वास्तविकता पर अधिक ध्यान केन्द्रित करो

हर व्यक्ति के पास परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने की संभावना है, इसलिए सभी को समझना चाहिए कि परमेश्वर के लिए कौन-सी सेवा परमेश्वर के प्रयोजनों के सबसे ज्यादा अनुरूप है। अधिकांश लोगों को यह नहीं पता है कि परमेश्वर में विश्वास करने का क्या अर्थ है और उन्हें पता नहीं है कि क्यों परमेश्वर पर विश्वास करना चाहिए। इसका मतलब यह है कि अधिकांश लोगों को परमेश्वर के कार्य की या परमेश्वर की प्रबंधन योजना के उद्देश्य की समझ नहीं है। आज, अधिकांश लोग अभी भी यह सोचते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करना स्वर्ग जाने और अपनी आत्माओं को बचाने के बारे में है। उनको अभी भी परमेश्वर में विश्वास करने के सटीक महत्व के बारे में कुछ पता नहीं है, और इसके अलावा, उन्हें परमेश्वर की प्रबंधन योजना में सबसे महत्वपूर्ण कार्य के बारे में कोई भी समझ नहीं है। लोग अपने विभिन्न कारणों की वजह से परमेश्वर के कार्य में कोई रुचि नहीं लेते हैं और परमेश्वर के प्रयोजनों या परमेश्वर की प्रबंधन योजना के बारे में नहीं सोचते हैं। इस धारा के व्यक्तियों के तौर पर प्रत्येक व्यक्ति को यह जानना चाहिए कि परमेश्वर की संपूर्ण प्रबंधन योजना का उद्देश्य क्या है, वे तथ्य जो परमेश्वर ने पहले ही पूरे कर लिए हैं, परमेश्वर ने लोगों के इस समूह को क्यों चुना है, उन्हें चुनने के लक्ष्य और महत्व क्या हैं, और परमेश्वर इस समूह में क्या प्राप्त करना चाहता है। महान लाल अजगर के देश में, परमेश्वर मामूली लोगों के ऐसे समूह को बनाने में सक्षम हुआ है और अब तक कार्य करना जारी रखते हुए वह हर प्रकार से उनकी परीक्षा लेते और उन्हें पूर्ण किया है, अनगिनत वचन बोलें हैं, बहुत सारा कार्य किया है, बहुत-सी सेवारत वस्तुएं भेजी हैं—परमेश्वर द्वारा इतने महान कार्यों को अकेले पूरा करना दिखाता है कि परमेश्वर का कार्य कितना अर्थपूर्ण है। इस पल, तुम लोग इसे पूरी तरह से समझने में अक्षम हो। इसलिए, परमेश्वर ने जो कार्य तुम लोगों पर किया है उसे साधारण बात ना समझो; यह कोई छोटी बात नहीं है। परमेश्वर ने आज तुम लोगों को जो कुछ दिखाया है, वह भी तुम लोगों के विचार करने और जानने का प्रयास करने के लिए पर्याप्त है। यदि तुम लोग अच्छी तरह से समझते हो तभी तुम लोग अधिक गहराई से अनुभव कर सकते हो और तुम्हारा जीवन प्रगति कर सकता है। आज, लोग बहत कम समझते और कार्य करते हैं; वे परमेश्वर के प्रयोजनों को पूरी तरह से संतुष्ट करने में अक्षम हैं। यह मनुष्य की कमी है और अपने कर्तव्य को पूरा करने में विफलता है। इस प्रकार वे इच्छित परिणाम हासिल करने में असमर्थ हैं। पवित्र आत्मा के पास बहुत-से लोगों पर कार्य करने का कोई साधन नहीं है क्योंकि उनके पास परमेश्वर के कार्य की बड़ी छिछली समझ है और जब वे परमेश्वर के घर का कार्य करते हैं तो वे इसे मूल्यवान मानने के अनिच्छुक होते हैं। वे हमेशा बिना मन लगाए बस किसी तरह काम चलाने के लिए कार्य करते हैं, या जो अधिकांश लोग कर रहे हैं उसकी नकल करते हैं, या सिर्फ दिखावे के लिए कार्य करते हैं। आज, इस धारा में प्रत्येक व्यक्ति को यह याद करना चाहिए कि क्या अपने कार्यकलापों और कर्मों में, उन्होंने वो सब किया है जो वे कर सकते थे, और क्या उन्होंने अपना पूरा प्रयास किया है। लोग अपने कर्तव्य पूरा करने में सर्वथा विफल हुए हैं, इसलिए नहीं है कि पवित्र आत्मा अपना कार्य नहीं करता है, परन्तु इसलिए कि लोग अपना कार्य नहीं करते हैं, जिससे पवित्र आत्मा के लिये अपना कार्य करना असंभव हो जाता है। परमेश्वर अपने वचनों को व्यक्त करना समाप्त कर चुका है, परन्तु लोग उसके साथ नहीं चल पाये हैं और बहुत पीछे छूट गए हैं, हर कदम के साथ पास रहने में वे असमर्थ हैं, मेमने के नक्शे कदमों का अनुसरण करने में वे असमर्थ हैं। जिसका उन्हें पालन करना चाहिए उन्होंने उसका पालन नहीं किया है; जिसका उन्हें अभ्यास करना चाहिए था, उन्होंने अभ्यास नहीं किया है; जिसके लिए उन्हें प्रार्थना करनी चाहिए थी, उसके लिए उन्होंने प्रार्थना नहीं की है; जिसको उन्हें किनारे कर देना चाहिए था उन्होंने उसे किनारे नहीं किया है। उन्होंने इन चीजों में से कुछ भी नहीं किया है। इसलिए, भोज में शामिल होने की यह बात खोखली है और इसका कोई वास्तविक अर्थ नहीं है। यह लोगों की अपनी कल्पना है। यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में लोगों ने अपना कर्तव्य पूरी तरह से नहीं निभाया है। सब कुछ परमेश्वर के स्वयं कहने और करने पर निर्भर रहा है। इंसान का कार्य बहुत ही छोटा रहा है; वे सभी बेकार कचरा हैं जो परमेश्वर के साथ समन्वय करना नहीं जानते हैं। परमेश्वर ने सैकड़ों हज़ारों वचन कहे हैं, परन्तु लोगों ने उसको अभ्यास में नहीं डाला है—चाहे देह-सुख त्यागने की बात हो, धारणाओं को छोड़ने, विवेक का विकास करते और अंतर्दृष्टि प्राप्त करते हुए सब बातों में परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने की बात हो, अपने हृदय में लोगों को स्थान न देने, अपने हृदय की प्रतिमाओं को नष्ट करने, खुद के गलत व्यक्तिगत इरादों के खिलाफ विद्रोह करने, अपनी भावनाओं के आधार पर कर्म नहीं करने, बिना पक्षपात के कार्य करने, परमेश्वर के हितों और दूसरों पर उनके बोले वचनों के प्रभाव के बारे में अधिक सोचने, परमेश्वर के कार्य को लाभ पहुँचाने वाली चीज़ें अधिक करने, अपने सभी कार्यों में परमेश्वर के घर को लाभान्वित करना ध्यान में रखने, अपनी भावनाओं को अपने व्यवहार को निर्धारित नहीं करने देने, स्वयं के शरीर को संतुष्ट करने वाली वस्तुओं को छोड़ने, स्वार्थी पुरानी धारणाओं को दूर करने की बातें आदि। लोग वास्तव में कुछ चीजों को समझते हैं जिनकी अपेक्षा परमेश्वर को उनसे है, परन्तु वे बिलकुल भी उन्हें अभ्यास में नहीं लाना चाहते हैं। परमेश्वर और क्या कर सकता है, और कैसे उन्हें प्रेरित कर सकता है? परमेश्वर की दृष्टि में विद्रोह के पुत्र कैसे परमेश्वर के वचनों को लेकर उसकी प्रशंसा करने की हिम्मत कैसे कर सकते हैं? वे परमेश्वर के भोजन को खाने की हिम्मत कैसे कर सकते हैं? लोगों की अंतरात्मा कहाँ है? उन्होंने अपने न्यूनतम कर्तव्यों को भी पूरा नहीं किया है जो उन्हें करना चाहिये था, भरसक प्रयास करने की बात करना व्यर्थ है। क्या वे व्यर्थ की आशा नहीं कर रहे बहैं? अभ्यास के बिना वास्तविकता की कोई बात नहीं हो सकती है। यह बिलकुल स्पष्ट तथ्य है!

तुम लोगों को अब और अधिक यथार्थवादी पाठ का अध्ययन करना चाहिए। उन ऊँची-ऊँची, खोखली बातों की कोई आवश्यकता नहीं है जिनकी लोग प्रशंसा करते हैं। जब ज्ञान के बारे में बात करने की बात आती है, तो प्रत्येक व्यक्ति पिछले से बढ़कर है, लेकिन अभी भी उनके पास अभ्यास का रास्ता नहीं है। कितने लोगों ने अभ्यास के सिद्धान्तों को समझा है? कितने लोगों ने वास्तविक सबक सीखे हैं? वास्तविकता के बारे में कौन सहभागिता कर सकता है? परमेश्वर के वचनों के ज्ञान की बात करने में सक्षम होने का अर्थ वास्तविक कद का होना नहीं है। यह केवल यह दिखाता है कि तू जन्म से चतुर और प्रतिभाशाली था। अगर तू मार्ग नहीं दिखा सकता तो इसका कोई नतीजा नहीं निकलेगा, और तू बस बेकार कचरा ही होगा! यदि तू अभ्यास करने के लिए एक वास्तविक पथ के बारे में कुछ भी नहीं कह सकता है तो क्या तू दिखावा नहीं कर रहा है? यदि तू अपने वास्तविक अनुभव दूसरों को नहीं दे सकता है, जिससे उन्हें सीखने के लिए सबक या अभ्यास का मार्ग मिल सके, तो क्या तू जालसाज़ी नहीं कर रहा है? क्या तू पाखंडी नहीं है? तेरा क्या मूल्य है? ऐसा व्यक्ति केवल "समाजवाद के सिद्धांत के आविष्कारक" की भूमिका अदा कर सकता है, "समाजवाद को लाने वाले योगदानकर्ता" की नहीं। वास्तविकता के बिना होना सत्य के बिना होना है। वास्तविकता के बिना होना निकम्मा होना है। वास्तविकता के बिना होना चलती-फिरती लाश होना है। वास्तविकता के बिना मानकविहीन "मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारक" होना है। मैं हर व्यक्ति से अनुरोध करता हूँ सिद्धांत की बात छोड़ कर किसी वास्तविक चीज़ के बारे में बात करो, कुछ असली और ठोस बात; किसी "आधुनिक कला" का अध्ययन करो, कुछ यथार्थवादी बातें बोलो, कुछ वास्तविकता का योगदान करो और कुछ निष्ठा की भावना रखो। बोलते समय वास्तविकता का सामना करो; लोगों को खुश करने के लिए या उनसे अपने ऊपर ध्यान दिलवाने के लिए अवास्तविक और अतिरंजित बातें ना करो। उसका महत्व क्या है? अपने प्रति लोगों से स्नेहपूर्ण व्यवहार करवाने का क्या औचित्य है? अपने भाषण में थोड़ा "कलात्मक" बनो, अपने आचरण में थोड़ा और निष्पक्ष रहो, विभिन्न बातों को संभालते हुए विवेकपूर्ण रहो, जो कुछ कहते हो उसमें थोड़ा और अधिक यथार्थवादी बनो, अपने हर कार्य से परमेश्वर के घर को लाभान्वित करने में ध्यान रखो, भावुक होने पर अपनी अंतरात्मा की सुनो, दया के बदले नफरत न करो, या दयालुता की एवज़ में कृतघ्न न हो, और एक ढोंगी ना बनो, ऐसा न हो कि तुम बुरा प्रभाव बन जाओ। जब तुम लोग परमेश्वर के वचन को खाते हो और पीते हो, तो उन्हें वास्तविकता के साथ अधिक जोड़ो, और जब तुम संगति करते हो, यथार्थवादी चीज़ों के बारे में और अधिक बोलो। दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयास न करो; यह परमेश्वर को संतुष्ट नहीं करेगा। दूसरों के साथ बातचीत में अधिक धैर्यवान और सहिष्णु रहो, अधिक उदार बनो, और "प्रधानमंत्री की भावना"[क] से सीखो। जब तुम्हारे मन में बुरे विचार आते, तो शरीर को त्याग करने का अधिक अभ्यास करो। जब तुम कार्य कर रहे होते हो, तो यथार्थवादी पथों के बारे में अधिक बोलो और बहुत उत्कृष्ट बनो नहीं तो तुम्हारी बातें लोगों के सर के ऊपर से निकल जाएंगी। कम आनंद, अधिक योगदान-समर्पण की अपनी निस्वार्थ भावना दिखाओ। परमेश्वर के प्रयोजनों के प्रति अधिक विचारशील बनो, अपने विवेक की अधिक सुनो, और अधिक ध्यान रखो और यह ना भूलो कि हर दिन तुम लोगों से परमेश्वर कितने धैर्य और गंभीरता से कैसे बात करता है। "पुराने पंचांग" को अधिक बार पढ़ो। अधिक प्रार्थना करो और अधिक सहभागिता करो। इतने अव्यवस्थित ना रहो, बल्कि अधिक समझ का प्रदर्शन करो और कुछ अंतर्दृष्टि प्राप्त करो। जब पाप का हाथ आगे बढ़े तो, इसे वापस खींचो; इसे अधिक विस्तार न करने दो। अन्यथा यह किसी काम का नहीं है! तुम्हें परमेश्वर से शाप के अलावा कुछ भी नहीं मिलेगा, इसलिए सावधान रहो। अपने हृदय को दूसरों पर दया करने दो और हमेशा हाथों के हथियारों का प्रयोग मत करो। दूसरों की सहायता करने की भावना रखते हुए, सत्य के ज्ञान के बारे में और संगति करो और जीवन के बारे में और अधिक बात करो। अधिक करो और कम बोलो। खोज और विश्लेषण में कम और अभ्यास पर अधिक ध्यान दो। पवित्र आत्मा द्वारा अधिक प्रेरित हो, और अपनी पूर्णता के लिए परमेश्वर को अधिक अवसर दो। अधिक से अधिक मानव तत्वों को समाप्त करो; तुम्हारे अंदर अब भी कार्य करने के बहुत सारे मानवीय तरीके हैं। चीजों को करने के सतही आचरण और व्यवहार अभी भी दूसरों के लिए घृणास्पद हैं। इन्हें अधिक से अधिक समाप्त करो। तुम लोगों की मानसिक स्थिति अभी भी बहुत घृणास्पद है। उसे सही करने में अधिक समय लगाओ। तुम हृदय में लोगों को अब भी बहुत प्रतिष्ठा देते हो; परमेश्वर को अधिक प्रतिष्ठा दो और इतना अनुचित ना बनो। "मंदिर" हमेशा से परमेश्वर का है और उस पर लोगों द्वारा कब्ज़ा नहीं किया जाना चाहिए। संक्षेप में, धार्मिकता पर अधिक ध्यान दो और भावनाओं पर कम। शरीर की बातों को समाप्त करना सबसे अच्छा है; वास्तविकता के बारे में अधिक बात करो और ज्ञान के बारे में कम; चुप रहना और कुछ न कहना सर्वोत्तम है। अभ्यास के पथ के बारे में और अधिक बोलो और बेकार की बात कम करो, और अभी से अभ्यास शुरू करना सबसे अच्छा है।

परमेश्वर की लोगों से अपेक्षाएं बहुत ज़्यादा नहीं हैं। यदि लोग थोड़ा-भी प्रयास करते हैं तो वे "उत्तीर्ण होने योग्य श्रेणी" प्राप्त कर सकेंगे। असल में, सत्य का अभ्यास करने के मुकाबले सत्य को समझना, जानना और स्वीकार करना अधिक जटिल है। सत्य को जानना और स्वीकार करना, सत्य का अभ्यास करने के बाद आता है; यह वो चरण और तरीका है जिसके द्वारा पवित्र आत्मा कार्य करता है। तुम इसका पालन कैसे नहीं कर सकते हो? क्या तुम अपने तरीके से चीजें कर के पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकोगे? पवित्र आत्मा तुम्हारी इच्छा के आधार पर कार्य करता है, या परमेश्वर के वचनों के अनुसार तुम्हारी कमियों के आधार पर? यह व्यर्थ है अगर तुम इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हो। ऐसा क्यों है कि अधिकांश लोगों ने परमेश्वर के वचनों को पढ़ने में काफी मेहनत की है लेकिन उनके पास केवल ज्ञान है और बाद में किसी वास्तविक पथ के बारे में कुछ नहीं कह पाते हैं? क्या तुझे लगता है कि ज्ञान होने का अर्थ सत्य का होना है? क्या यह एक उलझा हुआ दृष्टिकोण नहीं है? तू उतना ज्ञान बोलने में सक्षम है जितना कि समुद्र तट पर रेत है, फिर भी इसमें से कुछ भी वास्तविक पथ से युक्त नहीं होता है। इस में, क्या तू लोगों को मूर्ख नहीं बना रहा है? क्या तू निरर्थक दिखावा नहीं कर रहा है, जिसका समर्थन करने के लिए कोई सार नहीं है? इस तरह का समस्त व्यवहार लोगों के लिए हानिकारक है! जितना ऊँचा सिद्धांत होता है, उतना ही यह वास्तविकता से रहित होता है, और उतना ही अधिक लोगों को वास्तविकता में ले जाने में असमर्थ होता है; जितना ऊँचा सिद्धांत होता है, उतना ही अधिक तुझसे परमेश्वर की उपेक्षा और उसका विरोध करवाता है। उत्कृष्टतम सिद्धांतों को अनमोल खजाना न समझ; वे घातक हैं, और किसी काम के नहीं हैं! शायद कुछ लोग उत्कृष्टतम सिद्धांतों की बात करने में सक्षम हों—लेकिन इनमें वास्तविकता का कुछ भी नहीं होता है, क्योंकि इन लोगों ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से अनुभव नहीं किया है, और इसलिए उनके पास अभ्यास करने का कोई मार्ग नहीं है। ऐसे लोग मनुष्य को सही मार्ग पर ले जाने में असमर्थ होते हैं, और वे केवल लोगों को पथभ्रष्ट करेंगे। क्या यह लोगों के लिए हानिकारक नहीं है? कम से कम, तुझे उनकी वर्तमान परेशानियों को हल करने और उन्हें प्रवेश हासिल करने देने में सक्षम अवश्य होना चाहिए; केवल यही समर्पण के रूप में गिना जाता है, और तभी तू परमेश्वर के लिए कार्य करने के योग्य होगा। हमेशा आडंबरपूर्ण, काल्पनिक शब्दों में बात मत कर, और लोगों को तेरी आज्ञापालन करने पर बाध्य करने के लिए अनुपयुक्त अभ्यासों का उपयोग मत कर। ऐसा करने का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, और यह केवल उनके भ्रम को बढ़ा सकता है। इस तरह कार्य करते रहने के परिणामस्वरूप कई तरह के नियम सिद्धान्त हो जायेंगे, जिससे लोग तुझसे घृणा करेंगे। मनुष्य की कमी ऐसी है, और यह वास्तव में लज्जाजनक है। इसलिए, अब मौजूद समस्याओं के बारे में अधिक बात करो। अन्य लोगों के अनुभवों को निजी संपत्ति न समझो और दूसरों को इसकी सराहना करवाने के लिए इसे ऊँचा न उठाओ। तुम्हें निकलने का अपना, व्यक्तिगत मार्ग खोजना होगा। प्रत्येक व्यक्ति को इसी चीज़ का अभ्यास करना चाहिए।

यदि तुम्हारी संगति लोगों को चलने का पथ दे सकती है, तो यह तुम्हारे पास वास्तविकता होने के बराबर है। तुम चाहे जो भी कहो, तुमको लोगों को अभ्यास में लाना होगा और उन सभी को मार्ग देना होगा जिसका वे अनुसरण कर सकें। ऐसा न करो कि उनके पास बस ज्ञान ही हो, लेकिन अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि, उनके पास चलने के लिए मार्ग हो। लोगों को परमेश्वर में विश्वास करने के लिए, उन्हें उस मार्ग पर चलना होगा जो परमेश्वर अपने कार्य में दिखाता है। अर्थात्, परमेश्वर में विश्वास करने की प्रक्रिया, उस पथ पर चलने की प्रक्रिया है जिस पर पवित्र आत्मा ले जाता है। तदनुसार, तुम्हारे पास एक ऐसा मार्ग होना चाहिए, जिस पर तुम चल सको चाहे कुछ भी हो, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण किये जाने के मार्ग पर चलना होगा। बहुत पीछे ना रह जाओ, और बहुत अधिक चीज़ों की चिंता न करो। यदि तुम बिना रुकावट पैदा किए उस मार्ग पर चलते हो जिस पर परमेश्वर ले जाता है, तभी तुम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकते हो और प्रवेश का मार्ग प्राप्त कर सकते हो। केवल यह परमेश्वर के प्रयोजनों के अनुसार होना है और मनुष्य के कर्तव्य को पूरा करना माना जाएगा। इस धारा का व्यक्ति होने के नाते, प्रत्येक व्यक्ति को अपना कर्तव्य ठीक से पूरा करना चाहिए, वह अधिक करना चाहिए जो लोगों को करना चाहिए, और मनमाने ढंग से कार्य नहीं करना चाहिए। कार्य करने वाले लोगों को अपने शब्दों को स्पष्ट करना चाहिए, अनुसरण करने वाले लोगों को कठिनाइयों का सामना करने और आज्ञापालन करने पर अधिक ध्यान देना चाहिए, और प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्थान पर रहना चाहिए और सीमा से बाहर नहीं जाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में स्पष्ट होना चाहिए कि उसे कैसे अभ्यास करना चाहिए और किस कार्य को पूरा करना चाहिए। उस मार्ग पर चलो जिस पर पवित्र आत्मा ले जाता है; पथभ्रष्ट न हो या गलत न करने लगो। तुम लोगों को आज के कार्य को स्पष्ट रूप से देखना होगा। आज की कार्य पद्धति में प्रवेश करने का तुम लोगों को अभ्यास करना चाहिए। यह पहली चीज़ है जहाँ तुम लोगों को प्रवेश करना होगा। अन्य बातों पर और अधिक शब्दों को बर्बाद ना करो। आज परमेश्वर के घर का कार्य करना तुम लोगों की ज़िम्मेदारी है, आज की कार्यप्रणाली में प्रवेश करना तुम लोगों का कर्तव्य है, और आज के सत्य का अभ्यास करना तुम लोगों का भार है।

फुटनोट:

क. प्रधानमंत्री की भावना: एक प्राचीन चीनी कहावत है जो एक ऐसे व्यक्ति का वर्णन करती है जो व्यापक विचारधारा वाला है और उदार है।

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