55. बंधन की बेड़ियों से मुक्ति

झोऊ यूआन, चीन

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "अब वह समय आ गया है जब मैं प्रत्येक व्यक्ति के अंत को निर्धारित करता हूँ, यह वो चरण नहीं जिसमें मैंने मनुष्यों को आकार देना आरंभ किया था। मैं अपनी अभिलेख पुस्तक में एक-एक करके, प्रत्येक व्यक्ति के कार्यों और कथनों को, और साथ ही उस मार्ग को जिस पर चलकर उन्होंने मेरा अनुसरण किया है, उनके अंतर्निहित अभिलक्षणों को और उन लोगों ने कैसा आचरण किया है, इन सबको लिखता हूँ। इस तरह, किसी भी प्रकार का मनुष्य मेरे हाथ से नहीं बचेगा, और सभी लोग अपने जैसे लोगों के साथ होंगे, जैसा कि मैं उन्हें नियत करूँगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो')। "प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम का निर्धारण उसके आचरण से पैदा होने वाले सार के अनुसार होता है और इसका निर्धारण सदैव उचित तरीक़े से होता है। कोई भी दूसरे के पापों को नहीं ढो सकता; यहाँ तक कि कोई भी दूसरे के बदले दंड नहीं पा सकता। यह सुनिश्चित है। माता-पिता द्वारा अपनी संतान की बहुत ज़्यादा देखभाल का अर्थ यह नहीं कि वे अपनी संतान के बदले धार्मिकता के कर्म कर सकते हैं, न ही किसी बच्चे के माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ स्नेह का यह अर्थ है कि वे अपने माता-पिता के लिए धार्मिकता के कर्म कर सकते हैं। यही इन वचनों का वास्तविक अर्थ है, 'उस समय दो जन खेत में होंगे; एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा। दो स्त्रियाँ चक्‍की पीसती रहेंगी; एक ले ली जाएगी और दूसरी छोड़ दी जाएगी।' लोग बुरा करने वाले बच्चों के प्रति गहरे प्रेम के आधार पर उन्हें विश्राम में नहीं ले जा सकते, न ही कोई अपनी पत्नी (या पति) को अपने धार्मिक आचरण के आधार पर विश्राम में ले जा सकता है। यह एक प्रशासनिक नियम है; किसी के लिए कोई अपवाद नहीं हो सकता। अंत में, धार्मिकता करने वाले धार्मिकता ही करते हैं और बुरा करने वाले, बुरा ही करते हैं। अंतत: धार्मिकों को बचने की अनुमति मिलेगी, जबकि बुरा करने वाले नष्ट हो जाएंगे। पवित्र, पवित्र हैं; वे गंदे नहीं हैं। गंदे, गंदे हैं और उनमें पवित्रता का एक भी अंश नहीं है। जो लोग नष्ट किए जाएँगे, वे सभी दुष्ट हैं और जो बचेंगे वे सभी धार्मिक हैं—भले ही बुरा कार्य करने वालों की संतानें धार्मिक कर्म करें और भले ही किसी धार्मिक व्यक्ति के माता-पिता दुष्टता के कर्म करें। एक विश्वास करने वाले पति और विश्वास न करने वाली पत्नी के बीच कोई संबंध नहीं होता और विश्वास करने वाले बच्चों और विश्वास न करने वाले माता-पिता के बीच कोई संबंध नहीं होता; ये दोनों तरह के लोग पूरी तरह असंगत हैं। विश्राम में प्रवेश से पहले एक व्यक्ति के रक्त-संबंधी होते हैं, किंतु एक बार जब उसने विश्राम में प्रवेश कर लिया, तो उसके कोई रक्त-संबंधी नहीं होंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे')। परमेश्‍वर के वचन हमें बताते हैं कि अंत के दिनों में उनका काम लोगों को उनकी किस्म के मुताबिक छांटना है। परमेश्वर हर व्यक्ति के परिणाम और गंतव्य को उसके व्यवहार, प्रकृति और सार के आधार पर तय करते हैं। इसे कोई नहीं बदल सकता, और यह परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव से तय होता है। परमेश्‍वर चाहते हैं कि हम उनके वचनों और सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप लोगों से व्यवहार करें। हम भावनाओं के आधार पर किसी की तरफदारी या उसे बचाने की कोशिश नहीं कर सकते हैं, अपने प्रियजनों की भी नहीं। यह सत्य के उलट और परमेश्वर के स्वभाव का अपमान होगा।

तीन साल पहले, एक दिन सभा खत्म होते समय, एक अगुआ ने मुझसे कहा : "तुम्हारे पिता हमेशा भाई-बहनों में झगड़े पैदा करते रहते हैं और कलीसिया की दुनिया में रुकावट डालते हैं। हमने उनके साथ संगति की, इसका विश्लेषण किया और चेतावनी दी, लेकिन उन्हें ज़रा-भी पछतावा नहीं है। भाई-बहनों ने बताया कि उन्होंने दूसरी जगहों पर भी अपने कर्तव्यों में ऐसा ही किया है। हम उनकी करतूतों के सबूत इकट्ठा कर रहे हैं।" ये सुनकर मेरा दिल धक से रह गया। मैंने सोचा "क्या वाकई स्थिति इतनी बुरी है?" पर फिर मैंने उन सभाओं के बारे में विचार किया जिनमें मैं अपने पिता के साथ शामिल हुई थी, वे कलीसियाई जीवन में बाधा डालते थे और सत्य स्वीकार नहीं करते थे। सभाओं में वे परमेश्वर के वचनों पर संगति नहीं करते थे, बल्कि हमेशा सत्य से अलग बातें करते थे, लोगों को उकसाते थे ताकि वो परमेश्वर के वचनों के बारे में शांति से न सोच सकें। मैंने उन्हें इसके बारे में बताया था पर उन्होंने नहीं सुना। मुझे चुप कराने के लिए उनके पास हज़ार बहाने थे। मैंने कलीसिया के अगुआ को इस बारे में बताया, उन्होंने मेरे पिता के साथ संगति की, उनकी बहुत बार मदद की, और उनके व्यवहार के सार और परिणामों के बारे में बताया। पर मेरे पिता नहीं माने। उन्होंने बहाने बनाना और बहस करना जारी रखा। उन्हें ज़रा-भी अफ़सोस नहीं था। भाई-बहनों की शिकायत के बाद से ये स्थिति और भी बदतर हो चुकी होगी। मुझे याद है कलीसिया में कुछ लोग थे जिन्हें दुष्ट मानकर निकाल दिया गया था क्योंकि वे लोग सत्य का अभ्यास तो करते नहीं थे, ऊपर से कलीसिया के जीवन में हमेशा रुकावट डालते थे और अफ़सोस भी नहीं जताते थे। अगर मेरे पिता वैसे ही हैं, तो क्या उन्हें नहीं निकाला जाएगा? अगर ऐसा हुआ, क्या तो उनकी आस्था के मार्ग का अंत नहीं हो जाएगा। फिर क्या उनके पास उद्धार का कोई मौका रह जाएगा? इसके बारे में सोचते हुए मेरी घबराहट बढ़ गई, और दिल डूबने लगा।

उस रात मैं करवटें बदलती रही और सो न सकी। दूसरों ने मेरे पिता के बारे में जो कहा, बस उसी के बारे में सोचती रही। मैं जानती थी कि वे कलीसिया के जीवन को बाधित होने से बचाना चाहते थे, उन्होंने ऐसा भाई-बहनों के जीवन में प्रवेश के बारे में विचारशीलता के कारण किया, और यह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप भी था। मैं अपने पिता के व्यवहार के बारे में जानती थी और सोच रही थी क्या मुझे अगुआ को इस बारे में बता देना चाहिए। मैंने सोचा मेरे पिता बचपन में मुझे कितना प्यार करते थे। जब मैं अपने भाई से झगड़ती, तो वो मुझे बचाते थे भले ही झगड़ा मैंने शुरू किया हो; सर्दियों में जब स्कूल में मेरे पास गर्म बिस्तर नहीं था, तो वो 60 मील तक बाइक चला कर मुझे रजाई देने आये थे। मेरी माँ अपने काम के चलते अक्सर घर से दूर रहती थी, तो मेरे पिता ही मेरा खाना पकाते और मेरा ख्याल रखते। मैं यही सब सोचती रही और अपने आंसूओं को रोक न पायी। मैंने सोचा, "मेरे पिता ने मुझे बड़ा किया। अगर मैं उनकी पोल खोलूंगी और उन्हें पता चलेगा, तो क्या वो नहीं कहेंगे कि मेरे अंदर ज़मीर नहीं है, मैं पत्थर दिल हूँ? उसके बाद मैं उनका कैसे सामना करूंगी?" मैंने बेमन से अपने पिता के व्यवहार के बारे में लिखना शुरू किया, पर ज्यादा न लिख सकी। मैं सोच रही थी, "अगर मैंने उनके बारे में सब लिख दिया और उन्हें निकाल दिया गया तो क्या होगा? छोड़ो। मुझे ये सब नहीं लिखना चाहिए।" मैं सब भूल कर चैन से सोना चाहती थी, पर सो न सकी। मैं बेचैन थी और खुद को दोषी मानती रही। हाल में उनका व्यवहार वाकई बहुत अच्छा नहीं था, और मैं उनकी अतीत की हरकतों के बारे में भी थोड़ा-बहुत जानती थी। अगर मैं इसे अपने तक रखूँ, तो क्या यह सत्य को छुपाना नहीं होगा? मेरे अंदर कश्मकश चल रही थी। मुझे प्रार्थना के लिए परमेश्वर के पास जाना ही था। मैंने प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, मैं अपने पिता के कुछ पापों के बारे में जानती हूँ, और जानती हूँ कि मुझे कलीसिया के काम को कायम रखने के लिए, जो कुछ मुझे पता है वो बता देना चाहिए, पर ऐसा करने पर उन्हें निकाल दिया जाएगा। परमेश्वर, मुझे रास्ता दिखाएँ, ताकि मैं सत्य का अभ्यास कर सकूं, ईमानदार इंसान बन सकूं, और कलीसिया के कार्य को बनाए रख सकूं।" इस प्रार्थना के बाद मुझे थोड़ी शांति मिली। इसके बाद मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "तुम सभी कहते हो कि तुम परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील हो और कलीसिया की गवाही की रक्षा करोगे, लेकिन वास्तव में तुम में से कौन परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील रहा है? अपने आप से पूछो : क्या तुम उसके बोझ के प्रति विचारशील रहे हो? क्या तुम उसके लिए धार्मिकता का अभ्यास कर सकते हो? क्या तुम मेरे लिए खड़े होकर बोल सकते हो? क्या तुम दृढ़ता से सत्य का अभ्यास कर सकते हो? क्या तुम में शैतान के सभी दुष्कर्मों के विरूद्ध लड़ने का साहस है? क्या तुम अपनी भावनाओं को किनारे रखकर मेरे सत्य की खातिर शैतान का पर्दाफ़ाश कर सकोगे? क्या तुम मेरी इच्छा को स्वयं में पूरा होने दोगे? सबसे महत्वपूर्ण क्षणों में क्या तुमने अपने दिल को समर्पित किया है? क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो मेरी इच्छा पर चलता है? स्वयं से ये सवाल पूछो और अक्सर इनके बारे में सोचो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 13')। "सभी लोगभावनाओं में जीते हैं—और इसलिए परमेश्वर उनमें से किसी एक को भी बख़्शता नहीं है, और संपूर्ण मानवजाति के हृदयों में छिपे रहस्यों को उजागर करता है। लोगों के लिए स्वयं को भावनाओं से पृथक करना इतना कठिन क्यों है? क्या ऐसा करना अंतरात्मा के मानकों के परे जाना है? क्या अंतरात्मा परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर सकती है? क्या भावना विपत्ति में लोगों की सहायता कर सकती है? परमेश्वर की नज़रों में, भावना उसका शत्रु है—क्या यह परमेश्वर के वचनों में स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 28')। परमेश्वर के वचनों में किए गए इन प्रश्नों का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं अच्छी तरह जानती थी कि मेरे पिता सत्य का अनुसरण नहीं करते थे, और सभाओं में और दूसरों द्वारा परमेश्वर के वचनों के खाने-पीने में रुकावट डालते थे। उन्होंने किसी की संगति नहीं सुनी, सबके प्रति पूर्वाग्रही थे, पीठ पीछे लोगों की आलोचना करते और कलह फैलाते थे। लेकिन भावनाओं के वशीभूत हो, मैंने इस पर ध्यान ही नहीं दिया कि मेरे भाई-बहनों के जीवन में प्रवेश में कैसे रुकावट डाली जा रही थी। मैं उन्हें बचाने के लिए अगुआ को आगे बढ़कर सच नहीं बताना चाहती थी। मैं सत्य को अभ्यास में नहीं ला रही थी और परमेश्वर की इच्छा का पालन नहीं कर रही थी। मैंने उन दो पापियों के बारे में सोचा, जिन्हें कलीसिया ने निकाल दिया था। उन्हें सत्य का अभ्यास न करने और कलीसिया के जीवन में रुकावट डालते देख कर मुझे गुस्सा आता था, और मैंने उनका ईमानदारी और कठोरता से खुलासा किया था। पर अपने पिता के बारे में सच क्यों नहीं लिख पा रही थी? मुझे समझ आ गया कि मैं ईमानदार नहीं हूँ, मेरे अंदर इंसाफ की भावना नहीं है। मैं ऐसे नाज़ुक मोड़ पर सत्य का अभ्यास या कलीसिया के कार्य की मर्यादा कायम नहीं रख पा रही थी। बल्कि मैं जज़्बात में बहकर अपने पिता को बचा रही थी, उनके पापों को छुपा रही थी और सत्य के सिद्धांतों के खिलाफ़ जा रही थी। ऐसा करना क्या शैतान का साथ देना और परमेश्वर का दुश्मन होना नहीं है? इसका एहसास होने पर, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और माफी मांगी। "मैं अब भावनाओं के आधार पर काम नहीं करना चाहती। मैं अपने पिता के बारे में सच बताना चाहती हूँ।"

प्रार्थना के बाद, मैंने उनके कुछ बुरे कर्मों के बारे में सोचा और एक-एक करके उन्हें लिखा। सुसमाचार उपयाजक के तौर पर काम करते हुए, वो अपने सहकर्मी, भाई झांग के प्रति पूर्वाग्रही हो गए। उन्होंने दूसरे भाई-बहनों के सामने उनकी आलोचना की और उनसे भेदभाव किया, जिससे भाई झांग तनाव और मायूसी की हालत में चले गए। अगुआ ने मेरे पिता की काँट-छाँट की और उनका निपटारा किया, लेकिन उन्होंने नहीं सुनी। जब भाई-बहनों ने उनकी समस्याएँ गिनाईं, तो उन्होंने उनमें से एक को भी स्वीकार नहीं किया। वो हमेशा दूसरों की कमियों पर ध्यान देते और उनकी कमजोरियों का दोहन करते थे और कहते थे, "मैं इतने सालों से विश्वासी रहा हूँ। मैं यह सब समझता हूँ!" जब वे मुझे अपने काम में मन लगाते देखते, तो मुझे पैसे और दूसरी सांसारिक चीज़ें हासिल करने के लिए मजबूर करते, और कर्तव्य के प्रति मेरे उत्साह को कम करने के लिए हमेशा उल्टी बातें कहते। एक बार वो कार दुर्घटना के शिकार हो गए, तो कलीसिया से भाई लिन उनकी खोज-खबर लेने और सत्य पर संगति करने गए, और कहा कि उन्हें सोचना चाहिए और सबक सीखना चाहिए, लेकिन उन्हें कुछ नहीं सुनना था। उन्होंने तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा, और अफवाह फैलाई कि भाई लिन उन्हें चिढ़ाने आए थे। इससे कुछ भाई-बहन भाई लिन के खिलाफ हो गए। जिससे मुझे बहुत धक्का लगा और गुस्सा आया। मैंने सोचा, "क्या ये सच में मेरे पिता हैं? क्या वो एक पापी इंसान नहीं हैं?" मैं हमेशा यही सोचती रही कि अपनी आस्था के इतने बरसों में वो अपना कर्तव्य निभाते और सुसमाचार फैलाते रहे हैं, वे तकलीफ सह सकते और मूल्य चुका सकते हैं। उन्हें सच्चा विश्वासी जानकर, जैसा वो दिखते थे, उन्हें वैसा ही मानती थी। मैंने कभी उनके व्यवहार को समझने की कोशिश नहीं की। मैं कितनी बेवकूफ़ और अंधी थी। मुझे खुद से घृणा होती है कि मैं भावनाओं की गुलाम बनकर, उन्हें आदर-प्यार देती रही और बचाती रही। तब मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : "जो लोग कलीसिया के भीतर विषैली, दुर्भावनापूर्ण बातों का गुबार निकालते हैं, भाइयों और बहनों के बीच अफवाहें व अशांति फैलाते हैं और गुटबाजी करते हैं, तो ऐसे सभी लोगों को कलीसिया से निकाल दिया जाना चाहिए था। अब चूँकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न युग है, इसलिए ऐसे लोग नियंत्रित हैं, क्योंकि उन पर बाहर निकाले जाने का खतरा मंडरा रहा है। शैतान द्वारा भ्रष्ट ऐसे सभी लोगों के स्वभाव भ्रष्ट हैं। कुछ के स्वभाव पूरी तरह से भ्रष्ट हैं, जबकि अन्य लोग इनसे भिन्न हैं : न केवल उनके स्वभाव शैतानी हैं, बल्कि उनकी प्रकृति भी बेहद विद्वेषपूर्ण है। उनके शब्द और कृत्य न केवल उनके भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव को प्रकट करते हैं, बल्कि ये लोग असली पैशाचिक शैतान हैं। उनके आचरण से परमेश्वर के कार्य में बाधा पहुंचती है; उनके सभी कृत्य भाई-बहनों को अपने जीवन में प्रवेश करने में व्यवधान उपस्थित करते हैं और कलीसिया के सामान्य कार्यकलापों को क्षति पहुंचाते हैं। आज नहीं तो कल, भेड़ की खाल में छिपे इन भेड़ियों का सफाया किया जाना चाहिए, और शैतान के इन अनुचरों के प्रति एक सख्त और अस्वीकृति का रवैया अपनाया जाना चाहिए। केवल ऐसा करना ही परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना है; और जो ऐसा करने में विफल हैं वे शैतान के साथ कीचड़ में लोट रहे हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी')। जब मैंने परमेश्वर के वचनों से अपने पिता के बर्ताव की तुलना की, तो मैंने जाना कि वे बस एक भ्रष्ट स्वभाव नहीं दिखा रहे थे, बल्कि एक दुष्ट प्रकृति का प्रदर्शन कर रहे थे। बाहर से वे जोशीले दिखते थे और अपने कामकाज में कष्ट उठा सकते थे, और वे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के उत्पीड़न का सामना करते हुए सुसमचार का प्रचार करना जारी रख सकते थे, लेकिन वो सत्य स्वीकार नहीं कर सकते थे। उन्हें तो सत्य से नफरत थी। उनकी हरकतों ने उनकी कपटी, दुष्ट प्रकृति का खुलासा कर दिया। सार में वो शैतान को मानने वाले पापी थे, उन्हें तो निकाल दिया जाना चाहिए। भले ही मैं उनकी बेटी हूँ, लेकिन मैं अपनी भावनाओं के अनुसार कार्य नहीं कर सकती। मुझे अपनी आस्था में परमेश्वर का साथ देना है और शैतान को बेनकाब और उसका त्याग करना है। मैंने समूह के उन भाई-बहनों के बारे में सोचा जिनकी प्रभारी मैं थी और जिन्हें मेरे पिता के बारे में कुछ पता नहीं था। मुझे उनके साथ संगति करनी थी और अपने पिता की दुष्टता का खुलासा करना था ताकि वो उन्हें और बेवकूफ न बना सकें। पर फिर मैंने सोचा : "कुछ लोगों को तो आस्था में उन्होंने ही शामिल किया था, जिनसे उनके अच्छे संबंध भी थे। अगर मैं उनके सामने अपने पिता का खुलासा करती हूँ, तो क्या वो लोग ये नहीं कहेंगे कि मेरे अंदर ज़मीर नहीं है, मैं पत्थर दिल हूँ? अगर उन्हें निकाल दिया गया और उन्होंने उद्धार पाने का मौका खो दिया, तो वो उनके लिए कितना दर्दनाक होगा।" यह सोच कर मुझे दुख हुआ और संगति करने की मेरी इच्छा जाती रही। मैं बिस्तर पर रात भर सोचती रही, कि अगर मैंने अपने पिता की करतूतों का खुलासा नहीं किया और भाई-बहन यूँ ही धोखे में आकर उनका पक्ष लेते रहे, तो वो भी पाप के भागी कहलाएंगे। अगर उन्हें गुमराह होते देखकर भी मैं उनसे संगति न करूँ, तो क्या मैं उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा रही हूँ? ये सोच कर मुझे अफसोस हुआ और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की : "हे परमेश्वर, मैं बहुत परेशान हूँ। मुझे विश्वास और शक्ति दें, मुझे सत्य का अभ्यास करने और इस दुष्ट इंसान का खुलासा करने का रास्ता दिखाएं।"

प्रार्थना के बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों के इस अंश को पढ़ा : "परमेश्वर के वचनों में, लोगों को एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए इसके संबंध में कौन से सिद्धांत का उल्लेख किया गया है? उससे प्रेम करो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, और उससे नफ़रत करो जिससे परमेश्वर नफ़रत करता है। अर्थात्, परमेश्वर जिन्हें प्यार करता है, लोग जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित करते हैं, ये वही लोग हैं जिनसे तुम्हें प्रेम करना चाहिए। जो लोग परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित नहीं करते हैं, परमेश्वर से घृणा करते हैं, उसकी अवज्ञा करते हैं, और जिनसे वो नफरत करता है, ये ही वे लोग हैं जिन्हें हमें भी तिरस्कृत और अस्वीकार करना चाहिए। यही है वह जो परमेश्वर के वचन द्वारा अपेक्षित है। यदि तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, तो वे उससे नफ़रत करते हैं; और अगर वे उससे नफरत करते हैं, तो परमेश्वर निश्चित रूप से उनसे घृणा करता है। इसलिए, यदि तुम्हें अपने माता-पिता से नफ़रत करने के लिए कहा जाए, तो क्या तुम ऐसा कर सकोगे? यदि वे परमेश्वर का विरोध करते और उसे बुरा-भला कहते हैं, तो वे निश्चित रूप से ऐसे लोग हैं जिनसे वह घृणा करता है और शाप देता है। इन परिस्थितियों में, तुम्हें अपने माता-पिता के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, यदि वे परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास में बाधा डालते हैं, या बाधा नहीं डालते? अनुग्रह के युग के दौरान, प्रभु यीशु ने कहा, 'कौन है मेरी माता? और कौन हैं मेरे भाई? ... क्योंकि जो कोई मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई, और मेरी बहिन, और मेरी माता है।' यह कहावत अनुग्रह के युग में पहले से मौजूद थी, और अब परमेश्वर के वचन और भी अधिक उपयुक्त हैं : 'उससे प्रेम करो, जिससे परमेश्वर प्रेम करता है और उससे घृणा करो, जिससे परमेश्वर घृणा करता है।' ये वचन बिलकुल सीधे हैं, फिर भी लोग अकसर इनका वास्तविक अर्थ नहीं समझ पाते। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर द्वारा शापित है, लेकिन बाहर से देखने पर वह काफी अच्छा लगता है, या वह तुम्हारी माता या पिता या कोई संबंधी है, तो संभवत: तुम उस व्यक्ति से घृणा न कर पाओ, और संभवत: तुम दोनों में बड़ी घनिष्ठता और नज़दीकी संबंध भी हो। जब तुम परमेश्वर से ऐसे वचन सुनते हो, तो बेचैन हो जाते हो और उस व्यक्ति के प्रति अपना दिल कठोर नहीं कर पाते या उसका त्याग नहीं कर पाते। ऐसा इसलिए है, क्योंकि एक पारंपरिक धारणा है, जो तुम्हें बाँधती है। तुम सोचते हो कि यदि तुम ऐसा करोगे, तो स्वर्ग के कोप के भागीदार होगे, स्वर्ग द्वारा दंडित किए जाओगे, यहाँ तक कि समाज द्वारा त्याग दिए जाओगे, और जनमत द्वारा ख़ारिज कर दिए जाओगे। इतना ही नहीं, एक इससे भी अधिक व्यावहारिक समस्या यह होगी कि यह तुम्हारे अंत:करण पर बोझ बन जाएगा। यह अंत:करण तुम्हारे माता-पिता द्वारा तुम्हें बचपन से सिखाई गई बातों से बनता है, या फिर सामाजिक संस्कृति के प्रभाव या संक्रमण से, जिनमें से कोई भी तुम्हारे भीतर सोच के ऐसे तरीके की जड़ रोप देता है, कि तुम परमेश्वर के वचन का अभ्यास नहीं कर पाते और उससे प्यार नहीं कर पाते, जिससे वह प्यार करता है और उससे घृणा नहीं कर पाते, जिससे वह घृणा करता है। हालाँकि अंदर से तुम जानते हो कि तुम्हें उनसे घृणा करनी चाहिए और उन्हें नामंज़ूर कर देना चाहिए, क्योंकि जीवन तुम्हें परमेश्वर से मिला है, तुम्हारे माता-पिता ने नहीं दिया। इंसान को परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और स्वयं को उसे लौटा देना चाहिए। हालाँकि तुम दोनों ऐसा कहते और सोचते हो, लेकिन तुम बस अपना मन बदलकर इसे अभ्यास में नहीं ला सकते। क्या तुम लोग जानते हो कि यहाँ क्या चल रहा है? ऐसा है कि इन चीज़ों ने तुम्हें कसकर और पूरी तरह से बाँध रखा है। शैतान इन चीज़ों का इस्तेमाल तुम्हारे विचारों, तुम्हारे दिमाग और तुम्हारे दिल को बाँधने के लिए करता है, ताकि तुम परमेश्वर के वचनों को स्वीकार न कर सको। ऐसी चीज़ों ने तुम्हें पूरी तरह से भर दिया है, इस बिंदु तक कि तुम्हारे भीतर परमेश्वर के वचनों के लिए कोई स्थान नहीं है। इतना ही नहीं, यदि तुम उसके वचनों का अभ्यास करने का प्रयास करते हो, तो ये चीज़ें तुम्हें भीतर से प्रभावित करती हैं और तुम्हें उसके वचनों और अपेक्षाओं के साथ संघर्षरत कर देती हैं, और तुम्हें इन ग्रंथियों से खुद को छुड़ाने और इस बंधन से आज़ाद होने में अक्षम बना देती हैं। यह निराशाजनक होगा और संघर्ष करने की ताक़त के बिना, तुम कुछ समय बाद हार मान लोगे" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो')। तब मैं समझ गई, जब हम दूसरों से व्यवहार करते हैं तो परमेश्वर चाहते हैं कि वो जिसे प्रेम करते हैं उसे हम भी प्रेम करें और जिससे वे नफ़रत करते हैं उससे हम भी नफ़रत करें। जो लोग परमेश्वर की इच्छानुसार काम करते और सत्य से प्रेम करते हैं, उनसे हमें प्रेम करना चाहिए, जबकि वे दुष्ट जो सत्य से नफ़रत करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं उनसे हमें नफ़रत करनी चाहिए। केवल यही अभ्यास परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। लेकिन अपने पिता के मामले में मैं हमेशा दिल से सोचती थी। मैं उन्हें बचाती और उनके दोषों पर पर्दा डालती थी। मैंने परमेश्वर की पसंद-नापसंद के अनुसार काम नहीं किया। ऐसा इसलिए था क्योंकि "पानी की तुलना में खून अधिक गाढ़ा होता है" और "मनुष्य निर्जीव नहीं है; वह भावनाओं से मुक्त कैसे हो सकता है?" जैसी इन पुरानी शैतानी धारणाओं ने मेरे दिल को जकड़ रखा था। मैं पाप-पुण्य में भेद नहीं कर पा रही थी, सोचती थी कि अपने पिता की दुष्टता का खुलासा करना अपमानजनक और शर्मनाक होगा। मुझे डर था कि लोग मेरी आलोचना करेंगे और मुझे बुरा-भला कहेंगे। तो खून के रिश्ते को बचाने के लिए मैंने सत्य की मर्यादा नहीं रखी और एक पापी का खुलासा नहीं किया, परमेश्वर के घर के कार्य और भाई-बहनों के जीवन प्रवेश के प्रति लापरवाही बरती। ये बेहद शर्मनाक और मानवीयता से रहित था। मैंने देखा कि ये पुरानी शैतानी धारणाएँ मुझे सत्य का अभ्यास करने से रोक रही हैं, और मैं न चाहते हुए भी परमेश्वर का विरोध कर रही थी और शैतान का साथ दे रही थी। सच तो ये है कि परमेश्वर ने कभी नहीं कहा कि शैतान और दुष्ट लोगों से निपटते समय हमें जमीर की सुननी चाहिए, न ही यह कहा कि शैतान को मानने वाले प्रियजनों का तिरस्कार अनैतिक है। व्यवस्था के युग में अय्यूब के अविश्वासी बच्चे आपदा में मारे गए थे, लेकिन अय्यूब ने भावुक होकर कभी अपने बच्चों की मृत्यु के कारण परमेश्वर के खिलाफ शिकायत नहीं की। बल्कि उसने परमेश्वर के नाम की प्रशंसा की। अनुग्रह के युग में, पतरस के माता-पिता उसे रोकने के लिए उसकी आस्था के रास्ते में आ गए, तो उसने परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए उन्हें, घर को और हर चीज़ दोनों को छोड़ दिया, और परमेश्वर की प्रशंसा हासिल की। अय्यूब और पतरस के अनुभवों के बारे में सोचते हुए, मैं परमेश्वर की इस बात को समझ पाई कि उससे प्रेम करो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, उससे नफ़रत करो जिससे परमेश्वर नफ़रत करता है।

तब मैंने परमेश्वर के और भी वचनों को पढ़ा : "शैतान कौन है, दुष्टात्माएँ कौन हैं और परमेश्वर के शत्रु कौन हैं, क्या ये वे नहीं, जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते और परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते? क्या ये वे लोग नहीं, जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं? क्या ये वे नहीं, जो विश्वास करने का दावा तो करते हैं, परंतु उनमें सत्य नहीं है? क्या ये वे लोग नहीं, जो सिर्फ़ आशीष पाने की फ़िराक में रहते हैं जबकि परमेश्वर के लिए गवाही देने में असमर्थ हैं? तुम अभी भी इन दुष्टात्माओं के साथ घुलते-मिलते हो और उनके प्रति साफ़ अंत:करण और प्रेम रखते हो, लेकिन क्या इस मामले में तुम शैतान के प्रति सदिच्छाओं को प्रकट नहीं कर रहे? क्या तुम दुष्टात्माओं के साथ संबद्ध नहीं हो रहे? यदि आज कल भी लोग अच्छे और बुरे में भेद नहीं कर पाते और परमेश्वर की इच्छा जानने का कोई इरादा न रखते हुए या परमेश्वर की इच्छाओं को अपनी इच्छा की तरह मानने में असमर्थ रहते हुए, आँख मूँदकर प्रेम और दया दर्शाते रहते हैं, तो उनके अंत और भी अधिक ख़राब होंगे। ... यदि तुम उनके साथ सहज हो, जिनसे मैं घृणा करता हूँ, और जिनसे मैं असहमत हूँ और तुम तब भी उनके प्रति प्रेम और निजी भावनाएँ रखते हो, तब क्या तुम अवज्ञाकारी नहीं हो? क्या तुम जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं कर रहे हो? क्या ऐसे व्यक्ति में सत्य होता है? यदि लोग शत्रुओं के प्रति साफ़ अंत:करण रखते हैं, दुष्टात्माओं से प्रेम करते हैं और शैतान पर दया दिखाते हैं, तो क्या वे जानबूझकर परमेश्वर के कार्य में रुकावट नहीं डाल रहे हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे')। इसे पढ़कर मैं बहुत व्यथित और अपराध-बोध से ग्रसित हो गई। मैं जानती थी मेरे पिता को सत्य से नफ़रत है और उन्होंने कलीसिया के जीवन में हमेशा रुकावट डाली है, उनकी प्रकृति और सार पापी हैं, पर मैंने उनके प्रति दिल से सोचना, प्रेम करना और उन्हें बचाना जारी रखा। परमेश्वर ने जब यह कहा "शैतान के प्रति सदिच्छाएँ प्रकट करना" और "दुष्टात्माओं के साथ संबद्ध होना", क्या इसका वही अर्थ नहीं है? क्या मैं बेशर्मी से परमेश्वर का विरोध करके कलीसिया के कार्य में रुकावट नहीं डाल रही थी? परमेश्वर के घर में, सत्य और धार्मिकता का राज है। दुष्ट लोगों और मसीह-विरोधियों सहित, शैतान की कोई भी दुष्ट ताकत, वहाँ नहीं रह सकती। परमेश्वर उन्हें उजागर करके खत्म कर देंगे और कलीसिया से निकाल देंगे। ये परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव से तय होता है। लेकिन मैं एक पापी व्यक्ति को बचा रही थी, उन्हें परमेश्वर के घर में रखने की कोशिश कर रही थी। क्या मैं कलीसिया के जीवन में पापी व्यक्ति की गड़बड़ी को बर्दाश्त नहीं कर रही थी? क्या मैं पापी दुश्मन की मदद और परमेश्वर का विरोध नहीं कर रही थी? इसी तरह से चलते रहने का मतलब होगा उस पापी के साथ मैं भी परमेश्वर से दण्ड पाउंगी। यह एहसास होने पर मैं डर गई। मैंने देखा परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव अपमान सहन नहीं करता और किसी पापी को निजी भावनाओं के वशीभूत होकर बचाने की कोशिश करना बहुत खतरनाक है! अब मैं दिल से न तो सोच सकती हूँ, न ही काम कर सकती हूँ। भले ही वो मेरे पिता थे, मुझे सत्य का अभ्यास करना होगा, जो परमेश्वर को पसंद है उसे पसंद करना होगा और जिससे वो नफ़रत करते हैं उससे नफ़रत करनी होगी और परमेश्वर के घर के हितों को कायम रखना होगा।

इसके बाद मैं अपने समूह के साथ एक सभा में गई और अपने पिता के व्यवहार और सभी पापों के बारे में उन्हें बता दिया। उनके द्वारा गुमराह हुए भाई-बहन अब उनके सार को समझ गए थे। बाद में कलीसिया ने मेरे पिता को निकालने का नोटिस दे दिया। फिर मैंने घर जाकर उन्हें इसे पढ़ कर सुनाया और उनके दुष्ट व्यवहार के बारे में बात की। मुझे झटका लगा जब उन्होंने तिरस्कार दिखाते हुए कहा, "मुझे कुछ समय पहले ही आभास हो गया था कि वो मुझे निकाल देंगे। मैंने परमेश्वर की कृपा पाने के लिए इतने साल विश्वास रखा, नहीं तो मैंने पहले ही विश्वास रखना छोड़ दिया होता।" ये देखकर कि उन्हें कोई पछतावा नहीं है मैं जान गई कि उनका दुष्ट सार खुल कर सामने आ गया है। मेरे पिता के निकाले जाने के बाद कलीसिया में रुकावट डालने वाला कोई पापी नहीं बचा था। सभाओं में भाई-बहन बिना किसी रुकावट के परमेश्वर के वचन पढ़ सकते थे और सत्य पर संगति कर सकते थे। वे अपना काम ठीक से कर रहे थे, और कलीसिया का जीवन फल-फूल रहा था। मैंने देखा परमेश्वर के घर में, सत्य और धार्मिकता का राज है, और जब हम परमेश्वर के वचनों के अनुसार सत्य का अभ्यास करते हैं, तो हमें उनका मार्गदर्शन और आशीर्वाद मिलता है। धीरे-धीरे मैंने अपने पिता के बारे में अपनी भावनाओं से मुक्ति पा ली और आखिरकार मैं सत्य का थोड़ा-बहुत अभ्यास कर पाई और कलीसिया के कामों में सहायता करने योग्य बन पाई। ये सब परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना से हासिल हो पाया!

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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