48. जब मैंने जिम्मेदारी लेने का साहस नहीं किया तो मैं किस बारे में चिंतित थी?

चिन मू, चीन

अप्रैल 2023 में पाठ-आधारित कार्य की पर्यवेक्षक को इसलिए बरखास्त कर दिया गया कि वह प्रसिद्धि और रुतबे के पीछे भाग रही थी और इस कार्य में गड़बड़ी और बाधा पैदा कर रही थी। मुझे नया पर्यवेक्षक बना दिया गया। मुझे याद आया कि बहुत साल पहले परमेश्वर में विश्वास करने के कारण मुझे सीसीपी द्वारा गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने मुझे एक गेस्टहाउस में बंद कर दिया और दस दिनों तक मुझसे गुप्त रूप से पूछताछ की। अपनी चमड़ी बचाने के प्रयास में मैंने अपने साथ गिरफ्तार की गई दो बहनों के साथ गद्दारी की और इस तरह अपराध कर दिया। मुझे लगा कि मैं इतने महत्वपूर्ण कर्तव्य के लायक नहीं हूँ, इसलिए मैंने अपनी चिंताएँ व्यक्त कीं। अगुआ ने मेरे साथ संगति की कि किस तरह परमेश्वर व्यक्ति के क्षणिक अपराधों को नहीं देखता है, बल्कि उसके क्रियाकलापों के संदर्भ और प्रकृति के आधार पर उसका समग्र रूप से मूल्यांकन करता है। अहम यह है कि क्या व्यक्ति ने सचमुच पश्चात्ताप किया है। उसने मुझसे कहा कि मैं अपने अपराध से सही से पेश आऊँ। मैं बहुत प्रभावित हुई और मैं प्रशिक्षण के इस अवसर को संजोने के लिए भी तैयार हो गई। जब मैंने यह कर्तव्य शुरू किया तो उसके बस कुछ ही दिनों बाद अप्रत्याशित रूप से एक अन्य पर्यवेक्षक सुन जिया को भी प्रसिद्धि और रुतबे के पीछे भागने और सिद्धांतों के अनुसार अपना कर्तव्य न करने के कारण बरखास्त कर दिया गया। अगले कुछ दिनों तक ऐसा लगा जैसे कोई भारी चट्टान मेरे दिल को दबा रही हो। “मैंने अभी-अभी यह कर्तव्य शुरू किया है और मैं अभी तक काम से परिचित नहीं हूँ। हमारे पास पाठ-आधारित कार्यकर्ताओं की कमी है, कुछ भाई-बहनों की दशाएँ खराब हैं और काम आगे नहीं बढ़ रहा है। काम में इतनी सारी समस्याओं के चलते क्या मुझ जैसी काबिलियत वाला कोई व्यक्ति यह कार्य सँभाल सकता है? यूँ तो मैं पिछले कुछ साल से पाठ-आधारित कर्तव्य निभाती आ रही हूँ, लेकिन पर्यवेक्षक होना भिन्न है। व्यक्ति के पास अच्छी काबिलियत और कार्यक्षमता होनी ही चाहिए और उसे सिद्धांत भी भली-भाँति समझने ही चाहिए। लेकिन मेरी काबिलियत और कार्यक्षमता दोनों औसत हैं और मुझमें पेशेवर ज्ञान की भी कमी है। मैं इतना महत्वपूर्ण काम कैसे सँभाल सकती हूँ? मैं पहले ही एक गंभीर अपराध कर चुकी हूँ और अगर मैं कार्य में और बाधा या नुकसान पहुँचाती हूँ तो मैं यह जिम्मेदारी नहीं उठा पाऊँगी। अगर समस्या गंभीर हुई तो हो सकता है कि मेरे पास कोई अच्छा परिणाम या मंजिल न हो।” यह सोचकर मुझे लगा जैसे मेरी साँस रुक रही है और मैं इतनी चिंतित थी कि रात को सो नहीं पाती थी। अगले कुछ दिनों तक मैं अपने कर्तव्य के लिए कोई उत्साह तक नहीं जुटा पाई और मेरे हाथ में जो काम थे उन्हें बस निष्क्रिय होकर करती रही। अगुआ ने मुझे आहें भरकर दिन बिताते देख मेरी दशा के बारे में पूछा। मैंने उसे अपनी दशा और कठिनाइयों के बारे में बताया और उसने परमेश्वर के वचनों के आधार पर मेरे साथ संगति की। मेरी दशा में थोड़ा सुधार हुआ।

मैंने भक्ति के दौरान अपनी दशा से निपटने वाले परमेश्वर के वचन खोजे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब नूह ने वैसा किया जैसा परमेश्वर ने निर्देश दिया था, तो वह नहीं जानता था कि परमेश्वर के इरादे क्या थे। उसे नहीं पता था कि परमेश्वर कौन-सा कार्य पूरा करना चाहता था। परमेश्वर ने नूह को सिर्फ एक आज्ञा दी थी और अधिक स्पष्टीकरण के बिना उसे कुछ करने का निर्देश दिया था, नूह ने आगे बढ़कर इसे कर दिया। उसने गुप्त रूप से परमेश्वर की इच्छाओं को जानने की कोशिश नहीं की, न ही उसने परमेश्वर का विरोध किया या निष्ठाहीनता दिखाई। वह बस गया और एक शुद्ध एवं सरल हृदय के साथ इसे तदनुसार कर डाला। परमेश्वर उससे जो कुछ भी करवाना चाहता था, उसने किया और परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पित होना और उन्हें सुनना ही उसके कार्यों को सहारा देने वाला विश्वास था। इस प्रकार जो कुछ परमेश्वर ने उसे सौंपा था, उसने ईमानदारी एवं सरलता से उसे निपटाया था। समर्पण ही उसका सार था, उसके कार्यों का सार था—न कि अपनी अटकलें लगाना या प्रतिरोध करना, न ही अपने निजी हितों और अपने लाभ-हानि के विषय में सोचना था। इसके आगे, जब परमेश्वर ने कहा कि वह जलप्रलय से संसार का नाश करेगा, तो नूह ने नहीं पूछा कब या उसने नहीं पूछा कि चीजों का क्या होगा और उसने निश्चित तौर पर परमेश्वर से नहीं पूछा कि वह किस प्रकार संसार को नष्ट करने जा रहा था। उसने बस वैसा ही किया, जैसा परमेश्वर ने निर्देश दिया था। हालाँकि परमेश्वर चाहता था कि इसे बनाया जाए और जिससे बनाया जाए, उसने बिल्कुल वैसा ही किया, जैसा परमेश्वर ने उसे कहा था और तुरंत कार्रवाई भी शुरू कर दी। उसने परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा के रवैये के साथ परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार काम किया। क्या वह आपदा से खुद को बचाने में सहायता करने के लिए यह कर रहा था? नहीं। क्या उसने परमेश्वर से पूछा कि संसार को नष्ट होने में कितना समय बाकी है? उसने नहीं पूछा। क्या उसने परमेश्वर से पूछा या क्या वह जानता था कि जहाज़ बनाने में कितना समय लगेगा? वह यह भी नहीं जानता था। उसने बस समर्पण किया, सुना और तदनुसार कार्य किया(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I)। नूह के अनुभव पर मनन करते हुए मैं प्रभावित भी हुई और शर्मिंदा भी। जब नूह ने नाव बनाने का परमेश्वर का आदेश स्वीकार किया तो उसने कभी यह भी नहीं देखा था कि नाव कैसी दिखती है। वह जानता था कि नाव बनाने की प्रक्रिया में कई कठिनाइयाँ आएँगी, लेकिन परमेश्वर का आदेश अपने सामने होने पर नूह ने इन चीजों पर विचार नहीं किया, न ही वह कठिनाइयों में लोटता रहा या ठहरा रहा। इसके बजाय, उसने समर्पण किया और आज्ञा मानी और परमेश्वर की जरूरतों के अनुसार नौका बनाने के लिए साजोसामान तैयार किया। नूह ने अपने व्यक्तिगत लाभ या हानि पर विचार नहीं किया; उसने केवल इस बात पर विचार किया कि परमेश्वर की जरूरतों के अनुसार जल्द से जल्द नाव कैसे बनाई जाए ताकि परमेश्वर के दिल को दिलासा दी जा सके। नूह का चरित्र सचमुच अच्छा था! परमेश्वर के आदेश के प्रति नूह के सरल समर्पण के रवैये ने मुझे अपनी असफलताओं को लेकर शर्मिंदा और लज्जित महसूस कराया। मैंने अपने कर्तव्य में कठिनाइयों का सामना करते समय अपने रवैये के बारे में सोचा और यह भी सोचा कि इसकी तुलना नूह की कठिनाइयों से बिल्कुल भी नहीं की जा सकती है। हालाँकि काम में कुछ वास्तविक कठिनाइयाँ थीं, लेकिन वे ऐसी नहीं थीं जिनका समाधान न हो सके। उदाहरण के लिए, पाठ-आधारित कार्यकर्ताओं की कमी को अन्य कलीसियाओं के साथ समन्वय करके हल किया जा सकता था; पाठ-आधारित कार्यकर्ताओं की खराब दशाओं को उनके साथ परमेश्वर के वचनों पर संगति करके हल किया जा सकता था; और मेरी औसत काबिलियत और कार्यक्षमता की कमी को अगुआ और मेरे भाई-बहनों के साथ सहयोग करके दूर किया जा सकता था। इन सभी कठिनाइयों का समाधान किया जा सकता था। लेकिन इन कठिनाइयों का सामना करते हुए मैं उनसे सीधे तौर पर नहीं निपटी और काम को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें व्यावहारिक रूप से हल नहीं किया। इसके बजाय, मुझे चिंता थी कि मैं काम में देरी कर दूँगी और आखिरकार जिम्मेदार ठहरा दी जाऊँगी। मैंने केवल अपने व्यक्तिगत लाभ और हानि पर विचार किया। मैंने परमेश्वर के इरादों पर बिल्कुल भी विचार नहीं किया, न ही मैंने यह विचार किया कि मेरा कर्तव्य और ज़िम्मेदारी क्या है। मेरी मानवता सचमुच खराब थी! मुझमें जैसी मानवता थी उसके चलते मैं ऐसे महत्वपूर्ण कार्य को सँभालने के लायक ही नहीं थी। मुझे बहुत आत्म-ग्लानि हुई और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, जब मैं अपने कर्तव्य में इन कठिनाइयों का सामना करती हूँ तो मेरे दिल में कमजोरी आ जाती है। कृपया मेरा मार्गदर्शन करो और मुझे आस्था और संकल्प दो। मैं इसका अनुभव करने में तुझ पर निर्भर रहने को तैयार हूँ।” प्रार्थना करने के बाद मैंने जल्दी से विभिन्न कलीसियाओं से पाठ-आधारित कार्यकर्ताओं की तलाश की। कुछ समय बाद पाठ-आधारित कार्य के कर्मियों को आम तौर पर नियुक्त कर दिया गया और अगुआओं ने मेरे साथ सहयोग करने के लिए एक नयी पर्यवेक्षक को चुना था। सबके वास्तविक सहयोग से पाठ-आधारित कार्य में धीरे-धीरे सुधार हो गया।

लेकिन अच्छा दौर ज्यादा दिन नहीं चला। कुछ समय बाद कार्य के नतीजे गिरने लगे। ठीक उसी समय मुझे अगुआओं का एक पत्र मिला, जिसमें इंगित किया गया था कि हम लोगों को विकसित करने पर ध्यान नहीं दे रहे हैं और हाल-फिलहाल संपादित किए गए धर्मोपदेशों की गुणवत्ता बहुत अच्छी नहीं थी। हमसे कहा गया था कि हम इन समस्याओं के कारणों का विश्लेषण करें। अगुआओं का पत्र देखकर मेरा दिल अचानक घबरा गया। “अब काम में इतनी सारी समस्याएँ उजागर हो गई हैं। इसकी वजह यह है कि मैंने, पर्यवेक्षक ने, अच्छी तरह अगुआई नहीं की और काम की अंतिम जाँच ठीक से नहीं की। लगता है कि यह कार्य सँभालने के लिए मेरी काबिलियत अभी भी बहुत ही खराब है!” फिर मैंने पिछली पर्यवेक्षक के बारे में सोचा, जिसे प्रसिद्धि और रुतबे के पीछे भागने और कार्य में गड़बड़ियाँ और बाधाएँ उत्पन्न करने के कारण बरखास्त कर दिया गया था। यूँ तो मैंने जानबूझकर गड़बड़ियाँ और बाधाएँ नहीं डाली थीं, लेकिन अगर मेरी खराब काबिलियत के कारण कार्य ठप हो गया तो क्या यह भी एक अपराध नहीं होगा? मैंने जितना अधिक सोचा मैं उतनी ही अधिक नकारात्मक होती गई और मुझे पूरे बदन में कमजोरी महसूस हुई। मैंने तय मान लिया कि मैं सचमुच पर्यवेक्षक बनने लायक नहीं हूँ, मुझे पद छोड़ देना चाहिए और किसी ज्यादा काबिल को कार्यभार सँभालने देना चाहिए। यह कम से कम कुछ आत्म-जागरूकता तो दिखाएगा। मुझे वे दिन याद आ रहे थे जब मैं सिर्फ एक टीम सदस्य थी, जब सारी चिंताएँ पर्यवेक्षक की होती थीं और मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं लेनी होती थी। यूँ तो मैं जानती थी कि ऐसे ख्याल गलत हैं, लेकिन मैं अपने विचारों पर काबू नहीं रख पा रही थी। उस समय एक पत्र का तत्काल जवाब देना था, लेकिन मैं बस कंप्यूटर को ताकती रही, मेरा दिल शांत नहीं हो पा रहा था। समय को यूँ ही बीतते देख, मुझे एहसास हुआ कि ऐसी दशा में रहने से काम पर असर पड़ेगा, इसलिए मैंने जल्दी से परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, काम में इतनी सारी समस्याएँ और विचलन देखकर, मैं बार-बार पीछे हटना चाहती हूँ। मैं जानती हूँ कि यह तुम्हारे इरादों के अनुरूप नहीं है। कृपया मेरा यह मार्गदर्शन करो कि मैं खुद को समझ लूँ और इस गलत दशा से बाहर निकल लूँ।”

प्रार्थना करने के बाद मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “मनुष्य द्वारा अपना कर्तव्य निभाना वास्तव में उस सबकी सिद्धि है, जो मनुष्य के भीतर अंतर्निहित है, अर्थात् जो मनुष्य के लिए संभव है। इसके बाद उसका कर्तव्य पूरा हो जाता है। मनुष्य की सेवा के दौरान उसके दोष उसके क्रमिक अनुभव और न्याय से गुज़रने की प्रक्रिया के माध्यम से धीरे-धीरे कम होते जाते हैं; वे मनुष्य के कर्तव्य में बाधा या विपरीत प्रभाव नहीं डालते। वे लोग, जो इस डर से सेवा करना बंद कर देते हैं या हार मानकर पीछे हट जाते हैं कि उनकी सेवा में कमियाँ हो सकती हैं, वे सबसे ज्यादा कायर होते हैं। यदि लोग वह व्यक्त नहीं कर सकते, जो उन्हें सेवा के दौरान व्यक्त करना चाहिए या वह हासिल नहीं कर सकते, जो उनके लिए सहज रूप से संभव है, और इसके बजाय वे बेमन से काम करते हैं, तो उन्होंने अपना वह प्रयोजन खो दिया है, जो एक सृजित प्राणी में होना चाहिए। ऐसे लोग ‘औसत दर्जे के’ माने जाते हैं; वे बेकार का कचरा हैं। इस तरह के लोग उपयुक्त रूप से सृजित प्राणी कैसे कहे जा सकते हैं? क्या वे भ्रष्ट प्राणी नहीं हैं, जो बाहर से तो चमकते हैं, परंतु भीतर से सड़े हुए हैं? ... जो लोग अपना कर्तव्य नहीं निभाते, वे परमेश्वर के विरुद्ध अत्यधिक विद्रोही और उसके अत्यधिक ऋणी होते हैं, फिर भी वे पलट जाते हैं और हमलावर होकर कहते हैं कि परमेश्वर गलत है। इस तरह के मनुष्य पूर्ण बनाए जाने लायक कैसे हो सकते हैं? क्या यह निकाल दिए जाने और दंडित किए जाने की ओर नहीं ले जाता? जो लोग परमेश्वर के सामने अपना कर्तव्य नहीं निभाते, वे पहले से ही सर्वाधिक जघन्य अपराधों के दोषी हैं, जिसके लिए मृत्यु भी अपर्याप्त सज़ा है, फिर भी वे परमेश्वर के साथ बहस करने और उसके साथ अपनी बराबरी करने की धृष्टता करते हैं। ऐसे लोगों को पूर्ण बनाने का क्या महत्व है? जब लोग अपना कर्तव्य पूरा करने में विफल होते हैं, तो उन्हें अपराध और कृतज्ञता महसूस करनी चाहिए; उन्हें अपनी कमजोरी और अनुपयोगिता, अपनी विद्रोहशीलता और भ्रष्टता से घृणा करनी चाहिए, और इससे भी अधिक, उन्हें परमेश्वर को अपना जीवन अर्पित कर देना चाहिए। केवल तभी वे सृजित प्राणी होते हैं, जो परमेश्वर से सच्चा प्रेम करते हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के आशीषों और प्रतिज्ञाओं का आनंद लेने और उसके द्वारा पूर्ण किए जाने के योग्य हैं(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर)। परमेश्वर कहता है कि लोगों के कर्तव्यों में विचलन और खामियाँ होना सामान्य है और अगर वे उन्हें पहचान लेते हैं और समय रहते चीजों को बदल सकते हैं तो वह इसके लिए उन्हें दोषी नहीं ठहराएगा। लेकिन अगर कोई अपने कर्तव्य में विचलन और खामियाँ आने पर कायरता से पीछे हट जाता है, या यहाँ तक कि ढेर सारे कुतर्क देता है और अपना कर्तव्य करना बंद कर देता है, तो ऐसे व्यक्ति में मानवता और विवेक की कमी होती है और वह परमेश्वर के लिए घृणित है। अगर वह पश्चात्ताप नहीं करता है तो अंततः परमेश्वर द्वारा हटा दिया जाएगा। परमेश्वर के न्याय के वचन मेरे दिल को बेध गए। मैं कार्य को अच्छी तरह न करके पहले ही नुकसान पहुँचा चुकी थी और अब जब समस्याएँ उजागर हो चुकी थीं तो उनका समाधान करने और विचलनों को ठीक करने की मुझे कोई जल्दी नहीं थी। इसके बजाय, मेरा दिल केवल अपने व्यक्तिगत हितों के बारे में सोच रहा था, काम को पंगु करने के लिए जिम्मेदार ठहराए जाने से डर रहा था, इसलिए मैं अपने कर्तव्य से ऐसे हाथ झटकना चाहती थी जैसे यह आग से निकला आलू हो। मैं बहुत स्वार्थी और नीच थी! असल में, पाठ-आधारित कार्य के नतीजे गिर चुके थे और जब अगुआओं ने कार्य में समस्याओं और विचलनों को इंगित किया तो वे मुझे व्यावहारिक रूप से सिखा रहे थे कि कार्य कैसे करना है। मुझे कार्य को आगे बढ़ाने के लिए सबके साथ मिलकर इन समस्याओं और विचलनों पर विचार करना चाहिए था और उनका सारांश निकालना चाहिए था। लेकिन मैंने न केवल इन समस्याओं पर विचार नहीं किया और इनका सारांश नहीं निकाला और न ही अपने कर्तव्य को ठीक से न करने के लिए मुझे कोई अपराध-बोध या पछतावा हुआ, बल्कि मैं मन ही मन बहस भी कर रही थी, मैं यह सोच रही थी कि परमेश्वर ने मुझे अच्छी काबिलियत नहीं दी है और मैं किसी ज्यादा काबिल व्यक्ति के पक्ष में पद छोड़ने के बहाने की ओट लेकर अपने कर्तव्य से जी चुराने की कोशिश कर रही थी। मुझे यह भी लगा कि मुझमें आत्म-जागरूकता है। लेकिन अब मैं देखती हूँ कि यह आत्म-जागरूकता होना लेशमात्र भी नहीं था। मैं तो बस निर्लज्ज बनी थी और अपने कर्तव्य को त्याग रही थी! मैंने इस बारे में सोचा कि कैसे अगुआओं ने इंगित किया कि हम लोगों को विकसित करने पर ध्यान नहीं दिया, जो एक तथ्य था। भाई-बहनों ने अभी-अभी प्रशिक्षण शुरू किया था और वे सिद्धांतों को भली-भाँति नहीं समझते थे, इसलिए हमें एक साथ अध्ययन और संवाद करना चाहिए था और एक-दूसरे की खूबियों से सीखकर अपनी कमजोरियों की भरपाई करनी चाहिए थी। अगुआओं ने इंगित किया कि हमने जो धर्मोपदेश संपादित किए थे उनकी गुणवत्ता अच्छी नहीं थी, यह भी एक तथ्य था। सत्य के बारे में मेरी अपनी समझ उथली थी और मैं समस्याओं के सार की असलियत नहीं देख पाई थी, इसलिए उन्हें हल करने में मुझमें शक्ति का अभाव था। अगुआओं का यह यह इंगित करना मेरे लिए एक अनुस्मारक था! इसलिए, मैंने जल्दी से अपने भाई-बहनों के साथ उन समस्याओं के बारे में संवाद किया जो अगुआ ने बताई थीं। सभी ने अपने कर्तव्यों में विचलनों और खामियों को भी पहचाना और वे सुधार करने को तैयार हो गए। उसके बाद से हमारे पास अपने कर्तव्यों में हमारी एक दिशा और लक्ष्य था।

मैंने आध्यात्मिक भक्ति के दौरान चिंतन करना जारी रखा, “ऐसा क्यों है कि हर बार जब मैं अपने कार्य में कठिनाइयों और समस्याओं का सामना करती हूँ तो मेरा दिल इतना बेचैन हो जाता है और यहाँ तक कि मैं अपने कर्तव्य से भागना चाहती हूँ?” मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “कुछ लोग अपना कर्तव्य निभाते हुए जिम्मेदारी लेने से डरते हैं। यदि कलीसिया उन्हें कोई काम देती है, तो वे पहले इस बात पर विचार करेंगे कि इस कार्य के लिए उन्हें कहीं उत्तरदायित्व तो नहीं लेना पड़ेगा, और यदि लेना पड़ेगा, तो वे उस कार्य को स्वीकार नहीं करेंगे। किसी काम को करने के लिए उनकी शर्तें होती हैं, जैसे सबसे पहले, वह आराम से किया जाने वाला काम होना चाहिए; दूसरा, वह व्यस्त रखने या थका देने वाला न हो; और तीसरा, चाहे वे कुछ भी करें, वे कोई जिम्मेदारी नहीं लेंगे। इन शर्तों के साथ वे कोई काम हाथ में लेते हैं। ऐसा व्यक्ति किस प्रकार का होता है? क्या ऐसा व्यक्ति धूर्त और कपटी नहीं होता? वह छोटी सी छोटी जिम्मेदारी भी नहीं उठाना चाहता। उन्हें यहाँ तक डर लगता है कि पेड़ों से झड़ते हुए पत्ते कहीं उनकी खोपड़ी न तोड़ दें। ऐसा व्यक्ति क्या कर्तव्य कर सकता है? परमेश्वर के घर में उनका क्या उपयोग हो सकता है? परमेश्वर के घर का कार्य शैतान से युद्ध करने के कार्य के साथ-साथ राज्य के सुसमाचार फैलाने से भी जुड़ा होता है। ऐसा कौन-सा काम है जिसमें उत्तरदायित्व न हो? क्या तुम लोग कहोगे कि अगुआ होना जिम्मेदारी का काम है? क्या उनकी जिम्मेदारियाँ भी बड़ी नहीं होतीं, और क्या उन्हें और ज्यादा जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए? चाहे तुम सुसमाचार का प्रचार करते हो, गवाही देते हो, वीडियो बनाते हो या कुछ और करते हो—इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम क्या करते हो—जब तक इसका संबंध सत्य सिद्धांतों से है, तब तक उसमें उत्तरदायित्व होंगे। यदि तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन में कोई सिद्धांत नहीं हैं, तो उसका असर परमेश्वर के घर के कार्य पर पड़ेगा, और यदि तुम जिम्मेदारी लेने से डरते हो, तो तुम कोई काम नहीं कर सकते। जो व्यक्ति अपना कर्तव्य निभाने में जिम्मेदारी लेने से डरता है, क्या वह कायर है या उसके स्वभाव में कोई समस्या है? तुम्हें इसका भेद पहचानना आना चाहिए। वास्तव में, यह कायरता का मुद्दा नहीं है। जब अमीर बनने की बात आती है या जब वे अपने फायदे के लिए कुछ कर रहे होते हैं, तो वे इतने साहसी कैसे हो जाते हैं? वे इन चीजों के लिए कोई भी जोखिम उठा लेंगे। लेकिन जब वे कलीसिया के लिए, परमेश्वर के घर के लिए काम करते हैं, तो वे बिल्कुल भी कोई जोखिम नहीं उठाते। ऐसे लोग स्वार्थी और नीच होते हैं, सबसे ज्यादा कपटी होते हैं। कर्तव्य निर्वहन में जिम्मेदारी न उठाने वाला व्यक्ति परमेश्वर के प्रति जरा भी ईमानदार नहीं होता, उसकी वफादारी की क्या बात करना। किस तरह का व्यक्ति जिम्मेदारी उठाने की हिम्मत करता है? किस प्रकार के इंसान में भारी बोझ वहन करने का साहस है? जो व्यक्ति अगुआई करते हुए परमेश्वर के घर के काम के सबसे महत्वपूर्ण पलों में बहादुरी से आगे बढ़ता है, जो अहम और अति महत्वपूर्ण कार्य देखकर बड़ी जिम्मेदारी उठाने और मुश्किलें सहने से नहीं डरता। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के प्रति वफादार होता है, मसीह का अच्छा सैनिक होता है। क्या बात ऐसी है कि लोग कर्तव्य की जिम्मेदारी लेने से इसलिए डरते हैं, क्योंकि उन्हें सत्य की समझ नहीं होती? नहीं; समस्या उनकी मानवता में होती है। उनमें न्याय या जिम्मेदारी की भावना नहीं होती, वे स्वार्थी और नीच लोग होते हैं, वे परमेश्वर के सच्चे विश्वासी नहीं होते, और वे सत्य जरा भी नहीं स्वीकारते। इन कारणों से उन्हें बचाया नहीं जा सकता। परमेश्वर के विश्वासियों को सत्य हासिल करने के लिए बहुत भारी कीमत चुकानी ही होगी और उसे अभ्यास में लाने के लिए उन्हें बहुत-सी रुकावटों से गुजरना होगा। उन्हें बहुत-सी चीजों का त्याग करना होगा, दैहिक हितों को छोड़ना होगा और कष्ट उठाने पड़ेंगे। तब जाकर वे सत्य का अभ्यास करने योग्य बन पाएँगे। तो, क्या जिम्मेदारी लेने से डरने वाला इंसान सत्य का अभ्यास कर सकता है? यकीनन वह सत्य का अभ्यास नहीं कर सकता, सत्य हासिल करना तो दूर की बात है। वह सत्य का अभ्यास करने और अपने हितों को होने वाले नुकसान से डरता है; उन्हें अपमानित होने और निंदा का और आलोचना का डर होता है और वे सत्य का अभ्यास करने की हिम्मत नहीं करते। नतीजतन, वह उसे हासिल नहीं कर सकता। परमेश्वर में उसका विश्वास चाहे जितना पुराना हो, वह उसका उद्धार प्राप्त नहीं कर सकता। परमेश्वर के घर में कर्तव्य निभाने वाले लोग ऐसे होने चाहिए जिनमें कलीसिया का कार्य करते समय बोझ उठाने की भावना हो, जो जिम्मेदारी लें, सत्य सिद्धांत कायम रखें, और जो कष्ट सहकर कीमत चुकाएँ। अगर कोई इन क्षेत्रों में कम होता है, तो वह कर्तव्य करने के अयोग्य होता है, और कर्तव्य करने की शर्तों को पूरा नहीं करता है। ... अगर कोई समस्या आने पर तुम अपनी रक्षा करते हो और अपने लिए बचने का रास्ता रखते हो, पिछले दरवाजे से निकलना चाहते हो, तो क्या ऐसा करके तुम सत्य का अभ्यास कर रहे हो? यह सत्य का अभ्यास करना नहीं है—यह धूर्त होना है। अब तुम परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य निभा रहे हो। कोई कर्तव्य निभाने का पहला सिद्धांत क्या है? वह यह है कि पहले तुम्हें अपने पूरे दिल से भरसक प्रयास करते हुए वह कर्तव्य निभाना चाहिए और इस प्रकार परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करनी चाहिए। यह एक सत्य सिद्धांत है, जिसे तुम्हें अभ्यास में लाना चाहिए। पिछला दरवाजा और बचने का रास्ता खुला रखकर अपनी रक्षा करना अविश्वासियों के अभ्यास का सिद्धांत और उनका सर्वोच्च फलसफा है। सभी चीजों में, पहले अपने बारे में सोचना, अपने हितों को सबसे ऊपर रखना और दूसरों के बारे में न सोचना, यह मानना कि परमेश्वर के घर के हितों और दूसरों के हितों का खुद से कोई लेना-देना नहीं है, पहले अपने हितों के बारे में सोचना और फिर बचने का रास्ता सोचना—क्या एक अविश्वासी ऐसा ही नहीं होता? एक अविश्वासी ठीक ऐसा ही होता है। इस तरह का व्यक्ति कर्तव्य निभाने के अयोग्य है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद आठ : वे दूसरों से केवल अपने प्रति समर्पण करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर के प्रति नहीं (भाग एक))। मैंने परमेश्वर के वचनों से पहचाना कि जब भी मेरे काम में विचलन या कठिनाइयाँ आती थीं, तो मेरे दिल में इतनी बड़ी उथल-पुथल मचने की मुख्य वजह यह थी कि मैं अपने कर्तव्य में ज़िम्मेदारी लेने से हमेशा डरती थी; ऐसा इसलिए था कि मेरा स्वार्थी और कपटी स्वभाव परेशानी पैदा करता था। कर्मियों के फेरबदल और काम में कठिनाइयों और समस्याओं का सामना होने पर मेरा पहला विचार यह था कि पाठ-आधारित कार्य परमेश्वर के घर का एक महत्वपूर्ण कार्य है और अगर मैं एक पर्यवेक्षक का कर्तव्य नहीं सँभाल सकी और कार्य में देरी कर दी तो मैं जिम्मेदार ठहराई जाऊंगी। यूँ तो मैंने अपना कर्तव्य त्यागने की हिम्मत नहीं की, लेकिन मेरे दिल को हमेशा लगता था कि यह कर्तव्य बहुत जोखिम भरा है। चिंता और पीड़ा की तो बात ही छोड़ दो, अगर कार्य के नतीजे खराब हुए या अगर विचलन या खामियाँ हुईं तो कम से कम मैं बरखास्त कर दी जाऊँगी; अगर मैंने बहुत सारे अपराध संचित कर दिए तो मेरे पास अच्छा परिणाम और गंतव्य नहीं होगा। यह सोचकर मैंने इस कर्तव्य को एक बोझ, एक भार के रूप में देखा और इससे जी चुराना चाहा। काम में आने वाली समस्याओं और कठिनाइयों को हल करने की भी मेरी कोई इच्छा नहीं थी। एक पर्यवेक्षक के रूप में मुझे सक्रिय रूप से अपनी जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी और जो मुझे समझ में नहीं आता था उसके बारे में अगुआ से पूछना चाहिए था। अगर मैं अपने इरादे सही रखती और अपनी पूरी कोशिश करती तो भले ही मैं जो करती वह मामूली होता और अंत में नतीजे बहुत अच्छे नहीं होते तब भी कम से-कम मुझे कोई पछतावा तो नहीं होता। लेकिन यह कर्तव्य निभाते हुए मैं जो ख्याल रखती थी वह यही था कि जिम्मेदारी लेने से कैसे बचा जाए। मेरा दिल मेरे कर्तव्य में बिल्कुल भी नहीं था। मैंने अपने कर्तव्य के प्रति कोई सच्चा दिल नहीं दिखाया, लगन की तो बात ही छोड़ दो। मैं सचमुच इतनी स्वार्थी और नीच थी! परमेश्वर का घर लोगों को इसलिए विकसित करता है ताकि वे अपने कर्तव्य निभाते समय सत्य के विभिन्न पहलुओं को समझने का प्रयास कर सकें और अपने कर्तव्य अच्छी तरह से निभाएँ। लोगों के लिए यह एक व्यावहारिक प्रशिक्षण है। कोई भी शुद्ध समझ वाला अपने कर्तव्य को संजोएगा। लेकिन मेरे अनुसरण के पीछे का मेरा दृष्टिकोण गलत था। मैं अपने कर्तव्य में कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहती थी और बस किताबी ढंग से अपना कर्तव्य निभाते हुए एक साधारण टीम सदस्य बनना चाहती थी, पर्यवेक्षक द्वारा हर चीज़ की व्यवस्था किए जाने का इंतज़ार करती थी। असल में, यूँ तो उस तरह से अपना कर्तव्य निभाने का मतलब जिम्मेदारी न लेना था, लेकिन मुझे कम प्रशिक्षण और कम सत्य मिलता और मेरा जीवन धीरे से प्रगति करता। एक पर्यवेक्षक होने का अभ्यास करके यूँ तो मैंने ज्यादा समस्याओं और कठिनाइयों का सामना किया और दबाव और अधिक था, लेकिन मैंने हासिल भी अधिक किया। मैंने सिद्धांतों को भली-भाँति समझने और लोगों और चीजों को देखने में कुछ लाभ प्राप्त किए। साथ ही, कार्य की निगरानी में कुछ समस्याएँ ऐसी थीं जहाँ मैं केवल सतही घटनाक्रम को देख पाती थी और असली बात को नहीं भली-भाँति समझ नहीं पाती थी, जिसके कारण मैं समस्याओं का समाधान करने में हमेशा असमर्थ रही। अगुआओं के मार्गदर्शन से ही मैंने अपनी कमियों को खोजा। सत्य खोज कर मैंने समस्याओं की प्रकृति और परिणामों को पहचाना और अभ्यास के सिद्धांत पाए, इस प्रकार समस्याओं को उनकी जड़ से हल किया। ये लाभ वे सारी चीजें थीं जो मैंने एक पर्यवेक्षक का कर्तव्य निभाने से हासिल की थीं। मैं यह भी समझ गई कि परमेश्वर के घर में व्यक्ति चाहे कोई भी कर्तव्य निभाए, उसे जिम्मेदारी का एक हिस्सा लेना पड़ता है। यह जिम्मेदारी किसी व्यक्ति द्वारा नहीं दी जाती है, बल्कि परमेश्वर से आती है। यह समझकर मैंने परमेश्वर से एक प्रण किया कि कार्य में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों, मैं परमेश्वर पर निर्भर रहने और अपनी जिम्मेदारियाँ लेने को तैयार हूँ। मैं अब और नकारात्मक नहीं रहूँगी, न ही मैं अपने कर्तव्य से भागूँगी।

एक बार, मैंने अनुभवजन्य गवाही के एक लेख में उद्धृत परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जो मेरी दशा के लिए बहुत उपयुक्त था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कुछ लोग यह नहीं मानते कि परमेश्वर का घर लोगों के साथ न्यायपूर्वक व्यवहार कर सकता है। वे यह नहीं मानते कि परमेश्वर के घर में परमेश्वर का और सत्य का शासन चलता है। उनका मानना है कि व्यक्ति चाहे कोई भी कर्तव्य क्यों न करता हो, अगर उसमें कोई समस्या उत्पन्न होती है, तो परमेश्वर का घर तुरंत उस व्यक्ति से निपटेगा, उसे कर्तव्य करने की उसकी योग्यता से वंचित कर देगा, उसे दूर भेज देगा या फिर उसे कलीसिया से ही निकाल देगा। क्या मामला वाकई ऐसा ही है? निश्चित रूप से नहीं। परमेश्वर का घर हर व्यक्ति के साथ सत्य सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करता है। परमेश्वर सभी के साथ धार्मिकता से व्यवहार करता है। वह केवल यह नहीं देखता कि व्यक्ति ने किसी परिस्थिति-विशेष में कैसा व्यवहार किया है; वह उस व्यक्ति की प्रकृति सार, उसके इरादे और उसका रवैया देखता है। खासतौर से वह यह देखता है कि जब वह व्यक्ति गलती करता है तब क्या वह आत्मचिंतन कर सकता है, क्या उसे प्रायश्चित होता है और क्या वह उसके वचनों के आधार पर समस्या के सार को समझ सकता है जिससे वह सत्य को समझने लगे और अपने आपसे घृणा करने लगे और सच में पश्चात्ताप करे। यदि किसी व्यक्ति में यह सही रवैया नहीं है और वह पूरी तरह से व्यक्तिगत इरादों से दूषित है, यदि वह छोटी-मोटी योजनाओं से भरा हुआ है और सिर्फ भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करता है और यदि, जब समस्याएँ उत्पन्न होती हैं तब वह दिखावा, कुतर्क और खुद को सही ठहराने तक का सहारा लेता है और अपने किए को मानने से हठपूर्वक इनकार करता है, तो ऐसे व्यक्ति को बचाया नहीं जा सकता। वह सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करता और पूरी तरह से प्रकट हो चुका है। जो लोग सही लोग नहीं हैं और जो सत्य को जरा भी स्वीकार नहीं कर सकते, वे मूलतः छद्म-विश्वासी होते हैं और उन्हें केवल हटाया जा सकता है। ... अच्छा बताओ, अगर किसी व्यक्ति ने कोई गलती की है, लेकिन वह सही समझ प्राप्त कर लेता है और पश्चात्ताप करने को तैयार है, तो क्या परमेश्वर का घर उसे एक अवसर नहीं देगा? जैसे-जैसे परमेश्वर की छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना समापन की ओर बढ़ रही है, ऐसे बहुत-से कर्तव्य हैं जिन्हें पूरा करने की जरूरत है। लेकिन अगर तुम में कोई अंतरात्मा और विवेक नहीं है और तुम अपने उचित काम पर ध्यान नहीं देते हो, अगर तुमने कोई कर्तव्य करने का अवसर प्राप्त किया है, लेकिन तुम उसे सँजोना नहीं जानते, सत्य का जरा भी अनुसरण नहीं करते और सबसे अनुकूल समय अपने हाथ से निकल जाने देते हो तो तुम तुम्हारा खुलासा हो जाएगा। अगर तुम अपने कर्तव्य करने में लगातार लापरवाह रहते हो, और काट-छाँट के समय जरा भी समर्पण-भाव नहीं रखते, तो क्या परमेश्वर का घर तब भी किसी कर्तव्य को करने के लिए तुम्हारा उपयोग करेगा? परमेश्वर के घर में सत्य का शासन होता है, शैतान का नहीं और हर चीज पर परमेश्वर का फैसला ही अंतिम होता है। वही इंसानों को बचाने का कार्य कर रहा है, वही सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है। क्या सही है और क्या गलत, तुम्हें इसका विश्लेषण करने की कोई जरूरत नहीं है; तुम्हें बस सुनना और समर्पण करना है। जब तुम्हारी काट-छाँट हो तब तुम्हें सत्य स्वीकार करना चाहिए और अपनी गलतियाँ सुधारनी चाहिए। अगर तुम ऐसा करते हो तो परमेश्वर का घर कर्तव्य करने की तुम्हारी योग्यता से तुम्हें वंचित नहीं करेगा। अगर तुम हटाए जाने से हमेशा डरते हो, खुद को हमेशा सही ठहराते हो, खुद को बचाने के लिए हमेशा कुतर्कों का उपयोग करते हो तो यह एक समस्या है। दूसरे देखेंगे कि तुम सत्य को जरा भी स्वीकार नहीं करते हो और तुम पूरी तरह से अविवेकपूर्ण हो। यह मुसीबत का कारण बनेगा और कलीसिया को तुमसे निपटना पड़ेगा। तुम अपना कर्तव्य करने में सत्य बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते हो और हमेशा बेनकाब किए जाने और हटाए जाने से डरते हो। तुम्हारा यह डर मानवीय इरादों से दूषित है; इस डर में भ्रष्ट शैतानी स्वभाव और साथ ही संदेह, सतर्कता और गलतफहमी भी शामिल हैं। इनमें से कोई भी ऐसा रवैया नहीं है जो एक व्यक्ति में होना चाहिए(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए मैंने सोचा कि जब मेरे साथ चीजें घटित होती हैं तो मैं कैसे हमेशा परमेश्वर के प्रति सतर्क और गलतफहमी में रहती हूँ और प्रकट किए जाने और हटाए जाने से डरती हूँ। यह इसलिए था क्योंकि मुझे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का कोई ज्ञान नहीं था। मैं सोचती थी कि मैंने अतीत में एक गंभीर अपराध किया है और अगर मैंने अपना कर्तव्य अच्छी तरह से न निभाया और कलीसिया के कार्य में बाधा और क्षति पहुँचाई तो मैं और भी बहुत से अपराध करूँगी और अगर वे गंभीर हुए तो मुझे हटा दिया जाएगा। असल में, अगर मैंने अपना कर्तव्य पूरे दिल और ताकत से निभाया, लेकिन मैं अपनी खराब काबिलियत के कारण अक्षम रही तो परमेश्वर का घर मेरी काबिलियत के अनुसार मुझे एक उपयुक्त कर्तव्य में लगा देगा और इस कारण से मुझे नहीं हटाएगा। जो जानबूझकर कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी और बाधा डालते हैं और चाहे उनके साथ कैसे भी संगति क्यों न की जाए पश्चात्ताप करने से इनकार करते हैं, केवल वे हटाए जाएंगे। यह ठीक पिछली पर्यवेक्षक की तरह है। उसने अपनी प्रसिद्धि और रुतबे की खातिर जानबूझकर सिद्धांतों का उल्लंघन किया और गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा कीं। उस दौरान अगुआ ने उसके साथ संगति की और उसकी मदद की, लेकिन उसने पश्चात्ताप नहीं किया और अंततः वह बरखास्त कर दी गई और हटा दी गई। परमेश्वर के घर में लोगों के साथ पेश आने के सिद्धांत हैं। यह लोगों के अपराधों से हर व्यक्ति की भिन्न पृष्ठभूमि और स्थिति के अनुसार निपटता है और सबको एक ही लाठी से नहीं हाँकने का तरीका नहीं अपनाता है। मेरे कर्तव्य निर्वहन में बहुत-सी समस्याएँ उजागर हुईं जिन्होंने काम की प्रगति पर असर डाला, इनका मुख्य कारण यह था कि मैं कम समय के लिए अभ्यास कर रही थी। काम को अच्छी तरह से कैसे किया जाए, इसके लिए मेरे पास न कोई दिशा थी, न कोई मार्ग था और कभी-कभी मैं मुख्य बिंदुओं को भली-भाँति नहीं समझ पाती थी। मैं जानबूझकर गड़बड़ी या बाधा नहीं डालना चाहती थी। जब मैंने अपने विचलनों को पहचाना और उन्हें समय पर सुधारा तो परमेश्वर के घर ने अभी भी मुझे प्रशिक्षण का अवसर दिया और अगुआओं ने भी मुझे मार्गदर्शन दिया कि वास्तविक कार्य कैसे करना है। मुझे परमेश्वर के प्रति सतर्क नहीं रहना चाहिए या उसे गलत नहीं समझना चाहिए। मुझे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का कोई ज्ञान नहीं था और मैं परमेश्वर के प्रति सतर्कता और गलतफहमी में जीती थी। मेरे अपने जीवन प्रवेश को नुकसान हुआ और इसका असर मेरे कर्तव्य पर भी पड़ा। ये सभी मेरे सत्य न खोजने के परिणाम थे।

पलक झपकते ही अक्टूबर आ गया। सीसीपी द्वारा गिरफ्तारियों के कारण कलीसिया में कार्य की विभिन्न मदें बाधित हो गईं और काम के नतीजे फिर से गिर गए। मेरे भाई-बहन भी आम तौर पर कठिनाइयों के बीच जी रहे थे। इस बार, मैं पहले की तरह न तो ढीली पड़ी और न ही नकारात्मक हुई, बल्कि मैंने अपनी सहयोगी बहन के साथ चर्चा की कि मौजूदा समस्याओं को कैसे हल किया जाए। इस समय अगुआओं ने भी हमारे कार्य में कुछ विचलन इंगित किए और अभ्यास के कुछ मार्गों पर संगति की। अगुआओं का पत्र देखकर मैं यह सोचे बिना न रह पाई, “अगर इसके बाद भी काम आगे नहीं बढ़ा तो क्या होगा? अगर काम में देरी हुई तो मैं यह जिम्मेदारी सहन नहीं कर पाऊँगी!” मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से अपना बचाव करने के बारे में सोच रही थी, इसलिए मैंने प्रार्थना और खोज की। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “एक ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? सबसे पहले, परमेश्वर के वचनों के बारे में कोई संदेह नहीं होना। यह ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्तियों में से एक है। इसके अलावा, सबसे महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है सभी मामलों में सत्य की खोज और उसका अभ्यास करना—यह सबसे महत्वपूर्ण है। तुम कहते हो कि तुम ईमानदार हो, लेकिन तुम हमेशा परमेश्वर के वचनों को अपने मस्तिष्क के कोने में धकेल देते हो और वही करते हो जो तुम चाहते हो। क्या यह एक ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्ति है? तुम कहते हो, ‘भले ही मेरी योग्यता कम है, लेकिन मेरे पास एक ईमानदार दिल है।’ फिर भी, जब तुम्हें कोई कर्तव्य मिलता है, तो तुम इस बात से डरते हो कि अगर तुमने इसे अच्छी तरह से नहीं किया तो तुम्हें पीड़ा सहनी और इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी, इसलिए तुम अपने कर्तव्य से बचने के लिए बहाने बनाते हो या फिर सुझाते हो कि इसे कोई और करे। क्या यह एक ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्ति है? स्पष्ट रूप से, नहीं है। तो फिर, एक ईमानदार व्यक्ति को कैसे व्यवहार करना चाहिए? उसे परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए, जो कर्तव्य उसे निभाना है उसके प्रति समर्पित होना चाहिए और परमेश्वर के इरादों को पूरा करने का प्रयास करना चाहिए। यह कई तरीकों से व्यक्त होता है : एक तरीका है अपने कर्तव्य को ईमानदार हृदय के साथ स्वीकार करना, अपने दैहिक हितों के बारे में न सोचना, और इसके प्रति अधूरे मन का न होना या अपने लाभ के लिए साजिश न करना। ये ईमानदारी की अभिव्यक्तियाँ हैं। दूसरा है अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने के लिए अपना तन-मन झोंक देना, परमेश्वर के घर द्वारा तुम्हें सौंपे गए कामों को ठीक से करना, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने कर्तव्य में अपना हृदय और प्रेम लगा देना। अपना कर्तव्य निभाते हुए एक ईमानदार व्यक्ति की ये अभिव्यक्तियाँ होनी चाहिए(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि एक ईमानदार व्यक्ति अपना कर्तव्य निभाते समय अपने लिए साजिश नहीं रचता है या अपने हितों पर विचार नहीं करता है, बल्कि परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहता है और अपना कर्तव्य पूरे दिल और ताकत से निभाता है। मुझे परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए और एक ईमानदार व्यक्ति बनना चाहिए। अब बड़ा लाल अजगर अपनी आखिरी साँसें ले रहा है और उन्मत्त होकर भाई-बहनों को गिरफ्तार कर रहा है। इसका उद्देश्य कलीसिया के कार्य में बाधा डालना है। ठीक इसी समय मुझे अपना सहयोग बढ़ाना चाहिए और अपने कर्तव्य अच्छी तरह निभाने के लिए सबके साथ कार्य करना चाहिए। इसलिए मैं जिस बहन के साथ सहयोग कर रही थी उसके साथ मैंने परमेश्वर के वचने खाए और पिए और तात्कालिक कठिनाइयों का समाधान करने के लिए उपाय खोजा। हमने अपनी आगामी कार्य योजनाओं की जानकारी भी अगुआओं को दी, फिर भाई-बहनों के साथ अलग-अलग संगति की और काम में आने वाली कठिनाइयों और समस्याओं को व्यावहारिक रूप से हल किया। कुछ समय अंतराल के बाद पाठ-आधारित कार्य धीरे-धीरे सुधर गया। सबके वास्तविक सहयोग की प्रक्रिया में हमने परमेश्वर का आशीष और मार्गदर्शन देखा। पाठ-आधारित कार्य के नतीजे बेहतर से बेहतर होते गए और हम सभी परमेश्वर के बहुत आभारी थे।

पहले, मुझे हमेशा लगता था कि मेरी काबिलियत अच्छी नहीं है और मैं एक पर्यवेक्षक का कर्तव्य नहीं कर सकती हूँ और केवल अच्छी काबिलियत वाले ही यह काम कर सकते हैं। तथ्यों ने साबित कर दिया कि मेरा दृष्टिकोण गलत था। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “पवित्र आत्मा के कार्य के बिना और परमेश्वर की सुरक्षा के बिना, कौन वहाँ तक पहुँच सकता था जहाँ वे आज हैं? कौन-सा कार्य आज तक कायम रह पाता? क्या इन लोगों को लगता है कि वे लौकिक संसार में हैं? अगर लौकिक संसार में प्रतिभाशाली या गुणी लोगों की एक टीम किसी समूह का साथ न दे, तो वह अपनी कोई भी परियोजना पूरी नहीं कर पाएगा। परमेश्वर के घर का कार्य अलग है। परमेश्वर के घर के कार्य की सुरक्षा, अगुआई और मार्गदर्शन परमेश्वर ही करता है। यह मत सोचना कि परमेश्वर के घर का कार्य किसी व्यक्ति के सहारे पर निर्भर करता है। ऐसा नहीं है, और यह एक छद्म-विश्वासी का दृष्टिकोण है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (18))। “चाहे तुम्हारी काबिलियत उच्च हो या निम्न और चाहे तुममें कितनी भी प्रतिभा हो, अगर तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों का समाधान नहीं होता तो चाहे तुम्हें किसी भी पद पर रखा जाए, तुम उपयोग के लिए योग्य नहीं होगे। इसके विपरीत, अगर तुम्हारी काबिलियत और क्षमताएँ सीमित हैं, लेकिन तुम विभिन्न सत्य सिद्धांत समझते हो, जिनमें वे सत्य सिद्धांत शामिल हैं जिन्हें तुम्हें अपने कार्य के दायरे में समझना-बूझना चाहिए, और तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों का समाधान हो गया है, तो तुम उपयोग के लिए योग्य व्यक्ति होगे(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। परमेश्वर के वचनों से अपनी तुलना करते हुए मैंने देखा कि मैं अंधी और अज्ञानी थी और मैंने जो प्रकट किया था वह एक छद्म-विश्वासी का दृष्टिकोण था। असल में, परमेश्वर के घर का कार्य ऐसी चीज नहीं है जो किसी एक व्यक्ति की काबिलियत या खूबियों पर निर्भर रहकर अच्छी तरह से की जा सकती हो। ऊपर से देखने में तो परमेश्वर के घर का कार्य इंसान कर रहे हैं, लेकिन असल में इसे परमेश्वर ही कर रहा है। पवित्र आत्मा ही इसकी अगुआई कर रहा है और इसे कायम रखे हुए है। चाहे किसी व्यक्ति की काबिलियत अच्छी हो या बुरी, अगर उसके पास एक सरल और ईमानदार दिल है, वह अपने साथ चीजें घटित होने पर सत्य सिद्धांत खोजने का इच्छुक है, अपने भ्रष्ट स्वभावों के सहारे नहीं जीता है और अपने कर्तव्यों में समर्पित है तो परमेश्वर उसे आशीष और मार्गदर्शन देगा और वह अपने कर्तव्यों में कुछ नतीजे प्राप्त कर सकता है। मैंने यह भी देखा कि यूँ तो मेरी काबिलियत औसत थी, लेकिन जब हर एक ने एक दिल और एक मन से सहयोग किया और अपने कर्तव्य निभाए तो हमने अच्छे नतीजे हासिल किए। यह सब परमेश्वर का मार्गदर्शन था; यह परमेश्वर ही था जो अपने कार्य को कायम रखे हुए था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर को धन्यवाद!

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