44. एक सभा के बाद का चिंतन
नवंबर 2024 में, मैं कलीसिया में अनुभवजन्य गवाही लेखों की जाँच कर रही थी। एक दिन, हमारी पर्यवेक्षक हमारी टीम की सभा में आई और कहा कि हाल ही में हमारे द्वारा जमा किए गए लेखों के आधार पर, वह देख सकती थी कि हम कुछ सिद्धांतों को ठीक से नहीं समझ पाए हैं। वह हमारे साथ कुछ लेखों की जाँच करना चाहती थी ताकि हम सब मिलकर सिद्धांतों को समझ सकें। उसने कुछ लेख चुने और हममें से हर एक को उनकी समीक्षा करने और फिर सिद्धांतों के आधार पर अपनी टिप्पणियाँ बताने को कहा। जैसे ही मैंने सुना कि हमें एक-एक करके अपनी राय देनी है, मैं घबराने लगी। मैंने सोचा, “हाल ही में मैंने जिन कई लेखों की जाँच की है, उनमें कुछ स्पष्ट समस्याएँ थीं। क्या वह इसका इस्तेमाल यह देखने के लिए कर रही है कि मैंने सिद्धांतों को समझा है या नहीं, और मैं इस कर्तव्य के लायक हूँ या नहीं? अगर उसे पता चल गया कि मैंने सिद्धांतों को नहीं समझा है, तो वह मुझे निश्चित रूप से बरखास्त करवा देगी।” उसके बाद, मैं लेख पढ़ने के लिए अपना मन शांत नहीं कर पाई। मैं बस यह सोचने में लगी रही कि ज़्यादा विस्तृत जवाब कैसे दूँ, और ऐसा क्या कहूँ कि मेरी कमियाँ उजागर न हों। जब हमने पहला लेख पढ़ लिया, तो झांग यान ने पहले अपनी राय बताई। उसने एक ऐसी समस्या बताई जिस पर मेरा ध्यान नहीं गया था। जब मैंने पर्यवेक्षक को सहमति में सिर हिलाते देखा, तो मैंने मन में सोचा, “लगता है झांग यान की बात सही है। जब मेरी बारी आएगी, तो मैं इस पहलू को भी जोड़ दूँगी ताकि मेरा जवाब ज़्यादा पूरा लगे। इस तरह पर्यवेक्षक मुझे इतनी नाकाबिल नहीं समझेगी।” इसके बाद, पर्यवेक्षक ने मुझे बुलाया। मैंने वे समस्याएँ बताईं जो मुझे दिखी थीं और ध्यान से झांग यान की बताई बात को भी जोड़ दिया। जब पर्यवेक्षक ने अंत में सिद्धांतों के साथ इस लेख का मूल्यांकन किया, तो उसने कहा कि झांग यान की राय उचित थी। मुझे थोड़ी राहत मिली, लेकिन बहुत बेचैनी भी हुई। मेरे मन में अपराध-बोध था। फिर, पर्यवेक्षक ने दूसरी ऐसी समस्याएँ भी बताईं जो मुझे नहीं दिखी थीं। मैं तुरंत सोचने लगी, “मैंने इतनी आसान समस्याएँ भी नहीं देखीं। पर्यवेक्षक को ज़रूर लगा होगा कि मेरी काबिलियत बहुत खराब है जो इतने साल पाठ-आधारित कर्तव्य करने के बाद भी मैं इतनी प्रत्यक्ष समस्याएँ नहीं देख पाई। अगली बार जब मैं अपनी राय दूँगी तो मुझे और सावधान रहना होगा।” जब हमने अगला लेख शुरू किया, तो मेरे दिल को शांत होने में काफी समय लगा; मैं पिछले लेख के बारे में अपने खराब जवाब पर ही अटकी रही। कुछ ही देर में, मुझे ऊंघ आने लगी और मैंने लेख का बाकी हिस्सा ठीक से नहीं समझा। चर्चा के दौरान, जब पर्यवेक्षक ने मेरी राय पूछी, तो मैंने ज्यादा कुछ नहीं कहा। जब इस बारे में बात करनी थी कि लेखक की समझ में क्या समस्याएँ थीं, तो मैं बस हकलाती रही और काफी देर तक कुछ बोल नहीं पाई। पहले तो मैं बस यह कहने वाली थी कि मुझे झपकी लग गई थी और मैंने उसे समझा नहीं, लेकिन फिर मुझे चिंता हुई कि अगर पर्यवेक्षक ने देखा कि मैं ऐसी स्थिति में भी ऊंघ रही हूँ, तो वह सोच सकती है कि मैं बुरी अवस्था में हूँ और मुझमें पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है। अगर ऐसा हुआ, तो मुझे निश्चित रूप से बरखास्त कर दिया जाएगा। इसलिए, मैंने जल्दी से अपनी गलती छिपाने की कोशिश करते हुए कहा, “ज़रा रुकिए, मैं ढूँढ़ रही हूँ कि मैंने वह समस्या कहाँ लिखी थी जो मुझे मिली थी।” मैं माउस से स्क्रॉल करते हुए जल्दी-जल्दी लेख को देखने लगी, मेरा दिमाग तेज़ी से चल रहा था ताकि कोई मुख्य समस्या जल्द-से-जल्द मिल जाए और मैं पर्यवेक्षक को जवाब दे सकूँ। आखिर में, पर्यवेक्षक अधीर हो गई और बोली, “जैसा देखा है, वैसा ही बताओ। तुम्हें जवाब देने में इतनी मुश्किल क्यों हो रही है?” कोई और चारा न होने पर, मैंने आखिर में मान लिया, “मेरा ध्यान भटक गया था और थोड़ी नींद-सी आ रही थी। मैंने इसे ठीक से समझा नहीं।” तब पर्यवेक्षक ने दूसरी बहन से अपनी राय बताने को कहा। उस पल मुझे बहुत शर्मिंदगी हुई। मेरे दिल में उथल-पुथल मची हुई थी, और मुझे चिंता थी कि पर्यवेक्षक मेरे हाल के प्रदर्शन के कारण मुझे बरखास्त कर देगी। बस कुछ ही घंटों के बाद, मैं मानसिक रूप से थक चुकी थी। मैं पर्यवेक्षक के साथ लेखों की जाँच करना और पेशेवर कौशल सीखना जारी नहीं रखना चाहती थी।
बाद में, मैं विचार करने लगी, “पर्यवेक्षक हमारे साथ लेखों की जाँच कर रही है और सिद्धांतों पर संगति कर रही है। क्या यह मेरी कमियों को दूर करने का एक शानदार मौका नहीं है? मैं इतनी घबराई हुई और इतनी थकी हुई क्यों हूँ?” ठीक उसी समय के आसपास, परमेश्वर के नवीनतम वचन जारी हुए थे। अपनी भक्ति के दौरान, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “जब मैं लोगों से गपशप करता हूँ, कभी-कभी कुछ प्रश्न पूछता हूँ तब कुछ पेचीदा मन वाले लोग सोच-विचार करते हैं, ‘तुम्हारा प्रश्न काफी सीधा है। मुझे नहीं पता कि तुम यह पूछकर क्या कहना चाहते हो। मुझे अपने उत्तर में सावधान रहना चाहिए!’ मैं कहता हूँ, तुमने इसे गलत समझ लिया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं किससे बात करता हूँ या क्या प्रश्न पूछता हूँ, अंतिम लक्ष्य हमेशा समस्याओं का पता लगाना और उन्हें सुलझाना होता है, तुम्हारी सहायता और मार्गदर्शन करना होता है और समस्याएँ सुलझाने में तुम्हारी मदद करना होता है। पहली बात, इसका उद्देश्य तुम्हें खोलकर रख देना और तुम्हें मूर्ख दिखाना नहीं है। दूसरी बात, इसका उद्देश्य तुम्हारा यह परीक्षण करना नहीं है कि तुम सच बोल रहे हो या नहीं या क्या तुम निष्कपट व्यक्ति हो। तीसरी बात, इसका उद्देश्य तुमसे अपनी वास्तविक स्थिति का खुलासा करवाने के लिए तुम्हें धोखा देना नहीं है। चौथी बात, इसका उद्देश्य यह परीक्षण करना तो और भी नहीं है कि तुम कार्य करने में कुशल हो या नहीं या तुम वास्तविक कार्य कर सकते हो या नहीं। दरअसल, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं कैसे गपशप करता हूँ, यह सब तुम्हें अपना कर्तव्य पूरा करने, कार्य अच्छी तरह से करने, समस्याएँ सुलझाने में तुम्हारी मदद और मार्गदर्शन करने के लिए है। कुछ लोग मेरी सरल पूछताछ को लेकर बहुत ही ज्यादा सोचते हैं, बहुत डरते हैं कि इसमें कोई छिपा अर्थ है। कुछ तो यह तक संदेह करते हैं कि मैं उनके खिलाफ षड्यंत्र कर रहा हूँ। स्पष्ट रूप से, मैं समस्याएँ सुलझाने में तुम्हारी मदद करना चाहता हूँ, फिर भी तुम गलती से सोचते हो कि मैं तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र कर रहा हूँ। क्या यह मेरे साथ अन्याय करना नहीं है? (हाँ।) तो यहाँ क्या मुद्दा है? मानव दिल धोखेबाज है! हालाँकि हो सकता है कि लोग जोर से कहें, ‘तुम परमेश्वर हो, मुझे तुम्हें सच बता देना चाहिए और तुम्हारे साथ स्पष्टवादी होना चाहिए। मैं तुम्हारा अनुसरण करता हूँ, मैं तुममें विश्वास रखता हूँ!’, लेकिन अपने दिल की गहराई में वे इस तरीके से नहीं सोचते। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे प्रश्न कितने साधारण और सरल हैं, लोग अक्सर उनकी व्याख्या अत्यधिक संवेदनशील तरीके से करते हैं। वे अपने अनुमानों और फिर जाँच-पड़ताल के जरिए कई आश्चर्यजनक बदलावों से गुजरते हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि वे अंतिम उत्तर पा लेते हैं, लेकिन दरअसल, यह मेरे वचनों के मूल इरादे से दूर है। यह स्पष्ट रूप से एक बहुत सरल प्रश्न है, फिर भी वे इसे लेकर बहुत ही ज्यादा सोचते हैं। क्या ऐसे लोग अत्यधिक संवेदनशील नहीं हैं? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं क्या पूछता हूँ, इसे सुनने के बाद उनके दिलों में उथल-पुथल मच जाती है : ‘तुम यह क्यों पूछ रहे हो? मैं ऐसे किस तरीके से उत्तर दूँ जो तुम्हें संतुष्ट कर दे और कोई कमी प्रकट न करे? मुझे पहले क्या और बाद में क्या कहना चाहिए?’ तीन से पाँच सेकंड में बिना किसी देरी के शब्द निकल आते हैं। उनके दिमाग कंप्यूटर से भी तेज हैं। इतने तेज क्यों हैं? दरअसल, यह प्रक्रिया पहले से ही उनकी मूल प्रवृत्ति है; लोगों से निपटने और मामलों को सँभालने में यह उनकी सामान्य चाल और शैली है। वे सबके खिलाफ षड्यंत्र करते हैं। इसलिए, चाहे मेरी पूछताछ कितनी भी सरल क्यों न हों, वे उसे लेकर बहुत ही ज्यादा सोचते हैं, वे मानते हैं कि मेरा कुछ मकसद या लक्ष्य है। वे अपने दिलों में सोच-विचार करते हैं, ‘अगर मैंने सच्चाई से उत्तर दे दिया तो क्या मैं अपनी वास्तविक स्थिति को उजागर नहीं कर दूँगा? यह तो खुद से गद्दारी करने के समान है। मैं तुम्हें अपनी वास्तविक स्थिति जानने नहीं दे सकता। तो मुझे कैसे उचित ढंग से उत्तर देना चाहिए? मैं कैसे तुम्हें खुश और संतुष्ट कर सकता हूँ, अपने बारे में एक अच्छी छवि बनवा सकता हूँ और मेरा उपयोग करना तुमसे जारी रखवा सकता हूँ?’ देखो, ये लोग कितने धोखेबाज हैं! इन लोगों के मन बहुत ही ज्यादा पेचीदा हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं इनसे कैसे बात करता हूँ, वे संदेह और जाँच-पड़ताल करेंगे। क्या ऐसे लोग सत्य का अभ्यास कर सकते हैं? क्या वे परमेश्वर के लिए उपयोगी हो सकते हैं? बिल्कुल नहीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोगों के मन बहुत ही ज्यादा पेचीदा होते हैं और बिल्कुल भी सरल नहीं होते; जो कोई भी लंबे समय तक उनके संपर्क में रहता है, वह इसे देख सकता है” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (26))। परमेश्वर के वचन पढ़कर, मुझे लगा कि वे मेरी ही अवस्था बयाँ कर रहे हैं। हालाँकि परमेश्वर उन विचारों और धारणाओं को उजागर कर रहा था जिन्हें लोग मसीह के साथ बातचीत करते समय प्रकट करते हैं, मुझे एहसास हुआ कि जब मैं दूसरों के साथ बातचीत करती थी तो मैं अक्सर वही मानसिकता प्रकट करती थी। मैंने सोचा कि कैसे पर्यवेक्षक ने हमें शुरू से ही बताया था कि वह सिद्धांतों को सीखने में हमारी मदद करने के लिए हमारे साथ लेखों की जाँच कर रही थी, और हमारी राय पूछना हमारी कमियों और विचलनों को समझने का एक तरीका था ताकि वह सटीक संगति करके मदद कर सके। लेकिन मेरा अपना मन बहुत जटिल था। मैं लगातार उसके बारे में अटकलें लगा रही थी, यह मानकर कि वह सिद्धांतों पर हमारी पकड़ का परीक्षण कर रही थी और यह पता लगाने की कोशिश कर रही थी कि हम इस कर्तव्य के लायक हैं या नहीं। मुझे यकीन था कि अगर उसे पता चल गया कि मुझमें बहुत ज़्यादा कमियाँ हैं, तो वह मुझे बरखास्त करवा देगी। अपनी कमियाँ उजागर न कर बैठूँ, इसके लिए अपनी राय व्यक्त करते समय मैंने ईमानदारी से जवाब नहीं दिया कि मुझे कितनी समस्याएँ दिखी थीं। इसके बजाय, मैंने अपनी क्षमता से अधिक कोशिश की कि पर्यवेक्षक यह सोचे कि सिद्धांतों पर मेरी अच्छी पकड़ है और किसी भी समस्या पर मेरा दृष्टिकोण व्यापक है। यहाँ तक कि मैंने झांग यान ने जो बात रखी, उसकी नकल भी कर ली। जब हम दूसरे लेख की समीक्षा कर रहे थे, तो साफ था कि मुझे झपकी आ गई थी और मैंने कोई समस्या नहीं पहचानी थी, और मुझे बस इस बारे में ईमानदार रहना चाहिए था। लेकिन डर था कि अगर मैंने सच बताया, तो पर्यवेक्षक के मन में मेरी छवि और बुरी हो जाएगी, इसलिए मैंने झूठ बोला और कहा कि मैं भूल गई थी कि मैंने वह समस्या कहाँ लिखी थी जो मुझे मिली थी। मैंने उसे खोजने का नाटक भी किया, जिससे बस सबका समय ही बर्बाद हुआ। असल में, जब पर्यवेक्षक ने मेरी राय पूछी, तो मुझे बस ईमानदारी से जवाब देना था। अगर मैं गलत थी, तो मैं बस अपने विचलन का विश्लेषण करके उसे सुधार सकती थी। लेकिन मेरा मन बहुत जटिल था : मैं बस पर्यवेक्षक के इरादों का अनुमान लगाने की कोशिश ही करती रही। अपने दिमाग में मैं बोलने से पहले हर वाक्य पर बार-बार सोच रही थी। जब मैंने चिंतन किया, तो मुझे एहसास हुआ कि पहले भी मेरी ऐसी अभिव्यक्ति रही थी। जब मैंने पहली बार यह कर्तव्य शुरू किया था, तो जब भी अगुआ कुछ मुद्दों पर मेरे विचार पूछती थी, मैं बहुत घबरा जाती थी। मैं अनजाने में यह अनुमान लगाने की कोशिश करती थी कि क्या वह मेरी काबिलियत और चीजों को देखने की क्षमता का आकलन कर रही है, यह जानने के लिए कि मैं इस कर्तव्य के लिए उपयुक्त थी या नहीं। मैं अपने दिल में जल्दी से सोचती थी कि इस तरह से कैसे बोलूँ कि अगुआ मेरी असलियत न जान पाए। मुझे हर एक शब्द के बारे में बहुत सोचना पड़ता था और उस तरह से जीना बहुत थका देने वाला था। मैंने देखा कि यह केवल एक कपटी स्वभाव का क्षणिक प्रकाशन नहीं था, बल्कि मैं लगातार जोड़-तोड़ की अवस्था में जी रही थी। मेरी प्रकृति ही धोखेबाज़ थी। मुझे प्रभु यीशु के वचन याद आए : “मैं तुम से सच कहता हूँ कि जब तक तुम न फिरो और बालकों के समान न बनो, तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने नहीं पाओगे” (मत्ती 18:3)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने भी कहा था : “यदि तुम धोखेबाज हो, तो तुम सभी लोगों और मामलों के प्रति सतर्क और शंकित रहोगे, और इस प्रकार मुझमें तुम्हारा विश्वास संदेह की नींव पर निर्मित होगा। मैं इस तरह के विश्वास को कभी स्वीकार नहीं कर सकता” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पृथ्वी के परमेश्वर को वास्तव में कैसे जानें)। परमेश्वर का सार विश्वासयोग्य है; उसे ईमानदार लोग पसंद हैं और वह कपटी लोगों से घृणा करता है। एक कपटी व्यक्ति उद्धार नहीं पा सकता और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता। मुझे एहसास हुआ कि अगर मैं वापस न मुड़ी और न बदली, एक ईमानदार इंसान न बन सकी, तो चाहे मैंने जिसका भी त्याग किया को या खुद को खपाया हो, अंततः मुझे परमेश्वर द्वारा हटा दिया जाएगा और ठुकरा दिया जाएगा। इस विचार पर, मेरा दिल भारी हो गया, और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं बहुत कपटी हूँ। मेरे सभी वचन और कार्य जोड़-तोड़ से भरे हैं। मैं एक ईमानदार इंसान नहीं हूँ। अगर मैं ऐसे ही चलती रही, तो निश्चित रूप से तुम्हारे द्वारा हटा दी जाऊँगी। मैं अपने कपटी स्वभाव को त्यागकर एक ईमानदार इंसान बनना चाहती हूँ। मैं तुम्हारे मार्गदर्शन के लिए विनती करती हूँ।” बाद में, मैंने पर्यवेक्षक के सामने अपनी अवस्था खोलकर रख दी। उसने मुझे बिल्कुल नहीं डाँटा; इसके बजाय, उसने मेरी मदद करने के लिए सत्य पर संगति की और मुझे सत्य का अभ्यास करने और एक ईमानदार इंसान बनने के लिए प्रोत्साहित किया।
बाद में, मैंने विचार किया, मैं हमेशा अपनी कमियों को उजागर करने के बारे में इतनी चिंतित क्यों थी? मुझे याद आया कि मैंने सुना था कि हाल ही में कुछ भाई-बहनों को इसलिए बरखास्त कर दिया गया था क्योंकि वे अपने कर्तव्यों में सिद्धांतों को समझने में लगातार नाकाम रहे थे, जिससे वे काम में गड़बड़ कर रहे थे और बाधा डाल रहे थे। चूँकि हाल ही में मेरे द्वारा जमा किए गए लेखों में कुछ समस्याएँ थीं, मैंने अनुमान लगाया कि पर्यवेक्षक मुझे देखने और मेरा आकलन करने के लिए वहाँ थी, और अगर उसे पता चल गया कि मैंने सिद्धांतों को नहीं समझा है, तो वह मुझे बरखास्त करवा देगी। इस अवस्था से निपटने के लिए, मैंने परमेश्वर के वचन खोजे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर के घर के पास इस बारे में सिद्धांत हैं कि किस तरह के लोगों को पदोन्नत और इस्तेमाल करना है और किस तरह के लोगों को इस्तेमाल नहीं करना है, और किन लोगों को विकसित करना है और किन लोगों को नहीं करना है; यह सब परमेश्वर के घर के कार्य की जरूरतों पर आधारित है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसे पदोन्नत किया जाता है और किसे इस्तेमाल किया जाता है, उद्देश्य उन्हें विकसित करना है ताकि वे अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कर सकें और यह जान सकें कि परमेश्वर के कार्य का कैसे अनुभव करना है, और वे सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य की जिम्मेदारी उठाने और कार्य करने में समर्थ बन सकें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस समस्या को सुलझाया जा रहा है, उद्देश्य उन्हें ज्यादा सत्य समझने में और यह सीखने में सक्षम बनाना है कि जिन विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों से उनका सामना होता है, उनसे वे कैसे सबक सीखें और भेद पहचानने की क्षमता प्राप्त करें। इस तरीके से उनके लिए सभी पहलुओं से सत्य वास्तविकता में प्रवेश करना आसान हो जाता है। यह तुमसे सेवा करवाने के लिए तुम्हारा शोषण करने के बारे में नहीं है और इस बारे में तो और भी नहीं है कि किसी रिक्त पद को भरने के लिए तुम्हारा शोषण किया जा रहा है क्योंकि कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिल रहा है और जब कोई उपयुक्त व्यक्ति आ जाता है तब तुम्हें धक्के मारकर बाहर निकाल दिया जाता है। यह ऐसा नहीं है। दरअसल यह तुम्हें खुद को प्रशिक्षित करने का अवसर दे रहा है। अगर तुम सत्य का अनुसरण करते हो तो तुम मजबूती से डटे रहोगे; अगर तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते हो तो अभी भी तुम मजबूती से डटे नहीं रह पाओगे। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि परमेश्वर के घर को तुम अप्रिय लगते हो, इसलिए वह तुम पर अपना रोब जमाएगा और तुम्हें हटाने का अवसर ढूँढ़ेगा। जब परमेश्वर का घर कहता है कि वह तुम्हें विकसित करेगा और तुम्हें पदोन्नत करेगा तब वह सही मायने में तुम्हें विकसित करेगा। जो बात मायने रखती है वह यह है कि तुम सत्य के लिए कैसे प्रयास करते हो। अगर तुम सत्य रत्ती भर भी नहीं स्वीकारते तो परमेश्वर का घर तुम पर से भरोसा खो देगा और तुम्हें अब और विकसित नहीं करेगा। कुछ लोग एक अवधि तक विकसित किए जाने के बाद इसलिए बर्खास्त कर दिए जाते हैं क्योंकि उनकी काबिलियत खराब होती है और वे वास्तविक कार्य नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग अपने विकसित किए जाने की अवधि के दौरान सत्य रत्ती भर भी नहीं स्वीकारते हैं, मनमाने ढंग से कार्य करते हैं और परमेश्वर के घर के कार्य में गड़बड़ करते हैं और बाधा डालते हैं और बर्खास्त कर दिए जाते हैं। कुछ दूसरे लोग सत्य का बिल्कुल भी अनुसरण नहीं करते हैं, मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चलते हैं, हमेशा शोहरत, लाभ और रुतबे के लिए कार्य करते हैं और बर्खास्त कर दिए जाते हैं और हटा दिए जाते हैं। इन सभी स्थितियों को लोगों का उपयोग करने के लिए परमेश्वर के घर के सिद्धांतों के अनुसार सँभाला जाता है। परमेश्वर का घर अभी भी उन लोगों को विकसित करेगा जो सत्य स्वीकार सकते हैं और सत्य के लिए प्रयास कर सकते हैं, भले ही वे कुछ गलतियाँ करके अपराध करें। अगर यह कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो सत्य स्वीकार सकता है, और जब उसकी काट-छाँट की जाती है तब वह सत्य नहीं स्वीकारता है, तो फिर उसे सीधे बर्खास्त कर देना चाहिए और हटा देना चाहिए। ... स्थिति चाहे जो भी हो, जब परमेश्वर का घर इन लोगों को पदोन्नत करता है तब यह हमेशा उन्हें विकसित करने और उन्हें सत्य वास्तविकता की तरफ ले जाने के लिए होता है, वह यह उम्मीद करता है कि वे कलीसिया का कार्य अच्छी तरह से कर सकेंगे और उन कर्तव्यों को पूरा कर सकेंगे जो उन्हें पूरे करने चाहिए। अगर तुम्हें यह पता नहीं भी हो कि किसी कार्य को कैसे करना है क्योंकि तुम बेवकूफ हो और तुममें अंतर्दृष्टि की कमी है या क्योंकि तुम्हारी काबिलियत खराब है, जब तक तुम सत्य सिद्धांतों के लिए प्रयास करते हो, तुममें जिम्मेदारी का यह बोध है, तुम इस कार्य को अच्छी तरह से करने के इच्छुक हो और कलीसिया के कार्य का बचाव कर सकते हो, तब तक परमेश्वर का घर अब भी तुम्हें विकसित करेगा, भले ही तुमने अतीत में कुछ मूर्खता भरी चीजें की हों। ... इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कितना कार्य करने में सक्षम हो या तुम्हारी काबिलियत क्या है, तुम्हें पदोन्नत और इस्तेमाल करना तुम्हारा शोषण करना नहीं है। बल्कि इरादा यह है कि इस अवसर का उपयोग तुम्हें कार्य करने में प्रशिक्षित होने देने के लिए और सत्य के तुम्हारे अनुसरण के जरिए, कड़ी मेहनत करके और भारी दायित्व उठाकर तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए किया जाए। एक तरफ यह तुम्हें व्यक्तिगत रूप से पूर्ण बनाना है; दूसरी तरफ यह परमेश्वर के घर का कार्य पूरा करना भी है। तुमने अच्छे कर्म तैयार किए हैं और अपने व्यक्तिगत जीवन प्रवेश में लाभ भी प्राप्त किए हैं। यह बहुत ही अच्छा है! यह एक ही प्रयास में दो अच्छे नतीजे प्राप्त करना है” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (26))। मैंने परमेश्वर के वचनों में देखा कि जब परमेश्वर का घर किसी को बढ़ावा देता है, तो वह सचमुच उन्हें विकसित करता है। अगुआ और पर्यवेक्षक उनकी कमियों के लिए मार्गदर्शन और मदद देंगे। अगर वे सत्य को स्वीकार कर सकते हैं, तो न केवल वे अपने जीवन में प्रगति करेंगे, बल्कि उनके काम के नतीजे भी बेहतर से बेहतर होते जाएँगे। इसके अलावा, परमेश्वर के घर में लोगों को बरखास्त करने के सिद्धांत हैं; वह किसी को बस कुछ कमियों या अपर्याप्तताओं के कारण बरखास्त नहीं करता। हाल ही में बरखास्त या हटाए गए कुछ लोगों को केवल इसलिए बरखास्त किया गया था क्योंकि उनकी खराब काबिलियत काम में रुकावट डाल रही थी, और फिर कलीसिया ने उनकी काबिलियत के आधार पर उनके लिए एक ज़्यादा उपयुक्त कर्तव्य की व्यवस्था की; दूसरों को खास तौर पर हठी होने, सिद्धांतों पर किसी भी संगति को स्वीकार करने से इनकार करने, और काम में गड़बड़ करने और बाधा डालने के लिए बरखास्त किया गया था। जब मैं पाठ-आधारित कर्तव्य करती थी, उसे याद करूँ तो, जब भी अगुआओं और पर्यवेक्षकों ने देखा कि मैं बुरी अवस्था में हूँ या मेरे कर्तव्य के नतीजे खराब हैं, तो वे मेरी मदद करने के लिए संगति करते थे। जब वे देखते कि मैं कुछ समय बाद प्रगति कर पा रही हूँ तो वे मुझे इस कर्तव्य में प्रशिक्षण जारी रखने देते थे। इस बार, जब अगुआ ने देखा कि हमारे कर्तव्य में लगातार समस्याएँ आ रही हैं, तो उसने पर्यवेक्षक की व्यवस्था की ताकि वह सिद्धांतों का अध्ययन करने में हमारी मदद करे। ऐसा इस उम्मीद में किया गया था कि हम जल्द से जल्द सिद्धांतों को समझ सकें और अपने कर्तव्यों को पूरा कर सकें। यह ठीक वैसा ही है जैसा परमेश्वर के वचन कहते हैं : “जब परमेश्वर का घर कहता है कि वह तुम्हें विकसित करेगा और तुम्हें पदोन्नत करेगा तब वह सही मायने में तुम्हें विकसित करेगा। जो बात मायने रखती है वह यह है कि तुम सत्य के लिए कैसे प्रयास करते हो।” मैंने अपनी औसत काबिलियत और कुछ सिद्धांतों की अपनी सीमित समझ के बारे में सोचा। जब समस्याएँ आती हैं तो पर्यवेक्षक का चीजों को बताना और मदद करना, और मेरे साथ सिद्धांतों का अध्ययन करना, मुझे अपना कर्तव्य बेहतर ढंग से करने में मदद कर सकता है। यह कितनी शानदार बात है! यह परमेश्वर था जो मुझे सचमुच विकसित करने के लिए लोगों, घटनाओं और चीजों का उपयोग कर रहा था। मुझे परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय, मैंने हर चीज का सामना जोड़-तोड़ और शत्रुता से भरे दिल से किया। मुझमें सचमुच जमीर और विवेक था ही नहीं!
बाद में, पर्यवेक्षक ने हमारी कमियों के आधार पर सबके लिए एक अध्ययन योजना बनाई और मेरे साथ संगति करने और मेरी मदद करने के लिए परमेश्वर के प्रासंगिक वचन ढूँढ़े। मैंने तहे दिल से परमेश्वर का धन्यवाद किया। उसके बाद, मैंने अपनी बहनों के साथ प्रासंगिक सिद्धांतों पर गंभीरता से विचार करना शुरू कर दिया। अध्ययन की एक अवधि के माध्यम से, मैं सिद्धांतों को और अधिक स्पष्टता से समझने लगी, और मेरे द्वारा जमा किए गए लेखों में समस्याओं की संख्या में काफी कमी आई। इस व्यावहारिक अनुभव के माध्यम से, मैंने और भी गहराई से महसूस किया कि जब परमेश्वर का घर लोगों को बढ़ावा देता है और विकसित करता है, तो वह ऐसा इसलिए करता है ताकि सिद्धांतों को समझने और अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से करने में हमारी मदद हो, और साथ ही, सत्य को समझने और हमारे जीवन में प्रगति करने में हमारी मदद हो। एक दिन, अनुभवजन्य गवाही के लेखों की जाँच करते समय, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और अपनी समस्या के बारे में कुछ नई समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कुछ लोग वर्षों से परमेश्वर पर विश्वास करते आए हैं, फिर भी थोड़ा-सा भी सत्य नहीं समझते। चीजों के बारे में उनका दृष्टिकोण अविश्वासियों जैसा ही होता है। जब वे किसी नकली अगुआ या मसीह-विरोधी का खुलासा होते या उसे हटाए जाते हुए देखते हैं तो सोचते हैं, ‘परमेश्वर में विश्वास करना, परमेश्वर का अनुसरण करना, परमेश्वर के समक्ष बर्फ की रपटीली पगडंडी पर चलने जैसा है! यह चाकू की नोंक पर जीने जैसा है!’ और दूसरे कहते हैं, ‘एक अगुआ और कार्यकर्ता होना और परमेश्वर की सेवा करना जोखिमपूर्ण है। यह वैसा ही है जैसा लोग कहते हैं—“राजा की संगत में रहना बाघ की संगत में रहने के समान है।” यदि तुम गलत कहते या करते हो तो तुम परमेश्वर के स्वभाव को नाराज कर दोगे और तुम्हें हटा दिया जाएगा और दंडित किया जाएगा!’ क्या ये टिप्पणियाँ सही हैं? ‘बर्फ की रपटीली पगडंडी पर चलना’ और ‘चाकू की नोंक पर जीना’—इन शब्दों का क्या मतलब है? इन शब्दों का मतलब है कि कोई बड़ा खतरा है, कि हर पल कोई बड़ा खतरा है और यह कि थोड़ी-सी भी लापरवाही से व्यक्ति लड़खड़ा जाएगा। ‘राजा की संगत में रहना बाघ की संगत में रहने के समान है’ अविश्वासियों के बीच एक आम कहावत है। इसका मतलब है कि दानवों के राजा से करीबी बनाना खतरनाक है। अगर कोई इस कहावत को परमेश्वर की सेवा करने पर लागू करता है, तो वह क्या गलती करता है? दानवों के राजा की तुलना परमेश्वर से, सृष्टिकर्ता से करना—क्या यह परमेश्वर की निंदा नहीं है? यह एक गंभीर समस्या है। परमेश्वर एक धार्मिक और पवित्र परमेश्वर है; परमेश्वर का विरोध करने या उससे शत्रुता रखने के लिए मनुष्य को दंडित किया जाना चाहिए, यह बिल्कुल स्वाभाविक और उचित है। शैतान और दानवों में लेशमात्र भी सत्य नहीं होता है; वे गंदे और दुष्ट हैं, वे बेगुनाहों का वध करते हैं और अच्छे लोगों को निगल जाते हैं। उनकी तुलना परमेश्वर से कैसे की जा सकती है? लोग तथ्यों को विकृत कर परमेश्वर को बदनाम क्यों करते हैं? यह परमेश्वर की घोर निंदा है!” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है)। मेरी अवस्था ठीक वैसी ही थी जिसे परमेश्वर के वचनों ने उजागर किया था। हालाँकि मैं कई सालों से परमेश्वर में विश्वास करती थी, मैं चीजों को सत्य के दृष्टिकोण से देखने में असमर्थ थी। इसके बजाय, मैं अविश्वासियों के दृष्टिकोण से चिपकी रही, इस शैतानी फलसफे के अनुसार जीती रही, “कभी दूसरों को नुकसान पहुँचाने का इरादा न रखो, लेकिन उनके द्वारा पहुँचाए जा सकने वाले नुकसान के प्रति हमेशा सतर्कता बरतो।” मैं लोगों के साथ बातचीत करते समय हमेशा सतर्क रहती थी, लगातार इस बात से चिंतित रहती थी कि अगर मैंने एक पल के लिए भी अपनी सतर्कता कम कर दी तो मेरे खिलाफ साजिश रची जाएगी। यह ठीक उस समय जैसा था, जब पर्यवेक्षक ने देखा कि हमारे कर्तव्य में समस्याएँ और विचलन आ रहे थे और सिद्धांतों को समझने में हमारी मदद करने के लिए वह हमारे साथ लेखों की जाँच करना चाहती थी। लेकिन, मैंने यह मान लिया कि वह मेरी असली स्थिति का पता लगाना चाहती थी ताकि वह उसे मुझे बरखास्त करवाने के सबूत के तौर पर इस्तेमाल कर सके। नतीजतन, मेरा दिल उसके प्रति शत्रुता से भर गया था। मैं हर समय सतर्क थी, मानो किसी दुर्जेय दुश्मन का सामना कर रही हूँ, चिंतित थी कि अगर मैं एक सेकंड के लिए भी लापरवाह हुई, तो शायद मैं कुछ गलत जवाब दे दूँगी और वह मेरी कमी को पकड़ लेगी और मुझे बरखास्त करवा देगी। जिन जगहों पर शैतान का राज है, वहाँ आपसी रिश्ते संघर्ष और जोड़-तोड़ से भरे होते हैं। ज़रा-सी लापरवाही भी साजिश का शिकार होने और अपना पद खोने का कारण बन सकती है और यहाँ तक कि जान भी खतरे में पड़ सकती है। और यहाँ मैं परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य कर रही थी, फिर भी मैं ऐसे सतर्क थी मानो दुनिया पर राज करने वाली ताकतों के सामने हूँ। मुझे बिल्कुल भी विश्वास नहीं था कि परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है, या कि परमेश्वर हममें से हर एक के साथ सच्चा और ईमानदार है। यह परमेश्वर की निंदा करना और उसकी ईशनिंदा करना था! इसकी प्रकृति भयानक थी! मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, इतने सालों से मैं आपके घर में अपना कर्तव्य करती आ रही हूँ, मैंने आपके सिंचन और प्रावधान का आनंद लिया है, मैं कई सत्य समझने लगी हूँ और मैंने आचरण करने के कुछ सिद्धांत सीखे हैं। यह सब आपका प्रेम और उद्धार है। लेकिन मैं अब भी आपके प्रति सतर्क रहती हूँ, और आपके और मेरे बीच की खाई बहुत गहरी है। यह सचमुच आपको दुखी करता है। परमेश्वर, मैं पश्चात्ताप करने को तैयार हूँ। मैं आपके दिल को सुकून देने के लिए एक ईमानदार इंसान बनने का अनुसरण करना चाहती हूँ। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें।”
एक और मौके पर, एक दूसरी पर्यवेक्षक हमारे साथ पेशेवर कौशल का अध्ययन कर रही थी और उसने हमें एक-एक करके अपनी राय बताने को कहा। पहले तो, मैं अब भी थोड़ी घबराई हुई थी, इस बात से चिंतित थी कि मैं अच्छी तरह से जवाब नहीं दे पाऊँगी या कुछ विचलन कर बैठूँगी और पर्यवेक्षक मेरी असलियत जान लेगी। उस पल, मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “बिना षड्यंत्र रचे दूसरों से संवाद में सफल होने के लिए तुम्हें सामान्य मानवता के जमीर और तार्किकता के दायरे में संवाद करना सीखना होगा। संवाद का उद्देश्य दूसरों की मदद करना है और साथ ही, उनसे मदद और फायदे प्राप्त करना भी है। यह सामान्य संवाद है और इस तरीके से तुम बिना षड्यंत्र रचे संवाद में सफल हो सकते हो” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (26))। “ईमानदार होने के लिए तुम लोगों को पहले अपनी निजी इच्छाओं को एक तरफ रखना होगा। यह ध्यान देने की बजाय कि परमेश्वर तुम्हारे साथ किस तरह का व्यवहार करता है, तुम्हें परमेश्वर के सामने अपना दिल खोलकर रख देना चाहिए और जो कुछ तुम्हारे दिल में है वह कह देना चाहिए। यह चिंतन या विचार मत करो कि तुम्हारे शब्दों का क्या दुष्परिणाम होगा; जो कुछ तुम सोच रहे हो वह कह दो, अपनी मंशाओं को एक तरफ रख दो, और बस किसी मकसद को हासिल करने के लिए बातें मत कहो। तुम्हारे अनेक व्यक्तिगत इरादे और मिलावटी विचार होते हैं; तुम हमेशा यह सोचते हुए तोलकर बातें करते हो कि ‘मुझे इस बारे में बात करनी चाहिए, उस बारे में नहीं, मैं जो कहता हूँ उसके बारे में सावधान रहना चाहिए। मैं इसे उस तरह कहूँगा जिससे मुझे फायदा हो और जो मेरी कमियाँ ढक दे, और परमेश्वर पर अच्छा प्रभाव छोड़े।’ क्या यह मंसूबे पालना नहीं है? मुँह खोलने से पहले तुम्हारा दिमाग कुटिल विचारों से भरा होता है, तुम जो कहना चाहते हो उसे कई बार संशोधित करते हो, जिससे जब शब्द तुम्हारे मुँह से निकलते हैं तो वे इतने शुद्ध नहीं होते, और जरा भी वास्तविक नहीं होते, और उनमें तुम्हारे अपने इरादे और शैतान के षड्यंत्र शामिल होते हैं। यह ईमानदार होना नहीं है; यह कुटिल मंशाएँ और बुरे इरादे रखना है” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद दस : वे सत्य का तिरस्कार करते हैं, सिद्धांतों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाते हैं और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की उपेक्षा करते हैं (भाग दो))। मैंने परमेश्वर के वचनों से देखा कि जोड़-तोड़ करना बंद करने के लिए, तुम्हें सामान्य मानवता के जमीर और विवेक से दूसरों के साथ संगति करने का अभ्यास करना चाहिए, अपने खुद के इरादे और लक्ष्य नहीं रखने चाहिए, न अपने शब्दों का विश्लेषण या हेरफेर करना चाहिए। तुम्हें बस वही कहना है जो तुम सोचते हो। लक्ष्य एक-दूसरे की मदद करना और सभी को लाभ पहुँचाना है। मुझे एहसास हुआ कि आज पर्यवेक्षक का हमारे साथ पेशेवर कौशल का अध्ययन करना, सिद्धांतों पर चर्चा करके एक-दूसरे की ताकत से सीखने और अपनी कमियों को दूर करने का एक मौका था, ताकि हम उन्हें बेहतर ढंग से समझ सकें। मुझे इसका सामना एक स्पष्ट रवैये से करना चाहिए, जितना मैं समझी, उतना कहना चाहिए, और अगर मैंने कुछ गलत कहा, तो मुझे बस अपने भाई-बहनों का मार्गदर्शन और मदद स्वीकार कर लेनी चाहिए। यह सीखने और आदान-प्रदान का एक शानदार अवसर था; मुझे इतनी चिंता करने की जरूरत नहीं थी। तो मैंने अपने दिल में प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, कृपया मेरे दिल को अपने सामने शांत रखें, और जब मैं अपनी राय बताऊँ तो आपकी पड़ताल स्वीकार कर सकूँ।” प्रार्थना करने के बाद, मैं खुद को शांत कर पाई और सिद्धांतों पर विचार कर सकी। यहाँ तक कि मुझे उनमें से कुछ के बारे में कुछ नई अंतर्दृष्टि भी मिली और महसूस हुआ कि मैं उन्हें पहले से ज़्यादा स्पष्टता से समझ गई हूँ। पर्यवेक्षक की संगति के माध्यम से, मैंने अपनी कुछ कमियाँ भी खोजीं। उस अध्ययन सत्र के दौरान मैंने काफी मुक्ति का एहसास हुआ और मुझे कुछ लाभ भी हुए। उसके बाद, जब भी पर्यवेक्षक लेखों की समीक्षा करने के लिए हमारे साथ शामिल होती थी या मुझसे सवाल पूछती थी, मैं ध्यान से परमेश्वर के वचनों के अनुसार एक ईमानदार इंसान होने का अभ्यास करती थी। मेरा दिल ज़्यादा से ज़्यादा मुक्त महसूस करने लगा, और मैंने एक ईमानदार इंसान होने की खुशी का थोड़ा-सा स्वाद चखा। परमेश्वर का धन्यवाद!