अध्याय 42

मुझे नहीं पता कि लोगों ने आज के कथनों में कोई बदलाव देखा है या नहीं। कुछ लोगों ने थोड़ा-सा देखा होगा, लेकिन वे निश्चित रूप से कहने की हिम्मत नहीं रखते। शायद दूसरों ने कुछ नहीं देखा। माह के बारहवें और पंद्रहवें दिन के बीच परमेश्वर के कथनों में इतना बड़ा बदलाव क्यों आया है? क्या तुमने इस पर विचार किया है? तुम्हारी क्या राय है? क्या तुमने परमेश्वर के सभी वचनों से कुछ भी समझा है? दो अप्रैल से पंद्रह मई के बीच किया गया मुख्य कार्य क्या था? आज लोग बेख़बर और इतने दिग्भ्रमित क्यों हैं, मानो उनके सिर पर किसी ने डंडे से वार कर दिया हो? आज "राज्य के लोगों के घोटाले" जैसे स्तंभ क्यों नहीं हैं? दो और चार अप्रैल को परमेश्वर ने मनुष्य की स्थिति नहीं बताई; इसी तरह, आज के बाद कई दिनों तक उसने लोगों की स्थिति की ओर इशारा नहीं किया—ऐसा क्यों है? यह निश्चित रूप से एक पहेली है—यह 180-डिग्री घुमाव क्यों? चलो सबसे पहले बात करते हैं कि परमेश्वर ने ऐसा क्यों कहा। आओ, पहले हम इस बारे थोड़ी बात करें कि परमेश्वर इस तरह क्यों बोला? आओ, परमेश्वर के पहले वचनों पर नज़र डालें, जिसमें उसने यह कहने में कोई समय बरबाद नहीं किया, "जैसे ही नया काम शुरू होता है।" यह वाक्य तुम्हें पहला संकेत देता है कि परमेश्वर का कार्य एक नई शुरुआत में प्रवेश कर चुका है, कि उसने एक बार फिर नया काम शुरू किया है। इससे पता चलता है कि ताड़ना समापन की ओर अग्रसर है; यह कहा जा सकता है कि पहले ही ताड़ना की पराकाष्ठा में प्रवेश किया जा चुका है, और इसलिए तुम लोगों को अपने समय का अधिकतम लाभ उठाते हुए ताड़ना के युग के कार्य का उपयुक्त रूप से अनुभव करना चाहिए, ताकि तुम पीछे न रह जाओ और त्यागे न जाओ। यह सारा कार्य मनुष्य का है, और इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य सहयोग करने की पूरी कोशिश करे। जब ताड़ना पूरी तरह से दूर कर दी जाएगी, तो परमेश्वर अपने कार्य का अगला हिस्सा प्रारंभ करेगा, "... मैंने अपने कार्य को मनुष्य के बीच करना जारी रखा है...। इस समय, मेरा दिल बहुत प्रसन्नता से भर गया है, क्योंकि मैंने कुछ लोगों को प्राप्त कर लिया है, और इसलिए मेरा 'विशेष उत्पाद' अब मंदी में नहीं है, यह अब खोखले वचन नहीं हैं।" अतीत में लोगों ने परमेश्वर की अदम्य इच्छा को उसके वचनों में देखा—इसमें कोई झूठ नहीं है—और आज परमेश्वर अपना काम अधिक गति से कर रहा है। मनुष्य के हिसाब से यह पूरी तरह से परमेश्वर की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है—परंतु परमेश्वर के हिसाब से उसका काम पहले ही समाप्त हो चुका है। चूँकि लोगों के विचार बहुत जटिल हैं, इसलिए चीज़ों के प्रति उनका दृष्टिकोण भी अकसर कुछ ज़्यादा ही जटिल होता है। लोगों की लोगों से बहुत ज़्यादा अपेक्षाएँ होती हैं, परंतु परमेश्वर मनुष्य से इतनी ऊँची अपेक्षाएँ नहीं करता, और इसके कारण, यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर और मनुष्य के बीच कितनी बड़ी विसंगति है। परमेश्वर जो कुछ करता है, उसमें लोगों की धारणाएँ साफ़-साफ़ दिखती हैं। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर लोगों से बड़ी माँगें करता है और लोग उन्हें पूरी करने में असमर्थ होते हैं, बल्कि लोग परमेश्वर से बड़ी माँगें करते हैं और परमेश्वर उन्हें पूरी करने में असमर्थ होता है। क्योंकि कई हज़ार वर्षों से शैतान द्वारा दूषित मानवजाति में, उपचार के बाद, उसके उत्तर-प्रभाव होते हैं, इसलिए लोगों ने हमेशा परमेश्वर से ऐसी बड़ी माँगें की हैं, और वे बिलकुल भी उदार नहीं होते, और इस बात से बेहद भयभीत रहते हैं कि परमेश्वर प्रसन्न नहीं है। इसलिए, यह तथ्य कि लोग कई चीज़ों में सक्षम नहीं होते, एक तरीका है, जिससे वे खुद को आत्म-ताड़ना के अधीन कर लेते हैं; वे स्वयं के कार्यों के परिणाम भोगते हैं—यह सरासर पीड़ा है। लोगों द्वारा भोगी गई कठिनाइयों में से 99% से अधिक को परमेश्वर तिरस्कृत कर देता है। इसे स्पष्ट रूप से कहा जाए तो, किसी ने भी वास्तव में परमेश्वर के लिए पीड़ा नहीं उठाई है। वे सभी स्वयं के कार्यों के परिणाम भोग रहे हैं—और बेशक, ताड़ना का यह चरण कोई अपवाद नहीं है; यह एक ऐसा कड़वा प्याला है, जिसे मनुष्य स्वयं तैयार करता है और स्वयं उसे पीने के लिए उठाकर मुँह तक ले जाता है। चूँकि परमेश्वर ने अपनी ताड़ना का वास्तविक उद्देश्य प्रकट नहीं किया है, अत: हालाँकि लोगों का एक हिस्सा है जो शापित है, फिर भी यह ताड़ना का प्रतिनिधित्व नहीं करता। लोगों का एक हिस्सा धन्य है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि वे भविष्य में भी धन्य रहेंगे। लोगों को ऐसा लगता है कि परमेश्वर एक ऐसा परमेश्वर है, जो अपने वचन पूरे नहीं करता। चिंता मत करो। शायद ये वचन कुछ ज़्यादा हो गए, लेकिन नकारात्मक न हो। मैं जो कहता हूँ, वह मनुष्य के दुख से कुछ सबंध रखता है, फिर भी मुझे लगता है कि तुम्हें परमेश्वर के साथ अच्छे संबंध बनाने चाहिए। तुम्हें उसे अधिक "उपहार" देने चाहिए—यह उसे निश्चित रूप से प्रसन्न कर देगा। मुझे विश्वास है कि परमेश्वर उन्हें प्रेम करता है, जो उसे "उपहार" देते हैं। तुम क्या कहते हो? क्या ये वचन सही हैं?

अब तक तुम लोगों ने अपनी कितनी संभावनाओं को अलग रखा है? परमेश्वर का कार्य जल्दी ही पूरा हो जाएगा, इसलिए शायद तुम लोगों ने लगभग अपनी सभी संभावनाओं को अलग रख दिया होगा, क्यों? तुम लोग स्वयं भी अपनी जाँच कर सकते हो : तुम लोगों को हमेशा ऊँचाई पर खड़े रहना, अपनी बड़ाई करना और दूसरों के सामने दिखावा करना पसंद है—यह क्या है? आज, मुझे अभी तक नहीं पता है कि लोगों की संभावनाएँ क्या हैं। अगर लोग वास्तव में दुख के समुद्र से घिरे हुए जीते हैं, कठिनाइयों के शुद्धिकरण के बीच या फिर यातना के विभिन्न उपकरणों के ख़तरे के अंतर्गत रहते हैं, या सभी लोगों द्वारा अस्वीकृति के समय में रहते हैं और आकाश की ओर देखते हुए गहरी आहें भरते हैं, तो शायद ऐसे समय अपने विचारों में वे अपनी संभावनाओं को अलग रख देते हैं। इसका कारण यह है कि लोग निराशा के बीच एक अलौकिक आदर्शलोक की खोज करते हैं, और आरामदायक परिस्थितियों में किसी ने भी कभी अपने सुंदर सपनों की अपनी खोज का त्याग नहीं किया। यह अवास्तविक हो सकता है, लेकिन काश, यह लोगों के दिलों में न होता। क्या तुम लोग अभी भी जीवित रहते हुए स्वर्गारोहण करना चाहते हो? क्या तुम अभी भी देह में अपना स्वरूप बदलना चाहते हो? मुझे नहीं पता कि तुम लोगों की राय भी यही है या नहीं, परंतु मैंने हमेशा यह महसूस किया है कि यह अवास्तविक है—ऐसे विचार बहुत अनावश्यक लगते हैं। लोग इस तरह की बातें करते हैं : "अपनी संभावनाओं को अलग रखो, अधिक यथार्थवादी बनो।" तुम कहते हो कि लोग धन्य होने के विचार छोड़ दें—लेकिन तुम्हारा अपने बारे में क्या कहना है? क्या तुम लोगों के धन्य होने के विचारों को नकारते हो और स्वयं आशीष पाने की कामना करते हो? तुम दूसरों को आशीष नहीं पाने देना चाहते, परंतु स्वयं गुप्त रूप से उन्हें पाने के बारे में सोचते रहते हो—यह तुम्हें क्या बनाता है? एक धोखेबाज़! जब तुम इस तरह व्यवहार करते हो, तो क्या तुम्हारा अंतःकरण अभियुक्त नहीं बन जाता? अपने दिल में क्या तुम ऋणी महसूस नहीं करते? क्या तुम धोखेबाज़ नहीं हो? तुम दूसरों के दिलों में वचनों को खोदकर निकालते हो, परंतु स्वयं के दिल में उनके बारे में कुछ नहीं कहते—कैसे कचरे के बेकार टुकड़े हो तुम! मुझे आश्चर्य होता है कि जब तुम लोग यह बोलते हो, तो अपने दिलों में क्या सोचते हो—क्या तुम लोगों को पवित्र आत्मा द्वारा तिरस्कृत नहीं किया जा सकता? क्या यह तुम लोगों की गरिमा भंग नहीं करता? तुम लोग वास्तव में नहीं जानते कि तुम लोगों के लिए क्या अच्छा है! तुम सब हमेशा श्री नांगुओ की तरह ही रहे हो—ढोंगी। कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर ने "वे सभी 'स्वयं को समर्पित' करने के लिए तैयार हैं" में "स्वयं को समर्पित" को उद्धरण-चिह्नों के बीच रखा है। परमेश्वर मनुष्य को बहुत अच्छी तरह से जानता है, और मनुष्य की धोखेबाज़ी कितनी भी चतुराई भरी क्यों न हो—भले ही वह कुछ भी प्रकट न करे और उसका चेहरा लाल न हो और न उसका दिल तेज़ी से धड़के—परमेश्वर की आँखें उज्ज्वल हैं, इसलिए मनुष्य को हमेशा परमेश्वर की नज़र से बचने में परेशानी हुई है। ऐसा लगता है, मानो परमेश्वर के पास एक्स-रे दृष्टि है और वह मनुष्य के भीतरी अंग देख सकता है, मानो वह लोगों के आर-पार देख सकता है और बिना किसी जाँच के उनके रक्त का प्रकार तय कर सकता है। ऐसी है परमेश्वर की बुद्धि, और मनुष्य द्वारा इसका अनुकरण नहीं किया जा सकता। जैसा कि परमेश्वर कहता है, "मैंने इतना काम क्यों किया है, फिर भी लोगों में इसका कोई सबूत नहीं है? क्या मैंने पर्याप्त प्रयास नहीं किया है?" परमेश्वर के साथ मनुष्य का सहयोग बहुत कम है, और यह कहा जा सकता है कि मनुष्य के भीतर बहुत-कुछ नकारात्मक है, और शायद ही लोगों में कोई सकारात्मकता हो। केवल कभी-कभार ही उनमें थोड़ी सकारात्मकता होती है, लेकिन वह बहुत दूषित होती है। यह दिखाता है कि लोग परमेश्वर से कितना प्यार करते हैं; ऐसा लगता है मानो उनके दिल में परमेश्वर के लिए प्रेम का करोड़ों में से केवल एक हिस्सा होता है, जिसमें से भी 50% दूषित होता है। यही वजह है कि परमेश्वर कहता है कि उसे मनुष्य में कोई सबूत नहीं दिखता। ठीक मनुष्य की अवज्ञा के कारण ही परमेश्वर के कथनों का स्वर बहुत ही निर्मम और निष्ठुर होता है। हालाँकि, परमेश्वर मनुष्य के साथ बीते हुए समय के बारे में बात नहीं करता, परंतु लोग हमेशा याद दिलाना चाहते हैं, ताकि वे स्वयं को परमेश्वर के सामने दिखा सकें, और वे हमेशा बीते हुए समय की ही बात करना चाहते हैं—फिर भी परमेश्वर ने कभी भी मनुष्य के कल को उसके आज की तरह नहीं लिया है; बल्कि, वह आज के लोगों से आज के संदर्भ में ही संपर्क करता है। यह परमेश्वर का दृष्टिकोण है, और इसमें, परमेश्वर ने इन वचनों को स्पष्ट रूप से कहा है, ताकि लोग भविष्य में यह न कह सकें कि परमेश्वर बहुत अनुचित है। क्योंकि परमेश्वर अविवेकपूर्ण काम नहीं करता, बल्कि लोगों को सच्चे तथ्यों के बारे में बताता है, ताकि ऐसा न हो कि लोग दृढ़ता से खड़े न हो सकें—क्योंकि मनुष्य, आख़िरकार, कमज़ोर है। ये वचन सुनकर, तुम लोगों का इस बारे में क्या विचार है : क्या तुम लोग सुनने और झुकने के लिए, और इस बारे में अब और न सोचने के लिए तैयार हो?

उपर्युक्त बात विषय से अलग है; यह मायने नहीं रखता कि इसके बारे में बात की जाती है या नहीं। मुझे आशा है कि तुम लोग इसकी आलोचना नहीं करोगे, क्योंकि परमेश्वर वचनों का कार्य करने के लिए आता है, और वह संसार के हर विषय के बारे में बात करना पसंद करता है। लेकिन मुझे आशा है कि फिर भी तुम लोग इन्हें पढ़ोगे, और तुम इन वचनों को अनदेखा नहीं करोगे। ठीक है? क्या तुम लोग ऐसा करोगे? अभी-अभी यह कहा गया था कि आज के वचनों में परमेश्वर ने नई जानकारी प्रकट की है : जिस पद्धति से परमेश्वर कार्य करता है, वह बदलने वाली है। बेहतर होगा कि इस सामयिक विषय पर ध्यान केंद्रित किया जाए। यह कहा जा सकता है कि आज के सभी कथन भावी मामलों की भविष्यवाणी करते हैं; ये कथन बताते हैं कि परमेश्वर अपने कार्य के अगले चरण के लिए किस प्रकार व्यवस्थाएँ कर रहा है। परमेश्वर ने कलीसिया के लोगों में अपना काम लगभग पूरा कर लिया है, और बाद में वह सभी लोगों के सामने क्रोध के साथ प्रकट होगा। जैसा कि परमेश्वर कहता है, "मैं धरती के लोगों से अपने कार्यों को स्वीकार करवाऊंगा, और 'न्यायपीठ' के सामने मेरे कर्म साबित होंगे, ताकि उन्हें पृथ्वी के लोगों के बीच स्वीकार किया जाए, जो स्वीकार करेंगे।" क्या तुम लोगों ने इन वचनों में कुछ देखा? इनमें परमेश्वर के कार्य के अगले हिस्से का सारांश है। पहले, परमेश्वर उन सभी संरक्षक कुत्तों को, जो राजनीतिक शक्ति को संचालित करते हैं, गंभीरता से विश्वास कराएगा और उन्हें बाध्य करेगा कि वे इतिहास के मंच से स्वयं पीछे हट जाएँ, और फिर कभी प्रतिष्ठा के लिए लड़ाई न करें, और फिर कभी कुचक्रों और षड्यंत्रों में संलग्न न हों। यह कार्य परमेश्वर द्वारा पृथ्वी पर विभिन्न आपदाएँ ढाकर किया जाना चाहिए। परंतु यह ऐसा मामला बिलकुल नहीं है कि परमेश्वर प्रकट होगा। क्योंकि, इस समय, बड़े लाल अजगर का राष्ट्र अभी भी मलिनता की भूमि होगा, और इसलिए परमेश्वर प्रकट नहीं होगा, परंतु केवल ताड़ना के रूप में उभरेगा। ऐसा है परमेश्वर का धर्मी स्वभाव, जिससे कोई बच नहीं सकता। इस दौरान, बड़े लाल अजगर के राष्ट्र में बसे सभी व्यक्ति विपत्तियों का सामना करेंगे, जिसमें स्वाभाविक रूप से पृथ्वी पर राज्य (कलीसिया) भी शामिल है। यह वही समय है, जब तथ्य सामने आएँगे, और इसलिए इसका अनुभव सभी लोगों द्वारा किया जाएगा, और कोई बच नहीं पाएगा। यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित किया गया है। यह ठीक कार्य के इस चरण के कारण है, जिसके बारे में परमेश्वर कहता है, "यही समय है महान योजनाओं को पूरा करने का।" क्योंकि भविष्य में पृथ्वी पर कोई कलीसिया नहीं होगा, और तबाही के आगमन के कारण लोग केवल उसी के बारे में सोच पाएँगे, जो उनके सामने होगा, और बाकी हर चीज़ को वे नज़रअंदाज़ कर देंगे, और तबाही के बीच परमेश्वर का आनंद लेना उनके लिए मुश्किल होगा। इसलिए, लोगों से कहा जाता है कि इस अद्भुत समय के दौरान अपने पूरे दिल से परमेश्वर से प्रेम करें, ताकि वे इस अवसर को गँवा न बैठें। जब यह तथ्य गुज़र जाएगा, तो परमेश्वर ने बड़े लाल अजगर को पूरी तरह हरा दिया होगा, और इस प्रकार परमेश्वर के लोगों की गवाही का कार्य समाप्त हो गया होगा; इसके बाद परमेश्वर कार्य के अगले चरण की शुरुआत करेगा, वह बड़े लाल अजगर के देश को तबाह कर देगा, और अंततः ब्रह्मांड के सभी लोगों को सलीब पर उलटा लटका देगा, जिसके बाद वह पूरी मानवजाति को नष्ट कर देगा—ये परमेश्वर के कार्य के भावी चरण हैं। इसलिए, तुम लोगों को इस शांतिपूर्ण वातावरण में परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करना चाहिए। भविष्य में तुम लोगों के पास परमेश्वर से प्रेम करने के और अधिक अवसर नहीं होंगे, क्योंकि लोगों के पास केवल देह में रहते हुए परमेश्वर से प्रेम करने का अवसर होता है; जब वे किसी दूसरे संसार में रहेंगे, तो कोई परमेश्वर से प्रेम करने की बात नहीं करेगा। क्या यह एक सृजित प्राणी की ज़िम्मेदारी नहीं है? और इसलिए तुम लोगों को अपने जीवन-काल के दौरान परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? क्या तुमने कभी इस बारे में सोचा है? क्या तुम परमेश्वर से प्रेम करने के लिए मर जाने के बाद का इंतज़ार कर रहे हो? क्या यह खोखली बात नहीं है? तुम आज ही परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास क्यों नहीं करते? क्या व्यस्त रहते हुए परमेश्वर से प्रेम करना परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम हो सकता है? ऐसा कहने का कारण यह है कि परमेश्वर के कार्य का यह चरण जल्दी ही समाप्त हो जाएगा, क्योंकि परमेश्वर के पास पहले ही शैतान के सामने गवाही है। इसलिए, मनुष्य को कुछ भी करने की कोई आवश्यकता नहीं है; मनुष्य को केवल उन वर्षों में परमेश्वर से प्रेम करने के लिए कहा जा रहा है, जिनमें वह जीवित है—यह कुंजी है। चूँकि परमेश्वर की अपेक्षाएँ बहुत ऊँची नहीं हैं, और इसके अलावा, चूँकि उसके दिल में एक झुलसाने वाली बेचैनी है, इसलिए उसने कार्य के इस चरण के समाप्त होने से पहले ही कार्य के अगले चरण का सारांश प्रकट कर दिया है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि कितना समय बचा है; यदि परमेश्वर अपने दिल में इतना व्यग्र नहीं होता, तो क्या वह ये वचन इतनी जल्दी कहता? समय कम होने के कारण ही परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है। आशा है कि तुम लोग अपने पूरे दिल से, अपने पूरे मस्तिष्क से, और अपनी पूरी शक्ति से परमेश्वर से प्रेम कर पाओगे, ठीक वैसे ही, जैसे तुम लोग अपने जीवन को सँजोते हो। क्या यह परम सार्थक जीवन नहीं है? जीवन का अर्थ तुम्हें और कहाँ मिल सकता है? क्या तुम बहुत अंधे नहीं हो रहे हो? क्या तुम परमेश्वर से प्रेम करने के लिए तैयार हो? क्या परमेश्वर मनुष्य के प्रेम के योग्य है? क्या लोग मनुष्य की आराधना के योग्य हैं? तो तुम्हें क्या करना चाहिए? परमेश्वर से बिना किसी संदेह के निडर होकर प्रेम करो, और देखो कि परमेश्वर तुम्हारे साथ क्या करेगा। देखो कि क्या वह तुम्हें मार डालता है? संक्षेप में, परमेश्वर से प्रेम करने का कार्य परमेश्वर के लिए नकल करने और लिखने के कार्य से अधिक महत्वपूर्ण है। तुम्हें उस चीज़ को पहला स्थान देना चाहिए, जो सबसे महत्वपूर्ण है, ताकि तुम्हारे जीवन का अधिक मूल्य हो और वह ख़ुशियों से भरा हो, और फिर तुम्हें अपने लिए परमेश्वर के "दंडादेश" की प्रतीक्षा करनी चाहिए। मैं सोचता हूँ कि क्या तुम्हारी योजना में परमेश्वर से प्रेम करना शामिल होगा? मैं चाहता हूँ कि हर व्यक्ति की योजनाएँ परमेश्वर द्वारा पूरी की जाएँ और वे सब साकार हो जाएँ।

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