वचन देह में प्रकट होता है

विषय-वस्तु
  • क्लीसिया में आने पर देहधारी मनुष्य के पुत्र के वचन (Ⅰ)
    • क्लीसिया में आने पर देहधारी मनुष्य के पुत्र के वचन (Ⅱ)
      • भाग एक आरंभ में मसीह के कथन और गवाहियाँ —कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचनों में देहधारी परमेश्वर की गवाही
        • भाग एक संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए देहधारी परमेश्वर के कथन जब उन्होंने पहली बार परमेश्वर की सेवकाई आरंभ की
          • परिशिष्ट: परमेश्वर के वचनों के रहस्यों की व्याख्या
            • क्लीसिया में आने पर देहधारी मनुष्य के पुत्र के वचन (Ⅲ)
              • क्लीसिया में आने पर देहधारी मनुष्य के पुत्र के वचन (Ⅳ)
                • सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नवीनतम कथन

                  वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है?

                  परमेश्वर का कार्य निरंतर आगे बढ़ता रहता है, और यद्यपि उसके कार्य का प्रयोजन नहीं बदलता है, जिस मायनों वह कार्य करता है वो निरंतर बदलते रहते हैं, और फलस्वरूप वे लोग भी बदलते रहते हैं जो उसका अनुसरण करते हैं। जितना अधिक परमेश्वर का कार्य होगा, उतना ही अधिक मनुष्य परमेश्वर को जानेगा, और मनुष्य का स्वभाव भी परमेश्वर के कार्य के साथ बदलेगा। हालाँकि, ऐसा इसलिए है कि परमेश्वर का कार्य हमेशा बदलता रहता है कि जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य के बारे में नहीं जानते हैं और सत्य को न जानने वाले विवेकहीन लोग परमेश्वर के विरोधी बन जाते हैं। कभी भी परमेश्वर का कार्य मनुष्यों की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है, क्योंकि उसका कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता है। न ही वह कभी पुराने कार्य को दोहराता है बल्कि पहले कभी नहीं किए गए कार्य के साथ आगे बढ़ जाता है। जिस प्रकार परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं है और मनुष्य परमेश्वर द्वारा अतीत में किए गए कार्य के आधार पर निरपवाद रूप से उसके आज के काम का निर्णय करता है, नए युग के कार्य के प्रत्येक चरण को करना परमेश्वर के लिए अत्यंत कठिन है। मनुष्य बहुत अधिक बाधाएँ प्रस्तुत करता है! मनुष्य की सोच बहुत ही ओछी है! कोई भी मनुष्य परमेश्वर के कार्य को नहीं जानता है, फिर भी वह ऐसे कार्य की व्याख्या करता है। परमेश्वर से दूर होकर, मनुष्य जीवन, सत्य और परमेश्वर की आशीषों को खो देता है, फिर भी मनुष्य न तो सत्य, और न ही जीवन को ग्रहण करता है, परमेश्वर द्वारा मानवजाति को प्रदान किए जा रहे आशीषों को तो और भी कम ग्रहण करता है।इससे कम परमेश्वर मनुष्यों पर महान आशीषें उण्डेलता है। प्रत्येक मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त करना चाहता है फिर भी परमेश्वर के कार्य में हुए किसी भी बदलाव को सहने में असमर्थ है। जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं वे यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील है, और कि परमेश्वर का कार्य हमेशा एक ठहराव पर रहता है। उनके विश्वास के अनुसार, परमेश्वर से जो कुछ भी शाश्वत उद्धार प्राप्त करने के लिए आवश्यक है वह है व्यवस्था को बनाए रखना, और जब तक वे पश्चाताप करते और अपने पापों को स्वीकार करते हैं, तब तक परमेश्वर का हृदय हमेशा संतुष्ट रहेगा। वे इस विचार के हैं कि परमेश्वर केवल वही हो सकता है जो व्यवस्था के अधीन है और जिसे मनुष्य के लिए क्रूस पर चढ़ाया गया था; उनका यह भी विचार है कि परमेश्वर बाइबल से बढ़कर नही होना चाहिए और नही हो सकता है। ये ठीक इस प्रकार के विचार हैं जिन्होंने उन्हें पुरानी व्यवस्था में दृढ़ता से बांध दिया है और कठोर नियमों में जकड़ कर रख दिया है। इससे भी अधिक लोग यह विश्वास करतें है कि जो कुछ भी परमेश्वर का नया कार्य है, उसे भविष्यवाणियों के द्वारा सिद्ध अवश्य किया जाना चाहिए और यह कि इस तरह के कार्य के प्रत्येक चरण में, जो भी उसका अनुसरण सच्चे हृदय से करते हैं उन्हें प्रकटन भी अवश्य दिखाया जाना चाहिए, अन्यथा वह कार्य परमेश्वर का कार्य नहीं हो सकता है। परमेश्वर को जानना मनुष्य के लिए पहले ही आसान काम नहीं है। इसके अतिरिक्त मनुष्य के विवेकहीन हृदय और उसके आत्म-महत्व एवं मिथ्याभिमान के विद्रोही स्वभाव को लें, तो परमेश्वर के नए कार्य को ग्रहण करना मनुष्य के लिए और भी अधिक कठिन है। मनुष्य न तो परमेश्वर के कार्य का सावधानीपूर्वक अध्ययन करता है और न ही इसे विनम्रता से स्वीकार करता है; बल्कि, मनुष्य परमेश्वर से प्रकाशन और मार्गदर्शन का इंतजार करते हुए, तिरस्कार का दृष्टिकोण अपनाता है। क्या यह मनुष्य का व्यवहार नहीं है जो परमेश्वर का विरोध करता है और उसका विरोधी है? इस प्रकार के मनुष्य कैसे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त कर सकते हैं?

                  उस समय में, यीशु ने कहा था कि यहोवा का कार्य अनुग्रह के युग में पीछे हो गया है, जितना मैं आज कहता हूँ कि यीशु का कार्य पीछे रह गया है। यदि केवल व्यवस्था का युग होता और अनुग्रह का युग न होता, तो यीशु को क्रूस पर नहीं चढ़ाया जा सकता था और समस्त मानवजाति का उद्धार नहीं किया जा सकता था; यदि केवल व्यवस्था का युग होता, तो क्या मानवजाति का सम्भवतः इस दिन तक विकास हो सकता था? इतिहास आगे बढ़ता है; क्या इतिहास परमेश्वर के कार्य की प्राकृतिक व्यवस्था नहीं है? क्या सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के अंदर यह मनुष्य के उसके प्रबंधन का चित्रण नहीं है? इतिहास आगे प्रगति करता है, इसलिए परमेश्वर का कार्य भी बढ़ता है, और परमेश्वर की इच्छा निरंतर बदलती रहती है। यह परमेश्वर के लिए अव्यवहारिक होगा कि वह कार्य के एक ही चरण को छः हज़ार साल तक बनाए रखे, क्योंकि मनुष्य यही जानता है कि परमेश्वर हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता है। वह सम्भवतः सूली पर चढ़ाने के समान कार्य को बनाए रखना जारी नहीं रख सकी, और एक बार, दो बार, तीन बार.....क्रूस पर चढ़ाया जाए। यह एक विवेकहीन मनुष्य की अनुभूति है। परमेश्वर एक ही कार्य को बनाए नहीं रखता है, और उसका कार्य हमेशा बदलता रहता है और हमेशा नया रहता है, बहुत कुछ ऐसा ही जैसे कि मैं प्रतिदिन नए वचन कहता और नया काम करता हूँ। यही वह कार्य है जो मैं करता हूँ, जिसकी मुख्य बात “नए” और “चमत्कारिक” शब्दों निहित है। “परमेश्वर अपरिवर्तनशील है, और परमेश्वर हमेशा परमेश्वर ही रहेगा”; यह कथन वास्तव में सत्य है। परमेश्वर का सार कभी भी नहीं बदलता है, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर है, और वह कभी भी शैतान नहीं बन सकता है, परन्तु इनसे यह सिद्ध नहीं होता है कि उसका कार्य उसके सार की तरह ही अचर और अचल है। आपने घोषणा की कि परमेश्वर इस प्रकार से है, परन्तु आप किस प्रकार से बता सकते हैं कि परमेश्वर हमेशा नया है और कभी भी पुराना नहीं होता है? परमेश्वर का कार्य हमेशा फैलता और निरंतर बदलता रहता है, और परमेश्वर की इच्छा निरंतर व्यक्त होती रहती है और मनुष्य को ज्ञात करवाई जाती रहती है। जैसे-जैसे मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, उसका स्वभाव निरंतर बदलता जाता है, और उसका ज्ञान निरंतर बदलता जाता है। तो फिर, कहाँ से, यह परिवर्तन होता है? क्या यह कभी भी परिवर्तन न होने वाले परमेश्वर के कार्य से नहीं है? यदि मनुष्य का स्वभाव बदल सकता है, तो मनुष्य क्यों मेरे कार्य और मेरे वचन को निरंतर बदलने नहीं दे सकता है? क्या मुझे मनुष्यों के प्रतिबंधों के अधीन होना आवश्यक है? क्या आप अब केवल कुतर्क का सहारा नहीं ले रहे हैं?

                  अपने पुनरुत्थान के बाद, यीशु अपने अनुयायियों के सामने प्रकट हुए और कहा, “और, देखो, मैं तुम्हें अपने पिता की प्रतिज्ञाएँ भेजता हूँ: परन्तु तुम यरूशलेम में ही ठहरे रहना, जब तक कि तुम ऊपर से सामर्थ्य न धारण कर लो।” क्या आप जानते हो कि इन वचनों को किस प्रकार से समझाया जा सकता है? क्या आप उसकी सामर्थ्य को धारण करते हैं? क्या आप अब समझ गए हैं कि सामर्थ्य किसे कहते हैं? यीशु ने घोषणा की कि अंतिम दिनों में मनुष्य पर सत्य की आत्मा अर्पित होगी। यह अब अंतिम दिन हैं; क्या आप सत्य की आत्मा के अधीन हैं? सत्य की आत्मा कहाँ है? क्या वे अशुद्ध आत्माएँ और दुष्टात्माएँ ही सत्य की आत्मा हैं? उनके पास कोई न्याय नहीं है, जीवन का प्रावधान तो और भी कम है, और कोई अल्पतम नया कार्य किए बिना पुराने युग के नियमों को बनाये रखते हैं। क्या वे ही सत्य की आत्मा हैं? क्या उनमें सत्य, जीवन और मार्ग है? क्या ये संसार से अलग पृथक रूप से उभर आयीं? आप में जो लोग बाइबल का हठपूर्वक पालन करते हैं और यीशु से चिपके रहते हैं - क्या आपने यीशु के कार्य का अनुसरण किया है और उसके वचनों का पालन किया है। आप यीशु के प्रति कितने वफादार हो? ओल्ड टेस्टामेंट की भविष्यवाणियों की सबसे महानतम पुस्तक यशायाह में कभी भी यह उल्लेख नहीं किया गया है कि न्यू टेस्टामेंट के युग में, यीशु नाम का बच्चा पैदा होगा, यह उल्लेख किया गया है कि इम्मानुएल नाम का एक नर शिशु पैदा होगा। उसने स्पष्ट रूप से यीशु का नाम क्यों नहीं बताया? ओल्ड टेस्टामेंट में कहीं भी उसका नाम नहीं दिखाई देता है, तो तब भी आप क्यों यीशु पर विश्वास करते हैं? आपने यीशु पर विश्वास करने से पहले निश्चित रूप से आपने उन्हें अपनी आँखों से नहीं देखा है? या क्या आपने प्रकाशित होने पर विश्वास करना प्रारम्भ किया? क्या परमेश्वर वास्तव में आप पर ऐसा अनुग्रह दर्शाएगा? और आप पर इस प्रकार का महान आशीष अर्पित करेगा? आपने किस आधार पर यीशु पर विश्वास किया? तो फिर आप क्यों विश्वास नहीं करते हैं कि आज के दिन परमेश्वर देहधारी हो गया है? आप क्यों कहते हैं कि आपके लिए परमेश्वर से प्रकटन की अनुपस्थिति यह सिद्ध करती है कि वह देहधारी नहीं हुआ है? क्या परमेश्वर को अपना कार्य प्रारम्भ करने से पहले मनुष्य को बताना आवश्यक है? क्या पहले उसे मनुष्य का अनुमोदन प्राप्त करना आवश्यक है? यशायाह में केवल घोषणा की गई है कि चरनी में एक नर शिशु का जन्म होगा परन्तु कभी भी यह भविष्यवाणी नहीं की कि मरियम यीशु को जन्म देगी। तो आप क्यों यीशु पर विश्वास करते हैं जिसे मरियम ने जन्म दिया? निश्चय ही आपका विश्वास अनिश्चितता और भ्रम वाला नहीं है! कुछ कहते हैं कि परमेश्वर का नाम बदलता नहीं है, तो फिर क्यों यहोवा का नाम यीशु हो गया? मसीह के आनेकी भविष्यवाणी की गई थी, तो फिर क्यों यीशु नाम का एक व्यक्ति आया? परमेश्वर का नाम क्यों बदला गया? क्या इस तरह का कार्य काफी समय पहले नहीं किया गया था? क्या परमेश्वर आज के दिन कोई नया कार्य नहीं कर सकता है? कल का कार्य बदला जा सकता है, और यीशु का कार्य यहोवा के कार्य के बाद नहीं आ सकता है। क्या यीशु के कार्य के बाद कोई अन्य कार्य नहीं हो सकता है? यदि यहोवा का नाम बदल कर यीशु हो सकता है, तो क्या यीशु का नाम भी नहीं बदला जा सकता है? यह असामान्य नहीं है, और लोग ऐसा[ए] केवल अपनी नासमझी के कारण सोचते हैं। परमेश्वर हमेशा परमेश्वर ही रहेगा। उसके कार्य और नाम में परिवर्तन की परवाह किए बिना, उसका स्वभाव और विवेक हमेशा अपरिवर्तित रहता है, वह कभी भी नहीं बदलेगा। यदि आप मानते हैं कि परमेश्वर केवल यीशु के नाम से ही पुकारा जा सकता है, तो आपको बहुत कम ज्ञान है। क्या आप यह दृढ़ता पूर्वक कहने का साहस करते हैं कि परमेश्वर का नाम यीशु हमेशा के लिए है, और परमेश्वर हमेशा और निरंतर यीशु के ही नाम से जाना जाएगा, और कि यह कभी नहीं बदलेगा? क्या आप यह निश्चितता से दृढ़तापूर्वक कहने का साहस कर सकते हैं कि यह यीशु का नाम ही है जिसने व्यवस्था के युग का समापन किया और अंतिम युग का भी समापन करता है? कौन कह सकता है कि यीशु का अनुग्रह युग का समापन कर सकता है? यदि आप अब इन सत्यों को स्पष्टता से नहीं जान सकते हैं, तो आप न केवल सुसमाचार का प्रचार करने के अयोग्य होंगे, बल्कि यहाँ तक कि आप स्वयं भी खड़ा नहीं रह सकते हैं। जब दिन आता है कि आप उन धार्मिक लोगों की सभी समस्याओं को हल करते हैं और उनकी भ्रांतियों को खण्डित करते हैं, यह सबूत होगा कि आप कार्य के इस चरण के बारे में पूरी तरह से निश्चित हैं और आपको जरा सा भी संदेह नहीं है। यदि आप उनकी भ्रांतियों को खण्डित नहीं कर पाते हैं, तो वे आप पर झूठे आरोप लगाएँगे और आपकी झूठी निंदा करेंगे। क्या यह शर्मनाक नहीं है?

                  उस समय के सभी यहूदियों ने ओल्ड टेस्टामेंट से पढ़ा था और यशायाह की भविष्यवाणी को जानते थे कि चरनी में एक नर शिशु जन्म लेगा। तो फिर क्यों, इस ज्ञान के साथ, उन्होंने तब भी यीशु को सताया? क्या यह उनके विद्रोही प्रकृति और पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति अज्ञानता के कारण नहीं है? उस समय, फरीसियों को विश्वास था कि यीशु का कार्य उससे भिन्न था जो वे भविष्यवाणी किए गए नर शिशु के बारे में जानते थे; आज का परमेश्वर को अस्वीकार करता है क्योंकि देहधारी परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुरूप नहीं है। क्या यह परमेश्वर के विरुद्ध उनके विद्रोहीपन का सार एक वही एक बात नहीं है? क्या आप इस प्रकार के हो सकते हैं कि आप पवित्र आत्मा के समस्त कार्य को बिना कोई प्रश्न किए स्वीकार करें? यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो यह सही “स्रोत” है। आपको इसे थोड़ी सी भी आशंका के बिना स्वीकार करना चाहिए, बजाय यह सोच विचार चुने कि किसे स्वीकार करें। यदि आपको परमेश्वर से कुछ ज्ञान प्राप्त होता है और उसके विरुद्ध कुछ सावधानी प्रयोग करते हैं, तो क्या यह कार्य वास्तव में अनुचित नहीं है? आपको जो करना चाहिए वह है बाइबल से बिना और सबूत की आवश्यकता के, किसी भी कार्य को स्वीकार करना, जब तक कि यह पवित्र आत्मा का है, क्योंकि आप परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, न कि उसकी जाँच-पड़ताल करने के लिए। मेरे यह दिखाने के लिए कि मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँ आपको और सबूत खोजने नहीं खोजने चाहिए। इसके बजाय कि आपको यह विचार करना चाहिए कि क्या मैं आपके लिए लाभ का हूँ, यही मुख्य बात है। भले ही आपको बाइबल में बहुत सारे अखंडनीय सबूत प्राप्त हो जाएँ; ये आपको पूरी तरह से मेरे सामने नहीं ला सकते हैं। आप एक ऐसे व्यक्ति हैं जो बाइबल के सीमा में ही रहता है, न कि मेरे सामने; बाइबल मुझे जानने में आपकी सहायता नहीं कर सकती है, न ही यह मेरे लिए आपके प्रेम को गहरा कर सकती है। यद्यपि बाइबल में भविष्यवाणी की गई है कि एक नर शिशु जन्म लेगा, कोई थाह नहीं ले सकता है कि किस पर यह भविष्यवाणी घटित होगी, क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर का कार्य नहीं पता, और फरीसियों का यीशु के विरोध में खड़े होने का यही कारण है। कुछ लोग जानते हैं कि मेरा कार्य मनुष्य के हितों में है, फिर भी वे निरंतर यह विश्वास करते रहते हैं कि यीशु और मैं दो पूरी तरह से अलग-अलग प्राणी हैं जो परस्पर असंगत हैं। उस समय, यीशु ने अनुग्रह के युग में अपने अनुयायियों को उपदेशों की एक श्रृंखला कही, जैसे कि कैसे अभ्यास करें, कैसे एक साथ इकट्ठा हों, प्रार्थना में कैसे माँगें, दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करें इत्यादि। जो कार्य उसने किया वह अनुग्रह के युग का था, और उन्होंने केवल यह प्रतिपादित किया कि शिष्य और वे जिन्होंने परमेश्वर का अनुसरण किया कैसे अभ्यास करें। उसने केवल अनुग्रह के युग का ही कार्य किया और अंतिम दिनों का कोई कार्य नहीं किया। जब यहोवा ने व्यवस्था के युग में ओल्ड टेस्टामेंट के नियमों को निर्धारित किया, उन्होंने अनुग्रह के युग के कार्य को तब क्यों नहीं किया? उन्होंने अग्रिम में अनुग्रह के युग के कार्य को स्पष्ट क्यों नहीं किया? क्या यह मनुष्यों के स्वीकार करने के लिए लाभदायक नहीं हो गया होता? उन्होंने केवल यह भविष्यवाणी की कि एक नर शिशु जन्म लेगा और सामर्थ्य में आएगा, परन्तु उन्होंने अनुग्रह के युग का कार्य अग्रिम में नहीं किया। प्रत्येक युग में परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट सीमाएँ हैं; वह केवल वर्तमान युग का कार्य करता है और वह कभी भी कार्य का आगामी चरण अग्रिम में नहीं करता है। केवल इस तरह से उसका प्रत्येक युग का प्रतिनिधि कार्य सामने लाया जा सकता है। यीशु ने अंतिम दिनों के केवल संकेतों के बारे में बात की, इस बारे में बात की कि किस प्रकार से धैर्यवान बनें और कैसे बचाए जाएँ, कैसे पश्चाताप करें और स्वीकार करें, और साथ ही क्रॉस को कैसे सहें, और साथ ही पीड़ाओं को कैसे सहन करें ; उन्होंने कभी भी नहीं कहा कि अंतिम दिनों में मनुष्य किस में प्रवेश करना चाहिए या परमेश्वर की इच्छा को किस प्रकार से संतुष्ट करें। वैसे तो, क्या अंतिम दिनों का परमेश्वर का कार्य बाइबल के अंदर खोजना भ्रान्ति का कार्य नहीं होगा? बाइबल को अपने हाथों में केवलपकड़कर आप क्या विचार कर सकते हैं? बाइबल का व्याख्याता हो या उपदेशक, आज के कार्य को कौन पहले से जान सकता है?

                  “वह जिसके कान हो, सुन ले कि आत्मा ने कलीसियाओं से क्या कहा।” क्या आपने अब पवित्र आत्मा के वचन सुन लिए हैं? परमेश्वर के वचन आपको अचानक मिले हैं। क्या आप उन्हें सुनते हैं? अंतिम दिनों में परमेश्वर वचन का कार्य करता है, और ऐसे वचन पवित्र आत्मा के वचन हैं, क्योंकि परमेश्वर पवित्र आत्मा है और देहधारी भी हो सकता है; इसलिए, पवित्र आत्मा के वचन, जैसे अतीत में बोले गए थे, आज देहधारी परमेश्वर के वचन हैं। कई विवेकहीन मनुष्य हैं जिनका मानना है कि पवित्र आत्मा के वचन मनुष्य के कान में सीधे स्वर्ग से उतर कर आने चाहिए। इस प्रकार सोचने वाला कोई भी परमेश्वर के काम को नहीं जानता है। वास्तव में, पवित्र आत्मा के द्वारा कहे गए कथन वे ही हैं जो परमेश्वर ने देहधारी होकर कहे। पवित्र आत्मा प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य से बात नहीं कर सकती है, और यहाँ तक कि व्यवस्था के युग में भी, यहोवा ने प्रत्यक्ष रूप से लोगों से बात नहीं की। क्या इस बात की बहुत कम सम्भावना नहीं होगी है कि वह आज के युग में भी ऐसा ही करेगा? कार्य को करने के लिए परमेश्वर को कथनों को बोलने के लिए, उसे अवश्य देहधारण करना चाहिए, अन्यथा उसका कार्य का उसके उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकता है। जो परमेश्वर के देहधारी होने को इनकार करते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जो आत्मा को या उन सिद्धान्तों को नहीं जानते हैं जिनके द्वारा परमेश्वर काम करते हैं। जो मानते हैं कि अब पवित्र आत्मा का युग है फिर भी उसके नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं वे अस्पष्ट विश्वास में जीने वाले लोग हैं। मनुष्यों का इस प्रकार का व्यवहार कभी भी पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त नहीं करेगा। जो लोग चाहते हैं कि पवित्र आत्मा प्रत्यक्ष रूप से उनसे बात करे और अपना काम करे, फिर भी वे देहधारी परमेश्वर के वचनों या काम को स्वीकार नहीं करते हैं, वे कभी भी नए युग में प्रवेश या परमेश्वर से पूरी तरह से उद्धार प्राप्त नहीं कर पाएँगे।

                  फुटनोटः

                  ए. मूलपाठ “जो है” पढ़ा जाता है।