परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?

परमेश्वर में विश्वास करने में, तुम्हें कम से कम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध रखने के मुद्दे का समाधान करना आवश्यक है। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य संबंध नहीं है, तो परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास का अर्थ खो जाता है। परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध स्थापित करना पूरी तरह से परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करने के माध्यम से किया जाता है। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का अर्थ है परमेश्वर के किसी भी कार्य पर संदेह न करने या उससे इनकार न करने और उसके कार्य के प्रति समर्पित रहने में सक्षम होना। इसका अर्थ है परमेश्वर की उपस्थिति में सही इरादे रखना और स्वयं के लिए योजनाएँ न बनाना; इसका अर्थ परमेश्वर के घर के हितों को प्राथमिकता देना, परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करना और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना भी है, चाहे तुम कुछ भी कर रहे हो। तुम जो कुछ भी करते हो, उसमें तुम्हें परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के इरादों को नहीं भी समझते, तो भी तुम्हें अपनी सर्वोत्तम योग्यता के साथ अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को पूरा करना चाहिए। एक बार परमेश्वर के इरादे तुम पर प्रकट हो जाते हैं, तो फिर उनके अनुसार अभ्यास करो, यह बहुत विलंब नहीं होगा। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाता है, तब लोगों के साथ भी तुम्हारा संबंध सामान्य होगा। परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध बनाने के लिए, सब कुछ परमेश्वर के वचनों की नींव पर बनाया जाना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के वचनों और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य करना चाहिए, तुम्हें अपने विचार सही रखने चाहिए, हर चीज में सत्य खोजना चाहिए और जब तुम सत्य समझ जाओ, तो तुम्हें सत्य का अभ्यास करना चाहिए। चाहे तुम्हारे साथ कुछ भी घटित हो, तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर की आज्ञा मानने वाले दिल से खोजना चाहिए। इस प्रकार अभ्यास करते हुए, तुम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध बनाए रख पाओगे। साथ ही अपने कर्तव्य को उचित ढंग से निभाते समय ही तुम्हें यह सुनिश्चित भी करना चाहिए कि तुम ऐसा कुछ भी न करो जिससे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश को लाभ न हो, और ऐसा कुछ भी न कहो जो भाई-बहनों के लिए उन्नतिप्रद न हो। कम से कम तुम्हें ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जो तुम्हारे जमीर के विरुद्ध हो और तुम्हें कतई कुछ भी ऐसा नहीं करना चाहिए जो शर्मनाक हो। खासकर तुम्हें कतई कुछ ऐसा नहीं करना चाहिए जो परमेश्वर से विद्रोह करता हो या उसका प्रतिरोध करता हो, न ही कुछ ऐसा करना चाहिए जो कलीसिया के कार्य या जीवन में बाधा डालता हो। अपने हर कार्य में खुले दिल वाले और सच्चे रहो और सुनिश्चित करो कि तुम्हारा हर क्रियाकलाप परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत करने योग्य हो। यद्यपि कभी-कभी देह कमज़ोर हो सकती है, फिर भी तुम्हें अपने व्यक्तिगत लाभ का लालच न करते हुए, कोई भी स्वार्थी या नीच कार्य न करते हुए, अक्सर आत्म-चिंतन करते हुए परमेश्वर के घर के हितों को पहले रखना चाहिए। इस तरह तुम अक्सर परमेश्वर के सामने रह सकते हो, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध पूरी तरह सामान्य हो जाएगा।

अपने हर कार्य में तुम्हें यह जाँचना चाहिए कि क्या तुम्हारे इरादे सही हैं। यदि तुम परमेश्वर की माँगों के अनुसार कार्य कर सकते हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है। यह न्यूनतम मापदंड है। अगर, अपने इरादों की जाँच करते हुए, तुम यह पाते हो कि तुममें गलत इरादे पैदा हो गए हैं, और तुम उनके खिलाफ विद्रोह कर और परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य कर पाते हो तो तुम परमेश्वर के समक्ष एक सही व्यक्ति बन जाओगे। यह दर्शाता है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है, और तुम जो कुछ करते हो वह परमेश्वर के लिए है, न कि तुम्हारे अपने लिए। तुम जो कुछ भी करते या कहते हो, उसमें अपने हृदय को सही बनाने और अपने कार्यों में न्यायपूर्ण होने में सक्षम बनो, और कार्य करते हुए अपनी भावनाओं या अपनी इच्छा से संचालित मत होओ। ये वे सिद्धांत हैं, जिनके अनुसार परमेश्वर के विश्वासियों को कार्य करना चाहिए। यहाँ तक कि एक छोटी-सी बात भी व्यक्ति के इरादों और आध्यात्मिक कद को प्रकट कर सकती है, और इसलिए, परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग में प्रवेश करने के लिए व्यक्ति को पहले अपने इरादे और परमेश्वर के साथ अपना संबंध सुधारना चाहिए। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होता है, केवल तभी तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जा सकते हो; केवल तभी तुममें परमेश्वर की काट-छाँट, अनुशासन और शोधन अपना अपेक्षित प्रभाव हासिल कर पाएगा। कहने का अर्थ यह है कि यदि मनुष्य अपने हृदय में परमेश्वर को रखने में सक्षम हैं और वे व्यक्तिगत लाभ के पीछे नहीं भागते या अपनी संभावनाओं पर (यानी देह के बारे में) विचार नहीं करते, बल्कि जीवन प्रवेश के लिए बोझ उठाते हैं, सत्य का अनुसरण करने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करते हैं और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण करते हैं—अगर तुम ऐसा कर सकते हो, तो जिन लक्ष्यों का तुम अनुसरण करते हो, वे सही होंगे और परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाएगा। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के साथ अपना संबंध सही करना व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा में प्रवेश करने का पहला कदम है। यद्यपि मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के हाथों में है और वह परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित है, और मनुष्य द्वारा उसे बदला नहीं जा सकता, तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जा सकते हो या नहीं अथवा तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं। तुम्हारे कुछ हिस्से ऐसे हो सकते हैं, जो कमज़ोर या विद्रोही हों—परंतु जब तक तुम्हारे दृष्टिकोण और इरादे सही हैं, और जब तक परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सही और सामान्य है, तब तक तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य हो। यदि तुम्हारा परमेश्वर के साथ सही संबंध नहीं है, और तुम देह के लिए या अपने परिवार के लिए कार्य करते हो, तो चाहे तुम जितनी भी मेहनत करो, यह व्यर्थ ही होगा। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है, तो बाकी सब चीजें भी ठीक हो जाएँगी। परमेश्वर कुछ और नहीं देखता, केवल यह देखता है कि क्या परमेश्वर में विश्वास करते हुए तुम्हारे दृष्टिकोण सही हैं : अंततः तुम किस पर विश्वास करते हो, तुम किसके लिए विश्वास करते हो और तुम क्यों विश्वास करते हो। यदि तुम इन चीजों को स्पष्ट रूप से देख पाते हो और अपने दृष्टिकोण अच्छी तरह से रखते हुए अभ्यास करते हो, तो तुम अपने जीवन में उन्नति करोगे, और तुम्हें सही मार्ग पर प्रवेश की गारंटी भी दी जाएगी। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं है, और परमेश्वर में विश्वास के तुम्हारे दृष्टिकोण विकृत हैं, तो बाकी सब कुछ बेकार है; तुम अपनी आस्था का कितना भी अभ्यास क्यों न करो, तुम कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाओगे। परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होने के बाद, जब तुम देह के खिलाफ विद्रोह करोगे, प्रार्थना करोगे, दुःख उठाओगे, सहन करोगे, समर्पण करोगे, अपने भाई-बहनों की सहायता करोगे, परमेश्वर के लिए खुद को अधिक खपाओगे, और ऐसी अन्य चीजें करोगे, केवल तभी तुम उसकी स्वीकृति प्राप्त करोगे। तुम्हारे कुछ करने की कोई कीमत या महत्व है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्हारे इरादे ठीक और विचार सही हैं या नहीं। आजकल बहुत-से लोग परमेश्वर पर विश्वास इस तरह करते हैं, जैसे घड़ी देखने के लिए सिर उठा रहे हों—उनके परिप्रेक्ष्य विकृत होते हैं और उन्हें बस इस समस्या को हल करने की जरूरत है। अगर यह समस्या हल हो गई, तो सब कुछ सही हो जाएगा; और अगर नहीं हुई, तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा। कुछ लोग मेरी उपस्थिति में अच्छा व्यवहार करते हैं, परंतु मेरी पीठ पीछे वे केवल मेरा विरोध ही करते हैं। यह कुटिलता और धोखे का प्रदर्शन है, और इस तरह के व्यक्ति शैतान के सेवक हैं; वे परमेश्वर की परीक्षा लेने के लिए आए शैतान के विशिष्ट रूप हैं। तुम केवल तभी एक सही व्यक्ति हो, जब तुम मेरे कार्य और मेरे वचनों के प्रति समर्पित रह सको। जब तक तुम परमेश्वर के वचनों को खा-पी सकते हो; जब तक तुम जो करते हो वह परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत करने योग्य है और अपने समस्त कार्यों में तुम खुले और सच्चे दिल से व्यवहार करते हो; जब तुम निंदनीय अथवा दूसरों के जीवन को नुकसान पहुँचाने वाले कार्य नहीं करते; और जब तुम प्रकाश में रहते हो और शैतान को अपना शोषण नहीं करने देते, तब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सुव्यवस्थित होता है।

परमेश्वर में विश्वास करने के लिए तुम्हें अपने इरादों और दृष्टिकोणों को सही करना आवश्यक है; तुम्हें परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर जिन समस्त परिवेशों का इंतजाम करता है, जिस व्यक्ति के बारे में परमेश्वर गवाही देता है और व्यावहारिक परमेश्वर की सही समझ और उनके प्रति व्यवहार का सही तरीका होना आवश्यक है। तुम्हें अपने विचारों के अनुसार अभ्यास नहीं करना चाहिए, और न ही अपनी क्षुद्र योजनाएँ बनानी चाहिए। तुम जो कुछ भी करो, तुम्हें सत्य को खोजने, और एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी स्थिति में परमेश्वर के सब कार्यों के प्रति समर्पित रहने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करना और जीवन के सही मार्ग में प्रवेश करना चाहते हो, तो तुम्हारा हृदय सदैव परमेश्वर की उपस्थिति में रहना आवश्यक है। बेलगाम मत बनो, शैतान का अनुसरण मत करो, शैतान को अपना काम करने का कोई अवसर मत दो, और शैतान को अपना इस्तेमाल मत करने दो। तुम्हें स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर को सौंप देना चाहिए और परमेश्वर को अपने ऊपर शासन करने देना चाहिए।

क्या तुम शैतान के सेवक बनना चाहते हो? क्या तुम शैतान द्वारा अपना शोषण करवाना चाहते हो? क्या तुम परमेश्वर पर विश्वास और उसका अनुसरण इसलिए करते हो ताकि तुम उसके द्वारा पूर्ण बनाए जा सको या इसलिए कि तुम उसके कार्य की विषमता बन सको? इस जीवन में, क्या तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने और अर्थपूर्ण जीवन जीने के इच्छुक हो या तुम इसके बजाय एक बेकार और खाली जीवन जीना पसंद करोगे? तुम परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया जाना पसंद करोगे, या शैतान द्वारा अपना शोषण करवाना? तुम परमेश्वर के वचनों और सत्य से ओतप्रोत होना पसंद करोगे या फिर पाप और शैतान से ओतप्रोत होना? इन बातों पर ध्यान से विचार करो। अपने दैनिक जीवन में तुम्हें यह समझना आवश्यक है कि तुम्हारे द्वारा कहे जाने वाले कौन-से शब्द और तुम्हारे द्वारा किए जाने वाले कौन-से कार्य परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं रहने देंगे, और फिर सही तरीका अपनाने के लिए स्वयं को सुधारो। हर वक्त अपने शब्दों, अपने कार्यों, अपने हर कदम और अपने समस्त विचारों और भावों की जाँच करो। अपनी वास्तविक स्थिति की सही समझ हासिल करो और पवित्र आत्मा के कार्य के तरीके में प्रवेश करो। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का यही एकमात्र तरीका है। इसका आकलन करके कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं, तुम अपने इरादों को सुधार पाओगे, मनुष्य के प्रकृति सार को समझ पाओगे, और स्वयं को वास्तव में समझ पाओगे, और ऐसा करने पर तुम वास्तविक अनुभवों में प्रवेश कर पाओगे, स्वयं के खिलाफ वास्तविक तरीके से विद्रोह कर पाओगे और स्वेच्छा से समर्पण कर पाओगे। जब तुम इस बात से संबंधित इन मामलों का अनुभव करते हो कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं, तो तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अवसर प्राप्त करोगे और पवित्र आत्मा के कार्य की कई दशाओं को समझने में सक्षम होगे। तुम शैतान की कई साजिशों को भी देख पाओगे और उसके षड्यंत्रों को समझ पाओगे। केवल यही मार्ग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की ओर ले जाता है। परमेश्वर के साथ अपना संबंध सही करो ताकि तुम अपने आपको परमेश्वर के सभी प्रबंधनों के प्रति उनकी पूर्णता में समर्पित कर सको, और वास्तविक अनुभवों में और भी गहराई से प्रवेश कर सको और पवित्र आत्मा का कार्य और अधिक प्राप्त कर सको। जब तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का अभ्यास करते हो, तो अधिकांश मामलों में सफलता देह के खिलाफ विद्रोह करने और परमेश्वर के साथ वास्तविक सहयोग करने से मिलेगी। तुम्हें यह समझना चाहिए कि “सहयोगी हृदय के बिना परमेश्वर के कार्य को प्राप्त करना कठिन है; यदि देह पीड़ा का अनुभव नहीं करती, तो परमेश्वर से आशीषें प्राप्त नहीं होंगी; यदि आत्मा संघर्ष नहीं करती, तो शैतान शर्मिंदा नहीं होगा।” यदि तुम इन सिद्धांतों का अभ्यास करो और इन्हें अच्छी तरह से समझ लो, तो परमेश्वर में विश्वास करने के तुम्हारे दृष्टिकोण सही हो जाएँगे। अपने वर्तमान अभ्यास में तुम लोगों को “भरपेट निवाले खाने की कोशिश में रहने” की मानसिकता को छोड़ना आवश्यक है; तुम्हें इस मानसिकता को छोड़ना भी आवश्यक है कि “सब कुछ पवित्र आत्मा द्वारा किया जाता है और लोग उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते।” जो भी लोग ऐसा कहते हैं, वे सब यह सोचते हैं, “लोग वह सब कर सकते हैं जो वे करना चाहते हैं, और जब समय आएगा तो पवित्र आत्मा अपना कार्य करेगा। लोगों को देह को नियंत्रित करने या सहयोग करने की आवश्यकता नहीं है; महत्त्वपूर्ण यह है कि पवित्र आत्मा द्वारा उन्हें प्रेरित किया जाए।” ये मत बेतुके हैं। इन परिस्थितियों में पवित्र आत्मा कार्य करने में असमर्थ है। इस प्रकार का दृष्टिकोण पवित्र आत्मा के कार्य के लिए एक बड़ी रुकावट बन जाता है। अक्सर पवित्र आत्मा का कार्य लोगों के सहयोग से प्राप्त किया जाता है। लोग सहयोग नहीं करते और उनमें कोई संकल्प नहीं होता है, फिर भी अपने स्वभाव में बदलाव लाना चाहते हैं और पवित्र आत्मा का कार्य तथा परमेश्वर से प्रबोधन और रोशनी प्राप्त करना चाहते हैं; ये वाकई अवास्तविक अपेक्षाएँ हैं। इसे “अपने प्रति उदार होना और शैतान को क्षमा करना” कहा जाता है। ऐसे लोगों का परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध नहीं होता। तुम्हें अपने भीतर शैतानी स्वभाव के कई खुलासे और अभिव्यक्तियाँ ढूँढ़नी चाहिए और अपने ऐसे अभ्यास तलाशने चाहिए, जो अब परमेश्वर की आवश्यकताओं के प्रतिकूल हैं। क्या तुम अब शैतान के खिलाफ विद्रोह कर सकोगे? तुम्हें परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना चाहिए, परमेश्वर की इच्छाओं के अनुसार कार्य करना चाहिए और नए जीवन के साथ एक नया व्यक्ति बनना चाहिए। अपने पिछले अपराधों पर ध्यान मत दो; अनुचित रूप से पश्चातापी न बनो; ऊपर उठने और परमेश्वर के साथ सहयोग करने में सक्षम बनो और जो कर्तव्य तुम्हें अच्छे से निभाने हैं उन्हें अच्छे से निभाओ। इस प्रकार परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाएगा।

यदि इसे पढ़ने के बाद तुम केवल शब्दों को स्वीकार करने का दावा करते हो, और अभी भी तुम्हारा हृदय द्रवित नहीं होता, और तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का प्रयास नहीं करते, तो यह प्रमाणित हो जाता है कि तुम परमेश्वर के साथ अपने संबंध को महत्व नहीं देते। यह प्रमाणित हो जाता है कि तुम्हारे दृष्टिकोण अभी तक सही नहीं हुए हैं, तुम्हारे इरादे परमेश्वर द्वारा तुम्हें प्राप्त किए जाने और उसके लिए महिमा लाने की ओर निर्दिष्ट नहीं किए गए हैं, बल्कि शैतान के षड्यंत्र जारी रहने और तुम्हारे व्यक्तिगत उद्देश्य पूरे करने के लिए निर्दिष्ट किए गए हैं। ऐसे व्यक्ति गलत इरादे और गलत दृष्टिकोण रखते हैं। परमेश्वर चाहे जो भी कहे या वह इसे कैसे भी कहे, ऐसे लोग पूरी तरह से उदासीन रहते हैं और उनमें जरा-सा भी परिवर्तन नहीं देखा जा सकता है। वे निडर और निर्लज्ज दोनों होते हैं। ऐसा व्यक्ति मृत आत्मा वाला और भ्रमित होता है। परमेश्वर के हर कथन को एक बार जब तुम पढ़ और समझ लेते हो, तो उसे अभ्यास में लाओ। अतीत में तुमने कैसा भी व्यवहार क्यों न किया हो, शायद ऐसे अवसर आए हों जब तुम्हारी देह कमजोर थी या तुम विद्रोही थे या तुमने प्रतिरोध किया था; इसका कोई खास महत्व नहीं है और यह आज तुम्हारे जीवन को परिपक्व होने से नहीं रोक सकता है। अगर आज तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रख सकते हो, तो आशा की किरण बाकी है। यदि हर बार परमेश्वर के वचन पढ़ने पर तुममें परिवर्तन होता है, और दूसरे लोग बता सकते हैं कि तुम्हारा जीवन बदलकर बेहतर हो गया है, तो यह दिखाता है कि अब तुम्हारा परमेश्वर के साथ संबंध सामान्य है और उसे सही रखा गया है। परमेश्वर लोगों से उनके अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। एक बार जब तुम समझ जाते हो और जागरूक हो जाते हो, जब तुम विद्रोही नहीं रहते और प्रतिरोध करना छोड़ देते हो, तो परमेश्वर फिर भी तुम पर दया करता है। जब तुम्हारे पास परमेश्वर द्वारा तुम्हें पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करने की समझ और संकल्प होता है, तो परमेश्वर की उपस्थिति में तुम्हारी स्थिति सामान्य हो जाएगी। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, बस इन बातों पर ध्यान दो : यदि मैं यह कार्य करूँगा, तो परमेश्वर क्या सोचेगा? क्या इससे मेरे भाई-बहनों को लाभ पहुँचेगा? क्या यह परमेश्वर के घर के कार्य के लिए लाभकारी होगा? अपनी प्रार्थना, संगति, बोलचाल, मामलों से निपटने या लोगों के साथ संपर्क में अपने इरादों की जाँच करो और देखो कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं। यदि तुम अपने इरादों और विचारों को नहीं समझ सकते, तो इसका अर्थ है कि तुममें विवेक की कमी है, जिससे प्रमाणित होता है कि तुम सत्य को बहुत कम समझते हो। अगर तुम, जो कुछ भी परमेश्वर करता है, उसे स्पष्ट रूप से समझने और परमेश्वर के पक्ष में खड़े होकर चीजों को उसके वचनों के लेंस के माध्यम से देखने में समर्थ हुए, तो तुम्हारे दृष्टिकोण सही हो गए होंगे। अतः परमेश्वर के साथ अच्छे संबंध बनाना हर उस व्यक्ति के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है, जो परमेश्वर में विश्वास रखता है; सभी को इसे सर्वोपरि महत्त्व का कार्य और अपने जीवन की सबसे बड़ी घटना मानना चाहिए। जो कुछ भी तुम करते हो, उसे इस बात से मापा जाता है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं। यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है और तुम्हारे इरादे सही हैं, तो कार्य करो। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध बनाए रखने के लिए तुम्हें अपने व्यक्तिगत हितों का नुकसान उठाने से डरने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है; तुम शैतान को जीतने नहीं दे सकते, तुम शैतान को अपने ऊपर पकड़ बनाने नहीं दे सकते और तुम शैतान को तुम्हें हँसी का पात्र बनाने नहीं दे सकते। ऐसे इरादे होना इस बात का संकेत है कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है—यह देह के लिए नहीं है, बल्कि आत्मा की शांति के लिए है, पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने के लिए है और परमेश्वर के इरादे पूरे करने के लिए है। सही दशा में प्रवेश करने के लिए तुम्हें परमेश्वर के साथ अच्छा संबंध बनाना और उस पर विश्वास करने के अपने दृष्टिकोणों को सही रखना आवश्यक है। ऐसा इसलिए, ताकि परमेश्वर तुम्हें प्राप्त कर सके और ताकि वह अपने वचनों के फल तुममें प्रकट कर सके, तुम्हें और अधिक प्रबुद्ध और रोशन कर सके। इस प्रकार से तुम सही तरीके में प्रवेश करोगे। परमेश्वर के आज के वचनों को लगातार खाते-पीते रहो, पवित्र आत्मा के कार्य करने के मौजूदा तरीके में प्रवेश करो, परमेश्वर की आज की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करो, अभ्यास के पुराने तरीकों का पालन मत करो, कार्य करने के पुराने तरीकों से मत चिपके रहो, और जितना जल्दी हो सके, कार्य करने के आज के तरीके में प्रवेश करो। इस तरह परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध पूरी तरह से सामान्य हो जाएगा और तुम परमेश्वर में विश्वास रखने के सही मार्ग पर चल पड़ोगे।

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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