2. प्रभु की वापसी के बारे में, बाइबल स्पष्ट रूप से कहती है, “उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता, न स्वर्ग के दूत और न पुत्र, परन्तु केवल पिता” (मत्ती 24:36)। कोई नहीं जानता कि प्रभु कब आएगा, फिर भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया इस बात की गवाही दे रही है कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है। आप यह कैसे जानते हैं?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“आधी रात को धूम मची : ‘देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो’” (मत्ती 25:6)।
“देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ” (प्रकाशितवाक्य 3:20)।
“मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं; मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं” (यूहन्ना 10:27)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
चूँकि हम परमेश्वर के पदचिह्नों की खोज कर रहे हैं, इसलिए हमारा दायित्व बनता है कि हम परमेश्वर के इरादों, उसके वचनों और कथनों की खोज करें। ऐसा इसलिए क्योंकि जहाँ कहीं भी परमेश्वर द्वारा बोले गए नए वचन हैं, वहाँ परमेश्वर की वाणी है और जहाँ कहीं भी परमेश्वर के पदचिह्न हैं, वहाँ परमेश्वर के कर्म हैं; जहाँ कहीं भी परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वहाँ परमेश्वर प्रकट होता है, और जहाँ कहीं भी परमेश्वर प्रकट होता है, वहाँ सत्य, मार्ग और जीवन विद्यमान होता है। परमेश्वर के कदमों की तलाश में तुम लोगों ने इन वचनों की अनदेखी कर दी है कि “परमेश्वर सत्य, मार्ग और जीवन है।” और इसलिए, बहुत-से लोग सत्य को प्राप्त करके भी यह नहीं मानते कि उन्हें परमेश्वर के पदचिह्न मिल गए हैं और वे परमेश्वर के प्रकटन को तो बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते। कितनी गंभीर ग़लती है! परमेश्वर का प्रकटन मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हो सकता और परमेश्वर उस तरह तो और भी प्रकट नहीं हो सकता जैसा इंसान उससे माँग करता है। परमेश्वर जब अपना कार्य करता है, तो वह अपनी पसंद और अपनी योजनाएँ बनाता है; इसके अलावा, उसके अपने उद्देश्य और अपने तरीके हैं। वह जो भी कार्य करता है, उसके बारे में उसे मनुष्य से चर्चा करने या उसकी सलाह लेने की आवश्यकता नहीं है, और अपने कार्य के बारे में हर-एक व्यक्ति को सूचित करने की आवश्यकता तो उसे बिल्कुल भी नहीं है। यह परमेश्वर का स्वभाव है, और हर व्यक्ति को इसे पहचानना चाहिए। यदि तुम लोग परमेश्वर के प्रकटन को देखने और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करने की इच्छा रखते हो, तो तुम लोगों को पहले अपनी धारणाओं से दूरी बना लेनी चाहिए। तुम लोगों को यह माँग नहीं करनी चाहिए कि परमेश्वर ऐसा करे या वैसा करे, तुम्हें उसे अपनी सीमाओं और अपनी धारणाओं तक सीमित तो बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, तुम लोगों को खुद से यह पूछना चाहिए कि तुम्हें परमेश्वर के कदमों की तलाश कैसे करनी चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के प्रकटन को कैसे स्वीकार करना चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर के नए कार्य के प्रति कैसे समर्पण करना चाहिए : मनुष्य को ऐसा ही करना चाहिए। चूँकि मनुष्य सत्य नहीं है, और उसके पास भी सत्य नहीं है, इसलिए उसे खोजना, स्वीकार करना और समर्पण करना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 1 : परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है
आज परमेश्वर ने नया कार्य किया है। हो सकता है, तुम इन वचनों को स्वीकार न कर पाओ और ये तुम्हें असामान्य लगें, पर मैं तुम्हें सलाह दूँगा कि तुम फिलहाल अपनी स्वाभाविकता प्रकट मत करो, क्योंकि जो लोग परमेश्वर के समक्ष धार्मिकता के लिए सचमुच भूख-प्यास रखते हैं केवल वे ही सत्य को प्राप्त कर सकते हैं, और जो सचमुच धर्मनिष्ठ हैं केवल वे ही परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध किए जा सकते हैं और उसका मार्गदर्शन पा सकते हैं। नतीजे संयम और शांति के साथ सत्य खोजने से मिलते हैं, झगड़े और विवाद से नहीं। जब मैं यह कहता हूँ कि “आज परमेश्वर ने नया कार्य किया है” तो मैं परमेश्वर के देह में लौटने की बात कर रहा हूँ। शायद ये वचन तुम्हें व्याकुल न करते हों; शायद तुम इनसे घृणा करते हो; या शायद ये तुम्हारे लिए बड़े रुचिकर हों। चाहे जो भी मामला हो, मुझे आशा है कि वे सब, जो परमेश्वर के प्रकट होने के लिए वास्तव में लालायित हैं, इस तथ्य का सामना कर सकते हैं और इसके बारे में झटपट निष्कर्षों पर पहुँचने के बजाय इसकी सावधानीपूर्वक जाँच कर सकते हैं; जैसा कि बुद्धिमान व्यक्ति को करना चाहिए।
ऐसी चीज़ की जाँच-पड़ताल करना कठिन नहीं है, परंतु इसके लिए जरूरी है कि हममें से प्रत्येक व्यक्ति पहले इस सत्य को जान ले : जो देहधारी परमेश्वर है उसके पास परमेश्वर का सार होगा और जो देहधारी परमेश्वर है उसके पास परमेश्वर की अभिव्यक्ति होगी। चूँकि परमेश्वर देहधारण करता है, इसलिए वह उस कार्य को सामने लाएगा जो वह करना चाहता है और चूँकि परमेश्वर देहधारण करता है, इसलिए वह उस चीज को अभिव्यक्त करेगा जो वह स्वयं है और मनुष्य के लिए सत्य को लाने, उसे जीवन प्रदान करने और उसे मार्ग दिखाने में सक्षम होगा। जिस देह में परमेश्वर का सार नहीं है, वह निश्चित रूप से देहधारी परमेश्वर नहीं है; इसमें कोई संदेह नहीं। अगर मनुष्य यह पता करना चाहता है कि क्या यह परमेश्वर की देहधारी देह है तो इसकी पुष्टि उसे उसके द्वारा अभिव्यक्त स्वभाव और उसके द्वारा बोले गए वचनों से करनी चाहिए। अर्थात क्या यह परमेश्वर की देहधारी देह है कि नहीं और यह सही मार्ग है कि नहीं, यह पुष्टि करने के लिए व्यक्ति को उसके सार के आधार पर यह अंतर करना चाहिए। अतः यह देहधारी परमेश्वर की देह है कि नहीं, यह निर्धारित करने की कुंजी उसके बाहरी स्वरूप के बजाय उसके सार (यानी उसके कार्य, उसके कथनों, उसके स्वभाव और बहुत से अन्य पहलुओं) में निहित है। यदि मनुष्य केवल उसके बाहरी स्वरूप की ही जाँच करता है, और परिणामस्वरूप उसके सार की अनदेखी करता है, तो इससे उसके अनाड़ी और अज्ञानी होने का पता चलता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना
परमेश्वर मौन है और हमारे सामने कभी प्रकट नहीं हुआ है, फिर भी उसका कार्य कभी नहीं रुका है। वह पूरी पृथ्वी की पड़ताल करता है, सारी चीजों को आदेश देता है और मनुष्य के सभी शब्दों, कर्मों और गतिविधियों को देखता है। वह अपना प्रबंधन एक योजना के साथ और चरणबद्ध ढंग से, चुपचाप और स्वर्गों और पृथ्वी को हिलाए बिना संचालित करता है, फिर भी उसके कदम एक-एक करके हमेशा मनुष्यों के निकट बढ़ते जाते हैं और उसका न्याय का आसन बिजली की रफ्तार से ब्रह्मांड में फैलता है, जिसके बाद हमारे बीच उसके सिंहासन का तुरंत अवरोहण होता है। वह कैसा प्रतापी दृश्य है, कितनी गौरवशाली और गंभीर झाँकी! एक कपोत के समान और एक गरजते हुए सिंह के समान, आत्मा हम जनसाधारण के बीच आ जाता है। वह बुद्धि है, वह धार्मिकता और प्रताप है और वह अधिकार से संपन्न होकर और प्रेमपूर्ण दयालुता और दया से भरे होकर चुपके से हमारे बीच आता है। उसके आगमन के बारे में कोई नहीं जानता है, उसके आगमन का स्वागत कोई नहीं करता है और इससे भी बढ़कर कोई भी वह सब नहीं जानता कि जो वह करने वाला है। मनुष्य का जीवन पहले जैसा चलता रहता है, उसका हृदय भी वैसा ही रहता है और दिन पहले जैसे बीतते जाते हैं। परमेश्वर हमारे बीच एक साधारण मनुष्य के रूप में रहता है, सबसे मामूली अनुयायियों में से एक और एक साधारण विश्वासी के रूप में रहता है। उसके अपने अनुसरण हैं, अपने लक्ष्य हैं और इससे भी बढ़कर उसमें ऐसी दिव्यता है जो साधारण मनुष्यों में नहीं होती है। किसी ने भी उसकी दिव्यता के अस्तित्व पर गौर नहीं किया है और किसी ने भी उसके सार और मनुष्य के सार के बीच का अंतर नहीं देखा है। हम उसके साथ बाधित और भयभीत हुए बिना मिलकर रहते हैं, क्योंकि हमारी दृष्टि में वह एक मामूली विश्वासी से अधिक कुछ नहीं है। वह हमारी हर गतिविधि देखता है और हमारे सभी विचार और दृष्टिकोण उसके सामने बेपर्दा कर दिए जाते हैं। कोई भी उसके अस्तित्व में रुचि नहीं लेता, वह जो प्रकार्य करता है उसके बारे में कोई भी कुछ कल्पना नहीं करता है और इससे भी बढ़कर उसकी पहचान के बारे में किसी को रत्ती भर भी संदेह नहीं होता है। हम बस अपने अनुसरणों में लगे रहते हैं, मानो उसका हमसे कुछ लेना-देना न हो ...
संयोगवश, पवित्र आत्मा उसके “माध्यम से” वचनों का एक अंश व्यक्त करता है, और भले ही यह बहुत अनपेक्षित महसूस होता हो, फिर भी हम इसे परमेश्वर से आने वाला कथन समझते हैं, और परमेश्वर की ओर से आया मानकर तुरंत उसे स्वीकार कर लेते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि चाहे इन वचनों को कोई भी व्यक्त करता हो, यदि ये पवित्र आत्मा से आते हैं, तो हमें उन्हें स्वीकार करना चाहिए, नकारना नहीं चाहिए। अगला कथन मेरे माध्यम से आ सकता है, या तुम्हारे माध्यम से, या किसी अन्य के माध्यम से। वह कोई भी हो, सब परमेश्वर का अनुग्रह है। परंतु यह व्यक्ति चाहे जो भी हो, हमें इसकी आराधना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि चाहे कुछ भी हो, यह संभवतः परमेश्वर नहीं हो सकता; न ही हम किसी भी तरह से ऐसे किसी साधारण व्यक्ति को अपने परमेश्वर के रूप में चुन सकते हैं। हमारा परमेश्वर बहुत महान और सम्माननीय है; ऐसा कोई मामूली व्यक्ति उसकी जगह कैसे ले सकता है? और तो और, हम सब परमेश्वर के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं, ताकि वह आकर हमें वापस स्वर्ग के राज्य में ले जाए, इसलिए कोई इतना मामूली व्यक्ति कैसे इतना महत्वपूर्ण और कठिन कार्य करने में सक्षम हो सकता है? यदि प्रभु दोबारा आता है, तो उसे सफेद बादल पर आना चाहिए, ताकि सभी लोग उसे देख सकें। वह कितना महिमामय होगा! यह कैसे संभव है कि वह चुपके से साधारण मनुष्यों के एक समूह में छिप जाए?
और फिर भी लोगों के बीच छिपा हुआ यही वह साधारण मनुष्य है जो हमें बचाने का नया काम कर रहा है। वह हमें कोई सफाई नहीं देता, न ही वह हमें यह बताता है कि वह क्यों आया है, बल्कि जो करने का उसका इरादा होता है उस काम को अपनी योजना और प्रक्रिया के अनुसार करता है। उसके वचनों और कथनों की बारम्बारता और भी ज्यादा बढ़ जाती है। सांत्वना देने, प्रोत्साहन देने, याद दिलाने और चेतावनी देने से लेकर फटकारने और अनुशासित करने तक; दयालु और नरम स्वर से लेकर प्रचंड और प्रतापी वचनों तक—यह सब मनुष्य को महान दया और घोर भय का अनुभव करवाता है। जो कुछ भी वह कहता है वह हमारे अंदर गहरे छिपे रहस्यों पर सीधे चोट करता है; उसके वचन हमारे हृदयों में डंक मारते हैं, हमारी आत्माओं में डंक मारते हैं और हमें असहनीय शर्मिंदगी से भर देते हैं, हम समझ ही नहीं पाते कि खुद को कहाँ छिपाएँ। हमें इसे लेकर संदेह होने लगता है कि इस व्यक्ति के हृदय का परमेश्वर हमसे वास्तव में प्रेम करता भी है या नहीं, और वास्तव में उसका इरादा क्या है। शायद ये पीड़ाएँ सहने के बाद ही हमें उठा लिया जा सकता हो? अपने मस्तिष्क में हम गणना कर रहे हैं ... आने वाली मंजिल के बारे में और अपनी भावी नियति के बारे में। फिर भी, पहले की तरह, हममें से कोई विश्वास नहीं करता कि हमारे बीच कार्य करने के लिए परमेश्वर पहले ही देहधारण कर चुका है। भले ही वह इतने लंबे समय तक हमारे साथ रहा हो, भले ही वह हमसे आमने-सामने पहले ही इतने सारे वचन बोल चुका हो, फिर भी हम इतने साधारण व्यक्ति को अपने भविष्य का परमेश्वर स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं, और इस मामूली व्यक्ति को अपने भविष्य और नियति का नियंत्रण सौंपने को तो हम बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं। उससे हम जीवित जल की अंतहीन आपूर्ति का आनंद लेते हैं, और उसके माध्यम से हम एक इंसान का जीवन जीते हैं और परमेश्वर हमारे आमने-सामने रहता है। फिर भी हम केवल स्वर्ग में मौजूद प्रभु यीशु के अनुग्रह के लिए धन्यवाद देते हैं, और हमने कभी इस साधारण व्यक्ति की भावनाओं पर ध्यान नहीं दिया, जो दिव्यता से युक्त है। फिर भी वह पहले की तरह विनम्रता से देह में छिपे रहकर अपना कार्य करता है, अपने हृदय की वाणी को अभिव्यक्ति देता है, मानो वह इंसान की अस्वीकृति से बेख़बर हो, मानो वह इंसान की अपरिपक्वता और अज्ञानता को हमेशा के लिए क्षमा कर रहा हो, और अपने प्रति इंसान के अपमानजनक रवैये के प्रति हमेशा के लिए सहिष्णु हो।
हमारे बिना जाने ही, यह मामूली व्यक्ति हमें एक के बाद एक परमेश्वर के कार्य के एक चरण से दूसरे चरण में ले गया है। हम अनगिनत परीक्षणों और अनगिनत ताड़नाओं से गुजरते हैं और मृत्यु द्वारा परखे जाते हैं। हम परमेश्वर के धार्मिक और प्रतापी स्वभाव के बारे में सीखते हैं, उसकी प्रेमपूर्ण दयालुता और दया का आनंद भी लेते हैं; परमेश्वर के महान सामर्थ्य और बुद्धि की समझ हासिल करते हैं, परमेश्वर की मनोहरता को निहारते हैं और मनुष्य को बचाने के परमेश्वर के उत्कट इरादे को देखते हैं। इस साधारण मनुष्य के शब्दों में हम परमेश्वर के स्वभाव और सार को जान जाते हैं; परमेश्वर के इरादे समझ जाते हैं, मनुष्य का प्रकृति सार जान जाते हैं और हम उद्धार और पूर्णता का मार्ग देख लेते हैं। उसके वचन हमारी “मृत्यु” का कारण बनते हैं और वे हमारे “पुनर्जन्म” का कारण भी बनते हैं; उसके वचन हमें दिलासा देते हैं, लेकिन हमें ग्लानि और ऋणी होने की भावना से भी भर देते हैं; उसके वचन हमें आनंद और शांति देते हैं, परंतु अपार पीड़ा भी देते हैं। कभी-कभी हम उसके हाथों में मेमनों के समान होते हैं, जिनका जैसा वह चाहे वैसा वध किया जाना है; कभी-कभी हम उसकी आँख के तारे के समान होते हैं और उसके कोमल प्रेम का आनंद उठाते हैं; कभी-कभी हम उसके शत्रु के समान होते हैं और उसकी निगाह में उसके कोप द्वारा भस्म कर दिए जाते हैं। हम उसके द्वारा बचाई गई मानवजाति हैं, हम उसकी दृष्टि में भुनगे हैं, और हम वे खोई हुए भेड़ें हैं, जिन्हें ढूँढ़ने में वह दिन-रात अड़ा रहता है। वह हमारे प्रति दयावान है, वह हमसे घिनाता है, वह हमें ऊपर उठाता है, वह हमें दिलासा और नसीहत देता है, वह हमारा मार्गदर्शन करता है, वह हमें प्रबुद्ध करता है, वह हमें ताड़ना देता है और अनुशासित करता है, यहाँ तक कि वह हमें शाप भी देता है। रात-दिन वह कभी हमारी चिंता करना बंद नहीं करता, हमारी सुरक्षा और परवाह करना बंद नहीं करता है, कभी हमारा साथ नहीं छोड़ता है। वह हमारे लिए अपने हृदय का रक्त उँडेल देता है और सारी कीमत चुकाता है। इस मामूली और साधारण-सी देह के वचनों में हमने परमेश्वर की संपूर्णता का आनंद लिया है और उस मंजिल को देखा है, जो परमेश्वर ने हमें प्रदान की है। इसके बावजूद, थोथा घमंड अभी भी हमारे हृदय को परेशान करता है, और हम अभी भी ऐसे किसी व्यक्ति को अपने परमेश्वर के रूप में स्वीकार करने के लिए सक्रिय रूप से तैयार नहीं हैं। यद्यपि उसने हमें बहुत अधिक मन्ना, बहुत अधिक आनंद दिया है, किंतु इनमें से कुछ भी हमारे हृदय में प्रभु का स्थान नहीं ले सकता। हम इस व्यक्ति की विशिष्ट पहचान और हैसियत को बड़ी अनिच्छा से ही स्वीकार करते हैं। जब तक वह हमसे यह स्वीकार करने के लिए कहने हेतु अपना मुँह नहीं खोलता कि वह परमेश्वर है, तब तक हम स्वयं उसे शीघ्र आने वाले परमेश्वर के रूप में कभी स्वीकार नहीं करेंगे, जबकि वह हमारे बीच बहुत लंबे समय से काम करता आ रहा है।
विभिन्न तरीकों और बहुत से परिप्रेक्ष्यों के उपयोग द्वारा हमें इस बारे में सचेत करते हुए कि हमें क्या करना चाहिए, और साथ ही अपने हृदय की वाणी व्यक्त करते हुए परमेश्वर अपने कथन जारी रखता है। उसके वचनों में जीवन-सामर्थ्य है, वे हमें वह मार्ग देते हैं जिस पर हमें चलना चाहिए और हमें यह अच्छी तरह से समझने में सक्षम बनाते हैं कि सत्य वास्तव में क्या है। हम उसके वचनों से आकर्षित होने लगते हैं, हम उसके बोलने के लहजे और तरीके पर ध्यान देने लगते हैं, और हम इस आसानी से न दिखने वाले व्यक्ति के हृदय की वाणी पर अवचेतन रूप से ध्यान देने लगते हैं। वह हमारे लिए पूरे दिल से अपने दिमाग को मथ डालता है, हमारे लिए नींद और भूख त्याग देता है, हमारे लिए रोता है, हमारे लिए आहें भरता है, हमारे लिए बीमारी में कराहता है; वह हमारे गंतव्य और उद्धार के लिए अपमान सहता है; और हमारी संवेदनहीनता और विद्रोहशीलता के कारण उसका हृदय खून और आँसू बहाता है। ऐसा अस्तित्व और चीजें किसी साधारण व्यक्ति में नहीं हो सकती हैं, न ही ये किसी भ्रष्ट मनुष्य में हो सकती हैं या वह उन्हें हासिल कर सकता है। उसमें ऐसी सहनशीलता और धैर्य है जो किसी साधारण मनुष्य में नहीं होता है और उसके जैसा प्रेम भी किसी सृजित प्राणी में नहीं होता है। उसके अलावा कोई भी हमारे समस्त विचारों को नहीं जान सकता, या हमारी प्रकृति और सार को अपनी हथेली के पीछे की तरह भली-भाँति नहीं जान सकता, या मानवजाति की विद्रोहशीलता और भ्रष्टता का न्याय नहीं कर सकता, या इस तरह से स्वर्ग के परमेश्वर की ओर से हमसे बातचीत या हम पर कार्य नहीं कर सकता। उसके अलावा किसी में परमेश्वर का अधिकार, बुद्धि और गरिमा नहीं है; उसमें परमेश्वर का स्वभाव और परमेश्वर का अस्तित्व और चीजें अपनी संपूर्णता में प्रकट होती हैं। उसके अलावा कोई हमें मार्ग नहीं दिखा सकता या हमारे लिए प्रकाश नहीं ला सकता। उसके अलावा कोई भी उन रहस्यों को प्रकट नहीं कर सकता, जिन्हें परमेश्वर ने सृष्टि के आरंभ से अब तक प्रकट नहीं किया है। उसके अलावा कोई हमें शैतान के बंधन और हमारे भ्रष्ट स्वभावों से नहीं बचा सकता। वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है; वह संपूर्ण मानवजाति के प्रति परमेश्वर के हृदय की वाणी, परमेश्वर के प्रोत्साहनों और परमेश्वर के न्याय के वचनों को व्यक्त करता है। उसने एक नया युग, एक नया काल आरंभ किया है, और वह एक नए स्वर्ग और पृथ्वी और नए कार्य में ले गया है, वह हमारे लिए आशा लेकर आया है और उसने उस जीवन पर विराम लगा दिया है जो हम अस्पष्ट स्थिति में बिता रहे थे, और उसने हमारे संपूर्ण अस्तित्व को उद्धार के मार्ग को पूरी स्पष्टता से देखने में सक्षम बनाया है। उसने हमारे संपूर्ण अस्तित्व को जीत लिया है और हमारे हृदय को प्राप्त कर लिया है। उस क्षण से हमारे दिल जागरूक हो गए हैं, और हमारी आत्माएँ पुनर्जीवित हो गई लगती हैं : क्या यह साधारण, मामूली व्यक्ति, जो हमारे बीच रहता है और जिसे हम इतने लंबे समय से ठुकराते आए हैं—प्रभु यीशु नहीं है; जो सोते-जागते हमेशा हमारे विचारों में रहता है और जिसके लिए हम रात-दिन लालायित रहते हैं? यह वही है! यह वास्तव में वही है! यह हमारा परमेश्वर है! यह सत्य, मार्ग और जीवन है! उसने हमें फिर से जीने और रोशनी देखने लायक बनाया है और हमारे हृदयों को भटकने से रोका है। हम परमेश्वर के घर लौट आए हैं, हम उसके सिंहासन के सामने लौट आए हैं, हम उसके आमने-सामने हैं, हमने उसका मुखमंडल देखा है और हमने आगे का मार्ग देखा है। इस समय हमारे हृदय परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से जीत लिए गए हैं; अब हमें संदेह नहीं है कि वह कौन है, अब हम उसके कार्य और वचन का विरोध नहीं करते, और अब हम उसके सामने पूरी तरह से दंडवत हैं। हम अपने शेष जीवन में परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण करने, और उसके द्वारा पूर्ण किए जाने, और उसके अनुग्रह का बदला चुकाने, और हमारे प्रति उसके प्रेम का प्रतिदान करने, और उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं का पालन करने, और उसके कार्य में सहयोग करने, और उसके द्वारा सौंपे जाने वाला हर कार्य पूरा करने के लिए सब-कुछ करने से अधिक कुछ नहीं चाहते।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 4 : परमेश्वर के प्रकटन को उसके न्याय और ताड़ना में देखना