91. मैं अपने अपराध के कारण अब गलतफहमी में नहीं रहता

सू तियान, चीन

अगस्त 2018 में मैं बाईस साल का था। चूँकि सीसीपी हमेशा से ईसाइयों को सताती और गिरफ्तार करती रही थी, मैंने परमेश्वर में विश्वास करने के लिए एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश में जाने की योजना बनाई। लेकिन अप्रत्याशित रूप से मुझे हवाई अड्डे पर गिरफ्तार कर लिया गया। कलीसिया की जानकारी उगलवाने के लिए पुलिस मुझे हर दिन सुबह 6 बजे से रात 12 बजे तक अपने पैर एक साथ जोड़कर खड़ा रखती थी और ऐसा एक बार में छह या सात दिनों तक चलता रहा। मैं इतनी देर तक खड़ा रहता था कि मुझे चक्कर आने लगते थे; मेरे पैर दुखते थे और सुन्न हो जाते थे और मेरी साँसें तेज हो जाती थीं। पुलिस मुझे धमकी भी देती थी, “अगर तुम नहीं बोले, तो हम तुम्हें लटकाकर ‘बर्फ और आग की दोहरी लपटों’ का मजा चखाएँगे। हम पहले तुम्हें एक उच्च-तापमान वाली मशीन से जलाएँगे और फिर तुम्हारे अंदर पानी भर देंगे, बार-बार यही प्रक्रिया दोहराएँगे। तब तुम चाहकर भी कुछ बोल नहीं पाओगे।” उन भाई-बहनों के बारे में सोचकर, जिन्हें पुलिस ने प्रताड़ित किया था, मेरे दिल में डर की एक लहर दौड़ गई, “अगर वे मुझे प्रताड़ित करेंगे तो क्या मैं यह सह पाऊँगा?” मैंने चुपचाप अपने दिल में प्रार्थना की, परमेश्वर से मुझे शक्ति और आस्था देने के लिए कहा। यह देखकर कि मैं कुछ नहीं कह रहा था, पुलिस ने मेरा सिर नीचे दबाया और एक जलती हुई सिगरेट मेरे नथुनों के पास रख दी। गाढ़ा धुआँ और गर्मी मेरे नथुनों में घुस गईं, मेरा इतना दम घुटने लगा कि मैं साँस नहीं ले पा रहा था। मुझे लगा जैसे मेरा दम घुट रहा है। उन्होंने मेरे नथुनों के नीचे की त्वचा भी जला दी और मुझे चुभन वाले दर्द की लहरें महसूस हुईं। फिर उन्होंने मेरी बाँह ऊपर खींची, एक लाइटर जलाया और उसकी लौ से मेरी बाँह को जलाया। मैंने सहज बोध से अपना हाथ हटाने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उसे कसकर पकड़ लिया और मुझे हिलने नहीं दिया। मेरी बाँहें दर्जनों सेकंड तक जलाई गईं। दर्द असहनीय था। मेरी बाँहों के नीचे की त्वचा जलकर काली और कच्ची हो गई; बाद में वह पक गई, जिससे अंडे जितने बड़े निशान पड़ गए। फिर पुलिस ने दुष्टता भरी मुस्कान और नजरों से देखा और मैं यह सोचकर गुस्से, आक्रोश और डर से भर गया, “ये दानव कुछ भी करने में सक्षम हैं। कौन जाने वे आगे मुझे कैसे प्रताड़ित करेंगे?” मैं बहुत कमजोर था और इस नारकीय जगह से जल्द से जल्द निकलना चाहता था। लेकिन मैं जानता था कि मैं अपनी दुर्दशा भरी जिंदगी को घसीटने के लिए यहूदा बनकर अपने भाई-बहनों को धोखा नहीं दे सकता। इसलिए मैंने अपने दिल में परमेश्वर से प्रार्थना की, यह प्रतिज्ञा करते हुए कि मैं मर भी जाऊँ, तो भी मैं परमेश्वर के घर के हितों के साथ विश्वासघात नहीं करूँगा और मैंने कभी यहूदा न बनने की कसम खाई। कुछ दिन बाद पुलिस मेरे परिवार को तीन कथनों पर मुझसे हस्ताक्षर करवाने के लिए ले आई, यह कहते हुए कि अगर मैं ऐसा करता हूँ तो वे मुझे जाने देंगे। मेरे पिता ने बड़े लाल अजगर से गुमराह होकर कहा कि अगर मैंने हस्ताक्षर नहीं किए तो वे मुझसे रिश्ता तोड़ लेंगे। मैं जानता था कि यह शैतान की चाल है और मैंने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। तब पुलिस ने मुझे धमकी देते हुए कहा, “हम तुम्हें आखिरी रात दे रहे हैं, लेकिन अगर कल भी तुमने हस्ताक्षर नहीं किए, तो हम तुम्हें कहीं और ले जाएँगे और तुमसे अच्छी तरह निपटेंगे!” यह सुनकर मैं डर गया। “वे कुछ भी करने में सक्षम हैं और खास तौर पर जो लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उनके प्रति वे और भी क्रूर हैं। अगर मैं हस्ताक्षर करने से इनकार करता रहा, तो कौन जाने वे मुझे कैसे प्रताड़ित करेंगे?” मौत से भी बदतर पीड़ा का विचार भयानक था। मैंने सोचा, “क्या होगा अगर मैं यातना सहन नहीं कर पाया और यहूदा बन गया? तब मैं परमेश्वर के स्वभाव को नाराज करूँगा और मेरे पास फिर कभी उद्धार पाने का मौका नहीं होगा। अगर मैं अपनी बुद्धि से तीन कथनों पर हस्ताक्षर कर दूँ, लेकिन मेरा दिल परमेश्वर को धोखा न दे, तो क्या परमेश्वर मुझे एक और मौका देगा?” अंत में, मैं अपनी देह की कमजोरी पर काबू नहीं पा सका और मैंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर कर दिए। तीन कथनों पर हस्ताक्षर करने के बाद पुलिस ने मुझे घर जाने दिया।

घर लौटकर मैं बेचैन महसूस करने लगा। हालाँकि मैंने बुद्धि का इस्तेमाल करने का सोचा था, फिर भी मैंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर कर दिए और परमेश्वर की नजरों में यह विश्वासघात की निशानी थी। क्या परमेश्वर अब भी मुझे बचाएगा? बाद में मेरे पिता मुझे काम करने के लिए बाहर ले जाना चाहते थे और उन्होंने मुझे समझाने के लिए रिश्तेदारों और दोस्तों को भी बुला लिया। मैंने मन ही मन सोचा, “मैं जा नहीं सकता। अगर मैं चला गया, तो मेरे भाई-बहन मुझे ढूँढ़ नहीं पाएँगे। तब मेरे पास परमेश्वर के घर लौटने का मौका कभी नहीं होगा।” मुझे एक भटके हुए पंछी जैसा महसूस हुआ, जो अकेले एक अनजान जवाब का इंतजार कर रहा था। पंद्रह दिन बाद मेरे भाई-बहन मुझे मिल गए और उन्होंने मेरे साथ अपने कर्तव्य निभाने के बारे में संगति की। यह देखकर कि मैं अब भी परमेश्वर के घर लौट सकता हूँ और अपने कर्तव्य निभा सकता हूँ, मैं इतना भावुक हो गया कि लगभग रो पड़ा और जल्दी से सहमति में सिर हिला दिया। उसके बाद कलीसिया ने मुझे जो भी कर्तव्य सौंपा, मैंने उसे पूरा करने की पूरी कोशिश की। लेकिन मैं कभी-कभी भाई-बहनों को तीन कथनों पर हस्ताक्षर करने के मामले पर चर्चा करते सुनता था। वे कहते, “हम किसी भी हालत में तीन कथनों पर हस्ताक्षर नहीं कर सकते। तीन कथनों पर हस्ताक्षर करना परमेश्वर के साथ विश्वासघात है और यह हम पर पशु की छाप लगा देता है।” हर बार जब मैं ये शब्द सुनता, तो मेरा दिल दुखने लगता, खासकर जब मैं परमेश्वर के ये वचन पढ़ता था : “मैं उन लोगों पर अब और दया नहीं करूँगा, जिन्होंने क्लेश के समय में मेरे प्रति रत्ती भर भी निष्ठा नहीं दिखाई, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी दूर तक ही है। इसके अतिरिक्त, मुझे ऐसा कोई इंसान पसंद नहीं, जिसने कभी मेरे साथ विश्वासघात किया हो, और ऐसे लोगों के साथ जुड़ना तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं, जो अपने मित्रों के हितों को बेच देते हैं। चाहे जो भी व्यक्ति हो, मेरा यही स्वभाव है। मुझे तुम लोगों को बता देना चाहिए : जो कोई मेरा दिल तोड़ता है, उसे दूसरी बार मुझसे क्षमा प्राप्त नहीं होगी, और जो कोई मेरे प्रति वफादार रहा है, वह सदैव मेरे हृदय में बना रहेगा(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो)। मैंने देखा कि परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक, प्रतापी है और अपमान सहन नहीं करता और जो कोई भी उसे धोखा देता है और उसके दिल को ठेस पहुँचाता है, उस पर परमेश्वर फिर कभी दया नहीं दिखाएगा। मैंने मन ही मन सोचा, “मैंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर किए हैं और परमेश्वर को धोखा दिया है। क्या मैं पहले ही परमेश्वर द्वारा हटा दिया गया हूँ? क्या इसका मतलब यह है कि अगर मैं अंत तक विश्वास भी करूँ, तो भी मैं कभी परमेश्वर द्वारा बचाया नहीं जा सकता?” खास तौर पर परमेश्वर के घर के अनुभवजन्य गवाही के वीडियो में मैंने उन भाई-बहनों को देखा जो पकड़े जाने के बाद हर तरह की यातनाओं के सामने अपनी गवाही में अडिग रहे और उन्होंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर करने से दृढ़ता से इनकार कर दिया। लेकिन मैंने यातना से बचने के लिए तीन कथनों पर हस्ताक्षर कर दिए। मैं न केवल परमेश्वर के लिए गवाही देने में असफल रहा, बल्कि शर्मिंदगी का एक निशान छोड़ दिया, जिससे शैतान को मेरा मजाक उड़ाने का मौका मिल गया। मुझे लगा कि परमेश्वर मुझसे सच में बहुत निराश हुआ होगा। मैंने जितना इस बारे में सोचा, उतना ही नकारात्मक होता गया; मेरा दिल ऐसे दुखने लगा मानो चाकू से छेदा जा रहा हो और मैं कामना करने लगा कि काश मैंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर न किए होते। लेकिन जो हो गया सो हो गया, जैसे गिरा हुआ पानी वापस नहीं उठाया जा सकता। बाद में परमेश्वर के घर ने उन लोगों की जाँच शुरू कर दी जिन्होंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर किए थे; मैं भी जाँच के दायरे में था। मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “क्या ‘तीन कथन’ पर हस्ताक्षर करने वाले लोग वही नहीं हैं जिन्होंने बम विस्फोट करके अपने चीथड़े उड़ा दिए?(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (5))। परमेश्वर उन लोगों से घृणा करता है जो तीन कथनों पर हस्ताक्षर करते हैं और उसे धोखा देते हैं। चूँकि मैंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर किए थे, तो मुझे परमेश्वर ने अवश्य ही निंदित और हटा दिया होगा। क्या अब मुझे बाहर निकाल दिया जाएगा? बाद में हालाँकि कलीसिया ने मुझे बाहर नहीं निकाला, फिर भी मैं नकारात्मकता में जीता रहा। कई बार जब मैं अपने सहयोगी भाई-बहनों को एक-दूसरे से अनुभवजन्य लेख लिखने या जीवन प्रवेश के बारे में बात करते हुए देखता, तो मुझे लगता कि मैं उनसे अलग हूँ, कि वे सब भाई-बहन हैं और उन सभी के पास सत्य का अनुसरण करने और उद्धार पाने का अवसर है। लेकिन मैं अलग था। मैंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया था और परमेश्वर को मुझसे पूरी तरह से घृणा हो गई होगी। मुझे लगा कि मुझ जैसे लोगों की सत्य का अनुसरण करने की कोई पात्रता नहीं है और यहाँ तक कि अगर मैं अंत तक विश्वास करता, तो भी यह सब बेकार होता और शायद मैं बस एक श्रमिक होता और उद्धार से मेरा कोई लेना-देना नहीं होता। मैं एक नकारात्मक अवस्था में जी रहा था और हर दिन मैं बस यंत्रवत अपने कर्तव्य पूरे करता था और मेरा दिल अकथनीय दर्द से भरा रहता था। उस समय मैं अक्सर परमेश्वर के वचनों का एक भजन सुनता था, “अगर तुम एक सेवाकर्मी हो”। परमेश्वर हमसे पूछता है : “यदि तुम सचमुच में सेवा करने वाले हो, तो क्या तुम अनमनेपन या नकारात्मक तत्वों के बिना निष्ठापूर्वक मुझे सेवा प्रदान कर सकते हो? यदि तुम्हें पता चले कि मैंने कभी भी तुम्हारी सराहना नहीं की है, तो क्या तब भी तुम जीवन भर टिके रह कर मुझे सेवा प्रदान कर पाओगे?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (2))। हर बार जब मैं यह गीत सुनता, तो मैं बहुत भावुक हो जाता था। मैं एक सृजित प्राणी हूँ और परमेश्वर में विश्वास करना और अपने कर्तव्य निभाना बिल्कुल स्वाभाविक और उचित है और अगर परमेश्वर मुझे नहीं भी चाहता, तो भी मैं अंत तक उस पर विश्वास करता रहूँगा। जब तक मेरे पास अपने कर्तव्य निभाने के लिए एक और दिन था, मुझे अपने कर्तव्य पूरे करने के लिए अपनी पूरी कोशिश करनी थी!

एक दिन मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश मिला जो सीधे मेरी दशा को संबोधित करता था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “लोगों के हताशा में डूबने का एक और कारण यह भी है कि वयस्क होने या सयाने होने से पहले ही लोगों के साथ कुछ चीजें हो जाती हैं, यानी वे कोई अपराध करते हैं, या कुछ बेवकूफी-भरे, मूर्खतापूर्ण और अज्ञानतापूर्ण काम करते हैं। इन अपराधों, बेवकूफी-भरे और अज्ञानतापूर्ण करतूतों के कारण वे हताशा में डूब जाते हैं। इस प्रकार की हताशा आत्म-निंदा है और यह इस बात की परिभाषा भी है कि वे स्वयं को किस प्रकार का व्यक्ति समझते हैं। ... कुछ लोग कभी-कभार अपनी हताशा की भावना को जाने दे सकते हैं, उसे पीछे छोड़ सकते हैं। अपना कर्तव्य निभाने, दायित्व और जिम्मेदारियाँ पूरी करने में वे भरसक अपनी पूरी ईमानदारी और शक्ति लगा सकते हैं, सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करने में तन-मन लगा सकते हैं, और वे परमेश्वर के वचनों में अपने पूरे प्रयास उंडेल देते हैं। लेकिन जैसे ही कोई विशेष स्थिति या परिस्थिति सामने आती है, हताशा की भावना उन पर फिर एक बार हावी हो जाती है और उन्हें दिल की गहराई से दोषी महसूस करवाती है। वे मन-ही-मन सोचते हैं, ‘तुमने पहले वह करतूत की थी, तुम उस किस्म के इंसान थे। क्या तुम उद्धार पा सकते हो? सत्य पर अमल करने का क्या कोई तुक है? तुम्हारी करतूत के बारे में परमेश्वर क्या सोचता है? क्या परमेश्वर तुम्हारी करतूत के लिए तुम्हें माफ कर देगा? क्या अब इस तरह कीमत चुकाने से उस अपराध की भरपाई हो सकेगी?’ वे अक्सर खुद को फटकारते हैं, भीतर गहराई से दोषी महसूस करते हैं, और हमेशा शक्की बन कर खुद से कई सवाल पूछते हैं। हताशा की इस भावना को वे कभी पीछे नहीं छोड़ पाते, त्याग नहीं पाते और अपनी शर्मनाक करतूतों के लिए वे हमेशा बेचैनी महसूस करते रहते हैं। तो, अनेक वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद भी, ऐसा लगता है मानो उन्होंने कभी परमेश्वर के वचन सुने ही नहीं या उन्हें समझा ही नहीं। मानो वे नहीं जानते कि क्या उद्धार-प्राप्ति का उनके साथ कोई लेना-देना है, क्या उन्हें दोषमुक्त कर छुड़ाया जा सकता है, या क्या वे परमेश्वर का न्याय और ताड़ना और उसका उद्धार प्राप्त करने योग्य हैं। उन्हें इन सब चीजों का कोई अंदाजा नहीं है। कोई जवाब न मिलने और कोई सही फैसला न मिलने के कारण, वे निरंतर भीतर गहराई से हताश महसूस करते हैं। अपने अंतरतम में वे बार-बार अपनी करतूतें याद करते रहते हैं, वे उसे अपने दिमाग में बार-बार चलाते रहते हैं, शुरुआत से अंत तक याद करते हैं कि यह सब कैसे शुरू हुआ और कैसे खत्म। वे इसे कैसे भी याद करते हों, हमेशा पापी महसूस करते हैं और इसलिए वर्षों तक इस मामले को लेकर निरंतर हताश महसूस करते हैं। अपना कर्तव्य निभाते समय भी, किसी कार्य के प्रभारी होने पर भी, उन्हें लगता है कि उनके लिए बचाए जाने की कोई उम्मीद नहीं रही। इसलिए, वे कभी भी सत्य का अनुसरण करने के मामले का सीधे तौर पर सामना नहीं करते, और नहीं मानते कि यह सबसे सही और अहम चीज है। वे मानते हैं कि पहले जो गलती उन्होंने की या जो करतूतें उन्होंने कीं, उन्हें ज्यादातर लोग नीची नजर से देखते हैं, या शायद लोग उनकी निंदा कर उनसे घृणा करें, या परमेश्वर भी उनकी निंदा करे। परमेश्वर का कार्य जिस भी चरण में हो, या उसने जितने भी कथनों का उच्चारण किया हो, वे सत्य का अनुसरण करने के मामले का कभी भी सही ढंग से सामना नहीं करते। ऐसा क्यों है? उनमें अपनी हताशा को पीछे छोड़ने का हौसला नहीं होता। ऐसी चीज का अनुभव करके इस किस्म का इंसान यही अंतिम निष्कर्ष निकालता है, और चूँकि वह सही निष्कर्ष नहीं निकालता, इसलिए वह अपनी हताशा को पीछे छोड़ने में असमर्थ होता है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (2))। परमेश्वर ने मेरी सटीक दशा का वर्णन किया। जब से मैंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर किए थे, यह बात मेरे दिल में एक काँटे की तरह चुभ रही थी और मैं अक्सर दुखी और संतप्त महसूस करता था। एक से ज्यादा बार मैंने खुद से पूछा, “चूँकि मैंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर किए हैं और मुझ पर पशु की छाप लग गई है, तो क्या परमेश्वर मुझ जैसे किसी को अब भी बचाएगा? परमेश्वर ऐसे लोगों को चाहता है जो उसके लिए गवाही दे सकें, लेकिन मैंने न केवल परमेश्वर के लिए गवाही नहीं दी, बल्कि मैंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर करके परमेश्वर को धोखा भी दिया और एक शर्मिंदगी का प्रतीक बन गया। क्या परमेश्वर ने मुझे पहले ही हटा दिया है?” जब भी मैं इस तरह सोचता, तो मुझे लगता कि मेरा दिल चाकू से चीरा जा रहा है। मुझे यह भी नहीं पता था कि अब अपनी प्रार्थनाओं में क्या कहूँ। हालाँकि कलीसिया ने मुझे अब भी अपने कर्तव्य निभाने का अवसर दिया, मैं बहुत आभारी था और उन्हें अपनी पूरी क्षमता से पूरा करना चाहता था, मेरी बेचैनी दूर ही नहीं हो रही थी। हर बार जब मैं भाई-बहनों को उन लोगों के बारे में चर्चा करते सुनता जिन्होंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर किए थे, तो मेरे दिल में एक हल्का दर्द होता था। गिरफ्तार होने के बाद अपनी गवाही में अडिग रहने वाले भाई-बहनों के अनुभवों को देखकर मेरे दिल में और भी अधिक पीड़ा और दर्द होता था। मुझे लगा कि इन लोगों को परमेश्वर ने स्वीकृति दी है, लेकिन मैंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर करके परमेश्वर को धोखा दिया था, जिससे मैं उसके उद्धार के अयोग्य हो गया था। चूँकि मैं तीन कथनों पर हस्ताक्षर करने की छाया से बाहर नहीं निकल पा रहा था, मैं अक्सर एक नकारात्मक अवस्था में जीता था और मैं सत्य का अनुसरण करने या जीवन प्रवेश पाने के लिए कोई उत्साह नहीं जुटा पाता था। मुझे एक आत्मारहित खोखले इंसान जैसा महसूस होता था, जो बस हर दिन काम निपटाना जानता था। ऐसा लगता था कि केवल अच्छी तरह से काम करके ही मैं अपने अपराधों का प्रायश्चित कर सकता था और तभी मेरे दिल को थोड़ी तसल्ली मिलती। परमेश्वर के वचनों पर मनन करते हुए मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर ने मुझसे सत्य का अनुसरण करने का अवसर नहीं छीना था। उसने तो मुझे एक अगुआ का कर्तव्य निभाने का प्रशिक्षण लेने की भी अनुमति दी थी। अगर परमेश्वर ने मुझे हटा दिया होता, तो मुझे अपना कर्तव्य निभाने का मौका अब भी कैसे मिलता? उस स्थिति में तो मैं परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति और सिंचन का आनंद भी नहीं ले पाता। लेकिन मैं लगातार परमेश्वर को गलत समझता रहा और नकारात्मकता में जीकर इतना समय बर्बाद करता रहा! अगर मैं इसी तरह नकारात्मक बना रहता, तो यह परमेश्वर द्वारा मुझे हटाना नहीं होता, बल्कि सत्य का अनुसरण न करके मैं खुद को बर्बाद कर रहा होता। मुझे इस नकारात्मक अवस्था से बाहर निकलने के लिए सावधानी से आत्म-चिंतन करना था और सत्य को खोजना था।

बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश देखा जिसने मुझे समस्या की जड़ खोजने में मदद की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “लोग आशीष पाने, पुरस्कृत होने, ताज पहनने के लिए परमेश्वर में विश्वास रखते हैं। क्या यह सबके दिलों में नहीं है? यह एक तथ्य है कि यह सबके दिलों में है। हालाँकि लोग अक्सर इसके बारे में बात नहीं करते, यहाँ तक कि वे आशीष प्राप्त करने का अपना मकसद और इच्छा छिपाते हैं, फिर भी यह इच्छा और मकसद लोगों के दिलों की गहराई में हमेशा अडिग रहा है। लोग चाहे कितना भी आध्यात्मिक सिद्धांत समझते हों, उनके पास जो भी अनुभवजन्य ज्ञान हो, वे जो भी कर्तव्य निभा सकते हों, कितना भी कष्ट सहते हों, या कितनी भी कीमत चुकाते हों, वे अपने दिलों में गहरी छिपी आशीष पाने की प्रेरणा कभी नहीं छोड़ते, और हमेशा चुपचाप उसके लिए कड़ी मेहनत करते हैं। क्या यह लोगों के दिल के अंदर सबसे गहरी दबी बात नहीं है? आशीष प्राप्त करने की इस प्रेरणा के बिना तुम लोग कैसा महसूस करोगे? तुम किस रवैये के साथ अपना कर्तव्य निभाओगे और परमेश्वर का अनुसरण करोगे? अगर लोगों के दिलों में छिपी आशीष प्राप्त करने की यह प्रेरणा दूर कर दी जाए तो ऐसे लोगों का क्या होगा? संभव है कि बहुत-से लोग नकारात्मक हो जाएँगे, जबकि कुछ अपने कर्तव्यों के प्रति प्रेरणाहीन हो जाएँगे। वे परमेश्वर में अपने विश्वास में रुचि खो देंगे, मानो उनकी आत्मा गायब हो गई हो। वे ऐसे प्रतीत होंगे, मानो उनका हृदय छीन लिया गया हो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि आशीष पाने की प्रेरणा ऐसी चीज है जो लोगों के दिल में गहरी छिपी है। शायद अपना कर्तव्य निभाते हुए या कलीसिया का जीवन जीते हुए उन्हें लगता है कि वे अपने परिवार त्यागने और खुद को खुशी-खुशी परमेश्वर के लिए खपाने में सक्षम हैं, और अब वे आशीष प्राप्त करने की अपनी प्रेरणा को जानकर इसे दरकिनार भी कर चुके हैं, और अब उससे नियंत्रित या विवश नहीं होते। फिर वे सोचते हैं कि उनमें अब आशीष पाने की प्रेरणा नहीं रही, लेकिन परमेश्वर ऐसा नहीं सोचता है। लोग मामलों को केवल सतही तौर पर देखते हैं। परीक्षणों के बिना, वे अपने बारे में अच्छा महसूस करते हैं। अगर वे कलीसिया नहीं छोड़ते या परमेश्वर के नाम को नहीं नकारते, और परमेश्वर के लिए खपने में लगे रहते हैं, तो वे मानते हैं कि वे बदल गए हैं। उन्हें लगता है कि वे अब अपने कर्तव्य-पालन में व्यक्तिगत उत्साह या क्षणिक आवेगों से प्रेरित नहीं हैं। इसके बजाय, वे मानते हैं कि वे सत्य का अनुसरण कर सकते हैं, और अपना कर्तव्य निभाते हुए लगातार सत्य की तलाश और अभ्यास कर सकते हैं, ताकि उनके भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध हो सकें और वे कुछ वास्तविक बदलाव हासिल कर सकें। लेकिन जब सीधे लोगों की मंजिल और परिणाम से संबंधित कोई बात हो जाती है तो वे किस प्रकार व्यवहार करते हैं? सच्चाई पूरी तरह से प्रकट हो जाती है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, जीवन संवृद्धि के छह संकेतक)। परमेश्वर ने मेरी असली दशा को उजागर कर दिया। मैं इतना नकारात्मक इसलिए था क्योंकि आशीष पाने की मेरी इच्छा चकनाचूर हो गई थी। परमेश्वर को पाने के बाद मैं उसके लिए खुद को खपाने के लिए उत्साहित था और हाई स्कूल के ठीक बाद पूरे समय अपना कर्तव्य निभाने लगा, यह सोचकर कि अगर मैं इसी तरह अनुसरण करता रहा, तो मैं निश्चित रूप से राज्य में प्रवेश करूँगा और स्वर्ग के राज्य की आशीषों का आनंद लूँगा। जब मैं पकड़ा गया और यातना के डर से तीन कथनों पर हस्ताक्षर कर दिए, तो मुझे लगा कि अब मेरे पास आशीषें पाने की कोई उम्मीद नहीं है और परमेश्वर के प्रति मेरे सभी संदेह और गलतफहमियाँ सतह पर आ गईं। मैं सोचने लगा, “तीन कथनों पर हस्ताक्षर करने के बाद क्या परमेश्वर अब भी मुझे माफ कर सकता है? अगर परमेश्वर मुझे नहीं बचाता है, तो क्या मेरे पास अब भी आशीषों की उम्मीद है? अगर आशीषों की कोई उम्मीद नहीं है, तो अंत तक विश्वास करने का क्या मतलब है?” मैं अंदर से सचमुच बहुत नकारात्मक हो गया। खास तौर पर बाद में जब अगुआओं ने मेरे तीन कथनों पर हस्ताक्षर करने के मामले की जाँच की, तो मुझे संदेह होने लगा कि मुझे किसी भी समय कलीसिया से बाहर निकाला जा सकता है और मुझे लगा कि भले ही मैं अब भी परमेश्वर के वचन का पोषण पाने और अपने कर्तव्य निभाने में सक्षम था, मैं हटा दिए जाने की नियति से नहीं बच सकता। मुझे लगा कि मेरे पास आशीषें पाने की कोई उम्मीद नहीं है, और मेरा दिल ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी भारी पत्थर से कुचला जा रहा हो। मुझे लगा जैसे मैंने अपनी आत्मा खो दी है। मैं अक्सर नकारात्मकता और दर्द में घिरा रहता था और मैं सत्य का अनुसरण करने या जीवन प्रवेश पाने के लिए हिम्मत नहीं जुटा पाता था। मैंने देखा कि आशीष पाने की मेरी इच्छा बहुत प्रबल थी। इतने सालों में मैंने जो भी खपाया था और त्याग किए थे, वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए नहीं बल्कि उसके साथ सौदा करने की कोशिश के लिए थे। जब कुछ हासिल करने को होता, तो मैं अपने कर्तव्यों में बहुत प्रेरित रहता था, लेकिन जब मुझे आशीषें नहीं मिल पाती थीं, तो मैं बहुत ज्यादा नकारात्मक हो जाता था। मेरे और छद्म-विश्वासियों के अनुसरण में क्या अंतर था? मैं बस एक सृजित प्राणी हूँ, धूल के भी लायक नहीं, लेकिन मैं परमेश्वर के घर आने, अपने कर्तव्य निभाने और परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सभी सत्यों का आनंद लेने में सक्षम हूँ। मैंने परमेश्वर से बहुत कुछ पाया है। लेकिन परमेश्वर ने मुझे जो कुछ भी दिया था, उसके लिए मैं बिल्कुल भी आभारी नहीं था। मैंने तो बेशर्मी से परमेश्वर से स्वर्ग के राज्य की आशीषें भी माँगीं, अगर मुझे आशीषें नहीं मिल पातीं, तो मैं नकारात्मक हो जाता और प्रतिरोध करता। मुझमें सचमुच कोई मानवता नहीं थी! यह एहसास होने पर मुझे गहरा पछतावा हुआ, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, आशीषों के अपने इरादे छोड़ने और पश्चात्ताप करने को तैयार हुआ।

उसके बाद मैंने परमेश्वर के वचनों के दो और अंश पढ़े और उसके इरादे की एक स्पष्ट समझ प्राप्त की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “ज्यादातर लोगों के अपने अपराध और दाग हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों ने परमेश्वर का विरोध किया है और ईशनिंदा की बातें कही हैं; कुछ लोगों ने परमेश्वर का आदेश नकारकर अपना कर्तव्य नहीं निभाया है, और परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिए गए हैं; कुछ लोगों ने प्रलोभन सामने आने पर परमेश्वर को धोखा दिया है; कुछ लोगों ने गिरफ्तार होने पर ‘तीन वक्तव्यों’ पर हस्ताक्षर करके परमेश्वर को धोखा दिया है; कुछ ने भेंटें चुरा ली हैं; कुछ ने भेंटें बरबाद कर दी हैं; कुछ ने अक्सर कलीसियाई जीवन को बाधित किया है और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नुकसान पहुँचाया है; कुछ ने गुट बनाए हैं और दूसरों को सताया है, जिससे कलीसिया अस्त-व्यस्त हो गई है; कुछ ने अक्सर धारणाएँ और मृत्यु फैलाकर भाई-बहनों को नुकसान पहुँचाया है; और कुछ व्यभिचार और भोग-विलास में लिप्त रहे हैं और उन लोगों का भयानक प्रभाव पड़ा है। जाहिर है, हर किसी के अपने अपराध और दाग हैं। लेकिन कुछ लोग सत्य स्वीकार कर पश्चात्ताप कर पाते हैं, जबकि दूसरे नहीं कर पाते और पश्चात्ताप करने के बजाय मरना पसंद करते हैं। इसलिए लोगों के साथ उनके प्रकृति सार और उनके निरंतर व्यवहार के अनुसार बर्ताव किया जाना चाहिए। जो पश्चात्ताप कर सकते हैं, वे वो लोग होते हैं जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं; लेकिन जो वास्तव में पश्चात्ताप न करने वाले होते हैं, जिन्हें हटाकर निकाल दिया जाना चाहिए, उन्हें हटाकर निकाल दिया जाएगा। ... प्रत्येक व्यक्ति के साथ परमेश्वर का व्यवहार उस व्यक्ति के हालात की वास्तविक परिस्थितियों और उस समय की पृष्ठभूमि के साथ-साथ उस व्यक्ति के क्रियाकलापों और व्यवहार और उसके प्रकृति-सार पर आधारित होता है। परमेश्वर कभी किसी के साथ अन्याय नहीं करेगा। यह परमेश्वर की धार्मिकता का एक पक्ष है। उदाहरण के लिए, हव्वा को साँप ने भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खाने के लिए बहकाया, लेकिन यहोवा ने उसे यह कहकर धिक्कारा नहीं, ‘मैंने तुम्हें इसे खाने से मना किया था, फिर भी तुमने ऐसा क्यों किया? तुममें विवेक होना चाहिए था; तुम्हें यह पता होना चाहिए था कि साँप ने केवल तुम्हें बहकाने के लिए वैसा कहा था।’ यहोवा ने हव्वा को इस तरह फटकारा नहीं। चूँकि मनुष्य परमेश्वर की रचना हैं, इसलिए वह जानता है कि उनकी सहज प्रवृत्तियाँ क्या हैं, वे सहज प्रवृत्तियाँ क्या करने में सक्षम हैं, किस हद तक लोग स्वयं को नियंत्रित कर सकते हैं, और लोग कहाँ तक जा सकते हैं। यह सब परमेश्वर बहुत स्पष्ट रूप से जानता है। मनुष्य के साथ परमेश्वर का व्यवहार उतना सरल नहीं है, जितना लोग कल्पना करते हैं। किसी व्यक्ति के प्रति परमेश्वर का रवैया—वह चाहे उसे पसंद करे, उसके प्रति विमुख हो या उससे घृणा करे—मुख्य रूप से सत्य के प्रति उस व्यक्ति के रवैये पर आधारित होता है। कोई व्यक्ति किसी दिए गए संदर्भ में चाहे जो भी कहता है, परमेश्वर हर चीज की पड़ताल करता है और उसे समझता है, क्योंकि परमेश्वर मनुष्य के हृदय और सार की पड़ताल करता है। लोग हमेशा सोचते रहते हैं, ‘परमेश्वर में सिर्फ उसकी दिव्यता है। वह धार्मिक है और मनुष्य का कोई अपराध सहन नहीं करता। वह मनुष्य की कठिनाइयों पर विचार नहीं करता या खुद को लोगों के स्थान पर रखकर नहीं देखता। अगर कोई व्यक्ति परमेश्वर का विरोध करता है, तो वह उसे दंड देगा।’ ऐसा बिल्कुल नहीं है। अगर कोई उसकी धार्मिकता, उसके कार्य और लोगों के प्रति उसके व्यवहार को ऐसा समझता है, तो वह गंभीर रूप से गलत है। परमेश्वर द्वारा प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम का निर्धारण मनुष्य की धारणाओं और कल्पनाओं पर आधारित नहीं होता, बल्कि परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव पर आधारित होता है। वह प्रत्येक इंसान को उसकी करनी के अनुसार प्रतिफल देगा। परमेश्वर धार्मिक है, और देर-सबेर वह यह सुनिश्चित करेगा कि सभी लोग हर तरह से आश्वस्त हों(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। “बाइबल में एक बिगड़ैल बेटे की वापसी की कहानी है—प्रभु यीशु ने इस दृष्टांत का इस्तेमाल क्यों किया? इसका उद्देश्य लोगों को यह समझाना था कि मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर का इरादा सच्चा है और वह लोगों को पश्चात्ताप करने और बदलने का मौका देता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान परमेश्वर मनुष्य को समझता है, उसकी कमजोरियों और उसकी भ्रष्टता के स्तर को अच्छे से जानता है। वह जानता है कि लोग लड़खड़ाएँगे और नाकाम होंगे। ठीक किसी ऐसे बच्चे की तरह जो चलना सीख रहा है, वह तन से चाहे कितना ही मजबूत हो, उनके लड़खड़ाने और गिरने के, चीजों से टकराने और रपटने के मौके हमेशा आएँगे। परमेश्वर हर व्यक्ति को उतना जानता है जितना कोई माँ अपने बच्चे को जानती है। वह हर व्यक्ति की परेशानियों, कमजोरियों और जरूरतों को समझता है। उससे भी बढ़कर, परमेश्वर यह भी समझता है कि लोग स्वभावगत बदलाव में प्रवेश करने की प्रक्रिया में किन कठिनाइयों, कमजोरियों और नाकामियों का सामना करेंगे। ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें परमेश्वर बखूबी समझता है। वैसे कहा जाता है कि परमेश्वर लोगों के दिल की गहराइयों की जाँच-पड़ताल करता है। तुम चाहे कितने ही कमजोर हो, जब तक तुम परमेश्वर का नाम लेना नहीं छोड़ते, या उसे या उसका मार्ग नहीं छोड़ते, तब तक तुम्हारे पास स्वभाव बदलने का मौका हमेशा रहेगा। अगर तुम्हारे पास यह मौका है, तो फिर तुम्हारे जीवित रहने, और इसलिए परमेश्वर के हाथों बचा लिए जाने की उम्मीद है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपना स्वभाव बदलने के लिए अभ्यास का मार्ग)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की कुछ समझ मिली। जब परमेश्वर यह न्याय करता है कि कोई व्यक्ति बचाया जा सकता है या नहीं, तो वह किसी व्यक्ति को एक क्षणिक अपराध के आधार पर निंदित या हटाता नहीं है। परमेश्वर हमारे आध्यात्मिक कद को जानता है और हमारी कमजोरियों के प्रति समझ दिखाता है। परमेश्वर किसी व्यक्ति को मुख्य रूप से उसके लगातार व्यवहार और क्या वह सत्य को स्वीकार कर सकता है, इस आधार पर मापता है। अगर अपने कर्तव्य में उसका व्यवहार लगातार अच्छा रहा है, और अगर अपराध करने के बाद वह सत्य को स्वीकार कर सकता है और सच में पश्चात्ताप कर सकता है, तो परमेश्वर ऐसे व्यक्ति पर दया और सहिष्णुता दिखाएगा। उदाहरण के लिए, उरिय्याह की पत्नी को ले लेने के बाद दाऊद पछतावे से भर गया और उसने फिर कभी व्यभिचार नहीं किया। यहाँ तक कि जब वह बूढ़ा हो गया, तब भी उसके बिस्तर को गर्म करने के लिए एक युवती लाई गई, लेकिन वह उसके करीब नहीं गया। हालाँकि दाऊद ने अपराध किया, उसने सच्चे दिल से पश्चात्ताप किया और परमेश्वर ने फिर भी उसे स्वीकार किया। कुछ भाई-बहनों को मसीह-विरोधी के मार्ग पर चलने के कारण और कलीसिया के कार्य में गंभीर रूप से बाधा डालने के लिए निष्कासित किया गया है लेकिन बाद में उन्होंने सच में पश्चात्ताप किया और उन्हें परमेश्वर के घर में फिर से प्रवेश दिया गया और यहाँ तक कि उन्होंने परमेश्वर के उद्धार कार्य की गवाही देते हुए अनुभवजन्य लेख भी लिखे। उनसे मैंने देखा कि जो लोग सच में पश्चात्ताप करते हैं और सत्य स्वीकार कर सकते हैं, उनके प्रति परमेश्वर का रवैया दया और उद्धार का होता है। इसके विपरीत जिनका प्रदर्शन लगातार खराब रहा है, जो सत्य को स्वीकार नहीं करते या जिन्होंने ईमानदारी से पश्चात्ताप नहीं किया है, उनके प्रति परमेश्वर का रवैया उन्हें निंदित करने और हटाने का होता है। उदाहरण के लिए, जिन कुछ लोगों ने तीन कथनों पर हस्ताक्षर किए, उन्हें बाद में परमेश्वर के साथ अपने विश्वासघात के लिए कोई समझ या पश्चात्ताप नहीं था और उन्होंने तो कलीसिया और अपने भाई-बहनों को बेच भी दिया। परमेश्वर ऐसे लोगों को अतिरिक्त मौके नहीं देता क्योंकि वे सत्य से विमुख होते हैं और उनमें कोई जमीर और विवेक नहीं होता। मैंने इस बारे में सोचा कि जब मुझे गिरफ्तार किया गया था तब मैं बहुत लंबे समय से अपना कर्तव्य नहीं निभा रहा था, मेरा अनुभव कम था और मेरा आध्यात्मिक कद छोटा था। मैंने कमजोरी के एक पल में तीन कथनों पर हस्ताक्षर कर दिए थे, लेकिन बाद में, मैंने खुद को बहुत दोष दिया और पछतावा महसूस किया और मैं पश्चात्ताप करना और बदलना चाहता था। कलीसिया ने मेरे कर्तव्य में मेरे लगातार व्यवहार के आधार पर मुझे एक मौका दिया। यह परमेश्वर की दया थी और उसकी धार्मिकता को प्रकट किया। लेकिन मैं परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझता था और उसे लगातार गलत समझता रहा, यह सोचकर कि मैं केवल श्रम कर रहा था और श्रम पूरा हो जाने पर मुझे हटा दिया जाएगा—मानो वह मुझसे श्रम करवाने के लिए मेरा इस्तेमाल कर रहा हो। मैंने सोचा कि परमेश्वर भ्रष्ट मानवता की तरह ही, हर मोड़ पर लोगों के खिलाफ साजिश रचेगा। क्या यह परमेश्वर के खिलाफ ईश्वर-निंदा नहीं थी? मेरे अंदर परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बिल्कुल नहीं था! मैंने परमेश्वर की धार्मिकता को पूरी तरह से नकार दिया, और मैंने मानवता को पूरी हद तक बचाने की परमेश्वर की मंशा को भी नकार दिया। मुझे एहसास हुआ कि अपनी आस्था में मैं परमेश्वर को बिल्कुल भी नहीं जानता था। मैं सचमुच अंधा था! अगर मैं इसी तरह चलता रहता, तो मुझे कभी भी परमेश्वर की क्षमा नहीं मिलती। मुझे दाऊद के उदाहरण का अनुसरण करना था, शांति से अपने अपराधों का सामना करना था, और सच में पश्चात्ताप करना था। चाहे अंत में मेरा परिणाम अच्छा हो या न हो, मुझे स्वीकार करना और समर्पण करना है और अपने भविष्य की संभावनाओं और रास्तों की चिंता नहीं करनी है।

बाद में, मैंने सोचा, “गिरफ्तार होने के बाद तीन कथनों पर हस्ताक्षर करने के मामले में मेरी असफलता का मूल कारण क्या था?” मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “तुम्हें आशा है कि परमेश्वर में अपनी आस्था के लिए तुम्‍हें मुश्किलों या क्लेशों या थोड़े भी कष्टों का सामना नहीं करना पड़ेगा। तुम हमेशा निरर्थक चीजों के पीछे भागते हो, और तुम जीवन के विकास को कोई अहमियत नहीं देते, बल्कि तुम अपने फिजूल के विचारों को सत्य से ज्यादा महत्व देते हो। तुम कितने निकम्‍मे हो! तुम सूअर की तरह जीते हो—तुममें और सूअर और कुत्ते में क्या अंतर है? जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, बल्कि शरीर से प्यार करते हैं, क्या वे सब पूरे जानवर नहीं हैं? क्या वे मरे हुए लोग जिनमें आत्मा नहीं है, चलती-फिरती लाशें नहीं हैं? तुम लोगों के बीच कितने सारे वचन कहे गए हैं? क्या तुम लोगों के बीच केवल थोड़ा-सा ही कार्य किया गया है? मैंने तुम लोगों के बीच कितनी आपूर्ति की है? तो फिर तुमने इसे प्राप्त क्यों नहीं किया? तुम्हें किस बात की शिकायत है? क्या यह बात नहीं है कि तुमने इसलिए कुछ भी प्राप्त नहीं किया है क्योंकि तुम देह से बहुत अधिक प्रेम करते हो? क्योंकि तुम्‍हारे विचार बहुत ज्यादा निरर्थक हैं? क्योंकि तुम बहुत ज्यादा मूर्ख हो? यदि तुम इन आशीषों को प्राप्त करने में असमर्थ हो, तो क्या तुम परमेश्वर को दोष दोगे कि उसने तुम्‍हें नहीं बचाया? ... मैं तुम्‍हें एक सच्चा मानवीय जीवन देता हूँ, फिर भी तुम अनुसरण नहीं करते। क्या तुम कुत्ते और सूअर से भिन्न नहीं हो? सूअर मनुष्य के जीवन की कामना नहीं करते, वे शुद्ध होने का प्रयास नहीं करते, और वे नहीं समझते कि जीवन क्या है। प्रतिदिन, उनका काम बस पेट भर खाना और सोना है। मैंने तुम्‍हें सच्चा मार्ग प्रदान किया है, फिर भी तुमने उसे प्राप्त नहीं किया है : तुम्‍हारे हाथ खाली हैं। क्या तुम इस जीवन में एक सूअर का जीवन जीते रहना चाहते हो? ऐसे लोगों के जिंदा रहने का क्या अर्थ है? तुम्‍हारा जीवन घृणित और ग्लानिपूर्ण है, तुम गंदगी और व्यभिचार में जीते हो और किसी लक्ष्य को पाने का प्रयास नहीं करते हो; क्या तुम्‍हारा जीवन अत्यंत निकृष्ट नहीं है? क्या तुम परमेश्वर का सामना करने का साहस कर सकते हो? यदि तुम इसी तरह अनुभव करते रहे, तो क्या केवल शून्य ही तुम्हारे हाथ नहीं लगेगा? तुम्हें एक सच्चा मार्ग दे दिया गया है, किंतु अंततः तुम उसे प्राप्त कर पाओगे या नहीं, यह तुम्हारी व्यक्तिगत खोज पर निर्भर करता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान)। “आज दुनिया में हर व्यक्ति परीक्षण से गुजर रहा है, यहाँ तक कि परमेश्वर भी कष्ट उठा रहा है, इसलिए क्या तुम्हारा कष्ट न उठाना उचित है? ... कुछ लोग परिवार की पीड़ा झेलते हैं, कुछ विवाह की पीड़ा झेलते हैं और कुछ उत्पीड़न सहते हैं, यहाँ तक कि उनके रहने के लिए जगह की भी कमी होती है। चाहे वे कहीं भी जाएँ, वह किसी और का ही घर होता है, और वे अपने दिल में दर्द महसूस करते हैं। जो पीड़ा तुम लोग अभी अनुभव कर रहे हो, क्या यह वही पीड़ा नहीं है जो परमेश्वर ने झेली है? तुम लोग परमेश्वर के साथ पीड़ित हो रहे हो और परमेश्वर मनुष्यों के दुख में उसके साथ है। आज मसीह के क्लेश, राज्य और सहनशीलता में तुम सभी लोगों का हिस्सा है, और तुम अंत में महिमा प्राप्त करोगे! यह पीड़ा सार्थक है। क्या ऐसा ही नहीं है? तुम इस संकल्प से रहित नहीं हो सकते। तुम्हें आज पीड़ा का अर्थ समझना चाहिए और इस बात का भी कि तुम इतनी पीड़ा क्यों झेलते हो। तुम्हें सत्य खोजना चाहिए और परमेश्वर के इरादे की समझ हासिल करनी चाहिए, तब तुममें पीड़ा सहने का संकल्प होगा(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें)। परमेश्वर के वचनों से मैंने महसूस किया कि तीन कथनों पर हस्ताक्षर करने के पीछे मूल कारण यह था कि मैं अपनी देह को बहुत अधिक सँजोता था। मैंने “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए” के शैतानी अस्तित्व के नियम का पालन किया और मैंने अपनी देह के हितों को बाकी सब से ऊपर रखा। परमेश्वर में विश्वास करते हुए मैं चाहता था कि कोई कठिनाई या दर्द बिल्कुल न हो और मेरी देह को कष्ट न हो, इससे भी बढ़कर किसी भी परीक्षण या क्लेश का अनुभव करने की कोई आवश्यकता न हो। इसलिए जब बड़े लाल अजगर द्वारा यातना की धमकी दी गई, तो मेरे दिमाग में यह नहीं था कि अपनी गवाही में कैसे अडिग रहा जाए, बल्कि यातना का मेरा डर था—कम यातना सहने के लिए मैंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर कर दिए। खुद को बचाने और शारीरिक कष्ट से बचने के लिए मैंने शैतान के आगे घुटने टेक दिए और जीने के लिए खुद को नीचा दिखाया, अपने शर्मनाक अस्तित्व को कसकर पकड़े रहा, मैंने परमेश्वर को नकारा और उसके साथ विश्वासघात किया। मेरा आचरण यहूदा के आचरण से किस तरह अलग था? परमेश्वर के वचनों से मुझे यह एहसास भी हुआ कि अपनी आस्था में उद्धार पाने के लिए व्यक्ति को कई कष्ट सहने पड़ते हैं। केवल दर्दनाक परिस्थितियों के माध्यम से ही हम परमेश्वर में सच्ची आस्था रख सकते हैं। पतरस का उदाहरण लें। जब उसने प्रभु यीशु का अनुसरण किया, तो उसने अपने पूरे जीवन में सैकड़ों परीक्षणों और शोधनों का अनुभव किया। उसने इन शोधनों में परमेश्वर से प्रेम करने की कोशिश की, अंत में उसने परमेश्वर के लिए सर्वोच्च प्रेम और मृत्यु तक समर्पण प्राप्त किया और उसे परमेश्वर के लिए उलटा क्रूस पर चढ़ाया गया और वह युगों-युगों में परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया जाने वाला पहला व्यक्ति बना। अय्यूब भी था, जिसने परीक्षणों का सामना किया। उसने एक पल में अपनी विशाल संपत्ति और बच्चों को खो दिया, उसका शरीर फोड़ों से ढक गया और फिर भी अय्यूब परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजनों के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रहने में सक्षम था, उसने शैतान को भयभीत कर दिया और उसे घबराहट में भागने पर मजबूर कर दिया। अय्यूब एक सच्चा स्वतंत्र व्यक्ति बन गया। उनकी तुलना में मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई। मैं गंभीर यातना का सामना किए बिना ही पूरी तरह से भयभीत हो गया और शैतान से समझौता कर लिया। मैं एक ग्रीनहाउस में लगे फूल की तरह था जो थोड़ी सी हवा या बारिश भी नहीं सह सकता था। मैं सचमुच नाजुक था! मुझे सत्य का अनुसरण करना था और अब अपनी देह का विचार नहीं करना था और मैंने प्रतिज्ञा की कि अगर किसी दिन मुझे फिर से गिरफ्तार किया गया, तो मैं अपनी गवाही में अडिग रहूँगा, भले ही शैतान मुझे इतनी बुरी तरह से प्रताड़ित करे कि जीवन मृत्यु से भी बदतर हो जाए।

जुलाई 2024 के अंत में जब मैं डोंगयांग कलीसिया पहुँचा ही था, पड़ोसी कलीसिया में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी की कार्रवाई हुई और अगुआओं ने हमारे लिए परमेश्वर के वचनों की किताबों को जल्दी से स्थानांतरित करने में मदद करने की व्यवस्था की। लेकिन जैसे ही हमने किताबों के कुछ गुप्त भंडारों को हटाया, ड्राइवर को पीछा किए जाने का संदेह हुआ। इसके अलावा जिस भाई के साथ मैं जोड़ी में था, वह भी ड्राइवर के संपर्क में आने के कारण संभावित जोखिमों के दायरे में आ गया। मैं बहुत डर गया था। मैंने सोचा कि हाल ही में पुलिस द्वारा मेरा लंबे समय तक पीछा किया गया था और मैं लगभग गिरफ्तार हो ही गया था और कैसे एक यहूदा ने मुझसे विश्वासघात किया था और मैं पुलिस की गिरफ्तारी के लिए एक मुख्य निशाना था। अगर पुलिस ने उस भाई को निशाना बनाया जिसके साथ मैं सहयोग कर रहा था, तो मैं बच नहीं पाऊँगा; अगर पुलिस ने मुझे पकड़ लिया, तो वे निश्चित रूप से मुझे जाने नहीं देंगे। लेकिन जब मैंने उस अपराध के बारे में सोचा जो मैंने पिछली बार गिरफ्तार होने और तीन कथनों पर हस्ताक्षर करने पर किया था, तो मेरे दिल में एक तीव्र भावना उठी, “अगर मैं सचमुच पकड़ा गया, तो मैं कसम खाता हूँ कि मैं कभी भी परमेश्वर को नहीं नकारूँगा और मैं निश्चित रूप से परमेश्वर की गवाही दूँगा!” जब मैंने इस तरह सोचा, तो मेरा दिल अब इस माहौल से बाधित नहीं था। मैं पकड़ा जाऊँगा या नहीं, यह परमेश्वर के हाथों में था और मुझे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना था। किताबों को तत्काल स्थानांतरित करने की आवश्यकता थी, विभिन्न कार्यों को तत्काल लागू करने की आवश्यकता थी और मुझे परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करनी थी। इसलिए मैं अपने साथी के साथ किताबों को स्थानांतरित करने की व्यवस्था पर चर्चा करता रहा। साथ ही मैंने स्थानांतरण की प्रगति पर नजर रखने के लिए कलीसिया को एक पत्र लिखा। इस तरह अभ्यास करने से मुझे अपने दिल में बहुत अधिक सहज महसूस हुआ। मैं जो यह थोड़ा सा ज्ञान और बदलाव हासिल कर पाया, वह परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन से अविभाज्य है। मैं परमेश्वर का तहे दिल से धन्यवाद करता हूँ!

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18. मुझे अपनी गलतफहमियों और रक्षात्मक-प्रवृत्ति से नुकसान हुआ

सुशिंग, चीनकुछ समय पहले, हमारी कलीसिया की अगुआ ने अपना पद गँवा दिया क्योंकि उसने न तो सत्य का अनुशीलन किया और न ही कोई व्यावहारिक काम किया।...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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