वचन देह में प्रकट होता है

विषय-वस्तु
  • क्लीसिया में आने पर देहधारी मनुष्य के पुत्र के वचन (Ⅰ)
    • क्लीसिया में आने पर देहधारी मनुष्य के पुत्र के वचन (Ⅱ)
      • भाग एक आरंभ में मसीह के कथन और गवाहियाँ —कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचनों में देहधारी परमेश्वर की गवाही
        • भाग एक संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए देहधारी परमेश्वर के कथन जब उन्होंने पहली बार परमेश्वर की सेवकाई आरंभ की
          • परिशिष्ट: परमेश्वर के वचनों के रहस्यों की व्याख्या
            • क्लीसिया में आने पर देहधारी मनुष्य के पुत्र के वचन (Ⅲ)
              • क्लीसिया में आने पर देहधारी मनुष्य के पुत्र के वचन (Ⅳ)
                • सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नवीनतम कथन

                  आपको हैसियत के आशीषों को अलग रखना चाहिए और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए

                  मनुष्य के लिए, मोआब के वंशजों को पूर्ण बनाना संभव नहीं है और वे ऐसा बनाए जाने के योग्य नहीं हैं। दूसरी तरफ, दाऊद के पुत्रों को निश्चित रूप से आशा है और वे निश्चित रूप से पूर्ण किए जाने के योग्य हैं। यदि कोई मोआब का वंशज हो, तब उसे पूर्ण नहीं किया जा सकता है। आज भी, आप लोग अभी भी उस कार्य के महत्व को नहीं जानते हैं जो आप लोगों के बीच किया गया है; इस वर्तमान चरण तक आप लोग अभी भी अपने दिलों में भविष्य की संभावनाओं को धारण किए हुए हैं और उन्हें त्यागने के अनिच्छुक हैं। किसी को भी इस बात की परवाह नहीं है कि आज परमेश्वर ने आप लोगों पर - सबसे अयोग्य समूह पर - कार्य करना क्यों चुना है, तो क्या यह कार्य गलत किया गया है? क्या यह कार्य एक क्षणिक चूक है? क्यों परमेश्वर आप लोगों के बीच में कार्य करने के लिए निष्पक्षता से उतर आए हैं, जबकि वे लंबे समय से जानते हैं कि आप लोग मोआब के पुत्र हैं? क्या आप लोग इस बारे में कभी नहीं सोचते हैं? क्या परमेश्वर जब अपना कार्य करते हैं तो इस बात पर कभी भी विचार नहीं करते हैं? क्या वे एकाएक इस तरह का निर्णय लेते हैं? क्या वे नहीं जानते हैं कि आप लोग शुरू से ही मोआब के वंशज हैं? क्या आप लोग इन बातों पर विचार करना नहीं जानते हैं? आप लोगों की “धारणाएँ” कहाँ चली गयी हैं? क्या आप लोगों की स्वस्थ सोच खराब हो गई है? आप लोगों की चतुराई और विवेक कहाँ चला गया है? क्या ऐसा है कि आप लोगों का आचरण इतना उदारतापूर्ण है कि आप इतनी छोटी सी बात पर ध्यान नहीं देते हैं? आप लोगों के मन आपकी भविष्य की संभावनाओं और आप लोगों के स्वयं के भाग्य जैसी चीजों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं, लेकिन किसी अन्य चीज के बारे में वे सुन्न हैं और मंदबुद्धि और पूरी तरह से अनभिज्ञ हैं। अरे,आखिर वह क्या है जिस पर आप लोग विश्वास करते हैं? आप लोगों की भविष्य की संभावनाएँ? या परमेश्वर? क्या आप सिर्फ अपनी अच्छी मंजिल में विश्वास नहीं कर रहे हैं? केवल अपनी भावी संभावना में?अब आप जीवन के मार्ग को कितना समझते हैं? आपने कितना प्राप्त कर लिया है? क्या आपको लगता है कि मोआब के वंशजों पर अब जो कार्य किया जाता है वह आपको अपमानित करने के लिए किया जाता है? क्या यह आपकी कुरूपता की कलई खोलने करने के उद्देश्य से किया जाता है? क्या इसे आपकी कुरूपता को प्रकट करने के लिए उद्देश्यपूर्ण ढंग से किया जाता है? क्या इसे आपको ताड़ना को स्वीकार करवाने और आपको आग की झील में फेंकने के लिए उद्देश्यपूर्ण ढंग से किया जाता है? मैंने कभी नहीं कहा कि आपका कोई भविष्य नहीं है, आपको नष्ट करना था या बरबाद करना था तो बिल्कुल नहीं कहा; क्या मैंने सार्वजनिक रूप से इस तरह की घोषणा की है? आप कहते हैं कि आप बिना आशा के हैं, किंतु क्या यह आपका स्वयं का निष्कर्ष नहीं है? क्या यह आपकी स्वयं की मानसिकता का असर नहीं है? क्या आपके स्वयं के निष्कर्ष का महत्व है? यदि मैं कहूँ कि आप धन्य नहीं हैं तो आप निश्चित रूप से विनाश के पात्र होंगे, और यदि मैं कहूँ कि आप धन्य हैं तो आप निश्चित रूप से नष्ट नहीं किए जाएँगे। अब मैं केवल इतना ही कह रहा हूँ कि आप मोआब के वंशज हैं। मैंने यह नहीं कहा कि आप नष्ट हो जाएँगे। यह मात्र इतना ही है कि मोआब के वंशजों को शाप दिया गया है, और वे एक प्रकार की भ्रष्ट मानवजाति हैं। पाप का पहले उल्लेख किया गया है; क्या आप सभी पापी नहीं हैं? क्या सभी पापी शैतान द्वारा भ्रष्ट नहीं किए गए हैं? क्या सभी पापी परमेश्वर की अवहेलना और उनके विरुद्ध विद्रोह नहीं करते हैं? क्या जो लोग परमेश्वर की अवहेलना करते हैं वे अभिशाप के पात्र नहीं हैं? क्या सभी पापियों को नष्ट नहीं किया जाना चाहिए? उस स्थिति में, मांस और रक्त वालों में से किसे बचाया जा सकता है? आप लोग आज तक कैसे बचे रह सकते हैं? आप लोग नकारात्मक हैं क्योंकि आप मोआब के वंशज हैं, और क्या आप लोग मानव जाति के पापियों में से नहीं हैं? आप आज तक कैसे टिके रहे हैं? जब पूर्णता का उल्लेख किया जाता है तो आप खुश हो जाते हैं। आपने सुना होगा कि आपको बड़े क्लेश का अनुभव अवश्य करना चाहिए, और आपको लगता है कि यह तो और भी धन्य है। आपको लगता है कि क्लेश के माध्यम से आप एक जीतने वाले बन सकते हैं, तथा यह परमेश्वर का और भी महान आशीष है और परमेश्वर के द्वारा आप का महान उन्नयन है। जब मोआब का ज़िक्र किया जाता है, तो आपके बीच हंगामा पैदा हो जाता है। वयस्क और बच्चे समान रूप से अकथनीय उदासी महसूस करते हैं और आपके हृदय विपत्ति से भर जाते हैं; आप सभी को पैदा होने का खेद होता है। आप लोगों को इस बात का महत्व समझ में नहीं आता है कि क्यों कार्य का यह चरण मोआब के वंशजों पर किया जाता है; आप केवल उच्च हैसियत की तलाश करना जानते हैं, और जब आपको लगता है कि आपके पास कोई आशा नहीं है, तो आप पीछे हट जाते हैं। जब पूर्णता और भविष्य की मंजिल का उल्लेख किया जाता है, तो आपको खुशी महसूस होती है। परमेश्वर में आपका विश्वास आशीष प्राप्त करने के लिए है, और इसलिए है कि आपको अच्छी मंजिल मिल सके। कुछ लोगों को अब अपनी हैसियत के कारण आशंका महसूस होती है। क्योंकि उनका कम महत्व और निम्न हैसियत है, वे इसलिए परिपूर्ण होने की तलाश करना नहीं चाहते हैं। परमेश्वर ने सबसे पहले परिपूर्णता के बारे में बात की, तब उसके बाद मोआब के वंशजों का ज़िक्र किया, इसलिये लोगों ने पूर्णता के उस मार्ग को नकार दिया जिसका उन्होंने पहले अनुसरण किया था। इसका कारण यह है कि आपने इस कार्य के महत्व को कभी नहीं जाना है, न ही आप इसके महत्व की परवाह करते हैं। आपके डील-डौल बहुत छोटे हैं और यहाँ तक कि आप थोड़ी सी भी गड़बड़ी को सहन नहीं कर सकते हैं। जब आप देखते हैं कि आपकी स्वयं की हैसियत बहुत दीन-हीन है तो आप नकारात्मक महसूस करते हैं, और आपको खोज करते रहने पर विश्वास नहीं होता है। लोग केवल अनुग्रह की प्राप्ति और शांति के आनंद को परमेश्वर में विश्वास के प्रतीक के रूप में, और आशीषों के लिए माँग करने को परमेश्वर में विश्वास के आधार के रूप में मानते हैं। बहुत कम लोग परमेश्वर को जानने की या अपने स्वभाव में बदलाव करने की माँग करते हैं। परमेश्वर में लोगों का विश्वास परमेश्वर से उन्हें एक उपयुक्त मंजिल प्रदान करवाने, पृथ्वी पर समस्त अनुग्रह दिलवाने, परमेश्वर को अपना सेवक बनाने, परमेश्वर के साथ उनके शांतिपूर्ण, मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखवाने, और उनके बीच कभी भी कोई संघर्ष नहीं होने देने की चाहत है। अर्थात्, परमेश्वर में उनके विश्वास के लिए आवश्यक है कि परमेश्वर उनकी सभी माँगों को पूरा करने का वादा करें, वे जो कुछ भी प्रार्थना करते हैं उन्हें प्रदान करें, ठीक जैसा कि बाइबिल में कहा गया है “मैं तुम्हारी सारी प्रार्थनाओं को सुनूँगा।” उन्हें परमेश्वर से अपेक्षा है कि वे किसी का न्याय या किसी के साथ व्यवहार न करें, क्योंकि परमेश्वर हमेशा दयालु उद्धारकर्ता यीशु हैं, जो लोगों के साथ हर समय और हर स्थान पर अच्छे संबंध रखते हैं। जिस तरह से वे विश्वास करते हैं, वह इस तरह से है: वे हमेशा बेशर्मी के साथ परमेश्वर से चीज़ें माँगते हैं, और परमेश्वर उन्हें सब कुछ आँख बंद करके प्रदान कर देते हैं, चाहे वे विद्रोही हों या आज्ञाकारी। लोग परमेश्वर से लगातार “भुगतान” की माँग करते हैं और परमेश्वर को किसी भी प्रतिरोध के बिना भुगतान अवश्य करना चाहिए, और दोहरा भुगतान करना चाहिए, चाहे परमेश्वर ने उनसे कुछ भी प्राप्त किया हो या नहीं। परमेश्वर केवल उनकी दया पर ही हो सकते हैं; वे मनमाने ढंग से गुप्त रूप से लोगों के लिए योजना नहीं बना सकते हैं,और वे अपने प्राचीन छिपे हुए विवेक और धर्मी स्वभाव को जैसा चाहें लोगों पर, उनकी अनुमति के बिना तो बिल्कुल भी प्रकट नहीं कर सकते हैं। वे परमेश्वर के सामने सिर्फ अपने पापों की स्वीकारोक्ति करें और परमेश्वर बस उनको पाप-मुक्त कर दें, और इससे तंग न हो सकें, और ऐसा हमेशा चलता रहे। वे परमेश्वर को सिर्फ आदेश दें और वे सिर्फ उस आज्ञा का पालन करें, जैसा कि बाइबल में यह कहते हुए अभिलिखित है कि “परमेश्वर का आगमन मनुष्य को उनके लिए प्रतीक्षा करवाना नहीं है, बल्कि उन्हें मनुष्य के लिए प्रतीक्षा करवाना है। वे मनुष्य की सेवा करने के लिए आए हैं।” क्या आपने हमेशा इस तरह से विश्वास नहीं किया है? जब आप लोग परमेश्वर से कुछ प्राप्त नहीं कर सकते हैं तो आप लोग भाग जाना चाहते हैं। और जब कोई चीज आप लोगों की समझ में नहीं आती है तो आप लोग बहुत क्रोधित हो जाते हैं, और इस हद तक भी चले जाते हैं कि सभी तरह के दुर्वचन कहने लगते हैं। आप लोग परमेश्वर को अपना विवेक और चमत्कार बस पूरी तरह से व्यक्त नहीं करने देंगे, बल्कि इसके बजाय आप लोग मात्र अस्थायी सुविधा और आराम का आनंद लेना चाहते हैं। अब तक, परमेश्वर में आपके विश्वास में आपकी प्रवृत्ति वही पुराने विचारों वाली रही है। यदि परमेश्वर आप लोगों को थोड़ा सा प्रताप दिखाते हैं तो आप लोग अप्रसन्न हो जाते हैं; क्या आप लोग अब देखते हैं कि आप लोगों का डील-डौल कैसा है? ऐसा मत सोचो कि आप सभी लोग परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हैं जबकि वास्तव में आप लोगों के पुराने विचारों में बदलाव नहीं हुआ है। जब तक आपके साथ कुछ अशुभ नहीं होता है,तब तक आप सोचते हैं कि हर चीज आसानी से चल रही है और आप परमेश्वर को सर्वोच्च शिखर तक प्यार करते हैं। लेकिन जब आपके साथ ज़रा-सा भी अशुभ हो जाता है तो आप अधोलोक में गिर जाते हैं। क्या यही आपका परमेश्वर के प्रति वफादार होना है?

                  यदि जीतने के कार्य का अंतिम चरण इज़राइल में शुरू हुआ होता, तो जीतने के कार्य का कोई अर्थ नहीं होता। इस कार्य का अत्यधिक महत्व तभी है जब यह इस देश में किया जाता है, जब यह आप लोगों पर किया जाता है। आप लोग सबसे विनम्र लोग हैं, सबसे कम हैसियत वाले लोग हैं। आप लोग इस समाज के निम्नतम स्तर वाले हैं और आप लोग उन लोगों में से हैं जिन्होंने शुरुआत में परमेश्वर को सबसे कम स्वीकार किया था। आप वे लोग हैं जो परमेश्वर से दूरतम हैं, और वे लोग हैं जिन्हें सबसे गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाया गया है। क्योंकि कार्य का यह चरण केवल जीत के लिए ही है, इसलिए क्या आने वाली गवाही देने के लिए आपको चुनना सबसे उपयुक्त नहीं है? यदि जीतने के कार्य का पहला चरण आप लोगों पर नहीं किया जाना होता, तो आने वाले जीतने के कार्य को आगे बढ़ाना मुश्किल हो जायेगा, क्योंकि अनुगामी जीतने के कार्य को आज किए जाने वाले इस कार्य के तथ्य के आधार पर परिणाम प्राप्त होंगे। आज का जीतने का कार्य जीतने के समस्त कार्य की शुरुआत मात्र है। आप जीता जाने वाला पहला बैच हैं; आप उस समस्त मानवजाति के प्रतिनिधि हैं जो जीत ली जाती हैं। यदि कोई हैं जिनमें वास्तव में समझ है, तो वे देखेंगे कि परमेश्वर आज जो भी कार्य करते हैं, वह महान है, कि परमेश्वर न केवल लोगों को उनके विद्रोहीपन को जानने की अनुमति देते हैं, बल्कि वह आपकी हैसियत को भी प्रकट करते हैं। उनके वचनों का उद्देश्य और अर्थ लोगों को नकारात्मक बनाना नहीं है, न ही लोगों के गिरने का कारण बनना है। ऐसा इसलिए है ताकि वे प्रकटन को प्राप्त कर सकें और उनके वचनों के माध्यम से बचाए जा सकें; यह उनके वचनों के माध्यम से मनुष्य की आत्मा को जागृत करना है। विश्व के सृजन के समय से अब तक, मनुष्य,यह नहीं जानते हुए कि एक परमेश्वर है, और विश्वास नहीं करते हुए कि एक परमेश्वर है, हमेशा शैतान की प्रभुता के आधीन रहा है। कि इन लोगों को परमेश्वर द्वारा महान उद्धार में शामिल किया जा सकता है और परमेश्वर द्वारा ऊपर उठाया जा सकता है यह वास्तव में परमेश्वर का प्यार दर्शाता है; जो लोग वास्तव में समझते हैं वे सब इस तरह से सोचेंगे। बिना समझ वाले लोग कैसे सोचेंगे? “आह, परमेश्वर कहते हैं कि हम मोआब के वंशज हैं। उन्होंने स्वयं कहा कि हम मोआब के वंशज हैं। क्या हमारे साथ कुछ अच्छा हो सकता है? हमें किसने मोआब का वंशज बनाया है? किसने पूर्व में हमसे उनकी इतनी अवहेलना करवाई? परमेश्वर हमारी निंदा करने के लिए आए हैं; क्या आप नहीं देखते हैं कि कैसे शुरू से ही परमेश्वर ने हमेशा हमारा न्याय किया है? चूँकि हमने परमेश्वर की अवहेलना की है इसलिए हमें इस तरीके से ताड़ना दी जानी चाहिए।” क्या ये वचन सही हैं? आज परमेश्वर आपका न्याय करते हैं, और आपको ताड़ना देते हैं, और आप की निंदा करते हैं, लेकिन जान लें कि आपकी निंदा इसलिए है कि आप स्वयं को जान सकें। निन्दा, अभिशाप, न्याय, ताड़ना - ये सब इसलिए हैं ताकि आप स्वयं को जान सकें, ताकि आपके स्वभाव में परिवर्तन हो जाए, और, इसके अलावा, ताकि आप अपने महत्व को जान सकें, और देख सकें कि परमेश्वर के सभी कार्य धर्मी हैं, और उनके स्वभाव और उनके कार्य की आवश्यकताओं के अनुसार हैं, कि वे मनुष्य के उद्धार के लिए अपनी योजना के अनुसार कार्य करते हैं, और कि वे ही धर्मी परमेश्वर हैं जो मनुष्य को प्यार करते हैं, और मनुष्य को बचाते हैं, और जो मनुष्य का न्याय करते और उसे ताड़ित करते हैं। यदि आप केवल यह जानते हैं कि आप दीन-हीन हैसियत के हैं, और यह कि आप भ्रष्ट और अवज्ञाकारी हैं, परन्तु यह नहीं जानते हैं कि परमेश्वर आज आप में जो न्याय कर रहे हैं और ताड़ना दे रहे हैं उसके माध्यम से परमेश्वर अपने उद्धार के कार्य को स्पष्ट कर देना चाहते हैं, तो आप के पास अनुभव करने का कोई मार्ग नहीं है, आगे जारी रखने में सक्षम तो आप बिल्कुल भी नहीं हैं। परमेश्वर मारने, या नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि न्याय करने, श्राप देने, ताड़ना देने, और बचाने के लिए आए हैं। अपनी 6000-वर्षीय प्रबंधन योजना के समापन से पहले – इससे पहले कि वे मनुष्य की प्रत्येक श्रेणी का अंत स्पष्ट करें – पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य उद्धार के लिए है, यह सब उन लोगों को पूरी तरह से पूर्ण बनाने, और उन्हें अपने प्रभुत्व में वापस लाने के उद्देश्य है जो उन्हें प्रेम करते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर लोगों को कैसे बचाते हैं, यह सब उन्हें उनके पुराने शैतानी स्वभाव से अलग करके किया जाता है; अर्थात्, वे उनसे जीवन की तलाश करवाने के द्वारा उन्हें बचाते हैं। यदि वे जीवन की तलाश नहीं करते हैं, तो उनके पास परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का कोई रास्ता नहीं होगा। उद्धार परमेश्वर का ही कार्य है और जीवन की तलाश करना कुछ ऐसा है जो उद्धार को स्वीकार करने के लिए मनुष्य के पास अवश्य होना चाहिए। मनुष्य के विचार से, उद्धार परमेश्वर का प्रेम है, और परमेश्वर का प्रेम ताड़ना, न्याय और श्राप नहीं हो सकता है; उद्धार में प्रेम, करुणा, और, इसके अलावा, सांत्वना के वचन अवश्य समाविष्ट होने चाहिए, और ये परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए अनगिनत आशीषों से युक्त अवश्य होने चाहिए। लोगों का मानना ​​है कि जब परमेश्वर मनुष्य को बचाते हैं, तो वे उन्हें स्पर्श करके और अपने आशीषों और अनुग्रह के माध्यम से उनसे उनके हृदय समर्पित करवाकर ऐसा करते हैं। कहने का तात्पर्य है कि जब वे मनुष्य का स्पर्श करते हैं तो वे उसे बचाते हैं। इस तरह का उद्धार ऐसा उद्धार है जिसमें एक लेन-देन किया जा रहा है। केवल जब परमेश्वर उन्हें सौ गुना प्रदान करते हैं, तभी मनुष्य परमेश्वर के नाम के अधीन आएँगे, और परमेश्वर के लिए अच्छा करने और उन्हें महिमामण्डित का प्रयत्न करेंगे। यह मानव जाति के लिए परमेश्वर की अभिलाषा नहीं है। भ्रष्ट मानवता को बचाने के लिए परमेश्वर पृथ्वी पर कार्य करने आए हैं-इसमें कोई झूठ नहीं है; यदि नहीं, तो वे अपना कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से निश्चित रूप से नहीं आते। अतीत में, उद्धार का उनका साधन परम प्रेम और करुणा दिखाना रहा था, इतनी कि उन्होंने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। आज अतीत के जैसा कुछ नहीं है: आज, आप लोगों का उद्धार, स्वभाव के अनुसार प्रत्येक के वर्गीकरण के दौरान, अंतिम दिनों के समय में होता है; आप लोगों के उद्धार का साधन प्रेम या करुणा नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है ताकि मनुष्य को अधिक अच्छी तरह बचाया जा सके। इस प्रकार, आप लोगों को जो भी प्राप्त होता है वह ताड़ना, न्याय और निष्ठुर मार है, लेकिन जान लें कि इस निर्दय मार में थोड़ा सा भी दण्ड नहीं है, जान लें कि इस बात की परवाह किए बिना कि मेरे वचन कितने कठोर हैं, आप लोगों पर जो पड़ता है वे कुछ वचन ही हैं जो आप लोगों को अत्यंत निर्दय प्रतीत होते हैं, और जान लें, कि इस बात की परवाह किए बिना कि मेरा क्रोध कितना अधिक है, आप लोगों पर जो पड़ता है वे फिर भी शिक्षण के वचन हैं, और आप लोगों को नुकसान पहुँचाना, या आप लोगों को मार डालना मेरा आशय नहीं है। क्या यह सब सत्य नहीं है? जान लें कि आज, चाहे वह धर्मी न्याय हो या निष्ठुर शुद्धिकरण, सभी उद्धार के लिए हैं। इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे आज स्वभाव के अनुसार प्रत्येक का वर्गीकरण है, या मनुष्य की श्रेणियाँ सामने लायी गई हैं, परमेश्वर के सभी कथन और कार्य उन लोगों को बचाने के लिए हैं जो परमेश्वर से प्यार करते हैं। धर्मी न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से है, निर्दय शुद्धिकरण मनुष्य का परिमार्जन करने के उद्देश्य से है, कठोर वचन या ताड़ना सब शुद्ध करने के उद्देश्य से और उद्धार के लिए हैं। और इस प्रकार, उद्धार की आज की विधि अतीत की विधि के विपरीत है। आज, धर्मी न्याय आप लोगों को बचाता है, और आप लोगों में से प्रत्येक को स्वभाव के अनुसार वर्गीकृत करने का एक अच्छा साधन है, और निर्मम ताड़ना आप लोगों के लिए सर्वोच्च उद्धार लाती है- और इस ताड़ना और न्याय का सामना होने पर आपकोक्या कहना है? क्या आप लोगों ने शुरू से अंत तक उद्धार का आनंद नहीं लिया है? आप लोगों ने देहधारी परमेश्वर को देखा है और उनकी सर्वसंभाव्यता और विवेक का एहसास किया है; इसके अलावा, आपने बार-बार मार और अनुशासन का अनुभव किया है। लेकिन क्या आपको सर्वोच्च अनुग्रह भी प्राप्त नहीं हुआ है? क्या आपको प्राप्त हुए आशीष किसी भी अन्य की तुलना में अधिक नहीं हैं? आप लोगों को प्राप्त हुए अनुग्रह सुलेमान के द्वारा उठाए गये महिमा और सम्पत्ति के आनंद की तुलना में कहीं अधिक विपुल हैं! इस बारे में विचार करें: यदि आगमन के पीछे मेरा इरादा आपको निंदित करना और सज़ा देना होता, न कि आपको बचाना, तो क्या आप लोगों के दिन इतने लंबे समय तक टिकते? क्या आप, मांस और रक्त के ये पापी प्राणी, आज तक जीवित रहते? यदि यह केवल आप लोगों को दंड देने के लिए होता, तो मैं क्यों शरीर धारण करता और इस तरह के कठिन कार्य की शुरूआत करता? क्या आप नश्वर-मात्र को दंडित करने के लिए एक वचन पर्याप्त नहीं होता? क्या आप को निंदित करने के बाद अभी भी आप लोगों को नष्ट करने का मेरा मन होगा? क्या आप लोगों को अभी भी मेरे इन वचनों पर विश्वास नहीं है? क्या मैं केवल प्यार और करुणा के माध्यम से मनुष्य को बचा सकता हूँ? या मैं मनुष्यों को बचाने के लिए केवल क्रूस पर चढ़ने का उपयोग कर सका था? क्या मेरा धर्मी स्वभाव मनुष्य को पूरी तरह आज्ञाकारी बनाने के लिए अनुकूल नहीं है? क्या यह मनुष्य को पूर्ण रूप से बचाने में अधिक सक्षम नहीं है?

                  यद्यपि मेरे वचन कठोर हो सकते हैं, किंतु वे सभी मनुष्यों के उद्धार के लिए कहे जाते हैं, क्योंकि मैं सिर्फ वचनों को बोल रहा हूँ और मनुष्य के शरीर को दंडित नहीं कर रहा हूँ। ये वचन मनुष्य को प्रकाश में जीने, यह जानने कि प्रकाश विद्यमान है, यह जानने कि प्रकाश अनमोल है, और इससे भी अधिक यह जानने कि ये वचन मनुष्य के लिए कितने लाभदायक हैं, और यह जानने कि परमेश्वर उद्धार है, का कारण बनते हैं। यद्यपि मैंने ताड़ना और न्याय के बहुत से वचन कहे हैं, किंतु वे कृत्य में आप पर कार्यान्वित नहीं किए गए हैं। मैं अपना कार्य करने, अपने वचनों को बोलने के लिए आया हूँ और, यद्यपि मेरे वचन कठोर हो सकते हैं, किंतु वे आपके भ्रष्टाचार और आपके विद्रोहीपन का न्याय करने के लिए बोले जाते हैं। मेरा ऐसा करने का उद्देश्य मनुष्य को शैतान की प्रभुता से बचाना, मनुष्य को बचाने के लिए अपने वचनों का उपयोग करना रहता है; मेरा उद्देश्य अपने वचनों से मनुष्य को हानि पहुँचाना नहीं है। मेरे वचन कठोर हैं ताकि मेरे कार्य से परिणाम प्राप्त हो सकें। केवल इस तरह से कार्य करने के माध्यम से ही मनुष्य स्वयं को जान सकता है और अपने विद्रोही स्वभाव को दूर कर सकता है। वचनों का सबसे बड़ा महत्व लोगों को, सत्य को समझने के बाद, सत्य को अभ्यास में लाने देना, अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने देना, और स्वयं के ज्ञान और परमेश्वर के कार्य को प्राप्त करने देना है। केवल बोलने के माध्यम से कार्य करने का साधन ही परमेश्वर और मनुष्य के बीच के संबंधों को सम्प्रेषित कर सकता है, केवल वचन ही सत्य को समझा सकते हैं। इस तरह से कार्य करना मनुष्य को जीतने का सर्वोत्तम साधन है; वचनों के कथन के अलावा, कोई अन्य तरीका मनुष्य को सत्य और परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट समझ देने में सक्षम नहीं है, और इसलिए अपने कार्य के अंतिम चरण में, परमेश्वर मनुष्य के प्रति सभी सत्यों और रहस्यों को,जो उसकी समझ में नहीं आते हैं, खोलने के उद्देश्य से मनुष्य से बोलते हैं, उसे सच्चे मार्ग और परमेश्वर से जीवन प्राप्त करने की अनुमति देते हैं, और इस प्रकार परमेश्वर की इच्छा को पूरा करते हैं। मनुष्य पर परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य इसलिए है कि वह परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर सके और यह सब मनुष्य को बचाने के लिए किया जाता है, इसलिए उनके द्वारा मनुष्य के उद्धार के समय के दौरान वे मनुष्य को दंडित करने का कार्य नहीं करते हैं। मनुष्य के उद्धार के समय के दौरान, परमेश्वर दुष्टों को दंडित या अच्छों को पुरस्कृत नहीं करते हैं, और न ही वे सभी भिन्न-भिन्न प्रकार के लोगों के लिए मंजिलों को प्रकट करते हैं। इसके बजाय, उनके कार्य का अंतिम चरण पूरा हो जाने के बाद ही वे दुष्टों को दंडित और अच्छों को पुरस्कृत करने का कार्य करेंगे, और उसके बाद ही वे विभिन्न प्रकार के सभी लोगों के अंत को प्रकट करेंगे। जो दंडित किए जाएँगे, वे वास्तव में बचाए नहीं जा पाएँगे, जबकि जो लोग बचाए जाएँगे वे ऐसे लोग होंगे जिन्होंने परमेश्वर द्वारा मनुष्यों के उद्धार के समय दौरान उनसे उद्धार प्राप्त कर लिया है। परमेश्वर के उद्धार के कार्य के दौरान, जो भी बचाए जा सकते हैं, उन्हें अधिकतम सीमा तक बचाया जाएगा, उनमें से किसी को भी त्यागा नहीं जाएगा, क्योंकि परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य मनुष्य को बचाना है। परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार के समय के दौरान, जो लोग अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने में असमर्थ हैं, वे सभी जो पूरी तरह से परमेश्वर की आज्ञापालन करने में असमर्थ हैं, दण्ड के पात्र होंगे। कार्य का यह चरण –वचनों का कार्य - मनुष्य के लिए उन सभी तरीकों और रहस्यों को खोलता है जो उसकी समझ में नहीं आते हैं, ताकि मनुष्य परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर की मनुष्य से अपेक्षाओं को समझ सके, ताकि उसके पास परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने और अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने की परिस्थिति हो। परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए केवल वचनों का उपयोग करते हैं, और लोगों को इस वजह से दण्ड नहीं देते हैं कि वे थोड़ा विद्रोही हैं, क्योंकि अब उद्धार के कार्य का समय है। यदि हर विद्रोही व्यक्ति को दंडित किय गया होता, तो किसी को भी बचाए जाने का अवसर नहीं मिला होता; उन सभी को दंडित किया गया होता और वे अधोलोक में गिर गए होते। मनुष्य का न्याय करने वाले वचनों का उद्देश्य उसे स्वयं को जानने देना और परमेश्वर की आज्ञापालन करने देना है; यह वचनों के न्याय के माध्यम से उन्हें दंडित किए जाने के लिए नहीं है। वचनों के कार्य के समय के दौरान, बहुत से लोग अपना विद्रोहीपन और अपनी अवज्ञा दिखाएँगे, और वे देहधारी परमेश्वर के प्रति अपनी अवज्ञा दिखाएँगे। लेकिन वे इस वजह से इन सभी लोगों को दंडित नहीं करेंगे, इसके बजाय वे उन लोगों को केवल त्याग देंगे जो मूलभूत रूप से भ्रष्ट हैं और जो बचाए नहीं जा सकते हैं। वे उनके शरीरों को शैतान को दे देंगे, और कुछ मामलों में, उनके शरीरों को समाप्त कर देंगे। जिन लोगों को छोड़ दिया जाएगा, वे अनुसरण करते रहेंगे और व्यवहार और काँट-छाँट का अनुभव करते रहेंगे। यदि अनुसरण करने के समय वे अभी भी व्यवहार और काँट-छाँट को स्वीकार नहीं कर सकते हैं और वे और भी अधिक पतित हो जाते हैं, तो इन लोगों ने उद्धार का अपना अवसर गँवा दिया होगा। प्रत्येक व्यक्ति जिसने वचनों द्वारा जीता जाना स्वीकार कर लिया है उसके पास उद्धार के प्रचुर अवसर होंगे। इन लोगों में से प्रत्येक का परमेश्वर द्वारा उद्धार उनके प्रति परमेश्वर की अत्यंत उदारता दिखाता है, जिसका अर्थ है कि उनके प्रति अत्यधिक सहिष्णुता दिखायी जाती है। जब तक लोग गलत रास्ते से पीछे लौटते हैं, जब तक वे पश्चाताप कर सकते हैं, तब तक परमेश्वर उन्हें अपने द्वारा उद्धार प्राप्त करने का अवसर देंगे। जब लोग पहले परमेश्वर के विरूद्ध विद्रोह करते हैं, तो परमेश्वर को उन्हें मारने की कोई इच्छा नहीं होती है, बल्कि इसके बजाय उन्हें बचाने के लिए वे वह सब कुछ करते हैं। यदि किसी में वास्तव में उद्धार के लिए कोई जगह नहीं है, तो परमेश्वर उन्हें अलग कर देंगे। परमेश्वर किसी को दंडित करने में इस वजह से धीमे हैं क्योंकि वे उन सभी को बचाना चाहते हैं जिन्हें बचाया जा सकता है। वे केवल वचनों से लोगों का न्याय करते हैं, उन्हें ज्ञान प्रदान करते हैं और उनका मार्गदर्शन करते हैं, और उन्हें मार डालने के लिए छड़ी का उपयोग नहीं करते हैं। लोगों को बचाने के लिए वचनों का उपयोग करना कार्य के अंतिम चरण का उद्देश्य और महत्व है।