75. मेरी बीमारी मेरे लिए परमेश्वर की आशीष थी

ओउयांग, चीन

जब मैं पंद्रह साल का था, मुझे पल्मोनरी हाइपरटेंशन नाम की एक दुर्लभ बीमारी होने का पता चला। शुरू में मैं बस भारी व्यायाम नहीं कर पाता था, लेकिन जल्द ही सिर्फ चलने से मेरी साँस फूलने लगती थी और मेरी छाती में बहुत ज्यादा जकड़न महसूस होती थी। मुझे स्कूल छोड़ना पड़ा और इलाज के लिए इधर-उधर भटकना पड़ा, लेकिन मेरी हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती गई। नौबत यहाँ तक आ गई कि मैं अपना खयाल भी नहीं रख पाता था और लेटने पर भी मुझे साँस लेने में तकलीफ होती थी। जब तकलीफ बढ़ गई, तो मुझे ऑक्सीजन पर रहना पड़ा। डॉक्टर ने कहा कि मेरे पास जीने के लिए ज्यादा से ज्यादा तीन महीने हैं। यह सोचकर कि मेरा जीवन केवल पंद्रह साल की उम्र में खत्म होने वाला है, मैं पूरी तरह से निराश हो गया। मैंने मन ही मन सोचा, “अगर मरना ही है, तो ऐसा ही सही। मौत छुटकारा दिला देगी।” लेकिन तीन महीने बाद चमत्कार यह कि मैं अभी भी जीवित था। हालाँकि मेरी बीमारी अभी भी बहुत गंभीर थी। जरा-सा परिश्रम करने पर दिल की धड़कन बढ़ जाती और साँस फूलने लगती थी। जब हालत खराब होती, तो मैं साँस नहीं ले पाता था और लगता था कि मेरा दम घुट रहा है और मैं बेहोश होने वाला हूँ। हालाँकि फिलहाल मेरा जीवन बच गया था, लेकिन मैं एक सामान्य व्यक्ति की तरह नहीं जी सकता था और कॉलेज जाने का मेरा सपना अब असंभव हो गया था। मैं खुद को पूरी तरह अंधेरे और दुख में गुम महसूस करता था। 1999 में मेरी माँ और मैंने अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर का कार्य स्वीकार कर लिया। उसके बाद मैं अक्सर परमेश्वर के वचन पढ़ता था। उसके वचनों से मुझे समझ में आया कि मानवता को बचाने के लिए परमेश्वर ने कार्य के तीन चरण किए हैं। अंत के दिनों में, परमेश्वर लोगों को शुद्ध करने और बचाने के लिए सत्य व्यक्त करने और अंततः उन्हें शैतान के प्रभाव से पूरी तरह बचाने और एक सुंदर मंजिल तक ले जाने के लिए देहधारी हुआ है। मेरे दिल में उजाला होने लगा और मुझे लगा कि जीवन में उम्मीद बाकी है। मुझे विश्वास था कि जब तक मैं ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास करता हूँ, मुझे बचाए जाने और उसके राज्य में प्रवेश करने का मौका मिलेगा और शायद एक दिन मेरी बीमारी भी ठीक हो जाएगी। मैं परमेश्वर के वचन पढ़ता रहा और सभाओं में जाता रहा और मेरा शरीर धीरे-धीरे मजबूत होता गया। मैंने कलीसिया में कर्तव्य निभाना भी शुरू कर दिया।

बाद में मैं सुसमाचार का प्रचार करने के लिए दूसरे क्षेत्र में गया और कभी-कभी मुझे दर्जनों मील तक साइकिल चलानी पड़ती थी। शुरू में मैं बहुत चिंतित रहता था, सोचता था, “क्या मेरा शरीर इसे झेल भी पाएगा?” लेकिन फिर मुझे याद आया कि मैं एक विश्वासी हूँ। मैंने सोचा कि जब तक मैं अपना कर्तव्य ठीक से करता हूँ, परमेश्वर मेरे प्रयासों और खपने को देखेगा और मेरी रक्षा करेगा। मेरी बीमारी परमेश्वर के हाथों में थी, इसलिए चिंता करने की कोई बात नहीं थी। कुछ समय तक मेरी हालत नहीं बिगड़ी और मैं परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा के लिए बहुत आभारी था। उस दौरान चाहे कड़ाके की ठंड हो या भीषण गर्मी, चाहे संभावित सुसमाचार सुनने वालों ने मुझे भगाया हो, या यहाँ तक कि पुलिस में रिपोर्ट की गई हो और मेरी गिरफ्तार के लिए मुझे ढूँढ़ा जा रहा हो, मैं कभी पीछे नहीं हटा और बस अपना कर्तव्य करता रहा। 2005 में एक सभा के दौरान मैंने सुना कि एक बहन को खून बहने की गंभीर बीमारी थी जिसे अस्पताल ठीक नहीं कर सका। लेकिन बाद तक वह अपना कर्तव्य करती रही और उसे पता भी नहीं चला कि कब उसकी बीमारी ठीक हो गई। मैंने मन ही मन सोचा, “अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य मुख्य रूप से लोगों के भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करने के लिए सत्य व्यक्त करना है, न कि बीमारों को चंगा करना और दानवों को बहिष्कृत करना। मुझे परमेश्वर से खुद को ठीक करने के लिए नहीं कहना चाहिए, लेकिन जब तक मैं अपना कर्तव्य ठीक से करता हूँ, परमेश्वर मेरे प्रदर्शन के आधार पर मुझे अनुग्रह और आशीष देगा। उस बहन की बीमारी इतनी गंभीर थी, फिर भी वह ठीक हो गई। अगर मैं अपना कर्तव्य करता रहूँ, तो शायद एक दिन मेरी बीमारी भी ठीक हो जाएगी। अगर मैं ठीक हो गया, तो मुझे अब और बीमारी का कष्ट सहने को बाध्य नहीं होना पड़ेगा।” इस तरह मैं अपने कर्तव्य में और भी अधिक प्रेरित हो गया।

बाद में 2006 में मेरी मुलाकात एक पारंपरिक चीनी डॉक्टर से हुई, जिसने कहा कि मेरी बीमारी ठीक होने की उम्मीद है। यह सुनकर मैं बहुत उत्साहित हुआ और मैंने सोचा कि क्या परमेश्वर मुझे ठीक करने के लिए इस डॉक्टर का इस्तेमाल करने वाला है। इसलिए मैंने इलाज में सक्रिय रूप से सहयोग किया। लेकिन करीब दो महीने के इलाज के बाद भी मेरी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। मैं बेहद निराश था। मैंने सोचा, “मेरी बीमारी ठीक क्यों नहीं हो सकती?” “सालों से मैंने अपना कर्तव्य करने के लिए अपने परिवार और करियर को पीछे छोड़ रखा है, यहाँ तक कि अपनी बीमारी के बावजूद सुसमाचार का प्रचार करना जारी रखा है। क्या मैंने काफी नहीं किया है? क्या मैंने इसे अच्छे से नहीं किया है? ऐसा क्यों था कि कुछ भाई-बहन चंगे हो गए, लेकिन मैं नहीं हुआ? अगर मेरी बीमारी ठीक हो जाती, तो क्या मैं अपना कर्तव्य और बेहतर ढंग से नहीं कर पाता?” मैंने इसके बारे में जितना सोचा, उतना ही दुखी हो गया। मुझमें चलने की भी ताकत नहीं थी। हालाँकि मैं अपना कर्तव्य करता रहा, लेकिन मैं थका हुआ महसूस करता था और किसी भी चीज के लिए ऊर्जा नहीं जुटा पाता था। बाद में अपनी आध्यात्मिक भक्ति के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और मेरी अवस्था बदलने लगी। परमेश्वर कहता है : “यदि, तुम्हारे द्वारा मेरे लिए खर्च करने के बाद भी मैंने तुम लोगों की कुछ माँगों को पूरा नहीं करता हूँ, तो क्या तुम मेरे प्रति निरुत्साहित और निराश हो जाओगे या यहाँ तक कि क्रोधित होकर गालियाँ भी बकने लगोगे?” “यदि तुम हमेशा मेरे प्रति बहुत निष्ठावान रहे हो, मेरे लिए तुममें बहुत प्रेम है, मगर फिर भी तुम बीमारी की पीड़ा, वित्तीय तनाव, अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के द्वारा त्यागे जाना या जीवन में किसी भी अन्य दुर्भाग्य को सहन करते हो, तो क्या तब भी मेरे लिए तुम्हारी निष्ठा और प्यार बना रहेगा?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (2))। परमेश्वर के सवालों के सामने मुझे एक ऐसा एहसास हुआ जिसे बयान नहीं किया जा सकता। परमेश्वर की अपेक्षा रहती है कि लोग सौदेबाजी या माँग करने की कोशिश किए बिना अपना कर्तव्य निभाएँ और चाहे कुछ भी हो जाए, उसके प्रति वफादार और सच्चे तौर पर समर्पित रहें। लेकिन चूँकि मैंने कुछ कठिनाइयाँ सही थीं और अपने कर्तव्य में कुछ प्रयास किए थे और खुद को खपाया था, तो मैंने सोचा कि परमेश्वर को मेरी बीमारी दूर करनी चाहिए। जब मेरी माँग पूरी नहीं हुई, तो मैंने परमेश्वर को गलत समझा और उसके खिलाफ शिकायत की और मैंने अपने कर्तव्य के लिए सारी प्रेरणा खो दी। हालाँकि मैंने कभी स्पष्ट रूप से परमेश्वर से मुझे ठीक करने की प्रार्थना नहीं की थी, लेकिन मैंने अपने दिल में यह असाधारण इच्छा पाल रखी थी। खास तौर पर कुछ भाई-बहनों की बीमारियाँ ठीक होते देखने के बाद मुझे यकीन हो गया था कि मेरे ठीक होने का दिन ज्यादा दूर नहीं है। मैंने इसी मंशा के साथ अपना कर्तव्य किया, यहाँ तक कि यह भी सोचता था कि मैं काफी समर्पित हूँ। लेकिन वास्तव में मेरे सारे प्रयास और खुद को खपाना मेरी बीमारी ठीक करवाने के लिए थे। मैं परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश कर रहा था। मुझमें उसके लिए वफादारी या प्रेम कहाँ था? परमेश्वर ने मेरी रक्षा की थी और मुझे आज तक जीवित रखा था और यहाँ तक कि मुझे अपना कर्तव्य निभाने और सत्य का अनुसरण करने का अवसर भी दिया था। परमेश्वर ने मुझे जो दिया था, वह पहले से ही काफी से ज्यादा था। मुझे परमेश्वर के प्रेम का कर्ज चुकाने के लिए लगन से अपना कर्तव्य करना चाहिए था; मुझे परमेश्वर से माँगें नहीं करनी चाहिए थीं या सौदेबाजी की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी। इसके बाद मैं अपना कर्तव्य करता रहा और अपनी बीमारी को लेकर परेशान या चिंतित नहीं हुआ।

कुछ साल बाद मेरा परिवार मेरे लिए एक और तरह की दवा लाया, यह कहा कि इससे मेरी हालत में मदद मिल सकती है। इलाज के अपने पिछले अनुभव को याद करते हुए मैंने खुद से पूछा, “अगर यह दवा भी असरदार नहीं रही, तो मुझे इस स्थिति का सामना कैसे करना चाहिए?” मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “अगर बीमारी आ जाए तो तुम्हें इसका अनुभव कैसे करना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर के समक्ष आकर प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर के इरादे जानने और पकड़ने चाहिए; तुम्हें अपनी जाँच करनी चाहिए कि तुमने ऐसा क्या कर दिया जो सत्य के विरुद्ध है, और तुम्हारे कौन-से भ्रष्ट स्वभावों का समाधान नहीं हुआ है। कष्ट भोगे बिना तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों का समाधान नहीं हो सकता। कष्टों की आँच से तपकर ही लोग स्वच्छंद नहीं बनेंगे और हर घड़ी परमेश्वर के समक्ष रह सकेंगे। जब कोई कष्ट भोगता है तो वह हमेशा प्रार्थना में लगा रहता है। उनका मन भोजन, वस्त्र और अन्य सुखों पर ध्यान केंद्रित करने का नहीं होता; वे अपने हृदय में लगातार प्रार्थना करते हैं, यह देखने के लिए खुद की जाँच करते हैं कि क्या उन्होंने हाल ही में कुछ गलत किया है या किसी तरह से सत्य के खिलाफ गए हैं। आम तौर पर, जब तुम किसी गंभीर बीमारी या अजीब बीमारी का सामना करते हो जो तुम्हें भयानक पीड़ा देती है, तो यह संयोग से नहीं होता है। तुम्हारी बीमारी और तुम्हारे अच्छे स्वास्थ्य दोनों में परमेश्वर का इरादा है। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है और तुम शारीरिक रूप से स्वस्थ होते हो, तो तुम आम तौर पर परमेश्वर को खोज सकते हो, लेकिन बीमार पड़ने पर और कष्ट भोगते हुए तुम परमेश्वर को खोजना बंद कर देते हो और नहीं जानते कि उसे कैसे खोजना है। तुम्हारा मन बीमारी में ही उलझा रहता है और तुम हमेशा यही सोचते रहते हो कि कौन-से इलाज से जल्द से जल्द ठीक हो सकते हो। तुम उन लोगों से जलने लगते हो जो ऐसे समय में बीमार नहीं हैं, और जितनी जल्दी हो सके तुम अपनी बीमारी और पीड़ा से मुक्ति पाना चाहते हो। ये नकारात्मकता और प्रतिरोध के भाव हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर पर विश्वास करने में सत्य प्राप्त करना सबसे महत्वपूर्ण चीज है)। “बीमार पड़ना वास्तव में तुम्हारे बस के बाहर की चीज है। अगर तुम बीमार पड़ जाते हो और इसके उपचार का कोई तरीका नहीं होता है, तब तुम्हें पीड़ा सहनी चाहिए। इससे छुटकारा पाने की कोशिश मत करो; तुम पहले समर्पण करो, परमेश्वर से प्रार्थना करो और परमेश्वर की इच्छाएँ खोजो। ... अगर तुम सचमुच ऐसे व्यक्ति हो जिसके हृदय में परमेश्वर है तो फिर तुम जिस चीज का भी सामना करते हो, उसकी अनदेखी मत करो। तुम्हें प्रार्थना और खोज करनी चाहिए, हर मामले में परमेश्वर की इच्छा देखनी चाहिए और परमेश्वर के प्रति समर्पण करना सीखना चाहिए। जब परमेश्वर यह देख लेता है कि तुम समर्पण कर सकते हो और तुम्हारे दिल में परमेश्वर के प्रति समर्पण है, तो वह तुम्हारी पीड़ा कम कर देगा। परमेश्वर पीड़ा और शोधन के जरिए ऐसे प्रभाव पैदा करता है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर पर विश्वास करने में सत्य प्राप्त करना सबसे महत्वपूर्ण चीज है)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गया कि मैं हमेशा इसी बात पर अटका रहता था कि मेरी बीमारी कब ठीक होगी और क्या दवा मुझे ठीक कर पाएगी। मैं बस यही सोचता था कि अपनी बीमारी से कैसे बचूँ। यह एक नकारात्मक भावना थी। मुझे एहसास हुआ कि मुझे अपनी बीमारी में परमेश्वर के इरादे खोजने चाहिए और उसके प्रति समर्पण करना सीखना चाहिए। यही सकारात्मक रवैया रखना है। हालाँकि बीमार होना कष्टदायक है, लेकिन मेरे लिए यह सुरक्षा का एक रूप भी था। मैंने बचपन से ही खूब पढ़ाई की थी और यहाँ तक कि बीमार होने के बाद भी मैं स्कूल जाने की जिद करता था, मुझे उम्मीद थी कि ज्ञान के जरिए अपनी किस्मत बदल सकता हूँ। मैं दुनिया के पीछे भागने, शोहरत, लाभ और रुतबे का पीछा करने की राह पर था। अगर मैं बीमार न पड़ा होता, तो मैंने निश्चित रूप से परमेश्वर में विश्वास करना नहीं चुना होता। मैं शोहरत, लाभ और रुतबे का पीछा करता रहता, इस अंधेरी और दुष्ट दुनिया में रहता और शैतान द्वारा सताया जाता रहता। अपनी बीमारी की वजह से ही मैंने अंत के दिनों के परमेश्वर का कार्य स्वीकार किया था। यह मेरे लिए परमेश्वर का उद्धार था और मेरे लिए उसकी महान सुरक्षा थी। मुझे यह भी समझ में आ गया कि परमेश्वर मुझे शुद्ध करने और बदलने के लिए इस बीमारी का इस्तेमाल कर रहा था। अगर यह बीमारी न होती, तो मैं सोचता कि मैं वास्तव में परमेश्वर के लिए खुद को खपा रहा हूँ, अपना कर्तव्य निभाने के मेरे इरादों में मौजूद अशुद्धियों को कभी नहीं पहचान पाता और मैं पश्चात्ताप नहीं करता या बदलना शुरू नहीं करता। यह समझकर मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं जानता हूँ कि यह बीमारी मेरे लिए सुरक्षा का एक रूप है, जिसका मकसद मुझे शुद्ध करना और बदलना है। मैं अब और तुझसे मुझे ठीक करने के लिए नहीं कहूँगा। चाहे यह बीमारी ठीक हो या न हो, मैं समर्पण करने के लिए तैयार हूँ।” प्रार्थना करने के बाद मुझे अपने दिल में गहरा सुकून महसूस हुआ, राहत का एक ऐसा एहसास जो मैंने पहले कभी अनुभव नहीं किया था।

फिर 2017 में मैंने भाई शू लियांग को, जिनके साथ मैं सहयोग कर रहा था, पेट की उन समस्याओं के बारे में बात करते सुना जो उन्हें हुआ करती थीं। उन्होंने लंबे समय तक उनका इलाज कराने की कोशिश की थी लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। फिर एक बार ठंड लगने के बाद उनकी पेट की समस्याएँ भड़क उठीं, लेकिन उस प्रकोप के बाद हैरानी की बात है कि वे ठीक हो गईं। उसकी कहानी सुनकर न चाहते हुए भी मुझे थोड़ी हताशा महसूस हुई। मैंने सोचा कि कैसे मेरे पल्मोनरी हाइपरटेंशन की वजह से अक्सर दिल में बेचैनी होती थी और इसे नियंत्रित करने के लिए मुझे हर दिन दवा लेनी पड़ती थी, जिसके कई तरह के दुष्प्रभाव होते थे : सिरदर्द, धुंधली दृष्टि, निचले अंगों में सूजन, मतली और बहुत कुछ। दूसरे लोगों की बीमारियाँ ठीक हो रही थीं, लेकिन मेरी बीमारी कब ठीक होगी? मुझे एहसास हुआ कि अपने दिल की गहराई में मैं अभी भी परमेश्वर से माँगें कर रहा था, अभी भी उम्मीद कर रहा था कि वह मेरी बीमारी दूर कर देगा। मुझे बहुत बुरा लगा और मुझे समझ नहीं आया कि मेरे लिए समर्पण करना हमेशा इतना मुश्किल क्यों था। बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और समस्या की जड़ का पता चला। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर का अनुसरण करने वाले बहुत सारे लोग केवल इस बात से मतलब रखते हैं कि आशीष कैसे प्राप्त किए जाएँ या आपदा को कैसे टाला जाए। ... परमेश्वर का अनुसरण करने में इन लोगों का उद्देश्य बहुत सरल होता है और यह एक ही लक्ष्य के लिए होता हैः आशीषित होना। ये लोग ऐसी किसी भी दूसरी चीज पर ध्यान देने की परवाह नहीं कर सकते जो इस उद्देश्य से संबंध नहीं रखती। उनके लिए, परमेश्वर में विश्वास करने का कोई भी लक्ष्य आशीष प्राप्त करने से ज्यादा वैध नहीं है—यह उनकी आस्था का असली मूल्य है। यदि कोई चीज इस उद्देश्य को प्राप्त करने में योगदान नहीं करती, तो चाहे जो भी हो वे उससे अप्रभावित रहते हैं। आज परमेश्वर में विश्वास करने वाले अधिकांश लोगों का यही हाल है। उनके उद्देश्य और इरादे न्यायोचित प्रतीत होते हैं, क्योंकि जब वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो वे परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते भी हैं, परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हैं और अपना कर्तव्य भी निभाते हैं। वे अपनी जवानी न्योछावर कर देते हैं, परिवार और आजीविका त्याग देते हैं, यहाँ तक कि वर्षों अपने घर से दूर भागते फिरते हैं। अपने परम उद्देश्य के लिए वे अपनी रुचियाँ बदल डालते हैं, अपने जीवन का दृष्टिकोण बदल देते हैं, यहाँ तक कि अपने अनुसरण की दिशा तक बदल देते हैं, किंतु परमेश्वर पर अपने विश्वास के उद्देश्य को नहीं बदल सकते। वे अपनी आकांक्षाओं के प्रबंधन के लिए भाग-दौड़ करते हैं; चाहे मार्ग कितना भी दूर क्यों न हो, और मार्ग में कितनी भी कठिनाइयाँ, खतरे और अवरोध क्यों न आएँ, वे दृढ़ रहते हैं और मृत्यु से नहीं डरते। ... उनके साथ इतनी निकटता से जुड़े उन लाभों के अतिरिक्त, परमेश्वर को कभी नहीं समझने वाले लोगों द्वारा उसके लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाने का क्या कोई अन्य कारण हो सकता है? यहाँ हमें मनुष्य के लिए एक पहले से अज्ञात समस्या का पता चलता है : परमेश्वर के साथ मनुष्य का संबंध केवल नग्न स्वार्थ पर आधारित है। यह आशीष लेने वाले और देने वाले के मध्य का संबंध है। स्पष्ट रूप से कहें तो यह एक कर्मचारी और एक नियोक्ता के मध्य का संबंध है। कर्मचारी केवल नियोक्ता द्वारा दिए जाने वाले प्रतिफल प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम करता है। इस प्रकार के स्वार्थ आधारित संबंध में कोई आत्मीय स्नेह नहीं होता, केवल लेन-देन होता है। प्रेम करने या प्रेम पाने जैसी कोई बात नहीं होती, केवल दान और दया होती है। कोई समझ नहीं होती, केवल असहाय दबा हुआ आक्रोश और धोखा होता है। कोई अंतरंगता नहीं होती, केवल एक अगम खाई होती है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है)। “‘परमेश्वर के शत्रु’ शब्दों का सार है : वे यह नहीं कह रहे हैं कि परमेश्वर मनुष्य को शत्रु के रूप में देखता है, बल्कि यह कि मनुष्य परमेश्वर को शत्रु के रूप में देखता है। पहला, जब लोग परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ करते हैं, तब उनमें से किसके पास अपने लक्ष्य, कारण, और महत्वाकांक्षाएँ नहीं होती हैं? उनका एक भाग भले ही परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करता है और परमेश्वर के अस्तित्व को देख चुका होता है, फिर भी वे कारण परमेश्वर में उनके विश्वास में अब भी समाए होते हैं, और परमेश्वर में विश्वास करने में उनका अंतिम लक्ष्य उसके आशीष और अपनी मनचाही चीजें प्राप्त करना होता है। ... कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य अपने हृदय में लगातार परमेश्वर की परीक्षा लेता रहता है और परमेश्वर के बारे में साजिशें रचता रहता है और अपने व्यक्तिगत परिणाम के लिए परमेश्वर के साथ लगातार बहस करता रहता है और परमेश्वर से बयान माँगता है और यह देखने की कोशिश करता है कि परमेश्वर उसे वह दे सकता है या नहीं जो वह चाहता है। परमेश्वर का अनुसरण करने के साथ ही साथ, मनुष्य परमेश्वर को परमेश्वर नहीं मानता। मनुष्य ने परमेश्वर के साथ हमेशा सौदेबाजी करने की कोशिश की है, उससे अनवरत माँगें की हैं, और हर क़दम पर उस पर दबाव डालते हुए, एक इंच दिए जाने पर एक मील लेने की कोशिश भी करते रहे हैं। परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश करते हुए साथ ही साथ, मनुष्य उसके साथ तर्क-वितर्क भी करता है, और यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो, जब परीक्षाएँ उन पर पड़ती हैं या जब वे अपने आप को किन्हीं खास स्थितियों में पाते हैं, तो प्रायः कमजोर, नकारात्मक होकर अपने कार्य में ढिलाई करते हैं और परमेश्वर के बारे में शिकायतों से भरे होते हैं। मनुष्य ने जब पहले-पहल परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ किया था, उसी समय से मनुष्य ने परमेश्वर को एक अक्षय पात्र, एक सर्व-उपयोगी उपकरण माना है और अपने आपको परमेश्वर का सबसे बड़ा साहूकार माना है, मानो परमेश्वर से आशीष और प्रतिज्ञाएँ प्राप्त करने की कोशिश करना उसका जन्मजात अधिकार और दायित्व है, जबकि मनुष्य की रक्षा, परवाह और उसकी आपूर्ति करना परमेश्वर कि जिम्मेदारियाँ हैं जो परमेश्वर को पूरी करनी चाहिए। ऐसी है ‘परमेश्वर में विश्वास’ की मूलभूत समझ, उन सब लोगों की जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, और ऐसी है परमेश्वर में विश्वास की अवधारणा की उनकी गहनतम समझ(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II)। परमेश्वर ने जो उजागर किया वह मेरी असली दशा थी। मैंने देखा कि आशीष पाने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करने की मेरी मानसिकता बहुत गहरी थी; यह ऐसी चीज नहीं थी जिसे सिर्फ कुछ प्रकाशनों का अनुभव करने के बाद बदला जा सके। जब मैं पहली बार विश्वासी बना, तो मैंने सोचा कि अगर मैं चीजों को त्याग दूँ और परमेश्वर के लिए खुद को खपा दूँ, तो वह मुझे अनुग्रह और आशीष देगा और मेरी बीमारी देर-सवेर ठीक हो जाएगी। इसी मंशा के साथ मैं अपने कर्तव्य में कोई भी कठिनाई सहने को तैयार था। लेकिन जब मेरी बीमारी ठीक नहीं हुई, तो मैंने शिकायत की कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है और यहाँ तक कि अपने कर्तव्य के लिए प्रेरणा भी खो दी। अब यह सुनकर कि किसी और की बीमारी ठीक हो गई है, मेरी आस्था की अशुद्धियाँ एक बार फिर प्रकट हो गईं। मैंने देखा कि मैं अभी भी परमेश्वर से माँगें कर रहा था। मेरा विश्वास बस अनुग्रह पाने, परमेश्वर से अपनी बीमारी ठीक करवाने के बारे में था। मैं परमेश्वर को एक महान चिकित्सक के रूप में, किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसे इस्तेमाल किया जा सके, मान रहा था और परमेश्वर के रूप में बिल्कुल नहीं। जब परमेश्वर ने मेरी माँगें पूरी नहीं कीं, तो मैंने उससे इनाम की माँग करने की कोशिश की। मुझमें परमेश्वर का भय मानने वाला दिल जरा भी नहीं था। मेरे जैसे इंसान को विश्वासी कैसे कहा जा सकता है? मैंने पौलुस के बारे में सोचा। उसकी सारी पीड़ा, खपाई और कड़ी मेहनत धार्मिकता का मुकुट पाने की खातिर थी। वह अपने द्वारा चुकाई गई कीमत का स्वर्ग के राज्य की आशीषों के बदले सौदा करना चाहता था। पौलुस में परमेश्वर के प्रति बिल्कुल भी समर्पण नहीं था; वह जिस रास्ते पर चला, वह परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला रास्ता था। मैं भी पौलुस वाले रास्ते पर ही चल रहा था। अगर मैं इसी तरह चलता रहा, तो चाहे मैं कितने भी साल विश्वास करूँ या कितनी भी मेहनत करूँ और खुद को खपाऊँ, मैं कभी भी सत्य नहीं पा सकूँगा या अपने स्वभाव में बदलाव हासिल नहीं कर सकूँगा। अंत में, मुझे अभी भी परमेश्वर द्वारा निकाल दिया जाएगा। मैंने देखा कि सत्य का अनुसरण किए बिना परमेश्वर पर विश्वास करना कितना खतरनाक है! मुझे अपने अनुसरण के पीछे के गलत नजरिए को सुधारना था, अपनी असाधारण इच्छाओं को छोड़ना था और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाना था। उसके बाद जब भी मैंने किसी को यह कहते सुनता कि उसकी बीमारी ठीक हो गई है, तो मैं इसे सही ढंग से ले पाता था और फिर कभी परमेश्वर से अपनी बीमारी दूर करने के लिए नहीं कहा।

देखते ही देखते मुझे यह बीमारी हुए बीस साल से ज्यादा हो गए। कभी-कभी मुझे अभी भी दिल में बेचैनी महसूस होती थी और चिंता होती थी कि क्या मेरी हालत बिगड़ रही है। अगर यह गंभीर हो जाती है, तो इसका मतलब है दिल का दौरा पड़ना—अगर ऐसा हुआ तो क्या मैं मर जाऊँगा? फिर मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े : “हर व्यक्ति का जीवन-काल परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत किया गया है। चिकित्सीय दृष्टिकोण से कोई बीमारी प्राणांतक हो सकती है, लेकिन परमेश्वर के नजरिये से अगर तुम्हारा जीवनकाल अभी तक पूरा नहीं हुआ है और तुम्हारा समय अभी नहीं आया है तो तुम चाहकर भी नहीं मर सकते। अगर तुम्हारे पास परमेश्वर का कोई आदेश है और तुम्हारा मिशन अभी तक पूरा नहीं हुआ है तो तुम नहीं मरोगे, फिर भले ही तुम्हें ऐसी कोई बीमारी क्यों न लग जाए जिसे प्राणघातक माना जाता है—परमेश्वर अभी तुम्हें नहीं ले जाएगा। भले ही तुम प्रार्थना न करो, सत्य न खोजो और अपनी बीमारी का इलाज न कराओ या भले ही तुम अपने इलाज में देरी कर दो—फिर भी तुम मरोगे नहीं। यह खास तौर से उन लोगों के लिए सच है जिनके पास परमेश्वर का एक महत्वपूर्ण आदेश है। जब उनका मिशन अभी पूरा होना बाकी है तो उन्हें चाहे कोई भी बीमारी हो जाए, वे तुरंत नहीं मरेंगे; वे अपने मिशन के पूरा होने के अंतिम क्षण तक जिएँगे(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। “एक सामान्य इंसान के तौर पर, अगर बीमारी के दौरान भी, तुम परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो पाते हो, तमाम दुख सह पाते हो, और फिर भी अपना कर्तव्य सामान्य रूप से निभा पाते हो, परमेश्वर द्वारा तुम्हें सौंपे गए आदेश पूरे कर पाते हो, तो यह अच्छी चीज है या बुरी? यह अच्छी चीज है, यह परमेश्वर के प्रति तुम्हारे समर्पण की गवाही है, यह तुम्हारे वफादारी से कर्तव्य निभाने की गवाही है, और यह वह गवाही है जो शैतान को शर्मिंदाकर उस पर विजय प्राप्त करती है। इसलिए हर सृजित प्राणी और हर परमेश्वर के चुने हुए व्यक्ति को किसी भी प्रकार के कष्ट को स्वीकार कर उसको समर्पित हो जाना चाहिए। तुम्हें इसे इसी तरह से समझना चाहिए, और तुम्हें यह सबक सीखना चाहिए और परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण प्राप्त करना चाहिए। यह परमेश्वर के इरादे के अनुरूप है और यही परमेश्वर की चाहत है। परमेश्वर हर सृजित प्राणी के लिए इन्हीं की व्यवस्था करता है। परमेश्वर का तुम्हें इन स्थितियों और हालात में डालना तुम्हें जिम्मेदारी, दायित्व और काम सौंपने के समान ही है, और इसलिए तुम्हें उन्हें स्वीकार कर लेना चाहिए(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपनी धारणाओं का समाधान करके ही व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास के सही मार्ग पर चल सकता है (1))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मेरे दिल में अचानक उजाला हो गया। हालाँकि डॉक्टर ने मुझे बहुत पहले ही मौत की सजा सुना दी थी, लेकिन जब तक मेरा जीवनकाल समाप्त नहीं होता और मेरा उद्देश्य पूरा नहीं होता, तब तक मैं नहीं मरूँगा, चाहे मेरी बीमारी कितनी भी गंभीर क्यों न हो जाए। कोई व्यक्ति कब मरता है, यह परमेश्वर के हाथों में है; इसका उसकी बीमारी की गंभीरता से कोई लेना-देना नहीं है। अगर एक दिन मैं इस बीमारी से मर भी जाता हूँ, तो इसका मतलब होगा कि मेरा समय आ गया है और मेरा उद्देश्य पूरा हो गया है। मुझे फिर भी समर्पण करना चाहिए और मुझे अपना कर्तव्य निभाने और सत्य का अनुसरण करने का अवसर देने के लिए परमेश्वर के अनुग्रह का धन्यवाद करना चाहिए। उसने मुझे कई सत्यों और रहस्यों को समझने और जीवन का अर्थ जानने दिया है। अगर मैं मर भी जाता हूँ, तो भी मेरा जीवन व्यर्थ नहीं जाएगा। यह समझकर मुझे बहुत सुकून महसूस हुआ। मैं अपनी बीमारी के बीच सत्य का अनुसरण करने और अपने कर्तव्य पर डटे रहने के लिए तैयार हो गया और मुझे अब अपने जीवन या मृत्यु की चिंता नहीं रही।

अक्टूबर 2020 में मैं जाँच के लिए एक प्रांतीय अस्पताल गया। डॉक्टर ने कहा, “तुम्हें पल्मोनरी हाइपरटेंशन होना असंभव है। इस बीमारी में जीने की औसत उम्र केवल दो से तीन साल होती है और तुम्हारी मौजूदा हालत बिल्कुल वैसी नहीं लगती।” फिर उसने मेरे कई टेस्ट करवाए। नतीजे देखने के बाद उसने माना कि मुझे वाकई पल्मोनरी हाइपरटेंशन है, लेकिन यह अपेक्षाकृत हल्का था और मेरा दिल अभी भी ठीक काम कर रहा था। मैं जानता था कि यह परमेश्वर की सुरक्षा है। इस बीमारी वाले कई अन्य लोगों ने तरह-तरह के इलाज आजमाए हैं : कुछ को कुछ ही सालों में दिल का दौरा पड़ जाता है, जबकि अन्य हालत बिगड़ने पर मर जाते हैं। लेकिन मैं आज जीवित हूँ और अपना कर्तव्य करने में सक्षम हूँ। यह वास्तव में परमेश्वर का अनुग्रह और दया है! हालाँकि अब यह बीमारी हमेशा मेरे साथ है, मैं अब इसे बेड़ियों के रूप में नहीं देखता, न ही मुझे इससे पीड़ा होती है। इसके बजाय मैं इसे स्वीकार कर समर्पण कर सकता हूँ। मुझे यह भी समझ में आ गया है कि यह बीमारी मेरे लिए परमेश्वर का उद्धार और सुरक्षा है। मैं तहे दिल से परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ!

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