वचन देह में प्रकट होता है

विषय-वस्तु

आज्ञाओं का पालन करना और सत्य का अभ्यास करना

व्यवहार में, आज्ञाओं को सत्य के अभ्यास से जोड़ा जाना चाहिए। आज्ञाओं का पालन करते हुए, व्यक्ति को सत्य का अभ्यास अवश्य करना चाहिए। सत्य का अभ्यास करते समय, व्यक्ति को आज्ञाओं के सिद्धान्तों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए या आज्ञाओं के विपरीत नहीं जाना चाहिए। वह कीजिये जो परमेश्वर आप सबसे करने की अपेक्षा करता है। आज्ञाओं में बने रहना और सत्य का अभ्यास करना परस्पर संबद्ध हैं, परस्पर विरोधी नहीं हैं। आप जितना अधिक सत्य का अभ्यास करते हैं, उतना ही अधिक आप आज्ञाओं के सार-तत्व को बनाए रखते हैं। आप जितना अधिक सत्य का अभ्यास करेंगे, उतना ही अधिक आप परमेश्वर के वचनों को समझेंगे जैसा आज्ञाओं में अभिव्यक्त है। सत्य का अभ्यास करना और आज्ञाओं में बने रहना, परस्पर विरोधी कार्य नहीं हैं, बल्कि इसके बजाए परस्पर संबद्ध हैं। आरंभ में, मनुष्य द्वारा आज्ञाओं का पालन करने के बाद ही वह सत्य का अभ्यास कर सकता है और पवित्र आत्मा से ज्ञानप्राप्त प्राप्त कर सकता है। किन्तु यह परमेश्वर का मूल अभिप्राय नहीं है। परमेश्वर अपेक्षा करता है कि आप ह्रदय से परमेश्वर की आराधना करें, बस यूँ ही अच्छे व्यवहार का अभ्यास करने के लिए नहीं। किन्तु आपको कम से कम सतही तौर पर ही आज्ञाओं का पालन अवश्य करना चाहिएl धीरे-धीरे, अनुभव के माध्यम से, मनुष्य को परमेश्वर की स्पष्ट समझ प्राप्त हो जाती है। वह परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करना और उसका प्रतिरोध करना बंद कर देता है, तथा वह परमेश्वर के कार्य पर प्रश्न करना बंद कर देता है। इस तरह से मनुष्य आज्ञाओं के सार-तत्व का पालन कर सकता है। इसलिए, सत्य के अभ्यास के बिना, मात्र आज्ञाओं का पालन करना प्रभावहीन है और यह परमेश्वर की सच्ची आराधना का गठन नहीं करता है क्योंकि आपने अभी तक वास्तविक कद प्राप्त नहीं किया है। यदि आप सत्य के बिना आज्ञाओं में बने रहते हैं, तो यह बस नियमों में कठोरता से बने रहने के समान होगा। ऐसा करने से, आज्ञाएँ आपकी व्यवस्था बन जाती है, जो जीवन में आगे बढ़ने में आपकी मदद नहीं करेगी। इसके विपरीत, वे आपका बोझ बन जाएँगी, और वे आपको ओल्ड टेस्टामेंट की व्यवस्था के समान मजबूती से बाँध लेंगी, जिससे आप पवित्र आत्मा की उपस्थिति को खो देंगे। इसलिए, केवल सत्य का अभ्यास करने के द्वारा ही आप प्रभावशाली रीति से आज्ञाओं का पालन कर सकते हैं। कोई व्यक्ति सत्य का अभ्यास करने के लिए आज्ञाओं का पालन करता है। आज्ञाओं का पालन करने के माध्यम से आप और भी अधिकसत्यों का अभ्यास करते हैं। सत्य के अभ्यास के माध्यम से आप आज्ञाओं के व्यावहारिक अर्थ की कहीं अधिक समझ हासिल करते हैं। परमेश्वर के आज्ञार्थक का उद्देश्य और अर्थ कि मनुष्य को आज्ञाओं का पालन अवश्य करना चाहिए अध्यादेशों का अनुसरण करना नहीं है जैसा कि मनुष्य कल्पना कर सकता है, बल्कि इसके बजाए इसका सरोकार जीवन में मनुष्य के प्रवेश से है। आप जीवन में जितना अधिक बढ़ते हैं, उतनी ही अधिक मात्रा में आप आज्ञाओं का पालन करने में सक्षम होंगे। यद्यपि आज्ञाएँ मनुष्य द्वारा पालन किए जाने के लिए हैं, फिर भी आज्ञाओं का सार-तत्व सिर्फ मनुष्य के जीवन के अनुभव के जरिए ही प्रकट होता है। अधिकांश लोग सोचते हैं कि आज्ञाओं का अच्छी तरह से पालन करने का अर्थ है “हर चीज़ तैयार है, जो बचा है वह है उसे लिया जाना”। यह अनावश्यक सोचना है और परमेश्वर की इच्छा नहीं है। वे लोग जो ऐसी चीज़ें कहते हैं वे प्रगति नहीं करना चाहते हैं और वे देह के अभिलाषी हैं। यह बकवास है! इसका सत्य के साथ तालमेल नहीं है! व्यावहारिक रूप से आज्ञाओं का पालन किये बिना केवल सत्य का अभ्यास करना, परमेश्वर की इच्छा नहीं है। इस प्रकार का व्यक्ति अपंग है और ऐसे आगे बढ़ता है मानो वह एक पाँव पर फुदक रहा हो। फिर भी, केवल आज्ञाओं का पालन करते रहना और सत्य प्राप्त किए बिना कठोरता से आज्ञाओं से चिपके रहना, उसी प्रकार, परमेश्वर की इच्छा पूरी नहीं करना है - उस व्यक्ति के समान जो सिर्फ एक आँख से देखता है, यह भी एक प्रकार की अपंगता है। ऐसा कहा जा सकता है कि यदि आप आज्ञाओं का अच्छी तरह से पालन करते हैं और आपने व्यावहारिक परमेश्वर की एक स्पष्ट समझ प्राप्त कर लेते हैं, तो आपके पास सत्य होगा। एक सापेक्ष दृष्टिकोण से, आपने वास्तविक कद को प्राप्त कर लिया होगा। आप एक ही समय पर बिना किसी आपसी संघर्ष के सत्य का अभ्यास करते हैं और आज्ञाओं का पालन करते हैं। सत्य का अभ्यास करना और आज्ञाओं का पालन करना दो पद्धतियाँ हैं। दोनों ही व्यक्ति के जीवन के अनुभव के अभिन्न भाग हैं। व्यक्ति के अनुभव में सत्य के अभ्यास के साथ आज्ञाओं के पालन का एकीकरण सम्मिलित होना चाहिए. कोई विभाजन नहीं। हालाँकि, इन दोनों चीज़ों के बीच में विभिन्नताएं और सम्बन्ध दोनों हैं।

नए युग में आज्ञाओं की घोषणा उस तथ्य की एक गवाही है कि इस धारा के सभी मनुष्य और वे सभी जो आज परमेश्वर की आवाज़ को सुनते हैं एक नए युग में प्रवेश कर चुके हैं। यह परमेश्वर के कार्य के लिए एक नई शुरुआत है और यह छः हज़ार से भी अधिक वर्षों की परमेश्वर की प्रबंधकारणीय योजना के कार्य के अंतिम भाग का आरम्भ है। नए युग की आज्ञाएँ इस बात की प्रतीक हैं कि परमेश्वर और मनुष्य नए स्वर्ग और नई पृथ्वी के क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं, और यह किजैसे यहोवा ने इस्रालियों में कार्य किया था और यीशु ने यहूदियों में कार्य किया था, वैसे ही परमेश्वर पृथ्वी पर और अधिक व्यावहारिक कार्य करेंगे तथा और अधिक बड़े काम करेंगे। वे ईस बात के भी प्रतीक हैं कि मनुष्यों का यह समूह परमेश्वर से और अधिक एवं बड़े आदेश प्राप्त करेगा, और परमेश्वर से व्यावहारिक आपूर्ति, पोषण, सहारा, देखरेख और सुरक्षा प्राप्त करेगा। इसके अतिरिक्त उन्हें और अधिक व्यावहारिक अभ्यास से गुज़ारा जाएगा, और साथ ही उनसे व्यवहार किया जाएगा, उन्हें तोड़ा जाएगा और परमेश्वर के वचन से परिशुद्ध किया जाएगा। नए युग की आज्ञाओं का अर्थ बहुत गहरा है। उन्होंने संकेत किया कि परमेश्वर, देह में अपनी सम्पूर्ण महिमा को प्रकट करते हुए, वास्तव में पृथ्वी पर प्रकट होगा और पृथ्वी पर समूचे विश्व को जीत लेगा। उन्होंने यह भी संकेत किया कि उन सभी को सिद्ध करने के लिए, जिन्हें परमेश्वर ने चुना है। व्यावहारिक परमेश्वर पृथ्वी पर और भी अधिक व्यावहारिक कार्य करने जा रहा है। और, परमेश्वर पृथ्वी पर अपने वचनों से सब कुछ निष्पादित करेगा और उस आज्ञा को प्रकट करेगा कि “देहधारी परमेश्वर सबसे ऊँचा उठता है और उसे गौरवान्वित किया जाता है, और सभी लोग एवं सभी देश परमेश्वर की आराधना करने के लिए घुटने टिकाते हैं - जो सर्वोच्च रूप में गौरवान्वित है”। हालाँकि नए युग की आज्ञाएँ मनुष्य के पालन करने के लिए हैं, जो कि मनुष्य का कर्तव्य और उसकी उपलब्धियों का उद्देश्य है, फिर भी वह अर्थ जो वे दर्शाते हैं वह इतना गहरा है कि उसे एक या दो शब्दों में पूरी तरह से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता है। नए युग की आज्ञाएँ यहोवा और यीशु के द्वारा घोषित की गई ओल्ड टेस्टामेंट की व्यवस्थाओं और न्यू टेस्टामेंट की अध्यादेशों को बदल देती हैं। यह एक गहरी शिक्षा है। यह उतना सरल विषय नहीं है जैसा मनुष्य सोचते हैं। नए युग की आज्ञाओं में व्यावहारिक अर्थ का एक पहलू है: वे अनुग्रह के युग और राज्य के युग के बीच मध्य भाग की भूमिका निभाते हैं। नए युग की आज्ञाएँ पुराने युग के और जो नए युग के पहले थे उन सभी अभ्यासों एवं अध्यादेशों को समाप्त करते हैं। वे मनुष्य को अधिक व्यावहारिक परमेश्वर की उपस्थिति में लाते हैं और मनुष्य को परमेश्वर द्वारा परिपूर्णता प्राप्त करना शुरू करने की अनुमति देते हैं, जो कि सिद्ध किए जाने के मार्ग का आरम्भ है। इसलिए, आप लोग को नए युग की आज्ञाओं के प्रति सही प्रवृत्ति धारण करेंगे और उनका अनुसरण लापरवाही से नहीं करेंगे या उनका तिरस्कार नहीं करेंगे। नए युग की आज्ञाएँ एक बिंदु पर जोर देती हैं: कि मनुष्य आज के स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर की आराधना करेगा, जो कि और अधिक व्यावहारिक रूप से आत्मा के सार-तत्व के प्रति समर्पित होना है। वे उस सिद्धान्त पर भी जोर देते हैं जिसके द्वारा धार्मिकता के सूर्य के रूप में प्रकट होने के बाद परमेश्वर मनुष्य के दोषी होने या धर्मी होने का न्याय करेगा। आज्ञाएँ व्यवहार में लाने की अपेक्षा समझने में अधिक आसान हैं। इस प्रकार, यदि परमेश्वर मनुष्य को परिपूर्ण करने की इच्छा करता है, तो उसे ऐसा अपने वचनों और मार्गदर्शन के द्वारा करना होगा। मनुष्य केवल अपनी स्वयं की स्वाभाविक बुद्धिमत्ता के माध्यम से परिपूर्णता हासिल नहीं कर सकता है। मनुष्य नए युग की आज्ञाओं का पालन कर सकता है या नहीं, यह मनुष्य के व्यावहारिक परमेश्वर के ज्ञान से सम्बंधित है। इसलिए, आप आज्ञाओं का पालन कर सकते हैं या नहीं, यह ऐसा प्रश्न नहीं हैं जिसका समाधान कुछ दिनों में कर लिया जायेगा। यह एक गहरा सबक है।

सत्य का अभ्यास करना ऐसा मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य का जीवन उन्नति कर सकता है। यदि आप लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, तो आप लोगों को केवल सिद्धान्त के साथ छोड़ दिया जायेगा और आप लोगों के पास कोई वास्तविक जीवन नहीं होगा। सत्य मनुष्य के कद का प्रतीक है। आप सत्य का अभ्यास करते हैं या नहीं, यह वास्तविक कद की प्राप्ति से सम्बंधित है। यदि आप सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, तो धर्मी की तरह अभिनय मत कीजिए, या यदि आप देह की भावनाओं और चिंता में बह जाते हैं, तो आप आज्ञाओं के पालन से बहुत दूर हैं। यह गहनतम सबक है। प्रत्येक युग में मनुष्य के प्रवेश करने के लिए और मनुष्य के समझने के लिए बहुत सी सच्चाईयाँ हैंl किन्तु प्रत्येक युग में अलग अलग आज्ञाएँ होती हैं जो सच्चाईयों के साथ होती हैं। वह सत्य जिसका मनुष्य अभ्यास करता है वह उसके युग से सम्बंधित होता है और वे आज्ञाएँ जिनका पालन मनुष्य के द्वारा किया जाता है वे भी उस युग से सम्बंधित होती हैं जिसमें वह रहता है। प्रत्येक युग की अपनी सच्चाईयाँ होती हैं जिनका अभ्यास किया जाता है और आज्ञाएँ होती हैं जिनका पालन किया जाता है। हालाँकि, परमेश्वर के द्वारा घोषित विभिन्न आज्ञाओं के आधार पर, अर्थात्, विभिन्न युगों के आधार पर, जिनमें मनुष्य रहता है, मनुष्य के द्वारा सत्य के अभ्यास का लक्ष्य और प्रभाव आनुपातिक रूप में भिन्न होता है। ऐसा कहा जा सकता है कि आज्ञाएँ सत्य का काम करता है और सत्य आज्ञाओं को बनाए रखने के लिए विद्यमान रहता है। यदि केवल सत्य हो, तो परमेश्वर के कार्य में कोई परिवर्तन नहीं होगा जिसकी बात की जाए। तथापि, आज्ञाओं को संदर्भित करके, मनुष्य पवित्र आत्मा के द्वारा किये गए कार्य के गतिशील विस्तार को पहचान सकता है और मनुष्य उस युग को जान सकता है जिसमें परमेश्वर कार्य करता है। धर्म में, बहुत से लोग हैं जो सच्चाईयों का अभ्यास कर सकते हैं जिनका अभ्यास व्यवस्था के युग के मनुष्य के द्वारा किया गया था। हालाँकि, उनके पास नये युग की आज्ञाएँ नहीं हैं और वे नये युग की आज्ञाओं का पालन नहीं कर सकते हैं। ऐसे मनुष्य पुरानी रीति का पालन करते हैं और आदिम मानव बने रहते हैं। ऐसे मनुष्य नई रीति से कार्य नहीं करते हैं और वे नए युग की आज्ञाओं को नहीं देख सकते हैं। अपने आप में, परमेश्वर का कार्य अनुपस्थित होता है। वे एक ऐसे मनुष्य के समान हैं जो अंडे के खाली छिलके को पकड़े हुए है : यदि उसके अंदर कोई चूज़ा नहीं है तो उसमें कोई आत्मा नहीं है। अधिक स्पष्ट करें तो, उसमें कोई जीवन नहीं है। ऐसे मनुष्यों ने नए युग में प्रवेश नहीं किया है और कई कदम पीछे हैं। इसलिए, यदि आपके पास पुराने युगों की सच्चाई है किन्तु नए युग की आज्ञाएँ नहीं हैं तो यह बेकार है। आप लोगों में से अनेक लोग इस युग सच्चाई का अभ्यास करते हैं किन्तु इस युग की आज्ञाओं का पालन नहीं करते हैं। आप लोगों को कुछ नहीं मिलेगा। वह सत्य जिसका आप लोग अभ्यास करते हैं वह बेकार और निरर्थक होगा और परमेश्वर इसकी प्रशंसा नहीं करेंगे। सत्य का अभ्यास उस रीति से किया जाना चाहिए जैसे कि जिसके द्वारा आज पवित्र आत्मा कार्य करती है। इसे आज के व्यावहारिक परमेश्वर की आवाज़ का अनुसरण करके किया जाना चाहिए। इसके बिना, हर चीज़ अकृत है - जैसे बाँस की टोकरी द्वारा पानी निकालना। यह नए युग की आज्ञाओं की घोषणा का व्यावहारिक अर्थ भी है। यदि आपके पास वर्तमान समय में पवित्र आत्मा के कार्य की पूरी समझ है और आप आज के कार्य की रीति में प्रवेश करते हैं, तो आप स्वाभाविक रूप से आज्ञाओं का पालन करने के सार-तत्व जान जाएँगे। यदि वह दिन आता है जब आप नये युग की आज्ञाओं के सार-तत्व को जान जाते हैं और आप आज्ञाओं का पालन कर सकते हैं, तो उस समय आप सिद्ध किए जा चुके होंगे। सत्य का अभ्यास करने और आज्ञाओं के पालन करने का यही वास्तविक अर्थ है। आप आज्ञाओं का पालन कर सकते हैं या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस प्रकार नए युग की आज्ञाओं के सार-तत्व का महसूस करते हैं। पवित्र आत्मा का कार्य मनुष्य के सामने निरन्तर प्रकट होगा और परमेश्वर मनुष्य से और भी अधिक अपेक्षा करेगा। इसलिए, वे सच्चाईयाँ जिनका मनुष्य वास्तव में अभ्यास करता है और अधिक तथा बड़ी होंगी तथा आज्ञाओं का पालन करने के प्रभाव और अधिक गहरे होंगे। इसलिए, आप लोग सत्य का अभ्यास करेंगे और उसके साथ साथ आज्ञाओं का पालन भी करेंगे। इस मुद्दे को कोई नजरअंदाज नहीं करेगा। आइए इस नए युग में नए सत्य और नई आज्ञाओं को एक ही समय में आरम्भ होने दें।