1. आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु अंतिम दिनों में लौट आया है और उसका एक नया नाम है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर। यह कैसे हो सकता है? बाइबल स्पष्ट रूप से कहती है, "किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें" (प्रेरितों 4:12)। "यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है" (इब्रानियों 13:8)। हम मानते हैं कि प्रभु यीशु का नाम कभी नहीं बदल सकता है, और यह कि उनकी वापसी पर उन्हें किसी अन्य नाम से नहीं पुकारा जा सकता है।

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"जो जय पाए उसे मैं अपने परमेश्‍वर के मन्दिर में एक खंभा बनाऊँगा, और वह फिर कभी बाहर न निकलेगा; और मैं अपने परमेश्‍वर का नाम और अपने परमेश्‍वर के नगर अर्थात् नये यरूशलेम का नाम, जो मेरे परमेश्‍वर के पास से स्वर्ग पर से उतरनेवाला है, और अपना नया नाम उस पर लिखूँगा" (प्रकाशितवाक्य 3:12)।

"प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था और जो आनेवाला है, जो सर्वशक्‍तिमान है, यह कहता है, 'मैं ही अल्फ़ा और ओमेगा हूँ'" (प्रकाशितवाक्य 1:8)।

"फिर मैं ने बड़ी भीड़ का सा और बहुत जल का सा शब्द, और गर्जन का सा बड़ा शब्द सुना: 'हल्‍लिलूय्याह! क्योंकि प्रभु हमारा परमेश्‍वर सर्वशक्‍तिमान राज्य करता है'" (प्रकाशितवाक्य 19:6)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर का नाम नहीं बदलता, तो फिर यहोवा का नाम यीशु क्यों हो गया? यह भविष्यवाणी की गई थी मसीहा आएगा, तो फिर यीशु नाम का एक व्यक्ति क्यों आ गया? परमेश्वर का नाम क्यों बदल गया? क्या इस तरह का कार्य काफी समय पहले नहीं किया गया था? क्या परमेश्वर आज नया कार्य नहीं कर सकता? कल का कार्य बदला जा सकता है, और यीशु का कार्य यहोवा के कार्य के बाद आ सकता है। तो क्या यीशु के कार्य के बाद कोई अन्य कार्य नहीं हो सकता? यदि यहोवा का नाम बदल कर यीशु हो सकता है, तो क्या यीशु का नाम भी नहीं बदला जा सकता? इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है; बात केवल इतनी-सी है कि लोग बहुत सरल दिमाग के हैं। परमेश्वर हमेशा परमेश्वर ही रहेगा। चाहे उसका काम कैसे भी बदले, चाहे उसका नाम कैसे भी बदल जाए, लेकिन उसका स्वभाव और बुद्धि कभी नहीं बदलेगी। यदि तुम्हें लगता है कि परमेश्वर को केवल यीशु के नाम से ही पुकारा जा सकता है, तो फिर तुम्हारा ज्ञान बहुत सीमित है। क्या तुम यह दावे से कह सकते हो कि परमेश्वर का नाम हमेशा के लिए यीशु रहेगा, परमेश्वर हमेशा यीशु नाम से ही जाना जाएगा, और यह कभी नहीं बदलेगा? क्या तुम यह यकीन से कह सकते हो कि यीशु नाम ने ही व्यवस्था के युग का समापन किया और वही अंतिम युग का भी समापन करेगा? कौन कह सकता है कि यीशु का अनुग्रह, युग का समापन कर सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वो मनुष्य, जिसने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, किस प्रकार उसके प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है?' से उद्धृत

हर बार जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह अपना नाम, अपना लिंग, अपनी छवि और अपना कार्य बदल देता है; वह अपने कार्य को दोहराता नहीं है। वह ऐसा परमेश्वर है, जो हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता। जब वह पहले आया, तो उसे यीशु कहा गया; जब वह इस बार फिर से आता है, तो क्या उसे अभी भी यीशु कहा जा सकता है? जब वह पहले आया, तो वह पुरुष था; क्या वह इस बार फिर से पुरुष हो सकता है? जब वह अनुग्रह के युग के दौरान आया था, तो उसका कार्य सलीब पर चढ़ाया जाना था; जब वह फिर से आता है, तो क्या तब भी वह मानवजाति को पाप से छुटकारा दिला सकता है? क्या उसे फिर से सलीब पर चढ़ाया जा सकता है? क्या वह उसके कार्य की पुनरावृत्ति नहीं होगी? क्या तुम्हें नहीं पता था कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता? ऐसे लोग हैं, जो कहते हैं कि परमेश्वर अपरिवर्तशील है। यह सही है, किंतु यह परमेश्वर के स्वभाव और सार की अपरिवर्तनशीलता को संदर्भित करता है। उसके नाम और कार्य में परिवर्तन से यह साबित नहीं होता कि उसका सार बदल गया है; दूसरे शब्दों में, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा, और यह तथ्य कभी नहीं बदलेगा। यदि तुम कहते हो कि परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील है, तो क्या वह अपनी छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना पूरी करने में सक्षम होगा? तुम केवल यह जानते हो कि परमेश्वर हमेशा अपरिवर्तशील है, किंतु क्या तुम यह जानते हो कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता? यदि परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील है, तो क्या वह मानवजाति की आज के दिन तक अगुआई कर सकता था? यदि परमेश्वर अपरिवर्तशील है, तो ऐसा क्यों है कि उसने पहले ही दो युगों का कार्य कर लिया है? उसका कार्य कभी आगे बढ़ने से नहीं रुकता, जिसका अर्थ है कि उसका स्वभाव मनुष्य के सामने धीरे-धीरे प्रकट होता है, और जो कुछ प्रकट होता है, वह उसका अंतर्निहित स्वभाव है। आरंभ में, परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य से छिपा हुआ था, उसने कभी भी खुलकर मनुष्य के सामने अपना स्वभाव प्रकट नहीं किया था, और मनुष्य को बस उसका कोई ज्ञान नहीं था। इस वजह से, वह धीरे-धीरे मनुष्य के सामने अपने स्वभाव को प्रकट करने हेतु अपने कार्य का उपयोग करता है, किंतु इस तरह कार्य करने का यह अर्थ नहीं है कि परमेश्वर का स्वभाव हर युग में बदलता है। यह ऐसा मामला नहीं है कि परमेश्वर का स्वभाव लगातार बदल रहा है, क्योंकि उसकी इच्छा हमेशा बदल रही है। बल्कि, यह ऐसा है कि, चूँकि उसके कार्य के युग भिन्न-भिन्न हैं, इसलिए परमेश्वर अपने अंतर्निहित स्वभाव को उसकी समग्रता में लेता है और क्रमश: उसे मनुष्य के सामने प्रकट करता है, ताकि मनुष्य उसे जानने में समर्थ हो जाए। किंतु यह किसी भी भाँति इस बात का साक्ष्य नहीं है कि परमेश्वर का मूलतः कोई विशेष स्वभाव नहीं है या युगों के गुज़रने के साथ उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल गया है—इस प्रकार की समझ ग़लत होगी। युगों के गुज़रने के अनुसार परमेश्वर मनुष्य को अपना अंतर्निहित और विशेष स्वभाव—अपना स्वरूप—प्रकट करता है; किसी एक युग का कार्य परमेश्वर के समग्र स्वभाव को व्यक्त नहीं कर सकता। और इसलिए, "परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता" वचन उसके कार्य को संदर्भित करते हैं, और "परमेश्वर अपरिवर्तशील है" उसे संदर्भित करते हैं, जो परमेश्वर का अंतर्निहित स्वरूप है। इसके बावज़ूद, तुम छह-हज़ार-वर्ष के कार्य को एक बिंदु पर आधारित नहीं कर सकते, या उसे केवल मृत शब्दों के साथ सीमित नहीं कर सकते। मनुष्य की मूर्खता ऐसी ही है। परमेश्वर इतना सरल नहीं है, जितना मनुष्य कल्पना करता है, और उसका कार्य किसी एक युग में रुका नहीं रह सकता। उदाहरण के लिए, यहोवा हमेशा परमेश्वर का नाम नहीं हो सकता; परमेश्वर यीशु के नाम से भी अपना कार्य कर सकता है। यह इस बात का संकेत है कि परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे की ओर प्रगति कर रहा है।

परमेश्वर हमेशा परमेश्वर है, और वह कभी शैतान नहीं बनेगा; शैतान हमेशा शैतान है, और वह कभी परमेश्वर नहीं बनेगा। परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर की चमत्कारिकता, परमेश्वर की धार्मिकता और परमेश्वर का प्रताप कभी नहीं बदलेंगे। उसका सार और उसका स्वरूप कभी नहीं बदलेगा। किंतु जहाँ तक उसके कार्य की बात है, वह हमेशा आगे बढ़ रहा है, हमेशा गहरा होता जा रहा है, क्योंकि वह हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता। हर युग में परमेश्वर एक नया नाम अपनाता है, हर युग में वह नया कार्य करता है, और हर युग में वह अपने सृजनों को अपनी नई इच्छा और नया स्वभाव देखने देता है। यदि नए युग में लोग परमेश्वर के नए स्वभाव की अभिव्यक्ति देखने में असफल रहेंगे, तो क्या वे उसे हमेशा के लिए सलीब पर नहीं टाँग देंगे? और ऐसा करके, क्या वे परमेश्वर को परिभाषित नहीं करेंगे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)' से उद्धृत

अनुग्रह का युग यीशु के नाम से शुरू हुआ। जब यीशु ने अपनी सेवकाई आरंभ की, तो पवित्र आत्मा ने यीशु के नाम की गवाही देनी आरंभ कर दी, और यहोवा का नाम बोला जाना अब बंद हो गया; इसके बजाय, पवित्र आत्मा ने मुख्य रूप से यीशु के नाम से नया कार्य आरंभ किया। जो यीशु में विश्वास करते थे, उन लोगों की गवाही यीशु मसीह के लिए दी गई थी, और उन्होंने जो कार्य किया, वह भी यीशु मसीह के लिए था। पुराने विधान के व्यवस्था के युग के समापन का यह अर्थ था कि मुख्य रूप से यहोवा के नाम पर किया गया कार्य समाप्त हो गया है। तब से परमेश्वर का नाम यहोवा नहीं रहा; इसके बजाय उसे यीशु कहा गया, और यहाँ से पवित्र आत्मा ने मुख्य रूप से यीशु के नाम से कार्य करना आरंभ किया। इसलिए जो लोग आज भी यहोवा के वचनों को खाते और पीते हैं, और अभी भी व्यवस्था के युग के कार्य के अनुसार सब-कुछ करते हैं—क्या तुम नियमों का अंधानुकरण नहीं कर रहे हो? क्या तुम अतीत में नहीं अटक गए हो? अब तुम लोग जानते हो कि अंत के दिन आ चुके हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि जब यीशु आए, तो वह अभी भी यीशु कहलाए? यहोवा ने इस्राएलियों से कहा था कि एक मसीहा आएगा, लेकिन जब वह आया, तो उसे मसीहा नहीं बल्कि यीशु कहा गया। यीशु ने कहा कि वह पुनः आएगा, और वह वैसे ही आएगा जैसे वह गया था। ये यीशु के वचन थे, किंतु क्या तुमने यीशु के जाने के तरीके को देखा था? यीशु एक सफेद बादल पर चढ़कर गया था, किंतु क्या ऐसा हो सकता है कि वह व्यक्तिगत रूप से एक सफेद बादल पर मनुष्यों के बीच वापस आएगा? यदि ऐसा होता, तो क्या वह अभी भी यीशु नहीं कहलाता? जब यीशु पुनः आएगा, तब तक युग पहले ही बदल चुका होगा, तो क्या उसे अभी भी यीशु कहा जा सकता है? क्या परमेश्वर को केवल यीशु के नाम से ही जाना जा सकता है? क्या नए युग में उसे नए नाम से नहीं बुलाया जा सकता? क्या एक व्यक्ति की छवि और एक विशेष नाम परमेश्वर का उसकी संपूर्णता में प्रतिनिधित्व कर सकते हैं? प्रत्येक युग में परमेश्वर नया कार्य करता है और उसे एक नए नाम से बुलाया जाता है; वह भिन्न-भिन्न युगों में एक ही कार्य कैसे कर सकता है? वह पुराने से कैसे चिपका रह सकता है? यीशु का नाम छुटकारे के कार्य के वास्ते लिया गया था, तो क्या जब वह अंत के दिनों में लौटेगा, तब भी उसे उसी नाम से बुलाया जाएगा? क्या वह अभी भी छुटकारे का कार्य करेगा? ऐसा क्यों है कि यहोवा और यीशु एक ही हैं, फिर भी उन्हें भिन्न-भिन्न युगों में भिन्न-भिन्न नामों से बुलाया जाता है? क्या यह इसलिए नहीं है, क्योंकि उनके कार्य के युग भिन्न-भिन्न हैं? क्या केवल एक नाम परमेश्वर का उसकी संपूर्णता में प्रतिनिधित्व कर सकता है? ऐसा होने पर, परमेश्वर को भिन्न युग में भिन्न नाम से ही बुलाया जाना चाहिए, और उसे युग को परिवर्तित करने और युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए उस नाम का उपयोग करना चाहिए। क्योंकि कोई भी एक नाम पूरी तरह से स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, और प्रत्येक नाम केवल एक दिए गए युग में परमेश्वर के स्वभाव के उस समय से संबंधित पहलू का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है; उसे केवल उसके कार्य का प्रतिनिधित्व ही करना है। इसलिए, समस्त युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए परमेश्वर ऐसे किसी भी नाम को चुन सकता है, जो उसके स्वभाव के अनुकूल हो। चाहे वह यहोवा का युग हो, या यीशु का, प्रत्येक युग का प्रतिनिधित्व एक नाम के द्वारा किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)' से उद्धृत

मान लो, प्रत्येक युग में परमेश्वर का कार्य हमेशा एक जैसा होता, और उसे हमेशा उसी नाम से बुलाया जाता, तो मनुष्य उसे कैसे जान पाता? परमेश्वर को यहोवा कहा जाना चाहिए, और यहोवा कहे जाने वाले परमेश्वर के अलावा, किसी अन्य नाम से पुकारा जाने वाला कोई अन्य व्यक्ति परमेश्वर नहीं है। या फिर परमेश्वर केवल यीशु हो सकता है, और यीशु के नाम के अलावा उसे किसी अन्य नाम से नहीं बुलाया जा सकता; यीशु के अलावा, यहोवा परमेश्वर नहीं है, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर भी परमेश्वर नहीं है। मनुष्य मानता है कि यह सत्य है कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, किंतु परमेश्वर तो परमेश्वर है जो मनुष्य के साथ है, और उसे यीशु कहा जाना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर मनुष्य के साथ है। ऐसा करना सिद्धांत के अनुरूप होना है, और परमेश्वर को एक दायरे में सीमित करना है। इसलिए, हर युग में परमेश्वर जो कार्य करता है, उसे जिस नाम से बुलाया जाता है, और जिस छवि को वह अपनाता है—और हर चरण में आज तक जो भी कार्य वह करता है—वे किसी एक विनियम का पालन नहीं करते, और किसी भी तरह की बाध्यता के अधीन नहीं हैं। वह यहोवा है, किंतु वह यीशु भी है, और साथ ही मसीहा भी, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर भी। उसके नाम में अनुरूपी परिवर्तनों के साथ उसका कार्य क्रमिक रूपांतरण से गुज़र सकता है। कोई अकेला नाम पूरी तरह से उसका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, किंतु वे सभी नाम जिनसे उसे बुलाया जाता है, उसका प्रतिनिधित्व करने में सक्षम हैं, और जो कार्य वह हर युग में करता है, वह उसके स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)' से उद्धृत

यदि मनुष्य हमेशा मुझे यीशु मसीह कहकर सम्बोधित करता है, किन्तु यह नहीं जानता है कि मैंने इन अंतिम दिनों के दौरान एक नए युग की शुरुआत कर दी है और एक नया कार्य प्रारम्भ कर दिया है, और यदि मनुष्य हमेशा सनकियों की तरह उद्धारकर्त्ता यीशु के आगमन का इन्तज़ार करता रहता है, तो मैं कहूँगा कि ऐसे लोग उनके समान हैं जो मुझ पर विश्वास नहीं करते हैं। वे ऐसे लोग हैं जो मुझे नहीं जानते हैं, और मुझ पर उनका विश्वास एक ढकोसला है। क्या ऐसे लोग उद्धारकर्त्ता यीशु के स्वर्ग से आगमन का दर्शन कर सकते हैं? वे मेरे आगमन का इन्तज़ार नहीं करते हैं, बल्कि वे यहूदियों के राजा के आगमन का इन्तज़ार करते हैं। वे मेरे द्वारा इस पुराने अशुद्ध संसार के सम्पूर्ण विनाश की लालसा नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाए यीशु के द्वितीय आगमन की लालसा करते हैं, जिसके पश्चात उन्हें छुटकारा दिया जाएगा; वे यीशु की प्रतीक्षा करते हैं कि वह एक बार फिर से पूरी मानवजाति को इस अशुद्ध और अधर्मी भूमि से छुटकारा दिलाए। ऐसे लोग उनके समान कैसे बन सकते हैं जो अंत के दिनों के दौरान मेरे कार्य को पूरा करते हैं? मनुष्य की कामनाएँ मेरी इच्छाओं को प्राप्त करने या मेरे कार्य को पूरा करने में अक्षम हैं, क्योंकि मनुष्य मात्र उस कार्य की प्रशंसा करता है और उस कार्य से प्यार करता है जिसे मैंने पहले किया है, उसे कोई अंदाजा नहीं है कि मैं परमेश्वर स्वयं हूँ जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता है। मनुष्य केवल इतना जानता है कि मैं यहोवा, और यीशु हूँ, उसको कोई आभास नहीं है कि मैं ही अंतिम, वह परमेश्वर हूँ जो मानवजाति को समाप्त करेगा। वह सब जिसके लिए मनुष्य तरसता है और जिसे जानता है वह उसकी स्वयं की धारणा है, जिसे मात्र वह अपनी आँखों से देख सकता है। यह उस कार्य के अनुसार नहीं है जो मैं करता हूँ, मेरे कार्य के संग इसका सामंजस्य नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "उद्धारकर्त्ता पहले ही एक 'सफेद बादल' पर सवार होकर वापस आ चुका है" से उद्धृत

क्या यीशु का नाम—"परमेश्वर हमारे साथ"—परमेश्वर के स्वभाव को उसकी समग्रता से व्यक्त करता है? क्या यह पूरी तरह से परमेश्वर को स्पष्ट कर सकता है? यदि मनुष्य कहता है कि परमेश्वर को केवल यीशु कहा जा सकता है, और उसका कोई अन्य नाम नहीं हो सकता क्योंकि परमेश्वर अपना स्वभाव नहीं बदल सकता, तो ऐसे वचन वास्तव में ईशनिंदा हैं! क्या तुम मानते हो कि यीशु, हमारे साथ परमेश्वर, का नाम अकेले परमेश्वर का उसकी समग्रता में प्रतिनिधित्व कर सकता है? परमेश्वर को कई नामों से बुलाया जा सकता है, किंतु इन नामों में से एक भी ऐसा नहीं है, जो परमेश्वर का सब-कुछ समाहित कर सकता हो, एक भी ऐसा नहीं है जो परमेश्वर का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व कर सकता हो। और इसलिए, परमेश्वर के कई नाम हैं, किंतु ये कई नाम परमेश्वर के स्वभाव को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं कर सकते, क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव इतना समृद्ध है कि वह बस मनुष्य के जानने की सीमा से बढ़कर है। मनुष्य की भाषा का उपयोग करके परमेश्वर को पूरी तरह से समाहित करने का मनुष्य के पास कोई तरीका नहीं है। मनुष्य परमेश्वर के स्वभाव के बारे में जो कुछ जानता है, उस सबको समाहित करने के लिए उसके पास सीमित शब्दावली है : महान, आदरणीय, अद्भुत, अथाह, सर्वोच्च, पवित्र, धार्मिक, बुद्धिमान इत्यादि। इतने-से शब्द! इतनी सीमित शब्दावली उस थोड़े-से का भी वर्णन करने में असमर्थ है, जो मनुष्य ने परमेश्वर के स्वभाव के बारे में देखा है। समय के साथ कई अन्य लोगों ने ऐसे शब्दों को जोड़ा, जिनके बारे में उन्हें लगता था कि वे उनके हृदय के उत्साह का बेहतर ढंग से वर्णन करने में समर्थ हैं : परमेश्वर इतना महान है! परमेश्वर इतना पवित्र है! परमेश्वर इतना प्यारा है! आज, मनुष्य की ऐसी उक्तियाँ अपने चरम पर पहुँच गई हैं, फिर भी मनुष्य अभी भी स्वयं को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने में असमर्थ है। और इसलिए, मनुष्य के लिए परमेश्वर के कई नाम हैं, मगर उसका कोई एक नाम नहीं है, और ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर का अस्तित्व इतना प्रचुर है, और मनुष्य की भाषा इतनी दरिद्र है। किसी एक विशेष शब्द या नाम में परमेश्वर का उसकी समग्रता में प्रतिनिधित्व करने की क्षमता नहीं है, तो क्या तुमको लगता है कि उसका नाम नियत किया जा सकता है? परमेश्वर इतना महान और इतना पवित्र है, फिर भी तुम उसे हर नए युग में अपना नाम नहीं बदलने दोगे? इसलिए, हर युग में, जिसमें परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है, वह उस कार्य को समाहित करने के लिए, जिसे करने का वह इरादा रखता है, एक ऐसे नाम का उपयोग करता है, जो उस युग के अनुकूल होता है। वह अस्थायी महत्व वाले इस विशेष नाम का उपयोग उस युग के अपने स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने के लिए करता है। यह परमेश्वर अपने स्वभाव को व्यक्त करने के लिए मनुष्य की भाषा का उपयोग करता है। फिर भी बहुत-से लोग, जिन्हें आध्यात्मिक अनुभव हो चुके हैं और जिन्होंने परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से देखा है, अभी भी महसूस करते हैं कि यह एक विशेष नाम परमेश्वर का उसकी समग्रता में प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है—आह, इसमें कुछ नहीं किया जा सकता—इसलिए मनुष्य अब परमेश्वर को किसी नाम से नहीं बुलाता, बल्कि उसे केवल "परमेश्वर" कहता है। यह ऐसा है, मानो मनुष्य का हृदय प्रेम से भरा हो, लेकिन वह विरोधाभासों से भी घिरा हो, क्योंकि मनुष्य नहीं जानता कि परमेश्वर की व्याख्या कैसे की जाए। परमेश्वर जो है, वह इतना प्रचुर है कि उसके वर्णन का कोई तरीका है ही नहीं। ऐसा कोई अकेला नाम नहीं है, जो परमेश्वर के स्वभाव का ख़ुलासा कर सकता हो, और ऐसा कोई अकेला नाम नहीं है, जो परमेश्वर के स्वरूप का वर्णन कर सकता हो। यदि कोई मुझसे पूछे, "तुम ठीक-ठीक किस नाम का उपयोग करते हो?" तो मैं उनसे कहूँगा, "परमेश्वर तो परमेश्वर है!" क्या यह परमेश्वर के लिए सर्वोत्तम नाम नहीं है? क्या यह परमेश्वर के स्वभाव का सर्वोत्तम संपुटीकरण नहीं है? ऐसा होने पर, क्यों तुम लोग परमेश्वर के नाम की तलाश में इतना प्रयास लगाते हो? क्यों तुम्हें बिना खाए और सोए, सिर्फ एक नाम के वास्ते अपना दिमाग़ चलाना चाहिए? एक दिन आएगा, जब परमेश्वर यहोवा, यीशु या मसीहा नहीं कहलाएगा—वह केवल सृष्टिकर्ता होगा। उस समय वे सभी नाम, जो उसने पृथ्वी पर धारण किए हैं, समाप्त हो जाएँगे, क्योंकि पृथ्वी पर उसका कार्य समाप्त हो गया होगा, जिसके बाद उसका कोई नाम नहीं होगा। जब सभी चीजें सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन आती हैं, तो उसे किसी अत्यधिक उपयुक्त फिर भी अपूर्ण नाम की क्या आवश्यकता है? क्या तुम अभी भी परमेश्वर के नाम की तलाश कर रहे हो? क्या तुम अभी भी कहने का साहस करते हो कि परमेश्वर को केवल यहोवा ही कहा जा सकता है? क्या तुम अभी भी कहने का साहस करते हो कि परमेश्वर को केवल यीशु कहा जा सकता है? क्या तुम परमेश्वर के विरुद्ध ईशनिंदा का पाप सहन करने में समर्थ हो? तुम्हें पता होना चाहिए कि मूल रूप से परमेश्वर का कोई नाम नहीं था। उसने केवल एक या दो या कई नाम धारण किए, क्योंकि उसके पास करने के लिए कार्य था और उसे मानवजाति का प्रबंधन करना था। चाहे उसे किसी भी नाम से बुलाया जाए—क्या उसने स्वयं उसे स्वतंत्र रूप से नहीं चुना? क्या इसे तय करने के लिए उसे तुम्हारी—एक प्राणी की—आवश्यकता होगी? जिस नाम से परमेश्वर को बुलाया जाता है, वह ऐसा नाम होता है, जिसके अनुसार मनुष्य मानवजाति की भाषा के साथ उसे समझने में समर्थ होता है, किंतु यह नाम कुछ ऐसा नहीं है, जिसे मनुष्य समेट सकता हो। तुम केवल इतना ही कह सकते हो कि स्वर्ग में एक परमेश्वर है, कि वह परमेश्वर कहलाता है, कि वह महान सामर्थ्य वाला स्वयं परमेश्वर है, जो इतना बुद्धिमान, इतना उच्च, इतना अद्भुत, इतना रहस्यमय, इतना सर्वशक्तिमान है, और फिर तुम इससे अधिक कुछ नहीं कह सकते; तुम बस इतना जरा-सा ही जान सकते हो। ऐसा होने पर, क्या मात्र यीशु का नाम ही स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है? जब अंत के दिन आते हैं, भले ही यह अभी भी परमेश्वर ही है जो अपना कार्य करता है, फिर भी उसके नाम को बदलना ही है, क्योंकि यह एक भिन्न युग है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)' से उद्धृत

यदि मनुष्य अब भी अंत के दिनों के दौरान उद्धारकर्त्ता यीशु के आगमन की अभिलाषा करता है, और अब भी उससे अपेक्षा करता है कि वह उसी प्रतिरूप में आए जो उसने यहूदिया में धारण किया था, तो छः हज़ार सालों की सम्पूर्ण प्रबन्धन योजना छुटकारे के युग में रुक जाएगी, और थोड़ी सी भी प्रगति करने में अक्षम होगी। इसके अतिरिक्त, अंत के दिन का आगमन कभी नहीं होगा, और युग का समापन कभी नहीं होगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि उद्धारकर्त्ता यीशु सिर्फ मानवजाति के छुटकारे और उद्धार के लिए है। मैंने अनुग्रह के युग के सभी पापियों के लिए यीशु का नाम अपनाया था, और यह वह नाम नहीं है जिसके द्वारा मैं पूरी मानवजाति को समाप्त करूँगा। यद्यपि यहोवा, यीशु, और मसीहा सभी मेरे पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं, किंतु ये नाम मेरी प्रबन्धन योजना में केवल विभिन्न युगों के द्योतक हैं, और मेरी सम्पूर्णता में मेरा प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। ऐसे नाम जिनके द्वारा पृथ्वी के लोग मुझे पुकारते हैं, मेरे सम्पूर्ण स्वभाव को और वह सब कुछ जो मैं हूँ उसे स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं कर सकते हैं। वे मात्र अलग-अलग नाम हैं जिनके द्वारा विभिन्न युगों के दौरान मुझे पुकारा जाता है। और इसलिए, जब अंतिम युग—अंत के दिनों के युग—का आगमन होगा, तो मेरा नाम पुनः बदल जाएगा। मुझे यहोवा, या यीशु नहीं कहा जाएगा, मसीहा तो कदापि नहीं, बल्कि मुझे सामर्थ्यवान स्वयं सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाएगा, और इस नाम के तहत ही मैं समस्त युग को समाप्त करूँगा। एक समय मुझे यहोवा के नाम से जाना जाता था। मुझे मसीहा भी कहा जाता था, और लोगों ने कभी मुझे उद्धारकर्त्ता यीशु कहा था क्योंकि वे मुझ से प्रेम करते थे और मेरा आदर करते थे। किन्तु आज मैं वह यहोवा या यीशु नहीं हूँ जिसे लोग बीते समयों में जानते थे—मैं वह परमेश्वर हूँ जो अंत के दिनों में वापस आ गया है, वह परमेश्वर जो युग को समाप्त करेगा। वह परमेश्वर मैं स्वयं हूँ जो अपने स्वभाव की परिपूर्णता के साथ, और अधिकार, आदर एवं महिमा से भरपूर होकर पृथ्वी के छोरों से उदय होता है। लोग कभी भी मेरे साथ संलग्न नहीं हुए हैं, मुझे कभी जाना नहीं है, और मेरे स्वभाव से हमेशा अनभिज्ञ रहे हैं। संसार की रचना के समय से लेकर आज तक, एक मनुष्य ने भी मुझे नहीं देखा है। यह वही परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान मनुष्यों पर प्रकट होता है किन्तु वह मनुष्य के बीच में छुपा हुआ है। वह, सामर्थ्य से भरपूर और अधिकार से लबालब भरा हुआ, धधकते हुए सूरज और दहकती हुई आग के समान, सच्चे और वास्तविक रूप में, मनुष्यों के बीच निवास करता है। कोई ऐसा मनुष्य या चीज़ नहीं है जिसका न्याय मेरे वचनों के द्वारा नहीं किया जाएगा, और कोई ऐसा मनुष्य या चीज़ नहीं है जिसे आग की जलती हुई लपटों के माध्यम से शुद्ध नहीं किया जाएगा। अंततः, मेरे वचनों के कारण सारे राष्ट्र धन्य हो जाएँगे, और मेरे वचनों के कारण टुकड़े-टुकड़े भी कर दिए जाएँगे। इस तरह, अंत के दिनों के दौरान सभी लोग देखेंगे कि मैं ही वह उद्धारकर्त्ता हूँ जो वापस लौट आया है, मैं ही वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ जो समस्त मानवजाति को जीतता है, और मैं ही एक समय मनुष्य के लिए पाप बलि था, किन्तु अंत के दिनों में मैं सूरज की ज्वाला भी बन जाता हूँ जो सभी चीज़ों को जला देती है, और साथ ही मैं धार्मिकता का सूर्य भी बन जाता हूँ जो सभी चीज़ों को प्रकट कर देता है। अंत के दिनों का मेरा कार्य ऐसा ही है। मैंने इस नाम को अपनाया है और मैं इस स्वभाव से सम्पन्न हूँ ताकि सभी लोग देख सकें कि मैं धर्मी परमेश्वर हूँ, धधकता हुआ सूरज हूँ, और दहकती हुई आग हूँ। ऐसा इसलिए है ताकि सभी मेरी, एकमात्र सच्चे परमेश्वर की, आराधना कर सकें, और ताकि वे मेरे असली चेहरे को देख सकें: मैं न केवल इस्राएलियों का परमेश्वर हूँ, और न मात्र छुटकारा दिलाने वाला हूँ—मैं समस्त आकाश, पृथ्वी और महासागरों के सारे प्राणियों का परमेश्वर हूँ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "उद्धारकर्त्ता पहले ही एक 'सफेद बादल' पर सवार होकर वापस आ चुका है" से उद्धृत

पिछला: 9. इस्राएलियों ने पीढ़ी दर पीढ़ी यहोवा पर विश्‍वास किया है, और प्रभु यीशु पर विश्‍वास करने वाले लोग पूरी दुनिया में पाए जा सकते हैं। चूँकि यहोवा, प्रभु यीशु, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक ही परमेश्वर हैं, आप यह क्यों कहते हैं कि चाहे लोग यहोवा या यीशु पर विश्वास करें, यदि वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंतिम दिनों के न्याय के कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं, तो उन्हें हटा दिया जाएगा?

अगला: 2. आप गवाही देते हैं कि अंतिम दिनों का लौटा हुआ परमेश्वर सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहलाता है। हमारा मानना है कि "सर्वशक्तिमान परमेश्वर" नाम परमेश्वर की सर्वव्यापकता को दर्शाता है और यह परमेश्वर का कोई नया नाम नहीं है। आप क्यों कहते हैं कि "सर्वशक्तिमान परमेश्वर" परमेश्वर का नया नाम है?

दुनिया आपदा से घिर गई है। यह हमें क्या चेतावनी देती है? आपदाओं के बीच हम परमेश्वर द्वारा कैसे सुरक्षित किये जा सकते हैं? इसके बारे में ज़्यादा जानने के लिए हमारे साथ हमारी ऑनलाइन मीटिंग में जुड़ें।
WhatsApp पर हमसे संपर्क करें
Messenger पर हमसे संपर्क करें

संबंधित सामग्री

2. परमेश्वर केवल उस कलीसिया को आशीष क्यों देता है जो उसके कार्य को स्वीकार कर उसका अनुपालन करती है? वह धार्मिक संगठनों को क्यों शाप देता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:पवित्र आत्मा के कार्य की स्पष्टतम अभिव्यक्ति यहीं और अभी को सम्मिलित करने में है, और अतीत से चिपके रहने में नहीं...

1. न्याय क्या है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:न्याय का कार्य परमेश्वर का अपना कार्य है, इसलिए स्वाभाविक रूप से इसे परमेश्वर द्वारा ही किया जाना चाहिए; उसकी जगह...

2. धार्मिक दुनिया ने क्यों हमेशा मसीह को नकारा तथा अस्वीकार किया है और उसकी निंदा की है, जिससे उसे परमेश्वर के शापों का सामना करना पड़ा है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:"एक और दृष्‍टान्त सुनो: एक गृहस्वामी था, जिसने दाख की बारी लगाई, उसके चारों ओर बाड़ा बाँधा, उसमें रस का कुंड खोदा...

प्रश्न 41: हमने चीनी कम्युनिस्ट सरकार और धार्मिक दुनिया के कई भाषण ऑनलाइन देखे हैं जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की बदनामी और झूठी निंदा करते हैं, उन पर आक्षेप और कलंक लगाते हैं (जैसे कि झाओयुआन, शेडोंग प्रांत की "28 मई" वाली घटना)। हम यह भी जानते हैं कि सीसीपी लोगों से झूठ और गलत बातें कहने में, और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर लोगों को धोखा देने में माहिर है, साथ ही साथ उन देशों का जिनके यह विरोध में है, उनका अपमान करने, उन पर हमला करने और उन की आलोचना करने में भी माहिर है, इसलिए सीसीपी के कहे गए किसी भी शब्द पर बिल्कुल विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों के द्वारा कही गई कई बातें सीसीपी के शब्दों से मेल खाती हैं, तो फिर हमें सीसीपी और धार्मिक दुनिया से आने वाले निन्दापूर्ण, अपमानजनक शब्दों को कैसे परखना चाहिए?

उत्तर:शैतान की बुरी ताकतें परमेश्वर के कार्य की आलोचना करते हुए इस बुरी तरह से परमेश्वर के कार्य पर हमला क्यों करती हैं? क्यों बड़े लाल अजगर...

वचन देह में प्रकट होता है अंत के दिनों के मसीह के कथन (संकलन) अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश अंत के दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें