175  ज्योति है परमेश्वर का वचन

1

जगा दिया मुझे पूरब की बिजली ने,

देखा परमेश्वर का वचन देह में प्रकट होते मैंने।

न्याय और ताड़ना के वचन,

जीतते और बचाते हैं मुझे।

टुकड़े-टुकड़े कर दिये मेरे, नाकामियों, इम्तहानों, यातनाओं ने।

उजागर हुई भ्रष्टता मेरी

अहंकारी था मैं, सिर झुका लिया मैंने।

मलिनता में, अपनी नालायकी देखी मैंने।

अपनी हैसियत और पुराने कर्ज़ों के संग,

नीच और भ्रष्ट, क्या हो सकता था

परमेश्वर की सेवा के लायक मैं?

आस्था की सही राह पर ला खड़ा किया मुझे,

रुकावटों, नाकामियों ने।

सदमे, शुद्धिकरण और मुसीबतें

बन गईं ज़ंजीर मेरे उद्धार की।

बाँध दिया इन्होंने परमेश्वर के प्रेम से मुझे,

जानता हूँ धार्मिक स्वभाव परमेश्वर का, कितनी बड़ी आशीष है।

शुद्ध करते और बचाते हैं परमेश्वर के वचन मुझे,

ताकि जी सकूँ असली ज़िंदगी मैं।

परमेश्वर को जानकर, देकर गवाही उसकी,

प्रेम करूँगा, सेवा करूँगा सदा परमेश्वर की मैं।


2

देहधारी परमेश्वर, उद्धारक फिर आया है।

न्याय, दुखों, परीक्षणों के ज़रिये,

आ गया हूँ रूबरू परमेश्वर के मैं।

उद्धार का आनंद ले लिया मैंने,

जान गया हूँ व्यवहारिक परमेश्वर को मैं।

ज़िंदा नरक के अंधेरों में सीख गया हूँ,

किससे नफ़रत, किससे मोहब्बत करूँ मैं।

परमेश्वर के वचनों से प्रबुद्ध, समझ गया हूँ ज़िंदगी के राज़ मैं।

भ्रष्ट इंसान की देह शैतान का देहधारण है।

शुद्ध करते और बचाते हैं परमेश्वर के वचन मुझे,

ताकि जी सकूँ असली ज़िंदगी मैं।

परमेश्वर को जानकर, देकर गवाही उसकी,

प्रेम करूँगा, सेवा करूँगा सदा परमेश्वर की मैं।


3

परमेश्वर का अपूर्व उत्कर्ष है ये,

प्रेम कर सकता हूँ, गवाही दे सकता हूँ मैं उसकी।

उसके प्रेम का प्रतिदान दूँ, सिर्फ़ यही ख़्वाहिश करता हूँ मैं।

उसके न्याय और ताड़ना के मायने हैं,

ये परमेश्वर के प्रेम को प्रकट करते हैं।

श्रद्धा से परमेश्वर को मानूँ, प्रेम करूँ, ये फ़र्ज़ है मेरा।

उसका वफ़ादार रहूँ, गवाही दूँ, ये फ़र्ज़ है मेरा।

उसकी इच्छा और महिमा की ख़ातिर, ख़ुद को अर्पित करता हूँ मैं।

शुद्ध करते और बचाते हैं परमेश्वर के वचन मुझे,

ताकि जी सकूँ असली ज़िंदगी मैं।

परमेश्वर को जानकर, देकर गवाही उसकी,

प्रेम करूँगा, सेवा करूँगा सदा परमेश्वर की मैं।

शुद्ध करते और बचाते हैं परमेश्वर के वचन मुझे,

ताकि जी सकूँ असली ज़िंदगी मैं।

परमेश्वर को जानकर, देकर गवाही उसकी,

प्रेम करूँगा, सेवा करूँगा सदा परमेश्वर की मैं।

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