81. कष्ट और परीक्षण—ईश्वर की आशीषें हैं

वांगगांग, चीन

मैं एक किसान हूं और चूंकि मेरा परिवार गरीब है, इसलिए मुझे धन कमाने हेतु अस्थायी नौकरियां खोजने के लिए जगह-जगह की यात्राएँ करनी पड़ती थी; मैं सोचता था कि अपनी शारीरिक मेहनत से मैं अपनी जिंदगी को बेहतर बना सकता हूं। हालांकि, असलियत में, मैंने देखा कि मेरे जैसे प्रवासी श्रमिकों के लिए कानूनी अधिकारों की कोई गारंटी नहीं थी; मेरे वेतन को किसी कारण के बिना ही अक्सर रोक लिया जाता था। बार-बार मेरे साथ धोखा किया जाता था और दूसरे मेरा फायदा उठाते थे। एक साल की कड़ी मेहनत के बाद भी, मुझे वह नहीं मिला जो मुझे मिलने की उम्मीद थी। मुझे महसूस हुआ कि यह दुनिया वाकई बुरी है! इंसान एक-दूसरे के साथ पशुओं जैसा बर्ताव करते हैं, जहां ताकतवर कमजोर का शिकार करता है; वे एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं, परस्पर लड़ाई करते हैं, और मैं इस तरह की जिंदगी नहीं जी पा रहा था। मेरी आत्मा में बहुत दर्द और अवसाद था, और जब मैंने जिंदगी में विश्वास खो दिया था, तभी मेरे एक दोस्त ने मुझे सर्व शक्तिमान परमेश्वर के उद्धारक चरित्र को मुझसे साझा किया। तब से, मैं नियमित तौर पर भाइयों व बहनों के साथ एकत्रित होता, प्रार्थना करता और भजन गाता था; हम सत्य का संवाद और आदान-प्रदान करते थे, और एक—दूसरे की कमजोरियों को दूर करने के लिए अपनी क्षमता का उपयोग करते थे। मैं बहुत खुश व स्वतंत्र महसूस करता था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में, मैंने देखा कि भाई व बहनें एक—दूसरे को नीचा दिखाने या सामाजिक भेदभाव करने की कोशिश नहीं करते थे; वे सभी शुद्ध रूप से मुक्त व निष्कपट थे और एक—दूसरे के मित्र थे। वहां पर हर कोई अपने भ्रष्ट आचारों को बाहर निकालने, और इंसानों जैसा जीवन जीने व उद्धार पाने हेतु पूरी मेहनत से सत्य पाने के लिए प्रयत्न कर रहा था। इससे मैंने जिंदगी में खुशियों का अनुभव करना और जिंदगी के महत्व व आदर्श को समझना सीखा। इसलिए, मैंने निर्णय लिया कि मुझे सुसमाचार का प्रसार करना चाहिए और अंधकार में जी रहे लोगों को उद्धार दिलाने और फिर से प्रकाश देखने के लिए परमेश्वर के पास लाने में उनकी मदद करनी चाहिए। परिणामस्वरूप, मैं सुसमाचार का प्रचार करने व परमेश्वर का प्रमाण प्रस्तुत करने वाले रैंक में शामिल हो गया। लेकिन अप्रत्याशित रूप से, सुसमाचार का प्रसार करने के लिए सीसीपी सरकार ने मुझे गिरफ्तार कर लिया और मुझे बेहद निर्दयी उत्पीड़न, क्रूर बर्ताव और जेल की पीड़ा सहनी पड़ी।

यह 2008 की सर्दियों की एक दोपहर की बात है, जब दो बहनें व मैं सुसमाचार के एक लक्ष्य-समूह में, अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य का प्रचार कर रहे थे, तभी अधर्मी लोगों ने हमारी शिकायत कर दी। छ: पुलिस कर्मचारियों ने सुसमाचार लक्ष्य-समूह के घर में घुसने के लिए हमारे आवासीय परमिट को जांचने की जरूरत का बहाना बनाया। जैसे ही वे दरवाजे पर आएं, वे चिल्लाने लगे: "हिलना मत!" उन दुष्ट पुलिसवालों में से दो मुझ पर इस तरह झपटे जैसे वे पूरी तरह से अपना आपा खो चुके हों; उनमें से एक ने मेरी छाती के कपड़े को धर दबोचा और दूसरे ने मेरे हाथों को पकड़ लिया और उन्हें मेरे पीछे कसने के लिए अपनी पूरी ताकत का इस्तेमाल किया, फिर उसने उग्रतापूर्वक पूछा: "तुम क्या कर रहे हो? तुम कहा से हो? तुम्हारा नाम क्या है।" जवाब में मैंने पूछा: "तुम लोग क्या कर रहे हें? तुम लोग मुझे क्यों गिरफ्तार कर रहे हैं?" जब उन्होंने मुझे ऐसा कहते हुए सुना, तो वे बहुत गुस्सा हो गए और आवेशपूर्ण रूप से कहा: "कोई फर्क नहीं पड़ता कि कारण क्या है, हम तुम्हें ही ढूंढ रहे थे और अब तुम हमारे साथ चलोगे।" इसके बाद, उन दुष्ट पुलिस वालों ने मुझे व दो बहनों को पुलिस वाहन में ढकेल दिया।

हमारे लोक सुरक्षा ब्यूरो पहुँचने के बाद, उन दुष्ट पुलिस वालों ने हमें ले जाकर एक छोटे कमरे में मुझे बंद कर दिया; उन्होंने मुझे जमीन पर अपनी नाक रगड़ने का आदेश दिया और हम पर निगरानी के लिए 4 लोग लगा दिए। चूंकि मैं काफी देर से उकड़ूँ बैठा हुआ था, इसलिए मैं इतना थक गया था कि मैं वह नहीं कर पाया। जब भी मैं खड़े होने की कोशिश करता था, तो वे दुष्ट पुलिस वाले मुझे घेर लेते थे और मेरे सिर को दबाकर मुझे खड़े होने से रोक दिया करते थे। कुछ ही समय बाद, मैंने बाजू के कमरे से आ रहीं यातना की चीखें सुनी जो खून को जमा देने वाली थी और उस पल, मैं बहुत डर गया था: मैं नहीं जानता था कि इसके बाद वे मुझ पर किस प्रकार के उत्पीड़न और क्रूर बर्ताव का प्रयोग करेंगे! मैंने तुरंत ही अपने दिल से परमेश्वर की प्रार्थना करनी शुरू कर दी: "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मैं अभी बहुत डरा हुआ हूं, मैं आपसे श्रद्धा व विश्वास तथा शक्ति की याचना कर रहा हूं, मुझे स्थिर व साहसी बनाइए ताकि मैं आपके लिए प्रमाण प्रस्तुत करने हेतु खड़ा हो सकूं। भले ही मैं उनका उत्पीड़न व क्रूर बर्ताव नहीं सह सकूँ, भले ही मुझे अपनी जीभ को काटकर आत्महत्या करनी पड़े, लेकिन मैं जुडास की तरह आपको कभी धोखा नहीं दूंगा!" प्रार्थना करने के बाद, मुझे अपने भीतर शक्ति बढ़ती हुई महसूस हुई, और मेरा डर कम होने लगा।

उस शाम 7 बजे के बाद, उन्होंने मेरे हाथों को पीठ के पीछे कर हथकड़ी लगा दी और मुझे सीढ़ियों से पूछताछ कक्ष में ले गए और फ़र्श पर फेंक दिया। वहाँ यातनाएं देने के लिए हर प्रकार का सामान मौजूद था, जैसे कि रस्सियां, लकड़ी के डंडे, छड़ी, चाबुक आदि। एक दुष्ट पुलिसवाले ने अपने हाथ में तेज आवाज़ करता बिजली के झटके देने वाला डंडा ले लिया, और मुझे डराते हुए जानकारी मांगने लगा: "तुम लोग कलीसिया में कुल कितने लोग हो? तुम लोगों के मिलने का स्थान कहा है? प्रभारी कौन है? इस क्षेत्र में कितने लोग सुसमाचार का प्रचार कर रहे हैं? बोलो! वर्ना, जो होगा वह तुम्हें भुगतना होगा!" मैंने इलेक्ट्रॉनिक छड़ी के आने वाले खतरे की ओर देखा और फिर यातना के उपकरणों से भरे हुए उस कमरे को देखा; मैं घबराने व डरने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता था। मैं नहीं जानता था कि मैं इस यातना को सह पाउंगा भी या नहीं, इसलिए मैं परमेश्वर को पुकारता ही रहा। यह देखकर कि मैं अपना मुँह नहीं खोलने वाला, वह चिढ़ गया और क्रूरतापूर्वक उसने इलेक्ट्रॉनिक डंडे से मेरी छाती के बांई ओर से मुझे जकड़ लिया। उसने लगभग एक मिनट तक मुझे बिजली का झटका दिया। मुझे तुरंत ही लगने लगा था कि मेरे शरीर में खून उबल रहा है; सिर से पैर तक मुझे असहनीय दर्द हो रहा था और मैं लगातार चिल्लाते हुए जमीन पर गिर कर तड़प रहा था। उसने फिर भी मुझे नहीं बख्शा और अचानक ही मुझे घसीटने लगा और ठुड्डी के बल मुझे उठाने के लिए डंडे का प्रयोग किया, और चिल्लाया: "बोलो! तुम कुछ भी स्वीकार नहीं करोगे?" इन दानवों की उन्मादी यातनाओं का सामना करते हुए, मुझे केवल इस बात का डर था कि इनकी यातनाओं को न सह पाने के कारण कहीं मैं परमेश्वर को धोखा न दे दूं। उस समय, मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा, "सत्ता में रहने वाले लोग बाहर से दुष्ट लग सकते हैं, लेकिन डरो मत, क्योंकि ऐसा इसलिए है तुम सब का विश्वास बहुत कम है। जब तक तुम सभी का विश्वास बढ़ता है, तब तक कुछ भी मुश्किल नहीं होगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 75')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे फिर से श्रद्धा व शक्ति दी, और मैं जान गया कि भले ही मेरे सामने मौजूद दुष्ट पुलिस वाले पागल व भ्रष्ट हो, लेकिन उन्हें परमेश्वर के हाथों ही तैयार किया गया था। परमेश्वर की अनुमति के बिना वे मुझे नहीं मार सकते। जब तक मैं परमेश्वर पर श्रद्धा दिखाउंगा व उस पर आश्रित रहूंगा और उन दुष्टों से हार नहीं मानूंगा, तब तक वे निश्चित रूप से मुझे अपमानित करने में असफल हो जाएंगे। ऐसा सोचकर, मैंने अपने शरीर की पूरी शक्ति को इकट्ठा किया और तेज आवाज में उत्तर दिया: "तुम लोग मुझे यहां क्यों लाए हो? तुम लोग इलेक्ट्रिक डंडे से क्यों मुझे बिजली के झटके दे रहे हो? मैंने कौन सा जुर्म किया है?" दुष्ट पुलिस वाला अचानक ही हेडलाइट के सामने आने वाले हिरण की तरह हो गया और अपराधबोध के साथ उसका सर झुक गया। वह हकलाने लगा और कुछ बोल न पाया। फिर वह दुम दबाकर भाग गया। शैतान की दुविधा की इस अपमानजनक परस्थिति को देखकर, मेरी आंखों से आंसू निकल आएं। इस अवस्था में, मैं वाकई सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों की शक्ति व प्रभुत्व को अनुभव किया। अगर मैं परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाऊँगा, तो मैं परमेश्वर के कर्मों को देख सकूँगा। पाँच-छ: मिनट बाद दो पुलिस वाले आए, पर इस बार उन्होंने दूसरा तरीका अपनाया। एक दुबले-पतले अधिकारी ने मुझसे बड़े अच्छे से कहा, "बस कुछ देर हमारा साथ दो। हमारे सवालों का जवाब दे दो नहीं तो हम तुम्हें जाने नहीं दे पाएंगे।" मैंने एक शब्द भी नहीं कहा, तो वह एक कागज़ का टुकड़ा ले आया और मुझे दस्तखत करने को कहा। उसमें लिखे शब्द, "श्रम द्वारा पुन:शिक्षण", पढ़कर मैंने इंकार कर दिया। दूसरे अधिकारी ने मेरे बाएँ कान पर इतना ज़ोरदार थप्पड़ मारा, कि मैं लगभग फ़र्श पर ही गिरा पड़ा। मेरे कान बजने लगे और सब कुछ स्पष्ट समझ आने में कुछ पल लग गए। उन्होंने मुझे फिर से हथकड़ी लगा दी और मुझे छोटे से कमरे में बंद कर दिया।

उस छोटे कमरे में वापस आने के बाद, मुझे चोट पहुंचाई गई व मारा गया, वह दर्द असहनीय था। मेरा दिल दुख व कमजोरी की भावना पैदा करने के अलावा कुछ नहीं कर सकता था: आस्तिकों को इस प्रकार का कष्ट क्यों सहना पड़ता है? मैंने लोगों को सत्य दिखाने व उन्हे बचाने के अच्छे प्रयोजन के साथ सुसमाचार का प्रचार किया था, और मुझे अप्रत्याशित रूप से इस उत्पीड़न को सहना पड़ा है। इस बारे में सोचते हुए, मैं ज्यादा यह सोचने लगा कि मेरे साथ गलत किया गया है। मैंने अपनी पीड़ा में प्रार्थना करते हुए परमेश्वर को पुकारा, और कहा, "हे परमेश्वर, मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है और मैं बहुत कमज़ोर हूँ। परमेश्वर मैं तुझ पर भरोसा करना चाहता हूँ और तेरी गवाही देना चाहता हूँ। कृपया मुझे राह दिखा।" बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों के एक गीत के बारे में सोचा : "निराश न हो, कमज़ोर न बनो, मैं तुम्हारे लिए चीज़ें स्पष्ट कर दूँगा। राज्य की राह इतनी आसान नहीं है; कुछ भी इतना सरल नहीं है! तुम चाहते हो कि आशीष आसानी से मिल जाएँ, है न? आज हर किसी को कठोर परीक्षणों का सामना करना होगा। बिना इन परीक्षणों के मुझे प्यार करने वाला तुम लोगों का दिल मजबूत नहीं होगा और तुम्हें मुझसे सच्चा प्यार नहीं होगा। यदि ये परीक्षण केवल मामूली परिस्थितियों से युक्त भी हों, तो भी सभी को इनसे गुज़रना होगा; अंतर केवल इतना है कि परीक्षणों की कठिनाई हर एक व्यक्ति के लिए अलग-अलग होगी। परीक्षण मेरे आशीष हैं, और तुममें से कितने मेरे सामने आकर घुटनों के बल गिड़गिड़ाकर मेरे आशीष माँगते हैं? तुम्हें हमेशा लगता है कि कुछ मांगलिक वचन ही मेरा आशीष होते हैं, किंतु तुम्हें यह नहीं लगता कि कड़वाहट भी मेरे आशीषों में से एक है" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'परीक्षणों की पीड़ा एक आशीष है')। यह सच है। यातनाओं और कठिनाइयों से मेरा सामना इसलिए हुआ कि परमेश्वर मेरी आस्था और प्रेम को पूर्ण बना सके। वह परिवेश मेरे लिए परमेश्वर की आशीष था। मैं कैसे शिकायत कर सकता था और परमेश्वर को कैसे दोष दे सकता था? मुझे गिरफ्तार किया गया और यातना दी गयी, पर इस अग्नि परीक्षा के दौरान परमेश्वर अपने वचनों से मुझे राह दिखाता रहा; यह परमेश्वर का प्रेम था। मैं मन ही मन वह गीत गाता रहा, जितना मैंने उसे गाया उतना ही मैं उत्साह से भर गया। इसने मेरी आस्था भी वापस ला दी और मैंने परमेश्वर के सामने कसम खाई : "परमेश्वर, चाहे मुझे पुलिस कितनी भी यातना दे, मैं गवाही देना चाहता हूँ, कभी तुझे धोखा देना नहीं चाहता। मैं अंत तक तेरा अनुसरण करने को संकल्पित हूँ।"

जेल में, वे बुरे पुलिस वाले मुझे यातना देने के लिए हर प्रकार की युक्तियों को लगातार आजमा रहे थे और अक्सर कैदियों को भी मुझे मारने के लिए उकसाया करते थे। सर्दी की जमा देने वाली ठंड में, वे कैदियों से बाल्टी से मुझ पर ठंडा पानी डालने के लिए कहते और जबरदस्ती मुझे ठंडे पानी से नहाने के लिए विवश करते थे। मैं सिर से पाँव तक ठंड से कांप जाता था। मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था और बहुत पसीना आ रहा था, मेरा दिल में इतना अधिक दर्द हो रहा था कि इससे मेरी पीठ का भी बुरा हाल था। यहां कैदी, सरकार के लिए धन बनाने वाली मशीन थे और उनके पास कोई भी वैधानिक अधिकार नहीं था। उनके पास इस दमन को सहने और गुलाम बने रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। जेल में मुझे दिन के समय मृतकों के साथ रखी जाने वाली और राख़ अवशेष स्वरूप प्रयोग किए जाने वाले कागज का धन मुद्रित करने के लिए विवश किया जाता। आरंभ में, उन्होंने यह नियम बनाया कि मुझे हर रोज 1,000 कागज के टुकड़ों को मुद्रित करना होगा, जिसे बाद में उन्होंने 1,800 टुकड़े प्रति दिन कर दिया, और अंत में इसे बढ़ा कर 3,000 टुकड़े कर दिया गया। इतनी मात्रा को पूरा करना एक अनुभवी व्यक्ति के लिए भी असंभव था, तो मेरे जैसे गैर अनुभवी व्यक्ति की तो बात ही छोड़ दीजिए। असल में, उन्होंने जानबूझकर मुझे इतना काम दिया था, ताकि मैं इसे किसी भी तरह पूरा न कर पाउं और उन्हें मुझे प्रताड़ित करने व पीटने के लिए एक बहाना मिल जाए। जब भी मैं इस कोटे को पूरा नहीं कर पाता था, तो दुष्ट पुलिस वाले मेरे पैरों में 5 किलोग्राम से ज्यादा वजनी बेड़ियां बांध देते, और वे हथकड़ियों से मेरे हाथ व पैर एक साथ बांध देते थे। मैं बस वहां बैठा रह सकता था, अपना सिर झुकाए और अपनी कमर मोड़े बिना मैं हिलने में भी सक्षम नहीं था। इसके अलावा, इन अमानवीय व निर्दयी पुलिस वालों ने मेरी मूलभूत जरूरतों के लिए भी मुझसे कभी नहीं पूछा और न ही उन्हें इसकी परवाह थी। हालांकि जेल की सेल में ही शौचालय था, लेकिन मैं वहां तक जाने और उसका प्रयोग करने में पूरी तरह से असक्षम था; मैं बस अपने सेल के साथियों से निवेदन कर सकता था कि वे मुझे उठाकर शौचालय तक ले जाएं। अगर वे कुछ बेहतर कैदी होते, तो वे मुझे उठाकर ले जाते; अगर कोई मेरी मदद नहीं करता था, तो फिर रोके रखने के अलावा मेरे पास कोई विकल्प नहीं होता था। सबसे ज्यादा दर्दनाक समय भोजन करने का समय होता था क्योंकि मेरे हाथ व पैर दोनों एक—साथ बंधे होते थे। मैं बस अपनी पूरी ताकत से अपना सिर बस नीचे कर पाता था और अपने हाथ व पैर उठा पाता था। केवल ऐसा करके ही मैं एक रोल अपने मुंह में डाल पाता था। मुझे हर कौर पर बहुत ऊर्जा खर्च करनी पड़ती थी। वे हथकड़ियां मेरे हाथों व पैरों में रगड़ खाती थीं, जिसकी वजह से काफी दर्द होता था। काफी समय के बाद, मेरी कलाईयों व टखनों में काले व चमकदार कड़े घट्टे पड़ गए थे। अक्सर ही जब मुझे बंद रखा जाता था तो मैं खा नहीं पाता था, और कभी कभार ही, कैदी मुझे दो छोटे रोल्स दे दिया करते थे। ज्यादातर वे मेरा हिस्सा भी खा जाया करते थे और मैं खाली पेट ही रह जाया करता था। मुझे पीने के लिए इससे भी कम मिलता था; असल में, हर किसी को प्रति दिन केवल दो बाउल पानी दिया जाता था, लेकिन मैं बंद था और हिल भी नहीं सकता था, इसलिए मैं कभी-कभार ही पानी पी पाता था। इस अमानवीय यातना को शब्दों मेँ नहीं व्यक्त किया जा सकता है। मुझे चार बार ऐसी अमानवीय यातना दी गयी, जो दस दिनों तक चली। उन परिस्थितियों में भी अधिकारी मुझसे रात की शिफ्ट कराते थे। मैंने लंबे समय से भर-पेट खाना नहीं खाया था; भूख की वजह से मेरे दिल की धड़कन बढ़ जाती, उल्टी आती और सीने में दर्द होता। मैं बस हाड़-माँस का पुतला बन गया था। जब मेरी भूख बर्दाश्त के बाहर हो गयी तो मैंने याद किया कि प्रभु यीशु ने परीक्षा के समय शैतान से कहा था : "मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा" (मत्ती 4:4)। इससे मुझे सुकून मिला और मैं इन शब्दों को शैतान द्वारा मुझे दी जा रही यातना में खुद अनुभव करने को तैयार हो गया। मैंने खुद को परमेश्वर के सामने शांत किया ताकि प्रार्थना कर सकूँ और उसके वचनों पर विचार कर सकूँ। और फिर मुझे पता भी नहीं चला और मेरी भूख शांत हो गयी। एक बार एक कैदी ने मुझसे कहा था : "ऐसे ही पहले एक युवा व्यक्ति को हथकड़ी लगाकर भूखा मार दिया गया था। मैं देख रहा हूँ कि तुमने कई दिनों से कुछ नहीं खाया है पर तुम्हारे हौसले अभी भी बुलंद हैं।" उसके शब्दों को सुनकर मैंने मन ही मन परमेश्वर को धन्यवाद दिया। मैंने गहराई से महसूस किया कि यह परमेश्वर के वचनों में मौजूद जीवन-शक्ति ही है जो मुझे सहारा दे रही है। इससे सच में मुझे यह महसूस हुआ कि परमेश्वर के वचन सत्य, मार्ग, और जिंदगी हैं एवं निश्चित रूप से यही वह आधार है जिस पर मुझे जीवित रहने के लिए भरोसा करना चाहिए। इसलिए, परमेश्वर में मेरी श्रद्धा अनायास रूप से बढ़ गई थी। कष्टों के इस वातावरण में, मैं इस सत्य की वास्तविकता को सच में अनुभव करने में सक्षम था कि "मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा।" यह सच में जिंदगी की सबसे बहुमूल्य संपत्ति थी जो परमेश्वर ने मुझे दी है, और यह मेरा अनोखा उपहार भी है। इसके अलावा, एक ऐसे वातावरण में मैं कभी यह नहीं पा सकता था जहां मुझे खाने या कपड़े की चिंता करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। अब, मेरे कष्टों का काफी अर्थ व मूल्य था!

उत्पीड़न और यातना के उस अनुभव ने कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति मेरे दिल में जो नफरत थी, उसे और बढ़ा दिया। मुझे गिरफ्तार किया गया था और बस परमेश्वर पर विश्वास करने के कारण मुझे सभी प्रकार की यातनाएँ दी गईं। यह अमानवीय दुर्व्यवहार था; यह पूरी तरह से दुष्टता थी! मैंने परमेश्वर के वचनों के एक अंश के बारे में सोचा जो मैंने पहले पढ़ा था: "गहराई का चेहरा अराजक और काला है, जबकि सामान्य लोग ऐसे दुखों का सामना करते हुए स्वर्ग की ओर देखकर रोते हैं और पृथ्वी से शिकायत करते हैं। मनुष्य कब अपने सिर को ऊँचा रख पाएगा? मनुष्य दुर्बल और क्षीण है, वह इस क्रूर और अत्याचारी शैतान से कैसे मुकाबला कर सकता है? वह क्यों नहीं जितनी जल्दी हो सके, परमेश्वर को अपना जीवन सौंप देता? वह क्यों अभी भी डगमगाता है? वह कब परमेश्वर का कार्य समाप्त कर सकता है? इस प्रकार निरुद्देश्य ढंग से तंग और प्रताड़ित किए जाते हुए उसका पूरा जीवन अंततः व्यर्थ ही व्यतीत हो जाएगा; उसे आने और विदा होने की इतनी जल्दी क्यों है? वह परमेश्वर को देने के लिए कोई अनमोल चीज़ क्यों नहीं रखता? क्या वह घृणा की सहस्राब्दियों को भूल गया है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (8)')। इस अनुभव ने मुझे कम्युनिस्ट पार्टी का सच्चा सार दिखाया कि वह परमेश्वर की दुश्मन है, सत्य की दुश्मन है। इसने परमेश्वर के लिए गवाही देने के मेरे संकल्प को और मजबूत कर दिया।

एक माह के बाद, सीसीपी की पुलिस ने मुझ पर "समाज की व्यवस्था को बिगाड़ने और कानून के कार्यान्वयन को बाधित करने" का आरोप लगाया; और मुझे एक साल का सश्रम कारावास दे दिया गया। जब मैं लेबर कैम्प में पहुंचा, तो दुष्ट पुलिस वालों ने मुझे हर दिन काम करने पर मजबूर किया। जब मैं कार्यशाला में बोरियां गिन रहा होता, तो मैं 100 बोरियों को गिनता और फिर उन्हें एक साथ बांध देता। कैदी हमेशा ही जान-बूझकर वहां आते थे और मैंने जो बोरियां गिनी होती थी उसमें से एक या कई बोरियां निकालकर ले जाते थे, फिर मुझसे कहा करते थे कि मैंने ठीक से गिनती नहीं की है और उस मौके का प्रयोग मुझे मुक्का व लात मारने के लिए किया करते थे। जब टीम कप्तान मुझे मार खाते हुए देखता था, तो वह भी वहां आ जाता था और पाखंडपूर्ण ढंग से मुझसे पूछता था कि यहां क्या हो रहा है और कैदी गलत साक्ष्य प्रस्तुत कर दिया करते थे कि मैं बोरियों की गिनती ठीक से नहीं कर रहा था। फिर मुझे टीम कप्तान की कठोर आलोचना की गोलीबारी सहनी पड़ती थी। जब मुझे लगता कि मेरे साथ गलत हो रहा है, या मैं पीड़ा में हूँ तो मैं काम करते हुए परमेश्वर के वचनों को एक गीत गाता : "इन अंतिम दिनों में, तुम्हें परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहना आवश्यक है, और परमेश्वर की कृपा पर रहना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही मजबूत और सामर्थी गवाही है" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास')। मैं जितना गाता गया, उतना ही मैंने द्रवित और प्रेरित महसूस किया, और मैं अपने आँसूओं को बहने से रोक नहीं पाया। मैंने संकल्प लिया कि चाहे मुझे कितना भी कष्ट उठाना पड़े, मैं परमेश्वर के लिए गवाही दूँगा। मेरी ही उम्र का एक और भाई था जो मेरे साथ ही जेल में बंद हुआ था। जब हम दिन में काम कर रहे होते थे, तब हमें बात करने की अनुमति नहीं थी, लेकिन रात में हम चुपके से परमेश्वर के वचनों और भजनों के अंशों को लिखते थे जिन्हें हमने याद किया था और उनका आदान-प्रदान करते थे। कुछ समय बाद हमें एक साथ काम पर लगाया गया, तब हम एक-दूसरे की मदद करने और प्रोत्साहित करने के लिए चुपचाप संगति साझा किया करते थे। इससे दुख को कम करने में बहुत मदद मिली।

इसके अलावा, वे मुझे हर सुबह "आचरण के नियमों" को याद करने का आदेश दिया करते थे, और अगर मैं याद नहीं कर पाता था, तो मुझे पीटा जाता था; इतना ही नहीं वे मुझे कम्यूनिस्ट पार्टी की प्रशंसा करने वाले गीत गाने के लिए भी विवश किया करते थे। अगर वे यह देख लेते कि मैं नहीं गा रहा हूँ या मेरे होंठ नहीं हिल रहे हैं, तो निश्चित रूप से उस रात को मुझे पीटा जाता था। वे मुझसे फर्श पर पोछा लगवाकर भी मुझे दंडित करते, और अगर मैंने उनकी उम्मीदों के अनुसार पोछा नहीं किया, तो फिर मुझे हिंसक रूप से पीटा जाता था। एक बार, कुछ कैदियों ने अचानक ही मुझे पीटना व लात मारना शुरू कर दिया। मुझे मारने के बाद, उन्होंने मुझसे पूछा: "युवा आदमी, क्या तुम जानते हो कि तुम्हें क्यों पीटा जा रहा है? क्योंकि जब संरक्षक यहां आया था तो तुमने खड़े होकर उसका अभिवादन नहीं किया था!" हर बार जब मुझे पीटा जाता, तो मैं काफी क्रोधित हो जाता था, लेकिन कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं दिखा पाता था; मैं बस रो सकता था और चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना कर सकता था, उन्हें इस कानून रहित, जंगली राज के कारण मेरे दिल में उत्पन्न क्रोध व नाराजगी के बारे में बताता था। वहां पर कुछ भी उचित नहीं था, वहां केवल हिंसा थी। वहां कोई भी इंसान नहीं था, वहां पर केवल उन्मादी दानव व बिच्छू थे! मैंने उस दुर्दशा में रहकर बहुत दर्द व दबाव महसूस किया था; मैं वहां एक मिनट भी और नहीं रहना चाहता था। जब-जब मैं कमजोरी व दर्द की स्थिति में होता था, तब तब मैं हर बार सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन वचनों के बारे में सोचने लगता था: "क्या तुम सबने कभी मिलने वाली आशीषों को स्वीकार किया है? क्या कभी तुम सबने तुमसे किए गए वायदों को खोजा है? तुम लोग निश्चय ही, मेरी रोशनी के नेतृत्व में, अंधकार की शक्तियों के गढ़ को तोड़ोगे। तुम अंधकार के मध्य, निश्चय ही मार्गदर्शन करने वाली ज्योति को नहीं खोओगे। तुम सब निश्चय ही सम्पूर्ण सृष्टि पर स्वामी होगे। तुम लोग शैतान पर निश्चय ही विजयी बनोगे। तुम सब निश्चय ही बड़े लाल अजगर के राज्य के पतन के समय, मेरी विजय की गवाही देने के लिए असंख्य लोगों की भीड़ में खड़े होगे। तुम लोग निश्चय ही सिनिम के देश में दृढ़ और अटूट खड़े रहोगे। तुम सब जो कष्ट सह रहे हो, उनके द्वारा तुम मेरे आशीषों को प्राप्त करोगे और मेरी महिमा को ब्रह्माण्ड भर में निश्चय ही बिखेरोगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 19')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे प्रोत्साहित किया। इस पर ध्यान दिए बिना कि परमेश्वर मेरे साथ जो भी कर रहा था वह अनुग्रुह व आशीर्वाद था या परीक्षा व परिष्करण, यह सबकुछ मुझे दिए जाने व मुझे बचाने के लिए था; यह मुझमें सत्य समाहित कर रहा था और मेरी जिंदगी को सत्य बना रहा था। आज, परमेश्वर ने इस उत्पीड़न व पीड़ा को मुझ तक आने की अनुमति दी थी। भले ही इसकी वजह से मुझे बहुत पीड़ा हुई थी, इसने मुझे स्पष्ट रूप से बड़े लाल अजगर के परमेश्वर से घृणा करने, उससे नफरत करने और उसे त्यागने के बुरे सार को देखने दिया, शैतान के प्रभाव से निकलने दिया, और परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से विजेता बनाए जाने के लिए उसकी ओर मुड़ने दिया। इसने मुझे सच में यह अनुभव करने में सक्षम किया था कि परमेश्वर मेरे साथ हैं; इस वजह से परमेश्वर के वचनों को मेरी जिंदगी की खुराक और मेरे पैरों का पथ प्रदर्शक चिराग व मेरे मार्ग का प्रकाश बनते हुए देखकर मैं वाकई आनंदित हो रहा था, जो मुझे इस अंधकारमय नरक के कुण्ड से चरण दर चरण बाहर निकाल रहे थे। यह परमेश्वर का प्रेम व सुरक्षा है कि मैंने अपनी पीड़ा की प्रक्रिया के दौरान भी इसका आनंद लिया व प्राप्त किया। इस समय, मैं यह देखने में सक्षम हो गया था कि मैं कितना अंधा व स्वार्थी था और मैं बहुत लालची भी था। परमेश्वर में विश्वास करके मैं सिर्फ यह जान सका था कि परमेश्वर के अनुग्रह व आशीर्वाद का आनंद कैसे लिया जाए और इस बात की तनिक भी परवाह नहीं किया कि सत्य व जीवन की तलाश और उसका अनुसरण कैसे किया जाए। मेरी देह को थोड़ी सी भी तकलीफ सहनी पड़ने पर, मैं तुरंत ही कराहने लगता; मैं बस परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझता था और परमेश्वर के कार्य को समझने की कोशिश नहीं करता था। मैं हमेशा ही चाहता था कि परमेश्वर मेरे कारणदुख व दर्द महसूस करें। मुझमें सच में विवेक नहीं था! पश्चाताप व खुद को दोष देने की भावना में, मैंने चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना की: "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मैं देख सकता हूं कि तू जो कुछ भी करता है वह मुझे बचाने व पाने के लिए है। मुझे बस इस बात से नफरत है कि मैं कितना बागी, अंधा हूं। मैंने हमेशा ही तुझे गलत समझा और तेरी इच्छा का विचार भी नहीं किया। हे परमेश्वर, आज तेरे वचन ने मेरे सुन्न दिल व आत्मा को जगा दिया है और इस वजह से मैं तेरी इच्छा को समझ गया हूं। अब मुझमेँ अपनी इच्छाएं व जरूरतें रखने की इच्छा बिल्कुल भी नहीं है; मैं बस तेरी व्यवस्था का आदर करूंगा। चाहे मुझे कितनी भी पीड़ा सहनी पड़े, फिर भी मैं शैतान के उत्पीड़न के दौरान तेरी गवाही दूँगा।" प्रार्थना करने के बाद, मैंने परमेश्वर के अच्छे प्रयोजनों को समझा, और मैं जान गया कि परमेश्वर ने जिस भी वातावरण को अनुभव करने की अनुमति मुझे दी, वह मेरे लिए परमेश्वर का महानतम प्रेम था और इसी मेँ मेरा उद्धार निहित था। इसलिए, अब मैं भविष्य मे कभी पीछे हटने या झुकने या परमेश्वर को गलत समझने के बारे में और नहीं सोचता हूँ। हालांकि परिस्थितियां अभी भी वैसी ही थीं, लेकिन मेरा दिल पूरी तरह से खुश व आनंदित था; मुझे महसूस हुआ कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने के लिए तकलीफ व उत्पीड़न सहने योग्य होना भी एक सम्मान व गर्व का विषय था, और यह मेरे जैसे एक भ्रष्ट व्यक्ति के लिए अनोखा उपहार था; यह मेरे लिए परमेश्वर का विशेष आशीर्वाद व अनुग्रह था।

जेल में एक साल की यातना का अनुभव करने के बाद, मैंने पाया कि मेरा कद बहुत छोटा है और यह कि मुझमें सत्य की कितनी कमी है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने इस अनोखे वातावरण के माध्यम से मेरी कमियों का निराकरण किया और उन्होंने मुझे प्रगति करने दिया। मेरी विपत्ति में, उनकी वजह से मुझे जिंदगी की सबसे अनमोल धरोहर मिली और मैं उन सत्यों को समझ पाया जिन्हें मैं पहले नहीं समझ पाता था और मैं साफ तौर पर दानव शैतान के घिनौने प्रकटन, और परमेश्वर का विरोध करने की उसकी सुधार विरोधी सत्ता को देख सकता था। मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर का विरोध करने और ईसाइयों का नर संहार करने के उसके घिनौने अपराधों को पहचान गया था। मैंने नम्रता पूर्वक उस महान मुक्ति व करुणा का अनुभव किया जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर की मुझ जैसे भ्रष्ट व्यक्ति पर थी और यह महसूस किया है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों की शक्ति व जिंदगी मेरे लिए प्रकाश ला सकती है और मेरी जिंदगी बन सकती है और शैतान से जीत दिला सकती है और मुझे मृत्यु के साये की घाटी से दृढ़तापूर्वक निकाल सकती है। परमेश्वर का धन्यवाद!

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