45. बंधन की बेड़ियों से मुक्ति

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "अब वह समय है जब मैं प्रत्येक व्यक्ति का अंत करने का निश्चय करता हूँ, उस चरण का नहीं जिस पर मैंने मनुष्यों पर कार्य आरंभ किया था। मैं अपनी अभिलेख पुस्तक में एक-एक करके, प्रत्येक व्यक्ति के कथनों और कार्यों को, और साथ ही मेरा अनुसरण करने में उनके मार्ग को, उनके अंतर्निहित अभिलक्षणों को और उनके अंतिम प्रदर्शन को लिखता हूँ। इस तरह, किसी भी प्रकार का मनुष्य मेरे हाथ से नहीं बचेगा, और सभी अपने स्वयं के प्रकार के लोगों के साथ होंगे, जैसा मैं उन्हें नियत करूँगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो')। "प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम का निर्धारण उस मूलतत्व के अनुसार होता है जो उसके आचरण से आता है और इसका निर्धारण सदैव उचित तरीके से होता है। कोई भी किसी दूसरे के पापों को नहीं ढो सकता; इससे भी अधिक, कोई भी किसी दूसरे के बदले में दण्ड प्राप्त नहीं कर सकता है। यह परम सिद्धान्त है। माता-पिता का अपनी संतान की बहुत ज़्यादा देखभाल का अर्थ यह नहीं है कि वे अपनी संतान के बदले में धार्मिकता के कर्म कर सकते हैं। न ही किसी बच्चे के अपने माता-पिता के प्रति कर्त्तव्यनिष्ठ स्नेह का यह अर्थ है कि वह अपने माता-पिता के लिए धार्मिकता के कर्म कर सकता है। यही इन वचनों का वास्तविक अर्थ है, 'उस समय दो जन खेत में होंगे, एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा। दो स्त्रियाँ चक्‍की पीसती रहेंगी, एक ले ली जाएगी और दूसरी छोड़ दी जाएगी।' कोई भी अपने बच्चों के लिए अपने गहन प्रेम के आधार पर बुरा कार्य करने वाले अपने बच्चों को विश्राम में नहीं ले जा सकता है, न कोई अपने स्वयं के धार्मिक आचरण के आधार पर अपनी पत्नी (या पति) को विश्राम में पहुँचा सकता है। यह एक प्रशासनिक नियम है; और इसमें किसी के लिए भी कोई अपवाद नहीं हो सकता है। धार्मिकता करने वाले धार्मिकता ही करेंगे और बुरा करने वाले, बुरा ही करेंगे। धार्मिकता करने वाले जीवित बच सकेंगे, और बुरा करने वाले नष्ट हो जाएँगे। जो पवित्र हैं, वे पवित्र हैं; वे अशुद्ध नहीं हैं। जो अशुद्ध हैं वे अशुद्ध हैं, और उनमें पवित्रता का एक अंश भी नहीं है। सभी दुष्ट लोग नष्ट कर दिए जाएँगे, और सभी धार्मिक लोग जीवित बचेंगे, भले ही बुरा कार्य करने वालों की संतानें धार्मिक कर्म करें और भले ही किसी धार्मिक व्यक्ति के माता-पिता दुष्टता के कर्म करें। एक विश्वास करने वाले पति और विश्वास न करने वाली पत्नी के बीच कोई संबंध नहीं है, और विश्वास करने वाले बच्चों और विश्वास न करने वाले माता-पिता के बीच कोई संबंध नहीं है। ये दोनों असंगत प्रकार हैं। विश्राम में प्रवेश से पहले, उसके रक्त-संबंधी थे, किन्तु एक बार विश्राम में प्रवेश कर लेने पर, कहने के लिए उसके कोई रक्त-संबंधी नहीं होंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे')। परमेश्‍वर के वचन हमें बताते हैं कि अंत के दिनों में उनका काम लोगों को उनकी किस्म के मुताबिक छांटना है। वह हर व्यक्ति के परिणाम और गंतव्य को उसके व्यवहार और सार के आधार पर तय करते हैं। इसे कोई नहीं बदल सकता, और यह परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव से तय होता है। परमेश्‍वर चाहते हैं कि हम लोगों से उनके वचनों और सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप व्यवहार करें। हम भावनाओं के आधार पर किसी की तरफदारी नहीं कर सकते हैं, अपने प्रियजनों की भी नहीं। यह सत्य के उलट और परमेश्वर के स्वभाव का अपमान होगा।

तीन साल पहले, सभा खत्म होते समय, एक अगुआ ने कहाः "तुम्हारे पिता ने हमेशा भाई-बहनों में झगड़े पैदा किए और कलीसिया की दुनिया में रुकावट डाली। हमने उनसे बात की, इसका विश्लेषण किया और चेतावनी दी, लेकिन वो नहीं बदले। भाई-बहनों ने बताया कि उन्होंने दूसरी जगहों पर भी ऐसा ही किया है। हम उनकी करतूतों के सबूत इकट्ठा कर रहे हैं।" ये सुनकर मेरा दिल धक से रह गया मैंने सोचा "क्या वाकई स्थिति इतनी बुरी है?" पर फिर मैंने उन सभाओं के बारे में विचार किया जिनमें मैं अपने पिता के साथ शामिल हुई थी, वे कलीसिया के जीवन के विरोधी थे और सत्य स्वीकार नहीं करते थे। सभाओं में वे परमेश्वर के वचनों पर संगति नहीं करते थे, बल्कि हमेशा सत्य से अलग बातें करते थे, लोगों को उकसाते थे ताकि वो परमेश्वर के वचनों के बारे में न सोच सकें। मैंने उन्हें बताया था पर उन्होंने नहीं सुना। मुझे चुप कराने के उनके पास हज़ार बहाने थे। मैंने कलीसिया अगुआ को इस बारे में बताया, उन्होंने मेरे पिता से बात की, उनकी बहुत बार मदद की, और उनके व्यवहार के परिणामों के बारे में बताया। पर मेरे पिता नहीं माने। उन्होंने बहाने बनाना और बहस करना जारी रखा। उन्हें जरा भी अफ़सोस नहीं था। भाई-बहनों की शिकायत के बाद से ये स्थिति और भी बदतर हो चुकी होगी। मुझे याद है कलीसिया में कुछ लोग थे जिन्हें पापी मानकर निकाल दिया गया था क्योंकि वे लोग सत्य का अभ्यास नहीं कर रहे थे, बल्कि कलीसिया के जीवन में हमेशा रुकावट डालते थे और अफ़सोस नहीं जताते थे। अगर मेरे पिता वैसे ही हैं, तो क्या उन्हें नहीं निकाला जाएगा? अगर ऐसा हुआ, क्या तो उनकी आस्था के मार्ग का अंत नहीं हो जाएगा। क्या उनके पास अभी भी उद्धार का कोई मौका है? मेरी घबराहट बढ़ गई जब मैंने ऐसा सोचा, और दिल डूबने लगा।

उस रात मैं करवटें बदलती रही और सो न सकी, बस सोचती रही जो दूसरों ने मेरे पिता के बारे में कहा था। मैं जानती थी वे कलीसिया के जीवन को बाधित होने से बचाना चाहते थे, जिसमें भाई-बहनों के जीवन में प्रवेश के बारे में विचारशीलता भी थी, और यह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप भी था। बिल्कुल ठीक। मैं अपने पिता के व्यवहार के बारे में जानती थी और सोचती थी क्या मुझे अगुआ को इस बारे में बताना चाहिए। मैंने सोचा मेरे पिता बचपन में मुझे कितना प्यार करते थे। जब मैं अपने भाई से झगड़ती, तो वो मुझे बचाते थे भले ही मैं गलत होती; सर्दियों में जब स्कूल में गर्म बिस्तर नहीं होते थे, तो वो 60 मील तक बाइक चला कर मुझे रजाई देने आते। मेरी माँ घर से दूर नौकरी करती थी, तो मेरे पिता ही मेरा खाना पकाते और मेरा ख्याल रखते। मैं यही सब सोचती रही और मेरे आंसू निकल आए। मैंने सोचा, "मेरे पिता ने मुझे बड़ा किया। अगर मैं उनकी पोल खोलूंगी और उन्हें पता चलेगा, तो क्या वो नहीं कहेंगे कि मेरे अंदर ज़मीर नहीं है, मैं पत्थर दिल हूँ? उसके बाद मैं उनका कैसे सामना करूंगी?" मैंने बेमन से अपने पिता के व्यवहार के बारे में लिखना शुरू किया, पर ज्यादा न लिख सकी। मैं सोच रही थी, "क्या हो अगर मैं उनके बारे में सब लिख दूं और उन्हें निकाल दिया जाए? छोड़ो। मुझे ये सब नहीं लिखना चाहिए।" मैं सब भूल कर चैन से सोना चाहती थी, पर सो न सकी। मैं बेचैन थी और खुद को दोषी मानती रही। हाल में उनका व्यवहार वाकई बहुत अच्छा नहीं था, और मैं उनकी अतीत की हरकतों के बारे में भी थोड़ा-बहुत जानती थी। अगर मैं इसे अपने तक रखूँ, तो क्या यह मेरा सत्य को छुपाना नहीं होगा? मुझे घुटन महसूस हो रही थी। मुझे प्रार्थना के लिए परमेश्वर के पास जाना पड़ा। मैंने प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, मैं अपने पिता के कुछ पापों के बारे में जानती हूँ, और जानती हूँ कि मुझे कलीसिया के काम को कायम रखने के लिए जो कुछ मुझे पता है वो बता देना चाहिए, पर ऐसा करने पर उन्हें निकाल दिया जाएगा। परमेश्वर, मुझे रास्ता दिखाएँ, ताकि मैं सत्य का अभ्यास कर सकूं, ईमानदार इंसान बन सकूं, और कलीसिया के कार्य कर सकूं।" इस प्रार्थना के बाद मुझे थोड़ी शांति मिली। इसके बाद मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़ेः "सभी ने कहा है कि वे परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील रहेंगे और कलीसिया की गवाही की रक्षा करेंगे। वास्तव में परमेश्वर के बोझ के प्रति कौन विचारशील रहा है? अपने आप से पूछो: क्या तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील रहा है? क्या तुम परमेश्वर के लिए धार्मिकता का अभ्यास कर सकते हो? क्या तुम मेरे लिए खड़े होकर बोल सकते हो? क्या तुम दृढ़ता से सत्य का अभ्यास कर सकते हो? क्या तुम शैतान के सभी कर्मों के विरूद्ध लड़ने के लिए पर्याप्त साहस जुटा सकते हो? क्या तुम अपनी भावनाओं को किनारे रखकर मेरे सत्य के खातिर शैतान का पर्दाफ़ाश कर सकोगे? क्या तुम मेरी इच्छा को स्वयं में पूरा होने दोगे? महत्वपूर्ण समय आने पर क्या तुमने अपने दिल को समर्पित किया है? क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो मेरी इच्छा पूरी करता है? स्वयं से पूछो और अक्सर इसके बारे में सोचो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 13')। "वे सभी भावनाओं में रहते हैं—और इसलिए परमेश्वर उनमें से एक को भी नहीं टालता है, और संपूर्ण मानवजाति के हृदयों में छिपे रहस्यों को उजागर करता है। लोगों के लिए स्वयं को भावना से पृथक करना इतना कठिन क्यों है? क्या यह अंतरात्मा के मानकों से अधिक है? क्या अंतरात्मा परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर सकती है? क्या भावना विपत्ति में लोगों की सहायता कर सकती है? परमेश्वर की नज़रों में, भावना उसका शत्रु है—क्या यह परमेश्वर के वचनों में स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 28')। परमेश्वर के वचनों में मेरे इन प्रश्नों का कोई जवाब नहीं था। मैं अच्छी तरह जानती थी कि मेरे पिता ने सत्य का रास्ता नहीं अपनाया, और सभाओं में दूसरों द्वारा परमेश्वर के वचनों के खाने-पीने में रुकावट डाली। उन्होंने किसी की संगति नहीं सुनी, सबको गलत समझा, पीठ पीछे बुराई की और कलह फैलाई। लेकिन भावनाओं के वशीभूत हो, मैं समझ नहीं पाई कि मेरे भाई-बहनों के जीवन में प्रवेश में कैसे रुकावट आ रही थी। मैं उन्हें बचाने के लिए अगुआ को आगे बढ़कर सच नहीं बताना चाहती थी। मैं सत्य को अभ्यास में नहीं ला रही थी और परमेश्वर की इच्छा का पालन नहीं कर रही थी। मैंने उन दो पापियों के बारे में सोचा, जिन्हें कलीसिया ने निकाल दिया था। उन्हें सत्य का अभ्यास न करने और कलीसिया के जीवन में रुकावट डालते देख कर मुझे गुस्सा आता था, और मैंने उनका ईमानदारी और कठोरता से खुलासा किया था। पर अपने पिता के बारे में सच क्यों नहीं लिख पा रही थी? मुझे लगा, मैं ईमानदार नहीं हूँ, मेरे अंदर इंसाफ की भावना नहीं है। मैं ऐसे नाज़ुक मोड़ पर सत्य का अभ्यास या कलीसिया के कार्य की मर्यादा कायम नहीं रख पा रही थी बल्कि मैं जज़्बात में बहकर अपने पिता को बचा रही थी, उनके पापों को छुपा रही थी और सत्य के सिद्धान्तों के खिलाफ़ जा रही थी। ऐसा करना क्या शैतान का साथ देना और परमेश्वर का दुश्मन होना नहीं है? यह सोच कर, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और माफी मांगी। "मैं अब भावनाओं के आधार पर काम नहीं करूंगी। मैं अपने पिता के प्रति ईमानदारी बनूंगी।"

प्रार्थना के बाद, मैंने उनके उजागर हुए कुछ पापों के बारे में सोचा और एक-एक करके उन्हें लिखा। सुसमाचार उपयाजक के तौर पर काम करते हुए, वो अपने सहकर्मी भाई झांग के प्रति पूर्वाग्रही हो गए। उन्होंने दूसरे भाई-बहनों के सामने उनकी आलोचना की और उनसे भेदभाव किया, जिससे भाई झांग तनाव और मायूसी की हालत में चले गए। अगुआ ने मेरे पिता की काँट-छाँट की और उनका निपटारा किया, लेकिन उन्होंने नहीं सुनी। जब भाई-बहनों ने इस बात पर ध्यान दिलाया, तो उन्होंने इसे स्वीकार ही नहीं किया। उन्होंने हमेशा दूसरों की कमियों पर ध्यान दिया और उनकी कमजोरियों का दोहन किया और हमेशा कहा, "मैं इतने सालों से विश्वासी रहा हूँ। मैं यह सब समझता हूँ!" जब वे मुझे अपने काम में मन लगाते देखते, तो मुझे पैसे और दूसरी सांसारिक चीज़ें हासिल करने के लिए मजबूर करते, और कर्तव्य के प्रति मेरे उत्साह को कम करने के लिए हमेशा उल्टी बातें कहते। एक बार वो कार दुर्घटना के शिकार हो गए, तो कलीसिया से भाई लिन उनकी खोज-खबर लेने और सत्य पर संगति करने गए, और कहा कि उन्हें सोचना चाहिए और सबक सीखना चाहिए, लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने तथ्यों को बिगाड़ा, और अफवाह फैलाई कि भाई लिन उन्हें चिढ़ाने आए थे। इससे कुछ भाई-बहन भाई लिन के खिलाफ हो गए। जिससे मुझे बहुत धक्का लगा और गुस्सा आया। मैंने सोचा, "क्या ये सच में मेरे पिता हैं? क्या वो पापी नहीं हैं?" मैं हमेशा यही सोचती रही कि अपनी आस्था के इतने बरसों में वो सुसमाचार का कार्य कर रहे हैं, उन्हें तकलीफ होगी और मूल्य चुकाना होगा। जैसा वो दिखते थे, मैं उन्हें वैसा ही सच्चा विश्वासी मानती थी। मैंने कभी उनके व्यवहार पर ध्यान नहीं दिया था। मैं कितनी बेवकूफ़ और अंधी थी। मुझे खुद पर अफसोस है कि मैं भावनाओं की कितनी गुलाम थी, उन्हें आदर-प्यार देती रही और बचाती रही। तब मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ाः "जो कलीसिया के भीतर विषैली, दुर्भावनापूर्ण बातों का गुबार निकालते हैं, और साथ ही ऐसे लोग भाईयों और बहनों के बीच अफवाहें फैलाते हैं, असामंजस्यता को भड़काते हैं और गुटबाजी करते हैं, उन सभी को कलीसिया से निकाल दिया जाना चाहिए था। हालाँक, क्योंकि यह अब परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न युग है, इसलिए ऐसे लोगों को प्रतिबंधित कर दिया गया है, क्योंकि ये निश्चित रूप से हटाए जाने की वस्तुएँ हैं। शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिए गए सभी लोगों के भ्रष्ट स्वभाव हैं। हालाँकि, कुछ लोग बस भ्रष्ट स्वभावों वाले ही हैं जबकि अन्य ऐसे हैं जो इन बातों में भिन्न हैं कि न केवल उनके शैतानी स्वभाव हैं, बल्कि उनकी प्रकृति चरम रूप से विद्वेषपूर्ण है। ऐसे लोग जो कुछ भी करते और कहते हैं, उससे न केवल दूषित शैतानी स्वभाव प्रकट होता है, बल्कि यह भी प्रकट होता है कि वे असली इब्लीस शैतान हैं। ये लोग जो कुछ भी करते हैं उससे बस परमेश्वर के कार्य में बाधा ही पड़ती है; उनके सभी कृत्य भाइयों और बहनों के जीवन प्रवेश में व्यवधान उपस्थित करते हैं और कलीसिया के सामान्य कार्यकलापों को नष्ट करते हैं। भेड़ की खाल में छिपे इन भेड़ियों का कभी न कभी अवश्य ही सफाया किया जाना चाहिए, और शैतान के इन अनुचरों के प्रति एक सख्त रवैया, अस्वीकृति का रवैया अपनाया जाना चाहिए। केवल इससे ही प्रदर्शित होता है कि लोग परमेश्वर के पक्ष में खड़े हैं; और जो ऐसा करने में विफल हैं वे शैतान के साथ कीचड़ में लोट रहे हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी')। जब मैंने परमेश्वर के वचनों से अपने पिता के बर्ताव की तुलना की, तो मैंने जाना कि ये कोई सामान्य भ्रष्ट स्थिति नहीं थी जो वो दिखा रहे थे, बल्कि दुष्ट प्रकृति थी। बाहर से वे जोशीले दिखते थे और अपने कामकाज में कष्ट उठा सकते थे, और सीसीपी के उत्पीड़न के नाम पर सुसमचार का प्रचार करना जारी रख सकते थे, लेकिन वो सत्य स्वीकार नहीं कर सकते थे। उन्हें तो सत्य से नफरत थी। उनकी हरकतों ने उनकी दुष्ट प्रकृति का खुलासा कर दिया। वो शैतान को मानने वाले पापी थे, उन्हें तो निकाल दिया जाना चाहिए। भले ही मैं उनकी बेटी थी, लेकिन मैं अपनी भावनाओं के अनुसार कार्य नहीं कर सकती थी। मुझे अपनी आस्था में परमेश्वर का साथ देना था और शैतान को बेनकाब और उसका त्याग करना था। मैंने अपने समूह के भाई-बहनों के बारे में सोचा जिन्हें इस बारे में कुछ पता नहीं था। मुझे उनसे संगति करनी थी और अपने पिता की दुष्टता का खुलासा करना था ताकि वो उन्हें और बेवकूफ न बना सकें। पर फिर मैंने सोचाः "कुछ लोगों को तो आस्था में उन्होंने ही शामिल किया था, जिनसे उनके अच्छे संबंध भी थे। अगर मैं उनका खुलासा करती हूँ, तो क्या वो लोग ये नहीं कहेंगे कि मेरे अंदर ज़मीर नहीं है, मैं पत्थर दिल हूँ? अगर उन्हें निकाल दिया गया और उन्होंने उद्धार पाने का मौका खो दिया, तो वो कितना दर्दनाक होगा।" यह सोच कर मुझे दुख हुआ और संगति करने की मेरी इच्छा जाती रही। मैं बिस्तर पर रात भर सोचती रही, कि अगर मैंने अपने पिता की करतूतों का खुलासा नहीं किया और भाई-बहन यूँ ही धोखे में आकर उनका पक्ष लेते रहे, तो वो भी पाप के भागी कहलाएंगे। अगर उन्हें गुमराह होते देखकर भी मैं उनसे संगति न करूँ, तो क्या मैं उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा रही हूँ? ये सोच कर मुझे अफसोस हुआ और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना कीः "हे परमेश्वर, मैं बहुत परेशान हूँ। मुझे विश्वास और शक्ति दें, मुझे सत्य का अभ्यास करने और पापियों का खुलासा करने का रास्ता दिखाएं।"

प्रार्थना के बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों के इस अंश को पढ़ाः "परमेश्वर के वचनों में, लोगों को एक दूसरे साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए इसके संबंध में कौन से सिद्धांत का उल्लेख किया गया है? उससे प्रेम करो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, और उससे नफ़रत करो जिससे परमेश्वर नफ़रत करता है। अर्थात्, परमेश्वर जिन्हें प्यार करता है, लोग जो वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित करते हैं, ये वही लोग हैं जिनसे तुम्हें प्रेम करना चाहिए। जो लोग परमेश्वर की इच्छा को कार्यान्वित नहीं करते हैं, परमेश्वर से घृणा करते हैं, उसकी अवज्ञा करते हैं, और जिनसे वो नफरत करता है, ये ही वे लोग हैं जिन्हें हमें भी तिरस्कृत और अस्वीकार करना चाहिए। यही है वह जो परमेश्वर के वचन द्वारा अपेक्षित है। ... अनुग्रह के युग के दौरान, प्रभु यीशु ने कहा, 'कौन है मेरी माता? और कौन हैं मेरे भाई? ... क्योंकि जो कोई मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई, और मेरी बहिन, और मेरी माता है।' यह कहावत अनुग्रह के युग में पहले से मौजूद थी, और अब परमेश्वर के वचन और भी अधिक उपयुक्त हैं : 'उससे प्रेम करो, जिससे परमेश्वर प्रेम करता है और उससे घृणा करो, जिससे परमेश्वर घृणा करता है।' ये वचन बिलकुल सीधे हैं, फिर भी लोग अकसर इनका वास्तविक अर्थ नहीं समझ पाते। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर द्वारा शापित है, लेकिन बाहर से देखने पर वह काफी अच्छा लगता है, या वह तुम्हारी माता या पिता या कोई संबंधी है, तो संभवत: तुम उस व्यक्ति से घृणा न कर पाओ, और संभवत: तुम दोनों में बड़ी घनिष्ठता और नज़दीकी संबंध भी हो। जब तुम परमेश्वर से ऐसे वचन सुनते हो, तो बेचैन हो जाते हो और उस व्यक्ति के प्रति अपना दिल कठोर नहीं कर पाते या उसका त्याग नहीं कर पाते। ऐसा इसलिए है, क्योंकि एक पारंपरिक धारणा है, जो तुम्हें बाँधती है। तुम सोचते हो कि यदि तुम ऐसा करोगे, तो स्वर्ग के कोप के भागीदार होगे, स्वर्ग द्वारा दंडित किए जाओगे, यहाँ तक कि समाज द्वारा त्याग दिए जाओगे, और जनमत द्वारा ख़ारिज कर दिए जाओगे। इतना ही नहीं, एक इससे भी अधिक व्यावहारिक समस्या यह होगी कि यह तुम्हारे अंत:करण पर बोझ बन जाएगा। यह अंत:करण तुम्हारे माता-पिता द्वारा तुम्हें बचपन से सिखाई गई बातों से बनता है, या फिर सामाजिक संस्कृति के प्रभाव या संक्रमण से, जिनमें से कोई भी तुम्हारे भीतर सोच के ऐसे तरीके की जड़ रोप देता है, कि तुम परमेश्वर के वचन का अभ्यास नहीं कर पाते और उससे प्यार नहीं कर पाते, जिससे वह प्यार करता है और उससे घृणा नहीं कर पाते, जिससे वह घृणा करता है। हालाँकि अंदर से तुम जानते हो कि तुम्हें उनसे घृणा करनी चाहिए और उन्हें नामंज़ूर कर देना चाहिए, क्योंकि जीवन तुम्हें परमेश्वर से मिला है, तुम्हारे माता-पिता ने नहीं दिया। इंसान को परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और स्वयं को उसे लौटा देना चाहिए। हालाँकि तुम दोनों ऐसा कहते और सोचते हो, लेकिन तुम बस अपना मन बदलकर इसे अभ्यास में नहीं ला सकते। क्या तुम लोग जानते हो कि यहाँ क्या चल रहा है? ऐसा है कि इन चीज़ों ने तुम्हें कसकर और पूरी तरह से बाँध रखा है। शैतान इन चीज़ों का इस्तेमाल तुम्हारे विचारों, तुम्हारे दिमाग और तुम्हारे दिल को बाँधने के लिए करता है, ताकि तुम परमेश्वर के वचनों को स्वीकार न कर सको। ऐसी चीज़ों ने तुम्हें पूरी तरह से भर दिया है, इस बिंदु तक कि तुम्हारे भीतर परमेश्वर के वचनों के लिए कोई स्थान नहीं है। इतना ही नहीं, यदि तुम उसके वचनों का अभ्यास करने का प्रयास करते हो, तो ये चीज़ें तुम्हें भीतर से प्रभावित करती हैं और तुम्हें उसके वचनों और अपेक्षाओं के साथ संघर्षरत कर देती हैं, और तुम्हें इन ग्रंथियों से खुद को छुड़ाने और इस बंधन से आज़ाद होने में अक्षम बना देती हैं" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट दृष्टिकोणों को जानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो')। तब मैं समझ गई, परमेश्वर चाहते हैं कि वो जिसे प्रेम करते हैं उसे हम भी प्रेम करें और जिससे वे नफ़रत करते हैं उससे हम भी नफ़रत करें। जो लोग परमेश्वर की इच्छानुसार काम करते और सत्य से प्रेम करते हैं उनसे हमें प्रेम करना चाहिए, जबकि वो पापी जो सत्य से नफ़रत करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं उनसे हमें नफ़रत करनी चाहिए। केवल यही अभ्यास परमेश्वर की इच्छा से मेल खाता है। लेकिन पिता के मामले में मैं हमेशा दिल से सोचती थी। मैं उन्हें बचा लेती थी और उनके दोषों पर पर्दा डाल देती थी। मैंने परमेश्वर की पसंद-नापसंद के अनुसार काम नहीं किया। क्योंकि शैतान की इस अवधारण ने "पानी की तुलना में खून अधिक गाढ़ा होता है" और "मनुष्य निर्जीव नहीं है; वह भावनाओं से मुक्त कैसे हो सकता है?" ने मेरे दिल को जकड़ रखा था। मैं पाप-पुण्य में भेद नहीं कर पा रही थी, सोचती थी कि अपने पिता के पाप का खुलासा करना अपमानजनक और शर्मनाक होगा। लोग मेरी आलोचना करेंगे और मुझे बुरा-भला कहेंगे। तो खून के रिश्ते को बचाने के लिए मैंने सत्य की मर्यादा नहीं रखी और एक ऐसे पापी का खुलासा नहीं किया जो परमेश्वर के घर के कार्य और भाई-बहनों के जीवन के प्रति लापरवाह था। ये बेहद शर्मनाक और मानवीयता से रहित था। मैंने देखा कि शैतान की अवधारणाएँ मुझे सत्य का अभ्यास करने से रोक रही हैं, और मैं न चाहते हुए भी परमेश्वर का विरोध कर रही थी और शैतान का साथ दे रही थी। बल्कि परमेश्वर ने कभी नहीं कहा कि शैतान और दुष्ट लोगों से निपटते समय हमें जमीर की सुननी चाहिए, न ही यह कहा कि शैतान को मानने वाले प्रियजनों का तिरस्कार अनैतिक है। व्यवस्था के युग में अय्यूब के अविश्वासी बच्चे आपदा में मारे गए थे, लेकिन अय्यूब ने परमेश्वर से भावुक होकर न तो कभी उन अविश्वासी बच्चों के पक्ष में बात की और न ही कभी उनकी शिकायत की। बल्कि उसने परमेश्वर की प्रशंसा की। हाँ। अनुग्रह के युग में, पतरस के माता-पिता उसे रोकने के लिए उसकी आस्था के रास्ते में आ गए, तो उसने परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए उन्हें, घर को और हर चीज़ दोनों को छोड़ दिया, और परमेश्वर की प्रशंसा हासिल की। अय्यूब और पतरस के अनुभवों के बारे में सोचते हुए, मैं परमेश्वर की इस बात को समझ पाई कि उससे प्रेम करो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, उससे नफ़रत करो जिससे परमेश्वर नफ़रत करता है।

तब मैंने परमेश्वर के और भी वचनों को पढ़ाः "शैतान कौन है, दुष्टात्माएँ कौन हैं, और परमेश्वर के शत्रु कौन हैं, क्या ये वे लोग नहीं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते और परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं? क्या ये वे लोग नहीं हैं जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी नहीं हैं? क्या ये वे नहीं जो सिर्फ़ ज़बानी तौर पर विश्वास करने का दावा करते हैं, परंतु उनमें सत्य नहीं हैं? क्या ये लोग वे नहीं हैं जो आशीषों को पाने की फ़िराक में रहते हैं परंतु परमेश्वर के लिए गवाही नहीं बन सकते हैं? तुम आज भी इन दुष्टात्माओं के साथ घुलतेमिलते हो और उनके प्रति विवेक और प्रेम रखते हो, लेकिन इस मामले में क्या तुम शैतान के प्रति सद्भावना नहीं दिखा रहे? क्या तुम दुष्टात्माओं के साथ संबद्ध नहीं हो रहे? यदि इन दिनों में भी लोग अच्छे और बुरे में भेद नहीं कर सकते, और परमेश्वर की इच्छा जानने का कोई इरादा मन में लिए बिना, आँखें मूँदकर प्रेम और दया दर्शाते रह सकते हैं, या परमेश्वर के इरादों को अपना इरादा मानने में किसी भी तरह सक्षम नहीं हैं, तो उनका अंत और भी अधिक दुःखदायी होगा। ... यदि तुम उनके साथ सहज हो जिनसे मैं घृणा करता हूँ, और जिनसे मैं असहमत हूँ, और तुम तब भी उनके प्रति प्रेम और व्यक्तिगत सद्भावनाएँ रखते हो, तब क्या तुम आज्ञाकारी हो? क्या तुम जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं कर रहे हो? क्या ऐसे व्यक्ति में सत्य है? यदि लोग शत्रुओं को स्थान देते हैं, दुष्टात्माओं से प्रेम और शैतान पर दया दिखाते हैं, तो क्या वे जानबूझकर परमेश्वर के कार्य में रूकावट नहीं डाल रहे हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे')। इसे पढ़कर मैं बहुत व्यथित और अपराध-बोध से ग्रसित हो गई। मैं जानती थी मेरे पिता को सत्य से नफ़रत है और उन्होंने कलीसिया के जीवन में हमेशा रुकावट डाली है, उनकी प्रकृति और सार पापी है, पर मैंने उनके प्रति दिल से सोचना, और उन्हें बचाना जारी रखा। क्या परमेश्वर के कहने का यही अर्थ नहीं है? "लेकिन इस मामले में क्या तुम शैतान के प्रति सद्भावना नहीं दिखा रहे" और "दुष्टात्माओं के साथ संबद्ध नहीं हो रहे?" क्या मैं बेशर्मी से परमेश्वर का विरोध करके कलीसिया के कार्य में रुकावट नहीं डाल रही थी? परमेश्वर के घर में, सत्य और धार्मिकता का राज चलता है। दुष्ट लोगों और मसीह-विरोधियों सहित, शैतान की कोई भी दुष्ट ताकत, बच नहीं सकती। परमेश्वर उन्हें उजागर करके खत्म कर देंगे और कलीसिया से निकाल देंगे। ये परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव से तय होता है। आमीन। लेकिन मैं एक पापी व्यक्ति को बचा रही थी, उन्हें परमेश्वर के घर में रोकने की कोशिश कर रही थी। क्या मैं कलीसिया के जीवन में पापी व्यक्ति की गड़बड़ी को बर्दाश्त नहीं कर रही थी? क्या मैं पापी दुश्मन की मदद और परमेश्वर का विरोध नहीं कर रही थी? इसी तरह से चलते रहने का मतलब होगा उस पापी के साथ परमेश्वर से खुद भी दण्ड पाना। यह सोच कर मैं डर गई। मैंने देखा परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव अपमान सहन नहीं करता और ऐसे पापी को निजी भावनाओं के वशीभूत होकर बचाने की कोशिश करना बहुत खतरनाक है! अब मैं दिल से नहीं सोच सकती। भले ही वो मेरे पिता थे, मुझे सत्य का अभ्यास करना होगा, जो परमेश्वर को पसंद है उसे पसंद करना और जिससे वो नफ़रत करते हैं उससे नफ़रत करना है और परमेश्वर के गृह-कार्य के हितों को कायम रखना है।

इसके बाद मैं अपने समूह के साथ एक सभा में गई और अपने पिता के व्यवहार और सभी पापों के बारे में उन्हें बता दिया। उनके द्वारा गुमराह हुए भाई-बहन अब उनके सार को समझ गए थे। बाद में कलीसिया ने मेरे पिता को निकालने का नोटिस दे दिया। फिर मैंने घर जाकर उन्हें इसे पढ़ कर सुनाया और उनके दुष्ट व्यवहार के बारे में बात की। मुझे झटका लगा जब उन्होंने उपेक्षा से कहा, "मुझे पता था वो मुझे निकाल देंगे। मैंने परमेश्वर की कृपा पाने के लिए इतने साल विश्वास रखा, नहीं तो मैंने पहले ही विश्वास रखना छोड़ दिया होता।" ये देखकर कि उन्हें कोई पछतावा नहीं है मैं जान गई कि उनकी पापी प्रकृति खुल कर सामने आ गई है। मेरे पिता के निकाले जाने के बाद कलीसिया में रुकावट डालने वाला कोई पापी नहीं बचा था। सभाओं में भाई-बहन परमेश्वर के वचन पढ़ सकते थे और बिना किसी रुकावट के सत्य की संगति कर सकते थे। वे अपना काम ठीक से कर रहे थे, और कलीसिया का जीवन फल-फूल रहा था। मैंने देखा परमेश्वर के घर में, सत्य और धार्मिकता का राज है, और जब हम परमेश्वर के वचनों के अनुसार सत्य का अभ्यास करते हैं, तो हमें उनका मार्गदर्शन और आशीर्वाद मिलता है। परमेश्वर का धन्यवाद। धीरे-धीरे मैंने अपने पिता के बारे में अपनी भावनाओं से मुक्ति पा ली और आखिरकार मैं सत्य का थोड़ा-बहुत अभ्यास और कलीसिया के कामों में सहायता करने योग्य बन पाई। ये सब परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से हासिल हो पाया!

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