95. क्या एक आदर्श शादी के पीछे भागने से खुशी मिल सकती है?
जब मैं स्कूल में थी तो मुझे गाने सुनना और प्राचीन कविताएँ पढ़ना बहुत पसंद था। इनमें से ज्यादातर रचनाएँ प्रेम पर आधारित थीं। मुझ पर प्रेम से जुड़े ऐसे नजरियों का प्रभाव था जैसे कि “प्रेम सर्वोपरि है” और “एक दूसरे का हाथ पकड़ना और साथ-साथ बूढ़ा होना”। मुझे ऐसी शादी का विचार आकर्षित करता था जिसमें प्रेम हमेशा बना रहे और मैं ऐसे इंसान से मिलने के लिए बेताब थी जो मेरा ख्याल रखे और मेरे साथ बूढ़ा हो। काम शुरू करने के बाद मेरी मुलाकात मेरे पति से हुई। शादी के बाद वह मेरी बेहद परवाह करता था और ख्याल रखता था। कभी-कभी जब मुझे हल्का सिरदर्द या बुखार भी होता तो वह इलाज के लिए मुझे अस्पताल ले जाने की जिद करता था। जब हम सड़क पर चलते थे तो वह हमेशा मुझे अपनी दाहिनी ओर चलने को कहता क्योंकि उसे डर रहता था कि कहीं कोई गाड़ी मुझे टक्कर न मार दे। जब भी हमारे जीवन में कोई छोटी-मोटी खटपट होती तो वह मेरी बात मान लेता और मुझे सहन करता। इसके अलावा वह बेहद रूमानी था। हर बार जब वह बिजनेस ट्रिप से वापस आता और हर त्योहार पर चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, वह मेरे लिए तोहफे खरीदता था। जब मैंने देखा कि मेरा पति मेरी कितनी परवाह करता है तो मुझे लगा कि मैं दुनिया की सबसे खुशकिस्मत औरत हूँ। मैंने इस जीवन की अपनी सारी खुशियाँ उसके हवाले कर दीं।
जुलाई 2013 में मैंने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया। परमेश्वर के वचनों से मैंने जाना कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही वह है जिसने स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों की रचना की है और वह हर चीज पर संप्रभु है। वह मानवता का उद्धारकर्ता है। मैं एक सृजित प्राणी हूँ और मुझे उचित ढंग से परमेश्वर में विश्वास करना चाहिए, परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए और अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। उस समय मैं परमेश्वर के वचन पढ़ती थी और जब भी मुझे फुरसत मिलती, मैं सक्रिय रूप से सुसमाचार का प्रचार करती थी। मेरे पति ने परमेश्वर में विश्वास करने पर मेरा विरोध नहीं किया। जून 2014 में उसने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को बदनाम करने वाली सीसीपी की निराधार अफवाहें सुनीं। उसे डर था कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर में मेरे विश्वास की वजह से वह फँस जाएगा और वह परमेश्वर पर मेरे विश्वास में बाधा डालने लगा। मैंने उसे सच्चाई बताई और उससे उन निराधार अफवाहों पर विश्वास न करने के लिए कहा। उसने देखा कि मैंने उसकी बात नहीं मानी और इसलिए तब से वह लगातार मुझसे झगड़ा करने लगा।
जून 2018 में एक रात करीब दस बजे मेरा पति शराब के नशे में घर आया। उसने बेडरूम का दरवाजा लात मारकर खोला, मेरे बाल पकड़े, मुझे बिस्तर से नीचे फर्श पर खींच लिया और मेरे सिर पर मारने लगा। वह बहुत ताकत लगाकर मार रहा था और हर थप्पड़ से मेरा सिर भन्ना उठता था। इसके बाद वह मेरे चेहरे पर थप्पड़ मारने लगा और जब वह मार चुका तो रसोई से चाकू लेने चला गया। गालियाँ बकते हुए उसने कहा, “अगर तुमने फिर से परमेश्वर में विश्वास किया तो मैं तुम्हें मार डालूँगा, फिर खुद को भी खत्म कर लूँगा।” बोलते हुए उसने चाकू की उल्टी धार मेरी गर्दन पर दबा दी। अपने दिल में मैं लगातार परमेश्वर को पुकार रही थी। मैंने शारीरिक रूप से संघर्ष करने की हिम्मत नहीं की। उसने जब चाकू नीचे रखा तो लगा जैसे एक अरसा बीत चुका हो। जब मैंने देखा कि कभी मेरी इतनी परवाह और प्यार करने वाला मेरा पति कितना हिंसक हो गया है तो मेरा दिल चकनाचूर हो गया। अगले दिन उसने मुझसे माफी माँगी और मुझसे क्षमा करने को कहा। मैंने मन ही मन सोचा, “हमारी शादी को कई साल हो गए हैं और वह हमेशा मेरे साथ अच्छा रहा है। इस बार शायद इसलिए ऐसा हुआ क्योंकि वह नशे और आवेश में था।” इसलिए मैंने उसे माफ कर दिया। हालाँकि तब से मैं सभा करते और अपना कर्तव्य निभाते हुए बाधित महसूस करने लगी। हर बार जब मैं सभा से वापस आती और देखती कि मेरा पति बाहर है तो मैं राहत की साँस लेती। अगर वह त्योरी चढ़ाए घर पर ही होता तो मैं आगे बढ़कर उससे बात करती, या उससे पूछती कि वह क्या खाना चाहता है और खाना बनाने के लिए जल्दी से रसोई में जाती। मैं पहले की तुलना में उसका और भी ज्यादा ख्याल रखती।
जून 2019 में मुझे कलीसिया में अगुआ चुना गया। जब मैंने यह खबर सुनी तो मैं बहुत खुश हुई और सोचा कि एक अगुआ के रूप में मुझे प्रशिक्षण पाने और जीवन में तेजी से प्रगति करने के कई अवसर मिलेंगे। हालाँकि मैं आशंकाओं से भी भरी हुई थी, “पहले जब मैं सभाओं में जाती थी तो मेरा पति हमेशा मुझे गंदे तरीके से देखता था या शिकायत करता था। अगुआओं के पास करने के लिए ज्यादा काम होता है और मुझे अक्सर सभाओं के लिए बाहर जाना पड़ेगा। क्या वह मुझे रोकने की और भी ज्यादा कोशिश करेगा? अगर ऐसा हुआ तो हमारा जीवन फिर कभी सामंजस्यपूर्ण नहीं रहेगा।” एक तरफ मेरा कर्तव्य; दूसरी तरफ मेरी शादी। मैं उलझन में थी। मैंने खोज करते हुए परमेश्वर से प्रार्थना की और परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “अगर तुम सुसमाचार कार्य को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हो और परमेश्वर की अनुमति के बिना अपना पद छोड़ देते हो, तो इससे बड़ा कोई अपराध नहीं है। क्या यह परमेश्वर से विश्वासघात नहीं है?” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सुसमाचार का प्रचार करना वह कर्तव्य है जिसे निभाना सभी विश्वासियों का दायित्व है)। अगर मैंने अपनी शादी कायम रखने के लिए अपने कर्तव्य से इनकार किया तो यह एक गंभीर अपराध होगा। मैं एक सृजित प्राणी हूँ और अपना कर्तव्य निभाना मेरी जिम्मेदारी और मेरा दायित्व है। मैं अपना छोटा-सा शांत जीवन जीने के लिए अपना कर्तव्य निभाना बंद नहीं कर सकती। इसलिए मैंने अगुआ का कर्तव्य स्वीकार कर लिया। उस समय ऐसा हुआ कि मेरा पति छुट्टी पर था। वह मुझे हर दिन जल्दी जाते और देर से आते देखता और हर दूसरे-तीसरे दिन मुझसे झगड़ा करता। कई बार वह मुझे दरवाजे पर ही रोक देता था और सभाओं में नहीं जाने देता था। उसने यहाँ तक कहा कि मैं न तो हमारे परिवार ख्याल रख रही हूँ, न ही उसका और अगर मैं परमेश्वर में विश्वास करती रही तो वह मुझे तलाक दे देगा। तब मेरे मुँह से ये शब्द निकल गए, “ठीक है, तो मुझे तलाक दे दो!” लेकिन अंदर से मैं कमजोर महसूस कर रही थी। मैंने सोचा, “अगर मेरे पति ने सचमुच मुझे तलाक दे दिया तो? उसके बाद मेरा जीवन कैसा होगा?” जैसे ही मैंने तलाक के बारे में सोचा, मुझे लगा कि इसके बाद मेरे जीवन में नाममात्र की भी खुशी नहीं बचेगी। मेरे दिल में इतना दर्द हो रहा था जैसे उस पर चाकू से वार किया जा रहा हो। मैं अब अपना कर्तव्य निभाने के लिए हर दिन बाहर नहीं जाना चाहती थी। हालाँकि, मैं कलीसिया में एक अगुआ थी और कलीसिया के समग्र कार्य की जिम्मेदारी मुझ पर थी। अगर मैंने अपना कर्तव्य त्याग दिया तो यह सच में मुझमें अंतरात्मा का न होना होगा। मुझे बस हिम्मत जुटानी थी और डटे रहना था। सभाओं में मैं बस खानापूर्ति करती, पूछती कि क्या किसी की अवस्था गलत है और काम के बारे में थोड़ी जानकारी लेती। मैं थोड़ी-बहुत साधारण संगति करती, लेकिन नतीजों की तलाश नहीं करती थी। कभी-कभी काम का कार्यान्वयन पूरा नहीं होता था, लेकिन जैसे ही मैं देखती कि सभा खत्म करने का समय हो गया है, मैं जल्दी से घर भाग जाती। नतीजतन, मेरे भाई-बहनों की समस्याएँ और मुश्किलें समय पर हल नहीं हुईं और कुछ काम समय पर कार्यान्वित नहीं किए जा सके।
एक बार मेरी बड़ी बहन मुझे परमेश्वर में विश्वास करने से रोकने के लिए मेरे पीछे-पीछे एक बहन के घर आ गई। इस बहन की सुरक्षा के लिए, उच्च अगुआओं ने कहा कि मैं भाई-बहनों के संपर्क में न रहूँ और अपने घर के हालात देखते हुए मैं अपना कर्तव्य उतना ही निभाऊँ जितना निभा सकती हूँ। पहले कुछ दिन मैं खोई-खोई और उदास थी क्योंकि मैं अपने कर्तव्य नहीं कर पा रही थी। बाद में जब मैंने अपने पति को हर दिन मेरे लिए खाना बनाते और मुझे खुश करने की कोशिश में व्यस्त देखा तो मैं जल्द ही फिर से वैवाहिक जीवन की भावनाओं में बह गई। मुझे अच्छी तरह पता था कि जिस बहन के साथ मैं काम कर रही थी, वह अभी-अभी अगुआ चुनी गई थी और कलीसिया के कार्य से अपरिचित थी। कार्य की कई ऐसी बातें थीं जिन्हें लागू करने और उनके अनुवर्तन के लिए हम दोनों के मिल-जुलकर काम करने की तत्काल जरूरत थी। इसके अलावा मेरा पति मेरी हर हरकत पर नजर नहीं रख रहा था। मेरे पास बाहर जाने और अपना कर्तव्य निभाने के मौके तो थे, लेकिन मुझे डर था कि अगर उसे पता चला तो वह नाराज हो जाएगा। हमारा रिश्ता अभी-अभी सुधरा था और मैं इस स्थिति को खराब नहीं करना चाहती थी। इसलिए मैंने “माहौल की सुरक्षा” का बहाना बनाकर दो महीने तक कलीसिया के कार्य के बारे में कोई पूछताछ नहीं की। नतीजतन, काम के सभी मुद्दों में अलग-अलग हद तक बाधा आई। उच्च अगुआओं ने देखा कि मैं पूरी तरह से दैहिक जीवन जी रही हूँ और कलीसिया का कार्य नहीं कर रही हूँ, इसलिए उन्होंने मुझे बरखास्त कर दिया। उस समय मैं रो पड़ी। इन दो महीनों में मेरे पास अपना कर्तव्य निभाने के मौके थे, लेकिन मैं अपने कर्तव्य पर डटी नहीं रही। क्या मैं भगोड़ी नहीं थी? मुझे अपने दिल में आत्म-ग्लानि और अपराध-बोध हुआ। एक सभा में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा, जो मुझे ऐसे याद है जैसे कल की ही बात हो। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अगर मैं तुम लोगों के सामने कुछ पैसे रखूँ और तुम्हें चुनने की आजादी दूँ—और अगर मैं तुम्हारी पसंद के लिए तुम्हारी निंदा न करूँ—तो तुममें से ज्यादातर लोग पैसे का चुनाव करेंगे और सत्य को छोड़ देंगे। तुममें से जो बेहतर होंगे, वे पैसे को छोड़ देंगे और अनिच्छा से सत्य को चुन लेंगे, जबकि इन दोनों के बीच वाले एक हाथ से पैसे को पकड़ लेंगे और दूसरे हाथ से सत्य को। इस तरह तुम्हारा असली रंग क्या स्वतः प्रकट नहीं हो जाता? सत्य और किसी ऐसी अन्य चीज के बीच, जिसके प्रति तुम वफादार हो, तुम सभी ऐसा ही चुनाव करोगे, और तुम्हारा रवैया ऐसा ही रहता। क्या ऐसा नहीं है? क्या तुम लोगों में बहुतेरे ऐसे नहीं हैं, जो सही और गलत के बीच डगमगाए हैं? सकारात्मक और नकारात्मक, काले और सफेद, परिवार और परमेश्वर, संतानों और परमेश्वर, सद्भाव और बिगाड़, धन और गरीबी, रुतबा और मामूलीपन, समर्थन दिए जाने और ठुकरा दिए जाने इत्यादि के बीच सभी संघर्ष के दौरान तुम लोगों ने जो विकल्प चुने हैं उनके बारे में तुम लोग निश्चित ही अनजान नहीं हो! एक सौहार्दपूर्ण परिवार और टूटे हुए परिवार के बीच तुमने पहले को चुना और तुमने ऐसा बिना किसी संकोच के किया; धन-संपत्ति और कर्तव्य के बीच तुमने फिर से पहले को चुना, यहाँ तक कि तुममें किनारे पर वापस लौटने की इच्छा भी नहीं रही; विलासिता और निर्धनता के बीच तुमने पहले को चुना; अपने बच्चों, पत्नियों और पतियों या मेरे बीच तुमने पहले को चुना; और धारणाओं और सत्य के बीच तुमने अब भी पहले को चुना। तुम लोगों के तरह-तरह के बुरे कर्मों को देखते हुए मेरा विश्वास तुम पर से बिल्कुल उठ गया है, मैं बिल्कुल स्तब्ध हूँ। तुम्हारे हृदय अप्रत्याशित रूप से इतने कठोर हैं कि उन्हें कोमल नहीं बनाया जा सकता” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम वास्तव में किसके प्रति वफादार हो?)। जब मैंने परमेश्वर के न्याय के वचन पढ़े, तो मुझे गहरा पछतावा हुआ और मैं खुद को रोने से नहीं रोक पाई। मैं उन बीच के लोगों में से एक थी, जिन्हें परमेश्वर ने उजागर किया था। एक हाथ से मैंने अपनी शादी और परिवार को कसकर पकड़ रखा था और उसे छोड़ना नहीं चाहती थी; दूसरे हाथ से मैंने परमेश्वर के उद्धार को थाम रखा था और त्यागा जाना नहीं चाहती थी। जब मैं अगुआ थी तो भले ही मैं हर दिन अपना कर्तव्य निभाने के लिए बाहर जा रही थी, मैं नहीं चाहती थी कि परमेश्वर में मेरे विश्वास से मेरा पति नाराज हो और हमारे रिश्ते पर असर पड़े। जब मैं अपना कर्तव्य करती थी, तो मैं बस खानापूर्ति करती थी। मैंने अपने भाई-बहनों की मुश्किलों और उनके काम में आने वाली समस्याओं के बारे में संगति करने और उन्हें सुलझाने में कोई कोशिश नहीं की। जब मैं “माहौल की सुरक्षा” के लिए घर पर अलग-थलग थी, तो मैंने बस अपना कर्तव्य छोड़ देने का मौका उठाया और तथाकथित खुशहाल जीवन का आनंद लिया। मुझे अच्छी तरह पता था कि जिस बहन के साथ मैं काम कर रही थी, वह अभी-अभी अगुआ बनी थी और वह अकेले उस सारे काम की देखरेख नहीं कर सकती थी। इसके अलावा मेरा पति हर दिन मुझ पर नजर नहीं रख रहा था, इसलिए मैं कुछ काम करने के लिए अपनी बहन के साथ सहयोग कर सकती थी। मगर अपने पति के साथ अपना रिश्ता बचाने के लिए मैंने दो महीने तक कलीसिया के कार्य से कोई मतलब नहीं रखा। अपने कर्तव्य और सामंजस्यपूर्ण परिवार के बीच फँसे रहकर मैंने अपना परिवार बनाए रखना चुना और आसानी से अपने कर्तव्य छोड़ दिए। मुझमें परमेश्वर के प्रति बिल्कुल भी वफादारी नहीं थी और उन दो महीनों के दौरान मुझे जरा भी आत्म-ग्लानि या ऋणी होने का भाव महसूस नहीं हुआ। मैंने परमेश्वर के इतने वचन पढ़े थे, लेकिन जब असल में मुझ पर बात आई, तो हैरानी की बात है कि मैंने इस तरह का व्यवहार किया। मुझमें वाकई रत्ती भर भी अंतरात्मा या विवेक नहीं था! परमेश्वर ने कहा था : “तुम लोगों के तरह-तरह के बुरे कर्मों को देखते हुए मेरा विश्वास तुम पर से बिल्कुल उठ गया है, मैं बिल्कुल स्तब्ध हूँ। तुम्हारे हृदय अप्रत्याशित रूप से इतने कठोर हैं कि उन्हें कोमल नहीं बनाया जा सकता।” कलीसिया में एक अगुआ के तौर पर मुझ पर भारी जिम्मेदारी थी। मुझे कलीसिया में कार्य के विभिन्न मदों की सामान्य प्रगति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी और मुझे सत्य समझने और अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने में अपने भाई-बहनों का समर्थन और मदद करनी चाहिए थी। लेकिन इसके बजाय मैंने इस बात की परवाह नहीं की कि मेरे भाई-बहनों का जीवन प्रवेश प्रभावित हो रहा है, या कलीसिया के कार्य को नुकसान पहुँच रहा है। मैंने केवल अपनी शादी और परिवार को बनाए रखने के बारे में सोचा और लापरवाही से अपना कर्तव्य छोड़ दिया। मैं वाकई बहुत स्वार्थी और नीच थी! मैं भरोसे के लायक इंसान नहीं थी! बरखास्त किए जाने के लिए मैं खुद ही जिम्मेदार थी। मुझे बहुत पछतावा हुआ और मैंने मन ही मन संकल्प किया कि मैं अब अपनी शादी और परिवार को बनाए रखने की खातिर अपना कर्तव्य नहीं छोड़ूँगी। बाद में मैंने फिर से कलीसिया में कर्तव्य निभाना शुरू कर दिया और मेरे पति ने मुझे परमेश्वर में विश्वास छोड़ने पर मजबूर करने के लिए प्यार और दबाव दोनों का इस्तेमाल किया। जब उसने देखा कि मैं नहीं सुनती, तो वह मुझे धमकाने के लिए हर एक दिन तलाक की बात करने लगा। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और मुझे आस्था और ताकत देने की विनती की इस तरह मैं हमेशा सभाओं में जाने और अपना कर्तव्य निभाने पर डटी रही। धीरे-धीरे मेरे पति ने मुझ पर इतनी सख्ती से नियंत्रण करना बंद कर दिया, बस यह माँग करता था कि मैं हर दिन घर आऊँ।
जुलाई 2023 में अगुआओं ने मेरे लिए एक कर्तव्य की व्यवस्था की। चूँकि काम में बहुत सारे मामले शामिल थे, इसलिए मैं हर दो हफ्ते में सिर्फ एक बार ही घर आ पाती। मुझे थोड़ा बाधित महसूस हुआ, “अगर मैं हर दो हफ्ते में सिर्फ एक बार घर आऊँगी, तो क्या मेरा पति मानेगा? अगर मैं नियमित रूप से घर पर नहीं रहूँगी और उसका साथ देने और ख्याल रखने के लिए उसके पास नहीं रहूँगी तो हमारी शादी में धीरे-धीरे और अनिवार्य रूप से दरार आ जाएगी।” लेकिन मुझे अपनी पिछली नाकामी का अनुभव याद आया। इस बार मैं पछतावे के साथ नहीं रहना चाहती थी और मैंने यह कर्तव्य स्वीकार कर लिया। कुछ समय बाद मुझे थोड़ी चिंता हुई, “अगर मैं घर वापस नहीं जाती रही, तो मेरे पति के साथ मेरा रिश्ता और भी दूर होता जाएगा। अगर वह किसी और के प्यार में पड़ गया, तो हमारी शादी खत्म हो जाएगी। अगर मेरी शादी टूट गई, तो क्या मैं भविष्य में भी खुशहाल जीवन जी पाऊँगी?” ऊपरी तौर पर मैं हर दिन काम में व्यस्त रहती थी, लेकिन मेरा दिल लगातार परेशान रहता था। जैसे ही काम पूरा होता, मैं दिन गिनने लगती कि मैं कब घर जा सकती हूँ। यहाँ तक कि मैंने अगुआओं से अपना कर्तव्य बदलकर ऐसा कोई कर्तव्य देने के बारे में पूछने का भी सोचा जिसे मैं घर पर रहकर कर सकूँ। मुझे एहसास हुआ कि यह अपने कर्तव्य को लेकर नखरे करना है। यह उचित नहीं था, इसलिए मैंने इसके बारे में बात नहीं की। असहाय होकर मैंने परमेश्वर को अपने मन की बात बताई और परमेश्वर से मुझे प्रबुद्ध करने और मेरा मार्गदर्शन करने की विनती की।
एक दिन अपनी भक्ति के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जो मेरे लिए बहुत मददगार था। परमेश्वर कहता है : “कुछ लोग ऐसे भी हैं जो परमेश्वर में विश्वास करने के बाद अपना कर्तव्य और परमेश्वर के घर से मिला आदेश स्वीकारते हैं, मगर जब कर्तव्य निभाने का समय आता है तो वे अपनी वैवाहिक सुख और संतुष्टि बरकरार रखने के चक्कर में बहुत पीछे रह जाते हैं। मूल रूप से, उन्हें किसी दूर जगह जाकर सुसमाचार प्रचार करना था, जिसमें वे हफ्ते में एक बार या लंबे अंतराल के बाद घर लौटते या वे घर छोड़कर विभिन्न पहलुओं में अपनी काबिलियत और परिस्थिति के अनुसार पूरे समय अपना कर्तव्य कर सकते थे, मगर वे डरते हैं कि उनका जीवनसाथी उनसे नाराज हो जाएगा, उनकी शादी खुशहाल नहीं रहेगी या फिर उनकी शादी ही टूट जाएगी, तो अपनी वैवाहिक सुख को बनाए रखने के लिए वे अपना बहुत सारा समय गँवा देते हैं जो उन्हें अपना कर्तव्य करने में लगाना चाहिए था। खास तौर पर जब वे अपने जीवनसाथी को शिकायत करते या नाखुश होते या रोते देखते हैं, तो अपनी शादी को बचाए रखने के लिए और भी सतर्क हो जाते हैं। वे अपने जीवनसाथी को संतुष्ट करने के लिए हर संभव प्रयास और अपनी वैवाहिक खुशहाली को बनाए रखने और अपनी शादी टूटने से रोकने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। बेशक, इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि कुछ लोग अपने वैवाहिक सुख को बरकरार रखने के लिए परमेश्वर के घर की पुकार को ठुकराकर अपना कर्तव्य निभाने से इनकार कर देते हैं। जब उन्हें अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ देना चाहिए, तब क्योंकि वे अपने जीवनसाथी से अलग होना बर्दाश्त नहीं कर सकते या क्योंकि उनके जीवनसाथी के माँ-बाप परमेश्वर में उनके विश्वास का विरोध करते हैं और उनके नौकरी छोड़कर कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ने का विरोध करते हैं, तो वे समझौता करके अपना कर्तव्य छोड़ देते हैं, और इसके बजाय अपनी वैवाहिक सुख और अपनी शादी की अखंडता बनाए रखने का फैसला करते हैं। अपने वैवाहिक सुख और अपनी शादी की अखंडता बनाए रखने के लिए, और अपनी शादी को टूटकर खत्म होने से बचाने के लिए, वे सिर्फ विवाहित जीवन में अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को पूरा करने और एक सृजित प्राणी के मकसद को त्यागने का रास्ता चुनते हैं। तुम्हें इसका एहसास नहीं होता, परिवार या समाज में तुम्हारी भूमिका कुछ भी हो—चाहे वह पत्नी, पति, बच्चे, माता-पिता, कर्मचारी या कुछ और भूमिका हो—और चाहे वैवाहिक जीवन में तुम्हारी भूमिका महत्वपूर्ण हो या न हो, परमेश्वर के सामने तुम्हारी एक ही पहचान है और वह एक सृजित प्राणी के रूप में है। परमेश्वर के सामने तुम्हारी कोई दूसरी पहचान नहीं है। इसलिए, जब परमेश्वर का घर तुम्हें बुलाता है, यही वह समय है जब तुम्हें अपना मकसद पूरा करना चाहिए। यानी, एक सृजित प्राणी के रूप में, ऐसा नहीं है कि तुम्हें अपना मकसद सिर्फ तभी पूरा करना चाहिए जब तुम्हारे वैवाहिक सुख और तुम्हारी शादी की अखंडता को बनाए रखने की शर्त पूरी हो, बल्कि ऐसा है कि अगर तुम एक सृजित प्राणी हो, तो परमेश्वर ने जो मकसद तुम्हें सौंपा है, तुम्हें उसे बिना शर्त पूरा करना चाहिए; परिस्थिति चाहे जो भी हो, तुम्हें अपना मिशन पूरा करना चाहिए, इससे अपने अनिवार्य कर्तव्य के रूप में पेश आना चाहिए, और परमेश्वर द्वारा तुम्हें सौंपे गए मकसद को पहले रखना चाहिए, जबकि शादी के जरिए तुम्हें सौंपे गए मकसद और जिम्मेदारियों को निभाने को दूसरा स्थान देना चाहिए” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (10))। परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ने के बाद ऐसा लगा जैसे मेरे दिल में रोशनी की किरण चमक उठी हो। मुझे अचानक स्पष्टता और प्रबुद्धता महसूस हुई। जैसा कि परमेश्वर कहता है, मैं अपनी शादी की सलामती और खुशी को बहुत ज्यादा अहमियत दे रही थी। मैं केवल तभी तक कोई कर्तव्य करना चाहती थी जब तक कि मैं अपनी शादी की खुशी बनाए रख सकूँ। जैसे ही इससे मेरी शादी पर असर पड़ता, मैं शांत दिल से अपना कर्तव्य नहीं कर पाती थी और यहाँ तक कि अपनी शादी बचाने के लिए अपना कर्तव्य छोड़ना चाहती थी। मैंने एक सृजित प्राणी के कर्तव्यों को पहले स्थान पर नहीं रखा। मुझे याद आया जब मैं स्कूल में थी, तो मैं शादी के बारे में “एक दूसरे का हाथ पकड़ना और साथ-साथ बूढ़ा होना” और “किसी का दिल जीतने और बाल सफेद होने तक साथ रहने की चाहत” जैसे नजरियों से बहुत प्रभावित थी। मैं हमेशा अपने ऐसे जीवनसाथी से मिलना चाहती थी जो मेरे साथ सच्चे दिल से पेश आए, मेरे प्रति विचारशील हो, मेरा ख्याल रखे और जीवन भर मेरा साथ निभाए। शादी होने के बाद मैंने अपनी शादी को सबसे महत्वपूर्ण चीज माना और हमेशा इसे बनाए रखने की कोशिश की। मेरे परमेश्वर में विश्वास करने के बाद मेरे पति ने निराधार अफवाहें सुनीं और मुझे रोकने की कोशिश की। मुझे हमारी शादी में दरार आने की चिंता थी और इसलिए मैंने उसे खुश करने के तरीके तलाशे। अगुआ का कर्तव्य निभाते समय मैं लापरवाह थी और बस खानापूर्ति करती रही। हर सभा में मैं समय पर आती और जाती थी, मानो मैं काम पर अपनी हाजिरी लगा रही हूँ। कुछ कामों का कार्यान्वयन पूरा नहीं हुआ था, लेकिन जब मैं सोचती कि मेरे पति का काम शायद खत्म हो गया होगा, तो मैं जल्दबाजी में सभा खत्म करके घर चली जाती। जब मैं घर जा रही होती, तब भी मैं यह सोच रही होती कि अपने पति का दिल कैसे जीतूँ और उसके साथ अपना रिश्ता कैसे बनाए रखूँ। जिन दो महीनों में मैं “माहौल की सुरक्षा” के लिए घर पर थी, मैं कुछ कर्तव्य निभा सकती थी। मगर पति के साथ अपना रिश्ता बनाए रखने के लिए मैंने कलीसिया के कार्य को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। इससे न केवल मेरे भाई-बहनों के जीवन प्रवेश में देरी हुई, बल्कि कलीसिया के कार्य को भी नुकसान पहुँचा। इसके अलावा, जब मैं इस बार अपना कर्तव्य निभाने के लिए बाहर आई, तो मैंने इसे केवल ऊपरी तौर पर स्वीकार किया; मैंने इसे पूरे दिल से नहीं किया। जैसे ही मुझे खाली समय मिलता, मैं हिसाब लगाने लगती कि मैं कब घर जाऊँगी। यहाँ तक कि मैंने अपना कर्तव्य बदलने के बारे में भी सोचा ताकि मैं हर दिन घर पर रह सकूँ। मैंने अपनी शादी की खुशी बनाए रखने को बहुत ज्यादा अहमियत दी; ऐसा लगता था मानो मेरी शादी का टूटना आसमान टूट पड़ने जितनी बड़ी घटना हो। मैं एक सृजित प्राणी हूँ। परमेश्वर ने ही मुझे जीवन दिया है और मुझे सब कुछ प्रदान किया है। एक सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छे से निभाना ही मेरा मिशन है। लेकिन अपनी शादी बनाए रखने के लिए मैं लगातार अनमने ढंग से अपना कर्तव्य करती रही। मैं परमेश्वर के सामने बहुत शर्मिंदा थी! मुझमें अंतरात्मा या विवेक का रत्ती भर भी अंश नहीं था। जब मुझे यह समझ आया, तो मुझे दिल में आत्म-ग्लानि और पीड़ा महसूस हुई। मैंने मन ही मन संकल्प किया : भविष्य में मैं सत्य का अभ्यास करूँगी और परमेश्वर के प्रेम का बदला चुकाऊँगी और अपना सारा समय और विचार अपने कर्तव्य में लगाऊँगी।
सितंबर 2023 में एक दिन मैं घर वापस आई। मेरा पति शाम को शराब पीकर घर आया और आक्रामक होकर मुझसे पूछने लगा, “तुम अक्सर घर पर नहीं रहतीं। तुम कहाँ रहती हो? तुम क्या कर रही हो?” उसने मुझे परमेश्वर में विश्वास करना बंद करने के लिए भी कहा। मैं नहीं मानी और इसलिए वह मुझे मारने लगा। मुझे इतना गुस्सा आया कि मैं घर छोड़कर चली गई। नवंबर में एक दिन मैं अपनी माँ के घर गई। मेरी माँ ने कहा, “तुम्हारे पति ने कहा है कि वह इस तरह नहीं जी सकता। वह चाहता है कि तुम घर वापस जाओ और तलाक की कार्यवाही पूरी करो।” जब मैंने यह सुना, तो मैंने राहत की लंबी साँस ली। मैंने मन ही मन सोचा, “इन सभी सालों में उसने मुझे बहुत सताया है और मुझे परमेश्वर में विश्वास करने से रोकने की कोशिश की है। अगर हमारा तलाक हो जाता है, तो मैं आजादी से परमेश्वर में विश्वास कर सकती हूँ और अब उससे बाधित नहीं रहूँगी।” लेकिन जब मैं दरवाजे से बाहर निकली और सड़क पर शादी-शुदा जोड़ों को टहलते हुए देखा, तो मैंने सोचा कि मेरी उससे शादी हुए बीस साल हो गए हैं। अगर हमारा तलाक हो गया, तो इसका मतलब होगा कि उसके बाद से हम दोनों के बीच बिल्कुल भी कोई रिश्ता नहीं रहेगा। अगर मैं बीमार पड़ गई, तो मेरी देखभाल कौन करेगा? उसके साथ के बिना क्या मेरी बाकी की जिंदगी वीरान और अकेली होगी? क्या मैं बीस साल के वैवाहिक जीवन को बस ऐसे ही खत्म कर सकती हूँ? जब मैंने यह सोचा, तो मेरा दिल दुख से भर गया और मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं जानती हूँ कि अब अपने पति के साथ अपनी शादी बनाए रखने की कोई जरूरत नहीं है। मैं उसे तलाक देने के लिए तैयार हूँ, लेकिन जैसे ही मैं उसे तलाक देने के बारे में सोचती हूँ, मेरे दिल को अभी भी बहुत दुख होता है। हे परमेश्वर, तुम मुझे आस्था और ताकत दो ताकि मैं सही चुनाव कर सकूँ।”
उसके बाद मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और जाना कि मुझे शादी के प्रति कैसा नजरिया रखना चाहिए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर ने तुम्हारे लिए शादी की व्यवस्था की और तुम्हें एक जीवनसाथी दिया है। शादी के बाद भी परमेश्वर के समक्ष तुम्हारी पहचान और दर्जा नहीं बदलता है—तुम अब भी तुम ही हो। अगर तुम महिला हो तो शादी के बाद भी तुम परमेश्वर के सामने एक महिला ही रहोगी; अगर तुम पुरुष हो तो शादी के बाद भी परमेश्वर के सामने तुम एक पुरुष ही रहोगे। लेकिन तुम दोनों के बीच एक चीज समान है, और वह यह है कि चाहे तुम पुरुष हो या महिला, तुम सभी सृष्टिकर्ता के सामने एक सृजित प्राणी हो। शादी के ढाँचे में, तुम एक-दूसरे से प्यार करते हो और एक-दूसरे के प्रति सहनशील रहते हो, तुम एक दूसरे की मदद और सहयोग करते हो, और यही तुम्हारे लिए जिम्मेदारियाँ निभाना है। लेकिन, परमेश्वर के सामने, जो जिम्मेदारियाँ तुम्हें निभानी चाहिए और जो मकसद तुम्हें पूरा करना चाहिए उसकी जगह अपने साथी के प्रति निभाई जाने वाली जिम्मेदारियाँ नहीं ले सकती हैं। इसलिए, जब भी अपने साथी के प्रति निभाई जाने वाली जिम्मेदारियों और परमेश्वर के समक्ष रहकर एक सृजित प्राणी की जिम्मेदारियों को निभाने के बीच टकराव की स्थिति हो, तो तुम्हें अपने साथी के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने के बजाय एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना चाहिए। तुम्हें यही दिशा और यही लक्ष्य चुनना चाहिए, और बेशक, यही मकसद पूरा करना चाहिए। हालाँकि, कुछ लोग गलती से वैवाहिक सुख की तलाश, या अपने साथी के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने, उसका ध्यान रखने, उसकी देखभाल करने और उससे प्यार करने को अपने जीवन का मकसद बना लेते हैं, और वे अपने साथी को अपना आसमान, अपनी नियति बना लेते हैं—यह गलत है। ... जहाँ तक शादी की बात है, लोगों को बस इसे परमेश्वर की व्यवस्था के रूप में स्वीकार कर परमेश्वर द्वारा मनुष्य के लिए शादी की निर्धारित परिभाषा के अनुरूप चलना चाहिए, जहाँ पति-पत्नी दोनों ही एक-दूसरे के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ और दायित्व पूरा करेंगे। वे अपने साथी की नियति, उसका पिछला जीवन, वर्तमान जीवन या अगला जीवन तय नहीं कर सकते, शाश्वत जीवन की तो बात छोड़ ही दो। तुम्हारी मंजिल, तुम्हारी नियति, और तुम्हारे जीवन का मार्ग केवल सृष्टिकर्ता तय कर सकता है। इसलिए, एक सृजित प्राणी होने के नाते, चाहे तुम्हारी भूमिका पत्नी की हो या पति की, तुम्हारे जीवन की खुशियाँ एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने और एक सृजित प्राणी का मकसद पूरा करने से ही आती हैं। सिर्फ शादी कर लेने से खुशियाँ नहीं मिल जाती हैं, और शादी के ढाँचे में रहकर एक पत्नी या पति की जिम्मेदारियाँ निभाने से तो बिल्कुल भी नहीं मिलती हैं। बेशक, जीवन में जो मार्ग तुम चुनते हो और जो नजरिया अपनाते हो, वह वैवाहिक सुख पर आधारित नहीं होना चाहिए; यह पति-पत्नी में से किसी एक के द्वारा निर्धारित तो बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए—यह बात तुम्हें समझनी होगी” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (11))। “जहाँ तक शादी की बात है, अगर यह तुम्हारे सत्य के अनुसरण में बाधा नहीं डालती या उसके आड़े नहीं आती है, तो तुम्हें जो दायित्व पूरे करने चाहिए, जो मकसद पूरा करना चाहिए, और शादी के ढाँचे के भीतर तुम्हें जो भूमिका निभानी चाहिए, वह नहीं बदलेगी। इसलिए, तुम्हें वैवाहिक सुख का अनुसरण त्यागने के लिए कहने का मतलब यह नहीं है कि तुम औपचारिकता के चक्कर में शादी को ही त्याग दो या तलाक ले लो, बल्कि इसका मतलब एक सृजित प्राणी के रूप में तुम्हें अपना मकसद पूरा करने और वह कर्तव्य निभाने के लिए कहना है जो तुम्हें शादी में निभाई जाने वाली जिम्मेदारियों को पूरा करने के आधार पर निभाना चाहिए। बेशक, अगर तुम्हारा वैवाहिक सुख का अनुसरण एक सृजित प्राणी के रूप में तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन को प्रभावित, बाधित या यहाँ तक कि उसे बर्बाद करता है, तो तुम्हें न सिर्फ वैवाहिक सुख के अनुसरण को, बल्कि अपनी पूरी शादी को ही त्याग देना चाहिए। ... अगर तुम सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति बनना चाहते हो, तो तुम्हें सबसे ज्यादा चिंता यह करनी चाहिए कि उस चीज को कैसे त्याग सको जिसे त्यागने के लिए परमेश्वर तुमसे कहता है और उस चीज को कैसे साधो जिसे साधने के लिए परमेश्वर तुम्हें कहता है। अगर भविष्य में तुम्हें बिना शादी के और बिना अपने साथी के रहना है, तो आने वाले दिनों में भी तुम इतनी ही अच्छी तरह से बुढ़ापे तक जीवित रह सकते हो। हालाँकि, अगर तुम यह अवसर छोड़ देते हो, तो यह तुम्हारे कर्तव्य और उस मकसद को त्यागने के समान है जो परमेश्वर ने तुम्हें सौंपा है। परमेश्वर के लिए, तब तुम ऐसे व्यक्ति नहीं रहोगे जो सत्य का अनुसरण करता है, जो वास्तव में परमेश्वर को चाहता है, या जो उद्धार पाना चाहता है। अगर तुम सक्रियता से उद्धार पाने और अपना मकसद पूरा करने का अपना अवसर और अधिकार त्यागना चाहते हो और इसके बजाय शादी को चुनते हो, पति-पत्नी की तरह साथ रहने का फैसला करते हो, अपने जीवनसाथी के साथ रहना और उसे संतुष्ट करना चुनते हो, और अपनी शादी को बरकरार रखना चाहते हो, तो अंत में तुम कुछ चीजें हासिल करोगे और कुछ चीजें खो दोगे। तुम्हें अंदाजा तो है न कि तुम क्या खो दोगे? शादी तुम्हारा सब कुछ नहीं है, न ही वैवाहिक सुख तुम्हारा सब कुछ है—यह तुम्हारी किस्मत तय नहीं कर सकता, यह तुम्हारा भविष्य भी तय नहीं कर सकता, तो फिर तुम्हारी मंजिल तय करना तो दूर की बात है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (10))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मेरा दिल बेहद रोशन और साफ हो गया। परमेश्वर ने मनुष्यों के लिए यह विधान किया है कि शादी का अर्थ सिर्फ लोगों का एक-दूसरे का साथ देना और एक-दूसरे का ख्याल रखना है। लेकिन शादी की जिम्मेदारियाँ एक सृजित प्राणी के मिशन की जगह नहीं ले सकतीं। जब कर्तव्य की पुकार हो, तो मुझे एक सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छे से निभाने को प्राथमिकता देनी चाहिए। अगर मैं एक खुशहाल शादी के पीछे भागकर अपना कर्तव्य छोड़ देती हूँ, तो मैं सत्य प्राप्त करने और परमेश्वर का उद्धार पाने का मौका खो दूँगी। अंत में, मैं महा विनाश में पड़ जाऊँगी और नष्ट हो जाऊँगी। अतीत में मैं सिर्फ एक खुशहाल शादी के अनुसरण के बारे में सोचती थी। मैंने अपने पति के साथ अपना रिश्ता बनाए रखने में बहुत समय और कोशिश लगाई। मैं एक हाथ से अपनी वैवाहिक खुशी को थामे रखना चाहती थी और दूसरे हाथ से सत्य को। मैंने दोनों चीजों को सँभालने की कोशिश की, लेकिन मेरा दिल पूरी तरह थक चुका था और मेरे पास नाममात्र की भी खुशी नहीं थी। अब मुझे परमेश्वर में विश्वास करते हुए कई साल हो गए हैं लेकिन मैं अभी भी सत्य नहीं समझती। मैंने बहुत समय बर्बाद किया है। मैं कितनी मूर्ख थी! मुझे यह भी एहसास हुआ कि परमेश्वर में विश्वास करना बिल्कुल स्वाभाविक और उचित है। मेरे पति ने परमेश्वर में विश्वास नहीं किया और मुझे भी विश्वास करने से रोकने की कोशिश की। जैसे ही मैं परमेश्वर में विश्वास करने से जुड़ी किसी बात का जिक्र करती, वह मुझ पर गुस्सा हो जाता, मुझे डाँटता, मुझे मारता-पीटता और मुझे कोसता। वह मुझे परमेश्वर में विश्वास छोड़ने पर मजबूर करने के लिए अक्सर तलाक की धमकी देता था। यह साफ है कि उसका सार उस राक्षस का है जो सत्य से घृणा करता है और परमेश्वर से घृणा करता है। जैसा कि परमेश्वर कहता है : “विश्वासी और अविश्वासी आंतरिक रूप से मेल नहीं खाते हैं, बल्कि वे एक दूसरे के विरोधी हैं” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे)। हम दो बिल्कुल अलग किस्म के लोग थे और दो पूरी तरह से अलग रास्तों पर चल रहे थे। हमारे लिए हाथ में हाथ डालकर साथ बूढ़ा होने का कोई रास्ता ही नहीं था। लेकिन मैं फिर भी मूर्खतावश इस शादी को बड़ी सावधानी से बनाए हुए थी। क्या यह आँख मूंदकर एक राक्षस के पीछे चलना नहीं था? मैं कितनी भ्रमित और मूर्ख थी! अपने पति के साथ अपना रिश्ता बनाए रखने का नतीजा सिर्फ यह होता कि मैं परमेश्वर से दूर हो जाती, परमेश्वर को धोखा देती और उद्धार पाने का अपना मौका खो देती। प्रेम के गलत नजरिए के साथ जीते हुए मैंने एक खुशहाल शादी के पीछे भागने को ही अपना मिशन मान लिया था। मैं अपने पति के सार का भेद पहचानने के लिए तैयार नहीं थी। अगर तथ्यों का प्रकाशन न होता और परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन न होता, तो मैं अभी भी इसकी असलियत नहीं जान पाती। मैं वाकई कितनी अंधी और अज्ञानी थी! मैं इन गलत विचारों और नजरियों के साथ जीती नहीं रह सकती थी। भले ही मेरा पति मुझे तलाक देना चाहता हो, फिर भी मुझे एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना था। यही मेरा असली मिशन है!
अपनी भक्ति के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों का एक भजन सुना।
परमेश्वर को अपने हृदय में आने दो
1 परमेश्वर केवल तभी तुम्हारे हृदय में आ सकता है, जब तुम अपना हृदय उसके लिए खोल देते हो। तुम केवल तभी जो परमेश्वर के पास है और जो वह है, उसे देख सकते हो, केवल तभी अपने लिए उसके इरादे देख सकते हो, जब वह तुम्हारे हृदय के भीतर आ गया होता है। उस समय तुम्हें पता चलेगा कि परमेश्वर से संबंधित हर चीज़ कितनी बहुमूल्य है, कि उसका स्वरूप कितना सँजोकर रखने लायक है। उसकी तुलना में लोग, घटनाएँ और तुम्हारे आसपास की चीजें, यहाँ तक कि तुम्हारे प्रियजन, तुम्हारा जीवनसाथी, और वे चीज़ें जिनसे तुम प्रेम करते हो, जो कि इतनी अनुल्लेखनीय हैं, वे इतनी छोटी हैं, और तुम्हारे लिए इतनी निम्न हैं। तुम महसूस करोगे कि कोई भौतिक पदार्थ फिर कभी तुम्हें आकर्षित करने में सक्षम नहीं होगा, अपने लिए कोई कीमत चुकाने हेतु फुसला नहीं सकेगा। परमेश्वर की विनम्रता में तुम उसकी महानता और उसकी सर्वोच्चता देखोगे।
2 और भी अधिक, परमेश्वर के कुछ कर्मों में, जिन्हें तुम पहले काफी छोटा समझते थे, तुम उसकी असीमित बुद्धि और उसकी सहनशीलता देखोगे, साथ ही उसका धैर्य, सहनशीलता और तुम्हारे प्रति दिखाई समझ देखोगे। यह तुममें उसके लिए श्रद्धा उत्पन्न करेगा। उस दिन तुम्हें लगेगा कि मानवजाति कितने गंदे संसार में रह रही है, और वह चाहे तुम्हारे बगल के लोग हों या तुम्हारे आसपास घटित होने वाली घटनाएँ, यहाँ तक कि जिनसे तुम प्रेम करते हो, और तुम्हारे प्रति उनका प्रेम और उनकी तथाकथित सुरक्षा या तुम्हारे लिए उनकी चिंता हो, सभी उल्लेखनीय तक नहीं हैं—केवल परमेश्वर ही तुम्हारा प्रियतम है, और तुम्हारा सबसे मूल्यवान खजाना है। परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है, और उसका सार बहुत पवित्र है—परमेश्वर में कोई धोखा नहीं है, कोई बुराई नहीं है, कोई ईर्ष्या नहीं है, और कोई कलह नहीं है, बल्कि केवल धार्मिकता और प्रामाणिकता है; और परमेश्वर के पास जो है और वह जो है, उसकी लालसा मनुष्यों को करनी चाहिए, और मनुष्यों को उसका अनुसरण करना चाहिए और उसकी आकांक्षा करनी चाहिए।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
यह भजन सुनकर मेरा दिल भर आया। लोगों के बीच का प्रेम आपसी लेन-देन की बुनियाद पर टिका होता है। जब मैं अपने पति का साथ देती थी और उसका और बच्चों का ख्याल रखती थी, तो वह मेरे साथ अच्छा व्यवहार करता था; जब मैं पूरे समय उसका ख्याल नहीं रख सकी, तो वह गुस्सा होने लगा और तलाक चाहने लगा क्योंकि उसे मुझसे कोई फायदा नहीं मिल रहा था। उन सालों में एक बार मैंने अपनी शादी की खुशी बनाए रखने के लिए अपना कर्तव्य एक तरफ रख दिया था और परमेश्वर को धोखा दिया था। मगर परमेश्वर मेरे कार्य-कलापों के अनुसार मेरे साथ पेश नहीं आया। परमेश्वर ने फिर भी मुझ पर दया और अनुग्रह दिखाया और मुझे प्रबुद्ध करने के लिए अपने वचनों का इस्तेमाल किया ताकि मैं शैतान की चालों को देख सकूँ। उसने मुझे शादी के प्रति मेरे गलत नजरियों से बाहर निकाला ताकि मुझे शैतान द्वारा और नुकसान न पहुँचाया जाए। मुझे एहसास हुआ कि केवल परमेश्वर ही लोगों से सबसे ज्यादा प्यार करता है और केवल परमेश्वर का प्रेम ही सच्चा और पवित्र है।
बाद में जब मैं अपने पति को तलाक देने के लिए तैयार हो गई, तो मेरा पति अब ऐसा नहीं चाहता था। उसने यहाँ तक कहा कि अगर मैं घर वापस आ जाती हूँ, वह मेरे साथ पहले जैसा अच्छा व्यवहार करेगा और मुझे अब परमेश्वर में विश्वास करने से रोकने की कोशिश नहीं करेगा। मैंने सोचा कि कैसे मेरे पति ने मुझे परमेश्वर में विश्वास छोड़ने पर मजबूर करने के लिए धमकियों, हिंसा और गालियों का इस्तेमाल किया था। जब उसने देखा कि वे चालें काम नहीं आईं, तो उसने मुझे बहकाने के लिए मीठी-मीठी बातों का इस्तेमाल किया। चाहे उसकी चालें कैसे भी बदल जाएँ, उसका सार अभी भी एक दानव का है। परमेश्वर का दुश्मन होने का उसका सार कभी नहीं बदलेगा। उसने एक दशक तक मुझे परमेश्वर में विश्वास करने से रोकने की कोशिश की थी। अगर वह बदलने के काबिल होता, तो वह बहुत पहले ही बदल गया होता। अगर मैंने फिर से उसकी बातों पर विश्वास किया, तो मैं बस उसके जाल में फँस जाऊँगी और धोखा खा जाऊँगी और मैं परमेश्वर द्वारा बचाए जाने का अपना मौका खो दूँगी। इसलिए मैंने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। मैंने सोचा, “भले ही हमारा तलाक न हो, मैं उसे अपने कर्तव्यों के पालन में बाधा नहीं डालने दे सकती।” उसके बाद मैं हमेशा कलीसिया में अपने कर्तव्य निभाती रही और मेरा दिल शांत हो गया। मैंने इस बारे में सोचना बंद कर दिया कि अपनी शादी और परिवार को कैसे बनाए रखा जाए और आखिरकार मैं अपने पति की बाधाओं और शादी के बंधनों से आजाद हो सकी। अब मैं परमेश्वर में विश्वास करने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए आजाद हूँ। परमेश्वर के उद्धार के लिए उसका धन्यवाद!