अध्याय 41

परमेश्वर मनुष्य पर कैसे काम करता है? क्या तुमने इसे पूरी तरह से समझ लिया है? क्या तुम्हें यह बिलकुल स्पष्ट है? और वह कलीसिया में कैसे काम करता है? तुमने इनके बारे में क्या विचार बनाए हैं? क्या तुमने कभी इन सवालों पर ग़ौर किया है? कलीसिया में अपने कार्य के ज़रिये वह किसे पूर्ण बनाना चाहता है? क्या ये सभी सवाल तुम्हें बिलकुल स्पष्ट हैं? अगर नहीं, तो जो भी तुम करते हो, वह सब व्यर्थ, अकृत और शून्य है! क्या इन वचनों ने तुम्हारे दिल को छुआ है? निष्क्रिय रूप से पीछे हटे बिना महज़ सक्रिय रूप से प्रगति करना—क्या यह परमेश्वर की इच्छा पूरी करेगा? क्या बिना सोचे-समझे सहयोग पर्याप्त है? अगर दृष्टि पारदर्शी ढंग से स्पष्ट न हो, तो क्या किया जाना चाहिए? क्या आगे खोज न करना ठीक होगा? परमेश्वर कहता है, "एक बार मैंने मनुष्यों के बीच एक महान उपक्रम आरंभ किया, लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया, और इसलिए मुझे उनके सामने उसे चरण-दर-चरण प्रकट करने के लिए अपने वचन का उपयोग करना पड़ा। फिर भी मनुष्य मेरे वचनों को समझ नहीं पाया, और मेरी योजना के उद्देश्य से अनजान रहा।" इन वचनों का क्या अर्थ है? क्या तुमने कभी इसके उद्देश्य पर विचार किया है? क्या यह वाकई लापरवाही से और बिना किसी उद्देश्य के बनाया गया था? और अगर ऐसा है, तो इसका मतलब क्या हुआ? अगर उद्देश्य तुम्हें अस्पष्ट और तुम्हारी समझ के बाहर है, तो वास्तविक सहयोग कैसे प्राप्त किया जा सकता है? परमेश्वर कहता है कि समस्त मानव-जाति की खोज असीम समुद्रों के ऊपर, खोखले वचनों से लिखे सिद्धांत के बीच में है। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि तुम लोगों की खोज किस श्रेणी के अंतर्गत आती है, तो यह तो तुम भी बताने में असमर्थ हो। परमेश्वर मनुष्य में क्या संपन्न करना चाहता है? तुम्हें इन सभी चीज़ों के बारे में स्पष्ट होना चाहिए। क्या यह केवल बड़े लाल अजगर को नकारात्मक रूप से लज्जित करने के लिए है? क्या ऐसा हो सकता है कि बड़े लाल अजगर को लज्जित करने के बाद, परमेश्वर पहाड़ों में किसी संन्यासी की तरह खाली हाथ जीवनयापन करेगा? तो फिर परमेश्वर चाहता क्या है? क्या वह वाकई मनुष्यों के दिल चाहता है? या वह उनका जीवन चाहता है? या उनकी धन-संपत्ति? ये किस काम के हैं? ये परमेश्वर के किसी काम के नहीं। क्या परमेश्वर ने मनुष्य में इतना कुछ सिर्फ इसलिए किया है कि वह उन्हें शैतान पर विजय के साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल कर सके और अपनी "क्षमताएँ" जाहिर कर सके? क्या परमेश्वर इससे क्षुद्र प्रतीत नहीं होगा? क्या परमेश्वर इस तरह का परमेश्वर है? तब क्या वह उस बच्चे की तरह नहीं होगा, जो दूसरों के साथ झगड़े में वयस्कों को घसीट लेता है? इसके क्या मायने हैं? परमेश्वर को मापने के लिए मनुष्य लगातार अपनी धारणाओं का इस्तेमाल कर रहा है। परमेश्वर ने एक बार कहा था, "वर्ष में चार मौसम होते हैं और प्रत्येक मौसम में तीन महीने होते हैं।" मनुष्य ने उसके ये वचन सुने, उन्हें स्मृति के हवाले किया, और कहना जारी रखा कि एक मौसम में तीन महीने और एक वर्ष में चार मौसम होते हैं। और फिर, जब परमेश्वर ने पूछा, "एक वर्ष में कितने मौसम होते हैं? और एक मौसम में कितने महीने होते हैं?" तो मनुष्य ने एक स्वर में उत्तर दिया, "चार मौसम, तीन महीने।" मनुष्य हमेशा नियमों के समुच्चयों पर आधारित पद्धति के इस्तेमाल द्वारा परमेश्वर को परिभाषित करने का प्रयास करता है। आजकल "वर्ष में तीन मौसम और एक मौसम में चार महीनों" के युग में आकर भी मनुष्य अनजान है, मानो अंधा हो गया हो, और हर चीज़ में नियम खोज रहा है। और अब मनुष्य अपने चौपट राजा वाले नियम परमेश्वर पर लागू करने का प्रयास कर रहा है! वे सचमुच अंधे हैं! क्या वे नहीं देखते कि अब कोई "सर्दी" नहीं रही, केवल "वसंत, ग्रीष्म और पतझड़" रह गए हैं? मनुष्य सचमुच मूर्ख है! वर्तमान स्थिति में आकर भी वह इस बात से अनजान है कि परमेश्वर को कैसे जाने : ठीक 1920 में रहने वाले आदमी के समान, जो सोचता है कि परिवहन असुविधाजनक है, और सब लोगों को पैदल चलना चाहिए, या छोटे गधे की रहनुमाई करनी चाहिए, या जो सोचता है कि लोगों को तेल के दीयों का इस्तेमाल करना चाहिए, या जो अस्तित्व के अन्य आदिम तरीकों पर विश्वास करता है। क्या लोगों के दिमाग़ में ये सभी धारणाएँ मौजूद नहीं हैं? तो क्यों वे आज भी दया और प्रेम की बात करते हैं? इसका क्या उपयोग होगा? किसी बुढ़िया द्वारा अपने अतीत के बारे में की जाने वाली बकबक की तरह, इन वचनों का क्या उपयोग है? वर्तमान आखिर वर्तमान होता है; क्या यह घड़ी को 20-30 साल पीछे ले जाने की तरह नहीं है? सब लोग रुझान के पीछे चलते हैं; यह स्वीकार करने में वे इतना हिचकते क्यों हैं? ताड़ना के इस युग में दया और प्रेम की बात करने का क्या उपयोग है? मानो परमेश्वर के पास केवल दया और प्रेम ही हो? "आटे और चावल" के इस युग में लोग "जौ-बाजरे की भूसी और जंगली सब्ज़ियाँ" क्यों परोसे चले जाते हैं? जो कुछ परमेश्वर करने को तैयार नहीं है, मनुष्य मनुष्य उसे करने के लिए बाध्य करता है। अगर परमेश्वर विरोध करता है, तो उस पर "प्रतिक्रांतिकारी" होने का ठप्पा लगा दिया जाता है, हालाँकि बार-बार यह कहा गया कि परमेश्वर स्वभाव से दयालु या प्रेम करने वाला नहीं है, पर कौन सुनता है? मनुष्य बहुत बेतुका है। यह ऐसा है, मानो परमेश्वर के वचन का कोई प्रभाव न हो। मनुष्य मेरे वचनों को हमेशा एक अलग दृष्टिकोण से देख रहे हैं। परमेश्वर को मनुष्यों द्वारा हमेशा धौंस दी जाती रही है, मानो निर्दोष लोगों पर निराधार अपराध मढ़ दिए गए हों; इसलिए परमेश्वर के अनुसार कौन कार्य कर पाएगा? तुम लोग हमेशा परमेश्वर की दया और प्रेम में जीने के इच्छुक हो, तो परमेश्वर के पास मनुष्य के अपमानों को सहने के सिवाय और चारा ही क्या है? हालाँकि मुझे आशा है कि तुम लोग परमेश्वर के साथ बहस करने से पहले इस बात की जाँच-पड़ताल करोगे कि पवित्र आत्मा कैसे काम करता है। फिर भी, मैं तुमसे परमेश्वर के वचनों का मूल अर्थ समझने का आग्रह करता हूँ। अपनी ही भलाई के लिए बहुत चालाक बनने की कोशिश मत करो और यह न समझो कि परमेश्वर के वचन में "अशुद्धता" है। यह अनावश्यक होगा! कौन कह सकता है कि परमेश्वर के वचन में कितनी "अशुद्धता" है? जब तक कि परमेश्वर सीधे तौर पर यह नहीं कहता, या स्पष्ट रूप से यह इंगित नहीं करता। अपने आपको इतना ऊँचा मत समझो। अगर तुम उसके वचनों में से अपने अभ्यास का मार्ग देख पा रहे हो, तो तुम उसकी अपेक्षाएँ पूरी करोगे। तुम लोग और क्या देखना चाहते हो? परमेश्वर ने कहा, "मैं मनुष्य की कमज़ोरी के लिए कोई दया दिखाना बंद कर दूँगा।" अगर तुम इस विशिष्ट और सरल वक्तव्य को पूरी तरह से नहीं समझ सकते, तो आगे शोध और जाँच करने से क्या फायदा? यांत्रिकी का न्यूनतम ज्ञान न होने पर भी क्या तुम्हारे पास रॉकेट बनाने का साधन हो सकता है? क्या ऐसा व्यक्ति बेकार की डींगें नहीं हाँकता? मनुष्य के पास परमेश्वर का कार्य करने का साधन नहीं है; परमेश्वर ही है, जो उनका उत्कर्ष करता है। बिना यह जाने कि उसे किस चीज़ से प्रेम है और किस चीज़ से घृणा, केवल उसकी सेवा करना : क्या यह आपदा को दावत देना नहीं है? मनुष्य स्वयं को नहीं समझते, परंतु अपने को असाधारण समझते हैं। वे अपने आपको क्या समझते हैं! वे क्या समझते हैं कि वे क्या कर रहे हैं? अतीत के बारे में अच्छी तरह से सोचो, और भविष्य को देखो। इसके बारे में क्या ख़याल है? फिर अपने आपको जानो।

परमेश्वर ने मनुष्य के इरादों और उद्देश्यों के बारे में एक बड़ा खुलासा किया है। परमेश्वर ने कहा, "यही वह क्षण था, जब मैंने उस मनुष्य के इरादों और उद्देश्यों को देखा। मैंने बादलों के भीतर से आह भरी : मनुष्य को हमेशा अपने हितों के लिए ही काम क्यों करना चाहिए? क्या मेरी ताड़नाएँ उन्हें पूर्ण बनाने के लिए नहीं होतीं? या क्या मैं उनके सकारात्मक रवैये पर जानबूझकर हमला कर रहा हूँ?" इन वचनों से तुमने अपने बारे में कितना सीखा है? क्या मनुष्य के इरादे और उद्देश्य अब वास्तव में नदारद हैं? क्या तुमने कभी खुद इस पर ध्यान दिया है? परमेश्वर के सामने आना और सीखने की कोशिश करना तुम्हारे लिए पीड़ादायक नहीं होगा : क्या तुम लोगों में परमेश्वर द्वारा किए गए ताड़ना के कार्य ने परिणाम हासिल कर लिया है? क्या तुम किसी निष्कर्ष पर पहुँच गए हो? शायद परिणाम अत्यल्प है, वरना तुम बहुत पहले ही अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से इसे लिख चुके होते। परमेश्वर तुम लोगों से क्या हासिल करने को कहता है? जो वचन तुम लोगों से कहे गए हैं, उनमें से कितने फलित हुए हैं, और कितने व्यर्थ में कहे गए? परमेश्वर की दृष्टि में, उसके कुछ ही वचन फलित हुए हैं; इसका कारण यह है कि मनुष्य उसके मूल अर्थ को समझने में हमेशा असमर्थ रहता है, और जिसे वे स्वीकार करते हैं, वह उलटी तरफ से उछलकर वापस लौटने वाली वचनों की गूँज भर होती है। क्या वे इस तरह परमेश्वर की इच्छा जान सकते हैं? निकट भविष्य में परमेश्वर के पास मनुष्य के करने के लिए और अधिक काम होगा; क्या मनुष्य अपने आज के मामूली आध्यात्मिक कद के साथ उस कार्य को पूरा कर सकता है? अगर विचलन नहीं तो, लक्ष्य के बाहर निशाना लगाना या इस तरह की अन्य गलती करना—ऐसा होना मनुष्य का स्वभाव लगेगा। मुझे यह समझना मुश्किल लगता है : परमेश्वर ने जो कुछ कहा है, उसे मनुष्य अपने दिल में क्यों नहीं उतार लेता? क्या ऐसा हो सकता है कि अपने वचन बोलकर परमेश्वर आदमी के साथ केवल मज़ाक कर रहा हो और कोई परिणाम न चाहता हो? सब-कुछ मनुष्य को "आनंद, क्रोध, दुख और सुख" का नाटक करते देखने के लिए? मनुष्य को एक पल के लिए ख़ुश करने, और अगले पल में रुलाने, और फिर उसके नेपथ्य में चले जाने पर उसे जैसा वह चाहे, वैसा करने देने के लिए? इसका क्या प्रभाव होगा? "ऐसा क्यों होता है कि मनुष्य से की जाने वाली मेरी अपेक्षाओं में से हमेशा कुछ निकलकर नहीं आता? क्या ऐसा है कि मैं किसी कुत्ते से पेड़ पर चढ़ने के लिए कहता हूँ? या बात का बतंगड़ बना देता हूँ?" परमेश्वर जो वचन बोलता है, वे सभी मनुष्य की वास्तविक स्थिति पर लक्षित हैं। सभी मनुष्यों के भीतर देखने में कोई हानि नहीं है, यह देखने के लिए कि कौन परमेश्वर के वचन के भीतर जी रहा है। "अभी भी, अधिकांश पृथ्वी बदलती जा रही है। अगर किसी दिन पृथ्वी वास्तव में बदलकर किसी अन्य प्रकार की हो जाती है, तो मैं इसे अपने हाथ के एक झटके से अलग कर दूँगा—क्या यह मेरे कार्य का वर्तमान चरण नहीं है?" वास्तव में, परमेश्वर अभी भी इस कार्य को हाथ में लेने की प्रक्रिया में है; परंतु उसका "अपने हाथ के एक झटके से अलग कर देने" की बात कहना भविष्य के बारे में है, क्योंकि हर चीज़ के लिए एक प्रक्रिया आवश्यक होती है। परमेश्वर के वर्तमान कार्य का रुझान यही है—क्या यह तुम्हें स्पष्ट है? मनुष्य के इरादों में खामियों के कारण अशुद्ध आत्माओं को अंदर प्रवेश करने का अवसर मिल गया है। इस समय "पृथ्वी वास्तव में बदलकर किसी अन्य प्रकार की हो जाती है।" इस समय लोग गुणात्मक रूप से बदल जाएँगे, परंतु उनका सार वैसा ही रहेगा। इसका कारण यह है कि सुधार के बाद पृथ्वी पर कुछ और ही चीज़ है। दूसरे शब्दों में, मूल पृथ्वी निम्न कोटि की थी, लेकिन सुधार होने के बाद इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। परंतु एक निश्चित अवधि तक इसका इस्तेमाल कर लिए जाने के बाद, जब आगे इसका इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, तो यह धीरे-धीरे अपने मूल रूप में वापस आ जाएगी। यह परमेश्वर के कार्य के अगले कदम का सारांश है। परमेश्वर का भविष्य का कार्य अधिक जटिल होगा, क्योंकि वह हर चीज़ को उसकी अपनी श्रेणी में रखने का समय होगा। मिलने की जगह पर जब सभी चीज़ों का अंत आ जाएगा, तो यह एक अपरिहार्य रूप से अराजकता की स्थिति होगी, और मनुष्य दृढ़-संकल्पों से रहित होगा। जैसा कि परमेश्वर ने कहा था : "सभी मनुष्य कलाकार हैं, जो बजाई जाने वाली हर तरह की धुन के साथ गाते हैं।" जैसे मनुष्यों में बजाई जाने वाली धुन के साथ गाने की काबिलियत होती है, ठीक वैसे ही परमेश्वर उनके इस दोष का उपयोग अपने कार्य में अगले चरण का निर्माण करने के लिए करता है और इस तरह उन्हें अपने इसे दोष से मुक्त होने में सक्षम बनाता है। चूँकि उनके पास वास्तविक आध्यात्मिक कद नहीं है इस कारण वे दीवार पर उगने वाली घास की तरह हैं। अगर वे आध्यात्मिक कद प्राप्त कर लेते, तो वे गगनचुंबी वृक्ष बन गए होते। परमेश्वर बुरी आत्माओं के कार्य के एक हिस्से का उपयोग मानव-जाति के एक हिस्से को पूर्ण बनाने के लिए करने का इरादा रखता है, ताकि ये लोग हैवानों के अन्यायपूर्ण कार्यों को पूरी तरह देखने में सक्षम हो सकें और वास्तव में अपने "पूर्वजों" को जान सकें। केवल इसी तरह से मनुष्य पूरी तरह से स्वतंत्र हो सकते हैं, न केवल शैतान के वंशजों को, बल्कि शैतान के पूर्वजों को भी त्यागकर। बड़े लाल अजगर को पूरी तरह से हराने में यह परमेश्वर का मूल इरादा है : ताकि सभी मनुष्य बड़े लाल अजगर का असली स्वरूप जानें, उसका मुखौटा पूरी तरह से उतारकर उसका वास्तविक स्वरूप देख सकें। परमेश्वर यही प्राप्त करना चाहता है, और यही पृथ्वी पर उसके द्वारा किए गए समस्त कार्य का अंतिम लक्ष्य है; और यही उसका सभी मनुष्यों में हासिल करने का उद्देश्य है। इसे परमेश्वर के प्रयोजन के लिए सभी चीज़ों को जुटाने के रूप में जाना जाता है।

भविष्य का कार्य कैसे किया जाएगा, क्या तुम लोगों को यह स्पष्ट है? यह सब समझना होगा। उदाहरण के लिए : परमेश्वर ऐसा क्यों कहता है कि मनुष्य कभी अपने कर्तव्यों को नहीं पूरा करते हैं? वह ऐसा क्यों कहता है कि बहुत लोग मेरे द्वारा दिए गए "गृहकार्य" को पूरा करने में विफल रहते हैं? इन चीज़ों को कैसे हासिल किया जा सकता है? क्या तुमने कभी इन सवालों पर विचार किया है? क्या ये तुम्हारे संवाद का विषय बने हैं? कार्य के इस चरण में मनुष्य को परमेश्वर के वर्तमान इरादों को समझना होगा। एक बार यह हासिल हो जाए, तो दूसरी चीज़ों पर चर्चा की जा सकती है, ठीक है न? परमेश्वर मनुष्य में जो कुछ करना चाहता है, उसे स्पष्ट रूप से बताया जाना होगा, अन्यथा सब-कुछ व्यर्थ हो जाएगा, और मनुष्य इसमें प्रवेश नहीं कर पाएगा, इसे हासिल करने की तो बात ही अलग है; और सब खोखली बात होगी। परमेश्वर ने आज जो कहा है, क्या उस पर अमल करने का कोई मार्ग तुमने ढूँढ़ा है? परमेश्वर के कथनों को लोग डर की भावना से देखते हैं। वे इसे पूरी तरह से समझ नहीं सकते, और साथ ही परमेश्वर को नाराज़ करने से डरते भी हैं। खाने-पीने के जितने भी तरीकों के बारे में अभी बताया गया है, उनमें से उन्होंने कितनों की खोज कर ली है? अधिकांश लोग नहीं जानते कि कैसे खाना-पीना है; इसे कैसे हल किया जा सकता है? क्या तुम्हें आज के कथन में खाने-पीने का कोई तरीक़ा मिला? तुमने इस समय किस तरह से सहयोग करने का प्रयास किया? और एक बार वचनों को खा-पीने लेने के बाद तुम किन तरीकों से अपने प्रभावों पर चर्चा करते हो? क्या मुनष्य को ऐसा नहीं करना चाहिए? किसी निर्दिष्ट बीमारी के लिए कोई किस तरह सही दवा लिखता है? क्या तुम्हें अभी भी परमेश्वर की प्रत्यक्ष घोषणा की आवश्यकता है? क्या यह जरूरी है? उपर्युक्त समस्याओं को पूरी तरह से कैसे समाप्त किया जा सकता है? यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम लोग अपने व्यवहारिक क्रियाकलापों में पवित्र आत्मा के साथ सहयोग करने में सक्षम हो या नहीं। अगर उपयुक्त सहयोग होगा, तो पवित्र आत्मा बड़ा काम करेगा। अगर कोई उपयुक्त सहयोग नहीं होगा और केवल गड़बड़ होगी, तो पवित्र आत्मा अपना सामर्थ्य उजागर करने की स्थिति में नहीं होगा। "अगर तुम अपने को जानते हो और अपने शत्रु को भी जानते हो, तो विजय हमेशा तुम्हारी होगी।" मूल रूप से ये वचन चाहे किसी ने भी कहे हों, ये तुम लोगों पर सबसे उपयुक्त तरीके से लागू हो सकते हैं। संक्षेप में, अपने शत्रुओं को जानने से पहले तुम्हें अपने आपको जानना होगा, और केवल तभी तुम अंतत: हर लड़ाई जीतने में सक्षम होगे। इन सभी चीज़ों को करने में तुम लोगों को सक्षम होना चाहिए। परमेश्वर तुमसे चाहे कुछ भी माँगे, तुम्हें उसे अपना सब-कुछ देना आवश्यक है। आशा है कि अंत में तुम परमेश्वर के समक्ष आने और उसे अपनी परम भक्ति प्रदान करने में सक्षम होगे, और जब तक तुम सिंहासन पर बैठे परमेश्वर की संतुष्ट मुसकराहट देख पाते हो, भले ही यह तुम्हारी मृत्यु का नियत समय क्यों न हो, आँखें बंद करते समय भी तुम्हें हँसने और मुसकराने में सक्षम होना चाहिए। पृथ्वी पर अपने समय के दौरान तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपना अंतिम कर्तव्य अवश्य निभाना चाहिए। अतीत में, पतरस को परमेश्वर के लिए क्रूस पर उलटा लटका दिया गया था; परंतु तुम्हें अंत में परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए, और अपनी सारी ऊर्जा परमेश्वर के लिए खर्च करनी चाहिए। एक सृजित प्राणी परमेश्वर के लिए क्या कर सकता है? इस कारण से तुम्हें जितना जल्दी हो सके, अपने आपको परमेश्वर पर छोड़ देना चाहिए, ताकि वह अपनी इच्छानुसार तुम्हारी व्यवस्था कर सके। जब तक परमेश्वर खुश और प्रसन्न है, तब तक उसे जो चाहे करने दो। मनुष्यों को शिकायत करने का क्या अधिकार है?

पिछला: अध्याय 40

अगला: अध्याय 42

दुनिया आपदा से घिर गई है। यह हमें क्या चेतावनी देती है? आपदाओं के बीच हम परमेश्वर द्वारा कैसे सुरक्षित किये जा सकते हैं? इसके बारे में ज़्यादा जानने के लिए हमारे साथ हमारी ऑनलाइन मीटिंग में जुड़ें।
WhatsApp पर हमसे संपर्क करें
Messenger पर हमसे संपर्क करें

संबंधित सामग्री

अभ्यास (2)

बीते समय में, लोग परमेश्वर के साथ रहने और प्रत्येक क्षण आत्मा के भीतर जीने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करते थे। आज के अभ्यास की तुलना में,...

अध्याय 24

मेरी ताड़नाएँ सभी लोगों पर आती हैं, फिर भी यह सभी लोगों से दूर भी रहती हैं। हर व्यक्ति का संपूर्ण जीवन मेरे प्रति प्रेम और नफ़रत से भरा हुआ...

वचन देह में प्रकट होता है अंत के दिनों के मसीह के कथन (संकलन) अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप अंत के दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें