमेश्वर, यह स्थिति अचानक शुरू हुई है। मुझे पता है कि इसके पीछे तुम्हारी नेक इच्छा है। लेकिन मैं बहुत असंवेदनशील हूँ और मैं नहीं जानता कि तुम्हारी इच्छा क्या है। कृपया मुझे प्रबुद्ध करो और मेरा मार्गदर्शन करो।"

एक दिन मेरी भक्ति के दौरान, परमेश्वर के ये वचन अचानक मेरे मन में आये: "यदि तुम अपना सब कुछ समर्पित करने को इच्छुक नहीं हो, यदि तुम इसे छिपा कर, बचा कर रखते हो, तो तुम अपने कामों में फिसड्डी हो...।" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार इंसान होकर ही कोई व्यक्ति सच में खुश हो सकता है')। यह मेरे लिये समय रहते सचेत होने की घंटी थी। मैं नाम और लाभ पाने के लिये संघर्ष कर रहा था, मुझे डर था कि कहीं यह भाई मुझसे आगे न निकल जाये, इसलिए मैं हमारे काम में कभी भी साफ़दिल नहीं रहा, और मैं उसके साथ अपना ज्ञान साझा नहीं करना चाहता था। मैंने देखा कि परमेश्वर मुझे इस स्थिति द्वारा चेतावनी दे रहा था, ताकि मैं अपने ऊपर विचार करूँ। बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा: "अविश्वासियों में एक विशेष तरह का भ्रष्ट स्वभाव होता है। जब वे अन्य लोगों को कोई व्यवसाय-संबंधी ज्ञान या कौशल का कुछ हिस्सा सिखाते हैं, तो वे इस बात पर विश्वास करते हैं कि 'जब कोई छात्र हर वो चीज़ सीख जाएगा जो उसका गुरु जानता है, तो गुरु के हाथ से उसकी आजीविका चली जाएगी।' उनका मानना होता है कि अगर वे दूसरों को हर वो चीज़ सीखा देंगे जो वे जानते हैं, तो कोई भी उनका सम्मान नहीं करेगा और वे अपना ओहदा खो देंगे। इसलिए, उन्हें लगता है कि उन्हें अपने ज्ञान का कुछ हिस्सा अपने पास ही रखना चाहिए। जो वे जानते हैं, उसका केवल अस्सी प्रतिशत लोगों को सिखाते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि वे अपनी कुछ चालें छिपाकर रखें; उन्हें लगता है कि यही एकमात्र तरीका है जिससे वे गुरु के अपने पद का दिखावा कर सकते हैं। जानकारी को हमेशा रोककर रखना और अपनी कुछ चालें छिपाकर रखना—यह किस प्रकार का स्वभाव है? यह धोखा है। ... यह मत सोचो कि तुम ठीक ही चल रहे हो या तुम सभी को सबसे साथी या बुनियादी बातें बताकर ज्ञान को नहीं छिपा रहे हो; यह नहीं चलेगा। शायद कभी-कभी तुमने केवल कुछ सिद्धांतों या बातों को सिखाया हो जो लोग शब्दशः समझ सकते हैं, लेकिन नए लोगों को कोई भी सार या महत्वपूर्ण बिंदुओं की समझ हासिल नहीं हो पाती है। तुम विस्तार में जाए बिना या विवरण दिए बिना, सिर्फ़ एक संक्षिप्त वर्णन देकर सोचते हो, 'खैर, मैंने तुम्हें बता दिया है, और मैंने जानबूझकर कोई भी चीज़ छिपाकर नहीं रखी है। अगर तुम नहीं समझ पा रहे हो, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम्हारी क्षमता बड़ी खराब है, इसलिए मुझे दोष मत दो। हमें बस यह देखना होगा कि अब परमेश्वर तुम्हें आगे कैसे ले जाता है।' इस तरह की विवेचना में छल होता है, है किनहीं? क्या यह स्वार्थी और अधम व्यवहार नहीं है? तुम लोग क्यों दूसरों को अपने दिल की हर बात और हर वो चीज़ सिखा नहीं सकते हो जो तुम समझते हो? इसकी बजाय तुम ज्ञान को क्यों रोकते हो? यह तुम्हारे इरादों और तुम्हारे स्वभाव की समस्या है।" परमेश्वर के वचनों ने सटीक रूप से मेरी स्थिति का ख़ुलासा किया। मैं उसे वो कौशल नहीं सिखाना चाहता था जिन्हें मैंने सीखा था, वरना मैं अपना नाम और पद खो बैठता। मुझे डर था कि वह इस पर पकड़ बना लेगा और मुझे पीछे छोड़ देगा, क्योंकि मैं सोचता था कि शिष्य गुरु का स्थान हड़प लेगा। हमेशा कुछ न कुछ छुपा कर, क्या मैं अपनी स्वार्थी, नीच, कुटिल शैतानी प्रकृति के नियंत्रण में नहीं था? मैंने उस बारे में भी सोचा जब भाई झांग पहली बार हमारी टीम में शामिल हुआ था। उसे निर्देश देने की मेरी प्रेरणा यह थी कि वह जल्द से जल्द टीम का काम संभालने लगे। तब मेरे पास अपना काम सौंपने के लिए कोई होता, क्योंकि मैं एक और ज़्यादा महत्वपूर्ण पद पाने की उम्मीद कर रहा था। लेकिन जब मैंने देखा कि वह कितनी जल्दी चीज़ों को समझता है और अगुआ भी उसे बहुत योग्य समझता है, तो मैं काफ़ी परेशान हो गया। मुझे चिंता थी कि अगर वह इसी तरह अच्छा करता रहा, तो कभी-न-कभी मुझसे आगे निकल जाएगा, मेरी जगह ले लेगा। इसी वजह से, मैं जो जानता था उसे उसके साथ साझा नहीं करना चाहता था। कभी-कभी जब मुझे पता रहता कि उसे अपने काम में कठिनाई होगी, तो मैं उसकी मदद नहीं करना चाहता था, जिससे कलीसिया के काम में देरी हो जाती थी। मैंने देखा कि मैं हमेशा अपने नाम और पद की रक्षा के लिए ही काम कर रहा था, मुझे परमेश्वर के घर के काम का कोई ख़याल नहीं था। मैं वाकई बहुत स्वार्थी और बेईमान था। अगर परमेश्वर मुझे समय पर अनुशासित नहीं करता, मेरे सामने ऐसी स्थिति न लाता, तो मैं अब भी अपने ऊपर विचार नहीं करता। फ़िर मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा: "विश्वास हासिल करने के बाद से, तुमने परमेश्वर के वचनों को खाया और पिया है; तुम उसके न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना चाहते हो और उसके उद्धार को स्वीकार करना चाहते हो। लेकिन, अगर काम करने और व्यवहार करने के तुम्हारे सिद्धांतों और दिशा में बदलाव नहीं आया है, अगर तुम अविश्वासियों के समान ही हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें विश्वासी के रूप में स्वीकार करेगा? वो नहीं करेगा। वह कहेगा कि तुम अभी भी अविश्वासियों के मार्ग पर चल रहे हो। इसलिए, चाहे तुम अपने कर्तव्य पूरे कर रहे हो या पेशेवर ज्ञान सीख रहे हो, तुम्हें अपने हर काम में सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। तुम जो कुछ भी करते हो, उससे सत्य के अनुसार पेश आना चाहिए, और सत्य के अनुसार अभ्यास करना चाहिए। समस्याओं को हल करने के लिए, तुम में प्रकट हुए भ्रष्ट स्वभावों को दूर करने के लिए, और तुम्हारे गलत तरीकों और विचारों को हटाने के लिए तुम्हें सत्य का उपयोग करना चाहिए। तुम्हें लगातार इन पर जीत हासिल करनी चाहिए। सबसे पहले, तुम्हें अपनी जांच करनी चाहिए। ऐसा करने के बाद अगर तुम्हें किसी भ्रष्ट स्वभाव का पता चलता है, तो तुम्हें इसे हल करना होगा, इसे वश में करना होगा और इसे त्यागना होगा। इन समस्याओं को हल करने के बाद, जब तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों के आधार पर चीज़ों को करना बंद कर दोगे, और जब तुम अपने उद्देश्यों और हितों को छोड़ पाओगे और सत्य के सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कर पाओगे, केवल तब तुम वह करोगे जो परमेश्वर का सच में अनुसरण करने वाले व्यक्ति को करना चाहिए।" "तुम्हें उस व्यावसायिक ज्ञान के सार और मुख्य बिंदुओं को—यानी वे चीज़ें जो दूसरों ने समझी या पहचानी नहीं हैं—लोगों को बताना होगा ताकि वे सभी समझने के लिए अपनी सारी ताकत लगा सकें, और फिर ज़्यादा संख्या में, ज़्यादा गहरी और ज़्यादा परिपक्व चीज़ें समझ सकें। अगर तुम इन सभी चीज़ों का योगदान करोगे, तो यह उन लोगों के लिए फ़ायदेमंद होगा जो इस कर्तव्य को पूरा कर रहे हैं और साथ ही साथ परमेश्वर के घर के काम के लिए भी अच्छा रहेगा। ... अधिकांश लोगों को जब पहली बार व्यवसाय-संबंधी ज्ञान के कुछ विशिष्ट पहलूओं से परिचित कराया जाता है, तो वे केवल इसके शाब्दिक अर्थ को समझ सकते हैं, जबकि मुख्य बिंदुओं और सार की समझ हासिल करने के लिए कुछ समय तक अभ्यास की ज़रूरत होती है। अगर तुम पहले ही इन बारीकियों को समझ चुके हो, तो तुम्हें उन्हें सीधे बता देना चाहिए; उन्हें गोल-गोल घुमाना नहीं चाहिए और वहां पहुंचने में इतना समय नहीं लगाना चाहिए। यह तुम्हारी ज़िम्मेदारी है; तुम्हें यही करना चाहिए। अगर तुम तुम्हारे मुताबिक जो मुख्य बिंदु और सार हैं, वो उन्हें बता देते हो केवल तब तुम कुछ भी छिपा नहीं रहे हो, और केवल तब तुम स्वार्थी नहीं हो।" परमेश्वर के वचनों से मुझे एहसास हुआ कि मुझे अपने कर्तव्य में खुद पर विचार करने पर ध्यान देना होगा, अपनी स्वार्थी और नीच शैतानी प्रकृति को ठीक करने के लिए सत्य की तलाश करनी होगी। मुझे मेरे ग़लत इरादों और ख़्यालों का त्याग करना होगा, अपने कर्तव्य में भाई-बहनों के साथ मिलकर काम करने के काबिल बनना होगा। मैंने महसूस किया कि हम सब में बहुत-सी चीज़ों का अभाव है, फ़िर चाहे वह सत्य में हो या हमारे काम में, इसलिए भाई-बहनों को अपने-अपने कर्तव्यों में एक दूसरे की मदद और सहयोग करना चाहिए, और वे जितना भी समझते हैं उसे बिना छुपाये उसके बारे में सहभागिता करनी चाहिए। इस प्रकार एक-दूसरे की कमियों को हल करने से हम भटकने से बच सकेंगे। असल में, मेरा भाई झांग से थोड़ा ज़्यादा योग्य होना भी पूरी तरह से परमेश्वर की कृपा के कारण था। मुझे परमेश्वर की इच्छा पर विचार करना चाहिए था, अपने स्वार्थ को त्याग कर, उसे वो सब कुछ सिखाना चाहिए था जो मैं जानता था, ताकि वह जल्द से जल्द अपना कर्तव्य अच्छे से निभा सके। सिर्फ वही परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होता। जैसे ही मुझे इस बात का एहसास हुआ, मैं भागता हुआ परमेश्वर के सामने आकर प्रार्थना करने लगा, मैं अपनी गलत सोच का त्याग करने और अपने स्वार्थी, नीच शैतानी स्वभावों से न जीने को तैयार था। बाद में मैंने भाई झांग को ढूँढा, ताकि मैं पहले जिस स्थिति में था उस बारे में उससे ईमानदारी से बातचीत कर सकूँ, और अपने इन शैतानी स्वभावों का विश्लेषण कर सकूँ। मैंने उसके साथ अपनी योग्यताओं के मुख्य बिंदु भी साझा किए। जब मैंने इस तरह से अभ्यास करना शुरू किया, तो मैं काफ़ी ज़्यादा सहज महसूस करने लगा, और मेरे स्वास्थ्य की समस्या भी जल्द ही ठीक हो गयी।

मैंने सोचा कि उन हालात से गुज़रने के बाद, अब मैं बदल चुका हूँ, लेकिन ये शैतानी स्वभाव वास्तव में मेरे भीतर गहराई तक समाये हुए थे। जैसे ही मुश्किल हालात सामने आते, मैं ज़हर फिर निकालने लगता था।

मार्च 2019 में, भाई झांग और मैं एक साथ कलीसिया के अगुआ नियुक्त किये गए। शुरुआत में, हमने मिलकर बहुत अच्छे से काम किया। फ़िर चाहे वह कलीसिया से जुड़ा कोई मुद्दा हो, या हमारी कोई परेशानी, हम मिलकर उन परेशानियों को हल करने के लिए सत्य तलाशने में सक्षम थे। लेकिन फ़िर एक दिन, मैंने कलीसिया में किसी को ऐसा कहते हुए सुना, "भाई झांग की सत्य पर सहभागिता काफ़ी व्यावहारिक है, और वे अपने काम को लेकर वाकई ज़िम्मेदार भी हैं।" यह सब सुनकर मेरा मन फिर से बेचैन हो गया और मैंने सोचा, "अगर भाई झांग मुझसे आगे निकल गया, तो जल्द ही मेरी कोई इज्ज़त नहीं रहेगी!" उसके बाद से हमारे काम की हर चर्चा में मैं केवल गलतियाँ और खामियाँ ही निकालता और उन्हें हल करने के अभ्यास के मार्गों को अपने तक ही रखता। कभी-कभी जब वह कुछ जानने के लिए मेरे पास आता, तो मैं बस होठों को भींचकर थोड़ी बहुत जानकारी दे दिया करता था, क्योंकि मुझे डर था कि अगर उसे कुछ ज़्यादा ही समझ आ गया, तो वह मेरे बिना ही समस्याओं को सुलझाने लगेगा। मुझे याद है एक समय जब वह कमज़ोरी का अनुभव कर रहे कुछ भाई-बहनों को सहारा देने जाने वाला था। उसे डर था कि सही सहभागिता के बिना, सब बेकार चला जाएगा, इसलिए वह मेरे पास बात करने आया कि किन सत्यों पर ध्यान देना सबसे अच्छा होगा। लेकिन उस समय मुझे बस इसी बात का ध्यान था कि अगर मैंने उसे वो सब कुछ बता दिया जो मैं जानता था और उसने जाकर समस्या को हल कर दिया, तो भाई-बहन बेशक उसी का आदर करेंगे, और फ़िर अगली बार मैं अपनी सहभागिता में क्या साझा करूंगा? क्या इससे वह मुझसे बेहतर नहीं दिखने लगेगा? इसलिए, उस समय मैंने सोचा, "नहीं, मुझे अगली बार की सहभागिता के लिए कुछ बातें छिपानी होंगी ताकि वे देख सकें कि मैं समस्याओं को सुलझाने में ज़्यादा सक्षम हूँ।" मैंने भाई झांग को सिर्फ़ एक संक्षिप्त जानकारी ही दी और किसी भी ख़ास या ज़रूरी बात का उल्लेख नहीं किया। क्योंकि मैं अपने स्वार्थ के बारे में ही सोच रहा था और मैं उसके साथ अपनी हर जानकारी को साझा नहीं करना चाहता था, इसलिए मैंने जानबूझकर हमारे काम में भाई झांग से नज़रें फ़ेर लीं और हम एक दूसरे के साथ चीज़ों पर चर्चा करने में कम समय बिताने लगे। कई बार मैंने खुद को वाकई दोषी महसूस किया और मन ही मन सोचा, "इस तरह से अपना कर्तव्य निभाते हुए, मैं अपने भाई के साथ मिलकर काम नहीं कर रहा हूँ, और परमेश्वर भी इससे ख़ुश नहीं होगा।" लेकिन फिर मैंने सोचा, "अगर वह मुझसे आगे निकल जाता है, तो सभी उसके पास जाने लगेंगे" इसलिए मैं अब सत्य का अभ्यास नहीं करना चाहता था। उस दौरान मैं लगातार ऐसी ज़िद्दी स्थिति में जी रहा था, और तभी परमेश्वर का धर्मी स्वभाव मुझ पर आया। मेरा मन हर समय उलझन में रहता था। सभाओं में मेरी सहभागिता में बिलकुल भी प्रकाश नहीं होता था और मैं अपने कर्तव्य में भी कुछ हासिल नहीं कर पा रहा था, हर रात आँख लग जाती और मैं जल्दी सो जाता। मुझे काफ़ी ज़्यादा बेचैनी भी होने लगी थी। उस समय मुझे यह एहसास हुआ कि परमेश्वर ने मुझसे मुँह फ़ेर लिया है, और फ़िर मैं डर गया। मैं भागकर परमेश्वर के सामने आया और प्रार्थना करने लगा। "हे परमेश्वर, मैं स्वार्थ और नीचता के अपने शैतानी स्वभावों के साथ जी रहा हूँ। मुझे पता है कि इससे तुम्हें घृणा होती है, लेकिन खुद को रोक नहीं पाता। मैं खुद को उनसे छुटकारा नहीं दिला पाता। परमेश्वर, कृपा करके मुझे प्रबुद्ध करो, ताकि मुझे अपनी प्रकृति और सार का सच्चा ज्ञान हो सके।"

अपनी प्रार्थना के बाद मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा: "जब तक लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं कर लेते हैं और सत्य को प्राप्त नहीं कर लेते हैं, तब तक यह शैतान की प्रकृति है जो भीतर से इन पर नियंत्रण कर लेती है और उन पर हावी हो जाती है। वह प्रकृति विशिष्ट रूप से किस चीज़ को अपरिहार्य बनाती है? उदाहरण के लिए, तुम स्वार्थी क्यों हो? तुम अपने पद की रक्षा क्यों करते हो? तुम्हारी भावनाएँ इतनी प्रबल क्यों हैं? तुम उन अधार्मिक चीज़ों से प्यार क्यों करते हो? ऐसी बुरी चीज़ें तुम्हें अच्छी क्यों लगती हैं? ऐसी चीजों को पसंद करने का आधार क्या है? ये चीज़ें कहाँ से आती हैं? तुम इन्हें स्वीकारकर इतने खुशी क्यों हो? अब तक, तुम सब लोगों ने समझ लिया है कि इन सभी चीजों के पीछे मुख्य कारण यह है कि वे शैतान के जहर से युक्त हैं। जहाँ तक इस बात का प्रश्न है कि शैतान का जहर क्या है, इसे वचनों के माध्यम से पूरी तरह से व्यक्त किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि तुम कुछ कुकर्मियों से पूछते हो कि वे उस तरह से क्यों करते हैं, तो वे जवाब देंगे: 'हर कोई बस अपना सोचे, और बाकियों को शैतान ले जाए।' यह अकेला वाक्यांश समस्या की जड़ को व्यक्त करता है। शैतान का तर्क लोगों का जीवन बन गया है। भले वे चीज़ों को इस या उस उद्देश्य से करें, वे इसे केवल अपने लिए ही कर रहे होते हैं। सब लोग सोचते हैं चूँकि जीवन का नियम, हर कोई बस अपना सोचे, और बाकियों को शैतान ले जाए, यही है, इसलिए उन्हें बस अपने लिए ही जीना चाहिए, एक अच्छा पद और ज़रूरत के खाने-कपड़े हासिल करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देनी चाहिए। 'हर कोई बस अपना सोचे, और बाकियों को शैतान ले जाए'—यही मनुष्य का जीवन और फ़लसफ़ा है, और इंसानी प्रकृति का भी प्रतिनिधित्व करता है। यह कथन वास्तव में शैतान का जहर है और जब इसे मनुष्य के द्वारा आत्मसात कर लिया जाता है तो यह उनकी प्रकृति बन जाता है। इस वचनों के माध्यम से शैतान की प्रकृति उजागर होती है; ये पूरी तरह से इसका प्रतिनिधित्व करते हैं। यह जहर मनुष्य का जीवन और साथ ही उसके अस्तित्व की नींव बन जाता है; यह भ्रष्ट मानवजाति पर लगातार हजारों सालों से इस ज़हर के द्वारा हावी रहा है" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस का मार्ग कैसे अपनाएँ')। परमेश्वर के वचनों को पढ़कर मुझे पता चला कि मैं अपने स्वार्थी और नीच शैतानी स्वभावों के साथ जीने से खुद को रोक नहीं सकता था क्योंकि शैतान के ज़हर, जैसे कि "हर कोई बस अपना सोचे, और बाकियों को शैतान ले जाए" और "जब कोई छात्र हर वो चीज़ सीख जाएगा जो उसका गुरु जानता है, तो गुरु के हाथ से उसकी आजीविका चली जाएगी" मेरी जिंदगी बन गये थे। मैं उन्हें सकारात्मक चीज़ें और जीवन जीने के नियम मान बैठा था, सोचता था कि लोगों को ऐसे ही जीना चाहिए, यही अपने आप को बचाए रखने का एकमात्र तरीका है। इसके परिणाम स्वरूप, मैं ज़्यादा से ज़्यादा स्वार्थी और नीच बन गया, मैं केवल खुद के बारे में सोच रहा था। मुझे लगातार इस बात का डर लग रहा था कि भाई झांग मुझसे उस काम में बेहतर होगा जिसे हम साथ मिलकर कर रहे थे, इसलिए जब भी हम काम के बारे में बात करते, तो मैं चीज़ों पर बस टिप्पणी ही करता था, कम से कम योगदान देता था, और अपने सारे ज्ञान को भी साझा नहीं करता था। जब भाई झांग को अपने कर्तव्य में समस्याओं का सामना करना पड़ता और वह तलाश करते हुए मेरे पास आता, तो मुझे परमेश्वर के घर के काम की चिंता नहीं रहती थी, बल्कि इसकी थी कि अगर मैंने उसे सब कुछ सिखा दिया, तो फ़िर मुझे कलीसिया में चमकने का मौका नहीं मिलेगा। जबकि मुझे अच्छी तरह से पता था कि यह सही तरीका नहीं है, तब भी मैं उसकी मदद नहीं करना चाहता था। मुझे पता था कि मैं अपना काम परमेश्वर की इच्छा के लिये या परमेश्वर के घर के काम को बनाए रखने के लिए नहीं कर रहा था, बल्कि मैं यह निजी नाम और रुतबे की चाह में कर रहा था। मैं वाकई हद से ज़्यादा स्वार्थी और चालाक बन गया था। अपने काम में उन शैतानी स्वभावों पर भरोसा करके, मैं आख़िर परमेश्वर का मार्गदर्शन और आशीष कैसे प्राप्त कर सकता था? मैंने सोचा कि मैं जो कुछ भी जानता था उसे दूसरों को न सिखाकर, मैं कलीसिया में सबसे अच्छा और सम्मानित ब्यक्ति बन सकता हूँ, लेकिन असल में सबकुछ उलटा हो गया, मैं चीज़ों को जितना अधिक छुपाता गया, मेरी आत्मा उतनी ही काली होती गयी, और परमेश्वर का मार्गदर्शन भी उतना ही दूर हो गया। स्थिति ऐसी हो गयी कि मैं उन कामों को भी नहीं कर सकता था जिन्हें मैं पहले करने में सक्षम था। फ़िर प्रभु यीशु के यह वचन मेरे मन में आये: "क्योंकि जिसके पास है, उसे दिया जाएगा, और उसके पास बहुत हो जाएगा; पर जिसके पास कुछ नहीं है, उससे जो कुछ उसके पास है, वह भी ले लिया जाएगा" (मत्ती 13:12)। इन वचनों को पढ़कर परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव मुझे बहुत प्रशंसनीय लगने लगा। जब मैंने इस बारे में थोड़ा और सोचा, तो मैंने देखा कि मेरा अपने काम में कुछ समस्याओं को देख पाना पूरी तरह से परमेश्वर का मार्गदर्शन और प्रबुद्धता थी, और परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन के बिना, मैं अंधा था, मैं कुछ भी समझ पाने और किसी भी समस्या को हल करने में असमर्थ था। मुझमें पूरी तरह से आत्म-चेतना की कमी थी, और मैंने पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता को बेशर्मी से अपनी योग्यता समझा। क्या मैं परमेश्वर की महिमा को चुराने की कोशिश नहीं कर रहा था? परमेश्वर लोगों के दिल और दिमाग में झाँक सकता है। मुझे पता था कि अगर मैं अपना काम उन शैतानी स्वभावों पर निर्भर होकर करता रहा, तो मैं निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा ठुकराया और हटा दिया जाऊँगा। उस विचार के साथ, मैं तुरंत परमेश्वर के पास आकर प्रार्थना करने लगा, मैंने कहा, "परमेश्वर, मैं अब अपने कर्तव्य में इतना ख़ुदगर्ज और नीच नहीं रहूँगा। मैं वाकई भाई झांग के साथ अच्छे से काम करना चाहता हूँ और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहता हूँ।"

उसके बाद, मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा: "हमेशा अपने स्वयं के वास्ते कार्यों को मत कर, हमेशा अपने हितों की मत सोच, और अपनी स्वयं की हैसियत, चेहरे या प्रतिष्ठा पर विचार मत कर। लोगों के हितों के प्रति मत सोच। तुझे सबसे पहले परमेश्वर के घर के हितों पर विचार अवश्य करना चाहिए और उसे अपनी पहली प्राथमिकता बनाना चाहिए; तुझे परमेश्वर की इच्छा के बारे में मननशील होना चाहिए, इस पर चिंतन करने के द्वारा आरंभ कर कि तू अपने कर्तव्य को पूरा करने में अशुद्ध रहा है या नहीं, तूने वफादार होने में, अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने में, अपना अधिकतम किया और अपना सर्वस्व दिया है या नहीं, तूने अपने कर्तव्य, और परमेश्वर के घर के कार्य के प्रति पूरे दिल से विचार किया है या नहीं। तुझे इन चीज़ों के बारे में विचार करने की आवश्यकता है। इन चीज़ों पर बार-बार विचार कर, और तेरे पास अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाने का एक आसान समय होगा" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'तू अपने सच्चे हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ने के बाद सच्चाई को प्राप्त कर सकता है')। "जब तुम ख़ुद को स्वार्थी और अधम होने के रूप में प्रकट करते हो, और इस बारे में जान जाते हो, तो तुम्हें सत्य की तलाश करनी चाहिए : परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होने के लिए मुझे क्या करना चाहिए? मुझे कैसे बर्ताव करना चाहिए ताकि सबको लाभ पहुंचे? अर्थात, तुम्हें अपने हितों को भूलने से शुरुआत करनी चाहिए, अपने कद के अनुसार धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा करके उनका त्याग करना चाहिए। कुछ बार इसका अनुभव करने के बाद, तुम पूरी तरह अपने हितों को भूल चुके होगे, और ऐसा करते-करते तुम्हारी स्थिरता बढ़ती जाएगी। तुम जितना ज़्यादा अपने हितों को भुलाते जाओगे, उतना ही तुम्हें लगेगा कि इंसान के रूप में तुम में विवेक और तर्क होना चाहिए। तुम्हें महसूस होगा कि स्वार्थी उद्देश्यों के बिना, तुम स्पष्ट, ईमानदार व्यक्ति बन रहे हो, और तुम पूरी तरह परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए काम कर रहे हो। तुम्हें महसूस होगा कि इस तरह का व्यवहार तुम्हें 'मानव' कहलाने के योग्य बनाता है, और इस तरह से पृथ्वी पर जीने के द्वारा, तुम एक स्पष्ट और ईमानदार व्यक्ति बनकर जी रहे हो, तुम एक सच्चे व्यक्ति की तरह बर्ताव कर रहे हो, तुम्हारी अंतरात्मा साफ़ है, और तुम उन सभी चीज़ों के योग्य हो जो परमेश्वर ने तुम पर न्यौछावर की हैं। तुम जितना इस तरह जीवन व्यतीत करोगे, उतना ही स्थिर और उजला महसूस करोगे। इस तरह, क्या तुमने सही रास्ते पर चलना नहीं शुरू कर दिया होगा?" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'तू अपने सच्चे हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ने के बाद सच्चाई को प्राप्त कर सकता है')। इसे पढ़ने के बाद, मुझे समझ आ गया कि अगर मुझे अपना काम अच्छी तरह से करना है तो मुझे सबसे पहले यह सोचना होगा कि परमेश्वर के घर के काम को कैसे जारी रखा जाए, पूरी लगन से काम कैसे किया जाए, और इसे पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कैसे निभाया जाए। परमेश्वर का ध्यान हमारे काम करने में हमारे रवैये पर होता है। उसे यह उम्मीद है कि हम उसका सामना सच्चे दिल से करें, हम अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाएं, हम विवेक और मानवता से भरे लोग बनें। जब मैंने उसकी इच्छा को समझ लिया, तो मैंने अपने दिल में परमेश्वर से एक प्रार्थना की, उसे यह बताया कि मैं अपने स्वार्थ को त्यागने और अपने निजी हितों पर विचार करना बंद करने के लिए तैयार हूँ, और मैं सिर्फ वही करूँगा जिससे कलीसिया को और मेरे भाई-बहनों के जीवन को फ़ायदा हो। उसके बाद, मैंने जाकर भाई झांग के साथ बात की, उसे अपने स्वार्थी, नीच शैतानी स्वभावों और अपने धोखेबाज इरादों के बारे में बताया। हमने एक साथ मिलकर सत्य की तलाश भी की, ताकि हमारे काम की समस्याओं और खामियों को हल किया जा सके, और मैंने बिना कुछ छुपाये, हर उस चीज़ के ऊपर सहभागिता की जिसके बारे में मैं जानता था। जब मैंने उस तरह से अभ्यास किया, तो मुझे काफ़ी शांति का अनुभव हुआ। मुझे पता चला कि ऐसा इंसान होना कितना शानदार है, जो बहुत स्पष्ट और निष्कपट होता है। मेरी स्थिति धीरे-धीरे सुधर गयी और मुझे अपने काम में इसका असर भी दिखना शुरू हो गया। हालांकि कई बार मैं अपने स्वार्थी और नीच शैतानी स्वभावों को दिखाने लगता था, लेकिन जैसे ही मेरे मन में यह ख़याल आता कि इससे परमेश्वर को कितनी घृणा होती है, तो मैं परमेश्वर के सामने आकर प्रार्थना करने लगता, अपनी ग़लत सोच को त्याग देता, और उसके वचनों के अनुसार अभ्यास करने की इच्छा करता।

ऐसे अनुभव से गुज़रने के बाद, मुझे वाकई यह एहसास हुआ कि शैतानी स्वभावों और शैतान के ज़हर पर निर्भर होकर अपना काम करने से हम सिर्फ़ ज़्यादा से ज़्यादा स्वार्थी, नीच और ख़ुदगर्ज ही बन सकते हैं। हम सारी इंसानियत खो देंगे, अपने आप को सिर्फ़ पीड़ा ही नहीं देंगे, बल्कि दूसरों के साथ ठीक से काम करने में भी असमर्थ हो जायेंगे। साथ ही, इससे बस परमेश्वर के घर के काम को नुकसान ही होता है। जब मैंने परमेश्वर के वचनों के अनुसार एक ईमानदार व्यक्ति की तरह सत्य का अभ्यास किया, और सिर्फ़ अपने हितों के बारे में सोचना छोड़ दिया, तब मुझे अपने कर्तव्य में पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन मिला, और मुझे आंतरिक शांति महसूस हुई। यह परमेश्वर के वचनों का न्याय और ताड़ना ही थी जिससे मुझे स्वार्थ और नीचता के अपने शैतानी स्वभावों की थोड़ी-बहुत समझ मिली, और मैं आखिरकार सत्य का अभ्यास करने और एक सच्चे इंसान की तरह जीने में सक्षम हो सका।

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